भारतकोश
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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
* अध्याय १४ *९९
एवं विज्ञापितो देव्या देवो देववरः प्रभुः।<br>ससर्ज सहसा रुद्रं दक्षयज्ञजिघांसया ॥ ३७ ॥<br><br>सहस्रशीर्षपादं च सहस्राक्षं महाभुजम्।<br>सहस्रपाणिं दुर्धर्षं युगान्तानलसंनिभम् ॥ ३८ ॥<br><br>दंष्ट्राकरालं दुष्प्रेक्ष्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दण्डहस्तं महानादं शार्ङ्गिणं भूतिभूषणम् ॥ ३९ ॥<br><br>वीरभद्र इति ख्यातं देवदेवसमन्वितम्।<br>स जातमात्रो देवेशमुपतस्थे कृताञ्जलिः ॥ ४० ॥देवीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवताओंमें श्रेष्ठ प्रभु भगवान् (शंकर)-ने दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेके लिये शीघ्र ही हजारों सिर एवं पैरवाले, हजारों आँखवाले, विशाल भुजायुक्त, हजारों हाथवाले, दुर्जेय प्रलयकालीन अग्निके समान, भयंकर दाढ़युक्त, देखनेमें भयंकर, शंख, चक्र तथा गदा धारण किये, हाथमें दण्ड धारण करनेवाले, घोर नाद करनेवाले, सींगसे बने धनुषको धारण किये, विभूतिसे सुशोभित तथा अनेक देवताओंसे घिरे हुए वीरभद्र नामवाले रुद्रको उत्पन्न किया। उत्पन्न होते ही वह हाथ जोड़कर देवताओंके स्वामी भगवान् शंकरके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥ ३७—४० ॥
तमाह दक्षस्य मखं विनाशय शिवोऽस्त्विति।<br>विनिन्द्य मां स यजते गङ्गाद्वारे गणेश्वर ॥ ४१ ॥<br><br>ततो बन्धुप्रयुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया।<br>वीरभद्रेण दक्षस्य विनाशमगमत् क्रतुः ॥ ४२ ॥<br><br>मन्युना चोमया सृष्टा भद्रकाली महेश्वरी।<br>तया च सार्धं वृषभं समारुह्य ययौ गणः ॥ ४३ ॥<br><br>अन्ये सहस्रशो रुद्रा निसृष्टास्तेन धीमता।<br>रोमजा इति विख्यातास्तस्य साहाय्यकारिणः ॥ ४४ ॥<br><br>शूलशक्तिगदाहस्ताष्टङ्कोपलकराज्जथा ।<br>कालाग्निरुद्रसंकाशा नादयन्तो दिशो दश ॥ ४५ ॥<br><br>सर्वे वृषासनारूढाः सभार्याश्चातिभीषणाः।<br>समावृत्य गणश्रेष्ठं ययुर्दक्षमखं प्रति ॥ ४६ ॥(शंकरने उससे कहा—) गणेश्वर! दक्षके यज्ञका विध्वंस करो, वह गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में मेरी निन्दा करते हुए यज्ञ कर रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। तदनन्तर बन्धु (शिव)-के द्वारा निर्दिष्ट वीरभद्रने सिंहके समान लीला करते हुए अकेले ही दक्षके यज्ञका विध्वंस कर दिया। उमाने भी क्रोध करते हुए महेश्वरी भद्रकालीको उत्पन्न किया, उसके साथ वृषभपर आरूढ़ होकर वह गण (वीरभद्र) वहाँ (गङ्गाद्वार यज्ञमें) गया। बुद्धिमान् उन शंकरने उनकी सहायता करनेवाले हजारों दूसरे रुद्रोंको भी उत्पन्न किया। (शंकरके) रोमोंसे उत्पन्न होनेके कारण वे रुद्र 'रोमज' कहलाये। हाथोंमें त्रिशूल, शक्ति, गदा, टङ्क (पत्थर तोड़नेके हथियार—घन, हथौड़ा, छेनी आदि) तथा पत्थर लिये हुए और कालाग्नि रुद्रके समान अत्यन्त भीषण सभी अपनी-अपनी भार्याओंके साथ वृषभरूप आसनपर आरूढ़ होकर दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए गणोंमें सर्वश्रेष्ठ वीरभद्रको अपने समूहके बीच रखते हुए जहाँ दक्षयज्ञ हो रहा था, उस ओर चल पड़े ॥ ४१—४६ ॥
सर्वे सम्प्राप्य तं देशं गङ्गाद्वारमिति श्रुतम्।<br>ददृशुर्यज्ञदेशं तं दक्षस्यामिततेजसः ॥ ४७ ॥<br><br>देवाङ्गनासहस्राढ्यमप्सरोगीतिनादितम् ।<br>वीणावेणुनिनादाढ्यं वेदवादाभिनादितम् ॥ ४८ ॥<br><br>दृष्ट्वा सहर्षिभिर्देवैः समासीनं प्रजापतिम्।<br>उवाच भद्रया रुद्रैर्वीरभद्रः स्मयन्निव ॥ ४९ ॥गङ्गाद्वार (हरिद्वार) नामसे प्रसिद्ध उस देशमें पहुँचकर उन सभीने अमित तेजस्वी दक्षके उस यज्ञस्थलको देखा, जो हजारों देवाङ्गनाओंसे सुशोभित था, अप्सराओंके गीतोंसे मुखरित था, वीणा तथा वेणुके निनादसे प्रतिध्वनित और वेद-मन्त्रोंसे गुञ्जित था। देवताओं तथा ऋषियोंके साथ बैठे हुए प्रजापति दक्षको देखकर भद्रकाली तथा रुद्रोंसहित वीरभद्रने हँसते हुए कहा— ॥ ४७—४९ ॥

१०० * कूर्मपुराण *


वयं ह्यनुचराः सर्वे शर्वस्यामिततेजसः।<br>भागाभिलिप्सया प्राप्ता भागान् यच्छध्वमीप्सितान्॥ ५० ॥हम सभी अमित तेजस्वी शंकरके अनुचर हैं, यज्ञमें भाग प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आये हैं, आप हमें अभीप्सित यज्ञभाग प्रदान करें। अथवा श्रेष्ठ मुनियो और देवताओ! आप हमें यह बतलायें कि किसने आपको ऐसी आज्ञा दी है कि मुझे यज्ञभाग न दें और आप लोगोंका ही सब भाग है। जो ऐसी आज्ञा देनेवाला है, उसे बतलायें, फिर हम उसे देख लेंगे। गणोंके स्वामी वीरभद्रके ऐसा कहे जानेपर प्रजापति दक्षसहित देवताओंने प्रभु (वीरभद्र)-से कहा—'आपको यज्ञभाग देने-सम्बन्धी मन्त्र नहीं हैं'॥ ५०–५२॥<br><br>(यह सुनकर वेद-) मन्त्रोंने (मूर्तिमान् स्वरूप धारणकर) देवताओंसे कहा—आपका मन तमोगुणसे आक्रान्त हो गया है, इसीलिये आप यज्ञके स्वामी महेश्वरकी पूजा नहीं कर रहे हैं। सभी प्राणियोंके एकमात्र स्वामी और सभी प्राणियोंके शरीर-रूप तथा समस्त अभ्युदय एवं सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले हर (शंकर) सभी यज्ञोंमें पूजित होते हैं। ईशान अर्थात् शंकरके बारेमें ऐसा कहे जानेपर भी मायाके कारण नष्ट चेतनावाले देवोंने (जब उनकी बातको) नहीं माना, तब मन्त्र उन्हें छोड़कर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर भार्या और गणेश्वरोंसहित उन (वीरभद्रस्वरूप) रुद्रने ब्रह्मर्षि दधीचको हाथोंसे स्पर्श करते हुए देवताओंसे कहा— ॥ ५३–५६ ॥<br><br>तुम लोगोंने अपने बलसे गर्वित होकर मन्त्रोंको प्रमाण नहीं माना, इसलिये इसे सहन न कर मैं आज बलपूर्वक सभीके गर्वको नष्ट करूँगा। ऐसा कहकर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने उस यज्ञशालाको जला डाला और गणेश्वरोंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर (यज्ञशालाके) यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। भयानक सभी गणेश्वरोंने आहुति देनेवालोंसहित पाठ करनेवालों एवं घोड़ेको भी पकड़कर गङ्गाके प्रवाहमें फेंक दिया। प्रदीप्त आत्मावाले तथा दीनतारहित वीरभद्रने भी इन्द्रके उठे हुए सौ हाथों तथा अन्य देवताओंके उठे हुए हाथोंको स्तम्भित कर दिया। उन्होंने नाखूनोंके अग्रभागसे खेल-खेलमें ही भग (देवता)-के नेत्रोंको उखाड़ डाला, मुक्केसे मारकर पूषा (देवता)-के दाँतोंको तोड़ डाला ॥ ५७–६१ ॥
अथ चेत् कस्यचिदियमाज्ञा मुनिसुरोत्तमाः।<br>भागो भवद्भ्यो देयस्तु नास्मभ्यमिति कथ्यताम्।<br>तं ब्रूताज्ञापयति यो वेत्स्यामो हि वयं ततः ॥ ५१ ॥
एवमुक्ता गणेशेन प्रजापतिपुरःसराः।<br>देवा ऊचुर्यज्ञभागे न च मन्त्रा इति प्रभुम्॥ ५२ ॥
मन्त्रा ऊचुः सुरान् यूयं तमोपहतचेतसः।<br>ये नाध्वरस्य राजानं पूजयध्वं महेश्वरम्॥ ५३ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां सर्वभूततनुर्हरः।<br>पूज्यते सर्वयज्ञेषु सर्वाभ्युदयसिद्धिदः॥ ५४ ॥
एवमुक्ता अपीशानं मायया नष्टचेतसः।<br>न मेनिरे ययुर्मन्त्रा देवान् मुक्त्वा स्वमालयम्॥ ५५ ॥
ततः स रुद्रो भगवान् सभार्यः सगनेश्वरः।<br>स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्मर्षिं दधीचं प्राह देवताः॥ ५६ ॥
मन्त्राः प्रमाणं न कृता युष्माभिर्बलगर्वितैः।<br>यस्मात् प्रसह्म तस्माद् वो नाशयाम्यद्य गर्वितम्॥ ५७ ॥
इत्युक्त्वा यज्ञशालां तां ददाह गणपुङ्गवः।<br>गणेश्वराश्च संक्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः॥ ५८ ॥
प्रस्तोत्रा सह होत्रा च अश्वं चैव गणेश्वराः।<br>गृहीत्वा भीषणाः सर्वे गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः॥ ५९ ॥
वीरभद्रोऽपि दीप्तात्मा शक्रस्योद्यच्छतः करम्।<br>व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्॥ ६० ॥
भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया।<br>निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णश्चैवमपातयत्॥ ६१ ॥
* अध्याय १४ *१०१
तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया।<br>धर्षयामास बलवान् स्मयमानो गणेश्वरः॥ ६२॥<br><br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन मुनीनपि मुनीश्वराः॥ ६३॥<br><br>तथा विष्णुं सगरुडं समायान्तं महाबलः।<br>विव्याध निशितैर्बाणैः स्तम्भयित्वा सुदर्शनम्॥ ६४॥<br>समालोक्य महाबाहुरगत्य गरुडो गणम्।<br>जघान पक्षैः सहसा ननादाम्बुनिधिर्यथा॥ ६५॥<br><br>ततः सहस्त्रशो भद्रः ससर्ज गरुडान् स्वयम्।<br>वैनतेयादभ्यधिकान् गरुडं ते प्रदुद्रुवुः॥ ६६॥<br><br>तान् दृष्ट्वा गरुडो धीमान् पलायत महाजवः।<br>विसृज्य माधवं वेगात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७॥<br><br>अन्तर्हिते वैनतेये भगवान् पद्मसम्भवः।<br>आगत्य वारयामास वीरभद्रं च केशवम्॥ ६८॥<br>प्रसादयामास च तं गौरवात् परमेष्ठिनः।<br>संस्तूय भगवानीशः साम्बस्तत्रागमत् स्वयम्॥ ६९॥<br><br>वीक्ष्य देवाधिदेवं तं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।<br>तुष्टाव भगवान् ब्रह्मा दक्षः सर्वे दिवौकसः॥ ७०॥<br><br>विशेषात् पार्वतीं देवीमीश्वरार्धशरीरिणीम्।<br>स्तोत्रैर्नानाविधैर्दक्षः प्रणम्य च कृताञ्जलिः॥ ७१॥<br><br>ततो भगवती देवी प्रहसन्ती महेश्वरम्।<br>प्रसन्नमानसा रुद्रं वचः प्राह घृणानिधिः॥ ७२॥<br>त्वमेव जगतः स्रष्टा शासिता चैव रक्षकः।<br>अनुग्राह्यो भगवता दक्षश्चापि दिवौकसः॥ ७३॥<br><br>ततः प्रहस्य भगवान् कपर्दी नीललोहितः।<br>उवाच प्रणतान् देवान् प्राचेतसमथो हरः॥ ७४॥<br><br>गच्छध्वं देवताः सर्वाः प्रसन्नो भवतामहम्।<br>सम्पूज्यः सर्वयज्ञेषु न निन्द्योऽहं विशेषतः॥ ७५॥इसी प्रकार लीला करते हुए बलशाली गणेश्वर वीरभद्रने हँसकर पैरके अँगूठेसे चन्द्रमाको धर्षित कर (रौंद) दिया। अग्नि (देवता)-के दोनों हाथोंको काटकर लीलासे ही उनकी जीभ उखाड़ दी। मुनीश्वरो! उन्होंने पैरसे मुनियोंके मस्तकपर भी प्रहार किया। साथ ही (उस) महाबली (वीरभद्र)-ने सुदर्शनचक्रको स्तम्भित कर गरुडपर बैठकर आते हुए विष्णुको भी तीक्ष्ण बाणोंसे विद्ध (चोटिल) कर दिया॥ ६२-६४॥<br><br>महाबाहु गरुडने वहाँ आकर गण (वीरभद्र)-को देखकर अचानक उन्हें अपने पंखोंसे मारा और समुद्रके समान गर्जन किया। तदनन्तर उन वीरभद्रने भी स्वयं हजारों गरुडोंको उत्पन्न कर डाला, जो विनतापुत्र गरुडसे भी अधिक बलशाली थे, वे सभी गरुडके ऊपर टूट पड़े। उन (वीरभद्रद्वारा उत्पन्न) गरुडोंको देखकर बुद्धिमान् वे गरुड विष्णुको छोड़कर बड़े ही वेगसे भाग उठे, यह एक आश्चर्यकी बात थी। विनताके पुत्र गरुडके अन्तर्धान हो जानेपर कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माने वहाँ उपस्थित होकर वीरभद्र तथा केशवको (युद्ध करनेसे) रोका॥ ६५-६८॥<br><br>परमेष्ठी ब्रह्माकी महत्ताको समझकर (वीरभद्रने उनकी) स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। (उस समय) पार्वतीसहित साक्षात् भगवान् शंकर भी वहाँ आये। सभी गणोंसे घिरे हुए पार्वतीसहित उन देवाधिदेव शंकरको देखकर भगवान् ब्रह्मा, दक्ष तथा द्युलोकमें रहनेवाले सभी देवता उनकी (भगवान् शंकरकी) स्तुति करने लगे। दक्षने विशेषरूपसे शंकरकी अर्धाङ्गिनी देवी पार्वतीको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे प्रसन्न किया। तदनन्तर दयाकी निधि देवी भगवतीने हँसते हुए प्रसन्न-मनसे महेश्वर रुद्रसे यह वचन कहा- ॥ ६९-७२॥<br><br>आप ही संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा आप ही शासन करनेवाले एवं रक्षक हैं। आप भगवान्‌को दक्ष तथा देवताओंपर कृपा करनी चाहिये। तदनन्तर जटा धारण करनेवाले नीललोहित भगवान् हरने हँसकर देवताओं तथा प्रचेतापुत्र दक्षसे कहा-॥ ७३-७४॥<br><br>देवताओ! आप सभी लोग जायें। मैं आपपर प्रसन्न हूँ। सभी यज्ञोंमें विशेषरूपसे मेरी पूजा करनी चाहिये और मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ७५॥

१०२ * कूर्मपुराण *

त्वं चापि शृणु मे दक्ष वचनं सर्वरक्षणम्। त्यक्त्वा लोकैषणानेतां मद्भक्तो भव यत्नतः ॥ ७६ ॥

भविष्यसि गणेशानः कल्पान्तेऽनुग्रहान्मम । तावत् तिष्ठ ममादेशात् स्वाधिकारेषु निर्वृतः ॥ ७७ ॥

एवमुक्त्वा स भगवान् सपत्नीकः सहानुगः। अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामिततेजसः ॥ ७८ ॥

अन्तर्हिते महादेवे शंकरे पद्मसंभवः। व्याजहार स्वयं दक्षमशेषजगतो हितम् ॥ ७९ ॥

ब्रह्मोवाच

किं तवापगतो मोहः प्रसन्ने वृषभध्वजे । यदाचष्ट स्वयं देवः पालयैतदतन्द्रितः ॥ ८० ॥

सर्वेषामेव भूतानां हृद्येष वसतीश्वरः । पश्यन्त्येनं ब्रह्मभूता विद्वांसो वेदवादिनः ॥ ८१ ॥

स आत्मा सर्वभूतानां स बीजं परमा गतिः । स्तूयते वैदिकैर्मन्त्रैर्देवदेवो महेश्वरः ॥ ८२ ॥

तमर्चयति यो रुद्रं स्वात्मन्येकं सनातनम् । चेतसा भावयुक्तेन स याति परमं पदम् ॥ ८३ ॥

तस्मादनादिमध्यान्तं विज्ञाय परमेश्वरम् । कर्मणा मनसा वाचा समाराधय यत्नतः ॥ ८४ ॥

यत्नात् परिहरेशस्य निन्दाम आत्मविनाशिनीम् । भवन्ति सर्वदोषाय निन्दकस्य क्रिया यतः ॥ ८५ ॥

यस्त्वैष महायोगी रक्षको विष्णुरव्ययः । स देवदेवो भगवान् महादेवो न संशयः ॥ ८६ ॥

मन्यन्ते ये जगद्योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात् । मोहाद्वेदवनिष्ठत्वात् ते यान्ति नरकं नराः ॥ ८७ ॥

वेदानुवर्तिनो रुद्रं देवं नारायणं तथा । एकीभावेन पश्यन्ति मुक्तिभाजो भवन्ति ते ॥ ८८ ॥

यो विष्णुः स स्वयं रुद्रो यो रुद्रः स जनार्दनः । इति मत्वा यजेद् देवं स याति परमां गतिम् ॥ ८९ ॥

हे दक्ष! तुम भी सभीकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरे वचनको सुनो- तुम 'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ' इस लोकैषणा (यशकी इच्छा)-का परित्यागकर प्रयत्नपूर्वक मेरे भक्त बनो। इस कल्पके बीत जानेपर मेरी कृपासे तुम गणोंके अधिपति बनोगे। मेरे आदेशसे उस समयतक तुम अपने अधिकारपर शान्तिसे बने रहो॥ ७६-७७॥

ऐसा कहकर वे भगवान् शंकर पत्नी पार्वती तथा अपने अनुचरोंसहित अमित तेजस्वी दक्षके लिये अन्तर्धान (अदृश्य) हो गये। महादेव शंकरके अन्तर्धान हो जानेपर साक्षात् पद्मोद्भव ब्रह्माने समस्त संसारके लिये कल्याणकारी वचन कहे- ॥ ७८-७९॥

ब्रह्माजीने कहा-(दक्ष!) वृषभध्वज शंकरके प्रसन्न हो जानेपर क्या तुम्हारा मोह दूर हुआ? साक्षात् भगवान्ने जो तुमसे कहा है, आलस्यरहित होकर उसका पालन करो। ये परमेश्वर सभी प्राणियोंके हृदयमें निवास करते हैं। वेदवादी ब्रह्मस्वरूप विद्वान् लोग इनका दर्शन करते हैं। वे सभी प्राणियोंके आत्मा, वे ही बीजरूप तथा परम गति हैं। वैदिक मन्त्रोंके द्वारा देवदेव महेश्वरकी स्तुति की जाती है। जो उस अद्वितीय सनातन रुद्रकी अपनी आत्मामें श्रद्धायुक्त मनसे आराधना करता है, वह परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित परमेश्वरको जानकर मन, वाणी तथा कर्मसे प्रयत्नपूर्वक उनकी आराधना करो॥ ८०-८४॥

अपना ही विनाश कर डालनेवाली शंकरकी निन्दा करना प्रयत्नपूर्वक छोड़ दो, क्योंकि (भगवान् शंकरकी) निन्दा करनेवालेकी सारी क्रियाएँ दोषयुक्त ही होती हैं। जो आपके ये अव्यय तथा महायोगी विष्णु रक्षक हैं, वे भी देवताओंके देव भगवान् महादेव ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो अज्ञानसे तथा वेदमें निष्ठा न रखनेके कारण संसारके मूल कारण भगवान् विष्णुको शंकरसे पृथक् मानते हैं, वे मनुष्य नरकमें जाते हैं। वेदमार्गका अनुवर्तन करनेवाले लोग रुद्रदेव तथा नारायणको एकीभावसे देखते हैं, अतः वे मुक्तिपदके भागी होते हैं॥ ८५-८८॥

जो विष्णु हैं वे ही साक्षात् रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही जनार्दन विष्णु हैं-इस प्रकार समझकर जो देवका पूजन करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है ॥ ८९ ॥

  • अध्याय १४ * १०३

सृजत्येतज्जगत् सर्वं विष्णुस्तत् पश्यतीश्वरः।<br>इत्थं जगत् सर्वमिदं रुद्रनारायणोद्भवम्॥ ९०॥विष्णु इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं और शंकर उसकी देख-रेख करते हैं। इस प्रकार यह सारा संसार रुद्र और नारायणद्वारा ही उत्पन्न होता है॥ ९०॥
तस्मात् त्यक्त्वा हरेर्निन्दां विष्णावपि समाहितः।<br>समाश्रयेन्महादेवं शरण्यं ब्रह्मवादिनाम्॥ ९१॥इसलिये भगवान् शंकरकी निन्दाका परित्याग कर और विष्णुमें भी ध्यान लगाकर ब्रह्मवादियोंके एकमात्र शरण्य महादेवका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ब्रह्माके वचन सुनकर प्रजापति दक्ष चर्माम्बर धारण करनेवाले देव पशुपतिकी शरणमें गये। और जो दूसरे महर्षि दधीचके शापरूपी अग्निसे दग्ध हो गये थे तथा मोहवश शंकरसे द्वेष करनेवाले थे, वे पूर्वजन्मके संस्कारोंके माहात्म्य तथा ब्रह्माके वचनसे सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके कलियुगमें ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे॥ ९१-९४॥
उपश्रुत्याथ वचनं विरिञ्चस्य प्रजापतिः।<br>जगाम शरणं देवं गोपतिं कृत्तिवाससम्॥ ९२॥<br>येऽन्ये शापाग्निानिर्दग्धा दधीचस्य महर्षयः।<br>द्विषन्तो मोहिता देवं सम्बभूवुः कलिष्वथ॥ ९३॥<br><br>त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मणो वचनादिह॥ ९४॥
मुक्तशापास्ततः सर्वे कल्पान्ते रौरवादिषु।<br>निपात्यमानाः कालेन सम्प्राप्यादित्यवर्चसम्।<br>ब्रह्माणं जगतामीशमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा॥ ९५॥रौरव आदि नरकोंमें डाले गये वे सभी (शंकरसे विद्वेष करनेवाले) कल्पान्तमें यथासमय स्वयम्भूकी आज्ञासे आदित्यके समान तेजोमय जगत्के स्वामी ब्रह्मको प्राप्तकर शापसे मुक्त हो जायँगे और तपोयोगद्वारा देवताओंके स्वामी शंकरकी आराधना कर और उनकी कृपासे पुनः जैसे पहले थे वैसे ही (विप्रर्षि) हो जायँगे॥ ९५-९६॥
समाराध्य तपोयोगादीशं त्रिदशाधिपम्।<br>भविष्यन्ति यथा पूर्वं शंकरस्य प्रसादतः॥ ९६॥
एतद् वः कथितं सर्वं दक्षयज्ञनिषूदनम्।<br>शृणुध्वं दक्षपुत्रीणां सर्वासां चैव संततिम्॥ ९७॥प्रसंगवश (मैंने) यह सब दक्ष-यज्ञके विध्वंसकी कथा आप लोगोंसे कही। अब आप लोग प्रजापति दक्षकी सभी कन्याओंकी संतान-परम्पराका वर्णन सुनें॥ ९७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४॥

१०४ * कूर्मपुराण *


पंद्रहवाँ अध्याय

दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन, पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धक-द्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्ररूपमें ग्रहण करना तथा विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन

सूत उवाचसूतजी बोले—
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>ससर्ज देवान् गन्धर्वान् ऋषींश्चैवासुरोरगान्॥ १ ॥पूर्वकालमें 'प्रजाकी सृष्टि करो' इस प्रकारकी स्वयम्भू—ब्रह्माकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, असुरों तथा नागोंकी सृष्टि की।
यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः।<br>तदा ससर्ज भूतानि मैथुनेनैव धर्मतः॥ २ ॥जब सृष्टि करनेवाले उन दक्षकी वे प्रजाएँ नहीं बढ़ीं, तब उन्होंने मर्यादापूर्वक मिथुन-धर्म (स्त्री-पुरुष-संयोग)-से प्राणियोंकी सृष्टि की।
असिक्न्यां जनयामास वीरणस्य प्रजापतेः।<br>सुतायां धर्मयुक्तायां पुत्राणां तु सहस्रकम्॥ ३ ॥उन्होंने वीरण प्रजापतिकी धर्मपरायणा असिक्नी नामकी कन्यासे एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया।
तेषु पुत्रेषु नष्टेषु मायया नारदस्य सः।<br>षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वैरिण्यां वै प्रजापतिः॥ ४ ॥देवर्षि नारदकी मायासे उन पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर पुनः उन दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीसे ही साठ कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १—४॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत् सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने॥ ५ ॥(उन साठ कन्याओंमेंसे) उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको,
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत् तासां वक्ष्येऽथ विस्तरम्॥ ६ ॥दो बहुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और इसी प्रकार दो कन्याएँ अंगिराको प्रदान कीं। अब मैं उनके वंश-विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥
अरुन्धती वसुर्जाभी लम्बा भानुर्मरुत्वती।<br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी॥ ७ ॥अरुन्धती, वसु, जामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा भामिनी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ हैं।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तासां पुत्रान् निबोधत।<br>विश्वाया विश्वेदेवास्तु साध्या साध्यान्जीजनत्॥ ८ ॥इनके पुत्रोंके नाम सुनो। विश्वाके विश्वेदेव हुए और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको जन्म दिया।
मरुत्वन्तो मरुत्वत्यां वसवोऽष्टौ वसोः सुताः।<br>भानोस्तु भानवश्चैव मुहूर्ता वै मुहूर्तजाः॥ ९ ॥मरुत्वतीसे मरुद्गण हुए और वसुसे वसु नामक आठ पुत्र हुए। भानुसे भानुओं और मुहूर्तासे मुहूर्तोंकी उत्पत्ति हुई।
लम्बायाश्चाथ घोषो वै नागवीथी तु जामिजा।<br>पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो धर्मपुत्रा दश स्मृताः॥ १०॥लम्बासे घोष और जामिसे नागवीथी नामक पुत्र उत्पन्न हुए। अरुन्धतीसे सम्पूर्ण पृथ्वीसे सम्बद्ध प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और संकल्पासे संकल्प नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार धर्मके (ये) दस पुत्र कहे गये हैं॥ ७—१०॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ ११॥आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये अष्ट वसु कहे गये हैं।
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः श्रान्तो धुनिरस्तथा।<br>ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः॥ १२॥आपके वैतण्ड्य, श्रम, श्रान्त तथा धुनि नामक पुत्र हुए और ध्रुवके पुत्र संसारके संहारक भगवान् काल हैं॥ ११-१२॥
  • अध्याय १५ * | १०५ ---|---

| सोमस्य भगवान् वर्चा धरस्य द्रविणः सुतः।<br>पुरोजवोऽनिलस्य स्यादविज्ञातगतिस्तथा॥ १३॥<br><br>कुमारो ह्यनलस्यासीत् सेनापतिरिति स्मृतः।<br>देवलो भगवान् योगी प्रत्यूषस्याभवत् सुतः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य शिल्पकर्ता प्रजापतिः॥ १४॥ | भगवान् वर्चा सोमके पुत्र हैं और धरके द्रविण नामक पुत्र हैं। अनिलके पुरोजव तथा अविज्ञातगति नाम-वाले पुत्र हैं। अतुलके पुत्र कुमार हैं जो 'सेनापति' नामसे कहे जाते हैं। प्रत्यूष (नामक वसु)-के महायोगी भगवान् देवल नामक पुत्र हुए। इसी प्रकार प्रभासके प्रजापति विश्वकर्मा नामक पुत्र हैं जो शिल्पकारी हैं॥ १३-१४॥ | | अदितिर्दितिर्दनुस्तद्वदरिष्टा सुरसा तथा।<br>सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।<br>कद्रुर्मुनिश्श्व धर्मज्ञा तत्पुत्रान् वै निबोधत॥ १५॥ | अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु, मुनि तथा धर्मज्ञा— (दक्षकी ये तेरह कन्याएँ कश्यपकी पत्नियाँ हैं) उनके पुत्रोंके विषयमें सुनो—॥ १५॥ | | अंशो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा।<br>विवस्वान् सविता पूषा ह्यंशुमान् विष्णुरेव च॥ १६॥<br>तुषिता नाम ते पूर्वं चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे प्रोक्ता आदित्याश्चादितेः सुताः॥ १७॥<br>दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपाद् बलसंयुतम्।<br>हिरण्यकशिपुं ज्येष्ठं हिरण्याक्षं तथापरम्॥ १८॥<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो महाबलपराक्रमः।<br>आराध्य तपसा देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>दृष्ट्वा लेभे वरान् दिव्यान् स्तुत्वासौ विविधैः स्तवैः॥ १९॥<br>अथ तस्य बलाद् देवाः सर्व एव सुरर्षयः।<br>बाधितास्ताडिता जग्मुर्देवदेवं पितामहम्॥ २०॥<br>शरण्यं शरणं देवं शम्भुं सर्वजगन्मयम्।<br>ब्रह्माणं लोककर्तारं त्रातारं पुरुषं परम्।<br>कूटस्थं जगतामेकं पुराणं पुरुषोत्तमम्॥ २१॥ | अंश, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये सभी पूर्वकालमें चाक्षुष मन्वन्तरमें तुषित नामक देवता थे और वैवस्वत मन्वन्तरमें ये ही अदितिके पुत्र (बारह) आदित्य कहे गये हैं। दितिने कश्यपसे बलवान् दो पुत्रोंको प्राप्त किया। उनमें हिरण्यकशिपु बड़ा था, उसका अनुज हिरण्याक्ष था। दैत्य हिरण्यकशिपु महाबलशाली और पराक्रमी था। उसने तपस्याद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माकी आराधनाकर उनका दर्शन किया तथा विविध स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिकर दिव्य वरोंको प्राप्त किया। उसके पराक्रमसे पीड़ित एवं ताडित सभी देवता एवं देवर्षिगण शरण ग्रहण करने योग्य, आश्रयस्वरूप, सर्वजगन्मय, शम्भु देवस्वरूप त्राता, लोककर्ता, परमपुरुष, कूटस्थ, जगत्के एकमात्र पुराण पुरुष पुरुषोत्तम देवोंके देव पितामह ब्रह्माकी शरणमें गये॥ १६-२१॥ | | स याचितो देववरैर्मुनिभिश्च मुनीश्वराः।<br>सर्वदेवहितार्थाय जगाम कमलासनः॥ २२॥<br><br>संस्तूयमानः प्रणतैर्मुनीन्द्रैरमरैरपि।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं यत्रास्ते हरिरीश्वरः॥ २३॥<br><br>दृष्ट्वा देवं जगद्योनिं विष्णुं विश्वगुरुं शिवम्।<br>ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना कृताञ्जलिरभाषत॥ २४॥ | मुनीश्वरो ! श्रेष्ठ देवताओं तथा मुनियोंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर सभी देवताओंके कल्याण करनेकी इच्छासे कमलके आसनवाले ब्रह्मा क्षीरसागरके उत्तरी तटपर गये, जहाँ विनीत मुनीन्द्रों तथा देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए हरि ईश्वर निवास करते हैं। जगत्के मूल कारण, विश्वके गुरु, कल्याणमय, विष्णुदेवका दर्शन करके उन्होंने मस्तक झुकाकर चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर (इस प्रकार) कहा—॥ २२-२४॥ | | ब्रह्मोवाच<br><br>त्वं गतिः सर्वभूतानामनन्तोऽस्यखिलात्मकः।<br>व्यापी सर्वामरवपुर्महायोगी सनातनः॥ २५॥ | ब्रह्माने कहा— (भगवन्!) आप सभी प्राणियोंकी गति हैं, अनन्त हैं और इस सम्पूर्ण विश्वके आत्मस्वरूप हैं। आप सर्वत्र व्याप्त, सभी देवताओंके शरीररूप, महायोगी तथा सनातन हैं॥ २५॥ |

१०६* कूर्मपुराण *
त्वमात्मा सर्वभूतानां प्रधानं प्रकृतिः परा।<br>वैराग्यैश्वर्यनिरतो रागातीतो निरञ्जनः॥ २६॥<br><br>त्वं कर्ता चैव भर्ता च निहन्ता सुरविद्विषाम्।<br>त्रातुमर्हस्यनन्तेश त्राता हि परमेश्वरः॥ २७॥<br>इत्थं स विष्णुर्भगवान् ब्रह्मणा सम्प्रबोधितः।<br>प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षः पीतवासासुरद्विषः॥ २८॥<br><br>किमर्थं सुमहावीर्याः सप्रजापतिकाः सुराः।<br>इमं देशमनुप्राप्ताः किं वा कार्यं करोमि वः॥ २९॥<br><p align="center">देवा ऊचुः</p>हिरण्यकशिपुर्नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः।<br>बाधते भगवन् दैत्यो देवान् सर्वान् सहर्षिभिः॥ ३०॥<br><br>अवध्यः सर्वभूतानां त्वामृते पुरुषोत्तम।<br>हन्तुमर्हसि सर्वेषां त्वं त्रातासि जगन्मय॥ ३१॥<br><br>श्रुत्वा तद्देवैरुक्तं स विष्णुर्लोकभावनः।<br>वधाय दैत्यमुख्यस्य सोऽसृजत् पुरुषं स्वयम्॥ ३२॥<br><br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं घोररूपं भयानकम्।<br>शङ्खचक्रगदापाणिं तं प्राह गरुडध्वजः॥ ३३॥<br>हत्वा तं दैत्यराजं त्वं हिरण्यकशिपुं पुनः।<br>इमं देशं समागन्तुं क्षिप्रमर्हसि पौरुषात्॥ ३४॥<br>निशम्य वैष्णवं वाक्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>महापुरुषमव्यक्तं ययौ दैत्यमहापुरम्॥ ३५॥<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं शङ्खचक्रगदाधरः।<br>आरुह्य गरुडं देवो महामेरुरिवापरः॥ ३६॥<br>आकर्ण्य दैत्यप्रवरा महामेघरवोपमम्।<br>समाचचक्षिरे नादं तदा दैत्यपतेर्भयात्॥ ३७॥<br><p align="center">असुरा ऊचुः</p>कश्चिदागच्छति महान् पुरुषो देवचोदितः।<br>विमुञ्चन् भैरवं नादं तं जानीमोऽमरार्दन॥ ३८॥<br><br>ततः सहासुरवरैर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>संनद्धैः सायुधैः पुत्रैः प्रह्लादाद्यैस्तदा ययौ॥ ३९॥<br><br>दृष्ट्वा तं गरुडासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>पुरुषं पर्वताकारं नारायणमिवापरम्॥ ४०॥आप सभी प्राणियोंकी आत्मा, प्रधान और परा प्रकृति हैं। आप वैराग्य और ऐश्वर्यमें निरत, रागातीत तथा निरञ्जन हैं। आप ही कर्ता-भर्ता तथा देवताओंसे द्वेष रखनेवालोंके संहर्ता हैं। अनन्तेश! आप ही रक्षा करनेवाले परमेश्वर हैं, आप रक्षा करें॥ २६-२७॥<br><br>ब्रह्माके द्वारा इस प्रकार भलीभाँति प्रबुद्ध किये जानेपर विकसित कमलके समान नेत्रवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले तथा असुरोंके द्वेषी भगवान् विष्णु बोले—अत्यन्त वीर्यशाली देवताओ! आपलोग प्रजापतियोंके साथ इस स्थानपर किस कारणसे आये हैं अथवा मैं आप लोगोंका कौन-सा कार्य करूँ?॥ २८-२९॥<br><br>देवता बोले—भगवन्! ब्रह्माके द्वारा प्राप्त वरदानके कारण घमंडसे भरा हुआ हिरण्यकशिपु नामका दैत्य ऋषियोंसहित सभी देवताओंको पीड़ित कर रहा है। हे पुरुषोत्तम! आपको छोड़कर अन्य सभी प्राणियोंसे वह अवध्य है। जगन्मय! आप उसे मारनेमें समर्थ हैं, आप ही सभीके रक्षक हैं। देवताओंके द्वारा कही गयी उस बातको सुनकर संसारके रक्षक विष्णुने दैत्यप्रमुख उस हिरण्यकशिपुके वधके लिये स्वयं एक पुरुषको उत्पन्न किया। सुमेरु पर्वतके समान शरीरवाले, घोर रूपवाले, भयानक एवं हाथमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले उस पुरुषसे गरुडध्वज (विष्णु)-ने कहा॥ ३०-३३॥<br><br>तुम (अपने) पराक्रमसे उस दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मारकर पुनः इस स्थानपर शीघ्र ही वापस लौट आओ। विष्णुका वचन सुनकर शंख, चक्र, गदाधारी वह दूसरे महामेरुके समान देव गरुडपर आरूढ़ होकर भीषण नाद करते हुए अव्यक्त, महापुरुष पुरुषोत्तमको प्रणामकर (हिरण्यकशिपु) दैत्यके महानगरकी ओर गया। महामेघकी गर्जनाके समान नादको सुनकर बड़े-बड़े दैत्योंने दैत्यराजसे (हिरण्यकशिपुसे) भयपूर्वक कहा—॥ ३४-३७॥<br><br>दैत्योंने कहा—देवताओंका विनाश करनेवाले दैत्यराज! देवताओंकी प्रेरणा प्राप्त कर कोई महान् पुरुष भीषण नाद करता हुआ आ रहा है, हमें उसे जानना चाहिये। तदनन्तर मुख्य-मुख्य असुरों तथा आयुधोंसे सुसज्जित प्रह्लाद आदि पुत्रोंके साथ हिरण्यकशिपु स्वयं वहाँ गया। करोड़ों सूर्यके समान प्रभाववाले तथा दूसरे नारायणके समान पर्वताकार गरुडपर बैठे हुए उस
  • अध्याय १५ * | १०७ ---|---

दुद्रुवुः केचिदन्योन्यमूचुः सम्भ्रान्तलोचनाः ।
अयं स देवो देवानां गोप्ता नारायणो रिपुः ॥ ४१ ॥

अस्माकमव्ययो नूनं तत्सुतो वा समागतः ।
इत्युक्त्वा शस्त्रवर्षाणि ससृजुः पुरुषाय ते ।
तानि चाशेषतो देवो नाशयामास लीलया ॥ ४२ ॥

तदा हिरण्यकशिपोश्चत्वारः प्रथितौजसः ।
पुत्रा नारायणोद्भूतं युयुधुर्मेघनिःस्वनाः ।
प्रह्लादश्चाप्यनुह्लादः संह्लादो ह्लाद एव च ॥ ४३ ॥

प्रह्लादः प्राहिणोद् ब्राह्ममनुह्लादोऽथ वैष्णवम् ।
संह्लादश्चापि कौमारमाग्नेयं ह्लाद एव च ॥ ४४ ॥

तानि तं पुरुषं प्राप्य चत्वार्यस्त्राणि वैष्णवम् ।
न शेकुर्बाधितुं विष्णुं वासुदेवं यथा तथा ॥ ४५ ॥

अथासौ चतुरः पुत्रान् महाबाहुर्महाबलः ।
प्रगृह्य पादेषु करैः संचिक्षेप ननाद च ॥ ४६ ॥

विमुक्तेष्वथ पुत्रेषु हिरण्यकशिपुः स्वयम् ।
पादेन ताडयामास वेगेनोरसि तं बली ॥ ४७ ॥

स तेन पीडितोऽत्यर्थं गरुडेन तथाशुगः ।
अदृश्यः प्रययौ तूर्णं यत्र नारायणः प्रभुः ।
गत्वा विज्ञापयामास प्रवृत्तमखिलं तथा ॥ ४८ ॥

संचिन्त्य मनसा देवः सर्वज्ञानमयोऽमलः ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥ ४९ ॥

नृसिंहवपुरव्यक्तो हिरण्यकशिपोः पुरे ।
आविर्बभूव सहसा मोहयन् दैत्यपुङ्गवान् ॥ ५० ॥

दंष्ट्राकरालो योगात्मा युगान्तदहनोपमः ।
समारुह्यात्मनः शक्तिं सर्वसंहारकारिकाम् ।
भाति नारायणोऽनन्तो यथा मध्यान्दिने रविः ॥ ५१ ॥

दृष्ट्वा नृसिंहवपुषं प्रह्लादं ज्येष्ठपुत्रकम् ।
वधाय प्रेरयामास नरसिंहस्य सोऽसुरः ॥ ५२ ॥

इमं नृसिंहवपुषं पूर्वस्माद् बहुशक्तिकम् ।
सहैव त्वनुजैः सर्वैर्नाशयाशु मयेरितः ॥ ५३ ॥

पुरुषको देखकर कोई तो भाग गये और कोई भ्रान्त-दृष्टि होकर आपसमें कहने लगे—'यह निश्चित ही हमारा शत्रु और देवताओंका रक्षक वही अव्यय नारायण देव है अथवा उसका पुत्र ही यह आया है।' ऐसा कहकर वे उस पुरुषपर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, किंतु उस देवने लीलासे ही उन सभी शस्त्रोंको नष्ट कर डाला ॥ ३८—४२ ॥

तदनन्तर अतितेजस्वी तथा मेघके समान गर्जना करनेवाले प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद तथा ह्लाद नामक हिरण्यकशिपुके चार पुत्र नारायणसे उत्पन्न उस पुरुषसे युद्ध करने लगे। प्रह्लादने ब्रह्मास्त्र, अनुह्लादने वैष्णवास्त्र, संह्लादने कौमारास्त्र तथा ह्लादने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४३-४४ ॥

वे चारों अस्त्र उस वैष्णव पुरुषके पास पहुँचकर उन वासुदेव विष्णुको किसी भी प्रकार बाँधनेमें समर्थ न हो सके। तदनन्तर महाबाहु महाबलशाली उस पुरुषने उन चारों पुत्रोंके पैरोंको अपने हाथसे पकड़कर उन्हें फेंक दिया और गर्जना की। इस प्रकार पुत्रोंके फेंक दिये जानेपर बलवान् स्वयं हिरण्यकशिपुने पैरद्वारा बड़े ही वेगसे उस (पुरुष)-की छातीपर प्रहार किया। उस प्रहारसे पीड़ित होकर वह पुरुष गरुड़पर चढ़कर अदृश्य हो गया तथा शीघ्र ही वहाँ गया जहाँ प्रभु नारायण स्थित थे। वहाँ जाकर उसने सम्पूर्ण घटित वृत्तान्त उन्हें बतला दिया ॥ ४५—४८ ॥

तब सर्वज्ञानमय विमल देवने मनमें विचारकर आधा शरीर मनुष्यका एवं आधा शरीर सिंहका बनाया। नरसिंह-शरीर धारण करनेवाले अव्यक्त देव दैत्य-समूहोंको मोहित करते हुए अकस्मात् हिरण्यकशिपुके नगरमें प्रकट हो गये। भयंकर दाढ़ोंवाले योगात्मा तथा प्रलयाग्निके समान अनन्त नारायण अपनी सर्वसंहारकारिणी शक्तिपर आरूढ़ होकर उसी प्रकार प्रकाशित हो रहे थे जैसे मध्याह्नकालीन सूर्य प्रकाशमान होता है। नरसिंहका शरीर धारण किये उन्हें देखकर उस असुरने अपने बड़े लड़के प्रह्लादको नरसिंहके वधके लिये प्रेरित किया और कहा— ॥ ४९—५२ ॥

अपने सभी छोटे भाइयोंके साथ तुम पहलेसे अधिक शक्तिवाले इस नरसिंह-शरीरधारी पुरुषको मेरी प्रेरणासे शीघ्र ही मार डालो ॥ ५३ ॥

१०८ * कूर्मपुराण *

तत्संनियोगादसुरः प्रह्लादो विष्णुमव्ययम्।<br>युयुधे सर्वयत्नेन नरसिंहेन निर्जितः ॥ ५४ ॥<br><br>ततः संचोदितो दैत्यो हिरण्याक्षस्तदानुजः।<br>ध्यात्वा पशुपतेरस्त्रं ससर्ज च ननाद च ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>न हानिमकरोदस्त्रं यथा देवस्य शूलिनः ॥ ५६ ॥उसकी आज्ञा पाकर असुर प्रह्लादने सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा अव्यय विष्णुके साथ युद्ध किया, किंतु वह नरसिंहद्वारा पराजित हो गया। तदनन्तर उस (हिरण्यकशिपु)-की आज्ञा प्राप्तकर उसके छोटे भाई हिरण्याक्षने पाशुपतास्त्रका ध्यान करके उसे चलाया और गर्जना की। वह अस्त्र देवाधिदेव अमित तेजस्वी उन विष्णुकी, कोई हानि न कर सका जैसे कोई अस्त्र त्रिशूलधारी देव (शंकर)-की हानि नहीं करता ॥ ५४-५६ ॥
दृष्ट्वा पराहतं त्वस्त्रं प्रह्लादो भाग्यगौरवात्।<br>मेने सर्वात्मकं देवं वासुदेवं सनातनम् ॥ ५७ ॥<br><br>संत्यज्य सर्वशस्त्राणि सत्त्वयुक्तेन चेतसा।<br>ननाम शिरसा देवं योगिनां हृदयेशयम् ॥ ५८ ॥<br><br>स्तुत्वा नारायणैः स्तोत्रैः ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>निवार्य पितरं भ्रातॄन् हिरण्याक्षं तदाब्रवीत् ॥ ५९ ॥अस्त्रको विफल होते देखकर भाग्यशाली होनेके कारण प्रह्लादने उन देवको सर्वात्मक सनातन वासुदेव ही समझा। उसने सभी शस्त्रोंका परित्याग कर दिया और सत्त्वगुणसम्पन्न चित्तसे योगियोंके हृदयमें निवास करनेवाले देवको सिरसे प्रणाम किया तथा ऋक्, यजुष् तथा सामवेदमें प्राप्त वैष्णव स्तुतियोंके द्वारा स्तुतिकर अपने पिता (हिरण्यकशिपु), भाइयों एवं हिरण्याक्षको युद्ध करनेसे रोकते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ५७-५९ ॥
अयं नारायणोऽनन्तः शाश्वतो भगवानजः।<br>पुराणपुरुषो देवो महायोगी जगन्मयः ॥ ६० ॥<br>अयं धाता विधाता च स्वयंज्योतिर्निरञ्जनः।<br>प्रधानपुरुषस्तत्त्वं मूलप्रकृतिरव्ययः ॥ ६१ ॥<br>ईश्वरः सर्वभूतानामन्तर्यामी गुणातिगः।<br>गच्छध्वमेनं शरणं विष्णुमव्यक्तमव्ययम् ॥ ६२ ॥ये अनन्त, सनातन, अजन्मा, महायोगी, जगन्मय पुराणपुरुष भगवान् नारायण देव हैं। ये धाता, विधाता, स्वयंज्योति, निरञ्जन, प्रधानपुरुषरूप, तत्त्व, मूलप्रकृति, अव्यय, ईश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तर्यामी तथा गुणातीत हैं। इन अव्यक्त, अव्यय विष्णुकी आप लोग शरण ग्रहण करें ॥ ६०-६२ ॥
एवमुक्ते सुदुर्बुद्धिर्हिरण्यकशिपुः स्वयम्।<br>प्रोवाच पुत्रमत्यर्थं मोहितो विष्णुमायया ॥ ६३ ॥<br><br>अयं सर्वात्मना वध्यो नृसिंहोऽल्पपराक्रमः।<br>समागतोऽस्मद्भवनमिदानीं कालचोदितः ॥ ६४ ॥(प्रह्लादके) इस प्रकार कहनेपर विष्णुकी मायासे अत्यन्त मोहित दुर्बुद्धि हिरण्यकशिपुने स्वयं पुत्रसे कहा—यह थोड़े पराक्रमवाला नरसिंह सभी प्रकारसे वध करने योग्य है। कालके द्वारा प्रेरित होकर इस समय यह हमारे घरमें ही आ गया है ॥ ६३-६४ ॥
विहस्य पितरं पुत्रो वचः प्राह महामतिः।<br>मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम् ॥ ६५ ॥<br><br>कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः।<br>कालेन हन्यते विष्णुः कालात्मा कालरूपधृक् ॥ ६६ ॥<br><br>ततः सुवर्णकशिपुर्दुरात्मा विधिचोदितः।<br>निवारितोऽपि पुत्रेण युयोध हरिमव्ययम् ॥ ६७ ॥<br><br>संरक्तनयनोऽनन्तो हिरण्यनयनाग्रजम्।<br>नखैर्विदारयामास प्रह्लादस्यैव पश्यतः ॥ ६८ ॥पिताका वचन सुनकर महामति प्रह्लादने हँसकर कहा—प्राणियोंके एकमात्र स्वामी इन अव्ययकी निन्दा मत करो। सनातन, कालवर्जित, कालात्मा, कालका रूप धारण करनेवाले, महादेव विष्णु देवको काल कैसे मार सकता है। तदनन्तर भाग्यसे प्रेरित हिरण्यकशिपु पुत्रके द्वारा रोके जानेपर भी अव्यय हरिसे लड़ने लगा। (क्रोधसे) अत्यन्त लाल नेत्रोंवाले अनन्त विष्णुने प्रह्लादके देखते-ही-देखते हिरण्य (स्वर्ण)-के समान नयन हैं जिसके, उस हिरण्यनयन (हिरण्याक्ष)-के बड़े भाई हिरण्यकशिपुको अपने नखोंद्वारा विदीर्ण कर डाला ॥ ६५-६८ ॥
* अध्याय १५ *१०९
हते हिरण्यकशिपौ हिरण्याक्षो महाबलः।<br>विसृज्य पुत्रं प्रह्लादं दुद्रुवे भयविह्वलः॥ ६९॥<br><br>अनुह्लादादयः पुत्रा अन्ये च शतशोऽसुराः।<br>नृसिंहदेहसम्भूतैः सिंहैर्नीता यमालयम्॥ ७०॥<br><br>ततः संहृत्य तद्रूपं हरिर्नारायणः प्रभुः।<br>स्वमेव परमं रूपं ययौ नारायणाह्वयम्॥ ७१॥हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर भयसे विह्वल महाबली हिरण्याक्ष पुत्र प्रह्लादको छोड़कर भाग चला। नरसिंहकी देहसे उत्पन्न सिंहोंने (हिरण्यकशिपुके) अनुह्लाद आदि पुत्रों तथा अन्य सैकड़ों असुरोंको यमलोक पहुँचा दिया। तदनन्तर प्रभु नारायण हरिने उस (नरसिंह) रूपको समेटकर अपने ही नारायण नामवाले श्रेष्ठ रूपको धारण कर लिया तथा अपने धामके लिये प्रस्थान किया॥ ६९—७१॥
गते नारायणे दैत्यः प्रह्लादोऽसुरसत्तमः।<br>अभिषेकेण युक्तेन हिरण्याक्षमयोजयत्॥ ७२॥<br><br>स बाधयामास सुरान् रणे जित्वा मुनीनपि।<br>लब्ध्वान्धकं महापुत्रं तपसाराध्य शंकरम्॥ ७३॥<br><br>देवाञ्जित्वा सदेवेन्द्रान् बध्वा च धरणीमिमाम्।<br>नीत्वा रसातलं चक्रे वन्दीमिन्दीवरप्रभाम्॥ ७४॥नारायणके चले जानेपर असुरश्रेष्ठ दैत्य प्रह्लादने (अपने चाचा) हिरण्याक्षका यथोचित अभिषेक किया। उस (हिरण्याक्ष)-ने युद्धमें देवताओं और मुनियोंको जीतकर उन्हें पीड़ा पहुँचायी और तपस्याके द्वारा शंकरकी आराधना करके अन्धक नामक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त किया। उसने देवराज इन्द्रसहित सभी देवताओंको जीत लिया तथा कमलके समान कान्तिवाली इस पृथ्वीको बाँधकर रसातलमें ले जाकर बंदी बना लिया॥ ७२—७४॥
ततः सब्रह्मका देवाः परिम्लानमुखश्रियः।<br>गत्वा विज्ञापयामासुर्विष्णवे हरिमन्दिरम्॥ ७५॥तब मुरझायी हुई मुखकी शोभावाले सभी देवता ब्रह्मासहित हरिके निवासमें गये और उन्हें (सारा वृत्तान्त) बतलाया॥ ७५॥
स चिन्तयित्वा विश्वात्मा तद्वधोपायमव्ययः।<br>सर्वदेवमयं शुभ्रं वाराहं वपुरादधे॥ ७६॥<br><br>गत्वा हिरणयनयनं हत्वा तं पुरुषोत्तमः।<br>दंष्ट्रयोद्धारयामास कल्पादौ धरणीमिमाम्॥ ७७॥<br><br>त्यक्त्वा वराहसंस्थानं संस्थाप्य च सुरद्विजान्।<br>स्वामेव प्रकृतिं दिव्यां ययौ विष्णुः परं पदम्॥ ७८॥अव्यय उन विश्वात्माने उस हिरण्याक्षके वधका उपाय सोचते हुए सर्वदेवमय स्वच्छ वराहके शरीरको धारण किया। हिरण्याक्षके समीप जाकर पुरुषोत्तमने उसे मार डाला और कल्पके आदिमें (हिरण्याक्षके द्वारा रसातल ले जायी गयी) इस पृथ्वीका अपने दाढ़ोंद्वारा (उठाकर) उद्धार किया। वराह-रूपका परित्याग कर तथा देवताओं और ब्राह्मणोंको यथास्थान प्रतिष्ठित कर विष्णुने अपने ही दिव्य (चतुर्भुज)-स्वरूपको धारण किया और वे अपने परम पदकी ओर चले गये॥ ७६—७८॥
तस्मिन् हतेऽमररिपौ प्रह्लादो विष्णुतत्परः।<br>अपालयत् स्वकं राज्यं भावं त्यक्त्वा तदासुरम्॥ ७९॥<br><br>इयाज विधिवद् देवान् विष्णोराराधने रतः।<br>निःसपत्नं तदा राज्यं तस्यासीद् विष्णुवैभवात्॥ ८०॥देवताओंके शत्रु उस (हिरण्याक्ष)-के मारे जानेपर विष्णुपरायण प्रह्लाद आसुर भावका परित्याग कर अपने राज्यका पालन करने लगा। विष्णुकी आराधनामें निरत रहते हुए उसने विधिपूर्वक देवोंका यज्ञ आदिद्वारा पूजन किया। विष्णुके प्रतापसे उसका राज्य किसी प्रतिद्वन्द्वी (शत्रु) आदिसे रहित था॥ ७९-८०॥
ततः कदाचिदसुरो ब्राह्मणं गृहमागतम्।<br>तापसं नार्चयामास देवानां चैव मायया॥ ८१॥एक बारकी बात है—देवताओंकी मायाके वशीभूत असुर प्रह्लादने घरमें आये हुए तपस्वी ब्राह्मणकी पूजा नहीं की॥ ८१॥

११० * कूर्मपुराण *


स तेन तापसोऽत्यर्थं मोहितेनावमानितः।<br>शशापासुरराजानं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ८२ ॥मायासे अत्यन्त मोहित उस तपस्वी प्रह्लादके द्वारा अपमानित होकर क्रोधसे रक्तनेत्रवाले उस तपस्वी ब्राह्मणने असुरराज (प्रह्लाद)-को शाप दे डाला—जिस बलका आश्रय ग्रहणकर तुम ब्राह्मणोंकी अवमानना कर रहे हो, तुम्हारी वह दिव्य वैष्णवी भक्ति विनष्ट हो जायगी ॥ ८२-८३ ॥
यत्तद्वलं समाश्रित्य ब्राह्मणानवमन्यसे।<br>सा भक्तिर्वैष्णवी दिव्या विनाशं ते गमिष्यति ॥ ८३ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ तूर्णं प्रह्लादस्य गृहाद् द्विजः।<br>मुमोह राज्यसंसक्तः सोऽपि शापबलात् ततः ॥ ८४ ॥ऐसा कहकर वह ब्राह्मण प्रह्लादके घरसे शीघ्र ही निकल पड़ा और प्रह्लाद भी शापके प्रभावसे राज्य-संचालनमें लगे रहनेपर भी मोहग्रस्त हो गया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको पीड़ित करने लगा और जनार्दनको भूल-सा गया। पिता (हिरण्यकशिपु)-के वधका स्मरणकर वह हरि (विष्णु)-पर क्रुद्ध हो गया। तब उन दोनों सुरद्रोही प्रह्लाद और नारायणदेवमें अत्यन्त घोर रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ। बड़ा भारी युद्ध करनेके बाद विष्णुने उसे जीत लिया। पहलेके संस्कारके माहात्म्यसे उसे परमपुरुष हरिका वास्तविक ज्ञान उद्बुद्ध हो गया और वह उनकी शरणमें गया। तबसे नारायण पुरुषोत्तममें अनन्य भक्ति रखते हुए उस दैत्येन्द्र प्रह्लादको महायोगकी प्राप्ति हुई ॥ ८४-८८ ॥
बाधयामास विप्रेन्द्रान् न विवेद जनार्दनम्।<br>पितुर्वधमनुस्मृत्य क्रोधं चक्रे हरिं प्रति ॥ ८५ ॥
तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>नारायणस्य देवस्य प्रह्लादस्यामरद्विषः ॥ ८६ ॥
कृत्वा तु सुमहद् युद्धं विष्णुना तेन निर्जितः।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्यात् परस्मिन् पुरुषे हरौ।<br>संजातं तस्य विज्ञानं शरण्यं शरणं ययौ ॥ ८७ ॥
ततः प्रभृति दैत्येन्द्रो ह्यनन्यां भक्तिमुद्वहन्।<br>नारायणे महायोगमवाप पुरुषोत्तमे ॥ ८८ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्रे योगसंसक्तचेतसि।<br>अवाप तन्महद् राज्यमन्धकोऽसुरपुङ्गवः ॥ ८९ ॥हिरण्यकशिपुके पुत्र (प्रह्लाद)-का चित्त योगमें आसक्त हो जानेपर शम्भुके देहसे* उत्पन्न हिरण्याक्षके पुत्र असुर श्रेष्ठ अन्धकने उस विशाल राज्यको प्राप्त किया तथा मन्दर पर्वतपर अवस्थित पर्वत (हिमालय)-की पुत्री उमा देवीको प्राप्त करनेकी इच्छा की ॥ ८९-९० ॥
हिरण्यनेत्रतनयः शम्भोर्देहसमुद्भवः।<br>मन्दरस्थामुमां देवीं चकमे पर्वतात्मजाम् ॥ ९० ॥
पुरा दारुवने पुण्ये मुनयो गृहमेधिनः।<br>ईश्वराराधनार्थाय तपश्चेरुः सहस्रशः ॥ ९१ ॥प्राचीन कालकी बात है, हजारों गृहस्थ मुनि पुण्यदायी दारुवनमें ईश्वरकी आराधना करनेके लिये तप करते थे। तदनन्तर कालयोगसे किसी समय प्राणियोंका विनाश करनेवाली अत्यन्त उग्र तथा भयंकर अनावृष्टि हुई। भूखसे व्याकुल सभी मुनियोंने साथ मिलकर तपोनिधि गौतमसे प्राण धारणके निमित्त भोजनकी याचना की। बुद्धिमान् उन गौतमने उन सभीको अत्यधिक स्वादयुक्त अन्न प्रदान किया। उन सभी ब्राह्मणोंने निःशंक-मनसे भोजन किया ॥ ९१-९४ ॥
ततः कदाचिन्महती कालयोगेन दुस्तरा।<br>अनावृष्टिरतीवोग्रा ह्यासीद् भूतविनाशिनी ॥ ९२ ॥
समेत्य सर्वे मुनयो गौतमं तपसां निधिम्।<br>अयाचन्त क्षुधाविष्टा आहारं प्राणधारणम् ॥ ९३ ॥
स तेभ्यः प्रददावन्नं मृष्टं बहुतरं बुधः।<br>सर्वे बुभुजिरे विप्रा निर्विशङ्केन चेतसा ॥ ९४ ॥
गते तु द्वादशे वर्षे कल्पान्त इव शंकरी।<br>बभूव वृष्टिर्महती यथापूर्वमभूज्जगत् ॥ ९५ ॥बारह वर्ष व्यतीत हो जानेपर कल्पान्तमें होनेवाली कल्याणकारिणी वृष्टिके सदृश महान् वृष्टि हुई। संसार (पुनः) पहलेके समान हो गया ॥ ९५ ॥

* शम्भुकी आराधनासे ही हिरण्याक्षको अन्धक (पुत्र)-की प्राप्ति हुई थी।

* अध्याय १५ * १११


ततः सर्वे मुनिवराः समामन्त्र्य परस्परम्।
महर्षिं गौतमं प्रोचुर्गच्छाम इति वेगतः॥ ९६ ॥
तब सभी मुनिवरोंने आपसमें मन्त्रणा कर महर्षि गौतमसे पूछा—क्या हमलोग शीघ्र यहाँसे चले जायें?

निवारयामास च तान् कञ्चित् कालं यथासुखम्।
उषित्वा मद्गृहेऽवश्यं गच्छध्वमिति पण्डिताः॥ ९७ ॥
तब गौतमने उन लोगोंको रोकते हुए कहा—पण्डितजनो! कुछ समय और यहाँ मेरे घरमें सुखपूर्वक रहें, इसके बाद आप सभी जायें।

ततो मायामयीं सृष्ट्वा कृशां गां सर्व एव ते।
समीपं प्रापयामासुर्गौतमस्य महात्मनः॥ ९८ ॥
तत्पश्चात् उन सभीने मायामयी एक कमजोर गाय बनाकर उसे महात्मा गौतमके समीप पहुँचा दिया।

सोऽनुवीक्ष्य कृपाविष्टस्तस्याः संरक्षणोत्सुकः।
गोष्ठे तां बन्धयामास स्पृष्टमात्रा ममार सा॥ ९९ ॥
गायको देखकर उसकी रक्षाके लिये उत्सुक दयालु मुनिने अपनी गोशालामें उसे बाँध दिया, किंतु वह गाय छूते ही मर गयी॥ ९६—९९॥

स शोकेनाभिसंतप्तः कार्याकार्यं महामुनिः।
न पश्यति स्म सहसा तादृशं मुनयोऽब्रुवन्॥ १००॥
शोकसे अत्यन्त दुःखी वे महामुनि उस समय किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये। तब शीघ्र ही मुनियोंने ऐसे उन (गौतम मुनि)-से कहा—॥ १००॥

गोवध्येयं द्विजश्रेष्ठ यावत् तव शरीरगा।
तावत् तेऽन्नं न भोक्तव्यं गच्छामो वयमेव हि॥ १०१॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! जबतक यह गोहत्या आपके शरीरमें (व्याप्त) रहेगी, तबतक आपके यहाँ अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये, इसलिये हमलोग जा रहे हैं॥ १०१॥

तेन ते मुदिताः सन्तो देवदारुवनं शुभम्।
जग्मुः पापवशं नीतास्तपश्कर्तुं यथा पुरा॥ १०२॥
इस प्रकार पापके वशीभूत हुए वे (मुनिजन) प्रसन्न होकर पहलेके ही समान तप करनेके लिये शुभ देवदारु वनमें चले गये।

स तेषां मायया जातां गोवध्यां गौतमो मुनिः।
केनापि हेतुना ज्ञात्वा शशापातीवकोपनः॥ १०३॥
उन गौतम मुनिने उन मुनियोंकी मायाद्वारा करायी गयी गोहत्याको किसी प्रकारसे जान लिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर (इस प्रकार) शाप दिया॥ १०२-१०३॥

भविष्यन्ति त्रयीबाह्या महापातकिभिः समाः।
बभूवुस्ते तथा शापाज्जायमानाः पुनः पुनः॥ १०४॥
महापातकियोंके समान ये लोग वेदसे बहिष्कृत हो जायँगे और शापके कारण बार-बार जन्म लेनेवाले होंगे।

सर्वे सम्प्राप्य देवेशं शंकरं विष्णुमव्ययम्।
अस्तुवन् लौकिकैः स्तोत्रैरुच्छिष्टा इव सर्वगौ॥ १०५॥
भोजनसे बची हुई जूठनके समान वे सभी (शापसे भयभीत होकर) सर्वव्यापक देवेश शंकर तथा अव्यय विष्णुके पास पहुँचकर उनकी लौकिक स्तुतियोंसे स्तुति करने लगे—॥ १०४-१०५॥

देवदेवौ महादेवौ भक्तानामार्तिनाशनौ।
कामवृत्त्या महायोगौ पापान्नस्त्रातुमर्हथः॥ १०६॥
हे देवदेव (विष्णु) ! हे महादेव ! (शंकर) आप दोनों भक्तोंका कष्ट दूर करनेवाले हैं और इच्छानुसार योगका अवलम्बन करनेवाले हैं। आप हम लोगोंकी पापसे रक्षा करें।

तदा पार्श्वस्थितं विष्णुं सम्प्रेक्ष्य वृषभध्वजः।
किमेतेषां भवेत् कार्यं प्राह पुण्यैषिणामिति॥ १०७॥
तब समीपमें स्थित विष्णुकी ओर देखकर वृषभध्वज शंकरने कहा—बताइये कि ये पुण्यकी इच्छा करनेवाले लोग क्या चाहते हैं?

ततः स भगवान् विष्णुः शरण्यो भक्तवत्सलः।
गोपतिं प्राह विप्रेन्द्रान्नालोक्य प्रणतान् हरिः॥ १०८॥
तब भक्तवत्सल, शरण्य हरि उन भगवान् विष्णुने विनीत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी ओर देखकर शंकरजीसे कहा—॥ १०६-१०८॥

न वेदबाह्ये पुरुषे पुण्यलेशोऽपि शंकर।
संगच्छते महादेव धर्मो वेदाद् विनिर्बभौ॥ १०९॥
शंकर! वेदबाह्य पुरुषमें पुण्यका लेशमात्र भी नहीं रहता। हे महादेव! वेदसे ही धर्म उत्पन्न हुआ है॥ १०९॥

११२ * कूर्मपुराण *


तथापि भक्तवात्सल्याद् रक्षितव्या महेश्वर ।<br>अस्माभिः सर्व एवैमे गन्तारो नरकानपि ॥ ११० ॥तथापि महेश्वर! भक्तवत्सलताके कारण नरकोंमें जानेवाले इन सभीकी हमारे द्वारा रक्षा की जानी चाहिये ऐसा उचित प्रतीत होता है। इसलिये वृषध्वज! वेदबाह्य पापियोंकी रक्षा करने एवं उन्हें मोहित करनेके लिये मैं शास्त्रोंकी रचना करूँगा। इस प्रकार मुरारि माधवसे प्रेरित किये गये रुद्रने मोहित करनेवाले शास्त्रोंको बनाया और उसी प्रकार शिवसे प्रेरणा प्राप्त केशवने भी ऐसे ही शास्त्रोंकी रचना की। कापाल, नाकुल, वाम, भैरव, पूर्वपश्चिम, पञ्चरात्र, पाशुपत तथा अन्य भी सहस्रों शास्त्रोंकी रचना करके उन देवोंने उन (वेदबाह्य)—से कहा—इन शास्त्रोंमें बताये गये कर्मोंको करनेके कारण बहुत कल्पोंतक आप सब घोर अन्धकारपूर्ण नरकोंमें गिरेंगे और फिर पाप-समूहके क्षीण हो जानेपर मनुष्यलोक प्राप्त करेंगे। पुनः ईश्वरकी आराधनाके बलपर पुण्यवानोंकी गति प्राप्त करेंगे। आप सभी मेरी प्रसन्नताके लिये ऐसा ही करें, आप लोगोंके निस्तारणका अर्थात् दोषमुक्त होनेका इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ११०-११५ ॥
तस्माद् वै वेदबाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम् ।<br>विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यामो वृषध्वज ॥ १११ ॥
एवं सम्बोधितो रुद्रो माधवेन मुरारिणा ।<br>चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवेरितः ॥ ११२ ॥
कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम् ।<br>पञ्चरात्रं पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः ॥ ११३ ॥
सृष्ट्वा तानूचतुर्देवौ कुर्वाणाः शास्त्रचोदितम् ।<br>पतन्तो निरये घोरे बहून् कल्पान् पुनः पुनः ॥ ११४ ॥
जायन्तो मानुषे लोके क्षीणपापचयस्ततः ।<br>ईश्वराराधनबलाद् गच्छध्वं सुकृतां गतिम् ।<br>वर्तध्वं मत्प्रसादेन नान्यथा निष्कृतिर्हि वः ॥ ११५ ॥
एवमीश्वरविष्णुभ्यां चोदितास्ते महर्षयः ।<br>आदेशं प्रत्यपद्यन्त शिरसाऽसुरविद्विषोः ॥ ११६ ॥इस प्रकार शिव तथा विष्णुके द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर उन महर्षियोंने असुरोंसे द्वेष करनेवाले उन दोनों देवोंकी आज्ञाको सिरसे स्वीकार किया। पुनः उन लोगोंने भी दूसरे शास्त्रोंकी रचना कर उनमें प्रवृत्त होनेवाले शिष्योंको पढ़ाया तथा उन शास्त्रोंके पढ़नेका फल भी बताया ॥ ११६-११७ ॥
चक्रुस्तेऽन्यानि शास्त्राणि तत्र तत्र रताः पुनः ।<br>शिष्यानध्यापयामासुर्दर्शयित्वा फलानि तु ॥ ११७ ॥
मोहयन्त इमं लोकमवतीर्य महीतले ।<br>चकार शंकरो भिक्षां हितायैषां द्विजैः सह ॥ ११८ ॥शिवने इन (ब्राह्मणों)—के कल्याणके लिये पृथ्वीपर अवतार लेकर लोगोंको मोहित करते हुए ब्राह्मणोंके साथ भिक्षावृत्ति ग्रहण की। कपालोंकी मालाका आभूषण धारणकर, चिता-भस्म लगाकर और जटामण्डलसे मण्डित हो इस लोकको मोहित किया। देवी पार्वतीको अमित तेजस्वी विष्णुके समीप रखा और दुष्टोंका निग्रह करनेके लिये अपने अङ्गसे उत्पन्न रुद्र भैरवको नियुक्त किया। देवीको नारायणके समीप रखकर कुलनन्दन नन्दीको वहाँ रखा तथा इन्द्रादि देवों एवं गणपोंको भी वहाँ स्थापित किया ॥ ११८-१२१ ॥
कपालमालाभरणः प्रेतभस्मावगुण्ठितः ।<br>विमोहयँल्लोकमिमं जटामण्डलमण्डितः ॥ ११९ ॥
निक्षिप्य पार्वतीं देवीं विष्णावमिततेजसि ।<br>नियोज्याङ्गभवं रुद्रं भैरवं दुष्टनिग्रहे ॥ १२० ॥
दत्त्वा नारायणे देवीं नन्दिनं कुलनन्दनम् ।<br>संस्थाप्य तत्र गणपान् देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ १२१ ॥
प्रस्थितेऽथ महादेवे विष्णुर्विश्वतनुः स्वयम् ।<br>स्त्रीरूपधारी नियतं सेवते स्म महेश्वरीम् ॥ १२२ ॥महादेवके जानेके पश्चात् विश्वतनु साक्षात् विष्णु स्त्री-रूप धारण करके महेश्वरी पार्वतीकी भलीभाँति सेवा करने लगे ॥ १२२ ॥
* अध्याय १५ *११३
ब्रह्मा हुताशनः शक्रो यमोऽन्ये सुरपुङ्गवाः ।<br>सिषेविरे महादेवीं स्त्रीवेशं शोभनं गताः ॥ १२३ ॥<br>नन्दीश्वरश्च भगवान् शम्भोरत्यन्तवल्लभः ।<br>द्वारदेशे गणाध्यक्षो यथापूर्वमतिष्ठत ॥ १२४ ॥<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो ह्यन्धको नाम दुर्मतिः ।<br>आहर्तुकामो गिरिजामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १२५ ॥<br>सम्प्राप्तमन्धकं दृष्ट्वा शंकरः कालभैरवः ।<br>न्यषेधयदमयात्मा कालरूपधरो हरः ॥ १२६ ॥<br>तयोः समभवद् युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ।<br>शूलेनोरसि तं दैत्यमाजघान वृषध्वजः ॥ १२७ ॥सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, यम तथा अन्य भी श्रेष्ठ देवता महादेवीकी सेवा करने लगे। शम्भुके अत्यन्त प्रिय गणोंके अध्यक्ष भगवान् नन्दीश्वर पूर्वकी भाँति द्वारपर स्थित रहे। इसी बीच अन्धक नामका एक कुबुद्धि दैत्य गिरिजा पार्वतीको हरनेकी इच्छासे उस मन्दर पर्वतपर आया। अन्धकको वहाँ आया देखकर कालरूपधारी शंकर, अमेयात्मा हर कालभैरवने उसे रोका। उन दोनोंका अत्यन्त भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ—॥ १२३-१२७ ॥
ततः सहस्रशो दैत्यः ससर्जान्धकसञ्ज्ञितान् ।<br>नन्दिषेणादयो दैत्यैरन्धकैरभिनिर्जिताः ॥ १२८ ॥<br>घण्टाकर्णो मेघनादश्चण्डेशश्चण्डतापनः ।<br>विनायको मेघवाहः सोमनन्दी च वैद्युतः ॥ १२९ ॥<br>सर्वेऽन्धकं दैत्यवरं सम्प्राप्यातिबलान्विताः ।<br>युयुधुः शूलशक्त्यृष्टिगिरिकूटपरश्वधैः ॥ १३० ॥<br>भ्रामयित्वाथ हस्ताभ्यां गृहीतचरणद्वयाः ।<br>दैत्येन्द्रेणातिबलिना क्षिप्तास्ते शतयोजनम् ॥ १३१ ॥<br>ततोऽन्धकनिसृष्टास्ते शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>कालसूर्यप्रतीकाशा भैरवं त्वभिदुद्रुवुः ॥ १३२ ॥<br>हा हेति शब्दः सुमहान् बभूवातिभयङ्करः ।<br>युयोध भैरवो रुद्रः शूलमादाय भीषणम् ॥ १३३ ॥इसके बाद उस दैत्यने अन्धक नामवाले हजारों दैत्योंको उत्पन्न किया। उन अन्धक नामवाले दैत्योंने नन्दिषेण आदि (गणों)-को पराजित कर दिया। घण्टाकर्ण, मेघनाद, चण्डेश, चण्डतापन, विनायक, मेघवाह, सोमनन्दी तथा वैद्युत आदि ये सभी अत्यन्त बलशाली गण दैत्यश्रेष्ठ अन्धकके पास जाकर शूल, शक्ति, ऋष्टि, पर्वतशिखर तथा परशुद्वारा युद्ध करने लगे। अत्यन्त बलवान् दैत्येन्द्रने अपने हाथोंसे उन सभीके दोनों पैरोंको पकड़कर घुमाते हुए उन्हें सौ योजन दूर फेंक दिया। तदनन्तर अन्धकद्वारा उत्पन्न सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें प्रलयकालीन सूर्यके समान वे (दैत्य) भैरवपर टूट पड़े। अत्यन्त भयंकर हाहाकारका शब्द होने लगा। भैरव रुद्र भीषण शूल लेकर युद्ध करने लगे ॥ १२८-१३३ ॥
दृष्ट्वाऽन्धकानां सुबलं दुर्जयं तर्जितो हरः ।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ १३४ ॥<br>सोऽसृजद् भगवान् विष्णुर्देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>देवीपार्श्वस्थितो देवो विनाशायामरद्विषाम् ॥ १३५ ॥अन्धकोंकी सेनाको अजेय देखकर भयभीत हर, विभु, अजन्मा देव वासुदेवकी शरणमें गये। तब देवीके समीपमें स्थित उन देव भगवान् विष्णुने देवताओंके द्वेषियोंका विनाश करनेके लिये श्रेष्ठ सौ देवियोंको उत्पन्न किया ॥ १३४-१३५ ॥
तदान्धकसहस्रं तु देवीभिर्यमसादनम् ।<br>नीतं केशवमाहात्म्याल्लीलयैव रणाजिरे ॥ १३६ ॥<br>दृष्ट्वा पराहतं सैन्यमन्धकोऽपि महासुरः ।<br>पराङ्मुखो रणात् तस्मात् पलायत महाजवः ॥ १३७ ॥तदनन्तर विष्णुकी महिमासे उन देवियोंने सैकड़ों अन्धकोंको उस युद्धस्थलमें खेल-खेलमें ही यमलोक भेज दिया। अपनी सेनाकी पराजय देखकर महान् असुर अन्धक भी युद्धसे विमुख होकर अत्यन्त वेगसे भाग चला ॥ १३६-१३७ ॥
ततः क्रीडां महादेवः कृत्वा द्वादशवार्षिकीम् ।<br>हिताय लोके भक्तानामाजगामाथ मन्दरम् ॥ १३८ ॥तदनन्तर संसारमें भक्तोंके कल्याणार्थ बारह वर्षतक चलनेवाली लीलाको समाप्तकर महादेव मन्दराचल पर्वतपर चले आये ॥ १३८ ॥

११४ * कूर्मपुराण *


| सम्प्राप्तमीश्वरं ज्ञात्वा सर्व एव गणेश्वराः ।<br>समागम्‍योपतस्थुस्तं भानुमन्तमिव द्विजाः ॥ १३९ ॥<br><br>प्रविश्य भवनं पुण्यमयुक्तानां दुरासदम् ।<br>ददर्श नन्दिनं देवं भैरवं केशवं शिवः ॥ १४० ॥<br><br>प्रणामप्रवणं देवं सोऽनुगृह्याथ नन्दिनम् ।<br>आघ्राय मूर्ध्नीशानः केशवं परिषस्वजे ॥ १४१ ॥<br><br>दृष्ट्वा देवी महादेवं प्रीतिविस्फारितेक्षणा ।<br>ननाम शिरसा तस्य पादयोरीश्वरस्य सा ॥ १४२ ॥<br><br>निवेद्य विजयं तस्मै शंकरायाथ शंकरी ।<br>भैरवो विष्णुमाहात्म्यं प्रणतः पार्श्वगोऽवदत् ॥ १४३ ॥<br><br>श्रुत्वा तद्विजयं शम्भुर्विक्रमं केशवस्य च ।<br>समास्ते भगवानीशो देव्या सह वरासने ॥ १४४ ॥<br><br>ततो देवगणाः सर्वे मरीचिप्रमुखा द्विजाः ।<br>आजग्मुर्मन्दरं द्रष्टुं देवदेवं त्रिलोचनम् ॥ १४५ ॥<br><br>येन तद् विजितं पूर्वं देवीनां शतमुत्तमम् ।<br>समागतं दैत्यसैन्यमीशदर्शनवाञ्छया ॥ १४६ ॥<br><br>दृष्ट्वा वरासनासीनं देव्या चन्द्रविभूषणम् ।<br>प्रणेमुरादराद् देव्यो गायन्ति स्मातिलालसाः ॥ १४७ ॥<br><br>प्रणेमुर्गिरिजां देवीं वामपार्श्वे पिनाकिनः ।<br>देवासनगतं देवं नारायणमनामयम् ॥ १४८ ॥<br><br>दृष्ट्वा सिंहासनासीनं देव्या नारायणेन च ।<br>प्रणम्य देवमीशानं पृष्टवत्यो वराङ्गनाः ॥ १४९ ॥<br><br>कन्या ऊचुः<br><br>कस्त्वं विभ्राजसे कान्त्या केयं बालरविप्रभा ।<br>कोऽन्वयं भाति वपुषा पङ्कजायतलोचनः ॥ १५० ॥<br><br>निशम्य तासां वचनं वृषेन्द्रवरवाहनः ।<br>व्याजहार महायोगी भूताधिपतिरव्ययः ॥ १५१ ॥<br><br>अहं नारायणो गौरी जगन्माता सनातनी ।<br>विभज्य संस्थितो देवः स्वात्मानं बहुधेश्वरः ॥ १५२ ॥ | ईश्वरको आया हुआ जानकर सभी गणेश्वर उनके पासमें आकर इस प्रकार स्थित हो गये जैसे द्विज सूर्यकी उपासनामें स्थित रहते हैं। अयोगियोंके लिये दुर्गम पुण्यशाली भवनमें प्रवेशकर शिवने नन्दी, भैरवदेव तथा केशवको देखा॥ १३९-१४०॥<br><br>उन देव शंकरने प्रणाम करनेवाले नन्दीके ऊपर कृपा करके उनका सिर सूंघा और केशवका आलिङ्गन किया। महादेवको देखकर प्रीतिसे विकसित आँखोंवाली उन देवीने उन ईश्वरके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया। तदनन्तर शंकरप्रिया पार्वतीने उन्हें विजयका समाचार कहा और (शंकरके) पार्श्वमें स्थित रहनेवाले भैरवने विनयपूर्वक विष्णुके माहात्म्यको भी (उन्हें) बताया। उस विजय (-के समाचार) तथा केशव विष्णुके पराक्रमको सुनकर शम्भु भगवान् शंकर देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान हुए। तदनन्तर मरीचि आदि प्रमुख द्विज तथा सभी देवगण देवाधिदेव त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये मन्दराचलपर आये॥ १४१-१४५॥<br><br>जिन्होंने दैत्य (अन्धक)-की सेनाको पहले जीता था, वे श्रेष्ठ सौ देवियाँ भी ईशके दर्शनोंकी लालसासे वहाँ आयीं। चन्द्रमारूपी आभूषणसे विभूषित शंकरको देवी पार्वतीके साथ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर (उन) देवियोंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अत्यन्त प्रेमसे वे गान करने लगीं। पिनाकी (शंकर)-के वामभागमें स्थित देवी गिरिजा एवं शंकरके आसनपर उनके साथ विराजमान प्रसन्नचित्त नारायणको (उन देवियोंने) प्रणाम किया। देवी पार्वती और नारायणके साथ सिंहासनपर बैठे हुए देव शंकरको प्रणामकर उन श्रेष्ठ स्त्रियोंने पूछा—॥ १४६-१४९॥<br><br>**कन्याओं (देवियों)-ने कहा—**अपनी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले आप कौन हैं? बाल सूर्यके समान आभावाली यह (बाला) कौन है? और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले एवं अपने शरीरके कारण शोभायमान यह कौन पुरुष है?॥ १५०॥<br><br>उनके वचन सुनकर श्रेष्ठ वृषभपर आरूढ़ होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, महायोगी अव्यय (शिव)-ने कहा—मैं अपनेको नारायण तथा सनातन जगन्माता गौरी आदि अनेक रूपोंमें विभक्तकर स्थित रहनेवाला देव ईश्वर हूँ॥ १५१-१५२॥ |

* अध्याय १५ *१९५
न मे विदुः परं तत्त्वं देवाद्या न महर्षयः।<br>एकोऽयं वेद विश्वात्मा भवानी विष्णुरेव च॥ १५३॥<br><br>अहं हि निष्क्रियः शान्तः केवलो निष्परिग्रहः।<br>मामेव केशवं देवमाहुर्देवीमथाम्बिकाम्॥ १५४॥<br><br>एष धाता विधाता च कारणं कार्यमेव च।<br>कर्ता कारयिता विष्णुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ १५५॥<br><br>भोक्ता पुमानप्रमेयः संहर्ता कालरूपधृक्।<br>स्रष्टा पाता वासुदेवो विश्वात्मा विश्वतोमुखः॥ १५६॥<br><br>कूटस्थो ह्यक्षरो व्यापी योगी नारायणः स्वयम्।<br>तारकः पुरुषो ह्यात्मा केवलं परमं पदम्॥ १५७॥<br><br>सैषा माहेश्वरी गौरी मम शक्तिर्निरञ्जना।<br>शान्ता सत्या सदानन्दा परं पदमिति श्रुतिः॥ १५८॥<br><br>अस्याः सर्वमिदं जातमत्रैव लयमेष्यति।<br>एषैव सर्वभूतानां गतीनामुत्तमा गतिः॥ १५९॥<br><br>तयाहं संगतो देव्या केवलो निष्कलः परः।<br>पश्याम्यशेषमेवेदं यस्तद् वेद स मुच्यते॥ १६०॥<br><br>तस्मादनादिमद्वैतं विष्णुमात्मानमीश्वरम्।<br>एकमेव विजानीध्वं ततो यास्यथ निर्वृतिम्॥ १६१॥<br><br>मन्यन्ते विष्णुमव्यक्तमात्मानं श्रद्धयान्विताः।<br>ये भिन्नदृष्ट्यापीशानं पूजयन्तो न मे प्रियाः॥ १६२॥<br><br>द्विषन्ति ये जगत्सूतिं मोहिता रौरवादिषु।<br>पच्यमाना न मुच्यन्ते कल्पकोटिशतैरपि॥ १६३॥<br><br>तस्मादशेषभूतानां रक्षको विष्णुरव्ययः।<br>यथावदिह विज्ञाय ध्येयः सर्वापदि प्रभुः॥ १६४॥<br><br>श्रुत्वा भगवतो वाक्यं देव्यः सर्वगणेश्वराः।<br>नेमुर्नारायणं देवं देवीं च हिमशैलजाम्॥ १६५॥<br><br>प्रार्थयामासुरीशाने भक्तिं भक्तजनप्रिये।<br>भवानीपादयुगले नारायणपदाम्बुजे॥ १६६॥<br><br>ततो नारायणं देवं गणेशा मातरोऽपि च।<br>न पश्यन्ति जगत्सूतिं तदद्भुतमिवाभवत्॥ १६७॥मेरे परम तत्त्वको न तो देवता आदि जानते हैं और न महर्षि। एकमात्र विश्वात्मा ये विष्णु और भवानी ही (मुझे) जानते हैं। मैं ही निष्क्रिय, शान्त, अद्वितीय और परिग्रहशून्य हूँ। मुझे ही केशव, देव तथा देवी अम्बिका कहा जाता है॥ १५३-१५४॥<br><br>ये विष्णु ही स्वयं धाता, विधाता, कारण, कार्य, कर्ता, कारयिता (कार्यके लिये प्रेरित करनेवाले) और भुक्ति तथा मुक्तिस्वरूप फलको प्रदान करनेवाले हैं। (ये ही) भोक्ता, अप्रमेय पुरुष, संहर्ता, कालका रूप धारण करनेवाले, सृष्टि तथा पालन करनेवाले, विश्वात्मा, सर्वव्यापक, वासुदेव, कूटस्थ, अविनाशी, व्यापी, योगी, नारायण, तारक, पुरुष, आत्मा और अद्वितीय परम पद हैं॥ १५५-१५७॥<br><br>ये माहेश्वरी गौरी मेरी निरञ्जन शक्ति हैं। वेद इन्हें ही शान्त, सत्य, सदानन्द और परम पद बतलाते हैं। इन्हींसे यह सब उत्पन्न हुआ है और इन्हींमें लय भी हो जायगा। ये ही सभी प्राणियोंकी गतियोंमें उत्तम गति हैं॥ १५८-१५९॥<br><br>इन्हीं देवीके साथ अद्वितीय, निष्कल तथा परमस्वरूप मैं इस सम्पूर्ण (विश्व)-का साक्षात्कार करता हूँ। जो इस (तत्त्व)-को जानता है, वह मुक्त हो जाता है। इसलिये अनादि, अद्वैत विष्णु और आत्मस्वरूप ईश्वर (शंकर)-को एक ही समझो। इससे तुम लोगोंको शान्ति प्राप्त होगी। जो श्रद्धासम्पन्न व्यक्ति अव्यक्त एवं आत्मरूप विष्णुको भिन्न मानकर शिवकी पूजा करते हैं, वे मुझे प्रिय नहीं हैं। जो लोग जगत्को उत्पन्न करनेवाले (विष्णु)-से द्वेष रखते हैं (वे सभी) मोहित व्यक्ति रौरव आदि नरकोंमें पड़े रहते हैं और सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी मुक्त नहीं होते। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक अव्यय विष्णुको भलीभाँति समझकर समस्त आपत्तियोंमें उन प्रभुका ध्यान करना चाहिये॥ १६०-१६४॥<br><br>सभी देवियों और गणेश्वरोंने भगवान्के वाक्यको सुनकर नारायण देव तथा हिमालयकी पुत्री देवी (पार्वती)-को प्रणाम किया और भक्तजनोंके प्रिय ईशान भगवान् शंकर तथा भवानीके चरणयुगल एवं नारायणके चरणकमलोंमें भक्तिकी प्रार्थना की। तदनन्तर गणेश्वरों और मातृदेवियोंने जगत्को उत्पन्न करनेवाले नारायण देवको नहीं देखा यह एक आश्चर्य-जैसा ही हुआ॥ १६५-१६७॥

११६ * कूर्मपुराण *


तदन्तरे महादैत्यो ह्यन्धको मन्मथार्दितः।<br>मोहितो गिरिशां देवीमाहर्तुं गिरिमाययौ ॥ १६८ ॥इसी बीच कामदेवके द्वारा पीड़ित महादैत्य अन्धक मोहित होता हुआ देवी गिरिजाको हरण करनेके लिये पर्वतपर आया ॥ १६८ ॥
अथानन्तवपुः श्रीमान् योगी नारायणोऽमलः।<br>तत्रैवाविरभूद् दैत्यैर्युद्धाय पुरुषोत्तमः ॥ १६९ ॥<br>कृत्वाथ पार्श्वे भगवन्तमीशो<br>युद्धाय विष्णुं गणदेवमुख्यैः।<br>शिलादपुत्रेण च मातृकाभिः<br>स कालरुद्रोऽभिजगाम देवः ॥ १७० ॥<br>त्रिशूलमादाय कृशानुकल्पं<br>स देवदेवः प्रययौ पुरस्तात्।<br>तमन्वयुस्ते गणराजवर्या<br>जगाम देवोऽपि सहस्रबाहुः ॥ १७१ ॥<br>रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिद्वर्णवर्णः।<br>तदा सुमेरोः शिखराधिरूढ-<br>स्त्रिलोकदृष्टिर्भगवानिवार्कः ॥ १७२ ॥इसके बाद विराट्शरीरधारी, श्रीमान्, योगी, निर्मल नारायण पुरुषोत्तम दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये वहीं प्रकट हो गये। तदनन्तर वे कालरुद्रदेव भगवान् विष्णुको अपने पार्श्वमें करके तथा मुख्य गणदेवों, शिलादपुत्र नन्दी और मातृकाओंको साथ लेकर युद्धके लिये स्वयं गये। अग्निके समान त्रिशूलको लेकर वे देवदेव (शंकर) आगे-आगे चले। उन श्रेष्ठ गणराजों तथा हजार बाहुवाले देव (विष्णु)-ने भी उनका अनुगमन किया। देवताओंके बीचमें उस समय मेघके समान वर्णवाले गरुडवाहन भगवान् विष्णु उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जिस प्रकार सुमेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ तीनों लोकोंके नेत्र-स्वरूप भगवान् सूर्य सुशोभित होते हैं ॥ १६९–१७२ ॥
जगत्यनादिर्भगवानमेयो<br>हरः सहस्राकृतिराविरासीत्।<br>त्रिशूलपाणिर्गगने सुघोषः<br>पपात देवोपरि पुष्पवृष्टिः ॥ १७३ ॥<br>समागतं वीक्ष्य गणेशराजं<br>समावृतं देवरिपुर्गणेशैः।<br>युयोध शक्रेण समातृकाभि-<br>र्गणैरशेषैरमरप्रधानैः ॥ १७४ ॥<br>विजित्य सर्वानपि बाहुवीर्यात्<br>स संयुगे शम्भुमनन्तधाम।<br>समाययौ यत्र स कालरुद्रो<br>विमानमारुह्य विहीन सत्त्वः ॥ १७५ ॥<br>दृष्ट्वान्धकं समायान्तं भगवान् गरुडध्वजः।<br>व्याजहार महादेवं भैरवं भूतिभूषणम् ॥ १७६ ॥अनादि, अमेय त्रिशूलपाणि भगवान् हर हजारों स्वरूप धारणकर पृथ्वीपर प्रकट हुए। (उस समय) आकाशमें सुन्दर शब्द होने लगा तथा उन देवके ऊपर (आकाशसे) पुष्पवृष्टि होने लगी। गणेश्वरोंके राजा शिवको गणेश्वरोंद्वारा घिरे हुए आते देखकर देवशत्रु अन्धक, इन्द्र तथा मातृकाओं, गणों और सभी प्रधान-प्रधान देवताओंके साथ युद्ध करने लगा। अपने बाहुबलसे युद्धमें सभीको जीतकर वह सत्त्वविहीन (अन्धक) अनन्त तेजस्वी शम्भुके समीप गया, जहाँ वे कालरुद्र विमानपर बैठे हुए थे। अन्धकको आते हुए देखकर भगवान् गरुडध्वजने विभूतिसे सुशोभित भैरव महादेवसे कहा— ॥ १७३–१७६ ॥
हन्तुमर्हसि दैत्येशमन्धकं लोककण्टकम्।<br>त्वामृते भगवान् शक्तो हन्ता नान्योऽस्य विद्यते ॥ १७७ ॥(भगवन्!) आप संसारके कण्टकरूप दैत्यपति अन्धकको मारनेमें समर्थ हैं। आपको छोड़कर इसे मारनेमें और कोई दूसरा समर्थ नहीं है। आप सभी लोकोंका संहार करनेवाले ईश्वरके कालमय शरीर हैं।
त्वं हर्ता सर्वलोकानां कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः।<br>स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्वेदविद्भिर्विचक्षणैः ॥ १७८ ॥वेदोंको जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा विविध मन्त्रोंसे आपकी स्तुति की जाती है ॥ १७७-१७८ ॥
* अध्याय १५ *११०
स वासुदेवस्य वचो निशम्य भगवान् हरः।<br>निरीक्ष्य विष्णुं हनने दैत्येन्द्रस्य मतिं दधौ॥ १७९॥वासुदेवका वचन सुनकर उन भगवान् हरने विष्णुकी ओर देखकर दैत्येन्द्र अन्धकको मारनेका विचार किया, गणोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे देवताओंकी सेनामें गये। (तब) अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले लोग भैरवदेवकी (इस प्रकार) स्तुति करने लगे—॥ १७९-१८०॥
जगाम देवतानीकं गणानां हर्षमुत्तमम्।<br>स्तुवन्ति भैरवं देवमन्तरिक्षचरा जनाः॥ १८०॥<br>जयानन्त महादेव कालमूर्ते सनातन।<br>त्वमग्निः सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यशः॥ १८१॥अनन्त ! महादेव ! आप सनातन हैं, कालकी मूर्ति हैं, आपकी जय हो। आप अग्निरूप और सभी प्राणियोंके भीतर सदैव निवास करनेवाले हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही धाता अव्यय हरि हैं। आप ही ब्रह्मा, महादेव और आप ही तेजःस्वरूप परमपद हैं। (आप) प्रणवमूर्ति, योगात्मा, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले त्रिलोचन हैं। आप महाविभूतिस्वरूप, देवताओंके स्वामी हैं। हे सम्पूर्ण संसारके स्वामी ! आपकी जय हो ॥ १८१-१८३॥
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वं धाता हरिरव्ययः।<br>त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्॥ १८२॥
ओङ्कारमूर्तिर्योगात्मा त्रयीनेत्रस्त्रिलोचनः।<br>महाविभूतिर्देवेशो जयाशेषजगत्पते॥ १८३॥<br>ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ गृहीत्वान्धकमीश्वरः।<br>त्रिशूलाग्रेषु विन्यस्य प्रननर्त सतां गतिः॥ १८४॥तदनन्तर सज्जनोंके आश्रयस्थान एवं प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर वे ईश्वर अन्धक दैत्यको पकड़कर अपने त्रिशूलके अग्रभागमें रखकर नाचने लगे। त्रिशूलपर पिरोये हुए अन्धकको देखकर पितामह ब्रह्मा तथा देवगण, संसारसागरसे मुक्त करनेवाले भैरवदेवको प्रणाम करने लगे ॥ १८४-१८५॥
दृष्ट्वान्धकं देवगणाः शूलप्रोतं पितामहः।<br>प्रणेमुरीश्वरं देवं भैरवं भवमोचकम्॥ १८५॥<br>अस्तुवन् मुनयः सिद्धा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>अन्तरिक्षेऽप्सरःसङ्घा नृत्यन्ति स्म मनोरमाः॥ १८६॥मुनि तथा सिद्धजन स्तुति करने लगे और गन्धर्व, किन्नर गान करने लगे तथा अन्तरिक्षमें रमणीय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। तदनन्तर त्रिशूलके अग्रभागमें स्थापित उस अन्धकके सभी पाप दग्ध (नष्ट) हो गये, उसे सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया और वह परमेश्वरकी स्तुति करने लगा— ॥ १८६-१८७॥
संस्थापितोऽथ शूलाग्रे सोऽन्धको दग्धकिल्बिषः।<br>उत्पन्नाखिलविज्ञानस्तुष्टाव परमेश्वरम्॥ १८७॥
अन्धक उवाच<br>नमामि मूर्ध्ना भगवन्तमेकं<br>समाहिता यं विदुरीशतत्त्वम्।<br>पुरातनं पुण्यमनन्तरूपं<br>कालं कविं योगवियोगहेतुम्॥ १८८॥<br>दंष्ट्राकरालं दिवि नृत्यमानं<br>हुताशवक्त्रं ज्वलनार्करूपम्।<br>सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं<br>भवन्तमेकं प्रणमामि रुद्रम्॥ १८९॥**अन्धकने (स्तुति करते हुए) कहा—**समाधिमें स्थित रहनेवाले लोग जिस पुरातन, पुण्यदायी, अनन्त-स्वरूप, कालरूप, कवि तथा संयोग एवं वियोगके कारणरूप ईश्वर-तत्त्वको जानते हैं, मैं उन अद्वितीय भगवान्‌को सिरसे प्रणाम करता हूँ। भयंकर दाढ़ोंवाले, आकाशमें नृत्य करते हुए, अग्निके समान मुखवाले, प्रज्वलित सूर्यके समान स्वरूपवाले, हजारों पैर, आँख तथा सिरोंसे युक्त आप अद्वितीय रुद्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥ १८८-१८९॥

११८ * कूर्मपुराण *


जयादिदेवामरपूजिताङ्घ्रे<br>विभागहीनामलतत्त्वरूप ।<br>त्वमग्निरेको बहुधाभिपूज्यसे<br>वाय्वादिभेदैरखिलात्मरूप ॥ १९०॥हे आदिदेव! देवताओंके द्वारा आपके चरणोंकी पूजा की जाती है, आप विभागरहित, शुद्ध तत्त्वस्वरूप हैं, आपकी जय हो। अद्वितीय अग्निरूप आप वायु आदि भेदोंसे बहुत प्रकारसे पूजित होते हैं और अखिल आत्मरूप हैं।
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>त्वं पश्यसीदं परिपास्यजस्रं<br>त्वमन्तको योगिगणाभिजुष्टः॥ १९१॥<br><br>एकोऽन्तरात्मा बहुधा निविष्टो<br>देहेषु देहादिविशेषहीनः।<br>त्वमात्मशब्दं परमात्मतत्त्वं<br>भवन्तमाहुः शिवमेव केचित्॥ १९२॥सूर्यके समान वर्णवाले पुराणपुरुष! एकमात्र आपको ही तम (मायारूप अन्धकार)-से परे कहा जाता है। आप इस (संसार)-के साक्षी हैं, निरन्तर इसका पालन करते हैं और आप ही संहार करनेवाले हैं। आप योगियोंके समूहोंद्वारा सेवित होते रहते हैं। अद्वितीय, अन्तरात्मारूप आप देह आदि विशेष पदार्थोंसे रहित होते हुए (विभिन्न) देहोंमें अनेक प्रकारसे स्थित रहते हैं। आप आत्मशब्द ('आत्मा' शब्दसे बोध्य) और परमात्मतत्त्व हैं। कुछ लोग आपको ही शिव कहते हैं॥ १९०-१९२॥
त्वमक्षरं ब्रह्म परं पवित्र-<br>मानन्दरूपं प्रणवाभिधानम्।<br>त्वमीश्वरो वेदपदेषु सिद्धः<br>स्वयं प्रभोऽशेषविशेषहीनः॥ १९३॥<br><br>त्वमिन्द्ररूपो वरुणाग्निरूपो<br>हंसः प्राणो मृत्युरन्तोऽसि यज्ञः।<br>प्रजापतिर्भगवानेकरुद्रो<br>नीलग्रीवः स्तूयसे वेदविद्भिः॥ १९४॥<br><br>नारायणस्त्वं जगतामथादिः<br>पितामहस्त्वं प्रपितामहश्च।<br>वेदान्तगुह्योपनिषत्सु गीतः<br>सदाशिवस्त्वं परमेश्वरोऽसि॥ १९५॥हे प्रभो! स्वयं आप आनन्दस्वरूप, परम पवित्र, ओंकार शब्दसे वाच्य, अविनाशी, पर ब्रह्म हैं। आप स्वयं वेदवाक्योंमें 'ईश्वर'-शब्दसे सिद्ध हैं और समस्त विशेष पदार्थोंसे शून्य हैं। आप इन्द्र, वरुण, अग्नि, हंस, प्राण, मृत्यु, अन्त एवं यज्ञ हैं। वेदको जाननेवालोंके द्वारा आपके नीलकण्ठ, एकरुद्र, प्रजापति और भगवत्स्वरूपकी स्तुति की जाती है। आप संसारके आदि और नारायण हैं, आप ही पितामह और प्रपितामह हैं। वेदान्तशास्त्र तथा गुह्य उपनिषदोंमें आप ही सदाशिव और परमेश्वर इस नामसे वर्णित हैं॥ १९३-१९५॥
नमः परस्तात् तमसः परस्मै<br>परात्मने पञ्चपदान्तराय।<br>त्रिशक्त्यतीताय निरञ्जनाय<br>सहस्रशक्त्यासनसंस्थिताय ॥ १९६॥तमोगुणसे परे, परम परमात्मा, पञ्चपदान्तरस्वरूप, ब्राह्मी, वैष्णवी एवं शाक्त—तीनों शक्तियोंसे अतीत, निरञ्जन और सहस्रशक्तिरूप आसनपर विराजमान रहनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है॥ १९६॥
त्रिमूर्तयेऽनन्तपदात्ममूर्ते<br>जगन्निवासाय जगन्मयाय।<br>नमो ललाटार्पितलोचनाय<br>नमो जनानां हृदि संस्थिताय॥ १९७॥<br><br>फणीन्द्रहाराय नमोऽस्तु तुभ्यं<br>मुनीन्द्रसिद्धाचितपादयुग्म ।ब्रह्मा-विष्णु एवं शिव—इन त्रिमूर्तिरूप, अनन्त पदात्मक, आत्ममूर्ति, जगन्निवास और जगन्मयको नमस्कार है। ललाटमें नेत्र धारण करनेवाले तथा लोगोंके हृदयमें स्थित आपको नमस्कार है। मुनीन्द्रों तथा सिद्धोंद्वारा जिनके चरणकमलोंकी पूजा की जाती है, ऐसे नागराजोंकी माला धारण करनेवाले आपको नमस्कार है॥ १९७½ ॥