लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१ अनर्थक 'इन्' होने पर भी इन्हुन्० आदि सूत्रों की प्रवृत्ति हो जाती है। इस बात को जनाने के लिये ही ग्रन्थकार ने यहां 'यशस्विन्' यह इन् का दूसरा उदाहरण दिया है, अन्यथा 'शार्ङ्गिन्' यह उदाहरण तो वे दे ही चुके थे। मघवन् (इन्द्र)। श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५७) इति सूत्रेण मह पूजायाम् (भ्वा० प०) इति धातोः कनिन्प्रत्ययो हस्य घो वुंगागमश्च निपात्यते । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८८) मघवा बहुलम् ।६।४।१२८॥ 'मघवन्' शब्दस्य वा तृँ इत्यन्तादेशः स्यात् । ऋ इत्¹॥ अर्थः— मघवन् शब्द को विकल्प कर के 'तृँ' अन्तादेश हो। ऋ इत्—ऋकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है। व्याख्या—मघवा ।१।१। (छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति—के अनुसार यहां षष्ठी विभक्ति के अर्थ में प्रथमा विभक्ति जाननी चाहिये)। बहुलम् ।१।१। तृँ ।१।१। (अर्वणस्त्रसावनञः से। यहां प्रथमा विभक्ति का लुक् जानना चाहिये)। अर्थः— (मघवा) मघवन् शब्द के स्थान पर (बहुलम्) विकल्प कर के² (तृँ) 'तृँ' यह आदेश हो। यद्यपि यह तृँ आदेश अनेकाल् होने से अनेकालशित्सर्वस्य (४५) सूत्र द्वारा सम्पूर्ण 'मघवन्' शब्द के स्थान पर होना चाहिये; तथापि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् (अनुबन्धों के कारण अनेकाल्ता नहीं माननी चाहिये) इस परिभाषा से इस के अने- काल् न होने से सर्वादेश नहीं होता किन्तु अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्तादेश हो जाता है। 'मघवत्' यहां ऋकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो कर 'मघवत्' शब्द बन जाता है। जिस पक्ष में तृँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में मघवन् ही रहता है उस का विवेचन आगे करेंगे। 'मघवत् + सु' (सुं) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८६) उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः ।७।१।७०॥ अधातोरुगितो नलोपिनोऽञ्चतेश्च नुमागमः स्यात् सर्वनामस्थाने परे। मघवान् । मघवन्तौ । मघवन्तः । हे मघवन् ! मघवद्भ्याम् । तृँत्वा- ऽभावे—मघवा । सुंटि राजवत् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर धातुभिन्न उगित् को तथा जिस के नकार का लोप हो चुका हो ऐसी 'अञ्चु' धातु को नुँम् का आगम हो जाता है। व्याख्या—उगिदचाम् ।६।३। सर्वनामस्थाने ।७।१। अधातोः।६।१। नुँम् ।१।१। १. यहां 'ऋ' यह विभक्तिरहित निर्दिष्ट किया गया है। प्रक्रियादशा में अविभक्तिक निर्देश करने में भी कोई दोष नहीं होता। २. 'बहुलम्' पद केवल विकल्प के लिये ही नहीं है अपितु—'मघवान्' रूप में उपधा- दीर्घ करने पर संयोगान्तलोप असिद्ध न हो—इस के लिये भी समझना चाहिये।
३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (इदितो नुम् धातोः) । समास - उक् इत् येषां त=उगित्, बहुव्रीहिसमासः । उगितश्च अञ्च् च=उगिदञ्च्, तेषाम्=उगिदञ्चाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अञ्च्'शब्देनह लुप्तनकारस्य अञ्चुँ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) इति धातोर्ग्रहणं भवति । न धातुः = अधातुस्तस्य-अधातोः, नञ्समासः । अधातोरिति उगित्तावशेषणं सम्भवति न तु अञ्चतेरिति वाच्यम् । अर्थ -(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (अधातोः) धातु से भिन्न (उगिदञ्चाम्) उक्-प्रत्याहार इत् वाले शब्दों का तथा नकार लुप्त हुई अञ्चुँ धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है। भाव - जिन शब्दों में उकार, ऋकार, ऌकार वर्णों की इत्सञ्ज्ञा होती है और यदि वे धातु नहीं तो सर्वनामस्थान परे होने पर उन को नुँम् का आगम हो जाता है। 'मघवत् + सुँ' यहां 'तु' के ऋकार की इत्सञ्ज्ञा हुई है अतः यह उगित् है, इस से पर 'सुँ' यह सर्वनामस्थान भी विद्यमान है। इसलिये मिदचोऽन्त्यात्परः (२६०) परिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र से अन्त्य अच् से परे नुँम् का आगम हो कर- मघवन्ुँम् त् + सुँ = 'मघवन् त् + सुँ' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार तथा संयोगान्तस्य लोपः (२०) से तकार का लोप हो कर- 'मघवन्' । पुनः प्रत्यय- लक्षण द्वारा सुँ को मान कर सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ करने से 'मघवान्' रूप निष्पन्न होता है। नोट-यहां संयोगान्तस्य लोपः (८.२.२३) द्वारा किया लोप उपधा को दीर्घ करने में असिद्ध नहीं होता। इस का कारण मघवा बहुलम् (२८६) सूत्र में 'बहुल' का ग्रहण है। 'बहुल' ग्रहण का तात्पर्य यह होता है कि लोकप्रसिद्ध इष्टरूप में जितनी बाधाएं उपस्थित होती हैं न हों। 'मघवान्' रूप लोक में प्रसिद्ध है यथा- हविर्भक्षिति विशङ्को मखेषु मघवानसौ (भट्टि०)। अतः इस की सिद्धि के अनुरूप उपधादीर्घ करने में संयोगान्तलोप असिद्ध नहीं होता। नकार का लोप भी इसी कारण नहीं होता। 'बहुल' शब्द पर विशेष विचार कृदन्तो में कृत्यल्युटो बहुलम् (७७२) सूत्र पर किया जायेगा। तुँत्वपक्ष में 'मघवन्'शब्द की रूपमाला यथा- प्र० मघवान् मघवन्तौ* मघवन्तः | प० मघवतः मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः द्वि० मघवन्तम् मघवन्तौ मघवतः | ष० मघवतः मघवतोः मघवताम् तृ० मघवता मघवद्भ्याम् मघवद्भिः | स० मघवति मघवतोः मघवत्सु च० मघवते मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः | सं० हे मघवन् ! हे मघवन्तौ ! हे मघवन्तः ! *यहाँ इतना विशेष है कि नुँम् का आगम होकर नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८) १ लुप्तनकार अञ्चुँ धातु को नुँम् के उदाहरण-'प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः' आदि आगे इसी प्रकरण में (३३४) सूत्र पर देखें।
हलन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३ सूत्र से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) से परसवर्ण—णकार हो जाता है। इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में भी प्रक्रिया होती है। ‡इत्यादियों में झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व-दकार हो जाता है। †यहां नुम् का आगम हो कर हल्ङ्यादिलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाता है। सम्बुद्धि परे होने से सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा उपधादीर्घ नहीं होता। नकारलोप का निषेध पूर्ववत् न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) द्वारा हो जाता है। तृँत्व के अभाव में— जहां तृँ आदेश नहीं होता वहां सुट् अर्थात् सर्वनामस्थान तक तो मघवन् शब्द के 'राजन्' शब्दवत् रूप बनते हैं। मघवा, मघवानौ, मघवानः, मघवानम्, मघवानौ। 'मघवन् + अस्' (शस्) यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६०) श्वयुवमघोनामतद्धिते¹ ।६।४।१३३॥ अनन्तानां भसञ्ज्ञकानाम् एषाम् अतद्धिते परे सम्प्रसारणं स्यात्। मघोनः। मघवभ्याम्। एवं श्वन्, युवन्॥ अर्थः—'अन्' शब्द जिन के अन्त में है ऐसे भसञ्ज्ञक श्वन्, युवन्, मघवन् शब्दों को तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर सम्प्रसारण हो जाता है। व्याख्या—अनाम् ।६।३। (अल्लोपोऽनः सूत्र से वचनविपरिणाम करके)। भानाम् ।६।३। (भस्य इस अधिकार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। श्वयुवमघो- नाम् ।६।३। सम्प्रसारणम् ।१।१। (वसोः सम्प्रसारणम् से)। अतद्धिते ।७।१। समासः— श्वा च युवा च मघवा च=श्वयुवमघवानः, तेषाम् = श्वयुवमघोनाम्, इतरेतरद्वन्द्वः। न तद्धितः = अतद्धितस्तस्मिन् =अतद्धिते, नञ्समासः। यहां पर्युदास प्रतिषेध होने से तद्धित से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय का ग्रहण होता है। 'अनाम्' से तदन्तविधि १. इस सूत्र पर एक सुभाषित अत्यन्त प्रसिद्ध है— प्रश्नः— काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे ग्रथ्नासि बाले! किमिदं विचित्रम्? उपजातिवृत्तम् उत्तरम्ः— विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ माला गूंथती हुई किसी बाला से प्रश्न किया गया कि तुम कांच, मणि और सोने को एक—ही सूत्र (तागे) में क्यों गूंथ रही हो? वह उत्तर देती है—विचार- वान् पाणिनिमुनि ने भी तो एक सूत्र में कुत्ते, युवा और इन्द्र को घसीट मारा है। अत्यन्त समुचित उत्तर है। जब पाणिनि जैसे बुद्धिमान् लोग भी असमान वस्तुओं को एक स्थान में बिठाते हैं तो भला मैं बाला (मूर्खा) ऐसा करूं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? वस्तुतः यह कोई काव्य नहीं कि 'सहचरभिन्नता' दोष हो। शब्दशास्त्र में ऐसी बात नहीं देखी जानी चाहिये। इस पद्य को कवि का विनोद समझना चाहिये।
३६४ भौमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां होती है। अर्थ — (अनाम्) अन्नन्त (भानाम्) भसञ्ज्ञक (श्वयुवमघोनाम्) श्वन्, युवन् तथा मघवन् शब्दों को (अतद्धिते) तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर (सम्प्रसार- णम्) सम्प्रसारण हो जाता है। 'मघवन् + अस्' यहाँ मघवन् शब्द अन्नन्त भी है, भसञ्ज्ञक भी है और इस पर तद्धितभिन्न 'शस्' प्रत्यय भी विद्यमान है अतः इग्यण सम्प्रसारणम् (२५६) के अनुसार प्रकृतसूत्र से वकार को उकार सम्प्रसारण हो कर—'मघ् उ अन् + अस्' । सम्प्रसारणाच्च (२५८) से उकार और अकार के स्थान पर पूर्वरूप उकार हो— 'मघ् उ न् + अस्' । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश करने पर—मघोन्
- अस् = मघोनस् = 'मघोनः' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी जानना चाहिये। भ्याम् आदियों में राजन्शब्दवत् नकार का लोप (१८०) हो जाता है—मघवभ्याम्, मघवद्भिः, मघवभ्यः। इस तृत्वाभावपक्ष में मघवन् शब्द की रूप- माला यथा— प्र० मघवा मघवानौ मघवानः | पं० मघोनः मघवभ्याम् मघवभ्यः द्वि० मघवानम् ,, मघोनः | ष० ,, मघोनोः मघोनाम् तृ० मघोना मघवभ्याम् मघवद्भिः | स० मघोनि ,, मघवसु च० मघोने ,, मघवभ्यः | सं० हे मघवन् ! मघवानौ ! मघवानः ! यद्यपि श्वन्, युवन् तथा मघवन् शब्द स्वयम् अन्नन्त ('अन्' अन्त वाले) हैं, इन के लिये 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन करना कुछ उचित प्रतीत नहीं होता, तथापि यदि यहाँ 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन न करते तो तृँ आदेश के पक्ष में 'मघवत, मघ- वन्तौ' आदि रूपों में एकदेशविकृतमनन्यवत् के न्यायानुसार 'मघवन्' शब्द समझ लिये जाने से सम्प्रसारण हो जाता जो अनिष्ट था। परन्तु अब 'अन्नन्त मघवन्' इस प्रकार के कथन से कुछ भी दोष नहीं होता, क्योंकि तृत्त्वपक्ष में अन्नन्त मघवन् नहीं किन्तु तान्त मघवत् है। यदि यहाँ कोई यह शङ्का करे कि एकदेशविकृतन्याय से इसे अन्नन्त भी मान लेंगे अतः आप का 'अनाम्' यह वचन दोषनिवृत्ति के लिये नहीं बन सकता तो उस का उत्तर यह है कि एकदेशविकृतन्याय लोकमूलक है। जैसे लोक में पुच्छकटे कुत्ते में कुत्ते का तो व्यवहार होता है परन्तु पूंछ के विषय में पूंछ का व्यवहार नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ 'मघवत्' शब्द में 'मघवन्' शब्द का तो व्यवहार होता है परन्तु अन्नन्तत्व का व्यवहार नहीं होता अतः 'अनाम्' का अनुवर्त्तन करने से दोष निवृत्त हो जाता है। 'तद्धितभिन्न' कथन का यह अभिप्राय है कि माघवनम् [मघवा देवता अस्य हविष तत् = माघवनम्। साऽस्य देवता (१०३८) इति मघवञ्छब्दादरण तद्धितेऽव्- त्वाभावे (६३८) इत्यादिवृद्धौ विभक्त्युत्पत्तौ—'माघवनम्' इति सिध्यति] यहाँ 'अण्' तद्धित के परे होने पर सम्प्रसारण आदेश न हो। श्वन् (कुत्ता)। यह शब्द व्युत्पत्तिपक्ष में श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५३) सूत्र
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५ द्वारा टुओँश्वि गतिवृद्ध्योः (भ्वा० प०) धातु से कनिँन् प्रत्यय तथा इकारलोप करने पर निपातित हुआ है। इस की रूपमाला यथा— प्र० श्वा श्वानौ श्वानः प० शुनः श्वभ्याम् श्वभ्यः द्वि० श्वानम् ,, शुनः† प० ,, शुनोः शुनाम् तृ० शुना श्वभ्याम् श्वभिः स० शुनि ,, श्वसु च० शुने ,, श्वभ्यः सं० हे श्वन्! हे श्वानौ! हे श्वानः! † 'श्वन्+शस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से सम्प्रसारण हो—शु अन्+अस् । सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप हो—शुन्+अस् = 'शुनः' । इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों में समझ लेना चाहिये । युवन् (जवान, श्रेष्ठ) । [व्युत्पत्तिपक्षे यु मिश्रणामिश्रणयोः (अदा० प०) इति धातोः कनिँन् यु-वृषि-तक्षि-राजि-धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) इति सूत्रेण कनिँन्प्रत्यये युवन्शब्दः सिध्यति] । सर्वनामस्थानों में इस की प्रक्रिया राजन्शब्दवत् होती है । युवा, युवानौ, युवानः, युवानम्, युवानौ । 'युवन्+अस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से वकार को सम्प्रसारण-उकार हो जाता है—यु उ अन्+अस् । अब सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर—'यून्+अस्' बन जाता है । अब इस स्थिति में श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से यकार को भी इकार सम्प्रसारण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२६१) न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ।६।१।३६॥ सम्प्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः सम्प्रसारणं न स्यात् । इति यकारस्य नेत्वम् । अत एव ज्ञापकादन्त्यस्य यणः पूर्वं सम्प्रसारणम् । यूनः । यूना । युवभ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—सम्प्रसारण परे होने पर पूर्व यण् को सम्प्रसारण नहीं होता । इति यस्येति—इस सूत्र के कारण यकार को इकार नहीं होता । अत एवेत्यादि—इस ज्ञापक से यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्रथम अन्त्य यण् को सम्प्रसारण करना चाहिये । व्याख्या—सम्प्रसारणे ।७।१। सम्प्रसारणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम् । अर्थः— (सम्प्रसारणे) सम्प्रसारण परे होने पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण (न) नहीं होता । 'यून्+अस्' यहां सम्प्रसारण परे है अतः पूर्व यकार को सम्प्रसारण नहीं होता— यूनस् = 'यूनः' । अब यहां एक शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि पूर्व यकार को पहले सम्प्रसारण कर लिया जाये और वकार को बाद में सम्प्रसारण करें तो न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र निषेध न कर सकेगा, अतः यहां ऐसा क्यों न किया जाये ? इस के समाधान में कहा है—अत एव ज्ञापकादित्यादि । अर्थात् यदि ऐसा किया जाये तो न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब इसे कोई
३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां भी स्थान प्रवृत्ति के लिये न मिल सकेगा। जब सम्प्रसारण परे होने पर कहीं पर भी सम्प्रसारण न मिलेगा तब निषेध कैसा ? अतः इस निषेधकरणसामर्थ्य से यह सूचित होता है कि जहां दो यण् हों वहां यदि सम्प्रसारण करना हो तो पहले अन्तिम यण् को सम्प्रसारण करना चाहिये। इस नियमानुसार अन्तिम यण् को सम्प्रसारण हो चुकने पर जब प्रथम यण् को सम्प्रसारण प्राप्त होता है तब इस सूत्र से निषेध हो जाता है। 'युवन्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० युवा युवानौ युवान प० यून युवभ्याम् युवभ्य द्वि० युवानम् ” यून ष० ” यूनोः यूनाम् तृ० यूना युवभ्याम् युवभि स० यूनि ” युवसु च० यूने ” युवभ्य स० हे युवन्! हे युवानौ! हे युवान! [लघु०] अर्वा। हे अर्वन् !॥ व्याख्या—ऋ गतौ(भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोर् अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (७६६) इतिसूत्रेण वनिँप्प्रत्यये, गुणे, रपरत्वे 'अर्वन्' इतिशब्दः सिध्यति। 'अर्वन्' शब्द का अर्थ 'घोड़ा' है। सुँ और सम्बुद्धि में 'अर्वा, हे अर्वन्' । राजन्शब्द के समान बनते हैं। 'अर्वन्+औ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६२) अर्वणस्त्रसावनञः ।६।४।१२७॥ नञा रहितस्य 'अर्वन्' इत्यस्याङ्गस्य 'तृ' इत्यन्तादेशो न तु सौ। अर्वन्तौ। अर्वन्तः। अर्वद्भ्याम् इत्यादि॥ अर्थः—'नञ्' से रहित 'अर्वन्' इस अङ्ग को 'तृ' यह अन्तादेश होता है परन्तु सुं परे होने पर नहीं होता। व्याख्या—अनञ् ।६।१। अर्वणः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। तृँ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। असौ ।७।१। समास —न विद्यते नञ् यस्य स =अनञ्, तस्य =अनञः । नञ्बहुव्रीहिसमासः । न सु =असु, तस्मिन्= असौ। नञ्तत्पुरुषः । अर्थ—(अनञ्) नञ् से रहित (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (अर्वणः) अर्वन् शब्द के स्थान पर (तृँ) 'तृ' यह आदेश हो जाता है परन्तु (असौ) सुँ परे होने पर नहीं होता। यह आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् = नकार के स्थान पर प्रवृत्त होता है। यहां अनेकाल्परिभाषा से सर्वादेश नहीं हो सकता, क्योंकि 'तृँ' में अनुनासिक ऋकार की इत्सञ्ज्ञा (२८) हो जाती है—नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् । 'अर्वन्+औ' यहां नकार को तृँ आदेश हो—अर्वतृ+औ। उगिदचां सर्व- नामस्थानेऽधातो (२८६) से नुँम् का आगम हो—अर्वन्ँनुँम्तृ+औ = अर्वन्त्+औ । नश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि पर- सवर्णः (७६) से परसवर्ण—नकार हो कर 'अर्वन्तौ' प्रयोग सिद्ध होता है।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६७ इसी प्रकार आगे समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि केवल सर्वनामस्थानों में ही नुँम् होता है । भ्याम् आदि में जश्त्व हो जाता है । रूपमाला यथा— प्र० अर्वा॑न् अर्वन्तौ अर्वन्तः प० अर्वतः अर्वद्भ्याम् अर्वद्भ्यः द्वि० अर्वन्तम् ,, अर्वतः ष० ,, अर्वतोः अर्वताम् तृ० अर्वता अर्वद्भ्याम् अर्वद्भिः स० अर्वति ,, अर्वत्सु च० अर्वते ,, अर्वद्भ्यः सं० हे अर्वन् !† अर्वन्तौ ! अर्वन्तः ! † यहां 'सुं' होने से 'तृ' आदेश नहीं होता । अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) सूत्र में 'अनञः' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि— न अर्वा = अनर्वा । नञ्तत्पुरुषः । 'अनर्वन्' शब्द को सुंभिन्न विभक्तियों में 'तृ' आदेश न हो जावे । 'अनर्वन्' का उच्चारण 'यज्वन्' शब्द की तरह होता है । पथिन् (मार्ग) । मथिन् (मथनी) । ऋभुक्षिन् (इन्द्र) । पत्ऌ गतौ (भ्वा० प०) धातु से पतेस्थ च (उणा० ४५२) सूत्र द्वारा इनिँ प्रत्यय तथा तकार को थकारादेश हो 'पथिन्' शब्द सिद्ध होता है । पतन्ति = गच्छन्ति यत्र स पन्थाः । मन्थ विलोडने (स्वा० प०) धातु से मन्थः (उणा० ४५१) सूत्र द्वारा कित् 'इनिँ' प्रत्यय करने पर अनिदिताम्० (३३४) से उपधा के नकार का लोप करने से 'मथिन्' शब्द सिद्ध होता है । मन्थति = विलोडयति दध्यादिकम् इति मन्थाः । ऋभुक्षः = स्वर्गो वज्रो वा, सोऽस्यास्तीति ऋभुक्षाः । 'ऋभुक्ष' शब्द से मत्व- र्थीय 'इनिँ' प्रत्यय (११८६) करने पर 'ऋभुक्षिन्' शब्द सिद्ध होता है । पथिन् + स् (सुँ) । मथिन् + स् (सुँ) । ऋभुक्षिन् + स् (सुँ) । इस अवस्था में निम्नलिखित सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६३) पथिमथ्यृभुक्षामात् ।७।१।८५॥ एषामाकारोऽन्तादेशः सौ परे ॥ अर्थः—पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों को सुँ परे होने पर आकार अन्तादेश हो । व्याख्या—पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। आत् ।१।१। सौ ।७।१। (सावनडुहः से) । समासः—पन्थाश्च मन्थाश्च ऋभुक्षाश्च = पथिमथ्यृभुक्षाणः, तेषाम् = पथिमथ्यृभुक्षाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(पथिमथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों के स्थान पर (सौ) सुँ परे रहते (आत्) आकार आदेश हो । अलोऽन्त्यविधि से यह आकार आदेश अन्त्य अल्—नकार के स्थान पर होगा । तो इस सूत्र से आकार आदेश करने पर—पथि आ + स्, मथि आ + स्, ऋभुक्षि आ + स् । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६४) इतोऽत् सर्वनामस्थाने ।७।१।८६॥ पथ्यादेरिकारस्य अकारः स्यात् सर्वनामस्थाने परे ॥
३६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ—पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्द के इकार को सर्वनामस्थान परे होने पर अकार हो जाता है। व्याख्या—पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से)। इतः ।६।१। अत् ।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। अर्थ—(पथिमथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों के (इतः) इकार के स्थान पर (अत्) अत् आदेश हो जाता है (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो । इस सूत्र से इकार को अकार करने पर—'पथ् आ+स्, मथ् आ+स्, ऋभुक्ष् आ+स्' हुआ । अब इन तीनों में से प्रथम दो में तो अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है परन्तु तीसरे में सवर्णदीर्घ करने से—'ऋभुक्षास्' = 'ऋभुक्षाः' रूप सिद्ध होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६५) थो न्थः ।७।१।८७॥ पथिमथोस् थस्य न्थादेश स्यात्, सर्वनामस्थाने परे । पन्थाः। पन्थानौ । पन्थानः ॥ अर्थ:—पथिन् तथा मथिन् शब्दों के थकार को न्थ् आदेश हो जाता है सर्व- नामस्थान परे हो तो । व्याख्या—पथिमथोः ।६।२। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से, ऋभुक्षिन् में थकार न होने से उस की अनुवृत्ति नहीं होती) । थः ।६।१। न्थः ।१।१। अत्र थकारोत्तरओकार उच्चारणार्थः । सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः—(पथिमथोः) पथिन् और मथिन् शब्द के (थः) थ् के स्थान पर (न्थः) न्थ् आदेश हो जाता है (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो । तो इस सूत्र से न्थ् आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'पन्थ् आ स् = पन्थाः, मन्थ् आ स् = मन्थाः' रूप सिद्ध होते हैं। पथिन्+औ, मथिन्+औ, ऋभुक्षिन्+औ—इन में सुँ परे न होने से पथि- मथ्यृभुक्षामात् (२६३) सूत्र से नकार को आकार आदेश नहीं होता । इतोऽत्सर्वनाम- स्थाने (२६४) सूत्र से इकार को अकार हो कर प्रथम दो रूपों में थो न्थः (२६५) सूत्र से थकार को न्थ् कर के सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा तीनों रूपों में नान्त को उपधा को दीर्घ हो जाता है—पन्थानौ, मन्थानौ, ऋभुक्षाणौ । पथिन्+अस् (शस्), मथिन्+अस् (शस्), ऋभुक्षिन्+अस् (शस्)—यहाँ सर्वनामस्थान परे न होने से इतोऽत्सर्वनामस्थाने (२६४) तथा सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) प्रवृत्त नहीं होते । अब इन में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) भस्य टेर्लोपः ।७।१।८८॥ भसंज्ञकस्य पथ्यादेष्टेर्लोपः स्यात् । पथः । पथा । पथिभ्याम् । एवम् —मथिन्, ऋभुक्षिन् ॥ अर्थ—भसंज्ञक पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों की टि का लोप हो । व्याख्या—भस्य ।६।१। (यहां वचनविपरिणाम कर के 'भानाम्' कर देना चाहिये) । पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से) । टेः ।६।१। लोपः ।१।१।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६ अर्थः— (भस्य = भानाम्) भसञ्ज्ञक (पथिन्मथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों की (टेः) टि का (लोपः) लोप हो जाता है। इस सूत्र से टि (इन्) का लोप हो कर— पथ् + अस् = पथः, मथ् + अस् == मथः, ऋभुक्ष् + अस् = ऋभुक्षः—रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों में जान लेना चाहिये। अन्यत्र—पदसञ्ज्ञकों में न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो जाता है। रूपमाला यथा— पथिन् (मार्ग) | मथिन् (मथनी) प्र० पन्थाः पन्थानौ पन्थानः | प्र० मन्थाः मन्थानौ मन्थानः द्वि० पन्थानम् ,, पथः | द्वि० मन्थानम् ,, मथः तृ० पथा पथिभ्याम् पथिभिः | तृ० मथा मथिभ्याम् मथिभिः च० पथे ,, पथिभ्यः | च० मथे ,, मथिभ्यः प० पथः ,, ,, | प० मथः ,, ,, ष० ,, पथोः पथाम् | ष० ,, मथोः मथाम् स० पथि ,, पथिषु | स० मथि ,, मथिषु सं० हे पन्थाः! हे पन्थानौ! हे पन्थानः! | सं० हे मन्थाः! हे मन्थानौ! हे मन्थानः! ऋभुक्षिन् (इन्द्र) प्र० ऋभुक्षाः ऋभुक्षाणौ ऋभुक्षाणः | प० ऋभुक्षः ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभ्यः द्वि० ऋभुक्षाणम् ,, ऋभुक्षः | ष० ,, ऋभुक्षोः ऋभुक्षाम् तृ० ऋभुक्षा ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभिः | स० ऋभुक्षि ,, ऋभुक्षिषु च० ऋभुक्षे ,, ऋभुक्षिभ्यः | सं० हे ऋभुक्षाः! ऋभुक्षाणौ! ऋभुक्षाणः! इस में णत्व अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (१३८) सूत्र से होता है। पञ्चन् (पांच)। 'पञ्चन्' शब्द सिद्धान्तकौमुदीपठित उणादिसूत्रों में सिद्ध नहीं किया गया। उणादिसूत्रों के वृत्तिकार उज्ज्वलदत्त कनिँन् युवृषि० (उणा० १५४) सूत्र पर बहुल द्वारा पचिँ (भ्वा० प०, चुरा० उभ०) धातु से कनिँन् प्रत्यय कर के इसे सिद्ध करते हैं। प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट उणादिसूत्रों में पञ्चेश्च सूत्र पढ़ कर इस की सिद्धि करते हैं। सरस्वतीकण्ठाभरणकार भोजदेव—द्वि-यु-वृषि-तक्षि- राजि-ध्वनि-पचि-द्यु-प्रतिदिवश्यः कनिँन् इस प्रकार सूत्र बना कर इस की सिद्धि करते हैं। श्रीदुर्गसिंह अपनी वृत्ति में पचिँ विस्तारे (चुरा० उ०) धातु से पञ्चेरनिः सूत्र द्वारा 'अनि' प्रत्यय ला कर इस की निष्पत्ति मानते हैं। 'पञ्चन्' शब्द तीनों लिङ्गों में एक समान रहने वाला तथा नित्यबहुवचनान्त है। अतः इस से 'जस्' आदि बहुवचन प्रत्यय ही होते हैं। 'पञ्चन् + जस्' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
४०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] सञ्ज्ञा सूत्रम्—(२६७) ष्णान्ता षट् ।१।१।२३॥ ष्णान्ता नान्ता च सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञा स्यात् । 'पञ्चन्'शब्दो नित्यं बहु- वचनान्तः । पञ्च । पञ्च । पञ्चभिः । पञ्चभ्यः । पञ्चभ्यः । नुट्— अर्थ —षकारान्त और नकारान्त सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञक होती है। 'पञ्चन्' शब्द नित्यबहुवचनान्त होता है। व्याख्या—ष्णान्ता ।१।१। सङ्ख्या ।१।१। (बहुगणवतुडति सङ्ख्या से) । षट् ।१।१।¹ समास —ष् च नश्च=ष्णौ, नकारादकार उच्चारणार्थः । ष्णौ अन्तौ यस्याः सा ष्णान्ता । बहुव्रीहिसमास । अर्थ —(ष्णान्ता) षकारान्त और नकारान्त (सङ्ख्या) सङ्ख्या (षट्) षट्सञ्ज्ञक होती है। 'पञ्चन्' शब्द नकारान्त सङ्ख्या है, अतः इस की 'षट्' सञ्ज्ञा हो कर षड्भ्यो लुक् (१८८) द्वारा जस का लुक् हो न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से नकार का भी लोप कर देने मे 'पञ्च' सिद्ध होता है। 'शस्' मे भी इसी तरह—'पञ्च' । पञ्चन् + भिस् = पञ्चभिः । पञ्चभ्यः । [न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) ] । पञ्चन् + आम् । यहा ष्णान्ता षट् (२६७) सूत्र से षट् सञ्ज्ञा हो कर षट्- चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र द्वारा आम् को नुट् का आगम हो जाता है—पञ्चन् + नुट् आम्=पञ्चन+नाम् । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(२६८) नोपधायाः ।६।४।७॥ नान्तस्योपधाया दीर्घः स्यान्नामि परे । पञ्चानाम् । पञ्चसु ॥ अर्थ —'नाम्' परे होने पर नान्त की उपधा को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—न ।६।१। (यहा षष्ठी का लुक् समझना चाहिये। यह अङ्गस्य का विशेषण है अत इस मे तदन्तविधि होती है) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । उपधायाः ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । नामि ।७।१। (नामि ग)। अर्थ.—(नामि) नाम् परे होने पर (न) नान्त (अङ्गस्य) अङ्ग की (उप- धाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ हो जाता है। 'पञ्चन्+नाम्' यहा स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) से पदत्व होने पर न लोप प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा प्राप्त नकारलोप के असिद्ध होने से नोपधायाः (२६८) द्वारा उपधादीर्घ हो कर पश्चात् नकारलोप करने मे 'पञ्चानाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। नोट—'पञ्चन् + नाम्' यहा न लोप ० (१८०) द्वारा यदि नकार का लोप कर दिया जाना तो उस के असिद्ध होने मे नामि (१४६) द्वारा दीर्घ न हो सकता था। अतः नोपधाया (२६८) सूत्र बनाया गया है। १. 'षट्' यह सञ्ज्ञा अन्वर्थ अर्थात् अर्थ के अनुसार की गई है। इस सञ्ज्ञा के मुख्य- तया सञ्ज्ञी—१ पञ्चन्, २ षष्, ३ सप्तन्, ४ अष्टन्, ५ नवन्, ६ दशन्— ये छः शब्द होते हैं। अत इस सञ्ज्ञा का नाम 'षट्' युक्त ही है।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०१ पञ्चन् + सुप् = पञ्चसु । नलोपः० से नकारलोप । रूपमाला यथा— प्र० ० ० पञ्च | प० ० ० पञ्चभ्यः द्वि० ० ० " | प० ० ० पञ्चानाम् तृ० ० ० पञ्चभिः | स० ० ० पञ्चसु च० ० ० पञ्चभ्यः | —:०:— 'पञ्चन्' शब्द के अनन्तर 'षष्' (छः) शब्द की वारी आती है; परन्तु यह पकारान्त है, यहां नकारान्तों का प्रकरण चल रहा है अतः इस का विवेचन आगे यथास्थान पकारान्तों में किया जायेगा । 'षष्' शब्द के वाद 'सप्तन्' (सात) शब्द आता है । इस की समग्र प्रक्रिया 'पञ्चन्' शब्दवत् होती है, कुछ विशेष नहीं होता । सप्तन् (सात) । षप समवाये (भ्वा० प०) इत्यस्मात् सप्यशूभ्यां तुंट् च (उणा० १५५) इति कनिँन्प्रत्यये तुंडागमे च सप्तन् इति शब्दः साधुः । रूपमाला यथा— प्र० ० ० सप्त† | प० ० ० सप्तभ्यः* द्वि० ० ० „ † | प० ० ० सप्तानाम्‡ तृ० ० ० सप्तभिः* | स० ० ० सप्तसु* च० ० ० सप्तभ्यः* | —:०:— † ष्णान्ता षट् (२६७) से षट्सञ्ज्ञा तथा षड्भ्यो लुक् (१८६) से जस् और शस् का लुक् हो कर न लोपः० (१८०) से नकारलोप हो जाता है ।
- न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से पदान्त नकार का लोप होता है । ‡ षट्सञ्ज्ञा, षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) से नुँडागम, नोपधायाः (२६८) से उपधादीर्घ तथा न लोपः० (१८०) से नकार का लोप हो जाता है । अष्टन् (आठ) । अशूँ व्याप्तौ (स्वा० आ०) इत्यस्मात् सप्यशूभ्यां तुंट् च (उणा० १५५) इति कनिँनि तुंडागमे च अष्टन् इति शब्दः साधुः । 'अष्टन्' शब्द भी पञ्चन् और सप्तन् शब्दों की तरह सदा बहुवचनान्त होता है । 'अष्टन् + अस्' (जस् वा शस्) । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) अष्टन आ विभक्तौ ।७।२।८४॥ अष्टन आत्वं वा स्याद् हलादौ विभक्तौ ॥ अर्थः—हलादि विभक्ति परे होने पर 'अष्टन्' शब्द को विकल्प कर के आकार अन्तादेश हो जाता है । व्याख्या—अष्टनः ।६।१। आ ।१।१। विभक्तौ ।७।१। हलि ।७।१। (रायो हलि इस अग्रिमसूत्र से । यह 'विभक्तौ' का विशेषण है । अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो कर 'हलादौ' बन जाता है ।) अर्थः—(अष्टनः) अष्टन् शब्द के स्थान पर (आ) 'आ' यह आदेश हो जाता है (हलि = हलादौ) हलादि (विभक्तौ) ल० प्र० (२६)
४०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां विभक्ति परे हो तो। अलोऽन्त्यविधि के अनुसार यह आकार आदेश अन्त्य अल् = नकार के स्थान पर होता है। यह आत्व अष्टनो दीर्घात् (६ १ १६८)' सूत्र मे दीर्घग्रहणसामर्थ्य से वैकल्पिक माना जाता है। क्योकि यदि यह नित्य होता तो सर्वत्र दीर्घ ही के प्राप्त होने से सूत्र मे 'दीर्घात्' का ग्रहण व्यर्थ हो जाता — उस का ग्रहण न किया जाता। पुनः उस के ग्रहण से आत्व की वैकल्पिकत्वा स्पष्ट हो जाती है। यह सूत्र हलादि विभक्तियों मे प्रवृत्त होता है। यहां जस् और शस् तो जकार और शकार के लुप्त हो जाने से अजादि हैं। अत इस की प्रवृत्ति नही हो सकती। इस शङ्का की निवृत्ति अग्रिमसूत्र से करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३००) अष्टाभ्य औश् ।७।१।२१॥ कृताकाराद् अष्टन परयोर्जश्शसोर् औश् स्यात्। 'अष्टभ्य' इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। अष्टौ। अष्टौ। अष्टाभि । अष्टाभ्यः । अष्टानाम् । अष्टासु । आत्वाऽभावे—अष्ट २ इत्यादि पञ्चवत्॥ अर्थः—कृताकार अर्थात् आकार आदेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द से परे जस् और शस् को 'औश्' आदेश हो। व्याख्या—अष्टाभ्य ५।३। जश्शसो ६।२। (जश्शसो शिः से)। औश् १।१। भ्यस् विभक्ति में अष्टन् शब्द के 'अष्टाभ्य' और 'अष्टभ्य' ये दो रूप बनते हैं। परन्तु यहां 'अष्टाभ्य' रूप 'अष्टन्' शब्द का नही किन्तु 'अष्टा' शब्द का है। 'अष्टा' शब्द आकार अन्तादेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द का अनुकरण है। बहुवचन का प्रयोग शब्दो के बाहुल्य की दृष्टि से अथवा मुख्य अष्टन् को बताने के लिये किया गया है। अर्थ— (अष्टाभ्य) 'अष्टा' शब्द अर्थात् आकार अन्तादेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द से परे (जश्शसो) जस् और शस् के स्थान पर (औश्) औश् आदेश हो जाता है। औश् आदेश शित् होने के कारण अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) सूत्र द्वारा सम्पूर्ण जस् और शस् के स्थान पर होता है। ध्यान रहे कि यह सूत्र षड्भ्यो लुक् (१८८) सूत्र का अपवाद है। अब यहा प्रश्न उत्पन्न होता है कि अष्टन आ विभक्तौ (२६६) सूत्र से हलादि विभक्तियों में 'अष्टन्' को आकार अन्तादेश करने का विधान किया गया है, इस से जस् और शस् के अजादि होने के कारण जबकि 'अष्टन' को आकार आदेश ही नहीं होना तो पुन उस से परे जस् और शस् को 'औश्' विधान कैसे सम्भव हो सकता है? इस का उत्तर देते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। अर्थात् महामुनि को यदि अष्टन् शब्द से परे केवल जस् और शस को 'औश्' ही विधान करना अभीष्ट होता तो वे अष्टाभ्य औश् (३००) १ सूत्र का अर्थ—दीर्घान्त अष्टन् शब्द से परे शस् आदि विभक्ति उदात्त होती है।
• हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०३ सूत्र में 'अष्टाभ्यः' पद की बजाय 'अष्टभ्यः' ऐसा लिखते, क्योंकि इस से एक मात्रा का लाघव हो सकता था । परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'अष्टाभ्यः' लिखा, इस से यह विदित होता है कि वे आत्व किये हुए 'अष्टन्' शब्द की ओर निर्देश कर रहे हैं। परन्तु जस् और शस् में आत्व करने वाला कोई सूत्र नहीं है, अतः यहां पाणिनि के निर्देशसामर्थ्य से ही जस्, शस् में भी वैकल्पिक आत्व का होना विदित होता है। 'अष्टन् + अस्' (जस् वा शस्) यहां अष्टाभ्य औश् (३००) इस प्रकृत सूत्र में आत्व-निर्देश के कारण आकार अन्तादेश तथा सूत्र से जस् वा शस् को 'औश्' सर्वादेश हो कर 'अष्ट आ + औ' । अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'अष्टौ' प्रयोग सिद्ध होता है । भिस् और भ्यस् में हलादि विभक्ति परे होने के कारण अष्टन आ विभक्तौ (२६६) से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'अष्टाभिः, अष्टाभ्यः' । अष्टन् + आम् । यहां ष्णान्ता षट् (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा हो कर षट्- चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र द्वारा नुट् का आगम करने से—अष्टन् + नाम् । अब 'नाम्' के हलादि होने से अष्टन आ विभक्तौ (२६६) सूत्र से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'अष्टानाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । अष्टन् + सुप् = अष्टासु (अष्टन आ विभक्तौ) । जहां आत्व न होगा वहां सम्पूर्ण रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होगी। विशेष—आत्व अनात्व दोनों पक्षों में आम् विभक्ति में 'अष्टानाम्' एक सा रूप बनता है। परन्तु दोनों पक्षों की प्रक्रियाओं के अन्तर को ध्यान में रखना चाहिये। आत्वपक्ष में पहले नुट् का आगम और तदनन्तर आत्व करने से रूप सिद्ध होता है। परन्तु आत्वाभाव में नुट् का आगम हो कर नोपधायाः (२६८) से उपधादीर्घ तथा न लोपः० (१८०) से नकार का लोप करने से रूप सिद्ध होता है । दोनों पक्षों में रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन ╭──────────┴──────────╮ (आत्वपक्षे) (अनात्वपक्षे) प्रथमा ० ० अष्टौ अष्ट द्वितीया ० ० ,, ,, तृतीया ० ० अष्टाभिः अष्टभिः चतुर्थी ० ० अष्टाभ्यः अष्टभ्यः पञ्चमी ० ० ,, ,, षष्ठी ० ० अष्टानाम् अष्टानाम् सप्तमी ० ० अष्टासु अष्टसु
४०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'अष्टन्' शब्द के अनन्तर 'नवन्' (नौ) और दशन्' (दस) आते हैं। ये भी सदा बहुवचनान्त हैं। इन की रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होती है। नवन् (नौ) | दशन् (दस) प्र० * * नव | प्र० * * दश द्वि० * * " | द्वि० * * " तृ० * * नवभिः | तृ० * * दशभिः च० * * नवभ्यः | च० * * दशभ्यः प० * * " | प० * * " ष० * * नवानाम् | ष० * * दशानाम् स० * * नवसु | स० * * दशसु इसी प्रकार—एकादशन् (ग्यारह), द्वादशन् (बारह), त्रयोदशन् (तेरह), चतुर्दशन् (चौदह), पञ्चदशन् (पन्द्रह), षोडशन् (सोलह), सप्तदशन् (सत्रह), अष्टादशन् (अठारह), नवदशन् (उन्नीस) शब्दों के रूप होते हैं। (यहाँ नकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) अभ्यास (४०) (१) नोपधाया सूत्र की व्यर्थता बतला कर उस का समाधान करें। (२) (क) नलोपः सुप्स्वरसंज्ञा० नियम का क्या लाभ है ? (ख) थर्वणस्तृसावमत्र सूत्र में 'अनङ्' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (ग) श्वयुव० सूत्र पर प्रसिद्ध सूक्ति का विवेचन करें। (घ) षट्संज्ञा की अन्वर्थता पर संक्षिप्त नोट लिखें। (ङ) 'मघवन्' शब्द की दोनों पक्षों में रूपमाला लिखें। (३) निम्नलिखित वचनों की प्रकरणनिर्देशपूर्वक व्याख्या करें— (क) अत एव ज्ञापकात्त्यस्य यणं पूर्वं सम्प्रसारणम्। (ख) अष्टम्य इति वक्तव्ये कृतात्त्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। (ग) यनिनस्मन्ग्रहणा न्यर्थवता चानर्थकेन तदन्तविधि प्रयोजयन्ति। (४) अधोलिखित रूपों की ससूत्र सिद्धि करें— १ यज्वनि। २ राज्ञः। ३ ब्रह्मा। ४ वृत्रहणि। ५ पथा। ६ मन्था। ७ अष्टौ। ८. पञ्च। ६ वृत्रहा। १० अर्वन्तो। ११ मघोनः। १२ यूनि। (५) निम्नलिखित शब्दों का केवल शस् में रूप लिखें— १ अश्वत्थामन्। २ पुष्पधन्वन्। ३ मथिन्। ४ मघवन्। ५. श्वन्। ६ पञ्चन्। ७ अष्टन्। ८ अर्वन् ६ भ्रूणहन्। १० पूषन्।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०५ (६) सूत्रों की व्याख्या करें— १. एकाजुत्तरपदे णः । २. हो हन्तेर्जिण्णन्नेषु । ३. सौ च । ४. न संयोगाद्वमन्तात् । ५. उगीदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः । ६. न ङिसम्बु- द्ध्योः । ७. थो न्थः । ८. अष्टाभ्य औश् । ६. इन्हन्पूषार्यम्णां शौ । १०. अर्वणस्त्रसावनञः । (७) ऽनुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः वार्त्तिक का भाव प्रतिपादन करें । (८) (क) क्या 'ज्ञ' तथा 'क्ष' स्वतन्त्र वर्ण हैं ? विवेचनात्मक नोट लिखें । (ख) अर्वणस्त्रसावनञः द्वारा प्रतिपादित 'तृ' आदेश अनेकाल् होने पर भी क्यों सर्वादेश नहीं होता ? (ग) मघवा बहुलम् सूत्र में 'बहुलम्' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (घ) 'अष्टानाम्' पर दोनो पक्षो की प्रक्रियाएं स्पष्ट करें । (ङ) अष्टन आ विभक्तौ द्वारा विहित आकार कैसे वैकल्पिक है ? --:: ० ::-- अब जकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३०१) ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ।३।२।५६॥ एभ्यः क्विन् स्यात् १। अञ्चेः सुँप्युपपदे । युजिक्रुञ्चोः केवलयोः । क्रुञ्चेर्नलोपाभावश्च निपात्यते । कनावितौ ॥ अर्थः—ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश्, उष्णह्—ये पांच क्विन्नन्त शब्द नि- पातित किये जाते हैं; तथा सुबन्त उपपद होने पर 'अञ्चु' धातु से, उपपदरहित युजिं और क्रुञ्च् धातु से भी क्विन् प्रत्यय हो जाता है। किञ्च क्विन् परे रहते क्रुञ्च् के नकार का लोप भी नहीं होता । व्याख्या—ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ् ।१।१। अञ्चुयुजिक्रुञ्चाम् ।६।३। च इत्य- व्ययपदम् । क्विन् ।१।१। (स्पृशोऽनुदके क्विन् से)। समासः—ऋत्विक् च दधृक् च स्रक् च दिक् च उष्णिफ् च = ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ्, समाहारद्वन्द्वः । अञ्चुँश्च युजिश्च क्रुङ् चँ = अञ्चुयुजिक्रुञ्चः, तेषाम् = अञ्चुयुजिक्रुञ्चाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । पञ्चम्यर्थे सौत्रत्वात्षष्ठी । इस सूत्र में दो वाक्य हैं—१. ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ् । २. अञ्चुं- युजिक्रुञ्चां च क्विन् । पहले वाक्य में पाणिनि ने बने बनाये पांच शब्द गिनाये है । सूत्रकार का स्वयं सब कार्य कर के पढ़ देना निपातन कहाता है२। इन पांच शब्दों का निपातन किया गया है । 'क्विन्' के प्रकरण में पढ़े जाने के कारण इन शब्दों को १. एभ्यः क्विन् स्यात् — यह वचन ऋत्विज् आदि पांच शब्दों के अन्तर्गत यज् आदि पञ्च धातुओं को तथा सूत्र में साक्षात् पढ़े अञ्चु आदि तीन धातुओं को लक्ष्य कर के कहा गया है । २. लक्षणं विनैव निपतति = प्रवर्त्तते लक्ष्येषु इति निपातनम् ।
४०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां भी क्विबन्त समझना चाहिये। दूसरे वाक्य में तीन धातुओं से 'क्विँन्' प्रत्यय का विधान किया गया है। अर्थ - (ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिश्युष्णिञ्च्) ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश् और उष्णिह्, ये पांच क्विबन्त शब्द निपातित किये जाते हैं। (च) तथा (अञ्चुयुजि- क्रुञ्चाम्) अञ्चु, युजि तथा क्रुञ्च् धातुओ से (क्विँन्) क्विँन् प्रत्यय हो जाता है। निपातनों के साथ २ अञ्चु आदि तीन धातुओ से 'क्विँन्' प्रत्यय विधान करने से यह विदित होता है कि इन धातुओं में भी कुछ २ निपातन कार्य होते हैं। वे निपातन-कार्य शिष्टग्रन्थों के अनुसार निम्नलिखित हैं— (१) सुबन्त उपपद होने पर ही 'अञ्चु' धातु से क्विन् होता है। (२) उपपदरहित 'युजि' और 'क्रुञ्च्' धातु से क्विन् होता है। (३) 'क्विन्' परे होने पर 'क्रुञ्च्' के उपधाभूत नकार का अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति (३३४) द्वारा लोप नहीं होता। ऋत्विज् आदि पांच शब्दों में महामुनि ने निम्नलिखित कार्य किये हैं— (१) ऋत्विज्—में 'ऋतु' उपपद वाली यज्' (भ्वा० उ०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहार लोप, वचि-स्वपि० (५४७) से सम्प्रसारण, सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा इको यणचि (१५) से यण् किया गया है। (२) दधृष्—में धृष्' (स्वा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, द्वित्वादिक कार्य तथा अन्तोदात्तत्व किया गया है। यह शब्द पुँल्लिङ्ग है। आगे षका- रान्तो में इस का विवेचन किया जायेगा। (३) स्रज्—में 'सृज्' (तुदा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, ऋकार से परे अम् का आगम तथा यणादेश किया गया है। यह शब्द जकारान्त स्त्री- लिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (४) दिश्—में 'दिश' (तुदा० प०) धातु से कर्मकारक में क्विन् प्रत्यय कर उस का सर्वापहारलोप किया गया है। यह शब्द शकारान्त स्त्रीलिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (५) उष्णिह्—में 'उत्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, उद् के दकार का भी लोप तथा सकार को षकार किया गया है। यह शब्द भी आगे हकारान्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में कहा जायेगा। अब क्रमप्राप्त जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों में प्रथम 'ऋत्विज्' शब्द का विवेचन किया जाना है। यह शब्द क्विबन्त निपातन किया गया है। 'क्विँन्' प्रत्यय आ जाने से क्या क्या लाभ होते हैं तथा उस का किस प्रकार सर्वापहारलोप किया जाता है— यह बतलाने के लिये अब अग्रिमसूत्रों का विवेचन किया जाता है— 'ऋत्विज् + क्विँन्' यहां हलन्त्यम् (१) से नकार तथा लशक्वतद्धिते (१३६) १ वस्तुत क्विबन्त 'ऋत्विज्' शब्द बना बनाया निपातन किया गया है, इस की सिद्धि करने की आवश्यकता नहीं। और यदि सिद्धि करनी भी हो तो 'ऋत्विज् +
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०७ से ककार की इत्सञ्ज्ञा हो लोप हो जाता है¹। इकार उच्चारणार्थ है। तो इस प्रकार —‘ऋत्विज्+व्’ हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३०२) कृदतिङ्।३।१।९३॥ अत्र धात्वधिकारे तिङ्भिन्नः प्रत्ययः कृत्सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः—धातोः (३.१.६१) इस अधिकार में पठित प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक हो। व्याख्या—तत्र इत्यव्ययपदम्। (तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से)। अतिङ् १।१। (यह अधिकृत है)। कृत् १।१। अर्थः—(तत्र) उस धातोः के अधिकार में (अतिङ्) तिङ्भिन्न (प्रत्ययः) प्रत्यय (कृत्) कृत्सञ्ज्ञक हो। इस सूत्र से एक सूत्र पीछे अष्टाध्यायी में धातोः (७६६) इस प्रकार का एक अधिकार चलाया गया है। इस अधिकार का तात्पर्य यह है कि तृतीय अध्याय की समाप्ति तक जितने प्रत्यय विधान किये जायें वे सब धातु से परे हों। इस अधिकार को चला कर अब ‘तत्र अतिङ् प्रत्ययः कृत्’ ऐसा कथन किया गया है। अर्थात् उस धात्वधिकार में तिङ्भिन्न प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक होता है। यह सूत्र अष्टाध्यायी के तृतीय अध्याय के प्रथम पाद में स्थित है। इस पाद में दो धात्वधिकार हैं। एक—धातो- रेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (३.१.२२) सूत्र में और दूसरा धातोः (३.१.६१) यह उपर्युक्त। यहां ‘तत्र’ शब्द द्वितीय धात्वधिकार को लक्ष्य कर के प्रयुक्त किया गया है। इसलिये वृत्ति में ‘अत्र’ कहा गया है। अतः प्रथम धात्वधिकार में धातु से परे विहित प्रत्यय की कृत्सञ्ज्ञा नहीं होती। ‘अतिङ्’ कहने से इस धात्वधिकार में पठित होने पर भी तिङ्प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक न होंगे। यथा—भवति, पठति, पठन्तु आदि। यदि यहां भी कृत्सञ्ज्ञा हो जाती तो कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न हो जाने से—‘भवतिः, पठतिः, पठन्तुः’ इस प्रकार अनिष्ट रूप हो जाते। ऋत्विज्+व् (क्विन्न्)। यहां क्विन्न् की कृत्सञ्ज्ञा हो जाती है, क्योंकि यह द्वितीय धात्वधिकार में पठित तथा तिङ्भिन्न प्रत्यय है। अब यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०३) वेरपृक्तस्य ।६।१।६५॥ अपृक्तस्य वस्य लोपः ॥ अर्थः—अपृक्तसञ्ज्ञक वकार का लोप हो जाता है। व्याख्या—वेः ।६।१। अपृक्तस्य ।६।१। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से)। ‘क्विन्न्’ ऐसा नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि तब प्रथम ऋतूपपद ‘यज्’ धातु से क्विन्न् कर उसका सर्वापहारलोप कर बाद में उसको मान सम्प्रसारण आदि होने चाहियें, लोप से पूर्व नहीं। अतः बालकों के ज्ञान वा सौकर्य के लिये ही यह अलीक मार्ग अवलम्बन किया गया समझना चाहिये। १. ‘क्विन्न्’ प्रत्यय में नकार का ग्रहण क्विन्न् और क्विँप् में भेद कराने के लिये तथा ककार का ग्रहण कित् कार्यों के लिये है।
४०८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां यहा 'वि' मे इकार उच्चारणार्थ है, क्योकि 'वि' अपृक्त नही हो सकता। अपृक्त एका- ल्प्रत्यय (१७८) द्वारा एकाल् प्रत्यय की ही अपृक्तसञ्ज्ञा होती है। अर्थ -- (अपृक्त- स्य) अपृक्तसञ्ज्ञक (वे ) वकार का (लोप ) लोप हो जाता है। ऋत्विज् + व्' यहा वकार अपृक्त है, अत प्रकृतसूत्र से इस का लोप होकर 'ऋत्विज्' ही अवशिष्ट रहता है। अब इस के कृदन्त होने से प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते है— 'ऋत्विज् + स्' (सुं) यहा हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) सूत्र मे सुं का लोप हो जाता है। अब 'ऋत्विज्' इस अवस्था मे अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधिसूत्रम्— (३०४) क्विन्प्रत्ययस्य कुः ।८।२।६२॥ क्विन्प्रत्ययो यस्मात् तस्य कवर्गोन्तादेश स्यात् पदान्ते। अस्यासिद्ध- त्वाच् 'चो कु' (३०६) इति कुत्वम्। ऋत्विक्, ऋत्विग्। ऋत्विजौ। ऋत्विग्भ्याम् ॥ अर्थ—'क्विन्' प्रत्यय जिस से किया जाये, उस को पदान्त मे कवर्ग अन्ता- देश हो जाता है। इस सूत्र के असिद्ध होने से चोः कु (३०६) द्वारा कुँत्व हो जाता है। व्याख्या—क्विन्प्रत्ययस्य ।६।१। कु १।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्को संयोगाद्योरन्ते च से) । समास —क्विन्प्रत्ययो यस्मात् स क्विन्- प्रत्यय, तस्य=क्विन्प्रत्ययस्य । बहुव्रीहिसमास । अर्थ --(क्विन्प्रत्ययस्य) 'क्विन्' प्रत्यय जिस से किया गया हो उस के स्थान पर (कु ) कवर्ग आदेश हो जाता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त मे। अलोन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर होना है। अत एव वृत्ति मे 'अन्तादेश.' लिखा है। यहा 'कु' से अणुदित् सवर्णस्य० (११) द्वारा कवर्ग समझा जाता है--यह सञ्ज्ञाप्रकरण मे उसी सूत्र मे स्पष्ट कर चुके हैं। यहा इस सूत्र से केवलमात्र यह अभिप्राय नही समझना चाहिये कि 'पदान्त मे क्विबन्त शब्द के अन्त को कवर्ग आदेश होता है'। यदि केवल इतना ही अभीष्ट होता तो 'क्विन् कु' सूत्र रचते, 'प्रत्यय' शब्द साथ मे न जोडते। अत 'प्रत्यय' शब्द साथ लगाने का यह प्रयोजन है कि 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि-समास मान कर अब अक्विन्नन्तो अर्थात् क्विन्भिन्न अन्यप्रत्ययान्तो को भी कवर्ग अन्तादेश हो जावे यदि कही उन मे क्विन्प्रत्यय हो चुका हो। यह सब आगे हलन्तस्त्रीलिङ्ग- प्रकरण मे मूल मे ही स्पष्ट हो जायेगा । प्रकृत मे 'ऋत्विज्' यह शब्द क्विबन्त है अत पदान्त मे इस सूत्र से जकार को कवर्ग-गकार प्राप्त होता है। इस के अतिरिक्त आगे आने वाले चो कुः (३०६) सूत्र से भी जकार को कवर्ग अर्थात् गकार प्राप्त होता है। पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा चो कु. (८.२.३०) की दृष्टि मे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (८.२ ६२) सूत्र असिद्ध है, अत.
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०६
चोः कुः द्वारा ही कुत्व-गकार हो कर—ऋत्विग्। वाऽवसाने (१४६) से विकल्प कर के चर्त्व ककार करने से—'ऋत्विक्, ऋत्विग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। यद्यपि क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) और चोः कुः (३०६) इन दोनों सूत्रों में से किसी एक के द्वारा यहां कार्य सिद्ध हो सकता है, तथापि अन्यत्र भिन्न २ उदाह- रणों में कार्यसिद्धि के लिये दोनों सूत्रों का होना आवश्यक है। यथा--'युङ्' यहां चवर्ग न होने से चोः कुः (३०६) प्रवृत्त नहीं होता, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से ही कार्य होता है। 'सुयुक्, सुयुग्' यहां क्विन्प्रत्यय न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र प्रवृत्त नही होता, चोः कुः (३०६) से ही कुत्व होता है। विशेष—वस्तुतः 'ऋत्विक्-ग्' में क्विन्प्रत्ययस्य कुः द्वारा ही कुत्व होता है चोः कुः द्वारा नहीं। यह सब विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओं में देखें। भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदसंज्ञा हो कर चोः कुः (३०६) से कुत्व-गकार हो जाता है। सुप् में कुत्व के अनन्तर आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार तथा खरि च (७४) से गकार को चर्त्व- ककार कर क् + ष् के योग से क्ष् आकृति हो जाती है। 'ऋत्विज्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ऋत्विक्-ग् ऋत्विजौ ऋत्विजः | प० ऋत्विजः ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भ्यः द्वि० ऋत्विजम् ,, ,, | प० ,, ऋत्विजोः ऋत्विजाम् तृ० ऋत्विजा ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भिः | स० ऋत्विजि ,, ऋत्विक्षु च० ऋत्विजे ,, ऋत्विग्भ्यः | सं० हे ऋत्विक्-ग् ! ऋत्विजौ ! ऋत्विजः ! युज् (योगी)। युजिर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्प्रत्यय होकर उस का सर्वापहार लोप हो जाता है। इस प्रकार 'युज्' शब्द के कृदन्त हो जाने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। युज्+स्(सुँ)। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०५) युजेरसमासे ।७।१।७१॥ युजेः सर्वनामस्थाने नुँम् स्यादसमासे । सुँलोपः । संयोगान्तलोपः । कुत्वेन नस्य ङः । युङ् । अनुस्वारपरसवर्णौ—युञ्जौ, युञ्जः । युग्भ्याम् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर युज् को नुँम् का आगम होता है, परन्तु समास में नहीं होता। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः से) । युजेः ।६।१। नुँम् ।१।१। (इदितो नुँम् धातोः से)। असमासे ।७।१। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (युजेः) युज् धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है (असमासे) परन्तु समास में नहीं होता। ध्यान रहे कि ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र में तथा युजेरसमासे (३०५) इस सूत्र में 'युजि' इस प्रकार इकार ग्रहण करना 'कार' प्रत्यय की भांति स्वार्थ में
४१० भैमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इक्श्तिपौ धातुनिर्देशे इस इक् प्रत्यय द्वारा नही समझना चाहिये, किन्तु इस मे युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु का अनुकरण किया गया है। अत इन सूत्रो मे युज समाधौ (दिवा०) धातु का ग्रहण नही होता । विस्तार के लिये सिद्धान्तकौमुदी देखें। 'युज् + स्' यहा सर्वनामस्थान परे है, अत युजेरसमासे सूत्र से नुँम् का आगम हो—यु नुँम् ज् + स् । मकार और उकार अनुबन्धो का लोप हो कर—युन्ज् + स् । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकार का लोप—युन्ज् । सयोगान्तस्य लोप (२०) से जकार का लोप कर क्विन्प्रत्ययस्य कु. (३०४) से नकार को ङकार करने से—'युङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । युज् + औ' यहा भी सर्वनामस्थान परे होने के कारण युजेरसमासे (३०५) सूत्र द्वारा नुँम् का आगम—यु नुँम् ज्+औ । मश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण (७६) सूत्र द्वारा अनुस्वार को परसवर्ण- ञकार हो कर 'युञ्जौ' सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि परसवर्ण—के असिद्ध होन स चो कु (३०६) द्वारा ञकार को ङकार नही होता । रूपमाला यथा— प्र० युङ् युञ्जौ युञ्ज | प० युज युग्भ्याम्* युग्भ्य * द्वि० युञ्जम् " युज | प० " युजो युजाम् तृ० युजा युग्भ्याम्* युग्भि * | स० युजि " युक्षु‡ च० युजे ,"* युग्म्य * | स० हे युङ् ! हे युञ्जौ ! हे युञ्ज !
- इन स्थानो पर चो कु (३०६) द्वारा कुत्व हो जाता है। क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) सूत्र उस की दृष्टि मे असिद्ध है । ‡ चो. कु (३०६), आदेशप्रत्ययो (१५०), खरि च (७४) । सुयुज् (उत्तम योगी) । सुपूर्वक युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'सुयुज्' शब्द निष्पन्न होता है। ध्यान रहे कि यहा ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा क्विन् प्रत्यय नही होता, क्योकि वहा निरुपपद युज् मे क्विन् विधान किया गया है, यहा 'सु' यह उपपद विद्यमान है । सुयुज् + स् (सू) । यहा समास मे निषेध होने से युजेरसमासे (३०५) द्वारा नुँम् का आगम नही होता । हल्ङ्याब्भ्य ० (१७६) से सकार का लोप हो कर अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३०६) चोः कुः ।८।२।३०॥ चवर्गस्य कवर्ग स्याज्झलि पदान्ते च । सुयुक्, सुयुग् । सुयुजौ । सुयुग्भ्याम् । खन् । खञ्जौ । खन्भ्याम् ॥ अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त मे चवर्ग को कवर्ग हो । व्याख्या—चो ।६।१। कु ।१।१। झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्को. संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थ —