महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२२५-
पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा
वैशम्पायन उवाच
तौ रथाभ्यां रथश्रेष्ठौ दावस्योभयतः स्थितौ ।
दिक्षु सर्वासु भूतानां चक्राते कदनं महत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ वीर दो रथोंपर बैठकर खाण्डववनके दोनों ओर खड़े हो गये और सब दिशाओंमें घूम-घूमकर प्राणियोंका महान् संहार करने लगे ॥ १ ॥
यत्र यत्र च दृश्यन्ते प्राणिनः खाण्डवालयाः ।
पलायन्तः प्रवीरौ तौ तत्र तत्राभ्यधावताम् ॥ २ ॥
खाण्डववनमें रहनेवाले प्राणी जहाँ-जहाँ भागते दिखायी देते, वहीं-वहीं वे दोनों प्रमुख वीर उनका पीछा करते ॥ २ ॥
छिद्रं न स्म प्रपश्यन्ति रथयोराशुचारिणोः ।
आविद्धावेव दृश्येते रथिनौ तौ रथोत्तमौ ॥ ३ ॥
(खाण्डववनके प्राणियोंको) शीघ्रतापूर्वक सब ओर दौड़नेवाले उन दोनों महारथियोंका छिद्र नहीं दिखायी देता था, जिससे वे भाग सकें। रथियोंमें श्रेष्ठ वे दोनों रथारूढ़ वीर अलातचक्रकी भाँति सब ओर घूमते हुए ही दीख पड़ते थे ॥ ३ ॥
खाण्डवे दह्यमाने तु भूताः शतसहस्रशः ।
उत्पेतुर्भैरवान् नादान् विनदन्तः समन्ततः ॥ ४ ॥
जब खाण्डववनमें आग फैल गयी और वह अच्छी तरह जलने लगा, उस समय लाखों प्राणी भयानक चीत्कार करते हुए चारों ओर उछलने-कूदने लगे ॥ ४ ॥
दग्धैकदेशा बहवो निष्पिष्टाश्च तथापरे ।
स्फुटिताक्षा विशीर्णाश्च विप्लुताश्च तथापरे ॥ ५ ॥
बहुत-से प्राणियोंके शरीरका एक हिस्सा जल गया था, बहुतेरे आँचमें झुलस गये थे, कितनोंकी आँखें फूट गयी थीं और कितनोंके शरीर फट गये थे। ऐसी अवस्थामें भी सब भाग रहे थे ॥ ५ ॥
समालिङ्ग्य सुतानन्ये पितॄन् भ्रातॄंस्तथापरे ।
त्यक्तं न शेकुः स्नेहेन तत्रैव निधनं गताः ॥ ६ ॥
कोई अपने पुत्रोंको छातीसे चिपकाये हुए थे, कुछ प्राणी अपने पिता और भाइयोंसे सटे हुए थे। वे स्नेहवश एक-दूसरेको छोड़ न सके और वहीं कालके गालमें समा गये ॥ ६ ॥
संदष्टदशनाश्चान्ये समुत्पेतुरनेकशः ।
ततस्तेऽतीव घूर्णन्तः पुनरग्नौ प्रपेदिरे ॥ ७ ॥
कुछ जानवर दाँत कटकटाते, बार-बार उछलते-कूदते और अत्यन्त चक्कर काटते हुए फिर आगमें ही पड़ जाते थे ॥ ७ ॥
दग्धपक्षाक्षिचरणा विचेष्टन्तो महीतले ।
तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते विनश्यन्तः शरीरिणः ॥ ८ ॥
कितने ही पक्षी पाँख, आँख और पंजोंके जल जानेसे धरतीपर गिरकर छटपटा रहे थे। स्थान-स्थानपर मरणोन्मुख जीव-जन्तु दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ८ ॥
जलाशयेषु तप्तेषु क्वाथ्यमानेषु वह्निना ।
गतसत्त्वाः स्म दृश्यन्ते कूर्ममत्स्याः समन्ततः ॥ ९ ॥
जलाशय आगसे तपकर काढ़ेकी भाँति खौल रहे थे। उनमें रहनेवाले कछुए और मछली आदि जीव सब ओर निर्जीव दिखायी देते थे ॥ ९ ॥
शरीरैरपरे दीप्तैर्देहवन्त इवाग्नयः ।
अदृश्यन्त वने तत्र प्राणिनः प्राणसंक्षये ॥ १० ॥
प्राणियोंके संहारस्थल बने हुए उस वनमें कितने ही प्राणी अपने जलते हुए अंगोंसे मूर्तिमान् अग्निके समान दीख पड़ते थे ॥ १० ॥
कांश्चिदुत्पततः पार्थः शरैः संछिद्य खण्डशः । पातयामास विहगान् प्रदीप्ते वसुरेतसि ॥ ११ ॥ अर्जुनने कितने ही उड़ते हुए पक्षियोंको अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े करके प्रज्वलित आगमें झोंक दिया ॥ ११ ॥
ते शराचितसर्वाङ्गा निनदन्तो महारवान् । ऊर्ध्वमुत्पत्य वेगेन निपेतुः खाण्डवे पुनः ॥ १२ ॥ पहले तो पक्षी बड़े वेगसे ऊपरको उड़ते, परंतु बाणोंसे सारा अंग छिद जानेपर जोर-जोरसे आर्तनाद करते हुए पुनः खाण्डववनमें ही गिर पड़ते थे ॥ १२ ॥
शरैरभ्याहतानां च संघशः स्म वनौकसाम् । विरावः शुश्रुवे घोरः समुद्रस्येव मथ्यतः ॥ १३ ॥ बाणोंसे घायल हुए झुंड-के-झुंड वनवासी जीवोंका भयानक चीत्कार समुद्र-मन्थनके समय होनेवाले जल-जन्तुओंके करुण-क्रन्दनके समान जान पड़ता था ॥ १३ ॥
वह्नेश्चापि प्रदीप्तस्य खमुत्पेतुर्महार्चिषः । जनयामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम् ॥ १४ ॥ प्रज्वलित अग्निकी बड़ी-बड़ी लपटें आकाशमें ऊपरकी ओर उठने और देवताओंके मनमें बड़ा भारी भय उत्पन्न करने लगीं ॥ १४ ॥
तेनार्चिषा सुसंतप्ता देवाः सर्षिपुरोगमाः । ततो जग्मुर्महात्मानः सर्व एव दिवौकसः । शतक्रतुं सहस्राक्षं देवेशमसुरार्दनम् ॥ १५ ॥ उस लपटसे संतप्त हुए देवता और महर्षि आदि सभी देवलोकवासी महात्मा असुरोंका नाश करनेवाले देवेश्वर सहस्राक्ष इन्द्रके पास गये ॥ १५ ॥
देवा ऊचुः
किं न्विमे मानवाः सर्वे दह्यन्ते चित्रभानुना । कच्चिन्न संक्षयः प्राप्तो लोकानाममरेश्वर ॥ १६ ॥ देवता बोले—अमरेश्वर! अग्निदेव इन सब मनुष्योंको क्यों जला रहे हैं? कहीं संसारका प्रलय तो नहीं आ गया ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वृत्रहा तेभ्यः स्वयमेवान्ववेक्ष्य च । खाण्डवस्य विमोक्षार्थं प्रययौ हरिवाहनः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवताओंसे यह सुनकर वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्र स्वयं वह घटना देखकर खाण्डववनको आगके भयसे छुड़ानेके लिये चले ॥ १७ ॥
महता रथवृन्देन नानारूपेण वासवः । आकाशं समवाकीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने साथ अनेक प्रकारके विशाल रथ ले लिये और आकाशमें स्थित हो देवताओंके स्वामी वे इन्द्र जलकी वर्षा करने लगे ॥ १८ ॥
ततोऽक्षमात्रा व्यसृजन् धाराः शतसहस्रशः । चोदिता देवराजेन जलदाः खाण्डवं प्रति ॥ १९ ॥ देवराज इन्द्रसे प्रेरित होकर मेघ रथके धुरेके समान मोटी-मोटी असंख्य धाराएँ खाण्डववनमें गिराने लगे ॥ १९ ॥
असम्प्राप्तास्तु ता धारास्तेजसा जातवेदसः । ख एव समशुष्यन्त न काश्चित् पावकं गताः ॥ २० ॥ परंतु अग्निके तेजसे वे धाराएँ वहाँ पहुँचनेसे पहले आकाशमें ही सूख जाती थीं। अग्नितक कोई धारा पहुँची ही नहीं ॥ २० ॥
ततो नमुचिहा क्रुद्धो भृशमर्चिष्मतस्तदा । पुनरेव महामेघैरम्भांसि व्यसृजद् बहु ॥ २१ ॥ तब नमुचिनाशक इन्द्रदेव अग्निपर अत्यन्त कुपित हो पुनः बड़े-बड़े मेघोंद्वारा बहुत जलकी वर्षा कराने लगे ॥ २१ ॥
अर्चिर्धाराभिसम्बद्धं धूमविद्युत्समाकुलम् । बभूव तद् वनं घोरं स्तनयित्नुसमाकुलम् ॥ २२ ॥ आगकी लपटों और जलकी धाराओंसे संयुक्त होनेपर उस वनमें धुआँ उठने लगा। सब ओर बिजली चमकने लगी और चारों ओर मेघोंकी गड़गड़ाहटका शब्द गूँज उठा। इस प्रकार खाण्डववनकी दशा बड़ी भयंकर हो गयी ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि इन्द्रक्रोधे पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें इन्द्रकोपविषयक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२५ ॥
२२६-
षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवताओं आदिके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
तस्याथ वर्षतो वारि पाण्डवः प्रत्यवारयत् ।
शरवर्षेण बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वर्षा करते हुए इन्द्रकी उस जलधाराको पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने उत्तम अस्त्रका प्रदर्शन करते हुए बाणोंकी बौछारसे रोक दिया ॥ १ ॥
खाण्डवं च वनं सर्वं पाण्डवो बहुभिः शरैः ।
आच्छादयदमेयात्मा नीहारेणेव चन्द्रमाः ॥ २ ॥
अमित आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डव अर्जुनने बहुत-से बाणोंकी वर्षा करके सारे खाण्डववनको ढँक दिया, जैसे कुहरा चन्द्रमाको ढक देता है ॥ २ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।
संछाद्यमाने खे बाणैरस्यता सव्यसाचिना ॥ ३ ॥
सव्यसाची अर्जुनके चलाये हुए बाणोंसे सारा आकाश छा गया था; इसलिये कोई भी प्राणी उस वनसे निकल नहीं पाता था ॥ ३ ॥
तक्षकस्तु न तत्रासीन्नागराजो महाबलः ।
दह्यमाने वने तस्मिन् कुरुक्षेत्रं गतो हि सः ॥ ४ ॥
जब खाण्डववन जलाया जा रहा था, उस समय महाबली नागराज तक्षक वहाँ नहीं था, कुरुक्षेत्र चला गया था ॥ ४ ॥
अश्वसेनोऽभवत् तत्र तक्षकस्य सुतो बली ।
स यत्नमकरोत् तीव्रं मोक्षार्थं जातवेदसः ॥ ५ ॥
परंतु तक्षकका बलवान् पुत्र अश्वसेन वहीं रह गया था। उसने उस आगसे अपनेको छुड़ानेके लिये बड़ा भारी प्रयत्न किया ॥ ५ ॥
न शशाक स निर्गन्तुं निरुद्धोऽर्जुनपत्रिभिः ।
मोक्षयामास तं माता निगीर्य भुजगात्मजा ॥ ६ ॥
किंतु अर्जुनके बाणोंसे रुँध जानेके कारण वह बाहर निकल न सका। उसकी माता सर्पिणीने उसे निगलकर उस आगसे बचाया ॥ ६ ॥
तस्य पूर्वं शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगीर्य च ।
निगीर्यमाणा साक्रामत् सुतं नागी मुमुक्षया ॥ ७ ॥
उसने पहले उसका मस्तक निगल लिया। फिर धीरे-धीरे पूँछतकका भाग निगल गयी। निगलते-निगलते ही उस नागिनने पुत्रको बचानेके लिये आकाशमें उड़कर निकल भागनेकी चेष्टा की ॥ ७ ॥
तस्याः शरेण तीक्ष्णेन पृथुधारेण पाण्डवः । शिरश्चिच्छेद गच्छन्त्यास्तामपश्यच्छचीपतिः ॥ ८ ॥ परंतु पाण्डुकुमार अर्जुनने मोटी धारवाले तीखे बाणसे उस भागती हुई सर्पिणीका मस्तक काट दिया। शचीपति इन्द्रने उसकी यह अवस्था अपनी आँखों देखी ॥ ८ ॥
तं मुमोचयिषुर्वज्री वातवर्षेण पाण्डवम् । मोहयामास तत्कालमश्वसेनस्त्वमुच्यत ॥ ९ ॥ तब उसे छुड़ानेकी इच्छासे वज्रधारी इन्द्रने आँधी और वर्षा चलाकर पाण्डुकुमार अर्जुनको उस समय मोहित कर दिया। इतनेहीमें तक्षकका पुत्र अश्वसेन उस संकटसे मुक्त हो गया ॥ ९ ॥
तां च मायां तदा दृष्ट्वा घोरां नागेन वञ्चितः । द्विधा त्रिधा च खगतान् प्राणिनः पाण्डवोऽच्छिनत् ॥ १० ॥ तब उस भयानक मायाको देखकर नागसे ठगे गये पाण्डुपुत्र अर्जुनने आकाशमें उड़नेवाले प्राणियोंके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले ॥ १० ॥
शशाप तं च संक्रुद्धो बीभत्सुर्जिह्मगामिनम् । पावको वासुदेवश्चाप्यप्रतिष्ठो भविष्यसि ॥ ११ ॥ फिर क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने टेढ़ी चालसे चलनेवाले उस नागको शाप दिया—‘अरे! तू आश्रयहीन हो जायगा।’ अग्नि और श्रीकृष्णने भी उसका अनुमोदन किया ॥ ११ ॥
ततो जिष्णुः सहस्राक्षं खं वितत्याशुगैः शरैः । योधयामास संक्रुद्धो वञ्चनां तामनुस्मरन् ॥ १२ ॥ तदनन्तर अपने साथ की हुई वंचनाको बार-बार स्मरण करके क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा आकाशको आच्छादित करके इन्द्रके साथ युद्ध छेड़ दिया ॥ १२ ॥
देवराजोऽपि तं दृष्ट्वा संरब्धं समरेऽर्जुनम् । स्वमस्त्रमसृजत् तीव्रं छादयित्वाखिलं नभः ॥ १३ ॥ देवराजने भी अर्जुनको युद्धमें कुपित देख सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित करते हुए अपने दुस्सह अस्त्र (ऐन्द्रास्त्र)-को प्रकट किया ॥ १३ ॥
ततो वायुर्महाघोषः क्षोभयन् सर्वसागरान् । वियत्स्थो जनयन् मेघाञ्जलधारासमाकुलान् ॥ १४ ॥ फिर तो बड़ी भारी आवाजके साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी। उसने समस्त समुद्रोंको क्षुब्ध करते हुए आकाशमें स्थित हो मूसलाधार पानी बरसानेवाले मेघोंको उत्पन्न किया ॥ १४ ॥
ततोऽशनिमुचो घोरांस्तडित्स्तनितनिःस्वनान् । तद्विघातार्थमसृजदर्जुनोऽप्यस्त्रमुत्तमम् ॥ १५ ॥ वायव्यमभिमन्त्र्याथ प्रतिपत्तिविशारदः । तेनेन्द्राशनिमेघानां वीर्यौजस्तद् विनाशितम् ॥ १६ ॥ वे भयंकर मेघ बिजलीकी कड़कड़ाहटके साथ धरतीपर वज्र गिराने लगे। उस अस्त्रके प्रतिकारकी विद्यामें कुशल अर्जुनने उन मेघोंको नष्ट करनेके लिये अभिमन्त्रित करके वायव्य नामक उत्तम अस्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रने इन्द्रके छोड़े हुए वज्र और मेघोंका ओज एवं बल नष्ट कर दिया ॥ १५-१६ ॥
जलधाराश्च ताः शोषं जग्मुर्नैशूश्च विद्युत : । क्षणेन चाभवद् व्योम सम्प्रशान्तरजस्तमः ॥ १७ ॥ जलकी वे सारी धाराएँ सूख गयीं और बिजलियाँ भी नष्ट हो गयीं। क्षणभरमें आकाश धूल और अन्धकारसे रहित हो गया ॥ १७ ॥
सुखशीतानिलवहं प्रकृतिस्थार्कमण्डलम् । निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग् विविधाकृतिः ॥ १८ ॥ सिच्यमानो वसाघैस्तैः प्राणिनां देहनिःसृतैः । प्रजज्वालाथ सोऽर्चिष्मान् स्वनादैः पूरयञ्जगत् ॥ १९ ॥ सुखदायिनी शीतल हवा चलने लगी। सूर्यमण्डल स्वाभाविक स्थितिमें दिखायी देने लगा। अग्निदेव प्रतीकारशून्य होनेके कारण बहुत प्रसन्न हुए और अनेक रूपोंमें प्रकट हो प्राणियोंके शरीरसे निकली हुई वसाके समूहसे अभिषिक्त होकर बड़ी-बड़ी लपटोंके साथ प्रज्वलित हो उठे। उस समय अपनी आवाजसे वे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥
कृष्णाभ्यां रक्षितं दृष्ट्वा तं च दावमहंकृताः । खमुत्पेतुर्महाराज सुपर्णाद्याः पतत्रिणः ॥ २० ॥ महाराज! उस खाण्डववनको श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित देख अहंकारसे युक्त सुन्दर पंख आदि अंगोंवाले पक्षी आकाशमें उड़ने लगे ॥ २० ॥
गरुत्मान् वज्रसदृशैः पक्षतुण्डनखैस्तथा । प्रहर्तुकामो न्यपतदाकाशात् कृष्णपाण्डवौ ॥ २१ ॥ एक गरुडजातीय पक्षी* वज्रके समान पाँख, चोंच और पंजोंसे प्रहार करनेकी इच्छा रखकर आकाशसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर झपटा ॥ २१ ॥
तथैवोरगसङ्घाताः पाण्डवस्य समीपतः । उत्सृजन्तो विषं घोरं निपेतुर्र्ज्वलिताननाः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले नागोंके समुदाय भी पाण्डव अर्जुनके समीप भयानक जहर उगलते हुए उनकी ओर टूट पड़े ॥ २२ ॥
तांश्चकर्त शरैः पार्थः सरोषाग्निसमुक्षितैः । विविशुश्चापि तं दीप्तं देहाभावाय पावकम् ॥ २३ ॥ यह देख अर्जुनने रोषाग्निप्रेरित बाणोंद्वारा उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और वे सभी अपने शरीरको भस्म करनेके लिये उस जलती हुई आगमें समा गये ॥ २३ ॥
ततोऽसुराः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । उत्पेतुर्नादमतुलमुत्सृजन्तो रणार्थिनः ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग युद्धके लिये उत्सुक हो अनुपम गर्जना करते हुए वहाँ दौड़े आये ॥ २४ ॥
अयःकणपचक्राश्मभुशुण्ड्युद्यतबाहवः । कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः क्रोधसम्मूर्च्छितौजसः ॥ २५ ॥ किन्हींके हाथमें लोहेकी गोली छोड़नेवाले यन्त्र (तोप, बंदूक आदि) थे और कुछ लोगोंने हाथोंमें चक्र, पत्थर एवं भुशुण्डी उठा रखी थी। क्रोधाग्निसे बढ़े हुए तेजवाले वे सब-के-सब श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालना चाहते थे ॥ २५ ॥
तेषामतिव्याहरतां शस्त्रवर्षं प्रमुञ्चताम् । प्रममाथोत्तमाङ्गानि बीभत्सुर्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥ वे लोग बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। उस समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उन सबके सिर उड़ा दिये ॥ २६ ॥
कृष्णश्च सुमहातेजाश्चक्रेणारिविनाशनः । दैत्यदानवसङ्घानां चकार कदनं महत् ॥ २७ ॥ शत्रुविनाशन महातेजस्वी श्रीकृष्णने भी चक्रद्वारा दैत्यों और दानवोंके समुदायका महान् संहार कर दिया ॥ २७ ॥
अथापरे शरैर्विद्धाश्चक्रवेगेरितास्तथा । वेलामिव समासाद्य व्यतिष्ठन्नमितौजसः ॥ २८ ॥ फिर दूसरे-दूसरे अमित तेजस्वी दैत्य-दानव बाणोंसे घायल और चक्रवेगसे कम्पित हो तटपर आकर रुक जानेवाली समुद्रकी लहरोंके समान एक सीमातक ही ठहर गये—आगे न बढ़ सके ॥ २८ ॥
ततः शक्रोऽतिसंक्रुद्धस्त्रिदशानां महेश्वरः । पाण्डुरं गजमास्थाय तावुभौ समुपाद्रवत् ॥ २९ ॥ तब देवताओंके महाराज इन्द्र श्वेत ऐरावतपर आरूढ़ हो अत्यन्त क्रोधपूर्वक उन दोनोंकी ओर दौड़े ॥ २९ ॥
वेगेनाशनिमादाय वज्रमस्त्रं च सोऽसृजत् । हतावेताविति प्राह सुरानसुरसूदनः ॥ ३० ॥
असुरसूदन इन्द्रने बड़े वेगसे अशनि-रूप अपना वज्रास्त्र उठाकर चला दिया और देवताओंसे कहा—‘लो ये दोनों मारे गये’ ॥ ३० ॥ ततः समुद्यतां दृष्ट्वा देवेन्द्रेण महाशनिम् । जगृहुः सर्वशस्त्राणि स्वानि स्वानि सुरास्तथा ॥ ३१ ॥ देवराज इन्द्रको वह महान् वज्र उठाये देख देवताओंने भी अपने-अपने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र ले लिये ॥ ३१ ॥ कालदण्डं यमो राजन् गदां चैव धनेश्वरः । पाशांश्च तत्र वरुणो विचित्रां च तथाशनिम् ॥ ३२ ॥ राजन्! यमराजने कालदण्ड, कुबेरने गदा तथा वरुणने पाश और विचित्र वज्र हाथमें ले लिये ॥ ३२ ॥ स्कन्दः शक्तिं समादाय तस्थौ मेरुरिवाचलः । ओषधीर्दीप्यमानाश्च जगृहातेऽश्विनावपि ॥ ३३ ॥ देवताओंके सेनापति स्कन्द शक्ति हाथमें लेकर मेरु पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े हो गये। दोनों अश्विनीकुमारोंने भी चमकीली ओषधियाँ उठा लीं ॥ ३३ ॥ जगृहे च धनुर्धाता मुसलं तु जयस्तथा । पर्वतं चापि जग्राह क्रुद्धस्त्वष्टा महाबलः ॥ ३४ ॥ धाताने धनुष लिया और जयने मुसल, क्रोधमें भरे हुए महाबली त्वष्टाने पर्वत उठा लिया ॥ ३४ ॥ अंशस्तु शक्तिं जग्राह मृत्युर्देवः परश्वधम् । प्रगृह्य परिघं घोरं विचचारार्यमा अपि ॥ ३५ ॥ अंशने शक्ति हाथमें ले ली और मृत्युदेवने फरसा। अर्यमा भी भयानक परिघ लेकर युद्धके लिये विचरने लगे ॥ ३५ ॥ मित्रश्च क्षुरपर्यन्तं चक्रमादाय तस्थिवान् । पूषा भगश्च संक्रुद्धः सविता च विशाम्पते ॥ ३६ ॥ आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशाः कृष्णपार्थौ प्रदुद्रुवुः । मित्र देवता जिसके किनारोंपर छुरे लगे हुए थे, वह चक्र लेकर खड़े हो गये। महाराज! पूषा, भग और क्रोधमें भरे हुए सविता धनुष और तलवार लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुनपर टूट पड़े ॥ ३६ १/२ ॥ रुद्राश्च वसवश्चैव मरुतश्च महाबलाः ॥ ३७ ॥ विश्वेदेवास्तथा साध्या दीप्यमानाः स्वतेजसा । एते चान्ये च बहवो देवास्तौ पुरुषोत्तमौ ॥ ३८ ॥ कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः प्रतीयुर्विविधायुधाः ।
रुद्र, वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव तथा अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाले साध्यगण—ये और दूसरे बहुत-से देवता नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनकी ओर बढ़े॥ ३७-३८ १/२॥
तत्राद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे॥ ३९॥
युगान्तसमरूपाणि भूतसम्मोहनानि च।
तथा दृष्ट्वा सुसंरब्धं शक्रं देवैः सहाच्युतौ॥ ४०॥
अभीतौ युधि दुर्धर्षौ तस्थतुः सज्जकार्मुकौ।
उस महासंग्राममें प्रलयकालके समान रूपवाले तथा प्राणियोंको मोहमें डाल देनेवाले अद्भुत अपशकुन दिखायी देने लगे। देवताओंसहित इन्द्रको रोषमें भरा देख अपनी महिमासे च्युत न होनेवाले निर्भय तथा दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन धनुष तानकर युद्धके लिये खड़े हो गये॥ ३९-४० १/२॥
आगच्छतस्ततो देवानुभौ युद्धविशारदौ॥ ४१॥
व्यताडयेतां संक्रुद्धौ शरैर्वज्रोपमैस्तदा।
तदनन्तर वे दोनों युद्धकुशल वीर कुपित हो अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा वहाँ आते हुए देवताओंको घायल करने लगे॥ ४१ १/२॥
असकृद् भग्नसंकल्पाः सुराश्च बहुशः कृताः॥ ४२॥
भयाद् रणं परित्यज्य शक्रमेवाभिशिश्रियुः।
बहुत-से देवता बार-बार प्रयत्न करनेपर भी कभी सफलमनोरथ न हो सके। उनकी आशा टूट गयी और वे भयके मारे युद्ध छोड़कर इन्द्रकी ही शरणमें चले गये॥ ४२ १/२॥
दृष्ट्वा निवारितान् देवान् माधवेनार्जुनेन च॥ ४३॥
आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनयो नभसि स्थिताः।
श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा देवताओंकी गति कुण्ठित हुई देख आकाशमें खड़े हुए महर्षिगण बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४३ १/२॥
शक्रश्चापि तयोर्वीर्यमुपलभ्यासकृद् रणे॥ ४४॥
बभूव परमप्रीतो भूयश्चैतावयोधयत्।
इन्द्र भी उस युद्धमें बार-बार उन दोनों वीरोंका पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए और पुनः उन दोनोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ४४ १/२॥
ततोऽश्मवर्षं सुमहद् व्यसृजत् पाकशासनः॥ ४५॥
भूय एव तदा वीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः।
तदनन्तर इन्द्रने सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमकी परीक्षा लेनेके लिये पुनः उनपर पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा प्रारम्भ की॥ ४५ १/२॥
तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षितः॥ ४६॥
विफलं क्रियमाणं तत् समवेक्ष्य शतक्रतुः ।
भूयः संवर्धयामास तद्वर्षं पाकशासनः ॥ ४७ ॥
अर्जुनने अत्यन्त अमर्षमें भरकर अपने बाणोंद्वारा वह सारी वर्षा नष्ट कर दी। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पाकशासन इन्द्रने उस पत्थरोंकी वर्षाको विफल हुई देख पुनः पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा की ॥ ४६-४७ ॥
सोऽश्मवर्षं महावेगैरिषुभिः पाकशासनिः ।
विलयं गमयामास हर्षयन् पितरं तथा ॥ ४८ ॥
यह देख इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पिताका हर्ष बढ़ाते हुए महान् वेगशाली बाणोंद्वारा पत्थरोंकी उस वृष्टिको फिर विलीन कर दिया ॥ ४८ ॥
तत उत्पाट्य पाणिभ्यां मन्दराच्छिखरं महत् ।
सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥ ४९ ॥
इसके बाद इन्द्रने पाण्डुनन्दन अर्जुनको मारनेके लिये अपने दोनों हाथोंसे मन्दर पर्वतका महान् शिखर वृक्षोंसहित उखाड़ लिया और उसे उनके ऊपर चलाया ॥ ४९ ॥
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलिताग्रैरजिह्मगैः ।
शरैर्विध्वंसयामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा ॥ ५० ॥
यह देख अर्जुनने प्रज्वलित नोकवाले वेगवान् एवं सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा उस पर्वत-शिखरको हजारों टुकड़े करके गिरा दिया ॥ ५० ॥
गिरेर्विशीर्यमाणस्य तस्य रूपं तदा बभौ ।
सार्कचन्द्रग्रहस्येव नभसः परिशीर्यतः ॥ ५१ ॥
छिन्न-भिन्न होकर गिरता हुआ वह पर्वतशिखर ऐसा जान पड़ता था मानो सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह आकाशसे टूटकर गिर रहे हों ॥ ५१ ॥
तेनाभिपतिता दावं शैलेन महता भृशम् ।
शृङ्गेण निहतास्तत्र प्राणिनः खाण्डवालयाः ॥ ५२ ॥
वहाँ गिरे हुए उस महान् पर्वतशिखरके द्वारा खाण्डववनमें निवास करनेवाले बहुतसे प्राणी मारे गये ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि देवकृष्णार्जुनयुद्धे
षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें देवताओंके साथ श्रीकृष्ण और अर्जुनके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२६ ॥
* यह विष्णुवाहन गरुडसे भिन्न था।
(मयदर्शनपर्व)
(मयदर्शनपर्व)
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा
वैशम्पायन उवाच
तथा शैलनिपातेन भीषिताः खाण्डवालयाः ।
दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पर्वतशिखरके गिरनेसे खाण्डववनमें रहनेवाले दानव, राक्षस, नाग, चीते तथा रीछ आदि वनचर प्राणी भयभीत हो उठे ।। १ ।।
द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा ।
मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा ॥ २ ॥
समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातयः ।
मदकी धारा बहानेवाले हाथी, शार्दूल, केसरी, सिंह, मृग, भैंस, सैकड़ों पक्षी तथा दूसरी-दूसरी जातिके प्राणी अत्यन्त उद्विग्न हो इधर-उधर भागने लगे ।। २ १/२ ।।
तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ ॥ ३ ॥
उत्पातनादशब्देन त्रासिता इव च स्थिताः ।
ते वनं प्रसमीक्ष्याथ दह्यमानमनेकधा ॥ ४ ॥
कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् ।
उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त-से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे ।। ३-४ १/२ ।।
तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः ॥ ५ ॥
ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव ।
उस भयंकर आर्तनाद और अग्निदेवकी गर्जनासे वहाँका सम्पूर्ण आकाश मानो उत्पातकालिक मेघोंकी गर्जनासे गूँज रहा था ।। ५ १/२ ।।
ततः कृष्णो महाबाहुः स्वतेजोभास्वरं महत् ॥ ६ ॥
चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः ।
तब महाबाहु श्रीकृष्णने अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाले उस अत्यन्त भयंकर महान् चक्रको उन दैत्य आदि प्राणियोंके विनाशके लिये छोड़ा ।। ६ १/२ ।।
तेनार्ता जातयः क्षुद्राः सदानवनिशाचराः ।। ७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1569)
श्रीकृष्ण और अर्जुनका देवताओंसे युद्ध
अर्जुन और श्रीकृष्णको इन्द्रका वरदान
निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् । उस चक्रके प्रहारसे पीड़ित हो दानव, निशाचर आदि समस्त क्षुद्र प्राणी सौ-सौ टुकड़े होकर क्षणभरमें आगमें गिर गये ॥ ७१/२ ॥ तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः ॥ ८ ॥ वसारुधिरसम्पृक्ताः संध्यायामिव तोयदाः । श्रीकृष्णके चक्रसे विदीर्ण हुए दैत्य मेदा तथा रक्तमें सनकर संध्याकालके मेघोंकी भाँति दिखायी देने लगे ॥ ८१/२ ॥ पिशाचान् पक्षिणो नागान् पशूंश्चैव सहस्रशः ॥ ९ ॥ निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत् तत्र भारत । भारत! भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सहस्रों पिशाचों, पक्षियों, नागों तथा पशुओंका वध करते हुए कालके समान विचर रहे थे ॥ ९१/२ ॥ क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः ॥ १० ॥ छित्त्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः । शत्रुघाती श्रीकृष्णके द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियोंका संहार करके पुनः उनके हाथमें चला आता था ॥ १०१/२ ॥ तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥ बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा । इस प्रकार पिशाच, नाग तथा राक्षसोंका संहार करनेवाले सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप उस समय बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १११/२ ॥ समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः ॥ १२ ॥ विजेता नाभवत् कश्चित् कृष्णपाण्डवयोर्मृधे । वहाँ सब ओरसे सम्पूर्ण दानव एकत्र हो गये थे, तथापि उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं निकला, जो युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत सके ॥ १२१/२ ॥ तयोर्बलात् परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः ॥ १३ ॥ नाशक्नुवञ्छमयितुं तदाभूवन् पराङ्मुखाः । जब देवतालोग उन दोनोंके बलसे खाण्डववनकी रक्षा करने और उस आगको बुझानेमें सफल न हो सके, तब पीठ दिखाकर चल दिये ॥ १३१/२ ॥ शतक्रतुस्तु सम्प्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा ॥ १४ ॥ बभूव मुदितो राजन् प्रशंसन् केशवार्जनौ । राजन्! शतक्रतु इन्द्र देवताओंको विमुख हुआ देख श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४१/२ ॥ निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी ॥ १५ ॥
शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई — ॥ १५१/२ ॥
न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥ १६ ॥ दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ । ‘वासव! तुम्हारे सखा नागप्रवर तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं। वे खाण्डवदाहके समय कुरुक्षेत्र चले गये थे ॥ १६१/२ ॥
न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥ १७ ॥ वासुदेवार्जुनौवेतौ निबोध वचनान्मम । नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥ १८ ॥ भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ । नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि ॥ १९ ॥ ‘भगवान् वासुदेव तथा अर्जुनको किसी प्रकार युद्धसे जीता नहीं जा सकता। मेरे कहनेसे तुम इस बातको समझ लो। ये दोनों पहलेके देवता नर और नारायण हैं। देवलोकमें भी इनकी ख्याति है। इनका बल और पराक्रम कैसा है, यह तुम भी जानते हो। ये अपराजित और दुर्धर्ष वीर हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें किसीके द्वारा भी ये युद्धमें जीते नहीं जा सकते ॥ १७—१९ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ । पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥ २० ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः । ‘ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायण सम्पूर्ण देवताओं, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों तथा नागोंके लिये भी परम पूजनीय हैं ॥ २०१/२ ॥
तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥ २१ ॥ दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम् । ‘अतः इन्द्र! तुम्हें देवताओंके साथ यहाँसे चले जाना ही उचित है। खाण्डववनके इस विनाशको तुम प्रारब्धका ही कार्य समझो’ ॥ २११/२ ॥
इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥ २२ ॥ क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा । यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इन्द्रने इसे ही सत्य माना और क्रोध तथा अमर्ष छोड़कर वे उसी समय स्वर्गलोकको लौट गये ॥ २२१/२ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥ २३ ॥ सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ।
राजन्! महात्मा इन्द्रको वहाँसे प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेनासहित उनके पीछे-पीछे चले गये ॥ २३ १/२ ॥
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ।। २४ ।।
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः ।
उस समय देवताओंसहित देवराज इन्द्रको जाते देख वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनने सिंहनाद किया ॥ २४ १/२ ॥
देवराजे गते राजन् प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ।। २५ ।।
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा ।
राजन्! देवराजके चले जानेपर वीरवर केशव तथा अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो उस समय बेखटके खाण्डववनका दाह कराने लगे ॥ २५ १/२ ॥
स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वार्जुनः सुरान् ।। २६ ।।
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् ।
जैसे प्रबल वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने देवताओंको भगाकर अपने बाणोंके समुदायसे खाण्डववासी प्राणियोंको मारना आरम्भ किया ॥ २६ १/२ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।। २७ ।।
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ।
सव्यसाची अर्जुनके बाण चलाते समय उनके बाणोंसे कट जानेके कारण कोई भी जीव वहाँसे बाहर न निकल सका ॥ २७ १/२ ॥
नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ।। २८ ।।
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे ।
शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम् ।। २९ ।।
अमोघ अस्त्रधारी अर्जुनको उस समय बड़े-से-बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे। वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे ॥ २८-२९ ॥
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव ।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च ।। ३० ।।
वे सभी प्राणी प्राणशून्य होकर साक्षात् कालसे मारे हुएकी भाँति आगमें गिर पड़ते थे। वे वनके किनारे हों या दुर्गम स्थानोंमें हों, कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३० ॥
पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाप्यजायत ।
भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ।। ३१ ।।
पितरों और देवताओंके लोकमें भी खाण्डववनके दाहकी गर्मी पहुँचने लगी। बहुतेरे प्राणियोंके समुदाय कातर हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ।। ३१ ।।
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ।
तेन शब्देन वित्र्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ।। ३२ ।।
हाथी, मृग और चीते भी रोदन करते थे। उनके आर्तनादसे गङ्गा तथा समुद्रके भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे ।। ३२ ।।
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः ।
न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ।। ३३ ।।
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद् योद्धुं कुतः पुनः ।
उस वनमें रहनेवाले जो विद्याधर-जातिके लोग थे, उनकी भी यही दशा थी। महाबाहो! उस समय कोई श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ।। ३४ ।।
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान् हरिः ।
जो कोई राक्षस, दानव और नाग वहाँ एक साथ संघ बनाकर निकलते थे, उन सबको भगवान् श्रीहरि चक्रद्वारा मार देते थे ।। ३४ १/२ ।।
ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद् गतासवः ।। ३५ ।।
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि ।
वे तथा दूसरे विशालकाय प्राणी चक्रके वेगसे शरीर और मस्तक छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण निर्जीव हो प्रज्वलित आगमें गिर पड़ते थे ।। ३५ १/२ ।।
स मांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ।। ३६ ।।
उपर्य्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।
दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च सम्प्रदीप्तमहाननः ।। ३७ ।।
इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये। उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्वामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा ।। ३६-३७ ।।
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन् प्राणभृतां वसाम् ।
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ।। ३८ ।।
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः ।
उनके चमकीले केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे, आँखें पिंगलवर्णकी थीं और वे प्राणियोंके मेदेका रस पी रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गये। उन्हें बड़ी शान्ति मिली ।। ३८ १/२ ।।
तथासुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ।। ३९ ।।
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३९½ ॥
तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥ शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०½ ॥
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥ जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः । स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥ अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला—'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ' ॥ ४१-४२½ ॥
तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा—‘डरो मत’ ॥ ४३१/२ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥ अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा—‘तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् । न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥ अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च । ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च । अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥ उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥