भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

कहाँ गये हैं?' तब घरमें रहनेवाली स्त्रियों और कन्याओंने उनसे सब बातें बनायीं — ॥ ५-६ ॥ अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् । विजेतुमभिसंरब्ध एक एवातिसाहसात् । बृहन्नलासहायश्च निर्गतः पृथिवीञ्जयः ॥ ७ ॥ 'इसी प्रकार अन्तःपुरमें रहनेवाली स्त्रियोंने भी बताया कि कौरवोंने हमारे गोष्ठका गोधन हर लिया है, अतः कुमार भूमिंजय अत्यन्त साहसके कारण क्रोधमें भरकर अकेले ही उन गौओंको जीत लानेके लिये बृहन्नलाके साथ निकले हैं' ॥ ७ ॥ उपयातानतिरथान् भीष्मं शान्तनवं कृपम् । कर्णं दुर्योधनं द्रोणं द्रोणपुत्रं च षड् रथान् ॥ ८ ॥ 'सुना है, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा—ये छः अतिरथी वीर युद्धके लिये आये हैं' ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजा विराटोऽथ भृशाभितप्तः श्रुत्वा सुतं त्वेकरथेन यातम् । बृहन्नलासारथिमाजिवर्धनं प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युद्धमें आगे बढ़नेवाले अपने पुत्रको बृहन्नला सारथिके साथ एकमात्र रथकी सहायतासे कौरवोंका सामना करनेके लिये गया हुआ सुनकर राजा विराटको बड़ा संताप हुआ। उन्होंने (अपने) सभी प्रधान मन्त्रियोंसे कहा— ॥ ९ ॥ सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः । त्रिगर्तान् निःसृताञ्छ्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन ॥ १० ॥ 'कौरव हों या दूसरे कोई राजा, जब वे सुनेंगे कि त्रिगर्त लोग युद्धमें पीठ दिखाकर भाग गये हैं, तब वे कदापि यहाँ ठहर नहीं सकेंगे' ॥ १० ॥ तस्माद् गच्छन्तु मे योधा बलेन महता वृताः । उत्तरस्य परीप्सार्थं ये त्रिगर्तैरविक्षताः ॥ ११ ॥ 'अतः मेरे सैनिकोंमेंसे जो लोग त्रिगर्तोंके साथ होनेवाले युद्धमें घायल नहीं हुए हों, वे सब विशाल सेनाके साथ राजकुमार उत्तरकी रक्षाके लिये जायँ' ॥ हयांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं पदातिसङ्घांश्च ततः प्रवीरान् । प्रस्थापयामास सुतस्य हेतो-

विचित्रशस्त्राभरणोपपन्नान् ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने पुत्रकी रक्षाके लिये विचित्र-विचित्र आयुधों और आभूषणोंसे विभूषित घुड़सवारों, हाथीसवारों, रथारोहियों तथा पैदल योद्धाओंके समूहोंको, जो बड़े शूरवीर थे, भेजा ॥ १२ ॥
एवं स राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः ।
व्यादिदेशाथ तां क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् ॥ १३ ॥
कुमारमाशु जानीत यदि जीवति वा न वा ।
यस्य यन्ता गतः षण्ढो मन्येऽहं स न जीवति ॥ १४ ॥
इस प्रकार सेनाओंके स्वामी मत्स्यनरेश विराटने अपनी उस चतुरंगिणी सेनाको शीघ्र आदेश दिया, 'जाओ, शीघ्र पता लगाओ। कुमार जीवित हैं या नहीं। एक हिजड़ा जिसका सारथि बनकर गया है, वह मेरी समझसे तो अब जीवित नहीं होगा' ॥ १३-१४ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमब्रवीद् धर्मराजो विहस्य
विराटराजं तु भृशाभितप्तम् ।
बृहन्नला सारथिश्चेन्नरेन्द्र
परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ताः ॥ १५ ॥
सर्वान् महीपान् सहितान् कुरूंश्च
तथैव देवासुरसिद्धयक्षान् ।
अलं विजेतुं समरे सुतस्ते
स्वनुष्ठितः सारथिना हि तेन ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा विराटको बहुत दुःखी देखकर धर्मराज युधिष्ठिरने उनसे हँसकर कहा—'नरेन्द्र! यदि बृहन्नला सारथि है, तो यह विश्वास कीजिये कि शत्रु आज आपकी वे गौएँ नहीं ले जा सकेंगे। उस हितैषी सारथिके सहयोगसे सब कार्य ठीक-ठीक कर लेनेपर आपका पुत्र युद्धमें समस्त राजाओं तथा संगठित होकर आये हुए कौरवोंकी तो बात ही क्या, देवता, असुर, सिद्ध और यक्षोंपर भी निश्चय ही विजय पा सकता है' ॥ १५-१६ ॥

वैशम्पायन उवाच

अथोत्तेरेण प्रहिता दूतास्ते शीघ्रगामिनः ।
विराटनगरं प्राप्य विजयं समवेदयन् ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इसी समय उत्तरके भेजे हुए शीघ्रगामी दूतोंने विराटनगरमें आकर विजयकी सूचना दी ॥ १७ ॥
राज्ञस्तत् सर्वमाचख्यौ मन्त्री विजयमुत्तमम् ।

पराजयं कुरूणां चाप्युपायान्तं तथोत्तरम् ॥ १८ ॥ सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः । उत्तरः सह सूतेन कुशली च परंतपः ॥ १९ ॥ मन्त्रीने वह सब समाचार महाराजसे कह सुनाया। अपने पक्षकी उत्तम विजय और कौरवोंकी करारी हार हुई है। राजकुमार उत्तर नगरमें आ रहे हैं। समस्त गौएँ जीत ली गयीं तथा कौरव परास्त होकर भाग गये। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुमार उत्तर सारथिसहित सकुशल हैं ॥ १८-१९ ॥

युधिष्ठिर उवाच दिष्ट्या विनिर्जिता गावः कुरवश्च पलायिताः । नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत् ते पुत्रोऽजयत् कुरून् ॥ २० ॥ ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नला । (देवेन्द्रसारथिश्चैव मातलिर्लघुविक्रमः । कृष्णस्य सारथिश्चैव न बृहन्नलया समौ ॥) युधिष्ठिरने कहा—महाराज! सौभाग्यकी बात है कि गौएँ जीत ली गयीं और कौरव भाग गये। आपके पुत्रने कौरवोंपर जो विजय पायी है, उसे मैं कोई आश्चर्यकी बात नहीं मानता। जिसका सारथि बृहन्नला हो, उसकी विजय तो निश्चित ही है। देवराज इन्द्रका शीघ्रगामी सारथि मातलि तथा श्रीकृष्णका सारथि दारुक—ये दोनों बृहन्नलाकी समानता नहीं कर सकते ॥ २० १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो विराटो नृपतिः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २१ ॥ श्रुत्वा स विजयं तस्य कुमारस्यामितौजसः । आच्छादयित्वा दूतांस्तान् मन्त्रिणं सोऽभ्यचोदयत् ॥ २२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने अमित-पराक्रमी कुमारकी विजयका समाचार सुनकर राजा विराट बड़े प्रसन्न हुए। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे उन दूतोंका सत्कार किया और मन्त्रीको आज्ञा दी— ॥ २१-२२ ॥ राजमार्गाः क्रियन्तां मे पताकाभिरलंकृताः । पुष्पोपहारैरर्च्यन्तां देवताश्चापि सर्वशः ॥ २३ ॥ कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः । वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम ॥ २४ ॥ 'मेरे नगरकी सड़कोंको पताकाओंसे अलंकृत किया जाय। फूलों तथा नाना प्रकारके उपहारोंसे सब देवताओंकी पूजा होनी चाहिये। कुमार, मुख्य-मुख्य योद्धा, शृंगारसे सुशोभित वारांगनाएँ और सब प्रकारके बाजे-गाजे मेरे पुत्रकी अगवानीमें भेजे जायँ ॥

घण्टावान् मानवः शीघ्रं मत्तमारुह्य वारणम् ।

शृङ्गाटकेषु सर्वेषु आख्यातु विजयं मम ।। २५ ।।

उत्तरा च कुमारीभिर्बह्वीभिः परिवारिता ।

शृंगारवेषाभरणा प्रत्युद्यातु सुतं मम ।। २६ ।।

'एक मनुष्य शीघ्र ही हाथमें घण्टा लिये मतवाले गजराजपर बैठ जाय और नगरके

समस्त चौराहोंपर हमारी विजयका संवाद सुनावे। राजकुमारी उत्तरा भी उत्तम शृङ्गार और

सुन्दर वेष-भूषासे सुशोभित हो अन्य राजकुमारियोंके साथ मेरे पुत्रकी अगवानीमें जायँ' ।।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा चेदं वचनं पार्थिवस्य

सर्वं पुरं स्वस्तिकपाणिभूतम् ।

भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च

वेषैः परार्थ्यैः प्रमदाः शुभाश्च ।। २७ ।।

तथैव सूतैः सह मागधैश्च

नान्दीवाद्याः पणवास्तूर्यवाद्याः ।

पुराद् विराटस्य महाबलस्य

प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यम् ।। २८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! राजाकी इस आज्ञाको सुनकर बहुमूल्य वेशभूषासे

सुशोभित सौभाग्यवती तरुणी स्त्रियों, सूत, मागध और बंदीजनोंसहित समस्त पुरवासी,

हाथोंमें मांगलिक वस्तुएँ लेकर भेरी, तूर्य, शंख तथा पणव आदि मांगलिक बाजे साथ लिये

महाबली विराटके अनन्त पराक्रमी पुत्र उत्तरकी अगवानी करनेके लिये नगरसे बाहर

गये ।। २७-२८ ।।

प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलङ्कृताः ।

मत्स्यराजो महाप्राज्ञः प्रहृष्ट इदमब्रवीत् ।। २९ ।।

राजन्! तदनन्तर सेना, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याओं और वारांगनाओंको

भेजकर परम बुद्धिमान् मत्स्यनरेश हर्षोल्लासमें भरकर इस प्रकार बोले— ।।

अक्षानाहर सैरन्ध्रि कङ्क द्यूतं प्रवर्तताम् ।

तं तथावादिनं दृष्ट्वा पाण्डवः प्रत्यभाषत ।। ३० ।।

'सैरन्ध्री! जा, पासे ले आ। कंक! जूआ प्रारम्भ हो। 'उन्हें ऐसा कहते देख पाण्डुनन्दन

युधिष्ठिर बोले— ।। ३० ।।

न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् ।

तं त्वामद्य मुदा युक्तं नाहं देवितुमुत्सहे ।

प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे ।। ३१ ।।

‘राजन्! मैंने सुना है, जब चालाक जुआरी अत्यन्त हर्षमें भरा हो, तो उसके साथ जूआ नहीं खेलना चाहिये। आज आप भी बड़े आनन्दमें मग्न हैं; अतः आपके साथ जूआ खेलनेका साहस नहीं होता, तथापि आपका प्रिय कार्य तो करना ही चाहता हूँ, अतः यदि आपकी इच्छा हो, तो खेल शुरू हो सकता है’ ॥ ३१ ॥

विराट उवाच

स्त्रियो गावो हिरण्यं च यच्चान्यद् वसु किञ्चन ।
न मे किञ्चित् त्वया रक्ष्यमन्तरेणापि देवितुम् ॥ ३२ ॥
विराटने कहा— स्त्रियाँ, गौएँ, सुवर्ण तथा अन्य जो कोई भी धन सुरक्षित रखा जाता है, बिना जूएके वह सब मुझे कुछ नहीं चाहिये। (मुझे तो जूआ ही सबसे अधिक प्रिय है) ॥ ३२ ॥

कङ्क उवाच

किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद ।
देवने बहवो दोषास्तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ॥ ३३ ॥
कंक बोले— सबको मान देनेवाले महाराज! आपको जूएसे क्या लेना है? इसमें तो बहुत-से दोष हैं। जूआ खेलनेमें अनेक दोष होते हैं, इसलिये इसे त्याग देना चाहिये ॥ ३३ ॥
श्रुतस्ते यदि वा दृष्टः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः ।
स राष्ट्रं सुमहत् स्फीतं भ्रातॄंश्च त्रिदशोपमान् ॥ ३४ ॥
राज्यं हारितवान् सर्वं तस्माद् द्यूतं न रोचये ।
(निःसंशयं स कितवः पश्चात् तप्यति पाण्डवः ॥
विविधानां च रत्नानां धनानां च पराजये ।
अस्मिन् क्षितिविनाशश्च वाक्पारुष्यमनन्तरम् ॥
अविश्वास्यं बुधैर्नित्यमेकाह्ना द्रव्यनाशनम् ।)
अथवा मन्यसे राजन् दीव्याम यदि रोचते ॥ ३५ ॥
आपने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको देखा होगा अथवा उनका नाम तो अवश्य सुना होगा। वे अपने अत्यन्त समृद्धिशाली राष्ट्रको, देवताओंके समान तेजस्वी भाइयोंको तथा समूचे राज्यको भी जूएमैं हार गये थे। अतः मैं जूएको पसंद नहीं करता। नाना प्रकारके रत्नों और धनको हार जानेके कारण अब वे जुआरी युधिष्ठिर निश्चय ही पश्चात्ताप करते होंगे। इस जूएमैं आसक्त होनेपर राज्यका नाश होता है, फिर जुआरी एक दूसरेके प्रति कटु वचनोंका प्रयोग करते हैं। जूआ एक ही दिनमें महान् धनराशिका नाश करनेवाला है। अतः विद्वान् पुरुषोंको इस (धोखा देनेवाले जूए) पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। राजन्! तो भी यदि आपकी रुचि और आग्रह हो, तो हम खेलेंगे ही ॥ ३४-३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रवर्तमाने द्यूते तु मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् । पश्य पुत्रेण मे युद्धे तादृशाः कुरवो जिताः ॥ ३६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जूएका खेल आस्मभ हो गया। खेलते-खेलते मत्स्यराजने पाण्डुनन्दनसे कहा—‘देखो, आज मेरे बेटेने युद्धमें उन प्रसिद्ध कौरवोंपर विजय पायी है’ ॥ ३६ ॥

ततोऽब्रवीन्महात्मा स एनं राजा युधिष्ठिरः । बृहन्नला यस्य यन्ता कथं स न जयेद् युधि ॥ ३७ ॥ तब महात्मा राजा युधिष्ठिरने विराटसे कहा—‘बृहन्नला जिसका सारथि हो, वह युद्धमें कैसे नहीं जीतेगा?’ ॥ ३७ ॥

इत्युक्तः कुपितो राजा मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् । समं पुत्रेण मे षण्ढं ब्रह्मबन्धो प्रशंससि ॥ ३८ ॥ यह सुनते ही मत्स्यनरेश कुपित हो उठे और पाण्डुनन्दनसे बोले—‘अधम ब्राह्मण! तू मेरे पुत्रके समान एक हिजड़ेकी प्रशंसा करता है! ॥ ३८ ॥

वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे । भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् कस्मान्न स विजेष्यति ॥ ३९ ॥ वयस्यत्वात् तु ते ब्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे । नेदृशं तु पुनर्व्याच्यं यदि जीवितुमिच्छसि ॥ ४० ॥ ‘क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसका तुझे ज्ञान नहीं है। निश्चय ही तू अपनी बातोंसे मेरा अपमान कर रहा है। भला, मेरा पुत्र भीष्म-द्रोण आदि समस्त वीरोंको क्यों नहीं जीत लेगा? ब्रह्मन्! मित्र होनेके नाते ही मैं तुम्हारे इस अपराधको क्षमा करता हूँ। यदि जीनेकी इच्छा हो, तो फिर ऐसी बात न करना’ ॥ ३९-४० ॥

युधिष्ठिर उवाच

यत्र द्रोणस्तथा भीष्मो द्रौणिर्वैकर्तनः कृपः । दुर्योधनश्च राजेन्द्रस्तथान्ये च महारथाः ॥ ४१ ॥ मरुद्गणैः परिवृतः साक्षादपि मरुत्पतिः । कोऽन्यो बृहन्नलायास्तान् प्रतियुध्येत सङ्गतान् ॥ ४२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**जहाँ द्रोणाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा, कर्ण, कृपाचार्य राजा दुर्योधन तथा अन्य महारथी उपस्थित हों, वहाँ बृहन्नलाके सिवा दूसरा कौन पुरुष चाहे वह देवताओंसे घिरा हुआ साक्षात् देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उन सब संगठित वीरोंका सामना कर सकता है? ॥ ४१-४२ ॥

यस्य बाहुबले तुल्यो न भूतो न भविष्यति ।

अतीव समरं दृष्ट्वा हर्षो यस्योपजायते ॥ ४३ ॥

योऽजयत् सङ्गतान् सर्वान् ससुरासुरमानवान् ।

तादृशेन सहायेन कस्मात् स न विजेष्यते ॥ ४४ ॥

बाहुबलमें जिसकी समानता करनेवाला न कोई हुआ है और न होगा ही, युद्धका

अवसर आया देखकर जिसे अत्यन्त हर्ष होता है, जिसने युद्धमें एकत्र हुए देवता, असुर

और मनुष्य—सबको जीत लिया है, वैसे बृहन्नला—जैसे सहायकके होनेपर राजकुमार

उत्तर विजयी क्यों न होंगे? ॥ ४३-४४ ॥

विराट उवाच

बहुशः प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं नियच्छसि ।

नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद् धर्ममाचरेत् ॥ ४५ ॥

विराटने कहा—कंक! मैंने बहुत बार मना किया, तो भी तू अपनी जबान नहीं बंद कर

रहा है। सच है, यदि शासन करनेवाला राजा न हो, तो कोई भी धर्मका आचरण नहीं कर

सकता ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद् भृशम् ।

मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सयन् ॥ ४६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इतना कहकर कोपमें भरे हुए राजा विराटने वह

पासा युधिष्ठिरके मुखपर जोरसे दे मारा तथा रोषपूर्वक डाँटते हुए उनसे कहा—'फिर कभी

ऐसी बात न कहना' ॥ ४६ ॥

बलवत् प्रतिविद्धस्य नस्तः शोणितमावहत् ।

तदप्राप्तं महीं पार्थः पाणिभ्यां प्रत्यगृह्णत ॥ ४७ ॥

अवैक्षत स धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् ।

सा ज्ञात्वा तमभिप्रायं भर्तुश्चित्तवशानुगा ॥ ४८ ॥

पात्रं गृहीत्वा सौवर्णं जलपूर्णमनिन्दिता ।

तच्छोणितं प्रत्यगृह्णाद् यत् प्रसुस्राव नस्ततः ॥ ४९ ॥

पासेका आघात जोरसे लगा था, अतः उनकी नाकसे रक्तकी धारा बह चली। किंतु

धर्मात्मा युधिष्ठिरने उस रक्तको पृथ्वीपर गिरनेसे पहले ही अपने दोनों हाथोंमें रोक लिया

और पास ही खड़ी हुई द्रौपदीकी ओर देखा। द्रौपदी अपने स्वामीके मनके अधीन

रहनेवाली और उनकी अनुगामिनी थी। उस सती-साध्वी देवीने उनका अभिप्राय समझ

लिया; अतः जलसे भरा हुआ सुवर्णमय पात्र ले आकर युधिष्ठिरकी नाकसे जो रक्त बहता

था, वह सब उसमें ले लिया ॥ ४७-४९ ॥

अथोत्तरः शुभैर्गन्धैर्माल्यैश्च विविधैस्तथा । अवकीर्यमाणः संहृष्टो नगरं स्वैरमागतः ॥ ५० ॥ इसी समय राजकुमार उत्तर बड़े हर्षके साथ स्वच्छन्दतापूर्वक नगरमें आये। मार्गमें उनके ऊपर उत्तम गन्ध और भाँति-भाँतिके पुष्पहार बरसाये जा रहे थे ।। सभाज्यमानः पौरैश्च स्त्रीभिर्जानपदैस्तथा । आसाद्य भवनद्वारं पित्रे सम्प्रत्यवेदयत् ॥ ५१ ॥ मत्स्यदेशके लोगों, पुरवासियों तथा सुन्दरी स्त्रियोंने उनका स्वागत किया; फिर राजभवनके द्वारपर पहुँचकर उन्होंने पिताको अपने आगमनकी सूचना करवायी ।। ५१ ।। ततो द्वाःस्थः प्रविश्यैव विराटमिदमब्रवीत् । बृहन्नलासहायश्च पुत्रो द्वार्युत्तरः स्थितः ॥ ५२ ॥ तब द्वारपालने भीतर जाकर महाराज विराटसे कहा—'प्रभो! बृहन्नलाके साथ राजकुमार उत्तर द्वारपर खड़े हैं' ।। ५२ ।। ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमब्रवीत् । प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तयोः ॥ ५३ ॥ इस समाचारसे प्रसन्न होकर मत्स्यराज अपने सेवकसे बोले—'मैं उन दोनोंसे मिलना चाहता हूँ; अतः उन्हें शीघ्र भीतर ले आओ' ।। ५३ ।। क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् ।

उत्तरः प्रविशत्वेको न प्रवेश्या बृहन्नला ॥ ५४ ॥
तब जाते हुए सेवकके कानमें युधिष्ठिरने धीरेसे कहा—'पहले अकेले राजकुमार उत्तर ही यहाँ आवें। बृहन्नलाको साथमें न ले आना' ॥ ५४ ॥
एतस्य हि महाबाहो व्रतमेतत् समाहितम् ।
यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वापि दर्शयेत् ।
अन्यत्र संग्रामगतान्न स जीवेत् कथञ्चन ॥ ५५ ॥
'महाबाहो! बृहन्नलाका यह निश्चित व्रत है कि जो युद्धभूमिके सिवा अन्य किसी स्थानमें मेरे शरीरमें घाव कर दे या रक्त बहता दिखा दे, वह किसी प्रकार जीवित न रहने पाये ॥ ५५ ॥
न मृष्याद् भृशसंक्रुद्धो मां दृष्ट्वा तु सशोणितम् ।
विराटमिह सामात्यं हन्यात् सबलवाहनम् ॥ ५६ ॥
'मेरे शरीरमें रक्त देखकर वह अत्यन्त कुपित हो उठेगा और इस अपराधको क्षमा नहीं करेगा एवं राजा विराटको मन्त्री, सेना और वाहनोंसहित यहीं मार डालेगा' ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञः सुतो ज्येष्ठः प्राविशत् पृथिवीञ्जयः ।
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ॥ ५७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा विराटके ज्येष्ठ पुत्र कुमार भूमिंजय (उत्तर) ने भीतर प्रवेश किया और पिताके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके कंकको भी मस्तक झुकाया ॥ ५७ ॥
ततो रुधिरसंयुक्तमनेकाग्रमनागसम् ।
भूमावासीनमेकान्ते सैरन्ध्र्या प्रत्युपस्थितम् ॥ ५८ ॥
उसने देखा, कंक एकान्तमें भूमिपर बैठे हैं। सैरन्ध्री उनकी सेवामें उपस्थित है। उनका मन एकाग्र नहीं है और वे निरपराध हैं, तो भी उनके शरीरसे रक्त बह रहा है ॥ ५८ ॥
ततः पप्रच्छ पितरं त्वरमाण इवोत्तरः ।
केनायं ताडितो राजन् केन पापमिदं कृतम् ॥ ५९ ॥
तब उत्तरने बड़ी उतावलीके साथ अपने पितासे पूछा—'राजन्! किसने इन्हें मारा है? किसने यह पाप किया है?' ॥ ५९ ॥

विराट उवाच

मयायं ताडितो जिह्यो न चाप्येतावदर्हति ।
प्रशस्यमाने यच्छूरे त्वयि षण्ढं प्रशंसति ॥ ६० ॥
**विराटने कहा—**बेटा! मैंने ही इस कुटिलको मारा है। यह इतने सम्मानके योग्य कदापि नहीं है। देखो न, जब मैं तुम्हारे शौर्यकी प्रशंसा करता हूँ, तब यह उस हिजड़ेकी

बड़ाई करने लगता है ।। ६० ।।

उत्तर उवाच

अकार्यं ते कृतं राजन् क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् ।
मा त्वां ब्रह्मविषं घोरं समूलमिह निर्दहेत् ।। ६१ ।।
**उत्तर बोले—**राजन्! आपने इन्हें मारकर बड़ा अनुचित कार्य किया है। शीघ्र ही इनको मनाइये; अन्यथा ब्राह्मणका भयंकर क्रोधविष आपको यहाँ जड़-मूलसहित भस्म कर डालेगा ।। ६१ ।।

वैशम्पायन उवाच

स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धनः ।
क्षमयामास कौन्तेयं भस्मच्छन्नमिवानलम् ।। ६२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पुत्रकी यह बात सुनकर अपने राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज विराट्ने राखमें छिपी हुई अग्निकी भाँति तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे क्षमा माँगी ।। ६२ ।।
क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत ।
चिरं क्षान्तमिदं राजन् न मन्युर्विद्यते मम ।। ६३ ।।
राजाको क्षमा माँगते देख पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने कहा—'राजन्! मैंने चिरकालसे क्षमाका व्रत ले रखा है, अतः आपका यह अपराध क्षमा हो चुका है। मुझे आपपर जरा भी क्रोध नहीं है ।। ६३ ।।
यदि ह्येतत् पतेद् भूमौ रुधिरं मम नस्ततः ।
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशयः ।। ६४ ।।
'महाराज! यदि मेरी नाकसे बहनेवाला यह रक्त धरतीपर गिर जाता, तो आप सारे राष्ट्रके साथ नष्ट हो जाते; इसमें कोई संशय नहीं है ।। ६४ ।।
न दूषयामि ते राजन् यद् वै हन्याददूषकम् ।
बलवन्तं प्रभुं राजन् क्षिप्रं दारुणमाप्नुयात् ।। ६५ ।।
'राजन्! जो किसीकी निन्दा या अपराध न करे, उसे मार देना अन्याय है, तथापि मैं आपके इस कार्यकी निन्दा नहीं करता; क्योंकि बलवान् राजाको प्रायः शीघ्र ही ऐसे कठोर कर्म करनेका अवसर प्राप्त हो जाता है' ।।

वैशम्पायन उवाच

शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला ।
अभिवाद्य विराटं तु कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ।। ६६ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! जब युधिष्ठिरकी नाकसे रक्त बहना बंद हो गया, उस समय बृहन्नलाने राजसभामें प्रवेश किया। उसने विराटको नमस्कार करके कंकको भी प्रणाम किया ।। ६६ ।।

क्षामयित्वा तु कौरव्यं रणादुत्तरमागतम् ।
प्रशंसंस ततो मत्स्यः शृण्वतः सव्यसाचिनः ।। ६७ ।।
इधर मत्स्यनरेश कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे क्षमा माँगकर सव्यसाची अर्जुनके सुनते हुए ही रणभूमिसे आये हुए उत्तरकी प्रशंसा करने लगे— ।। ६७ ।।

त्वया दायादवानस्मि कैकेयीनन्दिवर्धन ।
त्वया मे सदृशः पुत्रो न भूतो न भविष्यति ।। ६८ ।।
‘कैकेयीनन्दन! तुम्हें पाकर मैं वास्तवमें पुत्रवान् हूँ। तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई पुत्र न हुआ है; न होगा ही ।। ६८ ।।

पदं पदसहस्रेण यश्चरन् नापराध्नुयात् ।
तेन कर्णेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ६९ ।।
मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते ।
तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७० ।।
तात! जो एक ही लक्ष्यके साथ-साथ सहस्रों लक्ष्योंका वेध करनेके लिये बाण चलाता है और कहीं भी चूकता नहीं है, उस कर्णके साथ तुम्हारा युद्ध किस प्रकार हुआ? बेटा! सारे मनुष्यलोकमें जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं है, उन भीष्मजीके साथ तुम्हारी भिड़न्त किस प्रकार हुई? ।। ६९-७० ।।

आचार्यो वृष्णिवीराणां कौरवाणां च यो द्विजः ।
सर्वक्षत्रस्य चाचार्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
तेन द्रोणेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७१ ।।
‘तात! जो वृष्णि वीरों और कौरवों दोनोंके आचार्य हैं अथवा दोनोंके ही नहीं, सम्पूर्ण क्षत्रियोंके आचार्य हैं, समस्त शस्त्रधारियोंमें जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, उन द्रोणाचार्यके साथ तुम्हारा संग्राम किस प्रकार हुआ? ।।

आचार्यपुत्रो यः शूरः सर्वशस्त्रभृतामपि ।
अश्वत्थामेति विख्यातस्तेनासीत् संगरः कथम् ।। ७२ ।।
‘आचार्यके जो शूरवीर पुत्र सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, जिनकी अश्वत्थामा नामसे ख्याति है, उनके साथ तुम्हारी लड़ाई कैसे हुई? ।। ७२ ।।

रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा ।
कृपेण तेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७३ ।।
‘बेटा! जैसे वणिक् अपना धन छिन जानेपर दुःखी होते हैं, उसी प्रकार युद्धमें जिन्हें देखकर बड़े-बड़े योद्धा शिथिल हो जाते हैं, उन कृपाचार्यके साथ तुम्हारा संग्राम किस

प्रकार हुआ? ।। ७३ ।। पर्वतं योऽभिविध्येत राजपुत्रो महेषुभिः । दुर्योधनेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७४ ।। 'तात! जो राजपुत्र अपने महान् बाणोंसे पर्वतको भी विदीर्ण कर सकता है, उस दुर्योधनके साथ तुम्हारी मुठभेड़ कैसे हुई? ।। ७४ ।।

अवगाढा द्विषन्तो मे सुखो वातोऽभिवाति माम् । यस्त्वं धनमथाजैषीः कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ।। ७५ ।। 'बेटा! कौरवोंने जिस गोधनको संग्राममें हड़प लिया था, उसे तुम जीतकर ले आये, यह बहुत अच्छा हुआ। आज हमारे शत्रु परास्त हो गये, इसलिये आजकी वायु मुझे बड़ी सुखदायिनी प्रतीत हो रही है ।। ७५ ।।

तेषां भयाभिपन्नानां सर्वेषां बलशालिनाम् । नूनं प्रकाल्प तान् सर्वांस्त्वया युधि नरर्षभ । आच्छिन्नं गोधनं सर्वं शार्दूलेनामिषं यथा ।। ७६ ।। 'नरश्रेष्ठ! तुमने उन समस्त शत्रुओंको युद्धमें जीतकर उन्हें भयमें डाल दिया है और उन समस्त बलशालियोंके हाथसे अपने सारे गोधनको इस प्रकार छीन लिया है, जैसे सिंह दूसरे जन्तुओंके हाथसे मांस छीन लेता है ।। ७६ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि विराटोत्तरसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें विराट-उत्तर-संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2555)

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

राजा विराट और उत्तरकी विजयके विषयमें बातचीत

उत्तर उवाच

न मया निर्जिता गावो न मया निर्जिताः परे ।
कृतं तत् सकलं तेन देवपुत्रेण केनचित् ॥ १ ॥
**उत्तरने कहा—**पिताजी! मैंने गौओंको नहीं जीता है और न मैंने शत्रुओंपर ही विजय पायी है। यह सब कार्य तो किसी देवकुमारने किया है ॥ १ ॥

स हि भीतं द्रवन्तं मां देवपुत्रो न्यवर्तयत् ।
स चातिष्ठद् रथोपस्थे वज्रसंहननो युवा ॥ २ ॥
मैं तो डरकर भागा आ रहा था; किंतु वज्रके समान सुदृढ़ शरीरवाले उस तरुण देवपुत्रने मुझे लौटाया और वह स्वयं ही रथके पिछले भागमें रथी बनकर बैठ गया ॥ २ ॥

तेन ता निर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः ।
तस्य तत् कर्म वीरस्य न मया तात तत् कृतम् ॥ ३ ॥
उसीने उन गौओंको जीता है और कौरवोंको भी परास्त किया है। पिताजी! यह सब उसी वीरका कर्म है। मैंने कुछ नहीं किया है ॥ ३ ॥

स हि शारद्वतं द्रोणं द्रोणपुत्रं च षड् रथान् ।
सूतपुत्रं च भीष्मं च चकार विमुखाञ्छरैः ॥ ४ ॥
दुर्योधनं विकर्णं च सनागमिव यूथपम् ।
प्रभग्नमब्रवीद् भीतं राजपुत्रं महाबलः ॥ ५ ॥
उसीने कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, भीष्म और दुर्योधन—इन छहों महारथियोंको अपने बाणोंसे मारकर युद्धसे भगा दिया। वहाँ जैसे यूथपति गजराज अपने झुंडके हाथियोंसहित भागा जाता हो, उसी प्रकार दुर्योधन और विकर्ण आदि राजपुत्र भयभीत होकर भागने लगे; तब उस महाबली देवपुत्रने दुर्योधनसे कहा— ॥ ४-५ ॥

न हास्तिनपुरे त्राणं तव पश्यामि किंचन ।
व्यायामेन परीप्सस्व जीवितं कौरवात्मज ॥ ६ ॥
‘धृतराष्ट्रकुमार! अब हस्तिनापुरमें तेरी जीवन-रक्षाका कोई उपाय मुझे नहीं दिखायी देता; अतः देश-देशान्तरोंमें घूमकर अपनी जान बचा ॥ ६ ॥

न मोक्ष्यसे पलायंस्त्वं राजन् युद्धे मनः कुरु ।
पृथिवीं भोक्ष्यसे जित्वा हतो वा स्वर्गमाप्स्यसि ॥ ७ ॥
‘राजन्! भागनेसे तू नहीं बच सकता। युद्धमें मन लगा। जीत लेगा, तो पृथिवीका राज्य भोगेगा अथवा मारे जानेपर तुझे स्वर्ग मिलेगा’ ॥ ७ ॥

स निवृत्तो नरव्याघ्रो मुञ्चन् वज्रनिभाञ्छरान् । सचिवैः संवृतो राजा रथे नाग इव श्वसन् ॥ ८ ॥ महाराज! इतना सुनना था कि नरश्रेष्ठ दुर्योधन साँपकी भाँति फुँफकारता हुआ रथके द्वारा लौट आया और मन्त्रियोंसे घिरकर उस देवपुत्रपर वज्र-सरीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ८ ॥

तं दृष्ट्वा रोमहर्षोऽभूदूरुकम्पश्च मारिष । स तत्र सिंहसंकाशमनीकं व्यधमच्छरैः ॥ ९ ॥ मारिष! उस समय उसे देखकर मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये और जाँघें काँपने लगीं; किंतु उस देवपुत्रने अपने बाणोंद्वारा सिंहके समान पराक्रमी दुर्योधन और उसकी सेनाको संतप्त कर दिया ॥ ९ ॥

तत् प्रणुद्य रथानीकं सिंहसंहननो युवा । कुरूंस्तान् प्रहसन् राजन् संस्थितान् हृतवाससः ॥ १० ॥ एकेन तेन वीरेण षड् रथाः परिनिर्जिताः । शार्दूलेनेव मत्तेन यथा वनचरा मृगाः ॥ ११ ॥ सिंहके समान सुदृढ़ शरीरवाले उस तरुण वीरने रथाारोहियोंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करके हँसते-हँसते उन कौरवोंको भी धराशायी कर दिया, जिससे उनके कपड़े उतार लिये गये। जैसे मदोन्मत्त सिंह वनमें विचरनेवाले मृगोंको परास्त करता है, उसी प्रकार उस वीर देवपुत्रने अकेले ही उन छः महारथियोंको हराया है ॥ १०-११ ॥

विराट उवाच

क्व स वीरो महाबाहुर्देवपुत्रो महायशाः । यो मे धनमथाजैषीत् कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ॥ १२ ॥ इच्छामि तमहं द्रष्टुमर्चितुं च महाबलम् । येन मे त्वं च गावश्च रक्षिता देवसूनुना ॥ १३ ॥ विराटने पूछा—बेटा! वह महायशस्वी महाबाहु वीर देवपुत्र कहाँ है, जिसने युद्धमें कौरवोंद्वारा काबूमें की हुई मेरी गौओंको जीता है? जिस देवकुमारने तुम्हें और मेरी गौओंको भी बचाया है, मैं उस महापराक्रमी वीरको देखना और उसका सत्कार करना चाहता हूँ ॥ १२-१३ ॥

उत्तर उवाच

अन्तर्धानं गतस्तत्र देवपुत्रो महाबलः । स तु श्वो वा परश्वो वा मन्ये प्रादुर्भविष्यति ॥ १४ ॥ उत्तरने कहा—पिताजी! वह महाबली देवपुत्र वहीं अन्तर्धान हो गया; किंतु मेरा विश्वास है कि वह कल या परसों यहाँ फिर प्रकट होगा ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमाख्यायमानं तु छन्नं सत्रेण पाण्डवम् । वसन्तं तत्र नाज्ञासीद् विराटो वाहिनीपतिः ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार संकेतपूर्वक बतानेपर भी सेनाओंके स्वामी राजा विराट नपुंसकवेशमें छिपकर वहीं रहनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनको पहचान न सके ॥ १५ ॥

ततः पार्थोऽभ्यनुज्ञातो विराटेन महात्मना । प्रददौ तानि वासांसि विराटदुहितुः स्वयम् ॥ १६ ॥ तदनन्तर महामना विराटकी आज्ञासे बृहन्नलारूपी अर्जुनने स्वयं विराटकन्या उत्तराको वे सब कपड़े, जो महारथियोंके शरीरसे उतारे गये थे, दे दिये ॥ १६ ॥

उत्तरा तु महार्हाणि विविधानि नवानि च । प्रतिगृह्याभवत् प्रीता तानि वासांसि भामिनी ॥ १७ ॥ मन्त्रयित्वा तु कौन्तेय उत्तरेण महात्मना । इतिकर्तव्यतां सर्वां राजन् पार्थे युधिष्ठिरे ॥ १८ ॥ ततस्तथा तद् व्यदधाद् यथावत् पुरुषर्षभ । सह पुत्रेण मत्स्यस्य प्रहृष्टा भरतर्षभाः ॥ १९ ॥ भामिनी उत्तरा उन भाँति-भाँतिके नवीन एवं बहुमूल्य वस्त्रोंको लेकर बहुत प्रसन्न हुई। जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुनने महामना उत्तरके साथ राजा युधिष्ठिरको प्रकट करनेके विषयमें सलाह की और क्या-क्या करना चाहिये, इन सब बातोंका निश्चय कर लिया। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर उन्होंने उसी निश्चयके अनुसार सब कार्य ठीक-ठीक किया। भरतकुलशिरोमणि पाण्डव मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरके साथ वह सब व्यवस्था करके बड़े प्रसन्न हुए ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि विराटोत्तरसंवादे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें विराट-उत्तर-संवादविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥

(वैवाहिकपर्व)

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(वैवाहिकपर्व)

सप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना

वैशम्पायन उवाच

ततस्तृतीये दिवसे भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
स्नाताः शुक्लाम्वरधराः समये चरितव्रताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य सर्वाभरणभूषिताः ।
द्वारि मत्ता यथा नागा भ्राजमाना महारथाः ॥ २ ॥
विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासानेष्वथ ।
निषेदुः पावकप्रख्याः सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नयः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर नियत समयतक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करके अग्निके समान तेजस्वी पाँचों भाई महारथी पाण्डव तीसरे दिन स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर समस्त राजोचित आभूषणोंसे विभूषित हो राजसभामें द्वारपर स्थित मदोन्मत्त गजराजोंकी भाँति सुशोभित होने लगे। वे राजा युधिष्ठिरको आगे करके विराटकी सभामें गये और राजाओंके लिये रखे हुए सिंहासनोंपर बैठे। उस समय वे भिन्न-भिन्न यज्ञवेदियोंपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १—३ ॥

तेषु तत्रोपविष्टेषु विराटः पृथिवीपतिः ।
आजगाम सभां कर्तुं राजकार्याणि सर्वशः ॥ ४ ॥

पाण्डवोंके वहाँ बैठ जानेपर राजा विराट अपने समस्त राजकाज करनेके लिये सभामें आये ॥ ४ ॥

श्रीमतः पाण्डवान् दृष्ट्वा ज्वलतः पावकानिव ।
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा सरोषः पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
अथ मत्स्योऽब्रवीत् कङ्कं देवरूपमिव स्थितम् ।
मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् ॥ ६ ॥

वहाँ प्रज्वलित अग्नियोंके समान तेजस्वी श्रीसम्पन्न पाण्डवोंको देखकर पृथिवीपति विराटने दो घड़ीतक मन-ही-मन कुछ विचार किया। फिर वे कुपित होकर देवताके समान स्थित मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके तुल्य सुशोभित कंकसे बोले— ॥ ५-६ ॥

स किलाक्षातिवापस्त्वं सभास्तारो मया वृतः ।

अथ राजासने कस्मादुपविष्टस्त्वलंकृतः ॥ ७ ॥ 'कंक! तुम्हें तो मैंने पासा फेंकनेवाला सभासद् बनाया था। आज बन-ठनकर राजसिंहासनपर कैसे बैठ गये?' ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

परिहासेप्सया वाक्यं विराटस्य निशम्य तत् । स्मयमानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! मानो परिहास करनेके लिये कहा गया हो, ऐसा विराटका वह वचन सुनकर अर्जुन मुसकराते हुए इस प्रकार बोले ॥ ८ ॥

अर्जुन उवाच

इन्द्रस्यार्धासनं राजन्नयमारोढुमर्हति । ब्रह्मण्यः श्रुतवांस्त्यागी यज्ञशीलो दृढव्रतः ॥ ९ ॥ अर्जुनने कहा— राजन्! आपके राजासनकी तो बात ही क्या है, ये तो इन्द्रके भी आधे सिंहासनपर बैठनेके अधिकारी हैं। ये ब्राह्मणभक्त, शास्त्रोंके विद्वान्, त्यागी, यज्ञशील तथा दृढ़ताके साथ अपने व्रतका पालन करनेवाले हैं ॥ ९ ॥

एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः । एष बुद्ध्याधिको लोके तपसां च परायणम् ॥ १० ॥ एषोऽस्त्रं विविधं वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे । न चैवान्यः पुमान् वेत्ति न वेत्स्यति कदाचन ॥ ११ ॥ ये मूर्तिमान् धर्म हैं तथा पराक्रमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। इस जगत्में ये सबसे बढ़कर बुद्धिमान् और तपस्याके परम आश्रय हैं। ये नाना प्रकारके ऐसे अस्त्रोंको जानते हैं, जिन्हें इस चराचर त्रिलोकीमें दूसरा मनुष्य न तो जानता है और न कभी जान सकेगा ॥ १०-११ ॥

न देवा नासुराः केचिन्न मनुष्या न राक्षसाः । गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ १२ ॥ जिन अस्त्रोंको देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और बड़े-बड़े नाग भी नहीं जानते, उन सबका इन्हें ज्ञान है ॥ १२ ॥

दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः । पाण्डवानामतिरथो यज्ञधर्मपरो वशी ॥ १३ ॥ ये दीर्घदर्शी, महातेजस्वी तथा नगर और देशके लोगोंको अत्यन्त प्रिय हैं। ये पाण्डवोंमें अतिरथी वीर हैं एवं सदा यज्ञ और धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं ॥ १३ ॥

महर्षिकल्पो राजर्षिः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।

बलवान् धृतिमान् दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः । धनैश्च सञ्चयैश्चैव शक्रवैश्रवणोपमः ॥ १४ ॥ ये महर्षियोंके समान हैं, राजर्षि हैं और समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। बलवान्, धैर्यवान्, चतुर, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं। धन और संग्रहकी दृष्टिसे ये इन्द्र और कुबेरके समान हैं ॥ १४ ॥

यथा मनुर्महातेजा लोकानां परिरक्षिता । एवमेष महातेजाः प्रजानुग्रहकारकः ॥ १५ ॥ जैसे महातेजस्वी मनु समस्त लोकोंके रक्षक हैं उसी प्रकार ये महातेजस्वी नरेश भी प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ १५ ॥

अयं कुरूणामृषभो धर्मराजो युधिष्ठिरः । अस्य कीर्तिः स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यतः प्रभा ॥ १६ ॥ ये ही कुरुवंशमें सर्वश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर हैं। उदयकालके सूर्यकी शान्त प्रभाके समान इनकी सुख-दायिनी कीर्ति समस्त संसारमें फैली हुई है ॥ १६ ॥

संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोऽस्य इवांशवः । उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनु गभस्तयः ॥ १७ ॥ जैसे सूर्योदय होनेपर सूर्यके तेजके पश्चात् उनकी किरणें समस्त दिशाओंमें फैल जाती हैं, उसी प्रकार इनके सुयशके साथ-साथ उसकी सुधाधवल किरणें समस्त दिशाओंमें छा रही हैं ॥ १७ ॥

एनं दशसहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । अन्वयुः पृष्ठतो राजन् यावदध्यावसत् कुरून् ॥ १८ ॥ राजन्! ये महाराज जब कुरुदेशमें रहते थे, उस समय इनके पीछे दस हजार वेगवान् हाथी चला करते थे ॥ १८ ॥

त्रिंशदेनं सहस्राणि रथाः काञ्चनमालिनः । सदश्वैरुपसम्पन्नाः पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ॥ १९ ॥ इस प्रकार अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमालामण्डित तीस हजार रथ भी उस समय इनका अनुसरण करते थे ॥

एनमष्टशताः सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः । अब्रुवन् मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षयः ॥ २० ॥ जैसे महर्षिगण इन्द्रकी स्तुति करते हैं, उसी प्रकार पहले विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये आठ सौ सूत और मागध इनके गुण गाते थे ॥ २० ॥

एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किंकरा यथा । सर्वे च राजन् राजानो धनेश्वरमिवामराः ॥ २१ ॥

राजन्! जैसे देवगण धनाध्यक्ष कुबेरका दरबार किया करते हैं, वैसे ही सब राजा और कौरव किंकरोंकी भाँति इनकी नित्य उपासना करते थे ॥ २१ ॥

एष सर्वान् महीपालान् करदान् समकारयत् । वैश्यानिव महाभागो विवशान् स्ववशामपि ॥ २२ ॥ अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् । उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रतम् ॥ २३ ॥

इन महाभाग नरेशने इस देशके सब राजाओंको वैश्योंकी भाँति स्ववश (अपने अधीन) और विवश करके कर देनेवाला बना दिया था। (अर्थात् सब राजा इन्हें कर दिया करते थे।) अत्यन्त उत्तम व्रतका पालन करनेवाले इन महाराजके यहाँ प्रतिदिन अठासी हजार महाबुद्धिमान् स्नातकोंकी जीविका चलती थी ॥ २२-२३ ॥

एष वृद्धाननाथांश्च पङ्गून्धांश्च मानवान् । पुत्रवत् पालयामास प्रजा धर्मेण वै विभुः ॥ २४ ॥

ये बूढ़े, अनाथ, पंगू और अंधे मनुष्योंका भी स्नेहपूर्वक पालन करते थे। ये नरेश अपनी प्रजाकी धर्मपूर्वक पुत्रकी भाँति रक्षा करते थे ॥ २४ ॥

एष धर्मे दमे चैव क्रोधे चापि जितव्रतः । महाप्रसादो ब्रह्मण्यः सत्यवादी च पार्थिवः ॥ २५ ॥

ये भूपाल धर्म और इन्द्रियसंयममें तत्पर तथा क्रोधको काबूमें रखनेके लिये दृढ़प्रतिज्ञ हैं। ये बड़े कृपालु, ब्राह्मणभक्त और सत्यवक्ता हैं ॥ २५ ॥

शीघ्रं तापेन चैतस्य तप्स्यते स सुयोधनः । सगणः सह कर्णेन सौबलेनापि वा विभुः ॥ २६ ॥

इनके प्रतापसे दुर्योधन शक्तिशाली होकर भी कर्ण, शकुनि तथा अपने गणोंके साथ शीघ्र ही संतप्त होनेवाला है ॥ २६ ॥

न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसंख्यातुं नरेश्वर । एष धर्मपरो नित्यमानृशंसश्च पाण्डवः ॥ २७ ॥ एवं युक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः । कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपते ॥ २८ ॥

नरेश्वर! इनके सद्गुणोंकी गणना नहीं की जा सकती। ये पाण्डुनन्दन नित्य धर्मपरायण तथा दयालु स्वभावके हैं। राजन्! समस्त राजाओंके शिरोमणि पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर इस प्रकार सर्वोत्तम गुणोंसे युक्त होकर भी राजोचित आसनके अधिकारी क्यों नहीं हैं? ॥ २७-२८ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पाण्डवप्रकाशे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पाण्डवप्राकट्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥