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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोषणम् ।। ११ ।। महर्षि अगस्त्यके सिवा दूसरा कौन है जो समुद्रका शोषण करनेमें समर्थ हो। समुद्रको सुखाये बिना वे दानव काबूमें नहीं आ सकते ।। ११ ।।

एतच्छ्रुत्वा तदा देवा विष्णुना समुदाहृतम् । परमेष्ठिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याश्रमं ययुः ।। १२ ।। भगवान् विष्णुकी कही हुई यह बात सुनकर देवता ब्रह्माजीकी आज्ञा ले अगस्त्यके आश्रमपर गये ।।

तत्रापश्यन् महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् । उपास्यमानमृषिभिर्देवैरिव पितामहम् ।। १३ ।। वहाँ उन्होंने मित्रावरुणके पुत्र महात्मा अगस्त्यजीको देखा। उनका तेज उद्भासित हो रहा था। जैसे देवतालोग ब्रह्माजीके पास बैठते हैं, उसी प्रकार बहुत-से ऋषि-मुनि उनके निकट बैठे थे ।। १३ ।।

तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् । आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभिष्टुवन् ।। १४ ।। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मित्रावरुण नन्दन तपोराशि महात्मा अगस्त्य आश्रममें ही विराजमान थे। देवताओंने समीप जाकर उनके अद्भुत कर्मोंका वर्णन करते हुए स्तुति प्रारम्भ की ।। १४ ।।

देवा ऊचुः

नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा । भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात् स्वर्लोकाल्लोककण्टकः ।। १५ ।। **देवता बोले—**भगवन्! पूर्वकालमें राजा नहुषके अन्यायसे संतप्त हुए लोकोंकी आपने ही रक्षा की थी। आपने ही उस लोककण्टक नरेशको देवेन्द्रपद तथा स्वर्गसे नीचे गिरा दिया था ।। १५ ।।

क्रोधात् प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः । वचस्तवानतिक्रामन् विन्ध्यः शैलो न वर्धते ।। १६ ।। पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य सूर्यदेवपर क्रोध करके जब सहसा बढ़ने लगा तब आपने ही उसे रोका था। आपकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए विन्ध्यगिरि आज भी बढ़ नहीं रहा है ।। १६ ।।

तमसा चावृते लोके मृत्युनाभ्यर्दिताः प्रजाः । त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ।। १७ ।। विन्ध्यगिरिके बढ़नेसे जब सारे जगत्में अन्धकार छा गया और सारी प्रजा मृत्युसे पीड़ित होने लगी। उस समय आपको ही अपना रक्षक पाकर सबने अत्यन्त हर्षका अनुभव

किया था ॥ १७ ॥
अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान् गतिः ।
ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥ १८ ॥
सदा आप ही हम भयभीत देवताओंके लिये आश्रय होते आये हैं। अतः इस समय भी संकटमें पड़कर हम आपसे वर माँग रहे हैं; क्योंकि आप ही वर देनेके योग्य हैं ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि
लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्य-वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥

अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना

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चतुरधिकशततमोऽध्यायः

अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़नेसे रोकना और देवताओंके साथ सागर-तटपर जाना

युधिष्ठिर उवाच

किमर्थं सहसा विन्ध्यः प्रवृद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! विन्ध्यपर्वत किसलिये क्रोधसे मूर्छित हो सहसा बढ़ने लगा था? मैं इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

लोमश उवाच

अद्रिराजं महाशैलं मेरुं कनकपर्वतम् ।
उदयास्तमने भानुः प्रदक्षिणमवर्तत ॥ २ ॥
**लोमशजीने कहा—**राजन्! सूर्यदेव सुवर्णमय महान् पर्वत गिरिराज मेरुकी उदय और अस्तके समय परिक्रमा किया करते हैं ॥ २ ॥
तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाब्रवीत् ।
यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते ॥ ३ ॥
प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर ।
एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥
नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् ।
एष मार्गः प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् ॥ ५ ॥
उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरिने उनसे कहा—'भास्कर! जैसे आप मेरुकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, उसी तरह मेरी भी कीजिये।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने गिरिराज विन्ध्यसे कहा—'गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छासे मेरुगिरिकी परिक्रमा नहीं करता हूँ। जिन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है, उन विधाताने मेरे लिये यही मार्ग निश्चित किया है' ॥ ३—५ ॥
एवमुक्तस्ततः क्रोधात् प्रवृद्धः सहसाचलः ।
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं रोद्धुमिच्छन् परंतप ॥ ६ ॥
परंतप युधिष्ठिर! सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर विन्ध्य-पर्वत सहसा कुपित हो सूर्य और चन्द्रमाका मार्ग रोक लेनेकी इच्छासे बढ़ने लगा ॥ ६ ॥
ततो देवाः सहिताः सर्व एव
विन्ध्यं समागम्य महाद्रिराजम् ।
निवारयामासुरुपायतस्तं

न च स्म तेषां वचनं चकार ॥ ७ ॥ यह देख सब देवता एक साथ मिलकर महान् पर्वतराज विन्ध्यके पास गये और अनेक उपायोंद्वारा उसके क्रोधका निवारण करने लगे; परंतु उसने उनकी बात नहीं मानी ॥ ७ ॥ अथाभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् । अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं तं चार्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥ तब वे सब देवता मिलकर अपने आश्रमपर विराजमान धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तपस्वी अगस्त्य मुनिके पास गये, जो अद्भुत प्रभावशाली थे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन कह सुनाया ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा । शैलराजो वृणोत्येष विन्ध्यः क्रोधवशानुगः ॥ ९ ॥ तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद् द्विजोत्तम । ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय ॥ १० ॥ **देवता बोले—**द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोधके वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमाके मार्ग तथा नक्षत्रोंकी गतिको रोक रहा है। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इसका निवारण नहीं कर सकता। अतः आप चलकर इसे रोकिये ॥ ९-१० ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् । सोऽभिगम्याब्रवीद् विन्ध्यं सदारः समुपस्थितः ॥ ११ ॥ देवताओंकी यह बात सुनकर विप्रवर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये और वहाँ उपस्थित हो उससे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥

मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम । दक्षिणामभिगन्तास्मि दिशं कार्येण केनचित् ॥ १२ ॥ ‘पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्यसे दक्षिण दिशाको जा रहा हूँ, मेरी इच्छा है, तुम मुझे मार्ग प्रदान करो ॥ १२ ॥

यावदागमनं मह्यं तावत् त्वं प्रतिपालय । निवृत्ते मयि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ॥ १३ ॥ ‘जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ तबतक मेरी प्रतीक्षा करते रहो। शैलराज! मेरे लौट आनेपर तुम पुनः इच्छानुसार बढ़ते रहना’ ॥ १३ ॥

एवं स समयं कृत्वा विन्ध्येनामित्रकर्शन । अद्यापि दक्षिणाद्देशाद् वारुणिर्न निवर्तते ॥ १४ ॥ शत्रुसूदन! विन्ध्यके साथ ऐसा नियम करके मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यजी चले गये और आजतक दक्षिण प्रदेशसे नहीं लौटे ॥ १४ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा विन्ध्यो न वर्धते । अगस्त्यस्य प्रभावेण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १५ ॥ राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने कह दिया। महर्षि अगस्त्यके ही प्रभावसे विन्ध्यपर्वत बढ़ नहीं रहा है ॥ १५ ॥

कालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निषूदिताः । अगस्त्याद् वरमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु ॥ १६ ॥ राजन्! सब देवताओंने अगस्त्यसे वर पाकर जिस प्रकार कालेय नामक दैत्योंका संहार किया, वह बता रहा हूँ, सुनो— ॥ १६ ॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् । किमर्थमभियाताः स्थ वरं मत्तः कमिच्छथ । एवमुक्तास्ततस्तेन देवता मुनिमब्रुवन् ॥ १७ ॥ (सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा पुरन्दरपुरोगमाः ।) देवताओंकी बात सुनकर मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यने पूछा—'देवताओ! आपलोग किसलिये यहाँ पधारे हैं और मुझसे कौन-सा वर चाहते हैं?' उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रको आगे करके सब देवताओंने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा— ॥ १७ ॥ एवं त्वयेच्छाम कृतं हि कार्यं महार्णवं पीयमानं महात्मन् । ततो वधिष्याम सहानुबन्धान् कालेयसंज्ञान् सुरविद्विषस्तान् ॥ १८ ॥ 'महात्मन्! हम आपके द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराना चाहते हैं कि आप सारे महासागरके जलको पी जायँ। तदनन्तर हमलोग देवद्रोही कालेय नामक दानवोंका उनके बन्धु-बान्धवोंसहित वध कर डालेंगे' ॥ १८ ॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् । करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत् सुखम् ॥ १९ ॥ देवताओंका यह कथन सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा—'बहुत अच्छा' मैं आपलोगोंका मनोरथ पूर्ण करूँगा। इससे सम्पूर्ण लोकोंको महान् सुख प्राप्त होगा ॥ १९ ॥ एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत् समुद्रं सरितां पतिम् । ऋषिभिश्च तपःसिद्धैः सार्धं देवैश्च सुव्रत ॥ २० ॥ सुव्रत! ऐसा कहकर अगस्त्यजी देवताओं तथा तपःसिद्ध ऋषियोंके साथ नदीपति समुद्रके तटपर गये ॥ मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिंपुरुषास्तथा । अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ २१ ॥ उस समय मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर सभी उस अद्भुत दृश्यको देखनेके लिये उन महात्माके पीछे चल दिये ॥ २१ ॥ ततोऽभ्यगच्छन् सहिताः समुद्रं भीमनिःस्वनम् । नृत्यन्तमिव चोर्मीभिर्वल्गन्तमिव वायुना ॥ २२ ॥

फिर वे सब लोग एक साथ भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रके समीप गये, जो अपने उत्ताल तरंगोंद्वारा मानो नृत्य कर रहा था; और वायुके द्वारा उछलता-कूदता-सा जान पड़ता था ॥ २२ ॥

हसन्तमिव फेनौघैः स्खलन्तं कन्दरेषु च ।
नानाग्राहसमाकीर्णं नानाद्विजगणान्वितम् ॥ २३ ॥
वह फेनोंके समुदायद्वारा मानो अपनी हास्यछटा बिखेर रहा था; और कन्दराओंसे टकराता-सा जान पड़ता था। उसमें नाना प्रकारके ग्राह आदि जलजन्तु भरे हुए थे, तथा बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ २३ ॥

अगस्त्यसहिता देवाः सगन्धर्वमहोरगाः ।
ऋषयश्च महाभागाः समासेदुर्महोदधिम् ॥ २४ ॥
अगस्त्यजीके साथ देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और महाभाग ऋषिगण सभी महासागरके तटपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योदधिगमने चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यका समुद्रतटपर गमनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)

१०५-

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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुनः भरनेका उपाय पूछना

लोमश उवाच

समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषिः ।
उवाच सहितान् देवानृषींश्चैव समागतान् ॥ १ ॥
अहं लोकहितार्थं वै पिबामि वरुणालयम् ।
भवद्भिर्यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥ २ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! समुद्रके तटपर जाकर मित्रावरुण-नन्दन भगवान् अगस्त्यमुनि वहाँ एकत्र हुए देवताओं तथा समागत ऋषियोंसे बोले—'मैं लोकहितके लिये समुद्रका जल पी लेता हूँ। फिर आपलोगोंको जो कार्य करना हो उसे शीघ्र पूरा कर लें' ॥ १-२ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं मैत्रावरुणिरच्युतः ।
समुद्रमपिबत् क्रुद्धः सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ३ ॥
अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले मित्रा-वरुण-कुमार अगस्त्यजी कुपित हो सब लोगोंके देखते-देखते समुद्रको पीने लगे ॥ ३ ॥

पीयमानं समुद्रं तं दृष्ट्वा सेन्द्रास्तदामराः ।
विस्मयं परमं जग्मुः स्तुतिभिश्चाप्यपूजयन् ॥ ४ ॥
उन्हें समुद्र-पान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े विस्मित हुए और स्तुतियोंद्वारा उनका समादर करने लगे ॥ ४ ॥

त्वं नस्त्राता विधाता च लोकानां लोकभावन ।
त्वत्प्रसादात् समुच्छेदं न गच्छेत् सामरं जगत् ॥ ५ ॥
‘लोकभावन महर्षे! आप हमारे रक्षक तथा सम्पूर्ण लोकोंके विधाता हैं। आपकी कृपासे अब देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत् विनाशको नहीं प्राप्त होगा’ ॥ ५ ॥
स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा
गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वशः ।
दिव्यैश्च पुष्पै्रवकीर्यमाणो
महार्णवं निःसलिलं चकार ॥ ६ ॥
इस प्रकार जब देवता महात्मा अगस्त्यकी प्रशंसा कर रहे थे, सब ओर गन्धर्वोंके वाद्योंकी ध्वनि फैल रही थी और अगस्त्यजी पर दिव्य फूलोंकी बौछार हो रही थी, उसी समय अगस्त्यजीने सम्पूर्ण महासागरको जलशून्य कर दिया ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं
सुराः समस्ताः परमप्रहृष्टाः ।
प्रगृह्य दिव्यानि वरायुधानि
तान् दानवाञ्जघ्नुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥

उस महासमुद्रको निर्जल हुआ देख सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने दिव्य एवं श्रेष्ठ आयुध लेकर अत्यन्त उत्साहसे सम्पन्न हो दानवोंपर आक्रमण किया ॥ ७ ॥

ते वध्यमानास्त्रिदशैर्महात्मभि- र्महाबलैर्वेगिभिरुन्नदद्भिः । न सेहिरे वेगवतां महात्मनां वेगं तदा धारयितुं दिवौकसाम् ॥ ८ ॥

महान् बलवान्, वेगशाली और महाबुद्धिमान् देवता जब सिंहगर्जना करते हुए दैत्योंको मारने लगे उस समय वे उन वेगवान् महामना देवताओंका वेग न सह सके ॥ ८ ॥

ते वध्यमानास्त्रिदशैर्दानवा भीमनिःस्वनाः । चक्रुः सुतुमुलं युद्धं मुहूर्तमिव भारत ॥ ९ ॥

भरतनन्दन! देवताओंकी मार पड़नेपर दानवोंने भी भयंकर गर्जना करते हुए दो घड़ीतक उनके साथ घोर युद्ध किया ॥ ९ ॥

ते पूर्वं तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः । यतमानाः परं शक्त्या त्रिदशैर्विनिषूदिताः ॥ १० ॥

उन दैत्योंको शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंने अपनी तपस्याद्वारा पहलेसे ही दग्ध-सा कर रखा था, अतः पूरी शक्ति लगाकर अधिक-से-अधिक प्रयास करनेपर भी देवताओंद्वारा वे मार डाले गये ॥ १० ॥

ते हेमनिष्काभरणाः कुण्डलाङ्गदधारिणः । निहता बह्वशोभन्त पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ ११ ॥

सोनेकी मोहरोंकी मालाओंसे भूषित तथा कुण्डल एवं बाजूबंदधारी दैत्य वहाँ मारे जाकर खिले हुए पलाशके वृक्षोंकी भाँति अधिक शोभा पा रहे थे ॥ ११ ॥

हतशेषास्ततः केचित् कालेया मनुजोत्तम । विदार्य वसुधां देवीं पातालतलमास्थिताः ॥ १२ ॥

नरश्रेष्ठ! मरनेसे बचे हुए कुछ कालेय दैत्य वसुन्धरा देवीको विदीर्ण करके पातालमें चले गये ॥ १२ ॥

निहतान् दानवान् दृष्ट्वा त्रिदशा मुनिपुङ्गवम् । तुष्टुवुर्विविधैर्वाक्यैरिदं वचनमब्रुवन् ॥ १३ ॥

सब दानवोंको मारा गया देख देवताओंने नाना प्रकारके वचनोंद्वारा मुनिवर अगस्त्यजीका स्तवन किया और यह बात कही— ॥ १३ ॥

त्वत्प्रसादान्महाभाग लोकैः प्राप्तं महत् सुखम् । त्वत्तेजसा च निहताः कालेयाः क्रूरविक्रमाः ॥ १४ ॥

‘महाभाग! आपकी कृपासे समस्त लोकोंने महान् सुख प्राप्त किया है; क्योंकि क्रूरतापूर्ण पराक्रम दिखानेवाले कालेय दैत्य आपके तेजसे दग्ध हो गये ॥ १४ ॥

पूरयस्व महाबाहो समुद्रं लोकभावन । यत् त्वया सलिलं पीतं तदस्मिन् पुनरुत्सृज ॥ १५ ॥ 'मुने! आपकी बाँहें बड़ी हैं। आप नूतन संसारकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अब आप समुद्रको फिर भर दीजिये। आपने जो इसका जल पी लिया है उसे फिर इसीमें छोड़ दीजिये' ॥ १५ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान् मुनिपुङ्गवः । (तांस्तदा सहितान् देवानगस्त्यः सपुरन्दरान् ।) जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोऽन्यःप्रचिन्त्यताम् ॥ १६ ॥ पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्भिर्यत्नमास्थितैः । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महर्षेर्भावितात्मनः ॥ १७ ॥ विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहिताः सुराः । परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ॥ १८ ॥ उनके ऐसा कहनेपर मुनिप्रवर भगवान् अगस्त्यने वहाँ एकत्र हुए इन्द्र आदि समस्त देवताओंसे उस समय यों कहा—'देवगण! वह जल तो मैंने पचा लिया, अतः समुद्रको भरनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहकर आपलोग कोई दूसरा ही उपाय सोचें।' शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका यह वचन सुनकर सब देवता बड़े विस्मित हो गये; उनके मनमें विषाद छा गया। वे आपसमें सलाह करके मुनिवर अगस्त्यजीको प्रणाम कर वहाँसे चल दिये ॥ १६—१८ ॥

प्रजाः सर्वा महाराज विप्रजग्मुर्यथागतम् । त्रिदशा विष्णुना सार्धमुपजग्मुः पितामहम् ॥ १९ ॥ महाराज! फिर सारी प्रजा जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी। देवतालोग भगवान् विष्णुके साथ ब्रह्माजीके पास गये ॥ १९ ॥

पूरणार्थं समुद्रस्य मन्त्रयित्वा पुनः पुनः । (ते धातारमुपागम्य त्रिदशाः सह विष्णुना ।) ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सागरस्याभिपूरणम् ॥ २० ॥ समुद्रको भरनेके उद्देश्यसे बार-बार आपसमें सलाह करके श्रीविष्णुसहित सब देवता ब्रह्माजीके निकट जा हाथ जोड़कर यह पूछने लगे कि 'समुद्रको पुनः भरनेके लिये क्या उपाय किया जाय' ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)

१०६-

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षडधिकशततमोऽध्यायः

राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना

लोमश उवाच

तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब लोकपितामह ब्रह्माजीने अपने पास आये हुए सब देवताओंसे कहा—'देवगण! इस समय तुम सब लोग इच्छानुसार अभीष्ट स्थानको चले जाओ ॥ १ ॥

महता कालयोगेन प्रकृतिं यास्यतेऽर्णवः ।
ज्ञातींश्च कारणं कृत्वा महाराजो भगीरथः ॥ २ ॥
पूरयिष्यति तोयौघैः समुद्रं निधिमम्भसाम् ।
‘अब दीर्घकालके पश्चात् समुद्र फिर अपनी स्वाभाविक अवस्थामें आ जायगा। महाराज भगीरथ अपने कुटुम्बी जनों (प्रपितामहों)-के उद्धारका उद्देश्य लेकर जलनिधि समुद्रको पुनः अगाध जलराशिसे भर देंगे' ॥ २ १/२ ॥

पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे विबुधसत्तमाः ।
कालयोगं प्रतीक्षन्तो जग्मुश्चापि यथागतम् ॥ ३ ॥
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं वै ज्ञातयो ब्रह्मन् कारणं चात्र किं मुने ।
कथं समुद्रः पूर्णश्च भगीरथप्रतिश्रयात् ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—'ब्रह्मन्! भगीरथके कुटुम्बीजन समुद्रकी पूर्तिमें निमित्त क्योंकर बने? मुने! उनके निमित्त बननेका कारण क्या है? और भगीरथके आश्रयसे किस प्रकार समुद्रकी पूर्ति हुई? ॥ ४ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ।
कथ्यमानं त्वया विप्र राज्ञां चरितमुत्तमम् ॥ ५ ॥
तपोधन! विप्रवर! मैं यह प्रसंग, जिसमें राजाओंके उत्तम चरित्रका वर्णन है, आपके मुखसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना । कथयामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर विप्रवर लोमशने महात्मा राजा सगरका माहात्म्य बतलाया ।। ६ ।।

लोमश उवाच

इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः । रूपसत्त्वबलोपेतः स चापुत्रः प्रतापवान् ॥ ७ ॥ **लोमशजी कहते हैं—**राजन्! इक्ष्वाकुवंशमें सगर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे रूप, धैर्य और बलसे सम्पन्न तथा बड़े प्रतापी थे, परंतु उनके कोई पुत्र न था ।। ७ ।।

स हैहयान् समुत्साद्य तालजङ्घांश्च भारत । वशे च कृत्वा राजन्यान् स्वराज्यमन्वशासत ॥ ८ ॥ भारत! उन्होंने हैहय तथा तालजंघ नामक क्षत्रियोंका संहार करके सब राजाओंको अपने वशमें कर लिया और अपने राज्यका शासन करने लगे ।। ८ ।।

तस्य भार्ये त्वभवतां रूपयौवनदर्पिते । वैदर्भी भरतश्रेष्ठ शैब्या च भरतर्षभ ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजा सगरके दो पत्नियाँ थीं, वैदर्भी और शैब्या। उन दोनोंको ही अपने रूप और यौवनका बड़ा अभिमान था ।। ९ ।।

स पुत्रकामो नृपतिस्तप्यते स्म महत्तपः । पत्नीभ्यां सह राजेन्द्र कैलासं गिरिमाश्रितः ॥ १० ॥ स तप्यमानः सुमहत् तपो योगसमन्वितः । आससाद महात्मानं त्र्यक्षं त्रिपुरमर्दनम् ॥ ११ ॥ शंकरं भवमीशानं शूलपाणिं पिनाकिनम् । त्र्यम्बकं शिवमुग्रेशं बहुरूपमुमापतिम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! राजा सगर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ कैलास पर्वतपर जाकर पुत्रकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या करने लगे। योगयुक्त होकर महान् तपमें लगे हुए महाराज सगरको त्रिपुरनाशक, त्रिनेत्रधारी, शंकर, भव, ईशान, शूलपाणि, पिनाकी, त्र्यम्बक, उग्रेश, बहुरूप और उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध महात्मा भगवान् शिवका दर्शन हुआ ।। १०—१२ ।।

स तं दृष्ट्वैव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः । प्रणिपत्य महाबाहुः पुत्रार्थे समयाचत ॥ १३ ॥ तं प्रीतिमान् हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् । यस्मिन् वृत्तो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥ १४ ॥

वरदायक भगवान् शिवको देखते ही महाबाहु राजा सगरने दोनों पत्नियोंसहित प्रणाम किया और पुत्रके लिये याचना की। तब भगवान् शिवने प्रसन्न होकर पत्नीसहित नृपश्रेष्ठ सगरसे कहा—‘राजन्! तुमने यहाँ जिस मुहूर्तमें वर माँगा है, उसका परिणाम यह होगा ।। १३-१४ ।।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः परमदर्पिताः । एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ।। १५ ।। ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव । एको वंशधरः शूर एकस्यां सम्भविष्यति ।। १६ ।। ‘नरश्रेष्ठ! तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे अत्यन्त अभिमानी साठ हजार शूरवीर पुत्र होंगे, परंतु वे सब-के-सब एक ही साथ नष्ट हो जायँगे। भूपाल! तुम्हारी जो दूसरी पत्नी है, उसके गर्भसे एक ही शूरवीर वंशधर पुत्र उत्पन्न होगा’ ।। १५-१६ ।। एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत । स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ।। १७ ।। पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा ।

तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने ।। १८ ।। वैदर्भी चैव शैब्या च गर्भिण्यौ सम्बभूवतुः । ततः कालेन वैदर्भी गर्भालाबुं व्यजायत ।। १९ ।। शैब्या च सुषुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् । तदालाबुं समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः ।। २० ।। ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये। राजा सगर भी अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो पत्नियोंसहित अपने निवासस्थानको चले गये। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी वे दोनों कमलनयनी पत्नियाँ वैदर्भी और शैब्या गर्भवती हुईं। फिर समय आनेपर वैदर्भीने अपने गर्भसे एक तूँबी उत्पन्न की और शैब्याने देवताके समान सुन्दर रूपवाले एक पुत्रको जन्म दिया। राजा सगरने उस तूंबीको फेंक देनेका विचार किया ।। १७—२० ।।

अथान्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् । राजन् मा साहसं कार्षीः पुत्रान् न त्यक्तुमर्हसि ।। २१ ।। अलाबुमध्यान्निष्कृष्य बीजं यत्नेन गोप्यताम् । सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णेषु भागशः ।। २२ ।। इसी समय आकाशसे एक गम्भीर वाणी सुनायी दी—'राजन्! ऐसा दुःसाहस न करो। अपने इन पुत्रोंका त्याग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। इस तूँबीमें से एक-एक बीजको निकालकर घीसे भरे हुए गरम घड़ोंमें अलग-अलग रक्खो और यत्नपूर्वक इन सबकी रक्षा करो ।। २१-२२ ।।

ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव । महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप । अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ।। २३ ।। 'पृथ्वीपते! ऐसा करनेसे तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। नरश्रेष्ठ! महादेवजीने तुम्हारे लिये इसी क्रमसे पुत्रजन्म होनेका निर्देश किया है; अतः तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सगरसंततिकथने षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसङ्गमें सगरसंततिवर्णनविषयक एक सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।

१०७-

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः

सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्‌के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्‌से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति

लोमश उवाच

एतच्छ्रुत्वान्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः ।
यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद् भरतर्षभ ।। १ ।।
लोमशजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यह आकाशवाणी सुनकर भूपालशिरोमणि राजा सगरने उसपर विश्वास करके उसके कथनानुसार सब कार्य किया ।। १ ।।

एकैकशस्ततः कृत्वा बीजं बीजं नराधिपः ।
घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् भागान् विदधे ततः ।। २ ।।
नरेशने एक-एक बीजको अलग करके उन सबको घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखा ।। २ ।।

धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् पुत्ररक्षणतत्परः ।
ततः कालेन महता समुत्तस्थुर्महाबलाः ।। ३ ।।
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याप्रतिमतेजसः ।
रुद्रप्रसादाद् राजर्षेः समजायन्त पार्थिव ।। ४ ।।
फिर पुत्रोंकी रक्षाके लिये तत्पर हो सबके लिये पृथक्-पृथक् धायें नियुक्त कर दीं। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उस अनुपम तेजस्वी नरेशके साठ हजार महाबली पुत्र उन घड़ोंमेंसे निकल आये। युधिष्ठिर! राजर्षि सगरके वे सभी पुत्र भगवान् शिवकी कृपासे ही उत्पन्न हुए थे ।। ३-४ ।।

ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः ।
बहुत्वाच्चावजानन्तःसर्वाँल्लोकान् सहामरान् ।। ५ ।।
वे सब-के-सब भयंकर स्वभाववाले और क्रूरकर्मा थे। आकाशमें भी सब ओर घूम-फिर सकते थे। उनकी संख्या अधिक होनेके कारण वे देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंकी अवहेलना करते थे ।। ५ ।।

त्रिदशांश्चाप्यबाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् ।
सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ।। ६ ।।
समरभूमिमें शोभा पानेवाले वे शूरवीर राजकुमार देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको कष्ट दिया करते थे ।। ६ ।।

वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः ॥ ७ ॥
मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंद्वारा सताये हुए सब लोग सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ७ ॥

तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः ।
गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः सार्धं यथागतम् ॥ ८ ॥
उस समय सर्वलोकपितामह महाभाग ब्रह्माने उनसे कहा—'देवताओ! तुम सभी इन सब लोगोंके साथ जैसे आये हो, वैसे लौट जाओ ॥ ८ ॥

नातिदीर्घेण कालेन सागराणां क्षयो महान् ।
भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥ ९ ॥
'अब थोड़े ही दिनोंमें अपने ही किये हुए अपराधोंद्वारा इन सगरपुत्रोंका अत्यन्त घोर और महान् संहार होगा' ॥ ९ ॥

एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर ।
पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ १० ॥
नरेश्वर! उनके ऐसा कहनेपर सब देवता तथा अन्य लोग ब्रह्माजीकी आज्ञा ले जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ १० ॥

ततः काले बहुतिथे व्यतीते भरतर्षभ ।
दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर पराक्रमी राजा सगरने अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥

तस्याश्वो व्यचरद् भूमिं पुत्रैः स परिरक्षितः ।
(सर्वैरेव महोत्साहैः स्वच्छन्दप्रचरो नृप ।)
समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् ॥ १२ ॥
रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवान्तरधीयत ।
ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् ॥ १३ ॥
आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरगं हृतम् ।
तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गंत वाजिनम् ॥ १४ ॥
(ससमुद्रवनद्वीपां विचरन्तो वसुन्धराम् ।)
राजन्! उनका यज्ञिय अश्व उनके अत्यन्त उत्साही सभी पुत्रोंद्वारा सुरक्षित हो स्वच्छन्दगतिसे पृथ्वीपर विचरने लगा। जब वह अश्व भयंकर दिखायी देनेवाले जलशून्य समुद्रके तटपर आया, तब प्रयत्नपूर्वक रक्षित होनेपर भी वहाँ सहसा अदृश्य हो गया। तात! तब उस उत्तम अश्वको अपहृत जानकर सगरपुत्रोंने पिताके पास आकर कहा—'हमारे यज्ञिय अश्वको किसीने चुरा लिया, अब वह दिखायी नहीं देता।' यह सुनकर राजा सगरने

कहा—'तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीपर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें जाकर उस अश्वका पता लगाओ'।। १२—१४।। ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम्। अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम्॥ १५॥ ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम्। नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च॥ १६॥ महाराज! तदनन्तर वे पिताकी आज्ञा ले इस सम्पूर्ण भूतलमें सभी दिशाओंमें अश्वकी खोज करने लगे। खोजते-खोजते सभी सगरपुत्र एक-दूसरेसे मिले, परंतु वे अश्व तथा अश्वहर्ताका पता न लगा सके।। १५-१६।। आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः। ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा॥ १७॥ सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप। अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव॥ १८॥ न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च। श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छितः॥ १९॥ उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप। अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम्॥ २०॥ यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः। प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः॥ २१॥ भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः। अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम्॥ २२॥ तब वे पिताके पास आकर उनके आगे हाथ जोड़कर बोले—'महाराज! हमने आपकी आज्ञासे समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेशोंसहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परंतु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही।' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले—'जाओ, लौटकर न आना। पुनः घोड़ेका पता लगाओ। पुत्रो! उस यज्ञके अश्वको लिये बिना वापस न आना।' पिताका वह संदेश शिरोधार्य करके सगरपुत्रोंने फिर सारी पृथ्वीपर अश्वको ढूँढ़ना आरम्भ किया। तदनन्तर उन वीरोंने एक स्थानपर पृथ्वीमें दरार पड़ी हुई देखी।। १७—२२।। समासाद्य बिलं तच्चाप्यखनन् सगरात्मजाः। कुद्दालैर्हेषुकैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः॥ २३॥ उस बिलके पास पहुँचकर सगरपुत्रोंने कुदालों और फावड़ोंसे समुद्रको प्रयत्नपूर्वक खोदना आरम्भ किया।।

स खन्यमानः सहितैः सागरैर्वरुणालयः ।
अगच्छत् परमामार्तिं दीर्यमाणः समन्ततः ॥ २४ ॥
असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि च ।
आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरैः ॥ २५ ॥
एक साथ लगे हुए सगरकुमारोंके खोदनेपर सब ओरसे विदीर्ण होनेवाले समुद्रको बड़ी पीड़ाका अनुभव होता था। सगरपुत्रोंके हाथों मारे जाते हुए असुर, नाग, राक्षस और नाना प्रकारके जन्तु बड़े जोरसे आर्तनाद करते थे ॥ २४-२५ ॥
छिन्नशीर्षा विदेहाश्च भिन्नत्वगस्थिसंधयः ।
प्राणिनः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २६ ॥
सैकड़ों और हजारों ऐसे प्राणी दिखायी देने लगे जिनके मस्तक कट गये थे, शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, चमड़े छिल गये थे तथा हड्डियोंके जोड़ टूट गये थे ॥ २६ ॥
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं वरुणालयम् ।
व्यतीतः सुमहान् कालो न चाश्वः समदृश्यत ॥ २७ ॥
इस प्रकार वरुणके निवासभूत समुद्रकी खुदाई करते-करते उनका बहुत समय बीत गया, परंतु वह अश्व कहीं दिखायी नहीं दिया ॥ २७ ॥
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते ।
विदार्य पातालमथ संक्रुद्धाः सगरात्मजाः ॥ २८ ॥
अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले ।
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् ।
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् ॥ २९ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सगरपुत्रोंने समुद्रके पूर्वोत्तर प्रदेशमें पाताल फोड़कर प्रवेश किया और वहाँ उस यज्ञिय अश्वको पृथ्वीपर विचरते देखा। वहीं तेजकी परम उत्तम राशि महात्मा कपिल बैठे थे, जो अपने दिव्य तेजसे उसी प्रकार उद्भासित हो रहे थे, जैसे लपटोंसे अग्नि ॥ २८-२९ ॥
ते तं दृष्ट्वा हयं राजन् सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ।
अनादृत्य महात्मानं कपिलं कालचोदिताः ॥ ३० ॥
संक्रुद्धाः सम्प्रधावन्त अश्वग्रहणकाङ्क्षिणः ।
ततः क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तमः ॥ ३१ ॥
राजन्! उस अश्वको देखकर उनके शरीरमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया। वे कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरकर महात्मा कपिलका अनादर करके उस अश्वको पकड़नेके, लिये दौड़े। महाराज! तब मुनिश्रेष्ठ कपिल कुपित हो उठे ॥ ३०-३१ ॥