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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२२९-

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एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह

मार्कण्डेय उवाच

उपविष्टं तु तं स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् ।
हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! स्कन्द सोनेका कवच, सोनेकी माला और सोनेकी कलँगीसे सुशोभित मुकुट धारण किये (सुन्दर आसनपर) बैठे थे। उनके नेत्रोंसे सुवर्णकी-सी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीरसे महान् तेजःपुंज प्रकट हो रहा था ॥ १ ॥
लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्ट्रं मनोरमम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम् ॥ २ ॥
उन्होंने लाल रंगके वस्त्रसे अपने अंगोंको आच्छादित कर रखा था। उनके दाँत बड़े तीखे थे और उनकी आकृति मनको लुभा लेनेवाली थी। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा तीनों लोकोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे ॥ २ ॥
ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् ।
अभजत् पद्मरूपा श्रीः स्वयमेव शरीरिणी ॥ ३ ॥
तदनन्तर वर देनेमें समर्थ, शौर्यसम्पन्न, युवा अवस्थासे सुशोभित तथा सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत कुमार कार्तिकेयका कमलके समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभाने स्वयं ही सेवन किया ॥ ३ ॥
श्रिया जुष्टः पृथुयशाः स कुमारवरस्तदा ।
निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ ४ ॥
मूर्तिमती शोभासे सेवित हो वहाँ बैठे हुए महा-यशस्वी सुन्दरकुमारको उस समय सब प्राणी पूर्णमासीके चन्द्रमाकी भाँति देखते थे ॥ ४ ॥
अपूजयन् महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम् ।
इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षयः ॥ ५ ॥
महामना ब्राह्मणोंने महाबली स्कन्दकी पूजा की और सब महर्षियोंने वहाँ आकर उनका इस प्रकार स्तवन किया ॥ ५ ॥

ऋषय ऊचुः

हिरण्यगर्भ भद्रं ते लोकानां शङ्करो भव ।
त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ॥ ६ ॥

**ऋषि बोले—**हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम समस्त जगत्‌के लिये कल्याणकारी बनो। तुम्हारे पैदा हुए अभी छः रातें ही बीती होंगी। इतनेमें ही तुमने समस्त लोकोंको अपने वशमें कर लिया है ॥ ६ ॥ अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम । तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥ ७ ॥ सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है। अतः आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो ॥ ७ ॥

स्कन्द उवाच

किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः । कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ॥ ८ ॥ **स्कन्द बोले—**तपोधनो! इन्द्र इस पदपर रहकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये क्या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओंकी किस प्रकार रक्षा करते हैं? ॥ ८ ॥

ऋषय ऊचुः

इन्द्रो दधाति भूतानां बलं तेजः प्रजाः सुखम् । तुष्टः प्रयच्छति तथा सर्वान् कामान् सुरेश्वरः ॥ ९ ॥ **ऋषि बोले—**देवराज इन्द्र संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण प्राणियोंको बल, तेज, संतान और सुखकी प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ९ ॥ दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति । अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदनः ॥ १० ॥ वे दुष्टोंका संहार करते और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंको जीवन दान देते हैं। बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले इन्द्र सभी प्राणियोंको आवश्यक कार्योंमें लगनेका आदेश देते हैं ॥ १० ॥ असूर्ये च भवेत् सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमाः । भवत्यग्निश्च वायुश्च पृथिव्यापश्च कारणैः ॥ ११ ॥ सूर्यके अभावमें वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमाके न रहनेपर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं। आवश्यकता पड़नेपर वे ही अग्नि, वायु, पृथिवी और जलका स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥ एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् । त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥ १२ ॥ यह सब इन्द्रका कार्य है। इन्द्रमें अपरिमित बल होता है। वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो। अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ ॥ १२ ॥

शक्र उवाच

भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः ।
अभिषिञ्चस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥ १३ ॥
**इन्द्रने कहा—**महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ। सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो। अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो ॥ १३ ॥

स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः ।
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥ १४ ॥
**स्कन्द बोले—**इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये। मैं तो आपका सेवक हूँ। मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है ॥ १४ ॥

शक्र उवाच
बलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानांमरीन् जहि ।
अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ॥ १५ ॥
इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम् ।
आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिताः ॥ १६ ॥
**इन्द्रने कहा—**वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओंका संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे। यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे ॥ १५-१६ ॥
भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेप्स्यति ।
द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा ॥ १७ ॥
विग्रहः सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल ।
तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि ॥ १८ ॥
तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय ।
प्रभो! यदि तुम फूट जाओगे तो जगत्के प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे। महाबलवान् वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे। अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो ॥ १७-१८ १/२ ॥

स्कन्द उवाच

त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च ।। १९ ।। करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे । **स्कन्द बोले—**देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ—? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। १९ १/२ ।।

इन्द्र उवाच

अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल ।। २० ।। यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद् भाषितं त्वया । यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ।। २१ ।। अभिषिञ्चस्व देवानां सेनापत्ये महाबल । **इन्द्रने कहा—**महाबलवान् स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो—महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो ।। २०-२१ १/२ ।।

स्कन्द उवाच

दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये ।। २२ ।। गोब्राह्मणहितार्थाय सेनापत्येऽभिषिञ्च माम् । **स्कन्द बोले—**देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये ।। २२ १/२ ।।

मार्कण्डेय उवाच

सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह ।। २३ ।। अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः । तत्र तत् काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत ।। २४ ।। यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् । **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओंसहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया। उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो ।। २३-२४ १/२ ।। विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी ।। २५ ।। आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना । आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप ।। २६ ।।

नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात् त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कन्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी ॥ २५-२६ ॥ अर्चयामास सुप्रीतो भगवान् गोवृषध्वजः । रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहु रुद्रसूनुस्ततस्तु सः ॥ २७ ॥ भगवान् वृषध्वज (शिव)-ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्दका समादर किया। ब्राह्मणलोग अग्निको रुद्रका स्वरूप बताते हैं, इसलिये स्कन्द भगवान् रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २७ ॥ रुद्रेण शुक्रममुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् । पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ॥ २८ ॥ रुद्रने जिस वीर्यका त्याग किया था, वही श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। फिर कृत्तिकाओंने अग्निके वीर्यको श्वेत पर्वतपर पहुँचाया था ॥ २८ ॥ पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः । रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ॥ २९ ॥ भगवान् रुद्रके द्वारा गुणवानोंमें श्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयका सम्मान होता देख सब देवता कहने लगे, ये रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २९ ॥ अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्निं जातो ह्ययं शिशुः । तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३० ॥ 'रुद्रने अग्निमें प्रवेश करके इस शिशुको जन्म दिया है। रुद्रस्वरूप अग्निसे उत्पन्न होनेके कारण स्कन्द रुद्रके ही पुत्र कहलाये' ॥ ३० ॥ रुद्रस्य वह्नेः स्वाहायाः षण्णां स्त्रीणां च भारत । जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३१ ॥ भारत! सुरश्रेष्ठ स्कन्दका जन्म रुद्रस्वरूप अग्निसे, स्वाहासे तथा छः स्त्रियोंसे हुआ था। इसलिये वे भगवान् रुद्रके पुत्र हुए ॥ ३१ ॥ अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः । भाति दीप्तवपुः श्रीमान् रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ॥ ३२ ॥ अग्निनन्दन स्कन्द लाल रंगके दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये कान्तिमान् एवं तेजस्वी शरीरसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो दो लाल बादलोंके साथ भगवान् अंशुमाली (सूर्य) सुशोभित हो रहे हों ॥ ३२ ॥ कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृतः । रथे समुच्छ्रितो भाति कालाग्निरिव लोहितः ॥ ३३ ॥ अग्निदेवने स्कन्दके लिये कुक्कुटके चिह्नसे अलंकृत ऊँचा ध्वज प्रदान किया था, जो रथपर अपनी अरुण प्रभासे प्रलयाग्निके समान उद्भासित होता था ॥ ३३ ॥ या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शान्तिर्बलं तथा ।

अग्रतस्तस्य सा शक्तिर्देवानां जयवर्धिनी ॥ ३४ ॥
सम्पूर्ण भूतोंमें जो चेष्टा, प्रभा, शान्ति और बल है, वही कुमार कार्तिकेयके सम्मुख शक्तिरूपमें उपस्थित है। वह देवताओंकी विजयश्रीको बढ़ानेवाली है ॥ ३४ ॥
विवेश कवचं चास्य शरीरे सहजं तथा ।
युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत् सदा ॥ ३५ ॥
तथा उन स्कन्ददेवके शरीरमें सहज (स्वाभाविक) कवचका प्रवेश हो गया, जो सदा उनके युद्ध करते समय प्रकट होता था ॥ ३५ ॥
शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः ।
ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥ ३६ ॥
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् ।
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥ ३७ ॥
राजन्! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन—ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे ॥ ३६-३७ ॥
एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलंकृतः ।
बभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुमण्डलः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार समस्त देवताओं द्वारा सेनापतिके पदपर अभिषिक्त होकर विविध आभूषणोंसे विभूषित, विशुद्ध एवं प्रसन्न हृदयवाले स्कन्द पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हुए ॥ ३८ ॥
इष्टैः स्वाध्यायघोषैश्च देवतूर्यवरैरपि ।
देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ॥ ३९ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिस्तुष्टैर्हृष्टैः स्वलंकृतैः ।
सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा ॥ ४० ॥
उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ये तथा और भी बहुत-से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे ॥ ३९-४० ॥
क्रीडन् भाति तदा देवैरभिषिक्तश्च पावकिः ।
अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः ॥ ४१ ॥
विनिहत्य तमः सूर्यं यथेहाभ्युदितं तथा ।

उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों॥ ४१ १/२॥ अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः ॥ ४२ ॥ अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः । तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं—'आप ही हमारे पति हैं'॥ ४२ १/२॥ ताः समासाद्य भगवान् सर्वभूतगणैर्वृतः ॥ ४३ ॥ अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि । समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान् स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए॥ ४३ १/२॥ शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥ ४४ ॥ सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था॥ ४४ १/२॥ अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ४५ ॥ विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् । उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये॥ स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम ॥ ४६ ॥ अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा । तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ४७ ॥ गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा । एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥ ४८ ॥ फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो।' इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया॥ ४६—४८॥

बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च । एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः ॥ ४९ ॥ उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंका जप और होम किया। इस प्रकार सब लोग यह जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेयकी पटरानी है ॥ ४९ ॥ षष्ठीं यां ब्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् । सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ॥ ५० ॥ उसीको ब्राह्मणलोग षष्ठी, लक्ष्मी, आशा, सुखप्रदा, सिनीवाली, कुहू, सद्वृत्ति तथा अपराजिता कहते हैं ॥ यदा स्कन्दः पतिर्लब्धः शाश्वतो देवसेनया । तदा तमाश्रयल्लक्ष्मीः स्वयं देवी शरीरिणी ॥ ५१ ॥ जब देवसेनाने स्कन्दको अपने सनातन पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया, तब (शोभास्वरूपा) लक्ष्मीदेवीने स्वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया ॥ ५१ ॥ श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता । षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद् यस्मात् तस्मात् षष्ठी महातिथिः ॥ ५२ ॥ पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात् शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपञ्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्ठी महातिथि मानी गयी ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दोपाख्यानसम्बन्धी दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥

कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन

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त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम् ।
सप्तर्षिपत्न्यः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! कुमार महासेनको श्रीसम्पन्न और देवताओंका सेनापति हुआ देख सप्तर्षियोंमेंसे छःकी पत्नियाँ उनके पास आयीं ॥ १ ॥

ऋषिभिः सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः ।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥ २ ॥
वे धर्मपरायणा तथा महान् पातिव्रत्यका पालन करनेवाली थीं, तो भी ऋषियोंने उन्हें त्याग दिया था। अतः उन्होंने देवसेनाके स्वामी भगवान् स्कन्दके पास शीघ्रतापूर्वक आकर कहा— ॥ २ ॥

वयं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसम्मितैः ।
अकारणाद् रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात् परिच्युताः ॥ ३ ॥
‘बेटा! हमारे देवतुल्य पतियोंने अकारण रुष्ट होकर हमें त्याग दिया है, इसलिये (हम) पुण्यलोकसे च्युत हो गयी हैं ॥ ३ ॥

अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम् ।
तत् सत्यमेतत् संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ ४ ॥
‘उन्हें किसीने यह बता दिया है कि तुम हमारे गर्भसे उत्पन्न हुए हो, (परंतु ऐसी बात नहीं है।) अतः हमारे सत्य कथनको सुनकर तुम इस संकटसे हमारी रक्षा करो ॥ ४ ॥

अक्षयश्च भवेत् स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो ।
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥ ५ ॥
‘प्रभो! तुम्हारी कृपासे हमें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। इसके सिवा हम तुम्हें अपना पुत्र भी बनाये रखना चाहती हैं। यह सब कार्य सम्पन्न करके तुम हमसे उऋण हो जाओ’ ॥ ५ ॥

स्कन्द उवाच

मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः ।
यद्द्वापीच्छत तत् सर्वं सम्भविष्यति वस्त्रथा ॥ ६ ॥

**स्कन्द बोले—**वन्दनीय सतियो! आपलोग मेरी माताएँ हैं और मैं आप सबका पुत्र हूँ। इसके सिवा यदि आप लोगोंकी और कोई इच्छा हो तो वह भी पूर्ण हो जायगी ।। ६ ।।

मार्कण्डेय उवाच

विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत् । उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवतस्तः ।। ७ ।। **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर इन्द्रको कुछ कहनेके लिये उत्सुक देख स्कन्दने पूछा—'क्या काम है, कहिये।' स्कन्दके इस प्रकार आदेश देनेपर इन्द्र बोले— ।। ७ ।।

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा । इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ।। ८ ।। ‘रोहिणीकी छोटी बहिन अभिजित् देवी स्पर्धाके कारण ज्येष्ठता पानेकी इच्छासे तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयी है ।। ८ ।।

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् । कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ।। ९ ।। ‘तुम्हारा कल्याण हो, आकाशसे यह एक नक्षत्र च्युत हो गया है; (इसकी पूर्ति कैसे हो?) इस प्रश्नको लेकर मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया हूँ। स्कन्द! तुम ब्रह्माजीके साथ मिलकर

इस उत्तम काल (मुहूर्त या नक्षत्र) की पूर्तिके उपायका विचार करो ॥ ९ ॥ धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः । रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥ 'अभिजित्‌का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही (सत्ययुग आदि) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया (क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था)। इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था (क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था)—इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन-संख्या उन दिनों सम थी' ॥ १० ॥ एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः । नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥ इन्द्रके उपर्युक्त प्रस्ताव करनेपर उनका आशय समझकर छहों कृत्तिकाएँ अभिजित्‌के स्थानकी पूर्ति करनेके लिये आकाशमें चली गयीं। वह अग्निदेवता-सम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्र सात सिरोंकी आकृतिमें प्रकाशित हो रहा है ॥ ११ ॥ विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः । इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥ गरुड़जातीय विनताने स्कन्दसे कहा—'बेटा! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो। मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ' ॥ १२ ॥

स्कन्द उवाच

एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम् । स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥ **स्कन्दने कहा—**एवमस्तु (ऐसा ही हो), मा! तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे ऊपर पुत्रोचित स्नेह रखकर कर्तव्यका आदेश देती रहो। देवि! तुम यहाँ सदा अपनी पुत्रवधू देवसेनाद्वारा सम्मानित होकर रहोगी ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत् । वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः । इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर समस्त मातृगणोंने आकर स्कन्दसे कहा—'बेटा! विद्वानोंने हमें सम्पूर्ण लोकोंकी माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता होना चाहती हैं। तुम मातृभावसे हमारा पूजन करो' ॥ १४ ॥

स्कन्द उवाच

मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः ।

उच्चतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥ १५ ॥
**स्कन्दने कहा—**आप मेरी माताएँ हैं। मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ। मुझसे सिद्ध होनेयोग्य जो आपका अभीष्ट कार्य हो, उसे बताइये ॥ १५ ॥

मातर ऊचुः

यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः ।
अस्माकं तु भवेत् स्थानं तासां चैव न तद् भवेत् ॥ १६ ॥
माताओंने कहा—(ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि) सुप्रसिद्ध लोकमाताएँ जो पहलेसे इस सम्पूर्ण जगत्की माताओंके स्थानपर प्रतिष्ठित हों, (वे अपना पद छोड़ दें।) उनके उस स्थानपर अब हमारा अधिकार हो जाय। उनका उसपर कोई अधिकार न रहे ॥ १६ ॥
भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ ।
प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥ १७ ॥
सुरश्रेष्ठ! हम सम्पूर्ण जगत्की पूजनीया हों। जो पहले मातृकाएँ थीं, उनकी अब पूजा न हो। उन्होंने तुम्हारे लिये हमपर मिथ्या अपवाद लगाकर हमारे पतियोंको कुपित करके हमारे सन्तानसुखको छीन लिया है। अतः तुम हमें संतान प्रदान करो (हमारे पतियोंको अनुकूल करके हमें संतान-सुखकी प्राप्ति कराओ) ॥ १७ ॥

स्कन्द उवाच

वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम् ।
अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥ १८ ॥
**स्कन्द बोले—**माताओं! जिन प्रजाओंकी उत्पत्तिका अवसर बीत गया, उन्हें आपलोग अब नहीं पा सकतीं। यदि दूसरी कोई प्रजा पानेकी आपके मनमें इच्छा हो तो कहिये, मैं उसे प्रदान करूँगा ॥ १८ ॥

मातर ऊचुः

इच्छाम तासां मातृणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः ।
त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥ १९ ॥
**माताओंने कहा—**यदि ऐसी बात है, तो हमें इन लोकमाताओंकी संतानें सौंप दो। हम उन्हें खाना चाहती हैं। तुमसे पृथक् जो उन संतानोंके पिता आदि अभिभावक हैं, उन्हें भी हम खाना चाहती हैं ॥ १९ ॥

स्कन्द उवाच

प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम् ।
परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधु नमस्कृताः ॥ २० ॥

स्कन्द बोले—देवियो! आपलोगोंने यह दुःखकी बात कही है, तो भी मैं आपको पहलेकी मातृकाओंकी संतानको अर्पित कर देता हूँ; परंतु आपलोग उन सबकी रक्षा करें; इसीसे आपका भला होगा। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥

मातर ऊचुः

परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि । त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥ २१ ॥ माताओंने कहा—स्कन्द! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार हम उन संतानोंकी रक्षा अवश्य करेंगी। शक्तिशाली कुमार! हमें दीर्घकालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा है ॥ २१ ॥

स्कन्द उवाच

यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः । प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥ २२ ॥ स्कन्द बोले—संसारके मनुष्य जबतक सोलह वर्षके तरुण न हो जायँ, तबतक आप मानव-प्रजाको पृथक्-पृथक् उतने ही रूप धारण करके संताप दे सकती हैं ॥ २२ ॥ अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम् । परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥ २३ ॥ मैं आपलोगोंको एक भयंकर एवं अविनाशी पुरुष प्रदान करूँगा, जो मेरा अभिन्न स्वरूप होगा। उसके साथ सम्मानपूर्वक रहकर आपलोग परम सुखकी भागिनी होंगी ॥ २३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः । भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभः ॥ २४ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर स्कन्दके शरीरसे अग्निके समान तेजस्वी तथा परम कान्तिमान् एक पुरुष प्रकट हुआ, जो समस्त मानव-प्रजाको खा जानेकी इच्छा रखता था ॥ २४ ॥ अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः । स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रहः ॥ २५ ॥ वह पैदा होते ही भूखसे पीडित हो सहसा अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर स्कन्दकी आज्ञासे वह भयंकर रूपधारी ग्रह हो गया ॥ २५ ॥ स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः । विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥ २६ ॥

श्रेष्ठ द्विज! इस ग्रहको 'स्कन्दापस्मार' कहते हैं। इसी प्रकार अत्यन्त रौद्र रूप धारण करनेवाली विनताको 'शकुनि ग्रह' बताया जाता है ॥ २६ ॥

पूतनां राक्षसीं प्राहुस्तं विद्यात् पूतनाग्रहम् ।
कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी ॥ २७ ॥
पूतनाको राक्षसी बताया गया है, उसे 'पूतनाग्रह' समझना चाहिये। वह भयंकर रूप धारण करनेवाली निशाचरी बड़ी क्रूरताके साथ बालकोंको कष्ट पहुँचाती है ॥ २७ ॥

पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना ।
गर्भान् सा मानुषीणां तु हरते घोरदर्शना ॥ २८ ॥
इसके सिवा भयानक आकारवाली एक पिशाची है, जिसे 'शीतपूतना' कहते हैं, वह देखनेमें बड़ी डरावनी है। वह मानवी स्त्रियोंका गर्भ हर ले जाती है ॥ २८ ॥

अदितिं रेवतीं प्राहुर्ग्रहस्तस्यास्तु रैवतः ।
सोऽपि बालान् महाघोरो बाधते वै महाग्रहः ॥ २९ ॥
लोग अदिति देवीको रेवती कहते हैं। रेवतीके ग्रहका नाम रैवत है। वह महाभयंकर महान् ग्रह भी बालकोंको बड़ा कष्ट देता है ॥ २९ ॥

दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम् ।
अत्यर्थं शिशुमांसेन सम्प्रहृष्टा दुरासदा ॥ ३० ॥
दैत्योंकी माता जो दिति है, उसे 'मुखमण्डिका' कहते हैं। वह छोटे बच्चोंके मांससे अधिक प्रसन्न होती है। उसे पराजित करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३० ॥

कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसम्भवाः ।
तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ॥ ३१ ॥
कुरुनन्दन! स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न हुए जिन कुमार एवं कुमारियोंका वर्णन किया गया है, वे सभी गर्भस्थ बालकोंका भक्षण करनेवाले महान् ग्रह हैं ॥ ३१ ॥

तासामेव तु पत्नीनां पतयस्ते प्रकीर्तिताः ।
आजायमानान् गृह्णन्ति बालकान् रौद्रकर्मिणः ॥ ३२ ॥
वे कुमार उन्हीं पत्नीस्वरूपा कुमारियोंके पति कहे गये हैं। उनके कर्म बड़े भयंकर हैं। वे जन्म लेनेके पहले ही बच्चोंको पकड़ ले जाते हैं ॥ ३२ ॥

गवां माता तु या प्राज्ञैः कथ्यते सुरभिर्नृप ।
शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्क्ते शिशून् भुवि ॥ ३३ ॥
राजन्! विद्वान् पुरुष जिसे गोमाता सुरभि कहते हैं, उसीपर आरूढ़ होकर शकुनिग्रह—विनता अन्य ग्रहोंके साथ भूमण्डलके बालकोंका भक्षण करती है ॥ ३३ ॥

सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप ।
सापि गर्भान् समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ॥ ३४ ॥

नरेश्वर! कुत्तोंकी माता जो देवजातीय सरमा है, वह भी सदैव मानवीय स्त्रियोंके गर्भस्थ बालकोंका अपहरण करती रहती है ।। ३४ ।। पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा । वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ।। ३५ ।। जो वृक्षोंकी माता है, वह करंजवृक्षपर निवास किया करती है। वह वर देनेवाली तथा सौम्य है और सदा समस्त प्राणियोंपर कृपा करती है ।। ३५ ।। करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात् पुत्रार्थिनो नराः । इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ।। ३६ ।। द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे । कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ।। ३७ ।। भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते । इसीलिये पुत्रार्थी मनुष्य करंजवृक्षपर रहनेवाली उस देवीको नमस्कार करते हैं। ये तथा दूसरे अठारह ग्रह मांस और मधुके प्रेमी हैं और दस राततक सूतिका-गृहमें निरन्तर टिके रहते हैं। कद्रू सूक्ष्म शरीर धारण करके गर्भिणी स्त्रीके शरीरके भीतर प्रवेश कर जाती है और वहाँ उस गर्भको खा जाती है। इससे वह गर्भिणी स्त्री सर्प पैदा करती है ।। ३६-३७ १/२ ।।

गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति ।। ३८ ।। ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते । जो गन्धर्वोंकी माता है, वह गर्भिणी स्त्रीके गर्भको लेकर चल देती है, जिससे उस मानवी स्त्रीका गर्भ विलीन हुआ देखा जाता है ।। ३८ १/२ ।।

या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ।। ३९ ।। उपनष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः । जो अप्सराओंकी माता है, वह भी गर्भको पकड़ लेती है, जिससे बुद्धिमान् मनुष्य कहते हैं कि अमुक स्त्रीका गर्भ नष्ट हो गया ।। ३९ १/२ ।।

लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ।। ४० ।। लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते । लालसागरकी कन्याका नाम लोहितायनि है, जिसे स्कन्दकी धाय बताया गया है। उसकी कदम्बवृक्षोंमें पूजा की जाती है ।। ४० १/२ ।।

पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ।। ४१ ।। आर्या माता कुमारस्य पृथक् कामार्थमिज्यते । एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ।। ४२ ।। यावत् षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः ।

जैसे पुरुषोंमें भगवान् रुद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार स्त्रियोंमें आर्या उत्तम मानी गयी हैं। आर्या कुमार कार्तिकेयकी जननी हैं। लोग अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये उनका उपर्युक्त ग्रहोंसे पृथक् पूजन करते हैं। इस प्रकार मैंने ये कुमारसम्बन्धी महान् ग्रह बताये हैं। जबतक सोलह वर्षकी अवस्था न हो जाय, तबतक ये बालकोंका अमंगल करनेवाले होते हैं॥ ४१-४२ १/२ ॥

ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ।। ४३ ।। सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः । जो मातृगण और पुरुषग्रह बताये गये हैं, इन सबको समस्त देहधारी मनुष्य सदा 'स्कन्दग्रह' के नामसे जाने* ॥ ४३ १/२ ॥

तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम् । बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषतः ।। ४४ ।। स्नान, धूप, अञ्जन, बलिकर्म, उपहार अर्पण तथा स्कन्ददेवकी विशेष पूजा करके इन स्कन्दग्रहोंकी शान्ति करनी चाहिये ॥ ४४ ॥

एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् । आयुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ।। ४५ ।। राजेन्द्र! इस प्रकार पूजित तथा विधिवत् पूजनद्वारा अभिवन्दित होनेपर वे सभी ग्रह मनुष्योंका मंगल करते हैं और उन्हें आयु तथा बल देते हैं ॥ ४५ ॥

ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद् ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् । तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ।। ४६ ।। अब मैं भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उन ग्रहोंका परिचय दूँगा, जो सोलह वर्षकी अवस्थाके बाद मनुष्योंके लिये अनिष्टकारक होते हैं ॥ ४६ ॥

यः पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ।। ४७ ।। जो मनुष्य जागते या सोतेमें देवताओंको देखता और तुरंत पागल हो जाता है, उस कष्ट देनेवाले ग्रहको 'देवग्रह' कहते हैं ॥ ४७ ॥

आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ।। ४८ ।। जो मनुष्य बैठे-बैठे या सोते समय पितरोंको देखता और शीघ्र पागल हो जाता है, उस बाधा देनेवाले ग्रहको 'पितृग्रह' जानना चाहिये ॥ ४८ ॥

अवमन्यति यः सिद्धान् क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ।। ४९ ।।

जो सिद्ध पुरुषोंका अनादर करता है और क्रोधमें आकर वे सिद्ध पुरुष जिसे शाप दे देते हैं, जिसके कारण वह तुरंत पागल हो जाता है, उसे 'सिद्धग्रह' की बाधा प्राप्त हुई है, ऐसा समझना चाहिये ।। ४९ ।। उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः ।। ५० ।। जो विभिन्न सुगन्धोंको सूँघता तथा रसोंका आस्वादन करता है एवं तत्काल ही उन्मत्त हो उठता है, उसपर प्रभाव डालनेवाले ग्रहको 'राक्षसग्रह' जानना चाहिये ।। गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः ।। ५१ ।। भूतलपर जिस मनुष्यमें दिव्य गन्धर्वोंका आवेश होता है, वह भी शीघ्र ही उन्मादग्रस्त हो जाता है। इसे 'गान्धर्वग्रह' की ही बाधा समझनी चाहिये ।। ५१ ।। अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः ।। ५२ ।। जिस पुरुषपर सदा पिशाच चढ़े रहते हैं, वह भी शीघ्र पागल हो जाता है। अतः वह 'पिशाचग्रह' की ही बाधा है ।। ५२ ।। आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ।। ५३ ।। कालक्रमसे जिस पुरुषमें यक्षोंका आवेश होता है, उसे भी पागल होते देर नहीं लगती। इसे 'यक्षग्रह' की बाधा जाननी चाहिये ।। ५३ ।। यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ।। ५४ ।। जिस देहधारी मनुष्यका चित्त वात, पित्त और कफ नामक दोषोंके कुपित होनेसे अपनी संज्ञा खो बैठता है, वह शीघ्र ही विक्षिप्त हो जाता है। उसकी वैद्यक शास्त्रके अनुसार चिकित्सा करानी चाहिये ।। ५४ ।। वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम् ।। ५५ ।। जो घबराहट, भय तथा घोर वस्तुओंके दर्शनसे ही तत्काल पागल हो जाता है, उनके अच्छे होनेका उपाय केवल उसे सान्त्वना देना है ।। ५५ ।। कश्चित् क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः । अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ।। ५६ ।। कोई ग्रह क्रीडा-विनोदकी, कोई भोजनकी और कोई कामोपभोगकी इच्छा रखता है, इस प्रकार ग्रहोंकी प्रकृति तीन प्रकारकी है ।। ५६ ।। यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् ।

अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ॥ ५७ ॥
जबतक सत्तर वर्षकी अवस्था पूरी होती है, तबतक ये ग्रह मनुष्योंको सताते हैं। उसके बाद तो सभी देहधारियोंको ज्वर आदि रोग ही ग्रहोंके समान सताने लगते हैं ॥ ५७ ॥
अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् ।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः ॥ ५८ ॥
जिसने अपनी इन्द्रियोंको सब ओरसे समेट लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस पुरुषको ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं—उसे दूरसे ही त्याग देते हैं ॥ ५८ ॥
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः ।
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम् ॥ ५९ ॥
राजन्! इस प्रकार मैंने मनुष्योंको जो ग्रहोंकी बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो भगवान् महेश्वरके भक्त हैं, उन मनुष्योंको भी ये ग्रह नहीं छूते हैं ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे मनुष्यग्रहकथने
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३० ॥


* मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ये तामस स्कन्दग्रह भगवान् रुद्रके भूत-प्रेतादि गणोंकी भाँति कुमार स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न तमोमय कुमारके साथी माने जाते हैं। इन ग्रहोंसे रक्षा पानेके लिये भगवान् महेश्वरकी भक्ति करनी चाहिये। भय दिखाकर भी भगवान्‌की भक्ति करानेमें हेतुभूत होनेके कारण इन ग्रहोंका वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान्‌के भक्तोंको ये ग्रह छू भी नहीं सकते। तमोगुणी प्रजापर ही सब तामस ग्रहोंका बल काम करता है। और वही इनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं।

२३१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा

मार्कण्डेय उवाच

यदा स्कन्देन मातृणामेवमेतत् प्रियं कृतम्।
अथैनमब्रवीत् स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः॥ १॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब स्कन्दने इस प्रकार मातृगणोंका यह प्रिय मनोरथ पूर्ण किया, तब स्वाहाने आकर उनसे कहा—'तुम मेरे औरस पुत्र हो॥ १॥
इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम्।
तामब्रवीत् ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम्॥ २॥
'अतः मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे परम दुर्लभ प्रीति प्रदान करो।' तब स्कन्दने पूछा—'माँ तुम कैसी प्रीति पानेकी अभिलाषा रखती हो?'॥ २॥

स्वाहोवाच

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज।
बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने॥ ३॥
**स्वाहा बोली—**महाबाहो! मैं प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री हूँ, मेरा नाम स्वाहा है। मैं बचपनसे ही सदा अग्निदेवके प्रति अनुराग रखती आयी हूँ॥ ३॥
न स मां कामिनीं पुत्र सम्यक् जानाति पावकः।
इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना॥ ४॥
पुत्र! परंतु अग्निदेवको इस बातका अच्छी तरह पता नहीं है कि मैं उन्हें चाहती हूँ। बेटा! मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि मैं नित्य-निरन्तर अग्निदेवके ही साथ निवास करूँ॥ ४॥

स्कन्द उवाच

हव्यं कव्यं च यत्किंचिद् द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम्।
होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्धृतम्॥ ५॥
अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः।
एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने॥ ६॥