महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(भक्तानुकम्पिनं देवं नागयज्ञोपवीतिनम् ।) विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् ॥ ४३ ॥ दृष्ट्वा गाण्डीवसंयोगमानीय भरतर्षभ नमस्कृत्य त्रिनेत्राय शर्वायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ मुक्तवान् दानवेन्द्राणां पराभावाय भारत मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन् रूपाण्यासन् सहस्रशः ॥ ४५ ॥ शत्रुदमन नरेश! लपलपाती जीभवाले बड़े-बड़े नाग उन दिव्य पुरुषके लिये चीर (वस्त्र) बने हुए थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवजीने सर्पोंका ही यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनके दर्शनसे मेरा सारा भय जाता रहा। भरतश्रेष्ठ! फिर तो मैंने उस भयंकर एवं सनातन पाशुपतास्त्रको गाण्डीव धनुषपर संयोजित करके अमित तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरको नमस्कार किया और उन दानवेन्द्रोंके विनाशके लिये उनपर चला दिया। उस अस्त्रके छूटते ही उससे सहस्रों रूप प्रकट हो गये ॥ ४३—४५ ॥ मृगाणामथ सिंहानां व्याघ्राणां च विशाम्पते ऋक्षाणां महिषाणां च पन्नगानां तथा गवाम् ॥ ४६ ॥ शरभाणां गजानां च वानराणां च सङ्घशः ऋषभाणां वराहाणां मार्जाराणां तथैव च ॥ ४७ ॥ शालावृकाणां प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः गृध्राणां गरुडानां च चमराणां तथैव च ॥ ४८ ॥ देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वाणां च सर्वशः पिशाचानां सयक्षाणां तथैव च सुरद्विषाम् ॥ ४९ ॥ गुह्यकानां च संग्रामे नैर्ऋतानां तथैव च झषाणां गजवक्त्राणामुलूकानां तथैव च ॥ ५० ॥ मीनवाजिसरूपाणां नानाशस्त्रासिपाणिनाम् तथैव यातुधानानां गदामुद्गरधारिणाम् ॥ ५१ ॥ महाराज! मृग, सिंह, व्याघ्र, रीछ, भैंस, नाग, गौ, शरभ, हाथी, वानर, बैल, सूअर, बिलाव, भेड़िये, प्रेत, मुरुण्ड, गिद्ध, गरुड, चमरी गाय, देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, देवद्रोही राक्षस, गुह्यक, निशाचर, मत्स्य, गजमुख, उल्लू, मीन तथा अश्व-जैसे रूपवाले नाना प्रकारके जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन सबके हाथमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र एवं खड्ग थे। इसी प्रकार गदा और मुद्गर धारण किये बहुत-से यातुधान भी प्रकट हुए ॥ ४६—५१ ॥ एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नानारूपधरैस्तथा सर्वमासीज्जगद् व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ॥ ५२ ॥ त्रिशिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः
अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभिः ।। ५३ ।।
इन सबके साथ दूसरे भी बहुत-से जीवोंका प्राकट्य हुआ, जिन्होंने नाना प्रकारके रूप धारण कर रखे थे। उन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त-सा हो गया था। पाशुपतास्त्रका प्रयोग होते ही कोई तीन मस्तक, कोई चार दाढ़ें, कोई चार मुख और कोई चार भुजावाले अनेक रूपधारी प्राणी प्रकट हुए, जो मांस, मेदा, वसा और हड्डियोंसे संयुक्त थे ।। ५२-५३ ।।
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा नाशमागताः
अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः ।। ५४ ।।
अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणैः
न्यहनं दानवान् सर्वान् मुहूर्तेनैव भारत ।। ५५ ।।
उन सबके द्वारा गहरी मार पड़नेसे वे सारे दानव नष्ट हो गये। भारत! उस समय सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी तथा वज्र और अशनिके समान प्रकाशित होनेवाले शत्रुविनाशक लोहमय बाणोंद्वारा भी मैंने दो ही घड़ीमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला ।। ५४-५५ ।।
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान् गतासून् नभसश्च्युतान्
दृष्ट्वाहं प्रणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे ।। ५६ ।।
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए अस्त्रोंद्वारा क्षत-विक्षत हो समस्त दानव प्राण त्यागकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। यह देखकर मैंने पुनः त्रिपुरनाशक भगवान् शंकरको प्रणाम किया ।। ५६ ।।
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान् दिव्याभरणभूषितान्
निशम्य परमं हर्षमगमद् देवसारथिः ।। ५७ ।।
दिव्य आभूषणोंसे विभूषित दानव पाशुपतास्त्रसे पिस गये हैं, यह देखकर देवसारथि मातलिको बड़ा हर्ष हुआ ।। ५७ ।।
तदसह्यं कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम्
दृष्ट्वा मां पूजयामास मातलिः शक्रसारथिः ।। ५८ ।।
जो कार्य देवताओंके लिये भी दुष्कर और असह्य था, वह मेरेद्वारा पूरा हुआ देख इन्द्रसारथि मातलिने मेरा बड़ा सम्मान किया ।। ५८ ।।
उवाच वचनं चेदं प्रीयमाणः कृताञ्जलिः
सुरासुरैरसह्यं हि कर्म यत् साधितं त्वया ।। ५९ ।।
और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर कहा—'अर्जुन! आज तुमने वह कार्य कर दिखाया है जो देवताओं और असुरोंके लिये भी असाध्य था ।। ५९ ।।
न ह्येतत् संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः
(ध्रुवं धनंजय प्रीतस्त्वयि शक्रः पुरार्दन ।)
सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत् खगं महत् ।। ६० ।।
त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात्
‘साक्षात् देवराज इन्द्र भी युद्धमें यह सब कार्य करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं।
हिरण्यपुरका विनाश करनेवाले वीरवर धनंजय! निश्चय ही देवराज इन्द्र आज तुम्हारे ऊपर
बहुत प्रसन्न होंगे। वीर! तुमने अपने पराक्रम और तपस्याके बलसे इस आकाशचारी विशाल
नगरको तहस-नहस कर डाला, जिसे सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी नष्ट नहीं कर
सकते थे' ।। ६० ।।
विध्वस्ते खपुरे तस्मिन् दानवेषु हतेषु च ।। ६१ ।।
विनदन्त्यः स्त्रियः सर्वा निष्पेतुर्नगराद् बहिः
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुखिताः ।। ६२ ।।
उस आकाशवर्ती नगरका विध्वंस और दानवोंका संहार हो जानेपर वहाँकी सारी
स्त्रियाँ विलाप करती हुई नगरसे बाहर निकल आयीं। उनके केश बिखरे हुए थे। वे दुःख
और व्यथामें डूबी हुई कुररीकी भाँति करुण-क्रन्दन करती थीं ।। ६१-६२ ।।
पेतुः पुत्रान् पितॄन् भ्रातृन् शोचमाना महीतले
रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वराः ।। ६३ ।।
उरांसि परिनिघ्नन्त्यो विस्रस्तस्रग्विभूषणाः
अपने पुत्र, पिता और भाइयोंके लिये शोक करती हुई वे सब-की-सब पृथ्वीपर गिर
पड़ीं। जिनके पति मारे गये थे, वे अनाथ अबलाएँ दीनतापूर्ण कष्टसे रोती-चिल्लाती हुई
छाती पीट रही थीं। उनके हार और आभूषण इधर-उधर गिर पड़े थे ।। ६३ ।।
तच्छोकयुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् ।। ६४ ।।
न बभौ दानवपुरं हतत्त्विट्कं हतेश्वरम्
गन्धर्वनगराकारं हतनागमिव ह्रदम् ।। ६५ ।।
शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत् पुरम्
दानवोंका वह नगर शोकमग्न हो अपनी सारी शोभा खो चुका था। वहाँ दुःख और
दीनता व्याप्त हो रही थी। अपने प्रभुओंके मारे जानेसे वह दानव-नगर निष्प्रभ और
अशोभनीय हो गया था। गन्धर्व-नगरकी भाँति उसका अस्तित्व अयथार्थ जान पड़ता था।
जिसका हाथी मर गया हो, उस सरोवर और जहाँके वृक्ष सूख गये हों, उस वनके समान वह
नगर अदर्शनीय हो गया था ।। ६४-६५ ।।
मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरा नयत् ।। ६६ ।।
देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात्
मेरे मनमें तो हर्ष और उत्साह भरा हुआ था। मैंने देवताओंका कार्य पूरा कर दिया था।
अतः मातलि उस रणभूमिसे मुझे शीघ्र ही देवराज इन्द्रके भवनमें ले आये ।। ६६ ।।
हिरण्यपुरमुत्सृज्य निहत्य च महासुरान् ।। ६७ ।।
निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम्
इस प्रकार मैं निवातकवच नामक महादानवोंको (तथा पौलोम और कालकेयोंको)
मारकर तथा उजड़े हुए हिरण्यपुरको उसी अवस्थामें छोड़कर वहाँसे इन्द्रके पास
आया ।। ६७ १/२ ।।
मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् ।। ६८ ।।
सर्वं विश्रावयामास यथाभूतं महाद्युते
महाद्युते! मातलिने मेरा सारा कार्य, जो कुछ जैसे हुआ था, देवराज इन्द्रसे
विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।।
हिरण्यपुरघातं च मायानां च निवारणम् ।। ६९ ।।
निवातकवचानां च वधं संख्ये महौजसाम्
तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सहस्राक्षः पुरंदरः ।। ७० ।।
मरुद्भिः सहितः श्रीमान् साधु साध्वित्यथाब्रवीत्
(परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय सस्मितम् ।)
ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः ।। ७१ ।।
अब्रवीद् विबुधैः सार्धमिदं स मधुरं वचः
अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे ।। ७२ ।।
हिरण्यपुरका विध्वंस, दानवी मायाका निवारण तथा महाबलवान् निवातकवचोंका
युद्धमें वध सुनकर मरुत् आदि देवताओंसहित भगवान् सहस्रलोचन इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो
मुझे साधुवाद देने लगे और मुझे प्रेम पूर्वक हृदयसे लगाकर मुसकराते हुए मेरा मस्तक
सूँघा। तत्पश्चात् देवराजने बार-बार मुझे सान्त्वना देते हुए देवताओंके साथ यह मधुर वचन
कहा—'पार्थ! तुमने युद्धमें वह कार्य किया है, जो देवताओं और असुरोंके लिये भी
असम्भव है ।। ६९–७२ ।।
गुर्वर्थश्च कृतः पार्थ महाशत्रून् घ्नता मम
एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनंजय ।। ७३ ।।
असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम्
अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः ।। ७४ ।।
‘आज तुमने मेरे महान् शत्रुओंका संहार करके गुरुदक्षिणा चुका दी है। धनंजय! इसी
प्रकार तुम्हें सदा युद्धभूमिमें अविचल रहना चाहिये और मोहशून्य होकर अस्त्रोंका प्रयोग
करना चाहिये। देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी युद्धमें तुम्हारा सामना नहीं कर
सकता ।। ७३-७४ ।।
सयक्षासुरगन्धर्वैः सपक्षिगणपन्नगैः
वसुधां चापि कौन्तेय त्वद्बाहुबलनिर्जिताम्
पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ७५ ।।
'यक्ष, असुर, गन्धर्व, पक्षी तथा नाग भी तुम्हारे सामने नहीं टिक सकते। कुन्तीकुमार! धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तुम्हारे बाहुबलसे जीती हुई पृथ्वीका पालन करेंगे ।। ७५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि हिरण्यपुरदैत्यवधे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें हिरण्यपुरवासी दैत्योंके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७३ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७७ १/२ श्लोक हैं)
१७४-
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
अर्जुन उवाच
ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम्
देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
अर्जुन कहते हैं—राजन्! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया। धीरे-धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये। तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा— ॥ १ ॥
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥ २ ॥
‘भरतनन्दन! तुममें सब दिव्यास्त्र विद्यमान हैं। भूमण्डलका कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता ॥ २ ॥
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः
संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३ ॥
‘बेटा! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा राजाओंसहित शकुनि—ये सब-के-सब संग्राममें खड़े होनेपर तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते’ ॥ ३ ॥
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥ ४ ॥
महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी ॥ ४ ॥
देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम्
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने बड़े जोरकी आवाज करनेवाला यह देवदत्त नामक शंख प्रदान किया। स्वयं देवराज इन्द्रने ही यह दिव्य किरीट मेरे मस्तकपर रखा था ॥ ५ ॥
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये ॥ ६ ॥
एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥ ७ ॥ महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ७ ॥
ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥ ८ ॥ तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'अर्जुन! अब तुम्हारे जानेका समय आ गया है; क्योंकि तुम्हारे भाई तुम्हें बहुत याद करते हैं' ॥ ८ ॥
एवमिन्द्रस्य भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥ ९ ॥ भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं ॥ ९ ॥
ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम् गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥ १० ॥ इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥ ११ ॥ दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ ॥ १२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। भारत! यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुमने देवताओंके स्वामी राजराजेश्वर इन्द्रको आराधनाद्वारा प्रसन्न कर लिया। निष्पाप परंतप! सबसे बड़ी सौभाग्यकी बात तो यह है कि तुमने देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् शंकरका दर्शन किया और उन्हें अपनी युद्धकलासे संतुष्ट कर लिया ॥ ११-१२ ॥
दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! समस्त लोकपालोंके साथ तुम्हारी भेंट हुई, यह भी हमारे लिये सौभाग्यका सूचक है। हमारा अहोभाग्य है कि हम उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहे हैं। अर्जुन! हमारे भाग्यसे ही तुम पुनः हमारे पास लौट आये ॥ १३ ॥
अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्
मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥ १४ ॥
आज मुझे यह विश्वास हो गया कि हम नगरोंसे सुशोभित समूची वसुधादेवीको जीत लेंगे। अब हम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भी अपने वशमें पड़ा हुआ ही मानते हैं ॥ १४ ॥
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हतः ॥ १५ ॥
भारत! अब मेरी इच्छा उन दिव्यास्त्रोंको देखनेकी हो रही है, जिनके द्वारा तुमने उस प्रकारके उन महापराक्रमी निवातकवचोंका विनाश किया है ॥ १५ ॥
अर्जुन उवाच
श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः
निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥ १६ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! कल सबेरे आप उन सब दिव्यास्त्रोंको देखियेगा जिनके द्वारा मैंने भयानक निवातकवचोंको मार गिराया है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः
भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥
१७५-
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना
वैशम्पायन उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धर्मराजो युधिष्ठिरः
उत्थायावश्यककार्याणि कृतवान् भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब वह रात बीत गयी तब धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयोंसहित उठकर आवश्यक नित्यकर्म पूरे किये ॥ १ ॥
ततः संचोदयामास सोऽर्जुनं भ्रातृनन्दनम्
दर्शयास्त्राणि कौन्तेय यैर्जिता दानवास्त्वया ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने भाइयोंको सुख पहुँचानेवाले अर्जुनको आज्ञा दी—'कुन्तीनन्दन! अब तुम उन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कराओ जिनसे तुमने दानवोंपर विजय पायी है' ॥ २ ॥
ततो धनंजयो राजन् देवैर्दत्तानि पाण्डवः
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शयामास भारत ॥ ३ ॥
राजन्! तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने देवताओंके दिये हुए उन दिव्य अस्त्रोंको दिखानेका आयोजन किया ॥ ३ ॥
यथान्यायं महातेजाः शौचं परममास्थितः
(नमस्कृत्य त्रिनेत्राय वासवाय च पाण्डवः ।)
गिरिकूबरपादाक्षं शुभवेणु त्रिवेणुमत् ॥ ४ ॥
पार्थिवं रथमास्थाय शोभमानो धनंजयः
दिव्येन संवृतस्तेन कवचेन सुवर्चसा ॥ ५ ॥
धनुरादाय गाण्डीवं देवदत्तं स वारिजम्
शोशुभ्यमानः कौन्तेय आनुपूर्व्यान्महाभुजः ॥ ६ ॥
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे
अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै ॥ ७ ॥
समाक्रान्ता मही पद्भ्यां समकम्पत सद्रुमा
क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः ॥ ८ ॥
महातेजस्वी अर्जुन पहले तो विधिपूर्वक स्नान करके शुद्ध हुए। फिर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और इन्द्रको नमस्कार करके उन्होंने वह अत्यन्त तेजस्वी दिव्य कवच धारण किया। तत्पश्चात् वे पृथ्वीरूपी रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे। पर्वत ही उस रथका कूबर था, दोनों पैर ही पहिये थे और सुन्दर बाँसोंका वन ही त्रिवेणु (रथके अंगविशेष)-का काम देता था। तदनन्तर महाबाहु कुन्तीनन्दन अर्जुनने एक हाथमें गाण्डीव धनुष और
दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमशः उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी। नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया ।। ४-८ ।। शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः। न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वल च पावकः ॥ ९ ॥ पर्वत विदीर्ण होने लगे और हवाकी गति रुक गयी। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आगका जलना बंद हो गया ॥ ९ ॥ न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय ॥ १० ॥ पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन् वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः ॥ ११ ॥ दह्यमानास्तदास्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम् ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः ॥ १२ ॥ जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः ॥ १३ ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥ १४ ॥ द्विजातियोंको किसी प्रकार भी वेदोंका भान नहीं हो पाता था। जनमेजय! भूमिके भीतर जो प्राणी निवास करते थे, वे भी पीड़ित हो उठे और अर्जुनको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये। उन सबके मुखपर विकृति आ गयी थी। वे हाथ जोड़े हुए थर-थर काँप रहे थे और अस्त्रोंके तेजसे संतप्त हो धनंजयसे प्राणोंकी भिक्षा माँग रहे थे। इसी समय ब्रह्मर्षि, सिद्ध महर्षि, समस्त जंगम प्राणी, श्रेष्ठ देवर्षि, देवता, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पक्षी तथा आकाशचारी प्राणी सभी वहाँ आकर उपस्थित हो गये ।। १०-१४ ।। ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥ १५ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी, समस्त लोकपाल तथा भगवान् महादेव अपने गणोंसहित वहाँ आये ।। १५ ।। ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥ १६ ॥ महाराज! तदनन्तर वायुदेव पाण्डुनन्दन अर्जुनपर सब ओरसे विचित्र सुगन्धित दिव्य मालाओंकी वृष्टि करने लगे ।। १६ ।। जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः
ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः
आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत
नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १९ ॥
नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे—‘अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो। भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥
अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो। कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्
बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव
भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
‘पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं। अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना। अजातशत्रु युधिष्ठिर! (आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें।) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा’ ॥ २२-२३ ॥
वैशम्पायन उवाच
निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम्
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥
तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥
(आजगरपर्व)
(आजगरपर्व)
षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान
जनमेजय उवाच
तस्मिन् कृतास्त्रे रथिनां प्रवीरे
प्रत्यागते भवनाद् वृत्रहन्तुः
अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः
समेत्य शूरेण धनंजयेन ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! रथियोंमें श्रेष्ठ महावीर अर्जुन जब इन्द्रभवनसे दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके लौट आये, तब उनसे मिलकर कुन्तीकुमारोंने पुनः कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः
सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः
तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये
धनेश्वराक्रीडगता विजह्रुः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले— राजन्! वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव इन्द्रतुल्य पराक्रमी अर्जुनके साथ उस परम रमणीय शैलशिखरपर कुबेरकी क्रीड़ाभूमिके अन्तर्गत उन्हीं वनोंमें सुखसे विहार करने लगे ॥ २ ॥
वेश्मानि तान्यप्रतिमानि पश्यन्
क्रीडाश्च नानाद्रुमसंनिबद्धाः
चचार धन्वी बहुधा नरेन्द्रः
सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ॥ ३ ॥
वहाँ कुबेरके अनुपम भवन बने हुए थे। नाना प्रकारके वृक्षोंके निकट अनेक प्रकारके खेल होते रहते थे। उन सबको देखते हुए किरीटधारी अर्जुन बहुधा वहाँ विचरा करते और हाथमें धनुष लेकर सदा अस्त्रोंके अभ्यासमें संलग्न रहते थे ॥ ३ ॥
अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः
प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः
न प्राणिनां ते स्पृहयन्ति राजन्
शिवश्च कालः स बभूव तेषाम् ॥ ४ ॥
राजन्! राजकुमार पाण्डवोंको राजाधिराज कुबेरकी कृपासे वहाँका निवास प्राप्त हुआ था। वे वहाँ रहकर भूतलके अन्य प्राणियोंके ऐश्वर्य-सुखकी अभिलाषा नहीं रखते थे। उनका वह समय बड़े सुखसे बीत रहा था ॥ ४ ॥
समेत्य पार्थेन यथैकरात्र-
मूबुः समास्तत्र तदा चतस्रः
पूर्वाश्च षट् ता दश पाण्डवानां
शिवा बभूवुर्वसतां वनेषु ॥ ५ ॥
वे अर्जुनके साथ वहाँ चार वर्षोंतक रहे, परंतु उनको वह समय एक रातके समान ही प्रतीत हुआ। पहलेके छः वर्ष तथा वहाँके चार वर्ष इस प्रकार सब मिलाकर पाण्डवोंके वनवासके दस वर्ष आनन्दपूर्वक बीत गये ॥ ५ ॥
ततोऽब्रवीद् वायुसुतस्तरस्वी
जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य
यमौ च वीरौ सुरराजकल्पा-
वेकान्तमास्थाय हितं प्रियं च ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक दिन अर्जुन तथा वीरवर नकुल-सहदेव, जो देवराजके समान पराक्रमी थे, एकान्तमें राजा युधिष्ठिरके पास बैठे थे। उस समय वेगशाली वायुपुत्र भीमसेन यह हितकर एवं प्रिय वचन बोले— ॥ ६ ॥
तव प्रतिज्ञां कुरुराज सत्यां
चिकीर्षमाणास्तदनु प्रियं च
ततो न गच्छाम वनान्यपास्य
सुयोधनं सानुचरं निहन्तुम् ॥ ७ ॥
‘कुरुराज! आपकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेकी इच्छासे और आपका प्रिय करनेकी अभिलाषा रखनेके कारण हमलोग यह वनवास छोड़कर दुर्योधनका अनुचरोंसहित वध करने नहीं जा रहे हैं ॥ ७ ॥
एकादशं वर्षमिदं वसामः
सुयोधनेनात्तसुखाः सुखार्हाः
तं वञ्चयित्वाधमबुद्धिशील-
मज्ञातवासं सुखमाप्नुयाम ॥ ८ ॥
'अब हमारे निवासका यह ग्यारहवाँ वर्ष चल रहा है। हमलोग सुख भोगनेके अधिकारी थे, परन्तु दुर्योधनने हमारा सुख छीन लिया। उसकी बुद्धि तथा स्वभाव अत्यन्त अधम है। उस दुष्टको धोखा देकर हम अपने अज्ञातवासका समय भी सुखपूर्वक बिता लेंगे ।। ८ ।।
तवाज्ञया पार्थिव निर्विशङ्का विहाय मानं विचरन् वनानि समीपवासेन विलोभितास्ते ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ।। ९ ।।
'भूपशिरोमणे! आपकी आज्ञासे हम मानापमानका विचार छोड़कर निःशंक हो वनमें विचरते रहेंगे। पहले किसी निकटवर्ती स्थानमें रहकर दुर्योधन आदिके मनमें वहीं खोज करनेका लोभ उत्पन्न करेंगे और फिर वहाँसे दूर देशमें चले जायँगे, जिससे उन्हें हमारा पता न लग सकेगा ।। ९ ।।
संवत्सरं तत्र विहृत्य गूढं नराधमं तं सुखमुद्धरेम निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय ।। १० ।। सुयोधनायानुचरैर्वृताय ततो महीमावस धर्मराज स्वर्गोपमं देशमिमं चरद्भिः शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ।। ११ ।।
'वहाँ एक वर्षतक गुप्तरूपसे निवास करके जब हम लौटेंगे, तब अनायास ही उस नराधम दुर्योधनकी जड़ उखाड़ देंगे। नरेन्द्र! नीच दुर्योधन आज अपने अनुचरोंसे घिरकर सुखी हो रहा है। उसने जो वैरका वृक्ष लगा रखा है, उसे हम फल-फूलसहित उखाड़ फेकेंगे और उससे वैरका बदला लेंगे। अतः धर्मराज! आप यहाँसे चलकर पृथ्वीपर निवास करें। नरदेव! इसमें संदेह नहीं कि हमलोग इस स्वर्गतुल्य प्रदेशमें विचरते रहनेपर भी अपना सारा शोक अनायास ही निवृत्त कर सकते हैं ।। १०-११ ।।
कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु तत् प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां शक्यं महत् प्राप्तुमथ क्रियाश्च ।। १२ ।। इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात् कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय कृतागसां भारत निग्रहे च ।। १३ ।।
‘परंतु ऐसा होनेपर चराचर जगत्में आपकी पुण्यमयी कीर्ति नष्ट हो जायगी। इसलिये कुरुवंश-शिरोमणि अपने पूर्वजोंके उस महान् राज्यको प्राप्त करके ही हम और कोई सत्कर्म करनेयोग्य हो सकते हैं। भरतकुलभूषण महाराज! आप कुबेरसे जो सम्मान या अनुग्रह प्राप्त कर रहे हैं, इसे तो सदा ही प्राप्त कर सकते हैं। इस समय तो अपराधी शत्रुओंको मारने और दण्ड देनेका निश्चय कीजिये ।। १२-१३ ।।
तेजस्तवोग्रं न सहेत राजन् समेत्य साक्षादपि वज्रपाणिः न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ समेत्य देवैरपि धर्मराज ।। १४ ।। तवार्थसिद्धयर्थमपि प्रवृत्तौ सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता तथैव कृष्णोऽप्रतिमो बलेन तथैव चाहं नरदेववर्य ।। १५ ।। तवार्थसिद्धयर्थमभिप्रपन्नो यथैव कृष्णः सह यादवैस्तैः तथैव चाहं नरदेववर्य यमौ च वीरौ कृतिनौ प्रयोगे ।। १६ ।।
‘राजन्! साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी आपसे भिड़कर आपके भयंकर तेजको नहीं सह सकते। धर्मराज! आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये दो वीर सदा प्रयत्न करते हैं! गरुड़ध्वज भगवान् श्रीकृष्ण और शिनिके नाती वीरवर सात्यकि। ये दोनों आपके लिये देवताओंसे भी युद्ध करनेमें कभी कष्टका अनुभव नहीं करेंगे। नरदेवशिरोमणे! इन्हीं दोनोंके समान अर्जुन भी बल और पराक्रममें अपना सानी नहीं रखते। इसी प्रकार मैं भी बलमें किसीसे कम नहीं हूँ। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यादवोंके साथ आपके प्रत्येक कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत रहते हैं, उसी प्रकार मैं, अर्जुन तथा अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल वीर नकुल-सहदेव भी आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा संनद्ध रहा करते हैं ।। १४—१६ ।।
त्वदर्थयोगप्रभवप्रधानाः शमं करिष्याम परान् समेत्य ।। १६ ½ ।।
आपको धनकी प्राप्ति हो और आपका ऐश्वर्य बढ़े, यही हमारा प्रधान लक्ष्य है। अतः हमलोग शत्रुओंसे भिड़कर वैरकी शान्ति करेंगे ।। १६ ½ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा तेषां च धर्मस्य सुतो वरिष्ठः ।। १७ ।।
प्रदक्षिणं वैश्रवणाधिवासं चकार धर्मार्थविदुत्तमौजाः। आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः ॥ १८ ॥ यथागतं मार्गमवेक्षमाणः पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः। ततो महात्मा स विशुद्धबुद्धिः सम्प्राथयामास नगेन्द्रवर्यम् ॥ १९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उत्तम ओजसे सम्पन्न श्रेष्ठ महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उस समय उन सबके अभिप्रायको जानकर कुबेरके निवासस्थान उस गन्धमादन पर्वतकी प्रदक्षिणा की। फिर उन्होंने वहाँके भवनों, नदियों, सरोवरों तथा समस्त राक्षसोंसे विदा ली। इसके बाद वे जिस मार्गसे आये थे, उसकी ओर देखने लगे। तदनन्तर उन विशुद्धबुद्धि महात्मा युधिष्ठिरने पुनः गन्धमादन पर्वतकी ओर देखते हुए उस श्रेष्ठ गिरिराजसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ १७—१९ ॥
समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि- र्जित्वा सपत्नान् प्रतिलभ्य राज्यम्। शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥ २० ॥ ‘शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धिको संयममें रखनेवाला मैं शत्रुओंको जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पानेके बाद सुहृदोंके साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्याके लिये लौटनेपर आपका दर्शन करूँगा’। इस प्रकार युधिष्ठिरने निश्चय किया ॥ २० ॥
वृतश्च सर्वैरनुजैर्द्विजैश्च तेनैव मार्गेण पतिः कुरूणाम्। उवाह चैतान् गणशस्तथैव घटोत्कचः पर्वतनिर्झरेषु ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् समस्त भाइयों और ब्राह्मणोंसे घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर उसी मार्गसे नीचे उतरने लगे जहाँ दुर्गम पर्वत और झरने पड़ते थे, वहाँ घटोत्कच अपने गणोंसहित आकर पहलेकी तरह इन सबको पीठपर बिठा वहाँसे पार कर देता था ॥ २१ ॥
तान् प्रस्थितान् प्रीतमना महर्षिः पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान्। स लोमशः प्रीतमना जगाम दिवौकसां पुण्यतमं निवासम् ॥ २२ ॥
महर्षि लोमशने जब पाण्डवोंको वहाँसे प्रस्थान करते देखा, तब जिस प्रकार दयालु पिता अपने पुत्रोंको उपदेश देता है वैसे ही उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर सबको उत्तम उपदेश दिया। फिर मन-ही-मन प्रसन्नताका अनुभव करते हुए वे देवताओंके परम पवित्र स्थानको चले गये ॥ २२ ॥ तेनार्ष्टिषेणेन तथानुशिष्टा- स्तीर्थानि रम्याणि तपोवनानि महान्ति चान्यानि सरांसि पार्थाः सम्पश्यमानाः प्रययुर्नराग्र्याः ॥ २३ ॥ इसी प्रकार राजर्षि आर्ष्टिषेणने भी उन सबको उपदेश दिया। तत्पश्चात् वे नरश्रेष्ठ पाण्डव पवित्र तीर्थों, मनोहर तपोवनों और अन्य बड़े-बड़े सरोवरोंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि गन्धमादनप्रस्थाने षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें गन्धमादनसे प्रस्थानविषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७६ ॥
१७७-
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं
दिशां गजैः किन्नरपक्षिभिश्च
सुखं निवासं जहतां हि तेषां
न प्रीतिरासीद् भरतर्षभाणाम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादन अनेकानेक निर्झरोंसे सुशोभित तथा दिग्गजों, किन्नरों और पक्षियोंसे सुसेवित होनेके कारण भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ पाण्डवोंके लिये एक सुखदायक निवास था, उसे छोड़ते समय उनका मन प्रसन्न नहीं था ॥ १ ॥
ततस्तु तेषां पुनरेव हर्षः
कैलासमालोक्य महान् बभूव
कुबेरकान्तं भरतर्षभाणां
महीधरं वारिधरप्रकाशम् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् कुबेरके प्रिय भूधर कैलाशको, जो श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहा था, देखकर भरतकुलभूषण पाण्डुपुत्रोंको पुनः महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥
समुच्छ्रयान् पर्वतसंनिरोधान्
गोष्ठान् हरीणां गिरिसेतुमालाः
बहून् प्रपातांश्च समीक्ष्य वीराः
स्थलानि निम्नानि च तत्र तत्र ॥ ३ ॥
तथैव चान्यानि महावनानि
मृगद्विजानेकपसेवितानि
आलोकयन्तोऽभिययुः प्रतीता-
स्ते धन्विनः खड्गधरा नराग्र्याः ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव अपने हाथोंमें खड्ग और धनुष लिये हुए थे। वे ऊँचाई, पर्वतोंके सकरे स्थान, सिंहोंकी मादें, पर्वतीय नदियोंको पार करनेके लिये बने हुए पुल, बहुत-से झरने और नीची भूमियोंको जहाँ-तहाँ देखते हुए तथा मृग, पक्षी एवं हाथियोंसे सेवित दूसरे-दूसरे विशाल वनोंका अवलोकन करते हुए विश्वासपूर्वक आगे बढ़ने लगे ॥ ३-४ ॥
वनानि रम्याणि नदीः सरांसि गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि एते निवासाः सततं बभूवु- र्दिवानिशं प्राप्य नरर्षभाणाम् ॥ ५ ॥ पुरुषरत्न पाण्डव कभी रमणीय वनोंमें, कभी सरोवरोंके किनारे, कभी नदियोंके तटपर और कभी पर्वतोंकी छोटी-बड़ी गुफाओंमें दिन या रातके समय ठहरते जाते थे। सदा ऐसे ही स्थानोंमें उनका निवास होता था ।। ५ ।।
ते दुर्गवासं बहुधा निरुष्य व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम् आसेदुरत्यर्थमनोरमं ते तमाश्रमाग्र्यं वृषपर्वणस्तु ॥ ६ ॥ अनेक बार दुर्गम स्थानोंमें निवास करके अचिन्त्यरूप कैलासपर्वतको पीछे छोड़कर वे पुनः वृषपर्वाके अत्यन्त मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें आ पहुँचे ।। ६ ।।
समेत्य राज्ञा वृषपर्वणा ते प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहाः शशंसिरे विस्तरशः प्रवासं गिरौ यथावद् वृषपर्वणस्ते ॥ ७ ॥ वहाँ राजा वृषपर्वासे मिलकर और उनसे भलीभाँति पूजित होकर उन सबका शोक-मोह दूर हो गया। फिर उन्होंने वृषपर्वासे गन्धमादन पर्वतपर अपने रहनेके वृत्तान्तका यथार्थरूपसे एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।।
सुखोषितास्तस्य त एकरात्रं पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे अभ्याययुस्ते बदरीं विशालां सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ॥ ८ ॥ उस पवित्र आश्रममें देवता और महर्षि निवास किया करते थे। वहाँ एक रात सुखपूर्वक रहकर वे वीर पाण्डव फिर विशालापुरीके बदरिकाश्रमतीर्थमें चले आये और वहाँ बड़े आनन्दसे रहे ।। ८ ।।
ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा नारायणस्थानगताः समग्राः कुबेरकान्तां नलिनीं विशोकाः सम्पश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् वहाँ भगवान् नर-नारायणके क्षेत्रमें आकर सभी महानुभाव पाण्डवोंने सुखपूर्वक निवास किया और शोकरहित हो कुबेरकी उस प्रिय पुष्करिणीका दर्शन किया,