महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये ॥ ८८ ॥ प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे अत्यन्त दुःखद वाणीमें एक-दूसरेको पुकारते हुए इस पृथ्वीपर विचरेंगे। युगान्तकालमें संसारकी यही दशा होगी। उस समय एक ही साथ समस्त लोकोंका भयंकर संहार होगा ॥ ८६–८८ ॥
द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति । ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पुनर्लोकविवृद्धये ॥ ८९ ॥ भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया । यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती ॥ ९० ॥ एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् । कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ ९१ ॥ तदनन्तर कालान्तरमें सत्ययुगका आरम्भ होगा और फिर क्रमशः ब्राह्मण आदि वर्ण प्रकट होकर अपने प्रभावका विस्तार करेंगे। उस समय लोकके अभ्युदयके लिये पुनः अनायास दैव अनुकूल होगा। जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्य नक्षत्र एवं तदनुरूप एक राशि कर्कमें पदार्पण करेंगे, तब सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। उस समय मेघ समयपर वर्षा करेगा। नक्षत्र शुभ एवं तेजस्वी हो जायँगे ॥ ८९—९१ ॥
प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः । क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥ ९२ ॥ ग्रह प्रदक्षिणाभावसे अनुकूल गतिका आश्रय ले अपने पथपर अग्रसर होंगे। उस समय सबका मंगल होगा। देशमें सुकाल आ जायगा। आरोग्यका विस्तार होगा। तथा रोग-व्याधिका नाम भी नहीं रहेगा ॥ ९२ ॥
कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः । उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ९३ ॥ सम्भूतः सम्भलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे । (महात्मा वृत्तसम्पन्नः प्रजानां हितकृन्नृप ।) राजन्! युगान्तके समय कालकी प्रेरणासे सम्भल नामक ग्राममें किसी ब्राह्मणके मंगलमय गृहमें एक महान् शक्तिशाली बालक प्रकट होगा, जिसका नाम होगा विष्णुयशा कल्की। वह महान् बुद्धि एवं पराक्रमसे सम्पन्न महात्मा, सदाचारी तथा प्रजावर्गका हितैषी होगा। (वह बालक ही भगवान्का कल्की अवतार कहलायेगा) ॥ ९३ ॥
मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च ॥ ९४ ॥ उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च । स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति ॥ ९५ ॥
मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायँगे। वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा ॥ ९४-९५ ॥ स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति । उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९६ ॥ वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण, दुःखसे व्याप्त हुए इस जगत्को आनन्द प्रदान करेगा। कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा ॥ ९६ ॥ संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः । स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः । उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९७ ॥ वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा। वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा ॥ ९७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/२ श्लोक मिलाकर कुल ९७ ३/२ श्लोक हैं)
१९१-
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश
मार्कण्डेय उवाच
ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम् ।
वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत् कल्पयिष्यति ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय चोर-डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान् कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणको दे डालेंगे ॥ १ ॥
स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयम्भुविहिताः शुभाः ।
वनं पुण्ययशःकर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति ॥ २ ॥
उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन होंगे। वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मंगलमयी मर्यादाओंकी स्थापना करके (तपस्याके लिये) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे ॥ २ ॥
तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः ।
विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥ ३ ॥
फिर इस जगत्के निवासी मनुष्य उनके शील-स्वभावका अनुकरण करेंगे। इस प्रकार सत्ययुगमें ब्राह्मणोंद्वारा दस्युदलका विनाश हो जानेपर संसारका मंगल होगा ॥ ३ ॥
कृष्णाजिनानि शक्तींश्च त्रिशूलान्यायुधानि च ।
स्थापयन् द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥ ४ ॥
संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् ।
कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे ॥ ४-५ ॥
हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः ।
विक्रोशमानान् सुभृशं दस्यून् नेष्यति संक्षयम् ॥ ६ ॥
ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत ।
भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥ ७ ॥
उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें ‘हाय मैया’, ‘हाय बप्पा’ और ‘हाय बेटा’ इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान् कल्की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे।। ६-७।।
आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा। पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च।। ८।। यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे। ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः।। ९।। उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे।। ८-९।।
आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः। जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह।। १०।। आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी। खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे।। १०।।
सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति। नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च।। ११।। राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे। सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे।। ११।।
जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः। पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम्।। १२।। ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी। क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे।। १२।।
व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे। षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः।। १३।। शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च। सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे। ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहेंगे। क्षत्रिय बल-पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहेंगे।। १३ १/२।।
एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा।। १४।। पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः। सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव।। १५।।
धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है॥ १४-१५॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा।
वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम्॥ १६॥
राजन्! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत-भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है॥ १६॥
एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना।
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम्॥ १७॥
इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोंका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है॥ १७॥
इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत।
धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम॥ १८॥
धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो॥ १८॥
धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर।
धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति॥ १९॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने-आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है॥ १९॥
निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ।
न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन॥ २०॥
ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया।
निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ। युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है॥ २० १/२॥
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः॥ २१॥
उवाच वचनं धीमान् परं परमद्युतिः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान् कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा—॥ २१ १/२॥
कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥ कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः । ‘मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये। मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ?’ ॥ २२ ½ ॥
मार्कण्डेय उवाच
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥ सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः । चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥ मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषद्दष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो ॥ २३-२४ ॥
प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय । अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥ यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो। मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो। तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो ॥ २५ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव । एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि । तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥ सारी पृथ्विको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो ॥ २६-२७ ॥
प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः । एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥ तात! विद्वान् पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते। महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है ॥ २८ ॥
मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः । मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है। अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये ॥ २९ ॥
आशङ्क्य मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव ।
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर ।
मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण। तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो ॥ ३० १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः ॥ ३२ ॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो ।
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा ॥ ३१-३२ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥
संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना ।
विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! उन परम बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३३-३४ ॥
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः ।
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें युधिष्ठिरके लिये उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा—'ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित्का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता
वैशम्पायन उवाच
भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वक्तुमर्हसीत्यब्रवीत् पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा—'ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥
अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥ २ ॥
तब मार्कण्डेयजीने कहा—'राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो ॥ २ ॥
‘अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोद्वहः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥ ३ ॥
'अयोध्यापुरीमें इक्ष्वाकुकुलके धुरंधर वीर राजा परीक्षित् रहते थे। वे एक दिन शिकार खेलनेके लिये गये ॥ ३ ॥
तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥ ४ ॥
'उन्होंने एकमात्र अश्वकी सहायतासे एक हिंसक पशुका पीछा किया। वह पशु उन्हें बहुत दूर हटा ले गया ॥ ४ ॥
अध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्चैकस्मिन् देशे नीलं गहनं वनखण्डमपश्यत् ॥ ५ ॥
'मार्गमें उन्हें बड़ी थकावट हुई और वे भूख-प्याससे व्याकुल हो गये। उसी समय उन्हें एक ओर नीले रंगका एक दूसरा वन दिखायी दिया, जो और भी घना था ॥ ५ ॥
तच्च विवेश ततस्तस्य वनखण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत ॥ ६ ॥
'तत्पश्चात् राजाने उसके भीतर प्रवेश किया। उस वनस्थलीके मध्यभागमें एक अत्यन्त रमणीय सरोवर था। उसे देखकर राजा घोड़ेसहित सरोवरके जलमें घुस गये ॥ ६ ॥
अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वायाग्रतो निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे संविवेश । ततः शयानो मधुरं गीतमशृणोत् ॥ ७ ॥
'जल पीकर जब वे कुछ आश्वस्त हुए, तब घोड़ेके आगे कुछ कमलकी नालें डालकर स्वयं उस सरोवरके तटपर लेट गये। लेटे-ही-लेटे उनके कानोंमें कहींसे मधुर गीतकी ध्वनि सुनायी पड़ी ॥ ७ ॥
स श्रुत्वाचिन्तयन्नेह मनुष्यगतिं पश्यामि कस्य खल्वयं गीतशब्द इति ॥ ८ ॥
‘उसे सुनकर राजा सोचने लगे कि ‘यहाँ मनुष्योंकी गति तो नहीं दिखायी देती। फिर यह किसके गीतका शब्द सुनायी देता है’ ।। ८ ।।
अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च। अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत् ।। ९ ।।
‘इतनेहीमें उनकी दृष्टि एक कन्यापर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूपके कारण देखने ही योग्य थी। वह वनके फूल चुनती हुई गीत गा रही थी। धीरे-धीरे भ्रमण करती हुई वह राजाके समीप आ गयी ।। ९ ।।
तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति। सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति ।। १० ।।
‘तब राजाने उससे पूछा—‘कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं कन्या हूँ—अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है।’ तब राजाने उससे कहा—‘भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ’ ।। १० ।।
अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत्। कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति ।। ११ ।।
‘कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं।’ राजाने उससे वह शर्त पूछी। कन्याने कहा—‘मुझे कभी जलका दर्शन न कराना’ ।। ११ ।।
स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते ।। १२ ।।
‘तब राजाने उससे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उससे (गान्धर्व) विवाह किया। विवाहके पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा-विहार करने लगे और एकान्तमें मिलकर उसके साथ चुपचाप बैठे रहे ।। १२ ।।
ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ।। १३ ।।
‘राजा अभी वहीं बैठे थे, इतनेहीमें उनकी सेना आ पहुँची ।। १३ ।।
सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्थ्यातिष्ठत्। पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव-घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते ।। १४ ।।
‘वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी। अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ-सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे ।। १४ ।।
तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा-त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ।। १५ ।।
‘वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था। तब एक दिन प्रधान मन्त्रीने राजाके पास रहनेवाली स्त्रियोंसे पूछा— ।। १५ ।।
किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः ।। १६ ।। 'यहाँ तुम्हारा क्या काम है?' उनके ऐसा पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा— ।। १६ ।।
अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयत इत्यथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुपुष्प-फलमूलं तस्य मध्ये मुक्ताजालमयीं पार्श्वे वापीं गूढां सुधासलिललिप्तां स रहस्युपगम्य राजान-मब्रवीत् ।। १७ ।। 'हमें यहाँ एक अद्भुत-सी बात दिखायी देती है। महाराजके अन्तःपुरमें पानी नहीं जाने पाता है। (हमलोग इसीकी चौकसी करती हैं।)' उनकी यह बात सुनकर प्रधान मन्त्रीने एक बाग लगवाया, जिसमें प्रत्यक्षरूपसे कोई जलाशय नहीं था। उसमें बड़े सुन्दर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगवाये गये थे। वहाँ फल-फूल और कन्द-मूलकी भी बहुतायत थी। उस उपवनके मध्यभागमें एक किनारेकी ओर सुधाके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई एक बावली भी बनवायी थी, जो मोतियोंके जालसे निर्मित थी। उस बावलीको (लताओंद्वारा) बाहरसे ढक दिया गया था। उस उद्यानके तैयार हो जानेपर मन्त्रीने किसी दिन राजासे मिलकर कहा— ।। १७ ।।
वनमिदमुदारकं साध्वत्र रम्यतामिति ।। १८ ।। 'महाराज! यह वन बहुत सुन्दर है, आप इसमें भलीभाँति विहार करें' ।। १८ ।।
स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत्। स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमुक्त-कागारमपश्यत् ।। १९ ।। 'मन्त्रीके कहनेसे राजाने उसी नवविवाहिता रानीके साथ उस वनमें प्रवेश किया। एक दिन महाराज परीक्षित् उस रमणीय उद्यानमें अपनी उसी प्रियतमाके साथ विहार कर रहे थे। विहार करते-करते जब वे थक गये और भूख-प्याससे बहुत पीड़ित हो गये, तब उन्हें वासन्ती लताद्वारा निर्मित एक मनोहर मण्डप दिखायी दिया ।। १९ ।।
तत् प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधाकृतां विमलां सलिलपूर्णां वापीमपश्यत् ।। २० ।। 'उस मण्डपमें प्रियसहित प्रवेश करके राजाने सुधाके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण वह बावली देखी ।। २० ।।
दृष्ट्वैव च तां तस्याश्च तीरे सहैव तया देव्याऽवातिष्ठत् ।। २१ ।। 'उसे देखकर वे अपनी रानीके साथ उसीके तटपर खड़े हुए ।। २१ ।।
अथ तां देवीं स राजाब्रवीत् साध्ववतर वापीसलिलमिति । सा तद्वचः श्रुत्वावतीर्य वापीं न्यमज्जन्न पुनरुदमज्जत् ।। २२ ।। 'उस समय राजाने उस रानीसे कहा—'देवि! सावधानीके साथ इस बावलीके जलमें उतरो।' राजाकी यह बात सुनकर उसने बावलीमें घुसकर गोता लगाया और फिर बाहर नहीं निकली ।। २२ ।।
तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा ॥ २३ ॥
सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी स मां मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति ॥ २४ ॥
'राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी। तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया। इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा। इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि 'सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय। जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे' ॥ २३-२४ ॥
अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश । ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ २५ ॥
'इस आज्ञाके अनुसार चारों ओर मेढकोंका भयंकर संहार आरम्भ हो गया। इससे सब दिशाओंके मेढकोंके मनमें भय समा गया। वे डरकर मण्डूकराजके पास गये और उनसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया ॥ २५ ॥
ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य-गच्छदुपैत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥
'तब मण्डूकराज तपस्वीका वेष धारण करके राजाके पास गया और निकट पहुँचकर उससे इस प्रकार बोला— ॥ २६ ॥
मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामपराधिनां वधं कर्तुमिति । श्लोकौ चात्र भवतः— ॥ २७ ॥
'राजन्! आप क्रोधके वशीभूत न हों। हमपर कृपा करें। निरपराध मेढकोंका वध न करावें।' इस विषयमें ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं— ॥ २७ ॥
मा मण्डूकान् जिघांस त्वं
कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको
जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥
अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं
प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि ।
अलं कृत्वा तवाधर्मं
मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २९ ॥
'प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकोंको पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; यह अधर्म करनेसे आपको क्या लाभ है? मण्डूकोंकी हत्यासे आपको क्या मिलेगा?' ॥ २९ ॥
तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा-थोवाच ॥ ३० ॥
राजाका हृदय अपनी प्यारी रानीके विनाशके शोकसे दग्ध हो रहा था। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले मण्डूकराजसे कहा— ॥ ३० ॥
न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्धुमिति ॥ ३१ ॥
‘मैं क्षमा नहीं कर सकता। इन मेढकोंको अवश्य मारूँगा। इन दुरात्माओंने मेरी प्रियतमाको खा लिया है। अतः ये मेढक मेरे लिये सर्वथा वध्य ही हैं। विद्वन्! आप मुझे उनके वधसे न रोकें’ ॥ ३१ ॥
स तद् वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम । तस्या हि दौःशील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति ॥ ३२ ॥
‘राजाकी बात सुनकर मण्डूकराजका मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं। वह बोला—‘महाराज! प्रसन्न होइये। मेरा नाम आयु है। मैं मेढकोंका राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है। उसका नाम सुशोभना है। वह आपको छोड़कर चली गयी, यह उसकी दुष्टता है। उसने पहले भी बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है’ ॥ ३२ ॥
तमब्रवीद् राजा तया समर्थी सा मे दीयतामिति ॥ ३३ ॥
तब राजाने मण्डूकराजसे कहा—‘मैं तुम्हारी उस पुत्रीको चाहता हूँ, उसे मुझे समर्पित कर दो’ ॥ ३३ ॥
अथैनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥ ३४ ॥
स एवमुक्त्वा दुहितरं क्रुद्धः शशाप यस्मात् त्वया राजानो विप्रलब्धा बहवस्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यानृतिकत्वात् तवेति ॥ ३५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1334)
‘तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षित्को समर्पित कर दी और उससे कहा—‘बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना।’ ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा—‘अरी! तूने बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है’ ।। ३४-३५ ।।
स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण-निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षेण बाष्प-कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद-नुगृहीतोऽस्मीति ।। ३६ ।।
‘सुशोभनाके रतिकलासम्बन्धी गुणोंने राजाके मनको बाँध लिया था। वे उसे पाकर ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्हें तीनों लोकोंका राज्य मिल गया हो। उन्होंने आनन्दके आँसू बहाते हुए मण्डूकराजको प्रणाम किया और उसका यथोचित सत्कार करते हुए हर्षगदगद वाणीमें कहा—‘मण्डूकराज! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की है’ ।।
स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ।। ३७ ।।
‘तत्पश्चात् कन्यासे विदा लेकर मण्डूकराज जैसे आया था, वैसे ही अपने स्थानको चला गया ।। ३७ ।।
अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय-स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति । तत-स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम ।। ३८ ।।
‘कुछ कालके पश्चात् सुशोभनाके गर्भसे राजा परीक्षित्के तीन पुत्र हुए—शल, दल और बल। इनमें शल सबसे बड़ा था। समय आनेपर पिताने शलका राज्याभिषेक करके स्वयं तपस्यामें मन लगाये तपोवनको प्रस्थान किया ।। ३८ ।।
अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ।। ३९ ।।
सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत् ।। ४० ।।
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति । ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति । स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव-शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे । ततः पुनः स राजा खड्गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति । स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति ।। ४१ ।।
‘तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा—‘शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ’। उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला—‘महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें। यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता। यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते।’ यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा
—‘सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा।’ राजाके ऐसा कहनेपर सारथि भयसे काँप उठा। उधर घोड़ोंका परिचय देनेपर उसे वामदेव ऋषिके शापका भी डर था। अतः उसने राजासे कुछ नहीं कहा। तब राजाने पुनः तलवार उठाकर कहा—‘अरे! शीघ्र बता, नहीं तो तुझे अभी मार डालूँगा।’ तब उसने राजाके भयसे त्रस्त होकर कहा—‘महाराज! वामदेव मुनिके पास दो घोड़े हैं जिन्हें ‘वाम्य’ कहते हैं। वे मनके समान वेगशाली हैं’ ।। ३९—४१ ।।
अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत् ।। ४२ ।।
‘सारथिके ऐसा कहनेपर राजाने उसे आज्ञा दी, ‘चलो वामदेवके आश्रमपर।’ वामदेवके आश्रमपर पहुँचकर राजाने उन महर्षिसे कहा— ।। ४२ ।।
भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति । तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति । स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत् सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत् ।। ४३ ।।
‘भगवन्! मेरे बाणोंसे घायल हुआ हिंसक पशु भागा जा रहा है। आप अपने वाम्य अश्व मुझे देनेकी कृपा करें।’ तब महर्षिने कहा—‘मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ। परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनों अश्व मुझे ही लौटा देना।’ राजाने दोनों अश्व पाकर ऋषिकी आज्ञा ले वहाँसे प्रस्थान किया। वामी घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा हिंसक पशुका पीछा करते हुए वे सारथिसे बोले—‘सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणोंके पास रहने योग्य नहीं। अतः इन्हें वामदेवके पास लौटानेकी आवश्यकता नहीं है।’ ऐसा कहकर राजा हिंसक पशुको साथ ले अपनी राजधानीको चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वोंको अन्तःपुरमें बाँध दिया ।। ४३ ।।
अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यात्यत्यहो कष्टमिति ।। ४४ ।।
उधर वामदेव मुनि मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—‘अहो! वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ोंको लेकर मौज कर रहा है, उन्हें लौटानेका नाम ही नहीं लेता है। यह तो बड़े कष्टकी बात है!’ ।। ४४ ।।
स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् ।। ४५ ।।
गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यात्यो-पाध्यायवाम्याविति । स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राजामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वैः कार्यं साधु गम्यताम् ।। ४६ ।।
‘मन-ही-मन सोच-विचार करते हुए जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्यसे बोले—‘आत्रेय! जाकर राजासे कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरुजीके दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये।’ शिष्यने जाकर राजासे यही बात दोहरायी। तब राजाने उसे उत्तर देते हुए कहा—‘यह सवारी राजाओंके योग्य है। ब्राह्मणोंको ऐसे रत्न रखनेका अधिकार नहीं है। भला, ब्राह्मणोंको घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिये’ ॥ ४५-४६ ॥
स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा ॥ ४७ ॥
‘शिष्यने लौटकर ये सारी बातें उपाध्यायसे कहीं। वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-मन क्रोधसे जल उठे और स्वयं ही उस राजाके पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देनेके लिये कहा। परंतु राजाने वे घोड़े नहीं दिये’ ॥ ४७ ॥
वामदेव उवाच
प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम् । मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै- र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥
**तब वामदेवने कहा—**राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें ॥ ४८ ॥
राजोवाच
अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता- वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव । ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४९ ॥
**राजा बोले—**वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभावके सीखे-सिखाये हृष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; ये ही ब्राह्मणोंके लिये उचित वाहन हो सकते हैं। अतः महर्षे! इन्हींको गाड़ीमें जोतकर आप जहाँ चाहें जायें। आप-जैसे महात्माका भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं ॥ ४९ ॥
वामदेव उवाच
छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति
लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति । अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत- दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥ वामदेवने कहा— राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हम-जैसे लोगोंके लिये वेदके मन्त्र ही वाहनका काम देते हैं। परंतु वे परलोकमें ही उपलब्ध होते हैं। इस लोकमें तो हम-जैसे लोगोंके तथा दूसरोंके लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं ॥ ५० ॥
राजोवाच
चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः । तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥ राजाने कहा— ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जातिकी खच्चरियाँ या वायुके समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारीके लिये प्रस्तुत हो सकते हैं। इन्हीं वाहनोंद्वारा आप यात्रा करें। यह वाहन, जिसे आप माँगने आये हैं, क्षत्रिय नरेशके ही योग्य हैं। इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं ॥ ५१ ॥
वामदेव उवाच
घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु- रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः । अयस्मया घोररूपा महान्त- श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः । मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥ वामदेव बोले— राजन्! तुम ब्राह्मणोंके इस धनको हड़पकर जो अपने उपयोगमें लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया है। यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह-शरीरवाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े-बड़े राक्षस हाथोंमें तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वधकी इच्छासे टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीरके चार टुकड़े करके उठा ले जायँगे ॥ ५२ ॥
राजोवाच
ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा । ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु
मद्वाक्यनुन्नाःशितशूलासिहस्ताः ॥ ५३ ॥
राजाने कहा— वामदेवजी! आप ब्राह्मण हैं तो भी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मुझे मारनेको उद्यत हैं, इसका पता हमारे जिन सेवकोंको चल गया है, वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथोंमें तीखे त्रिशूल तथा तलवार लेकर शिष्योंसहित आपको पहले ही यहाँ मार गिरावेंगे ॥ ५३ ॥
वामदेव उवाच
ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन्
पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम् ।
प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ
यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥ ५४ ॥
वामदेव बोले— राजन्! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी मैं इन्हें पुनः लौटा दूँगा। ऐसी दशामें यदि अपने-आपको तुम जीवित रखना चाहते हो तो मेरे दोनों वाम्यसंज्ञक घोड़े वापस दे दो ॥ ५४ ॥
राजोवाच
न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता
न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम् ।
तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ५५ ॥
राजा बोले— ब्रह्मन्! (ये घोड़े शिकारके उपयोग में आने योग्य हैं और) ब्राह्मणोंके लिये शिकार खेलनेकी विधि नहीं है। यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूँगा और आजसे आपके सारे आदेशोंका पालन करूँगा, जिससे मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो (परन्तु ये घोड़े आपको नहीं मिल सकते) ॥ ५५ ॥
वामदेव उवाच
नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां-
स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥ ५६ ॥
वामदेवने कहा— राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता। जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ॥ ५६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्ते वामदेवेन राजन् समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः । तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! वामदेवकी यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये। उनके हाथमें त्रिशूल थे। जब वे राजापर चोट करने लगे, तब राजाने उच्च स्वरसे यह बात कही— ॥ ५७ ॥
इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु- र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि । नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥ ‘यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके-जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं’ ॥ ५८ ॥
एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै- र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः । ततो विदित्वा नृपतिं निपातित- मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५९ ॥ ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसोंसे मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये। इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दलका राज्याभिषेक कर दिया ॥ ५९ ॥
राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः । दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय- मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥ तब पुनः उस राज्यमें जाकर विप्रवर वामदेवने राजा दलसे यह बात कही—‘महाराज! ब्राह्मणोंकी वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मोंमें देखी गयी है ॥ ६० ॥
बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ । एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥ ‘नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वोंको लौटा दो।’ वामदेवकी यह बात सुनकर राजाने रोषपूर्वक अपने सारथिसे कहा— ॥ ६१ ॥