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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

हंसके समान मधुर स्वरमें बोलनेवाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए सारी रात उनका मनोरंजन किया ।। ४६ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पुरवासियोंके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।

अध्याय (पृष्ठ 37)

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द्वितीयोऽध्यायः

धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

प्रभातायां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! जब रात बीती और प्रभातका उदय हुआ तथा अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डव वनकी ओर जानेके लिये उद्यत हुए, उस समय भिक्षान्नभोजी ब्राह्मण साथ चलनेके लिये उनके सामने खड़े हो गये ॥ १ ॥

तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः ॥ २ ॥
फलमूलाशनहारा वनं गच्छाम दुःखिताः ।
वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम् ॥ ३ ॥
तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा—'ब्राह्मणो! हमारा राज्य, लक्ष्मी और सर्वस्व जूएमें हरण कर लिया गया है। हम फल, मूल तथा अन्नके आहार-पर रहनेका निश्चय करके दुःखी होकर वनमें जा रहे हैं। वनमें बहुत-से दोष हैं। वहाँ सर्प-बिच्छू आदि असंख्य भयंकर जन्तु हैं ॥ २-३ ॥

परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति ।
ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत् ।
किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः ॥ ४ ॥
'मैं समझता हूँ, वहाँ आपलोगोंको अवश्य ही महान् कष्टका सामना करना पड़ेगा। ब्राह्मणोंको दिया हुआ क्लेश तो देवताओंका भी विनाश कर सकता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है? अतः ब्राह्मणो! आपलोग यहाँसे अपने अभीष्ट स्थानको लौट जायें' ॥ ४ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः

गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः ।
नार्हस्यस्मान् परित्यक्तुं भक्तान् सद्धर्मदर्शिनः ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंने कहा— राजन्! आपकी जो गति होगी उसे भुगतनेके लिये हम भी उद्यत हैं। हम आपके भक्त तथा उत्तम धर्मपर दृष्टि रखनेवाले हैं। इसलिये आपको हमारा परित्याग नहीं करना चाहिये ॥ ५ ॥

अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते । विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचारावलम्बिषु ॥ ६ ॥ देवता भी अपने भक्तोंपर विशेषतः सदाचारपरायण ब्राह्मणोंपर तो अवश्य ही दया करते हैं ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर उवाच ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः । सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम् ॥ ७ ॥ आहरेयुरिमे येऽपि फलमूलमधूनि च । त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर बोले— विप्रगण! मेरे मनमें भी ब्राह्मणोंके प्रति उत्तम भक्ति है, किंतु यह सब प्रकारके सहायक साधनोंका अभाव ही मुझे दुःखमग्न-सा किये देता है। जो फल-मूल एवं शहद आदि आहार जुटाकर ला सकते थे वे ही ये मेरे भाई शोकजनित दुःखसे मोहित हो रहे हैं ॥ ७-८ ॥ द्रौपद्या विप्रकर्षेण राज्यापहरणेन च । दुःखार्दितानिमान् क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे ॥ ९ ॥ द्रौपदीके अपमान तथा राज्यके अपहरणके कारण ये दुःखसे पीडित हो रहे हैं, अतः मैं इन्हें (आहार जुटानेका आदेश देकर) अधिक क्लेशमें नहीं डालना चाहता ॥ ९ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत् ते हृदि पार्थिव । स्वयमाहृत्य चान्नानि त्वानुयास्यामहे वयम् ॥ १० ॥ ब्राह्मण बोले— पृथ्वीनाथ! आपके हृदयमें हमारे पालन-पोषणकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। हम स्वयं ही अपने लिये अन्न आदिकी व्यवस्था करके आपके साथ चलेंगे ॥ १० ॥ अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव । कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह रंस्यामहे वयम् ॥ ११ ॥ हम आपके अभीष्टचिन्तन और जपके द्वारा आपका कल्याण करेंगे तथा आपको सुन्दर-सुन्दर कथाएँ सुनाकर आपके साथ ही प्रसन्नतापूर्वक वनमें विचरेंगे ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच एवमेतन्न संदेहो रमेऽहं सततं द्विजैः । न्यूनभावात् तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मनः ॥ १२ ॥

युधिष्ठिरने कहा—महात्माओ! आपका कहना ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि मैं सदा ब्राह्मणोंके साथ रहनेमें ही प्रसन्नताका अनुभव करता हूँ, किंतु इस समय धन आदिसे हीन होनेके कारण मैं देख रहा हूँ कि मेरे लिये यह अपकीर्तिकी-सी बात है ।। १२ ।।
कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान् स्वयमाहृतभोजनान् ।
मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान् धिक् पापान् धृतराष्ट्रजान् ।। १३ ।।
आप सब लोग स्वयं ही आहार जुटाकर भोजन करें, यह मैं कैसे देख सकूँगा? आपलोग कष्ट भोगनेके योग्य नहीं हैं, तो भी मेरे प्रति स्नेह होनेके कारण इतना क्लेश उठा रहे हैं। धृतराष्ट्रके पापी पुत्रोंको धिक्कार है ।। १३ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा स नृपः शोचन् निषसाद महीतले ।
तमध्यात्मरतो विद्वान् शौनको नाम वै द्विजः ।। १४ ।।
योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमब्रवीत् ।। १५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इतना कहकर धर्मराज युधिष्ठिर शोकमग्न हो चुपचाप पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय अध्यात्मविषयमें रत अर्थात् परमात्म-चिन्तनमें तत्पर विद्वान् ब्राह्मण शौनकनै, जो कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनों ही निष्ठाओंके विचारमें प्रवीण थे, राजासे इस प्रकार कहा— ।। १४–१५ ।।
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।। १६ ।।
‘शोकके सहस्रों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे मूढ़ मनुष्यपर प्रतिदिन अपना प्रभाव डालते हैं; परंतु ज्ञानी पुरुषपर वे प्रभाव नहीं डाल सकते ।। १६ ।।
न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु ।
श्रेयोघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ।। १७ ।।
‘अनेक दोषोंसे युक्त, ज्ञानविरुद्ध एवं कल्याणनाशक कर्मोंमें आप-जैसे ज्ञानवान् पुरुष नहीं फँसते हैं ।। १७ ।।
अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम् ।
श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन् सा त्वय्यवस्थिता ।। १८ ।।
‘राजन्! योगके आठ अंग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधिसे सम्पन्न, समस्त अमंगलोंका नाश करनेवाली तथा श्रुतियों और स्मृतियोंके स्वाध्यायसे भलीभाँति दृढ़ की हुई जो उत्तम बुद्धि कही गयी है, वह आपमें स्थित है ।। १८ ।।
अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च ।
शारीरमानसैर्दुःखैर्न सीदन्ति भवद्विधाः ।। १९ ।।

'अर्थसंकट, दुस्तर दुःख तथा स्वजनोंपर आयी हुई विपत्तियोंमें आप-जैसे ज्ञानी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीडित नहीं होते ।। १९ ।। श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा । आत्मव्यवस्थानाकरा गीताः श्लोका महात्मना ।। २० ।। 'पूर्वकालमें महात्मा राजा जनकने अन्तःकरणको स्थिर करनेवाले कुछ श्लोकोंका गान किया था। मैं उन श्लोकोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनिये— ।। २० ।। मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् । तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु ।। २१ ।। 'सारा जगत् मानसिक और शारीरिक दुःखोंसे पीडित है। उन दोनों प्रकारके दुःखोंकी शान्तिका यह उपाय संक्षेप और विस्तारसे सुनिये ।। २१ ।। व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात् । दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते ।। २२ ।। 'रोग, अप्रिय घटनाओंकी प्राप्ति, अधिक परिश्रम तथा प्रिय वस्तुओंका वियोग—इन चार कारणोंसे शारीरिक दुःख प्राप्त होता है ।। २२ ।। तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् । आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु ।। २३ ।। 'समयपर इन चारों कारणोंका प्रतीकार करना एवं कभी भी उसका चिन्तन न करना—ये दो क्रियायोग (दुःखनिवारक उपाय) हैं। इन्हींसे आधि-व्याधिकी शान्ति होती है ।। २३ ।। मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते । मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम् ।। २४ ।। 'अतः बुद्धिमान् तथा विद्वान् पुरुष प्रिय वचन बोलकर तथा हितकर भोगोंकी प्राप्ति कराकर पहले मनुष्योंके मानसिक दुःखोंका ही निवारण किया करते हैं ।। २४ ।। मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते । अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् ।। २५ ।। 'क्योंकि मनमें दुःख होनेपर शरीर भी संतप्त होने लगता है; ठीक वैसे ही, जैसे तपाया हुआ लोहेका गोला डाल देनेपर घड़ेमें रखा हुआ शीतल जल भी गरम हो जाता है ।। २५ ।। मानसं शमयेत् तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना । प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शरीरमुपशाम्यति ।। २६ ।। 'इसलिये जलसे अग्निको शान्त करनेकी भाँति ज्ञानके द्वारा मानसिक दुःखको शान्त करना चाहिये। मनका दुःख मिट जानेपर मनुष्यके शरीरका दुःख भी दूर हो जाता है ।। २६ ।।

मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते । स्नेहात् तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ॥ २७ ॥ ‘मनके दुःखका मूल कारण क्या है? इसका पता लगानेपर ‘स्नेह’ (संसारमें आसक्ति)-की ही उपलब्धि होती है। इसी स्नेहके कारण ही जीव कहीं आसक्त होता और दुःख पाता है ॥ २७ ॥

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च । शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥ २८ ॥ स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा । अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥ २९ ॥ ‘दुःखका मूल कारण है आसक्ति। आसक्तिसे ही भय होता है। शोक, हर्ष तथा क्लेश—इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है। आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं। ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ॥ २८-२९ ॥

कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत् । धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत् ॥ ३० ॥ ‘जैसे खोखलेमें लगी हुई आग सम्पूर्ण वृक्षको जड़-मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार विषयोंके प्रति थोड़ी-सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनोंका नाश कर देती है ॥ ३० ॥

विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे । विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः ॥ ३१ ॥ ‘विषयोंके प्राप्त न होनेपर जो उनका त्याग करता है, वह त्यागी नहीं है; अपितु जो विषयोंके प्राप्त होनेपर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है, वस्तुतः वही त्यागी है—वही वैराग्यको प्राप्त होता है। उसके मनमें किसीके प्रति द्वेषभाव न होनेके कारण वह निर्वैर तथा बन्धनमुक्त होता है ॥ ३१ ॥

तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् । स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥ ३२ ॥ ‘इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह (आसक्ति) न करे। अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे ॥ ३२ ॥

ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु । न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ॥ ३३ ॥ ‘जो ज्ञानी, योगयुक्त, शास्त्रज्ञ तथा मनको वशमें रखनेवाले हैं, उनपर आसक्तिका प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता, जैसे कमलके पत्तेपर जल नहीं ठहरता ॥ ३३ ॥

रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।

इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥ ३४ ॥
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता ।
अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥ ३५ ॥
'रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है। तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है। तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है। उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है। वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है ॥ ३४-३५ ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ ३६ ॥
'खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, जो शरीरके जरासे जीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग बताया गया है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ॥ ३६ ॥

अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् ।
विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः ॥ ३७ ॥
'यह तृष्णा यद्यपि मनुष्योंके शरीरके भीतर ही रहती है, तो भी इसका कहीं आदि-अन्त नहीं है। लोहेके पिण्डकी आगके समान यह तृष्णा प्राणियोंका विनाश कर देती है ॥ ३७ ॥

यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति ।
तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति ॥ ३८ ॥
'जैसे काष्ठ अपनेसे ही उत्पन्न हुई आगसे जलकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार जिसका मन वशमें नहीं है, वह मनुष्य अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए लोभके द्वारा स्वयं नष्ट हो जाता है ॥ ३८ ॥

राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि ।
भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥ ३९ ॥
'धनवान् मनुष्योंको राजा, जल, अग्नि, चोर तथा स्वजनोंसे भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है, जैसे सब प्राणियोंको मृत्युसे ॥ ३९ ॥

यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि ।
भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ ४० ॥
'जैसे मांसके टुकड़ेको आकाशमें पक्षी, पृथ्वीपर हिंस्र जन्तु तथा जलमें मछलियाँ खा जाती हैं, उसी प्रकार धनवान् पुरुषको सब लोग सर्वत्र नोचते रहते हैं ॥ ४० ॥

अर्थ एव हि केषांचिदनर्थं भजते नृणाम् ।
अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नरः ॥ ४१ ॥

'कितने ही मनुष्योंके लिये अर्थ ही अनर्थका कारण बन जाता है; क्योंकि अर्थद्वारा सिद्ध होनेवाले श्रेय (सांसारिक भोग)-में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याणको नहीं प्राप्त होता ।। ४१ ।। तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः । कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ।। ४२ ।। अर्थजानि विदुः प्राज्ञाः दुःखान्येतानि देहिनाम् । अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ।। ४३ ।। सहन्ति च महद् दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् । अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ।। ४४ ।। 'इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं। कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है। धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक-दूसरेको मार डालते हैं। धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रु का-सा काम करता है* ।। ४२—४४ ।। दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत् । असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ।। ४५ ।। 'धनकी प्राप्ति भी दुःखसे ही होती है। इसलिये उसका चिन्तन न करे; क्योंकि धनकी चिन्ता करना अपना नाश करना है। मूर्ख मनुष्य सदा असंतुष्ट रहते हैं और विद्वान् पुरुष संतुष्ट ।। ४५ ।। अन्तो नास्ति पिपासायाः संतोषः परमं सुखम् । तस्मात् संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ।। ४६ ।। 'धनकी प्यास कभी बुझती नहीं है; अतः संतोष ही परम सुख है। इसीलिये ज्ञानीजन संतोषको ही सबसे उत्तम समझते हैं ।। ४६ ।। अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः । ऐश्वर्यं प्रियसैंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ।। ४७ ।। 'यौवन, रूप, जीवन, रत्नोंका संग्रह, ऐश्वर्य तथा प्रियजनोंका एकत्र निवास—ये सभी अनित्य हैं; अतः विद्वान् पुरुष उनकी अभिलाषा न करे ।। ४७ ।। त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान् क्लेशान् सहेत च । न हि संचयवान् कश्चिद् दृश्यते निरुपद्रवः । अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते ।। ४८ ।। 'इसलिये धन-संग्रहका त्याग करे और उसके त्यागसे जो क्लेश हो, उसे धैर्यपूर्वक सह ले। जिनके पास धनका संग्रह है, ऐसा कोई भी मनुष्य उपद्रवरहित नहीं देखा जाता। अतः

धर्मात्मा पुरुष उसी धनकी प्रशंसा करते हैं जो दैवेच्छासे न्यायपूर्वक स्वतः प्राप्त हो गया हो ॥ ४८ ॥

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता ।
प्रक्षालनाद्धि पंकस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम् ॥ ४९ ॥
‘जो धर्म करनेके लिये धनोपार्जनकी इच्छा करता है उसका धनकी इच्छा न करना ही अच्छा है। कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा मनुष्योंके लिये उसका स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ है ॥ ४९ ॥

युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि ।
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥ ५० ॥
‘युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है। यदि आपको धर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें’ ॥ ५० ॥

युधिष्ठिर उवाच

नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम ।
भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन् काङ्क्षे न लोभतः ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— ब्रह्मन्! मैं जो धन चाहता हूँ वह इसलिये नहीं कि मुझे धनसम्बन्धी भोग भोगनेकी इच्छा है। मैं तो ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये ही धनकी इच्छा रखता हूँ, लोभवश नहीं ॥ ५१ ॥

कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् वर्तमानो गृहाश्रमे ।
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥ ५२ ॥
विप्रवर! गृहस्थ-आश्रममें रहनेवाला मेरे-जैसा पुरुष अपने अनुयायियोंका भरण-पोषण भी न करे, यह कैसे उचित हो सकता है? ॥ ५२ ॥

संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते ।
तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥ ५३ ॥
गृहस्थके भोजनमें देवता, पितर, मनुष्य एवं समस्त प्राणियोंका हिस्सा देखा जाता है। गृहस्थका यह धर्म है कि वह अपने हाथसे भोजन न बनानेवाले संन्यासी आदिको अवश्य पका-पकाया अन्न दे ॥ ५३ ॥

तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ५४ ॥
आसनके लिये तृण (कुश), बैठनेके लिये स्थान, जल और चौथी मधुर वाणी, सत्पुरुषोंके घरमें इन चार वस्तुओंका अभाव कभी नहीं होता ॥ ५४ ॥

देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम् ।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥ ५५ ॥

रोग आदिसे पीड़ित मनुष्यको सोनेके लिये शय्या, थके-माँदे हुएको बैठनेके लिये आसन, प्यासेको पानी और भूखेको भोजन तो देना ही चाहिये ॥ ५५ ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्यात् सुभाषिताम् ।
उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः ।
प्रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम् ॥ ५६ ॥
जो अपने घरपर आ जाय, उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे, मनसे उसके प्रति उत्तम भाव रखे, उससे मीठे वचन बोले और उठकर उसके लिये आसन दे। यह गृहस्थका सनातन धर्म है। अतिथिको आते देख उठकर उसकी अगवानी और यथोचित रीतिसे उसका आदर-सत्कार करे ॥ ५६ ॥

अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः ।
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः ॥ ५७ ॥
यदि गृहस्थ मनुष्य अग्निहोत्र, साँड, जाति-भाई, अतिथि-अभ्यागत, बन्धु-बान्धव, स्त्री-पुत्र तथा भृत्यजनोंका आदर-सत्कार न करे तो वे अपनी क्रोधाग्निसे उसे जला सकते हैं ॥ ५७ ॥

आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत् पशून् ।
न च तत् स्वयमश्रीयाद् विधिवद् यन्न निर्वपेत् ॥ ५८ ॥
केवल अपने लिये अन्न न पकावे (देवता-पितरों एवं अतिथियोंके उद्देश्यसे ही भोजन बनानेका विधान है), निकम्मे पशुओंकी भी हिंसा न करे और जिस वस्तुको विधिपूर्वक देवता आदिके लिये अर्पित न करे, उसे स्वयं भी न खाय ॥ ५८ ॥

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि ।
वैश्वदेवं हि नामैतत् सायं प्रातश्च दीयते ॥ ५९ ॥
कुत्तों, चाण्डालों और कौवोंके लिये पृथ्वीपर अन्न डाल दे। यह वैश्वदेव नामक महान् यज्ञ है, जिसका अनुष्ठान प्रातःकाल और सायंकालमें भी किया जाता है ॥ ५९ ॥

विघसाशी भवेत् तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः ।
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ ६० ॥
अतः गृहस्थ मनुष्य प्रतिदिन विघस एवं अमृत भोजन करे। घरके सब लोगोंके भोजन कर लेनेपर जो अन्न शेष रह जाय उसे ‘विघस’ कहते हैं तथा बलि-वैश्वदेवसे बचे हुए अन्नका नाम ‘अमृत’ है ॥ ६० ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६१ ॥
अतिथिको नेत्र दे (उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे), मन दे (मनसे हित-चिन्तन करे) तथा मधुर वाणी प्रदान करे (सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे)। जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक

उसके पीछे-पीछे जाय और जबतक वह घरपर रहे तबतक उसके पास बैठे (उसकी सेवामें लगा रहे)। यह पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त अतिथि-यज्ञ है ॥ ६१ ॥

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते ।
श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत् ॥ ६२ ॥
जो गृहस्थ अपरिचित थके-माँदे पथिकको प्रसन्नतापूर्वक भोजन देता है, उसे महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ ६२ ॥

एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे ।
तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे ॥ ६३ ॥
ब्रह्मन्! जो गृहस्थ इस वृत्तिसे रहता है, उसके लिये उत्तम धर्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, अथवा इस विषयमें आपकी क्या सम्मति है? ॥ ६३ ॥

शौनक उवाच

अहो बत महत् कष्टं विपरीतमिदं जगत् ।
येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति ॥ ६४ ॥
शौनकजीने कहा— अहो! बहुत दुःखकी बात है, इस जगत्में विपरीत बातें दिखायी देती हैं। साधु पुरुष जिस कर्मसे लज्जित होते हैं, दुष्ट मनुष्योंको उसीसे प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ ६४ ॥

शिश्रोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु ।
मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः ॥ ६५ ॥
अज्ञानी मनुष्य अपनी जननेन्द्रिय तथा उदरकी तृप्तिके लिये मोह एवं रागके वशीभूत हो विषयोंका अनुसरण करता हुआ नाना प्रकारकी विषय-सामग्रीको यज्ञावशेष मानकर उसका संग्रह करता है ॥ ६५ ॥

ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हरिभिरिन्द्रियैः ।
विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भ्रान्तैरिव सारथिः ॥ ६६ ॥
समझदार मनुष्य भी मनको हर लेनेवाली इन्द्रियोंद्वारा विषयोंकी ओर खींच लिया जाता है। उस समय उसकी विचारशक्ति मोहित हो जाती है। जैसे दुष्ट घोड़े वशमें न होनेपर सारथिको कुमार्गमें घसीट ले जाते हैं, यही दशा उस अजितेन्द्रिय पुरुषकी भी होती है ॥ ६६ ॥

षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा ।
तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मनः ॥ ६७ ॥
जब मन और पाँचों इन्द्रियाँ अपने विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, उस समय प्राणियोंके पूर्वसंकल्पके अनुसार उसीकी वासनासे वासित मन विचलित हो उठता है ॥ ६७ ॥

मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान् याति सेवितुम् ।

तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते ॥ ६८ ॥ मन जिस इन्द्रियके विषयोंका सेवन करने जाता है, उसीमें उस विषयके प्रति उत्सुकता भर जाती है और वह इन्द्रिय उस विषयके उपभोगमें प्रवृत्त हो जाती है ॥ ६८ ॥ ततः संकल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः । विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात् पतङ्गवत् ॥ ६९ ॥ तदनन्तर संकल्प ही जिसका बीज है, उस कामके द्वारा विषयरूपी बाणोंसे बिंधकर मनुष्य ज्योतिके लोभसे पतंगकी भाँति लोभकी आगमें गिर पड़ता है ॥ ६९ ॥ ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया । महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते ॥ ७० ॥ इसके बाद इच्छानुसार आहार-विहारसे मोहित हो महामोहमय सुखमें निमग्न रहकर वह मनुष्य अपने आत्माके ज्ञानसे वंचित हो जाता है ॥ ७० ॥ एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु । अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥ ७१ ॥ इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है ॥ ७१ ॥ ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते । जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः ॥ ७२ ॥ फिर तो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियोंमें तथा जल, भूमि और आकाशमें वह मनुष्य बारंबार जन्म लेकर चक्कर लगाता रहता है ॥ ७२ ॥ अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु । ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरत्तयो जनाः ॥ ७३ ॥ यह अविवेकी पुरुषोंकी गति बतायी गयी है। अब आप मुझसे विवेकी पुरुषोंकी गतिका वर्णन सुनें। जो धर्म एवं कल्याणमार्गमें तत्पर हैं और मोक्षके विषयमें जिनका निरन्तर अनुराग है, वे विवेकी हैं ॥ ७३ ॥ तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७४ ॥ वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोंका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ७४ ॥ इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ७५ ॥ यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग—ये धर्मके आठ मार्ग हैं ॥ ७५ ॥ अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः ।

कर्तव्यमिति यत् कार्यं नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७६ ॥ इनमें पहले बताये हुए चार धर्म पितृयानके मार्गमें स्थित हैं; अर्थात् इन चारोंका सकामभावसे अनुष्ठान करनेपर ये पितृयानमार्गसे ले जाते हैं। अग्निहोत्र और संध्योपासनादि जो अवश्य करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य-बुद्धिसे ही अभिमान छोड़कर करे ॥ ७६ ॥

उत्तरो देवयानस्तु सद्भि‍राचरितः सदा । अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ॥ ७७ ॥ अन्तिम चार धर्मोंको देवयानमार्गका स्वरूप बताया गया है। साधु पुरुष सदा उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। आगे बताये जानेवाले आठ अंगोंसे युक्त मार्गद्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके कर्तव्य-कर्मोंका कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होकर पालन करे ॥ ७७ ॥

सम्यक्संकल्पसम्बन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् । सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥ ७८ ॥ सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् । सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥ ७९ ॥ पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ॥ ७८-७९ ॥

एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः । रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः ॥ ८० ॥ संसारको जीतनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् पुरुष इसी प्रकार राग-द्वेषसे मुक्त होकर कर्म करते हैं। इन्हीं नियमोंके पालनसे देवतालोग ऐश्वर्यको प्राप्त हुए हैं ॥ ८० ॥

रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ । योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः ॥ ८१ ॥ रुद्र, साध्य, आदित्य, वसु तथा दोनों अश्विनीकुमार योगजनित ऐश्वर्यसे युक्त होकर इन प्रजाजनोंका धारण-पोषण करते हैं ॥ ८१ ॥

तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम् । तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत ॥ ८२ ॥ कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें करके तपस्याद्वारा सिद्धि तथा योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी चेष्टा कीजिये ॥ ८२ ॥

पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते ।

तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै ॥ ८३ ॥ यज्ञ, युद्धादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि पितृ-मातृमयी (परलोक और इहलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाली) है, जो आपको प्राप्त हो चुकी है। अब तपस्याद्वारा वह योगसिद्धि प्राप्त करनेका प्रयत्न कीजिये जिससे ब्राह्मणोंका भरण-पोषण हो सके ॥ ८३ ॥

सिद्धा हि यद् यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात् ।
तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम् ॥ ८४ ॥
सिद्ध पुरुष जो-जो वस्तु चाहते हैं, उसे अपने तपके प्रभावसे प्राप्त कर लेते हैं। अतः आप तपस्याका आश्रय लेकर अपने मनोरथकी पूर्ति कीजिये ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पाण्डवोंका प्रव्रजन (वनगमन)-विषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥


* धनके लोभसे मनुष्य धनके रक्षककी हत्या कर डालते हैं।

अध्याय (पृष्ठ 50)

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तृतीयोऽध्यायः

युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच

शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शौनकके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने पुरोहितके पास आकर भाइयोंके बीचमें इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः ॥ २ ॥
‘विप्रवर! ये वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण मेरे साथ वनमें चल रहे हैं। परंतु मैं इनका पालन-पोषण करनेमें असमर्थ हूँ, यह सोचकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है ॥ २ ॥

परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे ।
कथमत्र मया कार्यं तद् ब्रूहि भगवन् मम ॥ ३ ॥
‘भगवन्! मैं इन सबका त्याग नहीं कर सकता; परंतु इस समय मुझमें इन्हें अन्न देनेकी शक्ति नहीं है। ऐसी अवस्थामें मुझे क्या करना चाहिये? यह कृपा करके बताइये’ ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम् ।
युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धौम्य मुनिने युधिष्ठिरका प्रश्न सुनकर दो घड़ीतक ध्यान-सा लगाया और धर्मपूर्वक उस उपायका अन्वेषण करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥

धौम्य उवाच

पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम् ।
ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा ॥ ५ ॥
गत्त्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्घृत्य रश्मिभिः ।
दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः ॥ ६ ॥
धौम्य बोले— राजन्! सृष्टिके प्रारम्भकालमें जब सभी प्राणी भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे, तब भगवान् सूर्यने पिताकी भाँति उन सबपर दया करके उत्तरायणमें जाकर

अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया ।। ५-६ ।।

क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः । दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा ।। ७ ।। इस प्रकार जब सारे भूमण्डलमें क्षेत्र तैयार हो गया, तब ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमाने अन्तरिक्षमें मेघोंके रूपमें परिणत हुए सूर्यके तेजको प्रकट करके उसके द्वारा बरसाये हुए जलसे अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ।। ७ ।।

निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः । ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि ।। ८ ।। चन्द्रमाकी किरणोंसे अभिषिक्त हुआ सूर्य जब अपनी प्रकृतिमें स्थित हो जाता है, तब छः प्रकारके रसोंसे युक्त पवित्र ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। वही पृथ्वीमें प्राणियोंके लिये अन्न होता है ।। ८ ।।

एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् । पितैष सर्वभूतानां तस्मात् तं शरणं व्रज ।। ९ ।। इस प्रकार सभी जीवोंके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला अन्न सूर्यरूप ही है। अतः भगवान् सूर्य ही समस्त प्राणियोंके पिता हैं, इसलिये तुम उन्हींकी शरणमें जाओ ।। ९ ।।

राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः । उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम् ।। १० ।। जो जन्म और कर्म दोनों ही दृष्टियोंसे परम उज्ज्वल हैं, ऐसे महात्मा राजा भारी तपस्याका आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्रजाजनोंका संकटसे उद्धार करते हैं ।। १० ।।

भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च । तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः ।। ११ ।। भीम, कार्तवीर्य अर्जुन, वेनपुत्र पृथु तथा नहुष आदि नरेशोंने तपस्या, योग और समाधिमें स्थित होकर भारी आपत्तियोंसे प्रजाको उबारा है ।। ११ ।।

तथा त्वमपि धर्मात्मन् कर्मणा च विशोधितः । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन् भर भारत ।। १२ ।। धर्मात्मा भारत! इसी प्रकार तुम भी सत्कर्मसे शुद्ध होकर तपस्याका आश्रय ले धर्मानुसार द्विजातियोंका भरण-पोषण करो ।। १२ ।।

जनमेजय उवाच

कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः । विप्रार्थमाराधितवान् सूर्यमद्भुतदर्शनम् ।। १३ ।।

जनमेजयेने पूछा— भगवन्! पुरुषश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये, जिनका दर्शन अत्यन्त अद्भुत है, उन भगवान् सूर्यकी आराधना किस प्रकार की? ।। १३ ।।

वैशम्पायन उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः । क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।। १४ ।। वैशम्पायनजीने कहा— राजेन्द्र! मैं सब बातें बता रहा हूँ। तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर सुनो और धैर्य रखो ।। १४ ।। धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने । नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते ।। १५ ।। महामते! धौम्यने जिस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरको पहले भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। १५ ।।

धौम्य उवाच

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः । गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ।। १६ ।। पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् । सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ।। १७ ।। इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः ।। १८ ।। वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः । धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ।। १९ ।। कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः ।। २० ।। संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः । पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ।। २१ ।। कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः । वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ।। २२ ।। भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः । स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः ।। २३ ।। अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः । जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता ।। २४ ।। मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः ।

धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ॥ २५ ॥ द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः । स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ २६ ॥ देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः । चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः ॥ २७ ॥ एतद् वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः । नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत् स्वयंभुवा ॥ २८ ॥

**धौम्य बोले—**१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान्, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख (आकाश), १९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक (मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वान्, २८ दीप्तांशु, २९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्चर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेजःपति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला-काष्ठा-मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा (रात्रि), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अश्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक-नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्नि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मनःसुपर्ण, ८९-भूतादि, ९० शीघ्रग, ९१ प्राणधारक, ९२ धन्वन्तरि, ९३ धूमकेतु, ९४ आदिदेव, ९५ अदितिसुत, ९६ द्वादशात्मा, ९७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता-माता-पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार-त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित—ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है ॥ १६—२८ ॥

सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् । वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम् ॥ २९ ॥

(इन नामोंका उच्चारण करके भगवान् सूर्यको इस प्रकार नमस्कार करना चाहिये।) समस्त देवता, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं, असुर, राक्षस तथा सिद्ध जिनकी

वन्दना करते हैं तथा जो उत्तम सुवर्ण और अग्निके समान कान्तिमान् हैं, उन भगवान् भास्करको मैं अपने हितके लिये प्रणाम करता हूँ॥ २९॥ सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत् स पुत्रदारान् धनरत्नसंचयान्। लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्॥ ३०॥ जो मनुष्य सूर्योदयके समय भलीभाँति एकाग्रचित्त हो इन नामोंका पाठ करता है वह स्त्री, पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्वजन्मकी स्मृति, धैर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त कर लेता है॥ ३०॥ इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः। विमुच्यते शोकदवाग्निसगरा- ल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान्॥ ३१॥ जो मानव स्नान आदि करके पवित्र, शुद्धचित्त एवं एकाग्र हो देवेश्वर 'भगवान्' सूर्यके इस नामात्मक स्तोत्रका कीर्तन करता है वह शोकरूपी दावानलसे युक्त दुस्तर संसारसागरसे मुक्त हो मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है॥ ३१॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः। विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः॥ ३२॥ धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्। पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्॥ ३३॥ सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत्। योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः॥ ३४॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पुरोहित धौम्यके इस प्रकार समयोचित बात कहनेपर ब्राह्मणोंको देनेके लिये अन्नकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियममें स्थित हो मनको वशमें रखकर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए शुद्धचेता धर्मराज युधिष्ठिरने उत्तम तपस्याका अनुष्ठान आरम्भ किया। राजा युधिष्ठिरने गंगाजीके जलमें स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारोंद्वारा भगवान् दिवाकरकी पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये। धर्मात्मा पाण्डुकुमार चित्तको एकाग्र करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे॥ ३२—३४॥ गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्। शुचिः प्रयतवाग् भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः॥ ३५॥

गंगाजलका आचमन करके पवित्र हो वाणीको वशमें रखकर तथा प्राणायामपूर्वक स्थित रहकर उन्होंने पूर्वोक्त अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्रका जप किया ॥ ३५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम् । त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम् ॥ ३६ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**सूर्यदेव! आप सम्पूर्ण जगत्‌के नेत्र तथा समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। आप ही सब जीवोंके उत्पत्तिस्थान और कर्मानुष्ठानमें लगे हुए पुरुषोंके सदाचार हैं ॥ ३६ ॥

त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् । अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ॥ ३७ ॥ सम्पूर्ण सांख्ययोगियोंके प्राप्तव्य स्थान आप ही हैं। आप ही सब कर्मयोगियोंके आश्रय हैं। आप ही मोक्षके उन्मुक्त द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओंकी गति हैं ॥ ३७ ॥

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते । त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ॥ ३८ ॥ आप ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करते हैं। आपसे ही यह प्रकाशित होता है। आप ही इसे पवित्र करते हैं और आपके ही द्वारा निःस्वार्थभावसे इसका पालन किया जाता है ॥ ३८ ॥

त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः । स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम् ॥ ३९ ॥ सूर्यदेव! आप ऋषिगणोंद्वारा पूजित हैं। वेदके तत्त्वज्ञ ब्राह्मणलोग अपनी-अपनी वेदशाखाओंमें वर्णित मन्त्रोंद्वारा उचित समयपर उपस्थान करके आपका पूजन किया करते हैं ॥ ३९ ॥

तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः । सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः ॥ ४० ॥ सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्यक और नाग आपसे वर पानेकी अभिलाषासे आपके गतिशील दिव्य रथके पीछे-पीछे चलते हैं ॥ ४० ॥

त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः । सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः ॥ ४१ ॥ तैंतीस³ देवता एवं विमानचारी सिद्धगण भी उपेन्द्र तथा महेन्द्रसहित आपकी आराधना करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ४१ ॥

उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः । दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः ॥ ४२ ॥