महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नमोऽस्तु त्रिपुरघ्नाय भगघ्नाय च वै नमः ।
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ।। ४७ ।।
त्रिपुरनाशक और भगनेत्रविनाशक भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है। वनस्पतियोंके पति तथा नरपतिरूप महादेवजीको नमस्कार है ।। ४७ ।।
मातृणां पतये चैव गणानां पतये नमः ।
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ।। ४८ ।।
मातृकाओंके अधिपति और गणोंके पालक शिवको नमस्कार है। गोपति और यज्ञपति शंकरको नित्य नमस्कार है ।। ४८ ।।
अपां च पतये नित्यं देवानां पतये नमः ।
पूष्णो दन्तविनाशाय त्र्यक्षाय वरदाय च ।। ४९ ।।
नीलकण्ठाय पिङ्गाय स्वर्णकेशाय वै नमः ।
जलपति तथा देवपतिको नित्य नमस्कार है। पूषाके दाँत तोड़नेवाले, त्रिनेत्रधारी वरदायक शिवको नमस्कार है। नीलकण्ठ, पिंगलवर्ण और सुनहरे केशवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ४९ १/२ ।।
कर्माणि यानि दिव्यानि महादेवस्य धीमतः ।। ५० ।।
तानि ते कीर्तयिष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
अर्जुन! अब मैं परम बुद्धिमान् महादेवजीके जो दिव्य कर्म हैं, उनका अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा मैंने सुन रखा है, वैसा ही तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ ।।
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः ।। ५१ ।।
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागताः ।
यदि वे कुपित हो जायँ तो देवता, असुर, गन्धर्व और राक्षस इस लोकमें अथवा पातालमें छिप जानेपर भी चैनसे नहीं रहने पाते हैं ।। ५१ १/२ ।।
दक्षस्य यजमानस्य विधिवत् सम्भृतं पुरा ।। ५२ ।।
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्दयस्त्वभवत् तदा ।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ।। ५३ ।।
पहलेकी बात है, वे यज्ञपरायण दक्षपर कुपित हो गये थे। उस समय उन्होंने उनके विधिपूर्वक किये जानेवाले यज्ञको नष्ट कर दिया था। उन दिनों वे निर्दय हो गये थे और धनुषद्वारा बाण छोड़कर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे थे ।। ५२-५३ ।।
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा ।
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ।। ५४ ।।
देवताओंको उस समय कहीं भी सुख और शान्ति नहीं मिली, महेश्वरके कुपित होनेसे सहसा यज्ञमें उपद्रव खड़ा हो गया था ।। ५४ ।।
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः ।
बभूवुर्वशगाः पार्थ निपेतुश्च सुरासुराः ॥ ५५ ॥ पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके गम्भीर घोषसे अत्यन्त व्याकुल हो सम्पूर्ण लोक उनके अधीन हो गये। देवता और असुर सभी धरतीपर गिर पड़े ॥ ५५ ॥ आपश्चक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुंधरा । पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः ॥ ५६ ॥ समुद्रके जलमें ज्वार आ गया, धरती काँपने लगी, पर्वत टूट-फूटकर बिखरने लगे और दिग्गज मूर्च्छित हो गये ॥ अन्धेन तमसा लोका न प्राकाशन्त संवृताः । जघ्निवान् सह सूर्येण सर्वेषां ज्योतिषां प्रभाः ॥ ५७ ॥ घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रकाश नहीं रह गया। भगवान् शिवने सूर्यसहित सम्पूर्ण ज्योतियोंकी प्रभा नष्ट कर दी ॥ ५७ ॥ चुक्षुभुर्भयभीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च । ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च सुखैषिणः ॥ ५८ ॥ महर्षि भी भयभीत एवं क्षुब्ध हो उठे। वे सम्पूर्ण भूतोंके तथा अपने लिये भी सुख चाहते हुए पुण्याहवाचन आदि शान्ति कर्म करने लगे ॥ ५८ ॥ पूषणमभ्यद्रवत शङ्करः प्रहसन्निव । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ ५९ ॥ उस समय हँसते हुए-से भगवान् शंकरने पूषापर आक्रमण किया। वे पुरोडाश खा रहे थे। उन्होंने उनके सारे दाँत तोड़ डाले ॥ ५९ ॥ ततो निष्क्रमुर्देवा वेपमाना नताः स्म ते । पुनश्च संदधे दीप्तान् देवानां निशिताञ्शरान् ॥ ६० ॥ तदनन्तर सारे देवता नतमस्तक हो भयसे थरथर काँपते हुए यज्ञशालासे बाहर निकल गये। तब भगवान् शिवने देवताओंको लक्ष्य करके तीखे और तेजस्वी बाणोंका संधान किया ॥ ६० ॥ सधूमान् सस्फुलिङ्गांश्च विद्युत्तोयदसंनिभान् । तं दृष्ट्वा तु सुराः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ६१ ॥ रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् । धूम और चिनगारियोंसहित वे बाण बिजलीसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे। तब सम्पूर्ण देवताओंने भगवान् महेश्वरको कुपित देख उनके चरणोंमें प्रणाम किया और रुद्रके लिये उन्होंने विशिष्ट यज्ञभागकी कल्पना की ॥ भयेन त्रिदशा राजञ्छरणं च प्रपेदिरे ॥ ६२ ॥ तेन चैवातिकोपेन स यज्ञः संधितस्तदा । भग्नाश्चापि सुरा आसन् भीताश्चाद्यापि तं प्रति ॥ ६३ ॥
राजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये। तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया। उन दिनों देवता लोग भाग खड़े हुए थे, तभीसे आजतक वे देवता उनसे डरते रहते हैं ॥ ६२-६३ ॥ असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णं परमं महत् ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें परम पराक्रमी तीन असुरोंके आकाशमें तीन नगर थे। एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा अत्यन्त विशाल नगर सोनेका बना हुआ था ॥ ६४ ॥ सौवर्णं कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम् । तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युन्मालिन आयसम् ॥ ६५ ॥ उनमेंसे सोनेका नगर कमलाक्षके, चाँदीका तारकाक्षके तथा तीसरा लोहेका बना हुआ नगर विद्युन्मालीके अधिकारमें था ॥ ६५ ॥ न शक्तस्तानि मघवान् भेत्तुं सर्वायुधैरपि । अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ ६६ ॥ इन्द्र सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन नगरोंका भेदन न कर सके। तब उनसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण देवता भगवान् शंकरकी शरणमें गये ॥ ६६ ॥ ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः । ब्रह्मदत्तवरा ह्येते घोरास्त्रिपुरवासिनः ॥ ६७ ॥ पीडयन्त्यधिकं लोकं यस्मात् ते वरदर्पिताः । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने महात्मा भगवान् शंकरसे कहा—‘प्रभो! ब्रह्माजीसे वरदान पाकर ये त्रिपुरनिवासी घोर दैत्य सम्पूर्ण जगत्को अधिकाधिक पीड़ा दे रहे हैं; क्योंकि वरदान प्राप्त होनेसे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है ॥ ६७ १/२ ॥ त्वदृते देवदेवेश नान्यः शक्तः कथंचन ॥ ६८ ॥ हन्तुं दैत्यान् महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विषः । ‘देवदेवेश्वर महादेव! आपके सिवा दूसरा कोई उन दैत्योंका वध करनेमें समर्थ नहीं है; अतः आप उन देवद्रोहियोंको मार डालिये ॥ ६८ १/२ ॥ रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ ६९ ॥ निपातयिष्यसे चैतानसुरान् भुवनेश्वर । ‘भुवनेश्वर! रुद्र! आप जब इन असुरोंका विनाश कर डालेंगे, तबसे सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंमें जो पशु (यज्ञके साधनभूत उपकरण) होंगे, वे रुद्रके भाग समझे जायँगे’ ॥ स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया ॥ ७० ॥ गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हरः । पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शङ्करः ॥ ७१ ॥ अक्षं कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचनः ।
चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कौ देवदेवः पिनाकधृक् ॥ ७२ ॥
अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च त्र्यम्बकः ।
यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम् ॥ ७३ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने ‘तथास्तु’ कहकर उनके हितकी इच्छासे गन्धमादन और विन्ध्याचल इन दो पर्वतोंको अपने रथके दो पार्श्ववर्ती ध्वज बनाये। फिर समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको रथ बनाकर नागराज शेषको उस रथका धुरा बनाया। तत्पश्चात् त्रिनेत्रधारी पिनाकपाणि देवाधिदेव महादेवने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको रथके दो पहिये बनाये। एलपत्रके पुत्र और पुष्पदन्तको जूएकी कीलें बनाया। फिर त्र्यम्बकने मलयाचलको यूप और तक्षक नागको जूआ बाँधनेकी रस्सी बना लिया ॥ ७०—७३ ॥
योक्त्राङ्गानि च सत्त्वानि कृत्वा शर्वः प्रतापवान् ।
वेदान् कृत्वाऽथ चतुरश्चतुरश्वान् महेश्वरः ॥ ७४ ॥
इसी प्रकार प्रतापी भगवान् महेश्वरने अन्य प्राणियोंको जोते और बागडोर आदिके रूपमें रखकर चारों वेद ही रथके चार घोड़े बना लिये ॥ ७४ ॥
उपवेदान् खलीनांश्च कृत्वा लोकत्रयेश्वरः ।
गायत्रीं प्रग्रहं कृत्वा सावित्रीं च महेश्वरः ॥ ७५ ॥
तत्पश्चात् तीनों लोकोंके स्वामी महेश्वरने उपवेदोंको लगाम बनाकर गायत्री और सावित्रीको प्रग्रह बना लिया ॥ ७५ ॥
कृत्वोङ्कारं प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम् ।
गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम् ॥ ७६ ॥
विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च ।
वायुं कृत्वाथ वाजाभ्यां पुङ्खे वैवस्वतं यमम् ॥ ७७ ॥
फिर ओंकारको चाबुक, ब्रह्माजीको सारथि, मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकिनागको उसकी प्रत्यंचा, भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निदेवको उस बाणका फल, वायुको उसके पंख और वैवस्वत यमको उसकी पूँछ बनाया ॥ ७६-७७ ॥
विद्युत् कृत्वाथ निश्राणं मेरुं कृत्वाथ वै ध्वजम् ।
आरुह्य स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिवः ॥ ७८ ॥
त्रिपुरस्य वधार्थाय स्थाणुः प्रहरतां वरः ।
असुराणामन्तकरः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ ७९ ॥
बिजलीको उस बाणकी तीखी धार बनाकर मेरु पर्वतको प्रधान ध्वजके स्थानमें रखा। इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार करके असुरोंका अन्त करनेवाले, अतुल पराक्रमी, योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा सदा स्थिर रहनेवाले श्रीमान् भगवान् शिव त्रिपुरवधके लिये उसपर आरूढ़ हुए ॥ ७८-७९ ॥
स्तूयमानः सुरैः पार्थ ऋषिभिश्च तपोधनैः । स्थानं माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभुः ॥ ८० ॥ अतिष्ठत् स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान् । पार्थ! उस समय सम्पूर्ण देवता और तपोधन महर्षि भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे। उन भगवान्ने उस अनुपम एवं दिव्य माहेश्वर स्थान (रथ)-का निर्माण करके उसपर एक हजार वर्षोंतक स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ८० १/२ ॥
यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च ॥ ८१ ॥ त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । जब वे तीनों पुर आकाशमें एकत्र हुए, तब उन्होंने तीन गाँठ और तीन फलवाले बाणसे उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८१ १/२ ॥
पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ८२ ॥ शरं कालाग्निसंयुक्तं विष्णुसोमसमायुतम् । उस समय दानव उन नगरोंकी ओर और कालाग्निसे संयुक्त एवं विष्णु तथा सोमकी शक्तिसे सम्पन्न उस बाणकी ओर भी आँख उठाकर देख न सके ॥ ८२ १/२ ॥
पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवेक्षितुम् ॥ ८३ ॥ बालमङ्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुनः । जिस समय वे तीनों पुरोंको दग्ध कर रहे थे, उस समय पार्वतीदेवी भी उन्हें देखनेके लिये एक पाँच शिखावाले बालकको गोदमें लेकर वहाँ गयीं ॥ ८३ १/२ ॥
उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् सुरान् ॥ ८४ ॥ असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । बाहुं सवज्रं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत् प्रभुः ॥ ८५ ॥ प्रहस्य भगवांस्तूर्णं सर्वलोकेश्वरो विभुः । पार्वतीदेवीने देवताओंसे पूछा—‘पहचानते हो, यह कौन है?’ उनके इस प्रश्नसे इन्द्रके हृदयमें असूया और क्रोधकी आग जल उठी, वे उस बालकपर वज्रका प्रहार करना ही चाहते थे कि सर्वलोकेश्वर सर्वव्यापी भगवान् शंकरने हँसकर उनकी वज्रसहित बाँहको स्तम्भित कर दिया ॥ ८४-८५ १/२ ॥
ततः स स्तम्भितभुजः शक्रो देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ जगाम ससुरस्तूर्णं ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम् । तदनन्तर स्तम्भित हुई भुजाके साथ ही देवताओंसहित इन्द्र तुरंत ही वहाँसे अविनाशी भगवान् ब्रह्माजीके पास गये ॥
ते तं प्रणम्य शिरसा प्रोचुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ८७ ॥ किमप्यङ्कगतं ब्रह्मन् पार्वत्या भूतमद्भुतम् ।
बालरूपधरं दृष्ट्वा नास्माभिरभिलक्षितः ॥ ८८ ॥
देवताओंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मन्! पार्वतीजीकी गोदमें बालरूपधारी एक अद्भुत प्राणी था, जिसे देखकर भी हमलोग पहचान नहीं सके हैं ।। ८७-८८ ।।
तस्मात् त्वां प्रष्टुमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम् ।
अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदराः ॥ ८९ ॥
‘अतः हमलोग आपसे उसके विषयमें पूछना चाहते हैं, उस बालकने बिना युद्धके ही खेल-खेलमें इन्द्रसहित हम देवताओंको परास्त कर दिया' ।। ८९ ।।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।
ध्यात्वा स शम्भुं भगवान् बालं चामिततेजसम् ॥ ९० ॥
उनकी यह बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके अमिततेजस्वी बालरूपधारी शंकरको पहचान लिया ।। ९० ।।
उवाच भगवान् ब्रह्मा शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।
चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान् हरः ॥ ९१ ॥
तस्मात् परतरं नान्यत् किंचिदस्ति महेश्वरात् ।
यो दृष्टो ह्युमया सार्धं युष्माभिरमितद्युतिः ॥ ९२ ॥
स पार्वत्याः कृते शर्वः कृतवान् बालरूपताम् ।
ते मया सहिता यूयं प्रापयध्वं तमेव हि ॥ ९३ ॥
तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उन देवश्रेष्ठ इन्द्र आदिसे कहा—'देवताओ! वे चराचर जगत्के स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर थे। उन महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कोई सत्ता नहीं है। तुमलोगोंगे पार्वतीजीके साथ जिस अमिततेजस्वी बालकका दर्शन किया है, उसके रूपमें भगवान् शंकर ही थे। उन्होंने पार्वतीजीकी प्रसन्नताके लिये बालरूप धारण कर लिया था; अतः तुमलोग मेरे साथ उन्हींकी शरणमें चलो' ।। ९१—९३ ।।
स एष भगवान् देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
न सम्बुबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् ॥ ९४ ॥
सप्रजापतयः सर्वे बालार्कसदृशप्रभम् ।
उस बालकके रूपमें ये सर्वलोकेश्वर प्रभु भगवान् महादेव ही थे, किंतु प्रजापतियोंसहित सम्पूर्ण देवता बालसूर्यके सदृश कान्तिमान् उन जगदीश्वरको पहचान न सके ।। ९४ १/२ ।।
अथाभ्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्ट्वा स च महेश्वरम् ॥ ९५ ॥
अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः ।
तदनन्तर ब्रह्माजीने निकट जाकर भगवान् महेश्वरको देखा और ये ही सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा जानकर उनकी वन्दना की ।। ९५ १/२ ।।
ब्रह्मोवाच
त्वं यज्ञो भुवनस्यास्य त्वं गतिस्त्वं परायणम् ॥ ९६ ॥
त्वं भवस्त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम् ।
त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ९७ ॥
ब्रह्माजी बोले— भगवन्! आप ही यज्ञ, आप ही इस विश्वके सहारे और आप ही सबको शरण देनेवाले हैं, आप ही सबको उत्पन्न करनेवाले भव हैं, आप ही महादेव हैं और आप ही परमधाम एवं परमपद हैं। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ ९६-९७ ॥
भगवन् भूतभव्येश लोकनाथ जगत्पते ।
प्रसादं कुरु शक्रस्य त्वया क्रोधार्दितस्य वै ॥ ९८ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवन्! लोकनाथ! जगत्पते! ये इन्द्र आपके क्रोधसे पीड़ित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये ॥ ९८ ॥
व्यास उवाच
पद्मयोनिवचः श्रुत्वा ततः प्रीतो महेश्वरः ।
प्रसादाभिमुखो भूत्वा अट्टहासमथाकरोत् ॥ ९९ ॥
व्यासजी कहते हैं— पार्थ! ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवान् महेश्वर प्रसन्न हो गये और कृपाके लिये उद्यत हो ठठाकर हँस पड़े ॥ ९९ ॥
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः ।
अभवच्च पुनर्बाहुर्यथाप्रकृति वज्रिणः ॥ १०० ॥
तब देवताओंने पार्वतीदेवी तथा भगवान् शंकरको प्रसन्न किया। फिर वज्रधारी इन्द्रकी बाँह जैसी पहले थी, वैसी हो गयी ॥ १०० ॥
तेषां प्रसन्नो भगवान् सपत्नीको वृषध्वजः ।
देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षयज्ञविनाशनः ॥ १०१ ॥
दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले देवश्रेष्ठ भगवान् वृषध्वज अपनी पत्नी उमाके साथ देवताओंपर प्रसन्न हो गये ॥ १०१ ॥
स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्च सर्ववित् ।
स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युतः ॥ १०२ ॥
वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप एवं सर्वज्ञ हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही दोनों अश्विनीकुमार तथा विद्युत् हैं ॥ १०२ ॥
स भवः स च पर्जन्यो महादेवः सनातनः ।
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः ॥ १०३ ॥
वे ही भव, वे ही मेघ और वे ही सनातन महादेव हैं। चन्द्रमा, ईशान, सूर्य और वरुण भी वे ही हैं ॥ १०३ ॥
स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि तु ।
मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः ॥ १०४ ॥
वे ही काल, अन्तक, मृत्यु, यम, रात्रि, दिन, मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर हैं ॥ १०४ ॥
धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।
सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः ॥ १०५ ॥
वे ही धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वरूपी कार्यके कर्ता हैं। वे शरीररहित होकर भी सम्पूर्ण देवताओंके शरीर धारण करते हैं ॥ १०५ ॥
सर्वदेवैः स्तुतो देवः सैकधा बहुधा च सः ।
शतधा सहस्रधा चैव भूयः शतसहस्रधा ॥ १०६ ॥
सम्पूर्ण देवता सदा उनकी स्तुति करते हैं। वे महादेवजी एक होकर भी अनेक हैं। सौ, हजार और लाखों रूपोंमें वे ही विराज रहे हैं ॥ १०६ ॥
द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः ॥ १०७ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर मानते हैं, एक घोर और दूसरा शिव। ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं और उन्हींसे पुनः बहुसंख्यक शरीर प्रकट हो जाते हैं ॥ १०७ ॥
घोरा तु या तनुस्तस्य सोऽग्निर्विष्णुः स भास्करः ।
सौम्या तु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमाः ॥ १०८ ॥
उनका जो घोर शरीर है, वही अग्नि, विष्णु और सूर्य है और उनका सौम्य (शिव) शरीर ही जल, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा है ॥ १०८ ॥
वेदाः साङ्गोपनिषदः पुराणाध्यात्मनिश्चयाः ।
यदत्र परमं गुह्यं स वै देवो महेश्वरः ॥ १०९ ॥
वेद, वेदांग, उपनिषद्, पुराण और अध्यात्मशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं तथा उनमें भी जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं ॥ १०९ ॥
ईदृशश्च महादेबो भूयांश्र्च भगवानजः ।
न हि सर्वे मया शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः ॥ ११० ॥
अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्डुनन्दन ।
अर्जुन! यह है अजन्मा भगवान् महादेवका महामहिमस्वरूप। मैं सहस्रों वर्षोंतक लगातार वर्णन करता रहूँ तो भी भगवान्के समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ ११० १/२ ॥
सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान् वै सर्वपापसमन्वितान् ॥ १११ ॥
स मोचयति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान् ।
जो सब प्रकारकी ग्रहबाधाओंसे पीड़ित हैं और सम्पूर्ण पापोंमें डूबे हुए हैं, वे भी यदि शरणमें आ जायँ तो शरणागतवत्सल भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें पाप-तापसे मुक्त कर देते हैं ।। १११ १/२ ।।
आयुरायोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ।। ११२ ।।
स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः ।
वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और प्रचुरमात्रामें मनोवांछित पदार्थ देते हैं तथा वे ही कुपित होनेपर फिर उन सबका संहार कर डालते हैं ।। ११२ १/२ ।।
सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ।। ११३ ।।
स चैव व्यापृतो लोके मनुष्याणां शुभाशुभे ।
ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरश्च स उच्यते ।। ११४ ।।
इन्द्र आदि देवताओंमें उन्हींका ऐश्वर्य बताया जाता है, वे ही ईश्वर होनेके कारण लोकमें मनुष्योंके शुभाशुभ कर्मोंके फल देनेमें संलग्न रहते हैं। सम्पूर्ण कामनाओंके ईश्वर भी वे ही बताये जाते हैं ।। ११३-११४ ।।
महेश्वरश्च महतां भूतानामीश्वरश्च सः ।
बहुभिर्बहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत् ।। ११५ ।।
महाभूतोंके ईश्वर होनेसे वे ही महेश्वर कहलाते हैं। वे नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं ।। ११५ ।।
तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे तदधिष्ठितम् ।
वडवामुखेति विख्यातं पिबत् तोयमयं हविः ।। ११६ ।।
उन महादेवजीका जो मुख है, वह समुद्रमें स्थित है। वह 'वडवामुख' नामसे विख्यात होकर जलमय हविष्यका पान करता है ।। ११६ ।।
एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः ।
यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम् ।। ११७ ।।
ये ही महादेवजी श्मशानभूमि (काशीपुरी)-में नित्य निवास करते हैं। वहाँ मनुष्य 'वीरस्थानेश्वर' के नामसे इनकी आराधना करते हैं ।। ११७ ।।
अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च ।
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्याः प्रवदन्ति च ।। ११८ ।।
इनके बहुत-से तेजस्वी घोर रूप हैं, जो लोकमें पूजित होते हैं और मनुष्य उनका कीर्तन करते रहते हैं ।। ११८ ।।
नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मणस्तथा ।। ११९ ।।
उनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत-से यथार्थ नाम बताये जाते हैं ।। ११९ ।।
वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम् ।
नाम्ना चानन्तरुद्रेति ह्युपस्थानं महात्मनः ।। १२० ।।
यजुर्वेदमें भी परमात्मा शिवकी 'शतरुद्रिय' नामक उत्तम स्तुति बतायी गयी है। अनन्तरुद्रनामसे इनका उपस्थान बताया गया है ।। १२० ।।
स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषाः ।
स विभुः स प्रभुर्देवो विश्वं व्याप्नोति वै महत् ।। १२१ ।।
जो दिव्य तथा मानव भोग हैं, उन सबके स्वामी ये महादेवजी ही हैं। ये देव इस विशाल विश्वमें व्याप्त हैं; इसलिये विभु और प्रभु कहलाते हैं ।। १२१ ।।
ज्येष्ठं भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मुनयस्तथा ।
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत् ।। १२२ ।।
ब्राह्मण और मुनिजन इन्हें सबसे ज्येष्ठ बताते हैं, ये देवताओंमें सबसे प्रथम हैं; इन्हींके मुखसे अग्निदेवका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १२२ ।।
सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते पुनः ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ।। १२३ ।।
ये सर्वथा पशुओं (प्राणियों)-का पालन करते और उन्हींके साथ खेला करते हैं तथा उन पशुओंके अधिपति हैं; इसलिये 'पशुपति' कहे गये हैं ।। १२३ ।।
दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यथा स्थितम् ।
महयत्येष लोकांश्च महेश्वर इति स्मृतः ।। १२४ ।।
इनका दिव्य लिंग ब्रह्मचर्यसे स्थित है। ये सम्पूर्ण लोकोंको महिमान्वित करते हैं; इसलिये महेश्वर कहे गये हैं ।। १२४ ।।
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
लिङ्गमस्यार्चयन्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम् ।। १२५ ।।
ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ इनके ऊर्ध्वलोकस्थित लिंगविग्रह (प्रतीक)-की पूजा करती हैं ।। १२५ ।।
पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः ।
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः ।। १२६ ।।
उस लिंग अर्थात् प्रतीककी पूजा होनेपर कल्याणकारी भगवान् महेश्वर आनन्दित होते हैं। सुखी, प्रसन्न तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होते हैं ।। १२६ ।।
यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।। १२७ ।।
भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें इनके स्थावर-जंगम बहुत-से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें 'बहुरूप' नाम दिया गया है ।। १२७ ।।
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
क्रोधाद् यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात् सर्व इति स्मृतः ।। १२८ ।।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि उनका एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा क्रोधसे प्रज्वलित रहता है; वे सब लोकोंमें समाविष्ट होनेके कारण 'सर्व' कहे गये हैं ।। १२८ ।।
धूम्ररूपं च यत् तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते ।
विश्वेदेवाश्च यत् तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ।। १२९ ।।
उनका रूप धूम्रवर्णका है; इसलिये वे 'धूर्जटि' कहलाते हैं। विश्वेदेव उन्हींमें प्रतिष्ठित हैं, इसलिये उनका एक नाम 'विश्वरूप' है ।। १२९ ।।
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः ।
द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः ।। १३० ।।
वे भगवान् भुवनेश्वर आकाश, जल और पृथ्वी इन अम्बास्वरूपा तीन देवियोंको अपनाते, उनकी रक्षा करते हैं, इसलिये त्र्यम्बक कहे गये हैं ।। १३० ।।
समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान् सर्वकर्मसु ।
शिवमिच्छन् मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ।। १३१ ।।
ये मनुष्योंका कल्याण चाहते हुए उनके समस्त कर्मोंमें सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंकी समृद्धि (सिद्धि) करते हैं, इसलिये 'शिव' कहे गये हैं ।। १३१ ।।
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ।। १३२ ।।
उनके सहस्र अथवा दस हजार नेत्र हैं अथवा वे सब ओरसे नेत्रमय ही हैं। भगवान् शिव महान् विश्वका पालन करते हैं; इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं ।। १३२ ।।
महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् ।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।। १३३ ।।
वे पूर्वकालसे ही महान् रूपमें स्थित हैं, प्राणोंकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर सदा स्थिर रहता है; इसलिये उन्हें 'स्थाणु' कहते हैं ।। १३३ ।।
सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः ।
ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः ।। १३४ ।।
लोकमें जो सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें प्रकाशित होती हैं, वे भगवान् त्रिलोचनके केश कही गयी हैं। वे व्योम (आकाश)-में प्रकाशित होती हैं; इसलिये उनका नाम 'व्योमकेश' है ।। १३४ ।।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः ।
भव एव ततो यस्माद् भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३५ ॥ भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत् भगवान् शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे ‘भूतभव्यभवोद्भव’ कहे गये हैं ॥ १३५ ॥
कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते । स देवदेवो भगवान् कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः ॥ १३६ ॥ कपि कहते हैं श्रेष्ठको और वृष नाम है धर्मका। वृष और कपि दोनों होनेके कारण देवाधिदेव भगवान् शंकर ‘वृषाकपि’ कहलाते हैं ॥ १३६ ॥
ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च । निगृह्य हरते यस्मात् तस्माद्धर इति स्मृतः ॥ १३७ ॥ वे ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका ऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये ‘हर’ कहे गये हैं ॥ १३७ ॥
निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद् देवो महेश्वरः । ललाटे नेत्रमसृजत् तेन त्र्यक्षः स उच्यते ॥ १३८ ॥ उन भगवान् महेश्वरने दोनों नेत्रोंको बंद करके अपने ललाटमें बलपूर्वक तीसरे नेत्रकी सृष्टि की, इसलिये उन्हें त्रिनेत्र कहते हैं ॥ १३८ ॥
विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह । स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु ॥ १३९ ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें विषम संख्यावाले पाँच प्राणोंके साथ निवास करते हुए सदा समभावसे स्थित रहते हैं। विषम परिस्थितियोंमें पड़े हुए समस्त देहधारियोंके भीतर वे ही प्राणवायु और अपानवायुके रूपमें विराजमान हैं ॥ १३९ ॥
पूजयेद् विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः । लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १४० ॥ जो कोई भी मनुष्य हो, उसे महात्मा शिवके अर्चाविग्रह अथवा लिंग (प्रतीक)-की पूजा करनी चाहिये। लिंग अथवा प्रतिमाकी पूजा करनेवाला पुरुष बड़ी भारी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १४० ॥
ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्धं च शिवा तनुः । आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ॥ १४१ ॥ दोनों जाँघोंसे नीचे भगवान् शिवका आधा शरीर आग्नेय अथवा घोर है तथा उससे ऊपरका आधा शरीर सोम एवं शिव है। किसी-किसीके मतमें उनके सम्पूर्ण शरीरका आधा भाग ‘अग्नि’ और आधा भाग ‘सोम’ कहलाता है ॥ १४१ ॥
तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः । भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ॥ १४२ ॥
उनका जो शिव शरीर है, वह तेजोमय और परम कान्तिमान् है। वह देवताओंके उपयोगमें आता है तथा मनुष्यलोकमें उनका प्रकाशमान घोर शरीर 'अग्नि' कहलाता है॥ १४२॥
ब्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तया।
यास्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तयेश्वरः॥ १४३॥
उनकी जो शिव मूर्ति है, वह जगत्की रक्षाके लिये ब्रह्मचर्यका पालन करती है और उनकी जो घोरतर मूर्ति है, उसके द्वारा भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं॥ १४३॥
यन्निर्दहति यत् तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते॥ १४४॥
ये प्रतापी देवता प्रलयकालमें अत्यन्त तीक्ष्ण एवं उग्र रूप धारण करके सबको दग्ध कर डालते हैं और प्राणियोंके रक्त, मांस एवं मज्जाको भी भक्षण करते हैं; अतः रौद्रभावके कारण 'रुद्र' कहलाते हैं॥ १४४॥
एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः।
संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक्॥ १४५॥
अर्जुन! संग्रामभूमिमें जो तुम्हारे आगे शत्रुओंका संहार करते हुए दिखायी दिये हैं, वे ये ही पिनाकधारी भगवान् महादेव हैं॥ १४५॥
सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयानघ।
कृष्णेन दर्शितः स्वप्ने यस्तु शैलेन्द्रमूर्धनि॥ १४६॥
एष वै भगवान् देवः संग्रामे याति तेऽग्रतः।
येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वया दानवा हताः॥ १४७॥
निष्पाप अर्जुन! जब तुमने सिंधुराजके वधकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें गिरिराजके शिखरपर जिनका दर्शन कराया था, ये वे ही भगवान् शंकर संग्राममें तुम्हारे आगे-आगे चल रहे हैं। उन्होंने ही तुम्हें वे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनके द्वारा तुमने दानवोंका संहार किया है॥ १४६-१४७॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम्॥ १४८॥
पार्थ! यह देवाधिदेव भगवान् शिवके 'शतरुद्रिय' स्तोत्रकी व्याख्या की गयी है। यह स्तोत्र वेदोंके समान परम पवित्र तथा धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है॥ १४८॥
सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्।
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्॥ १४९॥
इसके पाठसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। यह पवित्र स्तोत्र सम्पूर्ण किल्बिषोंका नाशक, सब पापोंका निवारक तथा सब प्रकारके दुःख और भयको दूर करनेवाला
है ।। १४९ ।। चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा । विजित्य शत्रून् सर्वान् स रुद्रलोके महीयते ।। १५० ।। जो मनुष्य भगवान् शंकरके ब्रह्मा, विष्णु महेश और निर्गुण निराकार—इन चतुर्विध स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले इस स्तोत्रको सदा सुनता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। १५० ।। चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् । पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ।। १५१ ।। भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा । वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ।। १५२ ।। परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। १५१-१५२ ।। गच्छ युद्ध्यस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः । यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः ।। १५३ ।। कुन्तीनन्दन! जाओ, युद्ध करो। तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मन्त्री, रक्षक और पार्श्ववर्ती साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।। १५३ ।।
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनं संख्ये पराशरसुतस्तदा ।
जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिंदम ॥ १५४ ॥
**संजय कहते हैं—**शत्रुओंका दमन करने-वाले भरतश्रेष्ठ! युद्धस्थलमें अर्जुनसे ऐसा कहकर पराशरनन्दन व्यासजी जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ १५४ ॥
युद्धं कृत्वा महत् घोरं पञ्चाहानि महाबलः ।
ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥ १५५ ॥
राजन्! पाँच दिनोंतक अत्यन्त घोर युद्ध करके महाबली ब्राह्मण द्रोणाचार्य मारे गये और ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ १५५ ॥
स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।
क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महत् यशः ॥ १५६ ॥
वेदोंके स्वाध्यायसे जो फल मिलता है, वही इस पर्वके पाठ और श्रवणसे भी प्राप्त होता है। इसमें निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीर क्षत्रियोंके महान् यशका वर्णन है ॥ १५६ ॥
[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्]
य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः । स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ १५७ ॥ जो प्रतिदिन इस पर्वको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पहलेके किये हुए बड़े-बड़े पापों तथा घोर कर्मोंसे मुक्त हो जाता है ।। १५७ ।।
यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ १५८ ॥ इसको प्रतिदिन पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणको यज्ञका फल प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको घोर युद्धमें सुयशकी प्राप्ति होती है, शेष दो वर्णके लोगोंको भी पुत्र, पौत्र आदि अभीष्ट एवं प्रिय वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ।। १५८ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०२ ।।
[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्]
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुलयोग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ९३७९॥ | (२९१॥) | ४००॥।- | ९७८०।- |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | १३० | (५) | ६॥।= | १३६॥।= |
| द्रोणपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या | ९९१७≡ |
श्रवण-महिमा
स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।
क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद् यशः ॥ १ ॥ य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः । स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ २ ॥ यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ ३ ॥
कर्णपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
कर्णपर्व
प्रथमोऽध्यायः
कर्णवधका संक्षिप्त वृत्तान्त सुनकर जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे विस्तारपूर्वक कहनेका अनुरोध
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
‘अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।’
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणे हते राजन् दुर्योधनमुखा नृपाः ।
भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर दुर्योधन आदि राजाओंका मन अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। वे सब-के-सब द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास आये ॥ १ ॥
ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः ।
पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारद्वतीसुतम् ॥ २ ॥
मोहवश उनका बल और उत्साह नष्ट-सा हो गया था। वे द्रोणाचार्यके लिये बारंबार चिन्ता करते हुए शोकसे व्याकुल हो कृपीकुमार अश्वत्थामाके पास उसके चारों ओर बैठ गये ॥ २ ॥
ते मुहूर्तं समाश्वस्य हेतुभिः शास्त्रसम्मितैः ।
रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ३ ॥
वे शास्त्रानुकूल युक्तियोंद्वारा दो घड़ीतक अश्वत्थामाको सान्त्वना देते रहे। फिर रात हो जानेपर समस्त भूपाल अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥ ३ ॥
ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन् सुखम् ।
चिन्तयन्तः क्षयं तीव्रं दुःखशोकसमन्विताः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन! शिविरोंमें भी वे भूपगण सुख न पा सके। संग्राममें जो घोर विनाश हुआ था, उसका चिन्तन करते हुए दुःख और शोकमें डूब गये ॥ ४ ॥ विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुयोधनः । दुःशासनश्च शकुनिः सौबलश्च महाबलः ॥ ५ ॥ उषितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने । चिन्तयन्तः परिक्लेशान् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ६ ॥ विशेषतः सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन, दुःशासन तथा महाबली सुबलपुत्र शकुनि—ये चारों उस रातको दुर्योधनके ही शिविरमें रहे और महात्मा पाण्डवोंको जो बड़े-बड़े क्लेश दिये गये थे; उनका चिन्तन करते रहे ॥ ५-६ ॥ यत् तद् द्यूते परिक्लिष्टा कृष्णा चानायिता सभाम् । तत् स्मरन्तोऽनुशोचन्तो भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ७ ॥ द्यूत-क्रीडाके समय जो द्रुपदकुमारी कृष्णाको सभामें लाया गया और उसे सर्वथा क्लेश पहुँचाया गया, उसका बारंबार स्मरण करके वे शोकमग्न हो जाते और मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठते थे ॥ ७ ॥ तथा तु संचिन्तयतां तान् क्लेशान् द्यूतकारितान् । दुःखेन क्षणदा राजन् जगामाब्दशतोपमा ॥ ८ ॥ राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंको जूएके द्वारा प्राप्त कराये गये उन क्लेशोंका चिन्तन करते-करते उनकी वह रात सौ वर्षोंके समान बड़े कष्टसे व्यतीत हुई ॥ ८ ॥ ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने । चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ९ ॥ तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर दैवके अधीन हुए समस्त कौरवोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार शौच, स्नान, संध्या-वन्दन आदि आवश्यक कार्य पूर्ण किया ॥ ९ ॥ ते कृत्वावश्यककार्याणि समाश्वस्य च भारत । योगमाज्ञापयामासुर्युद्धाय च विनिर्ययुः ॥ १० ॥ कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः । पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठान् दधिपात्रघृताक्षतैः ॥ ११ ॥ गोभिरश्वैश्च निष्कैश्च वासोभिश्च महाधनैः । वन्द्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! प्रतिदिनके आवश्यक कार्य सम्पन्न करके आश्वस्त हो उन्होंने सैनिकोंको कवच आदि धारण करके तैयार हो जानेकी आज्ञा दी तथा कौतुक एवं मांगलिक कृत्य पूर्ण करके कर्णको सेनापति बनाकर वे सब-के-सब दही, पात्र, घृत, अक्षत, गौ, अश्व, कण्ठभूषण तथा बहुमूल्य वस्त्रोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करके सूत, मागध और
वन्दीजनोंद्वारा विजय-सूचक आशीर्वादोंसे अभिवन्दित हो युद्धके लिये निकले ॥ १०—१२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।
शिबिरान्निर्ययुस्तूर्णं युद्धाय कृतनिश्चयाः ॥ १३ ॥
राजन्! इसी प्रकार पाण्डव भी पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करके तुरंत ही शिविरसे बाहर निकले। उन्होंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १३ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १४ ॥
तदनन्तर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले कौरवों और पाण्डवोंमें भयंकर रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥
तयोर्द्वौ दिवसौ युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।
कर्णे सेनापतौ राजन् बभूवाद्भुतदर्शनम् ॥ १५ ॥
राजन्! कर्णके सेनापति हो जानेपर उन कौरव-पाण्डव-सेनाओंमें दो दिनोंतक अद्भुत युद्ध हुआ ॥ १५ ॥
ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः ।
पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥ १६ ॥
उस युद्धमें शत्रुओंका महान् संहार करके कर्ण धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥
ततस्तु संजयः सर्वं गत्वा नागपुरं द्रुतम् ।
आचष्ट धृतराष्ट्राय यद् वृत्तं कुरुजाङ्गले ॥ १७ ॥
तदनन्तर संजयने तुरंत हस्तिनापुरमें जाकर कुरुक्षेत्रमें जो घटना घटित हुई थी, वह सब धृतराष्ट्रसे कह सुनायी ॥ १७ ॥
जनमेजय उवाच
आपगेयं हतं श्रुत्वा द्रोणं चापि महारथम् ।
आजगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्बिकासुतः ॥ १८ ॥
**जनमेजय बोले—**ब्रह्मन्! गंगानन्दन भीष्म तथा महारथी द्रोणको मारा गया सुनकर ही बूढ़े राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रको बड़ी भारी वेदना हुई थी ॥ १८ ॥
स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् ।
कथं द्विजवर प्राणानधारयत दुःखितः ॥ १९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! फिर दुर्योधनके हितैषी कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी हो उन्होंने अपने प्राण कैसे धारण किये? ॥ १९ ॥
यस्मिञ्जयाशां पुत्राणां सममन्यत पार्थिवः ।