महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महामेघनिभेनाशु शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ७ ॥ भरतवंशी नरेश! शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य मेघोंकी घटाके समान अपनी गजसेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक शिविरकी ओर ही भाग चले ॥ ७ ॥ अश्वत्थामा ततः शूरो विनिःश्वस्य पुनः पुनः । पाण्डवानां जयं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ८ ॥ तदनन्तर शूरवीर अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विजय देख बारंबार उच्छ्वास लेता हुआ छावनीकी ओर ही भागने लगा ॥ ८ ॥ संशप्तकावशिष्टेन बलेन महता वृतः । सुशर्मापि ययौ राजन् वीक्षमाणो भयार्दितः ॥ ९ ॥ राजन्! संशप्तकोंकी बची हुई विशाल सेनासे घिरा हुआ सुशर्मा भी भयसे पीड़ित हो इधर-उधर देखता हुआ छावनीकी ओर चल दिया ॥ ९ ॥ दुर्योधनोऽपि नृपतिर्हतसर्वस्वबान्धवः । ययौ शोकसमाविष्टश्चिन्तयन् विमना बहु ॥ १० ॥ जिसके भाई नष्ट हो गये थे और सर्वस्व लुट गया था, वह राजा दुर्योधन भी शोकमग्न, उदास और विशेष चिन्तित होकर शिविरकी ओर चल पड़ा ॥ १० ॥ छिन्नध्वजेन शल्यस्तु रथेन रथिनां वरः । प्रययौ शिबिरायैव वीक्षमाणो दिशो दश ॥ ११ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ राजा शल्यने भी जिसकी ध्वजा कट गयी थी, उस रथके द्वारा दसों दिशाओंकी ओर देखते हुए छावनीकी ओर ही प्रस्थान किया ॥ ११ ॥ ततोऽपरे सुबहवो भरतानां महारथाः । प्राद्रवन्त भयत्रस्ता ह्रियाविष्टा विचेतसः ॥ १२ ॥ भरतवंशियोंके दूसरे-दूसरे बहुसंख्यक महारथी भी भयभीत, लज्जित और अचेत होकर शिविरकी ओर दौड़े ॥ १२ ॥ असृक् क्षरन्तः सोद्विग्ना वेपमानास्तथातुराः । कुरवो दुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् ॥ १३ ॥ कर्णको मारा गया देख सभी कौरव-सैनिक खून बहाते और काँपते हुए उद्विग्न तथा आतुर होकर छावनीकी ओर भागने लगे ॥ १३ ॥ प्रशंसन्तोऽर्जुनं केचित् केचित् कर्णं महारथाः । व्यद्रवन्त दिशो भीताः कुरवः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥ कुरुश्रेष्ठ! कौरव-महारथियोंमेंसे कुछ लोग अर्जुनकी प्रशंसा करते थे और कुछ कर्णकी। वे सब-के-सब भयभीत होकर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ १४ ॥ तेषां योधसहस्राणां तावकानां महामृधे । नासीत्तत्र पुमान् कश्चिद् यो युद्धाय मनो दधे ॥ १५ ॥
आपके उन हजारों योद्धाओंमें वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो अपने मनमें उस महासमरमें युद्धके लिये उत्साह रखता हो ॥ १५ ॥
हते कर्णे महाराज निराशाः कुरवोऽभवन् ।
जीवितेष्वपि राज्येषु दारेषु च धनेषु च ॥ १६ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर कौरव अपने राज्यसे, धनसे, स्त्रियोंसे और जीवनसे भी निराश हो गये ॥ १६ ॥
तान् समानीय पुत्रस्ते यत्नेन महता विभुः ।
निवेशाय मनो दध्रे दुःखशोकसमन्वितः ॥ १७ ॥
दुःख और शोकमें डूबे हुए आपके पुत्र राजा दुर्योधनने बड़े यत्नसे उन सबको साथ ले आकर छावनीमें विश्राम करनेका विचार किया ॥ १७ ॥
तस्याज्ञां शिरसा योधाः परिगृह्य विशाम्पते ।
विवर्णवदना राजन् न्यविशन्त महारथाः ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! वे सब महारथी योद्धा दुर्योधनकी आज्ञा शिरोधार्य करके शिविरमें प्रविष्ट हुए। उन सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शिविरप्रयाणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरव-सेनाका शिविरकी ओर प्रस्थानविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥
युधिष्ठिरका रणभूमिमें कर्णको मारा गया देखकर प्रसन्न हो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करना, धृतराष्ट्रका शोकमग्न होना तथा कर्णपर्वके श्रवणकी महिमा
षण्णवतितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका रणभूमिमें कर्णको मारा गया देखकर प्रसन्न हो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करना, धृतराष्ट्रका शोकमग्न होना तथा कर्णपर्वके श्रवणकी महिमा
संजय उवाच
तथा निपतिते कर्णे परसैन्ये च विद्रुते ।
आश्लिष्य पार्थं दाशार्हो हर्षाद् वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब कर्ण मारा गया और शत्रुसेना भाग चली, तब दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको हृदयसे लगाकर बड़े हर्षके साथ इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
हतो वज्रभृता वृत्रस्त्वया कर्णो धनंजय ।
वृत्रकर्णवधं घोरं कथयिष्यन्ति मानवाः ॥ २ ॥
‘धनंजय! पूर्वकालमें वज्रधारी इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था और आज तुमने कर्णको मारा है। वृत्रासुर और कर्ण दोनोंके वधका वृत्तान्त बड़ा भयंकर है। मनुष्य सदा इसकी चर्चा करते रहेंगे ॥ २ ॥
वज्रेण निहतो वृत्रः संयुगे भूरितेजसा ।
त्वया तु निहतः कर्णो धनुषा निशितैः शरैः ॥ ३ ॥
‘वृत्रासुर युद्धमें महातेजस्वी वज्रके द्वारा मारा गया था; परंतु तुमने कर्णको धनुष एवं पैने बाणोंसे ही मार डाला है ॥ ३ ॥
तमिमं विक्रमं लोके प्रथितं ते यशस्करम् ।
निवेदयावः कौन्तेय कुरुराजस्य धीमतः ॥ ४ ॥
‘कुन्तीनन्दन! चलो, हम दोनों तुम्हारे इस विश्व-विख्यात और यशोवर्धक पराक्रमका वृत्तान्त बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरको बतावें ॥ ४ ॥
वधं कर्णस्य संग्रामे दीर्घकालचिकीर्षितम् ।
निवेद्य धर्मराजाय त्वमानृण्यं गमिष्यसि ॥ ५ ॥
‘उन्हें दीर्घकालसे युद्धमें कर्णके वधकी अभिलाषा थी। आज धर्मराजको यह समाचार बताकर तुम उऋण हो जाओगे ॥ ५ ॥
वर्तमाने महायुद्धे तव कर्णस्य चोभयोः ।
द्रष्टुमायोधनं पूर्वमागतो धर्मनन्दनः ॥ ६ ॥
'जब यह महायुद्ध चल रहा था, उस समय तुम्हारा और कर्णका युद्ध देखनेके लिये धर्मनन्दन युधिष्ठिर पहले आये थे ॥ ६ ॥
भृशं तु गाढविद्धत्वान्नाशकत् स्थातुमाहवे ।
ततः स शिविरं गत्वा स्थितवान् पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥
'परंतु गहरी चोट खानेके कारण वे देरतक युद्धस्थलमें ठहर न सके। यहाँसे शिविरमें जाकर वे पुरुषप्रवर युधिष्ठिर विश्राम कर रहे हैं' ॥ ७ ॥
तथेत्युक्तः केशवस्तु पार्थेन यदुपुङ्गवः ।
पर्यावर्तयदव्यग्रो रथं रथवरस्य तम् ॥ ८ ॥
तब अर्जुनने केशवसे 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। तत्पश्चात् यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने शान्तभावसे रथिश्रेष्ठ अर्जुनके उस रथको युधिष्ठिरके शिविरकी ओर लौटाया ॥ ८ ॥
एवमुक्त्वाऽर्जुनं कृष्णः सैनिकानिदमब्रवीत् ।
परानभिमुखा यत्तास्तिष्ठध्वं भद्रमस्तु वः ॥ ९ ॥
अर्जुनसे पूर्वोक्त बात कहकर भगवान् श्रीकृष्ण सैनिकोंसे इस प्रकार बोले— 'वीरो! तुम्हारा कल्याण हो! तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये सदा प्रयत्नपूर्वक डटे रहना' ॥ ९ ॥
धृष्टद्युम्नं युधामन्युं माद्रीपुत्रौ वृकोदरम् ।
युयुधानं च गोविन्द इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
इसके बाद गोविन्द धृष्टद्युम्न, युधामन्यु, नकुल, सहदेव, भीमसेन और सात्यकिसे इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥
यावदावेद्यते राज्ञे हतः कर्णोऽर्जुनेन वै ।
तावद्भवद्भिर्यत्तैस्तु भवितव्यं नराधिपैः ॥ ११ ॥
'अर्जुनने कर्णको मार डाला' यह समाचार जबतक हमलोग राजा युधिष्ठिरसे निवेदन करते हैं, तबतक तुम सभी नरेशोंको यहाँ शत्रुओंकी ओरसे सावधान रहना चाहिये ॥
स तैः शूरैरनुज्ञातो ययौ राजनिवेशनम् ।
पार्थमादाय गोविन्दो ददर्श च युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥
उन शूरवीरोंने उनकी आज्ञा स्वीकार करके जब जानेकी अनुमति दे दी, तब भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको साथ लेकर राजा युधिष्ठिरका दर्शन किया ॥ १२ ॥
शयानं राजशार्दूलं काञ्चने शयनोत्तमे ।
अगृह्णीतां च मुदितौ चरणौ पार्थिवस्य तौ ॥ १३ ॥
उस समय नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर सोनेके उत्तम पलंगपर सो रहे थे। उन दोनोंने वहाँ पहुँचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजाके चरण पकड़ लिये ॥ १३ ॥
तयोः प्रहर्षमालक्ष्य हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ।
राधेयं निहतं मत्वा समुत्तस्थौ युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ उन दोनोंके हर्षोल्लासको देखकर राजा युधिष्ठिर यह समझ गये कि राधापुत्र कर्ण मारा गया; अतः वे शय्यासे उठ खड़े हुए और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥
उवाच च महाबाहुः पुनः पुनररिंदमः । वासुदेवार्जुनौ प्रेम्णा तावुभौ परिषस्वजे ॥ १५ ॥ शत्रुदमन महाबाहु युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण और अर्जुनसे बारंबार प्रेमपूर्वक बोलने और उन दोनोंको हृदयसे लगाने लगे ॥ १५ ॥
तत् तस्मै तद् यथावृत्तं वासुदेवः सहार्जुनः । कथयामास कर्णस्य निधनं यदुपुङ्गवः ॥ १६ ॥ उस समय अर्जुनसहित यदुकुलतिलक वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कर्णके मारे जानेका सारा समाचार उन्हें यथावत्रूपसे कह सुनाया ॥ १६ ॥
ईषदउत्स्मयमानस्तु कृष्णो राजानमब्रवीत् । युधिष्ठिरं हतामित्रं कृताञ्जलिरथाच्युतः ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण हाथ जोड़कर किंचित् मुस्कराते हुए, जिनका शत्रु मारा गया था, उस राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च पाण्डवश्च वृकोदरः । त्वं चापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥ ‘राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डव भीमसेन, पाण्डुकुमार माद्रीनन्दन नकुल-सहदेव और आप भी सकुशल हैं ॥ १८ ॥
मुक्ता वीरक्षयादस्मात् संग्रामाल्लोमहर्षणात् । क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि पाण्डव ॥ १९ ॥ ‘आप सब लोग वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे मुक्त हो गये। पाण्डुनन्दन! अब आगे जो कार्य करने हैं, उन्हें शीघ्र पूर्ण कीजिये ॥ १९ ॥
हतो वैकर्तनो राजन् सूतपुत्रो महारथः । दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र दिष्ट्या वर्धसि भारत ॥ २० ॥ ‘राजन्! महारथी सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण मारा गया, राजेन्द्र! सौभाग्यसे आप विजयी हो रहे हैं। भारत! आपकी वृद्धि हो रही है, यह परम सौभाग्यकी बात है ॥ २० ॥
यस्तु द्यूतजितां कृष्णां प्राहसत् पुरुषाधमः । तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पिबति शोणितम् ॥ २१ ॥ ‘जिस नराधमने जूएमें जीती हुई द्रौपदीका उपहास किया था, आज पृथ्वी उस सूतपुत्र कर्णका रक्त पी रही है ॥ २१ ॥
शेतेऽसौ शरपूर्णाङ्गः शत्रुस्ते कुरुपुङ्गव । तं पश्य पुरुषव्याघ्र विभिन्नं बहुभिः शरैः ॥ २२ ॥
‘कुरुपुंगव! आपका वह शत्रु रणभूमिमें सो रहा है और उसके सारे शरीरमें बाण भरे हुए हैं। नरव्याघ्र! अनेक बाणोंसे क्षत-विक्षत हुए उस कर्णको आप देखिये ।। २२ ।।
हतामित्रामिमामुर्वीमनुशाधि महाभुज ।
यत्तो भूत्वा सहास्माभिर्भुङ्क्ष्व भोगांश्च पुष्कलान् ।। २३ ।।
‘महाबाहो! आप सावधान होकर हम सब लोगोंके साथ इस निष्कंटक हुई पृथ्वीका शासन और प्रचुर भोगोंका उपभोग कीजिये' ।। २३ ।।
संजय उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा दाशार्हं वाक्यमब्रवीत् ।। २४ ।।
संजय कहते हैं—राजन्! महात्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे वार्तालाप आरम्भ किया ।। २४ ।।
दिष्ट्या दिष्ट्येति राजेन्द्र वाक्यं चेदमुवाच ह ।
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दन ।। २५ ।।
त्वया सारथिना पार्थो यत्नवानहनञ्च तम् ।
न तच्चित्रं महाबाहो युष्मद्बुद्धिप्रसादजम् ।। २६ ।।
राजेन्द्र! 'अहो भाग्य! अहो भाग्य!' ऐसा कहकर युधिष्ठिर इस प्रकार बोले—‘महाबाहु देवकीनन्दन! आपके रहते यह महान् कार्य सम्पन्न होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आप-जैसे सारथिके होते ही पार्थने प्रयत्नपूर्वक उसका वध किया है। महाबाहो! आपकी बुद्धिके प्रसादसे ऐसा होना आश्चर्य नहीं है' ।। २५-२६ ।।
प्रगृह्य च कुरुश्रेष्ठ साङ्गदं दक्षिणं भुजम् ।
उवाच धर्मभृत् पार्थ उभौ तौ केशवार्जुनौ ।। २७ ।।
कुरुश्रेष्ठ! इसके बाद धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने बाजूबंदविभूषित श्रीकृष्णका दाहिना हाथ अपने हाथमें लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंसे कहा— ।। २७ ।।
नरनारायणौ देवौ कथितौ नारदेन मे ।
धर्मात्मानौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ।। २८ ।।
‘प्रभो! देवर्षि नारदने मुझसे कहा था कि आप दोनों धर्मात्मा, महात्मा, पुराणपुरुष तथा ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् नर और नारायण हैं ।। २८ ।।
असकृच्चापि मेधावी कृष्णद्वैपायनो मम ।
कथामेतां महाभाग कथयामास तत्त्ववित् ।। २९ ।।
‘महाभाग! परम बुद्धिमान् तत्त्ववेत्ता महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने भी बारंबार मुझसे यही बात कही है ।। २९ ।।
तव कृष्ण प्रसादेन पाण्डवोऽयं धनंजयः ।
जिगायाभिमुखः शत्रून् न चासीद् विमुखः क्वचित् ॥ ३० ॥
‘श्रीकृष्ण! आपके प्रसादसे ही ये पाण्डुपुत्र धनंजय सदा सामने रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजयी हुए हैं और कभी युद्धसे मुँह नहीं मोड़ सके हैं॥ ३० ॥
जयश्चैव ध्रुवोऽस्माकं न त्वस्माकं पराजयः ।
यदा त्वं युधि पार्थस्य सारथ्यमुपजग्मिवान् ॥ ३१ ॥
‘प्रभो! जब आप युद्धमें अर्जुनके सारथि बने थे, तभी हमें यह विश्वास हो गया था कि हमलोगोंकी विजय निश्चित है, अटल है। हमारी पराजय नहीं हो सकती॥ ३१ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च महात्मा गौतमः कृपः ।
अन्ये च बहवः शूरा ये च तेषां पदानुगाः ॥ ३२ ॥
त्वद्बुद्ध्या निहते कर्णे हता गोविन्द सर्वथा ।
‘गोविन्द! भीष्म, द्रोण, कर्ण, महात्मा गौतमवंशी कृपाचार्य तथा इनके पीछे चलनेवाले जो और भी बहुत-से शूरवीर हैं और रहे हैं, आपकी बुद्धिसे आज कर्णके मारे जानेपर उन सबका वध हो गया, ऐसा मैं मानता हूँ’॥ ३२ १/२ ॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु रथं हेमविभूषितम् ॥ ३३ ॥
श्वेतवर्णैर्हयैर्युक्तं कालवालैर्मनोजवैः ।
आस्थाय पुरुषव्याघ्रः स्वबलेनाभिसंवृतः ॥ ३४ ॥
प्रययौ स महाबाहुर्द्रष्टुमायोधनं तदा ।
कृष्णार्जुनाभ्यां वीराभ्यामनुमन्त्र्य ततः प्रियम् ॥ ३५ ॥
आभाषमाणस्तौ वीरावुभौ माधवफाल्गुनौ ।
स ददर्श रणे कर्णं शयानं पुरुषर्षभम् ॥ ३६ ॥
ऐसा कहकर पुरुषसिंह महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर श्वेतवर्ण और काली पूँछवाले, मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो अपनी सेनाके साथ युद्ध देखनेके लिये चले। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीरोंके साथ प्रिय विषयपर परामर्श और उनसे वार्तालाप करते हुए युधिष्ठिरने रणभूमिमें सोये हुए पुरुषप्रवर कर्णको देखा ॥ ३३—३६ ॥
यथा कदम्बकुसुमं केसरैः सर्वतो वृतम् ।
चितं शरशतैः कर्णं धर्मराजो ददर्श सः ॥ ३७ ॥
जैसे कदम्बका फूल सब ओरसे केसरोंसे भरा होता है, उसी प्रकार कर्णका शरीर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त था। धर्मराज युधिष्ठिरने इसी अवस्थामें उसे देखा ॥ ३७ ॥
गन्धतैलावसिक्ताभिः काञ्चनीभिः सहस्रशः ।
दीपिकाभिः कृतोद्योतं पश्यते वै वृषं तदा ॥ ३८ ॥
उस समय सुगन्धित तेलसे भरे हुए सहस्रों सोनेके दीपक जलाकर प्रकाश किया गया था। उसी उजालेमें वे धर्मात्मा कर्णको देख रहे थे॥ ३८ ॥
संछिन्नभिन्नकवचं बाणैश्च विदलीकृतम् । सपुत्रं निहतं दृष्ट्वा कर्णं राजा युधिष्ठिरः ॥ ३९ ॥ संजातप्रत्ययोऽतीव वीक्ष्य चैवं पुनः पुनः । प्रशशंस नरव्याघ्रावुभौ माधवपाण्डवौ ॥ ४० ॥ उसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया था और सारा शरीर बाणोंसे विदीर्ण हो चुका था। उस अवस्थामें पुत्रसहित मरे हुए कर्णको देखकर बारंबार उसका निरीक्षण करके राजा युधिष्ठिरको इस बातपर पूरा-पूरा विश्वास हुआ। फिर वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३९-४० ॥
अद्य राजास्मि गोविन्द पृथिव्यां भ्रातृभिः सह । त्वया नाथेन वीरेण विदुषा परिपालितः ॥ ४१ ॥ उन्होंने कहा—'गोविन्द! आप-जैसे विद्वान् और वीर स्वामी एवं संरक्षकके द्वारा सुरक्षित होकर आज मैं भाइयोंसहित इस भूमण्डलका राजा हो गया ॥ ४१ ॥
हतं श्रुत्वा नरव्याघ्रं राधेयमतिमानिनम् । निराशोऽद्य दुरात्मासौ धार्तराष्ट्रो भविष्यति ॥ ४२ ॥ जीविते चैव राज्ये च हते राधात्मजे रणे । त्वत्प्रसादाद् वयं चैव कृतार्थाः पुरुषर्षभ ॥ ४३ ॥ 'आज दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अत्यन्त अभिमानी नरव्याघ्र राधापुत्र कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर राज्य और जीवनसे भी निराश हो जायगा। पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे रणभूमिमें राधापुत्र कर्णके मारे जानेपर हम सब लोग कृतार्थ हो गये ॥ ४२-४३ ॥
दिष्ट्या जयसि गोविन्द दिष्ट्या शत्रुन्निपातितः । दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च विजयी पाण्डुनन्दनः ॥ ४४ ॥ 'गोविन्द! बड़े भाग्यसे आपकी विजय हुई है। भाग्यसे ही हमारा शत्रु कर्ण आज मार गिराया गया है और सौभाग्यसे ही गाण्डीवधारी पाण्डुनन्दन अर्जुन विजयी हुए हैं' ॥ ४४ ॥
त्रयोदश समास्तीर्णा जागरणेन सुदुःखिताः । स्वप्स्यामोऽद्य सुखं रात्रौ त्वत्प्रसादान्महाभुज ॥ ४५ ॥ 'महाबाहो! अत्यन्त दुःखी होकर हमलोगोंने जागते हुए तेरह वर्ष व्यतीत किये हैं। आजकी रातमें आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक सो सकेंगे' ॥ ४५ ॥
संजय उवाच
एवं स बहुशो राजा प्रशशंस जनार्दनम् । अर्जुनं च कुरुश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४६ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार धर्मराज राजा युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्ण तथा कुरुश्रेष्ठ अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा की ॥ ४६ ॥
दृष्ट्वा च निहतं कर्णं सपुत्रं पार्थसायकैः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मेने च स महीपतिः ॥ ४७ ॥
पुत्रसहित कर्णको अर्जुनके बाणोंसे मारा गया देख राजा युधिष्ठिरने अपना नया जन्म हुआ-सा माना ॥ ४३ ॥
समेत्य च महाराज कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
हर्षयन्ति स्म राजानं हर्षयुक्ता महारथाः ॥ ४८ ॥
महाराज! उस समय हर्षमें भरे हुए पाण्डवपक्षके महारथी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे मिलकर उनका हर्ष बढ़ाने लगे ॥ ४८ ॥
नकुलः सहदेवश्च पाण्डवश्च वृकोदरः ।
सात्यकिश्च महाराज वृष्णीनां प्रवरो रथः ॥ ४९ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पाण्डुपाञ्चालसृञ्जयाः ।
पूजयन्ति स्म कौन्तेयं निहते सूतनन्दने ॥ ५० ॥
राजेन्द्र! नकुल-सहदेव, पाण्डुपुत्र भीमसेन, वृष्णिवंशके श्रेष्ठ महारथी सात्यकि, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी आदि पाण्डव, पांचाल तथा सृंजय योद्धा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर कुन्तीकुमार अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४९-५० ॥
ते वर्धयित्वा नृपतिं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
जितकाशिनो लब्धलक्ष्या युद्धशौण्डाः प्रहारिणः ॥ ५१ ॥
स्तुवन्तः स्तवयुक्ताभिर्वाग्भिः कृष्णौ परंतपौ ।
जग्मुः स्वशिबिरायैव मुदा युक्ता महारथाः ॥ ५२ ॥
वे विजयसे उल्लसित हो रहे थे। उनका लक्ष्य सिद्ध हो गया था। वे युद्धकुशल महारथी योद्धा धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको बधाई देकर स्तुतियुक्त वचनोंद्वारा शत्रुसंतापी श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने शिविरको गये ॥ ५१-५२ ॥
एवमेष क्षयो वृत्तः सुमहाँल्लोमहर्षणः ।
तव दुर्मन्त्रिते राजन् किमर्थमनुशोचसि ॥ ५३ ॥
राजन्! इस प्रकार आपकी ही कुमन्त्रणाके फलस्वरूप यह रोमांचकारी महान् जनसंहार हुआ है। अब आप किसलिये बारंबार शोक करते हैं? ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतदप्रियं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
पपात भूमौ निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ५४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह अप्रिय समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन
राजा धृतराष्ट्र निश्चेष्ट हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५४ ॥
तथा सा पतिता देवी गान्धारी दीर्घदर्शिनी ।
शुशोच बहुलालापैः कर्णस्य निधनं युधि ॥ ५५ ॥
इसी तरह दूरतक सोचनेवाली गान्धारी देवी भी पछाड़ खाकर गिरीं और बहुत विलाप
करती हुई युद्धमें कर्णकी मृत्युके लिये शोक करने लगीं ॥ ५५ ॥
तां पर्यगृह्णाद् विदुरो नृपतिं संजयस्तथा ।
पर्याश्वासयतां चैव तावुभावेव भूमिपम् ॥ ५६ ॥
उस समय विदुरजीने गान्धारी देवीको और संजयने राजा धृतराष्ट्रको सँभाला। फिर
दोनों ही मिलकर राजाको समझाने-बुझाने लगे ॥ ५६ ॥
तथैवोत्थापयामासुर्गान्धारीं कुरुयोषितः ।
स दैवं परमं मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः ॥ ५७ ॥
परां पीडां समाश्रित्य नष्टचित्तो महातपाः ।
चिन्ताशोकपरीतात्मा न जज्ञे मोहपीडितः ।
स समाश्वासितो राजा तूष्णीमासीद् विचेतनः ॥ ५८ ॥
इसी प्रकार कुरुकुलकी स्त्रियोंने आकर गान्धारी देवीको उठाया। भाग्य और
भवितव्यताको ही प्रबल मानकर राजा धृतराष्ट्र भारी व्यथाका अनुभव करने लगे। उनकी
विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। वे महातपस्वी नरेश चिन्ता और शोकमें डूब गये और मोहसे
पीड़ित होनेके कारण उन्हें किसी भी बातकी सुध न रही। विदुर और संजयके समझानेपर
राजा धृतराष्ट्र अचेत-से होकर चुपचाप बैठे रह गये ॥ ५७-५८ ॥
श्रवणमहिमा
इमं महायुद्धमखं महात्मनो-
र्धनंजयस्याधिरथेश्च यः पठेत् ।
स सम्यगिष्टस्य मखस्य यत् फलं
तदाप्नुयात् संश्रवणाच्च भारत ॥ ५९ ॥
भारत! जो मनुष्य महात्मा अर्जुन और कर्णके इस महायुद्धरूपी यज्ञका पाठ अथवा
श्रवण करेगा, वह विधिपूर्वक किये हुए यज्ञानुष्ठानका फल प्राप्त कर लेगा ॥ ५९ ॥
मखो हि विष्णुर्भगवान् सनातनो
वदन्ति तच्चाग्न्यनिलेन्दुभानवः ।
अतोऽनसूयुः शृणुयात् पठेच्च यः
स सर्वलोकानुचरः सुखी भवेत् ॥ ६० ॥
सनातन भगवान् विष्णु यज्ञस्वरूप हैं, इस बातको अग्नि, वायु, चन्द्रमा और सूर्य भी
कहते हैं। अतः जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इस युद्धयज्ञका वर्णन पढ़ता या
सुनता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें* विचरनेवाला और सुखी होता है ।। ६० ।।
तां सर्वदा भक्तिमुपागता नराः
पठन्ति पुण्यां वरसंहितामिमाम् ।
धनेन धान्येन यशसा च मानुषा
नन्दन्ति ते नात्र विचारणास्ति ।। ६१ ।।
जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस उत्तम एवं पुण्यमयी संहिताका पाठ करते हैं, वे धन-धान्य एवं यशसे सम्पन्न हो आनन्दके भागी होते हैं। इस बातमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। ६१ ।।
अतोऽनसूयुः शृणुयात् सदा तु वै
नरः स सर्वाणि सुखानि चाप्नुयात् ।
विष्णुः स्वयंभूर्भगवान् भवश्च
तुष्यन्ति ते तस्य नरोत्तमस्य ।। ६२ ।।
अतः जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर सदा इस संहिताको सुनता है, वह सम्पूर्ण सुखोंको प्राप्त कर लेता है, उस श्रेष्ठ मनुष्यपर भगवान् विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी भी प्रसन्न होते हैं ।। ६२ ।।
वेदावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह दृष्टा
रणे बलं क्षत्रियाणां जयो युधि ।
धनज्येष्ठाश्चापि भवन्ति वैश्याः
शूद्राऽऽरोग्यं प्राप्नुवन्तीह सर्वे ।। ६३ ।।
इसके पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणोंको वेदोंका ज्ञान प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको बल और युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनमें बढ़े-चढ़े हो जाते हैं और समस्त शूद्र आरोग्य लाभ करते हैं ।। ६३ ।।
तथैव विष्णुर्भगवान् सनातनः
स चात्र देवः परिकीर्त्यते यतः ।
ततः स कामाँल्लभते सुखी नरो
महामुनेस्तस्य वचोऽर्चितं यथा ।। ६४ ।।
इसमें सनातन भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण)-की महिमाका वर्णन किया गया है; अतः मनुष्य इसके स्वाध्यायसे सुखी होकर सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। महामुनि व्यासदेवकी इस परम पूजित वाणीका ऐसा ही प्रभाव है ।। ६४ ।।
कपिलानां सवत्सानां वर्षमेकं निरन्तरम् ।
यो दद्यात् सुकृतं तद्धि श्रवणात् कर्णपर्वणः ।। ६५ ।।
लगातार एक वर्षतक प्रतिदिन जो बछड़ोंसहित कपिला गौओंका दान करता है, उसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वही कर्णपर्वके श्रवणमात्रसे मिल जाता है ।। ६५ ।।
॥ कर्णपर्व सम्पूर्णम् ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरहर्षे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका हर्षविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९६ ॥
॥ कर्णपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | (बड़े श्लोक) | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ४०९२॥ | (१०७॥) | १२४७।।।— | ५३४०।— |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | १२५॥ | (२८) | ३८॥ | १६४ |
| कर्णपर्व की | कुल श्लोक-संख्या | ५५०४।— |
* 'सर्वलोकानुचर:' का यह अर्थ भी हो सकता है कि सब लोग उसके अनुचर हो जाते हैं।
शल्यपर्व
।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।
श्रीमहाभारतम्
शल्यपर्व
प्रथमोऽध्यायः
संजयके मुखसे शल्य और दुर्योधनके वधका वृत्तान्त सुनकर राजा धृतराष्ट्रका मूर्च्छित होना और सचेत होनेपर उन्हें विदुरका आश्वासन देना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।
जनमेजय उवाच
एवं निपातिते कर्णे समरे सव्यसाचिना ।
अल्पावशिष्टाः कुरवः किमकुर्वत वै द्विज ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! जब इस प्रकार समरांगणमें सव्यसाची अर्जुनने कर्णको मार गिराया, तब थोड़े-से बचे हुए कौरव-सैनिकोंने क्या किया? ॥ १ ॥
उदीर्यमाणं च बलं दृष्ट्वा राजा सुयोधनः ।
पाण्डवैः प्राप्तकालं च किं प्रापद्यत कौरवः ॥ २ ॥
पाण्डवोंका बल बढ़ता देखकर कुरुवंशी राजा दुर्योधनने उनके साथ कौन-सा समयोचित बर्ताव करनेका निश्चय किया? ॥ २ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम ।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ ३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। मुझे अपने पूर्वजोंका महान् चरित्र सुनते-सुनते तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप इसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कर्णे हते राजन् धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ।
भृशं शोकार्णवे मग्नो निराशः सर्वतोऽभवत् ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन शोकके समुद्रमें डूब गया और सब ओरसे निराश हो गया ॥ ४ ॥
हा कर्ण हा कर्ण इति शोचमानः पुनः पुनः ।
कृच्छ्रात् स्वशिविरं प्राप्तो हतशेषैर्नृपैः सह ॥ ५ ॥
‘हा कर्ण! हा कर्ण!’ ऐसा कहकर बारंबार शोकग्रस्त हो मरनेसे बचे हुए नरेशोंके साथ वह बड़ी कठिनाईसे अपने शिविरमें आया ॥ ५ ॥
स समाश्वास्यमानोऽपि हेतुभिः शास्त्रनिश्चितैः ।
राजभिर्नालभच्छर्म सूतपुत्रवधं स्मरन् ॥ ६ ॥
राजाओंने शास्त्रनिश्चित युक्तियोंद्वारा उसे बहुत समझाया-बुझाया तो भी सूतपुत्रके वधका स्मरण करके उसे शान्ति नहीं मिली ॥ ६ ॥
स दैवं बलवन्मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः ।
संग्रामे निश्चयं कृत्वा पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ ७ ॥
उस राजा दुर्योधनने दैव और भवितव्यताको प्रबल मानकर संग्राम जारी रखनेका ही दृढ़ निश्चय करके पुनः युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ ७ ॥
शल्यं सेनापतिं कृत्वा विधिवद् राजपुङ्गवः ।
रणाय निर्ययौ राजा हतशेषैर्नृपैः सह ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ राजा दुर्योधन शल्यको विधिपूर्वक सेनापति बनाकर मरनेसे बचे हुए राजाओंके साथ युद्धके लिये निकला ।।
ततः सुतुमुलं युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।
बभूव भरतश्रेष्ठ देवासुररणोपमम् ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कौरव-पाण्डव सेनाओंमें घोर युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ॥ ९ ॥
ततः शल्यो महाराज कृत्वा कदनमाहवे ।
ससैन्योऽथ स मध्याह्ने धर्मराजेन घातितः ॥ १० ॥
महाराज! तत्पश्चात् सेनासहित शल्य युद्धमें बड़ा भारी संहार मचाकर मध्याह्नकालमें धर्मराज युधिष्ठिरके हाथसे मारे गये ॥ १० ॥
ततो दुर्योधनो राजा हतबन्धू रणाजिरात् ।
अपसृत्य ह्रदं घोरं विवेश रिपुजाद् भयात् ॥ ११ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधन अपने भाइयोंके मारे जानेपर समरांगणसे दूर जाकर शत्रुके भयसे भयंकर तालाबमें घुस गया ॥ ११ ॥
अथापराह्ने तस्याह्नः परिवार्य सुयोधनः ।
ह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥ १२ ॥ इसके बाद उसी दिन अपराह्नकालमें दुर्योधनपर घेरा डालकर उसे युद्धके लिये तालाबसे बुलाकर भीमसेनेने मार गिराया ॥ १२ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे हतशिष्टास्त्रयो रथाः । संरम्भान्निशि राजेन्द्र जघ्नुः पांचालसोमकान् ॥ १३ ॥ राजेन्द्र! उस महाधनुर्धर दुर्योधनके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए तीन रथी—कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामाने रातमें सोते समय पांचालों और सोमकोंको रोषपूर्वक मार डाला ॥ १३ ॥
ततः पूर्वाह्णसमये शिबिरादेत्य संजयः । प्रविवेश पुरीं दीनो दुःखशोकसमन्वितः ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् पूर्वाह्नकालमें दुःख और शोकमें डूबे हुए संजयने शिबिरसे आकर दीनभावसे हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ १४ ॥
स प्रविश्य पुरीं सूतो भुजावुच्छ्रित्य दुःखितः । वेपमानस्ततो राज्ञः प्रविवेश निकेतनम् ॥ १५ ॥ पुरीमें प्रवेश करके दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखमग्न हो काँपते हुए संजय राजभवनके भीतर गये ॥ १५ ॥
रुरोद च नरव्याघ्र हा राजन्निति दुःखितः । अहो बत विनष्टाः स्म निधनेन महात्मनः ॥ १६ ॥ और रोते हुए दुःखी होकर बोले—'हा नरव्याघ्र नरेश! हा राजन्! बड़े शोककी बात है! महामनस्वी कुरुराजके निधनसे हम सर्वथा नष्टप्राय हो गये! ॥ १६ ॥
विधिश्च बलवानत्र पौरुषं तु निरर्थकम् । शक्रतुल्यबलाः सर्वे यथावध्यन्त पाण्डवैः ॥ १७ ॥ 'इस जगत्में भाग्य ही बलवान् है। पुरुषार्थ तो निरर्थक है, क्योंकि आपके सभी पुत्र इन्द्रके तुल्य बलवान् होनेपर भी पाण्डवोंके हाथसे मारे गये!' ॥ १७ ॥
दृष्ट्वैव च पुरे राजञ्जनः सर्वः स संजयम् । क्लेशेन महता युक्तं सर्वतो राजसत्तम ॥ १८ ॥ रुरोद च भृशोद्विग्नो हा राजन्निति विस्वरम् । आकुमारं नरव्याघ्र तत्र तत्र समन्ततः ॥ १९ ॥ आर्तनादं ततश्चक्रे श्रुत्वा विनिहतं नृपम् । राजन्! नृपश्रेष्ठ! हस्तिनापुरके सभी लोग संजयको सर्वथा महान् क्लेशसे युक्त देखकर अत्यन्त उद्विग्न हो 'हा राजन्!' ऐसा कहते हुए फूट-फूटकर रोने लगे। नरव्याघ्र! वहाँ चारों ओर बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सब लोग राजाको मारा गया सुन आर्तनाद करने लगे ॥ १८-१९ १/२ ॥
धावतश्चाप्यपश्यामस्तत्र तान् पुरुषर्षभान् ॥ २० ॥ नष्टचित्तानिवोन्मत्तान् शोकेन भृशपीडितान् । हमलोगोंने देखा कि वे नगरके श्रेष्ठ पुरुष अचेत और उन्मत्त-से होकर शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो वहाँ दौड़ रहे हैं ॥ २० १/२ ॥
तथा स विह्वलः सूतः प्रविश्य नृपतिक़्षयम् ॥ २१ ॥ ददर्श नृपतिश्रेष्ठं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । इस प्रकार व्याकुल हुए संजयने राजभवनमें प्रवेश करके अपने स्वामी प्रज्ञाचक्षु नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्रका दर्शन किया ॥ २१ १/२ ॥
तथा चासीनमनघं समन्तात् परिवारितम् ॥ २२ ॥ स्नुषाभिर्भरतश्रेष्ठ गान्धार्या विदुरेण च । तथान्यैश्च सुहृद्भिश्च ज्ञातिभिश्च हितैषिभिः ॥ २३ ॥ तमेव चार्थं ध्यायन्तं कर्णस्य निधनं प्रति । भरतश्रेष्ठ! वे निष्पाप नरेश अपनी पुत्रवधुओं, गान्धारी, विदुर तथा अन्य हितैषी सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए बैठे थे और कर्णके मारे जानेसे होनेवाले परिणामका चिन्तन कर रहे थे ॥ २२-२३ १/२ ॥
रुदन्नेवाब्रवीद् वाक्यं राजानं जनमेजय ॥ २४ ॥ नातिहृष्टमनाः सूतो वाक्यसंदिग्धया गिरा । संजयोऽहं नरव्याघ्र नमस्ते भरतर्षभ ॥ २५ ॥ जनमेजय! उस समय संजयने खिन्नचित्त होकर रोते हुए ही संदिग्ध वाणीमें कहा—‘नरव्याघ्र! भरतश्रेष्ठ! मैं संजय हूँ। आपको नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥
मद्राधिपो हतः शल्यः शकुनिः सौबलस्तथा । उलूकः पुरुषव्याघ्र कैतव्यो दृढविक्रमः ॥ २६ ॥ ‘पुरुषसिंह! मद्राज शल्य, सुबलपुत्र शकुनि तथा जुआरीका पुत्र सुदृढ़पराक्रमी उलूक—ये सब-के-सब मारे गये ॥ २६ ॥
संशप्तका हताः सर्वे काम्बोजाश्च शकैः सह । म्लेच्छाश्च पर्वतीयाश्च यवना विनिपातिताः ॥ २७ ॥ ‘समस्त संशप्तक वीर, काम्बोज, शक, म्लेच्छ, पर्वतीय योद्धा और यवनसैनिक मार गिराये गये ॥ २७ ॥
प्राच्या हता महाराज दाक्षिणात्याश्च सर्वशः । उदीच्याश्च हताः सर्वे प्रतीच्याश्च नरोत्तमाः ॥ २८ ॥ ‘महाराज! पूर्वदेशके योद्धा मारे गये, समस्त दाक्षिणाात्योंका संहार हो गया तथा उत्तर और पश्चिमके सभी श्रेष्ठ मनुष्य मार डाले गये ॥ २८ ॥
राजानो राजपुत्राश्च सर्वे ते निहता नृप ।
दुर्योधनो हतो राजा यथोक्तं पाण्डवेन ह ॥ २९ ॥
भग्नसक्थो महाराज शेते पांसुषु रूषितः ।
‘नरेश्वर! समस्त राजा और राजकुमार कालके गालमें चले गये। महाराज! जैसा पाण्डुपुत्र भीमसेनने कहा था, उसके अनुसार राजा दुर्योधन भी मारा गया। उसकी जाँघ टूट गयी और वह धूल-धूसर होकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ २९½ ॥
धृष्टद्युम्नो महाराज शिखण्डी चापराजितः ॥ ३० ॥
उत्तमौजा युधामन्युस्तथा राजन् प्रभद्रकाः ।
पञ्चालाश्च नरव्याघ्र चेदयश्च निषूदिताः ॥ ३१ ॥
‘महाराज! नरव्याघ्र नरेश! धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, उत्तमौजा, युधामन्यु, प्रभद्रकगण, पांचाल और चेदिदेशीय योद्धाओंका भी संहार हो गया' ॥ ३०-३१ ॥
तव पुत्रा हताः सर्वे द्रौपदेयाश्च भारत ।
कर्णपुत्रो हतः शूरो वृषसेनः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
‘भारत! आपके तथा द्रौपदीके भी सभी पुत्र मारे गये। कर्णका प्रतापी एवं शूरवीर पुत्र वृषसेन भी नष्ट हो गया ॥ ३२ ॥
नरा विनिहताः सर्वे गजाश्च विनिपातिताः ।
रथिनश्च नरव्याघ्र हयाश्च निहता युधि ॥ ३३ ॥
‘नरव्याघ्र! युद्धस्थलमें समस्त पैदल मनुष्य, हाथीसवार, रथी और घुड़सवार भी मार गिराये गये ॥ ३३ ॥
किञ्चिच्छेषं च शिविरं तावकानां कृतं प्रभो ।
पाण्डवानां कुरूणां च समासाद्य परस्परम् ॥ ३४ ॥
‘प्रभो! पाण्डवों तथा कौरवोंमें परस्पर संघर्ष होकर आपके पुत्रों तथा पाण्डवोंके शिबिरमें किंचिन्मात्र ही शेष रह गया है ॥ ३४ ॥
प्रायः स्त्रीशेषमभवज्जगत् कालेन मोहितम् ।
सप्त पाण्डवतः शेषा धार्तराष्ट्रास्त्रयो रथाः ॥ ३५ ॥
‘प्रायः कालसे मोहित हुए सारे जगत्में स्त्रियाँ ही शेष रह गयी हैं। पाण्डवपक्षमें सात और आपके पक्षमें तीन रथी मरनेसे बचे हैं ॥ ३५ ॥
ते चैव भ्रातरः पञ्च वासुदेवोऽथ सात्यकिः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्च जयतां वरः ॥ ३६ ॥
‘उधर पाँचों भाई पाण्डव, वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और सात्यकि शेष हैं तथा इधर कृपाचार्य, कृतवर्मा और विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा जीवित हैं ॥ ३६ ॥
तथाप्येते महाराज रथिनो नृपसत्तम ।
अक्षौहिणीनां सर्वासां समेतानां जनेश्वर ॥ ३७ ॥
एते शेषा महाराज सर्वेऽन्ये निधनं गताः ।
'नृपश्रेष्ठ! जनेश्वर! महाराज! उभय पक्षमें जो समस्त अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं, उनमेंसे ये ही रथी शेष रह गये हैं, अन्य सब लोग कालके गालमें चले गये ।। ३७ १/२ ।। कालेन निहतं सर्वं जगद् वै भरतर्षभ ।। ३८ ।। दुर्योधनं वै पुरतः कृत्वा वैरं च भारत । 'भरतश्रेष्ठ! भरतनन्दन! कालने दुर्योधन और उसके वैरको आगे करके सम्पूर्ण जगत्को नष्ट कर दिया' ।। ३८ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचः क्रूरं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।। ३९ ।। निपपात स राजेन्द्रो गतसत्त्वो महीतले । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह क्रूर वचन सुनकर राजाधिराज जनेश्वर धृतराष्ट्र प्राणहीन-से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ३९ १/२ ।। तस्मिन् निपतिते भूमौ विदुरोऽपि महायशाः ।। ४० ।। निपपात महाराज शोकव्यसनकर्षितः । महाराज! उनके गिरते ही महायशस्वी विदुरजी भी शोकसंतापसे दुर्बल हो धड़ामसे गिर पड़े ।। ४० १/२ ।। गान्धारी च नृपश्रेष्ठ सर्वाश्च कुरुयोषितः ।। ४१ ।। पतिताः सहसा भूमौ श्रुत्वा क्रूरं वचस्तदा । निःसंज्ञं पतितं भूमौ तदासीद् राजमण्डलम् ।। ४२ ।। प्रलापयुक्तं महति चित्रन्यस्तं पटे यथा । नृपश्रेष्ठ! उस समय वह क्रूरतापूर्ण वचन सुनकर कुरुकुलकी समस्त स्त्रियाँ और गान्धारी देवी सहसा पृथ्वीपर गिर गयीं, राजपरिवारके सभी लोग अपनी सुध-बुध खोकर धरतीपर गिर पड़े और प्रलाप करने लगे। वे ऐसे जान पड़ते थे मानो विशाल पटपर अंकित किये गये चित्र हों ।। ४१-४२ १/२ ।। कृच्छ्रेण तु ततो राजा धृतराष्ट्रो महीपतिः ।। ४३ ।। शनैरलभत प्राणान् पुत्रव्यसनकर्शितः । तत्पश्चात् पुत्रशोकसे पीड़ित हुए पृथ्वीपति राजा धृतराष्ट्रमें बड़ी कठिनाईसे धीरे-धीरे प्राणोंका संचार हुआ ।। लब्ध्वा तु स नृपः संज्ञां वेपमानः सुदुःखितः ।। ४४ ।। उदीक्ष्य च दिशः सर्वाः क्षत्तारं वाक्यमब्रवीत् । विद्वन् क्षत्तर्महाप्राज्ञ त्वं गतिर्भरतर्षभ ।। ४५ ।। ममानाथास्य सुभृशं पुत्रैर्हीनस्य सर्वशः । एवमुक्त्वा ततो भूयो विसंज्ञो निपपात ह ।। ४६ ।।
चेतना पाकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त दुःखी हो थर-थर काँपने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखकर विदुरसे इस प्रकार बोले—‘विद्वन्! महाज्ञानी विदुर! भरतभूषण! अब तुम्हीं मुझ पुत्रहीन और अनाथके सर्वथा आश्रय हो।’ इतना कहकर वे पुनः अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४४—४६ ॥
तं तथा पतितं दृष्ट्वा बान्धवा येऽस्य केचन । शीतैस्ते सिषिचुस्तोयैर्व्यव्यजुर्व्यजनैरपि ॥ ४७ ॥ उन्हें इस प्रकार गिरा हुआ देख उनके जो कोई बन्धु-बान्धव वहाँ मौजूद थे, उन्होंने राजाके शरीरपर ठंडे जलके छींटे दिये और व्यजन डुलाये ॥ ४७ ॥
स तु दीर्घेण कालेन प्रत्याश्वस्तो नराधिपः । तूष्णीं दध्यौ महीपालः पुत्रव्यसनकर्शितः ॥ ४८ ॥ फिर बहुत देरके बाद जब राजा धृतराष्ट्रको होश हुआ, तब वे पुत्रशोकसे पीड़ित हो चिन्तामग्न हो गये ॥
निःश्वसन् जिह्मग इव कुम्भक्षिप्तो विशाम्पते । संजयोऽप्यरुदत् तत्र दृष्ट्वा राजानमातुरम् ॥ ४९ ॥ प्रजानाथ! उस समय वे घड़ेमें रखे हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगे। राजाको इस प्रकार आतुर देखकर संजय भी वहाँ रोने लगे ॥ ४९ ॥
तथा सर्वाः स्त्रियश्चैव गान्धारी च यशस्विनी । ततो दीर्घेण कालेन विदुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ५० ॥ धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठ मुह्यमानो मुहुर्मुहुः । गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनी ॥ ५१ ॥ तथेमे सुहृदः सर्वे भ्राम्यते मे मनो भृशम् । फिर सारी स्त्रियाँ और यशस्विनी गान्धारी देवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् बहुत देरके बाद बारंबार मोहित होते हुए धृतराष्ट्रने विदुरसे कहा—‘ये सारी स्त्रियाँ और यशस्विनी गान्धारी देवी भी यहाँसे चली जायँ। ये समस्त सुहृद् भी अब यहाँसे पधारें; क्योंकि मेरा चित्त अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है’ ॥
एवमुक्तस्ततः क्षत्ता ताः स्त्रियो भरतर्षभ ॥ ५२ ॥ विसर्जयामास शनैर्वेपमानः पुनः पुनः । भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर बारंबार काँपते हुए विदुरजीने उन सब स्त्रियोंको धीरे-धीरे बिदा कर दिया ॥ ५२ १/२ ॥
निष्चक्रमुस्ततः सर्वाः स्त्रियो भरतसत्तम ॥ ५३ ॥ सुहृदश्च तथा सर्वे दृष्ट्वा राजानमातुरम् । भरतभूषण! फिर वे सारी स्त्रियाँ और समस्त सुहृद्गण राजाको आतुर देखकर वहाँसे चले गये ॥ ५३ १/२ ॥
ततो नरपतिं तत्र लब्धसंज्ञं परंतप ।। ५४ ।।
अवैक्षत् संजयो दीनं रोदमानं भृशातुरम् ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तदनन्तर होशमें आकर अत्यन्त आतुर हो दीनभावसे विलाप करते हुए राजा धृतराष्ट्रकी ओर संजयने देखा ।। ५४ १/२ ।।
प्राञ्जलिर्निःश्वसन्तं च तं नरेन्द्रं मुहुर्मुहुः ।
समाश्वासयत क्षत्ता वचसा मधुरेण च ।। ५५ ।।
उस समय बारंबार लंबी साँस खींचते हुए राजा धृतराष्ट्रको विदुरजीने हाथ जोड़कर अपनी मधुर वाणीद्वारा आश्वासन दिया ।। ५५ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रप्रमोहे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका मोहविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।