महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कोका इव महानागं मा वै हन्युर्यतव्रतम् ॥ २८ ॥ अतः हमलोग शीघ्र वहीं चलें, जहाँ द्रोणाचार्य खड़े हैं। कहीं ऐसा न हो कि कुछ भेड़िये (जैसे पाण्डव-सैनिक) महान् गजराज-जैसे व्रतधारी द्रोणाचार्यका वध कर डालें ॥ २८ ॥
संजय उवाच राधेयस्य वचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः । भ्रातृभिः सहितो राजन् प्रायाद् द्रोणरथं प्रति ॥ २९ ॥ संजय कहते हैं— महाराज! राधानन्दन कर्णकी बात सुनकर राजा दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ द्रोणाचार्यके रथकी ओर चल दिया ॥ २९ ॥
तत्रारावो महानासीदेकं द्रोणं जिघांसताम् । पाण्डवानां निवृत्तानां नानावर्णैर्हयोत्तमैः ॥ ३० ॥ वहाँ अनेक प्रकारके रंगवाले उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए रथोंद्वारा एकमात्र द्रोणाचार्यको मार डालनेकी इच्छासे लौटे हुए पाण्डव-सैनिकोंका महान् कोलाहल प्रकट हो रहा था ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्रोणयुद्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें द्रोणाचार्यका युद्धविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं।)
त्रयोविंशोऽध्यायः
पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वेषामेव मे ब्रूहि रथचिह्नानि संजय ।
ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! क्रोधमें भरे हुए भीमसेन आदि जो योद्धा द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर रहे थे, उन सबके रथोंके (घोड़े-ध्वजा आदि) चिह्न कैसे थे? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
ऋक्षवर्णैर्हयैर्दृष्ट्वा व्यायच्छन्तं वृकोदरम् ।
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेयः संन्यवर्तत ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! रीछके समान रंगवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर भीमसेनको आते देख चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंवाले शूरवीर सात्यकि भी लौट पड़े ॥ २ ॥
सारङ्गाश्वो युधामन्युः स्वयं प्रत्वरयन् हयान् ।
पर्यवर्तत दुर्धर्षः क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥ ३ ॥
सारंगके³ समान (सफेद, नीले और लाल) रंगके घोड़ोंसे युक्त युधामन्यु, स्वयं ही अपने घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ द्रोणाचार्यके रथकी ओर लौट पड़ा। वह दुर्जय वीर क्रोधमें भरा हुआ था ॥ ३ ॥
पारावतसवर्णैस्तु हेमभाण्डैर्महाजवैः ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नो न्यवर्तत ॥ ४ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न कबूतरके³ समान (सफेद और नीले) रंगवाले सुवर्णभूषित एवं अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा लौट आया ॥ ४ ॥
पितरं तु परिप्रेप्सुः क्षत्रधर्मा यतव्रतः ।
सिद्धिं चास्य परां काङ्क्षन् शोणाश्वः संन्यवर्तत ॥ ५ ॥
नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाला क्षत्रधर्मा अपने पिता धृष्टद्युम्नकी रक्षा और उनके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि चाहता हुआ लाल रंगके घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ हो लौट आया ॥ ५ ॥
पद्मपत्रनिभांश्चाश्वान् मल्लिकाक्षान् स्वलंकृतान् ।
शिखण्डिः क्षत्रदेवस्तु स्वयं प्रत्वरयन् ययौ ॥ ६ ॥ शिखण्डीका पुत्र क्षत्रदेव, कमलपत्रके समान रंग तथा निर्मल नेत्रोंवाले सजे-सजाये घोड़ोंको स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ वहाँ आया ॥ ६ ॥
दर्शनीयास्तु काम्बोजाः शुकपत्रपरिच्छदाः । वहन्तो नकुलं शीघ्रं तावकानभिदुद्रुवुः ॥ ७ ॥ तोतेकी पाँखके समान रोमवाले दर्शनीय काम्बोजदेशीय³ घोड़े नकुलको वहन करते हुए बड़ी शीघ्रताके साथ आपके सैनिकोंकी ओर दौड़े ॥ ७ ॥
कृष्णास्तु मेघसंकाशा अवहन्नुत्तमौजसम् । दुर्धर्षायाभिसंधाय क्रुद्धं युद्धाय भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! दुर्धर्ष युद्धका संकल्प लेकर क्रोधमें भरे हुए उत्तमौजाको मेघके समान श्यामवर्णवाले घोड़े युद्धस्थलकी ओर ले जा रहे थे ॥ ८ ॥
तथा तित्तिरिकल्माषा हया वातसमा जवे । अवहंस्तुमुले युद्धे सहदेवमुदायुधम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न सहदेवको तीतरके समान चितकबरे रंगवाले तथा वायुके समान वेगशाली घोड़े उस भयंकर युद्धमें ले गये ॥ ९ ॥
दन्तवर्णास्तु राजानं कालवाला युधिष्ठिरम् । भीमवेगा नरव्याघ्रमवहन् वातरंहसः ॥ १० ॥ हाथीके दाँतके समान सफेद रंग, काली पूँछ तथा वायुके समान तीव्र एवं भयंकर वेगवाले घोड़े नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरको रणक्षेत्रमें ले गये ॥ १० ॥
हेमोत्तमप्रतिच्छन्नैर्हयैर्वातसमैर्जवे । अभ्यवर्तन्त सैन्यानि सर्वाण्येव युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥ सोनेके उत्तम आवरणोंसे ढके हुए, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा सारी सेनाओंने महाराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेर रखा था ॥ ११ ॥
राजंस्त्वनन्तरो राजा पाञ्चाल्यो द्रुपदोऽभवत् । जातरूपमयच्छत्रः सर्वैस्तैरभिरक्षितः ॥ १२ ॥ राजा युधिष्ठिरके पीछे पांचालराज द्रुपद चल रहे थे। उनका छत्र सोनेका बना हुआ था। वे भी समस्त सैनिकोंद्वारा सुरक्षित थे ॥ १२ ॥
ललामैर्हरिभिर्युक्तः सर्वशब्दक्षमैर्युधि । राज्ञां मध्ये महेष्वासः शान्तभीरभ्यवर्तत ॥ १३ ॥ वे 'ललाम'¹ और 'हरि'² संज्ञावाले घोड़ोंसे, जो सब प्रकारके शब्दोंको सुनकर उन्हें सहन करनेमें समर्थ थे, सुशोभित हो रहे थे। उस युद्धस्थलमें
समस्त राजाओंके मध्यभागमें महाधनुर्धर राजा द्रुपद निर्भय होकर द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये आये ।। १३ ।। तं विराटोऽन्वयाच्छीघ्रं सह सर्वैर्महारथैः । केकयाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च ।। १४ ।। स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मत्स्यराजानमन्वयुः । द्रुपदके पीछे सम्पूर्ण महारथियोंके साथ राजा विराट शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे। केकयराजकुमार, शिखण्डी तथा धृष्टकेतु—ये अपनी-अपनी सेनाओंसे घिरकर मत्स्यराज विराटके पीछे चल रहे थे ।। १४ १/२ ।। तं तु पाटलिपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ।। १५ ।। वहमाना व्यराजन्त मत्स्यस्यामित्रघातिनः । शत्रुसूदन मत्स्यराज विराटके रथको जो वहन करते हुए शोभा पा रहे थे, वे उत्तम घोड़े पाडरके फूलोंके समान लाल और सफेद रंगवाले थे ।। १५ १/२ ।। हरिद्रासमवर्णास्तु जवना हेममालिनः ।। १६ ।। पुत्रं विराटराजस्य सत्वरं समुदावहन् । हल्दीके समान पीले रंगवाले तथा सुवर्णमय माला धारण करनेवाले वेगशाली घोड़े विराटराजके पुत्रको शीघ्रतापूर्वक रणभूमिकी ओर ले जा रहे थे ।। १६ १/२ ।। इन्द्रगोपकवर्णैश्च भ्रातरः पञ्च केकयाः ।। १७ ।। जातरूपसमाभासाः सर्वे लोहितकध्वजाः । पाँच भाई केकयराजकुमार इन्द्रगोप (वीरबहूटी)-के समान रंगवाले घोड़ोंद्वारा रणभूमिमें लौट रहे थे। उन पाँचों भाइयोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी तथा वे सब-के-सब लाल रंगकी ध्वजा-पताका धारण किये हुए थे ।। १७ १/२ ।। ते हेममालिनः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ।। १८ ।। वर्षन्त इव जीमूताः प्रत्यदृश्यन्त दंशिताः । सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित वे सभी युद्धविशारद शूरवीर मेघोंके समान बाण-वर्षा करते हुए कवच आदिसे सुसज्जित दिखायी देते थे ।। १८ १/२ ।। आमपात्रनिकाशास्तु पांचाल्यममितौजसम् ।। १९ ।। दत्तास्तुम्बुरुणा दिव्याः शिखण्डिनमुदावहन् । अमित तेजस्वी पांचालराजकुमार शिखण्डीको तुम्बुरुके दिये हुए मिट्टीके कच्चे बर्तनके समान रंगवाले दिव्य अश्व वहन करते थे ।। १९ १/२ ।। तथा द्वादश साहस्त्राः पञ्चालानां महारथाः ।। २० ।।
तेषां तु षट् सहस्राणि ये शिखण्डिनमन्वयुः ।
पाञ्चालोंके जो बारह हजार महारथी युद्धमें लड़ रहे थे, उनमेंसे छः हजार इस समय शिखण्डीके पीछे चलते थे ॥ २० १/२ ॥
पुत्रं तु शिशुपालस्य नरसिंहस्य मारिष ॥ २१ ॥
आक्रीडन्तो वहन्ति स्म सारङ्गशबला हयाः ।
आर्य! पुरुषसिंह शिशुपालके पुत्रके सारंगके समान चितकबरे अश्व खेल करते हुए-से वहन कर रहे थे ॥ २१ १/२ ॥
धृष्टकेतुस्तु चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः ॥ २२ ॥
काम्बोजैः शबलैरश्वैरभ्यवर्तत दुर्जयः ।
चेदिदेशका श्रेष्ठ राजा अत्यन्त बलवान् दुर्जय वीर धृष्टकेतु काम्बोजदेशीय चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धभूमिकी ओर लौट रहा था ॥ २२ १/२ ॥
बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं सुकुमारं हयोत्तमाः ॥ २३ ॥
पलालधूमसंकाशाः सैन्धवाः शीघ्रमावहन् ।
केकयदेशके सुकुमार राजकुमार बृहत्क्षत्रको पुआलके धूएँके समान उज्ज्वल-नील वर्णवाले सिन्धुदेशीय¹ अच्छी जातिके घोड़ोंने शीघ्रतापूर्वक रणभूमिमें पहुँचाया ॥
मल्लिकाक्षाः पद्मवर्णा बाह्लिजाताः स्वलंकृताः ॥ २४ ॥
शूरं शिखण्डिनः पुत्रमृक्षदेवमुदावहन् ।
शिखण्डीके शूरवीर पुत्र ऋक्षदेवको पद्मके² समान वर्ण और निर्मल नेत्रवाले बाह्लिक³ देशके सजे-सजाये घोड़ोंने रणभूमिमें पहुँचाया ॥ २४ १/२ ॥
रुक्मभाण्डप्रतिच्छन्नाः कौशेयसदृशा हराः ॥ २५ ॥
क्षमावन्तोऽवहन् संख्ये सेनाबिन्दुमरिंदमम् ।
सोनेके आभूषणों तथा कवचोंसे सुशोभित रेशमके समान श्वेत-पीत रोमवाले सहनशील घोड़ोंने शत्रुओंका दमन करनेवाले सेनाबिन्दुको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २५ १/२ ॥
युवानमवहन् युद्धे क्रौञ्चवर्णा हयोत्तमाः ॥ २६ ॥
काश्यस्याभिभुवः पुत्रं सुकुमारं महारथम् ।
क्रौंचवर्णक⁴ उत्तम घोड़ोंने काशिराज अभिभूके सुकुमार एवं युवा पुत्रको, जो महारथी वीर था, युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २६ १/२ ॥
श्वेतास्तु प्रतिविन्ध्यं तं कृष्णग्रीवा मनोजवाः ।
यन्तुः प्रेष्यकरा राजन् राजपुत्रमुदावहन् ॥ २७ ॥
राजन्! मनके समान वेगशाली तथा काली गर्दनवाले श्वेतवर्णके घोड़े, जो सारथिकी आज्ञा माननेवाले थे, राजकुमार प्रतिविन्ध्यको रणमें ले गये ॥ २७ ॥ सुतसोमं तु यः सौम्यं पार्थः पुत्रमजीजनत् । माषपुष्पसवर्णास्तमवहन् वाजिनो रणे ॥ २८ ॥ कुन्तीकुमार भीमसेनने जिस सौम्यरूपवाले पुत्र सुतसोमको जन्म दिया था, उसे उड़दके फूलकी भाँति सफेद और पीले रंगवाले घोड़ोंने रणक्षेत्रमें पहुँचाया ॥ सहस्रसोमप्रतिमो बभूव पुरे कुरूणामुदयेन्दुनाम्नि । तस्मिंजात: सोमसंक्रन्दमध्ये यस्मात् तस्मात् सुतसोमोऽभवत् सः ॥ २९ ॥ कौरवोंके उदयेन्दु नामक पुर (इन्द्रप्रस्थ) में सोमाभिषव (सोमरस निकालने) के दिन सहस्रों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् वह बालक उत्पन्न हुआ था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया था ॥ २९ ॥ नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हयाः । आदित्यतरुणप्रख्याः श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३० ॥ नकुलके स्पृहणीय पुत्र शतानीकको शालपुष्पके समान रक्त-पीतवर्णवाले और बालसूर्यके समान कान्तिमान् अश्व रणभूमिमें ले गये ॥ ३० ॥ काञ्चनापिहितैर्युक्तैर्मयूरग्रीवसंनिभाः । द्रौपदेयं नरव्याघ्रं श्रुतकर्माणमाहवे ॥ ३१ ॥ मोरकी गर्दनके समान नीले रंगवाले घोड़ोंने सुनहरी रस्सियोंसे आबद्ध हो द्रौपदीपुत्र सहदेवकुमार पुरुषसिंह श्रुतकर्माको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ३१ ॥ श्रुतकीर्तिं श्रुतनिधिं द्रौपदेयं हयोत्तमाः । ऊहुः पार्थसमं युद्धे चाषपत्रनिभा हयाः ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार युद्धमें अर्जुनकी समानता करनेवाले, शास्त्रज्ञानके भण्डार द्रौपदीनन्दन अर्जुनकुमार श्रुतकीर्तिको नीलकण्ठकी पाँखके समान रंगवाले उत्तम घोड़े रणक्षेत्रमें ले गये ॥ ३२ ॥ यमाहुरर्ध्यर्धगुणं कृष्णात् पार्थाच्च संयुगे । अभिमन्युं पिशङ्गास्तं कुमारमवहन् रणे ॥ ३३ ॥ जिसे युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनसे ड्योढ़ा बताया गया है, उस सुभद्राकुमार अभिमन्युको रणक्षेत्रमें कपिलवर्णवाले घोड़े ले गये ॥ ३३ ॥ एकस्तु धार्तराष्ट्रेभ्यः पाण्डवान् यः समाश्रितः । तं बृहन्तो महाकाया युयुत्सुमवहन् रणे ॥ ३४ ॥
पलालकाण्डवर्णास्तु वार्धक्षेमिं तरस्विनम् ।
ऊहुः सुतुमुले युद्धे हयाः कृष्णाः स्वलंकृताः ॥ ३५ ॥
आपके पुत्रोंमेंसे जो एक युयुत्सु पाण्डवोंकी शरणमें जा चुके हैं, उन्हें पुआलके डंठलके समान रंगवाले, विशालकाय एवं बृहद् अश्वोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया। उस भयंकर युद्धमें काले रंगके सजे-सजाये घोड़ोंने वृद्धक्षेमके वेगशाली पुत्रको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥
कुमारं शितिपादास्तु रुक्मचित्रैरुुरच्छदैः ।
सौचित्तिमवहन् युद्धे यन्तुः प्रेष्यकरा हयाः ॥ ३६ ॥
सुचित्तके पुत्र कुमार सत्यधृतिको सुवर्णमय विचित्र कवचोंसे सुसज्जित और काले रंगके पैरोंवाले, सारथिकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले उत्तम घोड़ोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३६ ॥
रुक्मपीठावकीर्णास्तु कौशेयसदृशा हयाः ।
सुवर्णमालिनः क्षान्ताः श्रेणिमन्तमुदावहन् ॥ ३७ ॥
सुनहरी पीठसे युक्त, रेशमके समान रोमवाले, सुवर्णमालाधारी तथा सहनशक्तिसे सम्पन्न घोड़ोंने श्रेणिमान्को युद्धमें पहुँचाया ॥ ३७ ॥
रुक्ममालाधराः शूरा हेमपृष्ठाः स्वलंकृताः ।
काशिराजं नरश्रेष्ठं श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३८ ॥
सुवर्णमाला धारण करनेवाले शूरवीर और सुवर्ण रंगके पृष्ठभागवाले सजे-सजाये घोड़े स्पृहणीय नरश्रेष्ठ काशिराजको रणभूमिमें ले गये ॥ ३८ ॥
अस्त्राणां च धनुर्वेदे बाह्ये वेदे च पारगम् ।
तं सत्यधृतिमायान्तमरुणाः समुदावहन् ॥ ३९ ॥
अस्त्रोंके ज्ञानमें, धनुर्वेदमें तथा ब्राह्मवेदमें भी पारंगत पूर्वोक्त सत्यधृतिको अरुणवर्णके अश्वोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३९ ॥
यः स पाञ्चालसेनानीर्द्रोणमंशमकल्पयत् ।
पारावतसवर्णास्तं धृष्टद्युम्नमुदावहन् ॥ ४० ॥
जो पांचालोंके सेनापति हैं, जिन्होंने द्रोणाचार्यको अपना भाग निश्चित कर रखा था, उन धृष्टद्युम्नको कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥
तमन्वयात् सत्यधृतिः सौचित्तियुद्धदुर्मदः ।
श्रेणिमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥ ४१ ॥
उनके पीछे सुचित्तके पुत्र युद्धदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान्, वसुदान* और काशिराजके पुत्र अभिभू चल रहे थे ॥ ४१ ॥
युक्तैः परमकम्बोजैर्जवनैर्हेममालिभिः ।
भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ॥ ४२ ॥ ये सब-के-सब यम और कुबेरके समान पराक्रमी योद्धा वेगशाली, सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एवं सुशिक्षित, उत्तम काबुली घोड़ोंद्वारा शत्रुसेनाको भयभीत करते हुए धृष्टद्युम्नका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४२ ॥
प्रभद्रकास्तु काम्बोजाः षट्सहस्राण्युदायुधाः । नानावर्णैर्हयैः श्रेष्ठैर्हेमवर्णरथध्वजाः ॥ ४३ ॥ शरव्रातैर्विधुन्वन्तः शत्रून् विततकार्मुकाः । समानमृत्युवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वयुः ॥ ४४ ॥ इनके सिवा छः हजार काम्बोजदेशीय प्रभद्रक नामवाले योद्धा हथियार उठाये, भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ घोड़ोंसे जुते हुए सुनहरे रंगके रथ और ध्वजासे सम्पन्न हो धनुष फैलाये अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको भयसे कम्पित करते हुए सब समानरूपसे मृत्युको स्वीकार करनेके लिये उद्यत हो धृष्टद्युम्नके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥
बभ्रुकौशेयवर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः । ऊहुरम्लानमनसश्चेकितानं हयोत्तमाः ॥ ४५ ॥ नेवले तथा रेशमके समान रंगवाले (पिंगल-गौर-वर्णके) उत्तम अश्व, जो सुन्दर सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा प्रसन्नचित्तवाले थे, चेकितानको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ४५ ॥
इन्द्रायुधसवर्णैस्तु कुन्तिभोजो हयोत्तमैः । आयात् सदश्वैः पुरुजिन्मातुलः सव्यसाचिनः ॥ ४६ ॥ अर्जुनके मामा पुरुजित् कुन्तिभोज इन्द्रधनुषके समान रंगवाले उत्तम श्रेणीके सुन्दर अश्वोंद्वारा उस युद्धभूमिमें आये ॥ ४६ ॥
अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव । राजानं रोचमानं ते हयाः संख्ये समावहन् ॥ ४७ ॥ राजा रोचमानको ताराओंसे चित्रित अन्तरिक्षके समान चितकबरे घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ४७ ॥
कर्बुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः । जारासंधिं हयाः श्रेष्ठाः सहदेवमुदावहन् ॥ ४८ ॥ जरासंधके पुत्र सहदेवको काले पैरोंवाले चितकबरे श्रेष्ठ घोड़े, जो सोनेकी जालीसे विभूषित थे, रणभूमिमें ले गये ॥ ४८ ॥
ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हयोत्तमाः । जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ॥ ४९ ॥
कमलके नालकी भाँति श्वेतवर्णवाले और श्येन पक्षीके समान वेगशाली उत्तम एवं विचित्र अश्व सुदामाको लेकर रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ।। ४९ ।।
शशलोहितवर्णास्तु पाण्डुरोद्गतराजयः ।
पाञ्चाल्यं गोपतेः पुत्रं सिंहसेनमुदावहन् ।। ५० ।।
जिनके रंग खरगोशके समान और लोहित हैं तथा जिनके अंगोंमें श्वेत-पीत रोमावलियाँ सुशोभित होती हैं, वे घोड़े उन गोपतिपुत्र पांचालराजकुमार सिंहसेनको* युद्धस्थलमें ले गये थे ।। ५० ।।
पञ्चालानां नरव्याघ्रो यः ख्यातो जनमेजयः ।
तस्य सर्षपपुष्पाणां तुल्यवर्णा हयोत्तमाः ।। ५१ ।।
पांचालोंमें विख्यात जो पुरुषसिंह जनमेजय हैं, उनके उत्तम घोड़े सरसोंके फूलोंके समान पीले रंगके थे ।।
माषवर्णाश्च जवना बृहन्तो हेममालिनः ।
दधिपृष्ठाश्चित्रमुखाः पाञ्चाल्यमवहन् द्रुतम् ।। ५२ ।।
उड़दके समान रंगवाले, स्वर्णमालाविभूषित, दधिके समान श्वेत पृष्ठभागसे युक्त और चितकबरे मुखवाले वेगशाली विशाल अश्व पांचालराजकुमारको संग्रामभूमिमें शीघ्रतापूर्वक ले गये ।। ५२ ।।
शूराश्च भद्रकाश्चैव शरकाण्डनिभा हयाः ।
पद्मकिञ्जल्कवर्णाभा दण्डधारमुदावहन् ।। ५३ ।।
शूर, सुन्दर मस्तकवाले, सरकण्डेके पोरुओंके समान श्वेत-गौर तथा कमलके केसरकी भाँति कान्तिमान् घोड़े दण्डधारको रणभूमिमें ले गये ।। ५३ ।।
रासभारुणवर्णाभाः पृष्ठतो मूषिकप्रभाः ।
वल्गन्त इव संयन्ता व्याघ्रदत्तमुदावहन् ।। ५४ ।।
गदहेके समान मलिन एवं अरुणवर्णवाले, पृष्ठभागमें चूहेके समान श्याम-मलिन कान्ति धारण करनेवाले तथा विनीत घोड़े व्याघ्रदत्तको युद्धमें उछलते-कूदते हुए-से ले गये ।। ५४ ।।
हरयः कालकाश्चित्राश्चित्रमाल्यविभूषिताः ।
सुधन्वानं नरव्याघ्रं पाञ्चाल्यं समुदावहन् ।। ५५ ।।
काले मस्तकवाले, विचित्र वर्ण तथा विचित्र मालाओंसे विभूषित घोड़े पांचालदेशीय पुरुषसिंह सुधन्वाको लेकर रणभूमिमें उपस्थित हुए ।। ५५ ।।
इन्द्राशनिसमस्पर्शा इन्द्रगोपकसंनिभाः ।
काये चित्रान्तराश्चित्राश्चित्रायुधमुदावहन् ।। ५६ ।।
इन्द्रके वज्रके समान जिनका स्पर्श अत्यन्त दुःसह है, जो वीरबहूटीके समान लाल रंगवाले हैं, जिनके शरीरमें विचित्र चिह्न शोभा पाते हैं तथा जो देखनेमें भी अद्भुत हैं, वे घोड़े चित्रायुधको युद्धभूमिमें ले गये ।। बिभ्रतो हेममालास्तु चक्रवाकोदरा हयाः । कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ।। ५७ ।। सुवर्णकी माला धारण किये चक्रवाकके उदरके समान कुछ-कुछ श्वेतवर्णवाले घोड़े कोसलनरेशके पुत्र सुक्षत्रको युद्धमें ले गये ।। ५७ ।। शबलास्तु बृहन्तोऽश्वा दान्ता जाम्बूनदस्रजः । युद्धे सत्यधृतिं क्षैममवहन् प्रांशवः शुभाः ।। ५८ ।। चितकबरे, विशालकाय, वशमें किये हुए, सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा ऊँचे कदवाले सुन्दर अश्वोंने क्षेमकुमार सत्यधृतिको युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ५८ ।। एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । अश्वैश्च धनुषा चैव शुक्लैः शुक्लो न्यवर्तत ।। ५९ ।। जिनके ध्वज, कवच और धनुष—ये सब कुछ एक ही रंगके थे, वे राजा शुक्ल शुक्लवर्णके अश्वोंद्वारा युद्धके मैदानमें लौट आये ।। ५९ ।। समुद्रसेनपुत्रं तु सामुद्रा रुद्रतेजसम् । अश्वाः शशाङ्कसदृशाश्चन्द्रसेनमुदावहन् ।। ६० ।। समुद्रसेनके पुत्र, भयानक तेजसे युक्त चन्द्रसेनको चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले समुद्री घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ६० ।। नीलोत्पलसवर्णास्तु तपनीयविभूषिताः । शैब्यं चित्ररथं संख्ये चित्रमाल्याऽवहन् हयाः ।। ६१ ।। नील-कमलके समान रंगवाले, सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित विचित्र मालाओंवाले अश्व विचित्र रथसे युक्त राजा शैब्यको युद्धस्थलमें ले गये ।। ६१ ।। कलायपुष्पवर्णास्तु श्वेतलोहितराजयः । रथसेनं हयश्रेष्ठाः समूहुर्युद्धदुर्मदम् ।। ६२ ।। जिनके रंग केरावके फूलके समान हैं, जिनकी रोमराजि श्वेतलोहित वर्णकी है, ऐसे श्रेष्ठ घोड़ोंने रणदुर्मद रथसेनको संग्रामभूमिमें पहुँचाया ।। ६२ ।। यं तु सर्वमनुष्येभ्यः प्राहुः शूरतरं नृपम् । तं पटच्चरहन्तारं शुकवर्णाऽवहन् हयाः ।। ६३ ।। जिन्हें सब मनुष्योंसे अधिक शूरवीर नरेश कहा जाता है, जो चोरों और लुटेरोंका नाश करनेवाले हैं, उन समुद्रप्रान्तके अधिपति को तोतेके समान
रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ६३ ॥ चित्रायुधं चित्रमाल्यं चित्रवर्मायुधध्वजम् । ऊहुः किंशुकपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ॥ ६४ ॥ जिनके माला, कवच, अस्त्र-शस्त्र और ध्वज सब कुछ विचित्र हैं, उन राजा चित्रायुधको* पलाशके फूलोंके समान लाल रंगवाले उत्तम घोड़े संग्राममें ले गये ॥ ६४ ॥ एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । धनुषा रथवाहैश्च नीलैर्नीलोऽभ्यवर्तत ॥ ६५ ॥ जिनके ध्वज, कवच और धनुष सब एक रंगके थे, वे राजा नील अपने रथमें जुते हुए नील रंगके घोड़ोंद्वारा रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ॥ ६५ ॥ नानारूपै रत्नचिह्नैर्वरूथैरथकार्मुकैः । वाजिध्वजपताकाभिश्चित्रैश्चित्रोऽभ्यवर्तत ॥ ६६ ॥ जिनके रथका आवरण, रथ तथा धनुष नाना प्रकारके रत्नोंसे जटिल एवं अनेक रूपवाले थे, जिनके घोड़े, ध्वजा और पताकाएँ भी विचित्र प्रकारकी थीं, वे राजा चित्र चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धके मैदानमें आये ॥ ये तु पुष्करपर्णस्य तुल्यवर्णा हयोत्तमाः । ते रोचमानस्य सुतं हेमवर्णमुदावहन् ॥ ६७ ॥ जिनके रंग कमलपत्रके समान थे, वे उत्तम घोड़े रोचमानके पुत्र हेमवर्णको रणभूमिमें ले गये ॥ ६७ ॥ योधाश्च भद्रकाराश्च शरदण्डानुदण्डयः । श्वेताण्डाः कुक्कुटाण्डाभा दण्डकेतुं हयाऽवहन् ॥ ६८ ॥ युद्ध करनेमें समर्थ, कल्याणमय कार्य करनेवाले, सरकण्डेके समान श्वेत-गौर पीठवाले, श्वेत अण्डकोशधारी तथा मुर्गीके अण्डेके समान सफेद घोड़े दण्डकेतुको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ६८ ॥ केशवेन हते संख्ये पितर्यथ नराधिपे । भिन्ने कपाटे पाण्ड्यानां विद्रुतेषु च बन्धुषु ॥ ६९ ॥ भीष्मादवाप्य बास्त्राणि द्रोणाद् रामात् कृपात् तथा । अस्त्रैः समत्वं सम्प्राप्य रुक्मिकर्णार्जुनाच्युतैः ॥ ७० ॥ इयेष द्वारकां हन्तुं कृत्स्नां जेतुं च मेदिनीम् । निवारितस्ततः प्राज्ञैः सुहृद्भिर्हितकाम्यया ॥ ७१ ॥ वैरानुबन्धमुत्सृज्य स्वराज्यमनुशास्ति यः । स सागरध्वजः पाण्ड्यश्चन्द्रश्वरश्मिनिभैर्हयैः ॥ ७२ ॥ वैडूर्यजालसंछन्नैर्वीर्यद्रविणमाश्रितः ।
दिव्यं विस्फारयंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद् बली ॥ ७३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे जब युद्धमें पाण्ड्यदेशके राजा तथा वर्तमान नरेशके पिता मारे गये, पाण्ड्यराजधानीका फाटक तोड़-फोड़ दिया गया और सारे बन्धु-बान्धव भाग गये, उस समय जिसने भीष्म, द्रोण, परशुराम तथा कृपाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखकर उसमें रुक्मी, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्णकी समानता प्राप्त कर ली; फिर द्वारकाको नष्ट करने और सारी पृथ्वीपर विजय पानेका संकल्प किया; यह देख विद्वान् सुहृदोंने हितकी कामना रखकर जिसे वैसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया और अब जो वैरभाव छोड़कर अपने राज्यका शासन कर रहा है और जिसके रथपर सागरके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती है, पराक्रमरूपी धनका आश्रय लेनेवाले उस बलवान् राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित तथा चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ६९—७३ ॥
आटरूषकवर्णाभा हयाः पाण्ड्यानुयायिनाम् ।
अवहन् रथमुख्यानामयुतानि चतुर्दश ॥ ७४ ॥
वासक-पुष्पोंके समान रंगवाले घोड़े राजा पाण्ड्यके पीछे चलनेवाले एक लाख चालीस हजार श्रेष्ठ रथोंका भार वहन कर रहे थे ॥ ७४ ॥
नानावर्णेन रूपेण नानाकृतिमुखा हयाः ।
रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ॥ ७५ ॥
अनेक प्रकारके रंग-रूपसे युक्त विभिन्न आकृति और मुखवाले घोड़े रथके पहियेके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले वीर घटोत्कचको रणभूमिमें ले गये ॥ ७५ ॥
भारतानां समेतानामुत्सृज्यैको मतानि यः ।
गतो युधिष्ठिरं भक्त्या त्यक्त्वा सर्वमभीप्सितम् ॥ ७६ ॥
लोहिताक्षं महाबाहुं बृहन्तं तमरट्टजाः ।
महासत्त्वा महाकायाः सौवर्णस्यन्दने स्थितम् ॥ ७७ ॥
जो एकत्र हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंके मतोंका परित्याग करके अपने सम्पूर्ण मनोरथोंको छोड़कर केवल भक्तिभावसे युधिष्ठिरके पक्षमें चले गये, उन लाल नेत्र और विशाल भुजावाले राजा बृहन्तको, जो सुवर्णमय रथपर बैठे हुए थे, अरट्टदेशके महापराक्रमी, विशालकाय और सुनहरे रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ७६-७७ ॥
सुवर्णवर्णा धर्मज्ञमनीकस्थं युधिष्ठिरम् ।
राजश्रेष्ठं हयश्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ७८ ॥
धर्मके ज्ञाता तथा सेनाके मध्यभागमें विद्यमान नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर सुवर्णके समान रंगवाले श्रेष्ठ घोड़े उनके साथ-साथ चल रहे
थे ।। ७८ ।। वर्णैरुच्चावचैरन्यैः सदश्वानां प्रभद्रकाः । संन्यवर्तन्त युद्धाय बहवो देवरूपिणः ।। ७९ ।। अन्य भिन्न-भिन्न प्रकारके वर्णोंसे युक्त सुन्दर अश्वोंका आश्रय ले प्रभद्रक नामवाले देवताओं-जैसे रूपवान् बहुसंख्यक प्रभद्रकगण युद्धके लिये लौट पड़े ।। ७९ ।।
ते यत्ता भीमसेनेन सहिताः काञ्चनध्वजाः । प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र सेन्द्रा इव दिवौकसः ।। ८० ।। राजेन्द्र! भीमसेनसहित पूरी सावधानीसे युद्धके लिये उद्यत हुए ये सुवर्णमय ध्वजवाले राजालोग इन्द्रसहित देवताओंके समान दृष्टिगोचर होते थे ।। ८० ।।
अत्यरोचत तान् सर्वान् धृष्टद्युम्नः समागतान् । सर्वाण्यति च सैन्यानि भारद्वाजो व्यरोचत ।। ८१ ।। वहाँ एकत्र हुए उन सब राजाओंकी अपेक्षा धृष्टद्युम्नकी अधिक शोभा हो रही थी और समस्त सेनाओंसे ऊपर उठकर भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य सुशोभित हो रहे थे ।। ८१ ।।
अतीव शुशुभे तस्य ध्वजः कृष्णाजिनोत्तरः । कमण्डलुर्महाराज जातरूपमयः शुभः ।। ८२ ।। महाराज! काले मृगचर्म और कमण्डलुके चिह्नसे युक्त उनका सुवर्णमय सुन्दर ध्वज अत्यन्त शोभा पा रहा था ।। ८२ ।।
ध्वजं तु भीमसेनस्य वैदूर्यमणिलोचनम् । भ्राजमानं महासिंहं राजन्तं दृष्टवानहम् ।। ८३ ।। वैदूर्यमणिमय नेत्रोंसे सुशोभित महासिंहके चिह्नसे युक्त भीमसेनकी चमकीली ध्वजा फहराती हुई बड़ी शोभा पा रही थी। उसे मैंने देखा था ।। ८३ ।।
ध्वजं तु कुरुराजस्य पाण्डवस्य महौजसः । दृष्टवानस्मि सौवर्णं सोमं ग्रहगणान्वितम् ।। ८४ ।। महातेजस्वी कुरुराज पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सुवर्णमयी ध्वजाको मैंने चन्द्रमा तथा ग्रहगणोंके चिह्नसे सुशोभित देखा है ।। ८४ ।।
मृदङ्गौ चात्र विपुलौ दिव्यौ नन्दोपनन्दकौ । यन्त्रेणाहन्यमानौ च सुस्वनौ हर्षवर्धनौ ।। ८५ ।। इस ध्वजामें नन्द-उपनन्द नामक दो विशाल एवं दिव्य मृदंग लगे हुए हैं। वे यन्त्रके द्वारा बिना बजाये बजते हैं और सुन्दर शब्दका विस्तार करके सबका हर्ष बढ़ाते हैं ।। ८५ ।।
शरभं पृष्ठसौवर्णं नकुलस्य महाध्वजम् । अपश्याम रथेऽत्युग्रं भीषयाणमवस्थितम् ॥ ८६ ॥ नकुलकी विशाल ध्वजा शरभके चिह्नसे युक्त तथा पृष्ठभागमें सुवर्णमयी है। हमने देखा, वह अत्यन्त भयंकर रूपसे उनके रथपर फहराती और सबको भयभीत करती थी ॥ ८६ ॥
हंसस्तु राजतः श्रीमान् ध्वजे घण्टापताकवान् । सहदेवस्य दुर्धर्षो द्विषतां शोकवर्धनः ॥ ८७ ॥ सहदेवकी ध्वजामें घंटा और पताकाके साथ चाँदीके बने सुन्दर हंसका चिह्न था। वह दुर्धर्ष ध्वज शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था ॥ ८७ ॥
पञ्चानां द्रौपदेयानां प्रतिमा ध्वजभूषणम् । धर्ममारुतशक्राणामश्विनोश्च महात्मनोः ॥ ८८ ॥ क्रमशः धर्म, वायु, इन्द्र तथा महात्मा अश्विनीकुमारोंकी प्रतिमाएँ पाँचों द्रौपदीपुत्रोंके ध्वजोंकी शोभा बढ़ाती थीं ॥
अभिमन्योः कुमारस्य शार्ङ्गपक्षी हिरण्मयः । रथे ध्वजवरो राजंस्तप्तचामीकरोज्ज्वलः ॥ ८९ ॥ राजन्! कुमार अभिमन्युके रथका श्रेष्ठ ध्वज तपाये हुए सुवर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान था। उसमें सुवर्णमय शार्ङ्गपक्षीका चिह्न था ॥
घटोत्कचस्य राजेन्द्र ध्वजे गृध्रो व्यरोचत । अश्वाश्च कामगास्तस्य रावणस्य पुरा यथा ॥ ९० ॥ राजेन्द्र! राक्षस घटोत्कचकी ध्वजामें गीध शोभा पाता था। पूर्वकालमें रावणके रथकी भाँति उसके रथमें भी इच्छानुसार चलनेवाले घोड़े जुते हुए थे ॥ ९० ॥
माहेन्द्रं च धनुर्दिव्यं धर्मराजे युधिष्ठिरे । वायव्यं भीमसेनस्य धनुर्दिव्यमभून्नृप ॥ ९१ ॥ राजन्! धर्मराज युधिष्ठिरके पास महेन्द्रका दिया हुआ दिव्य धनुष शोभा पाता था। इसी प्रकार भीमसेनके पास वायु देवताका दिया हुआ दिव्य धनुष था ॥ ९१ ॥
त्रैलोक्यरक्षणार्थाय ब्रह्मणा सृष्टमायुधम् । तद् दिव्यमजरं चैव फाल्गुनार्थाय वै धनुः ॥ ९२ ॥ तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने जिस आयुधकी सृष्टि की थी, वह कभी जीर्ण न होनेवाला दिव्य गाण्डीव धनुष अर्जुनको प्राप्त हुआ था ॥ ९२ ॥
वैष्णवं नकुलायाथ सहदेवाय चाश्विजम् ।
घटोत्कचाय पौलस्त्यं धनुर्दिव्यं भयानकम् ॥ ९३ ॥
नकुलको वैष्णव तथा सहदेवको अश्विनीकुमार-सम्बन्धी धनुष प्राप्त था तथा घटोत्कचके पास पौलस्त्य नामक भयानक दिव्य धनुष विद्यमान था ॥ ९३ ॥
रौद्रमाग्नेयकौबेरं याम्यं गिरिशमेव च ।
पञ्चानां द्रौपदेयानां धनूरत्नानि भारत ॥ ९४ ॥
भरतनन्दन! पाँचों द्रौपदीपुत्रोंके दिव्य धनुषरत्न क्रमशः रुद्र, अग्नि, कुबेर, यम तथा भगवान् शंकरसे सम्बन्ध रखनेवाले थे ॥ ९४ ॥
रौद्रं धनुर्वरं श्रेष्ठं लेभे यद् रोहिणीसुतः ।
तत् तुष्टः प्रददौ रामः सौभद्राय महात्मने ॥ ९५ ॥
रोहिणीनन्दन बलरामने जो रुद्रसम्बन्धी श्रेष्ठ धनुष प्राप्त किया था, उसे उन्होंने संतुष्ट होकर महामना सुभद्राकुमार अभिमन्युको दे दिया था ॥ ९५ ॥
एते चान्ये च बहवो ध्वजा हेमविभूषिताः ।
तत्रादृश्यन्त शूराणां द्विषतां शोकवर्धनाः ॥ ९६ ॥
ये तथा और भी बहुत-सी राजाओंकी सुवर्णभूषित ध्वजाएँ वहाँ दिखायी देती थीं, जो शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाली थीं ॥ ९६ ॥
तदभूद् ध्वजसम्बाधमकापुरुषसेवितम् ।
द्रोणानीकं महाराज पटे चित्रमिवार्पितम् ॥ ९७ ॥
महाराज! उस समय वीर पुरुषोंसे भरी हुई द्रोणाचार्यकी वह ध्वजविशिष्ट सेना पटमें अंकित किये हुए चित्रके समान प्रतीत होती थी ॥ ९७ ॥
शुश्रुवुर्नामगोत्राणि वीराणां संयुगे तदा ।
द्रोणमाद्रवतां राजन् स्वयंवर इवाहवे ॥ ९८ ॥
राजन्! उस समय युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण करनेवाले वीरोंके नाम और गोत्र उसी प्रकार सुनायी पड़ते थे, जैसे स्वयंवरमें सुने जाते हैं ॥ ९८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि हयध्वजादिकथने
त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अश्व और ध्वज आदिका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
१. नीलकण्ठी टीकामें अश्व-शास्त्रके अनुसार घोड़ोंके रंग और लक्षण आदिका परिचय दिया गया है। उसमेंसे कुछ आवश्यक बातें यहाँ यथास्थान उद्धृत की जाती हैं। सारंगका रंग सूचित करनेवाला रंग इस प्रकार है— सितनीलारुणो वर्णः सारंगसदृशश्च सः ।
२. कबूतरका रंग बतानेवाला वचन यों मिलता है— पारावतकपोताभः सितनीलसमन्वयात् ।
३. काम्बोज (काबुल)-के घोड़ोंका लक्षण— महाललाटजघनस्कन्धवक्षोजवा हयाः । दीर्घग्रीवायता ह्रस्वमुष्काः काम्बोजकाः स्मृताः ।। जिनके ललाट, जाँघें, कंधे, छाती और वेग महान् होते हैं, गर्दन लम्बी और चौड़ी होती है तथा अण्डकोष बहुत छोटे होते हैं, वे काबुली घोड़े माने गये हैं।
१. जिस घोड़ेके ललाटके मध्यभागमें ताराके समान श्वेत चिह्न हो, उसके उस चिह्नका नाम ललाम है। उससे युक्त अश्व भी ललाम ही कहलाता है। यथा— श्वेतं ललाटमध्यस्थं तारारूपं हयस्य यत् । ललामं चापि तत्प्राहुर्लामोऽश्वस्तदन्वितः ।।
३. 'हरि' का लक्षण इस प्रकार दिया गया है— सकेशराणि रोमाणि सुवर्णभानि यस्य तु । हरिः स वर्णतोऽश्वस्तु पीतकौशेयसंनिभः ।। जिसकी गर्दनके बड़े-बड़े बाल और शरीरके रोएँ सुनहरे रंगके हों, जो रंगमें रेशमी पीताम्बरके समान जान पड़ता हो, वह घोड़ा 'हरि' कहलाता है।
१. सिंधु देशके घोड़ोंकी गर्दन लम्बी, मूत्रेन्द्रिय मुँहतक पहुँचनेवाली, आँखे बड़ी-बड़ी, कद ऊँचा तथा रोएँ सूक्ष्म होते हैं। सिंधी घोड़े बड़े बलिष्ठ होते हैं, जैसा कि बताया गया है— दीर्घग्रीवा मुखालम्बमेहनाः पृथुलोचनाः । महान्तस्तनुरोमाणो बलिनः सैन्धवा हयाः ।।
३. पद्मवर्णका परिचय इस प्रकार दिया गया है— सितरक्तसमायोगात् पद्मवर्णः प्रकीर्त्यते । सफेद और लाल रंगोंके सम्मिश्रणसे जो रंग होता है, वह पद्मवर्ण कहलाता है।
३. बाह्लिक देशके घोड़े भी प्रायः काबुली घोड़ोंके समान ही होते हैं। उनमें विशेषता इतनी ही है कि उनका पीठभाग काम्बोजदेशीय घोड़ोंकी अपेक्षा बड़ा होता है। जैसा कि निम्नांकित वचनसे स्पष्ट है— काम्बोजसमसंस्थाना बाह्लिजाताश्च वाजिनः । विशेषः पुनरेतेषां दीर्घपृष्ठाङ्गतोच्यते ।।
४. जिनके रोएँ तथा केसर (गर्दनके बाल) सफेद होते हैं, त्वचा, गुह्यभाग, नेत्र, ओठ और खुर काले होते हैं, ऐसे घोड़ोंको महर्षियोंने क्रौंचवर्णका बताया है। यथा— सितलोमकेसराढ्याः कृष्णत्वग्गुह्यलोचनोष्ठखुराः । ये स्युर्मुनिर्भिर्वाहा निर्दिष्टाः क्रौञ्चवर्णास्ते ।।
* ये वसुदान २१।५५ में मारे गये वसुदानसे भिन्न हैं। इन्हें कहीं-कहीं 'काश्य' बताया गया है। सम्भाव है, ये ही काशिराज हों।
* यद्यपि सिंहसेन और व्याघ्रदत्तके मारे जानेका वर्णन (१६।३७ में) आ चुका है। तथापि यहाँ घोड़ोंके वर्णनके प्रसंगमें संजयने सामान्यतः सबके घोड़ोंका उल्लेख कर दिया है। मृत्युसे पहले वे दोनों वैसे ही घोड़ोंपर आरूढ़ हो रणभूमिमें पधारे थे।
* इन्हींका वर्णन पहले श्लोक ५६ में भी आ चुका है।
चतुर्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना
धृतराष्ट्र उवाच
व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि संजय ।
आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा नृपाः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! भीमसेन आदि जो-जो नरेश युद्धमें लौटकर आये थे, ये तो देवताओंकी सेनाको भी पीड़ित कर सकते हैं ॥ १ ॥
सम्प्रयुक्तः किलैवायं दिष्टैर्भवति पूरुषः ।
तस्मिन्नेव च सर्वार्थाः प्रदृश्यन्ते पृथग्विधाः ॥ २ ॥
निश्चय ही यह मनुष्य दैवसे प्रेरित होता है। सबके पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण मनोरथ दैवपर ही अवलम्बित दिखायी देते हैं ॥ २ ॥
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी ।
अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
स एव महतीं सेनां समावर्तयदाहवे ।
किमन्यद् दैवसंयोगान्मम पुत्रस्य चाभवत् ॥ ४ ॥
जो राजा युधिष्ठिर दीर्घकालतक जटा और मृगचर्म धारण करके वनमें रहे और कुछ कालतक लोगोंसे अज्ञात रहकर भी विचरे हैं, वे ही आज रणभूमिमें विशाल सेना जुटाकर चढ़ आये हैं, इसमें मेरे तथा पुत्रोंके दैवयोगके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः ।
स तथाऽऽकृष्यते तेन न यथा स्वयमिच्छति ॥ ५ ॥
निश्चय ही मनुष्य भाग्यसे युक्त होकर ही जन्म ग्रहण करता है। भाग्य उसे उस अवस्थामें भी खींच ले जाता है, जिसमें वह स्वयं नहीं जाना चाहता ॥ ५ ॥
द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः ।
स पुनर्भागधेयेन सहायानुपलब्धवान् ॥ ६ ॥
हमने द्यूतके संकटमें डालकर युधिष्ठिरको भारी क्लेश पहुँचाया था, परंतु उन्होंने भाग्यसे पुनः बहुतेरे सहायकोंको प्राप्त कर लिया है ॥ ६ ॥
अद्य मे केकया लब्धाः काशिकाः कोसलाश्र्च ये ।
चेदयश्रापरे वङ्गा मामेव समुपाश्रिताः ॥ ७ ॥
पृथिवी भूयसी तात मम पार्थस्य नो तथा ।
इति मामब्रवीत् सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ॥ ८ ॥ सूत संजय! आजसे बहुत पहलेकी बात है, मूर्ख दुर्योधनने मुझसे कहा था कि 'पिताजी! इस समय केकय, काशी, कोसल तथा चेदिदेशके लोग मेरी सहायताके लिये आ गये हैं। दूसरे वंगवासियोंने भी मेरा ही आश्रय लिया है। तात! इस भूमण्डलका बहुत बड़ा भाग मेरे साथ है, अर्जुनके साथ नहीं है' ॥ ७-८ ॥ तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः । निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद् भागधेयतः ॥ ९ ॥ उसी विशाल सेनासमूहके मध्य सुरक्षित हुए द्रोणाचार्यको युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने मार डाला, इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ९ ॥ मध्ये राज्ञां महाबाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् । सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेयिवान् ॥ १० ॥ राजाओंके बीचमें सदा युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याके पारंगत विद्वान् महाबाहु द्रोणाचार्यको कैसे मृत्यु प्राप्त हुई? ॥ १० ॥ समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं मोहं परममागतः । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ११ ॥ मुझपर महान् संकट आ पहुँचा है। मेरी बुद्धिपर अत्यन्त मोह छा गया है। मैं भीष्म और द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर जीवित नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ यन्मां क्षत्ताब्रवीत् तात प्रपश्यन् पुत्रगृद्धिनम् । दुर्योधनेन तत् सर्वं प्राप्तं सूत मया सह ॥ १२ ॥ तात! मुझे अपने पुत्रोंके प्रति अत्यन्त आसक्त देखकर विदुरने मुझसे जो कुछ कहा था, मेरे साथ दुर्योधनको वह सब प्राप्त हो रहा है ॥ १२ ॥ नृशंसं तु परं नु स्यात् त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि । पुत्रशेषं चिकीर्षेयं कृत्स्नं न मरणं व्रजेत् ॥ १३ ॥ यदि मैं दुर्योधनको त्यागकर शेष पुत्रोंकी रक्षा करना चाहूँ तो यह अत्यन्त निष्ठुरताका कार्य अवश्य होगा, परंतु मेरे सारे पुत्रोंकी तथा अन्य सब लोगोंकी भी मृत्यु नहीं होगी ॥ १३ ॥ यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः । सोऽस्माच्च हीयते लोकात् क्षुद्रभावं च गच्छति ॥ १४ ॥ जो मनुष्य धर्मका परित्याग करके अर्थपरायण हो जाता है, वह इस लोकसे (लौकिक स्वार्थसे) भ्रष्ट हो जाता है और नीच गतिको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य संजय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १५ ॥
संजय! आज इस राष्ट्रका उत्साह भंग हो गया। प्रधानके मारे जानेसे अब मुझे किसीका जीवन शेष रहता नहीं दिखायी देता ॥ १५ ॥
कथं स्यादवशेषो हि धुर्ययोरभ्यतीतयोः ।
यौ नित्यमुपजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ॥ १६ ॥
हमलोग सदा जिन सर्वसमर्थ पुरुषसिंहोंका आश्रय लेकर जीवन धारण करते थे, उन धुरंधर वीरोंके इस लोकसे चले जानेपर अब हमारी सेनाका कोई भी सैनिक कैसे जीवित बच सकता है ॥ १६ ॥
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत ।
केऽयुध्यन् के व्यपाकुर्वन् के क्षुद्राः प्राद्रवन् भयात् ॥ १७ ॥
संजय! वह युद्ध जिस प्रकार हुआ था, सब साफ-साफ मुझसे बताओ। कौन-कौन वीर युद्ध करते थे, कौन किसको परास्त करते थे और कौन-कौन-से क्षुद्र सैनिक भयके कारण युद्धके मैदानसे भाग गये थे ॥
धनंजयं च मे शंस यद् यच्चक्रे रथर्षभः ।
तस्माद् भयं नो भूयिष्ठं भ्रातृव्याच्च वृकोदरात् ॥ १८ ॥
धनंजय अर्जुनके विषयमें भी मुझे बताओ। रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने क्या-क्या किया था। मुझे उनसे तथा शत्रुस्वरूप भीमसेनसे अधिक भय लगता है ॥ १८ ॥
यथाऽऽसीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेयेषु संजय ।
मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः ॥ १९ ॥
संजय! पाण्डव-सैनिकोंके पुनः युद्धभूमिमें लौट आनेपर मेरी शेष सेनाके साथ जिस प्रकार उनका अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ था, वह कहो ॥ १९ ॥
कथं च वो मनस्तात निवृत्तेष्वभवत् तदा ।
मामकानां च ये शूराः के कांस्तत्र न्यवारयन् ॥ २० ॥
तात! पाण्डव-सैनिकोंके लौटनेपर तुमलोगोंके मनकी कैसी दशा हुई? मेरे पुत्रोंकी सेनामें जो शूरवीर थे, उनमेंसे किन लोगोंने शत्रुपक्षके किन वीरोंको रोका था? ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पञ्चविंशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-सैनिकोंके द्वन्द्व-युद्ध
संजय उवाच
महद् भैरवमासीन्नः संनिवृत्तेषु पाण्डुषु ।
दृष्ट्वा द्रोणं छाद्यमानं तैर्भास्करमिवाम्बुदैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! पाण्डव-सैनिकोंके लौटनेपर जैसे बादलोंसे सूर्य ढक जाते हैं, उसी प्रकार उनके बाणोंसे द्रोणाचार्य आच्छादित होने लगे। यह देखकर हमलोगोंने उनके साथ बड़ा भयंकर संग्राम किया ॥ १ ॥
तैश्चोद्धूतं रजस्तीव्रमवचक्रे चमूं तव ।
ततो हतममंस्याम द्रोणं दृष्टिपथे हते ॥ २ ॥
उन सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई तीव्र धूलने आपकी सारी सेनाको ढक दिया। फिर तो हमारी दृष्टिका मार्ग अवरुद्ध हो गया और हमने समझ लिया कि द्रोण मारे गये ॥ २ ॥
तांस्तु शूरान् महेष्वासान् क्रूरं कर्म चिकीर्षतः ।
दृष्ट्वा दुर्योधनस्तूर्णं स्वसैन्यं समचूचुदत् ॥ ३ ॥
उन महाधनुर्धर शूरवीरोंको क्रूर कर्म करनेके लिये उत्सुक देख दुर्योधनने तुरंत ही अपनी सेनाको इस प्रकार आज्ञा दी— ॥ ३ ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं यथासत्त्वं नराधिपाः ।
वारयध्वं यथायोगं पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४ ॥
‘नरेश्वरो! तुम सब लोग अपनी शक्ति, उत्साह और बलके अनुसार यथोचित उपायद्वारा पाण्डवोंकी सेनाको रोको’ ॥ ४ ॥
ततो दुर्मर्षणो भीममभ्यगच्छत् सुतस्तव ।
आराद् दृष्ट्वा किरन् बाणैर्जिघृक्षुस्तस्य जीवितम् ॥ ५ ॥
तब आपके पुत्र दुर्मर्षणने भीमसेनको अपने पास ही देखकर उनके प्राण लेनेकी इच्छासे बाणोंकी वर्षा करते हुए उनपर आक्रमण किया ॥ ५ ॥
तं बाणैरवतस्तार क्रुद्धो मृत्युरिवाहवे ।
तं च भीमोऽतुदद् बाणैस्तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ॥ ६ ॥
उसने क्रोधमें भरी हुई मृत्युके समान युद्धस्थलमें बाणोंद्वारा भीमसेनको ढक दिया। साथ ही भीमसेनने भी अपने बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी। इस प्रकार उन दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६ ॥
त ईश्वरसमादिष्टाः प्राज्ञाः शूराः प्रहारिणः ।
राज्यं मृत्युभयं त्यक्त्वा प्रत्यतिष्ठन् परान् युधि ॥ ७ ॥