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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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षड्विंशोऽध्यायः

भीमसेनका भगदत्तके हाथीके साथ युद्ध, हाथी और भगदत्तका भयानक पराक्रम

धृतराष्ट्र उवाच

तेष्वेवं संनिवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः ।
कथं युयुधिरे पार्था मामकाश्च तरस्विनः ॥ १ ॥
किमर्जुनश्चाप्यकरोत् संशप्तकबलं प्रति ।
संशप्तका वा पार्थस्य किमकुर्वत संजय ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! इस प्रकार जब सैनिक पृथक्-पृथक् युद्धके लिये लौटे और कौरव-योद्धा आगे बढ़कर सामना करनेके लिये उद्यत हुए, उस समय मेरे तथा कुन्तीके वेगशाली पुत्रोंने आपसमें किस प्रकार युद्ध किया? संशप्तकोंकी सेनापर चढ़ाई करके अर्जुनने क्या किया? अथवा संशप्तकोंने अर्जुनका क्या कर लिया? ॥ १-२ ॥

संजय उवाच

तथा तेषु निवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः ।
स्वयमभ्यद्रवद् भीमं नागानीकेन ते सुतः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! इस प्रकार जब पाण्डव-सैनिक पृथक्-पृथक् युद्धके लिये लौटे और कौरव-योद्धा आगे बढ़कर सामना करनेके लिये उद्यत हुए, उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने हाथियोंकी सेना साथ लेकर स्वयं ही भीमसेनपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

स नाग इव नागेन गोवृषेणेव गोवृषः ।
समाहूतः स्वयं राज्ञा नागानीकमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
जैसे हाथीसे हाथी और साँड़से साँड़ भिड़ जाता है, उसी प्रकार राजा दुर्योधनके ललकारनेपर भीमसेन स्वयं ही हाथियोंकी सेनापर टूट पड़े ॥ ४ ॥

स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चान्वितः ।
अभिनत् कुञ्जरानीकमचिरेणैव मारिष ॥ ५ ॥
आदरणीय नरेश! कुन्तीकुमार भीमसेन युद्धमें कुशल तथा बाहुबलसे सम्पन्न हैं। उन्होंने थोड़ी ही देरमें हाथियोंकी उस सेनाको विदीर्ण कर डाला ॥ ५ ॥

ते गजा गिरिसंकाशाः क्षरन्तः सर्वतो मदम् ।
भीमसेनस्य नाराचैर्विमुखा विमदीकृताः ॥ ६ ॥
वे पर्वतके समान विशालकाय हाथी सब ओर मदकी धारा बहा रहे थे; परंतु भीमसेनके नाराचोंसे विद्ध होनेपर उनका सारा मद उतर गया। वे युद्धसे विमुख होकर भाग

चले ॥ ६ ॥ विधमेदभ्रजालानि यथा वायुः समुद्धतः । व्यधमत् तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजः ॥ ७ ॥ जैसे जोरसे उठी हुई वायु मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार पवनपुत्र भीमसेनने उन समस्त गजसेनाओंको तहस-नहस कर डाला ॥

स तेषु विसृजन् बाणान् भीमो नागेश्वशोभत । भुवनेष्विव सर्वेषु गभस्तीनुदितो रविः ॥ ८ ॥ जैसे उदित हुए सूर्य समस्त भुवनोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन उन हाथियोंपर बाणोंकी वर्षा करते हुए शोभा पा रहे थे ॥

ते भीमबाणाभिहताः संस्यूता विबभुर्गजाः । गभस्तिभिरिवार्कस्य व्योम्नि नानाबलाहकाः ॥ ९ ॥ वे भीमके बाणोंसे मारे जाकर परस्पर सटे हुए हाथी आकाशमें सूर्यकी किरणोंसे गुँथे हुए नाना प्रकारके मेघोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ९ ॥

तथा गजानां कदनं कुर्वाणमनिलात्मजम् । क्रुद्धो दुर्योधनोऽभ्येत्य प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥ १० ॥ इस प्रकार गजसेनाका संहार करते हुए पवनपुत्र भीमसेनके पास आकर क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने उन्हें पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ १० ॥

ततः क्षणेन क्षितिपं क्षतजप्रतिमेक्षणः । क्षयं निनीषुर्निशितैर्भीमो विव्याध पत्रिभिः ॥ ११ ॥

यह देख भीमसेनकी आँखें खूनके समान लाल हो गयीं। उन्होंने क्षणभरमें राजा दुर्योधनका नाश करनेकी इच्छासे पंखयुक्त पैने बाणोंद्वारा उसे बींध डाला ॥ ११ ॥

स शराचितसर्वाङ्गः क्रुद्धो विव्याध पाण्डवम् ।
नाराचैरर्करश्म्याभैर्भीमसेनं स्मयन्निव ॥ १२ ॥

दुर्योधनके सारे अंग बाणोंसे व्याप्त हो गये थे। अतः उसने कुपित होकर सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी नाराचोंद्वारा पाण्डुनन्दन भीमसेनको मुसकराते हुए-से घायल कर दिया ॥ १२ ॥

तस्य नागं मणिमयं रत्नचित्रध्वजे स्थितम् ।
भल्लाभ्यां कार्मुकं चैव क्षिप्रं चिच्छेद पाण्डवः ॥ १३ ॥

राजन्! उसके रत्ननिर्मित विचित्र ध्वजके ऊपर मणिमय नाग विराजमान था। उसे पाण्डुनन्दन भीमने शीघ्र ही दो भल्लोंसे काट गिराया और उसके धनुषके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १३ ॥

दुर्योधनं पीड्यमानं दृष्ट्वा भीमेन मारिष ।
चुक्षोभयिषुरभ्यागादङ्गो मातङ्गमास्थितः ॥ १४ ॥

आर्य! भीमसेनके द्वारा दुर्योधनको पीड़ित होते देख क्षोभमें डालनेकी इच्छासे मतवाले हाथीपर बैठे हुए राजा अंग उनका सामना करनेके लिये आ गये ॥ १४ ॥

तमापतन्तं नागेन्द्रमम्बुदप्रतिमस्वनम् ।
कुम्भान्तरे भीमसेनो नाराचैरार्दयद् भृशम् ॥ १५ ॥

वह गजराज मेघके समान गर्जना करनेवाला था। उसे अपनी ओर आते देख भीमसेनने उसके कुम्भस्थलमें नाराचोंद्वारा बड़ी चोट पहुँचायी ॥ १५ ॥

तस्य कायं विनिर्भिद्य
न्यमज्जद् धरणीतले ।
ततः पपात द्विरदो
वज्राहत इवाचलः ॥ १६ ॥

भीमसेनका नाराच उस हाथीके शरीरको विदीर्ण करके धरतीमें समा गया, इससे वह गजराज वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥

तस्यावर्जितनागस्य
म्लेच्छस्याधः पतिष्यतः ।
शिरश्चिच्छेद भल्लेन
क्षिप्रकारी वृकोदरः ॥ १७ ॥

वह म्लेच्छजातीय अंग हाथीसे अलग नहीं हुआ था। उस हाथीके साथ-साथ वह नीचे गिरना ही चाहता था कि शीघ्रकारी भीमसेनने एक भल्लके द्वारा उसका सिर काट दिया ॥ १७ ॥

तस्मिन् निपतिते वीरे सम्प्राद्रवत सा चमूः ।
सम्भ्रान्ताश्वद्विपरथा पदातीनवमृद्नती ॥ १८ ॥
उस वीरके धराशायी होते ही उसकी वह सारी सेना भागने लगी। घोड़े, हाथी तथा रथ सभी घबराहटमें पड़कर इधर-उधर चक्कर काटने लगे। वह सेना अपने ही पैदल सिपाहियोंको रौंदती हुई भाग रही थी ॥ १८ ॥

तेष्वनीकेषु भग्नेषु विद्रवत्सु समन्ततः ।
प्राग्ज्योतिषस्ततो भीमं कुञ्जरेण समाद्रवत् ॥ १९ ॥
इस प्रकार उन सेनाओंके व्यूह भंग होने तथा चारों ओर भागनेपर प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्तने अपने हाथीके द्वारा भीमसेनपर धावा किया ॥ १९ ॥

येन नागेन मघवानजयद् दैत्यदानवान् ।
तदन्वयेन नागेन भीमसेनमुपाद्रवत् ॥ २० ॥
इन्द्रने जिस ऐरावत हाथीके द्वारा दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी थी, उसीके वंशमें उत्पन्न हुए गजराजपर आरूढ़ हो भगदत्तने भीमसेनपर चढ़ाई की थी ॥ २० ॥

स नागप्रवरो भीमं सहसा समुपाद्रवत् ।
चरणाभ्यामथो द्वाभ्यां संहतेन करेण च ॥ २१ ॥
वह गजराज अपने दो पैरों तथा सिकोड़ी हुई सूँड़के द्वारा सहसा भीमसेनपर टूट पड़ा ॥ २१ ॥

व्यावृत्तनयनः क्रुद्धः प्रमथन्निव पाण्डवम् ।
वृकोदररथं साश्वमविशेषमचूर्णयत् ॥ २२ ॥
उसके नेत्र सब ओर घूम रहे थे। वह क्रोधमें भरकर पाण्डुनन्दन भीमसेनको मानो मथ डालेगा, इस भावसे भीमसेनके रथकी ओर दौड़ा और उसे घोड़ोंसहित सामान्यतः चूर्ण कर दिया ॥ २२ ॥

पद्भ्यां भीमोऽप्यथो धावंस्तस्य गात्रेष्वलीयत । जानन्नञ्जलिकावेधं नापाक्रामत पाण्डवः ॥ २३ ॥ भीमसेन पैदल दौड़कर उस हाथीके शरीरमें छिप गये। पाण्डुपुत्र भीम अंजलिकावेध* जानते थे। इसलिये वहाँसे भागे नहीं ।। २३ ।।

गात्राभ्यन्तरगो भूत्वा करेणाताडयन्मुहुः । लालयामास तं नागं वधाकाङ्क्षिणमव्ययम् ॥ २४ ॥ वे उसके शरीरके नीचे होकर हाथसे बारंबार थपथपाते हुए वधकी आकांक्षा रखनेवाले उस अविनाशी गजराजको लाड़-प्यार करने लगे ।। २४ ।।

कुलालचक्रवन्नागस्तदा तूर्णमथाभ्रमत् । नागायुतबलः श्रीमान् कालयानो वृकोदरम् ॥ २५ ॥ उस समय वह हाथी तुरंत ही कुम्हारके चाकके समान सब ओर घूमने लगा। उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। वह शोभायमान गजराज भीमसेनको मार डालनेका प्रयत्न कर रहा था ।। २५ ।।

भीमोऽपि निष्क्रम्य ततः सुप्रतीकाग्रतोऽभवत् । भीमं करेणावनम्य जानुभ्यामभ्यताडयत् ॥ २६ ॥ भीमसेन भी उसके शरीरके नीचेसे निकलकर उस हाथीके सामने खड़े हो गये। उस समय हाथीने अपनी सूँड़से गिराकर उन्हें दोनों घुटनोंसे कुचल डालनेका प्रयत्न किया ।।

ग्रीवायां वेष्टयित्वैनं स गजो हन्तुमैहत । करवेष्टं भीमसेनो भ्रमं दत्त्वा व्यमोचयत् ॥ २७ ॥

इतना ही नहीं, उस हाथीने उन्हें गलेमें लपेटकर मार डालनेकी चेष्टा की। तब भीमसेन उसे भ्रममें डालकर उसकी सूँड़के लपेटसे अपने-आपको छुड़ा लिया॥ २७॥

पुनर्गात्राणि नागस्य प्रविवेश वृकोदरः।
यावत् प्रतिगजायातं स्वबले प्रत्यवैक्षत ॥ २८ ॥
तदनन्तर भीमसेन पुनः उस हाथीके शरीरमें ही छिप गये और अपनी सेनाकी ओरसे उस हाथीका सामना करनेके लिये किसी दूसरे हाथीके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ २८ ॥

भीमोऽपि नागगात्रेभ्यो विनिःसृत्यापयाज्जवात् ।
ततः सर्वस्य सैन्यस्य नादः समभवन्महान् ॥ २९ ॥
थोड़ी देर बाद भीम हाथीके शरीरसे निकलकर बड़े वेगसे भाग गये। उस समय सारी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ २९ ॥

अहो धिङ् निहतो भीमः कुञ्जरेणेति मारिष।
तेन नागेन संत्रस्ता पाण्डवानामनीकिनी ॥ ३० ॥
सहसाभ्यद्रवद् राजन् यत्र तस्थौ वृकोदरः ।
आर्य! उस समय सबके मुँहसे यही बात निकल रही थी—'अहो! इस हाथीने भीमसेनको मार डाला, यह कितनी बुरी बात है!' राजन्! उस हाथीसे भयभीत हो पाण्डवोंकी सारी सेना सहसा वहीं भाग गयी, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ३० ½ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा वृकोदरम् ॥ ३१ ॥
भगदत्तं सपाञ्चाल्यः सर्वतः समवारयत्।
तब राजा युधिष्ठिरने भीमसेनको मारा गया जानकर पांचालदेशीय सैनिकोंको साथ ले भगदत्तको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३१ ½ ॥

तं रथं रथिनां श्रेष्ठाः परिवार्य परंतपाः ॥ ३२ ॥
अवाकिरन् शरैस्तीक्ष्णैः शतशोऽथ सहस्रशः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे श्रेष्ठ रथी उन महारथी भगदत्तको सब ओरसे घेरकर उनके ऊपर सैकड़ों और हजारों पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३२ ½ ॥

स विघातं पृषत्कानामङ्कुशेन समाहरन् ॥ ३३ ॥
गजेन पाण्डुपाञ्चालान् व्यधमत् पर्वतेश्वरः ।
पर्वतराज भगदत्तने उन बाणोंके प्रहारका अंकुशद्वारा निवारण किया और हाथीको आगे बढ़ाकर पाण्डव तथा पांचाल योद्धाओंको कुचल डाला ॥ ३३ ½ ॥

तदद्भुतमपश्याम भगदत्तस्य संयुगे ॥ ३४ ॥
तथा वृद्धस्य चरितं कुञ्जरेण विशाम्पते ।

प्रजानाथ! उस युद्धस्थलमें हाथीके द्वारा बूढ़े राजा भगदत्तका हमलोगोंने अद्भुत पराक्रम देखा ।। ३४ १/२ ।।
ततो राजा दशार्णानां प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ।। ३५ ।।
तिर्यग्जातेन नागेन समदेनाशुगामिना ।
तत्पश्चात् दशार्णराजने मदस्रावी, शीघ्रगामी तथा तिरछी दिशा (पार्श्वभाग)-की ओरसे आक्रमण करनेवाले गजराजके द्वारा भगदत्तपर धावा किया ।।
तयोर्युद्धं समभवन्नागयोर्भीमरूपयोः ।। ३६ ।।
सपक्षयोः पर्वतयोर्यथा सद्रुमयोः पुरा ।
वे दोनों हाथी बड़े भयंकर रूपवाले थे। उन दोनोंका युद्ध वैसा ही प्रतीत हुआ, जैसा कि पूर्वकालमें पंखयुक्त एवं वृक्षावलीसे विभूषित दो पर्वतोंमें युद्ध हुआ करता था ।। ३६ १/२ ।।
प्राग्ज्योतिषपतेर्नागः संनिवृत्यापसृत्य च ।। ३७ ।।
पार्श्वे दशार्णाधिपतेर्भित्त्वा नागमपातयत् ।
प्राग्ज्योतिषनरेशके हाथीने लौटकर और पीछे हटकर दशार्णराजके हाथीके पार्श्वभागमें गहरा आघात किया और उसे विदीर्ण करके मार गिराया ।। ३७ १/२ ।।
तोमरैः सूर्यरश्म्याभैर्भगदत्तोऽथ सप्तभिः ।। ३८ ।।
जघान द्विरदस्थं तं शत्रुं प्रचलितासनम् ।
तत्पश्चात् राजा भगदत्तने सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले सात तोमरोंद्वारा हाथीपर बैठे हुए शत्रु दशार्णराजको, जिसका आसन विचलित हो गया था, मार डाला ।। ३८ १/२ ।।
व्यवच्छिद्य तु राजानं भगदत्तं युधिष्ठिरः ।। ३९ ।।
रथानीकेन महता सर्वतः पर्यवारयत् ।
तब युधिष्ठिरने राजा भगदत्तको अपने बाणोंसे घायल करके विशाल रथसेनाके द्वारा सब ओरसे घेर लिया ।। ३९ १/२ ।।
स कुञ्जरस्थो रथिभिः शुशुभे सर्वतो वृतः ।। ४० ।।
पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः ।
जैसे वनके भीतर पर्वतके शिखरपर दावानल प्रज्वलित हो रहा हो, उसी प्रकार सब ओर रथियोंसे घिरकर हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त सुशोभित हो रहे थे ।। ४० १/२ ।।
मण्डलं सर्वतः श्लिष्टं रथिनामुग्रधन्विनाम् ।। ४१ ।।
किरतां शरवर्षाणि स नागः पर्यवर्तत ।
बाणोंकी वर्षा करते हुए भयंकर धनुर्धर रथियोंका मण्डल उस हाथीपर सब ओरसे आक्रमण कर रहा था और वह हाथी चारों ओर चक्कर काट रहा था ।। ४१ १/२ ।।

ततः प्राग्ज्योतिषो राजा परिगृह्य महागजम् ॥ ४२ ॥
प्रेषयामास सहसा युयुधानरथं प्रति ।
उस समय प्राग्ज्योतिषपुरके राजाने उस महान् गजराजको सब ओरसे काबूमें करके सहसा सात्यकिके रथकी ओर बढ़ाया ॥ ४२ १/२ ॥
शिनेः पौत्रस्य तु रथं परिगृह्य महाद्विपः ॥ ४३ ॥
अभिचिक्षेप वेगेन युयुधानस्त्वपाक्रमत् ।
युयुधान (सात्यकि) अपने रथको छोड़कर दूर हट गये और उस महान् गजराजने शिनिपौत्र सात्यकिके उस रथको सूँडसे पकड़कर बड़े वेगसे फेंक दिया ॥ ४३ १/२ ॥
बृहतः सैन्धवानश्वान् समुत्थाप्याथ सारथिः ॥ ४४ ॥
तस्थौ सात्यकिमासाद्य सम्प्लुतस्तं रथं प्रति ।
तदनन्तर सारथिने अपने रथके विशाल सिंधी घोड़ोंको उठाकर खड़ा किया और कूदकर रथपर जा चढ़ा। फिर रथसहित सात्यकिके पास जाकर खड़ा हो गया ॥ ४४ १/२ ॥
स तु लब्ध्वान्तरं नागस्त्वरितो रथमण्डलात् ॥ ४५ ॥
निश्चक्राम ततः सर्वान् परिचिक्षेप पार्थिवान् ।
इसी बीचमें अवसर पाकर वह गजराज बड़ी उतावलीके साथ रथोंके घेरेसे पार निकल गया और समस्त राजाओंको उठा-उठाकर फेंकने लगा ॥ ४५ १/२ ॥
ते त्वाशुगतिना तेन त्रास्यमाना नरर्षभाः ॥ ४६ ॥
तमेकं द्विरदं संख्ये मेनिरे शतशो द्विपान् ।
उस शीघ्रगामी गजराजसे डराये हुए नरश्रेष्ठ नरेश युद्धस्थलमें उस एकको ही सैकड़ों हाथियोंके समान मानने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
ते गजस्थेन काल्यन्ते भगदत्तेन पाण्डवाः ॥ ४७ ॥
ऐरावतस्थेन यथा देवराजेन दानवाः ।
जैसे देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठकर दानवोंका नाश करते हैं, उसी प्रकार अपने हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त पाण्डव-सैनिकोंका संहार कर रहे थे ॥ ४७ १/२ ॥
तेषां प्रद्रवतां भीमः पञ्चालानामितस्ततः ॥ ४८ ॥
गजवाजिकृतः शब्दः सुमहान् समजायत ।
उस समय इधर-उधर भागते हुए पांचाल-सैनिकोंके हाथी-घोड़ोंका महान् भयंकर चीत्कार शब्द प्रकट हुआ ॥ ४८ १/२ ॥
भगदत्तेन समरे काल्यमानेषु पाण्डुषु ॥ ४९ ॥
प्राग्ज्योतिषमभिक्रुद्धः पुनर्भीमः समभ्ययात् ।
भगदत्तके द्वारा समरभूमिमें पाण्डव-सैनिकोंके खदेड़े जानेपर भीमसेन कुपित हो पुनः प्राग्ज्योतिषके स्वामी भगदत्तपर चढ़ आये ॥ ४९ १/२ ॥

तस्याभिद्रवतो वाहान् हस्तमुक्तेन वारिणा ।। ५० ।। सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः । उस समय आक्रमण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंपर उस हाथीने सूँड़से जल छोड़कर उन्हें भयभीत कर दिया। फिर तो वे घोड़े भीमसेनको लेकर दूर भाग गये ।। ५० १/२ ।। ततस्तमभ्ययात् तूर्णं रुचिपर्वाऽऽकृतीसुतः ।। ५१ ।। समघ्नञ्छरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः । तब आकृतीपुत्र रुचिपर्वाने तुरंत ही उस हाथीपर आक्रमण किया। वह रथपर बैठकर साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था। उसने बाणोंकी वर्षासे उस हाथीको गहरी चोट पहुँचायी ।। ५१ १/२ ।। ततः स रुचिपर्वाणं शरेणानतपर्वणा ।। ५२ ।। सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम् । यह देख जिनके अंगोंकी जोड़ सुन्दर है उन पर्वतराज भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा रुचिपर्वाको यमलोक पहुँचा दिया ।। ५२ १/२ ।। तस्मिन् निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुतः ।। ५३ ।। चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन् द्विपम् । त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः ।। ५४ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः । उस वीरके मारे जानेपर अभिमन्यु, द्रौपदीकुमार, चेकितान, धृष्टकेतु तथा युयुत्सुने भी उस हाथीको पीड़ा देना आरम्भ किया। ये सब लोग उस हाथीको मार डालनेकी इच्छासे विकट गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी धारासे सींचने लगे, मानो मेघ पर्वतको जलकी धारासे नहला रहे हों ।। ५३-५४ १/२ ।। ततः पाष्र्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः ।। ५५ ।। प्रसारितकरः प्रायात् स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम् । सोऽधिष्ठाय पदा वाहान् युयुत्सोः सूतमरुजत् ।। ५६ ।। तदनन्तर विद्वान् राजा भगदत्तने अपने पैरोंकी एँड़ी, अंकुश एवं अंगुष्ठसे प्रेरित करके हाथीको आगे बढ़ाया। फिर तो अपने कानोंको खड़े करके एकटक आँखोंसे देखते हुए सूँड़ फैलाकर उस हाथीने शीघ्रतापूर्वक धावा किया और युयुत्सुके घोड़ोंको पैरोंसे दबाकर उनके सारथिको मार डाला ।। ५५-५६ ।। युयुत्सुस्तु रथाद् राजन्नपाक्रामत् त्वरान्वितः । ततः पाण्डवयोधास्ते नागराजं शरैर्द्रुतम् ।। ५७ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः ।

राजन्! युयुत्सु बड़ी उतावलीके साथ रथसे उतरकर दूर चले गये थे। तत्पश्चात् पाण्डव-योद्धा उस गजराजको शीघ्रतापूर्वक मार डालनेकी इच्छासे भैरव-गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उसे सींचने लगे ॥ ५७ १/२ ॥

पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् ॥ ५८ ॥
स कुञ्जरस्थो विसृजन्निक्षूनरिषु पार्थिवः ।
बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ॥ ५९ ॥
उस समय घबराये हुए आपके पुत्र युयुत्सु अभिमन्युके रथपर जा बैठे। हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त शत्रुओंपर बाण-वर्षा करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५८-५९ ॥

तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः ।
त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ॥ ६० ॥
अर्जुनकुमार अभिमन्युने बारह, युयुत्सुने दस और द्रौपदीके पुत्रों तथा धृष्टकेतुने तीन-तीन बाणोंसे भगदत्तके उस हाथीको घायल कर दिया ॥ ६० ॥

सोऽतियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ ।
संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ॥ ६१ ॥
अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चलाये हुए उन बाणोंसे हाथीका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। उस अवस्थामें वह सूर्यकी किरणोंमें पिरोये हुए महामेघके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥

नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेरितोऽरिशरार्दितः ।
परिचिक्षेप तान् नागः स रिपून् सव्यदक्षिणम् ॥ ६२ ॥
महावतके कौशल और प्रयत्नसे प्रेरित होकर वह हाथी शत्रुओंके बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी उन विपक्षियोंको दायें-बायें उठाकर फेंकने लगा ॥ ६२ ॥

गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।
आवेष्टयत तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ॥ ६३ ॥
जैसे ग्वाला जंगलमें पशुओंको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भगदत्तने पाण्डव-सेनाको बार-बार घेर लिया ॥ ६३ ॥

क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः ।
बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः ॥ ६४ ॥
जैसे बाज पक्षीके चंगुलमें फँसे हुए अथवा उसके आक्रमणसे त्रस्त हुए कौओंमें शीघ्र ही काँव-काँवका कोलाहल होने लगता है, उसी प्रकार भागते हुए पाण्डव योद्धाओंका आर्तनाद जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ६४ ॥

स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः
पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप ।

भयं तदा रिपुषु समादधद् भृशं वणिग्जनानां क्षुभितो यथार्णवः ॥ ६५ ॥ नरेश्वर! उस समय विशाल अंकुशकी मार खाकर वह गजराज पूर्वकालके पंखधारी श्रेष्ठ पर्वतकी भाँति शत्रुओंको उसी प्रकार अत्यन्त भयभीत करने लगा, जैसे विक्षुब्ध महासागर व्यापारियोंको भयमें डाल देता है ॥ ६५ ॥

ततो ध्वनिर्दिरदरथाश्वपार्थिवै- र्भयाद् द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः । क्षितिं वियद् द्यां विदिशो दिशस्तथा समावृणोत् पार्थिव संयुगे ततः ॥ ६६ ॥ महाराज! तदनन्तर भयसे भागते हुए हाथी, रथ, घोड़े तथा राजाओंने वहाँ अत्यन्त भयंकर आर्तनाद फैला दिया। उनके उस भयंकर शब्दने युद्धस्थलमें पृथ्‍वी, आकाश, स्वर्ग तथा दिशा-विदिशाओंको सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ ६६ ॥

स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् । पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे विरोचनो देववरूथिनीमिव ॥ ६७ ॥ उस गजराजके द्वारा राजा भगदत्तने शत्रुओंकी सेनामें अच्छी तरह प्रवेश किया। जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय देवताओंद्वारा सुरक्षित देव-सेनामें विरोचनने प्रवेश किया था ॥ ६७ ॥

भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद् रजः समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् । तमेकनागं गणशो यथा गजान् समन्ततो द्रुतमथ मेनिरे जनाः ॥ ६८ ॥ उस समय वहाँ बड़े जोरसे वायु चलने लगी। आकाशमें धूल छा गयी। उस धूलने समस्त सैनिकोंको ढक दिया। उस समय सब लोग चारों ओर दौड़ लगानेवाले उस एकमात्र हाथीको हाथियोंके झुंड-सा मानने लगे ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तयुद्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तका युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

*— हाथीके निचले भागमें कोई ऐसा स्थान होता है, जिसमें दोनों हाथोंके द्वारा थपथपानेसे हाथीको सुख मिलता है। इस अवस्थामें वह महावतके मारनेपर भी टस-से-मस नहीं होता। भीमसेन इस कलाको जानते थे। इसीका नाम ‘अंजलिकावेध’ है।

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सप्तविंशोऽध्यायः

अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध

संजय उवाच

यन्मां पार्थस्य संग्रामे कर्माणि परिपृच्छसि ।
तच्छृणुष्व महाबाहो पार्थो यदकरोद् रणे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाबाहो! आप जो मुझसे युद्धमें अर्जुनके पराक्रम पूछ रहे हैं, उन्हें बताता हूँ। अर्जुनने रणक्षेत्रमें जो कुछ किया था, वह सुनिये ॥ १ ॥

रजो दृष्ट्वा समुद्भूतं श्रुत्वा च गजनिःस्वनम् ।
भगदत्ते विकुर्वाणे कौन्तेयः कृष्णमब्रवीत् ॥ २ ॥
भगदत्तके विचित्र रूपसे युद्ध करते समय वहाँ धूल उड़ती देखकर और हाथीके चिग्घाड़नेका शब्द सुनकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा— ॥ २ ॥

यथा प्राग्ज्योतिषो राजा गजेन मधुसूदन ।
त्वरमाणो विनिष्क्रान्तो ध्रुवं तस्यैष निःस्वनः ॥ ३ ॥
‘मधुसूदन! राजा भगदत्त अपने हाथीपर सवार जिस प्रकार उतावलीके साथ युद्धके लिये निकले थे, उससे जान पड़ता है निश्चय ही यह महान् कोलाहल उन्हींका है ॥ ३ ॥

इन्द्रादनवरः संख्ये गजयानविशारदः ।
प्रथमो गजयोधानां पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ४ ॥
‘मेरा तो यह विश्वास है कि वे युद्धमें इन्द्रसे कम नहीं है। भगदत्त हाथीकी सवारीमें कुशल और गजारोही योद्धाओंमें इस पृथ्वीपर सबसे प्रधान हैं ॥ ४ ॥

स चापि द्विरदश्रेष्ठः सदाऽप्रतिगजो युधि ।
सर्वशस्त्रातिगः संख्ये कृतकर्मा जितक्लमः ॥ ५ ॥
‘और उनका वह गजश्रेष्ठ सुप्रतीक भी युद्धमें अपना शानी नहीं रखता है। वह सब शास्त्रोंका उल्लंघन करके युद्धमें अनेक बार पराक्रम प्रकट कर चुका है। उसने परिश्रमको जीत लिया है ॥ ५ ॥

सहः शस्त्रनिपातानामग्निस্পর্শस्य चानघ ।
स पाण्डवबलं सर्वमद्यैको नाशयिष्यति ॥ ६ ॥
‘अनघ! वह सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघात तथा अग्निके स्पर्शको भी सह सकनेवाला है। आज वह अकेला ही समस्त पाण्डव-सेनाका विनाश कर डालेगा ॥ ६ ॥

न चावाभ्यामृतेऽन्योऽस्ति शक्तस्तं प्रतिबाधितुम् ।

त्वरमाणस्ततो याहि यतः प्राग्ज्योतिषाधिपः ॥ ७ ॥
'हम दोनोंके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उसे बाधा देनेमें समर्थ हो। अतः आप शीघ्रतापूर्वक वहीं चलिये, जहाँ प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त विद्यमान हैं' ॥ ७ ॥
दृप्तं संख्ये द्विपबलाद् वयसा चापि विस्मितम् ।
अद्यैनं प्रेषयिष्यामि बलहन्तुः प्रियातिथिम् ॥ ८ ॥
'अपने हाथीके बलसे युद्धमें घमंड दिखानेवाले और अवस्थामें भी बड़े होनेका अहंकार रखनेवाले इन राजा भगदत्तको मैं देवराज इन्द्रका प्रिय अतिथि बनाकर स्वर्गलोक भेज दूँगा' ॥ ८ ॥
वचनादथ कृष्णस्तु प्रययौ सव्यसाचिनः ।
दीर्यते भगदत्तेन यत्र पाण्डववाहिनी ॥ ९ ॥
सव्यसाची अर्जुनके इस वचनसे प्रेरित हो श्रीकृष्ण उस स्थानपर रथ लेकर गये, जहाँ भगदत्त पाण्डव-सेनाका संहार कर रहे थे ॥ ९ ॥
तं प्रयान्तं ततः पश्चादाह्वयन्तो महारथाः ।
संशप्तकाः समारोहन् सहस्राणि चतुर्दश ॥ १० ॥
अर्जुनको जाते देख पीछेसे चौदह हजार संशप्तक महारथी उन्हें ललकारते हुए चढ़ आये ॥ १० ॥
दशैव तु सहस्राणि त्रिगर्तानां महारथाः ।
चत्वारि च सहस्राणि वासुदेवस्य चानुगाः ॥ ११ ॥
उनमें दस हजार महारथी तो त्रिगर्तदेशके थे और चार हजार भगवान् श्रीकृष्णके सेवक (नारायणी-सेनाके सैनिक) थे ॥ ११ ॥
दीर्यमाणां चमूं दृष्ट्वा भगदत्तेन मारिष ।
आहूयमानस्य च तैरभवद्धृदयं द्विधा ॥ १२ ॥
आर्य! राजा भगदत्तके द्वारा अपनी सेनाको विदीर्ण होती देखकर तथा पीछेसे संशप्तकोंकी ललकार सुनकर उनका हृदय दुविधामें पड़ गया ॥ १२ ॥
किं नु श्रेयस्करं कर्म भवेदद्येति चिन्तयन् ।
इह वा विनिवर्तेयं गच्छेयं वा युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥
वे सोचने लगे—आज मेरे लिये कौन-सा कार्य श्रेयस्कर होगा। यहाँसे संशप्तकोंकी ओर लौट चलूँ अथवा युधिष्ठिरके पास जाऊँ ॥ १३ ॥
तस्य बुद्ध्या विचार्यैवमर्जुनस्य कुरूद्वह ।
अभवद् भूयसी बुद्धिः संशप्तकवधे स्थिरा ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बुद्धिसे इस प्रकार विचार करनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव अत्यन्त दृढ़ हुआ कि संशप्तकोंके वधका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ १४ ॥
स संनिवृत्तः सहसा कपिप्रवरकेतनः ।

एको रथसहस्राणि निहन्तुं वासवी रणे ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ वानरचिह्नसे सुशोभित ध्वजावाले इन्द्रकुमार अर्जुन उपर्युक्त बात सोचकर सहसा लौट पड़े। वे रणक्षेत्रमें अकेले ही हजारों रथियोंका संहार करनेको उद्यत थे ॥ १५ ॥
सा हि दुर्योधनस्यासीन्मतिः कर्णस्य चोभयोः ।
अर्जुनस्य वधोपाये तेन द्वैधमकल्पयत् ॥ १६ ॥
अर्जुनके वधका उपाय सोचते हुए दुर्योधन और कर्ण दोनोंके मनमें यही विचार उत्पन्न हुआ था। इसीलिये उसने युद्धको दो भागोंमें बाँट दिया ॥ १६ ॥
स तु दोलायमानोऽभूद् द्वैधीभावेन पाण्डवः ।
वधेन तु नराग्र्याणामकरोत् तां मृषा तदा ॥ १७ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन एक बार दुविधामें पड़कर चंचल हो गये थे, तथापि नरश्रेष्ठ संशप्तक वीरोंके वधका निश्चय करके उन्होंने उस दुविधाको मिथ्या कर दिया था ॥ १७ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।
असृजन्नर्जुने राजन् संशप्तकमहारथाः ॥ १८ ॥
राजन्! तदनन्तर संशप्तक महारथियोंने अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक लाख बाणोंकी वर्षा की ॥ १८ ॥
नैव कुन्तीसुतः पार्थो नैव कृष्णो जनार्दनः ।
न हया न रथो राजन् दृश्यन्ते स्म शरैश्चिताः ॥ १९ ॥
महाराज! उस समय न तो कुन्तीकुमार अर्जुन, न जनार्दन श्रीकृष्ण, न घोड़े और न रथ ही दिखायी देते थे। सब-के-सब वहाँ बाणोंके ढेरसे आच्छादित हो गये थे ॥ १९ ॥
तदा मोहमनुप्राप्तः सिष्विदे हि जनार्दनः ।
ततस्तान् प्रायशः पार्थो ब्रह्मास्त्रेण निजघ्निवान् ॥ २० ॥
उस अवस्थामें भगवान् जनार्दन पसीने-पसीने हो गये। उनपर मोह-सा छा गया। यह देख अर्जुनने ब्रह्मास्त्रसे उन सबको अधिकांशमें नष्ट कर दिया ॥ २० ॥
शतशः पाणयश्छिन्नाः सेषुज्यातालकार्मुकाः ।
केतवो वाजिनः सूता रथिनश्चापतन् क्षितौ ॥ २१ ॥
सैकड़ों भुजाएँ बाण, प्रत्यंचा और धनुषसहित कट गयीं। ध्वज, घोड़े, सारथि और रथी सभी धराशायी हो गये ॥ २१ ॥
द्रुमाचलाग्राम्बुधरैः समकायाः सुकल्पिताः ।
हतारोहाः क्षितौ पेतुर्द्विपाः पार्थशराहताः ॥ २२ ॥
वृक्ष, पर्वत-शिखर और मेघोंके समान विशाल एवं ऊँचे शरीरवाले, सजे-सजाये हाथी, जिनके सवार पहले ही मार दिये गये थे, अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥
विप्रविद्धकुथा नागाश्छिन्नभाण्डाः परासवः ।

सारोहास्तु रणे पेतुर्मथिता मार्गणैर्भृशम् ॥ २३ ॥ उस रणक्षेत्रमें बहुत-से हाथी अर्जुनके बाणोंसे मथित होकर सवारोंसहित प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय उनके झूल चिथड़े-चिथड़े होकर दूर जा पड़े थे और उनके आभूषणोंके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये थे॥ २३ ॥

सर्ष्टिप्रासासिनखराः समुद्गरपरश्वधाः । विच्छिन्ना बाहवः पेतुर्नॄणां भल्लैः किरीटिना ॥ २४ ॥ किरीटधारी अर्जुनके भल्लनामक बाणोंसे ऋष्टि, प्रास, खड्ग, नखर, मुद्गर और फरसोंसहित वीरोंकी भुजाएँ कटकर गिर गयीं ॥ २४ ॥

बालादित्याम्बुजेन्दूनां तुल्यरूपाणि मारिष । संच्छिन्नान्यर्जुनशरैः शिरांस्युर्व्यां प्रपेदिरे ॥ २५ ॥ आर्य! योद्धाओंके मस्तक, जो बालसूर्य, कमल और चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥

जज्वालालंकृता सेना पत्रिभिः प्राणिभोजनैः । नानारूपैस्तदामित्रान् क्रुद्धे निघ्नति फाल्गुने ॥ २६ ॥ जब क्रोधमें भरे हुए अर्जुन नाना प्रकारके प्राणनाशक बाणोंद्वारा शत्रुओंका नाश करने लगे, उस समय आभूषणोंसे विभूषित हुई संशप्तकोंकी सारी सेना जलने लगी ॥ २६ ॥

क्षोभयन्तं तदा सेनां द्विरदं नलिनीमिव । धनंजयं भूतगणाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ २७ ॥ जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार अर्जुनको सारी सेनाका विनाश करते देख सब प्राणी 'साधु-साधु' कहकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २७ ॥

दृष्ट्वा तत् कर्म पार्थस्य वासवस्येव माधवः । विस्मयं परमं गत्वा प्राञ्जलिस्तमुवाच ह ॥ २८ ॥ इन्द्रके समान अर्जुनका वह पराक्रम देख भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त आश्चर्यमें पड़कर हाथ जोड़े हुए बोले— ॥ २८ ॥

कर्मैतत् पार्थ शक्रेण यमेन धनदेन च । दुष्करं समरे यत् ते कृतमद्येति मे मतिः ॥ २९ ॥ 'पार्थ! मेरा ऐसा विश्वास है कि आज समर-भूमिमें तुमने जो कार्य किया है, यह इन्द्र, यम और कुबेरके लिये भी दुष्कर है ॥ २९ ॥

युगपच्चैव संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः । पतिता एव मे दृष्टाः संशप्तकमहारथाः ॥ ३० ॥ 'इस संग्राममें मैंने सैकड़ों और हजारों संशप्तक महारथियोंको एक साथ ही गिरते देखा है' ॥ ३० ॥

संशप्तकांस्ततो हत्वा भूयिष्ठा ये व्यवस्थिताः । भगदत्ताय याहीति कृष्णं पार्थोऽभ्यनोदयत् ॥ ३१ ॥ इस प्रकार वहाँ खड़े हुए संशप्तक योद्धाओंमेंसे अधिकांशका वध करके अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'अब भगदत्तके पास चलिये' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि संशप्तकवधे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें संशप्तकोंका वधविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशोऽध्यायः

संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम

संजय उवाच

यियासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान् मनोजवान् ।
सम्प्रेषीद्धेमसंछन्नान् द्रोणानीकाय सत्वरन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर द्रोणकी सेनाके समीप जानेकी इच्छावाले अर्जुनके सुवर्णभूषित एवं मनके समान वेगशाली अश्वोंको भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यकी सेनातक पहुँचनेके लिये हाँका ॥ १ ॥

तं प्रयान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वान् भ्रातॄन् द्रोणतापितान् ।
सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ २ ॥
द्रोणाचार्यके सताये हुए अपने भाइयोंके पास जाते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको भाइयोंसहित सुशर्माने युद्धकी इच्छासे ललकारा और पीछेसे उनपर आक्रमण किया ॥ २ ॥

ततः श्वेतहयः कृष्णमब्रवीदजितं जयः ।
एष मां भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयतेऽच्युत ॥ ३ ॥
तब श्वेतवाहन अर्जुनने अपराजित श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा, 'अच्युत! यह भाइयोंसहित सुशर्मा मुझे पुनः युद्धके लिये बुला रहा है ॥ ३ ॥

दीर्यते चोत्तरेणैव तत् सैन्यं मधुसूदन ।
द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम् ॥ ४ ॥
'उधर उत्तर दिशाकी ओर अपनी सेनाका नाश किया जा रहा है। मधुसूदन! इन संशप्तकोंने आज मेरे मनको दुविधामें डाल दिया है ॥ ४ ॥

किं नु संशप्तकान् हन्मि स्वान् रक्षाम्यहितार्दितान् ।
इति मे त्वं मतं वेत्सि तत्र किं सुकृतं भवेत् ॥ ५ ॥
'क्या मैं संशप्तकोंका वध करूँ अथवा शत्रुओंद्वारा पीड़ित हुए अपने सैनिकोंकी रक्षा करूँ। इस प्रकार मेरा मन संकल्प-विकल्पमें पड़ा है, सो आप जानते ही हैं। बताइये, अब मेरे लिये क्या करना अच्छा होगा' ॥ ५ ॥

एवमुक्तस्तु दाशार्हः स्यन्दनं प्रत्यवर्तयत् ।
येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपने रथको उसी ओर लौटाया, जिस ओरसे त्रिगर्तराज सुशर्मा उन पाण्डुकुमारको युद्धके लिये ललकार रहा था ॥ ६ ॥

ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । ध्वजं धनुश्चास्य तथा क्षुराभ्यां समकृन्तत ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् अर्जुनने सुशर्माको सात बाणोंसे घायल करके दो क्षुरोंद्वारा उसके ध्वज और धनुषको काट डाला ॥ ७ ॥

त्रिगर्ताधिपतेश्चापि भ्रातरं षड्भिराशुगैः । साश्वं ससूतं त्वरितः पार्थः प्रैषीद् यमक्षयम् ॥ ८ ॥ साथ ही त्रिगर्तराजके भाईको भी छः बाण मारकर अर्जुनने उसे घोड़े और सारथिसहित तुरंत यमलोक भेज दिया ॥ ८ ॥

ततो भुजगसंकाशां सुशर्मा शक्तिमायसीम् । चिक्षेपार्जुनमादिश्य वासुदेवाय तोमरम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर सुशर्माने सर्पके समान आकृतिवाली लोहेकी बनी हुई एक शक्तिको अर्जुनके ऊपर चलाया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णपर तोमरसे प्रहार किया ॥ ९ ॥

शक्तिं त्रिभिः शरैश्छित्त्वा तोमरं त्रिभिरर्जुनः । सुशर्माणं शरव्रातैर्मोहयित्वा न्यवर्तयत् ॥ १० ॥ अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा शक्ति तथा तीन बाणोंद्वारा तोमरको काटकर सुशर्माको अपने बाणसमूहोंद्वारा मोहित करके पीछे लौटा दिया ॥ १० ॥

तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षं शरौघिनम् । राजंस्तावकसैन्यानां नोग्रं कश्चिदवारयत् ॥ ११ ॥ राजन्! इसके बाद वे इन्द्रके समान बाण-समूहोंकी भारी वर्षा करते हुए जब आपकी सेनापर आक्रमण करने लगे, उस समय आपके सैनिकोंमेंसे कोई भी उन उग्ररूपधारी अर्जुनको रोक न सका ॥ ११ ॥

ततो धनंजयो बाणैः सर्वानैव महारथान् । आयाद् विनिघ्नन् कौरव्यान् दहन् कक्षमिवानलः ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् जैसे अग्नि घास-फूँसके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन अपने बाणोंद्वारा समस्त कौरव महारथियोंको क्षत-विक्षत करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥

तस्य वेगमसह्यं तं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । नाशक्नुवंस्ते संसोढुं स्पर्शमग्नेरिव प्रजाः ॥ १३ ॥ परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्रके उस असह्य वेगको कौरव-सैनिक उसी प्रकार नहीं सह सके, जैसे प्रजा अग्निका स्पर्श नहीं सहन कर पाती ॥ १३ ॥

संवेष्टयन्ननीकानि शरवर्षेण पाण्डवः । सुपर्णपातवद् राजन्नायात् प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १४ ॥ राजन्! अर्जुनने बाणोंकी वर्षासे कौरव-सेनाओंको आच्छादित करते हुए गरुड़के समान वेगसे भगदत्तपर आक्रमण किया ॥ १४ ॥

यत् तदानामयज्जिष्णुर्भरतानामपापिनाम् । धनुः क्षेमकरं संख्ये द्विषतामश्रुवर्धनम् ।। १५ ।। तदेव तव पुत्रस्य राजन् दुर्द्यूतदेविनः । कृते क्षत्रविनाशाय धनुरायच्छदर्जुनः ।। १६ ।। महाराज! विजयी अर्जुनने युद्धमें शत्रुओंकी अश्रुधाराको बढ़ानेवाले जिस धनुषको कभी निष्पाप भरतवंशियोंका कल्याण करनेके लिये नवाया था, उसीको कपटद्यूत खेलनेवाले आपके पुत्रके अपराधके कारण सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये हाथमें लिया ।। १५-१६ ।।

तथा विक्षोभ्यमाणा सा पार्थेन तव वाहिनी । व्यशीर्यत महाराज नौरिवासाद्य पर्वतम् ।। १७ ।। नरेश्वर! कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा मथी जाती हुई आपकी वाहिनी उसी प्रकार छिन्न-भिन्न होकर बिखर गयी, जैसे नाव किसी पर्वतसे टकराकर टूक-टूक हो जाती है ।। १७ ।।

ततो दशसहस्राणि न्यवर्तन्त धनुष्मताम् । मतिं कृत्वा रणे क्रूरां वीरा जयपराजये ।। १८ ।। तदनन्तर दस हजार धनुर्धर वीर जय अथवा पराजयके हेतुभूत युद्धका क्रूरतापूर्ण निश्चय करके लौट आये ।। १८ ।।

व्यपेतहृदयत्रासा आवव्रुस्तं महारथाः । आर्च्छत् पार्थो गुरुं भारं सर्वभारसहो युधि ।। १९ ।। उन महारथियोंने अपने हृदयसे भयको निकालकर अर्जुनको वहाँ घेर लिया। युद्धमें समस्त भारोंको सहन करनेवाले अर्जुनने उनसे लड़नेका भारी भार भी अपने ही ऊपर ले लिया ।। १९ ।।

यथा नलवनं क्रुद्धः प्रभिन्नः षष्टिहायनः । मृद्नीयात् तद्वदायस्तः पार्थोऽमृद्नाच्चमूं तव ।। २० ।। जैसे साठ वर्षका मदस्रावी हाथी क्रोधमें भरकर नरकुलोंके जंगलको रौंदकर धूलमें मिला देता है, उसी प्रकार प्रयत्नशील पार्थने आपकी सेनाको मटियामेट कर दिया ।। २० ।।

तस्मिन् प्रमथिते सैन्ये भगदत्तो नराधिपः । तेन नागेन सहसा धनंजयमुपाद्रवत् ।। २१ ।। उस सेनाके मथ डाले जानेपर राजा भगदत्तने उसी सुप्रतीक हाथीके द्वारा सहसा धनंजयपर धावा किया ।।

तं रथेन नरव्याघ्रः प्रत्यगृह्णाद् धनंजयः । स संनिपातस्तुमुलो बभूव रथनागयोः ।। २२ ।।