महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्
त्रिनवतितमोऽध्यायः
गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत
युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि व्रतधारी विप्र किसी ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसके घर श्राद्धका अन्न भोजन कर ले तो इसे आप कैसा मानते हैं? (अपने व्रतका लोप करना उचित है या ब्राह्मणकी प्रार्थना अस्वीकार करना) ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रताश्चैव भुञ्जानाः कामकारणे ।
वेदोक्तेषु तु भुञ्जाना व्रतलुप्ता युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो वेदोक्त व्रतका पालन नहीं करते, वे ब्राह्मणकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन कर सकते हैं; किंतु जो वैदिक व्रतका पालन कर रहे हों, वे यदि किसीके अनुरोधसे श्राद्धका अन्न ग्रहण करते हैं तो उनका व्रत भंग हो जाता है ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
तपः स्यादेतदेवेह तपोऽन्यद् वापि किं भवेत् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहा करते हैं, उसके सम्बन्धमें आपकी क्या धारणा है? मैं यह जानना चाहता हूँ कि वास्तवमें उपवास ही तप है या उसका और कोई स्वरूप है ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
मासार्धमासोपवासाद् यत् तपो मन्यते जनः ।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा—राजन्! जो लोग पंद्रह दिन या एक महीनेतक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीरको कष्ट देते हैं। वास्तवमें केवल उपवास करनेवाले न तपस्वी हैं, न धर्मज्ञ ।। ४ ।।
त्यागस्य चापि सम्पत्तिः शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी तथैव च ।। ५ ।।
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो वेदांश्चैव सदा जपेत् ।
त्यागका सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है। ब्राह्मणको सदा उपवासी (व्रतपरायण), ब्रह्मचारी, मुनि और वेदोंका स्वाध्यायी होना चाहिये ।। ५ १/२ ।।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्रश्च मानवः ।। ६ ।।
अमांसाशी सदा च स्यात् पवित्रं च सदा पठेत् ।
ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्च सदा भवेत् ।। ७ ।।
विघसाशी कथं च स्याद् सदा चैवातिथिप्रियः ।
अमृताशी सदा च स्यात् पवित्री च सदा भवेत् ।। ८ ।।
धर्मपालनकी इच्छासे ही उसको स्त्री आदि कुटुम्बका संग्रह करना चाहिये (विषयभोगके लिये नहीं)। ब्राह्मणको उचित है कि वह सदा जाग्रत् रहे, मांस कभी न खाय, पवित्रभावसे सदा वेदका पाठ करे, सदा सत्य भाषण करे और इन्द्रियोंको संयममें रखे। उसको सदा अमृताशी, विघसाशी और अतिथिप्रिय तथा सदा पवित्र रहना चाहिये ।। ६—८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव ।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रियः ।। ९ ।।
युधिष्ठिरने पूछा—पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है? ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
अन्तरा सायमाशं च प्रातराशं च यो नरः ।
सदोपवासी भवति यो न भुंक्तेऽन्तरा पुनः ।। १० ।।
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रातःकाल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिये ।।
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति चैव ह ।
ऋतवादी सदा च स्याद् दानशीलस्तु मानवः ।। ११ ।।
जो केवल ऋतुकालमें धर्मपत्नीके साथ सहवास करता है वह ब्रह्मचारी ही माना जाता है। सदा दान देनेवाला पुरुष सत्यवादी ही समझने योग्य है ।। ११ ।।
अभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत ।
दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्रश्च दिवास्वपन् ॥ १२ ॥
जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ॥ १२ ॥
भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नरः सदा ।
अमृतं केवलं भुंक्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों* और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला (अमृताशी) समझना चाहिये ॥ १३ ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नरः ।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥
जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है ॥ १४ ॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च ।
अवशिष्टानि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणः स्मृताः ।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप ॥ १६ ॥
नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं। उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥
देवतातिथिभिः सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते ।
रमन्ते पुत्रपौत्रेण तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥
जो देवताओं और अतिथियोंसहित पितरोंके लिये अन्नका भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगत्में पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और मृत्युके पश्चात् उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च ।
दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वै को विशेषः पितामह ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! लोग ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान करते हैं। दान देने और दान लेनेवाले पुरुषोंमें क्या विशेषता होती है? ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
साधोर्यः प्रतिगृह्णीयात् तथैवासाधुतो द्विजः ।
गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ॥ १९ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् उत्तम गुण-आचरणवाले पुरुषसे तथा असाधु अर्थात् दुर्गुण और दुराचारवाले पुरुषसे दान ग्रहण करता है, उनमें सद्गुणी-सदाचारवाले पुरुषसे दान लेना अल्प दोष है। किंतु दुर्गुण और दुराचारवालेसे दान लेनेवाला पापमें डूब जाता है ॥ १९ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वृषादर्भेश्च संवादं सप्तर्षीणां च भारत ॥ २० ॥
भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २० ॥
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
विश्वामित्रो जमदग्निः साध्वी चैवाप्यरुन्धती ॥ २१ ॥
सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत् कर्मकारिका ।
शूद्रः पशुसखश्चैव भर्ता चास्या बभूव ह ॥ २२ ॥
ते च सर्वे तपस्यन्तः पुरा चेरुर्महीमिमाम् ।
समाधिनोपशिक्षन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ २३ ॥
एक समयकी बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता देवी अरुन्धती—ये सब लोग समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए इस पृथ्वीपर विचर रहे थे। इन सबकी सेवा करनेवाली एक दासी थी, जिसका नाम था 'गण्डा'। वह पशुसख नामक एक शूद्रके साथ व्याही गयी थी (पशुसख भी इन्हीं महर्षियोंके साथ रहकर सबकी सेवा किया करता था) ॥ २१—२३ ॥
अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दन ।
कृच्छ्रप्राणोऽभवद् यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वितः ॥ २४ ॥
कुरुनन्दन! एक बार पृथ्वीपर दीर्घकालतक वर्षा नहीं हुई। जिससे अकाल पड़ जानेके कारण यह सारा जगत् भूखसे पीड़ित रहने लगा। लोग बड़ी कठिनाईसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ २४ ॥
कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना ।
दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्तः पुत्रः पुरा किल ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था ॥ २५ ॥
अस्मिन् कालेऽथ सोऽल्पायुर्दिष्टान्तमगमत् प्रभुः ।
ते तं क्षुधाभिसंतप्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥ २६ ॥
उस दुर्भिक्षके समय वह अल्पायु राजकुमार मृत्युको प्राप्त हो गया। वे सप्तर्षि भूखसे पीड़ित थे, इसलिये उस मरे हुए बालकको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥
वृषादर्भिरुवाच
(प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता ।) प्रतिग्रहस्तारयति पुष्ट्यर्थे प्रतिगृह्यताम् । मयि यद् विद्यते वित्तं तद् वृणुध्वं तपोधनाः ॥ २७ ॥
तब वृषादर्भि बोले—प्रतिग्रह ब्राह्मणोंके लिये उत्तम वृत्ति नियत किया गया है। तपोधन! प्रतिग्रह दुर्भिक्ष और भूखके कष्टसे ब्राह्मणकी रक्षा करता है तथा पुष्टिका उत्तम साधन है। अतः मेरे पास जो धन है उसे आप स्वीकार करें और ले लें ॥ २७ ॥
प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् । एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतरोमाः ॥ २८ ॥
क्योंकि जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आपलोगोंमेंसे प्रत्येकको एक हजार खच्चरियाँ देता हूँ तथा सभीको सफेद रोएँवाली शीघ्रगामिनी एवं ब्यायी हुई गौएँ साँडोंसहित देनेको उद्यत हूँ ॥ २८ ॥
कुलंभराननडुहः शतं शतान् धुर्यान् श्वेतान् सर्वशोऽहं ददामि । प्रष्ठौहीनां पीवराणां च ताव- दग्र्या गृष्ट्यो धेनवः सुव्रताश्च ॥ २९ ॥
साथ ही एक कुलका भार वहन करनेवाले दस हजार भारवाहक सफेद बैल भी आप सब लोगोंको दे रहा हूँ। इतना ही नहीं, मैं आप सब लोगोंको जवान, मोटी-ताजी, पहली बारकी ब्यायी हुई, अच्छे स्वभाववाली श्रेष्ठ एवं दुधारू गौएँ भी देता हूँ ॥ २९ ॥
वरान् ग्रामान् व्रीहिरसं यवांश्च रत्नं चान्यद् दुर्लभं किं ददानि । नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं पुष्ट्यर्थं वः किं प्रयच्छाम्यहं वै ॥ ३० ॥
इनके सिवा अच्छे-अच्छे गाँव, धान, रस, जौ, रत्न तथा और भी अनेक दुर्लभ वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ। बतलाइये, मैं आपको क्या दूँ? आप इस अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें मन न लगावें। कहिये, आपके शरीरकी पुष्टिके लिये मैं क्या दूँ ॥ ३० ॥
ऋषय ऊचुः
राजन् प्रतिग्रहो राज्ञां मध्वास्वादो विषोपमः । तज्जानमानः कस्मात् त्वं कुरुषे नः प्रलोभनम् ॥ ३१ ॥
ऋषि बोले— राजन्! राजाका दिया हुआ दान ऊपरसे मधुके समान मीठा जान पड़ता है, परंतु परिणाममें विषके समान भयंकर हो जाता है। इस बातको जानते हुए भी आप क्यों हमें प्रलोभनमें डाल रहे हैं ।। ३१ ।।
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम् ।
अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ।। ३२ ।।
ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं। यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ।। ३२ ।।
अह्नापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते ।
तद् दाव इव निर्दह्यात् प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ।। ३३ ।।
ब्राह्मण दिनभरमें जितना तप संग्रह करता है, उसको राजाका दिया हुआ दान वनको दग्ध करनेवाले दावानलकी भाँति नष्ट कर डालता है ।। ३३ ।।
कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव ।
अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वान्येन ते ययुः ।। ३४ ।।
राजन्! इस दानके साथ ही आप सदा सकुशल रहें और यह सारा दान आप उन्हींको दें जो आपसे इन वस्तुओंको लेना चाहते हों। ऐसा कहकर वे दूसरे मार्गसे चल दिये ।। ३४ ।।
ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वाश्य मन्त्रिणः ।
प्रचीयोदुम्बराणि स्म दातुं तेषां प्रचक्रिरे ।। ३५ ।।
तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे ।। ३५ ।।
उदुम्बराण्यर्थान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् ।
भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ।। ३६ ।।
मन्त्रियोंने गूलर तथा दूसरे-दूसरे वृक्षोंके फल तोड़कर उनमें सुवर्ण-मुद्राएँ भर दीं। फिर उन फलोंको लेकर राजाके सेवक उन्हें ऋषियोंके हवाले करनेके लिये उनके पीछे दौड़े गये ।। ३६ ।।
गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत् ।
न स्महे मन्दविज्ञाना न स्महे मन्दबुद्धयः ।। ३७ ।।
हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जागृम ।
इह ह्येतदुपादत्तं प्रेत्य स्यात् कटुकोदयम् ।
अप्रतिग्राह्यमेवैतत् प्रेत्येह च सुखेप्सुना ।। ३८ ।।
वे सभी फल भारी हो गये थे, इस बातको महर्षि अत्रि ताड़ गये और बोले—ये 'गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं। हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है। हमारी ज्ञानशक्ति लुप्त नहीं हुई है। हम सो नहीं रहे हैं, जागते हैं। हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है।
यदि आज हम इन्हें स्वीकार कर लेते हैं तो परलोकमें हमें इनका कटु परिणाम भोगना पड़ेगा। जो इहलोक और परलोकमें भी सुख चाहता हो उसके लिये यह फल अग्राह्य है' ॥ ३७-३८ ॥
वसिष्ठ उवाच
शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम् ।
तथा बहु प्रतीच्छन् वै पापिष्ठां पतते गतिम् ॥ ३९ ॥
**वसिष्ठ बोले—**एक निष्क (स्वर्णमुद्रा) का दान लेनेसे सौ हजार निष्कोंके दान लेनेका दोष लगता है। ऐसी दशामें जो बहुत-से निष्क ग्रहण करता है, उसको तो घोर पापमयी गतिमें गिरना पड़ता है ॥ ३९ ॥
कश्यप उवाच
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद् विद्वान् शमं चरेत् ॥ ४० ॥
**कश्यपने कहा—**इस पृथ्वीपर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब किसी एक पुरुषको मिल जायँ तो भी उसे संतोष न होगा; यह सोचकर विद्वान् पुरुष अपने मनकी तृष्णाको शान्त करे ॥ ४० ॥
भरद्वाज उवाच
उत्पन्नस्य रुरोः शृंगं वर्धमानस्य वर्धते ।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ॥ ४१ ॥
**भरद्वाज बोले—**जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ॥
गौतम उवाच
न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोकं प्रतिपूरयेत् ।
समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ॥ ४२ ॥
**गौतमने कहा—**संसारमें ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो मनुष्यकी आशाका पेट भर सके। पुरुषकी आशा समुद्रके समान है, वह कभी भरती ही नहीं ॥ ४२ ॥
विश्वामित्र उवाच
कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।
अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥ ४३ ॥
**विश्वामित्र बोले—**किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ॥ ४३ ॥
(अत्रिरुवाच
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥)
**अत्रि बोले—**भोगोंकी कामना उनके उपभोगसे कभी नहीं शान्त होती है। अपितु घीकी आहुति पड़नेपर प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है ॥
जमदग्निरुवाच
प्रतिग्रहे संयमो वै तपो धारयते ध्रुवम् ।
तद् धनं ब्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ॥ ४४ ॥
**जमदग्निने कहा—**प्रतिग्रह न लेनेसे ही ब्राह्मण अपनी तपस्याको सुरक्षित रख सकता है। तपस्या ही ब्राह्मणका धन है। जो लौकिक धनके लिये लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥
अरुन्धत्युवाच
धर्मार्थं संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मतः ।
तपःसंचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात् ॥ ४५ ॥ **अरुन्धती बोलीं—**संसारमें एक पक्षके लोगोंकी राय है कि धर्मके लिये धनका संग्रह करना चाहिये; किंतु मेरी रायमें धन-संग्रहकी अपेक्षा तपस्याका संचय ही श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥
गण्डोवाच
उग्रादितो भयाद् यस्माद् बिभ्यतीमे ममेश्वराः । बलीयांसो दुर्बलवद् बिभेम्यहमतः परम् ॥ ४६ ॥ **गण्डाने कहा—**मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ॥
पशुसख उवाच
यद् वै धर्मे परं नास्ति ब्राह्मणास्तद्धनं विदुः । विनयार्थं सुविद्वांसमुपासेयं यथातथम् ॥ ४७ ॥ **पशुसखने कहा—**धर्मका पालन करनेपर जिस धनकी प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है। उस धनको ब्राह्मण ही जानते हैं; अतः मैं भी उसी धर्ममय धनकी प्राप्तिका उपाय सीखनेके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवामें लगा हूँ ॥ ४७ ॥
ऋषय ऊचुः
कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमाः । फलान्युपधियुक्तानि य एवं नः प्रयच्छति ॥ ४८ ॥ **ऋषियोंने कहा—**जिसकी प्रजा ये कपटयुक्त फल देनेके लिये ले आयी है तथा जो इस प्रकार फलके व्याजसे हमें सुवर्णदान कर रहा है, वह राजा अपने दानके साथ ही कुशलसे रहे ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै । ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रताः ॥ ४९ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ४९ ॥
मन्त्रिण ऊचुः
उपधिं शंकमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै । ततोऽन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ॥ ५० ॥
**तब मन्त्रियोंने शैव्यके पास जाकर कहा—**महाराज! आपको विदित हो कि उन फलोंको देखते ही ऋषियोंको यह संदेह हुआ कि हमारे साथ छल किया जा रहा है। इसलिये वे फलोंका परित्याग करके दूसरे मार्गसे चले गये हैं ।। ५० ।।
इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वृषादर्भिश्चुकोप ह ।
तेषां वै प्रतिकर्तुं च सर्वेषामगमद् गृहम् ।। ५१ ।।
सेवकोंके ऐसा कहनेपर राजा वृषादर्भिको बड़ा कोप हुआ और वे उन सप्तर्षियोंसे अपने अपमानका बदला लेनेका विचार करके राजधानीको लौट गये ।। ५१ ।।
स गत्वा हवनीयेऽग्नौ तीव्रं नियममास्थितः ।
जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ।। ५२ ।।
वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अग्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे ।। ५२ ।।
तस्मादग्नेः समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी ।
तस्या नाम वृषादर्भिर्यातुधानीत्यथाकरोत् ।। ५३ ।।
आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा ।। ५३ ।।
सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता ।
वृषादर्भिं नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ।। ५४ ।।
कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली—'महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?' ।। ५४ ।।
वृषादर्भिरुवाच
ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च ।
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय ।। ५५ ।।
ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वनेतान् विनाशय ।
विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ।। ५६ ।।
**वृषादर्भिने कहा—**यातुधानी! तुम यहाँसे वनमें जाओ और वहाँ अरुन्धतीसहित सातों ऋषियोंका, उनकी दासीका और उस दासीके पतिका भी नाम पूछकर उसका तात्पर्य अपने मनमें धारण करो। इस प्रकार उन सबके नामोंका अर्थ समझकर उन्हें मार डालो; उसके बाद जहाँ इच्छा हो चली जाना ।। ५५-५६ ।।
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी ।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षयः ।। ५७ ।।
राजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने ‘तथास्तु’ कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी ।। ५७ ।।
भीष्म उवाच
अथात्रिप्रमुखा राजन् वने तस्मिन् महर्षयः ।
व्यचरन् भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च ।। ५८ ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल-मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे ।। ५८ ।।
अथापश्यन् सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम् ।
परिव्रजन्तं स्थूलांगं परिव्राजं शुना सह ।। ५९ ।।
एक दिन उन महर्षियोंने देखा, एक संन्यासी कुत्तेके साथ वहाँ इधर-उधर विचर रहा है। उसका शरीर बहुत मोटा था। उसके मोटे कंधे, हाथ, पैर, मुख और पेट आदि सभी अंग सुन्दर और सुडौल थे ।। ५९ ।।
अरुन्धती तु तं दृष्ट्वा सर्वांगोपचितं शुभम् ।
भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृषीन् ।। ६० ।।
अरुन्धतीने सारे अंगोंसे हृष्ट-पुष्ट हुए उस सुन्दर संन्यासीको देखकर ऋषियोंसे कहा—‘क्या आपलोग कभी ऐसे नहीं हो सकेंगे?’ ।। ६० ।।
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्वृतम् ।
सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६१ ।।
वसिष्ठजीने कहा— हमलोगोंकी तरह इसको इस बातकी चिन्ता नहीं है कि आज हमारा अग्निहोत्र नहीं हुआ और सबेरे तथा शामको अग्निहोत्र करना है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ खूब मोटा-ताजा हो गया है ।। ६१ ।।
अत्रिरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम् ।
कृच्छ्राधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६२ ।।
अत्रि बोले— हमलोगोंकी तरह भूखके मारे उसकी सारी शक्ति नष्ट नहीं हो गयी है तथा बड़े कष्टसे जो वेदोंका अध्ययन किया गया था, वह भी हमारी तरह इसका नष्ट नहीं हुआ है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६२ ।।
विश्वामित्र उवाच
नैतस्येह यथास्माकं शश्वच्छास्त्रं जरद्गवः ।
अलसः क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६३ ।।
**विश्वामित्रने कहा—**हमलोगोंका भूखके मारे सनातन शास्त्र विस्मृत हो गया है और शास्त्रोक्त धर्म भी क्षीण हो चला है। ऐसी दशा इसकी नहीं है तथा यह आलसी, केवल पेटकी भूख बुझानेमें ही लगा हुआ और मूर्ख है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६३ ॥
जमदग्निरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च ।
संचिन्त्यं वार्षिकं चित्ते तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६४ ॥
**जमदग्नि बोले—**हमारी तरह इसके मनमें वर्षभरके लिये भोजन और ईंधन जुटानेकी चिन्ता नहीं है, इसीलिये कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६४ ॥
कश्यप उवाच
नैतस्येह यथास्माकं चत्वारश्च सहोदराः ।
देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६५ ॥
**कश्यपने कहा—**हमलोगोंके चार भाई हमसे प्रतिदिन ‘भोजन दो, भोजन दो’ कहकर अन्न माँगते हैं, अर्थात् हमलोगोंको एक भारी कुटुम्बके भोजन-वस्त्रकी चिन्ता करनी पड़ती है। इस संन्यासीको यह सब चिन्ता नहीं है। अतः यह कुत्तेके साथ मोटा है ॥ ६५ ॥
भरद्वाज उवाच
नैतस्येह यथास्माकं ब्रह्मबन्धोरचेतसः ।
शोको भार्यापवादेन तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६६ ॥
**भरद्वाज बोले—**इस विवेकशून्य ब्राह्मणबन्धुको हमलोगोंकी तरह अपनी स्त्रीके कलंकित होनेका शोक नहीं है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥
गौतम उवाच
नैतस्येह यथास्माकं त्रिकौशेयं च रांकवम् ।
एकैकं वै त्रिवर्षीयं तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६७ ॥
**गौतम बोले—**हमलोगोंकी तरह इसे तीन-तीन वर्षोंतक कुशकी रस्सीकी बनी हुई तीन लरवाली मेखला और मृगचर्म धारण करके नहीं रहना पड़ता है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान् महर्षीन् शुना सह ।
अभिगम्य यथान्यायं पाणिस্পর্শमथाचरत् ॥ ६८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाके अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया ॥ ६८ ॥
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीघातकारिकाम् ।
अन्योन्येन निवेद्याथ प्रतिष्ठन्त सहैव ते ॥ ६९ ॥
तदनन्तर वे एक दूसरेको अपना कुशल-समाचार बताते हुए बोले—‘हमलोग अपनी भूख मिटानेके लिये इस वनमें भ्रमण कर रहे हैं’ ऐसा कहकर वे साथ-ही-साथ वहाँसे चल पड़े ॥ ६९ ॥
एकनिश्चयकार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते ।
आददानाः समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च ॥ ७० ॥
उन सबके निश्चय और कार्य एक-से थे। वे फल-मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे ॥ ७० ॥
कदाचिद् विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् ।
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ॥ ७१ ॥
एक दिन घूमते-फिरते हुए उन महर्षियोंको एक सुन्दर सरोवर दिखायी पड़ा; जिसका जल बड़ा ही स्वच्छ और पवित्र था। उसके चारों किनारोंपर सघन वृक्षोंकी पंक्ति शोभा पा रही थी ॥ ७१ ॥
बालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् ।
वैदूर्यवर्णसदृशैः पद्मपत्रैरथावृताम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण रंगके कमलपुष्प उस सरोवरकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाले कमलिनीके पत्ते उसमें चारों ओर छा रहे थे ॥ ७२ ॥
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रकरसेविभिः ।
एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ७३ ॥
नाना प्रकारके विहंगम कलरव करते हुए उसकी जलराशिका सेवन करते थे। उसमें प्रवेश करनेके लिये एक ही द्वार था। उसकी कोई वस्तु ली नहीं जा सकती थी। उसमें उतरनेके लिये बहुत सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वहाँ काई और कीचड़का तो नाम भी नहीं था ॥ ७३ ॥
वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना ।
यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ॥ ७४ ॥
राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी ॥ ७४ ॥
पशुसखसहायास्तु बिसार्थं ते महर्षयः ।
पद्मिनीमभिजग्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम् ॥ ७५ ॥
पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था ।। ७५ ।।
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् ।
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ।। ७६ ।।
सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले— ।। ७६ ।।
एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ।
पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि ।। ७७ ।।
'अरी! तू कौन है और किसलिये यहाँ अकेली खड़ी है? यहाँ तेरे आनेका क्या प्रयोजन है? इस सरोवरके तटपर रहकर तू कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहती है?' ।। ७७ ।।
यातुधान्युवाच
यास्मि सास्म्यनुयोगो मे न कर्तव्यः कथंचन ।
आरक्षिणीं मां पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधनाः ।। ७८ ।।
**यातुधानी बोली—**तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषयमें पूछ-ताछ करनेका किसी प्रकार कोई अधिकार नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवरका
संरक्षण करनेवाली हूँ॥ ७८ ॥
ऋषय ऊचुः
सर्व एव क्षुधार्ताः स्म न चान्यत् किंचिदस्ति नः। भवत्याः सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत ॥ ७९ ॥ **ऋषि बोले—**भद्रे! इस समय हमलोग भूखसे व्याकुल हैं और हमारे पास खानेके लिये दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः यदि तुम अनुमति दो तो हम सब लोग इस सरोवरसे कुछ मृणाल ले लें॥ ७९ ॥
यातुधान्युवाच
समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः। एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम्॥ ८० ॥ **यातुधानीने कहा—**ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो। एक-एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो। इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ८० ॥
भीष्म उवाच
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम्। अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि 'यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है।' तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया॥ ८१ ॥
अत्रिरुवाच
अरात्रिरत्रिः सा रात्रिर्या नाधीते त्रिद्य वै। अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने॥ ८२ ॥ **अत्रि बोले—**कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत् (मृत्यु) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ। जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता, तबतककी अवस्था रात्रि कहलाती है। उस अज्ञानावस्थासे रहित होनेके कारण भी मैं अरात्रि एवं अत्रि कहलाता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अज्ञात होनेके कारण जो रात्रिके समान है, उस परमात्मतत्त्वमें मैं सदा जाग्रत् रहता हूँ; अतः वह मेरे लिये अरात्रिके समान है, इस व्युत्पत्तिका अनुसार भी मैं अरात्रि और अत्रि (ज्ञानी) नाम धारण करता हूँ। यही मेरे नामका तात्पर्य समझो॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८३ ॥ **यातुधानीने कहा—**तेजस्वी महर्षे! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बताया है, उसका मेरी समझमें आना कठिन है। अच्छा, अब आप जाइये और तालाबमें उतरिये ॥ ८३ ॥
वसिष्ठ उवाच वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि । वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ॥ ८४ ॥ **वसिष्ठ बोले—**मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं। मैं गृहस्थ-आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता (ऐश्वर्य-सम्पत्ति) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःख्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८५ ॥ **यातुधानी बोली—**मुने! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है उसके तो अक्षरोंका भी उच्चारण करना कठिन है। मैं इस नामको नहीं याद रख सकती। आप जाइये तालाबमें प्रवेश कीजिये ॥ ८५ ॥
कश्यप उवाच कुलं कुलं च कुवमः कुवमः कश्यपो द्विजः । काश्यः काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय ॥ ८६ ॥ **कश्यपने कहा—**यातुधानी! कश्य नाम है शरीरका, जो उसका पालन करता है उसे कश्यप कहते हैं। मैं प्रत्येक कुल (शरीर) में अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करके उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिये कश्यप हूँ। कु अर्थात् पृथ्वीपर वम यानी वर्षा करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है, इसलिये मुझे 'कुवम' भी कहते हैं। मेरे देहका रंग काशके फूलकी भाँति उज्ज्वल है, अतः मैं काश्य नामसे भी प्रसिद्ध हूँ। यही मेरा नाम है। इसे तुम धारण करो ॥ ८६ ॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८७ ॥ **यातुधानी बोली—**महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये ॥ ८७ ॥
भरद्वाज उवाच
भरेऽसुतान् भरेऽशिष्यान् भरे देवान् भरे द्विजान् ।
भरे भार्यां भरे द्वाजं भरद्वाजोऽस्मि शोभने ॥ ८८ ॥
**भरद्वाजने कहा—**कल्याणी! जो मेरे पुत्र और शिष्य नहीं हैं, उनका भी मैं पालन करता हूँ, तथा देवता, ब्राह्मण, अपनी धर्मपत्नी तथा द्वाज (वर्णसंकर) मनुष्योंका भी भरण-पोषण करता हूँ, इसलिये भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ८८ ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८९ ॥
**यातुधानी बोली—**मुनिवर! आपके नामाक्षरका उच्चारण करनेमें भी मुझे क्लेश जान पड़ता है, इसलिये मैं इसे धारण नहीं कर सकती। जाइये, आप भी इस सरोवरमें उतरिये ॥ ८९ ॥
गौतम उवाच
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात् ।
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम् ॥ ९० ॥
**गौतमने कहा—**कृत्ये! मैंने गो नामक इन्द्रियोंका संयम किया है, इसलिये 'गोदम' नाम धारण करता हूँ। मैं धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी हूँ, सबमें समान दृष्टि रखनेके कारण तुम्हारे या और किसीके द्वारा मेरा दमन नहीं हो सकता। मेरे शरीरकी कान्ति (गो) अन्धकारको दूर भगानेवाली (अतम) है, अतः तुम मुझे गौतम समझो ॥ ९० ॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९१ ॥
**यातुधानी बोली—**महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती। जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये ॥ ९१ ॥
विश्वामित्र उवाच
विश्वे देवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा ।
विश्वामित्रमिति ख्यातं यातुधानि निबोध माम् ॥ ९२ ॥
**विश्वामित्रने कहा—**यातुधानी! तू कान खोलकर सुन ले, विश्वेदेव मेरे मित्र हैं, तथा गौओं और सम्पूर्ण विश्वका मैं मित्र हूँ। इसलिये संसारमें विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ९२ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९३॥ यातुधानी बोली— महर्षे! आपके नामकी व्याख्याके एक अक्षरका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। इसे याद रखना मेरे लिये असम्भव है। अतः जाइये, सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९३॥
जमदग्निरुवाच जाजमद्यजजानेऽहं जिजाहीह जिजायिषि। जमदग्निरिति ख्यातस्ततो मां विद्धि शोभने॥ ९४॥ जमदग्निने कहा— कल्याणी! मैं जगत् अर्थात् देवताओंके आहवनीय अग्निसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये तुम मुझे जमदग्नि नामसे विख्यात समझो॥ ९४॥
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९५॥ यातुधानी बोली— महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है, उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये॥ ९५॥
अरुन्धत्युवाच धरान् धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम्। मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्ध्यारुन्धतीम्॥ ९६॥ अरुन्धतीने कहा— यातुधानी! मैं अरु अर्थात् पर्वत, पृथ्वी और द्युलोकको अपनी शक्तिसे धारण करती हूँ। अपने स्वामीसे कभी दूर नहीं रहती और उनके मनके अनुसार चलती हूँ, इसलिये मेरा नाम अरुन्धती है॥ ९६॥
यातुधान्युवाच नामनैरूक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम्। नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ ९७॥ यातुधानी बोली— देवि! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके एक अक्षरका भी उच्चारण मेरे लिये कठिन है, अतः इसे भी मैं नहीं याद रख सकती। आप तालाबमें प्रवेश कीजिये॥ ९७॥
गण्डोवाच वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते।
तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे ॥ ९८ ॥ **गण्डाने कहा—**अग्निसे उत्पन्न होनेवाली कृत्ये! गडि धातुसे गण्ड शब्दकी सिद्धि होती है, यह मुखके एक देश—कपोलका वाचक है। मेरा कपोल (गण्ड) ऊँचा है, इसलिये लोग मुझे गण्डा कहते हैं ॥ ९८ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९९ ॥ **यातुधानी बोली—**तुम्हारे नामकी व्याख्याका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। अतः इसको याद रखना असम्भव है। जाओ, तुम भी बावड़ीमें उतरो ॥ ९९ ॥
पशुसख उवाच पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा । गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे ॥ १०० ॥ **पशुसखने कहा—**आगसे पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओंको प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुणके अनुसार मेरा नाम पशुसख है ॥ १०० ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ १०१ ॥ **यातुधानी बोली—**तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है। अतः इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ ॥ १०१ ॥
शुनःसख उवाच एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे । शुनःसखसखायं मां यातुधान्युपधारय ॥ १०२ ॥ **शुनःसख (संन्यासी) ने कहा—**यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुनःसख समझ ॥
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते वाक्यं संदिग्धया गिरा । तस्मात् पुनरिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज ॥ १०३ ॥ **यातुधानी बोली—**विप्रवर! आपने संदिग्धवाणीमें अपना नाम बताया है। अतः अब फिर स्पष्टरूपसे अपने नामकी व्याख्या कीजिये ॥ १०३ ॥
शुनःसख उवाच
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि ।
तस्मात् त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा चिरम् ॥ १०४ ॥
**शुनःसखने कहा—**मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा—इसमें विलम्ब न हो ॥ १०४ ॥
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा ।
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह ॥ १०५ ॥
यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ॥
शुनःसखा च हत्वा तां यातुधानीं महाबलाम् ।
भुवि त्रिदण्डं विष्टभ्य शाद्वले समुपाविशत् ॥ १०६ ॥
इस प्रकार शुनःसखने उस महाबलवती राक्षसीका वध करके त्रिदण्डको पृथ्वीपर रख दिया और स्वयं भी वे वहीं घाससे ढँकी हुई भूमिपर बैठ गये ॥ १०६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे पुष्कराणि बिसानि च ।
यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदान्विताः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले ॥ १०७ ॥
श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापशः ।
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ॥ १०८ ॥
फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे। इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे ॥ १०८ ॥
अथोत्थाय जलात् तस्मात् सर्वे ते समुपागमन् ।
नापश्यंश्चापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभाः ॥ १०९ ॥
थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखे हुए अपने वे मृणाल नहीं दिखायी पड़े ॥ १०९ ॥
ऋषय ऊचुः
केन क्षुधापरीतानामस्माकं पापकर्मणाम् ।
नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकांक्षिणाम् ॥ ११० ॥
**तब वे ऋषि एक दूसरेसे कहने लगे—**अरे! हम सब लोग भूखसे व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे। ऐसे समयमें किस निर्दयीने हम पापियोंके मृणाल चुरा लिये ॥ ११० ॥