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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

यावन्ति तस्य पत्राणि पुष्पाणि च फलानि च । तावद् वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥ दानमें दिये हुए उस वृक्षके जितने पत्ते, फूल और फल होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह इन्द्रलोकमें महिमा पाता है ॥

शक्रलोकावतीर्णश्च मानुष्यं लोकमागतः । रथाश्वगजसम्पूर्णं पुरं राज्यं च रक्षति ॥ इन्द्रलोकसे उतरकर जब वह मनुष्यलोकमें आता है, तब रथ, घोड़े और हाथियोंसे पूर्ण नगरके राज्यकी रक्षा करता है ॥

स्थापयित्वा तु मद्भक्त्या यो मत्प्रतिकृतिं नरः । आलयं विधिवत् कृत्वा पूजाकर्म च कारयेत् । स्वयं वा पूजयेद् भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो पुरुष भक्तिपूर्वक मन्दिर बनवाकर उसमें मेरी प्रतिमाकी विधिपूर्वक स्थापना करता है और दूसरेसे उसकी पूजा करवाता है या स्वयं भक्तिके साथ पूजा करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ॥

अश्वमेधसहस्रस्य यत् पुण्यं समुदाहृतम् । तत् फलं समवाप्नोति मत्सालोक्यं प्रपद्यते । न जाने निर्गमं तस्य मम लोकाद् युधिष्ठिर ॥ एक हजार अश्वमेधयज्ञका जो पुण्य बताया गया है, उस फलको पाकर वह मेरे परमधामको पधारता है। युधिष्ठिर! मैं जानता हूँ, वह वहाँसे कभी लौटकर इस लोकमें नहीं आता ॥

देवालये विप्रगृहे गोवाटे चत्वरेऽपि वा । प्रज्वालयति यो दीपं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो मनुष्य देवमन्दिरमें, ब्राह्मणके घरमें, गोशालामें और चौराहेपर दीपक जलाता है, उसके पुण्यफलको सुनो ॥

आरुह्य काञ्चनं यानं द्योतयन् सर्वतो दिशम् । गच्छेदादित्यलोकं स सेव्यमानः सुरोत्तमैः ॥ वह सुवर्णमय विमानपर बैठकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करता हुआ सूर्यलोकको जाता है, उस समय श्रेष्ठ देवता उसकी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥

तत्र प्रकामं क्रीडित्वा वर्षकोटिं महातपाः । इह लोके भवेद् विप्रो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ वह महातपस्वी पुरुष करोड़ों वर्षोंतक सूर्यलोकमें यथेष्ट विहार करनेके पश्चात् मर्त्यलोकमें आकर वेद-वेदांगोंमें पारंगत ब्राह्मण होता है ॥

करकां कर्णिकां वापि महद् वा जलभाजनम् ।

यः प्रयच्छति विप्राय तस्य पुण्यफलं शृणु ।।
जो मनुष्य ब्राह्मणको करका (कमण्डलु), कर्णिका (गिलास) अथवा महान् जलपात्र दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो ।।
ब्रह्मकूर्चे तु यत् पीते फलं प्रोक्तं नराधिप ।
तत् पुण्यफलमाप्नोति जलभाजनदो नरः ।।
सुतृप्तः सर्वसौगन्धः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः ।।
जनेश्वर! पञ्चगव्य पीनेवाले मनुष्यके लिये जो फल बताया गया है, उस फलको वह जलपात्र दान करनेवाला मनुष्य पाता है। वह सदा तृप्त रहता है। उसे सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ सुलभ होते हैं तथा उसकी इन्द्रियाँ और मन सदा प्रसन्न रहते हैं ।।
हंससारसयुक्तेन विमानेन विराजता ।
स याति वारुणं लोकं दिव्यगन्धर्वसेवितम् ।।
इतना ही नहीं, वह हंस और सारसोंसे जुते हुए सुन्दर विमानपर बैठकर दिव्य गन्धर्वोंसे सेवित वरुणलोकमें जाता है ।।
पानीयं यः प्रयच्छेद् वै जीवानां जीवनं परम् ।
ग्रीष्मे च त्रिषु मासेषु तस्य पुण्यफलं शृणु ।।
जो गर्मीके तीन महीनोंमें जीवोंके जीवनभूत जलका दान करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
स गच्छेदिन्द्रभवनं सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।
वह पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान सुन्दर विमानपर आरूढ़ होकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रभवनकी यात्रा करता है ।।
शिरोऽभ्यङ्गप्रदानेन तेजस्वी प्रियदर्शनः ।
सुभगो रूपवान् शूरः पण्डितश्च भवेद् द्विजः ।।
सिरमें लगानेके लिये तेल-दान करनेसे मनुष्य तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, रूपवान्, शूरवीर और पण्डित ब्राह्मण होता है ।।
वस्त्रदायी तु तेजस्वी सर्वत्र प्रियदर्शनः ।
सुभगो भवति श्रीमान् स्त्रीणां नित्यं मनोरमः ।।
वस्त्र-दान करनेवाला पुरुष भी तेजस्वी, दर्शनीय, सुन्दर, श्रीसम्पन्न और सदा स्त्रियोंके लिये मनोरम होता है ।।
उपानहौ च छत्रं च यो ददाति नरोत्तमः ।
स याति रथमुख्येन काञ्चनेन विराजता ।
शक्रलोकं महातेजाः सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।

जो उत्तम पुरुष जूता और छाता दान करता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न हो सोनेके बने हुए सुन्दर रथपर बैठकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। काष्ठपादुकदा यान्ति विमानैर्वृक्षनिर्मितैः । धर्मराजपुरं रम्यं सेव्यमानाः सुरोत्तमैः ॥ जो काठकी खड़ाऊँ दान करते हैं, वे काष्ठनिर्मित विमानोंपर आरूढ़ होकर श्रेष्ठ देवताओंसे सेवित हो धर्मराजके रमणीय नगरमें प्रवेश करते हैं ।। दन्तकाष्ठप्रदानेन प्रियवाक्यो भवेन्नरः । सुगन्धवदनः श्रीमान् मेधासौभाग्यसंयुतः ॥ दातौनका दान करनेसे मनुष्य मधुरभाषी होता है। उसके मुँहसे सुगन्ध निकलती रहती है तथा वह लक्ष्मीवान् एवं बुद्धि और सौभाग्यसे सम्पन्न होता है ।। अनन्तराशी यश्चापि वर्तते व्रतवत् सदा । सत्यवाक्क्रोधरहितः शुचिः स्नानरतः सदा । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो मनुष्य अतिथि और कुटुम्बीजनोंको भोजन करा लेनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है, सदा व्रतका पालन करता है, सत्य बोलता है, क्रोधसे दूर रहता है तथा स्नान आदिके द्वारा सर्वदा पवित्र रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोककी यात्रा करता है ।। एकभक्तेन यश्चापि वर्षमेकं तु वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यशौचसमन्वितः । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो एक वर्षतक प्रतिदिन एक वक्त भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है, क्रोधको काबूमें रखता है तथा सत्य और शौचका पालन करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर इन्द्रलोकमें पदार्पण करता है ।। चतुर्थकाले यो भुङ्क्ते ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । वर्तते चैकवर्षं तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो एक वर्षतक चौथे वक्त अर्थात् प्रति दूसरे दिन भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है और इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। चित्रबर्हिणयुक्तेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन स महेन्द्रपुरं नरः ॥ वह मनुष्य विचित्र पंखवाले मोरोंसे जुते हुए अद्भुत ध्वजसे शोभायमान दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रलोकमें गमन करता है ।। निवेशयति मन्मूर्त्यामात्मानं मद्गतः शुचिः । रुद्रदक्षिणमूर्त्यां वा चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव देवलोकैश्च पूजितः ।

गन्धर्वैर्भूतसङ्घैश्च गीयमानो महातपाः ।। प्रविशेत् स महातेजा मां वा शङ्करमेव वा । न स्यात् पुनर्भवो राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन्! जो मनुष्य पवित्र और मेरे परायण होकर मेरे श्रीविग्रहमें मन लगाता (मेरा ध्यान करता) है तथा विशेषतः चतुर्दशीके दिन रुद्र अथवा दक्षिणामूर्तिमें चित्त एकाग्र करता है, वह महान् तपस्वी पुरुष सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर गन्धर्वों और भूतोंका गान सुनता हुआ मुझमें या शंकरमें प्रवेश कर जाता है तथा उसका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता—इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।।

गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरुविप्रकृतेऽपि वा । हन्यन्ते ये तु राजेन्द्र शक्रलोकं व्रजन्ति ते ।। राजेन्द्र! जो मनुष्य गौ, स्त्री, गुरु और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये प्राण दे डालते हैं, वे इन्द्रलोकमें जाते हैं ।।

तत्र जाम्बूनदमये विमाने कामगामिनि । मन्वन्तरं प्रमोदन्ते दिव्यनारीनिषेविताः ।। वहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले सुवर्णके बने हुए विमानपर रहकर दिव्य नारियोंसे सेवित हुए एक मन्वन्तरतक आनन्दका अनुभव करते हैं ।।

आश्रुतस्य प्रदानेन दत्तस्य हरणेन च । जन्मप्रभृति यद् दत्तं तत् सर्वं तु विनश्यति ।। देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तुको न देनेसे अथवा दी हुई वस्तुको छीन लेनेसे जन्मभरका किया हुआ सारा दान-पुण्य नष्ट हो जाता है ।।

यद् यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनोपार्जितं च यत् । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ।। अक्षय सुख चाहनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो-जो न्यायसे उपार्जित किया हुआ अत्यन्त अभीष्ट द्रव्य है, वह-वह गुणवान् ब्राह्मणको दानमें दे ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्‌के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन]

⬅ विषय-सूची (TOC)

[पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्‌के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

पञ्च यज्ञाः कथं देव क्रियन्तेऽत्र द्विजातिभिः ।
तेषां नाम च देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! द्विजातियोंके द्वारा पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान यहाँ किस प्रकार किया जाता है? देवेश्वर! उन यज्ञोंके नाम भी पूर्णतया बताने चाहिये ॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु पञ्च महायज्ञान् कीर्त्यमानान् युधिष्ठिर ।
यैरेव ब्रह्मसालोक्यं लभ्यते गृहमेधिना ॥
**श्रीभगवान्‌ने कहा—**युधिष्ठिर! जिनके अनुष्ठानसे गृहस्थ पुरुषोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, उन पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
ऋभुयज्ञं ब्रह्मयज्ञं भूतयज्ञं च पाण्डव ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥
पाण्डुनन्दन! ऋभुयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ—ये पञ्चयज्ञ कहलाते हैं ॥
तर्पणं ऋभुयज्ञः स्यात् स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञकः ।
भूतयज्ञो बलैर्यज्ञो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ।
पितॄनुद्दिश्य यत् कर्म पितृयज्ञः प्रकीर्तितः ॥
इनमें ‘ऋभुयज्ञ’ तर्पणको कहते हैं, ‘ब्रह्मयज्ञ’ स्वाध्यायका नाम है, समस्त प्राणियोंके लिये अन्नकी बलि देना ‘भूतयज्ञ’ है, अतिथियोंकी पूजाको ‘मनुष्ययज्ञ’ कहते हैं और पितरोंके उद्देश्यसे जो श्राद्ध आदि कर्म किये जाते हैं, उनकी ‘पितृयज्ञ’ संज्ञा है ॥
हुतं चाप्यहुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
प्राशितं बलिदानं च पाकयज्ञान् प्रचक्षते ॥
हुत, अहुत, प्रहुत, प्राशित और बलिदान—ये पाकयज्ञ कहलाते हैं ॥
वैश्वदेवादयो होमा हुतमित्युच्यते बुधैः ।
अहुतं च भवेद् दत्तं प्रहुतं ब्राह्मणाशितम् ॥
वैश्वदेव आदि कर्मोंमें जो देवताओंके निमित्त हवन किया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष ‘हुत’ कहते हैं। दान दी हुई वस्तुको ‘अहुत’ कहते हैं। ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नाम ‘प्रहुत’ है ॥

प्राणाग्निहोत्रहोत्रं च प्राशितं विधिवद् विदुः ।
बलिकर्म च राजेन्द्र पाकयज्ञाः प्रकीर्तिताः ॥
राजेन्द्र! प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे जो प्राणोंको पाँच ग्रास अर्पण किये जाते हैं, उनकी 'प्राशित' संज्ञा है तथा गौ आदि प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जो अन्नकी बलि दी जाती है, उसीका नाम बलिदान है। इन पाँच कर्मोंको पाकयज्ञ कहते हैं ॥

केचित् पञ्च महायज्ञान् पाकयज्ञान् प्रचक्षते ।
अपरे ब्रह्मयज्ञादीन् महायज्ञविदो विदुः ॥
कितने ही विद्वान् इन पाकयज्ञोंको ही पञ्चमहायज्ञ कहते हैं; किन्तु दूसरे लोग, जो महायज्ञके स्वरूपको जाननेवाले हैं, ब्रह्मयज्ञ आदिको ही पञ्चमहायज्ञ मानते हैं ॥

सर्व एते महायज्ञाः सर्वथा परिकीर्तिताः ।
बुभुक्षितान् ब्राह्मणांस्तु यथाशक्ति न हापयेत् ॥
ये सभी सब प्रकारसे महायज्ञ बतलाये गये हैं। घरपर आये हुए भूखे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति निराश नहीं लौटाना चाहिये ॥

तस्मात् स्नात्वा द्विजो विद्वान् कुर्यादेतान् दिने दिने ।
अतोऽन्यथा तु भुञ्जन् वै प्रायश्चित्ती भवेद् द्विजः ॥
इसलिये विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह प्रतिदिन स्नान करके इन यज्ञोंका अनुष्ठान करे। इन्हें किये बिना भोजन करनेवाला द्विज प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥

युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न त्वद्भक्तस्य जनार्दन ।
वक्तुमर्हसि देवेश स्नानस्य च विधिं मम ॥
युधिष्ठिरने कहा—देवदेव! आप दैत्योंके विनाशक और देवताओंके स्वामी हैं। जनार्दन! अपने इस भक्तको स्नान करनेकी विधि बताइये ॥

श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत् सर्वं पवित्रं पापनाशनम् ।
स्नात्वा येन विधानेन मुच्यन्ते किल्बिषाद् द्विजाः ॥
श्रीभगवान् बोले—पाण्डुनन्दन! जिस विधिके अनुसार स्नान करनेसे द्विजगण समस्त पापोंसे छूट जाते हैं, उस परम पवित्र पापनाशक विधिका पूर्णरूपसे श्रवण करो ॥

मृदं च गोमयं चैव तिलं दर्भांस्तथैव च ।

पुष्पाण्यपि यथान्यायमादाय तु जलं व्रजेत् ॥ मिट्टी, गोबर, तिल, कुशा और फूल आदि शास्त्रोक्त सामग्री लेकर जलके समीप जाय ॥ नद्यां स्नात्वा न च स्नायादन्यत्र द्विजसत्तमः । सति प्रभूते पयसि नाल्पे स्नायात् कदाचन ॥ श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह नदीमें स्नान करनेके पश्चात् और किसी जलमें न नहाये। अधिक जलवाला जलाशय उपलब्ध हो तो थोड़े-से जलमें कभी स्नान न करे ॥ गत्वोदकसमीपं तु शुचौ देशे मनोरमे । ततो मृद्गोमयादीनि तत्र विप्रो विनिक्षिपेत् ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि जलके निकट जाकर शुद्ध और मनोरम जगहपर मिट्टी और गोबर आदि सामग्री रख दे ॥ बहिः प्रक्षाल्य पादौ च द्विराचम्य प्रयत्नतः । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् ॥ तथा पानीसे बाहर ही प्रयत्नपूर्वक अपने दोनों पैर धोकर दो बार आचमन करे। फिर जलाशयकी प्रदक्षिणा करके उसके जलको नमस्कार करे ॥ सर्वदेवमया ह्यापो मन्मयाः पाण्डुनन्दन । तस्मात् तास्तु न हन्तव्यास्त्वद्भिः प्रक्षालयेत्स्थलम् ॥ पाण्डुनन्दन! जल सम्पूर्ण देवताओंका तथा मेरा भी स्वरूप है; अतः उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये। जलाशयके जलसे उसके किनारेकी भूमिको धोकर साफ करे ॥ केवलं प्रथमं मज्जेन्नाङ्गानि विमृशेद् बुधः । तत् तु तीर्थं समासाद्य कुर्यादाचमनं पुनः ॥ फिर बुद्धिमान् पुरुष पानीमें प्रवेश करके एक बार सिर्फ डुबकी लगावे, अंगोंकी मैल न छुड़ाने लगे। इसके बाद पुनः आचमन करे ॥ गोकर्णाकृतिवत् कृत्वा करं त्रिःप्रपिबेज्जलम् । द्विस्तत्परिमृजेद् वक्त्रं पादावभ्युक्ष्य चात्मनः । शीर्षण्यं तु ततः प्राणान् सकृदेव तु संस्पृशेत् ॥ हाथका आकार गायके कानकी तरह बनाकर उससे तीन बार जल पीये। फिर अपने पैरोंपर जल छिड़ककर दो बार मुखमें जलका स्पर्श करे। तदनन्तर गलेके ऊपरी भागमें स्थित आँख, कान और नाक आदि समस्त इन्द्रियोंका एक-एक बार जलसे स्पर्श करे ॥ बाहू द्वौ च ततः स्पृष्ट्वा हृदयं नाभिमेव च ।

प्रत्यङ्गमूदकं स्पृष्ट्वा मूर्धानं तु पुनः स्पृशेत् ।। फिर दोनों भुजाओंका स्पर्श करनेके पश्चात् हृदय और नाभिका भी स्पर्श करे। इस प्रकार प्रत्येक अंगमें जलका स्पर्श कराकर फिर मस्तकपर जल छिड़के ।। आपः पुनन्वित्युक्त्वा च पुनराचमनं चरेत् । सोङ्कारव्याहृतीर्वापि सदसस्पतिमित्यृचम् ।। इसके बाद ‘आपः पुनन्तु०³’ मन्त्र पढ़कर फिर आचमन करे अथवा आचमनके समय ओंकार और व्याहृतियोंसहित ‘सदसस्पतिम्०³’ इस ऋचाका पाठ करे ।। आचम्य मृत्तिकाः पश्चात् त्रिधा कृत्वा समालभेत् । ऋचेदं विष्णुरित्यङ्गमुत्तमाधममध्यमम् । आलभ्य वारुणैः सूक्तैर्नमस्कृत्य जलं ततः ।। आचमनके बाद मिट्टी लेकर उसके तीन भाग करे और ‘इदं विष्णुः०³’ इस मन्त्रको पढ़कर उसे क्रमशः ऊपरके, मध्यभागके तथा नीचेके अंगोंमें लगावे। तत्पश्चात् वारुण-सूक्तोंसे जलको नमस्कार करके स्नान करे ।। स्रवन्ती चेत् प्रतिस्रोते प्रत्यर्कं चान्यवारिषु । मज्जेदोमित्युदाहृत्य न च विक्षोभयेज्जलम् ।। यदि नदी हो तो जिस ओरसे उसकी धारा आती हो, उसी ओर मुँह करके तथा दूसरे जलाशयोंमें सूर्यकी ओर मुँह करके स्नान करना चाहिये। ॐकारका उच्चारण करते हुए धीरेसे गोता लगावे, जलमें हलचल पैदा न करे ।। गोमयं च त्रिधा कृत्वा जले पूर्वं समालभेत् । सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं च जपेत् पुनः ।। इसके बाद गोबरको हाथमें ले जलसे गीला करके उसके तीन भाग करे और उसे भी पूर्ववत् अपने शरीरके ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग तथा अधोभागमें लगावे। उस समय प्रणव और व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रकी पुनरावृत्ति करता रहे ।। पुनराचमनं कृत्वा मद्गतेनान्तरात्मना । आपो हिष्ठेति तिसृभीर्ऋग्भिः पूतेन वारिणा । तथा तरत्समन्दीभिः सिञ्चेच्चतसृभिः क्रमात् ।। गोसूक्तेनाश्वसूक्तेन शुद्धवर्गेण चात्मनः । वैष्णवैर्वारुणैः सूक्तैः सावित्रैरिन्द्रदैवतैः ।। वामदैव्येन चात्मानमन्यैर्मन्मयसामभिः । स्थित्वान्तः सलिले सूक्तं जपेद् वा चाघमर्षणम् ।।

फिर मुझमें चित्त लगाकर आचमन करनेके पश्चात् 'आपो हिष्ठा मयो'१ इत्यादि तीन ऋचाओंसे, 'तरत्समन्दीभिः' इत्यादि चार ऋचाओंसे और गोसूक्त, अश्वसूक्त, वैष्णवसूक्त, वारुणसूक्त, सावित्रसूक्त, ऐन्द्रसूक्त, वामदैव्यसूक्त तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य साममन्त्रोंके द्वारा शुद्ध जलसे अपने ऊपर मार्जन करे। फिर जलके भीतर स्थित होकर अघमर्षणसूक्तका२ जप करे ।।

सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं वा ततो जपेत् ।
आश्वासमोक्षात् प्रणवं जपेद् वा मामनुस्मरन् ।।
अथवा प्रणव एवं व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र जपे या जबतक साँस रुकी रहे तबतक मेरा स्मरण करते हुए केवल प्रणवका ही जप करता रहे ।।

उत्प्लुत्य तीर्थमासाद्य धौते शुक्ले च वाससी ।
शुद्धे चाच्छादयेत् कक्षे न कुर्यात् परिपाशके ।।
इस प्रकार स्नान करके जलाशयके किनारे आकर धोये हुए शुद्ध वस्त्र—धोती और चादर धारण करे। चादरको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेटकर बाँधे नहीं ।।

पाशेन बद्ध्वा कक्षे यत् कुरुते कर्म वैदिकम् ।
राक्षसा दानवा दैत्यास्तद् विलुम्पन्ति हर्षिताः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कक्ष्यापाशं न धारयेत् ।।
जो वस्त्रको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेट करके वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसके कर्मको राक्षस, दानव और दैत्य बड़े हर्षमें भरकर नष्ट कर डालते हैं; इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नसे काँखको वस्त्रसे बाँधना नहीं चाहिये ।।

ततः प्रक्षाल्य पादौ च हस्तौ चैव मृदा शनैः ।
आचम्य पुनराचामेत् पुनः सावित्रिया द्विजः ।।
ब्राह्मणको चाहिये कि वस्त्र-धारणके पश्चात् धीरे-धीरे हाथ और पैरोंको मिट्टीसे मलकर धो डाले, फिर गायत्री-मन्त्र पढ़कर आचमन करे ।।

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि ध्यायन् वेदान् समाहितः ।
जले जलगतः शुद्धः स्थल एव स्थलस्थितः ।
उभयत्र स्थितस्तस्मादाचामेदात्मशुद्धये ।।
तथा पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके एकाग्रचित्तसे वेदोंका स्वाध्याय करे। जलमें खड़ा हुआ द्विज जलमें ही आचमन करके शुद्ध हो जाता है और स्थलमें

स्थित पुरुष स्थलमें ही आचमनके द्वारा शुद्ध होता है, अतः जल और स्थलमेंसे कहीं भी स्थित होनेवाले द्विजको आत्मशुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ।।

दर्भेषु दर्भपाणिः सन् प्राङ्मुखः सुसमाहितः ।
प्राणायामांस्ततः कुर्यान्मद्गतेनान्तरात्मना ।।
इसके बाद संध्योपासन करनेके लिये हाथोंमें कुश लेकर पूर्वाभिमुख हो कुशासनपर बैठे और मुझमें मन लगाकर एकाग्रभावसे प्राणायाम करे ।।

सहस्रकृत्वः सावित्रीं शतकृत्वस्तु वा जपेत् ।
समाहितो जपेत् तस्मात् सावित्र्या चाभिमन्त्र्य च ।
मन्देहानां विनाशाय रक्षांसां विक्षिपेज्जलम् ।।
फिर एकाग्रचित्त होकर एक हजार या एक सौ गायत्री-मन्त्रका जप करे। मन्देह नामक राक्षसोंका नाश करनेके उद्देश्यसे गायत्री-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जल लेकर सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे ।।

उद्गर्गोऽसीत्यथाचान्तः प्रायश्चित्तजलं क्षिपेत् ।।
इसके बाद आचमन करके 'उद्गर्गोऽसि' इस मन्त्रसे प्रायश्चित्तके लिये जल छोड़े ।।

अथादाय सुपुष्पाणि तोयमञ्जलिना द्विजः ।
प्रक्षिप्य प्रतिसूर्य च व्योममुद्रां प्रकल्पयेत् ।।
फिर द्विजको चाहिये कि अंजलिमें सुगन्धित पुष्प और जल लेकर सूर्यको अर्घ्य दे और आकाशमुद्राका प्रदर्शन करे ।।

ततो द्वादशकृत्वस्तु सूर्यस्यैकाक्षरं जपेत् ।
ततः षडक्षरादीनि षट्कृत्वः परिवर्तयेत् ।।
तदनन्तर सूर्यके एकाक्षर-मन्त्रका बारह बार जप करे और उनके षडक्षर आदि मन्त्रोंकी छः बार पुनरावृत्ति करे ।।

प्रदक्षिणं परामृष्य मुद्रया स्वमुखान्तरे ।
ऊर्ध्वबाहुस्ततो भूत्वा सूर्यमीक्षेत् समाहितः ।।
तन्मण्डलस्थं मां ध्यायेत् तेजोमूर्तिं चतुर्भुजम् ।
उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ।।
सावित्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा सूक्तं च मामकम् ।
मन्मयानि च सामानि पुरुषव्रतमेव च ।।
आकाशमुद्राको दाहिनी ओरसे घुमाकर अपने मुखमें विलीन करे। इसके बाद दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे सूर्यकी ओर देखते हुए उनके मण्डलमें स्थित मुझ चार भुजधारी तेजोमूर्ति नारायणका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। उस समय 'उदुत्यम्'<sup></sup>, 'चित्रं देवानाम्'<sup></sup> 'तच्चक्षुः'<sup></sup> इन मन्त्रोंका,

यथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले सूक्तोंका जप करके मेरे साममन्त्रों और पुरुषसूक्तका भी पाठ करे ।। ततश्चालोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यपि । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्य दिवाकरम् ।। तत्पश्चात् 'हँसः शुचिषत्'<sup></sup> इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यकी ओर देखे और प्रदक्षिणापूर्वक उन्हें नमस्कार करे ।। ततस्तु तर्पयेदद्भिर्ब्रह्माणं मां च शङ्करम् । प्रजापतिं च देवांश्च तथा देवमुनीनपि ।। साङ्गानपि तथा वेदानितिहासान् क्रतूनपि । पुराणानि च सर्वाणि कुलान्यप्सरसां तथा ।। ऋतून् संवत्सरं चैव कलाकाष्ठात्मकं तथा । भूतग्रामांश्च भूतानि सरितः सागरांस्तथा । शैलान् शैलस्थितान् देवानौषधीः सवनस्पतीः ।। तर्पयेदुपवीती च प्रत्येकं तृप्यतामिति । अन्वारभ्य च सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ।। इस प्रकार संध्योपासन समाप्त होनेपर क्रमशः ब्रह्माजीका, मेरा, शंकरजीका, प्रजापतिका, देवताओं और देवर्षियोंका, अंगसहित वेदों, इतिहासों, यज्ञों और समस्त पुराणोंका, अप्सराओंका, ऋतु-कलाकाष्ठारूप संवत्सर तथा भूतसमुदायोंका, भूतोंका, नदियों और समुद्रोंका तथा पर्वतों, उनपर रहनेवाले देवताओं, ओषधियों और वनस्पतियोंका जलसे तर्पण करे। तर्पणके समय जनेऊको बायें कंधेपर रखे तथा दायें और बायें हाथकी अंजलिसे जल देते हुए उपर्युक्त देवताओंमेंसे प्रत्येकका नाम लेकर 'तृप्यताम्' पदका उच्चारण करे (यदि दो या अधिक देवताओंको एक साथ जल दिया जाय तो क्रमशः द्विवचन और बहुवचन—'तृप्येताम्' और 'तृप्यन्ताम्' इन पदोंका उच्चारण करना चाहिये) ।। निवीती तर्पयेद् विद्वानृषीन् मन्त्रकृतस्तथा । मरीच्यादीनृषींश्चैव नारदाद्यान् समाहितः ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि मन्त्रद्रष्टा मरीचि आदि तथा नारद आदि ऋषियोंको निवीती होकर अर्थात् जनेऊको गलेमें मालाकी भाँति पहन करके एकाग्रचित्तसे तर्पण करे ।। प्राचीनावीत्यथैतांस्तु तर्पयेद् देवताः पितॄन् । ततस्तु कव्यवाडग्निं सोमं वैवस्वतं तथा ।। ततश्चार्यमणं चापि ह्यग्निष्वात्तांस्तथैव च ।

सोमपांश्चैव दर्भेषु सतिलैरेव वारिभिः ।

तृप्यतामिति पश्चात् तु स पितॄंस्तर्पयेत् ततः ।।

इसके बाद जनेऊको दाहिने कंधेपर करके आगे बताये जानेवाले पितृ-

सम्बन्धी देवताओं एवं पितरोंका तर्पण करे। कव्यवाट्, अग्नि, सोम, वैवस्वत,

अर्यमा, अग्निष्वात्त और सोमप—ये पितृ-सम्बन्धी देवता हैं। इनका तिलसहित

जलसे कुशाओंपर तर्पण करे और 'तृप्यताम्' पदका उच्चारण करे। तदनन्तर

पितरोंका तर्पण आरम्भ करे ।।

पितॄन् पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान् ।

पितामहीस्तथा चापि तथैव प्रपितामहीः ।।

मातरं चात्मनश्चैव गुरुमाचार्यमेव च ।

पितृमातृस्वसारौ च तथा मातामहीमपि ।।

उपाध्यायान् सखीन् बन्धून् शिष्यर्त्विग्ज्ञातिबान्धवान् ।

प्रमीताननृशंस्यार्थं तर्पयेत् तानमत्सरः ।।

उनका क्रम इस प्रकार है—पिता, पितामह और प्रपितामह तथा अपनी

माता, पितामही और प्रपितामही! इनके सिवा गुरु, आचार्य, पितृष्वसा (बुआ),

मातृष्वसा (मौसी), मातामही, उपाध्याय, मित्र, बन्धु, शिष्य, ऋत्विज् और

जाति-भाई आदिमेंसे भी जो मर गये हों, उनपर दया करके ईर्ष्या-द्वेष त्यागकर

उनका भी तर्पण करना चाहिये ।।

तर्पयित्वा तथाऽऽचम्य स्नानवस्त्रं प्रपीडयेत् ।

वृत्तिं भृत्यजनस्याहुः स्नानं पानं च तद्विदः ।

अतर्पयित्वा तान् पूर्वं स्नानवस्त्रं न पीडयेत् ।

पीडयेच्च पुरा मोहाद् देवाः सर्षिगणास्तथा ।।

तर्पणके पश्चात् आचमन करके स्नानके समय पहने हुए वस्त्रको निचोड़

डाले। उस वस्त्रका जल भी कुलके मरे हुए संतानहीन पुरुषोंका भाग है। वह

उनके स्नान करने और पीनेके काम आता है। अतः उस जलसे उनका तर्पण

करना चाहिये, ऐसा विद्वानोंका कथन है। पूर्वोक्त देवताओं तथा पितरोंका तर्पण

किये बिना स्नानका वस्त्र नहीं धोना चाहिये। जो मोहवश तर्पणके पहले ही

धौतवस्त्रको धो लेता है, वह ऋषियों और देवताओंको कष्ट पहुँचाता है ।।

तर्पयित्वा तथाऽऽचम्य स्नानवस्त्रं निपीडयेत् ।

पितरस्तु निराशास्ते शप्त्वा यान्ति यथागतम् ।।

उस अवस्थामें उसके पितर उसे शाप देकर निराश लौट जाते हैं, इसलिये

तर्पणके पश्चात् आचमन करके ही स्नान-वस्त्र निचोड़ना चाहिये ।।

प्रक्षाल्य तु मृदा पादावाचम्य प्रयतः पुनः ।

दर्भेषु दर्भपाणिः सन् स्वाध्यायं तु समारभेत् ।। तर्पणकी क्रिया पूर्ण होनेपर दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर उन्हें धो डाले और फिर आचमन करके पवित्र हो कुशासनपर बैठ जाय और हाथोंमें कुशा लेकर स्वाध्याय आरम्भ करे ।।

वेदमादौ समारभ्य ततो पर्युपरि क्रमात् । यदधीतेऽन्वहं शक्त्या तत् स्वाध्यायं प्रचक्षते ।। पहले वेदका पाठ करके फिर क्रमसे उसके अन्य अंगोंका अध्ययन करे। अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन जो अध्ययन किया जाता है, उसको स्वाध्याय कहते हैं ।।

ऋचो वापि यजुर्वापि सामगायमथापि च । इतिहासपुराणानि यथाशक्ति न हापयेत् ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका स्वाध्याय करे। इतिहास और पुराणोंके अध्ययनको भी यथाशक्ति न छोड़े ।।

उत्थाय तु नमस्कृत्य दिशो दिग्देवता अपि । ब्रह्माणं च ततश्चाग्निं पृथिवीमोषधीस्तथा ।। वाचं वाचस्पतिं चैव मां चैव सरितस्तथा । नमस्कृत्य तथाद्भिस्तु प्रणवादि च पूर्ववत् ।। ततो नमोऽद्भ्य इत्युक्त्वा नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् । स्वाध्याय पूर्ण करके खड़ा होकर दिशाओं, उनके देवताओं, ब्रह्माजी, अग्नि, पृथ्वी, ओषधि, वाणी, वाचस्पति और सरिताओंको तथा मुझे भी प्रणाम करे। फिर जल लेकर प्रणवयुक्त ‘नमोऽद्भ्यः’ यह मन्त्र पढ़कर पूर्ववत् जलदेवताको नमस्कार करे ।।

घृणिः सूर्यस्तथाऽऽदित्यस्तं प्रणम्य स्वमूर्धनि ।। ततस्त्वालोकयन्नर्कं प्रणवेन समाहितः । ततो मामर्चयेत् पुष्पैर्मत्प्रियैरेव नित्यशः ।। इसके बाद घृणि, सूर्य तथा आदित्य आदि नामोंका उच्चारण करके अपने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यदेवको प्रणाम करे और प्रणवका जप करते हुए एकाग्रचित्तसे उनका दर्शन करे। उसके बाद मुझे प्रिय लगनेवाले पुष्पोंसे नित्यप्रति मेरी पूजा करे ।।

युधिष्ठिर उवाच

त्वत्प्रियाणि प्रसूनानि त्वदधिष्ठानि माधव । सर्वाण्याचक्ष्व देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ।।

**युधिष्ठिरने कहा—**अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले माधव! जो पुष्प आपको अत्यन्त प्रिय हों तथा जिनमें आपका निवास हो, उन सबका मुझ अपने भक्तसे वर्णन कीजिये॥

श्रीभगवानुवाच

शृणुष्वावहितो राजन् पुष्पाणि प्रियकृन्ति मे ।
कुमुदं करवीरं च चणकं चम्पकं तथा ॥
मल्लिकाजातिपुष्पं च नन्द्यावर्तं च नन्दिकम् ।
पलाशपुष्पपत्राणि दूर्वाभृङ्गकमेव च ॥
वनमाला च राजेन्द्र मत्प्रियाणि विशेषतः ।
**श्रीभगवान् बोले—**राजन्! जो फूल मुझे बहुत प्रिय हैं, उनके नाम बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। राजेन्द्र! कुमुद, करवीर, चणक, चम्पा, मालती, जातिपुष्प, नन्द्यावर्त, नन्दिक, पलाशके फूल और पत्ते, दूर्वा, भृंगक और वनमाला—ये फूल मुझे विशेष प्रिय हैं॥
सर्वेषामपि पुष्पाणां सहस्रगुणमुत्पलम् ॥
तस्मात् पद्मं तथा राजन् पद्मात् तु शतपत्रकम् ।
तस्मात् सहस्रपत्रं तु पुण्डरीकं ततः परम् ॥
पुण्डरीकसहस्रात् तु तुलसी गुणतोऽधिका ।
सब प्रकारके फूलोंसे हजार गुना अच्छा उत्पल माना गया है। राजन्! उत्पलसे बढ़कर पद्म, पद्मसे शतदल, शतदलसे सहस्रदल, सहस्रदलसे पुण्डरीक और हजार पुण्डरीकसे बढ़कर तुलसीका गुण माना गया है॥
वकपुष्पं ततस्तस्मात् सौवर्णं तु ततोऽधिकम् ।
सौवर्णात् तु प्रसूनाच्च मत्प्रियं नास्ति पाण्डव ॥
पाण्डुनन्दन! तुलसीसे श्रेष्ठ है वकपुष्प और उससे भी उत्तम है सौवर्ण, सौवर्णके फूलसे बढ़कर दूसरा कोई भी फूल मुझे प्रिय नहीं है॥
पुष्पाभावे तुलस्यास्तु पत्रैर्मामर्चयेत् पुनः ।
पत्रालाभे तु शाखाभिः शाखालाभे शिफालवैः ॥
शिफाभावे मृदा तत्र भक्तिमानर्चयेत माम् ।
फूल न मिलनेपर तुलसीके पत्तोंसे, पत्तोंके न मिलनेपर उसकी शाखाओंसे और शाखाओंके न मिलनेपर तुलसीकी जड़के टुकड़ोंसे मेरी पूजा करे। यदि वह भी न मिल सके तो जहाँ तुलसीका वृक्ष रहा हो, वहाँकी मिट्टीसे ही भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करे॥
वर्जनीयानि पुष्पाणि शृणु राजन् समाहितः ॥

किंकिणीं मुनिपुष्पं च धुर्धूरं पाटलं तथा ।।
तथातिमुक्तकं चैव पुन्नागं नक्तमालिकम् ।
यौधिकं क्षीरिकापुष्पं निर्गुण्डी लांगुली जपाः ।।
कर्णिकारं तथाशोकं शाल्मलीपुष्पमेव च ।
ककुभाः कोविदाराश्च वैभीतकमथापि च ।।
कुरण्टकप्रसूनं च कल्पकं कालकं तथा ।
अङ्कोलं गिरिकर्णी च नीलान्येव च सर्वशः ।
एकपर्णानि चान्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
राजन्! अब त्यागनेयोग्य फूलोंके नाम बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। किंकिणी, मुनिपुष्प, धुर्धुर, पाटल, अतिमुक्तक, पुन्नाग, नक्तमालिक, यौधिक, क्षीरिकापुष्प, निर्गुण्डी, लांगुली, जपा, कर्णिकार, अशोक, सेमलका फूल, ककुभ, कोविदार, वैभीतक, कुरण्टक, कल्पक, कालक, अंकोल, गिरिकर्णी, नीले रंगके फूल तथा एक पंखड़ीवाले फूल—इन सबका सब प्रकारसे त्याग कर देना चाहिये ।।

अर्कपुष्पाणि वर्ज्यानि अर्कपत्रस्थितानि च ।
व्याधृताः पिचुमन्दानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
आक (मदार)-के फूल तथा आकके पत्तेपर रखे हुए फूल भी वर्जित हैं। नीमके फूलोंका भी परित्याग कर देना चाहिये ।।

अन्यैस्तु शुक्लपत्रैस्तु गन्धवद्भिर्नराधिप ।
अवर्ज्यैस्तैर्यथालाभं मद्भक्तो मां समर्चयेत् ।।
नराधिप! इनके अतिरिक्त जिनका निषेध नहीं किया गया है, ऐसे सफेद पंखड़ियोंवाले सुगन्धित पुष्प जितने मिल सकें, उनके द्वारा भक्त पुरुषको मेरी पूजा करनी चाहिये ।।

युधिष्ठिर उवाच
कथं त्वमर्चनीयोऽसि मूर्तयः कीदृशास्तु ते ।
वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ।।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? आपकी मूर्तियाँ कैसी हैं? इस विषयमें वानप्रस्थलोग किस प्रकार बताते हैं और पञ्चरात्रवाले किस प्रकार बताते हैं? ।।

श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः ।
स्थण्डिले पद्मकं कृत्वा चाष्टपत्रं सकर्णिकम् ।।

अष्टाक्षरविधानेन ह्यथवा द्वादशाक्षरैः । वैदिकैरथ मन्त्रैश्च मम सूक्तेन वा पुनः ॥ स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षणः । पुरुषं च ततः सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर ॥ श्रीभगवान् बोले—पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मेरे अर्चनकी सब विधि सुनो। वेदीपर कर्णिकाओंसे युक्त अष्टदल कमल बनावे। उसपर अष्टाक्षर अथवा द्वादशाक्षर मन्त्रके विधानसे तथा वैदिक मन्त्रोंके द्वारा और पुरुषसूक्तसे मेरी मूर्तिकी स्थापना करे। फिर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि मुझ सत्यस्वरूप अच्युत पुरुषका पूजन करे ।।

अनिरुद्धं च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाञ्चरात्रिकाः ॥ वासुदेवं च राजेन्द्र सङ्कर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च चतुर्मूर्तिं प्रवक्ष्यते ॥ नृपश्रेष्ठ महाराज! वानप्रस्थ-धर्मके ज्ञाता मनुष्य मुझे अनिरुद्ध स्वरूप बताते हैं। उनसे भिन्न जो पाञ्चरात्रिक हैं, वे मुझे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस प्रकार चतुर्व्यूह-स्वरूप बताते हैं ॥

एताश्चान्याश्च राजेन्द्र संज्ञाभेदेन मूर्तयः । विद्ध्यनर्थान्तरा एव मामेवं चार्चयेद् बुधः ॥ राजेन्द्र! ये सभी तथा अन्य नामभेदसे मेरी मूर्तियाँ हैं, उन सबका अर्थ एक ही समझना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान् लोग मेरी पूजा करते हैं ॥

युधिष्ठिर उवाच

त्वद्भक्ताः कीदृशा देव कानि तेषां व्रतानि च । एतत् कथय देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥ युधिष्ठिरने पूछा—अच्युत! भगवन्! आपके भक्त कैसे होते हैं और उनके नियम कौन-कौन-से हैं? यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि देवेश्वर! मैं भी आपके चरणोंमें भक्ति रखता हूँ ॥

श्रीभगवानुवाच

अनन्यदेवताभक्ता ये मद्भक्तजनप्रियाः । मामेव शरणं प्राप्ता मद्भक्तास्ते प्रकीर्तिताः ॥ श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्! जो दूसरे किसी देवताके भक्त न होकर केवल मेरी ही शरण ले चुके हों तथा मेरे भक्तजनोंके साथ प्रेम रखते हों, वे ही मेरे भक्त कहे गये हैं ॥

स्वर्ग्याण्यपि यशस्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः । मद्भक्तः पाण्डवश्रेष्ठ व्रतानीमानि धारयेत् ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! स्वर्ग और यश देनेवाले होनेके साथ ही जो मुझे विशेष प्रिय हों, ऐसे व्रतोंका ही मेरे भक्त पालन करते हैं ।।

नान्यदाच्छादयेद् वस्त्रं मद्भक्तो जलतारणे । स्वस्थस्तु न दिवा स्वप्नेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥ भक्त पुरुषको जलमें तैरते समय एक वस्त्रके सिवा दूसरा नहीं धारण करना चाहिये। स्वस्थ रहते हुए दिनमें कभी नहीं सोना चाहिये। मधु और मांसको त्याग देना चाहिये ।।

प्रदक्षिणं व्रजेद् विप्रान् गामश्वत्थं हुताशनम् । न धावेत् पतिते वर्षे नाग्रभिक्षां च लोपयेत् ॥ मार्गमें ब्राह्मण, गौ, पीपल और अग्निके मिलनेपर उनको दाहिने करके जाना चाहिये। पानी बरसते समय दौड़ना नहीं चाहिये। पहले मिलनेवाली भिक्षाका त्याग नहीं करना चाहिये ।।

प्रत्यक्षलवणं नाद्यात् सौभाञ्जनकरञ्जनौ । ग्रासमुष्टिं गवे दद्याद् धान्याम्लं चैव वर्जयेत् ॥ खाली नमक नहीं खाना चाहिये तथा सौभांजन और करंजनका भक्षण नहीं करना चाहिये। गौको प्रतिदिन ग्रास अर्पण करे और अन्नमें खटाई मिलाकर न खाय ।।

तथा पर्युषितं चापि पक्वं परगृहागतम् । अनिवेदितं च यद् द्रव्यं तत् प्रयत्नेन वर्जयेत् ॥ दूसरेके घरसे उठाकर आयी हुई रसोई, बासी अन्न तथा भगवान्‌को भोग न लगाये हुए पदार्थका भी प्रयत्नपूर्वक त्याग करे ।।

विभीतककरञ्जानां छायां दूरे विवर्जयेत् । विप्रदेवपरीवादान् न वदेत् पीडितोऽपि सन् ॥ बहेड़े और करंजकी छायासे दूर रहे, कष्टमें पड़नेपर भी ब्राह्मणों और देवताओंकी निन्दा न करे ।।

उदिते सवितर्याप्य क्रियायुक्तस्य धीमतः । चतुर्वेदविदश्चापि देहे षड् वृषलाः स्मृताः ॥ सूर्योदयके बाद नित्य क्रियाशील रहनेवाले बुद्धिमान् और चारों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मणके शरीरमें भी छः वृषल बताये जाते हैं ।।

क्षत्रियाः सप्त विज्ञेया वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः । नियताः पाण्डवश्रेष्ठ शूद्राणामेकविंशतिः ॥

पाण्डवश्रेष्ठ! क्षत्रियोंके शरीरमें सात वृषल जानने चाहिये, वैश्योंके देहमें आठ वृषल बताये गये हैं और शूद्रोंमें इक्कीस वृषलोंका निवास माना गया है ।।
कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहश्च मद एव च ।
महामोहश्च इत्येते देहे षड् वृषलाः स्मृताः ।।
काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और महामोह—ये छः वृषल ब्राह्मणके शरीरमें स्थित बताये गये हैं ।।
गर्वः स्तम्भो ह्यहंकार ईर्ष्या च द्रोह एव च ।
पारुष्यं क्रूरता चैव सप्तैते क्षत्रियाः स्मृताः ।।
गर्व, स्तम्भ (जडता), अहंकार, ईर्ष्या, द्रोह, पारुष्य (कठोर बोलना) और क्रूरता—ये सात क्षत्रिय-शरीरमें रहनेवाले वृषल हैं ।।
तीक्ष्णतानिकृतिर्माया शाठ्यं दम्भो ह्यनार्जवम् ।
पैशुन्यमनृतं चैव वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः ।।
तीक्ष्णता, कपट, माया, शठता, दम्भ, सरलताका अभाव, चुगली और असत्य-भाषण—ये आठ वैश्य-शरीरके वृषल हैं ।।
तृष्णा बुभुक्षा निद्रा च ह्याल्स्यं चाघृणादयः ।
आधिश्चापि विषादश्च प्रमादो हीनसत्त्वता ।।
भयं विक्लवता जाड्यं पापकं मन्युरेव च ।
आशा चाश्रद्धधानत्वमनवस्थाप्ययन्त्रणम् ।।
आशौचं मलिनत्वं च शूद्रा ह्येते प्रकीर्तिताः ।
यस्मिन्नेते न दृश्यन्ते स वै ब्राह्मण उच्यते ।।
तृष्णा, खानेकी इच्छा, निद्रा, आलस्य, निर्दयता, क्रूरता, मानसिक चिन्ता, विषाद, प्रमाद, अधीरता, भय, घबराहट, जडता, पाप, क्रोध, आशा, अश्रद्धा, अनवस्था, निरंकुशता, अपवित्रता और मलिनता—ये इक्कीस वृषल शूद्रके शरीरमें रहनेवाले बताये गये हैं। ये सभी वृषल जिसके भीतर न दिखायी दें, वही वास्तवमें ब्राह्मण कहलाता है ।।
तस्मात् तु सात्त्विको भूत्वा शुचिः क्रोधविवर्जितः ।
मामर्चयेत् तु सततं मत्प्रियत्वं यदिच्छति ।।
अतः ब्राह्मण यदि मेरा प्रिय होना चाहे तो सात्त्विक, पवित्र और क्रोधहीन होकर सदा मेरी पूजा करता रहे ।।
अलोलजिह्वः समुपस्थितो धृतिं
निधाय चक्षुर्युगमात्रमेव तत् ।
मनश्च वाचं च निगृह्य चञ्चलं
भयान्निवृत्तो मम भक्त उच्यते ।।

जिसकी जिह्वा चंचल नहीं है, जो धैर्य धारण किये रहता है और चार हाथ आगेतक दृष्टि रखते हुए चलता है, जिसने अपने चंचल मन और वाणीको वशमें करके भयसे छुटकारा पा लिया है, वह मेरा भक्त कहलाता है ।।
ईदृशाध्यात्मिनो ये तु ब्राह्मणा नियतेन्द्रियाः ।
तेषां श्राद्धेषु तृप्यन्ति तेन तृप्ताः पितामहाः ।।
ऐसे अध्यात्मज्ञानसे युक्त जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिनके यहाँ श्राद्धमें तृप्तिपूर्वक भोजन करते हैं, उनके पितर उस भोजनसे पूर्ण तृप्त होते हैं ।।
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम् ।
क्षमा जयति न क्रोधः क्षमावान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं; सत्यकी विजय होती है, असत्यकी नहीं तथा क्षमाकी जीत होती है, क्रोधकी नहीं। इसलिये ब्राह्मणको क्षमाशील होना चाहिये ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


१. ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथिवी पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम् ।।
यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहँस्वाहा ।।
(तै० आ० प्र० १०।२३)

२. सदसस्पतिमद्भुतमप्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिम्मेधा मयासिषँस्वाहा ।।
(यजु० अ० ३२ मं० १३)

३. ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपाँसुरे स्वाहा ।।
(यजु० अ० ५ मं १५)

१. ॐआपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरंगमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।
(यजु० ११ मं० ५०—५२)

२. ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ।।
(ऋ० अ० ८अ० ८व० ४८)

१. ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ।। (यजु० अ० ७ मं० ४१)
२. ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।। (यजु० अ० ७ मं० ४२)
३. ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतँशृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। (यजु० अ० ३६ मं० २४)
४. हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योम सदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ।। (यजु० १०।२४)

[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]

⬅ विषय-सूची (TOC)

[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]

वैशम्पायन उवाच

दानपुण्यफलं श्रुत्वा तपःपुण्यफलानि च ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दान और तपस्याके पुण्य-फलको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥
या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो ।
होमधेनुः सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ॥
सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन् दिनेऽपि वा ।
कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ॥
'भगवन्! विभो! जिसे ब्रह्माजीने अग्निहोत्रकी सिद्धिके लिये पूर्वकालमें उत्पन्न किया था तथा जो सदा ही पवित्र मानी गयी है, उस कपिला गौका ब्राह्मणोंको किस प्रकार दान करना चाहिये? माधव! वह पवित्र लक्षणोंवाली गौ किस दिन और कैसे ब्राह्मणको देनी चाहिये? ॥
कति वा कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
कैर्वा देयाश्च ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
'ब्रह्माजीने कपिला गौके कितने भेद बतलाये हैं तथा कपिला गौका दान करनेवाला मनुष्य कैसा होना चाहिये? इन सब बातोंको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ' ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि ।
अब्रवीत् कपिलासंख्यां तासां माहात्म्यमेव च ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके द्वारा सभामें इस प्रकार कहे जानेपर श्रीकृष्ण कपिला गौकी संख्या और उनकी महिमाका वर्णन करने लगे— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पावनं परम् ।
यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥
'पाण्डुनन्दन! यह विषय बड़ा ही पवित्र और पावन है। इसका श्रवण करनेसे पापी पुरुष भी पापसे मुक्त हो जाता है, अतः ध्यान देकर सुनो ॥
कपिला ह्यग्निहोत्रार्थे विप्रार्थे वा स्वयम्भुवा ।
सर्वं तेजाः समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ॥
'पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणोंके लिये सम्पूर्ण तेजोंका संग्रह करके कपिला गौको उत्पन्न किया था ॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ॥