महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है। विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था।।
न्यायतस्ते महाभागे सर्वशः समुदीरितः।
भूमिदेवा महाभागाः सदा लोके द्विजातयः ॥ ३० ॥
महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है। महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं ॥ ३० ॥
उपवासः सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः।
स हि धर्मार्थसम्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥
इसमें संशय नहीं कि उपवास (इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है। धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३१ ॥
तस्य धर्मक्रिया देवि ब्रह्मचर्या च न्यायतः।
व्रतोपनयनं चैव द्विजो येनोपपद्यते ॥ ३२ ॥
देवि! उसे धर्मका अनुष्ठान और न्यायतः ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। व्रतके पालनपूर्वक उपनयन-संस्कारका होना उसके लिये परम आवश्यक है, क्योंकि उसीसे वह द्विज होता है ॥ ३२ ॥
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्यायाभ्यासनात्मकः।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ॥ ३३ ॥
गुरु और देवताओंकी पूजा तथा स्वाध्याय और अभ्यासरूप धर्मका पालन ब्राह्मणको अवश्य करना चाहिये। धर्मपरायण देहधारियोंको उचित है कि वे पुण्यप्रद धर्मका आचरण अवश्य करें ॥ ३३ ॥
उमोवाच
भगवन् संशयो मेऽस्ति तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं वै नैपुण्येन प्रकीर्तय ॥ ३४ ॥
उमाने कहा— भगवन्! मेरे मनमें अभी संशय रह गया है। अतः उसकी व्याख्या करके मुझे समझाइये। चारों वर्णोंका जो धर्म है, उसका पूर्णरूपसे प्रतिपादन कीजिये ॥ ३४ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
रहस्यश्रवणं धर्मो वेदव्रतनिषेवणम्।
अग्निकार्यं तथा धर्मो गुरुकार्यप्रसाधनम् ॥ ३५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— धर्मका रहस्य सुनना, वेदोक्त व्रतका पालन करना, होम और गुरुसेवा करना—यह ब्रह्मचर्य-आश्रमका धर्म है ॥ ३५ ॥
भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता।
नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ॥ ३६ ॥
ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ॥ ३६ ॥ गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः । विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ॥ ३७ ॥ ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ॥ ३७ ॥ शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् । धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं तथैव च ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है। सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास-व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ॥ ३८ ॥ आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः । विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ॥ ३९ ॥ गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विघसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ॥ ३९ ॥ अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टींश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ॥ ४० ॥ अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है। वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ॥ ४० ॥ यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु । अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ॥ ४१ ॥ यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है। घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना—कुटुम्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना—यह भी उसका धर्म है ॥ ४१ ॥ भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते । ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ॥ ४२ ॥ जब कुटुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात् स्वयं भोजन करना—यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषतः श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है ॥ ४२ ॥ दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः । गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ॥ ४३ ॥ नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता ।
पति और पत्नीका स्वभाव एक-सा होना चाहिये। यह गृहस्थका धर्म है। घरके देवताओंकी प्रतिदिन पुष्पोंद्वारा पूजा करना, उन्हें अन्नकी बलि समर्पित करना, रोज-रोज घर लीपना और प्रतिदिन व्रत रखना भी गृहस्थका धर्म है ।। ४३ १/२ ।।
सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे ॥ ४४ ॥
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः ।
द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ॥ ४५ ॥
झाड़-बुहार, लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए घरमें घृतयुक्त आहुति करके उसका धुआँ फैलाना चाहिये। यह ब्राह्मणोंका गार्हस्थ्य धर्म बतलाया, जो संसारकी रक्षा करनेवाला है। अच्छे ब्राह्मणोंके यहाँ सदा ही इस धर्मका पालन किया जाता है ।। ४४-४५ ।।
यस्तु क्षत्रगतो देवि मया धर्म उदीरितः ।
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे शृणु समाहिता ॥ ४६ ॥
देवि! मेरे द्वारा जो क्षत्रिय-धर्म बताया गया है, उसीका अब तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ, तुम मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ४६ ।।
क्षत्रियस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः ।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ ४७ ॥
क्षत्रियका सबसे पहला धर्म है प्रजाका पालन करना। प्रजाकी आयके छठे भागका उपभोग करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है ।। ४७ ।।
(क्षत्रियास्तु ततो देवि द्विजानां पालने स्मृताः ।
यदि न क्षत्रियो लोके जगत् स्यादधरोत्तरम् ॥
रक्षणात् क्षत्रियैरेव जगद् भवति शाश्वतम् ।
देवि! क्षत्रिय ब्राह्मणोंके पालनमें तत्पर रहते हैं। यदि संसारमें क्षत्रिय न होता तो इस जगत्में भारी उलट-फेर या विप्लव मच जाता। क्षत्रियोंद्वारा रक्षा होनेसे ही यह जगत् सदा टिका रहता है ।।
सम्यग्गुणहितो धर्मो धर्मः पौरहितक्रिया ।
व्यवहारस्थितिर्नित्यं गुणयुक्तो महीपतिः ॥)
उत्तम गुणोंका सम्पादन और पुरवासियोंका हितसाधन उसके लिये धर्म है। गुणवान् राजा सदा न्याययुक्त व्यवहारमें स्थित रहे ।।
प्रजाः पालयते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः ।
तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसंचिताः ॥ ४८ ॥
जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसे उसके प्रजापालनरूपी धर्मके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ।। ४८ ।।
तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ४९ ॥
यज्ञोपवीतधरणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा । भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ॥ ५० ॥ सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुक्रियाः । व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ॥ ५१ ॥ राजाका परम धर्म है—इन्द्रियसंयम, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत-धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्यका सम्पादन, पोष्यवर्गका भरण-पोषण, आरम्भ किये हुए कर्मको सफल बनाना, अपराधके अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मोंका अनुष्ठान करना, व्यवहारमें न्यायकी रक्षा करना और सत्यभाषणमें अनुरक्त होना। ये सभी कर्म राजाके लिये धर्म ही हैं ॥ आर्तहस्तप्रदो राजा प्रेत्य चेह महीयते । गोब्राह्मणार्थे विक्रान्तः संग्रामे निधनं गतः ॥ ५२ ॥ अश्वमेधजिताँल्लोकानाप्नोति त्रिदिवालये ॥ ५३ ॥ जो राजा दुखी मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, वह इस लोक और परलोकमें भी सम्मानित होता है। गौओं और ब्राह्मणोंको संकटसे बचानेके लिये जो पराक्रम दिखाकर संग्राममें मृत्युको प्राप्त होता है, वह स्वर्गमें अश्वमेध यज्ञोंद्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार जमा लेता है ॥ ५२-५३ ॥ (तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः । अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्षफलदा हि ते ॥ यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवेयुस्तथा परे ।) देवि! इसी प्रकार वैश्य भी लोगोंकी जीवन-यात्राके निर्वाहमें सहायक माने गये हैं। दूसरे वर्णोंके लोग उन्हींके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं। यदि वैश्य न हों तो दूसरे वर्णके लोग भी न रहें ॥ वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ५४ ॥ वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः । विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥ पशुओंका पालन, खेती, व्यापार, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, सन्मार्गका आश्रय लेकर सदाचारका पालन, अतिथि-सत्कार, शम, दम, ब्राह्मणोंका स्वागत और त्याग—ये सब वैश्योंके सनातन धर्म हैं ॥ ५४-५५ ॥ तिलान् गन्धान् रसांश्चैव विक्रीणीयान्न चैव हि । वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ॥ ५६ ॥ सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यथार्हतः ।
व्यापार करनेवाले सदाचारी वैश्यको तिल, चन्दन और रसकी बिक्री नहीं करनी चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इस त्रिवर्गका सब प्रकारसे यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ॥
शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ॥ ५७ ॥
स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तपः संचिनुते महत् ॥ ५८ ॥
शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोंकी सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ॥ ५७-५८ ॥
नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः ।
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान् ॥ ५९ ॥
नित्य सदाचारका पालन और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले बुद्धिमान् शूद्रको धर्मका मनोवांछित फल प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥
(तथैव शूद्रा विहिताः सर्वधर्मप्रसाधकाः ।
शूद्राश्च यदि ते न स्युः कर्मकर्ता न विद्यते ॥
इसी प्रकार शूद्र भी सम्पूर्ण धर्मोंके साधक बताये गये हैं। यदि शूद्र न हों तो सेवाका कार्य करनेवाला कोई नहीं है ॥
त्रयः पूर्वे शूद्रमूलाः सर्वे कर्मकराः स्मृताः ।
ब्राह्मणादिषु शुश्रूषा दासधर्म इति स्मृतः ॥
पहलेके जो तीन वर्ण हैं, वे सब शूद्रमूलक ही हैं, क्योंकि शूद्र ही सेवाका कर्म करनेवाले माने गये हैं। ब्राह्मण आदिकी सेवा ही दास या शूद्रका धर्म माना गया है ॥
वार्ता च कारुकर्माणि शिल्पं नाट्यं तथैव च ।
अहिंसकः शुभाचारो दैवतद्विजवन्दकः ॥
वाणिज्य, कारीगरके कार्य, शिल्प तथा नाट्य भी शूद्रका धर्म है। उसे अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ॥
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः स्वधर्मेणोपयुज्यते ।
एवमादि तथान्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृतः ॥)
ऐसा शूद्र अपने धर्मसे सम्पन्न और उसके अभीष्ट फलोंका भागी होता है। यह तथा और भी शूद्र-धर्म कहा गया है ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं चातुर्वर्ण्यस्य शोभने ।
एकैकस्येह सुभगे किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ६० ॥
शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक-एक करके चारों वर्णोंका सारा धर्म बतलाया। सुभगे! अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ६० ॥
उमोवाच
(भगवन् देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो ॥
उमा बोलीं— भगवन्! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है। प्रभो! अब मैं आश्रमियोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तथाश्रमगतं धर्मं शृणु देवि समाहिता ।
आश्रमाणां तु यो धर्मः क्रियते ब्रह्मवादिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! एकाग्रचित्त होकर आश्रमधर्मका वर्णन सुनो। ब्रह्मवादी मुनियोंने आश्रमोंका जो धर्म निश्चित किया है, वही यहाँ बताया जा रहा है ॥
गृहस्थः प्रवरस्तेषां गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रितः ।
पञ्चयज्ञक्रिया शौचं दारतुष्टिरतन्द्रिता ॥
ऋतुकालाभिगमनं दानयज्ञतपांसि च ।
अविप्रवासस्तस्येष्टः स्वाध्यायश्चाग्निपूर्वकम् ॥
आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गार्हस्थ्य धर्मपर प्रतिष्ठित है। पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान, बाहर-भीतरकी पवित्रता, अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहना, आलस्यको त्याग देना, ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करना, दान, यज्ञ और तपस्यामें लगे रहना, परदेश न जाना और अग्निहोत्रपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना—ये गृहस्थके अभीष्ट धर्म हैं ॥
तथैव वानप्रस्थस्य धर्माः प्रोक्ताः सनातनाः ।
गृहवासं समुत्सृज्य निश्चित्यैकमनाः शुभैः ॥
वन्यैरेव सदाहारैर्वर्तयेदिति च स्थितिः ।
इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रमके सनातन धर्म बताये गये हैं। वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छावाला पुरुष एकचित्त होकर निश्चय करनेके पश्चात् घरका रहना छोड़कर वनमें चला जाय और वनमें प्राप्त होनेवाले उत्तम आहारोंसे ही जीवन-निर्वाह करे। यही उसके लिये शास्त्रविहित मर्यादा है ॥
भूमिशय्या जटाश्मश्रुचर्मवल्कलधारणम् ॥
देवतातिथिसत्कारो महाकृच्छ्राभिपूजनम् ।
अग्निहोत्रं त्रिषवणं तस्य नित्यं विधीयते ॥
ब्रह्मचर्यं क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।
एवं स विगते प्राणे देवलोके महीयते ॥
पृथ्वीपर सोना, जटा और दाढ़ी-मूँछ रखना, मृगचर्म और वल्कल वस्त्र धारण करना, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करना, महान् कष्ट सहकर भी देवताओंकी पूजा आदिका निर्वाह करना—यह वानप्रस्थ-का नियम है। उसके लिये प्रतिदिन अग्निहोत्र और त्रिकाल-स्नानका विधान है। ब्रह्मचर्य, क्षमा और शौच आदि उसका सनातन धर्म है। ऐसा करनेवाला वानप्रस्थ प्राणत्यागके पश्चात् देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥
यतिधर्मास्तथा देवि गृहांस्त्यक्त्वा यतस्ततः।
आकिञ्चन्यमनारम्भः सर्वतः शौचमार्जवम्॥
सर्वत्र भैक्षचर्या च सर्वत्रैव विवासनम्।
सदा ध्यानपरत्वं च दोषशुद्धिः क्षमा दया॥
तत्त्वानुगतबुद्धित्वं तस्य धर्मविधिर्भवेत्।
देवि! यतिधर्म इस प्रकार है। संन्यासी घर छोड़कर इधर-उधर विचरता रहे। वह अपने पास किसी वस्तुका संग्रह न करे। कर्मोंके आरम्भ या आयोजनसे दूर रहे। सब ओरसे पवित्रता और सरलताको वह अपने भीतर स्थान दे। सर्वत्र भिक्षासे जीविका चलावे। सभी स्थानोंसे वह विलग रहे। सदा ध्यानमें तत्पर रहना, दोषोंसे शुद्ध होना, सबपर क्षमा और दयाका भाव रखना तथा बुद्धिको तत्त्वके चिन्तनमें लगाये रखना—ये सब संन्यासीके लिये धर्मकार्य हैं॥
बुभुक्षितं पिपासार्तमतिथिं श्रान्तमागतम्।
अर्चयन्ति वरारोहे तेषामपि फलं महत्॥
वरारोहे! जो भूख-प्याससे पीड़ित और थके-मांदे आये हुए अतिथिकी सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें भी महान् फलकी प्राप्ति होती है॥
पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्मै धर्मकाङ्क्षिभिः।
आगमिष्यति यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति॥
धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज जो पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा।
काले सम्प्राप्तमतिथिं भोक्तुकाममुपस्थितम्।
यस्तं सम्भावयेत् तत्र व्यासोऽयं समुपस्थितः॥
समयपर भोजनकी इच्छासे आये अथवा उपस्थित हुए अतिथिका जो समादर करता है, वहाँ ये साक्षात् भगवान् व्यास उपस्थित होते हैं॥
तस्य पूजां यथाशक्त्या सौम्यचित्तः प्रयोजयेत्।
चित्तमूलो भवेद् धर्मो धर्ममूलं भवेद् यशः॥
अतः कोमलचित्त होकर उस अतिथिकी यथा-शक्ति पूजा करनी चाहिये; क्योंकि धर्मका मूल है चित्तका विशुद्ध भाव और यशका मूल है धर्म॥
तस्मात् सौम्येन चित्तेन दातव्यं देवि सर्वथा ।
सौम्यचित्तस्तु यो दद्यात् तद्धि दानमनुत्तमम् ॥
अतः देवि! सर्वथा सौम्यचित्तसे दान देना चाहिये; क्योंकि जो सौम्यचित्त होकर दान देता है, उसका वह दान सर्वोत्तम होता है ॥
यथाम्बुबिन्दुभिः सूक्ष्मैः पतद्भिर्मेदिनीतले ।
केदारश्च तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ॥
तोयपूर्णानि दृश्यन्ते अप्रतर्क्यानि शोभने ।
अल्पमल्पमपि ह्येकं दीयमानं विवर्धते ॥
शोभने! जैसे भूतलपर वर्षाके समय गिरती हुई जलकी छोटी-छोटी बूँदोंसे ही खेतोंकी क्यारियाँ, तालाब, सरोवर और सरिताएँ अतर्क्य भावसे जलपूर्ण दिखायी देती हैं, उसी प्रकार एक-एक करके थोड़ा-थोड़ा दिया हुआ दान भी बढ़ जाता है ॥
पीडयापि च भृत्यानां दानमेव विशिष्यते ।
पुत्रदारधनं धान्यं न मृतमनुगच्छति ॥
भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंको थोड़ा-सा कष्ट देकर भी यदि दान किया जा सके तो दान ही श्रेष्ठ माना गया है। स्त्री-पुत्र, धन और धान्य—ये वस्तुएँ मरे हुए पुरुषोंके साथ नहीं जाती हैं ॥
श्रेयो दानं च भोगश्च धनं प्राप्य यशस्विनि ।
दानेन हि महाभागा भवन्ति मनुजाधिपाः ॥
नास्ति भूमौ दानसमं नास्ति दानसमो निधिः ।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ॥
यशस्विनि! धन पाकर उसका दान और भोग करना भी श्रेष्ठ है; परंतु दान करनेसे मनुष्य महान् सौभाग्यशाली नरेश होते हैं। इस पृथ्वीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। दानके समान कोई निधि नहीं है। सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नही है ॥
आश्रमे यस्तु तप्येत तपो मूलफलाशनः ।
आदित्याभिमुखो भूत्वा जटावल्कलसंवृतः ॥
मण्डूकशायी हेमन्ते ग्रीष्मे पञ्चतपा भवेत् ।
सम्यक् तपश्चरन्तीह श्रद्दधाना वनाश्रमे ॥
गृहाश्रमस्य ते देवि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
जो वानप्रस्थ आश्रममें फल-मूल खाकर जटा बढ़ाये, वल्कल पहने, सूर्यकी ओर मुँह करके तपस्या करता है, हेमन्त-ऋतुमें मेढककी भाँति जलमें सोता है और ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निका ताप सहन करता है। इस प्रकार जो लोग वानप्रस्थ आश्रममें रहकर श्रद्धापूर्वक
उत्तम तप करते हैं, वे भी गृहस्थाश्रमके पालनसे होनेवाले धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते॥
उमोवाच
गृहाश्रमस्य या चर्या व्रतानि नियमाश्च ये ।।
यथा च देवताः पूज्याः सततं गृहमेधिना ।
यद् यच्च परिहर्तव्यं गृहिणा तिथिपर्वसु ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यमानं त्वया विभो ।
उमाने कहा— प्रभो! गृहस्थाश्रमका जो आचार है, जो व्रत और नियम हैं, गृहस्थको सदा जिस प्रकारसे देवताओंकी पूजा करनी चाहिये तथा तिथि और पर्वोंके दिन उसे जिस-जिस वस्तुका त्याग करना चाहिये, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
गृहाश्रमस्य यन्मूलं फलं धर्मोऽयमुत्तमः ।।
पादैश्चतुर्भिः सततं धर्मो यत्र प्रतिष्ठितः ।
सारभूतं वरारोहे दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! गृहस्थ-आश्रमका जो मूल और फल है, यह उत्तम धर्म जहाँ अपने चारों चरणोंसे सदा विराजमान रहता है, वरारोहे! जैसे दहीसे घी निकाला जाता है, उसी प्रकार जो सब धर्मोंका सारभूत है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। धर्मचारिणि! सुनो॥
शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे ।।
भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजाः ।
तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः ।।
पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते ।
जो लोग गृहस्थ-आश्रममें रहकर माता-पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है॥
उमोवाच
मातापितृवियुक्तानां का चर्या गृहमेधिनाम् ।।
विधवानां च नारीणां भवानेतद् ब्रवीतु मे ।
उमाने पूछा— जिन गृहस्थोंके माता-पिता न हों, उनकी अथवा विधवा स्त्रियोंकी जीवनचर्या क्या होनी चाहिये? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवतातिथिशुश्रूषा गुरुवृद्धाभिवादनम् ।। अहिंसा सर्वभूतानामलोभः सत्यसंधता । ब्रह्मचर्यं शरण्यत्वं शौचं पूर्वाभिभाषणम् ।। कृतज्ञत्वमपैशुन्यं सततं धर्मशीलता । दिने द्विरभिषेकं च पितृदैवतपूजनम् ।। गवाह्निकप्रदानं च संविभागोऽतिथिष्वपि । दीपं प्रतिश्रयं चैव दद्यात् पाद्यासनं तथा ।। पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा द्वादशेऽप्यष्टमेऽपि वा । चतुर्दशे पञ्चदशे ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।। श्मश्रुकर्म शिरोऽभ्यङ्गमञ्जनं दन्तधावनम् । नैतेष्वहस्सु कुर्वीत तेषु लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवता और अतिथियोंकी सेवा, गुरुजनों तथा वृद्ध पुरुषोंका अभिवादन, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, लोभको त्याग देना, सत्यप्रतिज्ञ होना, ब्रह्मचर्य, शरणागतवत्सलता, शौचाचार, पहले बातचीत करना, उपकारीके प्रति कृतज्ञ होना, किसीकी चुगली न खाना, सदा धर्मशील रहना, दिनमें दो बार स्नान करना, देवता और पितरोंका पूजन करना, गौओंको प्रतिदिन अन्नका ग्रास और घास देना, अतिथियोंको विभागपूर्वक भोजन देना, दीप, ठहरनेके लिये स्थान तथा पाद्य और आसन देना, पंचमी, षष्ठी, द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करना, इन तिथियोंपर मूँछ मुड़ाने, सिरमें तेल लगाने, आँखमें अंजन करने तथा दाँतुन करने एवं दाँत धोने आदिका कार्य न करे। जो इन विधि-निषेधोंका पालन करते हैं, उनके यहाँ लक्ष्मी प्रतिष्ठित होती हैं ।। व्रतोपवासनियमस्तपो दानं च शक्तितः । भरणं भृत्यवर्गस्य दीनानामनुकम्पनम् ।। परदारनिवृत्तिश्च स्वदारेषु रतिः सदाः । व्रत और उपवासका नियम पालना, तपस्या करना, यथाशक्ति दान देना, पोष्यवर्गका पोषण करना, दीनोंपर कृपा रखना, परायी स्त्रीसे दूर रहना तथा सदा ही अपनी स्त्रीसे प्रेम रखना गृहस्थका धर्म है ।। शरीरमेकं दम्पत्योर्विधात्रा पूर्वनिर्मितम् ।। तस्मात् स्वदारनिरतो ब्रह्मचारी विधीयते । विधाताने पूर्वकालमें पति-पत्नीका एक ही शरीर बनाया था; अतः अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है ।। शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च ।। आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ।
प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च ।। गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः कृत्यमाश्रमैः । जो शील और सदाचारसे विनीत है, जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखा है, जो सरलतापूर्वक बर्ताव करता है और समस्त प्राणियोंका हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया है—ऐसे गृहस्थके लिये अन्य आश्रमोंकी क्या आवश्यकता है? ।।
यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।। तथा गृहाश्रमं प्राप्य सर्वे जीवन्ति चाश्रमाः । जैसे सभी जीव माताका सहारा लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थ-आश्रमका आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करते हैं ।।
राजानः सर्वपाषण्डाः सर्वे रङ्गोपजीविनः ।। व्यालग्रहाश्च दम्भाश्च चोरा राजभटास्तथा । सविद्याः सर्वशीलज्ञाः सर्वे वै विचिकित्सकाः ।। दूराध्वानं प्रपन्नाश्च क्षीणपथ्योदना नराः । एते चान्ये च बहवः तर्कयन्ति गृहाश्रमम् ।। राजा, पाखण्डी, नट, सपेरा, दम्भ, चोर, राजपुरुष, विद्वान्, सम्पूर्ण शीलोंके जानकार, सभी संशयालु तथा दूरके रास्तेपर आये हुए पाथेयरहित राही—ये तथा और भी बहुत-से मनुष्य गृहस्थ-आश्रमपर ही ताक लगाये रहते हैं ।।
मार्जारा मूषिकाः श्वानः सूकराश्च शुकास्तथा । कपोतका कर्कटकाः सरीसृपनिषेवणाः ।। अरण्यवासिनश्चान्ये सङ्घा ये मृगपक्षिणाम् । एवं बहुविधा देवि लोकेऽस्मिन् सचराचराः ।। गृहे क्षेत्रे बिले चैव शतशोऽथ सहस्रशः । गृहस्थेन कृतं कर्म सर्वैस्तैरिह भुज्यते ।। देवि! चूहे, बिल्ली, कुत्ते, सुअर, तोते, कबूतर, कर्कटक (काक आदि), सरीसृपसेवी—ये तथा और भी बहुत-से मृग-पक्षियोंके वनवासी समुदाय हैं तथा इसी तरह इस जगत्में जो नाना प्रकारके सैकड़ों और हजारों चराचर प्राणी घर, क्षेत्र और बिलमें निवास करते हैं, वे सब-के-सब यहाँ गृहस्थके किये हुए कर्मको ही भोगते हैं ।।
उपयुक्तं च यत् तेषां मतिमान् नानुशोचति । धर्म इत्येव संकल्प्य यस्तु तस्य फलं शृणु ।। जो वस्तु उनके उपयोगमें आ गयी, उसके लिये जो बुद्धिमान् पुरुष कभी शोक नहीं करता, इन सबका पालन करना धर्म ही है, ऐसा समझकर संतुष्ट रहता है, उसे मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो ।।
सर्वयज्ञप्रणीतस्य हयमेधेन यत् फलम् ।
वर्षे स द्वादशे देवि फलेनैतेन युज्यते ॥)
देवि! जो सम्पूर्ण यज्ञोंका सम्पादन कर चुका है, उसे अश्वमेधयज्ञसे जो फल मिलता है, वही फल इस गृहस्थको बारह वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करनेसे प्राप्त हो जाता है ॥
उमोवाच
उक्तस्त्वया पृथग्धर्मश्चातुर्वर्ण्यहितः शुभः ।
सर्वव्यापी तु यो धर्मो भगवंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ ६१ ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! आपने चारों वर्णोंके लिये हितकारी एवं शुभ धर्मका पृथक्-पृथक् वर्णन किया है। अब मुझे वह धर्म बतलाइये, जो सब वर्णोंके लिये समानरूपसे उपयोगी हो ॥ ६१ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ब्राह्मणा लोकसारेण सृष्टा धात्रा गुणार्थिना ।
लोकांस्तारयितुं कृत्स्नान् मर्त्येषु क्षितिदेवताः ॥ ६२ ॥
तेषामपि प्रवक्ष्यामि धर्मकर्मफलोदयम् ।
ब्राह्मणेषु हि यो धर्मः स धर्मः परमो मतः ॥ ६३ ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने समस्त लोकोंका उद्धार करनेके लिये जगत्की सार वस्तुद्वारा मृत्युलोकमें ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है। ब्राह्मण इस भूमण्डलके देवता हैं, अतः पहले उनके ही धर्म-कर्म और उनके फलोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि ब्राह्मणोंमें जो धर्म होता है, उसे ही परम धर्म माना जाता है ॥ ६२-६३ ॥
इमे ते लोकधर्मार्थं त्रयः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
पृथिव्यां सर्जने नित्यं सृष्टांस्तानपि मे शृणु ॥ ६४ ॥
ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये तीन प्रकारके धर्मका विधान किया है। पृथ्वीकी सृष्टिके साथ ही इन तीनों धर्मोंकी सृष्टि हो गयी है, इनको भी तुम मुझसे सुनो ॥ ६४ ॥
वेदोक्तः परमो धर्मः स्मृतिशास्त्रगतोऽपरः ।
शिष्टाचीर्णोऽपरः प्रोक्तस्त्रयो धर्माः सनातनाः ॥ ६५ ॥
पहला है वेदोक्त धर्म, जो सबसे उत्कृष्ट धर्म है। दूसरा है वेदानुकूल स्मृति-शास्त्रमें वर्णित—स्मार्तधर्म और तीसरा है शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म (शिष्टाचार)। ये तीनों धर्म सनातन हैं ॥ ६५ ॥
त्रैविद्यो ब्राह्मणो विद्वान् न चाध्ययनजीवकः ।
त्रिकर्मा त्रिपरिक्रान्तो मैत्र एष स्मृतो द्विजः ॥ ६६ ॥
जो तीनों वेदोंका ज्ञाता और विद्वान् हो; पढ़ने-पढ़ानेका काम करके जीविका न चलाता हो; दान, धर्म और यज्ञ—इन तीन कर्मोंका सदा अनुष्ठान करता हो; काम, क्रोध और लोभ—इन तीनों दोषोंका त्याग कर चुका हो और सब प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखता हो—ऐसा पुरुष ही वास्तवमें ब्राह्मण माना गया है ॥ ६६ ॥ षडिमानि तु कर्माणि प्रोवाच भुवनेश्वरः । वृत्त्यर्थं ब्राह्मणानां वै शृणु धर्मान् सनातनान् ॥ ६७ ॥ सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंकी जीविकाके लिये ये छः कर्म बताये हैं; जो उनके लिये सनातन धर्म हैं। इनके नाम सुनो ॥ ६७ ॥ यजनं याजनं चैव तथा दानप्रतिग्रहौ । अध्यापनं चाध्ययनं षट्कर्मा धर्मभाग् द्विजः ॥ ६८ ॥ यजन-याजन (यज्ञ करना-कराना), दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना। इन छः कर्मोंका आश्रय लेनेवाला ब्राह्मण धर्मका भागी होता है ॥ ६८ ॥ नित्यः स्वाध्यायिता धर्मो धर्मो यज्ञः सनातनः । दानं प्रशस्यते चास्य यथाशक्ति यथाविधि ॥ ६९ ॥ इनमें भी सदा स्वाध्यायशील होना ब्राह्मणका मुख्य धर्म है, यज्ञ करना सनातन धर्म है और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दान देना उसके लिये प्रशस्त धर्म है ॥ शमस्तूपरमो धर्मः प्रवृत्तः सत्सु नित्यशः । गृहस्थानां विशुद्धानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ ७० ॥ सब प्रकारके विषयोंसे उपरत होना शम कहलाता है। यह सत्पुरुषोंमें सदा दृष्टिगोचर होता है। इसका पालन करनेसे शुद्ध चित्तवाले गृहस्थोंको महान् धर्म-राशिकी प्राप्ति होती है ॥ ७० ॥ पञ्चयज्ञविशुद्धात्मा सत्यवागनसूयकः । दाता ब्राह्मणसत्कर्ता सुसंसृष्टनिवेशनः ॥ ७१ ॥ अमानी च सदाजिह्मः स्निग्धवाणीप्रदस्तथा । अतिथ्यभ्यागतरतिः शेषात्नकृतभोजनः ॥ ७२ ॥ पाद्यमर्घ्यं यथान्यायमासनं शयनं तथा । दीपं प्रतिश्रयं चैव यो ददाति स धार्मिकः ॥ ७३ ॥ गृहस्थ पुरुषको पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनको शुद्ध बनाना चाहिये। जो गृहस्थ सदा सत्य बोलता, किसीके दोष नहीं देखता, दान देता, ब्राह्मणोंका सत्कार करता, अपने घरको झाड़-बुहारकर साफ रखता, अभिमानको त्याग देता, सदा सरल भावसे रहता, स्नेहयुक्त वचन बोलता, अतिथि और अभ्यागतोंकी सेवामें मन लगाता, यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता और अतिथिको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पाद्य, अर्घ्य, आसन,
शय्या, दीपक तथा ठहरनेके लिये गृह प्रदान करता है, उसे धार्मिक समझना चाहिये ।। ७१—७३ ।।
प्रातरुत्थाय चाचम्य भोजनेनोपमन्त्र्य च । सत्कृत्यानुव्रजेद् यस्तु तस्य धर्मः सनातनः ।। ७४ ।। जो प्रातःकाल उठकर आचमन करके ब्राह्मणोंको भोजनके लिये निमन्त्रण देता और उसे ठीक समयपर सत्कारपूर्वक भोजन करानेके बाद कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाता है, उसके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ७४ ।।
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति निशानिशम् । शूद्रधर्मः समाख्यातस्त्रिवर्गपरिचारणम् ।। ७५ ।। शूद्र गृहस्थको अपनी शक्तिके अनुसार तीनों वर्णोंका निरन्तर सब प्रकारसे आतिथ्य-सत्कार करना चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन वर्णोंकी परिचर्यामें रहना उसके लिये प्रधान धर्म बतलाया गया है ।। ७५ ।।
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीयते । तमहं वर्तयिष्यामि सर्वभूतहितं शुभम् ।। ७६ ।। प्रवृत्तिरूप धर्मका विधान गृहस्थोंके लिये किया गया है। वह सब प्राणियोंका हितकारी और शुभ है। अब मैं उसीका वर्णन करता हूँ ।। ७६ ।।
दातव्यमसकृच्छक्त्या यष्टव्यमसकृत् तथा । पुष्टिकर्मविधानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।। ७७ ।। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सदा अपनी शक्तिके अनुसार दान करना चाहिये। सदा यज्ञ करना चाहिये और सदा ही पुष्टिजनक कर्म करते रहना चाहिये ।।
धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलब्धं त्रिधा धनम् । कर्तव्यं धर्मपरमं मानवेन प्रयत्नतः ।। ७८ ।। मनुष्यको धर्मके द्वारा धनका उपार्जन करना चाहिये। धर्मसे उपार्जित हुए धनके तीन भाग करने चाहिये और प्रयत्नपूर्वक धर्मप्रधान कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।। ७८ ।।
एकेनांशेन धर्मार्थौ कर्तव्यौ भूतिमिच्छता । एकेनांशेन कामार्थ एकमंशं विवर्धयेत् ।। ७९ ।। अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको धनके उपर्युक्त तीन भागोंमेंसे एक भागके द्वारा धर्म और अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। दूसरे भागको उपभोगमें लगाना चाहिये और तीसरे अंशको बढ़ाना चाहिये (प्रवृत्तिधर्मका वर्णन किया गया है) ।। ७९ ।।
निवृत्तिलक्षणस्त्वन्यो धर्मो मोक्षाय तिष्ठति । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मे देवि तत्त्वतः ।। ८० ।। इससे भिन्न निवृत्तिरूप धर्म है। वह मोक्षका साधन है। देवि! मैं यथार्थरूपसे उसका स्वरूप बताता हूँ, उसे सुनो ।। ८० ।।
सर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता ।
आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥ ८१ ॥
मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। यही उनका धर्म है। उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये। यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है ॥ ८१ ॥
न कुट्यां नोदके सङ्गो न वाससि न चासने ।
न त्रिदण्डे न शयने नाग्नौ न शरणालये ॥ ८२ ॥
मोक्षाभिलाषी पुरुषको न तो कुटीमें आसक्ति रखनी चाहिये न जलमें, न वस्त्रमें, न आसनमें; न त्रिदण्डमें, न शय्यामें, न अग्निमें और न किसी निवासस्थानमें ही आसक्त होना चाहिये ॥ ८२ ॥
अध्यात्मगतिचित्तो यस्तन्मनास्तत्परायणः ।
युक्तो योगं प्रति सदा प्रतिसंख्यानमेव च ॥ ८३ ॥
मुमुक्षुको अध्यात्मज्ञानका ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये। उसे उसीमें सदा स्थित रहना चाहिये। निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त होकर तत्त्वका विचार करते रहना चाहिये ॥ ८३ ॥
वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशनः ।
नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्च यः ॥ ८४ ॥
विमुक्तः सर्वसङ्गेषु स्नेहबन्धेषु च द्विजः ।
आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्जैत वै द्विजः ॥ ८५ ॥
संन्यासी द्विजको उचित है कि वह सब प्रकारकी आसक्तियों और स्नेहबन्धनोंसे मुक्त होकर सर्वदा वृक्षके नीचे, सूने घरमें अथवा नदीके किनारे रहता हुआ अपने अन्तःकरणमें ही परमात्माका ध्यान करे ॥ ८४-८५ ॥
स्थाणुभूतो निराहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा ।
परिव्रजेति यो युक्तस्तस्य धर्मः सनातनः ॥ ८६ ॥
जो युक्तचित्त होकर संन्यासी होता है और मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिके द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराहार (विषयसेवनसे रहित) और ठूंठे काठकी भाँति स्थिर रहता है, उसको सनातन धर्मका मोक्षरूप धर्म प्राप्त होता है ॥ ८६ ॥
न चैकत्र समासक्तो न चैकग्रामगोचरः ।
मुक्तो ह्यटति निर्मुक्तो न चैकपुलिनेशयः ॥ ८७ ॥
संन्यासी किसी एक स्थानमें आसक्ति न रखे, एक ही ग्राममें न रहे तथा किसी एक ही किनारेपर सर्वदा शयन न करे। उसे सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरना चाहिये ॥ ८७ ॥
एष मोक्षविदां धर्मो वेदोक्तः सत्पथः सताम् ।
यो मार्गमनुयातीमं पदं तस्य च विद्यते ॥ ८८ ॥ यह मोक्षधर्मके ज्ञाता सत्पुरुषोंका वेदप्रतिपादित धर्म एवं सन्मार्ग है। जो इस मार्गपर चलता है, उसको ब्रह्मपदकी प्राप्ति होती है ॥ ८८ ॥ चतुर्विधा भिक्षवस्ते कुटीचकबहूदकौ । हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तमः ॥ ८९ ॥ संन्यासी चार प्रकारके होते हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है ॥ ८९ ॥ अतः परतरं नास्ति नावरं न तिरोग्रतः । अदुःखसुखं सौम्यमजरामरमव्ययम् ॥ ९० ॥ इस परमहंस धर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले आत्म-ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है। यह परमहंस-ज्ञान किसीसे निष्कृष्ट नहीं है। परमहंस-ज्ञानके सम्मुख परमात्मा तिरोहित नहीं है। यह दुःख-सुखसे रहित सौम्य अजर-अमर और अविनाशी पद है ॥ ९० ॥ उमोवाच गार्हस्थ्यो मोक्षधर्मश्च सज्जनाचरितस्त्वया । भाषितो जीवलोकस्य मार्गः श्रेयस्करो महान् ॥ ९१ ॥ उमा बोलीं— भगवन्! आपने सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए गार्हस्थ्यधर्म और मोक्षधर्मका वर्णन किया। ये दोनों ही मार्ग जीवजगत्का महान् कल्याण करनेवाले हैं ॥ ९१ ॥ ऋषिधर्मं तु धर्मज्ञ श्रोतुमिच्छाम्यतः परम् । स्पृहा भवति मे नित्यं तपोवननिवासिषु ॥ ९२ ॥ धर्मज्ञ! अब मैं ऋषिधर्म सुनना चाहती हूँ। तपोवननिवासी मुनियोंके प्रति सदा ही मेरे मनमें स्नेह बना रहता है ॥ ९२ ॥ आज्यधूमोद्भवो गन्धो रुणद्धीव तपोवनम् । तं दृष्ट्वा मे मनः प्रीतं महेश्वर सदा भवेत् ॥ ९३ ॥ महेश्वर! ये ऋषिलोग जब अग्निमें घीकी आहुति देते हैं, उस समय उसके धूमसे प्रकट हुई सुगन्ध मानो सारे तपोवनमें छा जाती है। उसे देखकर मेरा चित्त सदा प्रसन्न रहता है ॥ ९३ ॥ एतन्मे संशयं देव मुनिधर्मकृतं विभो । सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञ देवदेव वदस्व मे । निखिलेन मया पृष्टं महादेव यथातथम् ॥ ९४ ॥ विभो! देव! यह मैंने मुनिधर्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा प्रकट की है। देवदेव! आप सम्पूर्ण धर्मोंका तत्त्व जाननेवाले हैं, अतः महादेव! मैंने जो कुछ पूछा है, उसका पूर्णरूपसे यथावत्
वर्णन कीजिये ॥ ९४ ॥
श्रीभगवानुवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि मुनिधर्ममनुत्तमम् । यं कृत्वा मुनयो यान्ति सिद्धिं स्वतपसा शुभे ॥ ९५ ॥ श्रीभगवान् शिव बोले— शुभे! तुम्हारे इस प्रश्नसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब मैं मुनियोंके सर्वोत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, जिसका पालन करके वे अपनी तपस्याके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ॥
फेनपानामृषीणां यो धर्मो धर्मविदां सताम् । तन्मे शृणु महाभागे धर्मज्ञे धर्ममादितः ॥ ९६ ॥ महाभागे! धर्मज्ञे! सबसे पहले धर्मवेत्ता साधुपुरुष फेनप ऋषियोंका जो धर्म है, उसीका मुझसे वर्णन सुनो ॥
उञ्छन्ति सततं ये ते ब्राह्म्यं फेनोत्करं शुभम् । अमृतं ब्रह्मणा पीतमध्वरे प्रसृतं दिवि ॥ ९७ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यज्ञ करते समय जिसका पान किया तथा जो स्वर्गमें फैला हुआ है, वह अमृत (ब्रह्माजीके द्वारा पीया गया इसलिये) ब्राह्म कहलाता है। उसके फेनको जो थोड़ा-थोड़ा संग्रह करके सदा पान करते हैं (और उसीके आधारपर जीवन-निर्वाह करके तपस्यामें लगे रहते हैं,) वे फेनप* कहलाते हैं ॥ ९७ ॥
एष तेषां विशुद्धानां फेनपानां तपोधने । धर्मचर्याकृतो मार्गो बालखिल्यगणैः शृणु ॥ ९८ ॥ तपोधने! यह धर्माचरणका मार्ग उन विशुद्ध फेनप महात्माओंका ही मार्ग है। अब बालखिल्य नामवाले ऋषिगणोंद्वारा जो धर्मका मार्ग बताया गया है, उसको सुनो ॥ ९८ ॥
वालखिल्यास्तपःसिद्धा मुनयः सूर्यमण्डले । उञ्छे तिष्ठन्ति धर्मज्ञाः शाकुनीं वृत्तिमास्थिताः ॥ ९९ ॥ वालखिल्यगण तपस्यासे सिद्ध हुए मुनि हैं। वे सब धर्मोंके ज्ञाता हैं और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। वहाँ वे उञ्छवृत्तिका आश्रय ले पक्षियोंकी भाँति एक-एक दाना बीनकर उसीसे जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ९९ ॥
मृगनिर्मोकवसनाश्चीरवल्कलवाससः । निर्द्वन्द्वाःसत्पथं प्राप्ता वालखिल्यास्तपोधनाः ॥ १०० ॥ मृगछाला, चीर और वल्कल—ये ही उनके वस्त्र हैं। वे बालखिल्य शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, सन्मार्गपर चलनेवाले और तपस्याके धनी हैं ॥ १०० ॥
अङ्गुष्ठपर्वमात्रा ये भूत्वा स्वे स्वे व्यवस्थिताः । तपश्चरणमीहन्ते तेषां धर्मफलं महत् ॥ १०१ ॥
उनमेंसे प्रत्येकका शरीर अंगूठेके सिरेके बराबर है। इतने लघुकाय होनेपर भी वे अपने-अपने कर्तव्यमें स्थित हो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके धर्मका फल महान् है ॥ १०१ ॥
ते सुरैः समतां यान्ति सुरकार्यार्थसिद्धये ।
द्योतयन्ति दिशः सर्वास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ १०२ ॥
वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उनके समान रूप धारण करते हैं। वे तपस्यासे सम्पूर्ण पापोंको दग्ध करके अपने तेजसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हैं ॥ १०२ ॥
ये त्वन्ये शुद्धमनसो दयाधर्मपरायणाः ।
सन्तश्चक्रचराः पुण्याः सोमलोकचराश्च ये ॥ १०३ ॥
पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि ।
इनके अतिरिक्त दूसरे भी बहुत-से शुद्धचित्त, दयाधर्मपरायण एवं पुण्यात्मा संत हैं, जिनमें कुछ चक्रचर (चक्रके समान विचरनेवाले), कुछ सोमलोकमें रहनेवाले तथा कुछ पितृलोकके निकट निवास करनेवाले हैं। ये सब शास्त्रीय विधिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ १०३ ½ ॥
सम्प्राक्षालाश्मकुट्टाश्च दन्तोलूखलिकाश्च ते ॥ १०४ ॥
सोमपानां च देवानामूष्मपाणां तथैव च ।
उञ्छन्ति ये समीपस्थाः सदारा नियतेन्द्रियाः ॥ १०५ ॥
कोई ऋषि सम्प्रक्षाल³, कोई अश्मकुट्ट³ और कोई दन्तोलूखलिक³ हैं। ये लोग सोमप (चन्द्रमाकी किरणोंका पान करनेवाले) और ऊष्मप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) देवताओंके निकट रहकर अपनी स्त्रियों-सहित उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं ॥ १०४-१०५ ॥
तेषामग्निपरिस्पन्दः पितॄणां चार्चनं तथा ।
यज्ञानां चैव पञ्चानां यजनं धर्म उच्यते ॥ १०६ ॥
अग्निहोत्र, पितरोंका पूजन (श्राद्ध) और पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान यह उनका मुख्य धर्म कहा जाता है ॥
एष चक्रचरैर्देवि देवलोकचरैर्द्विजैः ।
ऋषिधर्मः सदा चीर्णो योऽन्यस्तमपि मे शृणु ॥ १०७ ॥
देवि! चक्रकी तरह विचरनेवाले और देवलोकमें निवास करनेवाले पूर्वोक्त ब्राह्मणोंने इस ऋषिधर्मका सदा ही अनुष्ठान किया है। इसके अतिरिक्त दूसरा भी जो ऋषियोंका धर्म है, उसे मुझसे सुनो ॥ १०७ ॥
सर्वेष्वेवर्षिधर्मेषु ज्ञेयोऽऽत्मा संयतेन्द्रियैः ।
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ॥ १०८ ॥
सभी आर्षधर्मोंमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। फिर काम
और क्रोधको भी जीतना चाहिये। ऐसा मेरा मत है ।। १०८ ।।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो धर्मरात्रिसमासनम् ।
सोमयज्ञाभ्यनुज्ञानं पञ्चमी यज्ञदक्षिणा ।। १०९ ।।
प्रत्येक ऋषिके लिये अग्निहोत्रका सम्पादन, धर्मसत्रमें स्थिति, सोमयज्ञका अनुष्ठान,
यज्ञविधिका ज्ञान और यज्ञमें दक्षिणा देना-इन पाँच कर्मोंका विधान आवश्यक
है ।। १०९ ।।
नित्यं यज्ञक्रिया धर्मः पितृदेवार्चने रतिः ।
सर्वातिथ्यं च कर्तव्यमन्नेनोज्छार्जितेन वै ।। ११० ।।
नित्य यज्ञका अनुष्ठान और धर्मका पालन करना चाहिये। देवपूजा और श्राद्धमें प्रीति
रखना चाहिये। उञ्छवृत्तिसे उपार्जित किये हुए अन्नके द्वारा सबका आतिथ्य-सत्कार करना
ऋषियोंका परम कर्तव्य है ।।
निवृत्तिरुपभोगेषु गोरसानां शमे रतिः ।
स्थण्डिले शयने योगः शाकपर्णनिषेवणम् ।। १११ ।।
फलमूलाशनं वायुरापः शैवलभक्षणम् ।
ऋषीणां नियमा ह्येते यैर्जयन्त्यजितां गतिम् ।। ११२ ।।
विषयभोगोंसे निवृत्त रहना, गोरसका आहार करना, शमके साधनमें प्रेम रखना, खुले
मैदान चबूतरेपर सोना, योगका अभ्यास करना, साग-पातका सेवन करना, फल-मूल
खाकर रहना, वायु, जल और सेवारका आहार करना-ये ऋषियोंके नियम हैं। इनका
पालन करनेसे वे अजित - सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त करते हैं ।।
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ।। ११३ ।।
अतिथिं काङ्क्षमाणो वै शेषान्नकृतभोजनः ।
सत्यधर्मरतः शान्तो मुनिधर्मेण युज्यते ।। ११४ ।।
न स्तम्भी न च मानी स्यान्नाप्रसन्नो न विस्मितः ।
मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ।। ११५ ।।
जब गृहस्थोंके यहाँ रसोईघरका धुआँ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे धान कूटनेकी
आवाज न आये-सन्नाटा छाया रहे, चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर
चुकें, बर्तनोंका इधर-उधर ले जाया जाना रुक जाय और भिक्षुक भीख माँगकर लौट गये
हों, ऐसे समयतक ऋषिको अतिथियोंकी बाट जोहनी चाहिये और उसके बचे-खुचे अन्नको
स्वयं ग्रहण करना चाहिये। ऐसा करनेसे सत्यधर्ममें अनुराग रखनेवाला शान्त पुरुष
मुनिधर्मसे युक्त होता है अर्थात् उसे मुनिधर्मके पालनका फल मिलता है। जिसे गर्व और
अभिमान नहीं है, जो अप्रसन्न और विस्मित नहीं होता, शत्रु और मित्रको समान समझता
तथा सबके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ऋषि है ॥ ११३—११५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २२१ १/२ श्लोक हैं)
* यहाँ आचार्य नीलकण्ठके मतमें श्मशान शब्दसे काशीका महाश्मशान ही गृहीत होता है। इसीलिये वहाँ शवके दर्शनसे शिवके दर्शनका फल माना जाता है।
* कुछ लोग दूध पीनेके समय बछड़ोंके मुँहमें लगे हुए फेनको ही वह अमृत मानते हैं, उसीका पान करनेवाले उनके मतमें फेनप हैं। आचार्य नीलकण्ठ अन्नके अग्रभाग (रसोईसे निकाले गये अग्राशन) को फेन और उसका उपयोग करनेवालेको फेनप कहते हैं।
१- जो भोजनके पश्चात् पात्रको धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे दिनके लिये कुछ भी नहीं बचाते हैं, उन्हें सम्प्रक्षाल कहते हैं।
२- पत्थरसे फोड़कर खानेवालेको अश्मकुट्ट कहते हैं।
३- जो दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं अर्थात् अन्नको ओखलीमें न कूटकर दाँतोंसे ही चबाकर खाते हैं वे दन्तोलूखलिक कहलाते हैं।