मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सिद्धान्त भी ठीक ही है-इसमें भी कही कोई युक्तिविरुद्ध बात नहीं दिखलायी देती। प्रामाणिक अनुशासन (शास्त्र या आप्तवाक्य) को भी न माननेपर 'तर्कानवस्थान' दोष अनिवार्य्य होगा। अर्थात् तर्कके वस्तुयाथार्थ्यपर अवलम्बित न रहकर व्यक्तिगत बुद्धिपर अवलम्बित रहनेके कारण जब जिस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, तब उसीका मत सिद्धान्तरूपमें मान लेना पड़ेगा और कब किस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं, अतः कभी सत्यपक्ष सत्य रह सकता है और कभी असत्यपक्ष भी जीत सकता है और ऐसी स्थितिमें ज्ञान भी अस्थिर ही रहेगा- 'यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः। अभियुक्ततरैः यै र्न्यथैवोपपाद्यते ॥' अर्थात् कुशल अनुमाता लोग बड़े प्रयत्नसे जिस अर्थको तर्कसिद्ध करते हैं, उसी अर्थको अन्य अनुमाता तार्किक अपने अनुमान-तर्कोंद्वारा अन्यथा ही सिद्ध कर देते हैं। इस तरह पूर्व अनुमित अर्थका खण्डन कर नवीन अर्थ प्रस्तुत और पुनः उसका खण्डन कर नवीन बात सिद्ध की जा सकती है। इसलिये तर्कमें अप्रतिष्ठितताका आरोप होता है। तथापि यह तर्कका अप्रतिष्ठितत्व दूषण नहीं भूषण ही है, क्योकि तर्कोंके अप्रतिष्ठितत्वकी सिद्धि भी तर्कसे ही होगी। जैसे 'अय तर्कः अप्रतिष्ठितः तर्कत्वात् तर्कान्तरवत्' यह भी एक तर्क ही है और यदि यह तर्क भी अप्रतिष्ठित है, तो इस अप्रतिष्ठित तर्कके द्वारा तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भी किस प्रकार सिद्ध होगा ? और यदि यह तर्क प्रतिष्ठित है, तो सब तर्क अप्रतिष्ठित हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योकि यह भी तर्क है, जिसको प्रतिष्ठित मान लिया गया। अतः कदाचित् तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भूषण है, दूषण नहीं। अतः बड़ी सावधानीसे किसी तत्त्वके निर्णयके लिये कुछ तर्कोंका प्रयोग किया जाना चाहिये। सुकरातका मत था कि 'सदाचारके अनुवर्तनसे ही सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है और वह ज्ञान प्रत्येक मनुष्यको उत्पन्न होनेवाले सामान्य ज्ञानसे भिन्न ही होता है। दृष्ट घटनाओद्वारा कार्यकारण-सम्बन्धसे सम्यग् ज्ञानकी उत्पत्ति सम्भव है। सम्यग् ज्ञान उत्कृष्ट गुण है। व्यापक विचारोसे उसकी उत्पत्ति होती है।' कुछ लोगोंको यह जो मत है कि 'सारा-का-सारा ज्ञान संशयाक्रान्त ही होता है, कोई भी ज्ञान निश्चयात्मक नहीं होता' उसका निराकरण करते हुए उनका कहना है कि 'देवता नहीं चाहते कि इस विषयको लोग जाने। इसीलिये संशयाक्रान्ति होती है और सदाचार तथा देवानुग्रहसे सम्यग्ज्ञानकी उत्पत्ति भी सम्भव ही है, असम्भव नहीं।' भौतिकवादियोंके मतमे सुकरातका दर्शन नीतिविषयक ही है। वैज्ञानिक अन्वेषणकी अपेक्षा उन्होने आध्यात्मिक कल्पनाका ही अधिक आदर किया है। उनके मतमें केवल बाह्य इन्द्रियोसे ही अनुभूति होती हो सो बात नहीं है, अपितु तत्त्वानुभूति तो अन्तरात्मासे ही उत्पन्न (प्रत्यगुद्भूत ही) होती है। न्याय, सदाचार और सुबुद्धि मनुष्योके आन्तरिक गुण हैं।' उनके मतमें
८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो त्रिकालाबाध्य है, एकरस है, वही सत्य है । उन्होंने अप्रामाणिकप्राय असम्बद्ध ज्ञानोंसे उपप्लुत मस्तिष्कको परिष्कृतकर उनमें सत्य ज्ञानके बीज बोये । उनका दर्शन शब्दार्थज्ञानविषयक ही है । बाह्य ज्ञानकी अपेक्षा आन्तरिक ज्ञानकी ही महत्ता उन्होंने अत्यधिक प्रख्यापित की है । उनके शिष्य अफलातून विशिष्ट दार्शनिक हुए । उन्हींके प्रभावसे अनेक विद्वान् अपूर्ण संसारसे विरक्त हो गये और अनन्त सत्यमें अपना मन लगा दिया । भौतिकवादियोंकी दृष्टिसे लोग 'वस्तु' से अपना ध्यान हटाकर अमूर्त्त व्यापक सत्यके अन्वेषणमें लग गये । इन्द्रियव्यापारोंसे उपरत होकर उन्होंने विचारशक्तिसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थिर किये । उक्त विरोधाभासको ही तत्त्व मानकर यह मान लेना कि 'गति या परिवर्तन विरोधपूर्ण है, अतः उसकी व्याख्या नहीं हो सकती' मिथ्या ही है । इसलिये तत्त्व तो अपरिवर्तनीय ही रहा और वही सत्य भी है, वही नित्य भी है । परिवर्तन तो भ्रममात्र है । भौतिकवादकी पद्धतिसे तो इस दर्शनमें अनुभव और प्रयोगकी उपेक्षा ही है । जो तत्त्व है, वह 'कृतबुद्धिग्राह्य' ही है अर्थात् परमेश्वरके अनुग्रहसे प्राप्त हुई किसी रहस्यमयी आत्मशक्तिद्वारा ही उसका ज्ञान ( ग्रहण ) हो सकता है । अन्य यूनानियोंका यह मार्ग भी प्रादुर्भूत हुआ कि 'तर्कद्वारा भी तत्त्वान्वेषण हो सकता है ।' अफलातूनके मतसे 'भौतिक वस्तुओंको सत्यपरिचायक समझना चाहिये । घटनाएँ असम्पूर्ण और भ्रामिका होती हैं । इसलिये घटनाओंके मूलमें कोई गम्भीर सत्य रहता है । वही 'वैज्ञानिक नियम' कहलाता है । सारी सृष्टि उसीके अनुसार है । उन्हीं नियमोंसे घटनाओंकी व्याख्या भी होती है । साथ ही मूलभूत वैज्ञानिक नियम जाने भी जा सकते हैं ।' अफलातूनके मतमें विश्वका घटनाचक्र यन्त्र-सा नहीं है, अपितु जैसे वस्तुओंकी वृद्धिका मूल सूर्य है, वैसे ही सब घटनाचक्र किसी-न-किसी शुभके ही उद्देश्यसे प्रवृत्त होता है । इसका विषयानुरूप विवरण यह हो सकता है कि जितने अंशसे इन्द्रिय जगत्-सम्बद्ध है, उतने अंशमें उसकी सत्ता न्यून है । यदि कोई हिम ( बर्फ ) पर हाथ रखकर कवोष्ण जल ( गुनगुने पानी ) में हाथ डाले, तो उसे वह जल अनुष्णके समान लगता है और यदि अनुष्ण जलमें पहले हाथ डालकर गुनगुनेमें डाले, तो उसे वह शीतल- जैसा लगेगा, इस प्रकार वही जल उष्ण भी है और शीतल भी । हाथीकी दृष्टिसे चूहा 'लघु जन्तु' है, परंतु चींटीकी दृष्टिसे वही 'महान्' अनुभूत होने लगता है । इस प्रकार वही मूषक लघु भी है, वही महान् भी । दृष्टिभेदकी दृष्टिसे यही युक्ति अन्य भी अनेक स्थलोंपर प्रयुक्त हो सकती है । कोई भी इन्द्रियानुभूत वस्तु विपरीत गुणयुक्त विदित होने लग सकती है । अतः गुण निश्चित नहीं कहे जा सकते और जो अपरिवर्तनीय गुणयुक्त नहीं है, वह सत्य नहीं है, और न वह ज्ञान ही प्रमात्मक है । कोई चित्र
पाश्चात्य-दर्शन ९ किसीको सुन्दर लगता है किसीको असुन्दर । जो वस्तु नित्य है, उसका गुण निश्चित होता है अथवा गुणाभाव निश्चित होता है।' उन (अफलातून) के मतसे 'इन्द्रिय-सम्बद्ध जगत जाना नहीं जा सकता । यदि पूछा जाय कि 'जो विज्ञान अनुभूत होता है वह किसका है ?' तो उनके मतसे उत्तर है—'रूपजगतका अथवा धारणाओंका ।' इन्द्रियानुभूत (वस्तुओं) में गुणोंकी उपलब्धिको कारण रूप है । उसीसे उसमें सत्यत्व- का आभास होता है । रूपका ही सम्यग्ज्ञान होता है । रूपशब्दसे यहाँ तात्त्विक रूप लेना चाहते हैं । सारांश यह कि अपूर्ण बाह्य जगतकी अपेक्षा नित्यसिद्ध पूर्णताका ही अन्वेषण करना चाहिये ।' अरस्तूने बाह्य एव आन्तर दोनोंकी व्याख्या की है । 'व्यापक विचारोंसे ही तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है' यह तो उन्हें भी मान्य ही है । वे रूपोंको वस्तुसे संश्लिष्ट ही मानते हैं, अत्यन्त पृथक् नहीं । अफलातूनकी रेखागणितमे अभिरुचि थी, इसलिये काल्पनिक वस्तुकी ओर उनका स्वाभाविक झुकाव रहा । अरस्तूकी जीवविज्ञानमे रुचि थी, इसलिये प्रकृतिके विकार, परिवर्द्धन आदि संस्कारोंकी प्रबलताके कारण अपरिवर्तनीय धारणा आदि सम्बन्धमे इनकी रुचि रही । उनके मतसे आकारमण्डित ही वस्तु विशिष्ट रूप ग्रहण करती है । विभिन्न वस्तुओंका वस्तु-तत्त्व और रूप पृथक्-पृथक् होता है । जैसे मूर्त्तिका वस्तुतत्त्व पाषाण है और शिल्पीकृत रूप ही रूप है । वनस्पति, पशु, मनुष्य आदिका शरीर- संघटन वस्तुतत्त्व है । रूप है; पचन-क्रिया, इन्द्रियानुभूति और बोध । रूपके बिना वस्तु कुछ नहीं है, क्योंकि धरणी, जल, अनल, अनिल आदि भी किसी मूल वस्तुके अवस्थाविशेष ही हैं । विश्वका गतिदायक परमेश्वर है, जो स्वयं गतिहीन है । उसकी सत्तामात्रसे विश्व पूर्णताकी ओर अभिमुख होकर विकासोन्मुखी है । जिस वस्तुमें जितने अधिक रूप हैं, उसका उतना ही अधिक महत्त्व है । आम्रका वस्तुभूत वृक्ष है और वृक्षका रूप आम्रफल है, परन्तु वृक्ष भी वनका रूप है । उसकी दृष्टिसे वन वस्तु है । यहाँ एक ही पदार्थ किसीकी दृष्टिसे रूप है और किसीकी दृष्टिसे वस्तु । अरस्तूकी दृष्टिसे भी सभी वस्तुएँ बीजरूपसे स्थित हैं ही । साराका सारा वटवृक्ष बीजमे अवस्थित है । उपयुक्त सामग्रीसे उसके आवरणका अपनयन होनेपर उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है । विकासोन्मुख वस्तुओंमें विकासानुगुण (विकासोचित या विकासोपयुक्त) शक्तियोंकी कल्पना कर लेनी चाहिये । वृद्धिशील वस्तुओकी प्रवृत्ति किसी उद्देश्यसे ही होती है । विश्व
कहाँसे और क्यो दृष्टिगोचर होता है इस प्रश्नका उत्तर वस्तु, रूप, सुप्तशक्ति एव वास्तविकता इन चार बातोसे होता है । बीज वृक्षका भौतिक हेतु है । दूसरा है नियम, जिससे आम्रवृक्षसे आम्रहीका वृक्ष होता है, पनस ( कटहल ) का नहीं । तीसरा--कर्ता, जिसकी प्रेरणासे क्रिया निर्वृत्त होती है । वास्तव- विकता चौथा हेतु है, जिसके उद्देश्यसे बीजकी प्रवृत्ति होती है । बीजके क्षेत्रमे यह आम्रफल है, चित्रकारके क्षेत्रमे सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामे 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है । वह कार्य्यका पूर्ववर्ती तथा भावी ( कार्य्य ) का निर्णायक होता है । सामग्री सम्पूर्ण रहे तो कार्योत्पत्ति निःसंदिग्ध है । जैसे छोटे- छोटे यन्त्र महान् यन्त्रके चलानेवाले होते है । 'टेलिओलौजी' सिद्धान्त बतलाता है कि 'इस बातपर भी ध्यान देना चाहिये कि कारण न हो तो वस्तु क्या हो जाय और किस उद्देश्यसे उसकी प्रवृत्ति होने लगे । सर्वत्र सुकल्पित, सुसङ्घटित व्यवस्था ही ईश्वरके अस्तित्वको भी सिद्ध करती है ।' 'अचेतन माया प्रकृति ही अन्य सभी चेतनोंका मूल है' यह भी उनका मत है--कि 'अन्तर्निहितशक्तिवाले भूत ही जीव, जन्तु, वनस्पति आदि रूपोंमें परिणत हो जाते है । जिस प्रकार जीर्ण-शीर्ण काष्ठ, सड़े-गले गोबर तथा गीले बालोंसे कीडे, बिच्छू तथा जूँ आदि उत्पन्न हो जाते हैं।' पर वास्तवमें ऐसी बात नहीं है । यद्यपि इस मतकी विस्तृत समालोचना आगे चलकर मार्क्सदर्शनकी समीक्षाके अवसरपर की जायगी, तथापि यहाँ इतना कह देना आवश्यक हे कि गोबर, काष्ठ, लोम, केशादिकोंसे बिच्छू आदिके जड़ कलेवरकी ही उत्पत्ति होती है, न कि उनके चेतन आत्माकी । वह तो सदाके अनुसार अन्यत्रसे ही आता है, वहाँ उसकी अभिव्यञ्जनामात्र होती है । जैसे लोहा-लकड़, कोयला, पानी आदिपर स्वतः विद्यमान अग्निकी ही अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विद्यमान चेतनकी ही तत्तत् शरीरोंमें अभिव्यक्ति होती है । आधुनिकोंमें बहुतोंका मत यह है कि पहले वस्तुओंको देखनेके साधन यन्त्र ऐसे नहीं थे, इसलिये समष्टि दृष्टिसे विचार-परम्परा चल पड़ी । 'मानसिक विचारोंसे ही तत्त्वबोध हो सकता है, इस धारणाका भी मूल कारण यही है । अरस्तूने ज्ञानरश्मियुक्त आत्माओंके जन्मान्तर माने हैं । भौतिकवादियोंका कहना है कि यह उनका भ्रम ही था, क्योंकि जीवविज्ञानशास्त्रका निश्चित मत है कि संस्कार एवं अन्तर्बोध इन्द्रियजन्य अनुभवका ही परिणाम है । अरस्तूके मतसे पदार्थोंमें जीवनके बीजाणु सर्वदा ही रहते हैं । संसारमें विशिष्ट श्रेणियाँ विशिष्टगुणयुक्त होती हैं । यह विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति है । संसारका स्वरूप बुद्धिप्रसूत है, नियन्त्रित है । इसलिये सभी वस्तुएँ नियमानुवर्ती ( नियमबद्ध ) ही हैं ।
दय-निःश्रेयसार्थ" Line 15: "बुद्धिमान् जन उसका सेवन करते हैं । अतः अरस्तू इत्यादिकोंका दर्शन बहुत" Wait: "अरस्तू" or "अरस्तू,"? There is a virama or comma under त्: "अरस्तू"? Wait, look at "अरस्तू" in Line 15: "अरस्तू" has 'अ', 'र', 'स्', 'त', 'ू' with a stroke below? Wait, in Line 2: "अरस्तूने" - 'अ' 'र' 'स' '्' 'त' 'ू' 'न' 'े'. In Line 15: 'अ' 'र' 'स्' 'त' 'ू' -> wait, it has a comma or halanta? "अरस्तू," or "अरस्तू"? It looks like a comma: "अरस्तू," or "अरस्तू"? Wait, look at line 15: "अरस्तू इत्यादिकोंका" - between अरस्तू and इत्यादिकोंका there is a space and a mark at baseline, like a comma: "अरस्तू, इत्यादिकोंका" or "अरस्तू इत्यादिकोंका". Line 16: "कुछ भारतीय आस्तिक दर्शनोंसे मिलता है ।"
* Paragraph 3:
Line 17: "उनके दर्शनका लक्ष्य सुखप्राप्तिके मार्गका ज्ञान ही है । सुख ही जीवनका"
१२ मार्क्सवाद रामराज्य गिरनेसे जटिल गतियोंकी उत्पत्ति नहीं होती, अतः विश्वसृष्टि दुर्लभ ही हो जायगी' अतः एपिकुरसने उनका वक्रगतिसे पतन माना है, जिससे विश्वसृष्टि उत्पन्न हो जाय । इस प्रकार वह सिद्ध करता है कि मनुष्य स्वतन्त्र इच्छावाला है किसी अन्यके द्वारा प्रयोज्य नहीं । शून्यसे शून्यकी ही उत्पत्ति हो सकती है, और किसी- की नहीं । अन्यथा किसीसे भी कुछ भी उत्पन्न हो जाय । जो है वह पिण्ड है, जो नहीं है वह शून्य है ( अथवा जिसकी सत्ता है वह पिण्ड है, जिसकी सत्ता नहीं है, वह शून्य है ) । अणु अविभक्त हैं, अपरिवर्तनीय हैं एव गतिमान् हैं । परस्पर अभिमुख होनेसे उनका संयोग होता है । गतियाँ अनादि हैं । परिमाण और आकारके अतिरिक्त उनका कोई गुण नहीं है । उनके मतमें आत्मा भी अणुविशेष ही है । वस्तुओंसे पृथक् जीवन-क्रियाको प्रदर्शित करनेके लिये ही आत्माकी सृष्टि हुई ( या की गयी ) है । धर्मका बन्धन छुड़ाकर प्रकृतिका अध्ययन करना ही मुख्य 'दर्शन' है-ऐसा उन ( डीमोक्रीटस ) के मतानुयायियोंका कथन है, परंतु ऐसा है नहीं । अणु परिमाण उसे कहना चाहिये जिससे अन्य कोई अपकृष्ट परिमाण न हो-'यतः अपकृष्टपरिमाणं नास्ति तत् अणुपरिमाणम्' । सूक्ष्मताकी कल्पना करते-करते वाचस्पतिकी मति भी जहाँ परिश्रान्त हो जाय, उस अविभाज्य निरतिशय सूक्ष्म अवयवको परमाणु कहते हैं । स्वतन्त्र जड परमाणुओं- में प्रपञ्चारम्भ या विनाशानुकूल व्यापार स्वतः सम्भव नहीं; क्योंकि चेतनानधिष्ठित जड पदार्थोंमें विलक्षण व्यवस्थित अभीष्टकार्यकारित्व सम्भव नहीं। अतएव स्वतन्त्र रूपमें वक्र गति या सीधी गतिसे भी सृष्टि निर्माण सम्भव नहीं, अपितु अदृष्ट और ईश्वरसपेक्ष ही परमाणुओंसे कदाचित् सृष्टि और कदाचित् विनाश होता है । मिस्रके 'अलेग्जैण्ड्रिया' नगरमें बहुत-से दार्शनिकोंका आविर्भाव हुआ । पाश्चात्त्य एवं पौरस्त्य दार्शनिक वहाँ एकत्र हुआ करते थे । वहाँ प्लाटिनसके प्रभावमें धर्म और दर्शनका सम्मिश्रण हुआ । वे मानते थे कि 'अनन्तप्रज्ञारूपिणी रहस्यपूर्ण सत्तासे ही सब वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है और वह सत्ता दुर्ज्ञेय है । उसकी प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिको ही ईश्वर मानकर व्यवहार चलाया जा सकता है और वह अपने भीतर ही संकल्पसे विश्वात्माकी सृष्टि करता है। विश्वात्मा ही समष्टिजगत् एवं व्यक्तियोंकी आत्मा है। पार्थिव सम्बन्धसे अवनति होती है और उसके विच्छेदद्वारा पूर्ण सत्ताप्राप्ति ही उत्थान है।' क्रान्सिस्कन, जान स्कोटस, एरिगेना ( ई० ८१०-८७० ), रोजिलिनस ( १०५१-११२६ ) इत्यादि दार्शनिक अफलातूनके सिद्धान्तसे प्रभावित रहे और डोटिनिसन, एलबर्ट स आदि अरस्तूके । एक्विनसकी दृष्टिसे निर्गुण पदार्थ-स्वरूप ही वस्तुएँ हैं । उन्हींमें प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । उपलब्ध वस्तुएँ रूप ही हैं । जिन रूपोंसे वस्तुओंका ज्ञान होता है, उन्हींसे मूर्ति मूर्त हो पाती है, अन्यथा
निराकार पिण्ड ही रहे। वस्तुहीके समान रूप भी सत्य है। वस्तुसे भी उच्चतर सत्य रूप है। मूर्त्तिका रूप कृत्रिम नहीं है न बाह्याकृति है, अपितु वस्तुका तत्त्व भी वही है, और बाह्य और आन्तर भी वही है। वस्तुका रूपान्तरण ही विकासवादका सिद्धान्त है। मनुष्य पशुका रूपान्तरण है और पशु अचेतन पदार्थ- का रूपान्तर। एक ही मूल वस्तुसे अनेक सत्योंका सङ्घटन सम्भव है। जीवित, चिन्तनशील, अनुभवपूर्ण मनुष्य भी वैसा ही सत्य है।' ऐक्विऩासके मतसे 'वस्तुतत्त्वका अनुभव तो बाह्य इन्द्रियोंसे होता है, परंतु रूपका बुद्धिसे ही होता है।' स्कौट्स एरिजेनाके मतमें 'प्रकृतिमे विवेक तो पहलेहीसे था। यथासमय शासनशक्ति भी उत्पन्न हो जाती है तथा समय प्रकृतिके साथ उत्पन्न होनेवाला है। तथापि प्रारम्भकालमें शासनशक्ति नहीं थी। विवेकसे ही शासनशक्ति उत्पन्न होती है, न कि शासनशक्तिसे विवेक। विवेकहीन शासनशक्ति दुर्बल ही रहती है। विवेक तो शासनशक्तिसे निरपेक्ष भी अपने गुणोंसे ही सुरक्षित है।'
अन्य पाश्चात्त्य-दर्शन
रोजेनिलस आदि दार्शनिक धर्मविरोधी थे। रोजर बेकन इत्यादिने विचार- स्वातन्त्र्यमें धर्मको कुछ नहीं गिना। धर्मके विषयमे यूरोपमे उस समय सुधारकी भावना उद्भूत हुई। तथापि वे सुधारक भी संकुचित वृत्तिके थे। कैल्विनने सुधारक होते हुए भी 'रक्तसंचालन'के तथ्यके आविष्कारमें लगे हुए सर्विटसको जीवित ही जलवा दिया था। बेकनका कहना है कि 'सर्वत्र श्रेष्ठ उपाय खोजना चाहिये। वस्तुके सभी अंगोंका यथायोग्य अध्ययन करना चाहिये। जिसका प्रथम स्थान हो, उसका अध्ययन प्रारम्भमे तथा दुरूहसे पहले सरलका अध्ययन कर लेना चाहिये। यह सब प्रयोगके बिना सम्भव नहीं हो सकता। आप्तवाक्य, विवेक और प्रयोग—ज्ञानके ये तीन मार्ग हैं। कारणरहित आप्तवाक्य अकिंचित्कर है, कारणके बिना आप्तवाक्यका कोई अर्थ नहीं। आप्तवाक्यपर विचारकर प्रयोगसे प्रमाणित कर विवेकसे ज्ञान एवं प्रदर्शनका भेद जानना चाहिये। उसके मतमे पहले प्राकृतिक ज्ञानमे ही विज्ञानकी उन्नति सम्भव है। इन्द्रियाँ पहले प्रमाण हैं, मन बादमे।' असलमें ऐसे स्थलोमे प्रत्यक्षानुमान-मूलक जो आप्तवाक्य हैं, उनका प्रत्यक्षानुमानसे भिन्न शब्दप्रमाणसे व्यवहार नहीं किया जा सकता। ये वाक्य भी प्रत्यक्षानुमानमूलक होनेसे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। जैसे नैयायिकोंका प्रत्यक्षखण्ड, अनुमानखण्ड या बौद्धोंके आगमग्रन्थ होनेपर भी वे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। आप्तवाक्य या शास्त्रप्रमाणके रूपमे उनकी मान्यता नहीं होती। इसी तरह यहाँ बेकनका 'आप्तवाक्य' भी है, जिसे
१४ मार्क्सवाद और रामराज्य
वह प्रयोग और विवेककी कसौटीपर कसता है, पर वह शब्दप्रमाणसे मान्य नही हो सकता। यो प्रत्यक्षानुमानकी शिक्षाके लिये अपेक्षित शिक्षकका जो मूल्य है, वही इनके मतानुसार आप्तोपदेशका मूल्य है। कुछ आधुनिक वेदप्रामाण्यवादी वेदोका प्रामाण्य इसलिये मानते हैं कि वेदोक्त अर्थ प्रयोग और विवेककी कसौटीपर खरे उतरते हैं। परन्तु वास्तविक वेदप्रामाण्यवादियोका कहना है कि जिस प्रयोग और विवेकके आधारपर वेदोक्त अर्थका सौष्ठव एव सत्यता सिद्ध की जाती है, उसी आधारपर वेदोक्त अर्थका परिज्ञान भी सम्पादित किया जा सकता है। फिर उसके लिये वेदप्रामाण्यकी कोई आवश्यकता नही ठहरती। जैसे नेत्रसे अवगतरूपके लिये दूसरे प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। अज्ञातज्ञापकता ही प्रमाणोका मुख्य प्रामाण्य होता है। प्रयोग और विवेकसे जो वस्तु ज्ञात हो, उसका ज्ञापक वेदवाक्य ज्ञातज्ञापक होनेसे अनुवाद ही ठहरता है। देकार्तने भी बेकनका अनुवर्तन करते हुए 'धर्मबन्धनसे विनिर्मुक्त' ही दर्शनका प्रवर्तन किया। उसके मतसे 'ईश्वर भी बुद्धिसे अतीत [ परे ] नही है।' विश्वसृष्टिके लिये उसने यान्त्रिक सिद्धान्त स्वीकृत किया है। पृथिवीकी गतिके दृष्टान्तसे वस्तुओ एव उनकी गतियोसे ही विश्वकी सृष्टि उसने सिद्ध की है। उसके मतमे 'विस्तार पदार्थोंका मुख्य गुण है, इसलिये जहाँ विस्तार हो, वहाँ भी पदार्थका अस्तित्व मान लेना चाहिये। इसलिये रिक्त स्थान है ही-नही। जो स्थान रिक्त समझा जाता है, वह कोणमुक्त कणोसे भरा हुआ ही है और सभी गतिमान् पदार्थ पारस्परिक सघर्षसे 'कोणत्व' के मिट जानेपर वृत्ताकार और सूक्ष्म हो जाते हैं। उन्हींसे सूर्य तथा अन्य प्रकाशवान् वस्तुएँ होती हैं। कुछ विलक्षण प्रकारके उन्ही कोणत्वहीन पदार्थोसे आकाशकी भी उत्पत्ति होती है। तीसरे प्रकारके उन्ही पदार्थोंसे, जो स्थिरप्राय होते हैं, पृथ्वी उत्पन्न होती है, जिसमे प्रकाशकी किरणोका प्रवेश नहीं हो पाता। इनकी गतियाँ वृत्ताकार आवर्त-जैसी होती हैं। बड़ी वस्तुएँ भँवरके बीचमे रहती हैं, छोटी उनके चारो ओर। भँवरकी इस गतिसे ही नक्षत्र सूर्यके चारो ओर चक्कर काटते रहते हैं।' पर चेतनानधिष्ठित किसी भी प्रकारके पदार्थोसे व्यवस्थित सृष्टिका होना असगत है; क्योकि कुलालादिसे अधिष्ठित मृत्तिकादिसे ही घटादिकी उत्पत्ति होती है। सारथिसे अधिष्ठित रथादिकी व्यवस्थित प्रवृत्ति होती है। इसलिये ईश्वर आवश्यक है। देकार्तको भी यह मानना पड़ा। वह ईश्वर बुद्धयतीत होते हुए भी बुद्धिगम्य हो सकता है। सृष्टिकर्तृत्वादिसे उसका अनुमान होता ही है। जहाँतक आकाशकी उत्पत्तिकी बात है, वहाँ आकाश यदि अवकाशात्मक, आवरणात्मक हो तो उसकी कल्पना निरर्थक है। क्योंकि निरवयव पदार्थकी उत्पत्तिमें कोई
पाश्चात्त्य-दर्शन ३५ प्रमाण नहीं है । शब्दसमवायिकारण आकाश निरवयव एव व्यापक है । इसलिये नैयायिकों तथा वैशेषिकोंके मतानुसार आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । वेदान्त- मतानुसार यद्यपि आकाशकी उत्पत्ति होती है, तथापि वह आकाशसे भी सूक्ष्म एवं अमूर्त अहंतत्त्वका ही परिणाम है । परमाणु, अन्य भूतों या किन्हीं कणोंसे आकाशकी उत्पत्ति तो सर्वथा असंगत एव निराधार है । 'ज्ञान कहाँसे प्राप्त होता है और किस प्रकारका होता है' यह दार्शनिकोंका मुख्य प्रश्न है । 'मनमें कुछ निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर रहते ही हैं, बुद्धि उन्हींका अनुगमन करती है और पदार्थोंके सत्य-ज्ञानके विषयमें सत्य-ज्ञान उत्पन्न होते हैं—यही देकार्त्त- का 'प्रज्ञावाद' है । 'जिस प्रकार गणितका सारा प्रपञ्च कुछ निश्चित सिद्धान्तोंके आधार- पर चलता है, उसी प्रकार सारा-का-सारा दार्शनिक प्रपञ्च बुद्धिके आधारपर चलता है, यह कहा जा सकता है।' दूसरे पक्षका कहना है कि 'यदि विश्वकी सारी समस्या गणितकी ही जैसी हो तो ऐसा कहा जा सकता है, परंतु ऐसा है नहीं।
१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वे केवल बुद्धिसे ग्रहण कर ली जाती हैं और वे मनुष्योको स्वतःसिद्ध हैं, अतः प्रमाण-निरपेक्ष होकर भी सत्य है।' वस्तुतः सत्यताका निर्णायक प्रमाण ही होता है, क्योकि प्रमाके कारणको प्रमाण कहते है और अज्ञात अबाधित असदिग्धविषयक ज्ञान ही प्रमा शब्दसे कहा जाता है । उस प्रमाके कारणको ही प्रमाण कहा जाता है। सहज प्रत्यय भी तो चक्षुरादि प्रमाणोसे ही उत्पन्न होंगे । इसीलिये सहज प्रत्ययो- मे भ्रम, प्रमा आदि विभाग होगे । देकार्तेके मतमें जिस वस्तुका बुद्धिमे स्पष्ट अवभासन हो, उसीका सत्य ज्ञान होता है, परंतु यहाँ यह विच्चारणीय है कि किसीकी बुद्धि या मनमे जो भासित होगा वह दूसरेकी भी बुद्धि या मनमे भासित हो यह अनिवार्य नही । यदि प्रत्येककी बुद्धिमे जो भासित हो उसीको सत्य मान ले, तो भिन्न-भिन्न बुद्धियोमे भिन्न भान होनेके कारण वस्तुका रूप ही विकृत हो जायगा । फिर भी अन्य सभी वस्तुओमे सदेह करनेवाला भी अपनेमे कोई सदेह नही करता । 'सदेह करनेवाला कोई मनन करनेवाला है' यह तो असदिग्ध ही है । यहाँ भी सदेह आदिका भासक कोई है, यह तो मानना ही पड़ेगा और वह अपरिवर्तनशील ही हो सकता है, अतः चेतनावान् पुरुषको भी देकार्त्तने माना है। ह्यूमका कहना है कि 'काम, सकल्प, लज्जा, भय इत्यादि मानसिक भावोकी जिस प्रकार अनुभूति होती है, उस प्रकार उसके भासक पुरुषकी अनुभूति नही होती । यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ये मानसिक भाव मणितुल्य हैं और आत्मा- रूपी सूत्रमे निबद्ध ह, तब भी मणिस्थानीय भावोके समान सूत्रस्थानीय आत्माकी भी उपलब्धि तो आवश्यक ही रहती है और यह सूत्रस्थानीय आत्मा उपलब्ध होता नही, अतः उसका अस्तित्व ही नही है।' साथ ही इस पक्षमे बाह्य वस्तुकी अपेक्षा मनके मननकर्तृत्वसे स्वात्मज्ञान ही अधिक है । इस प्रकार ससारके मानसिक कल्पनामात्र होनेसे वस्तुत्वकी ही सिद्धि न होगी । तब फिर मनको पूर्णरूपेण शरीरसे भी पृथक् मानना पडेगा । ऐसी भ्रान्ति बहुतोको हुई है । वस्तुतः सर्वभासक साक्षी उपलब्धि अथवा भानस्वरूप होनेसे भानान्तरनिरपेक्ष ही सिद्ध है । वस्तुका प्रकाश दो प्रकारसे होता है । एक प्रकाशस्वरूप होनेसे और दूसरा प्रकाशसे ससर्ग होनेसे । जैसे घटादिमे 'प्रकाशके ससर्गसे प्रकाशित होता है, ऐसा व्यवहार होता है और प्रकाशमे संसर्गान्तर बिना ही 'स्वतः ही प्रकाशित होता है' ऐसा व्यवहार होता है । इसी तरहसे प्रकाशान्तर या बोधान्तरका विषय न होनेपर प्रकाशस्वरूप होनेसे 'प्रकाशित होता है', ऐसा व्यवहार सगत है और मणियोके बीच सूत्रोपलब्धिके समान विविध बोधवृत्तियोकी सधियोमे निर्विकल्प बोधस्वरूप स्वतः भासमान रहता ही है। गतिविज्ञानवादियोकी दृष्टिमें यन्त्रादिकी अपेक्षा गति ही पहलेसे निर्धारित है। शरीर- के यन्त्ररूप निर्मित होनेके कारण उनकी भी गति वैसे ही पूर्वनिर्धारित ही है। मन भी
पाश्चात्त्य-दर्शन १७ यदि शरीरसे अभिन्न वस्तु हो, तो उसकी भी वैसी ही गति सिद्ध हो जाय। पृथक्त्ववादियोंके मतमे मन शरीर-प्रभावसे अस्पृष्ट ही रहता है। देकार्त्तके मतसे 'मन और वस्तु दोनो ही ईश्वरनिर्मित हैं। चिन्तन मनकी विशेषता है और विकास वस्तुकी। ये दोनों परस्पर भिन्न होनेके कारण एक दूसरेसे अत्यन्त अप्रभावित रहते है। जिस प्रकार दो घटिकायन्त्र स्वतन्त्ररूपसे नाद करते हैं, अतः एक साथ नाद करनेपर भी उनका सम्बन्ध नही माना जा सकता, उसी प्रकार मन एव शरीरकी घटनाएँ यद्यपि एक दूसरेके अनुरूप होती हैं, तथापि उनका कोई पारस्परिक सम्बन्ध नही है। परमेश्वरकी कृपासे ही मन और शरीर दोनोकी क्रियाओमे सामञ्जस्यसे जीवन चलता है।' इस प्रकार भौतिकवाद तथा आदर्शवाद--ये उस [देकार्त्त] के दर्शनकी दो धाराएँ हैं। स्पिनोजा [१६३२-१६७७ ई०] भौतिकवादका प्रवर्त्तक हुआ और लाइवनिट्स [१६४६ ई०] आदर्शवादका। स्पिनोजाके मतसे 'प्रज्ञा ही सबसे उत्कृष्ट है। उसीके द्वारा धर्मग्रन्थके विषयोकी भी परीक्षा की जानी चाहिये। प्रज्ञासे वस्तुओके सम्बन्धोका अन्वेषण करना चाहिये। प्राकृतिक घटनाओके आन्तरिक सम्बन्धके बतलानेमे अप्राकृतिक शक्तिका हस्तक्षेप अनुचित है। इसके मतसे आध्यात्मिक, मानसिक एव भौतिक ऐश्वर्य आदि सभी भाव प्रकृतिमे ही अन्तर्भूत हो जाते हैं और इस प्रकार ईश्वर अथवा प्रकृति एक ही है। सम्पूर्ण ही ईश्वर है, ईश्वर ही सम्पूर्ण है। घटनाओका ऐक्य केवल उनके अस्तित्वमात्रका है, जो नियमानुवर्ती है। भूतो तथा आत्माओका पूरा साम्य है। उनमे ईश्वरकी सत्ता है, अतः भूत आत्ममय ही हुए। सीमित वस्तुएँ एव घटनाएँ अपने अतिरिक्त असंख्य वस्तुओ एव घटनाओसे सम्बद्ध है। इनके समूहका ज्ञान अत्यन्त दुष्कर है, अतः किसी न किसी स्वात्मनिर्भरकी सत्ता मानना आवश्यक है। इस प्रकार मूल पदार्थका वैविध्य नहीं रह जाता। साथ ही इस पक्षमे शून्यकारणतावादका परिहार बड़ी सरलतासे हो जाता है। पूर्ण अनन्त ईश्वर अथवा पूर्ण अनन्त प्रकृतिसे बहिर्भूत अन्य कुछ नहीं रह जाता--ईश्वर ही सम्पूर्ण है। इसमे अन्तर इतना ही है कि कार्य कारणसे अभिन्न अर्थात् अनन्य हो सकता है, परन्तु कारण कार्यसे अभिन्न नहीं होता। जैसे हाटक (सोना) से भिन्न कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं हैं, पर कटक, मुकुट आदिके बिना भी हाटक रहता है। अतः हाटकको उनसे अभिन्न नहीं कहा जा सकता। इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है। पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है। अतः वह जगत्से अभिन्न नहीं कहा जा सकता और प्रकृति तथा ईश्वरमे इतना भेद है कि स्वतन्त्र और चेतन ईश्वर है, किंतु अचेतन चेतनाधिष्ठित प्रकृति है। सृष्टिचक्रके बाहर कोई अप्राकृत वस्तु नहीं है और प्रकृतिका स्वभाव चञ्चल है। सभी शक्तियाँ उसीमे विलीन रहती हैं। सारी-की मा० रा० २--
१. प्रथम खण्ड: द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) की दार्शनिक समीक्षा
१८ मार्क्सवाद और रामराज्य गरी शक्तियाँ परमेश्वरकी अङ्गभूता हैं । व्यापकता तथा मननशक्ति इन दोका अनुभव लोगोंको होता है । भौतिक पदार्थ तथा घटनाएँ व्यापकताशक्तिमे एव मन तथा उसकी अनुभूतियाँ मननशक्तिमे अन्तर्भूत हो जाती हैं । एक ही अन्तिम सत्ताके विभिन्न रूप होनेके कारण तथा समानकालिक होनेके कारण मन तथा शरीर परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियावान् हैं । पदार्थगतिके अनुरूप ही मनोगति होती है । बाह्य नियमबन्धनका प्रतिविम्बमात्र ही आन्तरिक-नियमबन्धन है । बुद्धिमें जिसकी धारणा होती है, बाहर भी उसकी सत्ता होती है । साथ ही, कार्यकारणभाव सर्वत्र है । जैसे लौहका कूट ( निहाई ) आदिके द्वारा ताड़नादि होता है, वैसे ही कूटादिका भी अन्य साधनोसे ही निर्माण होता है । वैसे ही उन साधनोका भी निर्माण साधनान्तरोसे ही होता है—यों कार्य-कारणभावकी कहीं समाप्ति नहीं । समान गुण हुए बिना दो वस्तुएँ परस्पर प्रभावोत्पादक नहीं हो सकती । इसलिये आत्मा एव भूतोके पारस्परिक प्रभावो- त्पादनके लिये उनका समानगुणत्व मानना होगा । यो मूलतः दोनो एक ही हैं । आन्तर कारणके सम्बन्धमें स्पिनोजाकी दृष्टिसे 'किसी प्रयोजनके बिना मन्द व्यक्ति भी किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होता, अतः प्रवृत्ति सोद्देश्य होनी चाहिये । जैसे नेत्र देखनेके लिये बनाये गये हैं, दाँत चबानेके लिये, सूर्य प्रकाशके लिये, ऐसे ही सभी वस्तुएँ मानवीय उपयोगके लिये ही बनी हैं । उपयोग करने योग्य वस्तुएँ अपने प्रयत्नके बिना ही मिल गयीं, इसलिये यह कल्पना की जाती है कि वे किसीके द्वारा बनायी गयी होगी । निर्माताके बिना ही स्वतः उत्पन्न हो गयी होगी ऐसा विश्वास जल्दी नहीं होता; क्योकि वैसा देखा नहीं जाता । जैसे हमलोग अपने उद्योगके लिये वस्तुओका निर्माण करते हैं, वैसे ही प्रकृतिके अधीश्वरने हमलोगोपर अनुग्रह कर वस्तुओका निर्माण कर दिया—ऐसे निरूढ संस्कारसे ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।' इसपर भौतिकवादियोका यह कहना है कि "सब वस्तुएँ परमेश्वरके अनुग्रहसे उत्पन्न हुई हैं' यह इसलिये नहीं कह सकते कि बहुत-सी ऐसी भी वस्तुएँ मिलती हैं, जो उपयोगार्ह नहीं हैं, प्रत्युत विघातक हैं । यथा—विष, भूकम्प, व्याधि आदि । यदि कहा जाय कि 'ये वस्तुएँ परमेश्वरके कोपमूलक हैं' तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि वैसा माननेपर धार्मिको एव ईश्वरभक्तोपर इनका कोई प्रभाव न पडना चाहिये था । पर देखा यह जाता है कि धार्मिक और अधार्मिक सब उपद्रव- ग्रस्त होते हैं । दूसरा मार्ग खोजनेकी अपेक्षा अन्धकारमें पड़े रहना ही सुखकर है ऐसा सोचकर आदर्शवादी वहीं पड़े हैं ।" यह भौतिकवादियोका प्रलाप है । वास्तवम सुख-दुःख धर्माधर्ममूलक हैं ( सुखका मूल धर्म और दुःखका मूल अधर्म है ) । व्यष्टिके पापोसे व्यष्टिको दुःख
और समष्टि पातकोंसे समष्टिदुःखजनक उपद्रवोंकी उत्पत्ति होती है, यह सर्वथा निर्दोष सिद्धान्त है। इस स्थितिमें धार्मिक होनेपर भी दुःख आनेपर कालान्तरीय पातकोंकी कल्पना की जा सकती है, जो फलवलकल्प्य है। इस प्रकार कोई दोष नहीं रह जाता। ऐसे प्रलापोंका समाधान बहुत पूर्वसे होता आ रहा है। मनुने पापी पुरुषोंको सुखी और कदाचित् धर्मात्माओके दुखी होनेकी शङ्कापर बतलाया है कि ऐसी बात देखकर भी अधर्मसे बचना चाहिये। क्योकि पहले अधर्मसे कभी-कभी वृद्धि देखी जाती है, पर उसका कारण व्यक्तिके प्राक्तन सुकृत हैं। उनका फल समाप्त होते ही उसका समूल विनाश हो जाता है-- अधर्मैनेधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापानां शीघ्रं पश्यन् विपर्ययम् ॥ ( मनु० ४ । १७४, १७५, १७१ ) पापीके बड़े-बड़े पुण्योंका फल तनिक सुखमे समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार पुण्यात्माके बड़े-बड़े पाप साधारण कष्टभोगोंसे समाप्त हो जाते हैं। पापीको जहाँ साम्राज्यप्राप्तिकी बात थी, वहाँ उसे पाप करते एक अशर्फी मिलकर रह जाती है। यो ही पुण्यात्माको जहाँ मरण-जैसा भयङ्कर कष्ट आना होता है, वहाँ पुण्य करते काँटा चुभकर रह जाता है। प्रज्ञा (बुद्धि) में भी भ्रम आदि दोष देख पड़ते ह, अतः उसका भी प्रामाण्य ऐकान्तिक नहीं है। अनुभवके अतिरिक्त भी कोई विचारमार्ग है या नही ? इस प्रश्नके उत्तरमे अध्यात्मवादी कहते हैं 'है', भौतिकवादी कहते ह 'नहीं है' । हाब्सने सब वस्तुओकी व्यवस्था यान्त्रिक सिद्धान्तानुसार बतलायी। उसके मतानुसार 'केवल वस्तुएँ और गतियाँ ही सत्यभूत हैं और सब इन्हींका विकार- समुदाय है। ज्ञान भी उसीमे अन्तर्भूत हो जाता है। इन्द्रियानुभूति ही ज्ञान है। वस्तुओके द्वारा इन्द्रियाक्रान्ति ही अनुभूति है। यह भी गतिविशेष ही है। मन भी भौतिक ही है। सभी वस्तुओका यह मूलभूत गुण है कि वे अपनी वर्तमान अवस्थामे रहती हैं। वह अवस्था गतिरहित हो या गतिमती हो यह दूसरी बात है।' हाब्सके मतमें 'मानव कल्पनाशक्तिके सीमित ही होनेके कारण किसी भी वस्तुकी असीम धारणा सम्भव नहीं है। इसलिये सीमारहित शक्ति या सीमारहित समय नहीं है। कहीं-कहीं असीम शब्दका जो प्रयोग होता है, उसका यही तात्पर्य होता है कि हमें उसकी सीमाका ज्ञान नहीं है। इन्द्रियानुभूतिका विषय न हो ऐसा कोई भी धारणाका विषय ( संभव ) नही हो सकता।' लाइबनिट्सने भौतिकवादका खण्डन करनेके लिये संशोधित रूपसे परमाणु- वादकी प्रतिष्ठापना की। निर्जीव भूतोमे सृष्टि नहीं हो सकती, यह सिद्ध करनेके लिये उसने 'मोनाड' नामके अनुभवशक्तियुक्त आध्यात्मिक अणुओको ही सृष्टिका कारण
माना। यान्त्रिक नियमोंका अनुवर्त्तन करनेवाले इन असंख्य और असमान अणुओंका अन्योन्य प्रभाव न होनेपर भी परमेश्वरकी महिमासे परस्पर सम्बन्ध अवभासित होता है। जिस प्रकार अनेक घटीयन्त्र (घडियाँ) समान रूपसे कालनिर्देशन करते हैं, वैसे ही इन अनन्त असंसृष्ट अणुओंके विषयमे भी समझना चाहिये। कार्य-कारणकी परम्परा ईश्वरमें जाकर समाप्त हो जाती है, क्योकि मूलका मूल नहीं हुआ करता। इसलिये जो सबका मूल है उसे स्वयं अमूल (मूलरहित) ही होना चाहिये। कार्य-कारणपरम्पराके नियमानुवर्त्ती होनेके कारण सृष्टिमें परमेश्वरका हस्तक्षेप नहीं होता। ये 'मोनाड' नामके अणु ही अन्तर्निहित शक्तियोंद्वारा जीव, अजीव, पशु, मनुष्य आदिके रूपमे विकसित होते हैं। 'मोनाड' मन और शरीर तथा पशु और मनुष्यके भेदको दूर कर देता है। बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष अनुभूतिके विषय हैं, अतः उनका मनसे पृथक् रूपमे अस्तित्व है और उससे मन प्रभावित होता है। उसीसे बाह्य वस्तुओंका प्रत्यक्षीकरण होता है। परंतु ऐसा माननेपर 'एक मोनाड दूसरे मोनाडोंसे प्रभावित नहीं होता' यह सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। इसलिये वह प्रक्रिया ठीक नहीं। घड़ीके समान परस्पर सम्बन्ध न रहनेपर भी समान क्रिया हो सकती है—यह उपपत्ति तो दी ही जा चुकी है। इसलिये आत्मनिष्ठ घटनाका ही अनुभव होता है। बाह्यानुभूति तो माया ही है। काम, सकल्प आदिके समान बाह्य वस्तु भी मानस (मानसिक) ही है। मनुष्य-शरीर असंख्य मोनाडोंसे संघटित है। इसका नियामक मन या आत्मा एक ही मोनाडसे बना है। विश्वके सम्बन्धमे मोनाडोंका विचार समानरूप- में व्यक्त नहीं होता। अग्निसे दो हाथकी दूरीपर स्थित व्यक्तिको उष्णताकी अनुभूति होनेपर प्रतीत होता है कि औष्ण्य अग्निका गुण है। उससे भी अधिक निकट जानेपर औष्ण्यकी अभिवृद्धि हो जानेपर देहमें पीडा भी होने लगती है। वह संनिधान या नैकट्यका ही गुण हो सकता है, अग्निका नहीं। पीडा तो उष्णताका ही उत्कट रूप है। अतः औष्ण्य अनुभूतिविशेष ही हुआ, अग्निका गुण नहीं। कुछ कीटाणुओंकी टाँगे इतनी सूक्ष्मतम होती हैं कि वे सूक्ष्मवीक्षण-यन्त्रसे ही देखी जा सकती हैं परंतु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उन [कीटाणुओ] को भी अपनी टाँगे सूक्ष्मवीक्षणयन्त्रसे ही ज्ञात होती है। इसलिये द्रष्टाके मनके गुणों- के अनुसार ही सूक्ष्मता या दीर्घता प्रतीत होती है। इसीलिये कीटाणुके मनके लिये दृश्य कुछ और है, हमारे मनके लिये दृश्य कुछ और है। किंतु इतने मात्र- में उस टाँगकी लम्बाई दो प्रकारकी नहीं हो जाती। परंतु सिद्ध यह होता है कि परिमाण दृष्टिका गुण है, दृश्य वस्तुका गुण नहीं। कारण, वह द्रष्टाके मनसे सापेक्ष है। जो आपाततः गुण प्रतीत होते हैं, विचार करनेपर वे मनकी अनुभूतिके
पाश्चात्य-दर्शन २१
• अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाने । दर्शन श्रवण आदिके स्वरूपका विचार करने- पर भी यही निश्चय होता है । जैसे—वस्तुओंकी आलोककिरणें स्नायुओंके सूक्ष्म दृष्टिमन्त्रोंपर पडती हैं । उसमे स्नायुओमे गति उत्पन्न होती है । उसस मस्तिष्कगत कणोंमे स्पन्दन उत्पन्न होता ह । उसीमे किसी प्रकार चेतना उत्पन्न हो जाती है । यही वस्तुदर्शन कहलाती है । इसी प्रकार शब्दका, जो वायुमण्डलीय स्पन्दनविशेष है, कर्णशष्कुलियोंसे सम्बन्ध होता है, जिसमे मस्तिष्क प्रभावित होता है । उससे मस्तिष्कस्थित स्नायु-कणोंमें गतिसमूह उत्पन्न होता है, उससे चेतना । इसीको 'श्रवण' कहते हैं । मस्तिष्क गहरे तमसे आच्छन्न कमरे- सरीखा है । उसमें एक सुदीप्त पट है, जिसका दीपन करनेवाली चेतना है । अनुभूयमान बाह्य विषय इन्द्रियोंको उत्तेजित करते हैं और वे मस्तिष्कगत स्नायुओं- को उत्तेजित करती हैं । उससे उत्पन्न चेतनाके द्वारा उद्दीप्त हुए पटपर वस्तुकी प्रतिकृतियाँ अभिव्यक्त हो जाती हैं । 'वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, इसका अर्थ यह है कि वस्तुओंके चित्र—प्रतिकृतियाँ—मस्तिष्कस्थ प्रदीप्त पटपर व्यक्त होती हैं । चेतनाके द्वारा उज्ज्वलित पटपर प्रतिफलित वस्तुकी प्रतिकृति ही ज्ञान है । सांख्य योग तथा वेदान्तके मतानुसार इन्द्रियोंद्वारा प्रत्युपस्थापित शब्दादि-विषयाकाराकारित वृत्तिसे युक्त अन्तःकरणमे प्रतिबिम्बित असङ्ग पुरुषका अपने प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानके द्वारा विषयोपरागाभिमान उत्पन्न होता है । जैसे जपाकुसुमसे उपरक्त हुआ स्फटिक स्वनिष्ठ प्रतिबिम्बमें अपना आकार समर्पित कर देता है । तथा च वृत्तियुक्त अन्तःकरणमें स्थित विषयाकारताका प्रतिबिम्बमें भान होता है । इसलिये प्रतिबिम्ब भी रक्त हो जाता है ओर उसके तादात्म्याभिमानसे बिम्ब भी अपने आपको रक्त मानता है । दर्पणगत मालिन्यके कारण दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बमें भी मलिनता प्रतीत होती है । प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानवान् होनेके कारण 'मेरा मुख मलिन है' यह समझकर बिम्ब भी चिन्तित होता है । उसी प्रकार विषयोपरक्त अन्तःकरणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब है, अतः उस प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याध्यास ( अभेदाध्यास ) के कारण बिम्बमें भी विषयोपरागका अभिमान होता है । इस तरह असङ्ग स्वप्रकाश चेतनमे विषयोपरागद्वारा विषयका प्रकाश होता है । ज्ञाताका मन प्रथम पदार्थ है, बाह्य वस्तु द्वितीय तथा चेतनोज्ज्वलितपट- प्रतिबिम्बित चित्र या प्रतिकृति तृतीय । मन प्रतिकृतिको तो जानता है, पर बाह्य वस्तुको नही, क्योंकि प्रथम एव तृतीय द्वितीयके बाधकके रूपमें उपस्थित हैं । ऐसी दशामे प्रश्न उठता है कि फिर द्वितीयका अस्तित्व माना जाय या नहीं । यदि द्वितीय जाना ही नहीं जा सकता तो फिर उसीसे तृतीय उत्पन्न कैसे हो जाता है यह
वाचोयुक्ति भी संगत मालूम होती है। अन्य लोगोंका कहना है कि बाह्य वस्तु अनुभूतिके कारणके रूपमे मान लेना चाहिये, क्योकि उसके बिना अनुभूतियोंमे वैचित्र्य उपपन्न नही होता। औरोका कहना है कि वासनाओके वैचित्र्यसे ही उन अनुभूतियोंके वैचित्र्यकी उपपत्ति दी जा सकती है। कुछ लोगोंका कहना है कि यद्यपि विज्ञानके अतिरिक्त और कुछ अनुभवका विषय नहीं होता, तथापि विज्ञानके वैचित्र्यकी उपपत्तिके लिये जब उसे मान लेना पडता है, तब स्वातन्त्र्येण भी उसकी कही सत्ता होगी ऐसा मान लेना चाहिये। बौद्धोंमे कोई क्षणिक बाह्य और आन्तर दोनो पदार्थ मानते हे। कुछ लोग आन्तरको प्रत्यक्ष और बाह्यको अनुमेय कहते हुए आन्तर विज्ञानमे विचित्रताकी उपपत्ति के लिये अनुमेय बाह्य पदार्थ मानते हे,। कुछ लोग वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य मानते हैं। इसलिये बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं स्वीकार करते। वर्कलेका (१६८५-१७५३) मत है कि 'औष्ण्य (उष्णता)के समान ही रूप, संस्थान,गुरुत्व आदि भी 'मानस' भाव ही है, इसलिये उनमे भी औष्ण्यसे कुछ वैशिष्ट्य न होनेके कारण कोई भेद नही। इसी प्रकार वस्तु गुणात्मक ही है। गुणोंके न रह जाने- पर वस्तु रह ही नहीं जाती और गुण विज्ञानके अतिरिक्त कुछ नहीं है।' भारतीय वेदान्तानुसार भी वस्तुस्थिति ऐसी ही है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणोंके अभावसे पृथ्वीतत्त्व कुछ मनोमात्र ही तो रह जाता है। परमेश ज्ञानमय होनेके कारण व्यवहारमे सब वस्तुओका यथायोग्य उपयोग हो जाता है, परंतु विचारसे उनका बाध हो जाता है, अतः अविचारितरमणीयता भी है। ईश्वरकी कल्पनाके विषय पदार्थ 'व्यावहारिक' और 'धारणाविषय' कहे जाते हैं और हमलोगोके कल्पित पदार्थ 'प्रातिभासिक' और 'कल्पनामात्र' । यही भेद है। ब्रह्मसे भिन्न सब कुछ दृष्टिसृष्टिमात्र है। भौतिकवादी न तोपरमेश्वरको ही मानते हे, न चेतनको ही स्वतन्त्र मानते हैं। अतः उनके मतमे तो यह सारा ही दर्शन बाधित हो जाता है। उनके मतमे विज्ञान- सिद्ध पदार्थका भी अस्तित्व है ही। मन अथवा चेतना पदार्थोंके गुण ही हैं। काण्ट (ई० १७२४-१८०४) दार्शनिक तथा गणितज्ञ था। उसकी 'प्रकृतिका साधारण इतिवृत्त' और 'ऊर्ध्वलोक-सिद्धान्त' नामकी पुस्तके प्रसिद्ध है। उसने ह्यूमके अज्ञेयवादसे विज्ञानका उद्धार किया और धर्मकी भी रक्षा की। उसके मतमें सभी वस्तुएँ दो प्रकारकी होती हैं—पारमार्थिक तथा प्रातिभासिक। इसलिये सामान्य व्यक्तिको वस्तुका यथावत् ज्ञान नहीं होता। उसके मतमे 'मनसे सम्बद्ध कुछ कारण होते हैं, जिनसे युक्त मनके द्वारा वस्तुएँ कुछ दूसरे ही प्रकारकी जानी जाती हैं। जैसे सहज नीले उपनेत्रसे युक्त चक्षुके द्वारा सब वस्तुएँ नील ही प्रतीत होती हैं, वैसे ही कुछ हेतुओसे युक्त मनके द्वारा देश-कालमें व्याप्त ही
पाश्चात्त्य दर्शन २३ वस्तुएँ प्रतीत होती हैं। अनुभूतिमें जिनकी प्रतीति होती है, उनमें पहले रूपा- दिहीन वस्तुएँ ही प्रतीत होती हैं।' सहज नीले उपनेत्र लगा लेनेके समान स्वतःसिद्ध ज्ञानरूपी साँचेसे वस्तुएँ जब मष्तिष्कमें जाती हैं, तब देश-कालादिसे सम्बद्ध ही प्रतीत होती हैं—यह हम कह आये हैं। 'यहाँ', 'वहाँ', अथवा 'सर्वत्र' किंवा 'इस समय', 'उस समय' अथवा 'सर्वदा'--इस प्रकार सभी वस्तुओंका अवबोध देश-कालसे आबद्ध ही होता है। काण्टके अनुसार मनमें यही स्वतः- प्राप्त ज्ञानका रूप है।' ऐसे ही मनःसंलग्न सहज उपनेत्रके समान अन्य कारणोंसे ज्ञान होनेका उस (काण्ट) का सिद्धान्त भी समझ लेना चाहिये, जिससे गुण, परिमाण, पदार्थ, कार्य और कारणके सम्बन्धोंका भान होता है। 'जो भी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उनमेंसे प्रत्येक पदार्थ परिमाणयुक्त है। उनमें कुछ गुणयुक्तोंकी दृष्टिसे कार्य हैं, कुछकी अपेक्षासे कोई कारण है। ज्ञानसिद्धान्तानुसार अनुभूयमान वस्तुओंमे मनके साथ मानसिक भाव भी संयुक्त हो जाते हैं। अतः ज्ञात वस्तु सम्मिश्रित ही होती है शुद्ध नहीं। सहजप्रत्ययरूप रूपहीन पदार्थ ज्ञानसिद्धान्तसे संसृष्ट होकर विज्ञात होता है और 'यह मनुष्य है', 'यह पशु है' इत्यादि रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता (पहचाना जाता) है। इसीसे अनुभव विज्ञान बनता है। उसके मतमें प्रतीयमान जगत्का नाम 'फेनोमेना' है और वस्तुभूत जगत्का 'नूमेना' प्रथम वर्कलेके सिद्धान्तसे सम्मत है, द्वितीय उससे भिन्न। समस्त व्यवहार सङ्कल्पमूलक ही हैं। तर्क, गणित आदिके नियम भी सङ्कल्पात्मक ही हैं। जैसे दो और तीन मिलकर पाँच होते हैं—यह गणितका नियम है। कार्य सदा सकारण होता है। आम्र स्वयं भी और स्वयंसे भिन्न भी— यह सम्भव नहीं, यह तर्क भी उसी ढंगका है। ये भाव मानस ही हैं क्योंकि जिनके मनका संघटन भिन्न प्रकारका होगा, उनके इस विषयमें विचार भी भिन्न प्रकारके हो सकते हैं। इसलिये हमारी धारणाके अनुसार ही हमारा जगत् है। परन्तु हमारे विचारोंसे वस्तुव्यवहार भी प्रभावित होता है, इस विश्वासका कोई कारण नहीं है। तर्क और अनुभवके मध्यसे विज्ञान प्रवृत्त होता है। गणितके समान विज्ञानमें भी तर्कका स्थान है। भेद इतना ही है कि विज्ञान अनुभवसे तर्ककी परीक्षा करता है और गणितका परिणाम अपरीक्षणीय ही रहता है, क्योंकि उसकी सत्यता छिपी नहीं रहती। इन्द्रियानुभूतिमें भी वैसी जटिलता नहीं है, किंतु तब गणितके तर्कोंका अनुभूतिके क्षेत्रोंमें प्रयोग कैसे हो, यह समस्या तो है ही। वैज्ञानिकी प्रक्रिया तो यह है। उसमें तर्कसिद्ध ज्ञान वस्तुव्यवहारमें प्रयुक्त होता है। जैसे मध्याकर्षण-नियमके आविष्कारसे वस्तुव्यवहारके सम्बन्धमें भविष्यवाणी की जाती है और वैसा ही घटित भी होता है। तर्कसिद्ध वस्तु प्रयोगमें भी कैसे सत्य होती है। यह समस्या है। जिन वस्तुओंका इन्द्रियानुभूतियोंमे ग्रहण
किया जाता है तथा जिनका बुद्धिसे ग्रहण किया जाता है, उनमें अन्तर स्पष्ट है। कुछ वस्तुओंकी दो-दो जोड़ियाँ बालकके द्वारा गिनी जानेवाली बुद्धिसे दो-दो चार होते हैं, यह व्यापक सत्य है। व्यापकधारणा विशिष्ट इन्द्रियानुभूतियोंसे भिन्न पृथक् ही हैं, कारण वह रूप, प्रयोग आदिसे भिन्न है। यहाँ प्रजावादी तो इन्द्रियानुभूतिके विप्रयका ही अपलाप कर देते हैं। कार्यकारण-सम्बन्धमें बँधे होनेके कारण एक वस्तुके विज्ञानसे ही सब विज्ञान हो जाता है, क्योंकि वही अवश्यंभावी परिणाम है। उनके मतमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका अस्तित्व घटनामात्र हो।' डार्विनका (१८०९-१८८२) मत है कि 'इन्द्रियोंसे पृथक् विचारशक्ति है ही नहीं, इसलिये इन्द्रियानुभूतिके अतिरिक्त विचार कुछ है ही नहीं।' उसके मतमें 'उन सूक्ष्म तन्तुओंका संकुचन, गतिविशेष अथवा रूपान्तरसे परिवर्त्तनविशेष हो ज्ञान है, जिनसे इन्द्रियोंका निर्माण होता है।' विचारका ही दूसरा पर्याय इन्द्रिय गतिविज्ञान है। स्मृतिशक्ति, कल्पना यदि जीवगति नहीं तो और क्या हो सकती हैं? यदि उसे वस्तुओंका चित्र या प्रतिकृति कहा जाय तो वह कहाँ है, जहाँ सभी वस्तुओंका संग्रह शक्य हो? सामान्यतया इन्द्रियानुभूति-विश्वासियोंके मतमें कोई आत्मा है, जिसके द्वारा बाह्य वस्तुएँ प्रतिकृतिके रूपमें ग्रहण की जाती हैं। डार्विन, हक्सले प्रभृति वैज्ञानिकोंने आत्मवादका खण्डन कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया कि 'वस्तुओंके इन्द्रिय-सन्निकर्षसे स्नायुओंद्वारा शरीरमें जो क्रियाविशेष उत्पन्न होती है, उसीसे विचारका जन्म होता है।' इन्द्रियाँ और उनका विषयोंके साथ सन्निकर्ष एवं मस्तिष्क-स्नायुओंपर तज्जन्य प्रभाव सभी अचित् (जड़) होनेसे वे स्वयं अपना ही प्रकाश नहीं कर सकते, तो फिर दूसरों- की तो बात ही क्या? अचेतनमें चेतनकी उत्पत्ति होती है, यह सिद्धान्त भी असिद्ध है, जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है। कात्पानी (१८४२-१९३५) का कहना है कि 'मानवेन्द्रियोंमें बाह्य वस्तुओं- की क्रिया-प्रतिक्रिया आदिके द्वारा जो प्रभावोत्पादन होता है, वही ज्ञान है। अनुभव ही जीवन है। घटनावलीयोंकी अद्भुत शृङ्खलाओंसे उसका अस्तित्व है। सभी वृत्तियोंके द्वारा अपने विकाससे किसी आवश्यकताकी पूर्ति ही की जाती है और परस्परके अनुसार अभ्यास बढ़ानेवालेके प्रयोजनोंकी निवृत्ति भी हो जाती है। बाह्य वस्तुओंके घात-प्रतिघातका परिणाम ही मानवजीवनका अस्तित्व है। हल्बागने 'प्रकृति-प्रथा' नामक पुस्तकमें फ्रांसीसी भौतिकवाद प्रकाशित किया है। उसमें दीदेरो, वफो, दकेसी, हेलवेशियस इत्यादिका मत संगृहीत है। उनके अनुसार 'दुःखका मूल प्रकृतिका अन्यथाज्ञान ही है। रूढ़िपाशमें बँधे हुए प्रकृतिके अध्ययनसे विमुख लोगोंका प्रेत-पिशाचादिमें अन्धविश्वास ही दुःख- का मूल है। प्रकृतिके अध्ययनसे उसका उच्छेद (कर डालना) आवश्यक है।
सत्य एक ही हे और वह सुखरूप हे । श्रमवशात् ही उद्धृत पुरोहितों तथा राष्ट्रोने जातियोंका बन्धन बनाया ओर भीषण मृग-तृष्णामय धर्मोके शिकार बने । अन्यथा-ज्ञानसे ही लोग घृणा तथा क्रूर दमनके भागी बनते हैं । इसलिये अन्धविश्वासका अपनयन और वस्तुतत्त्वज्ञान नितान्त आवश्यक है । जीव और उसे प्रभावित करनेवाले पूर्ण प्रकृतिके.अङ्ग हैं । अप्राकृत पुरुष कल्पना- प्रसूत ही है । मानव भौतिक ही हे । विशिष्ट-सङ्घटनका परिणाम होनेके कारण उसकी विशेषता है । वस्तु तथा उसकी गतिके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं हे । कार्यकारण-सम्बन्धकी अनन्त शृङ्खला ही संसार है । वस्तुओंमे परस्पर क्रिया- प्रतिक्रियाकी परम्परा चलती ही रहती है । विचित्र गुणो एव संयोगोमे वस्तुविशेष- की अभिव्यक्ति होती है ।' सुकरात, अफलातून, अरस्तू, काण्ट आदिके दर्शन ही इस पक्षका खण्डन हैं । सुख अवश्य पुरुषार्थ है, परन्तु क्षणभङ्गुर नही, अपितु अनन्त एव शाश्वत भी है और वही पुरुषार्थ है । प्रकृति और प्राकृत प्रपञ्चका जो भान है, जिसके
२६ मार्क्सवाद और रामराज्य
लिये दृश्य वस्तुओका एकत्रीकरण, उनका पारस्परिक सम्बन्ध-स्थापन तथा तुलनात्मक आलोचना होती है। इसलिये इन्द्रियानुभूतिको सत्य माननेपर बुद्धिप्राप्त ज्ञान ही असम्भव है। यदि प्रज्ञावाद सत्य हो, तो इनका ज्ञान असम्भव है। ज्ञानका विषय कुछ है। परंतु यह भी सत्य है कि अनुभूतियोंमें बुद्धि प्रयुक्त होती है। उसके परिणामका भी अपने जगत्मे प्रयोग होता है। परंतु उभयवादियोके सामञ्जस्यकी समस्या तो वैसी ही रह जाती है। इस विषयमें काण्टका कहना है कि 'अनुभूतिका विषय अकृत्रिम नही है। इसलिये वस्तुतत्त्व अनुभवसे गृहीत नही होता, किन्तु ज्ञानप्राप्तिकी क्रियासे परिष्कृत देशकालादि- सम्बद्ध ही वस्तुका ग्रहण होता है। इससे यह तो सम्भव है कि वस्तु उन नियमोका पालन करे, जिन नियमोसे वस्तु बुद्धिसे मण्डित होती है। यदि भौतिकवादके अनुसार प्रकृतिको क्रियाशील और ज्ञानको अक्रिय माना जाता है तो ज्ञानमे व्यवस्थापकत्व कैसे बन सकता है ? काण्ट आदिके ज्ञानका रचनात्मक कार्य कर्तृत्व इस दृष्टिसे होता है कि मनस या सर्वमनस ही ज्ञान है, भारतीय वेदान्तकी दृष्टिसे मन स्वय ही भौतिक कार्य है, उसकी उत्पत्ति होती है और वह व्यापारवान् होता है, सक्रिय तो है ही। इगलिश-फ्रेन्च भौतिकवादियोका यह मत भी ठीक नही कि वस्तुका अस्तित्व विचार कर्ताके अस्तित्वसे पहले है, विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त कर सकता है। यदि आत्मा भूतका ही परिणाम है तब तो सुतरा कार्य भूत आत्माके पहले कारणरूप भूतका रहना ठीक ही है। परंतु जडभूतोके किसी परिणाममे चेतनता या विचारकर्तृता किसी भी प्रमाणसे नही सिद्ध हो सकती, हान्सके विचार भी इस सम्बन्धमे भौतिकवादी ही हैं। भौतिकवादी भूतपरिणामको ही ज्ञान मानते हैं, अतएव ज्ञानका उद्गमस्थान उनकी दृष्टि से इन्द्रियग्राह्य रूपोके मूलभूत ही है। किंतु अध्यात्मवादी जडभूतो के अतिरिक्त आत्माको ही ज्ञानका उद्गमस्थान मानते है। वह आत्मा नैयायिक, वैशेषिक आदिके अनुसार ज्ञान-गुणवाला है, कुछके मतानुसार ज्ञान- स्वरूप होकर ज्ञानधर्मक है और कुछके मतानुसार अखण्ड नित्य बोधस्वरूप है। उससे ही सर्वभूतो एव भूतप्रकृतिकी उत्पत्ति होती है, उससे भौतिक अन्तःकरण मन आदि उत्पन्न होता है, उसीसे साभास वृत्तिरूप अनित्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं। परंतु उन सबमे पृथक् अखण्ड स्वतः सिद्ध नित्यबोध है, जिससे अनित्य ज्ञानोकी उत्पत्ति, स्थिति एव प्रलय आदिका बोध होता है।
हेगेल-दर्शन
हेगेलने (१७७०-१८३१) काण्टकी वस्तुस्वरूप धारणाका खण्डन किया और बतलाया कि 'वस्तुको उसके आवेष्टन गुणो और अवस्थाओसे अलग करके देखना