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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ९५ ईशान में रङ्गरेज, जुलाहे, धोबी; आग्नेय कोण में अग्निजीवी ( धातुशिल्पी ); अन्त्यज, चर्मकार, वरड, सुराजीवी एवं वेश्याओं को नैर्ऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में व्याध को बसाना चाहिये— ईशे रङ्गकराः कुविन्दरजकाः वह्नौ च तज्जीविनः प्रोक्ता अन्त्यजचर्मकारबरडाः स्युः शौण्डिकाः राक्षसे। पण्यस्त्री निर्ऋतौ च मारुतयुते कोणे न्यसेल्लुब्धकान् ॥१९॥

अथैकादशोऽध्यायः ( भूलम्बविधानम् ) भूमिलम्बविधानं तु वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात्। चतुरस्रमायतास्रं वर्तुलं च तदायतम् ॥१॥ अष्टास्रं च षडस्रं च द्व्यस्रवृत्तं तथैव च। एतद्विन्यासभेदं स्यात् क्षयवृद्धिविधानतः ॥२॥ भूमि के तल एवं आयाम—अब मैं ( मय ) संक्षेप में क्रमानुसार भूमिलम्ब- विधान का वर्णन करता हूँ। क्षय ( कम करते हुये ) एवं वृद्धि ( बढ़ाते हुये ) विधान के अनुसार विन्यास-भेद इस प्रकार हैं—चौकोर, आयताकार, गोलाकार, लम्बाई लिये गोलाकार, अष्टकोण, षट्कोण एवं द्व्यस्रवृत्त ( दो कोणों के साथ गोलाकार )। भूमिलम्बमिति प्रोक्तं त्रिचतुर्हस्तमानतः। द्विद्विहस्तविवृद्ध्यैकं भूमेर्मानं चतुष्टयम् ॥३॥ इसे भूमिलम्ब कहते हैं। एक भूमि ( के भवन ) का मान तीन या चार हस्त से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ की वृद्धि करते हुये चार प्रकार का होता है॥३॥ पञ्चषड्ढस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात्। द्वितले तु चतुर्मानं रुद्रभानुकरान्तकम् ॥४॥ पाँच या छः हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये ग्यारह या बारह हाथ तक दो तल वाले भवन के चार प्रकार के मान होते हैं॥४॥ सप्ताष्टहस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात्। पञ्चदशविकारान्तं त्रितले पञ्चमानकम् ॥५॥ तीन तल वाले भवन के सात या आठ हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये पन्द्रह या सोलह हस्तपर्यन्त पाँच प्रकार के मान होते हैं॥५॥ नवपङ्क्तिकराद्यावत् पक्षषोडशहस्तकम् । चतुष्पञ्चतलं प्रोक्तं चतुर्मानं सनातनम् ॥६॥ नौ या दश हाथ से प्रारम्भ कर पन्द्रह या सोलह हाथ तक चार और पाँच तल वाले भवन के चार प्रकार के मान वर्णित हैं॥६॥

एकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९७ एकहस्तं द्विहस्तं वा क्षुद्रमेकतलं स्मृतम्। युग्मायुग्मकरैर्मानैर्हस्तार्धोनसमन्वितैः ॥७॥ केचिद् वदन्ति देवानां मानुषाणां विमानके। विस्तारे सप्तषट्पञ्चचतुरूर्ध्वंशेऽधिकं त्रिभिः ॥८॥ अथवा एक तल का क्षुद्र प्रमाण एक हाथ या दो हाथ कहा गया है। कुछ विद्वान् देवों एवं मनुष्यों के कई तल वाले भवन के विस्तारप्रमाण में आधा हाथ जोड़ने या कम करने के लिये कहते हैं। यह सम या विषम संख्या वाले सभी हस्त-प्रमाण के लिये हैं। (लम्बाई के लिये) विस्तारप्रमाण में तीन के साथ विस्तार का सात, छः, पाँच, चार या तीन अंश अधिक जोड़ना चाहिये॥७-८॥ शान्तिकं पौष्टिकं जयदमद्भुतं सार्वकामिकम्। उच्छ्रायं द्विगुणं पादार्धाधिकं चापि सम्मतम् ॥९॥ शान्तिक, पौष्टिक, जयद, अद्भुत एवं सार्वकामिक भवनों में पूर्वोक्त प्रमाण के अतिरिक्त भवन की ऊँचाई उसके चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़गुनी अथवा सवा गुनी अधिक होनी चाहिये॥९॥ पञ्चदशकरव्यासाद्धीनं क्षुद्रविमानकम्। सप्ताष्टाधिकपङ्क्त्यादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१०॥ चौड़ाई में पन्द्रह हाथ से कम माप का भवन क्षुद्रविमानक होता है। सत्रह या अट्ठारह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाना चाहिये॥१०॥ आसप्ततेश्चतुर्भूम्यादीनि त्रीणि मतानि च। सप्तविंशतिभेदानि द्वादशान्तान्यनुक्रमात् ॥११॥ (दो-दो हाथ बढ़ाते हुये) सत्तर हाथ तक माप ले जाना चाहिये। चार तल से बारह तलपर्यन्त भवन के सत्ताईस भेद होते हैं एवं इनमें से प्रत्येक के तीन भेद होते हैं॥११॥ त्रिचतुर्विंशतिरतलेर्यावच्छतकरान्तकम् । त्रित्रिहस्तविवृद्ध्या तु त्रिनवोत्सेधमिष्यते ॥१२॥ तेईस या चौबीस हाथ से प्रारम्भ कर एक सौ हाथ तक तीन-तीन हाथ बढ़ाते हुये भवन के सत्ताईस प्रकार के ऊँचाई के प्रमाण-भेद प्राप्त होते हैं॥१२॥ एवमुत्कृष्टमानेषु श्रेष्ठमध्याधमं भवेत्। त्रिचतुष्पङ्क्तिहस्तादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१३॥ मय०-१७

orसप्ताष्टपङ्क्तेरारभ्य`. Wait, look at line 8 again: Is there a 'र'? Let's look at: प - ङ्के - रा - र - भ्य ? Wait! Look at the character between 'रा' and 'भ्य': Wait! Look at the top bar above 'रा': There is a letter: र with a vertical line (रा). Then to the right of the vertical line, there is another र! Wait, is there? Let's compare with line 10: "सत्रह या अठारह हाथ से प्रारम्भ" In line 10: "प्रारम्भ" -> 'रा' has vertical line, then 'म्' joins to 'भ'. Now look at line 8: After 'रा', there is a glyph that has a top bar, a left curl, and a leg: THAT IS A 'र'! Wait, is it a र? Wait! Let's zoom in on line 8: स - प्ता - ष्ट - प - ङ्के - रा - र - भ्य Wait, look at the letter before 'भ्य': It is र! Wait, then what is before it? Is that 'रा'? Wait, look at: Is it 'सप्ताष्टपङ्केराभ्य' or 'सप्ताष्टपङ्केरारभ्य'? Wait! Look at: प ङ्के (or ङ्क्

एकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९९ भवन का विस्तार स्तम्भ के बाहर से मापना चाहिये एवं इसकी ऊँचाई इसके जन्म ( मूल ) से प्रारम्भ कर स्तूपिका-पर्यन्त लेनी चाहिये। कुछ विद्वान् भवन की ऊँचाई शिखर-पर्यन्त मानते हैं।।२०।। महतामुच्छ्रयो हस्तैरुद्देशः समुदाहृतः। तत्तद्व्यासे तु सप्तांशे निर्देशोच्चं त्र्यंशकैः ॥२१॥ बड़े भवनों की ऊँचाई कर-प्रमाण में दी गई है। इनका विस्तार दश में सातवाँ भाग होना चाहिये।।२१।। विस्तारद्विगुणोत्सेधं युक्त्याल्पेषु प्रयोजयेत्। देवानां सार्वभौमानामाद्वादशतलं विदुः ॥२२॥ छोटे भवनों की ऊँचाई उनके विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। सार्वभौम देवों का मन्दिर बारह तलों का होना चाहिये।।२२।। रक्षोगन्धर्वयक्षाणामेकादशतलं मतम्। विप्राणां नवभौमं स्याद् दशभौममथापि वा ॥२३॥ राक्षस, गन्धर्व एवं यक्षों का भवन एकादश तल का तथा ब्राह्मणों का भवन नौ या दश तल का होना चाहिये।।२३।। युवराजस्य राज्ञश्च पञ्चमस्यैव सप्तभूः। तदाद्येकादशतलं षण्णां वै चक्रवर्तिनाम् ॥२४॥ पाँचवें प्रकार का भवन युवराजों एवं राजाओं का होता है, जो सात तल का होता है। चक्रवर्ती राजाओं का भवन छः तल से प्रारम्भ कर ग्यारह तलपर्यन्त होता है।।२४।। त्रिभूमं च चतुर्भूमं वणिजां शूद्रजन्मनाम्। राज्ञां पञ्चतलं वाऽपि मतं पट्टभृतां तु तत् ॥२५॥ वैश्यों एवं शूद्रों का भवन तीन एवं चार-तल का होना चाहिये तथा पट्टभृत राजाओं ( छोटे राजाओं ) का भवन पाँच तल का होना चाहिये।।२५।। शतहस्तसमुत्सेधात् सप्तत्यारत्निविस्तरात्। नेष्यतेऽधिकमानं तु सर्वथा तद्विचक्षणैः ॥२६॥ कुशल स्थपति एक सौ हाथ से अधिक ऊँचे तथा सत्तर हाथ से अधिक विस्तृत भवन का प्रमाण अभीष्ट नहीं मानते हैं।।२६।। क्षुद्रल्पमध्यमवरादिविमानकानां व्यामिश्रहस्तकयुजां विपुलोच्चभेदम्।

१०० मयमतम् युक्त्या यथोदितमजाद्यमरेश्वराणां नृणां तथैव कथितं हि मया पुराणैः ॥२७॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे भूलम्बविधानो नामैकादशोऽध्यायः मैंने ( मय ऋषि ने ) विभिन्न ऊँचाई वाले एवं विस्तार वाले अत्यन्त छोटे, मध्यम एवं बड़े भवनों का वर्णन प्राचीन विद्वानों के मतानुसार किया। इस प्रकार यह ब्रह्मा आदि देवों एवं मनुष्यों के भवनों का वर्णन नियमानुसार किया गया।।२७।। व्याख्यात्मक टिप्पणी भूलम्ब-विधान ( श्लोक-१-२ ) मानसार ( ११ अ. ), ईशानशिवगुरुदेवपद्धति ( क्रिया-३०.५०-५३ ), अपराजितपृच्छा ( १२ ) में एक से बारह भूमियों की चर्चा प्राप्त होती है।

अथ द्वादशोऽध्यायः ( गर्भविन्यासः ) तैतिलानां द्विजातीनां वर्णानां हर्म्यके गृहे । गर्भविन्यासविधिः सम्यक् संक्षेपाद् वक्ष्यतेऽधुना ॥१॥ शिलान्यास—देवों के, ब्राह्मणों के एवं अन्य वर्ण वालों के भवनों के गर्भविन्यास ( शिलान्यास ) की विधि का भली-भाँति एवं संक्षेप में अब वर्णन किया जा रहा है॥१॥ सर्वद्रव्यैस्तु सम्पन्नं गर्भं तत् सम्पदां पदम् । द्रव्यहीनमसम्पन्नं गर्भं सर्वविपत्करम् ॥२॥ सभी पदार्थों से युक्त गर्भ ( भवन की नींव का गर्त ) सम्पदा का स्थल होता है तथा किसी पदार्थ के कम होने से अथवा गर्भविन्यास न होने से वह गर्भ सभी प्रकार की विपत्तियों का कारण ( उस पर निर्मित भवन एवं भवन के निवासियों के लिये ) बनता है॥२॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गर्भं सम्यग् विनिक्षिपेत् । गर्भश्वभ्रस्य गाम्भीर्यं स्वाधिष्ठानोन्नते समम् ॥३॥ इसलिये सभी प्रकार के प्रयत्नपूर्वक गर्भ का न्यास करना चाहिये। गर्भ के गर्त की गहराई को अधिष्ठान की ऊँचाई तक समतल करना चाहिये॥३॥ चतुरस्रसमं कुर्यात् गर्तमिष्टकयाश्मना । आपूर्य सलिलं तस्य मूले सर्वमृदं क्षिपेत् ॥४॥ गर्त को ईंटों एवं पत्थरों से सम एवं चौकोर करना चाहिये। पानी से गड्ढे को भरने के बाद इसके मूल में सभी प्रकार की मिट्टियाँ डालनी चाहिये॥४॥ निम्नगाह्रदसस्याद्रिवल्मीककुलिरावटे । हलस्थलाब्धिगोशृङ्गहस्तिदन्तेषु मृत्तिका ॥५॥ यह मृत्तिका नदी से, तालाब से, अन्न के खेत से, पर्वत से, बाँबी से, हल से, बैल के सींग से एवं गजदन्त से प्राप्त होती है॥५॥

१०२ मयमतम् तदूर्ध्वं तस्य मध्ये तु पद्मकन्दं न्यसेत् पुनः। पूर्वे चोत्पलकन्दं च दक्षिणे कौमुदं क्षिपेत् ॥६॥ उसके ऊपर गर्त के मध्य में पद्म ( लाल कमल ) की जड़, पूर्व दिशा में उत्पल ( नीलकमल ) की जड़ एवं दक्षिण में कुमुद ( की जड़ ) डालनी चाहिये।।६।। सौगन्धिं पश्चिमे विद्यात् नीललोहमुदग्दिशि। धान्यान्यष्टौ तदूर्ध्वं तु शालिर्व्रीहिश्च कोद्रवः ॥७॥ कङ्गुं मुद्गं च माषं च कुलत्थं च तिलं तथा। प्रादक्षिण्‍येन शाल्यादीनीशानादिषु विन्यसेत् ॥८॥ पश्चिम दिशा में सौगन्धि ( एक प्रकार की सुगन्धित घास ), उत्तर दिशा में नील- लोह ( नीले या काले रंग का धातु ) डालना चाहिये। उनके ऊपर आठो दिशाओं में आठ धान्यशालि ( चावल का एक प्रकार ), व्रीहि ( चावल का एक प्रकार ), कोद्रव ( कोदो ), कङ्गु, मुद्ग ( मूँग ), माष ( उड़द ), कुलत्थ ( कुलथा ) एवं तिल को प्रदक्षिण- क्रम से ईशान से प्रारम्भ करते हुये गर्त में डालना चाहिये।।७-८।। ❋ फेला ❋ तस्योपरि निधातव्यं मञ्जूषं ताम्रनिर्मितम्। त्रिचतुर्मात्रविस्ताराद् द्विद्व्यङ्गुलविवर्धनात् ॥९॥ पञ्चषड्विंशमात्रान्तं मानं द्वादश भाजने। समोच्चं वाऽष्टषट्पञ्चभागोनं वा तदुच्छ्रयम् ॥१०॥ पेटी—उसके ऊपर ताँबे से निर्मित मञ्जूषा ( पेटी, बाक्स ) रखना चाहिये। प्रमाण की दृष्टि से यह पात्र चौड़ाई में तीन या चार अंगुल से प्रारम्भ करते हुये दो-दो अंगुल की वृद्धि के साथ पच्चीस-छब्बीस अंगुलपर्यन्त बारह प्रकार का होता है। इसकी ऊँचाई इसकी चौड़ाई के बराबर अथवा आठ, छः या पाँच भाग कम रखनी चाहिये। एकादिद्वादशान्तानां हर्म्याणामुदितं क्रमात्। गृहीतोच्चत्रिभागैकं पादालम्बिविधानकम् ॥११॥ उपर्युक्त माप एक से बारह तलपर्यन्त भवनों के क्रमानुसार वर्णित हैं। ( अथवा ) पादलम्ब ( स्तम्भ ) के विधान के अनुसार गृह की ऊँचाई के तीसरे भाग के प्रमाण को ग्रहण करना चाहिये।।११।। तत्तद्धर्म्याङ्घ्रिविष्कम्भसमं वाष्टांशहीनकम्। त्रिपादं वा विशालं तत्फेलायाः प्राग्वोच्छ्रयम् ॥१२॥

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०३ अथवा भवन के स्तम्भ के विष्कम्भ (घेरा) से आठ भाग कम मञ्जूषा का माप रखना चाहिये। मञ्जूषा की चौड़ाई फेला (गर्त के तल का मेहराब) का तीन चौथाई भाग या पूर्ववर्णित माप के अनुसार रखना चाहिये।।१२।। त्रिवर्गमण्डपाकारं वृत्तं वा चतुरस्रकम्। पञ्चविंशतिकोष्ठं वा नवकोष्ठकमेव वा ।।१३।। मञ्जूषा की आकृति त्रिवर्ग मण्डप के सदृश, वृत्ताकार अथवा चौकोर होना चाहिये। इसमें पच्चीस कोष्ठ या नौ कोष्ठ होना चाहिये।।१३।। फेलोच्चार्धत्रिभागैकं कोष्ठभित्त्युच्छ्रयं भवेत्। तद्भित्तिघनतां कुर्याद् यवैर्द्वित्रिचतुष्टयैः ।।१४।। उपपीठपदे देवाः पञ्चविंशति सम्मताः। फेला की ऊँचाई के तीन भाग करने चाहिये। उसके एक भाग के बराबर कोष्ठ की भित्ति की ऊँचाई होनी चाहिये। उस भित्ति की मोटाई दो, तीन या चार यव (विना छिलके वाले यव के मध्य भाग की चौड़ाई) के बराबर रखनी चाहिये। उपपीठ वास्तु- विन्यास पर पच्चीस वास्तुदेवों को स्थापित करना चाहिये।।१४।। ✹ गर्भस्थापनम् ✹ श्वभ्रोर्ध्वभूतलं सर्वं गन्धैः पुष्पैश्च दीपकैः ।।१५।। वासयित्वा तु पूर्वेद्युः पञ्चगव्यैस्तु भाजनम्। प्रक्षाल्य सूत्रैरावेष्ट्य शुद्धशाल्यास्तरे शुभे ।।१६।। नींव में वास्तु-पूजन की सामग्री रखना—जिस दिन गर्भस्थापन का विधान करना हो, उसके एक दिन पूर्व गर्त के ऊपर की (आस-पास की) भूमि को सभी प्रकार के गन्धों से सुवासित कर पुष्पों तथा दीपकों से सुसज्जित करना चाहिये। मञ्जूषापात्र को पञ्चगव्य (गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर) से स्वच्छ कर उस पर सूत्र लपेटना चाहिये। इसके पश्चात् भूमि पर शुद्ध शालि का धान बिछाना चाहिये। स्थण्डिले चण्डितं कृत्वा मण्डूकं वाऽथ तत्परम्। विन्यस्य देवान् ब्रह्मादीन् श्वेततण्डुलधारया ।।१७।। उस शालि के आस्तरण पर चण्डित अथवा मण्डूक वास्तुपद का विन्यास कर श्वेत तण्डुल की धारा के द्वारा ब्रह्मा आदि वास्तुदेवों का पदविन्यास करना चाहिये।।१७।। आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्भुवनाधिपतिं जपेत्। स्थपतिः कलशान् न्यस्य सर्वान् वस्त्रविभूषितान् ।।१८।।

१०४ मयमतम् सुगन्धोदकसम्पूणान् गन्धपुष्पसमर्चितान् । निष्कलङ्कान्सुषिरान् पञ्चपञ्चैव सूत्रितान् ॥१९॥ वास्तु-देवों की पूजा गन्ध एवं पुष्प आदि से करके संसार के स्वामी (शिव) का जप करना चाहिये। इसके पश्चात् पाँच-पाँच कलशों का न्यास करना चाहिये। इन कलशों को वस्त्रों से सजाना चाहिये, उनमें सुगन्धित जल से भरना चाहिये तथा गन्ध एवं पुष्पों से उनकी पूजा करनी चाहिये। इन कलशों को दोषरहित, छिद्ररहित एवं एक सूत्र (एक लाइन) में रक्खा होना चाहिये ॥१८-१९॥ तस्य प्रदक्षिणे गन्धशालिस्थण्डिलमण्डले । आराध्य गन्धपुष्पाद्यैर्बलिं दत्त्वा यथाविधि ॥२०॥ भाजनाय ततः पात्रं वेष्टयेच्छ्वेतवाससा । श्वेतवस्त्रान्तरस्योर्ध्वं न्यसेद् दर्भास्तरे शुचिः ॥२१॥ शालि धान्य के ऊपर निर्मित स्थण्डिल मण्डल के ऊपर प्रदक्षिणक्रम से (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर) गन्ध एवं पुष्प आदि से वास्तुदेवों को नियमानुसार बलि प्रदान कर एवं उनकी पूजा करने के पश्चात् मञ्जूषा-पात्र को श्वेत वस्त्र से लपेटना चाहिये। उसके ऊपर श्वेत वस्त्र को फैलाना चाहिये एवं उसके ऊपर दर्भ (कुश) बिछाना चाहिये॥२०-२१॥ पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत्ततः । स्थपतिः शास्त्रवित् प्राज्ञः सूत्रग्राह्यादिसेवितः ॥२२॥ तदनन्तर सूत्रग्राही आदि के द्वारा सम्मानित बुद्धिमान एवं वास्तुशास्त्र के ज्ञाता स्थपति को शुद्ध जल पान कर रात्रि को उपवास करना चाहिये ॥२२॥ धान्यादीन्यथ वस्तूनि भाजनाभ्यन्तरे न्यसेत् । हेमराजतशुल्बैश्च शालिव्रीहिकुलत्थकान् ॥२३॥ त्रपुणा कङ्गु सीसेन माषो मुद्गोऽयसायसा । कोद्रवं च तिलं भाव्यं वैकृन्तेन प्रयत्नतः ॥२४॥ (अगले दिन) मञ्जूषा में प्रयत्नपूर्वक धान्य आदि वस्तुओं को रखना चाहिये। ये पदार्थ हैं—सोने के शालि, चाँदी के व्रीहि, ताँबे के कुलत्थ, राँगे के कङ्गु, सीसे के उड़द, अयस् (लोहे) के मूँग, अयस् के कोदो तथा पारे के तिल॥२३-२४॥ ईशादिषु न्यसेदेतान्यष्टदिक्षु यथाक्रमम् । जयन्ते जातिहिङ्गुल्यं हरितालं भृशे मतम् ॥२५॥

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०५ उपर्युक्त वस्तुओं को ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये (प्रदक्षिणक्रम से) आठो दिशाओं (एवं कोणों) में रखना चाहिये। इसके पश्चात् जयन्त के पद पर सिन्दूर एवं भृश पर हरिताल रखना चाहिये।।२५।। मनःशिला च वितथे भृङ्गराजे तु माक्षिकम्। राजावर्तं तु सुग्रीवे शोषे गैरिकमीरितम् ॥२६॥ अञ्जनं गणमुख्ये स्यादुदितौ दरदं विदुः । मध्यमे पद्मरागं तु मरीचौ विद्रुमं मतम् ॥२७॥ सविन्द्रे पुष्परागं तु वैडूर्यं स्याद् विवस्वति । वज्रमिन्द्रजये विद्यादिन्द्रनीलं तु मित्रके ॥२८॥ रुद्रराजे महानीलं मरकतं तु महीधरे । मुक्तापवत्से मध्यादिपूर्वेण क्रमशॊ न्यसेत् ॥२९॥ वितथ के पद पर मनःशिला (मैनसिल), भृङ्गराज पर माक्षिक (लाल खड़िया), सुग्रीव पर लाजावर्त, शोष पर गेरु, गणमुख्य पर अञ्जन, उदित पर दरद (लाल ताँबा), मध्य भाग पर पद्मराग (रूबी पत्थर), मरीचि पर मूँगा, सविन्द्र पर पुष्पराग, विवस्वान् पर वैडूर्य मणि, इन्द्रजय पर हीरा, मित्र पर इन्द्रनील, रुद्रराज पर महानील, महीधर पर मरकत (पन्ना) एवं आपवत्स पर मोती का स्थापन करना चाहिये। इन सभी पदार्थों को मध्य से प्रारम्भ कर पूर्व क्रम से क्रमानुसार रखना चाहिये। विष्णुकान्ता त्रिशूला श्रीः सहा दूर्वा च भृङ्ककम् । अपामार्गैकपत्राब्जमीशादिष्वौषधान्न्यसेत् ॥३०॥ उपर्युक्त कोष्ठों में इन ओषधियों को ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये रखना चाहिये—विष्णुकान्ता, त्रिशूला, श्री, सहा, दूर्वा, भृङ्क, अपामार्ग तथा एकपत्राब्ज ।।३०।। चन्दनागरुकर्पूरलवङ्गैलालताफलम् । तक्कोलेनाष्टगन्धांस्तु जयन्तादिषु विन्यसेत् ॥३१॥ जयन्त आदि के कोष्ठों में चन्दन, अगरु, कपूर, लवङ्ग, इलायची, लताफल, तक्कोल एवं इना—इन आठ गन्धयुक्त पदार्थों को रखना चाहिये।।३१।। स्वस्तिकानि चतुर्दिक्षु हेमायस्ताम्ररूप्यकैः । सर्वेषामपि सामान्यमेतच्चिह्नैस्तु लक्ष्यते ॥३२॥ चारो दिशाओं में सुवर्ण, अयस्, ताम्र एवं रूप्यक (रूपा, चाँदी) द्वारा निर्मित स्वस्तिक रखना चाहिये। सभी देवों के लिये ये सभी सामान्य हैं; किन्तु उनको उनके विशेष चिह्नों से युक्त किया जाता है।।३२।।

१०६ मयमतम्

  • शिवगर्भम् * कपालशूलखट्वाङ्गं परशुं वृषभं तथा । पिनाकं हरिणं पाशं हैमं पूर्वादिषु न्यसेत् ॥३३॥ शिवालय का शिलान्यास—शिवालय के भूगर्भ में पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर सुवर्ण-निर्मित कपाल, शूल, खट्वाङ्ग, परशु, वृषभ, पिनाक धनुष, हरिण एवं पाश का गर्भन्यास करना चाहिये।। ३३ ।। कार्त्तस्वरमयं चाष्टमङ्गलं तत्र पूर्ववत् । दर्पणं पूर्णकुम्भं च वृषभं युग्मचामरम् ॥३४॥ श्रीवत्सं स्वस्तिकं शङ्खं दीपं देवाष्टमङ्गलम् । स्थापकस्यानुशिष्यस्तान् स्थपतिः क्रमश्रो न्यसेत् ॥३५॥ उपर्युक्त क्रमानुसार ही आठ मंगल पदार्थ रखना चाहिये। दर्पण, पूर्णकुम्भ (जल भरा घट), वृषभ, चामर का जोड़ा, श्रीवत्स, स्वस्तिक, शंख एवं दीप—ये सभी देवों के अष्टमंगल होते हैं। स्थापक के अनुसार स्थपति को इन्हें क्रमशः स्थापित करना चाहिये।। ३४-३५ ।। आच्छाद्य भाजनं शुभ्रं पिधानेन तु निश्चलम् । तमेवाराध्य गन्धाद्यैः स्नापयेत् कलशोदकैः ॥३६॥ उस पवित्र एवं दृढ़ मञ्जूषापात्र को ढक्कन से ढँक कर उसकी गन्ध आदि से पूजा करे एवं एक कलश के जल से उसे स्नान कराये।। ३६ ।। विप्रस्वाध्यायघोषैश्च शङ्खभेर्यादिनिःस्वनैः । कल्याणजयघोषैश्च स्थपतिः स्थापकेन तु ॥३७॥ पुष्पकुण्डलहारादिकटकैरङ्गुलीयकैः । पञ्चाङ्गभूषणैर्हेमनिर्मितैश्च विभूषणैः ॥३८॥ हेमयज्ञोपवीतस्तु नववस्त्रोत्तरीयकः । श्वेतानुलेपनश्चैव सितपुष्पशिराः शुचिः ॥३९॥ जिस समय ब्राह्मण वेदमन्त्रों का उच्चारण कर रहे हों, शंख एवं भेरी आदि वाद्यों के स्वर हो रहे हों, कल्याण एवं जय का उद्घोष हो रहा हो, उस समय स्थपति एवं स्थापक को अपने शरीर को पुष्प, कुण्डल, हार, कटक (बाजूबन्द) एवं अंगूठी— इन पञ्चाङ्ग आभूषणों से सुसज्जित करना चाहिये। ये आभूषण सुवर्णनिर्मित होने चाहिये। पवित्र होकर उन्हें सोने का जनेऊ, नया उत्तरीयक (शरीर के ऊपर ओढ़ा जाने

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०७ वाला) वस्त्र, श्वेत (चन्दन आदि) का लेप एवं सिर पर श्वेत पुष्प धारण करना चाहिये।।३७-३९।। ध्यात्वा धरातलं सर्वं दिग्द्विपेन्द्रसमन्वितम् । ससागरं सशैलेन्द्रमनन्तस्योपरि स्थितम् ॥४०॥ (इसके पश्चात्) पृथिवी देवी का ध्यान करना चाहिये। वह दिग्गजों से युक्त हो, सागर एवं पर्वतराज से युक्त हो तथा अनन्त नाग के ऊपर स्थित हो (इस रूप में पृथिवी का ध्यान करना चाहिये) ।।४०।। सृष्टिस्थितिलयाधारं भुवनाधिपतिं जपेत् । ब्रह्मादीनां च देवानां देवीनां द्वारदक्षिणे ॥४१॥ स्तम्भमूले यथायोगं गर्ते गर्भं निधापयेत् । होमस्तम्भे प्रतिस्तम्भे पादुकाच्च प्रतेरधः ॥४२॥ (पृथिवी का ध्यान करने के पश्चात्) सृष्टि, स्थिति एवं विनाश के आधारभूत संसार के स्वामी का जप करना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवों एवं देवियों के (मन्दिर के) दक्षिण द्वार के स्तम्भ के मूल में, होमस्तम्भ के नीचे, प्रतिस्तम्भ के नीचे, पादुका से प्रति के नीचे उचित रीति से रखना चाहिये।।४१-४२।। तस्मादत्युन्नतं निम्नं गर्भं सम्पद्विनाशकृत् । चतुरस्त्रीकृता सारवृक्षपाषाणनिर्मिता ॥४३॥ नियत स्थान से ऊँचा या नीचा गर्भ-स्थापन सम्पत्ति के विनाश का कारण होता है। मञ्जूषा-स्थापन के पश्चात् सार-वृक्ष के काष्ठ या पाषाण-खण्डों से भूमि को चौकोर बनाना चाहिये।।४३।। पात्रद्विगुणविस्तारा पञ्चाङ्गुलधनान्विता । प्रतिमाफलका या सा स्थाप्या तद्भाजनोपरि ॥४४॥ इस पात्र के ऊपर पात्र का दुगना चौड़ा एवं पाँच अंगुल मोटा प्रतिमाफलक स्थापित करना चाहिये।।४४।। तदूर्ध्वे स्थापयेत् स्तम्भं संश्लिष्टचतुरिष्टकम् । सरत्नौषधिभिर्युक्तं वस्त्रपुष्पादिशोभितम् ॥४५॥ उसके ऊपर चार ईंटों से जुड़े हुये स्तम्भ की स्थापना करनी चाहिये। वह स्तम्भ रत्न एवं ओषधियों से युक्त हो एवं वस्त्र तथा पुष्प आदि से अलङ्कृत हो।।४५।। ईशगर्भमिदं प्रोक्तमन्येषां तु प्रवक्ष्यते ।

१०८ मयमतम् इस प्रकार शिवालय के भू-गर्भ विन्यास की विधि का वर्णन किया गया। अब अन्य मन्दिरों के गर्भ-विन्यास का वर्णन किया जा रहा है। ❋ विष्णुगर्भम् ❋ विष्णुधिष्ण्ये च गर्भं स्याद्धैमं चक्रं तु मध्यमे ॥४६॥ शङ्खकार्मुकदण्डं च रुक्ममायसनन्दकम्। धनुः शङ्खं च वामे तु खड्गं दण्डं च दक्षिणे ॥४७॥ प्रमुखे वैनतेयं च स्थापयेद्धेमनिर्मितम्। विष्णुमन्दिर का शिलान्यास—विष्णुदेव के भवन में मध्य भाग में सुवर्णनिर्मित चक्र स्थापित करना चाहिये। शङ्ख, धनुष, दण्ड सुवर्ण-निर्मित एवं लोहे की तलवार होनी चाहिये। धनुष एवं शङ्ख वाम भाग में तथा खड्ग एवं दण्ड दक्षिण भाग में होना चाहिये। सामने सोने का गरुड स्थापित करना चाहिये।॥४६-४७॥ ❋ ब्रह्मगर्भम् ❋ यज्ञोपवीतमोङ्कारं स्वस्तिकाग्निं च हेमजम् ॥४८॥ पद्मं कमण्डलुं चाक्षसूत्रदर्भश्च ताम्रजाः। ब्रह्मासनपदे मध्येऽम्बुरुहं स्थाप्यमेव च ॥४९॥ ब्रह्मा के मन्दिर का शिलान्यास—ब्रह्मा के मन्दिर में जनेऊ, ॐकार, स्वस्तिक एवं अग्नि सुवर्णनिर्मित स्थापित करना चाहिये। पद्म, कमण्डलु, अक्षमाला एवं कुश ताम्रनिर्मित रखना चाहिये। ब्रह्मा के स्थान के मध्य में कमल स्थापित होना चाहिये। तस्मिन्मध्ये तदोङ्कारं यज्ञसूत्रावृतं तु तत्। स्वस्तिकानि चतुर्दिक्षु वामे स्थाप्यं कमण्डलु ॥५०॥ उसके मध्य में जनेऊ से लपेटा हुआ ॐकार, चारो दिशाओं में स्वस्तिक तथा वाम भाग में कमण्डलु स्थापित करना चाहिये।॥५०॥ कुशाक्षमालां वामे तु पुरस्तीक्ष्णानलं क्षिपेत्। ब्रह्मगर्भमिदं प्रोक्तं ब्रह्मस्थाने प्रतिष्ठितम् ॥५१॥ वाम भाग में कुश एवं अक्षमाला तथा सम्मुख तीक्ष्ण अग्नि स्थापित करनी चाहिये। ब्रह्मस्थान में स्थापित होने वाले ब्रह्मगर्भ का वर्णन इस प्रकार किया गया।॥५१॥ ❋ षण्मुखगर्भम् ❋ स्वस्तिकं चाक्षमालां च शक्तिं चक्रञ्च कुक्कुटम्। मयूरं चैव सौवर्णमयसा शक्तिमध्यमे ॥५२॥

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १०९ वामे च कुक्कुटं दद्याद् दक्षिणे च मयूरकम् । अक्षसूत्रं पुरः स्थाप्यं गर्भं षण्मुखसद्मनि ॥५३॥ कार्त्तिकेय-मन्दिर का शिलान्यास—षण्मुख ( कार्त्तिकेय ) के मन्दिर के गर्भ में सुवर्णमय स्वस्तिक, अक्षमाला, शक्ति, चक्र, कुक्कुट ( मुर्गा ) एवं मोर तथा लोहे की शक्ति मध्य भाग में स्थापित करनी चाहिये। वाम भाग में कुक्कुट एवं दाहिने भाग में मोर रखना चाहिये। अक्षमाला को सम्मुख स्थापित करना चाहिये।।५२-५३।। अम्बुजं चाङ्कुशं पाशं सिंहं सवितृधामके । वज्रेभं नन्दकं चक्रं चामरं धाम्नि वज्रिणः ॥५४॥ अन्य देवों के लिये गर्भव्यास की सामग्री—सवितृ देवता के भवन में कमल, अंकुश, पाश एवं सिंह तथा इन्द्र के भवन में वज्र, गज, तलवार एवं चामर स्थापित करना चाहिये।।५४।। जाम्बूनदमयं मेषं शक्तिं पावकधामनि । अयसा महिषं पाशं हेमजं यमधामनि ॥५५॥ अग्नि के भवन में सुवर्णनिर्मित मेष एवं शक्ति तथा यम के भवन में लोहे का महिष एवं सुवर्णमय पाश स्थापित करना चाहिये।।५५।। अयसा नन्दकं गर्भं निर्ऋतेस्तु विमानके । वरुणे मकरं पाशं लोहजं हेमजं तथा ॥५६॥ निर्ऋति के भवन में लोहे की तलवार तथा वरुण के भवन में लोहे का मकर एवं सुवर्णमय पाश गर्भस्थान में रखना चाहिये।।५६।। वायोः कृष्णमृगं हैमं व्यालं तारापतेः क्षिपेत् । नरवाहे नरः प्रोक्तो मकरो मदनालये ॥५७॥ गर्भव्यास में वायु के भवन में कृष्ण वर्ण का मृग तथा तारापति ( चन्द्रमा ) के भवन में सुवर्णनिर्मित व्याल स्थापित करना चाहिये। कुबेर के भवन में मनुष्य ( की प्रतिमा ) एवं मदन ( कामदेव ) के भवन में मकर स्थापित करना चाहिये।।५७।। टङ्कं दन्ताक्षमाला च विघ्नेशावासगर्भके । ओङ्कारं वक्रदण्डं च सौवर्णं चार्यकस्य तु ॥५८॥ विघ्नेश ( गणेश ) के भवन के गर्भ में कुठारदन्त ( गजदन्त ) एवं अक्षमाला स्थापित करनी चाहिये। आर्यक के भवन में सुवर्णनिर्मित टेढ़ा दण्ड एवं ओम् स्थापित करना चाहिये।।५८।।

११० मयमतम् अश्वत्थं करकं सिंहं छत्रं स्वर्णेन कारयेत् । अश्वत्थः पुरतः स्थाप्यश्छत्रं तस्योपरि स्थितम् ॥५९॥ कुण्डिकापरभागे तु केसरी दक्षिणे भवेत् । सौगते धामके गर्भं श्रीवत्साशोकसिंहकम् ॥६०॥ सुगत के भवन के गर्भन्यास के लिये सोने के पीपल, करक ( कमण्डलु ), सिंह एवं छत्र निर्मित कराना चाहिये। सामने के भाग में अश्वत्थ ( पीपल ) स्थापित करना चाहिये एवं उसके ऊपर छत्र स्थापित करना चाहिये। वाम भाग में कुण्डिका ( कमण्डलु ) एवं दाहिने भाग में केसरी ( सिंह ) तथा गर्भ में श्रीवत्स, अशोक एवं सिंह स्थापित करना चाहिये॥५९-६०॥ कमण्डल्वक्षमाला च शिखिपिच्छं तु हेमजम् । त्रिच्छत्रं करकं तालवृन्तं रुक्ममयं भवेत् ॥६१॥ ( श्रीवत्स, अशोक एवं सिंह के अतिरिक्त ) कमण्डलु, अक्षमाला एवं मोर का पंख सुवर्णमय तथा त्रिच्छत्र, करक एवं तालवृन्त ( ताल का पंखा ) सोने से निर्मित होना चाहिये॥६१॥ वृक्षस्तु पुरतः स्थाप्यश्छत्रं तस्योपरि स्थितम् । पिच्छं दक्षिणभागेऽक्षमाला वामे तु कुण्डिका ॥६२॥ ( जिनमन्दिर में ) वृक्ष को सम्मुख, उसके ऊपर छत्र स्थापित करना चाहिये। मोर-पंख को दाहिने भाग में एवं वामभाग में कुण्डिका ( कमण्डलु ) के साथ अक्षमाला स्थापित करनी चाहिये॥६२॥ श्रीरूपं मध्यमे स्थाप्यं केसरीं तत्र विन्यसेत् । अपरे करकं तालवृन्तं गर्भो जिनालये ॥६३॥ जिन-मन्दिर में श्रीरूप को गर्भ के मध्य में स्थापित करना चाहिये एवं सिंह को भी वहीं स्थापित करना चाहिये। करक एवं तालवृन्त को उसके बायें स्थापित करना चाहिये॥६३॥ शुकं चक्रं च हैमं तु सिंहं शङ्खं च राजतम् । मृगं ताम्रमयञ्चैव कृष्णलोहेन नन्दकम् ॥६४॥ एवं दुर्गाविमाने तु गर्भं कुर्याद् विचक्षणः । खट्वाङ्गं नन्दकं शक्तिं क्षेत्रपालस्य हेमजम् ॥६५॥ बुद्धिमान ( स्थपति ) को दुर्गा-मन्दिर के गर्भ-विन्यास में शुक एवं चक्र सुवर्ण-

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः १११ निर्मित, सिंह एवं शंख रजत-निर्मित, मृग ताम्र-निर्मित तथा तलवार लोहा-निर्मित स्थापित करना चाहिये। क्षेत्रपाल के मन्दिर के गर्भ-विन्यास में सुवर्णनिर्मित खट्वाङ्ग, तलवार एवं शक्ति स्थापित करनी चाहिये।।६४-६५।। पद्मं लक्ष्म्याः सरस्वत्या ओङ्कारं च त्रिवर्णकम्। ध्वाङ्क्षकेतूत्पलं हैमं ज्येष्ठाकोष्ठस्य गर्भके ॥६६॥ सुवर्णपद्म लक्ष्मी-मन्दिर में, तीन वर्ण का ॐकार सरस्वती-मन्दिर में तथा ज्येष्ठा के मन्दिर में सुवर्णनिर्मित काक, केतु एवं कमल गर्भ में स्थापित करना चाहिये।।६६।। कपालशूलघण्टाभिः प्रेतान् कालीगृहे न्यसेत्। हंसोक्षशिखिताक्ष्र्याँश्च सिंहेभप्रेतरूपकान् ॥६७॥ जाम्बूनदमयान् मातृकोष्ठकेषु निधापयेत्। पद्माक्षसूत्रकं दीपं रोहिणीगृहगर्भके ॥६८॥ काली-मन्दिर के गर्भविन्यास में कपाल, शूल एवं घण्टों के साथ प्रेतों को स्थापित करना चाहिये। मातृकाओं के भवन के गर्भ में हंस, वृषभ, मयूर, गरुड़, सिंह, गज एवं प्रेतों की सुवर्ण-प्रतिमायें स्थापित करनी चाहिये। रोहिणी के मन्दिर के गर्भ में पद्म, अक्षसूत्र एवं दीप स्थापित करना चाहिये।।६७-६८।। दर्पणं चाक्षमालां च पार्वतीभवने विदुः। पद्माक्षसूत्रकं पूर्णकुम्भं मोहिनीधामनि ॥६९॥ पार्वती-मन्दिर के गर्भ में दर्पण एवं अक्षमाला तथा मोहिनी-मन्दिर में पद्म, अक्षमाला एवं पूर्ण-कुम्भ स्थापित करना चाहिये।।६९।। छत्रध्वजपताकाश्च सचिह्नैः सह वाहनैः। अनुक्तानां च देवानां देवीनां गर्भमिष्यते ॥७०॥ जिन देवी एवं देवों का उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, उनके मन्दिर के गर्भ में उनके विशिष्ट चिह्न एवं वाहन के साथ छत्र, ध्वज एवं पताका स्थापित करनी चाहिये।।७०।। ✵ मानुषहर्म्यगर्भकम् ✵ द्विजातीनां तु वर्णानां जातिगर्भो विधीयते। करकं दन्तकाष्ठं च शुल्बं हेममयं भवेत् ॥७१॥ मनुष्य के भवन का शिलान्यास—द्विजन्मा वर्ण वालों के भवन के गर्भ में

११२ मयमतम् जिन वस्तुओं का विन्यास होता है, उनका वर्णन किया जा रहा है। उनमें करक तथा दन्तकाष्ठ ताम्रमय एवं सुवर्णमय होता है।।७१।। यज्ञोपवीतं यज्ञाग्निं यज्ञभाण्डं च राजतम्। यज्ञोपवीतमध्यस्थं यज्ञभाण्डं च दक्षिणे ॥७२॥ यज्ञोपवीत ( जनेऊ ), यज्ञाग्नि एवं यज्ञपात्र रजत-निर्मित होते हैं। यज्ञोपवीत गर्भ के मध्य में तथा यज्ञपात्र उसके दाहिने होना चाहिये।।७२।। वामे तु करकं काष्ठमनलं पुरतो भवेत्। विप्रगर्भमिदं प्रोक्तं स्वस्तिकानि चतुर्दिशि ॥७३॥ यज्ञोपवीत के वाम भाग में करक तथा दन्त-काष्ठ एवं यज्ञाग्नि सम्मुख होना चाहिये। चारो दिशाओं में स्वस्तिक होने चाहिये। ब्राह्मण के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार वर्णित है।।७३।। मध्ये हेममयं चक्रं वामे शङ्खं च राजतम्। कार्मुकं ताम्रजं वामे दण्डो रुक्मेण दक्षिणे ॥७४॥ ( क्षत्रिय के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार होना चाहिये— ) मध्य में सुवर्णमय चक्र, उसके वाम भाग में रजत-निर्मित शंख एवं ताम्रनिर्मित धनुष होना चाहिये। चक्र के दक्षिण भाग में सोने का दण्ड होना चाहिये।।७४।। खड्गं चायसमेव स्याच्चतुर्नागांश्चतुर्दिशि । हैममायसकं ताम्रं रजतं क्रमशो न्यसेत् ॥७५॥ दक्षिण भाग में ही लोहे का खड्ग तथा चारो दिशाओं में चार गज होने चाहिये। ये क्रमशः सुवर्ण, लोहा, ताँबा एवं रजत-निर्मित हों।।७५।। मध्ये श्रीरूपकं हैमं स्वस्तिकानि चतुर्दिशि । छत्रध्वजपताकाश्च दण्डं वै शासनात्मकम् ॥७६॥ मध्य भाग में सुवर्णनिर्मित श्रीरूपक एवं चारो दिशाओं में स्वस्तिक तथा छत्र, ध्वज, पताका एवं दण्ड निश्चित रूप से होना चाहिये। यह गर्भ-न्यास राजा के गृह के लिये होता है।।७६।। राजद्वारे भवेद् गर्भमन्येषां तु यथार्हकम्। वार्ष्णेयकानां गर्भं चेद् विजयद्वारदक्षिणे ॥७७॥ ये सभी गर्भ-न्यास राजभवन के द्वार के स्थान पर होने चाहिये। अन्य क्षत्रियों के गृहों में उचित स्थान पर होना चाहिये। यदि राजा 'वार्ष्णेयक' श्रेणी का हो तो यह गर्भ-न्यास विजयद्वार के दक्षिण ओर होना चाहिये।।७७।।

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः ११३ अयसा हलजिह्वां च शङ्खं ताम्रकुलीरकम्। पञ्चायुधं सीसमाषं हयं वृषगजौ हरिम् ॥७८॥ ( वैश्य-गृहों का गर्भ-न्यास इस प्रकार होना चाहिये— ) लोहे से निर्मित हल का अग्र भाग ( जिह्वा ) एवं शंख तथा ताँबे से निर्मित केकड़ा, ( विष्णु के ) पाँच अस्त्र एवं उड़द सीसा ( लेड ) से निर्मित होना चाहिये। इनके अतिरिक्त अश्व, वृष, गज एवं सिंह होना चाहिये॥७८॥ अर्काग्निवरुणेन्दूनां स्थाने सम्यङ् निवेशयेत्। चत्वारो धेनुकाः श्वेतनिर्मिताश्च चतुर्दिशि ॥७९॥ गोपुङ्गवं च पुरतो वैश्यानां प्रविधीयते। इन्हें सूर्य, अग्नि, वरुण एवं सोम के स्थान पर भली-भाँति स्थापित करना चाहिये। श्वेत वर्ण ( रजत ) से निर्मित चार गायों को चारो दिशाओं में स्थापित करना चाहिये। वृष को वैश्यों के भवन के गर्भ में सामने रखना चाहिये॥७९॥ बीजपात्रं हलं हैमं ताम्रजं युगमिष्यते ॥८०॥ रजतेन पशुं विद्याच्चतुर्दिक्षु विनिक्षिपेत्। मध्ये गोपुङ्गवं चैव तन्निरीक्ष्य युगं पुनः ॥८१॥ ( शूद्र के गृह का गर्भ-विन्यास इस प्रकार वर्णित है— ) बीजपात्र, सोने का हल एवं ताँबे का युग ( हल का जुआ ) होना चाहिये। चारो दिशाओं में चाँदी से निर्मित पशु ( गायं ) रखना चाहिये एवं मध्य में वृष होना चाहिये, जिसके सामने जुआ रक्खा होना चाहिये॥८०-८१॥ हलं दक्षिणभागे तु वामांशे बीजपात्रकम्। बीजं हिरण्मयं शूद्रगर्भं वैश्ये च सम्मतम् ॥८२॥ वृष के दाहिने भाग में हल एवं बाँयें भाग में बीज का पात्र होना चाहिये। बीजों को सुवर्ण-निर्मित होना चाहिये। शेष गर्भ-न्यास शूद्रों के भवन के गर्भ में उसी प्रकार होना चाहिये, जिस प्रकार वैश्यों के गृह में वर्णित हैं॥८२॥ गृहाणां गृहगर्भं च जातिगर्भं विमिश्रितम्। अनेकभूमियुक्तानि यानि वासगृहाणि च ॥८३॥ सामान्य भवनों के गृहों के गर्भ-न्यास एवं जाति-विशेष के गृहों के गर्भ-न्यास को उस भवन में मिश्रित कर दिया जाता है, जो अनेक तल वाले होते हैं॥८३॥ पुष्पदन्ते च भल्लाटे महेन्द्रे च गृहक्षते। दक्षिणे नेत्रभित्तौ तु सौम्यादौ तु चतुर्गृहे ॥८४॥ मय०-८

११४ मयमतम् उत्तर आदि चारो दिशाओं के मुख वाले गृहों में भिति के नेत्र ( गृह का द्वार ) के दाहिने भाग में पुष्पदन्त ( पश्चिम दिशा ), भल्लाट ( उत्तर दिशा ), महेन्द्र ( पूर्व दिशा ) एवं गृहक्षत ( दक्षिण दिशा ) के पद पर गर्भ-न्यास करना चाहिये ।।८४।। द्वारप्रदक्षिणे स्तम्भे योगे वाऽपि विधीयते । स्थाली तदुपधानं च दार्विकं तण्डुलं खजम् ।।८५।। गलक्यं दन्तकाष्ठाग्निं कृष्णां लोहं महानसे । रसोई के गर्भ-न्यास में द्वार के दाहिने भाग में अथवा स्तम्भ के नीचे स्थाली ( पकाने का पात्र ), उसका ढक्कन, करछुल, चावल, मथानी, चलनी, दाँत साफ करने का काष्ठ ( दतुअन या दातौन ) तथा अग्नि की लौह-निर्मित प्रतिमा रखनी चाहिये ।।८५।। दक्षिणे भवने गर्भः कुम्भः शाल्युदपूरितः ।।८६।। धनसद्मनि गर्भस्तु सार्गलं कुञ्चिकं भवेत् । पर्यङ्कदीपशयनं गर्भं विद्यात् सुखालये ।।८७।। रसोई के दाहिनी ओर के कक्ष में शालि ( चावल ) से भरा कुम्भ गर्भ में स्थापित करना चाहिये। धन-कक्ष के गर्भ-न्यास में चाभी एवं अर्गला होनी चाहिये। सुखालय ( विश्राम-गृह ) के गर्भ में पलंग, दीपक एवं शयन ( आसन ) स्थापित करना चाहिये। येन यत् कर्म निष्पाद्यं तेन तद्गृहगर्भकम् । यानि यस्य स्वचिह्नानि तानि तस्य निधापयेत् ।।८८।। जिन सामाग्रियों से जिन कार्यों को सम्पन्न किया जाता है, उन सामग्रियों को उनके कक्षों के गर्भ में स्थापित करना चाहिये। जो जिनके प्रतीक हों, उन चिह्नों को उसके गर्भ में स्थापित करना चाहिये ।।८८।। सभाप्रपामण्डपेषु कर्णपादे प्रदक्षिणे । द्वितीयस्तम्भके द्वारदक्षिणाङ्घ्रौ तु वा न्यसेत् ।।८९।। सभागार, प्रपा ( प्याऊ ) एवं मण्डपों में दक्षिणी कोने के स्तम्भ अथवा दूसरे स्तम्भ या द्वार के दाहिने स्तम्भ के नीचे गर्भ-स्थापन करना चाहिये ।।८९।। अयोमयगजो गर्भः कृष्णलोहेन कोद्रवः । लक्ष्मीं सरस्वतीं हेमां पात्रमध्ये तु विन्यसेत् ।।९०।। उपर्युक्त भवन-निर्माण में गर्भ-विन्यास हेतु लोहे का गज, कोदो ( अन्न-विशेष ), सुवर्ण-निर्मित लक्ष्मी एवं सरस्वती को पात्र के मध्य में रखना चाहिये ।।९०।। गर्भो नाट्यसभायां च प्रक्षिपेत् कुटिकामुखे । मण्डितस्तम्भमूले वाऽप्युभयोरपि चेष्यते ।।९१।।