भारतकोश
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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

६८ मयमतम् व्यसनं ग्रामविनाशो नृपभङ्गो भवति मरणं च। देवालयान्तरापणशून्यत्वं शोध्यसञ्चयं चापि ॥१००॥ मार्गेऽशुद्धक्षेपणमीदृग् ग्रामस्य शून्यतादायि । उपर्युक्त का दुष्परिणाम ग्राम का विनाश, राजा का भङ्ग (हानि) एवं मृत्यु होता है। देवालय एवं हाट का रिक्त होना, कूड़े का संग्रह तथा मार्ग में अशुद्ध वस्तुओं (कूड़े आदि) का फेंका जाना ग्राम को शून्य कर देता है॥१००॥ ☀ गर्भविन्यासः ☀ ग्रामादीनां च सर्वेषां गर्भविन्यासमुच्यते ॥१०१॥ शिलान्यास—सभी ग्रामादिकों के गर्भ-विन्यास का वर्णन किया जाता है॥१०१॥ सगर्भं सर्वसम्पत्त्यै विगर्भं सर्वनाशनम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गर्भं सम्यग्विनिक्षिपेत् ॥१०२॥ (ग्रामादि का) गर्भयुक्त होना सभी प्रकार की सम्पत्तियों का एवं गर्भहीन होना सभी प्रकार के विनाश का कारण होता है

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६९ उन्नतं तावदेवं स्याद्वृत्तं स्याच्चतुरस्रकम् । सपञ्चपञ्चकोष्ठं वा नवकोष्ठकमेव वा ॥१०६॥ ताम्रपात्र की ऊँचाई उसकी चौड़ाई के समान होनी चाहिये। उसमें पच्चीस अथवा नौ कोष्ठ होने चाहिये ।।१०६।। उपपीठपदे देवास्तस्मिन् पात्रे तु सम्मताः । रजतेन वृषः सूर्ये वज्री हाटकनिर्मितः ॥१०७॥ उपपीठ पद से युक्त (पच्चीस कोष्ठ वाले) उस पात्र में वास्तुदेवों को स्थान देना चाहिये। सूर्य के कोष्ठ में रजतनिर्मित वृष एवं सुवर्णनिर्मित इन्द्र को स्थापित करना चाहिये ।।१०७।। यमे तु यमराजश्च शुल्बेनायसवारणः । हैमः सिंहस्तु रूप्येण वरुणे सजलाधिपः ॥१०८॥ यम के पद पर ताम्रनिर्मित यमराज, लौहनिर्मित सिंह एवं रजतनिर्मित वरुण को स्थापित करना चाहिये ।।१०८।। वाजी श्वेतमयः सोमे राजतो द्विजराजकः । ईशे वैकृन्तमनले त्रपु सीसं तु नैर्ऋते ॥१०९॥ सोम के पद पर श्वेत वर्ण का (रजतमय) अश्व तथा रजतनिर्मित गज रखना चाहिये। ईश के पद पर पारा, अग्नि पर टिन, निर्ऋति पर सीसा रखना चाहिये ।।१०९।। स्वर्णं समीरणे जातिहिङ्गुल्यं तु जयन्तके । हरितालं भृशे भागे वितथे तु मनःशिला ॥११०॥ समीरण के पद पर सुवर्ण, जयन्त पर सिन्दूर, भृश पर हरिताल तथा वितथ पर मनःशिला (मैनसिल) रखना चाहिये ।।११०।। माक्षिकं भृङ्गराजे स्याद्राजावर्तं सुकन्धरे । गैरिकं शोषभागे तु गणमुख्येऽञ्जनं भवेत् ॥१११॥ भृङ्गराज पर माक्षिक (एक खनिज पदार्थ), सुकन्धर पर लाजावर्त, शोष पर गैरिक (गेरु) तथा गणमुख्य पर अञ्जन रखना चाहिये ।।१११।। अदितौ दरदं विद्यादेवमेव न्यसेत् क्रमात् । चतुष्पदे च लोकेशाः स्थाप्याश्चाभ्यन्तराननाः ॥११२॥ अदिति पर रक्त वर्ण का ताम्र रखना चाहिये। उपर्युक्त सभी को भली-भाँति जान कर क्रमानुसार रखना चाहिये। चतुष्पदों पर लोकनाथों को इस प्रकार स्थापित करना

७० मयमतम् चाहिये, जिससे उनका मुख केन्द्र की ओर रहे।।११२।। षड्भिः पञ्चचतुस्त्रिद्विमात्रे बिम्बोदयं भवेत्। तदर्धं वाहनोत्सेधं स्थानकासनमेव वा ।।११३।। इन देवों की प्रतिमा की ऊँचाई छः, पाँच, चार, तीन या दो अङ्गल होनी चाहिये एवं उनके वाहनों की ऊँचाई पूर्वोक्त माप की आधी होनी चाहिये। प्रतिमायें स्थानक मुद्रा ( खड़ी ) अथवा आसन मुद्रा ( बैठी ) में होनी चाहिये ।।११३।। मुक्तापवत्से मरीचौ विद्रुमं सवितर्यथ। पुष्परागं च वैडूर्यं विवस्वति विनिक्षिपेत् ।।११४।। आपवत्स पर मोती, मरीचि पर मूँगा, सविता पर पुष्पराग ( पोखराज ) तथा विवस्वान् पर वैदूर्य मणि रखना चाहिये।।११४।। वज्रमिन्द्रजये विद्यादिन्द्रनीलं तु मित्रके। रुद्रराजे महानीलं मरकतं तु महीधरे ।।११५।। इन्द्रजय पर हीरा, मित्रक पर इन्द्रनील, रुद्रराज पर महानील तथा महीधर पर मरकत ( पन्ना ) रखना चाहिये।।११५।। मध्यमे पद्मरागं तु विन्यसेद् गर्भभाजने। रत्नानि धातवश्चैव स्वस्वविस्तारभाजने ।।११६।। पात्र के मध्य में पद्मराग ( रुबी ) रखना चाहिये। रत्न एवं धातुओं को पात्र में उनके उचित स्थान पर रखना चाहिये।।११६।। तद्देवस्थानभावज्ञैरानीतानि निधापयेत्। हेमायस्ताप्ररूप्यैश्च स्वस्तिकानि चतुर्दिशि ।।११७।। उन देवों के स्थान एवं स्थिति को विधिपूर्वक ज्ञात कर रत्नादि को रखना चाहिये। चारो दिशाओं में सुवर्ण, आयस ( लौह ), ताँबे एवं चाँदी के स्वस्तिक रखने चाहिये।।११७।। ब्रह्मस्थानाद् बहिष्ठानि पूर्वादौ स्थापयेत्क्रमात्। स्वर्णेन शालिं रूप्येण व्रीहिं चायसकोद्रवम् ।।११८।। ब्रह्मस्थान के बाहर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशा में सुवर्ण के साथ शालिधान्य, चाँदी के साथ व्रीहि, अयस के साथ कोद्रव ( कोदो ) रखना चाहिये।।११८।। त्रपुकङ्कं सीसमाषं तिलं वैकृन्तकल्पितम्। मुद्गं चायोमयं ताम्रं कुलत्थमिति लोहजान् ।।११९।।

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ७१ टिन के साथ कङ्गु धान्य, सीसा के साथ माष (उड़द), तिल पारे के साथ, मूँग को अयस (लोह) के साथ तथा कुलत्थ को ताम्र धातु के साथ रखना चाहिये।।११९।। भाजनाय बलिं दत्त्वा पश्चात् सर्वं निधापयेत् । अङ्गुलाधिकविस्तीर्णमायामं द्वादशाङ्गुलम् ।।१२०।। प्रथमतः पात्र के लिये बलि (उपर्युक्त वर्णित पदार्थ) प्रदान करना चाहिये। इसके पश्चात् सभी पदार्थों को पात्र में रख देना चाहिये। (पात्र को ढकने के लिये) एक अङ्गुल से अधिक चौड़ा तथा बारह अङ्गुल लम्बा पत्र लेना चाहिये।।१२०।। पञ्चाङ्गुलेन वृद्धिः स्याद्द्वात्रिंशत्प्रमाणतः । खादिरं चेन्द्रकीलं स्यात्तस्याग्रं चित्रवृत्तकम् ।।१२१।। बारह अङ्गुल से लेकर पाँच-पाँच अङ्गुल के वृद्धि-मान से बत्तीस अङ्गुल तक (पत्र) का प्रमाण हो सकता है। यह इन्द्रकीलसंज्ञक पत्र खदिर के काष्ठ का गोलाकार निर्मित होना चाहिये।।१२१।। भाजनोपरि तत्स्थाप्यं गर्भन्यासविचक्षणैः । स्थानीये द्रोणमुखे खर्वटे प्रतिनागरे ।।१२२।। गर्भ-विन्यास के ज्ञाता को इस पत्र को पात्र के ऊपर रखना चाहिये। यह गर्भ- विन्यास स्थानीय, द्रोणमुख तथा खर्वट एवं प्रत्येक प्रकार के नगर में करना चाहिये। ग्रामे च निगमे खेटे पत्तने कोत्मकोलके । ब्रह्मण्यार्यर्कभागेऽपि विवस्वति यमे तथा ।।१२३।। मित्रे च वरुणे चैव सोमे च पृथिवीधरे । द्वारदक्षिणदेशे वा ह्येतेषां गर्भ इष्यते ।।१२४।। (उपर्युक्त के अतिरिक्त) ग्राम, निगम, खेट, पत्तन तथा कोत्मकोलक आदि वसति- विन्यासों में गर्भ-विन्यास ब्रह्मा, आर्य, अर्क, विवस्वान्, यम, मित्र, वरुण, सोम एवं पृथिवीधर के भाग में या द्वार के दक्षिण भाग में करना चाहिये।।१२३-१२४।। पुष्पदन्ते च भल्लाटे महेन्द्रे च गृहक्षते । विष्णुस्थाने श्रियः स्थाने स्कन्दस्थानेऽथवा पुनः ।।१२५।। स्थापयेद् ग्रामरक्षार्थं सर्वकामाभिवृद्धये । गर्भमादौ विनिक्षिप्य बिम्बं तदुपरि न्यसेत् ।।१२६।। (द्वार के दक्षिण भाग में) पुष्पदन्त, भल्लाट, महेन्द्र एवं गृहक्षत के पद पर अथवा विष्णु के स्थान (मन्दिर), लक्ष्मी के स्थान या स्कन्द के स्थान में ग्राम की

७२ मयमतम् रक्षा के लिये एवं सभी प्रकार की कामनाओं की वृद्धि के लिये गर्भ-विन्यास करना चाहिये। प्रथमतः ( गर्त में ) गर्भ-विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके ऊपर मूर्तियों को स्थापित करना चाहिये।। १२५-१२६।। शिलेष्टकचिते खाते पुरुषाञ्जलिमात्रके। अनुक्तानां च सर्वेषामजभागादिषु न्यसेत् ।।१२७।। गर्भ-विन्यास वाले क्षेत्र को ( गर्त को ) शिलाओं एवं इष्टकाओं से निर्मित करना चाहिये। इसका माप पुरुष का अञ्जलिप्रमाण रखना चाहिये। अवर्णित सभी पदार्थों को ब्रह्म आदि के भाग में रखना चाहिये ( अवर्णित पदार्थों का वर्णन 'गर्भिविन्यास' अध्याय में प्राप्त होता है ) ।।१२७।। सुरक्षं तु यथागर्भं स्थपतिः स्थापयेत् स्थिरम्। अत्रानुक्तं तु तत्सर्वं द्रष्टव्यं गर्भलक्षणे ।।१२८।। जिस विधि से गर्भिविन्यास सुरक्षित एवं स्थिर रहे ( तथा भवननिर्माण भी सुरक्षित एवं स्थिर रहे ), उसी रीति से स्थपति को गर्भ स्थापित करना चाहिये। यहाँ जिनका वर्णन नहीं किया गया है, उन सभी का वर्णन गर्भलक्षण ( गर्भिविन्यास, अध्याय- १२ ) में किया गया है।।१२८।। एवं प्रोक्ता भूमितिर्देवतानां वर्णानाञ्चाप्यत्र जात्यन्तराणाम्। ग्रामादीनां मानविन्यासमार्गं सालङ्कारं चारु संक्षिप्य तन्त्रात् ।।१२९।। इस प्रकार देवों के अनुरूप भूमि का माप ( वास्तुमण्डल ), वर्ण एवं अन्य जातियों के अनुकूल माप, ग्रामादिकों का प्रमाण, मार्गयोजना आदि को तन्त्रों से अलङ्कार- सहित, सुन्दर ढंग से एवं संक्षेप में लिया गया है।।१२९।। दद्यान्नृपः स्थपतिकादिचतुष्टयेभ्यो मानादिकर्मनिपुणेभ्य इडाञ्च गाञ्च। नित्यं यथा जगति वित्तमनेकवस्तु- न्याचन्द्रतारमधिवासभुवं मुदा सः ।।१३०।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे ग्रामविन्यासो नाम नवमोऽध्यायः

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः '७३ राजा को मापन आदि कर्म में निपुण चारो स्थपतियों को भूमि एवं गायें प्रदान करनी चाहिये; जो व्यक्ति इस प्रकार करता है, उसे संसार में चन्द्रमा एवं तारों की स्थितिपर्यन्त सर्वदा धन एवं अनेक ( समृद्धिदायक ) वस्तुओं की प्राप्ति होती रहती है एवं वह सर्वदा प्रसन्न रहता है।।१३०।।

अथ दशमोऽध्यायः ( नगरविधानम् ) नगरादीनां मानं विन्यासञ्च क्रमादहं वक्ष्ये । नगर-योजना—मैं नगर आदि के प्रमाण एवं विन्यास का क्रमानुसार वर्णन करता हूँ। ✵ नगरमानम् ✵ आद्यं धनुषां त्रिशतं तस्माच्छतदण्डवर्धनादुपरि ॥१॥ साष्टकसप्ततिभेदाश्चाष्टसहस्रान्तकं यावत् । नगराणां विपुलं हि प्रोक्तं पूर्वोक्तमानेन ॥२॥ नगरों का प्रमाण—नगर का प्रमाण तीन सौ धनुष से प्रारम्भ होकर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये आठ हजार दण्ड तक प्राप्त होता है। इसके अठहत्तर भेद बनते हैं। इस प्रकार नगरों के विस्तार का प्रमाण प्राप्त होता है।।१-२।। शतदण्डादिदशवृद्ध्या त्रिःसप्तत्रिशतदण्डान्तम् । क्षुद्राणामिदमुदितं नगराणामेव सर्वेषाम् ॥३॥ एक सौ दण्ड से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ दण्ड- पर्यन्त सभी क्षुद्र नगरों के इक्कीस विस्तार-प्रमाण प्राप्त होते हैं।।३।। उत्कृष्टपुरपरिधिर्नृपतेर्यष्टिद्विरष्टसाहस्रैः । चातुःसहस्रकान्तं पञ्चशतोनाद्धि पञ्चपञ्चधा मानम् ॥४॥ राजाओं के उत्तम पुरों की परिधि का प्रमाण सोलह हजार यष्टिप्रमाण से प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड कम करते हुये चार हजार पर्यन्त कहा गया है। इस प्रकार इनके पच्चीस प्रमाणभेद बनते हैं।।४।। त्रिशतादिचतुःशतकं यावद्वृद्ध्या तु विंशतिभिः । षड्विधमुक्तं खेटं श्रेष्ठे मध्ये परे विपुलम् ॥५॥ तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर बीस-बीस दण्ड की वृद्धि करते समय चार सौ दण्डपर्यन्त खेट के छः प्रकार के भेद वर्णित हैं। इनमें दो श्रेष्ठ, दो मध्यम एवं दो कनिष्ठ प्रकार के खेट होते हैं।।५।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७५ तस्मात् त्रिराष्टवृद्ध्या द्रोणमुखे पञ्चधा मानम् । षण्णवतिचतुःशतकं यावत्तावत्तु विस्तारम् ॥१६॥ उससे ( चार सौ दण्ड से ) चौबीस-चौबीस दण्ड की वृद्धि करते हुये चार सौ छियानबे दण्डपर्यन्त द्रोणमुख वास्तु के पाँच प्रकार बनते हैं। ये इनके विस्तारमान कहे गये हैं।।१६।। द्विशतादिचतुःशतकं यावत्पञ्चाशदभिवृद्ध्या । पञ्चप्रमाणमेवं खर्वटविस्तार उद्दिष्टः ॥१७॥ दो सौ दण्ड से प्रारम्भ करते हुये पचास-पचास दण्ड की क्रमशः वृद्धि चार सौ दण्डपर्यन्त की जाती है। इस प्रकार खर्वट के विस्तार के पाँच प्रमाणभेद प्राप्त होते हैं।।१७।। द्विशतादिपङ्क्तिवृद्ध्या चत्वारिंशत्त्रिशतदण्डं स्यात् । यावन्निगमे विपुलाः प्रोक्तास्त्रिःपञ्चभेदाश्च ॥१८॥ दो सौ से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ चालीस दण्डपर्यन्त निगम के विस्तार का मान प्राप्त होता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पन्द्रह भेद बनते हैं।।१८।। शतदण्डे शतवृद्ध्या पञ्चशतं यावदुद्दिष्टम् । स्यात् कोत्मकोलकानां विपुलं पञ्चैव भेदेन ॥१९॥ शत दण्ड से प्रारम्भ कर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ पर्यन्त कोत्मकोलक का विस्तार रखा जाता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पाँच भेद होते हैं।।१९।। तावन्मानं प्रोक्तं पुरविपुले सूरिभिः प्राज्ञैः । यावत्पञ्चशतान्तं त्रिशतादारभ्य सप्तधा मानम् ॥ १२०॥ पञ्चाशद्धनुवृद्ध्या विपुलं कथितं विडम्बस्य । प्रागुपदिष्टं मानं ह्येतन्मानं तु वै तेषाम् ॥१२१॥ विद्वान् मनीषियों ने पुरों के विस्तार के प्रमाणों का इस प्रकार वर्णन किया है। विडम्ब का विस्तार-मान तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर पचास-पचास दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ दण्डपर्यन्त होता है। इसके प्रमाण की दृष्टि से सात भेद बनते हैं। पूर्ववर्णित मान ही इनका ( समानुपातिक ) मान होता है।।१२०-१२१।। द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् । विपुले तु षडष्टांशे भागेनैकेन वायतं पुरतः ॥१२२॥

७६ मयमतम् इन पुरादिकों की लम्बाई इनकी चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी अथवा चतुर्थांश अधिक होती है। अथवा चौड़ाई का षष्ठांश या अष्टमांश अधिक लम्बाई रखनी चाहिये।।१२।। ✺ वप्रविधानम् ✺ चतुरस्रमायतास्रं वृत्तं वृत्तायतं च पुनः। स्याद् गोलवृत्तमेवं वप्राकारास्तु पञ्चैव ।।१३।। प्राकार-योजना—नगर का प्राकारमण्डल ( चारदिवारी ) पाँच प्रकार की होती है—चौकोर, आयताकार, वृत्ताकार, वृत्तायताकार ( लम्बाई लिये वृत्ताकार ) तथा गोलवृत्ताकार।।१३।। पङ्क्त्यष्टसप्तपञ्चकचतुरंशैस्तत्कृते विपुले। मुनिरसशरयुगशिखिभिर्भागैर्वप्रावधिः प्रोक्तः ।।१४।। प्राकार-मण्डल की लम्बाई दश, आठ, सात, पाँच एवं चार तथा चौड़ाई सात, छः, पाँच, चार एवं तीन रखनी चाहिये।।१४।। द्वित्रिचतुर्हस्तं स्याद्विपुलं सालस्य तुङ्गे तु। सप्तदशैकादशभिर्हस्तैरग्रं तु त्र्यंशोनम् ।।१५।। परितः परिखा बाह्येऽबाह्ये देवालयादीनि। वप्र के मूल का विस्तार दो, तीन या चार हस्त तथा ऊँचाई सात, दश या ग्यारह हस्त रखना चाहिये। इसके ऊर्ध्व भाग का विस्तार मूल से तीन भाग कम होना चाहिये। देवालय आदि के बाहर एवं भीतर परिखा ( जलयुक्त खाई ) होनी चाहिये।।१५।। ✺ वर्ज्यस्थानानि ✺ पेचकभागाद्यासनभागान्तं चण्डितं प्रोक्तम् ।।१६।। सूत्रादीन्यथ विषमस्थानानि च वर्जयेन्मतिमान्। त्याज्य स्थान—पेचक वास्तु-विन्यास ( चार पद वास्तु ) या आसन वास्तु- विन्यास ( एक सौ पद वास्तु ) अथवा इन दोनों के मध्य आने वाले वास्तु-विन्यासों में से किसी का प्रयोग किया जा सकता है। बुद्धिमान व्यक्ति को निर्माण करते समय वास्तु के सूत्रादिकों एवं विषम स्थलों का परित्याग करना चाहिये।।१६।। ✺ मार्गाः ✺ प्रागुदगग्रं मार्गं तत्र यथेष्टं न्यसेद्विधिना ।।१७।। वहाँ मार्ग की योजना इच्छानुसार विधिपूर्वक पूर्व तथा उत्तर से प्रारम्भ करते हुये करनी चाहिये।।१७।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७७ दण्डादिसप्तदण्डं यावद्दण्डार्धवॄद्ध्या तु। मार्गविशालाश्चैते त्रयोदशभेदाः समुद्दिष्टाः ॥१८॥ मार्गों का विस्तार एक दण्ड से प्रारम्भ कर आधा-आधा दण्ड बढ़ाते हुये सात दण्डपर्यन्त रखना चाहिये। इस प्रकार विस्तार की दृष्टि से मार्ग के तेरह भेद कहे गये हैं॥१८॥ ❊ राजधानी ❊ राष्ट्रस्य मध्यभागे सज्जनबहुले नदीसमीपे च। नगरं केवलमथवा राजगृहोपेतराजधानी वा ॥१९॥ राष्ट्र (राज्य) के मध्य भाग में, नदी के निकट, श्रेष्ठ लोगों की जनसंख्या जहाँ अधिक हो, ऐसा वसति-विन्यास केवल नगर होता है। उस नगर में यदि राजभवन हो तो उसे राजधानी कहते हैं॥१९॥ दिक्षु चतुर्द्वारयुतं गोपुरयुक्तं तु सालाढ्यम्। क्रयविक्रयकैर्युक्तं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥२०॥ चारो दिशाओं में चार द्वार से युक्त, द्वारों पर शालयुक्त गोपुर, क्रय-विक्रय के स्थानों (बाजार) से युक्त एवं सभी वर्णों के आवास से युक्त स्थान (नगर होता है)॥२०॥ सर्वसुरालयसहितं नगरमिदं केवलं प्रोक्तम्। प्रत्यगुदग्दिशि गहना परितः साला बहिः सपांसुचया ॥२१॥ सभी देवों के मन्दिर से युक्त स्थान को केवल नगर कहा गया है। (राजधानी के) पूर्व एवं उत्तर दिशा में गहरा होता है तथा बाहर चारो ओर गीली मिट्टी से निर्मित प्राकार होता है॥२१॥ परितः परिखा बाह्ये शिबिरयुतानेकमुखरक्षा। पूर्वायां दक्षिणतश्चाभिमुखा राजबलयुक्ता ॥२२॥ प्राकार-मण्डल के बाहर चारो ओर परिखा होती है। नगर (राजधानी) के रक्षार्थ शिविर होता है, जहाँ से प्रत्येक दिशा पर दृष्टि रक्खी जाती है। राज्य के प्रहरी सैनिक पूर्व एवं दक्षिण दिशा में मुख करके पहरा देते हैं॥२२॥ उन्नतगोपुरयुक्ता नानाविधमालिकोपेता। सर्वसुरालयसहिता नानागणिकान्विता बहुद्याना ॥२३॥ नगर में ऊँचे-ऊँचे गोपुर (प्रवेशद्वार) होते हैं, जिनमें अनेक मालिकायें होती हैं।

७८ मयमतम् उसमें सभी देवों के मन्दिर, नाना प्रकार की गणिकायें एवं बहुत से उद्यान होते हैं।।२३।। हस्त्यश्वरथपदातिबहुमुख्या सर्वजनयुक्ता। द्वारोपद्वारयुताभ्यन्तरतोऽनेकजनवासा ॥२४॥ यहाँ गज, अश्व, रथ एवं पैदल सैनिक होते हैं। सभी प्रकार के एवं सभी वर्ण के लोग निवास करते हैं। इस नगर में द्वार एवं उपद्वार (छोटे प्रवेशद्वार ) होते हैं। नगर के भीतर अनेक प्रकार के जनावास होते हैं।।२४।। या नृपवेश्मसमेता सा कथिता राजधानीति । काननवनदेशे वा सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥२५॥ क्रयविक्रयकैर्युक्तं पुरमुदितं यत्तदेव नगरमिति । इस प्रकार का राजभवन से युक्त नगर राजधानी कहलाता है। जो वन-प्रदेश में स्थित होता है, जहाँ सभी प्रकार के लोग बसते हैं एवं क्रय-विक्रय के स्थल ( हाट, बाजार ) से युक्त पुर को नगर कहते हैं।।२५।। ✵ खेटादिभेदाः ✵ शूद्रैरधिष्ठितं यन्नद्यचलावेष्टितं तु तत्खेटम् ॥२६॥ नदी अथवा पर्वत से घेरे एवं शूद्रों के निवास से युक्त स्थान को खेट कहते हैं।।२६।। परितः पर्वतयुक्तं खर्वटकं सर्वजनसहितम्। खर्वटखेटकमध्ये यज्जनताढ्यं जनस्थानकुब्जम् ॥२७॥ चारो ओर पर्वत से घिरे हुये, सभी वर्णों के आवास से युक्त स्थान को खर्वटक कहते हैं। खेट एवं खर्वट के मध्य स्थित घनी जनसंख्या वाले स्थान को कुब्ज कहते हैं।।२७।। द्वीपान्तरागतवस्तुभिरभियुक्तं सर्वजनसहितम् । क्रयविक्रयकैर्युक्तं रत्नधनक्षौमगन्धवस्वाढ्यम् ॥२८॥ सागरवेलाभ्याशे तदनुगतायामि पत्तनं प्रोक्तम्। अन्य द्वीपों से आये हुये वस्तुओं से युक्त, सभी प्रकार के लोगों से युक्त, क्रय- विक्रयस्थल से युक्त, रत्न, धन, सिल्क के वस्त्रों से युक्त तथा विविध प्रकार के सुगन्धियों ( इत्र आदि ) से युक्त, सागर-तट पर स्थित एवं उससे सम्बद्ध नगर को पत्तन कहते हैं।।२८।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७९ परनृपदेशसमीपे युद्धारम्भक्रियोपेतम् ॥२९॥ सेनासेनापतियुतमिदमुदितं शिबिरमिति च वरैः । सर्वजनैः सङ्कीर्णं नृपभवनयुतं तदेव तथा ॥३०॥ बहुरक्षोपेतं यत् सेनामुखमुच्यते तज्ज्ञैः । शत्रु-देश के समीप स्थित, युद्ध प्रारम्भ करने के लिये सभी सामग्रियों से युक्त तथा सेना एवं सेनापति से युक्त स्थान को शिविर कहते हैं। वही स्थान सभी प्रकार के लोगों के आवास से युक्त एवं राजभवन से युक्त होता है तथा बहुत-सी सेनाओं से युक्त होता है, तो उसे सेनामुख कहते हैं।।२९-३०।। नद्यद्रिपार्श्वयुक्तं नृपभवनयुतं सबहुरक्षम् ॥३१॥ यन्नृपतिस्थापितकं तत्स्थानीयं समुद्दिष्टम् । नदी के किनारे या पर्वत के पास, राजभवन तथा बहुत से सैनिकों से युक्त तथा राजा के द्वारा स्थापित स्थान को स्थानीय कहते हैं।।३१।। नद्यब्धिदक्षिणादक्षिणभागवणिगादिसंयुक्तम् ॥३२॥ सर्वजनावासं यद् द्रोणमुखं प्रोक्तमाचार्यैः । ग्रामसमीपे जनतालयमिदमुदितं विडम्बमिति ॥३३॥ नदी के उत्तर एवं दक्षिण दोनों भागों में अथवा समुद्र के किनारे बसे हुये स्थान को द्रोणमुख कहते हैं। यहाँ व्यापारी वर्ग (प्रधान रूप से) तथा अन्य सभी वर्गों के लोग निवास करते हैं। ग्राम के समीप जनावास को विडम्ब कहा जाता है।।३२-३३।। वनमध्ये जनवासं यत्कोत्मकोलकं प्रोक्तम्। चातुर्वर्ण्यसमेतं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥३४॥ बहुकर्मकारयुक्तं यन्निगमं तत् समुद्दिष्टम् । वन के मध्य में स्थित जनस्थान को कोत्मकोलक कहा जाता है। जो स्थान चारो वर्गों के लोगों से युक्त हो, सभी प्रकार के लोगों से बसा हो तथा अधिक संख्या में जहाँ हस्तशिल्पी निवास करते हों, उसे निगम कहते हैं।।३४।। नद्यद्रिवनसमेतं बहुजनयुक्तं सनृपवासम् ॥३५॥ एतत् स्कन्धावारं तत्पार्श्वे चेरिका प्रोक्ता। नदी, पर्वत एवं वन से युक्त, जहाँ की जनसंख्या अधिक हो एवं जहाँ राजा निवास करते हों; ऐसे स्थान को स्कन्धावार कहते हैं। इसके पार्श्व में चेरिका जनावास होता है।।३५।।

८० मयमतम्

  • दुर्गाणि * गिरिवनजलपङ्केरिणदैवतमिश्राणि सप्त दुर्गाणि ॥३६॥ दुर्ग के प्रकार—दुर्ग सात प्रकार के होते हैं—गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, पङ्क- दुर्ग, इरिण (मरु) दुर्ग, दैवतदुर्ग एवं मिश्रित दुर्ग।।३६।। गिरिमध्यं गिरिपार्श्वं गिरिशिखरं पार्वतं दुर्गम्। अजलं तरुवनगहनं वनदुर्गं तदुभयन्तु मिश्रं स्यात् ॥३७॥ गिरिदुर्ग पर्वत के मध्य, पर्वत के बगल या पर्वत के शिखर पर स्थित होता है। वनदुर्ग की स्थिति जलहीन स्थान पर वृक्षों के सघन वन में होती है। मिश्रित दुर्ग में गिरि एवं वन दोनों दुर्गों के मिश्रित लक्षण होते हैं।।३७।। दैवं तु सहजदुर्गं पङ्कयुतं पङ्कदुर्गं स्यात्। नद्यब्धिपरिवृतं यज्जलदुर्गं निर्वनोदमिरिणं स्यात् ॥३८॥ जिस दुर्ग की सुरक्षा-व्यवस्था प्राकृतिक होती है, उसे दैवदुर्ग कहते हैं। जिस दुर्ग के बाहर कीचड़ (दलदल) हो, उसे पङ्कदुर्ग कहते हैं। चारो ओर नदी या समुद्र से घिरे दुर्ग को जलदुर्ग तथा वन एवं जल से रहित (ऊषर या रेगिस्तान क्षेत्र में स्थित) दुर्ग को इरिण दुर्ग कहते हैं॥३८॥ अक्षयजलान्नशस्त्रं ह्यतिविपुलोत्तुङ्गघनसालम्। सर्वं हि दुर्गजातं सप्राकारं त्वनेकमुखरक्षम् ॥३९॥ दुर्ग प्रत्येक दृष्टि से सभी लक्षणों से परिपूर्ण होना चाहिये। दुर्ग में अक्षय जल, अन्न एवं शस्त्रास्त्र होना चाहिये। दुर्ग अत्यन्त विस्तृत, उन्नत एवं ठोस होना चाहिये। उसे प्राकार-मण्डल एवं सभी द्वारों पर रक्षकों से युक्त होना चाहिये।।३९।। बहिरुदकरहितवनच्छन्नपथं दुष्प्रवेशं च। गोपुरमण्डपयुक्तं सोपानच्छन्नमच्छन्नम् ।।४०।। बाहर से दुर्ग में प्रवेश हेतु ऐसा मार्ग होना चाहिये, जिस पर जल न हो, वन द्वारा छिपा हो तथा इस मार्ग से दुर्ग में प्रवेश कठिनाई से होता हो। दुर्ग का प्रवेशद्वार गोपुरमण्डप से युक्त, सोपानयुक्त हो एवं ढका न हो।।४०।। द्विकवाटचतुष्परिघार्गलहस्तोन्नतेन्द्रकीलयुतम् । सस्थूणमध्यमालयमिण्ठकसहितं सगूढसोपानम् ॥४१॥ प्रवेशद्वार पर दो कपाट हों, जिनमें चार परिघार्गल (द्वार को खुलने से रोकने के लिये लगी अर्गला) तथा एक हाथ ऊँची इन्द्रकील लगी होनी चाहिये। द्वार पर मध्य

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८१ में काष्ठ की स्थूणा ( खम्भा ) से युक्त कक्ष होना चाहिये, जिसमें मिण्ठक ( द्वार पर लटकने वाली विशेष आकृति ) लगा हो। उस कक्ष में प्रवेश हेतु सीढ़ियाँ बनी होनी चाहिये, जो छिपी हों ॥४१॥ द्वाराणि मण्डपसभाशालाकाराणि कार्याणि । द्वादश सालाकाराश्चतुरं वृत्तं तदायतं च पुनः ॥४२॥ नन्द्यावर्तं कौक्कुटमिभकुम्भं नागवृत्तं च। मग्नचतुरं त्रिकोणमष्टास्रं नेमिखण्डं च ॥४३॥ द्वारों को मण्डप, सभा अथवा शाला के आकार का बनाना चाहिये। इनकी योजना बारह में से किसी एक प्रकार की होनी चाहिये। बारह आकृति-योजनायें इस प्रकार हैं—चौकोर, वृत्त, आयत, नन्द्यावर्त, कुक्कुट, इभ ( गजाकृति ), कुम्भ, नागवृत्त ( कुण्डलीयुक्त सर्प ), मग्नचतुर ( गोलाई वाले कोने से युक्त चौकोर ), त्रिकोण, अष्टकोण तथा नेमिखण्ड ( कुछ गोलाई लिये आकृति )॥४२-४३॥ प्राकाराश्चेष्टकया द्वादशहस्तोच्छिताहीनाः । उत्सेधार्धविशाला मूले भित्तिः ससञ्चारा ॥४४॥ ईंटों से निर्मित प्राकार की उँचाई कम से कम बारह हाथ रखनी चाहिये। प्राकार के मूल की चौड़ाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये। भित्ति इतनी चौड़ी होनी चाहिये, जिससे उस पर सुगमता से चला जा सके ॥४४॥ सालस्याभ्यन्तरतः पांसुचयोपर्यनेकयन्त्रयुतम् । परितः परिखोपेतं पांसुचये संहताट्टालम् ॥४५॥ प्राकार के भीतरी भाग में पांसुचय ( कच्ची मिट्टी की जोड़ाई ) के ऊपर अनेक सुरक्षायन्त्र लगाना चाहिये। चारो ओर परिखा ( खाई ) होनी चाहिये एवं पांसुचय के ऊपर अट्टालक बनाना चाहिये ॥४५॥ परितः शिबिरोपेतं नानाजनवाससङ्कीर्णम् । नृपभवनसमोपेतं हस्त्यश्वरथपदातिबहुमुख्यम् ॥४६॥ इसके चारो ओर सैनिकों की छावनी होनी चाहिये। दुर्ग में विभिन्न प्रकार के लोगों का आवास, राजभवन तथा गज, अश्व, रथ एवं पैदल सेना होनी चाहिये ॥४६॥ धान्यैस्तैलैः क्षारैः सलवणभैषज्यगन्धविषम् । लोहाङ्गारस्नायुविषाणवेण्विन्धनैर्युक्तम् ॥४७॥ दुर्ग के भीतर अन्न, तेल, क्षार, नमक, औषधियाँ, सुगन्ध, विष, धातुयें, अङ्गार मय ०-६

८२ मयमतम् (कोयला), स्नायु (चमड़े की डोरी), सींग, बाँस एवं इन्धन की लकड़ी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये।।४७।। तृणचर्मशाकयुक्तं सवल्कलं सारदारुयुतम्। दुर्गं दुर्गममुक्तं दुर्लङ्घ्यं दुरवगाहं च।।४८।। दुर्ग में तृण (पशुओं का चारा), चमड़ा, शाक (तरकारी), छाल से युक्त काष्ठ एवं कठोर काष्ठ प्रभूत मात्रा में होना चाहिये। दुर्ग को कठिनाई से प्रवेश करने योग्य, कठिनाई से लाँघने योग्य तथा कठिनाई से पार करने योग्य होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।४८।। रक्षार्थं च जयार्थं हारिभिरभेदं च दुर्गमिष्टं स्यात्। इन्द्रश्च वासुदेवो गुहो जयन्तश्च वैश्रवणः।।४९।। अश्विनौ श्रीमदिरे शिवश्च दुर्गा सरस्वती चेति। प्राकारान्तर्दिव्या दुर्गनिवेशे च विज्ञेयाः।।५०।। रक्षा के लिये, विजय के लिये एवं शत्रुओं द्वारा अभेद्यता के लिये दुर्ग की आवश्यकता होती है। दुर्ग-निवेश के समय प्राकार के भीतर इन्द्र, वासुदेव, गुह, जयन्त, कुबेर, दोनों अश्विनीकुमार, श्री, मदिरा, शिव, दुर्गा तथा सरस्वती देवी- देवताओं को स्थापित करना चाहिये।।४९-५०।। एवं दुर्गविधानं सम्यक् प्रोक्तं पुरातनैर्मुनिभिः। इस प्रकार प्राचीन मनीषयों ने दुर्ग-विधान का वर्णन किया है। ❋ नगरविन्यासः ❋ सर्वेषां विन्यासं संक्षेपाद् वक्ष्यते क्रमशः।।५१।। नगर-योजना—अब क्रमशः सभी (नगरों) का विन्यास संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है।।५१।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गा द्वादश दश वाऽष्टषट्चतुर्युगलम्। तावदुदीचीनास्ते तत्रैवायुग्मसंख्या वा।।५२।। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले मार्गों की संख्या बारह, दश, आठ, छः, चार या दो होनी चाहिये। इसी प्रकार उत्तर (से दक्षिण जाने वाले) मार्गों की भी योजना रखनी चाहिये। अथवा अयुग्म (विषम) संख्या में मार्ग होने चाहिये।।५२।। एकादशनवसप्तकपञ्चगुणा वैकमार्गा वा। युग्मायुग्मपदेषु द्व्येकत्रिभिरंशकैरजांशाः स्युः।।५३।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८३ अयुग्म संख्याओं में ग्यारह, नौ, सात, पाँच, तीन या एक मार्ग होने चाहिये। युग्म ( सम ) अथवा अयुग्म ( विषम ) पदों में दो, तीन एवं एक अज ( ब्रह्मा ) का भाग होता है।।५३।। नगरादीनामेवं मार्गान्युदितानि सर्वेषाम् । दण्डवदेका वीथी तद्दण्डकमित्यभीष्टं स्यात् ॥५४॥ इस प्रकार सभी नगरादिकों के मार्गों का वर्णन किया गया है। दण्ड के समान एक वीथी ( मार्ग ) को दण्डक कहते हैं।।५४।। उत्तरदिङ्मुखमेकं तन्मध्ये सम्प्रयुक्तं चेत् । कर्तरिदण्डकमुदितं प्राचीनौ कुट्टिमौ तर्हि ॥५५॥ उत्तर दिशा से आता हुआ एक मार्ग यदि पूर्वोक्त मार्ग के साल मध्य में संयुक्त होता है तो उसे कर्तरिदण्डक कहते हैं। यदि पूर्व दिशा से ईंटों से निर्मित दो मार्ग आते हैं—।।५५।। तद् बाहुदण्डकं स्याद् दिक्षु चतुर्द्वारसंयुक्तम् । बहुकुट्टिमसंयुक्तं मध्ये वीथ्या द्विपाश्र्वे तु ॥५६॥ शेषं पूर्ववदिष्टं कुटिकामुखदण्डकं प्रोक्तम् । तो उसे बाहुदण्डक कहा जाता है। यदि चारो दिशाओं में द्वार हों तथा वीथी के मध्य में दोनों पार्श्वों में बहुत से कुट्टिमयुक्त ( ईंटों से निर्मित ) मार्ग आकर मिलें एवं शेष स्थिति पूर्ववर्णित रहे तो उसे कुटिकामुख दण्डक कहते हैं।।५६।। प्राचीनोदीचीनैर्मार्गैस्त्रिभिरेव संयुक्तम् ॥५७॥ तत् कलकाबन्धदण्डकमिति तज्ज्ञैः समुद्दिष्टम् । पूर्व से आने वाले तीन मार्ग तथा उत्तर से आने वाले तीन मार्ग जब आपस में संयुक्त होते हैं तो उसे कलकाबन्धदण्डक कहा गया है।।५७।। प्राङ्मुखवीथ्यस्तिस्रश्चोत्तरमार्गास्त्रियश्चैव ॥५८॥ एकैकान्तरितास्ते कुट्टिममार्गास्त्वनेकाश्च । वेदीभद्रकमुदितं नगरादीनामिदं शस्तम् ॥५९॥ यदि पूर्व से तीन मार्ग एवं उत्तर से तीन मार्ग निकलें तथा इनमें एक-एक के बाद अनेक कुट्टिममार्ग हों तो उसे वेदीभद्रक कहते हैं। यह मार्ग-योजना नगरादिकों के लिये उपयुक्त होती है।।५८-५९।। स्वस्तिकमुदितं ग्रामे यथा तथा स्वस्तिकं विद्यात् । प्रागुत्तरमुखमार्गाः षट्षडभीष्टास्तु तद्बाह्ये ॥६०॥

८४ मयमतम् मार्ग की स्वस्तिक-योजना स्वस्तिक ग्राम के लिये कही गई है। इसमें छः मार्ग पूर्व से एवं छः मार्ग उत्तर से निकलते हैं।।६०।। प्रागिव मार्गोपेतं वीथिपदं स्वस्तिकं चैव । पूर्व-वर्णित मार्ग-योजना के अनुसार मार्गों की रचना स्वस्तिक होती है। प्राचीनोदीचीनाश्चत्वारश्चैव मार्गाः स्युः ॥६१॥ ब्रह्मावृतपथमेकं कुट्टिममार्गास्त्रयः प्राच्याम् । एतद् भद्रकमुदितं नाम्ना नगरादिविन्यासम् ॥६२॥ पूर्व से एवं उत्तर से निकलने वाले मार्गों की संख्या चार होती है। एक मार्ग ब्रह्मस्थान से निकलता है। तीन कुट्टिममार्ग पूर्व दिशा में होते हैं। इस मार्गयोजना को भद्रक कहा जाता हैं। इस मार्गयोजना का प्रयोग नगरादि के विन्यास में किया जाता है।।६१-६२।। प्राङ्मुखमार्गाः पञ्चैवोत्तरमार्गास्तथैव स्युः । बहुकुट्टिमसंयुक्तं भद्रमुखं नाम वस्तु स्यात् ॥६३॥ पाँच मार्ग पूर्व दिशा से एवं पाँच मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। बहुत से कुट्टिम मार्ग निकलते हैं। इस मार्गयोजना को भद्रमुख कहते हैं।।६३।। प्राचीनास्तु षडेवैवोत्तरवक्त्रास्तथा मार्गाः । यद् बहुकुट्टिमयुक्तं तद्वस्तु च भद्रकल्याणम् ॥६४॥ छः मार्ग पूर्व दिशा से एवं छः मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं तथा बहुत से कुट्टिम मार्ग होते हैं, तो उसे भद्रकल्याण मार्गयोजना कहते हैं।।६४।। पूर्वापरमुखमार्गाः सप्तैवोदङ्मुखाश्च तथा । शेषं प्रागिव सर्वं विन्यासं तन्महाभद्रम् ॥६५॥ पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले सात मार्ग तथा उत्तर से (दक्षिण की ओर जाने वाले) सात मार्ग हों तथा शेष योजना पूर्ववत् (बहुत से कुट्टिम मार्ग) हो तो उसे महाभद्र मार्गयोजना कहते हैं।।६५।। अष्टौ पूर्वमुखास्ते मार्गाश्चाष्टावुदग्वक्त्राः । द्वादशमार्गोपेतं बह्वर्गलकुट्टिमैर्युक्तम् ॥६६॥ यत्तद्वस्तुसुभद्रं नाम्ना विन्यासमुद्दिष्टम् । आठ मार्ग पूर्व दिशा से एवं आठ मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। (इनके अतिरिक्त) बारह मार्गों एवं बहुत से अर्गल कुट्टियों से (अर्गला के समान आपस में

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८५ गुम्फित ) युक्त मार्ग-विन्यास को वस्तुसुभद्र कहते हैं।।६६।। नवनवमार्गाश्चैते प्राचीनाश्चाप्युदीचीनाः ।।६७।। द्वारोपद्वारयुतं कुट्टिममार्गार्गलैर्युक्तम् । राजगृहोपेतं यन्नगरं नाम्ना जयाङ्गं स्यात् ।।६८।। नौ द्वार पूर्व से निकलते हों तथा नौ द्वार उत्तर से निकलते हों, इन मार्गों पर द्वार एवं उपद्वार ( छोटे प्रवेशद्वार ) हों, इन मार्गों के साथ अर्गल-कुट्टिम मार्ग भी हों तथा नगर में राजगृह भी हो तो उसकी संज्ञा जयाङ्ग होती है।।६७-६८।। प्राचीना दश मार्गाश्चोत्तरमार्गास्तथैव स्युः । नृपमन्दिरसंयुक्तं युक्त्यानेकार्गलोपेतम् ।।६९।। बहुकुट्टिमसंयुक्तं विजयं नाम्ना वरैः प्रोक्तम् । पूर्व दिशा से दश मार्गों का प्रारम्भ होता हो तथा उत्तर दिशा से भी दश मार्ग निकलते हों; साथ ही इन मार्गों के साथ अनेक अर्गलायुक्त कुट्टिम मार्ग हों तथा नगर में राजभवन भी हो तो उसे श्रेष्ठ जनों ने विजय संज्ञा प्रदान की है।।६९।। प्राचीनास्त्वेकादश मार्गा रुद्रा उदीचीनाः ।।७०।। ब्रह्मांशादपरांशो यदभीष्टं तत्र नृपवासम् । तन्मुखतोऽदभ्रमहाङ्गणकं स्यादिष्टभागे तु ।।७१।। ( सर्वतोभद्र योजना में ) पूर्व से ग्यारह मार्ग तथा उत्तर से ग्यारह मार्ग निकलते हों, ब्रह्मभाग के पश्चिम में इच्छित स्थान पर राजा का आवास हो, उसके सम्मुख बहुत विशाल आँगन होना चाहिये।।७०-७१।। तत्रान्तःपुरवासं शेषं सर्वं समुन्नेयम् । तत्राागुदग्गतमार्गा सा कथिता राजवीथीति ।।७२।। इसके पश्चात् अभीष्ट स्थान पर रानियों का आवास होना चाहिये। पूर्व से निकले मार्ग को राजवीथी कहते हैं।।७२।। तस्या द्विपार्श्वयोः स्यात्सैश्वर्याणां तु मालिकापङ्क्तिः । तत्पार्श्वयोर्निवासो वणिजां स्यात्तस्य दक्षिणतः ।।७३।। स्यात्तन्तुवायवासं ह्युत्तरतश्चक्रिणां वासम् । तत्तज्जात्यन्तरगृहमथ तत्सामीप्यतः कुर्यात् ।।७४।। राजवीथी के दोनों पार्श्वों में धनाढ्य लोगों की मालिका-पङ्क्ति ( भवनों की पङ्क्ति ) होनी चाहिये। उनके पार्श्वों में व्यापारियों का आवास होना चाहिये। उसके दक्षिण में

८६ मयमतम् तन्तुवायों ( जुलाहों ) का आवास होना चाहिये। उसके उत्तर में कुम्हारों का आवास होना चाहिये और इनके समीप ही जात्यन्तरों ( छोटी जाति वालों ) का आवास होना चाहिये।।७३-७४।। शेषं प्रागिव सर्वं योग्यं तत्सर्वतोभद्रम्। एवं षोडश भेदा ह्युदिताश्चाद्यैर्मुनीन्द्रैस्तु ।।७५।। शेष सभी पूर्ववर्णित नियमों के अनुसार होना चाहिये। यह सर्वतोभद्र व्यवस्था है। इस प्रकार प्राचीन मुनियों ने नगर के सोलह भेदों का वर्णन किया है।।७५।। मार्गच्छेदं नेष्टं पदमध्ये चत्वरं न स्यात्। शेषं युक्त्यानुक्तं सम्यग्योज्यं नृपेच्छया तज्ज्ञैः ।।७६।। क्षुद्राणामपि चैषां मध्यानां चापि सर्वेषाम्। नगर के मध्य पद में न तो मार्ग बाधित होना चाहिये तथा न ही वहाँ चौराहा होना चाहिये। शेष की योजना राजा की इच्छानुसार मध्य में करनी चाहिये, जिनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है।।७६।। ✺ अन्तरापणम् ✺ तत्र कुटुम्बावलिकं वक्ष्येऽहं चान्तरापणकम् ।।७७।। हाट-योजना—अब मैं ( मय ) कुटुम्बावलिक ( परिवारों के आवास की पंक्ति ) तथा बाजारों का वर्णन करता हूँ।।७७।। परितो रथपथयुक्तं मध्ये वणिजां गृहश्रेणी । तद्दक्षिणतः पार्श्वे गेहं स्यात्तन्तुवायानाम् ।।७८।। बाजार के चारो ओर रथ के चलने योग्य मार्ग हों एवं मध्य में व्यापारियों के गृहों की पङ्क्ति होनी चाहिये। उनके दक्षिण पार्श्व में जुलाहों के गृह होने चाहिये।।७८।। उत्तरतस्तद्वासावलिकं स्याच्चक्रिकाणां तु। कर्मोपजीविनां स्याद्वासं रथपथ्यनेकानाम् ।।७९।। उत्तर भाग में कुम्हारों के भवन होने चाहिये। अन्य शिल्पियों के गृह भी रथमार्ग से संयुक्त होने चाहिये।।७९।। ब्रह्मावृतपथमेकं तत्रान्तरापणं कार्यम् । ताम्बूलादि फलञ्च प्रोक्तं सारान्वितं द्रव्यम् ।।८०।। जो मार्ग ब्रह्म-पद को घेरता हो, उस पर पान, फल एवं सारयुक्त सामग्रियों का हाट बनाना चाहिये।।८०।।

२. अध्याय ८-१६: पाषाण, इष्टिका, दारु (काष्ठ) चयन एवं प्रासाद-अधिष्ठान

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८७ ईशानादिमहेन्द्रद्वारान्तं चान्तरापणकम् । तत्रैव मत्स्यमांसं शुष्कं शाकञ्च विज्ञेयम् ॥८१॥ ईशान से महेन्द्र पद तक हाट-बाजार निर्मित करना चाहिये। वहीं पर मछली, माँस, सूखे पदार्थ एवं शाक (सब्जी, तरकारी) का हाट भी होना चाहिये॥८१॥ महेन्द्राद्यग्न्यन्तं भक्ष्यं भोज्यं च निर्दिष्टम् । अग्न्यादि गृहक्षतपर्यन्तं तत्र भाण्डानि ॥८२॥ महेन्द्र पद से प्रारम्भ कर अग्निकोण-पर्यन्त भक्ष्य एवं भोज्य (खाने-पीने योग्य) पदार्थों का हाट होना चाहिये तथा अग्नि से गृहक्षतपर्यन्त भाण्डों (बरतन) का हाट होना चाहिये॥८२॥ तस्मान्निऋर्तिपदान्तं कंसादिकमत्र विज्ञेयम् । स्यात् पुष्पदन्तभागान्तं पितृभागादि वस्त्रं स्यात् ॥८३॥ गृहक्षत से निऋर्ति के पद तक कांस्य आदि धातुओं से निर्मित पदार्थों का हाट होना चाहिये। पितृपद से पुष्पदन्त के पद तक वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८३॥ तस्मात् समीरणान्तं तण्डुलधान्यादिकं च कटम् । स्याद् भल्लाटपदान्तं वास्त्रादिकं वस्त्रकादीनाम् ॥८४॥ पुष्पदन्त से समीर पदपर्यन्त चावल, अन्न एवं भूसे के बाजार होने चाहिये। वायु से भल्लाट के पद तक वस्त्र आदि के हाट होने चाहिये॥८४॥ तत्रैव लावणादिद्रव्यं तैलादिकं ज्ञेयम् । तस्मादीशपदान्तं गन्धं पुष्पादिकं विहितम् ॥८५॥ उसी स्थान पर नमक आदि पदार्थ एवं तेल आदि का हाट होना चाहिये। भल्लाट से ईश तक सुगन्ध एवं पुष्प आदि का हाट होना चाहिये॥८५॥ एवं नवान्तरापणमुदितं तत्परितस्तु मध्ये । अभ्यन्तरगतमार्गेष्वथ रत्नं हाटकं वस्त्रम् ॥८६॥ इस प्रकार वसति-विन्यास (नगरादि) में चारो ओर नौ प्रकार के हाटों का वर्णन किया गया है। मध्य भाग में जाने वाले मार्गों पर रत्न, सुवर्ण एवं वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८६॥ माञ्जिष्ठं तु मरीचं पिप्पलकं चापि हारिद्रम् । मधुघृततैलादिकमथ भैषज्यं सर्वतः कार्यम् ॥८७॥ इनके अतिरिक्त माञ्जिष्ठ (मजीठ, रंग), काली मिर्च, पीपल, हारिद्र (हल्दी),