मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
प्रकाशक : कृष्णदास अकादमी, वाराणसी
मुद्रक : चौखम्बा प्रेस, वाराणसी
संस्करण : चतुर्थ, सन् २००२
मूल्य : पूर्वमेघ ३५.००
संपूर्ण ६०.००
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KRISHNADAS SANSKRIT SERIES
30
MEGHADŪTAM
Of
MAHĀKAVI KĀLIDĀSA
with 'Indukalā' Sanskrit-Hindi Commentaries
By
Sri Vaidyanath Jha
कृष्णदास अकादमी
वाराणसी
KRISHNADAS ACADEMY, VARANASI
Publisher : Krishnadas Academy, Varanasi.
Printer : Chowkhamba Press, Varanasi.
Edition : 4rth, 2002
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समर्पणम्
स्निग्धामुदारमधुरां विलसत्प्रसादां
विश्रामधामपुलिनां विशदार्थधाराम् ।
हंसावगाहनरसां नितरामगाधा—
माराधयामि कविराजसरस्वतीं ताम् ॥ १ ॥
श्री-कालिदासरसपिच्छिलकाव्यमार्गे
प्रस्थानकौतुकमतीव शिशुत्वमेव ।
जानन्नपि स्फुटमिदं पुनरेव गन्तु—
मालम्ब्य सद्गुरुकराङ्गुलिमुद्यतोऽस्मि ॥ २ ॥
स्वाभाविकं स्खलनमेव पदे पदे मे
सम्भाव्यते यदपि दुर्जनहासहेतुः ।
स्मृत्वा सतां परमपारकृपामकम्पा—
माश्वासनादकरवं ललितार्थटीकाम् ॥ ३ ॥
श्रोतुर्विमुग्धमतिविभ्रममारहन्तीं
चित्रां पटीमिव नटीमिव नाटकस्य ।
वाचं निवेदयति सो विपुलार्थलक्ष्मीं
स्मेराननं तमनिशं गुरुमानतोऽस्मि ॥ ४ ॥
कीर्तिर्धुरि-स्फुरति नामनि यस्य शश्व—
दानन्द एव चरमावयवं बिभर्ति ।
तस्मै सुधीन्द्रतिलकाय सुदेशिकाय
टीकामिमामुपहरत्यथ वैद्यनाथः ॥ ५ ॥
२ मे० दू० भू०
—: व्याख्यातृमङ्गलाचरणम् :—
शृङ्गार-दैवतमनन्तगुणाभिरामं
रामानुजं हृदयरञ्जनमञ्जनाभम् ।
नेत्रामृतं निरुपमं वृषभानुजाया
ध्वान्तापहं किमपि धाम नमामि कृष्णम् ॥ १ ॥
विद्याविनोदरसिकं मधुरं निसर्गा-
दन्तेवसत्स्वतुलवत्सलमेव सत्सु ।
आन्वीक्षिकीहृदयवल्लभमार्यकीर्त्या-
नन्दाभिधं गुरुवरं प्रणमामि भक्त्या ॥ २ ॥
यस्मिन् प्रसीदति, निषीदति भाग्यलक्ष्मी-
रुत्सृज्य दैवहतकं गमनोत्सुकापि ।
जागर्ति सुप्तनियतिः शरणागतानां
तं पूज्यपूजितगुरुं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
श्रीमत्कवीन्द्रकलकीर्तिकृताग्रदूतं
शश्वद्रसोर्मिशतमेदुरमेघदूतम् ।
व्याख्यातुमाश्रयति सद्गुरुदत्तविद्यां
हृद्यामवद्यरहितामिह वैद्यनाथः ॥ ४ ॥
भूमिका
संस्कृत साहित्य से सम्बद्ध ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो स्वनामधन्य सर्वमूर्धन्य कवि एवं सुनिपुण नाटककार कविकुल-गुरु “कालिदास” को न जानता हो। जिनका यशःसौरभ शकुन्तलानाटक के माध्यम से समस्त विश्व को सुवासित कर रहा है, जिनकी काव्य-मधुरिमा पर क्या प्राच्य और क्या भारतीय समस्त सहृदयगण लट्टू हैं। “कविकुलमूर्धन्य” नाम वाली पगड़ी जिनके सम्पर्क में सार्थक हुई उन कविकुल-सुधाकर “कालिदास” को कौन नहीं जानता ? आपकी प्रतिभा सर्वतोमुखी है, खण्डकाव्य, महाकाव्य और नाटक सर्वत्र ही आपकी कवित्व-शक्ति पूर्णरूप से परिपक्व दिखाई पड़ती है। आप भारत के ही नहीं अपितु समस्त विश्व के महाकवियों में सर्वप्रथम गिने जाने वाले महाकवि हैं। काव्य के तीनों विधाओं में आपके समान विश्व का कोई भी कवि ऐसा मनोरम काव्य-प्रणयन नहीं कर सका। प्रकृति के मनोरम चित्रण करने में एवं अपनी रचनाओं के पात्रों के चरित्र का असाधारण चित्रण करने में महाकवि अद्वितीय हैं। इनकी रचनाओं में नाट्यकला की सुन्दरता का अवलोकन कीजिए या महाकाव्य का वर्णन-सौन्दर्य देखिये अथवा गीतिकाव्य के सरस करुण हृदयोद्गारों का आनन्द लीजिए, सब उपर्युपरि है। महाकवि में वह अप्रतिम चमत्कार है जिस पर समस्त विश्व आश्चर्यान्वित हो रहा है, इनमें ऐसी ब्रह्माण्डव्यापिनी सर्वातिशायिनी प्रतिभा है जिसका एकत्र समागम संसार में दुष्प्राप्य है। आध्यात्मिक रहस्य का ऐसा सरस प्रतिपादन अन्यत्र दुर्लभ है। इनकी शान्तिप्रदायिनी उपदेशमयी कविताकौमुदी जिज्ञासुजन के जिज्ञासातप्त हृदय को आनन्द-सागर की लहरों में ऐसा डुबो देती है कि उससे निकलने का नाम नहीं लेना चाहता।। इनकी कविता में अपनी शकुन्तला की तरह अनाघ्रात पुष्प की ताजगी, अखण्डित किसलयों की कोमलता, अनास्वादित रस का माधुर्य तथा अखण्ड सौभाग्यशाली पुण्यों के फल की पवित्रता आदि का समवाय मिलता है। इस कलाकार की कला में केवल रसिकता ही नहीं अपितु समाज-विज्ञान का भी अपूर्व एवं अद्भुत दर्शन होता है। संस्कृत साहित्य के एकमात्र
( ८ )
कालिदास ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी कविता में अपने युग की चेतना को रूपायित किया है (बाण को छोड़कर)। इनका काव्य भारत के प्राचीन इतिहास के देदीप्यमान युग का प्रकाश-स्तम्भ और पौराणिक ब्राह्मण-धर्म तथा वर्णाश्रम धर्म का वास्तविक प्रतीक है।
जीवन :—दुःख है कि हम अपने इस महाकवि के जीवन के विषय में 'इदमित्थम्' नहीं कह सकते क्योंकि ऐसा कोई निश्चयात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सका है। महाकवि स्वयं इतने बड़े निरभिमानी थे कि अपने सम्बन्ध में इन्होंने नाम के प्रयोग को छोड़कर और कुछ लिखा ही नहीं। आत्मश्लाघा से ये कितनी दूर रहते थे एवं ये कितने विनम्र थे इसका परिचय हमें इनके रघुवंश महाकाव्य के निम्नलिखित पद्यों में मिलता है—
क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्॥
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः॥
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन्।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः॥ (रघु०, १–२।३।९॥)
अतः ये कब और कहाँ उत्पन्न हुए? ऐसे महारत्न का जन्म किस स्तुत्य दम्पति ने दिया, एवं ये कब परलोक सिधारे—इन सब बातों का समुचित एवं सन्तोषप्रद उत्तर हमें नहीं प्राप्त हो सका है।
ऐसी जनश्रुति है कि महाकवि पहले महामूर्ख थे। किसी शारदानन्द नामक राजा की पुत्री विद्योत्तमा विदुषी एवं परम-सुन्दरी थी। अपनी विद्या के गर्व के कारण उसने 'शास्त्रार्थ में जो पुरुष मुझे परास्त करेगा उसी से मैं अपना विवाह करुँगी' ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी। तात्कालिक विद्वान् लोग उससे परास्त होकर ईर्ष्यावश उसका दर्प-भंग करने के लिए उसका विवाह किसी महामूर्ख से कराना चाहते थे, और सब मिलकर ऐसे मूर्ख को खोजने लगे। कहा जाता है कि कालिदास वृक्ष की डाल पर बैठकर उसी डाल को इस तरह काट रहे थे जिससे उसके कटने पर डाल सहित कालिदास भी धराशायी हो जाते। पण्डितों ने इनकी कार्यवाही को देखा और इन्हें महामूर्ख समझकर इन्हें नीचे उतरवाकर 'हमलोग तुम्हारा विवाह एक परम सुन्दरी राजकुमारी से
( ९ )
करवा देंगे तुम कुछ न बोलना हमलोग राजसभा में तुम्हारा परिचय ‘ये हमारे गुरुजी हैं’ इस तरह देंगे इत्यादि बातें समझाकर अपने साथ ले गये। राजसभा में जाकर पण्डितों ने इनका पूर्वनियोजित ढंग से परिचय दिया तथा शास्त्रार्थ के लिए राजकुमारी को कहा एवं यह भी सूचित कर दिया कि ‘इस समय हमारे पूज्य गुरुवर ने मौन व्रत ले रखा है अतः शास्त्रार्थ साङ्केतिक ( इशारों से ) होगा।’ शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। विद्योत्तमा ने ‘ईश्वर एक है’ इस अभिप्राय से अपनी एक अंगुली उठाकर गुरुजी की तरफ दिखाया। गुरुजी ने ‘यह मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है’ ऐसा समझकर ‘मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड़ दूँगा’ इस अभिप्राय से अपनी दो अंगुली ऊपर उठाकर राजकुमारी को दिखाया। इस पर गुरुजी के शिष्यों ने एकजुट होकर ऐसा तर्क-कुतर्क प्रस्तुत किया कि विद्योत्तमा को परास्त होना पड़ा। अन्ततः इनका विवाह राजकुमारी से हो गया। कहा जाता है कि सुहागरात के शुभावसर पर बाहर कोई ‘ऊँट’ चिल्लाया और विनोद के लिए राजकुमारी ने अपने पति से किमिदम् ( यह क्या है ) ? ऐसा पूछा। उस मूर्ख ने पत्नी के प्रश्न को सुनकर घबराकर या उच्चारण की असमर्थता से ‘उट्रोऽयम्’ ऐसा उत्तर दिया। राजकुमारी पण्डितों के षड्यन्त्र को समझकर अपने दुर्भाग्य पर पछताती हुई पति महोदय को अपमानित कर राजभवन से निकाल दिया। उस मूर्ख के लिए पत्नी का अपमान असह्य था। अतः उसने विद्या-प्राप्ति के लिए किसी ‘काली मन्दिर’ में जाकर आमरण उपासना प्रारम्भ कर दी। काली ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, उस मूर्ख ने ‘कवित्वपूर्ण विद्या दो’ ऐसा वर माँगा। भगवती के ‘एवमस्तु’ ऐसा कहकर अन्तर्धान हो जाने पर वह मूर्ख तत्क्षण सकल शास्त्र का पारङ्गत एवं अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न विद्वान् हो गया। काली की उपासना के फलस्वरूप उन्हें विद्या मिली अतः उनका नाम ‘कालिदास’ पड़ा, ऐसा भी सुना जाता है। आगे यह भी किंवदन्ती है कि वरदान मिल जाने पर कालिदास को अपनी पत्नी के द्वारा किया गया अपमान भी स्मरण हो आया और उसका बदला लेने वे घर की ओर चले। जिस समय वे घर पहुँचे वह समय सम्भवतः रात का समय था अतः घर का द्वार बन्द था, उन्होंने बाहर से आवाज लगायी ‘अनावृतकपाटं द्वारं देहि’ ( बन्द किवार खोलो ) । विद्योत्तमा पति के स्वर से परिचित थी एवं पति की मूर्खता से भी, अतः उसने साश्चर्य पूछा—
( १० )
'अस्ति कश्चिद्वाग्विशेषः' (क्या वाणी की कुछ विशेषता है ?) महाकवि ने पत्नी के विद्याभिमान का मर्दन करने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त वाक्य के तीन पदों को लेकर तीन काव्यों का निर्माण किया जो संस्कृत साहित्य के अनूठे काव्य हैं। जैसे कि 'अस्ति' इस वाक्यांश को लेकर 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'कुमारसंभव' महाकाव्य, “कश्चित्' इस वाक्यांश को लेकर 'कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'मेघदूत' नामक खण्डकाव्य तथा 'वाक्' इस वाक्यांश को लेकर 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'रघुवंश' महाकाव्य । यह किंवदन्ती बहुत प्रसिद्ध है ।
इनके सम्बन्ध में दूसरी जनश्रुति है कि ५०० ई० में वर्तमान लङ्का के महाराज कुमारदास स्वयं कवि थे और कलामर्मज्ञ भी । अतः उन्होंने कालिदास को अपनी राजसभा में ही नहीं रखा अपितु अपना मित्र भी बना लिया । राजभोग का उपभोग करते हुए इनका सम्बन्ध किसी वेश्या से हो गया और उसी के द्वारा इनकी हत्या कर दी गयी । पर यह जनश्रुति बिल्कुल निराधार जान पड़ती है ।
कुछ लोग इन्हें महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में एक मानते हैं । जैसा कि इनके काव्यों में 'विक्रम' शब्द का साभिप्राय प्रयोग किसी विक्रम राजा के आश्रित होने का संकेत करता है ।
कालिदास का सम्प्रदाय :— कालिदास जाति के ब्राह्मण थे । ये किस सम्प्रदाय के थे ? इनके उपास्य देव कौन थे ? इन सब प्रश्नों का उत्तर हमें उनके काव्यों के आदि में किये गये मङ्गलाचरणों से मिलता है । रघुवंश के मङ्गलाचरण में उन्होंने जगत् के माता-पिता शङ्कर और पार्वती को प्रणाम किया है—जैसे
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥
इसी प्रकार मालविकाग्निमित्र नाटक में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर की वन्दना की है । जैसे :—
एकैश्वर्ये स्थितोऽपि प्रणतबहुफले यः स्वयं कृत्तिवासाः,
कान्तासंमिश्रदेहोऽप्यविषयमनसां यः परस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनुभिर्बिभ्रतो नाऽभिमानः,
सन्मार्गालोकनाय व्यपनयतु स वस्तामसीं वृत्तिमीशः ॥
( ११ )
इसी प्रकार विक्रमोर्वशीय त्रोटक के मङ्गलाचरण में उन्होंने शङ्कर की प्रार्थना की है। जैसे—
वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाऽक्षरः।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते
स स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायाऽस्तु वः॥
इसी प्रकार विश्वविश्रुत ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ के मङ्गलाचरण में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर को ही प्रणाम किया है। जैसे—
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥
इस प्रकार हम यह निश्चय कर सकते हैं कि ये भगवान् शिव के उपासक थे और इनका सम्प्रदाय ‘शैव’ था। परन्तु यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के सर्वश्रेष्ट महाकवि कालिदास स्वयं शैव होते हुए भी साम्प्रदायिक संङ्कीर्णता से बहुत ही दूर थे। यह बात मैं नहीं, उनका काव्य स्वयं कह रहा है। कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्माजी की स्तुति एवं रघुवंश के दशम सर्ग में की गयी ‘विष्णु’ की स्तुति इसका प्रमाण है। इतना ही नहीं, ये एक ही परब्रह्म के तीनों रूप (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) मानते हैं-जैसा कि कुमार संभव के सप्तम सर्ग में उन्होंने प्रतिपादित किया है। जैसे—
एकैव मूर्तिर्बिभिदे त्रिधा सा सामान्यमेषां प्रथमाऽवरत्वम्।
विष्णोर्हरस्तस्य हरेः कदाचिद्-वेधास्तयोस्तावपि धातुराद्यौ। (७।४४।)
कालिदास का स्थितिकाल— कालिदास का स्थितिकाल संस्कृत साहित्य के इतिहास में विभिन्न इतिहासज्ञों के अन्तःसाक्ष्य प्रमाणों के आधार पर ईसा के पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक के सात सौ वर्षों के लम्बे समय में झूल रहा है। यहाँ पर संक्षेप में प्रधान मतों का उल्लेख किया जायगा। उनमें सामान्यतः चार मत प्रधान हैं। जिसमें प्रथम है—
( १ ) धारा नगरी के राजा भोज का समय (१००५-१०५४) खृष्ट की ग्यारहवीं शताब्दी। वल्लालसेन नामक किसी विद्वान् ने कालिदास को
( १२ )
राजा भोज का सभा-पण्डित माना है। वल्लालसेन ने यह बात सुनी-सुनायी बातों के आधार पर लिखी है क्योंकि वे स्वयं भोज के समकालिक नहीं थे। यह बात उन्हीं के कथनों से पुष्ट होती है। क्योंकि जहाँ पर कालिदास को भोज का सभा-पण्डित उन्होंने कहा वहीं भारवि, दण्डी, माघ आदि कवियों को भी (जो विभिन्न समय के थे) भोज के सभा-पण्डित कहा है। अतः यह मत बिल्कुल नगण्य है। क्योंकि राजा भोज ग्यारहवीं शताब्दी के थे और कादम्बरी तथा हर्षचरित के रचयिता बाणभट्ट छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुए थे। एवञ्च बाणभट्ट ने अपने 'हर्षचरित' में कालिदास की प्रशंसा में लिखा है—
'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु ।
प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥'
यदि कालिदास भोज के सभापण्डित होते तो उनकी प्रशंसा ५०० वर्ष पूर्व कैसे होती ? हो सकता है वल्लालसेन ने भोज के समय हुए परिमल कालिदास या कालिदास उपाधिवाले किसी और कवि को ही भ्रमवश दीप-शिखा 'कालिदास' मान लिया हो ।
( २ ) दूसरा मत है चौथी शताब्दी के अन्त से पाँचवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अर्थात् चन्द्रगुप्तविक्रमादित्य और समुद्रगुप्त का राज्यकाल। प्रो० लासेन, कर्नल विल्फोर्ड, जेम्स प्रिन्सेप, प्रो० मैकडानल, प्रो० कीथ और विन्सेण्ट स्मिथ आदि विदेशी विद्वानों का कहना है कि गुप्तवंश के राजाओं के राज्यकाल में भारत का साहित्यसूर्य मध्याह्न के आकाश में स्थित होकर सारे संसार को अपने प्रखर किरणों से प्रभावित कर रहा था। कालिदास की रचना में जो तृप्ति और आनन्द की अजस्र धारा प्रवाहित हुई वह उसी सुख एवं समृद्धि के सौभाग्य समय में संभव हो सकी है। प्रो० विन्सेण्ट स्मिथ कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल में आये 'चीनांशुकमिव केतोः' इस उक्ति के आधार पर यह मानते हैं कि जिस बौद्ध धर्म के प्रभाव से भारत और चीन की पारस्परिक मैत्री होकर दोनों देशों की सभ्यता के संमिश्रण से एक तीसरी सभ्यता उत्पन्न हुई उसका पूर्ण विकास गुप्त वंश के राज्यकाल में ही हुआ।
कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् ।
नक्षत्रताराग्रहसंकुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥ (रघुवंश, ६-२२)
( १३ )
रघुवंश के इन्दुमती स्वयंवर में सुनन्दा सर्वप्रथम मगध के राजा की प्रशंसा करती है। गुप्तवंश के राजा मगध पर शासन करते थे, यह बात तो निर्विवाद है ही। प्रो० कीथ सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा किये जाने को यह मानते हैं कि कालिदास ने इस तरह प्रच्छन्नभाव से अपने आश्रयदाता का संकेत एवं कृतज्ञता घोषित करने के लिए प्रशंसा अपने काव्यों में की है। उनका कहना है कि कालिदास ने इसी तरह रघुवंश में ‘आसमुद्रक्षितीशानाम्’ इस वाक्य के द्वारा समुद्रगुप्त के राज्यविस्तार का संकेत किया है, इसी तरह ‘ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रि:’ इस श्लोकांश में आये ‘चन्द्र’ शब्द के द्वारा अपने आश्रयदाता चन्द्रगुप्त का एवं ‘कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम्’ इस श्लोक में आये ‘कुमार’ शब्द के द्वारा उसके पुत्र कुमारगुप्त का संकेत किया है। उनका कहना है कि ‘कुमारसम्भव’ नामक महाकाव्य की रचना कालिदास ने चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म के उपलक्ष्य में की है।
उन्होंने कालिदास को गुप्त काल में मानने के लिए कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। उनका कहना है कि अश्वघोष कनिष्क के शासनकाल में विद्यमान थे। अश्वघोष एवं कालिदास की रचनाओं में अनेक स्थल पर भाव-साम्य है। भावसाम्य के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं—
महाकवि अश्वघोष का अपने बुद्धचरित में सिद्धार्थ के जन्म का वर्णन—
वाता ववुः स्पर्शसुखा मनोज्ञा दिव्यानि वासांस्यवपातयन्तः।
सूर्यः स एवाऽभ्यधिकं चकासे जज्वल सौम्यार्चिरनीरिरतोऽग्निः ॥
( बुद्धचरित, १–२२ )
यदि इस तरह करते हैं तो महाकवि कालिदास भी अपने कुमारसंभव में कार्तिकेय के जन्म का भी वर्णन उसी प्रकार करते हैं—
वाता ववुः सौख्यकराः प्रसेदुः आशाविधूमो हुतभुग् दिदीपे।
जलान्यभूवन् विमलानि तत्रोत्सवेऽन्तरिक्षं प्रसाद सद्यः ॥ ( ११–३७ )
यदि अश्वघोष राजकुमार सिद्धार्थ जिस समय वनविहार के लिए राजमार्ग पर निकले उस समय उनको देखने के लिए उत्कण्ठित नगर-नारियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परम्परायासितकुण्डलानि।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥
( बुद्धचरित, ३–१९ )
( १४ )
तो कालिदास भी स्वयंवर में आते हुए अज को देखने के लिए उत्कण्ठित नगरस्त्रियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—
तासां मुखैरासवगन्धगर्भैर्व्याप्तान्तराः सान्द्रकुतूहलानाम्।
विलोचनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः सहस्रपत्र·भरणा इवाऽऽसन् ॥ (रघुवंश, ७-११)
बुद्धचरित में तपस्या में लीन बुद्ध को तपस्या से विरत करने के लिए प्रयत्नशील काम को आकाशस्थ विशिष्टभूत इस प्रकार फटकारता है—
मोघं श्रमं नार्हसि मार ! कर्तुं हिंसात्मतामुत्सृज गच्छ शर्म।
नैष त्वया कम्पयितुं हि शक्यो महागिरिर्मेरुरिवाऽनिलेन ॥
( बुद्धचरित, १३-५७ )
रघुवंश में नन्दिनी सेवा में तत्पर दिलीप की परीक्षा के लिए माया-निर्मित सिंह भी राजा को उसी प्रकार कहता है—
'अलं महीपाल! तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ (रघुवंश, २-३४)
इसी तरह सौन्दरनन्द में नन्द को बुद्ध के गौरव से एवं सुन्दरी प्रिया के अनुराग से हुई दुविधा का वर्णन अश्वघोष इस प्रकार करते हैं—
तं गौरवं बुद्धगतं चकर्ष, भार्यानुरागः पुनराचकर्ष ।
सोऽनिश्चयान्नाऽपि ययौ न तस्थौ तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥ ( ४-४२ )
कुमारसंभव में तपश्चर्यरत पार्वती की परीक्षा के लिए आये हुए ब्रह्मचारी वेशधारी शिव ने शिव की निन्दा सुनाने के कारण जाती हुई पार्वती को अपना स्वरूप दिखला कर जैसी दुविधा में डाला—कालिदास के द्वारा उसका वर्णन देखिए—
तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टि-निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती ।
मार्गाऽचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराज-तनया न ययौ न तस्थौ ॥
( ५-८५ )
इस प्रकार दोनों महाकवियों की रचनाओं में बहुत-से स्थलों पर समानता पायी जाती है जो इस बात को प्रमाणित करती है कि एक ने दूसरे का अनुकरण किया है। किसने अनुकरण किया और किसकी रचना अनुकार्य है इसका विवेचन यदि किया जाय तो समय की कुछ जानकारी हो सकती है । प्रो० साहेव का कहना है कि महाकवि भास ने अपने नाटकों में जैसी प्राकृत भाषा का प्रयोग किया है वह अश्वघोष के द्वारा प्रयुक्त प्राकृत से परिष्कृत और अर्वाचीन है, इससे सिद्ध होता है कि महाकवि भास अश्वघोष से अर्वाचीन हैं। महाकवि
( १५ )
कालिदास भास से अर्वाचीन हैं यह बात तो निबिवाद ही है क्योंकि कालिदास स्वयं मालविकाग्निमित्र नाटक के प्रारम्भ में भास को प्राचीन यशस्वी कवि मान चुके हैं। जैसे—प्रथितयशसां भाससौमिल्लकविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानः ? अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया है। हम पहले ही लिख चुके हैं कि अश्वघोष कनिष्क के समय में विद्यमान थे। कनिष्क सम्भवतः खृष्ट की प्रथम या द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में पञ्जाब का शासन करते थे। इस स्थिति में भास यदि तृतीय शताब्दी के कवि माने जाएँ तो कालिदास उनसे परवर्ती कवि माने जाएँगे।
दूसरी बात बाणभट्ट की रचनाओं से पता चलता है कि वे हर्षवर्द्धन के सभा-पण्डित थे। हर्षवर्द्धन सातवीं शताब्दी के मध्यभाग में राज्य करते थे एवञ्च बाणभट्ट ने कालिदास की प्रशंसा में 'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु' ऐसा लिखा है जिससे सिद्ध होता है कि कालिदास सातवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे।
“सविजयतां रविकीर्तिः कविताऽऽश्रितकालिदासभारविकीर्तिः” द्वितीय पुलकेशी के इस प्रस्तरलेख से सिद्ध होता है कि कालिदास द्वितीय पुलकेशी जो ६३४ खृष्टाब्द का माना जाता है, के पूर्व विद्यमान थे। इस तरह कालिदास ६३४ खृष्टाब्द से पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं।
वत्सभट्टि नाम के कवि ने प्राचीन दशपुर आधुनिक मन्दसोर नाम के स्थान के सूर्यमन्दिर के प्रशस्ति की रचना की है। जिस प्रशस्ति पर मालव संवत् ५२९ का उल्लेख है। पूर्वोक्त लेख की भाषा और शैली में कालिदास की भाषा और शैली की समानता पायी जाती है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास मालव सं० ५२९ से पूर्व विद्यमान थे।
प्रो० साहेब ने पूर्वोक्त प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहा है कि कालिदास तृतीय शताब्दी से पीछे एवं पाँचवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे। एवञ्च यह सिद्ध होता है कि कालिदास गुप्त वंश के राजाओं के राज्यकाल में विद्यमान थे। इनकी आनन्दपूर्ण शान्तिप्रदायिनी काव्यधारा उसी सौभाग्य समय में प्रवाहित हुई थी। एवञ्च पूर्वोक्त पद्य में 'चन्द्र' शब्द के आधार पर इनके आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय को मान लिया जाता है, जिसका राज्यकाल ४१४
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तक था। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि महाकवि कालिदास द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय में उत्पन्न हुए थे।
परन्तु पाश्चात्य विद्वानों के इस मत का यदि ठीक से विवेचन किया जाए तो उनका कथन मात्र काल्पनिक सिद्ध होगा, सत्य नहीं। जिसका विचार हम आगे करेंगे।
तीसरा मत है छठी शताब्दी अर्थात् विश्वविख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर का समय। इस मत को मानने वाले प्रमुख पाश्चात्य विद्वान् हैं-प्रो० मैक्स-मूलर, डॉ० भण्डारकर, प्रो. कर्न एवं डॉ. भाऊदा जी। इन लोगों का आधार भारतीय जनश्रुति है।
कालिदास के ग्रन्थों के टीकाकार मल्लिनाथजी ने मेघदूत की टीका में कालिदास को महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक माना है-पूर्वोक्त विद्वान् ने इसी पर निर्भर होकर इनको छठी शताब्दी का मान लिया है। क्योंकि कालिदास जिन नवरत्नों में एक थे उन्हीं में ज्योतिष के उद्भट् विद्वान् वराहमिहिर भी एक रत्न थे। ब्रह्मगुप्त के खण्डनखाद्य की टीका में अमरराज लिखते हैं-
‘नवाधिक-पञ्चशतसंख्याके वराहमिहिराचार्यो दिवं गतः’।
नवाधिक पञ्चाशत का अर्थ ५०९ होगा।
इस उक्ति के आधार पर वराहमिहिर की मृत्यु ५८७ खृष्टाब्द मानी जा सकती है। इस तरह कालिदास भी छठीं शताब्दी के सिद्ध होते हैं। आचार्य दिङ्नाग और धर्मकीर्ति असङ्ग के छात्रथे। असङ्ग ५४१ खृष्टाब्द में विद्यमान थे।
स्थानादस्मात्सरसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं
दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान्।
इस श्लोक की टीका में मल्लिनाथ ने दिङ्नाग एवं निचुल शब्द को श्लिष्ट माना है। दिङ्नागाचार्य वसबन्धु के भी छात्र थे। उसी समय उज्जयिनी में ‘विक्रमादित्य’ नामक राजा राज्य करते थे। कालिदास उन्हीं के सभा-रत्न थे, यह बात प्रमाणित होती है परन्तु यह मत भी निःसार ही प्रतीत होता है।
अब हम कालिदास को प्रथम शताब्दी का सिद्ध करने से पहले पूर्वकथित मतों का संक्षेप में विवेचन कर वास्तविकता की ओर बढ़ें।
गुप्तकाल में ही संस्कृतविद्या का पुनर्जागरण हुआ यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह सर्वसम्मत मत नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत
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विद्या का चरमोत्कर्ष विक्रमादित्य और राजा भोज के समय में हुआ और उसे ही संस्कृत का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। जिन विद्वानों ने 'चीनांशुकमिव-' यहाँ प्रयुक्त 'चीन' शब्द को देशपरक मानकर तात्कालिक सभ्यता का आदान-प्रदान आदि की कल्पना की है वह भ्रम मात्र है सत्य नहीं। क्योंकि 'चीन' शब्द का मेदिनी कोश के 'चीनो देशांशुकव्रीहिभेदे तन्तौ मृगान्तरे' इस पंक्ति के अनुसार 'रेशमी' वस्त्र भी अर्थ है। और यही अर्थ शाकुन्तल के उक्त स्थल के उपयुक्त भी है। 'चीनांशुक' में चीन (देश) का अंशुक (कपड़ा) ऐसा षष्ठी तत्पुरुष समास न मानकर 'चीनं च तदंशुकम्' ऐसा कर्मधारय मानने से उपर्युक्त रेशमीवस्त्र वाला मत पुष्ट हो जाता है। एवञ्च इन्दुमती स्वयंवर में सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा करवाने के कारण कालिदास यदि मगध के राजाओं के आश्रित मान लिये जायें तो, उनकी जन्मभूमि के विषय में अनेक तरह के प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे मेघदूत में अलकापुरी की अत्यधिक प्रशंसा करने से वे अलकापुरी के कोई यक्ष मान लिये जायें एवञ्च कुमारसंभव में हिमालय की पर्याप्त प्रशंसा करने के कारण वे कोई हिमालयवासी किन्नर मान लिये जाएँ, रघुवंश में रघु और अज की अत्यधिक प्रशंसा करवाने के कारण उन्हें अयोध्यावासी मान लिया जाए, शाकुन्तल में शकुन्तला प्रस्थान के समय आचार को देखकर उन्हें मिथिलावासी ही न क्यों मान लिया जाए इस प्रकार बहुतेरे प्रश्न हो सकते हैं। अतः विद्वानों का उक्त आधार भी बालू की भीति ही है।
इसी तरह 'ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः' इस श्लोकांश एवं 'गुप्तमूल प्रयत्नतः' इत्यादि स्थलों को आधार मान कर यह कहना कि कालिदास ने अपने आश्रयदाता गुप्त वंशज राजाओं का एवं 'चन्द्र' पद से 'द्वितीय चन्द्रगुप्त' का निर्देश किया है तो यह कहना भी युक्तिमूलक नहीं प्रतीत होता क्योंकि जब कवि सर्वतन्त्रस्वतन्त्र होता है एवं उन्हें यदि अपने आश्रयदाता का संकेत ही करना था तो स्पष्ट रूप से कह सकते थे। कुमारसंभव की रचना चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्मोत्सव पर की गयी यह भी कोरी कल्पना है, इसमें सत्यता नहीं क्योंकि इसमें कोई प्रबल प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया इस लिए वे अश्वघोष के परवर्ती हैं, यह भी नहीं कह सकते।
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महाकवि कालिदास की रचना कवित्वप्रदर्शन मात्र के लिए अर्थात् 'कला कला के लिए' थी, जब कि अश्वघोष की रचना अध्यात्ममार्ग से अन्यमनस्क लोगों का ध्यान काव्य के माध्यम से अध्यात्म की ओर आकृष्ट करना था। जैसा कि उन्होंने सौन्दरनन्द में स्पष्ट रूप से लिख भी दिया है।
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भा कृतिः श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात्कृता । इत्यादि
अतः रचना की समता को लेकर किसी महाकवि की रचना को मौलिक और किसी की रचना को अनुकृतिमूलक कहना साहसमात्र है। वैसे यदि कहा जाय कि अश्वघोष ने ही कालिदास का अनुकरण किया तो युक्तियुक्त भी हो सकता है। जैसे—
अपने नगर में अपने पिता द्वारा अवरुद्ध सिद्धार्थ का वन-विहार के लिए निकलने पर नगर-स्त्रियों की उत्सुकता उतनी नहीं रही होगी जितनी कि कुमारसंभव में ओषधिप्रस्थ में वरयात्रा के प्रसङ्ग में शिवजी या इन्दुमती स्वयंवर के अनन्तर अज की यात्रा में उसे देखने के लिए स्त्रियों की उत्सुकता अपूर्व रही होगी, अतः महाकवि ने जो स्त्रियों के औत्सुक्य का वर्णन किया है वह स्वाभाविक है अतः मौलिक एवं मनोरम है। अश्वघोष को तो अनुकृतिमूलक है।
कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण नहीं किया इसमें एक युक्ति यह भी है कि अनुकरण आदर्श का; उत्तम का किया जाता है जो स्वयं अपूर्ण है उसका कोई भला क्या अनुकरण करेगा? अश्वघोष की भाषा-शैली अपरिमार्जित है च्युति-संस्कृति दोषग्रस्त और साथ ही उतना हृदयावर्जक भी नहीं जितनी कि महाकवि कालिदास की। कालिदास की शैली परिमार्जित, सरस एवं मनोरम है।
साथ ही महाकवि कालिदास कितने निरभिमानी थे इस बात को मैंने प्रारम्भ में ही लिख दिया है। ये अपने से प्राचीन प्रतिष्ठित कवियों का यशो-गान करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते और न अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग ही मानते थे। अतः उन्होंने मालविकाग्निमित्र में लिखा है कि—
'भास-सौमिल्लककविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानं' इत्यादि ।
यदि कालिदास महाकवि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो उपर्युक्त पंक्ति में क्या उनका नामोल्लेख नहीं करते ? अवश्य
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करते । और भी ‘चोरी’ चोरी की तरह की जाती है। महाकवि कालिदास यदि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो वे यह साहस कभी नहीं कर सकते थे कि एक ही भाव को अपने दो महाकाव्यों (कुमारसंभव और रघुवंश) में उल्लेख करते। अतः इस आधार पर उन्हें चौथी शताब्दी के शेष भाग से पाँचवीं शताब्दी के पूर्वार्ध का मानना कल्पनामात्र है।
प्रो० मैक्समूलर का यह कहना कि संस्कृत विद्या का चरमोत्कर्ष छठी शताब्दी से हुआ और उस समय कालिदास विद्यमान थे, फर्गुसन के कथन पर आधारित है। फर्गुसन का कहना है कि "खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नाम का कोई राजा था ही नहीं, अतः कालिदास प्रथम शताब्दी के नहीं माने जा सकते। अपितु, उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य ने ५४४ ई० सन् में भारत से शकों को भगाकर उस विजयोपलक्ष्य में ६०० वर्ष पूर्व अपना संवत्सर स्थापित किया और उसी समय कालिदास उत्पन्न हुए।"
परन्तु फर्गुसन के इस मत का खण्डन प्रो० फ्लीट और हर्नैल ने महाकवि कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रन्थ के इस श्लोक—
धन्वन्तरिक्षपणकाऽमरसिंहशङ्कु-वेतालभट्टघटखर्पर-कालिदासाः। ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
को आधार मानकर किया है। कुछ यूरोपीय विद्वान् ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ को महाकवि कालिदास की कृति नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ में वर्णित ग्रहादि की दशा से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के पश्चात् किसी नवीन विद्वान् ने इसका निर्माण किया है और कालिदास के नाम से प्रचरित कर दिया है। 'अस्तु' ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ भले ही कालिदास विरचित न हो परन्तु यह तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि कालिदास विक्रम के नवरत्नों में एक थे। अब रही बात खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नामक राजा के रहने और न रहने की, तो इस पर यदि विचार किया जाय तो यह भी सिद्ध हो जाता है कि खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रम थे।
डॉ० राजबली पाण्डेय ने अपने "विक्रमादित्य" नामक ग्रन्थ में पर्याप्त प्रमाणों से सिद्ध कर दिया है कि खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व विक्रम नामक राजा थे। यूरोपीय विद्वान् ने जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को ही उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य मानकर यह लिखा है कि 'उसी ने ५४४ ई० सन् में शकों को भारत
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से भगाया और ६०० साल पहले का संवत्सर चलाया' बिलकुल निराधार एवं बेतुका लगता है। यदि उसे अपने नाम से ही संवत्सर चलाना था तो ६०० साल पहले से क्यों चलाता ? साथ ही यूरोपीय विद्वानों ने अपने उक्त कथन में कोई प्रमाण भी नहीं दिया है। अतः यह भी मत अनादरणीय ही है।
अब हम भारतीय विद्वानों के सम्मत प्रथम शताब्दी वाले मत का उल्लेख करने जा रहे हैं।
भारत की बहुप्रचलित जनश्रुति के आधार पर मालवनरेश विक्रम संवत्सर के प्रवर्तक जो खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व हुए थे उन "विक्रमादित्य" की सभा के नवरत्नों में कालिदास भी एक रत्न थे ।
महाकविकालिदास गुप्तवंश के राजाओं के आश्रित नहीं थे अपितु खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी के विक्रमादित्य के आश्रित थे, निम्नलिखित प्रमाणों से सिद्ध हो जाता है ।
जे० के० सुब्रह्मण्यम् ने कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक से जो सूक्ष्म प्रमाण प्रस्तुत किये हैं वह महत्त्वपूर्ण हैं। उनका कथन है कि—महाकवि ने अपनी नवीन रचना के विषय में यह लिखा है कि—
"पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।"
इत्यादि । यहां प्रयुक्त "पुराण" पद श्लिष्ट है । महाकवि ने पुराण शब्द के द्वारा "पुराणख्यातवृत्त" का संकेत किया है। अर्थात् प्राचीन कवियों ने जो प्राचीन ( रामायण, महाभारत आदि ) ख्यातवृत्तों का आश्रयण लेकर अपने काव्यों की रचना की है उसका मैंने ( कालिदास ने ) उल्लंघन किया है, इसलिए वह उपेक्ष्य नहीं है, काव्य-मर्मज्ञजन उसकी परीक्षा करके इस बात का निर्णय कर सकते हैं। वस्तुतः महाकवि ने उक्त नियम का उल्लङ्घन किया है। मालविकाग्निमित्र के भरतवाक्य—
"आशास्यमीतिविगमप्रभृतिप्रजानां
संपत्स्यते न खलु गोप्तरि नाऽग्निमित्रे ॥"
में प्रयुक्त "गोप्तरि, अग्निमित्रे" पद की सप्तमी को भावलक्षणा मानकर उस समय "अग्निमित्र" जीवित थे यह सिद्ध होता है। अग्निमित्र पुष्यमित्रशुङ्ग के पुत्र थे। इनका समय खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी माना गया है।
महाकवि की रचनाओं के अवलोकन से यह बात (प्रथम शताब्दी की) और भी प्रमाणित हो जाती है। शुङ्गवंश के राजाओं के समय चोरी जैसे अपराधों
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में मनु, वशिष्ठ और आपस्तम्ब ऋषियों की स्मृतियों के आधार पर मृत्युदण्ड का विधान था। जैसा कि 'अँगूठी की चोरी में पकड़े गये मल्लाह को प्राण-दण्ड दिया जाता है।' अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में कालिदास ने ऐसा अभिनीत करवाया है। परन्तु गुप्तकाल में वैसा कठोर दण्ड–चोरी जैसे अपराध के लिए नहीं था। उस समय याज्ञवल्क्य-स्मृति की मान्यता थी। और भी, कालिदास ने अपने नाटकों में मृतपति के धन का दायभाग विधवा को नहीं दिया जाता है वह राज-कोष की चीज है, ऐसा वर्णित किया है जो कि मनु, वशिष्ठ, बौधायन और आपस्तम्ब स्मृतिसम्मत है। परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार विधवा को उसके मृतपति के धन का दायभाग मिलता है—ऐसी व्यवस्था गुप्तकाल में थी। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास शुङ्गवंश के राजाओं के समय में थे न कि गुप्तवंश के राजाओं के समय।
कालिदास अपने आश्रयदाता का स्पष्ट संकेत अपनी रचना में ही करते हैं। जैसे कि शाकुन्तल के प्रारम्भ में सूत्रधार नटी से कहता है 'आर्ये ! रस-भावदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्याऽभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। अस्यां च कालिदास-ग्रथितवस्तुना नवेनाऽभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः।' पूर्वकाल में आजकल के समान उपाधि के तौर पर नाम का प्रयोग नहीं किया जाता था अतः उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'विक्रमादित्य' का अर्थ—
मालवनरेश खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में विद्यमान संवत्सर-प्रवर्तक विक्रमादित्य' ही है, न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' उपाधिधारी।
महाकवि को प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध करने में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द भी प्रमाण है। उन्होंने कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में एक श्लोक में लिखा है—'त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श'
यहाँ पाणिनि व्याकरण के नियम से लोक में 'त्र्यम्बक' प्रयोग ही साधु है और उसी का प्रयोग होना चाहिए था। परन्तु उक्त प्रयोग होने के कारण यह सिद्ध होता है कि कालिदास के समय पाणिनि व्याकरण पूर्ण रूप से लोक में प्रचलित नहीं हो पाया था। इसी तरह उन्होंने 'पातयामास' का जहाँ प्रयोग उचित था वहाँ 'पातयाम्' का पृथक् और 'आस' का पृथक् प्रयोग किया है, जैसे—'तं पातयां प्रथममास पपात पश्चात्'। (रघुवंश, ९ ६१) इत्यादि।
३ मे० भू०