मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पञ्चमोऽङ्कः ३०६
चारुदत्तः—वयस्य ! अलमिदानी सर्वं परिवादमुक्त्वा; अवस्थयै- नास्मि निवारितः । पश्य—
वेगं करोति तुरगस्त्वरितं प्रयातुं
प्राणव्ययान्न चरणास्तु तथा वहन्ति ।
सर्वत्र यान्ति पुरुषस्य चलाः स्वभावाः
खिन्नास्ततो हृदयमेव पुनविशन्ति ॥ ८ ॥
अर्थ—चारुदत्त— मित्र इस समय निन्दा करना व्यर्थ है, (निर्धन) अवस्था ने ही (वेश्यासर्ग से) रोक दिया है। देखो—
अन्वयः— तुरगः, त्वरितम्, प्रयातुम्, वेगम्, करोति, तु, प्राणव्ययात्, तस्य, चरणाः, तथा, न, वहन्ति; (एवमेव), पुरुषस्य, चलाः, स्वभावाः, सर्वत्र, यान्ति, (परन्तु), ततः, खिन्नाः, पुनः, हृदयम्, एव, विशन्ति ॥ ८ ॥
शब्दार्थ—तुरगः = घोड़ा, त्वरितम् = शीघ्र ही, प्रयातुम् = दौड़ने के लिये, वेगम्= वेग को, करोति= करता है; तु= लेकिन, प्राणव्ययात्= शक्ति क्षीणता के कारण, तस्य = उस घोड़े के, चरणाः = कदम, पैर, तथा= उस प्रकार (वेग से), न= नहीं, वहन्ति = ढोते हैं, चल पाते हैं; (एवम् एव= इसी प्रकार) पुरुषस्य = मनुष्य के, चलाः = चञ्चल, स्वभावाः = स्वभाव, मनोवृत्तियाँ, सर्वत्र= सभी स्थानों पर, यान्ति= जाती हैं, (परन्तु = लेकिन), ततः = उन स्थानों से, खिन्नाः = निराश होती हुयीं, पुनः= फिर, हृदयम् एव = मनमें ही, विशन्ति = घुस जाती हैं, वापस लौट आती हैं ।।८।।
अर्थ— घोड़ा शीघ्र भागने के लिये वेग (ताकत) लगाता है परन्तु शक्ति क्षीणता के कारण पैर उस प्रकार वेग से नहीं चलते हैं, इसी प्रकार मनुष्य के चञ्चल स्वभाव (मनोवृत्तियाँ) सभी ओर जाते हैं परन्तु (कहीं भी सफल न हो सकने के कारण) निराश होकर पुनः मनमें ही वापस लौट आते हैं। (अतः निर्धनता के कारण ही वेश्यासंग छूट जायगा, उसकी निन्दा करने का कोई लाभ नहीं है)॥८॥
टीका—निर्धनतैव गणिकाप्रसङ्गात् वारयति, न तत्र अन्यदपेक्ष्यमिति सांध- यन्नाह—वेगमिति । तुरगः = अश्वः, त्वरितम् = शीघ्रम्, प्रयातुम् = गन्तुम्, धावितु-मिति भावः, वेगम् = जवम्, करोति = विदधाति, तु= किन्तु, प्राणव्ययात्= शक्ति-क्षीणतया, हेतोः, तस्य= अश्वस्य, चरणाः = पादाः, तथा= वेगपूर्वकम्, न, वहन्ति = न चलन्ति, एवमेव, पुरुषस्य = मनुष्यस्य, चलाः = चञ्चलाः, स्वभावाः = मनोवृत्तयः, सर्वत्र= साध्यासाध्येषु, यान्ति= व्रजन्ति, तु= किन्तु, ततः = तत्तत्स्थानेभ्यः, खिन्नाः = निराशाः, असफला इति भावः, पुनः, हृदयम् = चित्तम्, एव, विशन्ति = प्रविशन्ति, परावर्तन्ते इति भावः । एवञ्च अस्मद्दरिद्रतैव मनोरथबाधिकेति बोध्यम् । दृष्टान्ता- लङ्कारः, बसन्ततिलका वृत्तम् ।। ८ ।।
| ३१० | मृच्छकटिकम् |
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अपि च—वयस्य !
यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता, धनहार्यो ह्यसौ जनः ।
( स्वगतम् ) न, गुणहार्यो ह्यसौ जनः । ( प्रकाशम् )
वयमर्थैः परित्यक्ताः, ननु त्यक्तैव सा मया ॥ ६ ॥
विमर्श— किसी समय तेज दौड़नेवाला घोड़ा भी शक्तिस्रीण होने पर चाह कर भी जैसे नहीं दौड़ पाता है, उसी प्रकार असमर्थ मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ भी दौड़कर मनमें ही रह जाती हैं। चारुदत्त का स्वभाव वसन्तसेना के पास गया हुआ भी अर्थाभाव के कारण दुःखी होकर वहाँ से वापस लौट आया'—इस विशेष के प्रस्तुत रहते उसी प्रकार के अप्रस्तुत सामान्य का कथन होने से उत्तरार्ध में अप्रस्तुतप्रशंसा है और वह—शीघ्र चलने की इच्छा करता हुआ भी घोड़ा असमर्थ होने के कारण नहीं चल पाता—इस प्रकार समान धर्मवाली वस्तु का प्रतिबिम्बित होने से पूर्वार्द्ध के दृष्टान्त अलङ्कार से सङ्कीर्ण है। दोनों का संकर अलङ्कार है ॥८॥
अन्वयः— यस्य, अर्थाः, (सन्ति), तस्य, सा, कान्ता, हि, असौ, जनः, धनहार्यः, न, असौ, जनः, गुणहार्यः (अस्ति), वयम्, अर्थैः, परित्यक्ताः, (अतः), सा, मया, ननु, त्यक्ता, एव ॥ ६ ॥
शब्दार्थ— यस्य=जिसके पास, अर्थाः=धन, सन्ति=हैं, तस्य=उसकी, सा=वह वसन्तसेना, कान्ता=प्रेयसी है, हि=क्योंकि, असौ=वह, जन=वेश्या, धनहार्यः=धन से खरीदी जाने योग्य, न=नहीं, असौ जनः=वह वसन्तसेना, गुणहार्यः=गुणों से वश में होने वाली, अस्ति=है, वयम्=हम लोग, अर्थैः=धन के द्वारा, परित्यक्ताः=छोड़ दिये गये हैं, (अतः=इसलिये), ननु=निश्चित ही, सा=वह वसन्तसेना, मया=मुझ चारुदत्त के द्वारा, त्यक्ता एव=छोड़ ही दी गयी ॥ ६ ॥
अर्थ— और भी मित्र !
जिसके पास धन है, उसी की वह वसन्तसेना है क्योंकि वह वेश्या धन से खरीदी जाने योग्य है।
(अपने में) नहीं, वह तो गुणों से वश में होने योग्य है।
(प्रकाश) धन ने हम लोगों को छोड़ दिया, अतः निश्चित ही हम लोगों ने वेश्या को छोड़ दिया ॥ ६ ॥
टीका— मद्गुणवशवर्त्तिनी वसन्तसेना निर्धनमपि मां न परित्यजतीति सम्यग् जानन्नपि विदूषकस्य सन्तोषायस्यान्यथा वदति-यस्येति। यस्य=पुरुषस्य, समीपे, अर्थाः =धनानि, सन्ति; तस्य=जनस्य, सा=वसन्तसेना, कान्ता=प्रेयसी, हि=यतः, असौ= वेश्यारूपी जनः, धनेन=वित्तेन, हार्यः=वश्यः, अस्ति, परन्तु वयम्, अर्थैः=धनैः, परित्यक्ताः=विरहिताः, अतः, मया=चारुदत्तेन, सा=वसन्तसेना, त्यक्ता=परित्यक्ता
पञ्चमोऽङ्कः ३११
विदूषकः—( अधोऽवलोक्य, स्वगतम् ) जधा एसो उद्धं पेक्खिअ दीहं णिस्ससदि, तथा तक्केमि मए विणिवारिअन्तस्स अधिअदरं वड्ढिदा से उक्कण्ठा। ता सुट्ठु क्खु एव्वं वुच्चदि—'कामो वामो'त्ति। ( प्रकाशम् ) भो वअस्स ! भणिदं अ ताए—'भणेहि चारुदत्तं अज्ज पओसे मए एत्थ आअन्तव्वं'त्ति। ता तक्केमि रअणावलीए अवसिट्टुट्ठा अवरं मग्गिदुं आअमिस्सदि'त्ति। ( यथा एष ऊर्ध्वं प्रेक्ष्य दीर्घं निःश्वसिति; तथा तर्कयामि-मया निवार्यमाणस्य अधिकतरं वृद्धा अस्य उत्कण्ठा। तत् सुष्ठु खल्वेवमुच्यते 'कामो वामः' इति। भो वयस्य ! भणितञ्च तया 'भण चारुदत्तम्—अद्य प्रदोषे मया अत्र आगन्तव्यम्, इति, तत् तर्कयामि रत्नावल्या अपरितुष्टा अपरं याचितुमागमिष्यतीति। )
चारुदत्तः—वयस्य ! आगच्छतु, परितुष्टा यास्यति।
चेटः—( प्रविश्य ) अवेध माणहे ! ( अवेत मानवाः ! )
जधा जधा वरशदि अभ्रखण्डे तथा तथा तिम्मदि पुट्ठिचम्मे।
जधा जधा लग्गदि शीदवादे तथा तथा वेवदि मे हअक्के ॥ १० ॥
यथा यथा वर्षति अभ्रखण्डम्, तथा तथा तिम्यति पृष्ठचर्म।
यथा यथा लगति शीतवातस्तथा तथा वेपते मे हृदयम् ॥ १० ॥
एव। एवञ्च तस्याः परित्यागविषये विदूषकेण न किमपि कर्तव्यमिति भावः। अत्र श्लोके चतुर्थपादस्यार्थं प्रति तृतीयपादस्य अर्थस्य हेतुतया काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥ ९ ॥
अर्थ—विदूषक—( नीचे की ओर देखकर अपने में ) जिस प्रकार ये ऊपर देखकर लम्बी सांसें ले रहे हैं ( आहें भर रहे हैं ) इससे मैं अनुमान कर रहा हूँ कि मेरे द्वारा वेश्यासंग से रोके जानेवाले इनकी उत्कण्ठा और अधिक बढ़ रही है। इसलिये यह ठीक ही कहा गया है—'कामविकार उल्टा होता है।' (प्रकट में) हे मित्र ! और उसने यह कहा है—'चारुदत्त से कहना कि आज सायंकाल मुझे उनके पास आना है।' इससे यह सोंचता हूँ कि रत्नावली से सन्तुष्ट न होनेवाली वह वेश्या कुछ और लेने के लिये आयेगी।'
चारुदत्त—मित्र, आने दो। सन्तुष्ट होकर जायेगी।
अन्वयः—अभ्रखण्डम्, यथा, यथा, वर्षति, पृष्ठचर्म, तथा, तथा, तिम्यति; शीतवातः, यथा, यथा, लगति, तथा, तथा, मे, हृदयम्, वेपते ॥ १० ॥
शब्दार्थ—अभ्रखण्डम् = बादलों का टुकड़ा, यथा यथा = जैसे जैसे, वर्षति = बरस रहा है, पृष्ठचर्म = पीठ का चमड़ा, तथा तथा = वैसे वैसे, तिम्यति = भीग रहा है; शीतवातः = ठण्डी हवा, यथा, यथा = जैसे जैसे, लगति = लग रही है, तथा तथा = वैसे वैसे, मे-मेरा, हृदयम् = हृदय, वेपते = काँप रहा है ॥ १० ॥
३१२ मृच्छकटिकम्
( प्रहस्य )
वंशं वाए शत्तच्छिद्दं शुशद्दं वीणं वाए शत्ततन्ति णदन्ति ।
गीअं गाए गद्दहश्शाणुलूअं के मे गाणे तुम्बुलू णालदे वा ॥११॥
वंशं वादयामि सप्तच्छिद्रं सुशब्दं वीणां वादयामि सप्ततन्त्रीं नदन्तीम् ।
गीतं गायामि गर्दभस्यानुरूपं को मे गाने तुम्बुरुर्नारदो वा ॥ ११ ॥
आणत्तम्हि अज्जआए वसन्तसेणाए—कुम्भीलआ ! गच्छ तुमं मम
अर्थ—चेट—( प्रवेश करके ) मनुष्यों ! [ यह ] समझ जाइये—
बादलों का टुकड़ा जैसे जैसे बरस रहा है, पीठ का चमड़ा वैसे वैसे भीग रहा है; जैसे जैसे ठण्डी हवा लग रही है, वैसे वैसे मेरा हृदय काँप रहा है ॥ १० ॥
टीका—वर्षाजलेनाईशरीरः कम्पमानश्चेटोऽन्यान् सावधानान् कर्तुमाह— यथा यथेति । अभ्रखण्डम् = मेघखण्डम्, यथा यथा=येन येन प्रकारेण, वर्षति = कटति, जलवर्षणं करोति, पृष्ठचर्म=शरीरस्य पश्चाद्भागः, तथा तथा, तिम्यति = आर्दीर्भवति; शीतवातः=शीतलः पवनः, यथा यथा, लगति=शरीरं स्पृशति, तथा तथा, मे=मम, हृदयम्=मनः, अन्तःकरणम्, वेपते=कम्पते । उपेन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥१०॥
विमर्श—वर्षा की अवस्था प्रस्तुत करने के लिये चेट का कथन है ॥ १० ॥
अन्वयः—सप्तच्छिद्रम्, सुशब्दम्, वंशम्, वादयामि; नदन्तीम्, सप्ततन्त्रीम्, वीणाम्, वादयामि; गर्दभस्य, अनुरूपम्, गीतम्, गायामि; गाने, तुम्बुरुः, नारदः, वा, मे, कः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ—सप्तच्छिद्रम् = सात छेदों वाली, सुशब्दम् = मधुर आवाजवाली, वंशम् = बाँसुरी को, वादयामि = बजा रहा हूँ; नदन्तीम् = झंकार करनेवाली, सप्त-तन्त्रीम्=सात स्वरों के उत्पादक तन्त्रों से युक्त, वीणाम्=वीणा को, वादयामि=बजा रहा हूँ; गर्दभस्य = गधे के, अनुरूपम् = समान, गीतम्=गाना को, गायामि=गा रहा हूँ; गाने=गाने में, तुम्बुरुः=तुम्बुर, वा=अथवा, नारदः=नारद, मे=मेरे विषय में, कः=कौन हैं, अर्थात् मेरे सामने कुछ नहीं है ॥ ११ ॥
( हंस कर )
अर्थ—सात छेदोंवाली, मधुर आवाजवाली बांसुरी बजा रहा हूँ । झंकार करनेवाली, सात तारोंवाली वीणा बजा रहा हूँ । गधे के समान मैं गाता हूँ । गाने में तुम्बुरु (गन्धर्व) या नारद मेरे सामने क्या हैं ? अर्थात् कुछ नहीं है ॥११॥
टीका—इदानीं चेटः स्वगीतकौशलं प्रदर्शयितुमाह—सप्तच्छिद्रमिति । सप्त-च्छिद्रम् = षड्जादिसप्तस्वरोत्पादकसप्तरन्ध्रयुक्तम्, सुशब्दम् = सुस्वरम्, वंशम्=वेणुम्, वादयामि=ध्वनयामि । नदन्तीम्=शब्दायमानाम्, सप्ततन्त्रीम्=सप्तसंख्याक-
पञ्चमोऽङ्कः ३१३
आगमणं अज्जचारुदत्तश्श णिवेदेहि'त्ति । ता जाव आज्जचारुदत्तश्श गेहं गच्छामि । ( परिक्रम्य प्रविष्टकेन दृष्ट्वा ) एशे चारुदत्ते रुक्खवाडिआए चिट्ठदि । एशे वि शे दुट्ट वडुके । ता जाव उपशप्पेमि । कथं ढक्किदे दुबाले रुक्खवाडिआए । भोदु, एदश्श दुट्ठवडुकश्श शण्णं देमि । ( इति लोष्टगुटिकाः क्षिपति । ) ( आज्ञप्तोस्मि आर्यया वसन्तसेनया-'कुम्भीलक ! गच्छ त्वम्, मम आगमनम् आर्यचारुदत्तस्य निवेदय' इति । तद् यावत् आर्यचारुदत्तस्य गेहं गच्छामि । एष चारुदत्तो वृक्षवाटिकायां तिष्ठति एषोऽपि स दुष्टवटुकः । तद्यावदुपसर्पामि । कथमाच्छादितं द्वारं वृक्षवाटिकायाः । भवतु, एतस्य दुष्टवटुकस्य संज्ञां ददामि । )
विदूषकः—अए ! को दाणि एसो पाआरवेहिट्ठदं विअ कइत्थं मं लोट्टकेंहि ताडेदि ? । ( अये ! क इदानीमेष प्राकारवेष्टितमिव कपित्थं मां लोष्टकैस्ताडयति ? )
चारुदत्तः—आराम-प्रासाद-वेदिकायां क्रीडद्भिः पारावतै पतितं भवेत् ।
स्वरोत्पादकसप्ततन्त्रीयुक्ताम्, वीणाम् = वाद्यविशेषम्, च, वादयामि = शब्दितां करोमि । गर्दभस्य=रासभस्य, अनुरूपम्=तुल्यम्, गीतम्=गानम्, गायामि=करोमीति भावः । गाने=गानकलायाम्, तुम्बुरुः=तन्नाम्ना प्रसिद्धो गन्धर्वः, वा=अथवा, नारदः = देवर्षिः, मे = मम सम्बन्धे, कः = कीदृशो गुणशाली, न गणनीय इति भावः । अत्रोपमानापेक्षयोपमेयस्याधिक्यवर्णनात् व्यतिरेकालंकारः । शालिनीवृत्तम् ।। ११ ।।
अर्थ—आर्या वसन्तसेना ने आज्ञा दी है—'कुम्भीलक ! तुम जाओ, आर्य चारुदत्त को मेरे आगमन की सूचना दे दो ।' इसलिये आर्य चारुदत्त के घर जाता हूँ । ( घूमकर घुसनेवाले दरवाजे से देखकर ) ये आर्य चारुदत्त वृक्षवाटिका ( फुलवाड़ी ) में बैठे हैं, और वह दुष्ट ब्राह्मण का बच्चा भी है । तो अब समीप में चलता हूँ । क्या वृक्षवाटिका ( फुलवाड़ी ) का दरवाजा बन्द है । अच्छा, इस दुष्ट ब्राह्मण को इशारा करता हूँ । ( इस प्रकार कहकर कंकड़ियां=मिट्टी के ढेले फेंकता है । )
विदूषक—अरे ! इस समय कौन चहारदीवार से घिरे हुये कैंथे के समान मुझे कंकड़ियों से मार रहा है ।
चारुदत्त—फुलवाड़ी के महल की चौकी पर खेलते हुये कबूतरों ने गिरा दी होंगी ।
३१४ | मृच्छकटिकम्
**विदूषकः—**दासीए पुत्त ! दुट्ट पारावअ ! चिट्ठ चिट्ठ, जाव एदिणा दण्डकट्ठेण सुपक्कं विअ चुअफलं इमादो पासादादो भमिए पाडइस्सं । ( इति दण्डकाष्ठमुद्यम्य धावति ) दास्याः पुत्र ! दुष्ट पारावत ! तिष्ठ तिष्ठ, यावदेतेन दण्डकाष्ठेन सुपक्वमिव चूतफलम् अस्मात् प्रासादात् भूमौ पातयिष्यामि ।)
चारुदत्तः—( यज्ञोपवीते आकृष्य ) वयस्य ! उपविश । किमनेन । तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्त्री पारावतः ।
**चेटः—**कधं पारावदं पेक्खदि, मं ण पेक्खदि । भोदु, अवराए लोट्ट-गुडिआए पुणो वि ताडइस्सं । ( तथा करोति । ) कथं परावर्तं प्रेक्षते, मां न प्रेक्षते ! भवतु, अपरया लोष्टगुटिकया पुनरपि ताडयिष्यामि । )
विदूषकः—( दिशोऽवलोक्य ) कधं कुम्भीलओ ! ता जाव उपसप्पामि । ( उपसृत्य द्वारमुद्घाट्य ) अरे कुम्भीलअ ! पविश । साअदं दे । ( कथं कुम्भीलक ! तद् यावदुपसर्पामि । अरे कुम्भीलक ! प्रविश । स्वागतं ते । )
चेटः—( प्रविश्य ) अज्ज ! वन्दामि । ( आर्य ! वन्दे । )
**विदूषकः—**अरे ! कहिं तुमं ईदिसे दुद्दिणे अन्धआरे आअदो । ( अरे ! कस्मिन् त्वमीदृशे दुर्दिने अन्धकारे आगतः । )
**चेटः—**अले एशा शा । ( अरे एषा सा । )
**विदूषकः—**का एशा का ? ( का एषा का ? )
**चेटः—**एशा शा । ( एषा सा । )
**विदूषक—**अरे दासी के बच्चे, दुष्ट कबूतर ! ठहर जा, ठहर जा; इस लकड़ी के डण्डे से पके हुये आम के समान तुझे इस महल से नीचे गिराता हूँ । ( यह कह कर लकड़ी का डण्डा लेकर दौड़ता है । )
चारुदत्त -- ( जनेऊ पकड़ कर ) मित्र ! बैठो । इससे क्या लाभ ? उस बेचारे कबूतर को अपनी प्रेयसी कबूतरी के साथ बैठा रहने दो ।
**चेट—**क्या, कबूतर को देख रहा है, मुझे नहीं देख रहा है । अच्छा अब दूसरी कंकड़ी से फिर मारता हूँ । ( वैसा ही करता है । )
विदूषक— ( चारों ओर देखकर ) क्या कुम्भीलक ! तो पास चलता हूँ । ( पास जाकर दरवाजा खोलकर ) अरे कुम्भीलक ! आओ, तुम्हारा स्वागत है ।
चेट—( प्रवेश करके ) आर्य ! प्रणाम करता हूँ ।
**विदूषक—**अरे ! तुम इस प्रकार के दुर्दिन के अन्धेरे में किस लिये आये हो ?
**चेट—**अरे ! यह वह है ।
**विदूषक—**वह कौन वह कौन ?
**चेट—**वह यह है ।
पञ्चमोऽङ्कः ३१३
विदूषकः--किं दाणि दासोए पुत्ता ! दुब्भिक्खकाले बुद्धरङ्को विअ उद्धकं सासाअसि 'एसा सा सा' त्ति ! (किमिदानीं दास्याः पुत्रः ! दुर्भिक्ष-काले वृद्धरङ्क इव ऊर्ध्वकं श्वासायसे 'एषा सा सा' इति )
चेटः--अले तुमं पि दाणि इन्द्र-मह-कामुको विअ सुट्ठु किं काका-असि 'का का' त्ति । ( अरे त्वमपीदानीमिन्द्रमहकामुक इव सुष्ठु किं काका-यसे 'का का' इति ? )
विदूषकः--ता कहेहि । ( तत् कथय । )
चेटः--( स्वगतम् ) भोदु, एव्वं भणिश्शं । ( प्रकाशम् ) अले ! पण्हं दे दइश्शं । ( भवतु, एवं भणिष्यामि । अरे ! प्रश्नं ते दास्यामि । )
विदूषकः--अहं दे मुण्डे गोडं दइस्सं । ( अहं ते मुण्डे पादं दास्यामि )
चेटः--अले, जाणाहि दाव, तेण हि कस्मिं काले चूआ मोलेन्ति । ( अरे ! जानीहि तावत्, तेन हि कस्मिन् काले चूता मुकुलयन्ति ? )
विदूषकः--अरे दासीए पुत्ता ! गिम्हे । ( अरे ! दास्याः पुत्र ! ग्रीष्मे । )
चेटः--( सहासम् ) अले ! णहि णहि । ( अरे ! नहि नहि । )
विदूषकः--( स्वगतम् ) किं दाणि एत्थ कहिस्सं ? । ( विचिन्त्य ) भोदु, चारुदत्तं गदूअ पुच्छिस्सं । ( प्रकाशम् ) अरे ! मुहूत्तअं चिट्ठ ! ( चारुदत्त-मुपसृत्य ) भो वअस्स ! पुच्छिस्सं दाव, कस्सिं काले चूआ मोलेन्ति ? ( किमिदानीमत्र कथयिष्यामि ? भवतु चारुदत्तं गत्वा प्रक्ष्यामि । अरे मुहूर्तकं तिष्ठ ! भो वयस्य ! प्रक्ष्यामि तावत्, कस्मिन् काले चूता मुकुलिता भवन्ति ? )
विदूषक—अरे दासी के बच्चे ! दुर्भिक्ष के समय वृद्ध कृपण के समान इस समय क्यों लम्बी लम्बी सांस ले रहे हो—'एषा सा सा, ( वह यह ) ।'
चेट—अरे ! तुम भी इस समय इन्द्रोत्सव के लोभी कौआ के समान 'का का' ऐसा कह रहे हो ?
विदूषक—तो कहो ।
चेट—( अपने में ) अच्छा, ऐसा कहूँगा । ( प्रकट में ) अरे ! तुम्हें प्रश्न देता हूँ । ( सवाल पूछता हूँ । )
विदूषक--अरे ! मैं तेरे सिर पर पैर रख दूँगा ।
चेट--अरे ! जानते हो आम में मंजरी कब लगतीं हैं ?
विदूषक—अरे दासी के बच्चे ! गर्मी में ।
चेट--( हंसी के साथ ) अरे ! नहीं । नहीं ।
विदूषक—( अपने में ) इसका क्या उत्तर देना चाहिये ? ( सोचकर ) अच्छा, चारुदत्त के पास जाकर पूछता हूँ । ( प्रकट में ) अरे ! कुछ देर ठहरो ।
३१६ मृच्छकटिकम्
चारुदत्तः—मूर्ख ! वसन्ते ।
विदूषक—( चेटमुपगम्य ) मुक्ख ! बसन्ते । ( मूर्ख ! वसन्ते । )
चेटः—दुदिअं दे पण्हं दइश्शं । शुशमिद्धाणं गामाणां का लक्खणं कलेदि ? । ( द्वितीयं ते प्रश्नं दास्यामि । सुसमृद्धानां ग्रामाणां का रक्षां करोति ? )
विदूषकः—अरे रच्छा । ( अरे ! रथ्या । )
चेटः—( सहासम् ) अले ! णहि णहि । ( अरे ! नहि नहि । )
विदूषकः—भोदु, संसए पड़िदम्हि । ( विचिन्त्य ) भोदु, चारुदत्तं पुणो वि पुच्छिस्सं । ( पुनर्निवृत्य चारुदत्तं तथैवोदाहरति । ) ( भवतु, संशये पतितोऽस्मि । भवतु चारुदत्तं पुनरपि प्रक्ष्यामि । )
चारुदत्तः—वयस्य ! सेना ।
विदूषकः—( चेटमुपगम्य ) अरे ! दासीए पुत्ता ! सेणा । ( अरे ! दास्याः पुत्र ! सेना । )
चेटः—अले ! दुवे बि एकक्किंश कडुआ शिग्धं भणाहि । ( अरे ! द्वे अपि एकस्मिन् कृत्वा शीघ्रं भण । )
विदूषकः—सेणावसन्ते । ( सेनावासन्ते । )
चेटः— णं पलिवत्तिअ भणाहि । ( ननु परिवर्त्य भण । )
विदूषकः ( कायेन परिवृत्य ) सेणावसन्ते । ( सेनावासन्ते । )
( चारुदत्त के पास जाकर ) हे मित्र ! मैं तुमसे पूछता हूँ किस समय आम में मञ्जरी आतीं हैं ?
चारुदत्त—मूर्ख ! वसन्त में ।
विदूषक—( चेट के पास जाकर ) मूर्ख ! वसन्त में ।
चेट—दूसरा प्रश्न देता हूँ । अत्यन्त समृद्ध गांवों की रक्षा कौन करता है ?
विदूषक—अरे ! रथ्या ( रक्षा करती है ) ।
चेट—( हँसी के साथ ) नहीं, नहीं ।
विदूषक—अरे ! संशय में फँस गया हूँ । ( सोच कर ) अच्छा, फिर चारुदत्त से पूछता हूँ । ( फिर चारुदत्त के पास जाकर उसी प्रकार पूछता है । )
चारुदत्त—मित्र ! सेना ।
विदूषक—( चेट के पास जाकर ) अरे दासी के बच्चे ! सेना ।
चेट—अरे ! दोनों को एक में मिलाकर जल्दी से कहो ।
विदूषक—सेना-वसन्त ।
चेट—अरे ! उल्टा कर कहो ।
विदूषक—( शरीर से उलट=घूमकर ) सेना-वसन्त ।
पञ्चमोऽङ्कः ३१७
चेटः—अले मुक्ख वडुका ! पदाइं पलिवत्तावेहि । ( अरे मूर्ख वटुक ! पदे परिवर्त्तय । ) विदूषकः—(पादौ परिवर्त्त्य) सेणावसन्ते । (सेना वसन्ते ।) चेटः—अले मुक्ख ! अक्खलपदाइं पलिवत्तावेहि । ( अरे मूर्ख ! अक्षरपदे परिवर्त्तय । ) विदूषकः—(विचिन्त्य) वसन्तसेणा । (वसन्तसेना ।) चेटः—एशा शा आददा । (एषा सा आगता ।) विदूषकः—ता जाव चारुदत्तस्स णिवेदेमि । (उपसृत्य) भो चारुदत्त ! धणिओ दे आगदो । (तद् यावत् चारुदत्तस्य निवेदयामि । भो चारुदत्त ! धनिकस्ते आगतः ।) चारुदत्तः—कुतोऽस्मत्कुले धनिकः ? विदूषकः—जइ कुले णत्थि, ता दुवारे अत्थि । एसा वसन्तसेणा आगदा । (यदि कुले नास्ति, तद्द्वारे अस्ति । एषा वसन्तसेना आगता ।) चारुदत्तः—वयस्य ! कि मां प्रतारयसि ? विदूषकः—जइ मे वअणे ण पत्तिआअसि, ता एदं कुम्भीलअं पुच्छ । अरे दासीए पुत्ता ! कुम्भीलअ ! उवसप्प । (यदि मे वचने न प्रत्येषि । तत् एतत् कुम्भीलकं पृच्छ । अरे दास्याः पुत्र ! कुम्भीलक उपसर्प ! ) चेटः—(उपसृत्य) अज्ज ! वन्दामि । (आर्य ! वन्दे ।)
चेट—अरे मूर्ख ब्राह्मण ! पद बदल कर ।
विदूषक—(पैर बदल कर) सेना वसन्त ।
चेट—अरे मूर्ख ! अक्षरों के पद बदल कर ।
विदूषक—(सोचकर) वसन्तसेना ।
चेट—वह यह आयी हुई है ।
विदूषक—तो आर्य चारुदत्त से निवेदन करता हूँ । (पास जाकर) हे चारुदत्त ! आपका धनिक (साहूकार) आ गया है ।
चारुदत्त—अरे हमारे कुल में धनिक कहाँ से ?
विदूषक—यदि कुल में नहीं है तो दरवाजे पर है । यह वसन्तसेना आयी हुयी है ।
चारुदत्त—मित्र ! क्यों मुझे ठग रहे हो ?
विदूषक—यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं करते हो तो इस कुम्भीलक से पूछो । अरे दासी के बच्चे कुम्भीलक ! इधर आओ ।
चेट—(पास जाकर) आर्य ! प्रणाम करता हूँ ।
३१८ | मृच्छकटिकम्
**चारुदत्तः—**भद्र ! स्वागतम् । कथय—सत्यं प्राप्ता वसन्तसेना ?
**चेटः—**एशा शा आददा वसन्तसेणा । ( एषा सा आगता वसन्तसेना । )
चारुदत्तः—(सहर्षम्) भद्र ! न कदाचित् प्रियवचनं निष्फलीकृतं मया । तद् गृह्यतां परितोषिकम् । ( इत्युत्तरीयं प्रयच्छति । )
चेटः—( गृहीत्वा प्रणम्य सपरितोषम् ) जाव अज्जआए णिवेदेमि । ( यावदार्यायै निवेदयामि । ) ( इति निष्क्रान्तः । )
**विदूषकः-**भो । अवि जाणासि; किं णिमित्तं ईदिसे दुट्ठिणे आअदेत्ति? । ( भोः ! अपि जानासि; किं निमित्तमीदृशे दुर्दिने आगतेति ? )
**चारुदत्तः—**वयस्य ! न सम्यगवधारयामि ।
**विदूषकः-**मए जाणिदं । अप्पमुल्ला रअणावलो, बहुमूलं सुवण्णभण्डअं त्ति ण परिदुट्टा अवरं मग्गिदुं आददा ( मया ज्ञातम् । अल्पमूल्या रत्नावली, बहुमूल्यं सुवर्णभाण्डकम् इति न परितुष्टा, अपरं याचितुमागता । )
चारुदत्तः—( स्वगतम् ) परितुष्टा यास्यति ।
( ततः प्रविशति उज्ज्वलाभिसारिकावेशेन वसन्तसेना सोत्कण्ठा, छत्रधारिणी विटश्च । )
विटः—( वसन्तसेनामुद्दिश्य )
अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं
कुलस्त्रीणां शोको मदनवरवृक्षस्य कुसुमम् ।
**चारुदत्त—**भद्र ! स्वागत है । कहो, सचमुच वसन्तसेना आयी है ?
**चेट—**हां, वह वसन्तसेना आयी हुयी है ।
चारुदत्त—( हर्ष के साथ ) भद्र ! मैंने कभी भी प्रियवचन को निष्फल नहीं किया । [ अर्थात् प्रिय बोलने वाले को खाली नहीं लोटाया ), इस लिये पुरस्कार ग्रहण करो । ( यह कह कर दुपट्टा दे देता है । )
चेट—(लेकर सन्तोष के साथ प्रणाम करके) तो चल कर आर्या (वसन्तसेना) से निवेदन करता हूँ । ( यह कर निकल जाता है । )
**विदूषक—**मित्र, जानते हो इस दुर्दिन में क्यों आयी है ?
**चारुदत्त—**मैं ठीक से नहीं समझ पा रहा हूँ ।
**विदूषक—**मैंने समझ लिया । रत्नावली कम मूल्य की है और सुवर्णभाण्ड अधिक मूल्य का है अतः वह सन्तुष्ट नहीं है, और कुछ लेने के लिये आयी है ।
चारुदत्त—( अपने आप में ) सन्तुष्ट होकर वापस जायेगी ।
( इसके बाद उज्ज्वल अभिसारिका वेश से उत्कण्ठित वसन्तसेना, छत्रधारिणी दासी और विट का प्रवेश ) ।
पञ्चमोऽङ्कः ३१६
सलीलं गच्छन्ती रतिसमयलज्जाप्रणयिनी रतिक्षेत्रे रङ्गे प्रियपथिकसार्थैरनुगता ॥ १२ ॥
**अन्वयः—**रतिसमयलज्जाप्रणयिनी, प्रियपथिकसार्थैः, अनुगता, रङ्गे, ( इव ), रतिक्षेत्रे, सलीलम्, गच्छन्ती, एषा, अपद्मा, श्रीः, अनङ्गस्य, ललितम्, प्रहरणम्, कुलस्त्रीणाम्, शोकः, मदनवरवृक्षस्य, कुसुमम्, [ अस्ति ] ॥ १२ ॥
**शब्दार्थ—**रतिसमय लज्जाप्रणयिनी = सम्भोग काल में [ कृत्रिम ] लज्जा प्रदर्शित करने वाली, प्रियपथिकसार्थैः=प्रिय पथिकों के समूहों के द्वारा, अनुगता=पीछा की गयी, रङ्गे=नाट्य रंगमंच [ के, इव=समान ], रतिक्षेत्रे=संकेतित रतिस्थल पर, सलीलम् = हावभाव के साथ, गच्छन्ती = जाने वाली, एषा = यह वसन्तसेना, अपद्मा = विना कमल की, श्रीः=लक्ष्मी, अनङ्गस्य = कामदेव का, ललितम्=सुन्दर, प्रहरणम् = अस्त्र, कुलस्त्रीणाम् = कुलवधुओं का, शोकः=शोक, मदनवरवृक्षस्य=कामदेवरूपी श्रेष्ठ वृक्ष का, कुसुमम्=पुष्प, है ॥ १२ ॥
अर्थ—विट—( वसन्तसेना को लक्षित करके )—
सम्भोग के समय [ कृत्रिम ] लज्जा प्रदर्शित करने वाली, प्यारे पथिकों से पीछा की गयी, नाट्य रंगमंच के समान संकेतित रतिस्थल पर हावभाव के साथ जाने वाली यह वसन्तसेना बिना कमल की लक्ष्मी ( है ), कामदेव का सुकुमार अस्त्र ( है ), उच्चकुलोत्पन्न वधुओं के लिये [ साक्षात् ] शोक ( है ), कामरूपी सुन्दर वृक्ष का फूल है ॥ १२ ॥
टीका— अभिसारार्थं गच्छन्त्याः वसन्तसेनायाः सौन्दर्यातिशयं वर्णयति—अपद्मेति। रतिसमये = सम्भोगकाले, या, लज्जा = त्रपा कुलस्त्रीणामिति भावः, तस्याः प्रणयिनी=सहचरी, वेश्या भूत्वापि संभोगावसरे कुलस्त्रीणामिव कृत्रिम-त्रपाप्रदर्शिनीति भावः, यद्वा रतिसमये लज्जाया अप्रणयिनीति च्छेदः, तेन स्वच्छन्द-रतिसम्भव इति बोध्यम्। प्रियाः=हृद्याः ये पथिकाः=पान्थाः, तेषाम्, सार्थैः=समूहैः, अनुगता=अनुसृता, रङ्गे=रागवर्द्धिनि, रंगमंच इव, रतिक्षेत्रे=संकेतित-रतिक्रीडास्थले, सलीलम्=सविलासम्, गच्छन्ती = प्रयान्ती, एषा=पुरोवर्तमाना, वसन्तसेनेति भावः, अपद्मा=पद्मरहिता, कमलेऽनुपविष्टा, श्रीः=लक्ष्मीः, अनङ्गस्य=कामदेवस्य, ललितम् = सुन्दरम्, प्रहरणम् = अस्त्रम्, कुलस्त्रीणाम्=कुलवधूनाम्, शोकः=साक्षात् शोकस्थानम्, अस्यामासक्ताः स्वकुलपत्नीः अपि त्यजन्ति तेनेयं तासां शोकजनिकेति भावः, मदनवरवृक्षस्य=कामरूपश्रेष्ठवृक्षस्य, कुसुमम्=पुष्पम्, अस्तीति शेषः। अत्र विषयं निरपहृत्य वसन्तसेनायां श्रीप्रभृतीनां तादात्म्येनारोपात् मालारूपकमलङ्कार इति बोध्यम्। शिखरिणी वृत्तम् ॥ १२ ॥
३९० मृच्छकटिकम्
वसन्तसेने। पश्य, पश्य-
गर्जन्ति शैलशिखरेषु विलम्बिबिम्बा मेघा वियुक्तवनिताहृदयानुकराः। येषां रवेण सहसोत्पतितैर्मयूरैः खं वीज्यते मणिमयैरिव तालवृन्तैः ॥ १३ ॥
अपि च--
पङ्कक्लिन्नमुखाः पिबन्ति सलिलं धाराहता दर्दुराः कण्ठं मुञ्चति बर्हिणः समदनो नीपः प्रदीपाद्यते।
विमर्श- यहां विषय का अपह्नव किये विना ही एक वसन्तसेना में अनेकों के तादात्म्य का आरोप होने से मालारूपक अलंकार है ॥ १२ ॥
अन्वयः शैलशिखरेषु, विलम्बिविम्बाः, वियुक्तवनिताहृदयानुकराः, मेघाः, गर्जन्ति, येषाम्, रवेण, सहसोत्पतितैः, मयूरैः, मणिमयैः, तालवृन्तैः, इव, खम्, बीज्यते ॥ १३ ॥
शब्दार्थ-- शैलशिखरेषु=पहाड़ों की चोटियों पर, विलम्बिविम्बाः=लटकते हुये आकारवाले, वियुक्तवनिताहृदयानुकराः=वियोगिनी स्त्रियों के हृदय के समान [मलिन वर्ण वाले], मेघाः=वादल, गर्जन्ति=गरज रहे हैं, येषाम्=जिनके, रवेण=शब्दों से, सहसा = अचानक, उत्पतितैः = उड़नेवाले, मयूरैः = मोरों द्वारा, मणिमयैः=मणि से बने हुये, तालवृन्तैः = ताड़वृक्ष के पंखों से, खम्=आकाश को, वीज्यते=हवा की जा रही है ॥ १३ ॥
अर्थ--वसन्तसेना देखो, देखो-- पहाड़ों की चोटियों पर लटकते हुये आकारवाले, वियोगिनी स्त्रियों के हृदय के समान [मलिनवर्ण] मेघ गरज रहे हैं, जिनके शब्दों से अचानक उड़नेवाले मोरों के द्वारा मणि से बने हुये ताड़ के पंखों से आकाश को हवा की जा रही है ॥१३॥
टीका--मेघोदयस्य कामोद्दीपकत्वेन तस्यैव वर्णनं करोति-गर्जन्तीति । शैलानाम्=पर्वतानाम्, शिखरेषु=अग्रभागेषु, विलम्बि=लम्बमानम्, विम्बम्=आकारः येषां ते, वियुक्तानाम्=पति-विरहितानाम्, वनितानाम्=नायिकानाम् हृदयम्=चेतः अनुकुर्वन्तीति अनुकाराः=मलिनाः इति भावः, जलाधिक्यात् मेघानाम्, वियोगाग्निना च वनितानां मलिनत्वम्=श्यामत्वमिति बोध्यम्, मेघाः=वारिदाः, गर्जन्ति=नदन्ति, येषाम्=अभ्राणामित्यर्थः, रवेण = ध्वनिना, सहसा=अकस्मात् उत्पतितैः=उडडीनैः, मयूरैः = बर्हिभिः, मणिमयैः=मणिखचितैः, तालमृन्तैः=व्यजनैः, खम्=आकाशम्, वीज्यतेइव । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १३ ॥
पञ्चमोऽङ्कः ३२१
संन्यासः कुलदूषणैरिव जनैर्मेघैर्वृतश्चन्द्रमाः । विद्युन्नीचकुलोद्गतेव युवतिर्नैकत्र सन्तिष्ठते ॥ १४ ॥
अन्वयः—धाराहताः, पंकक्लिन्नमुखाः, दर्दुराः, सलिलम्, पिबन्ति, समदनः, बर्हिणः, कण्ठम् मुञ्चति; नीपः, प्रदीपायते; कुलदूषणैः, जनैः, संन्यासः, इव, मेघैः, चन्द्रमाः, वृतः, नीचकुलोद्गता, युवतिः, इव; विद्युत्, एकत्र, न, सन्तिष्ठते ॥ १४ ॥
शब्दार्थ—धाराहताः = जलधाराओं से ताडित, पंकक्लिन्नमुखाः = कीचड़ से व्याप्त मुख वाले, दर्दुराः = मेढक, सलिलम् = पानी, पिबन्ति = पीते हैं। समदनः = कामातुर, मस्त, बर्हिणः = मोर, कण्ठम् = कण्ठध्वनि को, मुञ्चति = छोड़ रहा है, अर्थात् बोल रहा है, नीपः = कदम्बवृक्ष, प्रदीपायते = दीपक के समान प्रतीत हो रहा है। कुलदूषणैः = वंश को दूषित करने वाले, जनैः = लोगों के द्वारा, संन्यासः = संन्यास, इव = के समान, मेघैः = बादलों के द्वारा, चन्द्रमाः = चन्द्रमा, वृतः = ढक दिया गया है, नीचकुलोद्गता = नीच कुल में उत्पन्न होने वाली, युवतिः = युवती स्त्री, इव = के समान, विद्युत् = बिजली, एकत्र = एक स्थान पर, न = नहीं, सन्तिष्ठते = स्थिर रह रही है ॥ १४ ॥
अर्थ—और भी -
जल की धाराओं से ताड़ित, कीचड़ से लिप्त मुखवाले मेढक [ बरसात का ] पानी पी रहे हैं। कामातुर मोर आवाज कर रहा है। कदम्ब का पेड़ [ अपने फूलों से ] दीपक के समान प्रतीत हो रहा है। कुल को कलङ्कित करने वाले लोगों के द्वारा संन्यास के समान बादलों के द्वारा चन्द्रमा को ढक लिया गया है। नीच कुल में पैदा होने वाली स्त्री के समान बिजली किसी एक जगह नहीं ठहर रही है ॥ १४ ॥
टीका—अभिसारे सहायकं वर्षाकालमेव वर्णयति-पङ्कक्लिन्नेति । पङ्कक्लिन्नमुखाः = पङ्केन = कर्दमेन क्लिन्नानि = व्याप्तानि मुखानि येषां ते, धाराभिः = वर्षाजलधाराभिः, आहताः = ताडिताः, दर्दुराः = मण्डूकाः, सलिलम् = जलम्, पिबन्ति = गृह्णन्ति; समदनः = कामातुरः, बर्हिणः = मयूरः, कण्ठम् = कण्ठध्वनिम्, मुञ्चन्ति = त्यजति, केकारवं करोतीति भावः। नीपः = कदम्बवृक्षः, प्रदीपायते = पीतपुष्पैः दीप इवाचरति; कुलदूषणैः = कुलकलङ्कैः, जनैः = लोकैः, संन्यासः = यतिधर्मः, इव, मेघैः = वारिदैः, चन्द्रमाः = चन्द्रः, वृतः = पूर्वत्र कलङ्कितः, परत्र चाच्छादित, नीचकुले उद्गता = उत्पन्ना, युवतिः = यौवनसम्पन्ना नारी, इव, विद्युत्, एकत्र = एकस्मिन् स्थाने एव, न = नैव, सन्तिष्ठते = विराजते । ‘समवप्रविभ्यः स्थः’ १।३।२२ इत्यात्मनेपदम् । अत्रोपमालङ्कारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १४ ॥
२१ मृ०
३२२ मृच्छकटिकम्
वसन्तसेना—भाव ! सुट्ठु दे भणिदं। (भाव ! सुष्ठु ते भणितम् ।) एषा हि—
मूढे ! निरन्तरपयोधरया मयैव कान्तः सहाभिरमते यदि किं तवात्र । मां गर्जितैरपि मुहुर्विनिवारयन्ती मार्गं रुणद्धि कुपितेव निशा सपत्नी ॥ १५ ॥
विमर्श— कुल को कलङ्कित करने वाले लोग संन्यास अवस्था को भी कलङ्कित करते हैं। कुलटा युवती जिस प्रकार एक पति के पास नहीं रहती हैं, प्रतिदिन घर बदलती रहती है, उसी प्रकार बिजली भी आकाश में भिन्न-भिन्न स्थानों पर चमकती रहती है। 'सम्' पूर्वक ष्ठा = स्था धातु से आत्मनेपद का विधान 'समवप्रविभ्यः स्थः' १।३।२२ सूत्र करता है ॥ १४ ॥
अन्वयः— मूढे ! निरन्तरपयोधरया, मया, एव, सह, यदि, कान्तः, अभिरमते, तदा, अत्र, तव, किम् ? [ईदृशैः] गर्जितैः, अपि, माम्, मुहुः, निवारयन्ती, कुपिता, सपत्नी, इव, निशा, मम, मार्गम्, रुणद्धि ॥ १५ ॥
शब्दार्थ— मूढे ! = रे मूर्खवसन्तसेने !, निरन्तरपयोधरया = घने पयोधरों [ रात्रिपक्ष में बादल और सपत्नीपक्ष में स्तनों ] वाली, मया=मेरे, एव=ही, सह=साथ, यदि=यदि कान्तः=प्रिय, अभिरमते=अभिरमण करता है, अत्र=इसमें तव=तुम्हारा=वसन्तसेना का क्या ? [ ईदृशैः=इस प्रकार के ] गर्जितैः=बार-बार गरजनों से, अपि=भी, माम्=मुझ=वसन्तसेना को, मुहुः=बार-बार, निवारयन्ती=रोकती हुयी, कुपिता=प्रणयकोपवती, सपत्नी=सौतन, इव=के समान, निशा=रात, मम=मेरा, वसन्तसेना का, मार्गम्=रास्ता, रुणद्धि=रोकती है ॥ १५ ॥
अर्थ—वसन्तसेना— भाव ! तुमने ठीक ही कहा है। क्योंकि यह—
'मूर्ख वसन्तसेने ! घने पयोधरों [ रात्रिपक्ष में बादलों और सौतवपक्ष में स्तनों ] वाली मुझ [ रात या सौतन ] के साथ ही यदि कान्त [ चन्द्रमा या चारुदत्त ] अभिरमण कर लेता है तो इसमें तुम्हारा [ वसन्तसेना का ] क्या ? इस प्रकार के गर्जनों से भी मुझे [ वसन्तसेना को ] बार-बार रोकती हुयी सौतन के समान यह रात मेरा रास्ता रोक रही है ॥ १५ ॥
टीका— विटोक्तिं समर्थयमाना रात्रिं सपत्नीत्वेनोपपादयन्ती आह—मूढे इति। रे मूढे ! = परवृत्तानभिज्ञे, वसन्तसेने इति भावः, निरन्तरपयोधरया=निविडमेघावृतया पक्षे निविडकुचयुग्मया; मया = निशया, एव, सह = सार्द्धम्, कान्तः=चन्द्रः, पक्षे चारुदत्तः, यदि, अभिरमते=अभिरमणं करोति, अत्र=अस्मिन् विषये, तव=वसन्तसेनायाः किम्=न किमपीति भावः । ईदृशैः, गर्जितैः=गर्जनैः,
पञ्चमोऽङ्कः ३२३
**विटः—**भवतु एवं तावत्, उपालभ्यतां तावदियम्।
**वसन्तसेना—**भाव ! किमनया स्त्री-स्वभाव-दुविदग्धया उपालब्धया ।
पश्यतु भावः—
मेघा वर्षन्तु गर्जन्तु मुञ्चन्त्वशनिमेव वा ।
गणयन्ति न शीतोष्णं रमणाभिमुखाः स्त्रियः ॥ १६ ॥
अपि, माम् = वसन्तसेनामित्यर्थः, मुहुः = वारं वारम्, निवारयन्ती = प्रियसंगमे अवरोधमुत्पादयन्ती, कुपिता = प्रणयकोपवती, सपत्नी, इव, निशा = रात्रिः, मम = वसन्तसेनायाः मार्गम्, रुणद्धि = आवृणोति । यथा काचित् सपत्नी प्रियसंगमे बाधामुत्थापयति तथैवेयं निशा मम चारुदत्तस्य च संगमे बाधामुत्थापयतीति बोध्यम् । अत्रोपमालङ्कारः, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १५ ॥
**विमर्शः—**चारुदत्त के साथ अभिसार में विघ्न डालने वाली रात को सपत्नी के रूप में सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है ॥ १५ ॥
**अर्थ—विट-**अच्छा यही सही, इस रात को ही उलाहना दो ।
**वसन्तसेना—**स्त्रीस्वभाव से हठी होने के कारण इसको उपालम्भ देने से क्या [ लाभ ] ? भाव ! देखिये—
**अन्वयः—**मेघाः, वर्षन्तु, गर्जन्तु, अशनिम्, एव, वा, मुञ्चन्तु, [ किन्तु ] रमणाभिमुखाः, स्त्रियः, शीतोष्णम्, न, गणयन्ति ॥ १६ ॥
**शब्दार्थ—**मेघाः=बादल, वर्षन्तु=बरसें, गर्जन्तु=गरजें, वा=अथवा, अशनिम्=वज्र ( बिजली ) को, एव=ही, मुञ्चन्तु=गिरा दें; [किन्तु] रमणाभिमुखाः=रमण के लिये तैयार, स्त्रियः=स्त्रियाँ, शीतोष्णम्=सर्दी गर्मी, आग, पानी, न=नहीं, गणयन्ति=गिनतीं हैं ॥ १६ ॥
**अर्थ—**बादल बरसें, गरजें अथवा वज्र ( बिजली ) को ही गिरा दें [ किन्तु ] प्रेमी के साथ रमण के लिये तैयार स्त्रियाँ सर्दी और गर्मी को कुछ भी नहीं गिनती हैं, इनकी चिन्ता नहीं करतीं हैं ॥ १६ ॥
**टीका—**निशायाः मेघानां वा रमणे बाधकाभावत्वं घोषयति—मेघा इति । मेघाः=वारिदाः, वर्षन्तु=जलं कटन्तु, गर्जन्तु=नदन्तु, अशनिम्=वज्रम् एव, वा=अथवा, मुञ्चन्तु = परित्यजन्तु, किन्तु, रमणाभिमुखाः = पतिरमणे तत्पराः, स्त्रियः = नार्यः, शीतोष्णम् = शिशिरजाडद्यम्, ग्रीष्मसन्तापम्, वर्षणक्लेशञ्च न=नैव, गणयन्ति=प्रतिबन्धकत्वेन मन्यन्ते । पूर्वार्द्धे मेघस्यैकस्यानेकक्रियासम्बन्धात् दीपकालंकारः । उत्तरार्धे अप्रस्तुतप्रशंसा चेति बोध्यम् । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १६ ॥
३२४ मृच्छकटिकम्
विटः—वसन्तसेने ! पश्य पश्य ! अयमपरः—
पवन-चपल-वेगः स्थूलधारा-शरौघः स्तनित-पटह-नादः स्पष्टविद्युत्पताकः । हरति करसमूहं खे शशाङ्कस्य मेघो नृप इव पुरमध्ये मन्दवीर्यस्य शत्रोः ॥ १७ ॥
**अन्वयः—**पवनचपलवेगः, स्थूलधाराशरौघः, स्तनितपटहनादः, स्पष्टविद्युत्पताकः, मेघः, मन्दवीर्यस्य, शत्रोः, पुरमध्ये, नृपः, इव, खे, शशाङ्कस्य, करसमूहम्, हरति ॥ १७ ॥
**शब्दार्थ—**पवनचपलवेगः = हवा के द्वारा चञ्चल वेगवाला [ नृपपक्ष में—हवा के समान तेज गति वाला ] स्थूलधाराशरौघः = मोटी जलधारारूपी वाणों वालों [ नृपपक्ष में—मोटी जलधाराओं के समान वाणसमूह वाला ] स्तनितपटहनादः = गर्जनरूपी नगाड़े की आवाजवाला, [ नृपपक्ष में—मेघों की गर्जन के समान युद्ध के नगाड़ों की आवाजवाला ], स्पष्टविद्युत्पताकः = स्पष्ट बिजलिरूपी पताकावाला [ नृपपक्ष में—चमकती हुयी बिजली के समान पताकाओं वाला ] मेघः = बादल, मन्दवीर्यस्य = अल्पपराक्रमी, शत्रोः = शत्रु के, पुरमध्ये = नगर के मध्य में, नृपः = आक्रमणकारी राजा, इव = के समान, खे = आकाश में, शशाङ्कस्य = चन्द्रमा के, करसमूहम् = किरणसमुदाय को [ नृपपक्ष में—टैक्ससमुदाय को ], हरति = छीन ले रहा है ॥ १७॥
**अर्थ—विट—**वसन्तसेना ! देखो, देखो । यह दूसरा—
मोटी पानी की धारारूपी वाणों वाला, गर्जनारूपी नगाड़े की आवाजवाला, स्पष्ट बिजलिरूपी पताकावाला मेघ कम पराक्रमवाले शत्रु के नगर के बीच में [ आक्रमणकारी ] राजा के समान आकाश में चन्द्रमा की किरणों के समूह का हरण कर ले रहा है। राजापक्ष में हवा के समान चञ्चल या तीव्रगतिवाला, मोटी मोटी जलधाराओं के समान वाणसमूह वाला, बादलों की गर्जन के समान युद्ध के नगाड़ों की आवाजवाला, चमकती हुई बिजली के समान पताकावाला विजयी राजा कमजोर शत्रु के नगर में उससे कर=टैक्स लेने लग जाता है ॥ १७ ॥
**टीका—**वसन्तसेनोक्तं मेघोपद्रवं समर्थयमानो विट आह पवनेति । पवनेन = वायुना, चपलः = चञ्चलः, वेगः =जवः यस्य सः, नृपपक्षे—पवन इव चपलवेगः, स्थूला चासो धारा = वर्षणप्रवाहः, शरौघः = वाणसमूह इव यस्य सः, नृपपक्षे—स्थूलधारा-इव शरौघः यस्य सः, निरन्तरवाणवर्षीयर्थः, स्तनितम् = घनगर्जितम्, पटहनादः = रणवाद्यविशेषरवः इव यस्य सः, अन्यत्र स्तनितमिव पटहनादो यस्य सः, स्पष्टा = सुव्यक्ता, विद्युत् = चपला, पताका =ध्वज इव यस्य सः, अन्यत्र स्पष्ट-
पञ्चमोऽङ्कः ३२६
वसन्तसेना—एव्वं णेदं । ता कधं एसो अवशो (एवं न्विदम् । तत् कथमेषः अपरः )—
एतैरेव यदा गजेन्द्रमलिनैराध्मातलम्बोदरै- र्गर्जद्भिः सतडिद्वलाकशबलैर्मेघैः सशल्यं मनः । तत् किं प्रोषित-भर्तृ-वध्य-पटहो हा हा हताशो बकः प्रावृट् प्रावृडिति ब्रवीति शठधीः क्षारं क्षते प्रक्षिपन् ॥१८॥
विद्युदिव पताका यस्य सः, मेघः = वारिदः, मन्दवीर्यस्य = अल्पपराक्रमस्य पराजितस्येत्यर्थः, शत्रोः = रिपोः, पुरमध्ये = नगरमध्ये, नृप इव = विजयी राजा इव, खे = गगने, शशाङ्कस्य = चन्द्रस्य, करसमूहम् = किरणजालम्, नृपपक्षे = राजकोषसमुदायम्, हरति = आवृणोति, अन्यत्र = गृह्णातीत्यर्थः । अत्रोपमारूपकयोः सङ्करः । मालिनी वृत्तम् ॥ १७ ॥
**विमर्श—**यहाँ मेघ की प्रबलता का कथन विजयी राजा के समान किया गया है ॥ १७ ॥
**अन्वयः—**यदा, गजेन्द्रमलिनैः, आध्मातलम्बोदरैः, सतडिद्वलाकशबलैः, गर्जद्भिः, एतैः, मेघैः, एव, मनः, सशल्यम्, भवति, हा, हा, तत्, प्रोषितभर्तृ-वध्यपटहः, हताशः, शठधीः, बकः, क्षते, क्षारम्, प्रक्षिपन्, इव, किम्, प्रावृट् प्रावृट्, इति, ब्रवीति ? ॥ १८ ॥
**शब्दार्थ—**यदा = जब, गजेन्द्रमलिनैः = गजराजों के समान मलिन, आध्मातलम्बोदरैः = फूले एवं लटकते हुये पेटवाले, सतडिद्वलाकशबलैः = बिजली एवं बगुलों की पांत से चितकबरे, गर्जद्भिः = गरजनेवाले, एतैः = इन, मेघैः = बादलों के कारण, एव = ही, मनः = मन, सशल्यम् = काँटे से युक्त, [ भवति = हो रहा है ]; हा-हा = हाय-हाय, तत् = उस समय, प्रोषितभर्तृवध्यपटहः = प्रवासी पतियोंवाली विरहिणियों की हत्या के समय बजनेवाला नगाड़ारूपी, हताशः = अभागा, शठधीः = धूर्तबुद्धिवाला, बकः = बगुला, क्षते = कटे हुये पर, क्षारम् = नमक को, प्रक्षिपन् = छिड़कता हुआ, इव = सा, किम् = क्यों, प्रावृट् प्रावृट् = वर्षा वर्षा ऐसी ध्वनि, ब्रवीति = बोल रहा है ? ॥ १८ ॥
**अर्थ—वसन्तसेना—**ऐसा ही है । तो क्या यह दूसरा—
जब गजराजों के समान मलिन [ मटमैला ], फूले एवं लटकते हुये पेटवाले [ मध्य भागवाला ] बिजली एवं बगुलों की पाँत से चितकबरे इन मेघों के कारण ही [ वियोगिनी स्त्रियों का ] मन कांटें से युक्त हो रहा है, उनके मनमें काठें चुभ रहे हैं । हाय हाय ! तब परदेश गये हुये पतियोंवाली नायिकाओं के वध के समय बजनेवाले नगाड़े के समान अभागा धूर्त बुद्धिवाला यह बगुला घाव ( कटे )
३२६ मृच्छकटिकम्
विटः—वसन्तसेने ! एवमेतत् । इदमपरं पश्य—
बलाका-पाण्डुरोष्णीषं विद्युदुत्क्षिप्तचामरम् । मत्त-वारण-सारूप्यं कर्त्तुकाममिवाम्बरम् ॥ १६ ॥
पर नमक छिड़कता हुआ सा क्यों 'वर्षा वर्षा' ऐसा बोल रहा है अर्थात् आवाज कर रहा है ? ॥ १८ ॥
टीका—वसन्तसेना मेघानामुद्द्दीपनत्वमेव वर्णयति—एतैरैवेति । यदा=यस्मिन् काले, यद्वा यतः हेतोरित्यर्थः एवञ्च तत् इत्यस्य तदा यद्वा ततः हेतोरित्यर्थो बोध्यः । गजेन्द्रवत् मलिनैः=मलिनवर्णैः, आध्मातानि=जलप्रपूरितानि, लम्बानि=अधोलम्ब-मानानि च उदराणि = मध्यभागाः येषां तादृशैः, तडिद्भिः वर्तमानाः, सतडितः, ते बलाकाः=बकाः, तैः=हेतुभूतैः, शबलैः=चित्रवर्णैः, गर्जद्भिः=ध्वनद्भिः, एतैः=पुरो दृश्यमानैः, मेघैः=वारिदैः, एव, मनः=विरहिणीनां चित्तम्, सशल्यम्=विरह-वेदनाशल्येन विद्धम्, हा हा-खेदबोधकमव्ययमिदम्, तत्=तस्मात् कारणात् तदा वा, प्रोषिताः=विदेशं प्रयाताः, भर्तारः=पतयो यासां ताः, तासाम्, वध्यपटहः=वधकाले वाद्यमानपटहतुल्यः, हता=नष्टा, आशा यस्य सः, भार्यरहितः, शठा = प्रतारण-शीला, बुद्धिः = मतिर्यस्य सः, बकः = बलाकः, क्षते = व्रणादौ, क्षारम्=लवणम्, प्रक्षिपन्=पातयन्, इव, किम् = कस्मात्, प्रावृट् प्रावृट् = वर्षा वर्षा इति ब्रवीति=वदति, तादृशध्वनिं करोतीति भावः । अत्र 'गजेन्द्रमलिनैः' अत्रोपमा' 'वध्यपटहः' अत्र रूपकम् 'क्षारं क्षते प्रक्षिपन्' इत्यत्र निदर्शना । एतेषां निरपेक्षतया संसृष्टि-रिति तत्त्वविदः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १८ ॥
विमर्श—'प्रावृट् प्रावृडिति' इसका व्याख्यान प्रायः 'वर्षा वर्षा' ऐसा किया गया है । परन्तु यह तर्कसंगत नहीं है । यह बगुला की आवाज का अनुकरण है । उसकी आवाज के लिये ही इस शब्द का प्रयोग समझना चाहिये ॥ १८ ॥
अन्वयः—बलाकापाण्डुरोष्णीषम्, विद्युदुत्क्षिप्तचामरम्, अम्बरम्, मत्तवारण-सारूप्यम्, कर्तुकामम्, इव, [ पश्य—गद्यस्थेनान्वयः ] ॥ १६ ॥
शब्दार्थ—बलाकापाण्डुरोष्णीषम्=बक [ पंक्तिरूपी ] श्वेत पगड़ीवाले, गज-पक्ष में—बगुलों के समान सफेद पगड़ीवाले, विद्युदुत्क्षिप्तचामरम्=डुलाये जाते हुये बिजलीरूपी चामरवाले, गजपक्ष में-बिजली के समान डुलाये जाते हुये चामरवाले, अम्बरम्=आकाश को, मत्तवारणसारूप्यम् मतवाले हाथी की समानता को, कर्तु-कामम्=करने का इच्छुक, इव=सा, [ पश्य=देखो ] ॥ १६ ॥
अर्थ—विट—वसन्तसेना ! यह ठीक है । किन्तु इस दूसरे बादल को देखो—
बगुला [ की पंक्तिरूपी ) श्वेत पगड़ीवाले ( गजपक्ष में--बगुला के समान श्वेत पगड़ीवाले ), बिजलीरूपी चंचल चामरवाले ( गजपक्ष में--बिजली के
पञ्चमोऽङ्कः ३२७
वसन्तसेना-भाव ! पेक्ख पेक्ख । ( भाव ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व । )
एतैराद्रं-तमालपत्र-मलिनैरापोतसूर्य नभो वल्मीकाः शरताडिता इव गजाः सीदन्ति धाराहताः । विद्युत्काञ्चनदीपिकेव रचिता प्रासादसञ्चारिणी ज्योत्स्ना दुर्बलभर्तृकेव वनिता प्रोत्सार्य मेघैर्हृता ॥ २० ॥
समान हिलते हुये चामर से युक्त ) आकाश को मतवाले हाथी के समान करने के इच्छुक से ( इस दूसरे बादल को देखो ) ॥ १६ ॥
टीका- बलाकादिभिः कृतस्याकाशस्य सौन्दर्यातिशयं विटो वर्णयति-बलाकेति । बलाका=बकपङ्क्तिरेव, पाण्डुरम्=श्वेतम्, उष्णीषम्=किरीटम्, यस्य तादृशम्, गजपक्षे-बकपङ्क्तिरिव श्वेतम् उष्णीषं यस्य तादृशम्, विद्युदेव=तडिदेव उत्क्षिप्तः=ऊर्ध्वीकृतः, चामरः=बालव्यजनं यस्यं तादृशम्, पक्षे तडिदिव उत्क्षिप्त-चामरविशिष्टम्, अम्बरम्=गगनम्, मत्तस्य=मदोन्मत्तस्य, वारणस्य=गजस्य, सारूप्यम्=समानरूपताम्, कर्तुकामम्=कर्तुमिच्छुकमिव, पश्येति गद्यस्थेनान्वयः, यद्वा-वर्तते इति बोध्यम् ॥ १९ ॥
विमर्श- प्रस्तुत श्लोक में क्रिया पद नहीं है । कुछ व्याख्याकारों ने 'वर्तते' जैसे क्रियापद आक्षिप्त किये हैं । परन्तु इसकी अपेक्षा 'इदम् अपरं पश्य' इस गद्यवाक्य में स्थित दर्शन क्रिया का कर्म मानना उचित प्रतीत है । इस प्रकार के बादल को दिखाना विट का उद्देश्य है ॥१९॥
अन्वयः- आर्द्रतमालपत्रमलिनैः, एतैः, ( मेघैः ) नभः, आपीतसूर्यम्, ( कृतम् ), धाराहताः, वल्मीकाः, शरताडिताः, गजाः, इव, सीदन्ति; विद्युत्, प्रासादसञ्चारिणी, काञ्चनदीपिका, इव, रचिता, दुर्बलभर्तृका, वनिता, इव, ज्योत्स्ना, मेघैः, प्रोत्सार्य, हृता ॥ २० ॥
शब्दार्थ- आर्द्रतमालपत्रमलिनैः=तमालवृक्ष के गीले पत्तों के समान मलिन, एतैः=इन्होंने, (मेघैः=बादलों ने), नभः=आकाश, आपीतसूर्यम्=ढके हुये सूरजवाला, कृतम्=कर दिया है। धाराहताः = वर्षा की धारा से गिराये गये, वल्मीकाः=दीमकों के पुञ्ज, शरताडिताः=बाणों से मारे गये, गजाः=हाथियों, इव=के समान सीदन्ति=नष्ट हो रहे हैं। विद्युत्=बिजली, प्रासादसञ्चारिणी = महल में घूमने वाली, कांचनदीपिका=सोने की लालटेन, इव=के समान, रचिता=बना दी गयी है, दुर्बलभर्तृका = कमजोर पतिवाली, वनिता = स्त्री, इव = के समान, ज्योत्स्ना=चांदनी, मेघैः = बादलों द्वारा, प्रोत्सार्य = बलपूर्वक छीनकर, हृता = हर ली गयी है ॥ २० ॥
अर्थ-वसन्तसेना-भाव ! देखो, देखो-
३२८ मृच्छकटिकम्
विटः—वसन्तसेने ! पश्य पश्य—
एते हि विद्युद्गुण-बद्ध-कक्षा गजा इवान्योन्यमभिद्रवन्तः । शक्राज्ञया वारिधराः सधारा गां रूप्यरज्ज्वेव समुद्धरन्ति ॥ २१ ॥
तमालवृक्ष के गीले पत्तों के समान मलिन इन मेघों द्वारा आकाश को ढके हुये सूर्यवाला बना दिया गया है अर्थात् आकाश में सूर्य को ढँक लिया है। वर्षा की जलधाराओं से गिराये गये बल्मीकों (दीमक) के घर बाणों से मारे गये हाथियों के समान नष्ट हो रहे हैं। बिजली महलों में घुमाई जानेवाली दीपिका (लालटेन) के समान बना दी गयी है (अर्थात् कभी कहीं, कभी कहीं चमकती रहती है।) कमजोर पतिवाली स्त्री के समान चाँदनी मेघों द्वारा बलपूर्वक छीनकर हर ली गयी है ॥ २० ॥
टीका—मेघानां बाहुल्यं तेन कृतञ्च प्राकृतिकं वर्णनं प्रस्तौति-एतैरिति । आर्दाणि = जलसिक्तानि, तमालपत्राणि = एतन्नामकवृक्षविशेषपत्राणि, मलिनैः= श्यामवर्णैः, एतैः=पुरो दृश्यमानैः, मेघैः, नभः=गगनम्, आपीतः=आच्छादितः, सूर्यः=दिनकरः, यस्मिन्, तादृशम्, कृतम्, जातं पश्येत्यादि क्रिया-पदमध्याहार्यम् । धाराभिः=वर्षाजलधाराभिः, आहता=प्रताडिताः, वल्मीकाः=कीटविशेषरचित-मृत्तिकास्तूपाः, शरताडिताः=शरैराहताः, गजाः=हस्तिनः, इव=यथा, सीदन्ति=विनाशं यान्ति । विद्युत्=तडित्, कर्मदम्, प्रासादसंचारिणी=प्रासादे सञ्चरणशीला, कांचनदीपिका = सुवर्णदीपिका, इव, रचिता = विहिता, दुर्बलः = क्षीणशक्तिकः, भर्त्ता=पतिर्यस्याः सा, तादृशी, वनिता=भार्या, इव, ज्योत्स्ना=चन्द्रिका, मेघैः=वारिदैः, प्रोत्सार्य=बलाद् आकृष्य, हृता=नीता । निर्बलपुरुषस्य समक्षमेव यथा तस्य भार्या शत्रुहरति तथैव मेघैः चन्द्रभार्या ज्योत्स्नापि हृतेति भावः ॥ अत्रोपमा-लङ्कारः, शार्दूलविक्रीडतम् वृत्तम् ॥ २० ॥
अन्वयः—विद्युद्गुणबद्धकक्षाः, अन्योन्यम्, अभिद्रवन्तः, गजाः, इव, सधाराः, एते, वारिधराः, शक्राज्ञया, गाम्, रूप्यरज्ज्वा, समुद्धरन्ति, इव ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—विद्युद्गुणबद्धकक्षः=बिजलीरूप रस्सी से बंधी हुई कमर वाले, [गजपक्ष में—बिजली के समान रस्सी से कसी हुयी कमर वाले] अन्योन्यम्=एक दूसरे को, अभिद्रवन्तः=पीछे धक्का देते हुये, गजाः=हाथियों, इव=के समान, एते=ये, सधाराः=जलधारासहित, वारिधराः=बादल, शक्राज्ञया=इन्द्र की आज्ञा से, गाम्=पृथ्वी को, रूप्यरज्ज्वा=चाँदी की रस्सियों से, समुद्धरन्ति इव=ऊपर उठा से रहे हैं ॥ २१ ॥