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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( ११० ) पिअवअस्सो कुसुमाअरुज्जाणं गमिस्सदि त्ति । प्रियवयस्यः कुसुमाकरोद्यानं गमिष्यतीति : ता जाव तहिंज्जेव्व गमिस्सं । (परिक्रम्य विलोक्य च) इदं तद्यावत्तत्रैव गमिष्यामि । इदं कुसुमाअरुज्जाणं, जाव पविसासि । (प्रविश्य भ्रमरबाधां नाटयन्), कुसुमाकरोद्यानं, यावत्प्रविशामि । अरे कीस उण एदे दुट्ठमहुअरा मं ज्जेव्व अभिभवंति अरे कथं पुनरेते दुष्टमधुकरा मामेवाभिभवन्ति¹ । (आत्मानमाघ्राय) भोदु जाणिदं, जं तं मलयवदीबंधुजणेण भवतु ज्ञातं, मत्तन्मलयवतीबन्धुजनेन जामातुअस्स पिअवअस्सो त्ति कदुअ सवहुमाणं जामातुः प्रियवयस्य इति कृत्वा सबहुमानं वण्णएहिं विलित्तोम्हि । सन्ताणकुसुमसेहरअं च मम सीसे ²वर्णकैर्विलिप्तोऽस्मि । ³सन्तानकुसुमशेखरश्च मम शीर्षे पिणद्धं । सो क्खु एसो अच्चाअरो अणत्थीभूदो किं दाणिं पिणद्धः । स खलु एषोऽत्यादरो ऽनर्थीभूतः । किमिदानीमत्र एत्थ करिस्सं ? अहवा एदेण जेव्व मलयवदीए करिष्यामि ? अथवा, एतेनैव मलयवत्याः स आसादो लद्धेण रत्तंसुअजुअलण इत्थिआवेसं विहिअ सकाशाल्लब्धेन रक्तांशुकयुगलेन स्त्रीवेषं विधाय उत्तरीअकिदावगुण्ठणो गमिस्सं । पेक्खामि दाव उत्तरीयकृतावगुण्ठनं गमिष्यामि । प्रेक्षे तावत्

(१११) कि मेरे प्रिय मित्र कुसुमाकर नामी बाग़ में जाएँगे । तो फिर मैं भी वहीं जाता हूँ। (घूमकर और देखकर) यह रहा कुसुमाकर उद्यान ! अतः भीतर जाता हूँ ! (प्रवेश करके, भौंरों द्वारा की गई रुकावट का अभिनय करते हुए) अरे ! क्यों ये दुष्ट भौंरे मुझ पर ही आक्रमण करने लगे। (अपने आप को सूंघ कर) अच्छा, जान लिया । मलयवती के बन्धुजनों ने मुझे दामाद का प्रिय मित्र जान कर बड़े सम्मान के साथ चन्दन आदि का लेप कर दिया है और सन्तान वृक्ष के फूलों का मुकुट भी मेरे सिर पर बांध दिया है। वही यह अति सम्मान (मेरे लिए) अनर्थ बन गया है। अब मैं क्या करूँ ? अथवा, इन्हीं मलयवती से प्राप्त दोनों लाल वस्त्रों से औरत का भेष करके और चादर से घूंघट निकाल कर चलता हूँ । फिर देखूं यह

  1. आक्रमण करना, कष्ट देना ।
  2. वर्णक = चन्दन, सुगन्धित रंग, उबटन ।
  3. सन्तान = इन्द्र के स्वर्ग के पांच वृक्षों में से एक । शेष चारो के नाम ये हैं— मन्दार, पारिजात, कल्प तथा हरिचन्दन !

( ११२ ) दासोए पुत्ता महुअरा किं करिस्संति त्ति । दास्याः पुत्रा मधुकराः किं करिष्यन्तीति । [तथा करोति] विटः- निरूप्य सहर्षम्) अरे चेडा ! (अङ्गुल्या निर्दिश्य सहासम्) अरे चेट ! एसा क्खु णोमालिआ मं पेक्खिअ अहं चिरस्स आअदो एषा खलु नवमालिका मां प्रेक्ष्य 'अहं चिरस्यागत' त्ति कुविदा अवगुण्ठनं कडुअ अण्णदो गच्छदि। इति कुपिताऽवगुण्ठनं कृत्वाऽन्यतो गच्छति । ता कण्ठे गेण्हिअ पसादेमि णं । तत्कण्ठे गृहीत्वा प्रसादयाम्येनाम् । [सहसोपसृत्य कण्ठे गृहीत्वा मुखे ताम्बूलं दातुमिच्छति] विदूषकः- (मद्यगन्धं सूचयन्नासिकां गृहीत्वा पराङ्मुखः स्थित्वा) कहं एक्क. णां महुअराणं सकाआदो परिब्भट्ठो कथनेकेषां ¹मधुकराणां सकाशात्परिभ्रष्ट दाणिं अण्णस्स दुट्ठमहुअरस मुहे पडिदोम्हि । इदानीमन्यस्य दुष्टमधुकरस्य मुखे पतितोऽस्मि । विटः- कहं कोवेण परम्मुही भूदा ? कथं कोपेन पराङ्मुखी भूता ? (प्रणामं कुर्वन्, विदूषकस्य चरणमात्मनः शिरसि कृत्वा) पसीद णोमालिए ! पसीद । प्रसीद नवमालिके ! प्रसीद ।

( ११३ ) दुष्ट भौंरे (मेरा) क्या कर लेंगे। [वैसा ही करता है] विट— (देखकर, हर्ष पूर्वक) अरे चेट ! (अंगुली से इशारा करके, हँसते हुए) निश्चय ही यह नवमालिका मुझे देखकर, क्योंकि मैं देर से आया हूँ अतः कुपित होकर, (मुखपर) घूंघट करके दूसरी ओर जा रही है। अतः इसे गले लगाकर प्रसन्न करता हूँ। [झट पास जाकर, उमे गले लगाकर, मुख में पान देना चाहता है] विदूषक—(शराब की वू की सूचना देते हुए, नाक पकड़ कर, मुख फेर कर) क्या एक प्रकार के मधुकरों से (भौरों) से छूट कर अब मैं दूसरे दुष्ट मधुकर (शराबी) के मुख (चंगुल) में पड़ गया हूँ। विट—क्या क्रोध से मुंह फेर रही है ? (प्रणाम करता हुआ विदूषक के चरण को अपने सिर पर रख कर) प्रसन्न हो, नवमालिका, प्रसन्न होवो। [चेटी का प्रवेश]


  1. मधुकर = (i) भौंरा; (ii) मस्त शराबी।

( ११४ ) चेटी-आणत्तम्हि भट्ठिदारिए जणणीए-हञ्जे णोमालिए ! आज्ञप्तास्मि भर्तृदारिकाया जनन्या - हञ्जे नवमालिके ! कुसुमोअरुज्जाणं गदुअ उज्जाणपालिअं पल्लविअं भणाहि - कुसुमाकरोद्यानं गत्वा उद्यानपालिकां पल्लविकां भण- “अज्ज सविसेसं तमालवीहिअं सजीकरेहि । मलयवदी- “अद्य सविशेषं तमालवीथिकां२ सजीकुरु । मलयवती- सहिदेण जामादुएण तत्थ गन्दव्वं' त्ति । आणत्ता च मए सहितेन जामात्रा तत्र गन्तव्यमिति । आज्ञप्ता च मया पल्लविआ । ता जाव रअणीविरहवड्ढिदोत्कण्ठं पल्लविका । तद्यावद्रजनीविरहवर्धितोत्कण्ठं पिअवल्लहं सेहरअं अण्णेसामि । (दृष्ट्वा) एसो सेहरओ ! प्रियवल्लभं शेखरकमन्विष्यामि । एष शेखरकः ! (सरोषम्) कहं अण्णं कम्पि इत्थिअं पसादेदि ! ता इह कथमन्यां कामपि स्त्रियं प्रसादयति ! तदिह ट्ठिदा ज्जेव्व जाणामि का एसेत्ति । स्थितैव जानामि कैषेति । विटः-(सहर्षम्)- हरिहरपिदामहाणं पि गव्विदो जो ण जाणइ णमिदुं हरिहरपितामहानामपि गर्वितो यो न जानाति नन्तुम् । सो सेहरओ चलणेसु तुज्ज णोमालिए ! पडइ ॥३॥ स शेखरकश्चरणयोस्तव नवमालिके ! पतति ॥ श्लोक नंः ३, अन्वयः--- यः गर्वितः हरिहरपितामहानामपि नन्तुं न जानाति स शेखरकः नवमालिके ! तव चरणयोः पतति ।

( ११५ ) चेटी — राजकुमारी (मलयवती) की माता जी ने मुझे आज्ञा दी है कि 'अरी नवमालिका ! कुसुमाकर उद्यान में जाकर उद्यानपालिका । (मालिन) पल्लविका से कह कि “आज अच्छी तरह से तमालवीथी (तमालवृक्षों के बीच का मार्ग) सजाओ । (क्योंकि) मलयवती के साथ जामाता (जीमूतवाहन) वहां जाएँगे ।” और मैं ने पल्लिका को आज्ञा दे दी है। अतः अब रात भर के वियोग से बढ़ी हुई उत्कण्ठा वाले अपने प्रिय स्वामी शेखरक को ढूंढती हूँ । (देख कर) यह रहा शेखरक ! (क्रोध के साथ) क्या किसी दूसरी स्त्री को प्रसन्न कर रहा है ? अतः यहीं ठहर कर ही मालूम करती हूँ कि यह कौन है । विट — (हर्षपूर्वक) हे नवमालिकां ! जो शेखरक गर्व के कारण विष्णु, शिव अथवा ब्रह्मा को भी प्रणाम करना नहीं जानता, वह तेरे चरणों पर पड़ रहा है ।

  1. वीथिका = गली; सड़क; रास्ता, मार्ग ।
  2. पितामह = दादा अथवा ब्रह्मा ।

( ११६ ) विदूषकः-दासिपुत्ता ! मत्तवालआ ! कुदो एत्थ णोमालिआ? दास्याःपुत्र ! मत्तवालक¹ ! कुतोऽत्र नवमालिका ? चेटी-(निरूप्य, सस्मितम्) कथं णं ति करिअ मदपरवसेण कथं नामिति कृत्वा मदपरवशेन सेहरएण अज्जो अत्तेओ पसादीअदि ? ता जाव अलीअं शेखरकेणार्यात्रेयः प्रसाद्यते ? तद्यावदलीकं² कोवं करिअ दुवेत्ति एदे परिहसिंसं । कोपं कृत्वा द्वावप्येतौ परिहसिष्यामि । चेटः-(चेटीं दृष्ट्वा, शेखरकं हस्तेन चालयन्) भट्टा ! मुञ्च एदं । णा भोदि एसा णोमालिआ । एसा भर्तः ! मुञ्च एतत् । न भवत्येषा नवमालिका । एषा उण रोसारुत्तेहिं लोअणेहिं पेक्खंती आगदा । ³पुनरोषारक्ताभ्यां लोचनाभ्यां प्रेक्षमाणागता । चेटी-(उपसृत्य) सेहरअ ! का उण एसा पसादीअदि ? शेखरक ! का पुनरेषा प्रसाद्यते ? विदूषकः-(अवगुण्ठनमपनीय) अहं मन्दभाअधेआए पुत्तो । अहं मन्दभागधेयायाः पुत्रः । चिटः-(विदूषकं निरूप्य) अरे कविलमंकडा ! तुमंपि मं सेहरअं अरे कपिल्मर्कट ! त्वमपि मां शेखरकं पदारेशि ? अरे चेडा ! गेण्ह एदं । जाव णोमालिअं प्रतारयसि ? अरे चेट ! गृहाणैनं, यावन्नवमालिकां प्रसादेमि । प्रसादयामि ।

( ११७ )

विदूषक -- बदमाश ! मतवाले ! नवमालिका यहां कहां ? चेटी-(देख कर, मुस्कराती हुई) क्या मुझे समझ कर नशे के कारण परवश हुआ शेखरक आर्य आत्रेय को प्रसन्न कर रहा है ? अच्छा तो नकली गुस्सा करके इन दोनों की हँसी उड़ाती हूँ। चेट- (चेटी को देखकर, शेखरक को हाथ से झंझोड़ कर) स्वामी ! इसे छोड़ दीजिए । यह नवमालिका नहीं है। वह तो क्रोध के कारण लाल लाल आंखों से देखती हुई (यह) आ गई । चेटी - (पास जा कर) शेखरक ! यह कौन मनाई जा रही है ? विदूषक - (घूंघट हटा कर) (यह) मैं हूँ (एक) अभागिन का पुत्र । विट- (विदूषक को देखकर) - अरे भूरे बन्दर ! तू भी शेखरक को धोखा देता है ? अरे चेट ! इसे पकड़ जब तक मैं नवमालिका को प्रसन्न करता हूँ ।


  1. मत्तवालक अथवा मत्तपालक = मतवाला; शराबी ।
  2. अलीकं = झूठा; बनावटी; नकली ।
  3. पुनः + रोष + आरक्त । र् के आगे यदि र् आ जाए तो पहिले र् का लोप हो जाता है । और उस से पहिले के ह्रस्व स्वर को दीर्घ कर देते हैं। अतः पुनर् के र् का लोप हो कर, उससे पूर्व 'अ' दीर्घ हो गया है।

( ११८ ) चेटः- जं भट्टके आणवेदि । यद्भर्त्ताज्ञापयति । विटः -(विदूषकं विमुच्य चेट्याः पादयोः पतति) पसीद णोमालिए ! पसीद । प्रसीद नवमालिके ! प्रसीद । विदूषकः- (आत्मगतम् ) एसो मे अवकमिदुं अवसरो । एष मेऽपक्रमितुमवसरः । [पलायितुमीहते] चेटः- (विदूषकं यज्ञोपवीते गृह्णाति । यज्ञोपवीतं त्रुट्यति) कहिं कहिं कविलमंकडा पलाअसि ? क्व क्व कपिलमर्कट ! पलायसे ? [तदुत्तरीयेणैव गले बद्ध्वाकर्षति] विदूषकः -भोदि णोमालिए ! पसीद । मोचेहि मं । भवति नवमालिके प्रसीद । मोचय माम् । चेटी-(विहस्य) जइ भूमीए सीसं णिवेसित्र पादेसु मे पडसि । यदि भूमौ शीर्षं निवेश्य पादयोर्मे पतसि । विदूषकः-(सरोषं सकम्पञ्च) भो ! कहं राजमित्तो बह्मणो भो ! कथं राजमित्रं ब्राह्मणो भविअ दासीए धीआए पादेसु पडइस्सं ? भूत्वा दास्यापुत्र्याः पादयोः पतिष्यामि ? चेटी- (अङ्गुल्या तर्जयन्ती¹ सस्मितम् ) दाणिं पाडइस्सं । इदानीं पातयिष्यामि ।

( ११६ ) चेट— जो स्वामी की आज्ञा । विट— (विदूषक को छोड़ कर चेटी के पैरों पड़ता है)-प्रसन्न हो, नवमालिका ! प्रसन्न हो । विदूषक- (मन ही मन)- यही मेरे भागने का मौका है । [ भागना चाहता है ] विट— (विदूषक को यज्ञोपवीत से पकड़ता है, यज्ञोपवीत टूट जाता है) कहाँ, भूरे बन्दर, कहाँ भागता है ? [ उसी की चादर से गले से बाँधकर खींचता है ] विदूषक- देवी नवमालिका ! प्रसन्न हूजिएं । मुझे छुड़ाइए । चेटी-- (हँसकर) यदि भूमि पर सिर रख कर मेरे पैरों पर गिरे तो (छुड़ाऊंगी) । विदूषक-- (क्रोध से कांपता हुआ) अरे क्या राजा का मित्र और ब्राह्मण होकर तुझ राँड के पावों पहूँगा ? चेटी-- (अंगुली से डराती हुई, मुस्कराहट के साथ) अब (तुम्हें अपने पैरों पर ) गिराऊँगी । शेखरक ! उठो, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ ।

  1. तर्ज् + शतृ + स्त्री० ।

( १२० )

... ! उट्ठेहि पसण्णा दे अहं । (कण्ठे गृह्णाति) एसो ...खरक ! उत्तिष्ठ । प्रसन्ना तेऽहम् । एष उण जामाउअस्स पिअवअस्सो तुए खलीकीदो। एव्वञ्च पुनर्जामातुः प्रियवयस्यस्त्वया खलीकृतः १ । एवञ्च सुणिअ कदावि भट्टा मित्तावसू तव कुप्पइ । ता आदरेण श्रुत्वा कदापि भर्ता मित्रावसुस्तुभ्यं कुप्यति । तदादरेण सम्माणेहि एणं । सम्मानयैनम् । विटः-जं णोमालिआ आणवेदि । (विदूषकं कण्ठे गृहीत्वा) यन्नवमालिकाज्ञापयति । अज्ज ! तुमं मए सम्बन्धिओ त्ति करिअ परिहसिदो । आर्य ! त्वं मया सम्बन्धीति कृत्वा परिहसितः । (घूर्णन्) किं सच्चं ज्जेव्व सेहरओ मत्तो किदो परिहासो । किं सत्यमेव शेखरको मत्तः ? कृतः २ परिहासः । (उत्तरीयं वर्तुलीकृत्य आसनं ददाति) इध उबविसदु सम्बन्धिओ । इहोपविशतु सम्बन्धी । विदूषकः- (स्वगतम्) दिट्ठिआ अवगदो विअ से मदावेगो । दिष्ट्याऽपगत इवास्य मदावेगः । [उपविशति] विटः- णोमालिए ! उबविस तुमं पि एदस्स पासे, जेण दुवेवि नवमालिके ! उपविश त्वमप्येतस्य पार्श्वे, येन द्वावपि तुम्हे समं ज्जेव्व सम्मणाइस्सं । युवां सममेव सम्मानयिष्यामि ।

( १२१ ) (गले लगाती है) दामाद (जीमूतवाहन) के इस प्रिय मित्र के साथ तुम ने दुर्व्यवहार किया है 1 यह सुन कर कहीं स्वामी मित्रावसु तुम्हें नाराज हों । इसलिए आदर के साथ इनका सम्मान करो । विट - जो नवमालिका की आज्ञा । (विदूषक को गले लगाकर) आर्य? आप हमारे सम्बन्धी हैं यह सोचकर ही हँसी मज़ाक किया है है । (झूमता हुआ) क्या सचमुच शेखरक मदमस्त है ? (नहीं) मज़ाक ही किया है । (चादर को गोलकर आसन बनाकर देता है.) सम्बन्धी जी, यहां बैठिए । विदूषक-(मन ही मन) भाग्यवश जान पड़ता है मानों इसके नशे का जोश उतर गया है । [ बैठता है] विट - नवमालिका ! तू भी इसी के पास बैठ जा ताकि तुम दोनों का सम्मान एक साथ ही कर सकूं !

  1. खल + च्वि + क्त । अपमान करना; कष्ट देना; बुरा व्यवहार करना ।
  2. मज़ाक किया है । अथवा, मज़ाक हो चुका; मज़ाक को छोड़िए ।

( १२२ ) चेटी- (विहस्योपविशति) विटः- (चषक्रमादाय) अरे चेडा सुमट्टिदं क्खु ए चसअं अरे चेट ! सुमृष्टं खल्वेतं चषकं करेहि अच्छसुराए । कुरु अच्छसुरया । चेटः- (नाट्येन चषकभरणं करोति) विटः- (स्वशिरः शेखरगत् पुष्पाणि गृहीत्वा चषके विन्यस्य जानुभ्यां स्थित्वा नवमालिकाया उपनयति) णोमालिए! चक्खिअ देहि एदं एदस्स । नवमालिके ! आस्वाद्य देह्येतदेतस्य ! चेटी- (सस्तिमम्) जं सेहरओ भणादि । यच्छेखरको भणति । [ तथा कृत्वा विटस्यार्पयति ] विटः - ( विदूषकस्य चषकमर्पयति ) एदं णोमालिआ- एतन्नवमालिका- मुहसंसग्गमविसेसवामिअरसं सेहरआअण्णेण मुखसंसर्गसविशेषवासितरसं शेखरकादन्येन केणवि अणासादिदपुरुव्वं ता पिवेहि एदं । किं केनाप्यनास्वादितपूर्वं, तत् पिवैतत् । किं दे अवरं सम्माणं करिस्सं ? तेऽपरं सम्मानं करिष्यामि ? विदूषकः- (सवैलक्ष्यस्मितं¹ कृत्वा ) सेहरअ ! बम्हणो क्खु अहं । शेखरक ! ब्राह्मणः खल्वहम्² ।

( १२३ ) चेटी— (हँसती हुई बैठ जाती ) विट— (शराब का प्याला लेकर) अरे चेट ! इस प्याले को बढ़िया शराब से अच्छी तरह भर दे । चेट— (प्याला भरने का अभिनय करता है) विट— (अपने सिर के मुकुट से फूल लेकर प्याले में डाल कर, घुटनो के बल बैठ कर नवमालिका के पास ले जाता है) नवमालिका !' चख कर यह इसे दो । चेटी—(मुस्कराते हुए)—जैसे शेखरक कहे । [वैसा ही कर के विट को दे देती है ] विट— (विदूषक को प्याला देता है)—नवमालिका के मुख के सम्पर्क से विशेष रूप से सुगन्धित इस रस को पिओ जिसका स्वाद शेखरक को छोड़ अभी तक और किसी ने नहीं लिया ! इस से बढ़ कर और मैं तेरा क्या आदर कर सकता हूँ । विदूषक—(विचित्र अथवा बनावटी हँसी के साथ) शेखरक ! मैं (तो) ब्राह्मण हूँ । ————————————————————————

  1. घबराहट की हँसी; कृत्रिम हँसी; दिखावे की हँसी; विचित्र हँसी ।
  2. ब्राह्मण के लिए मद्यपान वर्जित है—‘‘ब्राह्मणो मद्यपानाद्धि ब्राह्मण्यादेव हीयते’’।

( १२४ ) विटः- जइ तुम बम्हणो, ता कहिं दे बम्हसुत्तं ? यदि त्वं ब्राह्मणः, तत्क्व ते ब्रह्मसूत्रम् ? विदूषकः - (यज्ञोपवीतं स्वशरीरेऽदृष्ट्वा) तं क्खु मे इमिणा तत्खलु मेऽनेन चेटेण कट्टीअमाणं छिन्नं । चेटेन कृष्यमाणं छिन्नम् । चेटो-(विहस्य) जइ एवं ता वेइक्खराईं पि दाव कतिवि उदाहरा यद्येवं तद्वेदाक्षराण्यपि तावत् कत्यप्युदाहर । विदूषकः-भोदि ! इमिणा शीधुगन्धेण पिणद्धाईं मे वेइक्खराईं । भवति ! अनेन शीधुगन्धेन पिद्धानि मे वेदाक्षराणि । अहवा, किं मम भोदीए समं विवादेण । एसो दे अथवा, किं मम भवत्या समं विवादेन । एष ते बम्हणो पादेसु पडदि । ब्राह्मणः पादयोः पतति । [ इति पादयोः पतितुमिच्छति ] चेटो- (हस्ताभ्यां निवार्य) मा क्खु एवं करेदु अज्जो । सेहरअ मा खल्वेवं करोत्वार्यः । शेखरक ! ओसर ओसर । सच्चं बम्हणो क्खु एसो । अपसरापसर । सत्यं ब्राह्मणः खल्वेषः । (विदूषकस्य पादयोः पतति) अज्ज ! ण तुए कुविदव्वं । आर्य ! न त्वया कुपितव्यम् । सम्बन्धिआणुरूओ क्खु एसो मए परिहासो किदो । सम्बन्धिकानुरूपः खल्वेष मया परिहासः कृतः ।

( १२५ ) विट—यदि तू ब्राह्मण है तो तेरा यज्ञोपवीत कहाँ है ? विदूषक—(अपने शरीर पर यज्ञोपवीत न देखकर) उस मेरे यज्ञोपवीत को इस चेट ने खींचते हुए तोड़ डाला है । चेटी—(हँसते हुए) यदि ऐसा ही है तो कुछ वेद के मन्त्र ही बोल । विदूषक— भद्रे ! इस शराब की बू से मेरे वेद मन्त्र भी बन्द हो गए हैं । अथवा, आप के साथ विवाद करने से मुझे क्या लाभ ? (लो) यह ब्राह्मण आप के पैरों पड़ता है । [यह कह कर उसके पैरों पर गिरना चाहता है] चेटी—(हाथो से रोक कर)— आर्य ! ऐसा मत करें । शेखरक ! हटो, हटो ! यह सचमुच ब्राह्मण ही है । (विदूषक के पैरों पर गिरती है) आर्य, आप नाराज़ न हों । सम्बन्धी के अनुरूप ही मैं ने ऐसा मज़ाक किया है ।

  1. बन्द हो गए हैं; मानों उन पर पर्दा पड़ गया है; मैं भूल गया हूँ । वस्तुतः उसे कोई वेद मन्त्र याद नहीं । शराब की बू का तो केवल बहाना ही है । इसी लिए अगले ही वाक्य में हथियार डाल देता है ।

( १२६ ) विटः — अहम्पि णं पसादेमि । [पादयोर्निपत्य] मरिसेदु अहम्प्येनं प्रसाद्यामि । मर्षयतु, मरिसेदु अज्जो, जं मए मदपरवसेण अवरद्धं, जेण अहं मर्षयतु, आर्यः, यन्मया मदपरवशेनापराद्धम् ; येनाहं णोमालिए सह आवाणअं गमिस्सं । नवमालिकया सहापानकं गमिष्यामि । विदूषकः—मरिसीदं मए, गच्छ तुम्हे, अहंपि पिअवअस्सं मर्षितं मया, गच्छतं युवाम् । अहमपि प्रियवयस्यं पेक्खामि । प्रेक्षे । [निष्क्रान्तो विटश्चेट्या सह चेटश्च] विदूषकः— अदिक्कंतो बम्हणस्स अकालमित्तू । ता जाव अतिक्रान्तो ब्राह्मणस्याकालमृत्युः । तद्याव- अहंपि मत्तवालअस्सङ्गदूसिदो इध दिग्धिकाए ण्हाइस्सं । दहमपि मत्तवालकसङ्गदूषित इह दीर्घिकायां स्नास्यामि । [तथा करोति । नेपथ्याभिमुखमवलोक्य]—एसो पिअवअस्सोवि एष प्रियवयस्योऽपि रुक्किणीं विअ हरी मलयवदीं अवलम्बिअ इदो जेव्व रुक्मिणीमिव हरिर्मलयवतीमवलम्ब्य इत एव- आगच्छदि । ता जाव पासपरिवित्ती होमि । आगच्छति । तद्यावत्पार्श्ववर्ती भवामि । [ततः प्रविशति गृहीतवरनेपथ्यो नायको मलयवती विभवतश्च परिवारः]

An exact line-by-line transcription of the page into Devanagari script:

( १२७ ) विट- मैं भी इन को मनाता हूँ। (पैरों पर गिरकर) क्षमा करें आर्य ! जो कुछ मैं ने नशे के जोश में अपराध किया है उसे आप क्षमा करें ताकि मैं नवमालिका के साथ मधुशाला को जाऊं । विदूषक-मैं ने, क्षमा किया। आप दोनों जाइए। मैं भी अपने प्रिय मित्र को देखता हूँ। [चेट्टी के साथ विट और चेट का प्रस्थान] विदूषक- (सुफ) ब्राह्मण की अकाल मृत्यु टल गई। तो मैं शराबी के सम्पर्क से दूषित हुआ इस तालाब में स्नान करता हूँ। [वैसा ही करता है। (फिर) पर्दे की ओर देखकर] यह मेरा प्रिय मित्र, रुक्मणी को लिए कृष्ण के समान, मलयवती के साथ इधर ही आ रहा है। तो मैं भी इनके पास ही जाता हूँ। [वर वेष में नायक, मलयवती और वैभव के अनुरूप नौकरों का प्रवेश]

  1. आपानकं = पानशाला; भट्टी; मधुशाला; शराब पीने की जगह; शराब की दुकान ।
  2. अवलम्ब्य = सहारा लेकर; हाथ पकड़ कर; उसके सङ्ग ।

( १२८ ) नायकः—(मलयवतीमवलोक्य सहर्षम् ) दृष्टा दृष्टिमधो ददाति, कुरुते नालापमाभाषिता, शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति, बलादालिङ्गिता वेपते। निर्यान्तीषु सखीषु ^1वासभवनान्निर्गन्तुमेवेहते । जातो ^2वामतयैव मेऽद्य सुतरां प्रीतयै नवोढा प्रिया ॥४॥ (मलयवतीं पश्यन्) हुङ्कारं ददता मया प्रतिवचो यन्मौनमासेवितं, यद्दावानल दीप्तिभिस्तनुरियं चन्द्रातपैस्तापिता ध्यातं यत्सुबहून्यनन्यमनसा नक्तन्दिनानि प्रिये ! तस्यैतत् तपसः फलं मुखमिदं पश्यामि यत्तेऽधुना ॥ ५ ॥ नायिका—(अपवार्य) हञ्जे चतुरिए ! ण केवलं दंसणीओ, हञ्जे चतुरिके ! न केवलं दर्शनीयः, श्लोक नं०: ४, अन्वयः— दृष्टा दृष्टिमधो ददाति, आभाषिता आलापं न कुरुते; शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति, बलात् आलिङ्गिता वेपते । वासभवनात् सखीषु निर्यान्तीषु निर्गन्तुम् इव ईहते, वामतया एव अद्य मे नवोढा प्रिया सुतरां प्रीत्यै जाता ॥ श्लोक नं०: ५ अन्वयः— यत् प्रतिवचः हुङ्कारं ददता मया मौनम् आसेवितम् ; यत् दावानलदीप्तिभिः चन्द्रातपैः इयं तनुः तापिता; यत् सुवहूनि नक्तन्दिनानि अनन्यमनसा (मया) ध्यातम्; (हे) प्रिये ! तस्य तपसः एतत् फलं यत् ते इदं मुखं अधुना पश्यामि ॥-

( १२६ ) नायक—(मलयवती को देख कर, हर्षपूर्वक) जब मैं इसे देखता हूँ तो यह अपनी दृष्टि नीचे कर लेती है; यदि मैं बातचीत करता हूँ तो यह बोलती ही नहीं; शय्या पर यह अपना मुख दूसरी ओर किए रहती है; बलात् (ज़बरदस्ती) आलिङ्गन करने पर काँपने लगती हैं; जब इसकी सहेलियां कमरे से जाने लगती हैं तो यह भी मानों निकल जाना चाहती है; इस प्रतिकूल आचरण से मेरी नवविवाहिता प्रिया और भी अधिक आनन्द का कारण बन गई है । (मलयवती को देख कर)— हे प्रिये ! (लोगों की) प्रत्येक बात के उत्तर में केवल हुङ्कार (हूँ, हूँ) करते हुए जो मैं ने मौनव्रत का पालन किया, दावाग्नि के समान गरम चन्द्रमा की किरणों से जो अपने इस शरीर को तपाया, बहुत काल तक रात-दिन एकाग्रचित्त से जो (तेरा ही) ध्यान किया— उसी तपस्या का यह फल है कि तेरा यह मुख अब देख रहा हूँ । नायिका—(अलग) सखी चतुरिका ! यह केवल सुन्दर ही नहीं, अपितु

  1. वासभवनं = रहने की जगह; घर; अथवा कमरा; शयनगृह ।
  2. वामता = विरुद्ध आचरण; इच्छा के प्रतिकूल आचरण ।