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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

द्वितीयोऽङ्कः। [ततः प्रविशति चेटी] चेटी-आणत्तम्हि भट्ठिदारिए मलयवदीए जहा- आज्ञप्तास्मि भर्तृदारिकया मलयवत्या यथा - 'हञ्जे मणोहरिए ! अज्ज चिराअदि भाअरो मे 'हञ्जे मनोहरिके ! अद्य चिरायति भ्राता मे अज्जोमित्तावसू। ता गदुअ जाणेहि दाव किं आअदो आर्यो मित्रावसुः। तद् गत्वा जानीहि तावत् किमागतो णा वेति । न वेति । (परिक्रामति) (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) का उण एसा तुरिदतुरिदं इदो एव्व आअच्छदि ? का ¹पुनरेषा त्वरितत्वरितमित एव आगच्छति ? (निरूप्य) कहं चदुरिआ ? कथं चतुरिका ? [ततः प्रविशति चतुरिका] मनोहरिका-(उपसृत्य) हला चदुरिए ! किं णिमित्तं उण मं हला चतुरिके ! किं निमित्तं पुनर्मां परिहरित्र एव्वं तुरिदाए गच्छीअदि ? परिहृत्य एवं त्वरितया गम्यते ? चतुरिका-हला मणोहरिए ! आणत्तम्हि भट्ठिदारिए मलयवदीए- हला मनोहरिके ! आज्ञप्तास्मि भर्तृ दारिकया मलयवत्या-

दूसरा अङ्कः । [चेटी का प्रवेश] चेटी — राजकुमारी मलयवती ने मुझे आज्ञा दी है कि 'सखी, मनोहरिके ! आज मेरे भाई श्री मित्रावसु ने देर कर दी है। अतः जाकर पता लगा कि वह आ गए हैं कि नहीं। (घूमती है) (नेपथ्य की ओर देख कर) परन्तु यह कौन जल्दी जल्दी इधर ही आ रही है ? (अच्छी तरह देख कर) क्या चतुरिका है ? [चतुरिका का प्रवेश] मनोहरिका— (पास जाकर) अरी चतुरिके ! क्या कारण है कि मुझे छोड़ कर जल्दी से चली जा रही हो । चतुरिका—मनोहरिके ! राजकुमारी मलयवती ने मुझे आज्ञा दी है कि-

  1. यहां 'पुनः' 'परन्तु' के अर्थ में प्रयुक्त है । ( ५१ )

२. द्वितीय अङ्क: मलयवती-जीमूतवाहन परिणय

( ५२ ) हज्जे चतुरिए ! कुसुमावचअ—परिसमणिस्सहं मे सरीरं । हञ्जे चतुरिके ! कुसुमावचय—परिश्रमनिःसहं मे शरीरम् । सरदादवजणिदो विअ मे संदावो अधिअदरं वाधेदि । शरदातपजनित इव मे संतापो¹ऽधिकतरं बाधते । ता गच्छ तुमं, बालकदलीपत्तपरिक्खवे चंदनलदाघरए तद् गच्छ त्वं बालकद्लीपत्रपरिक्षिप्ते चन्दनलतागृहे चंदमणिसिलायलं सज्जीकरेहि 'त्ति । अणुचिट्ठिदंअ मए चन्द्रमणिशिलातलं सज्जीकुरु' इति । अनुष्ठितञ्च मया जधा आणत्तं । ता जाव गदुआ भट्टिदारिआए णिवेदेमि । यथाऽऽज्ञप्तम् । तद्यावद् गत्वा भर्तृदारिकायै निवेदयामि । मनोहरिका—जइ एवं ता लहुं गदुअ णिवेदेहि, जेण से यद्येवं तल्लघु² गत्वा निवेदय येनास्या- तहिं गदाए उवसमिदि संदावो । स्तत्र गताया उपशाम्यति संतापः । चतुरिका— (विहस्यात्मगतम् ) ण ईरिसो से संदावो जो नेदृशोऽस्याः संतापो य एव्वं उवसमिसदि । विवित्तरमणीअं चंदणलदाघरअं एवमुपशमिष्यति । विविक्तरमणीयं चन्दनलतागृहं पेक्खन्तीए अधिअदरो संदावो हुविस्सदि त्ति तक्केमि । प्रेक्षमाणाया अधिकतरः संतापो भविष्यतीति तर्कयामि ! (प्रकाशम् ) ता गच्छ तुमं । तद् गच्छ त्वम् ।

( ५३- ) ! "सखि चतुरिके ! फूलों के चुनने के परिश्रम से मेरा शरीर बहुत थक गया है। शरद् ऋतु की धूप से मानों उत्पन्न हुई गरमी मुझे बहुत कष्ट दे रही है। अतः तू जा और कोमल केले के पत्तों से ढके हुए चन्दनलतागृह में चन्द्रमणि शिला के तल को तैयार कर।" और जैसी (उनकी) आज्ञा थी मैं ने कर दिया है। तो जाकर राजकुमारी को (इसकी) सूचना देती हूँ। मनोहरिका - यदि ऐसा है तो जल्दी जाकर बता ताकि वहां जाकर उस का कष्ट शान्त हो। चतुरिका - (हंस कर, मन ही मन) उसका सन्ताप ऐसा नहीं जो इस प्रकार शान्त हो जाएगा ! मेरा तो विचार है कि एकान्त और रमणीय चन्दनलता गृह को देखने से इसका सन्ताप और भी बढ़ेगा। (प्रकट) अच्छा तू जा।

  1. गरमी, दुःख, कष्ट।
  2. लघु = जल्दी, शीघ्र !

( २४ ) अहम्पि 'सज्जीकिदं मणिसिलाअलं' त्ति गदुअ अहमपि 'सज्जीकृतं मणिशिलातलमिति गत्वा भट्टिदारिआए णिवेदेमि । (इति निष्क्रान्ते) भर्तृदारिकायै निवेदयामि । [प्रवेशकः] [ततः प्रविशति सोत्कण्ठा मलयवती चेटी च] मलयवती — (निःश्वस्यात्मगतम्) हिअअ ! तथा णाम तदा तस्सिं जणे लज्जाए मं परम्मुही- हृदय ! तथा नाम तदा तस्मिञ्जने लज्जया मां पराङ्मुखी- कदुअ दाणिं अप्पणा तहिं एव्वं गदं सि त्ति अहो ! कृत्वेदानीमात्मना तत्रैव गतमसीत्यहो ! दे अत्तंभरित्तणं । ते आत्मम्भरित्वम् । (प्रकाशम्) हञ्जे चतुरिए ! आदेसेहि मे भअवदीए आअदणस्स मग्गं । हञ्जे चतुरिके ! आदिश मे भगवत्या आयतनस्य मार्गम् । चेटी — (आत्मगतम्) चन्दणलदाघरअं पत्थिदा भणादि भअवदीए आअदणस्स मग्गं चन्दनलतागृहं प्रस्थिता भणति 'भगवत्या आयतनस्य मार्गम् । (प्रकाशम्) णं चन्दणलदाघरअं भट्टिदारिआ पत्थिदा । ननु चन्दनलतागृहं भर्तृदारिका प्रस्थिता ।

( ५५ ) मैं भी जाकर राजकुमारी को सूचना देती हूँ कि चन्द्रमणि शिलातल तैयार है। (दोनों चली जाती हैं) [प्रवेशक समाप्त] [उत्कण्ठित मलयवती और चेटी का प्रवेश] मलयवती— (गहरी सांस लेकर, मन ही मन) हे हृदय ! उस समय उस (प्रिय से) लज्जावश मुझे पराङ्मुख करके अब तू स्वयं वहीं (उसके पास) चला गया है। अहो, तेरी स्वार्थपरता ! (प्रकट) सखि चतुरिका ! भगवती (गौरी) के मन्दिर का मार्ग दिखा। चेटी —(मन ही मन) चली तो थी चन्दनलतागृह को, पर कहती है 'देवी के मन्दिर का मार्ग' । (प्रकट) राजकुमारी, आप तो चन्दनलतागृह की ओर चली थीं ।

( ५६ ) नायिका — (सलज्जम्) । हञ्जे सुट्ठु सुमराविदं, ता एहि तहिं जेव गच्छम्ह । हञ्जे ! सुष्ठु स्मारितम् । तदेहि तत्रैव गच्छावः । चेटी — एदु एदु भट्ठिदारिआ । [अग्रतो गच्छति] एतु एतु भर्तृदारिका । नायिका — (अन्यतो गच्छति) चेटी — (पृष्ठतो दृष्ट्वा सोद्वेगमात्मगतम् ) अहो ! से सुण्णहिअअत्तणं ! कहं तं ज्जेव देवी भवणं अहो ! अस्याः शून्यहृदयत्वम् ! कथं तदेव देवी भवनं पत्थिदा । (प्रकाशम्) भट्ठिदारिए ! णं इदो चंदणलदाघरअं । प्रस्थिता । भर्तृदारिके ! नन्वितश्चन्दनलतागृहम् । ता इदो एहि । तदित एहि । नायिका — (१सविलक्षस्मितं तथा करोति) चेटी — भट्ठिदारिए ! इदं चंदणलदाघरअं । ता पविसिअ भर्तृदारिके ! इदं चन्दनलतागृहम् । तत्प्रविश्य चंदमणिसिलादले उपविसिअ समस्ससदु भट्ठिदारिआ । चन्द्रमणिशिलातले उपविश्य समाश्वसितु भर्तृदारिका । [उभे उपविशतः] नायिका — (निःश्वस्य, आत्मगतम् ) भअवं कुसुमाउह ! जेण तुमं रूवसोहाए णिज्जिदोसि, भगवन् कुसुमायुध² ! येन त्वं रूपशोभया निर्जितोऽसि ,

( ५७ )

नायिका— (लज्जा के साथ) सखी, तू ने खूब याद दिलाया। तो आ वहीं चलें। चेटी — राजकुमारी जी, आइए। (आगे चलती है) नायिका — (दूसरी दिशा में जाती है) चेटी — (पीछे देख कर, दुःख के साथ, मन ही मन)—आंह, इसकी बेसुधी ! क्या उसी देवी के मन्दिर को (ही) चल पड़ी है ? (प्रकट) राजकुमारी, चन्दनलतागृह तो इधर है। अतः, इधर आइए। नायिका—(लज्जित हो कर, मुस्कराते, हुए, वैसा ही करती है) चेटी— राजकुमारी ! यह चन्दनलतागृह है। इसमें प्रवेश करके, चन्द्रमणि शिलातल पर बैठकर, शान्त होइए। (दोनों बैठ जाती हैं) नायिका — (गहरी सांस लेकर, मन ही मन) भगवान् काम देव ! जिस (जीमूतवाहन) ने आपको अपने रूप की शोभा से जीत लिया


  1. घबराहट, हैरानी अथवा लज्जा के साथ।
  2. कुसुमायुध- फूलों के शस्त्रों वाला। कामदेव के पांच बाण बताए हैं जो फूलों के हैं - अरविन्द, अशोक, चूत, नवमल्लिका और नीलोत्पल।

( २८ ) तस्स तुए ण किम्पि किदं। मम उण अणवराद्धाएवि तस्य त्वया न किमपि कृतम्। मम पुनरपराद्धाया अपि, अबलेत्ति करित्र पहरंतो कहं ण लज्जेसि ? अबलेति कृत्वा प्रहरन् कथं न लज्जसे ? (आत्मानं निर्वर्ण्य, मदनावस्थां नाटयन्ती प्रकाशम् ) हञ्जे ! कीस उण घणपल्लवणिरुद्धसूरकिरणं तं एव्व हञ्जे ! किं पुनर्धनपल्लवनिरुद्धसूर्य्यकिरणं तदेव चंदणलदाघरअं ण मे अज्जवि संदाबदुक्खं अवणोदि । चन्दनलतागृहं न मे ऽद्यापि संतापदुःखमपनयति । चेटी-- जाणामि अहं एत्थ संदावस्स कारणं, किं जानम्यहमत्र संतापस्य कारणम्; किं उणअसंभावणीअं ति भट्टिदारिआ ण तं पडिवज्जिस्सदि । पुनरसम्भावनीयमिति भर्तृदारिका न ¹तत्प्रतिपत्स्यते । नायिका- (आत्मगतम् ) लखिअदा विअ अहं एदाए, तह वि पुच्छिस्सं। (प्रकाशम्) लक्षितेवाहमेतया, तथापि पृच्छामि । हञ्जे ! किं तं जं ण पडिवज्जिअदि । ता कहेहि दाव किं हञ्जे ! किं तद्यन्न प्रतिपद्यते । तत्कथय तावत्किं तं कारणं । तत्कारणम् । चेटी- एसो दे हिअअट्ठिदो वरो । एष ते हृदयस्थितो वरः ।

( ५६ ) है, उसका तो आप ने कुछ भी नहीं बिगाड़ा। परन्तु मुझ निरपराध पर अबला जानकर प्रहार करते हुए क्या आप को शर्म नहीं आती ? (अपने आप को देखकर, काम अवस्था का अभिनय करती हुई; प्रकट) सखी, घने पत्तों से सूर्य की किरणों को रोकने वाला (यह) वही चन्दनलतागृह आज मेरे गरमी के क्लेश को दूर क्यों नहीं करता ? चेटी- मैं इस सन्ताप का कारण जानती हूँ । परन्तु राजकुमारी आप तो उसे असम्भव कह कर विश्वास नहीं करेंगी । नायिका- (मन ही मन) इसने मुझे भांप ही लिया है । फिर भी पूछती हूँ। (प्रकट) सखी, वह क्या है जिसे मैं स्वीकार नहीं करूंगी ?¹ तो कह वह क्या कारण है ? चेटी- यह आप के हृदय में स्थित वर !

  1. मानना, स्वीकार करना ।

( ६४ ) नायिका- (सहर्षं ससम्भ्रममुत्थाय द्वित्राणि पदानि गत्वा) कहिं कहिं सो ? कुत्र कुत्र सः ? चेटी- (उत्थाय सस्मितं) भट्टिदारिए सो को ? भर्तृदारिके स कः ? नायिका- (सलज्जमुपविश्याधोमुखी तिष्ठति) चेटी- भट्टिदारिए ! णं एदम्हि वत्तुकामा-‘एसो दे भर्तृदारिके ! नन्वेतदस्मि वक्तुकामा-"एष ते हिअअट्ठिदो वरो एव्व देईए दिण्णो सिविणए । हृदयस्थितो वर एव देव्या दत्तः स्वप्ने । पच्छा वि क्खणं एव्व पविमुक्ककुसुमवाणो विअ पश्चादपि क्षणमेव प्रविमुक्तकुसुमबाण इव मअरद्धओ भट्टिदारिआए दिट्ठो । सो दे इमस्स मकरध्वजो भर्तृदारिकया दृष्टः । स तेऽस्य संदावस्स कारणं जेण एदं सहावसीदलंपि चंदण- सन्तापस्य कारणं, येन एतत्स्वभावशीतलमपि चन्दन- लदाघरयं ण दे संदावदुक्खं अवणोदि । लतागृहं न ते सन्तापदुःखमपनयति । नायिका- (चतुरिकाया अलकं सञ्जयन्ती) हञ्जे ! चदुरिआ क्खु तुमं, किं दे अवरं पच्छादीअदि ? हञ्जे ! चतुरिका खलु त्वम्, किं तेऽपरं प्रच्छाद्यते ? ता कहिस्सं । तत्कथयिष्यामि ।

( ६१ ) नायिका- (हर्ष तथा घबराहट के साथ उठकर, दो तीन कदम चलकर) कहाँ ? कहाँ है वह ? चेटी- (उठकर, मुस्कराते हुए) राजकुमारी, वह कौन ? नायिका- (लज्जित हो बैठ कर, मुहँ नीचे किए रहती है) चेटी - राजकुमारी, मैं तो यह कहना चाहती हूँ कि यह आप के हृदय में स्थित वर देवी ने स्वप्न में दिया। पीछे उसे आपने क्षणभर के लिए फूलों के बाणों से रहित (साक्षात्) कामदेव के समान देखा। वही आपके इस सन्ताप का कारण है जिससे यह स्वभाव से (ही) शीतल चन्दनलतागृह भी आपके (इस) सन्ताप के कष्ट को दूर नहीं कर सकता। नायिका- (चतुरिका के बाल सँवारती हुई) सखी ! तू सचमुच चतुर है। और तुझ से क्या छिपाना है ? सो कहती हूँ ।

  1. 'काम' तथा 'मनस्' आगे होने पर तुमुन् का अनुस्वार नहीं रहता ।

( ६२ ) चेटी— भट्टिदारिए ! दाणिं एव्व कहिदं इमिणा भर्तृदारिके ! इदानीमेव कथितममुना वरालापमत्तजणिदेण संभमेण । ता मा संतप्प । वरालापमात्रजनितेन सम्भ्रमेण । तन्मा सन्तप्यस्व । जइ अहं चतुरिआ, तदा सोवि भट्टिदारिअं अप्पेक्खंतो यद्यहं चतुरिका, तदा सोऽपि भर्तृदारिकामपश्यन् ण मुहुत्तंपि अहिरमिस्सदि । एदम्पि मए न मुहूर्तम्प्यभिरंस्यते । एतदपि मया लक्खिदं एव्व । लक्षितमेव । नायिका—(सास्रम्) हञ्जे ! कुदो अम्हाणं एत्तिआणि भाग्गधेआईं ? हञ्जे ! कुतोऽस्माकमियन्ति भागधेयानि ? चेटी — भट्टिदारिए ! मा एव्वं भण । किं मधुमहणो भर्तृदारिके ! मैवं भण । किं मधुमथनो वच्छत्थलेण लच्छिं अणुवहंतो णिव्वुदो भोदि ? वक्षःस्थलेन लक्ष्मीमनुद्वहन् निर्वृत्तो¹ भवति ? नायिका— किं सुअणो पिअं वज्जिअ अण्णं भणिदुं जाणादि ? किं सुजनः प्रियं वर्जयित्वाऽन्यद्भणितुं जानाति ? सहि ! अ दोवि मे संदावो अधिअदरं बाधेदि, जं सो सखि ! अतोऽपि मे सन्तापोऽधिकतरं बाधते, यत्स

( ६३ ) चेटी - राजकुमारी, अभी 'वर' शब्द के उच्चारण से ही उत्पन्न हुई इस घबराहट से (आपने सब कुछ) कह दिया है । अतः (और अधिक) सन्तप्त न हो । यदि मैं (सचमुच) चतुरिका हूँ तो वह भी आप को देखे बिना क्षण भर भी (कहीं) आनन्द नहीं ले सकेगा । यह भी मैंने देख लिया है । नायिका- (आंसुओं के साथ) हमारे इतने भाग्य कहाँ ? चेटी - राजकुमारी, ऐसा न कहो । क्या भगवान् विष्णु छाती पर लक्ष्मी को उठाए बिना सुखी हो सकते हैं ? नायिका- क्या मित्रजन प्रिय बातों को छोड़ अन्य कुछ बोलना (भी) जानते हैं ? सखी, इसलिए भी मेरा सन्ताप और अधिक

  1. निर्वृत्तः = सुखी, शान्त ।

( ६४ ) महाणुभाओ वाङ्गामेत्तएण वि मए ण संभाविदो । महानुभावो वाङ्मात्रेणापि मया न सम्भावितः । सो वि अकिदपडिवत्तीं अदक्खिणोत्ति मं संभाविस्सदि । सोऽप्यकृतप्रतिपत्तिमद्¹क्षिणेति मां सम्भावयिष्यति । ( इति रोदिति ) चेटी-- भट्टिदारिए ! मा रोद । अहवा कहं ण रोइस्सदि ? भर्तृदारिके ! मा रुदिहि । अथवा कथं न रोदिष्यति ? अहिओ से हिअअस्स संदावो अधिअदरं बाधेदि । अधिकोऽस्याः हृदयस्य सन्तापोऽधिकतरं बाधते । ता किं दाणीं एत्थ करिस्सं ? ता जाव चंदणलदा- तत्किमिदानीमत्र करिष्ये । तद्यावच्चन्दनलता- पल्लवरसं से हिअए दाइस्सं । पल्लवरसमस्या हृदये दास्ये । (उत्थाय चन्दनपल्लवं गृहीत्वा निष्पीड्य हृदये ददाति) भट्टिदारिए ! णं भणामि, मा रोद । अअं क्खु भर्तृदारिके ! ननु भणामि, मा रुदिहि । अयं खलु चंदणरसो इमेहिं अणावरद-पडंतेहिं वाहबिंदूहिं उण्हो- चन्दनरस एभिरनवरत-पतद्भिर्बाष्पविन्दुभिरुष्णी- किदो ण दे हिअअस्स संदाबदुक्खं अवणेदि । कृतो न ते हृदयस्य सन्तापदुःखमपनयति । (कदलीपत्रमादाय वीजयति) नायिका-(हस्तेन निवारयन्ती) सहि ! मा वीजेहि । सखि ! मा वीजय ।

( ६५ ) कष्टकर है क्योंकि मैंने उस महानुभाव का वाणीमात्र से भी सम्मान नहीं किया । वह भी सत्कार न करने वाली मुझे व्यवहार-ज्ञान-शून्य (ही) समझेंगे ! (यह कह कर रो पड़ती है) चेटी - राजकुमारी ! रोओ मत । अथवा कैसे न रोए । इसके हृदय का अधिक सन्ताप और अधिक कष्ट दे रहा है । तो अब क्या करूँ ? अच्छा तब तक चन्दनलता के पत्तों का रस (ही) उसके हृदय पर लगाती हूं । (उठ कर चन्दन का पत्ता ले कर, उसे निचोड़ कर हृदय पर लगाती है) । राजकुमारी ! मैं कहती हूँ रोओ मत । यह चन्दन का रस इन लगातार गिरने वाली आंसू की बूंदों से गर्म हुआ हुआ आप के मन के सन्ताप के दुःख को नहीं हटा सकता । (केले का पत्ता लेकर पंखा करती है ।) नायिका - (हाथ से हटाते हुई) सखी, पंखा मत कर । यह केले के


  1. चातुरीशून्य; व्यवहार-ज्ञान-शून्य; धर्म-कार्य में मूढ़; भूर्णा; अल्हड़, फूहड़ ।

( ६६ ) उण्हो क्खु एसो कअलीदलमारुदो । उष्णः खल्वेष कदलीदलमारुतः । चेटी- भद्दिदारिए ! मा इमस्स दोसं कहेहि । भर्तृदारिके ! माऽस्य दोषं कथय । कुणासि घणचन्दणालदापल्लवसंसग्गसीदलं पि इमं । करोषि घनचन्दनलतापल्लवसंसर्गशीतमपीमम् । णीसासेहिं तुमं एव्व कअलीदलमारुअं उण्हं ॥१॥ निःश्वासैस्त्वमेव कदलीदलमारुतमुष्णम् नायिका—(सास्रम्) सहि ! अत्थि कोबि इमस्स संदावस्स उवसमोवाओ ? सखि ! अस्ति कोऽप्यस्य सन्तापस्योपशमोपायः ? चेटी- भद्दिदारिए ! अत्थि, जदि सो एत्थ आअच्छदि । भर्तृदारिके ! अस्ति यदि सोऽत्राऽऽगच्छति [ ततः प्रविशति नायको विदूषकश्च ] श्लोक नं०: १, अन्वयः — घनचन्दनलतापल्लवसंसर्गशीतलम् अपि इमं कदलीदलमारुतं त्वम् एव निःश्वासैः उष्णं करोषि ॥

( ६७ ) पत्ते की हवा गरम है । चेटी - राजकुमारी ! (तो) इस का दोष मत कहो - घने चन्दन के पत्तों के सम्पर्क से शीतल इस केले के पत्ते की हवा को भी आप ही (अपनी) आहों से गरम कर रही हैं। नायिका - (आंसुओं के साथ) सखी, क्या इस सन्ताप को शान्त करने का कोई भी उपाय है ? चेटी - राजकुमारी, है तो, यदि "वह" यहां आ जाए। [नायक तथा विदूषक का प्रवेश]

( ६८ ) नायकः- व्यावृत्यैव सितासितेक्षणरुचा तानाश्रमे शाखिनः कुर्वत्या विटपावसक्तविलसत्कृष्णाजिनौघानिव । यद्दृष्टोऽस्मि तया मुनेरपि पुरस्तेनैव मय्याहते ⁴पुष्पेषो ! भवता मुधैव किमिति क्षिप्यन्त एते शराः ? ॥२॥ विदूषकः- भो वअस्स ! कहिं क्खु गदं दे तं धीरत्तणं ? भो वयस्य ! कुत्र खलु गतं ते तद्धीरत्वम् ? नायकः - वयस्य ! ननु धीर एवास्मि । कुतः ?— नीताः किं न निशाः शशाङ्कधवला नाघ्रातमिन्दीवरं ? किं नोन्मीलितमालतीसुरभयः सोढाः प्रदोषानिलाः ?' झङ्कारः कमलाकरे मधुलिहां किं वा मया न श्रुतो, निर्व्याजं विधुरेष्वधीर इति मां येनाभिधत्से भवान् ? ॥३॥ श्लोक नं० २ः अन्वयः — सितासितेक्षणरुचा आश्रमे तान् शाखिनः विटपावसक्त- विलसत्कृष्णाजिनौघान इव कुर्वत्या तया मुनेरपि पुरा यद् व्यावृत्य एव दृष्टोऽस्मि, तेन एव आहते मयि पुष्पेषो ! भवता मुधा एव एते शराः किमिति क्षिप्यन्ते ॥ श्लोक नं० ३, अन्वयः— किं शशाङ्कधवला निशाः न नीताः ? (किम्) इन्दीवरं न आघ्रातम् ?' किम् उन्मीलितमालतीसुरभयः प्रदोषादिलाः न सोढाः ? किं वा मया कमलाकरे मधुलिहां झङ्कारः न श्रुतः ? येन भवान् निर्व्याजं मां विधुरेषु अधीरः इति अभिधत्ते ॥

( ६६ ) नायकः - आँखों की सफेद तथा काली कान्ति से आश्रम में (स्थित) उन वृक्षों को मानों शाखाओं के लटकते हुए शोभायमान कृष्णमृग के चर्म समूह से युक्त करती हुई उस (मलयवती) ने मुनि के सामने ही जो मुझे घूम कर देखा था, उसी से ही घायल हुए मुझ पर, हे कामदेव ! आप व्यर्थ ही यह तीर क्यों फेंक रहे हैं ? विदूषक. - अरे मित्र ! तेरी वह धीरता कहाँ गई ? नायक - मित्र ! मैं तो सचमुच धीर ही हूं, क्योंकि - क्या चान्द (की चान्दनी) से उजली रातें मै ने नहीं बिताईं ? क्या (नील) कमल फूलों को नहीं सूंघा ? क्या खिले हुये मालती फूलों से सुगन्धित सायंकाल की हवा को सहन नहीं किया ? क्या मैं ने कमल-समूह में भौरों का गुञ्जार नहीं सुना ? . जिससे आप बिना कारण ही मुझे विरह की घड़ियों में अधीर कहते हो ।

  1. शाखाएँ 2. फैला हुआ; लगा हुआ; लटकता हुआ।
  2. ओघः = समूह ।
  3. फूलों के तीरों वाला । (फूलों के नाम पहिले दे चुके हैं)