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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३ कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ। महर्षे! साधुशिरोमणे! मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके जिस तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ४ कालस्वरूपका वर्णन किया था, उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी अन्येषां चैव भूतानां चराणामचराश्च ये। तथा दूसरे भी जो पृथ्वी, पर्वत और समुद्र आदि पदार्थ भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ५ एवं चराचर जीव हैं, उनकी आयुका परिमाण नियत संख्याज्ञानं च ते वच्मि मनुष्याणां निबोध मे। किया जाता है। अब मैं आपसे मनुष्योंकी 'काल-गणना' अष्टादश निमेषास्तु काष्ठैका परिकीर्तिता॥ ६ का ज्ञान बता रहा हूँ, सुनिये॥ १-५१/२॥ काष्ठास्त्रिंशत्कला ज्ञेया कलास्त्रिंशन्मुहूर्तकम्। अठारह निमेषोंकी एक 'काष्ठा' कही गयी है, तीस त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्॥ ७ काष्ठाओंकी एक 'कला' समझनी चाहिये तथा तीस अहोरात्राणि तावन्ति मासपक्षद्वयात्मकः। कलाओंका एक 'मुहूर्त' होता है। तीस मुहूर्तोंका एक तैः षड्भिरयनं मासैर्द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे॥ ८ मानव 'दिन-रात' माना गया है। उतने ही (तीस ही) अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्। दिन-रात मिलकर एक 'मास' होता है। इसमें दो पक्ष अयनद्वितयं वर्षं मर्त्यानामिह कीर्तितम्॥ ९ होते हैं। छः महीनोंका एक 'अयन' होता है। अयन नृणां मासः पितॄणां तु अहोरात्रमुदाहृतम्। दो हैं—'दक्षिणायन' और 'उत्तरायण'। दक्षिणायन वस्वादीनामहोरात्रं मानुषो वत्सरः स्मृतः॥ १० देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन। दो अयन दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु युगं त्रेतादिसंज्ञितम्। मिलकर मनुष्योंका एक 'वर्ष' कहा गया है। मनुष्योंका चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११ एक मास पितरोंका एक दिन-रात बताया गया है और चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्। मनुष्योंका एक वर्ष वसु आदि देवताओंका एक दिन- दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२ रात कहा गया है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंका त्रेता तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्र विधीयते। आदि नामक चतुर्युग होता है। उसका विभाग आपलोग संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३ मुझसे समझ लें॥ ६-११॥ संध्यासंध्यांशयोर्मध्ये यः कालो वर्तते द्विज। पुराण-तत्त्ववेत्ताओंने कृत आदि युगोंका परिमाण युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञकः॥ १४ क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चेति चतुर्युगम्। बतलाया है। ब्रह्मन्! प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ प्रोच्यते तत्सहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसं द्विज॥ १५ वर्षोंकी 'संध्या' कही गयी है और युगके पीछे उतने ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश। ही परिमाणवाले 'संध्यांश' होते हैं। विप्र! संध्या और भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६ संध्यांशके बीचका जो काल है, उसे सत्ययुग और सप्तर्षयस्तु शक्रोऽथ मनुस्तत्सूनवोऽपि ये। त्रेता आदि नामोंसे प्रसिद्ध युग समझना चाहिये। एककालं हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७ 'सत्ययुग', 'त्रेता', 'द्वापर' और 'कलि'-ये चार युग चतुर्युगानां संख्या च साधिका ह्येकसप्ततिः। मिलकर 'चतुर्युग' कहलाते हैं। द्विज! एक हजार मन्वन्तरं मनोः कालः शक्रादीनामपि द्विज॥ १८ चतुर्युग मिलकर 'ब्रह्माका एक दिन' होता है। ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनिये। सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनु-पुत्र— ये पूर्व कल्पानुसार एक ही समय उत्पन्न किये जाते हैं तथा इनका संहार भी एक ही साथ होता है। ब्रह्मन्! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक काल एक 'मन्वन्तर' कहलाता है। यही मनु तथा इन्द्रादि देवोंका

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१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३ अष्टौ शतसहस्राणि दिव्याया संख्यया स्मृतः। काल है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनाके अनुसार द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ १९ यह मन्वन्तर आठ लाख बावन हजार वर्षोंका समय त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। कहा गया है। महामुने! द्विजवर! मानवीय वर्ष-गणनाके सप्तषष्टिश्च तथान्यानि नियुतानि महामुने ॥ २० अनुसार पूरे तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना। वर्षोंका काल एक मन्वन्तरका परिमाण है, इससे अधिक मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१ नहीं ॥ १२–२१ ॥ चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्मामहः स्मृतम्। इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका एक दिन होता विश्वस्यादौ सुमनसा सृष्ट्वा देवांस्तथा पितॄन् ॥ २२ है। ब्रह्माजीने विश्व-सृष्टिके आदिकालमें प्रसन्न मनसे देवताओं गन्धर्वान् राक्षसान् यक्षान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा। तथा पितरोंकी सृष्टि करके गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, पिशाच, ऋषीन् विद्याधराँश्चैव मनुष्यांश्च पशूंस्तथा ॥ २३ गुह्यक, ऋषि, विद्याधर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर (वृक्ष, पक्षिणः स्थावरांश्चैव पिपीलिकभुजंगमान् । पर्वत आदि), पिपीलिका (चींटी) और साँपोंकी रचना चातुर्वर्ण्यं तथा सृष्ट्वा नियुज्याध्वरकर्मणि ॥ २४ की है। फिर चारों वर्णोंकी सृष्टि करके वे उन्हें यज्ञकर्ममें पुनर्दिनान्ते त्रैलोक्यमुपसंहृत्य स प्रभुः । नियुक्त करते हैं। तत्पश्चात् दिन बीतनेपर वे अविनाशी शेते चानन्तशयने तावतीं रात्रिमव्ययः ॥ २५ प्रभु त्रिभुवनका उपसंहार करके दिनके ही बराबर तस्यान्तेऽभून्महाकल्पो ब्राह्म इत्यभिविश्रुतः । परिमाणवाली रात्रिमें शेषनागकी शय्यापर सोते हैं। उस यस्मिन् मत्स्यावतारोऽभून्मथनं च महोदधेः ॥ २६ रात्रिके बीतनेपर 'ब्राह्म' नामक विख्यात महाकल्प हुआ, तद्वद्वाराहकल्पश्च तृतीयः परिकल्पितः । जिसमें भगवान्‌का मत्स्यावतार और समुद्र-मन्थन हुआ। यत्र विष्णुः स्वयं प्रीत्या वाराहं वपुराश्रितः । इस ब्राह्म-कल्पके ही समान तीसरा 'वाराह-कल्प' हुआ, उद्धर्तुं वसुधां देवीं स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ २७ जिसमें कि भगवती वसुंधरा (पृथ्वी)-का उद्धार करनेके सृष्ट्वा जगद्व्योमचराप्रमेयः लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्वक वाराहरूप प्रजाश्च सृष्ट्वा सकलास्तथेशः । धारण किया। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति करते नैमित्तिकाख्ये प्रलये समस्तं थे। स्थलचर और आकाशचारी जीवोंके द्वारा जिनकी इयत्ताको संहृत्य शेते हरिरादिदेवः ॥ २८ जान लेना नितान्त असम्भव है, वे आदिदेव भगवान् विष्णु समस्त प्रजाओंकी सृष्टि कर 'नैमित्तिक प्रलय' में सबका संहार करके शयन करते हैं ॥ २२–२८ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सर्गरचनायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाविषयक' दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ ────────────────────────── तीसरा अध्याय ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले—महाभाग ! नैमित्तिक प्रलयकालमें तत्र सुप्तस्य देवस्य नाभौ पद्ममभून्महत् । सोये हुए भगवान् नारायणकी नाभिमें एक महान् कमल तस्मिन् पद्मे महाभाग वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ उत्पन्न हुआ। उसीसे वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी ब्रह्माजीका ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजां सृज महामते । प्रादुर्भाव हुआ। तब उनसे भगवान् नारायणने कहा— एवमुक्त्वा तिरोभावं गतो नारायणः प्रभुः ॥ २ 'महामते ! तुम प्रजाकी सृष्टि करो' और यह कहकर वे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३ ] ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण १५ तथेत्युक्त्वा स तं देवं विष्णुं ब्रह्माथ चिन्तयन्। अन्तर्धान हो गये। उन भगवान् विष्णुसे 'तथास्तु' आस्ते किंचिज्जगद्बीजं नाध्यगच्छत किंचन ॥ ३ कहकर ब्रह्माजी सोचने लगे—'क्या जगत्की सृष्टिका कोई बीज है?' परंतु बहुत सोचनेपर भी उन्हें किसी तावत्तस्य महान् रोषो ब्रह्मणोऽभून्महात्मनः। बीजका पता न लगा। तब महात्मा ब्रह्माजीको महान् ततो बालः समुत्पन्नस्तस्याङ्के रोषसम्भवः ॥ ४ रोष हुआ। रोष होते ही उनकी गोदमें एक बालक प्रकट हो गया, जो उनके रोषसे ही प्रादुर्भूत हुआ था। स रुदन्वारितस्तेन ब्रह्मणा व्यक्तमूर्तना। उस बालकको रोते देख स्थूल शरीरधारी ब्रह्माजीने उसे नाम मे देहि चेत्युक्तस्तस्य रुद्रेत्यसौ ददौ ॥ ५ रोनेसे मना किया। फिर उसके यह कहनेपर कि 'मेरा नाम रख दीजिये', उन्होंने उसका 'रुद्र' नाम रख तेनासौ विसृजस्वेति प्रोक्तो लोकमिमं पुनः। दिया॥ १—५॥ अशक्तस्तत्र सलिले ममज्ज तपसाऽऽदृतः ॥ ६ इसके बाद ब्रह्माजीने उससे कहा कि 'तुम इस लोककी सृष्टि करो'—यह कहनेपर उस कार्यमें असमर्थ तस्मिन् सलिलमग्ने तु पुनरन्यं प्रजापतिः। होनेके कारण वह सादर तपस्याके लिये जलमें निमग्न ब्रह्मा ससर्ज भूतेशो दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽपरम् ॥ ७ हो गया। उसके जलमें निमग्न हो जानेपर भूतनाथ प्रजापति ब्रह्माजीने फिर अपने दाहिने अँगूठेसे 'दक्ष' नामक एक दक्षं वामे ततोऽङ्गुष्ठे तस्य पत्नी व्यजायत। दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, तत्पश्चात् बायें अँगूठेसे उसकी स तस्यां जनयामास मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः ॥ ८ पत्नी प्रकट हुई। प्रभु दक्षने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया। तब ब्रह्माजीने उसी मनुसे प्रजाओंकी सृष्टि तस्मात् सम्भाविता सृष्टिः प्रजानां ब्रह्मणा तदा। बढ़ायी। मुनिवर! वसुधाकी सृष्टि करनेवाले उस विधाताकी इत्येवं कथिता सृष्टिर्मया ते मुनिसत्तम। सृष्टि-रचनाका यह क्रम मैंने आपसे वर्णन किया। अब सृजतो जगतीं तस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६—९॥ भरद्वाज उवाच संक्षेपेण तदाऽऽख्यातं त्वया मे लोमहर्षण। भरद्वाजजी बोले—लोमहर्षणजी! आपने यह सब विस्तरेण पुनर्ब्रूहि आदिसर्गं महामते ॥ १० वृत्तान्त मुझसे पहले संक्षेपसे कहा है। महामते! अब आप विस्तारके साथ आदिसर्गका वर्णन कीजिये॥ १०॥ सूत उवाच सूतजी बोले—पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें तथैव कल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः। सोकर उठनेके बाद सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ ११ (नारायणस्वरूप) भगवान् ब्रह्माजीने उस समय सम्पूर्ण लोकको शून्यमय देखा। वे ब्रह्मस्वरूपी भगवान् नारायण नारायणः परोऽचिन्त्यः पूर्वेषामपि पूर्वजः। सबसे परे हैं, अचिन्त्य हैं, पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं, ब्रह्मस्वरूपी भगवानादिः सर्वसम्भवः ॥ १२ अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। इस जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत उन ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति। पुराणवेत्ता विद्वान् यह श्लोक कहते हैं—"जल भगवान् ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवात्मकम् ॥ १३ नर—पुरुषोत्तमसे उत्पन्न है, इसलिये 'नार' कहलाता है। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (आदि शयन-स्थान) अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १४ है, इसलिये वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं।" In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[शीर्षक] १६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३


[बायाँ स्तम्भ : संस्कृत श्लोक]

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा। अबुद्धिपूर्वकं तस्य प्रादुर्भूतं तमस्तदा॥ १५ तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः। अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः॥ १६ पञ्चधाधिष्ठितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्। बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः। मुख्यसर्गः स विज्ञेयः सर्गसिद्धिविचक्षणैः॥ १७ यत्पुनर्ध्यायस्तस्तस्य ब्रह्मणः समपद्यत। तिर्यक्स्रोतस्ततस्तस्मात् तिर्यग्योनिस्ततः स्मृतः॥ १८ पश्चादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणश्च ये। तमप्यसाधकं मत्वा तिर्यग्योनिं चतुर्मुखः॥ १९ ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकः समवर्तत। तदा तुष्टोऽन्यसर्गं च चिन्तयामास वै प्रभुः॥ २० ततश्चिन्तयतस्तस्य सर्गवृद्धिं प्रजापतेः। अर्वाक्स्रोताः समुत्पन्ना मनुष्याः साधका मताः॥ २१ ते च प्रकाशबहुलास्तमोयुक्ता रजोऽधिकाः। तस्मात्ते दुःखबहुला भूयो भूयश्च कारिणः॥ २२ एते ते कथिताः सर्गा बहवो मुनिसत्तम। प्रथमो महतः सर्गस्तन्मात्राणां द्वितीयकः॥ २३ वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः। मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः॥ २४ तिर्यक्स्रोताश्च यः प्रोक्तस्तिर्यग्योनिः स उच्यते। ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः॥ २५ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमो मानुषः स्मृतः। अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विको य उदाहृतः॥ २६


[दायाँ स्तम्भ : हिन्दी अनुवाद]

इस प्रकार कल्पके आदिमें पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करते समय ब्रह्माजीके बिना जाने ही असावधानता हो जानेके कारण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ॥ ११—१५॥ उस समय उन महात्मासे तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पञ्चपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई। फिर सृष्टिके लिये ध्यान करते हुए ब्रह्माजीसे वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध् एवं तृणरूप पाँच प्रकारका स्थावरात्मक सर्ग हुआ, जो बाहर-भीतरसे प्रकाशरहित, अविद्यासे आवृत एवं ज्ञानशून्य था। सर्गसिद्धिके ज्ञाता विद्वान् इसे 'मुख्य सर्ग' समझें; (क्योंकि अचल वस्तुओंको मुख्य कहा गया है।) फिर सृष्टिके लिये ध्यान करनेपर उन ब्रह्माजीसे तिर्यक्- स्रोत नामक सृष्टि हुई। तिरछा चलनेके कारण उसकी 'तिर्यक्' संज्ञा है। उससे उत्पन्न हुआ सर्ग 'तिर्यग्योनि' कहा जाता है। वे विख्यात पशु आदि जो कुमार्गसे चलनेवाले हैं, तिर्यग्योनि कहलाते हैं। चतुर्मुख ब्रह्माजीने उस तिर्यक्स्रोता सर्गको पुरुषार्थका असाधक मानकर जब पुनः सृष्टिके लिये चिन्तन किया, तब उनसे तृतीय 'ऊर्ध्वस्रोता' नामक सर्ग हुआ। यह सत्त्वगुणसे युक्त था (यही 'देवसर्ग' है)। तब भगवान्ने प्रसन्न होकर पुनः अन्य सृष्टिके लिये चिन्तन किया। तदनन्तर सर्गकी वृद्धिके विषयमें चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिसे 'अर्वाक्स्रोता' नामक सर्गकी उत्पत्ति हुई। इसीके अन्तर्गत मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थके साधक माने गये हैं। इनमें प्रकाश (सत्त्वगुण), और रज—इन दो गुणोंकी अधिकता है और तमोगुण भी है। इसलिये ये अधिकतर दुःखी और अत्यधिक क्रियाशील होते हैं॥ १६—२२॥ मुनिश्रेष्ठ! इन बहुत-से सर्गोंका मैंने आपसे वर्णन किया है। इनमें 'महत्तत्त्व' को पहला सर्ग कहा गया है। दूसरा सर्ग 'तन्मात्राओं' का है। तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो 'ऐन्द्रिय' (इन्द्रियसम्बन्धी) कहलाता है। चौथा 'मुख्य' सर्ग है। स्थावर (वृक्ष, तृण, लता आदि) ही 'मुख्य' कहे गये हैं। तिर्यक्स्रोता नामक जो पाँचवाँ सर्ग कहा गया है, वह 'तिर्यग्योनि' कहलाता है। इसके बाद छठा 'ऊर्ध्वस्रोताओं' का सर्ग है। उसे 'देवसर्ग' कहा जाता है। फिर सातवाँ अर्वाक्स्रोताओंका सर्ग है, उसे 'मानव- सर्ग' कहते हैं। आठवाँ 'अनुग्रह-सर्ग' है, जिसे 'सात्त्विक'


[पाद-टिप्पणी] In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

नवमो रुद्रसर्गस्तु नव सर्गाः प्रजापतेः । कहा गया है। नवाँ ‘रुद्रसर्ग' है—ये ही नौ सर्ग प्रजापतिसे पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्ते त्रयः स्मृताः । उत्पन्न हुए हैं। इनमें पहलेके तीन 'प्राकृत सर्ग' कहे प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ २७ गये हैं। उसके बादवाले पाँच 'वैकृत सर्ग' हैं और नवाँ जो 'कौमार सर्ग' है, वह प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः । प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए जो सृजतो ब्रह्मणः सृष्टिमुत्पन्ना ये मयेरिताः ॥ २८ जगत्की उत्पत्तिके मूलकारण प्राकृत और वैकृत सर्ग हैं, उनका मैंने वर्णन किया। सबके आत्मरूपसे जाननेयोग्य तं तं विकारं च परं परेशो अव्यक्तस्वरूप परमात्मा परमेश्वर भगवान् अनन्तदेव मायामधिष्ठाय सृजत्यनन्तः । अपनी मायाका आश्रय लेकर प्रेरित होते हुए-से उन- अव्यक्तरूपी परमात्मसंज्ञः उन विकारोंकी सृष्टि करते हैं ॥ २३—२९ ॥ सम्प्रेर्यमाणो निखिलात्मवेद्यः ॥ २९ । इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिरचनाप्रकारोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाका प्रकार' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय अनुसर्गके स्रष्टा

भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले—सूतजी ! अव्यक्त जन्मा ब्रह्माजीसे नवधा सृष्टिरुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । जो नौ प्रकारकी सृष्टि हुई, उसका विस्तार किस प्रकार कथं सा ववृधे सूत एतत्कथय मेऽधुना ॥ १ हुआ ? यही इस समय आप हमें बतलाइये ॥ १ ॥ सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्माजीने पहले जिन मरीचि आदि प्रथमं ब्रह्मणा सृष्टा मरीच्यादय एव च । ऋषियोंको उत्पन्न किया, उनके नाम इस प्रकार हैं— मरीचिरत्रिश्च तथा अङ्गिराः पुलहः क्रतुः ॥ २ मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महातेजस्वी पुलस्त्य, पुलस्त्यश्च महातेजाः प्रचेता भृगुरेव च । प्रचेता, भृगु, नारद और दसवें महाबुद्धिमान् वसिष्ठ हैं। नारदो दशमश्चैव वसिष्ठश्च महामतिः ॥ ३ सनक आदि ऋषि निवृत्तिमार्गमें तत्पर हुए और एकमात्र सनकादयो निवृत्ताख्ये ते च धर्मे नियोजिताः । नारद मुनिको छोड़कर शेष सभी मरीचि आदि मुनि प्रवृत्ताख्ये मरीच्याद्या मुक्त्वैकं नारदं मुनिम् ॥ ४ प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त हुए ॥ २-४ ॥ योऽसौ प्रजापतिस्त्वन्यो दक्षनामाङ्गसम्भवः । ब्रह्माजीके दायें अङ्गसे उत्पन्न जो 'दक्ष' नामक तस्य दौहित्रवंशेन जगदेतच्चराचरम् ॥ ५ दूसरे प्रजापति कहे गये हैं, उनके दौहित्रोंके वंशसे यह देवाश्च दानवाश्चैव गन्धर्वोरगपक्षिणः । चराचर जगत् व्याप्त है। देव, दानव, गन्धर्व, उरग (सर्प) सर्वे दक्षस्य कन्यासु जाताः परमधार्मिकाः ॥ ६ और पक्षी—ये सभी, जो सब-के-सब बड़े धर्मात्मा थे, चतुर्विधानि भूतानि ह्यचराणि चराणि च । दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए। चार प्रकारके चराचर वृद्धिं गतानि तान्येवमनुसर्गोद्भवानि तु ॥ ७ प्राणी अनुसर्गमें उत्पन्न होकर वृद्धिको प्राप्त हुए। अनुसर्गस्य कर्तारो मरीच्याद्या महर्षयः । महाभाग ! पूर्वोक्त मरीचिसे लेकर वसिष्ठतक सभी वसिष्ठान्ता महाभाग ब्रह्मणो मानसोद्भवाः ॥ ८ श्रीब्रह्माजीकी मानस संतान हैं। ये सब अनुसर्गके स्रष्टा हैं।

१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५ सर्गे तु भूतानि धियश्च खानि ख्यातानि सर्वं सृजते महात्मा। स एव पश्चाच्चतुरास्यरूपी मुनिस्वरूपी च सृजत्यनन्तः ॥ ९ सर्ग अर्थात् आदिसृष्टिमें महात्मा भगवान् नारायण पाँच महाभूत, बुद्धि तथा पूर्वोक्त इन्द्रियवर्ग-इन सबको उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् (अनुसर्गकालमें) वे अनन्तदेव स्वयं ही चतुर्मुख ब्रह्मा और मरीचि आदि मुनियोंके रूपसे प्रकट हो जगत्की सृष्टि करते हैं॥५-९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौथा अध्याय पूरा हुआ॥४॥

पाँचवाँ अध्याय रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार

भरद्वाज उवाच रुद्रसर्गं तु मे ब्रूहि विस्तरेण महामते। पुनः सर्वे मरीच्याद्याः ससृजुस्ते कथं पुनः ॥ १ मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं भवेत्। ब्रह्मणो मनसः पूर्वमुत्पन्नस्य महामते॥ २ सूत उवाच रुद्रसृष्टिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्गांश्चैव सत्तम। प्रतिसर्गं मुनीनां तु विस्तराद्वदतः शृणु॥ ३ कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः। प्रादुरासीत् प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ ४ अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्। तेजसा भासयन् सर्वा दिशश्च प्रदिशश्च सः॥ ५ तं दृष्ट्वा तेजसा दीप्तं प्रत्युवाच प्रजापतिः। विभजात्मानमद्य त्वं मम वाक्यान्महामते॥ ६ इत्युक्तो ब्रह्मणा विप्र रुद्रस्तेन प्रतापवान्। स्त्रीभावं पुरुषत्वं च पृथक् पृथगथाकरोत्॥ ७ बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः। तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे द्विजसत्तम॥ ८ अजैकपादहिर्बुध्न्यः कपाली रुद्र एव च। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः॥ ९ वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ १०

श्रीभरद्वाजजी बोले- महामते! अब मुझसे 'रुद्रसर्ग' का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा यह भी बताइये कि मरीचि आदि ऋषियोंने पहले किस प्रकार सृष्टि की? महाबुद्धिमान् सूत ! वसिष्ठजी तो पहले ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए थे; फिर वे मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये? ॥१-२॥ सूतजी बोले-साधुशिरोमणे! आपके प्रश्नानुसार मैं अब रुद्र-सृष्टिका तथा उसमें होनेवाले सर्गोंका वर्णन करूँगा, साथ ही मुनियोंद्वारा सम्पादित प्रतिसर्ग (अनुसर्ग)-को भी मैं विस्तारके साथ बताऊँगा; आपलोग ध्यानसे सुनें। कल्पके आदिमें प्रभु ब्रह्माजी अपने ही समान शक्तिशाली पुत्र होनेका चिन्तन कर रहे थे। उस समय उनकी गोदमें एक नीललोहित वर्णका बालक प्रकट हुआ। उसका आधा शरीर स्त्रीका और आधा पुरुषका था। वह प्रचण्ड एवं विशालकाय था और अपने तेजसे दिशाओं तथा अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था। उसे तेजसे देदीप्यमान देख प्रजापतिने कहा- 'महामते ! इस समय मेरे कहनेसे तुम अपने शरीरके दो भाग कर लो।' विप्र! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी रुद्रने अपने स्त्रीरूप और पुरुषरूपको अलग-अलग कर लिया। द्विजश्रेष्ठ ! फिर पुरुषरूपको उन्होंने ग्यारह स्वरूपोंमें विभक्त किया; मैं उन सबके नाम बतलाता हूँ, सुनें। अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, कपाली, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी और रैवत-ये 'ग्यारह रुद्र' कहे गये हैं, जो तीनों

अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार १९ स्त्रीत्वं चैव तथा रुद्रो बिभेद दशधैकधा। भुवनोंके स्वामी हैं। पुरुषकी भाँति स्त्रीरूपके भी रुद्रने उमैव बहुरूपेण पत्नी सैव व्यवस्थिता॥ ११ ग्यारह विभाग किये। भगवती उमा ही अनेक रूप धारण कर इन सबकी पत्नी हैं॥ ३—११॥ तपः कृत्वा जले घोरमुत्तीर्णः स यदा पुरा। विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें प्रतापी रुद्रदेव जलमें घोर तपस्या तदा स सृष्टवान् देवो रुद्रस्तत्र प्रतापवान्॥ १२ करके जब बाहर निकले, तब अपने तपोबलसे उन्होंने तपोबलेन विप्रेन्द्र भूतानि विविधानि च। वहाँ नाना प्रकारके भूतोंकी सृष्टि की। सिंह, ऊँट और पिशाचान् राक्षसांश्चैव सिंहोष्ट्रमकराननान्॥ १३ मगरके समान मुँहवाले पिशाचों, राक्षसों तथा वेताल वेतालप्रमुखान् भूतानन्यांश्चैव सहस्रशः। आदि अन्य सहस्रों भूतोंको उत्पन्न किया। साढ़े तीस विनायकानामुग्राणां त्रिंशत्कोट्यर्थमेव च॥ १४ करोड़ उग्र स्वभाववाले विनायकगणोंकी सृष्टि की तथा अन्यकार्यं समुद्दिश्य सृष्टवान् स्कन्दमेव च। दूसरे कार्यके उद्देश्यसे स्कन्दको उत्पन्न किया। इस एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ मया ते कीर्तितः प्रभुः॥ १५ प्रकार भगवान् रुद्र तथा उनके सर्गका मैंने आपसे वर्णन किया॥ १२—१५॥ अनुसर्गं मरीच्यादेः कथयामि निबोध मे। अब मरीचि आदि ऋषियोंके अनुसर्गका वर्णन देवादिस्यावरान्ताश्च प्रजाः सृष्टाः स्वयम्भुवा॥ १६ करता हूँ, आप सुनें। स्वयम्भू ब्रह्माजीने देवताओंसे यदास्य च प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः। लेकर स्थावरोंतक सारी प्रजाओंकी सृष्टि की। किंतु इन तदा मानसपुत्रान् स सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ १७ बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी ये सब प्रजाएँ जब वृद्धिको प्राप्त मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। नहीं हुई, तब इन्होंने अपने ही समान मानस-पुत्रोंकी प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं चैव महामतिम्॥ १८ सृष्टि की। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः। प्रचेता, वसिष्ठ और महाबुद्धिमान् भृगुको उत्पन्न किया। अग्निश्च पितरश्चैव ब्रह्मपुत्रौ तु मानसौ॥ १९ ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। ब्रह्मन् ! सृष्टिकाले महाभागौ ब्रह्मन् स्वायम्भुवोद्गतौ। अग्नि और पितर भी ब्रह्माके ही मानस-पुत्र हैं। इन दोनों शतरूपां च सृष्ट्वा तु कन्यां स मनवे ददौ॥ २० महाभागोंको सृष्टिकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने उत्पन्न किया। फिर उन्होंने 'शतरूपा' नामक कन्याकी सृष्टि करके उसे मनुको दे दिया॥ १६—२०॥ तस्माच्च पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत। उन स्वायम्भुव मनुसे देवी शतरूपाने 'प्रियव्रत' प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूतिं चैव कन्यकाम्॥ २१ और 'उत्तानपाद' नामक दो पुत्र उत्पन्न किये और ददौ प्रसूतिं दक्षाय मनुः स्वायम्भुवः सुताम्। 'प्रसूति' नामवाली एक कन्याको जन्म दिया। स्वायम्भुव प्रसूत्यां च तदा दक्षश्चतुर्विंशतिकं तथा॥ २२ मनुने अपनी कन्या प्रसूति दक्षको ब्याह दी। दक्षने ससर्ज कन्यकास्तासां शृणु नामानि मेऽधुना। प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। अब मुझसे उन श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा तथा क्रिया॥ २३ कन्याओंके नाम सुनें—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी। मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और अपत्यार्थं प्रजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २४ तेरहवीं कीर्ति थी। भगवान् धर्मने संतानोत्पत्तिके लिये श्रद्धादीनां तु पत्नीनां जाताः कामादयः सुताः। इन तेरह कन्याओंका पाणिग्रहण किया। धर्मकी इन धर्मस्य पुत्रपौत्राद्यैर्धर्मवंशो विवर्धितः॥ २५ श्रद्धा आदि पत्नियोंके गर्भसे काम आदि पुत्र उत्पन्न हुए। अपने पुत्र और पौत्र आदिसे धर्मका वंश खूब बढ़ा॥ २१—२५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[संस्कृत श्लोक]

ताभ्यः शिष्टा यवीयस्यस्तासां नामानि कीर्तये। सम्भूतिश्चानसूया च स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ॥ २६ संनतिश्चाथ सत्या च ऊर्जा ख्यातिर्द्विजोत्तम। तद्गतपुत्रौ महाभागौ मातरिश्वाथ सत्यवान् ॥ २७ स्वाहाथ दशमी ज्ञेया स्वधा चैकादशी स्मृता। एताश्च दत्ता दक्षेण ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ २८ मरीच्यादीनां तु ये पुत्रास्तानहं कथयामि ते। पत्नी मरीचेः सम्भूतिर्जज्ञे सा कश्यपं मुनिम् ॥ २९ स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा। सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा ॥ ३० अनसूया तथा चात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्। सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम् ॥ ३१ योऽसावग्नेरभीमानी ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः। तस्मात् स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनुदारौजसो द्विज ॥ ३२ पावकं पवमानं च शुचिं चापि जलाशिनम्। तेषां तु संततावन्वे चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ३३ कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पिता पुत्रत्रयं च यत्। एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः ॥ ३४ पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया तव। तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा ॥ ३५ प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा। यथा ससर्ज भूतानि तथा मे शृणु सत्तम ॥ ३६ मनसैव हि भूतानि पूर्वं दक्षोऽसृजन्मुनिः। देवानृषींश्च गन्धर्वानसुरान् पन्नगांस्तथा ॥ ३७ यदास्य मनसा जाता नाभ्यवर्धन्त ते द्विज। तदा संचिन्त्य स मुनिः सृष्टिहेतोः प्रजापतिः ॥ ३८ मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। असिक्नीमुद्वहन् कन्यां वीरणस्य प्रजापतेः ॥ ३९


[हिन्दी अनुवाद]

द्विजश्रेष्ठ! श्रद्धा आदिसे छोटी अवस्थावाली जो उनकी शेष बहनें थीं, उनके नाम बता रहा हूँ—सम्भूति, अनसूया, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, सत्या, ऊर्जा, ख्याति, दसवीं स्वाहा और ग्यारहवीं स्वधा है। दक्षके 'मातरिश्वा' और 'सत्यवान्' नामक दो महाभाग पुत्र भी हुए। उपर्युक्त ग्यारह कन्याओंको दक्षने पुण्यात्मा ऋषियोंको दिया ॥ २६-२८ ॥ मरीचि आदि मुनियोंके जो पुत्र हुए, उन्हें मैं आपसे बतलाता हूँ। मरीचिकी पत्नी सम्भूति थी। उसने कश्यप मुनिको जन्म दिया। अङ्गिराकी भार्या स्मृति थी। उसने सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति—इन चार कन्याओंको उत्पन्न किया। इसी प्रकार अत्रि मुनिकी पत्नी अनसूयाने सोम, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित पुत्रोंको जन्म दिया। द्विज ! ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र, जो अग्निका अभिमानी देवता है, उससे उसकी पत्नी स्वाहाने पावक, पवमान और जलका भक्षण करनेवाले शुचि— इन अत्यन्त तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया। इन तीनोंके (प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे) अन्य पैंतालीस अग्निस্বরূপ संतानें हुईं। पिता अग्नि, उसके तीनों पुत्र तथा उनके भी ये पूर्वोक्त पैंतालीस पुत्र सब मिलकर 'अग्नि' ही कहलाते हैं। इस प्रकार उनचास अग्नि कहे गये हैं। ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये जिन पितरोंका मैंने आपके समक्ष वर्णन किया था, उनसे उनकी पत्नी स्वधाने मेना और धारिणी—इन दो कन्याओंको जन्म दिया ॥ २९-३५॥ साधुशिरोमणे ! पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीके द्वारा 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो' यह आज्ञा पाकर दक्षने जिस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि की थी, उसे सुनिये। विप्रवर ! दक्षमुनिने पहले देवता, ऋषि, गन्धर्व, असुर और सर्प—इन सभी भूतोंको मनसे ही उत्पन्न किया। परंतु जब मनसे उत्पन्न किये हुए ये देवादि सर्ग वृद्धिको प्राप्त नहीं हुए, तब उन दक्ष प्रजापति ऋषिने सृष्टिके लिये पूर्णतः विचार करके मैथुनधर्मके द्वारा ही नाना प्रकारकी सृष्टि रचनेकी इच्छा मनमें लिये वीरण प्रजापतिकी कन्या असिक्नीके साथ विवाह किया।


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अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार २१ षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम्। ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश॥ ४० सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने। द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा॥ ४१ द्वे कृशाश्वाय विदुषे तदपत्यानि मे शृणु। विश्वेदेवांस्तु विश्वा या साध्या साध्यानसूत॥ ४२ मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः। भानोस्तु भानवो देवा मुहूर्तायां मुहूर्तजाः ॥ ४३ लम्बायाश्चैव घोषाख्यो नागवीथिश्च जामिजा। पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत॥ ४४ संकल्पायाश्च संकल्पः पुत्रो जज्ञे महामते। ये त्वनेकवसुप्राणा देवा ज्योतिःपुरोगमाः ॥ ४५ वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु। आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः ॥ ४६ प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः। तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४७ साध्याश्च बहवः प्रोक्तास्तत्पुत्राश्च सहस्रशः। कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दिनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खसा॥ ४८ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा। कद्रूर्मुनिश्ध धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु॥ ४९ हमने सुना है कि दक्ष प्रजापतिने वीरण-कन्या असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दस कन्याएँ उन्होंने धर्मको और तेरह कश्यप मुनिको ब्याह दीं*। फिर सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बहुपुत्रको, दो अङ्गिराको और दो कन्याएँ विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दीं। अब इन सबकी संतानोंका वर्णन सुनिये॥ ३६—४१ १/२॥ जो विश्वा नामकी कन्या थी, उसने विश्वेदेवोंको और साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीके मरुत्वान् (वायु), वसुके वसुगण, भानुके भानुदेवता और मुहूर्ताके मुहूर्ताभिमानी देवगण हुए। लम्बासे घोष नामक पुत्र हुआ, जामिसे नागवीथि नामवाली कन्या हुई और अरुन्धतीसे† पृथिवीके समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। महाबुद्धे! संकल्पा नामक कन्यासे संकल्पका जन्म हुआ, अनेक प्रकारके वसु (तेज अथवा धन) ही जिनके प्राण हैं, ऐसे जो आठ ज्योतिर्मय वसु देवता कहे गये हैं, उनके नाम सुनिये—आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये 'आठ वसु' कहलाते हैं। इनके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी है॥ ४२-४७॥ इसी प्रकार साध्यगणोंकी भी संख्या बहुत है और उनके भी हजारों पुत्र हैं। जो (दक्ष-कन्याएँ) कश्यप मुनिकी पत्नियाँ हुईं, उनके नाम सुनिये—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि थीं। धर्मज्ञ! अब आप मुझसे उनकी संतानोंका विवरण सुनिये।

  • पाँचवें अध्यायके श्लोक बाईसमें यह चर्चा आयी है कि स्वायम्भुव मनुने प्रजापतिको अपनी पुत्री प्रसूति ब्याह दी थी। उसके गर्भसे दक्षने चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया था। फिर इसी अध्यायके उन्तालीस-चालीस श्लोकोंमें यह बात आती है कि दक्षने वीरण प्रजापतिकी पुत्री असिक्नीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे उन्होंने साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे दसका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया था। एक ही दक्षके विषयमें ये दो प्रकारकी बातें आपाततः संदेह उत्पन्न करती हैं। विष्णुपुराणमें भी यह प्रसंग आया है। अध्याय सातके उन्नीससे चौबीसवें श्लोकतक तथा अध्याय पंद्रहके उक्त दोनों प्रसंगोंका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। एक सौ तीनवें श्लोकमें उन प्रसंगोंके पर्यालोचनसे यह प्रतीत होता है कि उक्त दोनों दक्ष दो व्यक्ति थे और दोनों दो कालमें उत्पन्न हुए थे। पहले दक्ष ब्रह्माजीके मानस-पुत्र थे और दूसरे प्रचेताओँके पुत्र। इतनेपर भी मैत्रेयजीने यह प्रश्न उठाया है कि 'ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रचेताओँके पुत्र कैसे हो गये?' वहाँ पराशरजीने यह समाधान किया है कि 'युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।' इस प्रकार युगभेदसे दोनों प्रसंगोंकी संगति बैठायी गयी है। वही समाधान यहाँ भी समझ लेना चाहिये। † यहाँ 'अरुन्धती' की जगह 'मरुत्वती' पाठ भी मिलता है, परंतु वह असंगत है। 'मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः' कहकर मरुत्वतीकी संततिका वर्णन आ चुका है। अतः यहाँ 'अरुन्धती' पाठ ही ठीक है; अन्यत्र धर्मकी नवीं पत्नीका नाम नहीं मिलेगा। विष्णुपुराण १५।१०९वें श्लोकमें भी 'अरुन्धत्याम्' ही पाठ है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण एवं सटीक पाठ दिया गया है:

[शीर्षक / Header] २२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[मूल संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

अदित्यां कश्यपाज्जाताः पुत्रा द्वादश शोभनाः । तानहं नामतो वक्ष्ये शृणुष्व गदतो मम ॥ ५० भगोऽशुंश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा । सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते ॥ ५१ त्वष्टा पूषा तथा चेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ॥ ५२ हिरण्याक्षो महाकायो वाराहेण तु यो हतः । हिरण्यकशिपुश्चैव नरसिंहेन यो हतः ॥ ५३ अन्ये च बहवो दैत्या दनुपुत्राश्च दानवाः । अरिष्टायां तु गन्धर्वा जज्ञिरे कश्यपात्तथा ॥ ५४ सुरसायामथोत्पन्ना विद्याधरगणा बहु । गा वै स जनयामास सुरभ्यां कश्यपो मुनिः ॥ ५५ विनतायां तु द्वौ पुत्रौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ । गरुडो देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ ५६ वाहनत्वमियात्प्रीत्या अरुणः सूर्यसारथिः । ताम्रायां कश्यपाज्जाताः षट्पुत्रास्तान्निबोध मे ॥ ५७ अश्वा उष्ट्रा गर्दभाश्च हस्तिनो गवया मृगाः । क्रोधायां जज्ञिरे तद्वद्ये भूम्यां दुष्टजातयः ॥ ५८ इरा वृक्षलतावल्लीशणजातींश्च जज्ञिरे । खसा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा ॥ ५९ कद्रूपुत्रा महानागा दंदशूका विषोल्बणाः । सप्तविंशति याः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः ॥ ६० तासां पुत्रा महासत्त्वा बुधाद्यास्त्वभवन् द्विज । अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ ६१ बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः । प्रत्यङ्गिरस्सुताः श्रेष्ठा ऋषयश्चर्षिसत्कृताः ॥ ६२ कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवाश्च ऋषयः सुताः । एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ॥ ६३ एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजंगमाः । स्थितौ स्थितस्य देवस्य नरसिंहस्य धर्मतः ॥ ६४ एता विभूतयो विप्र मया ते परिकीर्तिताः । कथिता दक्षकन्यानां मया तेऽपत्यसंततिः ॥ ६५ श्रद्धावान् संस्मरेदेतां स सुसंतानवान् भवेत् ॥ ६६


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

महामते! अदितिके कश्यपजीसे बारह सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम बता रहा हूँ, सुनिये— महामते! भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। दितिके कश्यपजीसे दो पुत्र हुए थे, ऐसा हमने सुना है। पहला महाकाय हिरण्याक्ष हुआ, जिसे भगवान् वाराहने मारा और दूसरा हिरण्यकशिपु हुआ, जो नृसिंहजीके द्वारा मारा गया। इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दैत्य दितिसे उत्पन्न हुए। दनुके पुत्र दानव हुए और अरिष्टाके कश्यपजीसे गन्धर्वगण उत्पन्न हुए। सुरसासे अनेक विद्याधरगण हुए और सुरभिसे कश्यप मुनिने गौओंको जन्म दिया॥ ४८-५५॥

विनताके 'गरुड' और 'अरुण' नामक दो विख्यात पुत्र हुए। गरुडजी प्रेमवश अमित-तेजस्वी देवदेव भगवान् विष्णुके वाहन हो गये और अरुण सूर्यके सारथि बने। ताम्राके कश्यपजीसे छः पुत्र हुए, उन्हें आप मुझसे सुनिये— घोड़ा, ऊँट, गदहा, हाथी, गवय और मृग। पृथ्वीपर जितने दुष्ट जीव हैं, वे क्रोधासे उत्पन्न हुए हैं। इरााने वृक्ष, लता, वल्ली और 'सन' जातिके तृणवर्गको जन्म दिया। खसाने यक्ष और राक्षसों तथा मुनिने अप्सराओंको प्रकट किया। कद्रूके पुत्र प्रचण्ड विषवाले 'दंदशूक' नामक महासर्प हुए। विप्रवर! चन्द्रमाकी सुन्दर व्रतवाली जिन सत्ताईस स्त्रियोंकी चर्चा की गयी है, उनसे बुध आदि महान् पराक्रमी पुत्र हुए। अरिष्टनेमिकी स्त्रियोंके गर्भसे सोलह संतानें हुईं ॥ ५६-६१ ॥

विद्वान् बहुपुत्रकी संतानें कपिला, अतिलोहिता, पीता और सिता—इन चार वर्णोंवाली चार बिजलियाँ कही गयी हैं। प्रत्यङ्गिराके पुत्रगण ऋषियोंद्वारा सम्मानित उत्तम ऋषि हुए। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवर्षि ही हुए। ये एक-एक हजार युग (अर्थात् एक कल्प)- के बीतनेपर पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं। इस प्रकार कश्यपके वंशमें उत्पन्न हुए चर-अचर प्राणियोंका वर्णन किया गया। विप्रवर! धर्मपूर्वक पालनकर्ममें लगे हुए भगवान् नरसिंहकी इन विभूतियोंका यहाँ मैंने आपके समक्ष वर्णन किया है। साथ ही दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा भी बतलायी है। जो श्रद्धापूर्वक इन सबका स्मरण करता है, वह सुन्दर संतानसे

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २३ सर्गानुसर्गौ कथितौ मया ते युक्त होता है। ब्रह्मन् ! सृष्टि-विस्तारके लिये ब्रह्मा तथा समासतः सृष्टिविवृद्धिहेतोः। अन्य प्रजापतियोंद्वारा जो सर्ग और अनुसर्ग सम्पादित पठन्ति ये विष्णुपराः सदा नरा हुए, उन सबको मैंने संक्षेपसे आपको बता दिया। जो द्विजाति मानव भगवान् विष्णुमें मन लगाकर इन इदं द्विजास्ते विमला भवन्ति ॥ ६७ प्रसङ्गोंको सदा पढ़ेंगे वे निर्मल हो जायेंगे ॥ ६२-६७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिकथने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके सृष्टिवर्णनमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्मन् ! परमात्मा भगवान् विष्णुसे जिस सृष्टिस्ते कथिता विष्णोर्मायास्य जगतो द्विज। प्रकार देव, दानव और यक्ष आदि उत्पन्न हुए, वह जगत्की देवदानवयक्षाद्या यथोत्पन्ना महात्मनः॥ १ सृष्टिका वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया। अब ऋषियोंके यमुद्दिश्य त्वया पृष्टः पुराहमृषिसंनिधौ। निकट जिस उद्देश्यको लेकर पहले आपने मुझसे प्रश्न मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं त्विति॥ २ किया था कि 'वसिष्ठजी मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये ?' उसी तदिदं कथयिष्यामि पुण्याख्यानं पुरातनम्। पुरातन पवित्र कथाको कहूँगा। भरद्वाजजी ! आप एकाग्रचित्त शृणुष्वैकाग्रमनसा भरद्वाज विशेषतः॥ ३ हो, विशेष सावधानीके साथ उसे सुनिये ॥ १-३ ॥ सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदां वरः। सम्पूर्ण धर्म और अर्थोंके तत्त्वको जाननेवाले, पारगः सर्वविद्यानां दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ४ समस्त वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा समग्र विद्याओंके पारदर्शी तेन दत्ताः शुभाः कन्याः सर्वाः कमललोचनाः। 'दक्ष' नामक प्रजापतिने अपनी तेरह सुन्दरी कन्याओंको, सर्वलक्षणसम्पूर्णाः कश्यपाय त्रयोदश॥ ५ जो सभी कमलके समान नेत्रोंवाली और समस्त शुभ तासां नामानि वक्ष्यामि निबोधत ममाधुना। लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, कश्यप मुनिको दिया था। उनके अदितिर्दितिर्दनुः काला मुहूर्ता सिंहिका मुनिः॥ ६ नाम बतलाता हूँ, आप लोग इस समय मुझसे उनके नाम जान लें—अदिति, दिति, दनु, काला, मुहूर्ता, इरा क्रोधा च सुरभिर्विनता सुरसा खसा। सिंहिका, मुनि, इरा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, कद्रूश्च सरमा चैव या तु देवशुनी स्मृता॥ ७ खसा, कद्रू और सरमा, जो देवताओंकी कुतिया कही दक्षस्यैता दुहितरस्ताः प्रादात् कश्यपाय सः। गयी हैं—ये सभी दक्ष-प्रजापतिकी कन्याएँ हैं*। तासां ज्येष्ठा वरिष्ठा च अदितिर्नाम्तो द्विज॥ ८ इनको दक्षने कश्यपजीको समर्पित किया था। विप्रवर ! अदिति नामकी जो कन्या थी, वही इन सबमें श्रेष्ठ और अदितिः सुषुवे पुत्रान् द्वादशाग्निसमप्रभान्। बड़ी थी॥ ४-८॥ तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम॥ ९ अदितिने बारह पुत्रोंको उत्पन्न किया†, जो अग्निके समान कान्तिमान् एवं तेजस्वी थे। उन सबके नाम बतला रहा हूँ, आप मुझसे उन्हें सुनें।

  • अध्याय पाँचके ४८-४९ श्लोकोंमें कश्यपकी तेरह पत्नियोंके नाम आये हैं। यहाँ पंद्रह नाम आये हैं; इनमें 'मुहूर्ता' और 'सरमा'—ये दो नाम अधिक हैं। 'मुहूर्ता' तो धर्मकी पत्नी थीं। 'सरमा' कश्यपकी पत्नी होनेपर भी दक्षकन्या नहीं थी। इसके अतिरिक्त अरिष्टा एवं ताम्राके स्थानपर यहाँ काला और सिंहिका नाम आये हैं। ये नाम अन्यत्र पुराणोंमें भी आते हैं। † यद्यपि पाँचवें अध्यायके ५१-५२ श्लोकोंमें अदितिकी सन्तानोंका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इस प्रसङ्गकी पुनरुक्ति जान पड़ती है; तथापि इसका समाधान यह है कि वहाँ सृष्टिवर्णनके प्रसङ्गमें वह बात कही गयी है और यहाँ 'वसिष्ठ तथा अगस्त्यजीकी मित्रावरुणके पुत्ररूपमें पुनरुत्पत्ति कैसे हुई ?' इस प्रश्नके समाधानके प्रसङ्गमें मित्र और वरुण देवताका परिचय देना आवश्यक हुआ। वे दोनों बारह आदित्योंमें परिगणित हैं; अतः अदितिके उन बारहौं पुत्रोंका पुनः वर्णन प्रसंगवशात् आ गया है; अतः पुनरुक्ति-दोष नहीं मानना चाहिये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ यैरिदं वासरं नक्तं वर्तते क्रमशः सदा। उन्हींके द्वारा सर्वदा क्रमशः दिन और रात होते रहते भगोंऽशुस्त्वर्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा॥ १० हैं। भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु हैं। ये सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते। बारह आदित्य तपते और वर्षा करते हैं॥ ९-११ १/२॥ त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो विष्णुर्द्वादशमः स्मृतः॥ ११ अदितिके मध्यम पुत्र वरुण 'लोकपाल' कहे गये एते च द्वादशादित्यास्तपन्ते वर्षयन्ति च। हैं; इनकी स्थिति वरुण-दिशा (पश्चिम)-में बतलायी तस्याश्च मध्यमः पुत्रो वरुणो नाम नामतः॥ १२ जाती है। ये पश्चिम दिशामें पश्चिम समुद्रके तटपर लोकपाल इति ख्यातो वारुण्यां दिशि शब्द्यते। सुशोभित होते हैं। वहाँ एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत है। पश्चिमस्य समुद्रस्य प्रतीच्यां दिशि राजते॥ १३ उसके शिखर सब रत्नमय हैं। उनपर नाना प्रकारकी जातरूपमयः श्रीमानास्ते नाम शिलोच्चयः। धातुएँ और झरने हैं। इनसे युक्त और नाना प्रकारके सर्वरत्नमयैः शृङ्गैर्धातुप्रस्रवणान्वितैः॥ १४ रत्नोंसे परिपूर्ण वह सुन्दर पर्वत बड़ी शोभा पाता है। उसमें बड़े-बड़े दर्रे और गुहाएँ हैं, जहाँ बाघ और सिंह संयुक्तो भाति शैलेशो नानारत्नमयः शुभः। दहाड़ते रहते हैं। वहाँके अनेकानेक एकान्त स्थलोंपर महादरीगुहाभिश्च सिंहशार्दूलनादितः॥ १५ सिद्ध और गन्धर्व वास करते हैं। जब सूर्य वहाँ पहुँचते नानाविविक्तभूमीषु सिद्धगन्धर्वसेवितः। हैं, तब समस्त संसार अन्धकारसे पूर्ण हो जाता है। उसी यस्मिन् गते दिनकरे तमसाऽऽपूर्यते जगत्॥ १६ पर्वतके शिखरपर विश्वकर्माकी बनायी हुई एक 'विश्वावती' नामकी शोभनपुरी है, जो बड़ी, दिव्य तथा सुवर्णसे बनी तस्य शृङ्गे महादिव्या जाम्बूनदमयी शुभा। रम्या मणिमयैः स्तम्भैर्विहिता विश्वकर्मणा॥ १७ हुई है और उसमें मणियोंके खंभे लगे हैं। इस प्रकार वह पुरी रमणीय एवं सम्पूर्ण भोग-साधनोंसे सम्पन्न है। उसीमें पुरी विश्वावती नाम समृद्धा भोगसाधनैः। अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए 'वरुण' नामक आदित्य तस्यां वरुण आदित्यो दीप्यमानः स्वतेजसा॥ १८ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे इन सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं। पाति सर्वानिमाँल्लोकान् नियुक्तो ब्रह्मणा स्वयम्। वहाँ उनकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ रहा करती उपास्यमानो गन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः॥ १९ हैं॥ १२-१९॥ दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गो दिव्याभरणभूषितः। एक दिन वरुण अपने अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप कदाचिद्वरुणो यातो मित्रेण सहितो वनम्॥ २० लगाये, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो 'मित्र' के साथ वनको गये। ब्रह्मर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, जो नाना कुरुक्षेत्रे शुभे रम्ये सदा ब्रह्मर्षिसेविते। प्रकारके फल और फूलोंसे युक्त तथा अनेक तीर्थोंसे व्याप्त नानापुष्पफलोपेते नानातीर्थसमाकुले॥ २१ है; जहाँ ऊर्ध्वरेता मुनियोंके आश्रम दृष्टिगोचर होते हैं तथा आश्रमा यत्र दृश्यन्ते मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। जो प्रचुर फल-फूल और जलसे पूर्ण है, उस सुन्दर सुरम्य तस्मिंस्तीर्थे समाश्रित्य बहुपुष्पफलोदके॥ २२ कुरुक्षेत्र तीर्थमें पहुँचकर वे दोनों देवता चीर और कृष्णमृगचर्म चीरकृष्णाजिनधरौ चरन्तौ तप उत्तमम्। धारण करके तपस्या करने लगे। वहाँपर वनके एक तत्रैकस्मिन् वनोद्देशे विमलोदो ह्रदः शुभः॥ २३ भागमें निर्मल जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर है, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २५ बहुगुल्मलताकीर्णो नानापक्षिनिषेवितः । जो बहुत-सी झाड़ियों और बेलोंसे आवृत है; अनेकानेक नानातरुवनच्छन्नो नलिन्या चोपशोभितः ॥ २४ पक्षी उसका सेवन करते हैं। वह भाँति-भाँतिके वृक्षसमूहोंसे आच्छन्न और कमलोंसे सुशोभित है। उस सरोवरकी पौण्डरीक इति ख्यातो मीनकच्छपसेवितः । 'पौण्डरीक' नामसे प्रसिद्धि है। उसमें बहुत-सी मछलियाँ ततस्तु मित्रावरुणौ भ्रातरौ वनचारिणौ । और कछुए निवास करते हैं। तप आरम्भ करनेके तं तु देशं गतौ देवौ विचरन्तौ यदृच्छया ॥ २५ पश्चात् वे दोनों भाई—मित्र और वरुणदेवता एक दिन वनमें विचरण करते और स्वेच्छानुसार घूमते हुए उस सरोवरकी ओर गये ॥ २०-२५ ॥ ताभ्यां तत्र तदा दृष्टा उर्वशी तु वराप्सराः । वहाँ उन दोनोंने उस समय श्रेष्ठ एवं सुन्दरी अप्सरा स्नायन्ती सहितान्याभिः सखीभिः सा वरानना । उर्वशीको देखा, जो अपनी अन्य सहेलियोंके साथ स्नान गायन्ती च हसन्ती च विश्वस्ता निर्जने वने ॥ २६ कर रही थी। वह सुमुखी अप्सरा उस निर्जन वनमें विश्वस्त होकर हँसती और गाती थी। उसका वर्ण गोरा था। कमलके गौरी कमलगर्भाभा स्निग्धकृष्णाशिरोरुहा । भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी। उसकी अलकें पद्मपत्रविशालाक्षी रक्तोष्ठी मृदुभाषिणी ॥ २७ काली-काली और चिकनी थीं, आँखें कमल-दलके समान बड़ी-बड़ी थीं, होठ लाल थे, उसका भाषण शङ्खकुन्देन्दुधवलैर्दन्तैरविरलैः समैः । बहुत ही मधुर था। उसके दाँत शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके सुभ्रूः सुनासा सुमुखी सुललाटा मनस्विनी ॥ २८ समान श्वेत, परस्पर मिले हुए और बराबर थे। उस मनस्विनीकी भौंहें, नासिका, मुख और ललाट—सभी सिंहवत् सूक्ष्ममध्याङ्गी पीनोरुजघनस्तनी । सुन्दर थे। कटिभाग सिंहके कटिप्रदेशकी भाँति पतला मधुरालापचतुरा सुमध्‍या चारुहासिनी ॥ २९ था। उरोज, ऊरु और जघन—ये मोटे और घने थे। वह मधुर भाषण करनेमें चतुर थी। उसका मध्यभाग रक्तोत्पलकरा तन्वी सुपदी विनयान्विता । सुन्दर और मुस्कान मनोहर थी। दोनों हाथ लाल कमलके पूर्णचन्द्रनिभा बाला मत्तद्विरदगामिनी ॥ ३० समान सुन्दर एवं कोमल थे। शरीर पतला और पैर सुन्दर थे। वह बाला बड़ी ही विनीता थी। उसका मुख दृष्ट्वा तस्यास्तु तद्रूपं तौ देवौ विस्मयं गतौ । पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक और गति मत्त गजराजके तस्या हास्येन लास्येन स्मितेन ललितेन च ॥ ३१ समान मन्द थी। उर्वशीके उस दिव्य रूपको देखकर वे दोनों देवता विस्मयमें पड़ गये। उसके लास्य (नृत्य), मृदुना वायुना चैव शीतानिलसुगन्धिना । हास्य, ललितभाव-मिश्रित मन्द मुस्कान और मधुर सुरीले मत्तभ्रमरगीतेन पुंस्कोकिलरुतेन च ॥ ३२ गानसे तथा शीतल-मन्द-सुगन्धित मलयानलके स्पर्शसे एवं मतवाले भौंरोंके संगीत और कोकिलोंके कलरवसे सुस्वरेण हि गीतेन उर्वश्या मधुरेण च । उन दोनोंका मन और भी मुग्ध हो गया। साथ ही ईक्षितो च कटाक्षेण स्कन्दतुस्तावूभावपि । उर्वशीकी तिरछी चितवनके शिकार होकर वे दोनों निमेः शापादथोत्क्रम्य स्वदेहान्मुनिसत्तम ॥ ३३ ही वहाँ स्खलित हो गये (उनके वीर्यका पतन हो गया)। मुनिसत्तम ! इसके बाद निमिके शापवश* वसिष्ठजीका वसिष्ठ मित्रावरुणात्मजोऽसी- जीवात्मा अपने शरीरसे पृथक् होकर (मित्रावरुणके त्यथोचुरागत्य हि विश्वदेवाः । वीर्यमें आविष्ट हुआ) ॥ २६-३३ ॥ रेतस्त्रिभागं कमलेऽचरत्तद् 'वसिष्ठ ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे'—इस प्रकार वसिष्ठ एवं तु पितामहोक्तेः ॥ ३४ विश्वेदेवोंने (निमिके शुक्रमें) आकर कहा था तथा ब्रह्माजीका भी यही कथन था; अतएव मित्रावरुणके तीन स्थानोंपर

  • एक बार राजा निमिने यज्ञ करनेकी इच्छासे अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे परामर्श किया। वसिष्ठजीने कहा—'मैं देवलोकमें एक यज्ञ आरम्भ करा चुका हूँ। उसके समाप्त होनेतक आप अपना यज्ञ रोके रहें। वहाँसे आकर हम आपका यज्ञ आरम्भ करायेंगे।' निमिने उनकी प्रतीक्षा नहीं की। वसिष्ठजीने लौटनेपर यज्ञ होता देख राजाको शाप दिया कि 'तुम विदेह हो जाओ।' तब राजाने भी शाप दिया कि 'आपका भी यह शरीर न रहे।'

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ त्रिधा समभवद्रेतः कमलेऽथ स्थले जले। अरविन्दे वसिष्ठस्तु जातः स मुनिसत्तमः। स्थले त्वगस्त्यः सम्भूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः ॥ ३५ स तत्र जातो मतिमान् वसिष्ठः कुम्भे त्वगस्त्यः सलिलेऽथ मत्स्यः। स्थानत्रये तत्पतितं समानं मित्रस्य यस्माद्वरुणस्य रेतः ॥ ३६ एतस्मिन्नेव काले तु गता सा उर्वशी दिवम्। उपेत्य तानृषीन् देवौ गतौ भूयः स्वमाश्रमम्। यमावपि तु तप्येते पुनरुग्रं परं तपः ॥ ३७ गिरे हुए वीर्यमेंसे जो भाग कमलपर गिरा था, उसीसे वसिष्ठजी हुए। उन दोनों देवताओंका वीर्य तीन भागोंमें विभक्त होकर कमल, जल और स्थलपर (घड़ेमें) गिरा। कमलपर गिरे हुए वीर्यसे मुनिवर वसिष्ठ उत्पन्न हुए, स्थलपर गिरे हुए रेतस्‌से अगस्त्य और जलमें गिरे हुए शुक्रसे अत्यन्त कान्तिमान् मत्स्यकी उत्पत्ति हुई। इस तरह उस कमलपर बुद्धिमान् वसिष्ठ, कुम्भमें अगस्त्य और जलमें मत्स्यका आविर्भाव हुआ; क्योंकि मित्रावरुणका वीर्य तीनों स्थानोंपर बराबर गिरा था। इसी समय उर्वशी स्वर्गलोकमें चली गयी। वसिष्ठ और अगस्त्य—इन दोनों ऋषियोंको साथ लेकर वे दोनों देवता पुनः अपने आश्रममें लौट आये और पुनः उन दोनोंने अत्यन्त उग्र तप आरम्भ किया ॥ ३४–३७ ॥ तपसा प्राप्तुकामौ तौ परं ज्योतिः सनातनम्। तपस्यन्तौ सुरश्रेष्ठौ ब्रह्माऽऽगत्येदमब्रवीत् ॥ ३८ मित्रावरुणकौ देवौ पुत्रवन्तौ महाद्युती। सिद्धिर्भविष्यति यथा युवयोर्वैष्णवी पुनः ॥ ३९ स्वाधिकारेण स्थीयेतामधुना लोकसाक्षिकौ। इत्युक्त्वान्तर्दधे ब्रह्मा तौ स्थितौ स्वाधिकारकौ ॥ ४० तपस्याके द्वारा सनातन परम ज्योति (ब्रह्मधाम)–को प्राप्त करनेकी इच्छावाले उन दोनों तपस्वी देवेश्वरोंसे ब्रह्माजीने आकर यह कहा—'महान् कान्तिमान् और पुत्रवान् मित्र तथा वरुण देवताओ! तुम दोनोंको पुनः वैष्णवी सिद्धि प्राप्त होगी। इस समय संसारके साक्षीरूपसे तुम लोग अपने अधिकारपर स्थित हो जाओ।' यों कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे दोनों देवता अपने अधिकृत पदपर स्थित हुए ॥ ३८–४० ॥ एवं ते कथितं विप्र वसिष्ठस्य महात्मनः। मित्रावरुणपुत्रत्वमगस्त्यस्य च धीमतः ॥ ४१ इदं पुंसीयमाख्यानं वारुणं पापनाशनम्। पुत्रकामास्तु ये केचिच्छृण्वन्तीदं शुचिव्रताः। अचिरादेव पुत्रांस्ते लभन्ते नात्र संशयः ॥ ४२ यश्चैतत्पठते नित्यं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। देवाश्च पितरस्तस्य तृप्ता यान्ति परं सुखम् ॥ ४३ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। नन्दते स सुखं भूमौ विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ४४ इत्येतदाख्यानमिदं मयेरितं पुरातनं वेदविद्वैरुदीरितम्। पठिष्यते यस्तु शृणोति सर्वदा स याति शुद्धो हरिलोकमञ्जसा ॥ ४५ ब्राह्मण! इस प्रकार महात्मा वसिष्ठजी और बुद्धिमान् अगस्त्यजी जिस तरह मित्रावरुणके पुत्र हुए थे, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह दिया। यह वरुणदेवता-सम्बन्धी पुंसवनाख्यान पाप नष्ट करनेवाला है। जो लोग पुत्रकी कामनासे शुद्ध व्रतका आचरण करते हुए इसका श्रवण करते हैं, वे शीघ्र ही अनेक पुत्र प्राप्त करते हैं—इसमें संदेह नहीं है। जो उत्तम ब्राह्मण हव्य (देवयाग) और कव्य (पितृयाग)-में इसका पाठ करता है, उसके देवता तथा पितर तृप्त होकर अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण करता है, वह पृथ्वीपर सुखपूर्वक प्रसन्नताके साथ रहता है और फिर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। वेदवेत्ताओंके द्वारा प्रतिपादित इस पुरातन उपाख्यानको, जिसे मैंने कहा है, जो लोग सादर पढ़ेंगे और सुनेंगे, वे शुद्ध होकर अनायास ही विष्णुलोकको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४१–४५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे पुंसवनाख्यानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुंसवन' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

सातवाँ अध्याय

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २७ सातवाँ अध्याय मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र' का पाठ और मृत्युपर विजय प्राप्त करना श्रीभरद्वाज उवाच │ श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युको कैसे पराजित किया? यह मुझे बताइये। आपने एतदाख्याहि मे सूत त्वयैतत् सूचितं पुरा॥ १ │ पहले यह सूचित किया था कि वे मृत्युपर विजयी │ हुए थे*॥ १॥ सूत उवाच │ सूतजी बोले—भरद्वाजजी! इस महान् पुरातन इदं तु महदाख्यानं भरद्वाज शृणुष्व मे। │ इतिहासको आप और ये सभी ऋषि सुनें; मैं कह रहा शृण्वन्तु ऋषयश्चेमे पुरावृत्तं ब्रवीम्यहम्॥ २ │ हूँ। अत्यन्त पवित्र कुरुक्षेत्रमें, व्यासपीठपर, एक सुन्दर कुरुक्षेत्रे महापुण्ये व्यासपीठे वराश्रमे। │ आश्रममें स्नान तथा जप आदि समाप्त करके व्यासासनपर तत्रासीनं मुनिवरं कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥ ३ │ बैठे हुए और शिष्यभूत मुनियोंसे घिरे हुए मुनिवर कृतस्नानं कृतजपं मुनिशिष्यैः समावृतम्। │ महर्षि कृष्णद्वैपायनसे, जो वेद और वेदार्थोंके तत्त्ववेत्ता वेदवेदार्थतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम्॥ ४ │ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ थे, परम धर्मात्मा शुकदेवजीने प्रणिपत्य यथान्यायं शुकः परमधार्मिकः। │ हाथ जोड़ उन्हें यथोचितरूपसे प्रणाम कर इसी विषयको इममेवार्थमुद्दिश्य तं पप्रच्छ कृताञ्जलिः॥ ५ │ जाननेके लिये प्रश्न किया था, जिसके लिये कि इन यमुद्दिश्य वयं पृष्टास्त्वयात्र मुनिसंनिधौ। │ मुनियोंके निकट आप पुण्यतीर्थनिवासी नृसिंहभक्तने नरसिंहस्य भक्तेन कृततीर्थनिवासिना॥ ६ │ मुझसे पूछा है॥ २–६॥ श्रीशुक उवाच │ श्रीशुकदेवजी बोले—पिताजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युपर कैसे विजय पायी? यह कथा कहिये। इस एतदाख्याहि मे तात श्रोतुमिच्छामि तेऽधुना॥ ७ │ समय मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ॥ ७॥ व्यास उवाच │ व्यासजी बोले—महामते पुत्र! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना यथा मृत्युः पराजितः। │ जिस प्रकार मृत्युपर विजय पायी, वह तुमसे कहता तथा ते कथयिष्यामि शृणु वत्स महामते॥ ८ │ हूँ, सुनो। मुझसे कहे जानेवाले इस महान् एवं उत्तम शृण्वन्तु मुनयश्चेमे कथ्यमानं मयाधुना। │ उपाख्यानको ये सभी मुनि और मेरे शिष्यगण भी सुनें। मच्छिष्याश्चैव शृण्वन्तु महदाख्यानमुत्तमम्॥ ९ │

  • यद्यपि नरसिंहपुराणके गत अध्यायोंमें मार्कण्डेयजीका नाम कहीं नहीं आया है। अतः 'आपने पहले यह सूचित किया था— (त्वयैतत् सूचितं पुरा)' इत्यादि कथनकी कोई संगति नहीं प्रतीत होती, तथापि प्रथम अध्यायके पंद्रहवें श्लोकसे इस बातकी सूचना मिलती है कि भरद्वाजजीने सूतजीके मुखसे पहले 'वाराहीसंहिता' सुनी थी, उसके बाद उन्होंने 'नरसिंहसंहिता' सुननेकी इच्छा प्रकट की। तब सूतजीने 'नरसिंहसंहिता' सुनाना आरम्भ किया था। अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वाराहीसंहिता-श्रवणके प्रसंगमें भरद्वाजजीको सूतजीके मुखसे मार्कण्डेयजीके मृत्युपर विजय पानेके इतिहासकी कोई सूचना प्राप्त हुई हो, जिसका स्मरण उन्होंने यहाँ दिलाया है।

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ भृगोः ख्यातयां समुत्पन्नो मृकण्डुर्नाम वै सुतः । भृगुजीके उनकी पत्नी ख्यातिके गर्भसे 'मृकण्डु' नामक सुमित्रा नाम वै पत्नी मृकण्डोस्तु महात्मनः ॥ १० एक पुत्र हुआ। महात्मा मृकण्डुकी पत्नी सुमित्रा हुई। धर्मज्ञा धर्मनिरता पतिशुश्रूषणे रता । वह धर्मको जाननेवाली, धर्मपरायणा और पतिकी तस्यां तस्य सुतो जातो मार्कण्डेयो महामतिः ॥ ११ सेवामें लगी रहनेवाली थी। इसीके गर्भसे मृकण्डुके भृगुपौत्रो महाभागो बालत्वेऽपि महामतिः । पुत्र मेधावी मार्कण्डेयजी हुए। ये भृगुके पौत्र महाभाग ववृधे वल्लभो बालः पित्रा तत्र कृतक्रियः ॥ १२ मार्कण्डेय बचपनमें भी बड़े बुद्धिमान् थे। पिताके द्वारा तस्मिन् वै जातमात्रे तु आगमी कश्चिदब्रवीत् । जातकर्म आदि संस्कार कर देनेपर माँ-बापके लाड़ले वर्षे द्वादशमे पूर्णे मृत्युरस्य भविष्यति ॥ १३ बालक मार्कण्डेयजी क्रमशः बढ़ने लगे॥८-१२॥ श्रुत्वा तन्मातृपितरौ दुःखितौ तौ बभूवतुः । उनके जन्म लेते ही किसी भविष्यवेत्ता ज्योतिषीने विदूयमानहृदयौ तं निरीक्ष्य महामते ॥ १४ यह कहा था कि 'बारहवाँ वर्ष पूर्ण होते ही इस तथापि तत्पिता तस्य यत्नात् काले क्रियां ततः । बालककी मृत्यु हो जायगी।' यह सुनकर उनके माता- चकार सर्वा मेधावी उपनीतो गुरोर्गृहे ॥ १५ पिता बहुत ही दुःखी हुए। महामते! उन्हें देख-देखकर वेदानेवाभ्यसन्नास्ते गुरुशुश्रूषणोद्यतः । उन दोनोंका हृदय व्यथित होता रहता था, तथापि उनके स्वीकृत्य वेदशास्त्राणि स पुनर्गृहमागतः ॥ १६ पिताने उनके नामकरण आदि सभी संस्कार किये। मातापितॄन्नमस्कृत्य पादयोर्विनयान्वितः । तत्पश्चात् मेधावी बालक मार्कण्डेय गुरुके घर ले जाये तस्थौ तत्र गृहे धीमान् मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ १७ गये। वहाँ उनका उपनयन-संस्कार हुआ। वहाँ वे गुरुकी तं निरीक्ष्य महात्मानं सत्प्रज्ञं च विचक्षणम् । सेवामें तत्पर रहकर वेदाभ्यास करते हुए ही रहने लगे। दुःखितौ तौ भृशं तत्र तन्मातापितरौ शुचा ॥ १८ वेद-शास्त्रोंका यथावत् अध्ययन करके वे पुनः अपने तौ दृष्ट्वा दुःखमापन्नौ मार्कण्डेयो महामतिः । घर लौट आये। घर आनेपर बुद्धिमान् महामुनि मार्कण्डेयने उवाच वचनं तत्र किमर्थं दुःखमीदृशम् ॥ १९ विनयपूर्वक माता-पिताके चरणोंमें शीश झुकाया और सदैतत् कुरुषे मातस्तातेन सह धीमता । तबसे वे घरपर ही रहने लगे ॥ १३-१७॥ वक्तुमर्हसि दुःखस्य कारणं मम पृच्छतः ॥ २० शुकदेव ! उस समय उन परम बुद्धिमान् महात्मा इत्युक्ता तेन पुत्रेण माता तस्य महात्मनः । एवं विद्वान् पुत्रको देखकर माता-पिता शोकसे बहुत ही कथयामास तत्सर्वमागमी यदुवाच ह ॥ २१ दुःखी हुए। उन्हें दुःखी देखकर महामति मार्कण्डेयजीने तच्छ्रुत्वासौ मुनिः प्राह मातरं पितरं पुनः । कहा-'माँ! तुम बुद्धिमान् पिताजीके साथ क्यों इस पित्रा सार्धं त्वया मातर्न कार्यं दुःखमण्वपि ॥ २२ प्रकार निरन्तर दुःखी रहा करती हो? मैं पूछता हूँ, अपनेष्यामि भो मृत्युं तपसा नात्र संशयः । मुझसे अपने दुःखका कारण बतलाओ।' अपने पुत्र यथा चाहं चिरायुः स्यां तथा कुर्यामहं तपः ॥ २३ मार्कण्डेयजीके इस प्रकार पूछनेपर उन महात्माकी इत्युक्त्वा तौ समाश्वास्य पितरौ वनमभ्यगात् । माताने, ज्योतिषी जो कुछ कह गया था, वह सब कह वल्लीवटं नाम वनं नानातृषिनिषेवितम् ॥ २४ सुनाया। यह सुनकर मार्कण्डेयमुनिने माता-पितासे तत्रासौ मुनिभिः सार्धमासीनं स्वपितामहम् । कहा-'माँ! तुम और पिताजी तनिक भी दुःख न भृगुं ददर्श धर्मज्ञं मार्कण्डेयो महामतिः ॥ २५ मानो। मैं तपस्याके द्वारा अपनी मृत्युको दूर हटा दूँगा, इसमें संशय नहीं है। मैं ऐसा तप करूँगा, जिससे चिरजीवी हो सकूँ' ॥ १८-२३॥ इस प्रकार कहकर, माता-पिताको आश्वासन देकर, वे अनेक ऋषियोंसे सुसेवित 'वल्लीवट' नामक वनमें गये। वहाँ पहुँचकर महामति मार्कण्डेयजीने मुनियोंके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २९ अभिवाद्य यथान्यायं मुनींश्चैव स धार्मिकः। कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तस्थौ तत्पुरतो दमी॥ २६ गतायुषं ततो दृष्ट्वा पौत्रं बालं महामतिः। भृगुराह महाभागं मार्कण्डेयं तदा शिशुम्॥ २७ किमागतोऽसि पुत्रात्र पितुस्ते कुशलं पुनः। मातुश्च बान्धवानां च किमागमनकारणम्॥ २८ इत्येवमुक्तो भृगुणा मार्कण्डेयो महामतिः। उवाच सकलं तस्मै आदेशिवचनं तदा॥ २९ पौत्रस्य वचनं श्रुत्वा भृगुस्तु पुनरब्रवीत्। एवं सति महाबुद्धे किं त्वं कर्म चिकीर्षसि ॥ ३० मार्कण्डेय उवाच भूतापहारिणं मृत्युं जेतुमिच्छामि साम्प्रतम्। शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि तत्रोपायं वदस्व नः ॥ ३१ भृगुरुवाच नारायणमनाराध्य तपसा महता सुत। को जेतुं शक्नुयान्मृत्युं तस्मात्तं तपसार्चय ॥ ३२ तमनन्तमजं विष्णुमच्युतं पुरुषोत्तमम्। भक्तप्रियं सुरश्रेष्ठं भक्त्या त्वं शरणं व्रज ॥ ३३ तमेव शरणं पूर्वं गतवान्नारदो मुनिः। तपसा महता वत्स नारायणमनामयम् ॥ ३४ तत्प्रसादान्महाभाग नारदो ब्रह्मणः सुतः। जरां मृत्युं विजित्याशु दीर्घायुर्वर्धते सुखम्॥ ३५ तमृते पुण्डरीकाक्षं नारसिंहं जनार्दनम्। कः कुर्यान्मानवो वत्स मृत्युसत्तानिवारणम्॥ ३६ तमनन्तमजं विष्णुं कृष्णं जिष्णुं श्रियः पतिम्। गोविन्दं गोपतिं देवं सततं शरणं व्रज ॥ ३७ नरसिंहं महादेवं यदि पूजयसे सदा। वत्स जेतासि मृत्युं त्वं सततं नात्र संशयः ॥ ३८ व्यास उवाच उक्तः पितामहेनैवं भृगुणा पुनरब्रवीत्। मार्कण्डेयो महातेजा विनयात् स्वपितामहम् ॥ ३९ साथ विराजमान अपने पितामह धर्मात्मा भृगुजीका दर्शन किया। उनके साथ ही अन्य ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन करके धर्मपरायण मार्कण्डेयजी मनोनिग्रहपूर्वक दोनों हाथ जोड़कर भृगुजीके समक्ष खड़े हो गये। महामति भृगुजीने अपने बालक पौत्र महाभाग मार्कण्डेयको, जिसकी आयु प्रायः बीत चुकी थी, देखकर कहा— 'वत्स! तुम यहाँ कैसे आये? अपने माता-पिता और बान्धवजनोंका कुशल कहो तथा यह भी बतलाओ कि यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है?' भृगुजीके इस प्रकार पूछनेपर महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजीने उनसे उस समय ज्योतिषीकी कही हुई सारी बात कह सुनायी। पौत्रकी बात सुनकर भृगुजीने पुनः कहा—'महाबुद्धे! ऐसी स्थितिमें तुम कौन-सा कर्म करना चाहते हो?'॥ २४-३०॥ मार्कण्डेयजी बोले- भगवन्! मैं इस समय प्राणियोंका अपहरण करनेवाले मृत्युको जीतना चाहता हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये आप मुझे कोई उपाय बतायें ॥ ३१ ॥ भृगुजी बोले- पुत्र ! बहुत बड़ी तपस्याके द्वारा भगवान् नारायणकी आराधना किये बिना कौन मृत्युको जीत सकता है? इसलिये तुम तपस्याद्वारा उन्हींका अर्चन करो। भक्तोंके प्रियतम और देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ उन अनन्त, अजन्मा, अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ। वत्स ! पूर्वकालमें नारदमुनि भी महान् तपके द्वारा उन्हीं अनामय भगवान् नारायणकी शरणमें गये थे। महाभाग! ब्रह्मपुत्र नारदजी उन्हींकी कृपासे जरा और मृत्युको शीघ्र ही जीतकर दीर्घायु हो सुखपूर्वक रहते हैं। पुत्र! उन कमललोचन नृसिंहस्वरूप भगवान् जनार्दनके बिना कौन मनुष्य यहाँ मृत्युकी सत्ताका निवारण कर सकता है? तुम निरन्तर उन्हीं अनन्त, अजन्मा, विजयी, कृष्णवर्ण, लक्ष्मीपति, गोविन्द, गोपति भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ! वत्स ! यदि तुम सदा उन महान् देवता भगवान् नरसिंहकी पूजा करते रहोगे तो सदाके लिये मृत्युपर विजय प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३८॥ व्यासजी बोले- पितामह भृगुके इस प्रकार कहनेपर महान् तेजस्वी मार्कण्डेयजीने उनसे विनयपूर्वक कहा ॥ ३९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ मार्कण्डेय उवाच आराध्यः कथितस्तात विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः। कथं कुत्र मया कार्यमच्युताराधनं गुरो। येनासौ मम तुष्टस्तु मृत्युं सद्योऽपनेष्यति॥ ४० भृगुरुवाच तुङ्गभद्रेति विख्याता या नदी सह्यपर्वते। तत्र भद्रवटे वत्स त्वं प्रतिष्ठाप्य केशवम्॥ ४१ आराध्य जगन्नाथं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं मनः संयम्य तत्त्वतः॥ ४२ हृत्पुण्डरीके देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्। ध्यायन्नेकमना वत्स द्वादशाक्षरमभ्यसन्॥ ४३ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। इमं मन्त्रं हि जपतो देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ प्रीतो भवति विश्वात्मा मृत्युं येनापनेष्यति॥ ४४ व्यास उवाच इत्युक्तस्तं प्रणम्याथ स जगाम तपोवनम्॥ ४५ सह्यपादोद्भवोवायास्तु भद्रायास्तटमुत्तमम्। नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ ४६ गुल्मवेणुलताकीर्णं नानामुनिजनाकुलम्। तत्र विष्णुं प्रतिष्ठाप्य गन्धधूपादिभिः क्रमात्॥ ४७ पूजयामास देवेशं मार्कण्डेयो महामुनिः। पूजयित्वा हरिं तत्र तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ ४८ निराहारो मुनिस्तत्र वर्षमेकममन्द्रितः। मात्रोक्तकाले त्वासन्ने दिने तत्र महामतिः॥ ४९ स्नात्वा यथोक्तविधिना कृत्वा विष्णोस्तथार्चनम्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं विशुद्धेनान्तरात्मना॥ ५० आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा कृत्वासौ प्राणसंयमम्। ॐकारोच्चारणाद्धीमान् हृत्पद्मं स विकासयन्॥ ५१ तन्मध्ये रविसोमाग्निमण्डलानि यथाक्रमम्। कल्पयित्वा हरेः पीठं तस्मिन् देशे सनातनम्॥ ५२ हिन्दी अनुवाद: मार्कण्डेयजी बोले—तात! गुरो! आपने विश्वपति भगवान् विष्णुको आराध्य तो बतलाया, परंतु मैं उन अच्युतकी आराधना कहाँ और किस प्रकार करूँ? जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होकर मेरी मृत्युको दूर कर दें॥ ४०॥ भृगुजी बोले—सह्यपर्वतपर जो 'तुङ्गभद्रा' नामसे विख्यात नदी है, वहाँ 'भद्रवट' नामक वृक्षके नीचे जगन्नाथ भगवान् केशवकी स्थापना कर क्रमशः गन्ध और पुष्प आदिसे उनकी पूजा करो। इन्द्रियोंको मनमें नियन्त्रित कर, मनको भी पूर्णतः संयममें रखते हुए एकाग्रचित्त हो, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करो और अपने हृदयकमलमें शङ्ख, चक्र, गदा (एवं पद्म) धारण किये देवेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान किया करो। जो देवाधिदेव शार्ङ्गधन्वा विष्णुके इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, उसके ऊपर वे विश्वात्मा प्रसन्न होते हैं। तुम भी इसका जप करो, जिससे प्रसन्न होकर वे तुम्हारी मृत्यु दूर कर देंगे॥ ४१–४४॥ व्यासजी कहते हैं—वत्स! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर उन्हें प्रणाम करके मार्कण्डेयजी सह्यपर्वतकी शाखासे निकली हुई तुङ्गभद्राके उत्तम तटपर विविध प्रकारके वृक्ष और लताओंसे भरे हुए नाना भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित, गुल्म, लता और वेणुओंसे व्याप्त तथा अनेकानेक मुनिजनोंसे पूर्ण तपोवनमें गये। वहाँ वे महामुनिने देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्थापना करके क्रमशः गन्ध-धूप आदिसे उनकी पूजा करने लगे। भगवान्‌की पूजा करते हुए वहाँ उन्होंने निरालस्यभावसे निराहार रहकर सालभर अत्यन्त दुष्कर तप किया। माताका बतलाया हुआ समय निकट आनेपर उस दिन महामति मार्कण्डेयजीने वहाँ स्नान करके पूर्वोक्त विधिसे विष्णुकी पूजा की और स्वस्तिकासन बाँध इन्द्रियसम्मूहको मनमें संयत कर विशुद्ध अन्तःकरणसे युक्त हो प्राणायाम किया। फिर ॐकारके उच्चारणसे हृदयकमलको विकसित करते हुए उसके मध्यभागमें क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निमण्डलकी कल्पना करके भगवान् विष्णुका पीठ निश्चित किया और उस स्थानपर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ ३१ पीताम्बरधरं कृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम्। भावपुष्पैः समभ्यर्च्य मनस्तस्मिन्निवेश्य च ॥ ५३ ब्रह्मरूपं हरिं ध्यायंस्ततो मन्त्रमुदीरयत्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ ५४ व्यास उवाच इत्येवं ध्यायत्तस्तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः। मनस्तत्रैव संलग्नं देवदेवे जगत्पतौ ॥ ५५ ततो यमाज्ञया तत्र आगता यमकिंकराः। पाशहस्तास्तु तं नेतुं विष्णुदूतैस्तु ते हताः ॥ ५६ शूलैः प्रहन्यमानास्तु द्विजं मुक्त्वा ययुस्तदा। वयं निवृत्य गच्छामो मृत्युरेवागमिष्यति ॥ ५७ विष्णुदूता ऊचुः यत्र नः स्वामिनो नाम लोकनाथस्य शार्ङ्गिणः। को यमस्तत्र मृत्युर्वा कालः कलयतां वरः ॥ ५८ व्यास उवाच आगत्य स्वयमेवाह मृत्युः पार्श्वं महात्मनः। मार्कण्डेयस्य बभ्राम विष्णुकिंकरशङ्कया ॥ ५९ तेऽप्युद्यम्य्याशु मुशलानायसान् विष्णुकिंकराः। विष्ण्वाज्ञया हनिष्यामो मृत्युमद्येति संस्थिताः ॥ ६० ततो विष्ण्वर्पितमना मार्कण्डेयो महामतिः। तुष्टाव प्रणतो भूत्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६१ विष्णुनैवोदितं यत्तत्स्तोत्रं कर्णे महात्मनः। सुभाषितेन मनसा तेन तुष्टाव माधवम् ॥ ६२ मार्कण्डेय उवाच नारायणं सहस्राक्षं पद्मनाभं पुरातनम्। प्रणतोऽस्मि हृषीकेशं किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६३ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षमनन्तमजमव्ययम्। केशवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६४ वासुदेवं जगद्योनिं भानुवर्णमतीन्द्रियम्। दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६५ पीताम्बर तथा शङ्ख, चक्र, गदा धारण करनेवाले सनातन भगवान् श्रीकृष्णकी भावमय पुष्पोंसे पूजा करके उनमें अपने चित्तको लगा दिया। फिर उन ब्रह्म-स्वरूप श्रीहरिका ध्यान करते हुए वे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'-इस मन्त्रका जप करने लगे ॥ ५३-५४॥ व्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार ध्यान करते हुए बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका मन उन देवाधिदेव जगदीश्वरमें लीन हो गया। तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे उन्हें ले जानेके लिये हाथोंमें पाश लिये हुए यमदूत वहाँ आये; परंतु भगवान् विष्णुके दूतोंने उन्हें मार भगाया। शूलोंसे मारे जानेपर वे उस समय विप्रवर मार्कण्डेयको छोड़कर भाग चले और यह कहते गये कि 'हमलोग तो लौटकर चले जा रहे हैं, परंतु अब साक्षात् मृत्युदेव ही यहाँ आयेंगे' ॥ ५५-५७॥ विष्णुदूत बोले—जहाँ हमारे स्वामी जगदीश्वर शार्ङ्गधन्वा भगवान् विष्णुका नाम जपा जाता हो, वहाँ उनकी क्या बिसात है? ग्रसनेवालोंमें श्रेष्ठ काल, मृत्यु अथवा यमराज कौन होते हैं? ॥ ५८॥ व्यासजी कहते हैं—यमदूतोंके लौटनेके बाद साक्षात् मृत्युने ही वहाँ आकर उन्हें यमलोक चलनेको कहा, परंतु श्रीविष्णुदूतोंके डरसे वे महात्मा मार्कण्डेयके आसपास ही घूमते रह गये; उन्हें स्पर्श करनेका साहस न कर सके। इधर विष्णुदूत भी शीघ्र ही लोहेके मूसल उठाकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने मनमें यह निश्चय कर लिया था कि 'आज हमलोग विष्णुकी आज्ञासे मृत्युका वध कर डालेंगे।' तत्पश्चात् महामति मार्कण्डेयजी भगवान् विष्णुमें चित्त लगाये उन देवाधिदेव जनार्दनको प्रणाम करते हुए स्तुति करने लगे। भगवान् विष्णुने ही वह स्तोत्र उन महात्माके कानमें कह दिया। उसी सुभाषित स्तोत्रद्वारा उन्होंने मनोयोगपूर्वक भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्तुति की ॥ ५९-६२॥ मार्कण्डेयजी बोले—जो सहस्रों नेत्रोंसे युक्त, इन्द्रियोंके स्वामी, पुरातन पुरुष तथा पद्मनाभ (अपनी नाभिसे ब्रह्माण्डमय कमलको प्रकट करनेवाले) हैं, उन श्रीनारायणदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। मृत्यु मेरा क्या कर लेगा? मैं अनन्त, अजन्मा, अविकारी, गोविन्द, कमलनयन भगवान् केशवकी शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? मैं संसारकी उत्पत्तिके स्थान, सूर्यके समान प्रकाशमान्, इन्द्रियातीत वासुदेव (सर्वव्यापी देवता) भगवान् दामोदरकी शरणमें आ गया In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ शङ्खचक्रधरं देवं छन्नरूपिणमव्ययम्। हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनका स्वरूप अव्यक्त अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६६ है, जो विकारोंसे रहित हैं, उन शङ्ख-चक्रधारी भगवान् अधोक्षजकी मैं शरणमें आ गया; मृत्यु मेरा क्या कर वाराहं वामनं विष्णुं नरसिंहं जनार्दनम्। लेगा? मैं वाराह, वामन, विष्णु, नरसिंह, जनार्दन एवं माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६७ माधवकी शरणमें हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? मैं पवित्र, पुष्कररूप अथवा पुष्कल (पूर्ण) रूप, कल्याणबीज, पुरुषं पुष्करं पुण्यं क्षेमबीजं जगत्पतिम्। जगत्-प्रतिपालक एवं लोकनाथ भगवान् पुरुषोत्तमकी लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६८ शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? जो समस्त भूतोंके आत्मा, महात्मा (परमात्मा) एवं जगत्की भूतात्मानं महात्मानं जगद्योनिमयोनिजम्। योनि (उत्पत्तिके स्थान) होते हुए भी स्वयं अयोनिज हैं, विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६९ उन भगवान् विश्वरूपकी मैं शरणमें आया हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो व्यक्ताव्यक्त सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्। स्वरूप हैं, उन महायोगी सनातन देवकी मैं शरणमें आया महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ७० हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? ॥ ६३–७० ॥ इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः। महात्मा मार्कण्डेयके द्वारा उच्चारित हुए उस स्तोत्रको अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैश्च पीडितः ॥ ७१ सुनकर विष्णुदूतोंद्वारा पीड़ित हुए मृत्युदेव वहाँसे भाग चले। इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयने मृत्युपर इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता। विजय पायी। सच है, कमललोचन भगवान् नृसिंहके प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम् ॥ ७२ प्रसन्न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। स्वयं भगवान् विष्णुने ही मार्कण्डेयजीके हितके लिये मृत्युको मृत्युञ्जयमिदं पुण्यं मृत्युप्रशमनं शुभम्। शान्त करनेवाले इस परम पावन मङ्गलमय मृत्युञ्जय- मार्कण्डेयहितार्थाय स्वयं विष्णुरुवाच ह ॥ ७३ स्तोत्रका उपदेश दिया था। जो नित्य नियमपूर्वक पवित्रभावसे भक्तियुक्त होकर सायं, प्रातः और मध्याह्न— य इदं पठते भक्त्या त्रिकालं नियतः शुचिः। तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, भगवान् नाकाले तस्य मृत्युः स्यान्नरस्याच्युतचेतसः ॥ ७४ अच्युतमें चित्त लगानेवाले उस पुरुषका अकालमरण नहीं होता। योगी मार्कण्डेयने अपने हृदय-कमलमें हृत्पद्ममध्ये पुरुषं पुराणं सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान सनातन पुराण-पुरुष नारायणं शाश्वतमादिदेवम्। आदिदेव नारायणका चिन्तन करके तत्काल मृत्युपर संचिन्त्य सूर्यादपि राजमानं मृत्युं स योगी जितवांस्तदैव ॥ ७५ विजय प्राप्त कर ली ॥ ७१–७५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयमृत्युञ्जयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेयकी मृत्युपर विजय' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥