भारतकोश
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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

[page_start] २३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

इन्द्रजिन्मन्त्रलब्धं तु रथमारुह्य वै पुनः। वानरेषु च सर्वेषु शरवर्षं ववर्ष सः॥७२

रात्रौ तद्द्बाणभिन्नं तु बलं सर्वं च राघवम्। निश्चेष्टमखिलं दृष्ट्वा जाम्बवत्प्रेरितस्तदा॥७३

वीर्यादौषधमानीय हनूमान् मारुतात्मजः। भूम्यां शयानमुत्थाप्य रामं हरिगणांस्तथा॥७४

तैरेव वानरैः सार्धं ज्वलितोल्काकरैर्निशि। दाहयामास लङ्कां तां हस्त्यश्वरथराक्षसाम्॥७५

वर्षन्तं शरजालानि सर्वदिक्षु घनो यथा। स भ्रात्रा मेघनादं तं घातयामास राघवः॥७६

घातितेष्वथ रक्षस्सु पुत्रमित्रादिबन्धुषु। कारितेष्वथ विघ्नेषु होमजप्यादिकर्मणाम्॥७७

ततः क्रुद्धो दशग्रीवो लङ्काद्वारे विनिर्गतः। क्वासौ राम इति ब्रूते मानुषस्तापसाकृतिः॥७८

योद्धा कपिबलीत्युच्चैर्व्याहरद्राक्षसाधिपः। वेगवद्भिर्विनीतैश्च अश्वैश्चित्ररथे स्थितः॥७९

अथायान्तं तु तं दृष्ट्वा रामः प्राह दशाननम्। रामोऽहमत्र दुष्टात्मन्नेहि रावण मां प्रति॥८०

इत्युक्ते लक्ष्मणः प्राह रामं राजीवलोचनम्। अनेन रक्षसा योत्स्ये त्वं तिष्ठेति महाबल॥८१

ततस्तु लक्ष्मणो गत्वा रुरोध शरवृष्टिभिः। विंशद्बाहुविसृष्टैस्तु शस्त्रास्त्रैर्लक्ष्मणं युधि॥८२

रुरोध स दशग्रीवः तयोर्युद्धमभून्महत्। देवा व्योम्नि विमानस्था वीक्ष्य तस्थुर्महाहवम्॥८३

ततो रावणशस्त्राणिच्छित्त्वा स्वैस्तीक्ष्णसायकैः। लक्ष्मणः सारथिं हत्वा तस्याश्वानपि भल्लकैः॥८४

तत्पश्चात् इन्द्रजित् मन्त्रशक्तिसे प्राप्त हुए रथपर आरूढ़ हो समस्त वानरोंपर बाण-वृष्टि करने लगा। रात्रिके समय समस्त वानर-सेना तथा श्रीरामचन्द्रजीको मेघनादके बाणोंसे विद्ध हो सर्वथा निश्चेष्ट पड़े देख पवनकुमार हनूमान्जी जाम्बवान्‌के द्वारा प्रेरित हो अपने पराक्रमसे औषध ले आये। उन्होंने उस औषधके प्रभावसे भूमिपर पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी तथा वानरगणोंको उठाया और प्रज्वलित उल्का हाथमें लिये उन्हीं वानरोंके साथ रातमें जाकर हाथी, रथ और घोड़ोंसे युक्त राक्षसोंकी लङ्कामें आग लगा दी। तदनन्तर भगवान् रामने बादलके समान समस्त दिशाओंमें बाणोंकी वर्षा करते हुए मेघनादका अपने भाई लक्ष्मणके द्वारा वध करा दिया॥७२-७६॥

इस प्रकार जब पुत्र-मित्रादि समस्त राक्षस-बन्धु मारे गये तथा होम-जप आदि अभिचार-कर्मोंमें वानरोंद्वारा विघ्न डाल दिया गया, तब कुपित हो दशशीश रावण वेगशाली सुशिक्षित अश्वोंसे युक्त विचित्र रथमें बैठकर लङ्काके द्वारपर निकल आया और कहने लगा—'तपस्वीका वेष बनाये वह मनुष्य राम कहाँ है, जो वानरोंके बलपर योद्धा बना हुआ है?' राक्षसराज रावणने यह बात बड़े जोरोंसे कही। यह सुन भगवान् रामने दशानन रावणको आते देख उससे कहा—'दुष्टात्मा रावण! मैं ही राम हूँ और यहाँ खड़ा हूँ, तू मेरी ओर चला आ'॥७७-८०॥

उनके यों कहनेपर लक्ष्मणने कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'महाबल! आप अभी ठहरें, मैं इस राक्षसके साथ युद्ध करूँगा।' तदनन्तर लक्ष्मणने आगे बढ़कर बाणोंकी वृष्टिसे रावणको ढक दिया। फिर दशग्रीव रावणने भी अपनी बीस भुजाओंद्वारा छोड़े हुए शस्त्रास्त्रोंसे लक्ष्मणको संग्राममें आच्छादित कर दिया। इस प्रकार उन दोनोंमें महान् युद्ध हुआ। विमानपर आरूढ़ देवतागण इस महान् संग्रामको देख [कौतूहलवश] आकाशमें स्थित हो गये॥८१-८३॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणने अपने तीखे बाणोंद्वारा रावणके अस्त्र-शस्त्र काटकर उसके सारथिको मार डाला और भल्ल नामक बाणोंसे उसके घोड़ोंको भी नष्ट कर दिया।

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अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३१ रावणस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं च निशितैः शरैः । फिर तीखे बाणोंसे रावणका धनुष और उसकी ध्वजा वक्षःस्थलं महावीर्यो विव्याध परवीरहा ॥ ८५ काटकर शत्रु-वीरोंका नाश करनेवाले महान् पराक्रमी लक्ष्मणजीने उसके वक्षःस्थलको बेध दिया। तब राक्षसराज ततो रथान्निपत्याधः क्षिप्रं राक्षसनायकः । रावण रथसे नीचे गिर पड़ा। किंतु शीघ्र ही उठकर कुपित शक्तिं जग्राह कुपितो घण्टानादविनादिनीम् ॥ ८६ हो उसने हाथमें शक्ति उठायी, जो सैकड़ों घड़ियालोंके समान आवाज करनेवाली थी। उसकी धार अग्निकी अग्निज्वालाज्वलज्जिह्वां महोल्कासदृशद्युतिम् । ज्वालाके समान प्रज्वलित थी तथा उसकी कान्ति महती दृढमुष्ट्या तु निक्षिप्ता शक्तिः सा लक्ष्मणोरसि ॥ ८७ उल्काके समान प्रतीत होती थी। उसने दृढ़तापूर्वक मुट्ठी बाँधकर उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीपर फेंका। वह विदार्यान्तःप्रविष्टाथ देवास्त्रस्तास्ततोऽम्बरे । शक्ति उनकी छाती छेदकर भीतर घुस गयी। इससे आकाशमें लक्ष्मणं पतितं दृष्ट्वा रुदद्भिर्वानरेश्वरैः ॥ ८८ स्थित देवतागण भयभीत हो गये। लक्ष्मणको गिरा देख रोते हुए वानराधिपतियोंके साथ दुःखी हो भगवान् श्रीराम दुःखितः शीघ्रमागम्य तत्पार्श्वं प्राह राघवः । शीघ्र ही उनके पास आये और कहने लगे— 'मेरे मित्र क्व गतो हनुमान् वीरो मित्रो मे पवनात्मजः ॥ ८९ पवनकुमार हनुमान् कहाँ चले गये? पृथ्वीपर पड़ा हुआ मेरा भाई लक्ष्मण जिस-किसी प्रकार भी जीवित हो सके, यदि जीवति मे भ्राता कथंचित्पतितो भुवि । वह उपाय होना चाहिये' ॥ ८४-८९१/२ ॥ इत्युक्ते हनुमान् राजन् वीरो विख्यातपौरुषः ॥ ९० राजन् ! उनके इस प्रकार कहनेपर, विख्यात पराक्रमी बद्ध्वाञ्जलिं बभाषेदं देह्यनुज्ञां स्थितोऽस्मि भोः । वीर हनुमान्‌जी हाथ जोड़कर बोले— 'देव ! आज्ञा दें, मैं रामः प्राह महावीर विशल्यकरणी मम ॥ ९१ सेवामें उपस्थित हूँ' ॥ ९०१/२ ॥ श्रीरामने कहा— 'महावीर ! मुझे 'विशल्यकरणी' अनुजं विरुजं शीघ्रं कुरु मित्र महाबल । ओषधि चाहिये। महाबली! उसे लाकर मेरे भाईको ततो वेगात्समुत्पत्य गत्वा द्रोणगिरिं कपिः ॥ ९२ शीघ्र ही नीरोग करो ॥ ९११/२ ॥ तब हनुमान्‌जी बड़े वेगसे उछले और द्रोणगिरिपर बद्ध्वा च शीघ्रमानीय लक्ष्मणं नीरुजं क्षणात् । जाकर शीघ्र ही वहाँसे दवा बाँधकर ले आये और उसका चकार देवदेवेशां पश्यतां राघवस्य च ॥ ९३ प्रयोग करके देवदेवेश्वरों तथा रामचन्द्रजीके देखते-देखते क्षणभरमें लक्ष्मणको नीरोग कर दिया ॥ ९२-९३ ॥ ततः क्रुद्धो जगन्नाथो रामः कमललोचनः । तदनन्तर जगदीश्वर कमलनयन श्रीराम बहुत ही कुपित रावणस्य बलं शिष्टं हस्त्यश्वरथराक्षसम् ॥ ९४ हुए और रावणकी बची हुई सेनाको हाथी, घोड़े, रथ तथा राक्षसोंसहित क्षणभरमें मार गिराया। उन्होंने तीखे बाणोंसे हत्वा क्षणेन रामस्तु तच्छरीरं तु सायकैः । रावणका शरीर जर्जर कर दिया और रणभूमिमें वानरोंसे तीक्ष्णैर्जर्जरितं कृत्वा तस्थिवान् वानरैर्वृतः ॥ ९५ घिरे हुए खड़े रहे। रावण निश्चेष्ट होकर गिर पड़ा। फिर धीरे-धीरे होशमें आनेपर वह उठकर कुपित हो सिंहनाद अस्तचेष्टो दशग्रीवः संज्ञां प्राप्य शनैः पुनः । करने लगा। उसकी गर्जना सुनकर आकाशवर्ती देवता लोग उत्थाय रावणः क्रुद्धः सिंहनादं ननाद च ॥ ९६ दहल गये ॥ ९४-९६१/२ ॥ तन्नादश्रवणैर्व्योम्नि वित्रस्तो देवतागणः । इसी समय रावणके प्रति वैर बाँधे महामुनि अगस्त्य एतस्मिन्नेव काले तु रामं प्राप्य महामुनिः ॥ ९७ श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और शत्रुओंपर विजय In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

२३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

२३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

रावणे बद्धवैरस्तु अगस्त्यो वै जयप्रदम्। दिलानेवाले 'आदित्यहृदय' नामक स्तोत्र-मन्त्रका उपदेश आदित्यहृदयं नाम मन्त्रं प्रादाज्जयप्रदम् ॥ ९८ किया। महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी अगस्त्यमुनिके बताये रामोऽपि जप्त्वा तन्मन्त्रमगस्त्योक्तं जयप्रदम्। हुए उस विजयदायक मन्त्रका जप करके उनके द्वारा तद्दत्तं वैष्णवं चापमतुलं सगुणं दृढम् ॥ ९९ अर्पित किये गये उत्तम डोरीवाले, सुदृढ़ एवं अनुपम वैष्णव-धनुषको सादर ग्रहण किया और उसपर प्रत्यञ्चा पूजयित्वा तदादाय सज्यं कृत्वा महाबलः। चढ़ायी। फिर प्रतापी रघुनाथजी शत्रुओंका मर्म-भेदन सौवर्णपुङ्खैस्तीक्ष्णैस्तु शरैर्मर्मविदारणैः ॥ १०० करनेमें समर्थ सोनेकी पाँखवाले तीक्ष्ण बाणोंद्वारा राक्षसराज युयुधे राक्षसेन्द्रेण रघुनाथः प्रतापवान्। रावणके साथ युद्ध करने लगे ॥ ९७-१००१/२ ॥ तयोस्तु युध्यतोस्तत्र भीमशक्त्योर्महामते ॥ १०१ महामते ! नृपश्रेष्ठ ! उन दोनों भयंकर शक्तिवाले श्रीराम और रावणके परस्पर युद्ध करते समय एक- परस्परविसृष्टस्तु व्योम्नि संवर्द्धितोऽनलः। दूसरेपर छोड़ी हुई अग्निकी ज्वाला उठ-उठकर वहाँ समुत्थितो नृपश्रेष्ठ रामरावणयोर्युधि ॥ १०२ आकाशमें फैलने लगी। इस वर्तमान संग्राममें अवर्णनीय संगरे वर्तमाने तु रामो दाशरथिस्तदा। पराक्रमवाले वीर दशरथनन्दन श्रीराम पैदल ही युद्ध पदातिर्युयुधे वीरो रामोऽनुक्तपराक्रमः ॥ १०३ कर रहे थे। यह देख देवराज इन्द्रने अपने सारथि मातुलिसहित एक महान् लोकविख्यात दिव्य रथ भेजा, सहस्राश्वयुतं दिव्यं रथं मातलिमेव च। जिसमें एक हजार घोड़े जुते थे। प्रतापी श्रीरामचन्द्रजी प्रेषयामास देवेन्द्रो महान्तं लोकविश्रुतम् ॥ १०४ श्रेष्ठ देवोंद्वारा प्रशंसित होकर उस रथपर आरूढ़ हुए रामस्तं रथमारुह्य पूज्यमानः सुरोत्तमैः। और मातलिके उपदेशसे उस दुष्ट दशाननका, जिसे मातल्युक्तोपदेशस्तु रामचन्द्रः प्रतापवान् ॥ १०५ ब्रह्माजीने वरदान दिया था, ब्रह्मास्त्रद्वारा वध किया। इस प्रकार प्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने क्रूर वैरी रावणका ब्रह्मदत्तवरं दुष्टं ब्रह्मास्त्रेण दशाननम्। संहार किया ॥ १०१-१०६ ॥ जघान वैरिणं क्रूरं रामदेवः प्रतापवान् ॥ १०६ श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा शत्रु रावणका उसके गणोंसहित रामेण निहते तत्र रावणे सगणे रिपौ। वध हो जानेपर इन्द्र आदि सभी देवता परस्पर कहने इन्द्राद्या देवताः सर्वाः परस्परमथाब्रुवन् ॥ १०७ लगे- "साक्षात् भगवान् विष्णुने ही श्रीरामावतार लेकर हमारे वैरी रावणका, जो दूसरोंके लिये अवध्य था, रामो भूत्वा हरिर्यस्मादस्माकं वैरिणं रणे। युद्धमें वध किया है। इसलिये हम लोग आकाशसे अन्यैरवध्यमप्येनं जघान युधि रावणम् ॥ १०८ उतरकर इन अनन्त पराक्रमी तथा किसीसे भी पराजित न होनेवाले 'श्रीराम' नामक परमेश्वरकी पूजा करें।" तस्मात्तं रामनामानमनन्तमपराजितम्। ऐसी सम्मति करके वे रुद्र, इन्द्र, वसु और चन्द्र आदि पूजयामोऽवतीर्यैनमित्युक्त्वा ते दिवौकसः ॥ १०९ देवतागण अनेक कान्तिमान् विमानोंद्वारा पृथ्वीपर उतरे। नानाविमानैः श्रीमद्भिरवतीर्य महीतले। वे जगत्के रचयिता, विश्वमूर्ति, सनातन पुरुष, विजयशील रुद्रेन्द्रवसुचन्द्राद्या विधातारं सनातनम् ॥ ११० भगवान् विष्णुके स्वरूपभूत अविनाशी परमात्मा श्रीरामका लक्ष्मणसहित विधिवत् पूजन करके उन्हें सब ओरसे विष्णुं जिष्णुं जगन्मूर्ति सानुजं राममव्ययम्। घेरकर खड़े हो गये ॥ १०७-१११॥ तं पूजयित्वा विधिवत्परिवार्योपतस्थिरे ॥ १११ सब देवता परस्पर कहने लगे- 'देवगण! देखो- रामोऽयं दृश्यतां देवा लक्ष्मणोऽयं व्यवस्थितः। ये श्रीरामचन्द्रजी हैं, ये लक्ष्मणजी खड़े हैं, ये सूर्यनन्दन सुग्रीवो रविपुत्रोऽयं वायुपुत्रोऽयं व्यवस्थितः ॥ ११२ सुग्रीव हैं, ये वायुनन्दन हनुमान्जी खड़े हैं और ये

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अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३३ अङ्गदाद्या इमे सर्वे इत्यूचुस्ते दिवौकसः । गन्धामोदितदिक्चक्रा भ्रमरालिपदानुगा ॥ ११३ देवस्त्रीकरनिर्मुक्ता राममूर्धनि शोभिता । पपात पुष्पवृष्टिस्तु लक्ष्मणस्य च मूर्धनि ॥ ११४ ततो ब्रह्मा समागत्य हंसयानेन राघवम् । अमोघाख्येन स्तोत्रेण स्तुत्वा राममवोचत ॥ ११५ ब्रह्मोवाच त्वं विष्णुरादिर्भूतानामनन्तो ज्ञानदृक्प्रभुः । त्वमेव शाश्वतं ब्रह्म वेदान्ते विदितं परम् ॥ ११६ त्वया यदद्य निहतो रावणो लोकरावणः । तदाशु सर्वलोकानां देवानां कर्म साधितम् ॥ ११७ इत्युक्ते पद्मयोनौ तु शङ्करः प्रीतिमास्थितः । प्रणम्य रामं तस्मै तं भूयो दशरथं नृपम् ॥ ११८ दर्शयित्वा गतो देवः सीता शुद्धेति कीर्तयन्। ततो बाहुबलप्राप्तं विमानं पुष्पकं शुभम् ॥ ११९ पूतामारोप्य सीतां तामादिष्टः पवनात्मजः । ततस्तु जानकीं देवीं विशोकां भूषणान्विताम् ॥ १२० वन्दितां वानरेन्द्रैस्तु सार्धं भ्रात्रा महाबलः । प्रतिष्ठाप्य महादेवं सेतुमध्ये स राघवः ॥ १२१ लब्धवान् परमां भक्तिं शिवे शम्भोरनुग्रहात् । रामेश्वर इति ख्यातो महादेवः पिनाकधृक् ॥ १२२ तस्य दर्शनमात्रेण सर्वहत्यां व्यपोहति । रामस्तीर्णप्रतिज्ञोऽसौ भरतासक्तमानसः ॥ १२३ ततोऽयोध्यां पुरीं दिव्यां गत्वा तस्यां द्विजोत्तमैः । अभिषिक्तो वसिष्ठाद्यैर्भरतेन प्रसादितः । अकरोद्धर्मतो राज्यं चिरं रामः प्रतापवान् ॥ १२४ [दायाँ भाग - हिन्दी अनुवाद] अङ्गद आदि सभी वानर वीर विराजमान हैं।' तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणके मस्तकपर देवाङ्गनाओं-के हाथसे छोड़े गये फूलोंकी वर्षा हुई। उस समय वहाँकी सब दिशाएँ उन दिव्य पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित हो रही थीं और उन पुष्पोंपर भ्रमरगण मँडरा रहे थे॥११२-११४॥ तदनन्तर ब्रह्माजी हंसकी सवारीसे वहाँ आये और 'अमोघ' नामक स्तोत्रसे भगवान् श्रीरामकी स्तुति करके तब उनसे बोले॥११५॥ ब्रह्माजीने कहा—आप समस्त प्राणियोंके आदिकारण, अविनाशी, ज्ञानदृष्टि भगवान् विष्णु हैं; आप ही वेदान्त-विख्यात सनातन परब्रह्म हैं। आपने आज जो सम्पूर्ण लोकोंको रुलानेवाले रावणका वध किया है, इससे समस्त लोकों तथा देवताओंका भी कार्य सद्यः सिद्ध हो गया॥११६-११७॥ ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेके पश्चात् भगवान् शङ्करने भी पहले श्रीरामचन्द्रजीको प्रेमपूर्वक प्रणाम किया। फिर उन्हें राजा दशरथका दर्शन कराया। उसके बाद यह कहकर कि 'श्रीसीताजी निष्कलङ्क और शुद्ध चरित्रवाली हैं'-भगवान् शंकर चले गये॥११८१/२॥ तदनन्तर पवित्रात्मा सीताजीको अपने बाहुबलसे प्राप्त सुन्दर पुष्पकविमानपर चढ़ाकर भगवान्ने हनुमान्जी-को चलनेका आदेश दिया। तब समस्त वानरेन्द्रांद्वारा वन्दित शोकरहित जानकीदेवीको आभूषणोंसे विभूषितकर महाबली रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मणके साथ चले। लौटती बार श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके पुलपर महादेवजीकी स्थापना की और शङ्करजीकी कृपासे उन्होंने उन शिवजीमें परमभक्ति प्राप्त की। वहाँ स्थापित हुए पिनाकधारी महादेवजी 'रामेश्वर' नामसे विख्यात हुए। उनके दर्शनमात्र-से शिवजी सब प्रकारके हत्यादि दोषोंको दूर कर देते हैं॥११९-१२२१/२॥ इस प्रकार प्रतिज्ञा पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी अपना चित्त भरतजीकी ओर लगा रहनेके कारण वहाँसे दिव्यपुरी अयोध्याको गये। फिर भरतजीके मनानेपर श्रीरामचन्द्रजीने वसिष्ठ आदि उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा अपना राज्याभिषेक कराया। तत्पश्चात् प्रतापी भगवान् श्रीरामने चिरकालतक

२३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३

२३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३ यज्ञादिकं कर्म निजं च कृत्वा पौरैस्तु रामो दिवमारुरोह। राजन्मया ते कथितं समास्तो रामस्य भूम्यां चरितं महात्मनः। इदं सुभक्त्या पठतां च शृण्वतां ददाति रामः स्वपदं जगत्पतिः॥ १२५ धर्मपूर्वक राज्य किया तथा राजोचित यागादि कर्मोंका अनुष्ठान करके वे पुरवासियोंके साथ ही स्वर्गलोक (साकेतधाम)-को चले गये। राजन्! पृथ्वीपर महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके किये हुए चरित्रोंका मैंने तुमसे संक्षेपतः वर्णन किया। जो लोग इसको भक्तिपूर्वक पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें जगत्पति भगवान् श्रीराम अपना धाम प्रदान करते हैं॥ १२३-१२५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे द्विपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५२॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें श्रीरामावतारकी कथाविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५२॥ तिरपनवाँ अध्याय बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावद्वयं शुभम्। तृतीयस्य तु रामस्य कृष्णस्य तु समासतः॥ १ पुरा ह्यसुरभारार्ता मही प्राह नृपोत्तम। आसीनं देवमध्ये तु ब्रह्माणं कमलासनम्॥ २ देवासुरे हता ये तु विष्णुना दैत्यदानवाः। ते सर्वे क्षत्रिया जाताः कंसाद्याः कमलोद्भव॥ ३ तद्बूरिभारसम्प्राप्ता सीदन्ती चतुरानन। मम तद्धारहानिः स्याद्यथा देव तथा कुरु॥ ४ तथैवमुक्तो ब्रह्माथ देवैः सह जगाम ह। क्षीरोदस्योत्तरं कूलं विष्णुं भक्तिविबोधितम्॥ ५ तत्र गत्वा जगत्त्रष्टा देवैः सार्धं जनार्दनम्। नरसिंहं महादेवं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ६ अभ्यर्च्य भक्त्या गोविन्दं वाक्पुष्पेण च केशवम्। पूजयामास राजेन्द्र तेन तुष्टो जगत्पतिः॥ ७ मार्कण्डेयजी कहते हैं—अब मैं तीसरे राम (बलराम) और श्रीकृष्णके युगल अवतारोंका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीडित हो देवताओंके मध्यमें विराजमान कमलासन ब्रह्माजीके पास गयी और इस प्रकार बोली॥ १-२॥ 'कमलोद्भव! देवासुर-संग्राममें जो-जो दैत्य और दानव भगवान् विष्णुके हाथसे मारे गये थे, वे सभी कंस आदि क्षत्रियोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। चतुरानन! उनके भारी बोझसे दबकर मैं बहुत दुःखी हो गयी हूँ। देव! मेरा वह भार जैसे भी दूर हो, वह उपाय आप करें'॥ ३-४॥ पृथ्वीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना की जानेपर, कहते हैं, ब्रह्माजी समस्त देवताओंके साथ क्षीरसागरके उत्तर तटपर भगवान् विष्णुके निकट गये। उन्होंने भगवान्‌को अपनी भक्तिके प्रभावसे सोतेसे जगाया था। वहाँ पहुँचकर जगतकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ नरसिंहस्वरूप महान् देवता भगवान् जनार्दनकी गन्ध-पुष्पादिके द्वारा क्रमशः भक्तिपूर्वक पूजा की। फिर वाक्पुष्पसे भी उन गोविन्द-केशवका पूजन किया। राजेन्द्र! इससे वे जगदीश्वर भगवान् विष्णु उनपर बहुत संतुष्ट हुए॥ ५-७॥ राजोवाच वाक्पुष्पेण कथं ब्रह्मन् ब्रह्माप्यर्चितवान् हरिम्। तन्मे कथय विप्रेन्द्र ब्रह्मोक्तं स्तोत्रमुत्तमम्॥ ८ राजा बोले—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुकी वाक्पुष्पसे किस प्रकार पूजा की? विप्रेन्द्र! ब्रह्माजीद्वारा कहे हुए उस उत्तम स्तोत्र (वाक्पुष्प)-को आप मुझे सुनाइये॥ ८॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३५

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३५ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! मैं ब्रह्माजीके मुखसे शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं ब्रह्ममुखेरितम्। निकले हुए उस उत्तम स्तोत्रको कहता हूँ, सुनो! वह सर्वपापहरं पुण्यं विष्णुतुष्टिकरं परम्॥ ९ स्तोत्र समस्त पापोंको हरनेवाला, पवित्र तथा भगवान् विष्णुको अत्यन्त संतुष्ट करनेवाला है। राजन्! ब्रह्माजीने तमाराध्य जगन्नाथमूर्ध्वबाहुः पितामहः। पूर्वोक्त रूपसे भगवान् जगन्नाथकी पूजा करके एकाग्रचित्त भूत्वैकाग्रमना राजन्निदं स्तोत्रमुदीरयत्॥ १० हो इस स्तोत्रका पाठ किया॥ ९-१०॥ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले—मैं सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी भगवान् नमामि देवं नरनाथमच्युतं अच्युतको, सनातन लोकगुरु भगवान् नारायणको नमस्कार नारायणं लोकगुरुं सनातनम्। करता हूँ। जो अनादि, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविनाशी अनादिमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं हैं, उन वेदान्तवेद्य पुरुषोत्तम श्रीहरिको प्रणाम करता हूँ। वेदान्तवेद्यं पुरुषोत्तमं हरिम्॥ ११ जो परमानन्दस्वरूप, परात्पर, ज्ञानमय एवं ज्ञानियोंके परम आश्रय हैं तथा जो सर्वमय, सर्वव्यापक, अद्वितीय आनन्दरूपं परमं परात्परं और सबके ध्येयरूप हैं, उन भगवान् लक्ष्मीपतिको मैं चिदात्मकं ज्ञानवतां परां गतिम्। प्रणाम करता हूँ। जो भक्तोंके प्रेमी, अत्यन्त कमनीय सर्वात्मकं सर्वगतैकरूपं और दोषोंसे रहित हैं, जो समस्त देवताओंके स्वामी हैं, ध्येयस्वरूपं प्रणमामि माधवम्॥ १२ विद्वान् पुरुष जिनकी स्तुति करते हैं, जिनके चार भुजाएँ हैं, नीलकमलके समान जिनकी श्यामल कान्ति है, जो भक्तप्रियं कान्तमतीव निर्मलं हाथमें चक्र धारण किये रहते हैं, उन परमेश्वर केशवको सुराधिपं सूरिजनैरभिष्टुतम् । मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके हाथोंमें गदा, तलवार, शङ्ख चतुर्भुजं नीरजवर्णमीश्वरं और कमल सुशोभित हैं, जो लक्ष्मीजीके पति हैं, सदा रथाङ्गपाणिं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १३ ही कल्याण करनेवाले हैं, जो शार्ङ्गधनुष धारण किये रहते हैं, जिनकी सूर्यके समान कान्ति है, जो पीतवस्त्र गदासिशङ्खाब्जकरं श्रियः पतिं धारण किये रहते हैं, जिनका उदरभाग हारसे विभूषित सदाशिवं शार्ङ्गधरं रविप्रभम्। है तथा जिनके मस्तकपर मुकुट शोभा पा रहा है, उन पीताम्बरं हारविराजितोदरं भगवान् विष्णुको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जिनके नमामि विष्णुं सततं किरीटिनम्॥ १४ कपोलोंपर सुन्दर रक्तवर्ण कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जो अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे गण्डस्थलासक्तसुरक्तकुण्डलं हैं, गन्धर्व और सिद्धगण जिनका सुयश गाते रहते हैं सुदीपिताशेषदिशं निजत्विषा। तथा जिनका वैदिक ऋचाओंद्वारा यशोगान किया जाता गन्धर्वसिद्धैरुपगीतमृग्ध्वनिं है, उन भूतनाथ भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता जनार्दनं भूतपतिं नमामि तम्॥ १५ हूँ। जो भगवान् प्रत्येक युगमें पृथ्वीपर अवतार ले, हत्वासुरान् पाति युगे युगे सुरान् देवद्रोही दानवोंकी हत्या करके अपने धर्ममें स्थित स्वधर्मसंस्थान् भुवि संस्थितो हरिः। देवताओंकी रक्षा करते हैं तथा जो इस जगत्की सृष्टि करोति सृष्टिं जगतः क्षयं य- एवं संहार करते हैं, उन सर्वान्तर्यामी भगवान् केशवको स्त वासुदेवं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १६ मैं प्रणाम करता हूँ॥ ११–१६॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

२३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३

२३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३ यो मत्स्यरूपेण रसातलस्थितान् | जिन्होंने युद्धमें मधु और कैटभ—इन दोनों वेदान् समाहृत्य मम प्रदत्तवान्। | दैत्योंको मारा तथा मत्स्यरूप धारण करके रसातलमें निहत्य युद्धे मधुकैटभावुभौ | पहुँचे हुए वेदोंको लाकर मुझे दिया था, उन वेदवेद्य तं वेदवेद्यं प्रणतोऽस्म्यहं सदा॥ १७ | परमेश्वरको मैं सदा ही प्रणाम करता हूँ। पूर्वकालमें देवासुरैः क्षीरसमुद्रमध्यतो | जिन्होंने देवता और असुरोंद्वारा क्षीरसमुद्रमें डाले हुए न्यस्तो गिरिर्येन धृतः पुरा महान्। | महान् मन्दराचलको सबका हित करनेके लिये हिताय कौर्मं वपुरास्थितो य- | कूर्मरूपसे पीठपर धारण किया था, उन प्रकाश स्तं विष्णुमाद्यं प्रणतोऽस्मि भास्करम्॥ १८ | देनेवाले आदिदेव भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हत्वा हिरण्याक्षमतीव दर्पितं | हूँ। जिन सनातन भगवान्ने वराहरूप धारण करके वराहरूपी भगवान् सनातनः। | इस सम्पूर्ण वसुंधराका जलसे उद्धार किया और उसी यो भूमिमेतां सकलां समुद्धरं- | समय अत्यन्त अभिमानी दैत्य हिरण्याक्षको मार गिराया स्तं वेदमूर्तिं प्रणमामि सूकरम्॥ १९ | था, उन वेदमूर्ति सूकररूपधारी भगवान्को प्रणाम कृत्वा नृसिंहं वपुरात्मनः परं | करता हूँ। जिन सनातन भगवान् श्रीहरिने त्रिलोकीका हिताय लोकस्य सनातनो हरिः | हित करनेके लिये स्वयं ही श्रेष्ठ नृसिंहरूप धारण जघान यस्तीक्ष्णनखैर्दितेः सुतं | करके अपने तीखे नखोंद्वारा दिति-नन्दन हिरण्यकशिपुका तं नारसिंहं पुरुषं नमामि॥ २० | वध किया था, उन परम पुरुष भगवान् नरसिंहको यो वामनोऽसौ भगवाञ्जनार्दनो | मैं प्रणाम करता हूँ। जिन वामनरूपधारी भगवान् बलिं बबन्ध त्रिभिरूर्जितैः पदैः। | जनार्दनने बलिको बाँधा था और अपने बढ़े हुए तीन जगत्त्रयं क्रम्य ददौ पुरंदरे | पगोंसे त्रिभुवनको नापकर उसे इन्द्रको दे दिया था, तदेवमाद्यं प्रणतोऽस्मि वामनम्॥ २१ | उन आदिदेव वामनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने यः कार्तवीर्यं निजघान रोषात् | कोपवश राजा कार्तवीर्यको मार डाला तथा इक्कीस त्रिस्सप्तकृत्वः क्षितिपात्मजानपि। | बार क्षत्रियोंका संहार किया, पृथ्वीका भार दूर तं जामदग्न्यं क्षितिभारनाशकं | करनेवाले परशुरामरूपधारी उन पुरुषोत्तम भगवान् नतोऽस्मि विष्णुं पुरुषोत्तमं सदा ॥ २२ | विष्णुको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने समुद्रमें सेतुं महान्तं जलधौ बबन्ध यः | बहुत बड़ा पुल बाँधा और लङ्कामें पहुँचकर त्रिलोकीकी सम्प्राप्य लङ्कां सगणं दशाननम्। | रक्षाके लिये रावणको उसके गणोंसहित मार डाला जघान भृत्यै जगतां सनातनं | था, उन सनातन पुरुष भगवान् श्रीरामको मैं सदा तं रामदेवं सततं नतोऽस्मि ॥ २३ | प्रणाम करता हूँ। भगवन् ! विष्णो ! जिस प्रकार यथा तु वाराहनृसिंहरूपैः | [पूर्वकालमें] वराह-नृसिंह आदि रूपोंसे आपने कृतं त्वया देव हितं सुराणाम्। | देवताओंका हित किया है, उसी प्रकार आज भी प्रसन्न तथाद्य भूमेः कुरु भारहानिं | होकर पृथ्वीका भार दूर करें। देव! आपको सादर प्रसीद विष्णो भगवन्नमस्ते ॥ २४ | नमस्कार है ॥ १७—२४॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३७

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३७

श्रीमार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो जगन्नाथः श्रीधरः पद्मयोनिना। आविर्बभूव भगवान्शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २५ उवाच च हृषीकेशः पद्मयोनिं सुरानपि। स्तुत्यानयाहं संतुष्टः पितामह दिवौकसः ॥ २६ पठतां पापनाशाय नृणां भक्तिमतामपि । यतोऽस्मि प्रकटीभूतो दुर्लभोऽपि हरिः सुराः ॥ २७ देवैः सेन्द्रैः सरुद्रैस्तु पृथ्व्या च प्रार्थितो ह्यहम्। पद्मयोने वदाद्य त्वं श्रुत्वा तत्करवाणि ते ॥ २८ इत्युक्ते विष्णुना प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः। दैत्यानां गुरुभारेण पीडितेयं मही भृशम् ॥ २९ लघ्वीमिमां कारयितुं त्वयाहं पुरुषोत्तम। तेनागतः सुरैः सार्धं नान्यदस्तीति कारणम् ॥ ३० इत्युक्तो भगवान् प्राह गच्छध्वममराः स्वकम्। स्थानं निरामयाः सर्वे पद्मयोनिस्तु गच्छतु ॥ ३१ देवक्यां वसुदेवाच्च अवतीर्य महीतले। सितकृष्णे च मच्छक्ती कंसादीन् घातयिष्यतः ॥ ३२ इत्याकर्ण्य हरेर्वाक्यं हरिं नत्वा ययुः सुराः। गतेषु त्रिदिवौकःसु देवदेवो जनार्दनः ॥ ३३ शिष्टानां पालनार्थाय दुष्टनिग्रहणाय च। प्रेषयामास ते शक्ती सितकृष्णे स्वके नृप ॥ ३४ तयोः सिता च रोहिण्यां वसुदेवाद्बभूव ह। तद्वत्कृष्णा च देवक्यां वसुदेवाद्बभूव ह॥ ३५ रौहिणेयोऽथ पुण्यात्मा रामनामाश्रितो महान्। देवकीनन्दनः कृष्णस्तयोः कर्म शृणुष्व मे ॥ ३६ गोकुले बालकाले तु राक्षसी शकुनी निशि। रामेण निहता राजन् तथा कृष्णेन पूतना ॥ ३७ धेनुकः सगणास्तालवने रामेण घातितः। शकटश्चार्जुनौ वृक्षौ तद्वत्कृष्णेन घातितौ ॥ ३८


श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर जगत्पति भगवान् लक्ष्मीधर हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये वहाँ प्रकट हुए तथा वे भगवान् हृषीकेश ब्रह्माजी और देवताओंसे बोले—‘पितामह ! देवताओ! मैं तुम्हारी इस स्तुतिसे बहुत ही प्रसन्न हूँ। देवगण ! यह स्तोत्र इसका पाठ करनेवालोंके सारे पाप नष्ट करनेमें समर्थ है। यद्यपि मैं श्रीहरिके रूपमें भक्तिमान् पुरुषोंको भी कठिनतासे ही प्राप्त होता हूँ, तथापि इस स्तोत्रके प्रभावसे मैं प्रत्यक्ष प्रकट हो गया हूँ। ब्रह्माजी ! आज रुद्र और इन्द्रसहित समस्त देवताओं तथा पृथिवीने मेरी प्रार्थना की है, अतः तुम लोग अपना मनोरथ कहो; उसे सुनकर पूर्ण करूँगा' ॥ २५–२८ ॥ भगवान् विष्णुके यों कहनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बोले—'पुरुषोत्तम ! यह पृथ्वी दैत्योंके गुरुतर भारसे अत्यन्त पीडित हो रही है। अतः मैं आपके द्वारा इस वसुधाके भारको उतरवानेके लिये यहाँ देवताओंके साथ आया हूँ। मेरे आनेका दूसरा कोई कारण नहीं है' ॥ २९–३० ॥ यह सुनकर भगवान्ने कहा—'देवगण ! तुम लोग निश्चिन्त होकर अपने-अपने स्थानको लौट जाओ। ब्रह्माजी भी चले जायँ। मेरी गौर और कृष्ण—दो शक्तियाँ पृथ्वीपर वसुदेवजीके वीर्य एवं देवकीके गर्भसे अवतार लेकर कंस आदि असुरोंका वध करेंगी' ॥ ३१–३२ ॥ भगवान्का यह वचन सुनकर सभी देवता उनको प्रणाम करके चले गये। राजन् ! देवताओंके चले जानेपर देवदेव जनार्दनने सज्जनोंकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके लिये अपनी वे गौर-कृष्ण—दो शक्तियाँ भेजीं। उनमेंसे गौर शक्ति वसुदेवद्वारा रोहिणीके गर्भसे प्रकट हुई तथा कृष्ण शक्तिने वसुदेवके अंश एवं देवकीके गर्भसे अवतार लिया। पुण्यात्मा महापुरुष रोहिणीनन्दनने 'राम' नाम धारण किया और देवकीनन्दनका 'श्रीकृष्ण' नाम रखा गया। नरेश्वर ! तुम उन दोनोंके कर्म मुझसे सुनो ॥ ३३–३६ ॥ राजन् ! गोकुलमें रामने बाल्यकालमें ही रात्रिके समय एक पक्षीरूपधारिणी राक्षसीको मारा था और श्रीकृष्णने 'पूतना' का संहार किया था। रामने तालवनमें 'धेनुक' नामक राक्षसको उसके गणोंसहित मारा था और श्रीकृष्णने भी शकट उलट दिया तथा 'यमलार्जुन' नामक दो वृक्षोंको


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२३८ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ५३

२३८ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ५३


[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

प्रलम्बो निधनं नीतो दैत्यो रामेण मुष्टिना। कालियो दमितस्तोये कालिन्द्यां विषपन्नगः ॥ ३९ गोवर्धनश्च कृष्णेन धृतो वर्षति वासवे। गोकुलं रक्षता तेन अरिष्टश्च निपातितः ॥ ४० केशी च निधनं नीतो दुष्टवाजी महासुरः। अक्रूरेण च तौ नीतौ मथुरायां महात्मना ॥ ४१ ददर्श तु निमग्नश्च रामकृष्णौ महामते। स्वं स्वं रूपं जले तस्य अक्रूरस्य विभूतिदम् ॥ ४२ अनयोर्भावमतुलं ज्ञात्वा दृष्ट्वा च यादवाः। बभूवुः प्रीतमनसो ह्यक्रूरश्च नृपात्मज ॥ ४३ दुर्वचश्च प्रजल्पन्तं कंसस्य रजकं ततः। कृष्णो जघान रामश्च तद्वस्त्रं ब्राह्मणे ददौ ॥ ४४ मालाकारेण भक्त्या तु सुमनोभिः प्रपूजितौ। ततस्तस्य वरान्दत्त्वा दुर्लभान् रामकेशवौ ॥ ४५ गच्छन्तौ राजमार्गं तु कुब्जया पूजितौ ततः। तत्कौटिल्यमपानीय विरूपं कार्मुकं ततः ॥ ४६ बभञ्ज कृष्णो बलवान् कंसस्याकृष्य तत्क्षणात्। रक्षपालान् जघानाथ रामस्तत्र खलान् बहून्। हत्वा कुवलयाख्यं च गजं रामजनार्दनौ ॥ ४७ प्रविश्य रङ्गं गजदन्तपाणी मदानुलिप्तौ वसुदेवपुत्रौ। युद्धे तु रामो निजघान म Narc... (मल्लं) शैलोपमं मुष्टिकमव्ययात्मा ॥ ४८ कृष्णोऽपि चाणूरमतिप्रसिद्धं बलेन वीर्येण च कंसमल्लकम्। युध्द्वा तु तेनाथ चिरं जघान तं दैत्यमल्लं जनसंसदीशः ॥ ४९


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

उखाड़ दिया था। रामने 'प्रलम्ब' नामक राक्षसको मुक्केसे मारकर मौतके घाट उतारा तथा श्रीकृष्णने यमुनाके जलमें रहनेवाले विषैले सर्प 'कालिय' का दमन किया और इन्द्रके वर्षा करते समय वे सात दिनोंतक हाथपर गोवर्धनपर्वत धारण किये खड़े रहे। इतना ही नहीं, श्रीकृष्णने गोकुलकी रक्षा करते हुए अरिष्टासुरका भी वध किया था। फिर दुष्ट घोड़ेका रूप धारण करनेवाले महान् असुर केशीका उन्होंने संहार किया; इसके बाद महात्मा अक्रूरजी [कंसकी आज्ञासे] आये तथा राम और कृष्ण—दोनों बन्धुओंको मथुरा ले गये। महामते! मार्गमें अक्रूरजीने यमुनामें डुबकी लगाते समय जलके भीतर राम और कृष्ण—दोनोंको देखा। उन दोनों बन्धुओंने अक्रूरजीको अपने-अपने ऐश्वर्यदायक स्वरूपका दर्शन कराया। नृपनन्दन! उन दोनोंके अनुपम स्वरूपको देख और जानकर अक्रूरजीके साथ ही समस्त यादवगण बहुत ही प्रसन्न हुए॥ ३७-४३॥

तत्पश्चात् [मथुरामें भ्रमण करते समय] कटुवचन कहनेवाले कंसके एक धोबीको कृष्ण और रामने मार डाला तथा उसके वस्त्र ब्राह्मणोंको बाँट दिये। फिर मार्गमें एक मालीने फूलोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। तब राम और श्रीकृष्णने उसे दुर्लभ वर दिये। उसके बाद जब वे सड़कपर घूम रहे थे, उसी समय 'कुब्जा' दासीने आकर उनका आदर-सत्कार किया। तब श्रीकृष्णने उसकी भद्दी लगनेवाली कुब्जताको दूर कर दिया। तदनन्तर [यज्ञशालामें रखे गये] कंसके धनुषको महाबली श्रीकृष्णने [बलपूर्वक] खींचा और तत्काल ही तोड़ डाला। उस समय वहाँके अनेकों दुष्ट रक्षकोंको बलरामजीने मार डाला। फिर बलराम और श्रीकृष्ण—दोनोंने मिलकर 'कुवलयापीड' नामक हाथीको भी मार गिराया ॥ ४४–४७ ॥

तदनन्तर उन दोनों वसुदेवकुमारोंने हाथीके दाँत उखाड़कर हाथमें ले लिये और उसके मदसे सने हुए ही रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। वहाँ अविनाशी बलरामजीने पर्वताकार 'मुष्टिक' नामक पहलवानको कुश्तीमें मार डाला और श्रीकृष्णचन्द्रने भी कंसके 'चाणूर' नामक


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अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३९

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३९ मृतस्य मल्लस्य च मुष्टिकस्य पहलवानका, जो अपने बल और पराक्रमके कारण मित्रं पुनः पुष्करकं स रामः। बहुत ही प्रसिद्ध था, कचूमर निकाल दिया। भगवान् युद्धार्थमुत्थाय कृतक्षणं तं श्रीकृष्णने उस जन-समाजमें दैत्य मल्ल चाणूरके साथ मुष्टिप्रहारेण जघान वीरः॥५० देरतक युद्ध करनेके बाद उसका वध किया था। फिर वीरवर बलरामजीने युद्धके लिये उत्साहपूर्वक उठे हुए कृष्णः पुनस्तान् सकलान्निहत्य पुष्करको, जो 'मृत मुष्टिक' नामक मल्लका मित्र था, निगृह्य कंसं विनिपात्य भूमौ। मुक्केसे ही मार डाला। इसके बाद श्रीकृष्णने वहाँ स्वयं च देहे विनिपत्य तस्य उपस्थित समस्त दैत्योंका संहार करके कंसको पकड़ हत्वा तथोर्व्यां निचकर्ष कृष्णः॥५१ लिया और उसे मञ्चके नीचे भूमिपर पटककर वे स्वयं भी उसके शरीरपर कूद पड़े। इस प्रकार कंसका वध हते तु कंसे हरिणातिक्रुद्धो करके श्रीकृष्णने उसके मृत देहको भूमिपर घसीटा। भ्रातापि तस्यातिरुषेण चोत्थितः। श्रीकृष्णद्वारा कंसके मारे जानेपर उसका बलवान् एवं सुनाभसंज्ञो बलवीर्ययुक्तो पराक्रमी भ्राता सुनाभ अत्यन्त क्रोधपूर्वक युद्धके लिये रामेण नीतो यमसादनं क्षणात्॥५२ उठा; किंतु उसे भी बलरामजीने तुरंत ही मारकर यमलोक भेज दिया॥४८-५२॥ तौ वन्द्य मातापितरौ सुहृष्टौ तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंसे घिरे हुए उन दोनों जनैः समस्तैर्यदुभिः सुसंवृतौ। भाइयोंने अत्यन्त प्रसन्न हुए माता-पिताकी वन्दना करके कृत्वा नृपं चोग्रसेनं यदूनां श्रीउग्रसेनको ही यदुवंशियोंका राजा बनाया और उन्हें सभां सुधर्मां ददतुर्महेन्द्रीम्॥५३ इन्द्रकी 'सुधर्मा' नामक दिव्य सभा प्रदान की॥५३॥ सर्वज्ञभावावपि रामकृष्णौ यद्यपि बलराम और श्रीकृष्ण सर्वज्ञ थे, तो भी सम्प्राप्य सांदीपनितोऽस्त्रविद्याम्। उन्होंने सांदीपनिसे अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पायी। फिर गुरोः कृते पञ्चजनं निहत्य गुरुको दक्षिणा देनेके लिये उद्यत हो, 'पञ्चजन' दैत्यको यमं च जित्वा गुरवे सुतं ददौ॥५४ मारा और यमराजको जीतकर वे दीर्घकालके मरे हुए गुरुपुत्रको वहाँसे ले आये। वही पुत्र उन्होंने गुरुजीको निहत्य रामो मगधेश्वरस्य दक्षिणाके रूपमें अर्पित किया॥५४॥ बलं समस्तं बहुशः समागतम्। फिर बलरामजीने अपने ऊपर अनेकों बार चढ़ाई दिव्यास्त्रपूरैरमराविमावुभौ करनेवाले मगधराज जरासंधके समस्त सैनिकोंको शुभां पुरीं चक्रतुः सागरान्ते॥५५ दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करके मार डाला। इसके बाद उन दोनों देवेश्वरोंने समुद्रके भीतर एक सुन्दर पुरी द्वारकाका तस्यां विधायाथ जनस्य वासं निर्माण कराया। उसमें मथुरावासी कुटुम्बीजनोंको बसाकर हत्वा शृगालं हरिरव्ययात्मा। अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने राजा शृगालका वध दग्ध्वा महान्तं यवनं ह्युपाया- किया। फिर एक उपाय करके महान् योद्धा यवनराजको द्दूरं च दत्त्वा नृपतेर्जगाम॥५६ भस्म कर, राजा मुचुकुन्दको वरदान दे, वे द्वारकामें लौट गये॥५५-५६॥ रामोऽथ संशान्तसमस्तविग्रहः तत्पश्चात् सारा बखेड़ा समाप्त हो जानेपर सम्प्राप्य नन्दस्य पुनः स गोकुलम्। बलरामजी एक बार फिर नन्दके गोकुल (नन्दगाँव)- वृन्दावने गोपजनैः सुभाषितः में गये और वहाँ वृन्दावनमें गोपजनोंसे भलीभाँति सीरेण रामो यमुनां चकर्ष॥५७ प्रेमालाप आदिके द्वारा सम्मानित हुए। वहाँ उन्होंने अपने हलसे यमुनाजीका आकर्षण किया था। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३

२४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३


[संस्कृत श्लोक]

सम्प्राप्य भार्यामथ रेवतीं च रेमे तया द्वारवतीं स लाङ्गली। क्षात्रेण सम्प्राप्य तदा स रुक्मिणीं कृष्णोऽपि रेमे पुरुषः पुराणः॥ ५८

द्यूते कलिङ्गराजस्य दन्तानुत्पाट्य लाङ्गली। जघानाष्टपदेनैव रुक्मिणं चानृतान्वितम्॥ ५९

कृष्णः प्राग्ज्योतिषो दैत्यान् हयग्रीवादिकान् बहून्। हत्वा तु नरकं चापि जग्राह च महद्धनम्॥ ६०

अदित्यै कुण्डले दत्त्वा जित्वेन्द्रं दैवतैः सह। गृहीत्वा पारिजातं तु ततो द्वारावतीं पुरीम्॥ ६१

कुरुभिश्च धृतं साम्बं राम एको महाबलः। कुरूणां भयमुत्पाद्य मोचयामास वीर्यवान्॥ ६२

बाणबाहुवनं छिन्नं कृष्णेन युधि धीमता। रामेण तद्बलं नीतं क्षयं कोटिगुणं क्षणात्॥ ६३

देवापकारी रामेण निहतो वानरो महान्। ततोऽर्जुनस्य साहाय्यं कुर्वता कंसशत्रुणा॥ ६४

सर्वभूतवधाद्राजन् भुवो भारोऽवरोपितः। तीर्थयात्रा कृता तद्वद्रामेण जगतः कृते॥ ६५

रामेण निहता ये तु तान्न संख्यातुमुत्सहे। एवं तौ रामकृष्णौ तु कृत्वा दुष्टवधं नृप॥ ६६

अवतार्य भुवो भारं जग्मतुः स्वेच्छया दिवम्। इत्येतौ कथितौ दिव्यौ प्रादुर्भावौ मया तव। संक्षेपाद्रामकृष्णस्य काल्क्यं शृणु ममाधुना॥ ६७

इत्थं हि शक्ती सितकृष्णरूपे हरेरनन्तस्य महाबलाढ्ये। कृत्वा तु भूमेर्नृप भारहानिं पुनश्च विष्णुं प्रतिजग्मतुस्ते॥ ६८


[हिन्दी अनुवाद]

तदनन्तर द्वारकामें 'रेवती' नामकी भार्याको पाकर बलरामजी उनके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और पुराणपुरुष श्रीकृष्णचन्द्र भी क्षत्रियधर्मके अनुसार 'रुक्मिणी' नामक भार्याको हस्तगत करके उसके साथ सानन्द विहार करने लगे। तदनन्तर एक बार जूआ खेलते समय हलधरने कलिङ्गराजके दाँतोंको उखाड़ लिया और असत्यका आश्रय लेनेवाले रुक्मीको भी पासेसे ही मार गिराया। इसी प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रने भी प्राग्ज्योतिषपुरके हयग्रीव आदि बहुत-से दैत्योंको यमलोक पहुँचाया तथा नरकासुरका भी संहार करके वे उसके यहाँसे बहुत धन ले आये। वहाँसे श्रीकृष्ण इन्द्रलोकमें गये। वहाँ उन्होंने अदितिको उनके वे दोनों दिव्य कुण्डल दिये, जो नरकासुरने हड़प लिये थे। फिर देवताओंसहित इन्द्रको जीतकर पारिजात वृक्ष साथ ले, वे अपनी पुरी द्वारकाको लौट आये॥ ५७-६१॥

तदनन्तर महाबली एवं महापराक्रमी बलरामजीने अकेले ही हस्तिनापुरमें जा कौरवोंको भय दिखाया और उनके द्वारा बंदी बनाये गये [श्रीकृष्णपुत्र] साम्बको छुड़ाया। फिर बुद्धिमान् श्रीकृष्णचन्द्रने युद्धमें बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला और बलरामजीने उसके करोड़ों सैनिकोंका क्षणभरमें ही संहार कर दिया। इसके बाद बलरामजीने देववैरी 'द्विविद' नामक महान् वानरका वध किया। इसी तरह भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी सहायता करके उनके द्वारा समस्त दुष्ट क्षत्रियोंका वध कराया और पृथ्वीका सारा भार उतार दिया। उन दिनों बलरामजी लोकहितके लिये तीर्थयात्रा कर रहे थे॥ ६२-६५॥

राजन्! बलराम और श्रीकृष्णचन्द्रने जितने दुष्टोंका वध किया था, उनकी गणना हम नहीं कर सकते। इस प्रकार दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने दुष्टोंका संहार करके भूमिकका भार दूर किया। फिर वे स्वेच्छानुसार वैकुण्ठधामको पधार गये। इस तरह राम और श्रीकृष्णके इन दिव्य अवतारोंको मैंने तुम्हें संक्षेपसे कह सुनाया। अब मुझसे 'कल्कि-अवतार' का वर्णन सुनो। नरेश्वर! इस प्रकार अनन्त भगवान् विष्णुकी वे दोनों महाबलवती गौर और कृष्ण शक्तियाँ पृथ्वीका भार उतारकर पुनः अपने विष्णुस्वरूपमें लीन हो गयीं॥ ६६-६८॥


इति श्रीनरसिंहपुराणे कृष्णप्रादुर्भावो नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४१

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४१ चौवनवाँ अध्याय कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म

मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु राजन् समाहितः। प्रादुर्भावं हरेः पुण्यं कल्क्याख्यं पापनाशनम्॥ १ कलिकालने राजेन्द्र नष्टे धर्मे महीतले। वृद्धिंगते तथा पापे व्याधिसम्पीडिते जने॥ २ देवैःसम्प्रार्थितो विष्णुः क्षीराब्धौ स्तुतिपूर्वकम्। साम्भलाख्ये महाग्रामे नानाजनसमाकुले॥ ३ नाम्ना विष्णुयशःपुत्रः कल्की राजा भविष्यति। अश्वमारुह्य खड्गेन म्लेच्छानुत्सादयिष्यति॥ ४ म्लेच्छान् समस्तान् क्षितिनाशभूतान् हत्वा स कल्की पुरुषोत्तमांशः। कृत्वा च यागं बहुकाञ्चनाख्यं संस्थाप्य धर्मे दिवमारुरोह॥ ५ दशावताराः कथितास्तवैव हरेर्मया पार्थिव पापहन्तुः। इमं सदा यस्तु नृसिंहभक्तः शृणोति नित्यं स तु याति विष्णुम्॥ ६

मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! इसके बाद मैं तुमसे भगवान् विष्णुके ‘कल्कि’ नामक पावन अवतारका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है; तुम सावधान होकर सुनो। राजेन्द्र! जब कलिकालद्वारा पृथ्वीपर धर्मका नाश हो जायगा, पाप बढ़ जायगा और सभी लोग नाना प्रकारके रोगोंसे पीड़ित होने लगेंगे, तब देवतालोग क्षीरसागरके तटपर जाकर वहाँ भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए उनसे प्रार्थना करेंगे। तदनन्तर भगवान् ‘साम्भल’ नामक महान् ग्राममें, जो बहुसंख्यक मनुष्योंसे परिपूर्ण होगा, विष्णुयशाके पुत्ररूपसे अवतार ले, ‘कल्कि’ नामसे विख्यात राजा होंगे। फिर वे घोड़ेपर चढ़कर, हाथमें तलवार ले, म्लेच्छोंका नाश करेंगे। इस प्रकार भगवान् विष्णुके अंशभूत ‘कल्कि’ भूमण्डलका ध्वंस करनेवाले समस्त म्लेच्छोंका संहार कर, ‘बहुकाञ्चन’ नामक यज्ञ करके, धर्मकी स्थापना कर स्वर्गारूढ हो जायँगे। राजेन्द्र! पापोंका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुके इन दस अवतारोंका मैंने वर्णन किया। जो भगवद्भक्त पुरुष इन अवतार-चरित्रोंका नित्य श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है॥ १-६॥

राजोवाच तव प्रसादाद्विप्रेन्द्र प्रादुर्भावाः श्रुता मया। नारायणस्य देवस्य शृण्वतां कल्मषापहाः॥ ७ कलिं विस्तरतो ब्रूहि त्वं हि सर्वविदां वरः। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च मुनिसत्तम॥ ८ किमाहाराः किमाचारा भविष्यन्ति कलौ युगे।

राजा बोले—विप्रेन्द्र! आपके प्रसादसे मैंने भगवान् नारायणके अवतारोंका, जो श्रोताओंके पापोंका नाश करनेवाले हैं, श्रवण कर लिया। मुनिसत्तम! अब आप कलिको विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आप सर्वज्ञ महात्माओंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। कृपया बताइये कि कलियुगमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कैसे आहार और आचरणवाले होंगे॥ ७-८१/२॥

सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे भरद्वाजेन संयुताः॥ ९ सर्वे धर्मा विनश्यन्ति कृष्णे कृष्णत्वमागते। तस्मात् कलिर्महाघोरः सर्वपापस्य साधकः॥ १०

सूतजी बोले—भरद्वाजसहित आप सभी ऋषिगण सुनें। राजाके यों प्रेरणा करनेपर मार्कण्डेयजीने कलि-धर्मका इस प्रकार निरूपण किया। भगवान् कृष्णचन्द्रके परमधाम पधार जानेपर उनके अन्तर्धानके फलस्वरूप समस्त पापोंका साधक महाघोर कलियुग प्रकट होगा;

२४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४

२४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४ [संस्कृत मूल पाठ] ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः। घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजदेवपराङ्मुखाः॥ ११ व्याजधर्मरताः सर्वे दम्भाचारपरायणाः। असूयानिरताश्चैव वृथाहंकारदूषिताः॥ १२ सर्वैः संक्षिप्यते सत्यं नरैः पण्डितगर्वितैः। अहमेवाधिक इति सर्व एव वदन्ति वै॥ १३ अधर्मलोलुपाः सर्वे तथान्येषां च निन्दकाः। अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे॥ १४ अल्पायुष्ट्वान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विजाः। विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः॥ १५ ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यन्ते परस्परम्। कामक्रोधपरा मूढा वृथा संतापपीडिताः॥ १६ बद्धवैरा भविष्यन्ति परस्परवधेप्सवः। ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्याः सर्वे धर्मपराङ्मुखाः॥ १७ शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः। उत्तमा नीचतां यान्ति नीचाश्चोत्तमतां तथा॥ १८ राजानो द्रव्यनिरतास्तथा लोभपरायणाः। धर्मकञ्चुकसंवीता धर्मविध्वंसकारिणः॥ १९ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वाधर्मसमन्विते। यो योऽश्वरथनागाढ्यः स स राजा भविष्यति॥ २० पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वःश्वश्रूश्च कर्मसु। पतीन्पुत्रान्वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः॥ २१ पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं श्वबाहुल्यं गवां क्षयः। धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तमपूजितम्। खण्डवर्षी च पर्जन्यः पन्थानस्तस्करावृताः। सर्वः सर्वं च जानाति वृद्धाननुपसेव्य च॥ २२ न कश्चिदकविर्नाम सुरापा ब्रह्मवादिनः। किंकराश्च भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः॥ २३ [हिन्दी अनुवाद] उस समय सभी धर्म नष्ट हो जायँगे। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी लोग धर्म, ब्राह्मण तथा देवताओंसे विमुख हो जायँगे। सभी किसी-न-किसी व्याजसे (स्वार्थसिद्धिके लिये) ही धर्ममें प्रवृत्त होंगे; दम्भ—ढोंगका आचरण करेंगे। एक- दूसरेमें दोष ढूँढ़नेवाले और व्यर्थ अभिमानसे दूषित विचारवाले होंगे। पाण्डित्यका गर्व रखनेवाले सभी मनुष्य सत्यका अपलाप करेंगे और सब लोग यही कहेंगे कि 'मैं ही सबसे बड़ा हूँ'। कलियुगमें सभी अधर्मलोलुप तथा दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे, अतः सबकी आयु बहुत थोड़ी होगी। द्विजगण! मनुष्योंकी आयु अल्प होनेसे ब्राह्मणलोग अधिक विद्याध्ययन नहीं कर सकेंगे। विद्याध्ययनसे शून्य होनेके कारण उनके द्वारा पुनः अधर्मकी ही प्रवृत्ति होगी॥ ९—१५॥ ब्राह्मण आदि वर्णोंमें परस्पर संकरता आ जायगी। वे कामी, क्रोधी, मूर्ख और व्यर्थ संतापसे पीड़ित होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपसमें वैर बाँधकर एक- दूसरेका वध कर देनेकी इच्छावाले होंगे। वे सभी अपने- अपने धर्मसे विमुख होंगे। तप एवं सत्यभाषणादिसे रहित होकर शूद्रके समान हो जायँगे। उत्तम वर्णवाले नीचे गिरेंगे और नीच वर्णवाले उत्तम बनेंगे। राजालोग लोभी तथा केवल धनोपार्जनमें ही प्रवृत्त रहेंगे। वे धर्मका चोला पहनकर उसीकी ओटमें धर्मका विध्वंस करनेवाले होंगे। समस्त अधर्मोंसे युक्त घोर कलियुगके आ जानेपर जो- जो घोड़े, रथ और हाथीसे सम्पन्न होंगे, वे-वे ही राजा कहे जायँगे। पुत्र अपने पितासे काम करायेंगे और बहुएँ साससे काम लेंगी। स्त्रियाँ पति और पुत्रको धोखा देकर अन्य पुरुषोंके पास जाया करेंगी॥ १६—२१॥ पुरुषोंकी संख्या कम और स्त्रियोंकी अधिक होगी। कुत्तोंकी अधिकता होगी और गौओंका ह्रास। सबके मनमें धनका ही महत्त्व रहेगा। सत्पुरुषोंके सदाचारका सम्मान नहीं होगा। मेघ कहीं वर्षा करेंगे, कहीं नहीं करेंगे। समस्त मार्ग चोरोंसे घिरे रहेंगे। गुरुजनोंकी सेवामें रहे बिना ही सभी लोग सब कुछ जाननेका अभिमान करेंगे। कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि न मानता हो। शराब पीनेवाले लोग ब्रह्मज्ञानका उपदेश करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४३

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४३

द्विषन्ति पितरं पुत्रा गुरुं शिष्या द्विषन्ति च। | और वैश्य शूद्रोंके सेवक होंगे। घोर कलिकाल आनेपर पतिं च वनिता द्वेष्टि कलौ घोरे समागते ॥ २४ | पुत्र पितासे, शिष्य गुरुसे और स्त्रियाँ अपने पतियोंसे लोभाभिभूतमनसः सर्वे दुष्कर्मशीलिनः। | द्वेष करेंगी। सबका चित्त लोभसे आक्रान्त होगा, अतएव परान्नलोलुपा नित्यं भविष्यन्ति द्विजातयः ॥ २५ | सभी लोग दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त होंगे। ब्राह्मण सदा दूसरोंके परस्त्रीनिरताः सर्वे परद्रव्यपरायणाः। | ही अन्नके लोभी होंगे। सभी परस्त्रीसेवी और परधनका घोरे कलियुगे प्राप्ते नरं धर्मपरायणम् ॥ २६ | अपहरण करनेवाले होंगे। घोर कलियुग आ जानेपर असूयानिरताः सर्वे उपहासं प्रकुर्वते । | दूसरोंमें दोषदृष्टि रखनेवाले सभी लोग धर्मपरायण पुरुषोंका न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः ॥ २७ | उपहास करेंगे। ब्राह्मणलोग वेदकी निन्दामें प्रवृत्त होकर न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादैर्विकुत्सिताः। | व्रतोंका आचरण नहीं करेंगे। तर्कवादसे कुत्सित विचार द्विजाः कुर्वन्ति दम्भार्थं पितृयज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २८ | हो जानेके कारण वे न तो यज्ञ करेंगे और न हवनमें न पात्रेष्वेव दानानि कुर्वन्ति च नरास्तथा। | ही प्रवृत्त होंगे। द्विजलोग दम्भके लिये ही पितृयज्ञ आदि क्षीरोपाधिनिमित्तेन गोषु प्रीतिं प्रकुर्वते ॥ २९ | क्रियाएँ करेंगे। मनुष्य प्रायः सत्पात्रको दान नहीं देंगे। बध्नन्ति च द्विजानेव धनार्थं राजकिंकराः। | लोग दूध आदिके लिये ही गौओंमें प्रेम रखेंगे। राजाके दानयज्ञजपादीनां विक्रीणन्ते फलं द्विजाः ॥ ३० | सिपाही धनके लिये ब्राह्मणोंको ही बाँधेंगे। द्विजलोग प्रतिग्रहं प्रकुर्वन्ति चण्डालादेरपि द्विजाः। | दान, यज्ञ और जप आदिका फल प्रायः बेचा करेंगे। कलेः प्रथमपादेऽपि विनिन्दन्ति हरिं नराः ॥ ३१ | ब्राह्मणलोग चण्डाल आदि अस्पृश्य जातियोंसे भी दान युगान्ते च हरेर्नाम नैव कश्चित् स्मरिष्यति। | लेंगे। कलियुगके प्रथम चरणमें भी लोग भगवान्‌की शूद्रस्त्रीसङ्गनिरता विधवाप्रंगलोलुपाः ॥ ३२ | निन्दा करनेवाले हो जायेंगे॥ २२—३१॥ शूद्रान्नभोगनिरता भविष्यन्ति कलौ द्विजाः। | न च द्विजातिशुश्रूषां न स्वधर्मप्रवर्त्तनम् ॥ ३३ | कलियुगके अन्तिम समयमें तो कोई भगवान्‌के करिष्यन्ति तदा शूद्राः प्रव्रज्यालिङ्गिनोऽधमाः । | नामका स्मरणतक न करेगा। कलियुगके द्विज शूद्रोंकी सुखाय परिवीताश्च जटिला भस्मधूर्धराः ॥ ३४ | स्त्रियोंके साथ सहवास करेंगे और विधवा-संगमके शूद्रा धर्मान् प्रवक्ष्यन्ति कूटबुद्धिविशारदाः । | लिये लालायित रहेंगे तथा वे शूद्रोंका भी अन्न भक्षण एते चान्ये च बहवः पाषण्डा विप्रसत्तमाः ॥ ३५ | करनेवाले होंगे। उस समय अधम शूद्र संन्यासका चिह्न ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या भविष्यन्ति कलौ युगे । | धारणकर न तो द्विजातियोंकी सेवा करेंगे और न उनकी गीतवाद्यरता विप्रा वेदवादपराङ्मुखाः ॥ ३६ | स्वधर्ममें ही प्रवृत्ति होगी। वे अपने सुखके लिये जनेऊ भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते शूद्रमार्गप्रवर्तिनः । | पहनेंगे, जटा रखायेंगे और शरीरमें खाक-भभूत लपेटे अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा वृथाहंकारदूषिताः ॥ ३७ | फिरेंगे। विप्रवरो! कूटबुद्धिमें निपुण शूद्रगण धर्मका हर्त्तारो न च दातारो भविष्यन्ति कलौ युगे । | उपदेश करेंगे। ऊपर कहे अनुसार तथा और भी तरहके प्रतिग्रहपरा नित्यं द्विजाः सन्मार्गशीलिनः ॥ ३८ | बहुत-से पाखण्डी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कलियुगमें आत्मस्तुतिपराः सर्वे परनिन्दापरास्तथा । | उत्पन्न होंगे। कलियुग आनेपर विप्रगण वेदके स्वाध्यायसे विश्वासहीनाः पुरुषा देववेदद्विजातिषु ॥ ३९ | विमुख हो गाने-बजानेमें मन लगायेंगे और शूद्रोंके | मार्गका अनुसरण करेंगे। कलियुगमें लोग थोड़े धनवाले, | झूठा वेष धारण करनेवाले और मिथ्याभिमानसे दूषित | होंगे। वे दूसरोंका धन हरण कर लेंगे, पर अपना | किसीको नहीं देंगे। उस समय अच्छे पथपर चलनेवाले | ब्राह्मण सदा दान लेते फिरेंगे। सभी लोग आत्मप्रशंसक | और दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे। देवता, वेद और | ब्राह्मणोंपरसे सबका विश्वास उठ जायगा॥ ३२-३९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४

Here is the complete transcribed text from the image, preserving the original Devanagari text, verses, and column layout:

२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४ असंश्रुतोक्तिवक्तारो द्विजद्वेषरतास्तथा। स्वधर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥ ४० याचकाः पिशुनाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे। पDefaultापवादनिरता आत्मस्तुतिपरायणाः ॥ ४१ परस्वहरणोपायचिन्तकाः सर्वदा जनाः। अत्याह्लादपरास्तत्र भुञ्जानाः परवेश्मनि ॥ ४२ तस्मिन्नेव दिने प्रायो देवतार्चनतत्पराः। तत्रैव निन्दानिरता भुक्त्वा चैकत्र संस्थिताः ॥ ४३ द्विजाश्च क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जातयः। अत्यन्तकामिनश्चैव संकीर्यन्ते परस्परम् ॥ ४४ न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा। न भार्या न पतिश्चैव भविता तत्र संकरे ॥ ४५ शूद्रवृत्त्यैव जीवन्ति द्विजा नरकभोगिनः। अनावृष्टिभयप्राया गगनासक्तदृष्टयः ॥ ४६ भविष्यन्ति जनाः सर्वे तदा क्षुद्भयकातराः। अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान् गृह्णन्ति भिक्षवः ॥ ४७ उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः। कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञा भेत्स्यन्ति ता हिताः ॥ ४८ यदा यदा न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति द्विजातयः। तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥ ४९ सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत्। सूत उवाच एवं कलेः स्वरूपं तत्कथितं विप्रसत्तमाः ॥ ५० हरिभक्तिपरानेव न कलिर्बाधते द्विजाः। तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव हि ॥ ५१


(Right Column Translation / व्याख्या)

सब लोग वेदविरुद्ध वचन बोलनेवाले और ब्राह्मणोंके द्वेषी होंगे। सभी स्वधर्मके त्यागनेवाले, कृतघ्न और अपने वर्णधर्मके विरुद्ध वृत्तिसे आजीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें लोग भिखमंगे, चुगलखोर, दूसरोंकी निन्दा करनेवाले और अपनी ही प्रशंसामें तत्पर होंगे। मनुष्य सदा दूसरोंके धनका अपहरण करनेके उपायको ही सोचते रहेंगे। यदि उन्हें दूसरोंके घरमें भोजन करनेका अवसर मिल जाय तो वे बड़े ही आनन्दित होंगे और प्रायः उसी दिन वे दूसरोंको दिखानेके लिये देवताकी पूजामें प्रवृत्त होंगे। दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहनेवाले वे ब्राह्मण वहाँ ही सबके साथ एक आसनपर बैठकर भोजन करेंगे ॥ ४०-४३ ॥ उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-सभी जातियोंके लोग अत्यन्त कामी होंगे और एक-दूसरेसे सम्पर्क स्थापित करके वर्ण-संकर हो जायँगे। वर्ण-संकरताकी दशामें गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र और पति-पत्नीका विचार नहीं रहेगा। नरकभोगी ब्राह्मणादि वर्ण प्रायः शूद्रवृत्तिसे ही जीविका चलायेंगे और नरकभोगी होंगे। लोगोंको प्रायः सदा अनावृष्टिका भय बना रहेगा और वे सदा आकाशकी ओर दृष्टि लगाये वृष्टिकी ही प्रतीक्षा करते रहेंगे। उस समयके सभी लोग सदा भूखकी पीड़ासे कातर रहेंगे। संन्यासी लोग अन्न-प्राप्तिके उद्देश्यसे ही लोगोंको शिष्य बनाते फिरेंगे। स्त्रियाँ दोनों ही हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने पति तथा गुरुजनोंकी हितभरी आज्ञाओंका तिरस्कार करेंगी। द्विजातिलोग ज्यों-ज्यों यज्ञ और हवन आदि कर्म छोड़ते जायँगे, त्यों-ही-त्यों बुद्धिमानोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये। उस समय सम्पूर्ण धर्मोंके नष्ट हो जानेसे यह सारा जगत् श्रीहीन हो जायगा ॥ ४४-४९¹/₂ ॥ सूतजी कहते हैं- विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कलियुगके स्वरूपका वर्णन किया। द्विजगण! जो लोग भगवान्‌के भजनमें तत्पर रहेंगे, उन्हींको कलियुग बाधा नहीं दे सकता। सत्ययुगमें तपस्या प्रधान है और त्रेतामें ध्यान।

अध्याय ५५ ] शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति २४५

द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे। यतते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्॥ ५२ द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ। ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ॥ ५३ यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्। समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् ॥ ५४ घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन् न सीदति। अहोऽतीव महाभाग्याः सकृच्चे केशवार्चकाः ॥ ५५ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वकर्मबहिष्कृते। न्यूनातिरिक्कता न स्यात्कलौ वेदोक्तकर्मणाम् ॥ ५६ हरिस्मरणमेवात्र सम्पूर्णफलदायकम्। हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय ॥ ५७ जनार्दन जगद्धाम पीताम्बरधराच्युत। इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलिः ॥ ५८ अहो हरिपरा ये तु कलौ सर्वभयंकरे। ते सभा्ग्या महात्मानस्तत्सङ्गतिरता अपि ॥ ५९ हरिनामपरा ये च हरिकीर्तनतत्पराः। हरिपूजारता ये च ते कृतार्था न संशयः ॥ ६० इत्येतद्वः समाख्यातं सर्वदुःखनिवारणम्। समस्तपुण्यफलदं कलौ विष्णोः प्रकीर्तनम् ॥ ६१

द्वापरमें यज्ञको महान् बताया गया है और कलियुगमें एकमात्र दानको। सत्ययुगमें दस वर्षोंतक तप आदिके लिये प्रयत्न करनेसे जो फल मिलता है, वही त्रेतायुगमें एक ही वर्षके प्रयत्नसे सिद्ध होता है, द्वापरमें एक ही मासकी साधनासे सुलभ होता है और कलियुगमें केवल एक दिन-रात यत्न करनेसे प्राप्त हो जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे, जो फल मिलता है, उसे ही कलियुगमें केवल भगवान्‌का कीर्तन करनेसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समस्त जगत्‌के आधारभूत परमार्थस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करनेवाले मनुष्यको कलिसे बाधा नहीं पहुँचती। अहो! जिन्होंने एक बार भी भगवान् विष्णुका पूजन किया है, वे बड़े सौभाग्यशाली हैं॥ ५०–५५॥ सम्पूर्ण कर्मोंका बहिष्कार करनेवाले कलियुगके प्राप्त होनेपर किये जानेवाले वेदोक्त कर्मोंमें न्यूनता या अधिकताका दोष नहीं होता। उसमें भगवान्‌का स्मरण ही पूर्ण फलदायक होता है। जो लोग हरे, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय, जनार्दन, जगद्धाम, पीताम्बरधर, अच्युत इत्यादि नामोंका उच्चारण करते रहते हैं, उन्हें कलियुग कभी बाधा नहीं पहुँचाता। अहो! सबको भय देनेवाले इस कलिकालमें जो लोग भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हैं, अथवा जो उनके आराधकोंका संग ही करते हैं, वे महात्माजन बड़े ही भाग्यशाली हैं। जो हरिनामका जप करते हैं, हरिकीर्तनमें लगे रहते हैं और सदा हरिकी पूजा ही किया करते हैं, वे मनुष्य कृतकृत्य हो गये हैं—इसमें संदेह नहीं है। इस प्रकार यह कलिका वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। कलियुगमें भगवान् विष्णुका नामकीर्तन समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण पुण्यफलोंको देनेवाला है॥ ५६–६१॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे कलिलक्षणकीर्तनं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'कलियुगके लक्षणोंका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति

राजोवाच मार्कण्डेय कथं शुक्रः पुरा बलिमखे गुरुः। वामनेन स विद्धाक्षः स्तुत्वा तल्लब्धवान् कथम् ॥ १

राजा बोले—मार्कण्डेयजी ! पूर्वकालमें राजा बलिके यज्ञमें भगवान् वामनने जो दैत्यगुरु शुक्राचार्यकी आँख छेद डाली थी, उसे उन्होंने पुनः भगवान्‌की स्तुतिद्वारा किस प्रकार प्राप्त किया ? ॥ १ ॥

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२४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५५

२४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५५ मार्कण्डेय उवाच वामनेन स विद्धाक्षो बहुतीर्थेषु भार्गवः। जाह्नवीसलिले स्थित्वा देवमभ्यर्च्य वामनम्॥ २ ऊर्ध्वबाहुः स देवेशं शंखचक्रगदाधरम्। हृदि संचिन्त्य तुष्टाव नरसिंहं सनातनम्॥ ३ शुक्र उवाच नमामि देवं विश्वेशं वामनं विष्णुरूपिणम्। बलिदर्पहरं शान्तं शाश्वतं पुरुषोत्तमम्॥ ४ धीरं शूरं महादेवं शङ्खचक्रगदाधरम्। विशुद्धं ज्ञानसम्पन्नं नमामि हरिमच्युतम्॥ ५ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वगं सर्वभावनम्। अनादिमजरं नित्यं नमामि गरुडध्वजम्॥ ६ सुरासुरैर्भक्तिमद्भिः स्तुतो नारायणः सदा। पूजितं च हृषीकेशं तं नमामि जगद्गुरुम्॥ ७ हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यायन्ति यतयः सदा। ज्योतिरूपमनौपम्यं नरसिंहं नमाम्यहम्॥ ८ न जानन्ति परं रूपं ब्रह्माद्या देवतागणाः। यस्यावताररूपाणि समर्च्चन्ति नमामि तम्॥ ९ एतत्समस्तं येनादौ सृष्टं दुष्टवधात्पुनः। त्रातं यत्र जगल्लीनं तं नमामि जनार्दनम्॥ १० भक्तैरभ्यर्चितो यस्तु नित्यं भक्तप्रियो हि यः। तं देवममलं दिव्यं प्रणमामि जगत्पतिम्॥ ११ दुर्लभं चापि भक्तानां यः प्रयच्छति तोषितः। तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं प्रणमामि सनातनम्॥ १२ श्रीमार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो जगन्नाथः पुरा शुक्रेण पार्थिव। प्रादुर्बभूव तस्याग्रे शङ्खचक्रगदाधरः॥ १३ उवाच शुक्रमेकाक्षं देवो नारायणस्तदा। किमर्थं जाह्नवीतीरे स्तुतोऽहं तद्ब्रवीहि मे॥ १४ मार्कण्डेयजी बोले—वामनजीके द्वारा जब आँख छेद दी गयी, तब भृगुनन्दन शुक्राचार्यजीने बहुत तीर्थोंमें भ्रमण किया। फिर एक जगह गङ्गाजीके जलमें खड़े हो भगवान् वामनकी पूजा की और अपनी बाँहें ऊपर उठाकर शङ्ख-चक्र-गदाधारी सनातन देवेश्वर भगवान् नरसिंहका मन-ही-मन ध्यान करते हुए वे उनकी स्तुति करने लगे॥ २-३॥ शुक्राचार्यजी बोले—मैं सम्पूर्ण विश्वके स्वामी और श्रीविष्णुके अवतार उन देवदेव वामनजीको नमस्कार करता हूँ, जो बलिक अभिमान चूर्ण करनेवाले, परम शान्त, सनातन पुरुषोत्तम हैं। जो धीर हैं, शूर हैं, सबसे बड़े देवता हैं, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं, उन विशुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न भगवान् अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन जरारहित, अनादिदेव भगवान् गरुडध्वजको मैं प्रणाम करता हूँ। देवता और असुर सदा ही जिन नारायणकी भक्तिपूर्वक स्तुति किया करते हैं, उन सर्वपूजित जगद्गुरु भगवान् हृषीकेशको मैं नमस्कार करता हूँ। यतिजन अपने अन्तःकरणमें भावनाद्वारा स्थापित करके जिनके स्वरूपका सदा ध्यान करते रहते हैं, उन अतुलनीय एवं ज्योतिर्मय भगवान् नृसिंहको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि देवतागण जिनके परमार्थ स्वरूपको भलीभाँति नहीं जानते, अतः जिनके अवताररूपोंका ही वे सदा पूजन किया करते हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने प्रथम इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की थी, फिर जिन्होंने दुष्टोंका वध करके इसकी रक्षा की है तथा जिनमें ही यह सारा जगत् लीन हो जाता है, उन भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। भक्तजन जिनका सदा अर्चन करते हैं तथा जो भक्तोंके प्रेमी हैं, उन परम निर्मल, दिव्य कान्तिमय जगदीश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो प्रसन्न होनेपर अपने भक्तोंको दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करते हैं, उन सर्वसाक्षी सनातन विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४—१२॥ श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें शुक्राचार्यजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् जगन्नाथ उनके समक्ष प्रकट हो गये। उस समय भगवान् नारायणने एक आँखवाले शुक्राचार्यजीसे कहा—'ब्रह्मन्! तुमने गङ्गातटपर किसलिये मेरा स्तवन किया है? यह मुझसे बताओ'॥ १३-१४॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७ शुक्र उवाच शुक्राचार्यजी बोले—देवदेव! मैंने पहले (बलिके देवदेव मया पूर्वमपराधो महान् कृतः। यज्ञमें) आपका बहुत बड़ा अपराध किया है; उसी तद्दोषस्यापनुत्त्यर्थं स्तुतवानस्मि साम्प्रतम्॥ १५ दोषको दूर करनेके लिये इस समय आपका स्तवन किया है॥ १५॥ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान् बोले- मुने! मेरे प्रति किये गये ममापराधान्नयनं नष्टमेकं तवाधुना। अपराधसे ही तुम्हारा एक नेत्र नष्ट हो गया था। शुक्र ! संतुष्टोऽस्मि ततः शुक्र स्तोत्रेणानेन ते मुने॥ १६ इस समय तुम्हारे इस स्तवनसे मैं तुमपर संतुष्ट हूँ ॥ १६ ॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तं मुनिं प्रहसन्निव । यह कहकर देवदेवेश्वर जनार्दनने हँसते हुए-से अपने पाञ्चजन्येन तच्चक्षुः पस्पर्श च जनार्दनः ॥ १७ पाञ्चजन्य शङ्खसे शुक्राचार्यके फूटे हुए नेत्रका स्पर्श किया। नृपश्रेष्ठ ! शार्ङ्गधन्वा देवदेव विष्णुके द्वारा शङ्खका स्पर्श स्पृष्टमात्रे तु शङ्खेन देवदेवेन शार्ङ्गिणा । कराये जाते ही शुक्राचार्यका वह नेत्र पहलेकी भाँति ही बभूव निर्मलं चक्षुः पूर्ववन्नृपसत्तम ॥ १८ निर्मल हो गया। इस प्रकार शुक्राचार्यको नेत्र देकर और एवं दत्त्वा मुनेश्चक्षुः पूजितस्तेन माधवः । उनसे पूजित होकर भगवान् लक्ष्मीपति तुरंत अन्तर्धान हो जगामादर्शनं सद्यः शुक्रोऽपि स्वाश्रमं ययौ ॥ १९ गये और शुक्राचार्य भी अपने आश्रमको चले गये। राजन् ! इस प्रकार पूर्वकालमें मुनिवर महात्मा शुक्राचार्यने देवेश्वर इत्येतदुक्तं मुनिना महात्मना भगवान् विष्णुकी कृपासे अपना नेत्र प्राप्त कर लिया- प्राप्तं पुरा देववरप्रसादात्। यह प्रसङ्ग तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने सुना दिया। अब तुम्हें शुक्रेण किं ते कथयामि राजन् मैं और क्या सुनाऊँ? तुम्हारे मनमें और भी यदि कुछ पुनश्च मां पृच्छ मनोरथान्तः ॥ २० पूछनेकी इच्छा हो तो मुझसे प्रश्न करो ॥ १७-२० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शुक्रवरप्रदानो नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शुक्राचार्यको वरप्रदान' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ छप्पनवाँ अध्याय विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि राजोवाच राजा बोले- ब्रह्मन् ! अब मैं शार्ङ्गधनुषधारी देवदेव साम्प्रतं देवदेवस्य नरसिंहस्य शार्ङ्गिणः । नरसिंहके स्थापनकी समस्त उत्तम विधिको सुनना श्रोतुमिच्छामि सकलं प्रतिष्ठायाः परं विधिम् ॥ १ चाहता हूँ ॥ १ ॥ श्रीमार्कण्डेय उवाच श्रीमार्कण्डेयजी बोले- भूपाल ! देवदेवेश्वर प्रतिष्ठाया विधिं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः । चक्रपाणि भगवान् विष्णुके स्थापनकी पुण्यदायिनी प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं शृणु भूपाल पुण्यदम् ॥ २ विधि सुनो; मैं शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन कर कर्तुं प्रतिष्ठां यश्चात्र विष्णोरिच्छति पार्थिव । रहा हूँ। पृथिवीपते ! जो भी इस लोकमें भगवान् स पूर्वं स्थिरनक्षत्रे भूमिशोधनमारभेत् ॥ ३ विष्णुकी स्थापना करना चाहे, उसको चाहिये कि वह पहले स्थिर-संज्ञक * नक्षत्रोंमें भूमिशोधनका कार्य प्रारम्भ

  • तीनों उत्तरा और रोहिणी - वे 'स्थिर' नक्षत्र कहलाते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (यथावत रूप में) प्रस्तुत है:

२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६

खात्वा पुरुषमात्रं तु बाहुद्वयमथापि वा। | करे। एक पुरुषके बराबर अर्थात् साढ़े तीन हाथ अथवा पूरयेच्छुद्धमृद्भिस्तु जलाक्तैः शर्करान्वितैः॥ ४ | दो हाथ नीचेतक नींव खोदकर उसमें जलसे भीगी हुई | कंकड़ और बालूसहित शुद्ध मिट्टी भर दे। राजन्! फिर अधिष्ठानं ततो बुद्ध्वा पाषाणेष्टकमृण्मयम्। | उसे ही आधार समझकर उसके ऊपर अपनी शक्तिके प्रासादं कारयेत्तत्र वास्तुविद्याविदा नृप॥ ५ | अनुसार पत्थर, ईंट अथवा मिट्टीसे गृहनिर्माण-विद्यामें | कुशल कारीगरोंके द्वारा मन्दिर तैयार कराये। वह मन्दिर चतुरस्रं सूत्रमार्गे चतुःकोणं समन्ततः। | चारों ओरसे बराबर और चौकोर हो। उसकी दीवार शिलाभित्तिकमुत्कृष्टं तदलाभेष्टकामयम्॥ ६ | पत्थरकी हो तो बहुत उत्तम; पत्थर न मिलनेपर ईंटोंकी | ही दीवार बनवा ले। यदि ईंटें भी न मिल सकें तो तदलाभे तु मृत्कुड्यं पूर्वद्वारं सुशोभनम्। | मिट्टीकी ही भींत उठा ले। मन्दिर बहुत ही सुन्दर हो और जातिकाष्ठमयैः स्तम्भैस्तल्लग्नैः फलदान्वितैः॥ ७ | उसका दरवाजा पूर्वकी ओर होना चाहिये। उस मन्दिरमें | अच्छी जातिवाले काठके खंभे लगे हों और उनमें चित्रकला उत्पलैः पद्मपत्रैश्च पातितैश्चित्रशिल्पिभिः। | जाननेवाले शिल्पियोंके द्वारा फलयुक्त वृक्ष, कुमुद तथा इत्थं तु कारयित्वा हि हरेर्वेश्म सुशोभनम्॥ ८ | कमलदल चित्रित कराने चाहिये॥ २—७१/२॥ | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार जिसमें सुन्दर किवाड़ लगे हों और पूर्वद्वारं नृपश्रेष्ठ सुकपाटं सुचित्रितम्। | जिसका द्वार पूर्व दिशाकी ओर हो—ऐसा बेल-बूटोंसे अतिवृद्धातिबालैस्तु कारयेन्नाकृतिं हरेः॥ ९ | भलीभाँति चित्रित भगवान्का परम सुहावना मन्दिर बनवाकर | बुद्धिमान् एवं हृष्टपुष्ट शरीरवाले पुरुषके द्वारा विश्वकर्माकी कुष्ठाद्युपहतैर्वापि अन्यैर्वा दीर्घरोगिभिः। | बतायी हुई पद्धतिके अनुसार पुराणोक्त दिव्य प्रतिमाका विश्वकर्मोक्तमार्गेण पुराणोक्तां नृपोत्तम॥ १० | निर्माण कराये। जो कारीगर अत्यन्त बूढ़ा या बालक अथवा | कोढ़ आदि रोगोंसे दूषित या पुराना रोगी हो, उससे कारयेत् प्रतिमां दिव्यां पुष्टाङ्गेन तु धीमता। | भगवत्प्रतिमाका निर्माण नहीं कराना चाहिये। प्रतिमाका मुख सौम्याननां सुश्रवणां सुनासां च सुलोचनाम्॥ ११ | सौम्य (प्रसन्न) तथा कान, नाक और नेत्र आदि अङ्ग सुढार | होने चाहिये। उसकी दृष्टि न तो बहुत नीची हो, न बहुत नाधोदृष्टिं नोर्ध्वदृष्टिं तिर्यग्दृष्टिं न कारयेत्। | ऊँची हो और न तिरछी ही हो। विद्वान् पुरुष ऐसी प्रतिमा कारयेत् समदृष्टिं तु पद्मपत्रायतेक्षणाम्॥ १२ | बनवाये, जिसकी दृष्टि सम हो और जिसके नेत्र कमलदलके | समान विशाल हों। भौंहें, ललाट और कपोल सुन्दर हों, सुभ्रुवं सुललाटां च सुकपोलां समां शुभाम्। | उसका समस्त विग्रह सुडौल और सौम्य हो। उसके दोनों बिम्बोष्ठीं सुष्ठुचिबुकां सुग्रीवां कारयेद्बुधः॥ १३ | ओठ लाल हों, ठोढ़ी (अधरके नीचेका भाग) मनोहर तथा | कण्ठ सुन्दर हो। प्रतिमाकी भुजाएँ चार होनी चाहिये—दो उपबाहुकरे देयं दक्षिणे चक्रमर्कवत्। | भुजाएँ और दो उपभुजाएँ। उनमेंसे दाहिनी उपभुजाके हाथमें नाभिसंलग्नदिव्यारं परितो नेमिसंयुतम्॥ १४ | सूर्यके समान आकारवाला चक्र धारण कराना चाहिये। | चक्रकी नाभिके चारों ओर दिव्य अरे हों और उनके भी वामपार्श्वेत्युपभुजे देयं शङ्खं शशिप्रभम्। | ऊपर सब ओरसे नेमि (हाल) लगी हो। बायीं उपभुजाके पाञ्चजन्यमिति ख्यातं दैत्यदर्पहरं शुभम्॥ १५ | हाथमें चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमय पाञ्चजन्य नामक | शंख देना चाहिये, जो दैत्योंके मदको चूर्ण करनेवाला और | कल्याणप्रद है॥ ८—१५॥

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अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९ हारार्पितवरां दिव्यां कण्ठे त्रिवलिसंयुताम्। | उस दिव्य भगवत्प्रतिमाके कण्ठमें सुन्दर हार पहनाया सुस्तनीं चारुहृदयां सुजठरां समां शुभाम् ॥ १६ | गया हो, गलेमें त्रिवली-चिह्न हो, स्तनभाग सुन्दर, वक्षःस्थल रुचिर और उदर मनोहर होना चाहिये। कटिलग्नवामकरां पद्मलग्नां च दक्षिणाम्। | सम्पूर्ण अङ्ग बराबर और सुन्दर हों। वह प्रतिमा अपना केयूरबाहुकां दिव्यां सुनाभिवलिभङ्गिकाम् ॥ १७ | बायाँ हाथ कमरपर रखे हो और दाहिनेमें कमल धारण किये हो। बाहुओंमें भुजबन्ध पहने हो और सुन्दर नाभि सुकटीं च सुजङ्घोरूं वस्त्रमेखलभूषिताम्। | तथा त्रिवलीसे सुशोभित एवं दिव्य जान पड़ती हो। एवं तां कारयित्वा तु प्रतिमां राजसत्तम ॥ १८ | उसका कटिभाग (नितम्ब), जाँघें और पिंडलियाँ मनोहर हों, वह कमरमें मेखला और पीतवस्त्रसे विभूषित हो। सुवर्णवस्त्रदानेन तत्कर्तृन् पूज्य सत्तम। | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवत्प्रतिमाका निर्माण कराकर पूर्वपक्षे शुभे काले प्रतिमां स्थापयेद्बुधः ॥ १९ | उसके बनानेवाले शिल्पियोंको सुवर्ण-दान एवं वस्त्र-दानके द्वारा सम्मानित करके विद्वान् पुरुष पूर्व पक्षमें शुभ समयपर उस प्रतिमाकी स्थापना करे ॥ १६–१९ ॥ प्रासादस्याग्रतः कृत्वा यागमण्डपमुत्तमम्। | चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु चतुर्भिस्तोरणैर्युतम् ॥ २० | मन्दिरके सामने एक उत्तम यज्ञमण्डप बनवाये। समधान्याङ्कुरैर्युक्तं शङ्खभेरीनिनादितम्। | उसमें चारों ओर एक-एकके क्रमसे चार दरवाजे हों और सारा मण्डप चार तोरणों (बड़े-बड़े फाटकों)- प्रतिमां क्षाल्य विद्वद्भिः षट्त्रिंशद्भिर्घटोदकैः ॥ २१ | से घिरा हो। उसमें सप्तधान्यके अङ्कुर उगे हों तथा शंख और भेरी आदि बाजे बजते हों। विद्वानोंके द्वारा छत्तीस प्रविश्य मण्डपे तस्मिन् ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । | घड़े जलसे उस प्रतिमाका अभिषेक कराकर उसके तत्रापि स्नापयेत्पश्चात् पञ्चगव्यैः पृथक् पृथक् ॥ २२ | साथ वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको साथमें लिये उक्त मण्डपमें प्रवेश करे और फिर पञ्चगव्योंसे पृथक्-पृथक् तथोष्णवारिणा स्नाप्य पुनः शीतोदकेन च। | स्नान कराये। इसी प्रकार गर्म जलसे नहलाकर फिर ठंडे हरिद्राकुङ्कुमाद्यैस्तु चन्दनैश्चोपलेपयेत् ॥ २३ | जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात्, हल्दी और कुङ्कुम आदिका तथा चन्दनोंका उसपर लेप करे, फिर फूलोंकी मालाओंसे पुष्पमाल्यैरलङ्कृत्य वस्त्रैराच्छाद्य तां पुनः। | विभूषितकर उसे वस्त्र धारण करा दे और पुण्याहवाचन पुण्याहं तत्र कृत्वा तु ऋग्भिस्तां प्रोक्ष्य वारिभिः ॥ २४ | करके वैदिक ऋचाओंसे उच्चारणपूर्वक जलसे प्रोक्षित कर भक्त ब्राह्मणोंद्वारा उस भगवद्विग्रहको नहलाये। स्नात्वा तां ब्राह्मणैर्भक्तैः शंखभेरीस्वनैर्युतम्। | तत्पश्चात् शंख, भेरी आदि बाजे बजाते हुए उसे नदीके वासयेत्सप्तरात्रं तु त्रिरात्रं वा नदीजले ॥ २५ | जलमें रखकर सात या तीन दिनोंतक उसे वहाँ रहने दे। ह्रदे तु विमले शुद्धे तडागे वापि रक्षयेत् । | अथवा किसी निर्मल जलाशय या शुद्ध सरोवरमें ही अधिवास्य जले देवमेवं पार्थिवपुङ्गव ॥ २६ | रखकर उसकी रक्षा करे। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान्‌का जलाधिवास कराके ब्राह्मणोंद्वारा उनको उठवाये और तत उत्थाप्य विप्रैस्तु स्थाप्या्वलङ्कृत्य पूर्ववत्। | पालकी आदिमें चढ़ाकर पूर्ववत् उन्हें माला आदिसे ततो भेरीनिनादैस्तु वेदघोषैश्च केशवम् ॥ २७ | विभूषित करे। तदनन्तर नगारोंकी ध्वनि और वेदमन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ भगवान्‌को वहाँसे ले आये और आनीय मण्डपे शुद्धे पद्माकारविनिर्मिते । | कमलाकार बने हुए शुद्ध मण्डपमें रखे। वहाँ पुनः स्नान कृत्वा पुनस्ततः स्नाप्य विष्णुभक्तैरलङ्क्रियात् ॥ २८ | कराके विष्णुभक्तोंद्वारा उसका शृङ्गार कराये ॥ २०-२८॥