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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ८ अ० २ पा० ४ खं०
अर्थः- “तनूनपात्पथ” हे 'तनूनपात्' आज्य (त्वम्)
तू 'ऋतस्य' (यज्ञस्य) यज्ञ के 'पथः'(मार्गान्) मार्गों को और
'यानान्' (हवींषि) हविओं को 'मध्वा' (मधुना) मधुर स्वाद से
'समञ्जन्' सींचता हुआ 'स्वदय' स्वादु कर दे। और हे सुजि-
ह्वः' सुन्दर जीभ वाले! [अपनी जीभ से ऐसा करता हुआ-]
'मन्मानि' (मननानि च) हमारी मानी हुई या मांगी हुई
वस्तुओं को 'कृणुहि' कर । 'धीभिः' (कर्मभिः) कर्मों से 'यज्ञम्'
यज्ञ को 'ऋन्धन्' (संसाधयन्) सम्पादन करता हुआ =
साधता हुआ (समर्धय) बढा । 'नः' हमारे 'अध्वरम्' (यज्ञम्)
यज्ञ के प्रति देवत्रा (देवान्) देवताओं को (गमय) चला या
ला।(यह हम तुझ से चाहते हैं।) ॥
शाकपूणि के मत में- हे भगवन् ! अग्ने ! तनूनपात् !
जल के पोते ! तू यज्ञ के मार्गों को हवियों को पाक के किये
हुए मीठे रस से संयुक्त करता हुआ स्वादु बना । हे सुजिह्व !
अच्छी ज्वालाओं वाले ! ऐसा करता हुआ हमारी वाञ्छित
वस्तुओं को सिद्ध करता हुआ यज्ञ को बढा और हमारे
यज्ञ के प्रति देवताओं को ला ॥
'नराशंस' (४) यज्ञ है, यह कात्थक्य मानते हैं। क्योंकि-
इस में नर (मनुष्य) आसीन (बैठे हुए) शंसन करते हैं-
देवताओं की स्तुति करते हैं ।
अग्नि 'नराशंस' है,-यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
क्योंकि-नरों से (मनुष्यों से) प्रशंसो किया जाता है ।
“तस्य०” उस 'नराशंस' की यह ऋचा है ॥३(६)॥
(खं० ४)
(निरु०) “नराशंसस्य महिमानमेषामुपस्तोषाम

हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) = अ० २ पा० ४ खं०
यजतस्य यज्ञैः । ये सुक्रतवः शुचयोधियंधाः
स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या ॥” [ऋ०सं० ५,२,
१, २] ॥
नराशंसस्य महिमानम्-एषाम् उपस्तुमः, यज्जि-
षस्य यज्ञै ये सुकर्माणः शुचयोधियंधारयितारः
स्वदयन्तु देवाः-उभयानि हवींषि सोमं च इतरा-
णि च इतिवा । तान्त्राणि च आवापिकानि च
इति वा ॥
‘ईलः’ ईट्टेः स्तुतिकर्मणः । इन्धतेर्वा ॥
तस्य एषा भवति–॥४(७)॥
‘एषाम्’ इन मनुष्यों के ‘नराशंसस्य’ वाञ्छित फल के
देने वाले यज्ञ की ‘महिमानम्’ महिमा को ‘उपस्तुमः’ स्तुति
करते हैं । ‘यजतस्य’ (यज्जिषस्य) यज्ञ करने वाले के ‘यज्ञैः’
(कर्मभिः) कर्मों से ‘ये’ जो ‘सुक्रतवः’ (सुकर्माणः) सुन्दर
कर्म वाले ‘शुचयः’ बिलकुल पाप रहित ‘धियंधाः’ (धियंधार-
यितारः) बुद्धि के धारण करने वाले ‘देवाः’ देवता हैं, वे
‘उभयानि’ दोनों प्रकार के ‘हव्या’ (हवींषि) हविष्यों को
‘स्वदन्ति’ (स्वदयन्तु) चाखें । दोनों प्रकार के हवि-सौमिक
पशु में-एक सोम और दूसरे पशु पुरोडाश धाना आदि हैं ।
और सोम से अन्यत्र तान्त्र (प्रयाज आज्यभाग स्विष्टकृत्
आदि) और आवापिक (प्रधान हविष् ) ये दो प्रकार के
हवि हैं ।
शाकपूणि के मत में-हम नरों के इच्छित उपकारों के

हिन्दी निरुक्त ( १५५ ) ८ अ० २ पा० ५ खं०
करने वाले नराशंस अग्नि देव की महिमा को स्तुति करते
हैं। उस नराशंस अग्नि को स्तुत होजाने पर यज्ञ के करने
वाले के गुणों से युक्त जो सुन्दर कर्मों वाले पवित्र बुद्धि के
धारण करने वाले देवता हैं, वे दोनों प्रकार के हविष्योँ को
चाखें ॥
'ईल' ५) (अग्नि) स्तुति अर्थ में 'ईड्' (अदा०आ०)
धातु का है। अथवा दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' (रु० आ०) धातु
का है।
“तस्य०” उस 'ईल' की यह ऋचा है ॥४(७)॥
( खं० ५ )
(निरु०-) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चायाह्यग्ने
वसुभिः सजोषाः । त्वं देवानामसि यह्व होता स
एनान्यक्षीषितो यजीयान् ॥” (ऋ०सं०८,६,८,३)
आहूयमानः ईलितव्यो वन्दितव्यश्च आयाहि
अग्ने वसुभिः सह जोषणः त्वं देवानाम् असि
यह्व होता ।
'यह्व' इति महतो नामधेयम् । यातश्च हूतश्च
भवति ।
“स एनान् यक्षीषितो यजीयान्” । 'इषितः'
प्रेषितः इति वा । अधीष्टः इति वा ।
'यजीयान्' यष्टृतरः ॥
'बर्हिः' परिवर्हणात् ।

हिन्दी निरुक्त ( १५७ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम् ॥” (ऋ० सं०
८, ६, ८, ४)॥
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वसनाय अस्याः
प्रवृज्यते, अग्रे अन्हो बर्हिः, पूर्वार्द्धे तद् विप्रथते
'वितरं',-विकीर्णतरम्-इति वा, विस्तीर्णतरम्-
इति वा ।
'वरीयः' वरतरम् । उरुतरं वा ।
देवेभ्यश्च अदितये च स्योनम् ।
'स्योनम्'- इति सुखनाम । स्यतेः । अवस्यन्ति-
एतत् । सेवितव्यम्भवति-इति वा ।
'द्वारः' जवतेर्वा । द्रवतेर्वा । वारयतेर्वा ॥
तासाम्-एषा भवति- ॥६(९)॥
अर्थ :- “प्राचीनं०” [ यज्ञ में कुशों का उपयोग- ]
‘अस्याः पृथिव्याः वस्तोः (वसनाय) प्रदिशा (विधिना)
(मन्त्रेण वा) अन्हाम् अग्रे (पूर्वाह्ने) प्राचीनं बर्हिः वृ-
ज्यते' इस पृथिवी के ढांपने के लिये पूर्वाह्नकाल में = दिन
के पहिले पहर में प्राचीन = पूर्व दिशा में गया हुआ अथवा
पूर्वाग्र कुश (डाभ) विधिवाक्य के अनुसार काटा जाता है
अथवा प्रस्तरण मन्त्र से बिछाया जाता है। ‘वरीयः' और २
यज्ञ के अङ्गों से बहुत श्रेष्ठ है । 'वितरं (विकीर्णतरं वा
विस्तीर्णतरं वा) काटा हुआ अथवा बिछाया हुआ 'व्युप्र-
थते' (तद् विप्रथते) वह कुश फैल जाता है। और 'देवेभ्यः'

हिन्दी निरुक्त ( १५८ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
देवताओं के लिये तथा 'अदितये' पृथिवी के लिये सुखरूप
होता है ।
'वितर' क्या ? विशीर्णतर = बहुत काट डाला हुआ ।
अथवा विस्तीर्णतर = बहुत फैलाया हुआ या बिछाया हुआ ।
'वरीयः' क्या ? वरतर = बहुत श्रेष्ठ । अथवा उरुतर =
बहुत घना ।
'स्योन' यह सुख का नाम है । कैसे ? स्यतेः । 'अव'
(उप०) और 'सो' (दि०प०, धातु से है । क्योंकि- 'एतद्
अवस्यन्ति' सब प्राणी इसी पर निर्भर करते हैं—इसी को
निश्चय करते हैं—कैसे मिले ? कैसे हो ? अथवा सेवन करने
योग्य होता है इससे यह 'स्योन' है ।
व्याख्या ।
“प्राचीनं बर्हिः” मन्त्र में कुशा या डाभ के सम्बन्ध में
बहुतसी विधियों का अक्षरार्थ से स्पष्टीकरण होता है । यज्ञ
में इसका बहुत उपयोग होता है। कर्मकेआरम्भ से पहिलेइसे वन
में से काट कर लाना पड़ता है अतः उसके काटने या बिछाने
का समय “अग्रेअन्हाम्” यह वाक्य पूर्वाह्न (दिनका पहि
ला प्रहर) बताता है, और वहां कैसे काटे इसके लिये
प्राचीनं बर्हिः वृज्यते” वाक्य बताता है कि- पूर्व की
ओर मुख करके काटने वालो उसे पूर्व की ओर ही ऐसे २
काटता हुआ बढे जैसे २ वह पूर्वाग्र कट २ कर गिरै या उसे
काट २ कर वैसे ही डाले जैसे पूर्वाग्र गिरे । जहां तक संभव
हो उस कर्म में सब प्रकारपूर्व दिशाको उपयोग करें ।
इसका दूसरा मूल “प्रागुदग्ग्रा बर्हि च्छिनात्ति”

हिन्दी निरुक्त ( १५६ ) ८ अ० ३ पा० ६ खं०
ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। इसी विधि का अनुवाद इस
मन्त्र वाक्य में किया गया है।
ऐसे ही वेदी में कुशा बिछाई जाती है, उस पर सब
हविः रखेजाते हैं, इस लिये जब वहां कुशा बिछाये तो कुशा-
ग्रों के अग्र को पूर्व की ओर रखे और वेदी के पश्चिम भाग
से बिछाना आरम्भ करके उसे पूर्व के भाग में पूराकरे । यह
अर्थ भी "प्राचीनं बर्हिः वृज्यते" इस वाक्य से ही आता
है। इसका दूसरा मूल वाक्य "प्राचीनं बर्हिः स्तृणाति"
यह ब्राह्मण श्रुति (विधिवाक्य) है। प्रस्तरण यो फैलाने का
मन्त्र "देवस्यत्वा" इत्यादि है।
कुशा क्यों फैलाई जाती हैं, इसका उत्तर भी अंशमात्र
इस मन्त्र में ही "पृथिव्या वस्तोरस्याः" "पृथिवी के
ढांपने के अर्थ' इस वाक्य से मिलजाता है। क्यों कि- देवता
पृथिवी पर खड़े नहीं होते और न पृथिवी पर धरे हुए हवि
ओं को वे ग्रहणकरते हैं, इसलिये वेदी पर कुशा बिछाई जाती
हैं, और उन पर हविः रखे जाते हैं ॥ अथवा कुशाग्रों के
फैलाने से पृथवी की नग्नता निवृत्त होजाती है। क्यों कि-
पृथवी की नग्नता की अवस्था में देवता यज्ञ में न आवेंगे
अतः पृथिवी की नग्नता की निवृत्ति के लिये कुशा बिछाना बहुत
आवश्यक है।
'द्वारः' (७) यह देवता का नाम वेग अर्थ में 'जु' (भ्वा०
प०) धातु से है। अथवा गति अर्थ में 'द्रु' (भ्वा० प०) धातु
से है। अथवा 'वारयति' (वृञ् धा० णिच्०प्र०) वारण अर्थ
में णिजन्त धातु से है। क्यों कि- द्वारों (दरवाजों) से ही

हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ८ अ० २ पा० ७ खं०
दौड़ना, गमने, तथा धारण करने योग्यों का धारण किया
जातो है ।
“तासामेषा०” उन द्वारों की यह ऋचा है-॥६(६)॥
(खं०७)
(निरु०) व्यचस्वतीरुर्विया विश्रयन्तां पतिभ्यो
न जनयः शुम्भमानाः । देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्व-
मिन्वादेवेभ्यो भवतसुप्रायणाः॥» [ऋ० सं० ८, ६, ८, ५]
व्यञ्जनवत्यः उरुत्वेन विश्रयन्तापतिभ्यो इव जा-
याः ऊरू मैथुनधर्मे शुशोभिषमाणाः वरतमम्-
अङ्गम् · ऊरू, देव्यो द्वारो बृहत्यो महत्यो 'विश्व-
मिन्वाः' विश्वम् आभिः एति यज्जे ।
गृहद्वारः- इति कात्थक्यः ।
अग्निः- इति शाकपूणिः ।
'उषासानक्ता' उषाश्च नक्ता च ।
'उषा' व्याख्याता ।
'नक्ता' इति रात्रिनाम। अनक्ति भूतानि। अपि
वा अव्यक्तवर्णा ।
तयोः एषा भवति-॥७(१०) ॥
अर्थ:- “व्यचस्वतीः०” (याः) जो ये 'व्यचस्वती' (व्यञ्जनव-
त्यः) अनेक प्रकार आने जाने से युक्त हैं, वे (द्वारः) द्वार (दर-
वाजे) 'उर्विया' (महत्त्वेन) विस्तार से 'विश्रयन्ताम्' खुलजावें ।

हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ८ अ० २ पा० ७ खं
‘जनयः-न’ (जायाः-इव) जैसे स्त्रिएं ‘पतिभ्यः’ पत्तियों के
लिये शुम्भमानाः’ (शुशोभिषमाणाः) अपनी शोभा बढाने की
इच्छा करती हुईं (मैथुनधर्मे) मैथुन कर्म में (ऊरू। जांघों को
फैला देती हैं । ‘द्वारः!’ ‘देवीः!’ (देव्य) हे द्वार देविओ? (यूयम्)
तुम ‘देवेभ्यः’ देवताओं के लिये ‘बृहतीः’ (बृहत्यः) बड़ी बड़ी
‘विश्वमिन्वाः’ सब संसार के आने जाने योग्य ‘सुप्रायणाः’
(सुप्रगमना) भले प्रकार आने जाने योग्य ‘भवत’ होजाओ ।
‘ऊरू’ क्या ? ‘वरतरम् अङ्गम्’ बहुत उत्तम अङ्ग ।
‘विश्वमिन्वा’ क्या ! ‘विश्वम् आभिः एति यञ्जे’ यज्ञ
में इनके द्वारा सब संसार आता है ॥
व्याख्या ।
इस मन्त्र के द्वारा यजमान अपने यज्ञ के द्वारों को ऐसे
खुले हुए चाहता है, जिनके द्वारा संसार के सब याचक आ
कर उससे अपनी सब प्रार्थनाओं को पूरी करें । यज्ञ के
अधिकारी की उदारता का स्वरूप इस मन्त्र से भले प्रकार जाना
जासकता है ।
यहां ‘द्वार’ क्या देवता है !
यह द्वार (घरके दरवाजे) हैं- यह कात्थक्य आचार्य
मानते हैं ।
अग्नि है- यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ।
‘उषासानक्ता’ क्या ! उषा (प्रभात काल) और नक्ता
[रात्रि] ।
‘नक्ता’ यहरात्रि का नाम है। क्योंकि-अवश्याय (ओस)
से सब पदार्थों को ‘अनक्ति’ गीले कर देती है । अथवा वह
अव्यक्तवर्णा होने से ‘नक्ता’ है अर्थात् अंधेरे के कारण उस में

हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ८ अ० २ पा० ८ खं
कोई वर्ण (रंग) प्रतीत नही होता । 'अव्यक्तवर्णा' शब्द से
'अ' के बदले में 'न' और 'क्त' ये दो अक्षर लेकर 'नक्ता' शब्द
बना है। यहां ऐसे ही संक्षेप होते है ।
उन दोनों की यह ऋचा है—॥ ७(१०)॥
(सं० ८)
(निरु०) "आसुष्वयन्ती यजते उपाके उषासा-
नक्ता सदतां नियौनौ । दिव्ये योषणे बृहती सु-
रुक्मे अधिश्रियं शुक्रपिशं दधाने ॥" [ ऋ० सं०
८, ६, ९, १ ]
सेष्मीयमाणे इति वा । सुष्वपन्त्यौ इति वा ।
सीदताम्-इति वा । न्यासीदताम् इति वा ।
यज्जिये उपक्रान्ते, दिव्ये योषणे बृहत्यौ महत्यौ
सुरुक्मे सुरोचने । अधिद्धाने शुक्रपेशासं श्रियम् ।
'शुक्रम्' शोचतेर्ज्वलतिकर्मणः ।
'पिश' इति रूपनाम । पिंशतेः । विपिशितं
भवति ।
'दैव्या होतारा' देव्यौ होतारौ। अयंच अग्निः,
असौ च मध्यमः ।
तयोः- एषा भवति ॥ ८ (११) ॥
अर्थ :- "आसुष्वयन्ती" 'सुष्वयन्ती' (सेष्मीयमाणे
इति वा, सुष्वपन्त्यौ इति वा) आपस में दोनों मुसकिराती

हिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ८ अ० ५ पा० ६ खं०
हुईं, अथवा जनों को सुलाती हुईं, 'यजते' ( यजिष्ये )
यज्ञ कराने वालीं, 'उपाके' ( उपक्रान्ते ) आपस में मिलकर
प्रशंसा करने योग्य, या एक पर एक चढ़ी हुईं 'दिव्ये' द्युलोक
में उपजी हुईं, या चमकने वालीं, 'योषयो' स्त्री रूपिणी या
आपस में मिली हुईं, 'बृहती' ( बृहत्यौ ) ( महत्यौ ) बड़ीं,
'सुरुक्ये' ( सुरूचने ) सुन्दर रूचने वालीं 'शुक्रपेशसम्' शुक्ल
कान्ति ( गौरवर्णा ) 'श्रियम्' श्री ( शोभा ) को 'अधि-दधाने'
अपने ऊपर धारण करती हुईं, 'योनौ' यज्ञ के स्थान में
'नि-आसदतां' ( सीदताम् इति वा न्यासीदताम् इति
वा ) बैठें ।
'शुक्र' ज्वलन अर्थ में 'शुच्' ( भ्वा०प० ) धातु से है ।
'पेश' यह रूप का नाम है । कैसे ? 'पिश्' ( भ्वा०प० )
धातु से है । क्योंकि-वह विपिशित होता है- जिस द्रव्य में
वह रहता है, उसे व्याप्त कर भासता है । कोई कहते हैं, वह
पराश्रित होने से दूसरे में रखा हुआ जैसा होता है ।
'दैव्या होतारा' (६) ( दैव्यौ होतारौ ) देवताओं के
होता हैं । कौन ? यह पृथिवी का अग्नि और वोह मध्यम
लोक का अग्नि ( विद्युत् ) ।
“तयोः०” उनकी यह ऋचा है—॥८(११)॥
( खं० ६ )
[निरु०-] ‘दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मि-
माना यज्ञं मनुषो यजध्यै । प्रचोदयन्ता विद-
थेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥”
[ ऋ०सं० ८,६,९,२ ] ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ८ अ० २ पा० ६ खं०
——————
दैव्यौ होतारौ प्रथमौ सुवाचौ निर्मिमानौ यज्ञं
मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय प्रचोदयमानौ
यज्ञेषु कर्त्तारौ पूर्वस्यां दिशि यष्टव्यम्-इति
प्रदिशन्तौ ॥
'तिस्रो देवी:' तिस्रो देव्यः ।
तासाम्-एषा भवति—॥९(१२)॥
अर्थः- 'दैव्या होतारा' ( दैव्यौ होतारौ ) देवसाक्षीं में
होने वाले होता-देवतारूप होता वायु और अग्नि 'प्रथमा'
( प्रथमौ ) मनुष्य होता की अपेक्षा प्रथम हैं- पहिले हैं ।
'सुवाचा' ( सुवाचौ ) सुन्दर वाणी वाले हैं । 'यज्ञम्' यज्ञ
को 'मिमाना' ( निर्मिमानौ ) निर्माण करने वाले 'मनुष्य.'
( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जने जने को 'यजध्यै' ( यजनाय ) यज्ञ
के लिये 'प्रचोदयन्ता' ( प्रचोदयमानौ ) प्रेरणा करने वाले
हैं । 'विदथेषु' ( यज्ञेषु ) यज्ञों में 'कारू' ( कर्त्तारौ ) करने
वाले हैं । 'प्राचीनं ( पूर्वस्यां दिशि ) ज्योतिः' पूर्व दिशा में
होने वाले आहवनीय अग्नि को 'प्रदिशा दिशन्ता' ( यष्ट-
व्यम्-इति प्रदिशन्तौ ) मन्त्र से या विधिवाक्य के अनुसार
यजन करना चाहिए-ऐसे आज्ञा करने वाले हैं । [ जो ये
दोनों अग्नि और वायु देवता इस प्रकार नित्य ही यज्ञ के
उपकार में रहते हैं, वे मेरे लिये भी ऐसा ही बर्ताव करें । ]
'तिस्रोदेवी:' (१०) क्या ? ( तिस्रो देव्यः ) तीन देवियें ।
"तासाम्०" उनकी यह ऋचा है ॥६(१२)॥

(खं १०)
(निरु०-) “आनो यज्ञं भारती तूयमेत्विला
मनुष्वदिह चेतयन्ती । तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं स्योनं
सरस्वती स्वपसः सदन्तु ॥” (ऋ०सं०८,६९,३)
ऐतु नो यज्ञं भारती क्षिप्रम् ।
'भरतः' आदित्यः तस्य भा ।
इला च मनुष्यवत् इह चेतयमाना। तिस्रोदेव्यः
बर्हिरिदं सुखं सरस्वती च सुकर्माणः आसीदन्तु।
'त्वष्टा' तूर्णम्-अश्नुते इति नैरुक्ताः । त्विषेर्वा
स्यात् दीप्तिकर्मणः । त्वक्षतेर्वा स्यात् करोति-
कर्मणः ॥
तस्य-एषा भवति—॥१०(१३)॥
अर्थ:-“आनो यज्ञं०” 'भारती' (भरतः आदित्यः
तस्य भा) भरत नाम जो सूर्य उसकी 'भा' दीप्ति (द्युलोक
की देवी) 'नः' हमारे 'यज्ञम्' यज्ञ को 'तूयम्' ( क्षिप्रम् )
शीघ्र 'आ-एतु' (ऐतु) आवे । 'इला' (च) और इला (पृथिवी
लोक की देवी) 'मनुष्वत्' (मनुष्यवत्) मनुष्य के समान
'चेतयन्ती' चेतती हुई [जैसे मनुष्य न्योता हुआ भोजन करने
को शीघ्र आता है] 'इह' हमारे इस यज्ञ में आवे । 'सर-
स्वती' (च) और सरस्वती (मध्यम लोक की देवी) आवे ।
(ताः एताः) वे ये स्वपसः' (सुकर्माणः) उत्तम कर्म वाली
'तिस्रोदेवीः' (तिस्रो देव्यः) तीनों देवियां 'इदम्' इस 'बर्हिः'

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० २ पा० ११ खं०
कुश पर ‘स्योनम्’ ( सुखम् ) सुखपूर्वक ‘आ-सदन्तु’ ( आसी-
दन्तु) बैठें ॥
‘त्वष्टा’ (११) क्यों ? वह तूर्ण ( शीघ्र ) अश्नुते (व्यापन)
करता है- ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं। अथवा दीप्ति
अर्थ में ‘त्विष्’ [भ्वा०प०] धातु से है। अथवा ‘करोति’ के
अर्थ में ‘त्वक्ष’ [ भ्वा०प० ] धातु से है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है-॥१०[१३]॥
[ खं० ११ ]
निरु०-] “य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपै-
रपिंशद्भुवनानि विश्वा। तमद्य होतरिषितो यजी-
यान्दे॒वं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥” ( ऋ० सं०
८, ६, ९, ४ )
यः इमे द्यावापृथिव्यौ जनयित्र्यौ रूपैः अकरोत्
भूतानि च सर्वाणि तम् अद्य होतः ! इषितः य-
जीयान् देवं त्वष्टारम् इह यज विद्वान् ।
माध्यमिकः त्वष्टा-इत्याहुः । मध्यमे च स्थाने
समाम्नातः ।
‘अग्निः’—इति शाकपूणिः ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥११[१४]॥
अर्थः- यः (त्वष्टा) जिस त्वष्टा देवने ‘इमे’ इन ‘जनित्री’
(जनयित्र्यौ) सब जगत् को जनने वालीं ‘द्यावापृथिवी’ (द्यावा-
पृथिव्यौ) द्युलोक पृथिवी लोकों को ‘रूपैः’ नाना प्रकारों से

हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० २ पा० ११ खं०
'अपिंशत्' (अकरोत्) किया था, और 'विश्वा' (सर्वाणि) सब 'भूता-
नि च' भूतों को किया था, हेहोतः (त्वम्) तू 'इषितः' इच्छा-
वान् 'यजीयान्' बड़ा यज्ज करने वाला 'विद्वान्' जानने
वाला 'इह' इस यज्ज कर्म में 'तम्' उस 'त्वष्टार देवम्' त्वष्टा
देवको 'यक्षि' (यज) यजन कर ।
यह त्वष्टा देव मध्यम लोक का है, ऐसा कोई नैरुक्त आ-
चार्य मानते हैं । क्यों कि- मध्यम स्थान में उसका समाम्नान
हुआ है।
यही 'अग्नि' त्वष्टा दैव है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
“तस्य०” उसकी यह और ऋचा है-॥११ (१४)॥
व्याख्या।
“य ईमे०” यह मन्त्र 'त्वष्टा' देवता के लिये निगम दिया है,
किन्तु इसमें अभी यह निर्णय नहीं हुआ कि- यह देवता
कौन से लोक का है ? पृथिवी लोक का है ? या मध्यम लोक
का है ?
सन्देह क्यों हुआ, यह 'त्वष्टा' पद पृथिवी स्थान के
देवताओं के नामों में [निघ० अ० ५ खं० २ प० ११) और
मध्यम स्थान के देवताओं के नामों में [निघ० अ० ५ खं० ४ प० २१]
भी पढ़ा है, इसीसे उक्त सन्देह हुआ ।
कई नैरुक्त आचार्य मानते हैं कि- यह मध्यम लोक का
देवता है और उस में तीन हेतु देते हैं--
१- मध्यम स्थान देवताओं में त्वष्टा नाम का पाठ ।
२- मन्त्र- व्यपदेश या मन्त्र का अर्थ- मनुष्य होता
कहता है कि- 'हे होत,' तू द्यावापृथिवी और भूतों के

हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० २ पा० ११ खं०
रखने वाले त्वष्टा का यजन कर । यहां मनुष्य होता जिस
दिव्य होता से त्वष्टा के यजन की प्रार्थना करता है, उसमें
मनुष्य होता से पृथक् देव होता और उनसे पृथक् त्वष्टा यज-
नीय देव सिद्ध होता है। प्रयोजन यह कि देव होता पार्थिव
अग्नि ही है, और उसका यजनीय उससे भिन्न त्वष्टा देवता
मध्यम लोक का ज्योति ही होसकता है।
३- ऐतिहासिकों का मत - वे कहते हैं कि-त्वष्टा- सब
शिल्पिओं का आचार्य देववर्धकि = देवताओं का खाती
(बढई) दाक्षायणी का पुत्र, बारह (१२) आदित्यों में से एक
आदित्य है।
शाकपूर्णि आचार्य कहते हैं कि यही पार्थिव अग्नि त्वष्टा
है। वे इन बातों का उत्तर इस प्रकार देते हैं-
१- मध्यम स्थान में त्वष्टा का नाम है, यह उसके मध्यम
होने में हेतु नहीं होसकता, क्योंकि अग्नि का भी नाम मध्यम
लोक के देवताओं में [अ०५ खं०४प०२३] है।
२- मन्त्र का अर्थ भी हेतु नहीं। क्योंकि- दूसरा मन्त्र
"त्वष्टा दधदिन्द्राय शुष्मम्" 'इन्द्र के लिये शुष्म को
धारण करता हुआ त्वष्टा' यहां इन्द्र (मध्यम लोक के देव) से
पृथक् त्वष्टा कहागया है। इसके अतिरिक्त एक ही देवता में
अनेक देवता के कार्य भी मन्त्रों में देखे जाते हैं जैसे कि-
"अग्नि मग्न आवह" 'हे अग्ने ! तू अग्नि को ला' यहां
वही बुलाने वाला औरउसी के द्वारा वह बुलाया जाने वाला
भी है। क्यों कि- पार्थिव अग्नि से अन्य अग्नि कोई सूक्त
का भजन करने वाला या हविः का भजन करने वाला नहीं

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८अ० २पा० १२ खं०
है, जिससे वह बुलाया जाता तथा यजन किया जाता। और
स्विष्टकृत मन्त्र में "स्वं महिमानमावह > 'तू अपनी महि-
मा को धारण कर' यहां स्पष्ट प्रतीत होता है, वह विधि के
अधीन आह्वान से अपने आत्मा को सस्कार करके दो, तीन
या अनेक होजाता है, उसी प्रकार यहाँ भी अग्नि होता ही
अपने दूसरे रूप से त्वष्टा कहा गया है।
३ ऐतिहासिकों के मतका समाधान भी यही है कि-
अग्नि के ही वैसे गुण वर्णन करने के अर्थ उसे ऐसा कहागया
है। ये शाकपूणि के मत के साधन और समाधान हैं
यही सिद्धान्त भी है, इसी से आगे ऋचा भी देते हैं, जिस
में त्वष्टा के अग्नि होने का विस्पष्ट लिङ्ग है [जो दूसरे में नहीं
घटताहै]। ॥ ११ (१४) ॥
(खं० १२)
निरु०-) “आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्माना
मूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे । उभ त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जाय-
मानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते ॥” (ऋ०सं०
१,७,१,५) ॥
'आविः' आवेदनात् । तत्यः(आविष्ट्यः) वर्द्धते
चारुः आसु ।
'चारु' चरतेः ।
'जिह्मं' जिहीतेः ।
'ऊर्ध्वः' उच्छ्रितो भवति ।

हिन्दी निरुक्त ( १७० ) ८ अ० २ पा० १२ खं०
'स्वयशाः' आत्मयशाः ।
'उपस्थे' उपस्थाने ।
“उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं
प्रति जोषयेते”
द्यावापृथिव्यौ- इति वा । अहोरात्रे इति वा ।
अरणी इति वा । प्रत्यक्ते 'सिंहं' सहनं प्रत्यासेवे-
ते ॥१२(१५) ॥
इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२ ॥
अर्थ:- “आविष्ट्यो०” 'आविष्ट्यः प्रकाश का विस्तार
करने वाला 'चारुः' चलने वाला [ कभी स्थिर नहीं होता ]
'जिह्मानाम्' टेढे काष्ठों या मनुष्योंके लिये भी 'ऊर्ध्वः' सदा
ऊपर की ओर जलने बाला 'उपस्थे' ( उपस्थाने ) उपस्थान
में = स्तुति में 'स्वयशाः' ( आत्मयशाः ) अपने यश को धा-
रण करने वाला किन्तु दूसरे में आश्रित होकर यश वाला
नहीं [ ऐसा त्वष्टा = अग्नि ] 'आसु' [ क्रियासु ] इन क्रिया-
ओं में 'वर्द्धते' बढता है । 'उभे' दोनों ही 'जायमानात्'
( एव ) उत्पन्न होते ही हुए 'त्वष्टुः' त्वष्टा अग्नि देव से
'बिभ्यतुः' डरीं । 'प्रतीची' ( प्रत्यक्ते ) इस के प्रति अभिमुख
गई हुईं 'सिंहं-प्रति' सहन के प्रति (सहने को) 'जोषयेते'
(प्रत्यासेवेते ) सेवा करती हैं ॥
'आविष्ट्यः' क्या ? 'आविः' नाम प्रकाश, क्यों ? आवे-
दन ( ज्ञान देने ) से, और 'त्य' उसका फैलाने वाला [ प्र-
काश का फैलाने वाला ] 'आविष्ट्य' है ।

हिन्दी निरुक्त ( १७१ ) ८ अ० ३ पा० १ खं०
'चारु' कैसे ? गति अर्थ में 'चर' ( भ्वा०प० ) धातु से ।
क्योंकि- वह चलता ही रहता है, कभी स्थिर ( अचल )
नहीं होता ।
'जिह्म' कैसे ? गति अर्थ में 'हा' ( जु० आ० ) धातु से ।
क्योंकि-वह कुटिल ( टेढा ) होने से किसी से मिलता नहीं,
अलग ही चला जाता है ।
'उदूष्वं' क्या ? उच्छ्रित = ऊँचा होता है ।
'स्वयशाः' क्या ? आत्मयशाः = अपने यश वाला ।
'उपस्थ' उपस्थान होता है ।
'सभे' (दो) कौन? (क) द्यावा-पृथिवी । (ख) अहोरात्र =
दिन और रात्रि । (ग) अथवा अरणि । क्यों ? उक्त तीनों ही
थोक उससे डरते हैं कि-यह (अग्नि) बढ़ता हुआ हमें जला
देगा। इसी से ये सब यथापक्ष उसकी सेवा करते हैं ॥१२(१५)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२॥
तृतीयः पादः ॥
( ख० १ )
निरु०-'वनस्पतिः' व्याख्यातः ।
तस्य-एषा भवति- ॥ १ (१६) ॥
अर्थः-वनस्पति (१२) देवतानाम ( अ०८पा०१खं०१ में )
व्याख्यान किया जाचुका है । "एष हि वनानां पाता
वा पालयिता वा" अर्थात्- यह वनों का पालन करने
वाला है ।
उसकी यह ऋचा है—॥ १ (१६) ॥

हिन्दी निरुक्तं ( १७२ ) ८ सं० ३ पा० २ खंड
( सं० २ )
(निरु०-) "उपावसृजत्तम॑न्था समञ्जन्देवानां पाथ
ऋतुथा हवींषि । वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः
स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन ॥” (ऋ०सं०८,६,९,५)
उपावसृज, आत्मना आत्मानं समञ्जन्, देवा-
नामन्नम्, ऋतौ ऋतौ हवींषि काले काले ।
वनस्पतिः, शमिता, देवः-अग्निः- इत्येते त्रयः
स्वदयन्तु हव्यं मधुना च घृतेन च ।
तत्र को वनस्पतिः ? यूपः-इति कात्थक्यः ।
अग्निः-इति शाकपूणिः ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥२(१७)॥
अर्थ- "उपावसृज०" हे देव ! (त्वम्) तू (एतत्)
इस 'देवानाम्' देवताओं के 'पाथः' अन्न को 'हवींषि' और
घृत आदि हविओं को 'ऋतुथा' (ऋतौ-ऋतौ = काले काले)
ऋतु ऋतु पर या समय समय में 'त्मन्या' (आत्मना आत्मानम्)
आत्मा से आत्मा को 'समञ्जन्' संस्कार विशेष से प्रकट
करता हुआ अथवा सचिक्कण = चिकना करता हुआ 'उप'
(आश्लिष्य) उसके साथ लग कर 'अवसृज' रच या बना ।
'वनस्पतिः' वनस्पति, 'शमिता' शमिता और अग्निः देवः'
अग्नि देव (इति एते त्रयः) ये तीनों देवता 'मधुना' मधु से
'घृतेन'-(च) और घृत से 'हव्यम्' हविः को स्वदन्तु (स्वदयन्तु)
स्वादु बनायें ।

हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ८ अ० ३ पा० ३ खं०
“तत्०” सो कौन वनस्पति है ?
यूप = यज्ञ का खम्भा, यह कात्यक्य कहते हैं ।
अग्नि है, यह शाकपूणि मानते हैं ।
उसकी यह दूसरी ऋचा है ॥ २ (१७) ॥
( खं० ३ )
(निरु०-) “अञ्जन्ति त्वा मध्वरे देवयन्तो वन-
स्पते मधुना दैव्येन । यद् दुर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह
धत्ताद्यद्वाक्षयो मातुरस्या उपस्थे ॥” [ ऋ० सं०
३, ३, १, १ ]
अञ्जन्ति त्वाम् अध्वरे देवान् कामयमाना
वनस्पते मधुना दैव्येन च घृतेन च । यद् ऊर्ध्वः
स्थास्यसि द्रविणानि च नो दास्यसि । यद्वा ते
कृतः क्षयः, मातुःअस्या उपस्थे उपस्थाने ।
अग्निः- इति शाकपूणिः ।
तस्य एषा अपरा भवति-॥३(१८)
अर्थः-“अञ्जन्ति०” इसका विश्वामित्र ऋषि, त्रि-
ष्टुप् छन्द और यूप देवता तथा यूप के घृत से अञ्जन या
चुपड़ने में विनियोग है, यह ऋचा पुरोरुक् तथा अनुवाक्य
संज्ञक है । यूप पक्ष में निगम है ॥
हे यूप ! हे ‘वनस्पते !’ ‘त्वाम्’ तुझे ‘अध्वरे’ यज्ञ में ‘देव-
यन्तः ( देवान् यष्टुं कामयमानाः ) देवताओं को यजन करने
की इच्छा करते हुए ऋत्विज् और यजमान ‘दैव्येन’ संस्कार