भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

•हिन्दी निरुक्त ( ४५७ ) ११अ० ४पा० १०खं० “तस्याः०” उस (अघ्न्या) की यह ऋचा है ॥९[४३]॥ (खं० १०) “निरु०- सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्व- दानीं पिव शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥” (ऋ० सं० २, ३, २१, ५) ॥ सुयवसादिनी भगवती हि भव अथ इदानीं वयं भगवन्तः स्याम, अद्धि तृणम् अघ्न्ये ! सर्वदा पिव च शुद्धम् उदकम् आचरन्ती ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥१०[४४]॥ अर्थः- “सूयवसाद्भ०” इस ऋचा का ऋषि पूर्व के समान है । माध्यमिक वाक् से कहाजाता है— 'अघ्न्ये !' हे अघ्न्ये ! नहीं मारने योग्य ! या अघ [पाप] को नाश करने वाली ! मध्यम लोक की वाक् ! 'सूयव- सात्' [सुयवसादिनी] सूयव [जल] को अपना आत्मा बनाकर या अपने अधीन करके [त्वम्] तू 'भगवती' [धनवती उदकेन] [जल से धन वाली 'भूयाः' [भव] हो 'अथो' [अथ] [इदानीम्] अब तुझे भगवती या धनवती होते ही 'वयम्' हम 'भगवन्तः' [धनवन्तः] धन वाले 'स्याम' होवें । हे अघ्न्ये ! 'तृणम्' (मेघम्) मेघको 'अद्धि' [संचूर्णय] भले प्रकार विदारण कर । 'विश्वदानी'म् (सर्वदा) (च) और सब काल में 'शुद्धम्' शुद्ध 'उदकम्' जल को 'आचरन्ती' सब अन्तरिक्ष में विचरती हुई 'पिब' पी (पानकर) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४५८ ) ११ अ० ४ पा०, ११ खं० “तस्याः”० उस अघ्न्याकी यह और ऋचा है॥१०[४४]॥ ( खं० ११ ) निरु०- “हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समि- च्छन्ती मनसाऽभ्यागात् । दुहा मश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय ॥” [ऋ०सं० २, ३, १९, २ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘पथ्या’ ‘स्वस्तिः’पन्था अन्तरिक्षं तन्निवासात। तस्या एषा भवति ॥११ [४५] ॥ अर्थः- “हिङ्कृण्वती०” इसका पूर्व के समान ऋषि आदि है । ‘हिङ्कृणवती’ ‘हिङ्’ ऐसा शब्द करती हुई ‘वदुपत्नी’ वसुओं [उदकों] की पत्नी (ईश्वरी) ‘वसूनाम्’ अथवा आदित्य रश्मिओं की अथवा मरुतों की ईश्वरी ‘मनसा’मन से ‘वत्सम् इच्छन्ती’ आदित्य रूप या मध्यम ( वायु ) रूप वत्स को इच्छा करती हुई मध्यम लोक की वाक् ‘अभ्यागात्’ अभि- मुख = संम्मुख (सामने) आई । ‘इयम्’ यह ‘अघ्न्या’ मध्यमा वाक् ‘अश्विभ्याम्’ द्यावा पृथिवी लोकों के लिये या सूर्य चन्द्रमा दोनों के लिये‘पयः’ जल ‘दुहाम्’(दुग्धाम् = प्रक्षरताम् झरे । ‘सा’ सो मध्यमा वाक् (अघ्न्या)‘महते—सौभगाय’हमारे बड़े सौभाग्य के अर्थ ‘वर्द्ध ताम्’ बढे-इसी प्रकार प्रतिवर्ष जैसे हमारा सौभाग्य बड़े वैसे ही जलसे बढ़े—जलकी वृद्धि करे ॥ “इति सा ” सो यह ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या

[Header] हिन्दी_निरुक्त ( ४५६ ) ११अ० ४पा० १२खं० की गई जैसी है—सुगमता के कारण व्याख्या की पेक्षा नहीं रखती (भाष्यकार कहते हैं) ॥ 'पंथ्या' (३२) 'स्वस्ति' [३३] ये दो शब्द हैं । 'पंथ्या' क्या? 'पन्थाः' अन्तरिक्ष होता है, उसमें निवास होने से वह 'पथ्या' है। तस्याः०" इस (पथ्या) की यह ऋचा है ॥ ११(४५)॥ [ खं० १२ ] निरु०—“स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति । सा नो अमा सो अरणे निपातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥” (ऋ०सं० ८,२,५,६) स्वस्तिः एव हि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वती धनवती अभ्येति, या वसूनि वननीयानि सा नः अमा गृहे सा निरमणे सा निर्गमने पातु स्वावेशा भवतु देवी गोप्त्री देवान् गोपायतु-इति, देवा एनां गोपायन्तु इति वा । 'उषाः' व्याख्याता । तस्या एषा भवति-॥१२(४६)॥ अर्थः—“स्वस्तिरिद्धि०” इस ऋचा का वसुकर्ण ऋषि है। 'या' जो 'स्वस्तिः' 'इत्' (एव) स्वस्ति देवी ही 'प्रपथे' (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में 'श्रेष्ठा' सब देवताओं से श्रेष्ठ है, 'रेक्णस्वती' (धनवती) धनवाली है, 'वामम्' (वसूनि =

वननीयानि) जलों के 'अभ्येति' साम्हने जाती है, 'सा' वह 'नः' हमें 'अमा' (गृहे) घर में 'पातु' रक्षा करे 'सा' वह 'नि- ष्परखे (अरण्ये वा निरमणे) अरण्य या भयानक स्थान में (रक्षा करे) (सा) वह (निर्गमने) घर से बाहर (पातु) रक्षा करे । वह देवी स्वस्ति 'स्वावेशा' (सूपचरणा) हमको शुभागमन वाली 'भवतु' हो। 'देवगोपा' (देवी गोप्त्री = देवान् गोपायतु इति) देवताओं को रक्षा करने वाली (देवाः एनां गोपायन्तु इतिवा) अथवा देवता इसको रक्षा करें ऐसी होवे-या यह देवताओं की रक्षणीय हो ॥ 'उषाः' (३४) शब्दकी व्याख्या होचुकी [२,६,१] "तस्याः०" उस (उषाः) की यह ऋचा है ॥१२ (४६)॥ [ खं० १३ ] निरु०- "अपोषा अनसः सरत् संपिष्टादह बिभ्युषी । नियत्सीं शिश्नथद्वृषा ॥" (ऋ० सं० ३, ६, २०, ५) ॥ अपासरद् उषा अनसः सम्पिष्टाद् मेघाद् बिभ्युषी । 'अनो' वायुः । अनितेः । अपि वा उपमार्थे स्याद् अनस इव = शकटादिव । 'अनः' शकटम् । आनद्धम् अस्मिन् चीवरम् । अनिते र्वा स्याद् जीवनकर्मणः । उपजीवन्ति एनम् । मेघोऽपि 'अनः' एतस्मादेव ॥ यद् निरशिश्नथद् वृषा वर्षिता मध्यमः- ॥

५ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) ११अ० ४पा० १४क० तस्या एषा अपरा भवति - ॥ १३ (४७) ॥ अर्थः- "अपोषा अनसः०" इस ऋचाका और अगली ऋचा का वामदेव ऋषि है। 'उषाः' उषा 'सम्पिष्टात्' विदारण किये हुए 'अनसः' (मेघात्) मेघसे 'अप-सरत्' (अपासपत्) हटगई। क्यों ? 'बिभ्युषी' (बिभ्यती) डरती हुई। अर्थात् जब वायु मेघों को हनन करता है, उस समय, उसमें रहने वाली उषा 'यह मुझे भी मारेगा' इस ख्याल से डर कर उस से हटजाती है। कब "नियत् सीं शिश्रथद् 'वृषा" 'यत्' (यदा) जब ['सीम्'अनर्थक] 'वृषा' (वर्षिता मध्यमः)वृष्टि करनेवाला वायु मध्यम देव 'निशिश्रथत्' (निरशिश्रथत्) हनन करता है ॥ "अपिवा०" अथवा 'अनसः' यह उपमा अर्थ में हो सकता है 'अनसः इव' (शकटाद् इव)। जिस प्रकार कोई शाक- टिक (गडवाला) किसी लुटेरे आदि से गाड़ी तोड़ी जाने पर उससे निकल भागे,वैसे ही उषा वायुके द्वारा मेघके चूर्णित किये जाने पर उससे भय करती हुई निकल पड़ती है । 'अनः' क्या ? शकट (गाड़ा) क्यों ? इसमें चीवर (पिञ्जर) आनद्ध (बंधा हुआ) होता है। अथवा जीवन अर्थ में 'अन' (अदा०प०) धातु से है। क्योंकि इसको जीविकार्थी उप- जीवन करते हैं। मेघ भी 'अनस्' है, इसी धातु से। "तस्याः०" उस (उषाः)की यह और ऋचा है-॥१३(४७)॥ (खं० १४) निरु०-'एतदस्या अनः शये सुसम्पिष्टं विपाश्या.

ससार सीं परावतः ॥” (ऋ० सं० २, ६, ३१,१) ॥ एतद् अस्या अन आशते सुसम्पिष्टम् इतरदिव विपाशि विमुक्तपाशि ससार उषाः परावतःप्रेरित- वतः परागताद् वा । ‘इला’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति ॥१४ (४८) ॥ अर्थः-“एतदस्याः०” इस ऋचा में सृष्टि के पश्चात् पृथ्वी पर पड़े हुये जलको देख कर ऋषि उसमें विदीर्ण पड़े हुये मेघ की बुद्धिकरके उसी की ओर निर्देश करता हुआ कहता है- ‘एतद्’ यह ‘अस्याः’ (उषसः) इस उषा का ‘अनः’ (मेघा- ख्यम् ) मेघ रूप शकट ‘सुसम्पिष्टम्’ वायु से भली प्रकार चूर्ण किया हुआ ‘आशये’ (आशेते) पृथ्वी पर फैलकर पड़ा है, (इतरद् इव विपाशि = विमुक्तपाशि) जैसे दूसरा मनुष्य का गाड़ा जिसके सब बन्धन टूटगये हों, पड़ा हो’ ‘परावतः’ (प्रेरितवतः) जिस प्रेरित किये गए या प्रेरित हुए हुएसे [परा- गताद् वा] अथवा दूर से भी दूर गए हुये से ‘उषाः’ उषा ‘ससार’ निकल भगी ॥ ‘इला’ [३५] शब्द की व्याख्या होचुकी । “तस्याः०” उस (इला) की यह ऋचा है ॥१४(४८)॥ ( खं० १५ ) निरु०-“अभि न इला यूथस्य माता स्मन्नदी”

८ हिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) ११ अ० ४ पा० १५ खं० भिर्वशी वा गृणातु । उर्वशी वा बृहद्दिवा गृणाना भ्यूर्णाना प्रभृत्यस्यायोः । सिषक्तु न ऊर्जव्यस्य पुष्टेः ॥” [ ऋ०सं० ४, २,१६, ६७ अथ०वा० ५, ३, ९, १९-२० ] अभिगृणातु नः इला यूथस्य माता सर्वस्य माता स्मदभि नदीभिः उर्वशी वा गृणातु उर्वशी वा बृहद्दिवा महद्दिवा गृणाना अभ्यूर्णाना प्रभृत्यस्य प्रभृतस्य आयोः अयनस्य मनुष्यस्य मनुष्वस्य ज्योतिषो वा उदकस्य वा सेवतां नः अन्नस्य पुष्टेः । ‘रोदसी’ रुद्रस्य पत्नी । तस्या एषा भवति– ॥ १५ ( ४९ ) ॥ अर्थः-“अभिन इला०” इस ऋचा का अग्नि ऋषि और शक्वरी छन्द है । “यूथस्य माता” मेघसमूह की माता = निर्माण करने वाली “उर्वशी वा” जो उर्वशी नाम से कही जाती है, या इडा नाम से कही जाती है, सो ‘इला’ मध्यमा देवी ‘नः’ (अस्मान्) हमें ‘अभिगृणातु’ [अभिशब्दयतु] बोले । कैसे ? ‘नदीभिः’ (नदनाभिः अद्भिः ) नदियों से = शब्दवाले जलों के द्वारा । ‘उर्वशी वा’ उर्वशी के समान ‘दिवा’ बिजली सहित जल समूह से ‘बृहत्’ (महत) बहुत ‘गृणाना’ बोलती हुई ‘अभ्यूर्वाना’ इस जगत् को आच्छादन करती

हिन्दी निरुक्त ( ४६४ ) ११ अ० ४ पा० १६ ख० हुई इला 'प्रभृथस्य' [प्रभृतस्य] इकट्ठे किये हुये 'आयौः' गमन स्वभाव जल के [समूह से] 'नः' हमें "सिषक्तु" सींचे । किस प्रयोजन के लिये ? "ऊर्जव्यस्य पुष्टेः" अन्न की पुष्टि के लिये ॥ “अभ्रूण्वाना प्रभृथस्य आयौः” [आयौः अयमस्य मनुष्यस्य मनुष्यस्य ज्योतिषो वा उदकस्य वा [अथवा मनुष्य मनुष्य को ढांपने वाली या ज्योति को ढांपनेवाली या जल को ढांपने वाली इला हमें सींचे [अन्नस्य पुष्टे अन्न की पुष्टि के हेतु ॥ रोदसी [३६] क्या ? रुद्र की पत्नी (भार्या) । “तस्याः०” उस [रोदसी] कीयह ऋचा है ॥१५[४६]॥ व्याख्या । मन्त्र में “उर्वशी वा” ऐसा पाठ दो वार आया है । उनमें एक बार इला और उर्वशी में अभेद बुद्धि से इलाका ही उर्वशी नामान्तर कहा गया है, और दूसरी वार उन दोनों में भेद बुद्धि करके उर्वशी को इला की उपमा बनादी है, यह वक्ता वेद भगवान की इच्छा या कल्पना है ॥१५(४६) ॥ ( खं० १६ ) निरु०" रथन्त्व मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे आ यस्मिन् तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी ॥ ” ( ऋ० सं० ४३, २०, ३ ) ॥ रथं क्षिप्रं मारुतं मेघं वयं श्रवणीयम् आह्वया- महे, आ यस्मिन् तस्थौ सुरमणीयानि उदकानि

हिन्दी निरुक्त ( ४१५ ) ११अ० ४पा० १६खं० बिभ्रती सचा मरुद्भिः सह रोदसी रोदसी ॥ १६ ( ५० ) ॥ इति एकादशाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥११,४ ॥ अर्थः- " रथन्नु मारुतं०" इस ऋचा का श्यावाश्व ऋषि और अग्निसारुत में विनियोग है । " वयं ( तं ) रथं ( क्षिप्रं ) मारुतं (मरुत्सहितं) श्रवस्युं (श्रवणीयं) मेघम् आहुवामहे (आह्वया- महे) " हम उस शीघ्रगामी मरुतों सहित श्रवण करने योग्य मेघ को बुलाते हैं । "यस्मिन् सुरणानि [ सुरमणी- यानि उदकानि] बिभ्रती मरुत्सु [मरुद्भिः] सचा (सह) रोदसी आतस्थौ " जिसमेघरूप रथ में सुन्दर रमणीय जलों को धारण करती हुई मरुतों के सहित रोदसी या रुद्रकी पत्नी बैठती थी या बैठती है । 'रोदसी' शब्द का पुनः पाठ अध्याय की समाप्ति की सूचना के अर्थ है ॥ १६ ( ५० ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥११,४॥ निरुक्त के एकादश अध्याय का खण्ड सूत्र- (१ म पा०- ) श्येनः ( १ ) आदाय ( २ ) स्वादिष्ठया ( ३ ) सोमम् ( ४ ) यत्वा (५) नवोनवः ( ६ ) परंमृत्यवो (७) त्वेषमित्या ( ८ ) प्रबोमहे ( ६ ) उदुज्ज्योतिः ( १० ) धोता (११) सोमस्य ( १२ ) [ २ य पा०—] अथातो मध्यस्थाना देवगणाः [ १३ ] आविद्युन्मद्भिः [ १४ ] आरुद्रासः ( १५ )

हिन्दी निरुक्त ( ४६६ ) ११ अ० ४ पा० १६खं० विष्टी शमी [ १६ ) विरूपासः [ १७ ] उदीरताम् ( १८ ) अङ्गिरसः ( १९ ) सूर्यस्येव ( २० ) स्तुषेय्य [ २१ ] ( ३ य पा०- ] अथातो मध्यस्थानाः स्त्रियः ( २२ ) दक्षस्य वा ( २३ ) यस्मै त्वम् [ २४ ] किमिच्छन्ती [ २५ ] पावकानः (२६ ) भुवोहरसः (२७) यद्वाग् वदन्ती(२८) देवीं वाचम् (२९) अन्विदं वते (३०) राकामहम् (३१) सिनीवाली (३२) कुहूमहम् (३३) अन्यमूर्षु (३४) [ ४ र्थ पा०- ] उर्वशी (३५) विद्युन्म (३६) बलित्था (३७) इन्द्राणीम् ( ३८ ) नाह- मिन्द्राणि (३९) गौरीर्मिमाय(४०)तस्याह(४१) गौरसीमेद [ ४२] उपह्वये (४३) मूपवसात् (४४) हिङ्कृतवती (४५) स्वस्तिरिद्धि (४६) अपोषा (४७) एतदस्याः ( ४८ ) अभिन्नः (४९) रथं नु मारुतम् (५०) ॥ इति निरुक्ते [उत्तर षट्के) एकादशोऽध्यायः ॥११,(४) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते ( उत्तर षट्के ) एकदशोऽध्यायः समाप्तः ॥११ (४) ॥

अथद्वादशोऽध्यायः ॥ प्रथमः पादः । [ खं० १ ] निघ०- अश्विनौ ॥१॥ उष्राः ॥ २ ॥ सूर्या ॥ ३ ॥ वृषाकपायी ॥ ४ ॥ संर- ण्यूः ॥५॥ निरु०- ॐ॥ अथातो द्युस्थाना देवताः । तासाम् अश्विनौ प्रथमागामिनौ भवतः 'अश्विनौ' यद् व्यश्नुवाते सर्वम्, रसेन अन्यः ज्योतिषा अन्यः । “अश्वैः अश्विनौ”- इति और्णवाभः । तत् कौ अश्विनौ ? “द्यावापृथिव्यौ”- इत्येके । “अहोरात्रौ”- इत्येके । “सूर्याचन्द्रमसौ”- इत्येके “राजानौ पुण्यकृतौ”- इति ऐतिहासिकाः । तयोःकालः ऊर्द्धवम् अर्द्धरात्रात् प्रकाशीभावस्य अनुविष्टम्भम् अनु तमोभागो हि मध्यमः,ज्योति- र्भागः आदित्यः । तयो एषा भवति ॥१॥

हिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) १२ अ० १ पा०, १ खं०

अर्थः-मध्यस्थान के देवताओं का विशेष वचनों और लिङ्गों के द्वारा व्याख्यान हो चुका, अब उसी समाम्नाय के अनुक्रम के अनुसार द्युस्थान [उत्तम स्थान] के देवताओं का व्याख्यान करना चाहिये, इस लिये विशेष रूप से पुनः अधिकार वचन कहते हैं-, “अथातो द्युस्थाना देवताः” अब यहां से द्युस्थान के देवताओं का व्याख्यान किया जावेगा । उनमें 'अश्विन्' प्रथमागामी (पहिले आने योग्य) हैं। 'अश्विनौ' [१] [अश्विन्] क्यों हैं? 'यद् व्यश्नुवातेसर्वम्' जिससे कि- वे सब को व्यापन करते हैं, उनमें एक रस (जल) से, और दूसरा (एक) ज्योति या प्रकाश से । अश्वों (घोड़ों) से वे 'अश्विन्' हैं- वे घोड़े वाले होने से 'अश्विन्' हैं । यह और्णवाभ आचार्य मानता है । (यह व्या- ख्यान ऐतिहासिक पक्ष में घटता है ।) “तत्०” सो कौन अश्विन् हैं ? 'द्यावापृथिवी हैं- द्युलोक और पृथिवी लोक हैं' ऐसा कोई मानते हैं । 'अहोरात्र हैं- दिन और रात्रि हैं' ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।' 'सूर्य चन्द्रमा हैं -ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।' 'पुण्य कर्म के करने वाले राजा हैं- ऐसा ऐतिहासिक मानते हैं।' “तयोः०” उन (अश्विनों)का काल अर्द्धरात्र(आधीरात) से पीछे है, ज्योति से फाड़ा जाता हुआ अंधेरा- जिस समय

हिन्दी निरुक्त ( ४६६ ) १२ अ० १ पा० १ ख० अन्धेरे को फाड़ता हुआ प्रकाश उसमें मिलने लगता है, या जब तक मिलता रहता है, वह काल सूर्योदय से पहिले २ अश्विनों का है । “तमोभागोहि मध्यमः” उस प्रकाश और अन्धकार के मेल में अन्धेरे का भाग मध्यम देव है ।— “ज्योतिर्भागः आदित्यः” और प्रकाश भाग आदित्य (उत्तम देव) है। (यह नैरुक्त मत है) ॥ "तयोः०" उन दोनों (अश्विनों) की यह ऋचा है ॥१॥ व्याख्या । “द्युस्थाना देवताः ” यद्यपि नैरुक्तों के मत में द्युस्थान का एक ही आदित्य देवता है, इससे 'देवता' पद में एक वचन ही चाहिए, तथापि याज्ञिकों के मत में बहुत देवता हैं, उनके मत में यह बहुवचन चरितार्थ हो जाता है । द्युस्थान के देवताओं का भेद । यद्यपि स्वरूप से सभी द्युस्थान के देवता एक जैसे हैं, तथापि भिन्न २ काल के सम्बन्ध से वे न्यारे २ समझे जाते हैं । तदनुसार अश्विनों का अन्य द्युस्थान के देवताओं से भेद बताने के लिये प्रथम व्याख्येय अश्विनों का “तयोः कालः०” इस पङ्क्ति से काल बता- या है। इसी प्रकार अन्य २ देवताओं के व्याख्यानों में भी उनके काल का अनुसन्धान रखना चाहिए । दोनों अश्विन भिन्न २ लोक के 'अश्विन्' नाम के दो जोड़ले जैसे देवता हैं, जहां कहीं भी इनका नाम आता है, द्विवचन से ही आता है, इसी से इनका अर्चन एक साथ

हिन्दी निरुक्त ( ४७० ) १२अ० १पा० १खं० एक मन्त्र से ही होता है, किन्तु ये दोनों भिन्न-२ लोक के देवता हैं। इनमें एक अन्धकार रूप है और एक प्रकाशरूप । जो अन्धकार रूप है, वह मध्यम लोक का और जो प्रकाशरूप है, वह उत्तम लोक का है । उत्तम लोक के देवताओं में व्याख्यान क्यों ? यद्यपि इन में एक देवता मध्यम लोक का है इससे इस [ अश्विन ] की व्याख्या मध्यम देवताओं में चाहिए, और एक उत्तम लोक का है, इससे उत्तम लोक के देवताओं में (जैसे कि-यहां है) चाहिए अथवा मध्यम (तमोरूप) का मध्यमों में और उत्तम (प्रकाशरूप] का उत्तमों में व्याख्यान होना चाहिये ? तथापि इनकी स्तुति सर्वत्र एक साथ ही आती है, किन्तु एक २ की नहीं इससे इनका ऐसा निगम नहीं दिया जा सकता जो एक देवता को वर्णन करे, इस से इन की व्याख्या एक ही लोक के देवताओं में होसकती है, और तथापि उत्तम लोक के देवताओं ही में उचित है। क्योंकि- उत्तम लोक का जो देवता प्रकाशरूप है, वही अपने प्रकाश रूप से वर्द्धमान है, और दूसरा जो तमोरूप है, वह सूर्योदय की ओर जितना चलता है अपने तमोरूप से क्षीण होता जाता है, प्रयोजन ? उत्तम देवता की बलवत्ता के कारण उसके अधि- कार में व्याख्या प्राप्त होती है, इस से यहाँ व्याख्या की गई है ॥ आचार्य का मत । यास्क का मत यह है कि-ये 'अश्विन्' नाम से मध्यम उत्तम देवता हैं। जिसके समर्थन के लिये यह उदाहरण देते हैं- ॥१॥

'हिन्दी' निरुक्त ( ४७१ ) १२ अ० १ पा० २ खं० [ खं० २ ] निरु०- "वसातिषु स्म चरथोऽसितौ पेत्वा- विव। कदेदमश्विना युव मभि देवाँ अगच्छतम्॥" इति सा निगदव्याख्याता ॥ तयोः समानकालयोः समानकर्मणोः संस्तुत- प्राययोः असंस्तवेन एषोऽर्द्धर्चो भवति- "नासात्यो अन्य उच्यत उषः पुत्रस्तवान्यः" इति । तयोः एषा अपरा भवति- ॥ २ ॥ अर्थः-"वसातिषुस्म-"ऋषि को देवता के दर्शन की दृष्टि प्राप्तहुई, रात्रि भाग के बीते, दिनकी उगाली (सन्धि) हुई, ऋषि सहसा ही (एकदम ही) अश्विन देवों को देखकर कहता है। हे 'अश्विनौ।' हे अश्विन देबो ! 'युवाम्' तुम दोनों 'असितौ' काले 'पेत्वौ-इव' मेघों के समान 'वसातिषु' (रात्रिषु) रात्रियों में चरथ'(स्म) विचरते हो-आप के काले २ होने से रात्रिमें मैं आपको न देख सका, अब इस उषाकाल में किसी प्रकार देख सकाहूं, इसी से कहता हूँ- 'अश्विना' (अश्विनौ !) हे अश्विन् देवो ! 'कदा' कब 'इदम्' (अस्मत्कर्म प्रति) इस हमारे कर्म के प्रति (ये देवा आगता) जो देवता आए हैं, उनके प्रति 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों 'अभिगच्छतम्' आए ? ॥ . यह, सो ऋचा पाठ से ही व्याख्या की गई है।

हिन्दी निरुक्त ( ४७२ ) १२ अ० १ पा०, ३ खं० ॥ “तयोः०” उन दोनों समान काल वालों समान कर्म वालों प्रायः एक साथ स्तुति वाले अश्विनों की पृथक् स्तुति की यह आधी ऋचा है ।- “वासात्यो अन्य०” अर्थात्— 'अन्यः' ( एकः ) एक 'वासात्यः' रात्रि को पुत्र है 'अन्यः' एक “तव उषःपुत्रः” तुझ उषा का पुत्र है । यह ॥ “तयो रेषा०” उन ( अश्विनों ) की यह और ऋचा है ॥ २ ॥ ( खं० ३ ) निरु०- इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३ नामभिः स्वैः । जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरि र्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ॥” (ऋ०सं० २, ४, २५, ४ ) । इह च इह च जातौ संस्तूयेते पापेन अलिप्य- मानया तन्वा नामभिश्च स्वैः जिष्णुर्वामन्यः सुमहतो बलस्य ईरयिता मध्यमः , दिवः अन्यः सुभगः पुत्रः ऊह्यते आदित्यः । तयोः एषा अपरा भवति ॥३॥ अर्थ—“इहेह जाता०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि और प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है । ( हे अश्विनौ ! युवाम् ऊह्येथे ) हे अश्विनो ! तुम दोनों

० हिन्दी निरुक्त ( ४७३ ) १२अ० १पा० ४खं० से कहा जाता है- "इह-इह जाता" ( इह च (मध्यस्थाने) इह च ( द्युस्थाने ) जातौ ) यहां मध्य स्थान में और यहां द्युस्थान में 'जाता' ( जातौ ) उत्पन्न हुए हुए तुम दोनों 'अरेपसा' ( पापेन अलिप्यमानया ) पाप से न लिपती हुई ( पापरहित ) 'तन्वा' शरीर से—अपने संकल्प के अनुसार ग्रहण किये हुए देह से 'स्वैः' अपने 'नामभिः' नामों से— जो दूसरे के आश्रय के बिना अपनी स्तुति के निमित्त से हैं 'समवावशीताम्' ( संस्तूयेते = संस्तूयेथे ) स्तुति किये जाते हो और वाम्' तुम दोनों में 'अन्यः' एक 'जिष्णुः' नित्य ही जय लाभ करने वाला 'सुमखस्य' ( सुमहतौ बलस्य ) सुन्दर महान् बलका 'सूरिः' ( ईरयिता ) प्रेरणा करने वाला है ( मध्यमः ) इससे मध्यम ( वायु या इन्द्र ) है । क्योंकि— ऐसे गुण वाला मध्यम से अन्य नहीं है । 'अन्यः' और एक 'सुभगः' सुन्दर धन वाला 'दिवः' द्युलोक का 'पुत्रः' पुत्र 'उहे' ( उह्यते वायुना ) वायुके द्वारा वहन किया जाता है— चलाया जाता है या लेजाया जाता है, वह (आदित्यः) आ- दित्य है। क्योंकि—वह सूर्य से अन्य नहीं हो सकता । इस प्रकार वहां परभी ये दोनों अश्विन मध्यम उत्तम देवरूप हैं। “तयोः०” उन दोनों ( अश्विनों ) की यह और ऋचा है । [ वह क्यों ? ये दोनों देवते साथ स्तुति वाले समान काल वाले और समान कर्म वाले हैं, यह कहा है, उसके दिखाने के अर्थ यह ऋचा है । ] ॥३॥ ( खं० ४ ) निरु०—“प्रातर्युजा विबोधयाश्विना वेह गच्छ.

हिन्दी निरुक्त ( ४७४ ) १२अ० ५पा० १ खं० ताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥” (ऋ०सं० १, २, ४, १) प्रातर्योगिनौ विबोधय अश्विनौ-आगच्छताम् अस्य सोमस्य पानाय ॥ तयोः एषा अपरा भवति ॥४॥ अर्थः- “प्रातर्युजा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे (स्तोतः) स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! 'प्रातर्युजा' (प्रातर्योगिनौ) प्रातःकाल मिलने वाले-प्रातःकाल में हविः से और स्तुति से संयुक्त होने वाले 'अश्विनौ' अश्विन् देवों को 'विबोधय' जगा-सुन्दर स्पष्ट स्तुतियों से (अस्मदर्थम्) हमारे लिये जना । और तुमसे जनाये हुए वे दोनों 'इह' इस हमारे कर्म में 'आ-गच्छताम्' आवें । किस लिये 'अस्य' इस 'सोमस्य' सोम के 'पीतये' (पानाय) पीने के लिये ॥ “तयोः०” उन (अश्विनों) की यह और ऋचा है। (यह किस लिये है? इन अश्विनों की अन्य कालमें इज्या (पूजा) है ही नहीं, यदि कोई करे भी, तो वह अनिर्ज्या (अपूजा) या व्यर्थ पूजा ही है, और इनका संस्तव या सहस्तुति ही है, किन्तु पृथक् नहीं, यह अगली ऋचासे भली प्रकार दिखा- या जाता है) ॥४॥ (खं० ५) निरु०-“प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम् । उतान्यो अस्मद्यजते विचावः

पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान् ॥” (ऋ० सं० ४, ४, १८, २) ॥ प्रातः यजध्वम् अश्विनौ प्रहिणुत न सायम् अस्ति देवेज्या अजुष्टम् एतद् अपि अन्यो अस्मद् यजते विचावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान् वनयितृतमः । तयोः कालः सूर्योदयपर्यन्तः, तस्मिन् अन्या देवता ओप्यन्ते ॥ ‘उषाः’ वष्टेः कान्तिकर्मणः । उच्छतेः-इतरा मध्यमिका । तस्या एषा भवति-॥५॥ अर्थ :-“प्रातर्यजध्वम्०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है । हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो तुम से कहा जाता है-(यूयम्) तुम सब ‘अश्विना’ (अश्विनौ) अश्विनों को ‘प्रातर्यजध्वम्’ प्रातःकाल ही यजन करो, [इसीसे कहता हूँ] ‘हिनोत’ (प्रहिणुत) बहुतायत से उनके प्रति स्तुतियों और हवियों को पहुँचाओ । [मैं क्यों कहता हूँ प्रातःकाल यजन करो ? ] “न सायम् अस्ति देवया” (देवेज्या) इन दो देवताओं की सायंकाल में इज्या (पूजा) नहीं है। ‘अजुष्टम्’ (अनासेवितम्) यदि किसी प्रकार हो भी जावे, तो वह उनका अजुष्ट = अस्वीकृत है-सायंकाल में किये हुये यजनको वे देवता स्वीकार नहीं करते । ‘उत’ (एतदपि) और यह

हिन्दी निरुक्त ( ४७६ ) १२ अ० १ पा० ६ खं० भी है कि-‘अस्मद्’ हम से ‘अन्यः’ दूसरा कोई पुरुष ‘यजते’ इन अश्विनों को यजन करता है या करे, ‘विचावः’ (वि च अवः) (व्यावयति च) और हविष्यों से तर्पण करता है, या करे, तो “पूर्वंः पूर्वः यजमानः वनीयान्” (वनयि- तृतमः) पहिला पहिला यजमान सेवन करने योग्य होता है या मान्य होता है—क्योंकि—हम पहिले यजन करते हैं, इस से देवता के निकट उनके प्रसाद के पात्र हमीं बनेंगे ॥ “तयोः०” उन अश्विन देवों का सूर्योदय पर्यन्त काल है। [ उस से क्या है ? ] उस स्तुति कालमे अश्विनोंके शस्त्र में और देवता आवाप किये जाते हैं—अन्य देवताओं को उस काल की स्तुति प्राप्त हो, इस लिये वे वहां भरे जाते ( घाले जाते ) हैं = उनके मन्त्र पढ़े जाते हैं। ‘उषाः’ [२] कैसे ? कान्ति अर्थ में ‘वश’ [ अदा० प० ] धातु से है। जोकि-कहा है—(१, ६, १) ‘उच्छति’ (उच्छ भ्वा० प०) कत्र्तृवाच्य धातु का है, वह विकल्प से द्युस्थान उषा का नाम है। और जो दूसरी ‘उषाः’ मध्यम लोक की है, उसके लिये विकल्प नहीं है, किन्तु वह ‘उच्छ’ (भ्वा०प०) धातु से ही है। “तस्याः०” उस (मध्यम लोक की उषा) की यह ऋचा है— ॥ ५ ॥ [ खं० ६ ] निरु०-“उषस्तच्चित्रमाभरास्मभ्यं वाजिनीवती। येन तोकं च तनयं च धामहे ॥” ( ऋ० सं० १, ६, २६, ३ ) ॥