न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३
३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३ स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेयाभिमानः ? ॥ ३१ ॥ मायागन्धर्वनगरमृगतृष्णिकावद्वा ? ॥ ३२ ॥ यथा स्वप्ने न विषयाः सन्त्यथ चाभिमानो भवति, एवं न प्रमाणानि प्रमे- यानि च सन्त्यथ च प्रमाणप्रमेयाभिमानो भवति ? ॥ ३१-३२ ॥ हेत्वभावादसिद्धिः ॥ ३३ ॥ स्वप्नान्ते विषयाभिमानवत् प्रमाणप्रमेयाभिमानो न पुनर्जागरितान्ते विषयो- पलब्धिवदित्यत्र हेतुर्नास्तीति हेत्वभावादसिद्धिः । स्वप्नान्ते चासन्तो विषया उपलभ्यन्ते इत्यत्रापि हेत्वभावः । प्रतिबोधेऽनुपलम्भादिति चेत् ? प्रतिबोधविषयोपलम्भादप्रतिषेधः । यदि प्रतिबोधेऽनुपलम्भात् स्वप्ने विषया न सन्तीति ? र्तिह य इमे प्रतिबुद्धेन विषया उपलभ्यन्ते उपलम्भात् सन्तीति । विपर्यये हि हेतुसामर्थ्यम् । उपलम्भात्सद्भावे सत्यनुपलम्भादभावः सिद्ध्यति, उभयथा त्वभावे नानुपलम्भस्य सामर्थ्यमस्ति, यथा-प्रदीपस्याभावादरूपस्यादर्शन- मिति, तत्र भावेनाभावः समर्थ्यते इति । [ विज्ञानवादी फिर दूसरे रूप से बात उठाते हैं— ] यह प्रमाण-प्रमेय का अभिमान ( कल्पना ) स्वप्नविषय के अभिमान ( मिथ्या कल्पना ) की तरह है ? ॥ ३१ ॥ या कल्पित गन्धर्वनगर या मृगतृष्णा की तरह ( मिथ्या ) है ? ॥ ३२ ॥ जैसे स्वप्न में विषय वास्तविक नहीं अपितु कल्पित ही होते हैं, उसी तरह ये प्रमाण तथा प्रमेय दोनों ही नहीं हैं, केवल इनकी कल्पना कर ली गयी है ? ॥ ३१-३२ ॥ उक्त अभिमानकल्पना में हेतु न होने से वह असिद्ध है ॥ ३३ ॥ यह प्रमाण-प्रमेयबुद्धि स्वप्नप्रत्ययसदृशी है, जाग्रत्प्रत्ययसदृशी नहीं है—इसमें कोई हेतु नहीं, अतः हेत्वभाव से आपकी बात अयुक्त ही है। स्वप्नावस्था में गृहीत होनेवाले विषय नहीं हैं—इसमें भी कोई हेतु नहीं। यदि यह कहो कि जागने पर वे उपलब्ध नहीं होते अतः वे नहीं हैं ? तो जाग्रद- वस्था में तो वे उपलब्ध रहते ही हैं। तब 'जाग्रदवस्था में विषय नहीं हैं'—यह कैसे कहते हो ! हेतुसामर्थ्य से तभी कोई बात सिद्ध की जा सकती है कि जब वह कहीं अन्यत्र देखी गयी हो। अन्यत्र क्वचित् उपलब्धि से सत्ता सिद्ध होने पर ही अनुपलब्धि से उसका अभाव सिद्ध हो सकता है। जब उभयथा अभाव ही है तो अनुपलब्धिसामर्थ्य से आप क्या सिद्ध करेंगे ! जैसे किसी जगह प्रदीप के अभाव में रूप ( घटादि ) का अदर्शन सिद्ध करना है तो प्रमाता को अन्यत्र कहीं रूपदर्शन हुआ रहना चाहिये, उसी सामर्थ्य से वह कह सकता है कि 'प्रदीप नहीं है, अतः रूपादर्शन हैं' । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥
३३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० स्वप्नान्तविकल्पे च हेतुवचनम्। स्वप्नविषयाभिमानवदिति ब्रुवता स्वप्ना- न्तविकल्पे हेतुर्वाच्यः। कश्चित्स्वप्नो भयोपसंहितः, कश्चित्प्रमादोपसंहितः, कश्चि- दुभयविपरीतः, कदाचित्स्वप्नमेव न पश्यतीति। निमित्तवतस्तु स्वप्नविषयाभि- मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥ स्मृतिसङ्कल्पवच्च स्वप्नविषयाभिमानः ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्धविषयः। यथा स्मृतिश्च सङ्कल्पश्च पूर्वोपलब्धविषयौ न तस्य प्रत्याख्यानाय कल्पेते, तथा स्वप्ने विषयग्रहणं पूर्वोपलब्धविषयं न तस्य प्रत्या- ख्यानाय कल्पते इति। एवं दृष्टाविषयश्च स्वप्नान्तो जागरितान्तेन। यः सुप्तः स्वप्नं पश्यति स एव जाग्रत्स्वप्नदर्शनानि प्रतिसन्धत्ते—इदमद्राक्षमिति। तत्र जाग्रद्बुद्धिवृत्ति- वशात्स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति व्यवसायः। सति च प्रतिसन्धाने या जाग्रतो बुद्धिवृत्तिस्तद्वशादयं व्यवसायः स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति। उभयाविशेषे तु साधनानर्थक्यम्। यस्य स्वप्नान्तजागरितान्तयोरविशेषस्तस्य स्वप्नविषयाभिमानवदिति साधनमनर्थकम्; तदाश्रयप्रत्याख्यानात्। स्वप्नविकल्प में भी हेतु देना चाहिये ! पूर्वपक्षी को 'स्वप्नविषयाभिमानवत्' कहते हुए हेतु भी रखना चाहिये। कोई स्वप्न राग से, कोई भय से, कोई प्रमाद से तथा कोई इनके अभाव अर्थात् अदृष्ट से होता है, कोई पुरुष स्वप्न देखता ही नहीं। निमित्तवान् स्वप्नविषयाभिमान के निमित्तविकल्प से निमित्तविकल्प बन जायेगा ॥ ३३ ॥ स्वप्नविषयाभिमान भी स्मृति तथा सङ्कल्प के समान ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्ध विषय वाला है। जैसे स्मृति और सङ्कल्प पूर्वोपलब्धविषयक ही होते हैं, उनका प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता; उसी तरह स्वप्न में दिखायी देने वाला विषय भी पूर्वोपलब्ध है, उनका प्रत्याख्यान कैसे होगा ! इस तरह स्वप्न-ज्ञान जाग्रज्ज्ञान से दृष्टविषय है। सोया हुआ मनुष्य जो कुछ स्वप्न में देखता है, जगने पर वह उसका प्रतिसन्धान करता है कि 'ऐसा मैंने स्वप्न में देखा था'। यों जाग्रज्ज्ञान होने पर जाग्र- त्पुरुष की ज्ञानवृत्ति के कारण यह निश्चय होता है कि स्वप्न में देखा गया विषय मिथ्या था; क्योंकि वह इस समय उपलब्ध नहीं है। यदि इन दोनों ( स्वाप्न एवं जाग्रत ) ज्ञानों को ही मिथ्या मानें तो साधनानर्थक्य होने लगेगा। यो, स्वाप्न तथा जाग्रत—दोनों ही ज्ञानों को मिथ्या मानता है, उसके लिये बाकी क्या रह जाता है कि उसे वह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है; क्योंकि उसने तो उस मिथ्याज्ञान के आश्रय जाग्रज्ज्ञानाधीन वस्तु का ही प्रत्याख्यान ( अप- लाप ) कर दिया ! अर्थात् जाग्रत् से स्वप्न या स्वप्न से जाग्रज्ज्ञान होता हैं—इसमें विनिगमन करना ही कठिन है।
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५
३५. सू० ] बाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३५ अतस्मिंस्तदिति च व्यवसायः प्रधानाश्रयः । अपुरुषे स्थाणौ पुरुष इति व्यवसायः स प्रधानाश्रयः, न खलु पुरुषेऽनुपलब्धे 'पुरुषः' इत्यपुरुषे व्यवसायो भवति । एवं स्वप्नविषयस्य व्यवसायः—हस्तिनमद्राक्षं पर्वतमद्राक्षमिति प्रधानाश्रयो भवितुमर्हति ॥ ३४ ॥ एवं च सति— मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्वज्ञानात्स्वप्नविषयाभिमानप्रणाशवत्प्रतिबोधे ॥ ३५ ॥ स्थाणौ पुरुषोऽयमिति व्यवसायो मिथ्योपलब्धिः, अतस्मिंस्तदिति ज्ञानम्; स्थाणौ स्थाणुरिति व्यवसायस्तत्त्वज्ञानम्, तत्त्वज्ञानेन च मिथ्योपलब्धिर्निवर्त्यते, नार्थः स्थाणुपुरुषसामान्यलक्षणः । यथा प्रतिबोधे या ज्ञानवृत्तिस्तया स्वप्नविषया भिमानो निवर्त्यते, नार्थो विषयसामान्यलक्षणः; तथा मायागन्धर्वनगरमृग- तृष्णिकाणामपि या बुद्धयोऽतस्मिंस्तदिति व्यवसायाः, तत्राप्यनेनैव कल्पेन मिथ्योपलब्धिविनाशस्तत्त्वज्ञानान्नार्थप्रतिषेध इति । उपादानवच्च मायादिषु मिथ्याज्ञानम् । प्रज्ञापनीयसरूपं च द्रव्यमुपादाय अभाव में सत्ता ( तदभाववान् में तत्त्व ) का व्यवसाय प्रधानाश्रित होता है । पुरुषाभावयुक्त स्थाणु में पुरुषव्यवसाय पुरुषाश्रित है । पुरुष यदि कहीं प्रमाता को अन्यत्र न उपलब्ध हुआ हो तो वह स्थाणु में पुरुषव्यवसाय कभी नहीं कर पायेगा । इसी तरह 'हाथी देखा था, पर्वत देखा था'—यह स्वप्नगत विषय का व्यवसाय भी जाग्रज्ज्ञानरूप प्रधान का आश्रय लेकर ही हो सकता है ॥ ३४ ॥ ऐसा मानने पर— जगने पर स्वप्नज्ञान के नाश की तरह तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञानोपलब्धि का विनाश हो जाता है ॥ ३५ ॥ स्थाणु में 'यह पुरुष है'—ऐसा व्यवसाय मिथ्योपलब्धि है, यही में तदभाववान् 'तत्ता' ज्ञान कहलाता है । स्थाणु में 'यह स्थाणु है'—ऐसा ज्ञान तत्त्वज्ञान कहलाता है । तत्त्व- ज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो जाती है, न कि स्थाणुपुरुष में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों ( स्थाणुत्व, पुरुषत्व ) का-कोई अर्थ नहीं रह जाता, अर्थात् इस तत्त्व- ज्ञान से उन विषयों में कोई परिवर्तन नहीं होता । जैसे जगने पर हुई ज्ञानवृत्ति से स्वप्न- विषयक मिथ्याभिमान नष्ट हो जाता है, न कि जाग्रत्स्वप्न-विषयों में उपलब्ध होने वाले सामान्य लक्षणों का कोई अर्थ नहीं है । इसी तरह मायाकल्पित गन्धर्वनगर, मृगतृष्णा आदि में तदभाववान् में तत्ता के ज्ञान का भी उक्त रीति से ही खण्डन समझ लेना चाहिये । वहाँ भी तत्त्वज्ञान से मिथ्योपलब्धि निवृत्त हो, जाती है विषय में कोई परिवर्त्तन नहीं होता । यों यह मिथ्याज्ञान सत् के आश्रित है । माया या इन्द्रजाल में मिथ्याज्ञान होता है । मायिक जिस विषय का आभास उत्पन्न करना चाहता है तत्सदृश किसी सद् द्रव्य को स्मृति में लेकर ही वह दूसरे में सम्पादित सामग्रियों से मिथ्याध्यवसाय करता
३३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० साधनवान् परस्य मिथ्याध्यवसायं करोति, सा माया। नीहारप्रभृतीनां नगरसरूप- सन्निवेशे दूरान्नगरबुद्धिरुत्पद्यते; विपर्यये तदभावात् । सूर्यमरीचिषु भौमेनोष्मणा संसृष्टेषु स्पन्दमानेषूदकबुद्धिर्भवति; सामान्यग्रहणात्, अन्तिकस्थस्य विपर्यये तदभावात् । क्वचित्-कदाचित् कस्यचिच्च भावान्नानिमित्तं मिथ्याज्ञानम्। दृष्टं च बुद्धिद्वैतं मायाप्रयोक्तुः, परस्य च दूरान्तिकस्थयोर्गन्धर्वनगरमृगतृष्णिकासु, सुप्तप्रतिबुद्धयोश्च स्वप्नविषये। तदेतत् सर्वस्याभावे निरुपाख्यातायां निरात्मकत्वे नोपपद्यते इति ॥ ३५ ॥ बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावोपलम्भात् ॥ ३६ ॥ मिथ्याबुद्धेश्चार्थवत्प्रतिषेधः। कस्मात् ? निमित्तोपलम्भात्, सद्भावोपलम्भा- च्च । उपलभ्यते मिथ्याबुद्धिनिमित्तम्, मिथ्याबुद्धिश्च प्रत्यात्ममुत्पन्ना गृह्यते; संवेद्यत्वात्। तस्मान्मिथ्याबुद्धिरप्यस्तीति ॥ ३६ ॥ तत्त्वप्रधानभेदाच्च मिथ्याबुद्धेर्द्वैविध्योपपत्तिः१ ॥ ३७ ॥ है, वही माया है। जैसे दूर से नगरादि की भ्रान्ति भी तभी होती है जब उसका कारण नक्षत्र या मेघादि से नगररूपाकार बन जाये । यहाँ मिथ्या ज्ञान का कारण दूरत्व है, पास में जाने पर वह बाधित होता है। मरुप्रदेश में सूर्यकिरणें भूमि से निर्गत उत्कट उष्ण तेज से संसृष्ट हो चिलचिलाती हैं, तत्र जल का सामान्य धर्म गृहीत होने से उसमें उदक का मिथ्या ज्ञान होता है । वह मिथ्याज्ञान समीप जानेपर नष्ट हो जाता है । कहीं कुछ तो कहीं कुछ भाव मिथ्याज्ञान से पूर्व है ही, न कि मिथ्याज्ञान अनिमित्तक है । लोक में यह बुद्धिद्वैत मायाप्रयोक्ता के कार्य में या दूसरे के कार्य में या गन्धर्वनगर- मृगतृष्णा आदि में देखते ही हैं। इसी तरह यह द्वैत सुप्त तथा प्रतिबुद्ध के स्वप्न तथा जाग्रत ज्ञानों में भी समझना चाहिये । यदि आत्यन्तिक निरात्मक एवं सत् के सर्वथा अभाव में ही इस संसार को व्याप्त करके रहता तो यह बुद्धिद्वैत कैसे होता ! अतः बाह्यार्थ का अपलाप करना अयुक्त है ॥ ३५ ॥ यों, कारण तथा सत्ता की उपलब्धि से मिथ्याज्ञान का अस्तित्व मानना ही उचित है ॥ ३६ ॥ जैसे ( मिथ्याज्ञानों के ) विषय का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, उसी तरह मिथ्याज्ञान का प्रतिषेध भी उचित नहीं; क्योंकि उसका कारण तथा उसकी सत्ता उप- लब्ध होती है। जब मिथ्याबुद्धि के कारण उपलब्ध होते हैं, तथा मिथ्याज्ञान सर्वजनानु- भवसिद्ध है तो शून्यवादी ( माध्यमिक बौद्ध ) को भी मिथ्याज्ञान की सत्ता स्वीकार करनी ही चाहिये ॥ ३६ ॥ तत्त्व ( धर्मस्वरूप ) तथा प्रधान ( आरोप्य ) में भेद होने से मिथ्याबुद्धि के निमित्त में द्वैविध्य बन सकता है ॥ ३७ ॥ १. ‘मिथ्याबुद्धिद्वैविध्योपपत्तिः’—इति पाठ० । ‘मिथ्याबुद्धिनिमित्तस्य द्वैविध्य- मित्यर्थः’—इति तात्पर्याचार्याः ।
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७
३८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७ तत्त्वं स्थाणुरिति, प्रधानं पुरुष इति—तत्त्वप्रधानयोरलोपाद् = भेदात्, स्थाणौ 'पुरुषः' इति मिथ्याबुद्धिरुत्पद्यते; सामान्यग्रहणात् । एवं पताकायां बलाकेति, लोष्टे कपोत इति । तत्र समाने विषये मिथ्याबुद्धीनां समावेशः, सामान्यग्रहणव्यवस्थानात् । यस्य तु निरात्मकं निरुपाख्यम्, सर्वं तस्यासमा- वेशः प्रसज्यते ! गन्धादौ च प्रमेये गन्धादिबुद्धयो मिथ्याभिमतास्तत्त्वप्रधानयोः सामान्य- ग्रहणस्य चाभावात् तत्त्वबुद्धय एव भवन्ति । तस्मादयुक्तमेतत्—'प्रमाणप्रमेय- बुद्धयो मिथ्या' इति ॥ ३७ ॥ तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् [ ३८-४९ ] 'दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः' (४. २. १) इत्युक्तम् । अथ कथ तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इति ? समाधिविशेषाभ्यासात् ॥ ३८ ॥ स तु प्रत्याहृतस्येन्द्रियेभ्यो मनसो धारकेण प्रयत्नेन धार्यमाणस्यात्मना संयोगस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टः । सति हि तस्मिन्निन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते, तदभ्यासवशात् तत्त्वबुद्धिरुत्पद्यते ॥ ३८ ॥ तत्त्व अर्थात् स्थाणु ( धर्मी ), प्रधान अर्थात् पुरुष ( आरोप्य )—इनके भिन्न-भिन्न होने से स्थाणु में 'पुरुष है' यह मिथ्याज्ञान उत्पन्न होता है; उनके सामान्य लक्षण समान होने के कारण । इसी तरह ध्वजा में वक पक्षी तथा ढेले में कबूतर का भी समान लक्षणों से मिथ्याज्ञान हो जाया करता है । अतः यह सिद्ध होता है कि समान विषयों में मिथ्याबुद्धियों का समावेश समान लक्षणों से हो जाता है । परन्तु जो इस संसार को निर्धर्मक और अभाव ही मानता है उसके मत में यह समावेश कैसे और क्या करने के लिये होगा ! गन्धादि प्रमेय में गन्धविज्ञान को भी ये शून्यवादी मिथ्या ही मानते हैं; परन्तु वहाँ उक्त तत्त्व तथा प्रधान का भेद न होने से तथा समानलक्षण गृहीत न होने से हमारे मत में वह गन्धज्ञान तत्त्वज्ञान ही है, अर्थात् धर्मवत् धर्मिस्वरूप का यह यथार्थ ज्ञान ही है। अतः यह कहना अयुक्त ही है कि—प्रमाणप्रमेयबुद्धि मिथ्या है ॥ ३७ ॥ 'दोष-कारणों के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार की निवृत्ति होती हैं' यह आप पहले ( ४.२.१ में ) कह चुके हैं, पर यह तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता कैसे है—यह तो बताइये ! समाधिविशेष के अभ्यास से तत्त्वज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ३८ ॥ समाधि क्या है ? तत्त्वज्ञान की इच्छा से इन्द्रियों से मन को हटा कर धारक प्रयत्न द्वारा धार्यमाण मन का आत्मा से संयोग ही 'समाधि' है। उस समाधि के होने पर, बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती । ऐसा अभ्यास करते-करते कि इन्द्रियाँ विषयों की तरफ न जाने पावें, एक दिन तत्त्वज्ञान हो ही जाता है ॥ ३८ ॥ न्या० द० : २२
३३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० यदुक्तम्—'सति हि तस्मिन् इन्द्रियार्थेषु बुद्धयो नोत्पद्यन्ते' इत्येतत्— न; अर्थविशेषप्राबल्यात् ? ॥ ३९ ॥ अनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तेर्नैतद् युक्तम् । कस्मात् ? अर्थविशेषप्राबल्याद् अबुभुत्समानस्यापि बुद्धयुत्पत्तिर्दृष्टा, यथा—स्तनयित्नुशब्दप्रभृतिषु । तत्र समाधिविशेषो नोपपद्यते ? ॥ ३९ ॥ क्षुदादिभिः प्रवर्त्तनाच्च ? ॥ ४० ॥ क्षुत्पिपासाभ्यां शीतोष्णाभ्यां व्याधिभिश्चानिच्छतोऽपि बुद्धयः प्रवर्त्तन्ते । तस्मादेकाग्र्यानुपपत्तिरिति ॥ ४० ॥ अस्त्वेतत् समाधिं विहाय व्युत्थानम्, व्युत्थाननिमित्तं समाधिप्रत्यनीकं च, सति त्वेतस्मिन्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ४१ ॥ पूर्वकृतो जन्मान्तरोपचितस्तत्त्वज्ञानहेतुर्धर्मप्रविवेकः¹ फलानुबन्धो योगा- शङ्का— आपका यह कहना कि 'उस समाधि के होने पर बुद्धि इन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं दौड़ती' यह अयुक्त है; क्योंकि— वह समाधि अर्थविशेष के प्राबल्य से नहीं हो पायेगी ? ॥ ३९ ॥ समाधिस्थ पुरुष के न चाहने पर भी विषय की प्रबलता से इन्द्रियाँ उधर प्रवृत्त होंगी ही, तब वैसा ज्ञान भी होगा ही । जैसे न जानना चाहते हुए की भी मेघगर्जन- शब्द की तरफ इन्द्रियप्रवृत्ति देखी जाती है, तथा उसका श्रावण ज्ञान भी देखा जाता है, अतः हम तो यही मानना चाहेंगे कि आपका वह समाधिविशेष उत्पन्न नहीं होता ? ॥ ३९ ॥ भूख आदि की प्रवृत्ति से भी यही मानना उचित है ? ॥ ४० ॥ अनिच्छुक पुरुष की भी क्षुत्पिपासा, शीतातप, तथा व्याधि आदि की तरफ बुद्धि दौड़ती रहती है, अतः यही मानें कि वह समाधिविशेष उत्पन्न हो नहीं पाता ? ॥४०॥ उत्तर—हम कब कहते हैं कि समाधि-च्युति नहीं होती, या उसमें अन्तराय नहीं आता; परन्तु पुनः पुनः समाधिच्युति या उसमें अन्तराय आने पर भी पूर्वशरीराभ्यस्त समाधि के धर्माख्य संस्कारविशेष की स्थिरता से इस समाधि की पुनः उत्पत्ति हो जाती है ॥ ४१ ॥ सूत्रस्थ 'पूर्वकृत' पद से तात्पर्य है—पूर्व जन्म में संचित हुआ तत्त्वज्ञान-निमित्तक धर्माख्य प्रकृष्ट संस्कार ( अदृष्ट ) । 'फलानुबन्ध से तात्पर्य है योगाभ्यास का सामर्थ्य । १. 'प्रविविच्यते विशिष्यते इति प्रविवेकः, धर्मश्चासौ प्रविवेकः' इति तात्पर्यकृतः ।
४४. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३९
४४. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३९ भ्याससामर्थ्यम्, निष्फले ह्यभ्यासे नाभ्यासमाद्रियेरन् । दृष्टं हि लौकिकेषु कर्म- स्वभ्याससामर्थ्यम् ॥ ४१ ॥ प्रत्यनीकपरिहारार्थं च अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनितो धर्मो जन्मान्तरेऽप्यनुवर्तते । प्रचयकाष्ठागते तत्त्वज्ञानहेतौ धर्मे प्रकृष्टायां समाधिभावनायां तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते इति । दृष्टश्च समाधिनाऽर्थ- विशेषप्राबल्याभिभवः—'नाहमेतदश्रौषं नाहमेतदज्ञासिषम्, अन्यत्र मे मनोऽभूत्' इत्याह लौकिक इति ॥ ४२ ॥ यद्यर्थविशेषप्राबल्यादनिच्छतोऽपि बुद्धयुत्पत्तिरनुज्ञायते, अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ ४३ ॥ मुक्तस्यापि बाह्यार्थसामर्थ्याद् बुद्धय उत्पद्येरन्निति ? ॥ ४३ ॥ न; निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ॥ ४४ ॥ इन दोनों हेतुओं से समाधि की उत्पत्ति होगी । 'फलानुबन्ध' इसलिये लगाया है कि निष्फल अभ्यास में प्रेक्षावान् पुरुषों का आदर न होगा । लोक में भी देखा जाता है, जैसे मनुष्य यदि कुछ समय पहले कोई कार्य थोड़ा-बहुत सीखा रहता है तो समय पाकर, साधन मिलने पर अभ्यास से वही उस कार्य में कुशल हो जाता है ॥ ४१ ॥ विघ्नों के परिहार के लिये आचार्यों ने अरण्य, गुफा, तथा ( समुद्र या नदी के ) तट आदि एकान्त स्थानों में बैठ कर योगाभ्यास का उपदेश किया है ॥ ४२ ॥ योगाभ्यासजनित अदृष्ट जन्मान्तर में भी अनुवृत्त होता है । जब यह तत्त्वज्ञानहेतु अदृष्ट प्रचय ( वृद्धि ) की अन्तिम सीमा तक पहुँच जाता है तो समाधि की पूर्णता से उस समय तत्त्वज्ञान हो जाता है । लोक में भी समाधि से अर्थविशेष के प्राबल्य का अभिभव देखा जाता है, जैसे कोई कहे—'अरे भाई ! मैं आपकी बात सुन नहीं सका, अतः समझ नहीं पाया, मेरा ध्यान ( मन ) दूसरी ओर था'—इत्यादि ॥ ४२ ॥ शङ्का— यदि आप हमारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि 'अनिच्छुक का भी मन अर्थ- विशेषप्राबल्य से उधर खिंच ही जाता है' तो— अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रसक्त होगी ? ॥ ४३ ॥ मुक्त पुरुष की बुद्धि भी विषयविशेष के प्राबल्य से उसकी तरफ प्रवृत्त होगी ? ॥ ४३ ॥ उत्तर— उस बुद्धि के निष्पन्न ( शरीर ) में ही अवश्यम्भावी होने से अपवर्ग-स्थिति में यह सब कुछ नहीं होता ॥ ४४ ॥
३४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० कर्मवशान्निष्पन्ने शरीरे चेष्टेन्द्रियार्थाश्रये निमित्तभावादवश्यम्भावी बुद्धीना- मुत्पादः, न च प्रबलोऽपि सन् बाह्योऽर्थ आत्मनो बुद्धयुत्पादे समर्थो भवति, तस्येन्द्रियेण संयोगाद् बुद्धयुत्पादे सामर्थ्यं दृष्टमिति ॥ ४४ ॥ तदभावश्चापवर्गे ॥ ४५ ॥ तस्य बुद्धिनिमित्ताश्रयस्य शरीरेन्द्रियस्य धर्माधर्मभावादभावोऽपवर्गे । तत्र यदुक्तम्-‘अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः’ इति तदयुक्तम् । तस्मात्सर्वदुःखविमोक्षोऽपवर्गः । यस्मात् सर्वदुःखबीजं सर्वदुःखायतनं चापवर्गे विच्छिद्यते, तस्मात् सर्वेण दुःखेन विमुक्तिरपवर्गः; न निर्बीजं निरायतनं च दुःखमुत्पद्यत इति ॥ ४५ ॥ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः ॥ ४६ ॥ तस्यापवर्गस्याधिगमाय यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारः । यमः१ समानमाश्र- मिणां धर्मसाधनम्, २नियमस्तु विशिष्टम् । आत्मसंस्कारः पुनरधर्महानं धर्मो- आत्मा के प्राक्तन कर्मवश जब यह शरीर निष्पन्न होता है, तब वह चेष्टा, इन्द्रिय, तथा विषयों का आश्रय होता है । इस प्रकार उस बुद्धि का निमित्त होने से इस शरीर में भी वैषयिक बुद्धि का उत्पाद अवश्यम्भावी है, परन्तु मोक्षावस्था में ( इन्द्रिय से दूर होने के कारण ) प्रबल बाह्य विषय भी आत्मा में बुद्धयुत्पाद नहीं कर सकता; क्योंकि इन्द्रियों के संयोग से ही उस वैषयिकबुद्धि की उत्पत्तिशक्ति देखी जाती है ॥ ४४ ॥ तथा उस बुद्धिकारण शरीर का अपवर्गदशा में अभाव है ॥ ४५ ॥ बुद्धिनिमित्त के आश्रय शरीरेन्द्रियोत्पत्ति के कारण धर्माधर्म हैं, पर अपवर्ग में धर्माधर्म क्षीण हो जाते हैं । अतः वहाँ कारण ( धर्माधर्मादि ) के अभाव में तत्कार्य ( शरीरेन्द्रियादि ) का अभाव ही रहेगा । इसलिए आपका यह कहना कि 'अपवर्ग में भी बाह्य विषयों की ओर बुद्धि प्रवृत्त होगी'—अयुक्त ही है । यहाँ सब दुःखों से छुट- कारा पा जाना ही मोक्ष है, यही 'अपवर्ग' है । तात्पर्य यह है कि सब दुःखों के कारण तथा आश्रय का अपवर्ग में विच्छेद हो जाता है, अतः सब दुःखों से विमुक्ति ही 'अपवर्ग' है । इस दशा में निष्कारण तथा निराश्रय दुःख उत्पन्न ही कैसे होंगे ! ॥ ४५ ॥ उसके लिये यम-नियम, योग तथा अध्यात्मशास्त्रोक्त उपायों से आत्मा का संस्कार करना चाहिये ॥ ४६ ॥ उस अपवर्ग की प्राप्ति के लिये यम-नियम से आत्म-संस्कार करना चाहिये । यम कहते हैं—आश्रमियों का समान धर्मसाधन, जैसे—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह आदि धर्म का पालन । नियम—जिज्ञासु पुरुषों के विशिष्ट धर्मसाधन को १. 'अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३०. ) २. 'शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः'—( योगसूत्रम्, २. ३२. )
४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१
४८. सू० ] तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३४१ पचयश्च, योगशास्त्राच्चाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । स पुनस्तपः, प्राणायामः, प्रत्याहारः, ध्यानम्, धारणेति । इन्द्रियविषयेषु प्रसंख्यानाभ्यासो रागद्वेषप्रहा- णार्थः । उपायस्तु योगाचारविधानमिति ॥ ४६ ॥ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च सह संवादः ॥ ४७ ॥ तदर्थमिति प्रकृतम् । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम् = आत्मविद्याशास्त्रम्, तस्य ग्रहण- मध्ययनधारणे । अभ्यासः = सततक्रियाध्ययनश्रवणचिन्तनानि । तद्विद्यैश्च सह संवाद इति प्रज्ञापरिपाकार्थम् । परिपाकस्तु संशयच्छेदनम्, अविज्ञातार्थबोधः, अध्यवसिताभ्यनुज्ञानमिति । समाय वादः = संवादः ॥ ४७ ॥ 'तद्विद्यैश्च सह संवादः' इत्यविभक्तार्थं वचनं विभज्यते-- तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारिविशिष्टश्रेयोऽर्थिभिरनसूयिभिरभ्युपेयात् ॥ ४८ ॥ कहते हैं, जैसे—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान । उक्त उपायों द्वारा अधर्मनाश तथा धर्मोपचय से आत्मसंस्कार समझना चाहिये । अध्यात्मविधि योगशास्त्र से ग्रहण करनी चाहिये । वह विधि योगशास्त्र में—तप, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान तथा धारणा आदि उपायों से बतायी गयी है । इन्द्रियार्थों के वारे में निवृत्ति ( त्याग ) का अभ्यास रागद्वेष के क्षय के लिये किया जाता है । योग तथा आचारशास्त्र में मुमुक्षु के लिये बतायी गयी विधियाँ ही 'उपाय' है। जैसे—एकाकिता, आहार में संयम तथा एक स्थान पर अधिक काल न रहना आदि ॥ ४६ ॥ [ यदि अपवर्ग उक्त समाधि से ही निष्पन्न होता है तो इस न्यायशास्त्र के अध्ययन का क्या लाभ ?—] इस पर सूत्रकार कहते हैं— विद्याओं का अध्ययन तथा उसका अभ्यास और उसके मर्मज्ञों के साथ संवाद ॥४७॥ उस अपवर्ग के लिए करना चाहिये । 'जिससे जाना जाये'—इस करणव्युत्पत्ति से आत्मविद्याशास्त्र को 'ज्ञान' कहते है, उसे प्राप्त करना ही अध्ययन एवं धारणा है । निरन्तर शास्त्रोक्त क्रिया, शास्त्रों का अध्ययन एवं चिन्तन करना अभ्यास कहलाता है । तथा प्रज्ञावै शद्य के लिए उस विद्या के विद्वानों के सामने जिज्ञासुभाव से श्रद्धा के साथ परिप्रश्न कर संवाद करते रहने से प्रज्ञापरिपाक होता है । यह प्रज्ञावैशद्य तब समझना चाहिये जब जिज्ञासु को संशयनिवृत्ति, अविज्ञात ( विशेषेण अज्ञात ) अर्थ का बोध, तथा प्रमाण से सामान्यतः ज्ञात का तर्कयुक्त अभ्युपगम हो जाये । समस्थिति के लिये किये गये वाद को 'संवाद' कहते हैं । अर्थात् तत्त्ववुभुत्सा के लिये विहित कथाप्रवर्तन संवाद कहलाता है ॥ ४७ ॥ पूर्वसूत्रोक्त 'उन उन विद्वानों के साथ होनेवाला संवाद'—इस वाक्यावयव को और स्पष्ट करते हैं— संवाद को शिष्य, गुरु, सहाध्यायी तथा किसी तत्त्वज्ञानी के साथ जो कि उस जिज्ञासु का कल्याण चाहते हों तथा उससे ईर्ष्या न करते हों, प्राप्त करे ॥ ४८ ॥
सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो,
३४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० एतन्निगदेनैव नीतार्थमिति ॥ ४८ ॥ यदिदं मन्येत—पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः प्रतिकूलः परस्येति ? प्रतिपक्षहीनमपि वा प्रयोजनार्थमर्थित्वे ॥ ४९ ॥ तमभ्युपेयादिति वर्तते । परतः प्रज्ञामुपादित्समानस्तत्त्वबुभुत्साप्रकाशनेन स्वपक्षमनावस्थापयन् स्वदर्शनं परिशोधयेदिति ॥ ४९ ॥ तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् [ ५०-५१ ] अन्योन्यप्रत्यनीकानि च प्रावादुकानां दर्शनानि, स्वपक्षरागेण चैके न्याय- मतिवर्तन्ते, तत्र— तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, बोजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत् ॥ ५० ॥ अनुत्पन्नतत्त्वज्ञानानामप्रहीणदोषाणां तदर्थं घटमानानामेतदिति ॥ ५० ॥ यह सूत्र अपने सरल पदों से स्वयं स्पष्ट है, अतः इसका अधिक व्याख्यान अपे- क्षित नहीं ॥ ४८ ॥ यदि संवाद में पक्ष तथा प्रतिपक्ष होने से वह दूसरों ( उक्त शिष्य, गुरु, सब्रह्म- चारी ) के लिये प्रतिकूल ही होगा—ऐसा समझा जाय तो ? तत्त्वज्ञान की इच्छा होने पर तत्त्वनिर्णय के लिये प्रतिकूलपक्षहीन ॥ ४९ ॥ वह संवाद करे । दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने के लिये तथा तत्त्वज्ञान की इच्छा प्रकट कर, अपना कोई पक्ष न रखता हुआ अपने ज्ञान का परिष्कार करे ॥ ४९ ॥ [ यदि तत्त्वज्ञान के लिये ऐसा सात्त्विक संवाद ही अपेक्षित है तो जल्प-वितण्डा को हाथ जोड़ लें, संवाद में उनकी क्या जरूरत पड़ेगी ? इस पर कहते हैं—] एक बात और, विभिन्न दार्शनिकों के आत्मविद्या के बारे में अपने-अपने मत हैं जो कि परस्पर विरुद्ध हैं, उनमें अपने को न उलझाते हुए तथा उनमें से अयुक्त को छोड़- कर युक्त के परिग्रह से अपने ज्ञान का परिष्कार करे। हाँ, उक्त प्रकार के वादियों को छोड़ कर अन्य प्रकार के वादी भी हैं जो अपने पक्ष में दुराग्रह रखते हुए न्याय का अतिक्रमण करते रहते हैं, उन पर— जिज्ञासु को तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिये जल्प-वितण्डा का भी प्रयोग करना चाहिये, जैसे अन्यत्र अनपेक्षित कण्टकशाखा का आवरण (कांटों का घेरा) भी क्षेत्ररक्षण के लिये कभी-कभी अत्यावश्यक होता है ॥ ५० ॥ सूत्रकार का यह आदेश उन जिज्ञासुओं के लिये है जिनको तत्त्वज्ञान न हुआ हो, • जिनके दोष प्रहीण न हुए हों, परन्तु जो उनके प्रहाण के लिये प्रयास कर रहे हों ॥५०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३
५१. सू० ] तत्त्वज्ञानपरिपालनप्रकरणम् ३४३ विद्यानिर्वेदादिभिश्च परेणावज्ञायमानस्य— ताभ्यां विगृह्य कथनम् ॥ ५१ ॥ विगृह्य इति विजिगीषया, न तत्त्वबुभुत्सयेति । तदेतद् विद्यापालनार्थम्, न लाभपूजाख्यात्यर्थमिति ॥ ५१ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकं समाप्तम् ❀ समाप्तश्च चतुर्थोऽध्यायः ❀ या जो प्रतिवादी मिथ्याज्ञानावलेपदुर्विदग्धता से जिज्ञासु की अवज्ञा करने को तत्पर हो, उस समय जिज्ञासु जल्प-वितण्डा से संवाद करता हुआ विजिगीषा से तत्त्वकथन करे ॥ ५१ ॥ ‘विगृह्य’ पद का तात्पर्य है विजिगीषा से, न कि तत्त्वबुभुत्सा से । जल्प-वितण्डा का प्रयोग इसलिये किया जाता है कि वे उक्त दुर्विदग्ध वादी अपना दृढ प्रतिपक्षी न न पाकर साधारण जनता के हृदय से धार्मिक भावनाओं का विलोप ही न कर दें । वहाँ जिज्ञासु को यह कभी न सोचना चाहिये कि इस जल्प-वितण्डा के प्रयोग से सत्कार, या धन का लाभ होगा, अपितु वह विद्या की रक्षा के लिये जल्प-वितण्डा का आश्रयण लेता रहे ॥ ५१ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में चतुर्थ अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ चतुर्थ अध्याय भी समाप्त ❀
सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ]
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अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथममाह्निकम् [ १-३ ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ] 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्' ( १.२.१८ ), इति संक्षेपेणोक्तम्, तद्विस्तरेण विभज्यते । ताः खल्विमा जातयः, स्थापना- हेतौ प्रयुक्ते, चतुर्विंशतिः प्रतिषेधहेतवः- साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रति- दृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुप- लब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः ॥ १ ॥ साधर्म्येण प्रत्यवस्थानमविशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः । अविशेषं तत्र तत्रोदाहरिष्यामः । एवं वैधर्म्यसमप्रभृतयोऽपि निर्वक्तव्याः ॥ १ ॥ [ इस न्यायशास्त्र के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम सूत्र में शास्त्रान्तःपाति विषयों का परि- गणन कर, तदनन्तर गत चारों अध्यायों में क्रमशः उन सबके उद्देश, लक्षण तथा परीक्षा की जा चुकी, अब क्या बाकी रह गया कि जिसके लिए यह पञ्चम अध्याय प्रारम्भ किया जा रहा है ? —इस पर भाष्यकार प्रसंग उठाते हैं—] "साधर्म्य तथा विरुद्ध धर्म से किये जाने वाले खण्डन को 'जाति' ( असत् उत्तर ) कहते हैं, तथा उसके भेद से जाति के बहुत भेद हैं"—ऐसा हम संक्षेप से पीछे ( १.२.१८ ) कह चुके हैं। अब उसी का विस्तरशः निरूपण किया जा रहा है । ये जातियाँ, जो कि वादी द्वारा स्थापनाहेतु उपस्थित किये जाने पर प्रतिवादी द्वारा उसके खण्डन के लिए काम में लायी जाती हैं, चौबीस प्रकार की होती हैं, जैसे— १. साधर्म्यसम, २. वैधर्म्यसम, ३. उत्कर्षसम, ४. अपकर्षसम, ५. वर्ण्यसम, ६. अवर्ण्यसम, ७. विकल्पसम, ८. साध्यसम, ९. प्राप्तिसम, १०. अप्राप्तिसम, ११. प्रसङ्गसम, १२. प्रतिदृष्टान्तसम, १३, अनुत्पत्तिसम, १४. संशयसम, १५. प्रकरणसम, १६. हेतुसम, १७. अर्थापत्तिसम, १८. अविशेषसम, १९. उपपत्तिसम, २०. उपलब्धि- सम, २१. अनुपलब्धिसम, २२. नित्यसम, २३. अनित्यसम, तथा २४. कार्यसम ॥ १ ॥ साधर्म्य ही से जिसका निषेध किया जा सकता हो, अर्थात् दोनों पक्ष के लिए समान हो, किसी एक पक्ष में प्रबल युक्ति न मिलती हो उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं । यह 'अविशेष' ( समानता ) आगे के उस उस जाति के उदाहरण में ही बताया जायेगा कि कहाँ क्या समानता है ! इसी तरह 'वैधर्म्यसम' आदि अवशिष्ट शब्दों का भी निर्वचन कर लेना चाहिये ॥१॥
२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५
२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५ लक्षणं तु— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ ॥ २ ॥ साधर्म्येणोपसंहारे—साध्यधर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्येणैव प्रत्यवस्थानम- विशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः प्रतिषेधः । निदर्शनम्—‘क्रियावानात्मा, द्रव्यस्य क्रियाहेतुगुणयोगात्; द्रव्यं लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तः क्रियावान्, तथा चात्मा, तस्मात् क्रियावान्’ इति । एवमुपसंहृते, परः साधर्म्येणैव प्रत्यवतिष्ठते— ‘निष्क्रिय आत्मा; विभुनो द्रव्यस्य निष्क्रियत्वाद्, विभु चाकाशं निष्क्रयं च, तथा चात्मा, तस्मान्निष्क्रिय.’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनरक्रियसाधर्म्याद् निष्क्रियेणेति । विशेषहेत्व- भावात् साधर्म्यसमः प्रतिषेधो भवति । अथ वैधर्म्यसमः—‘क्रियाहेतुगुणयुक्तो लोष्टः परिच्छिन्नो दृष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्न लोष्टवत् क्रियावान्’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रिया- 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' का लक्षण हैं— साधर्म्य तथा वैधर्म्य से वादी द्वारा साध्य का उपसंहार करने पर, प्रतिवादी द्वारा उस साध्यधर्म के व्यतिरेक का ( व्याप्त्यनपेक्ष ) केवल साधर्म्य वैधर्म्य से उपपादन करना 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' जाति कहलाती हैं ॥ २ ॥ साधर्म्य द्वारा उपसंहार किये जाने पर, साध्यधर्म के अभाव का उपपादन न कर प्रतिवादी व्याप्त्यनपेक्ष केवल साधर्म्य से स्थापनाहेतु के समान ही प्रतिषेध उपस्थित कर दे उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं। उदाहरण के लिए 'आत्मा क्रियावान् है, द्रव्य के क्रिया- हेतुगुणयुक्त होने से; लोष्टद्रव्य जैसे क्रियाहेतुगुणयुक्त है अतः क्रियावान् है, वैसे ही आत्मा भी द्रव्य है, अतः वह भी क्रियावान् हैं'—ऐसा वादी द्वारा साध्य का उपसंहार किये जानेपर, प्रतिवादी उदाहरणान्तर के साधर्म्य ( व्याप्त्यनपेक्ष ) से ही प्रतिषेधात्मक प्रयोग करता है—'आत्मा निष्क्रिय है, विभु द्रव्य के निष्क्रिय होने से जैसे आकाश विभु तथा निष्क्रिय है, वैसे ही आत्मा भी विभु हैं, अतः वह निष्क्रिय है ।' यहाँ वादी के उपसंहार तथा प्रतिवादी के प्रत्यवस्थान में कोई विशेष अर्थात् हेतु व्याप्तिविशिष्ट नहीं हैं कि जिससे किसी को प्रमाण माना जा सके । अतः यह कैसे निश्चय किया जाये कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो; अक्रिय साधर्म्य से निष्क्रिय सिद्ध न हो । यों विशेष हेतु न होने से यह 'साधर्म्य' प्रतिषेध है । इसी में 'वैधर्म्यसम' का उदाहरण सुनिये—'क्रियाहेतुगुणयुक्त लोष्ट परिच्छिन्न देखा जाता है ऐसा आत्मा नहीं देखा जाता, अतः वह लोष्ट की तरह क्रियावान् नहीं हैं'—इस प्रयोग में भी ऐसा कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि जिससे यह सिद्ध हो सके कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो, तथा क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय न
३४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनः क्रियावद्वैधर्म्यादक्रियेणेति । विशेष- हेत्वभावाद् वैधर्म्यसमः । वैधर्म्येण चोपसंहारे—'निष्क्रिय आत्मा, विभुत्वात्; क्रियावद् द्रव्यमविभु दृष्टम्—यथा, लोष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्निष्क्रियः' इति । वैधर्म्येण प्रत्यव- स्थानम्–'निष्क्रियं द्रव्यमाकाशं क्रियाहेतुगुणरहितं दृष्टम्, न तथाऽऽत्मा, तस्मान्न निष्क्रियः' इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियेण भवितव्यम्, न पुनरक्रियवैधर्म्यात् क्रियावतेति विशेषहेत्वभावाद्वैधर्म्यसमः । अथ साधर्म्यसमः–'क्रियावान् लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तो दृष्टः, तथा चाऽऽत्मा, तस्मात् क्रियावान्' इति । न चास्ति विशेषहेतुः–क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियः, न पुनः क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावानिति । विशेषहेत्वभावात् साधर्म्यसमः ॥ २ ॥ अनयोत्तरम्— गोत्वाद गोसिद्धिवत् तत्सिद्धिः ॥ ३ ॥ साधर्म्यमात्रेण वैधर्म्यमात्रेण च साध्यसाधने प्रतिज्ञायमाने स्यादव्यवस्था, हो । विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' प्रतिषेध है । (साधर्म्यसम के प्रतिषेध में आकाश के साथ निष्क्रियत्वरूप साधर्म्य से आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया था, यहाँ इस प्रतिषेध में परिच्छिन्न लोष्ट के साथ अपरिच्छिन्नत्वरूप वैधर्म्य से ही आत्मा का निष्क्रियत्व सिद्ध किया जा रहा है, अतः यह वैधर्म्यसमप्रतिषेध का उदाहरण उचित ही है । ) वैधर्म्य से उपसंहार में दूसरा उदाहरण देते हैं—हेतु का उदाहरण में वैधर्म्य से यों उपसंहार करने पर कि 'आत्मा निष्क्रिय है, विभु होने से, जब कि क्रियावान् द्रव्य अविभु देखा गया है, जैसे लोष्ट; वैसा आत्मा नहीं है, अतः वह निष्क्रिय हैं' ! इस प्रयोग का वैधर्म्य से ही प्रतिषेध करते हैं—'निष्क्रिय द्रव्य आकाश क्रियाहेतुगुणरहित देखा गया है, आत्मा वैसा नहीं है, ( अर्थात् क्रियाहेतुगुणसहित है ) अतः वह निष्क्रिय नहीं है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया, जिससे हम माने कि क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय ही होना चाहिये, न कि अक्रिय वैधर्म्य से क्रियावान् ! विशेष हेतु न होने से यह 'वैधर्म्यसम' है । इसी में साधर्म्यसम का का उदाहरण देते हैं—'क्रियावान् लोष्ट क्रियाहेतुगुणयुक्त देखा गया है, आत्मा भी वैसा ही है, अतः वह भी क्रियावान् है ।' यहाँ कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि हम समझें—क्रियावद्वैधर्म्य से ही निष्क्रिय सिद्ध हो तथा क्रियावत्सा- धर्म्य से क्रियावान् सिद्ध न हो । विशेष हेतु न होने से यह प्रयोग 'साध्यसम' है ॥ २॥ इन साधर्म्यसम तथा वैधर्म्यसम के असदुत्तरत्व में हेतु ( = खण्डन ) बतलाते हैं— गोत्व से गोसिद्धि की तरह उसकी सिद्धि है ॥ ३ ॥ केवल साधर्म्य या वैधर्म्य से साध्यसिद्धि की प्रतिज्ञा में तो अव्यवस्था हो जायगी ।
'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७
'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७ सा तु धर्मविशेषे नोपपद्यते, गोसाधर्म्याद् गोत्वाज्जातिविशेषाद् गौः सिद्ध्यति, न तु सास्नादिसम्बन्धात्¹। अश्वादिवैधर्म्याद् गोत्वादेव च गौः सिद्ध्यति, न गुणादिभेदात्। तच्चैतत् कृतव्याख्यानमवयवप्रकरणे—'प्रमाणानामभिसम्ब- न्धाच्चैकार्थकारित्वं समानं वाक्ये' इति ( १.१.३९ ) । हेत्वाभासाश्रया खल्विय- मव्यवस्थेति ॥ ३ ॥ उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् [ ४-६ ] साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यवर्ण्य- विकल्पसाध्यसमाः ॥ ४ ॥ दृष्टान्तधर्मं साध्ये समासजतः उत्कर्षसमः। यदि क्रियाहेतुगुणयोगाल्लोष्टवत् क्रियावानात्मा, लोष्टवदेव स्पर्शवानपि प्राप्नोति। अथ न स्पर्शवान्, लोष्टवत् क्रियावानपि न प्राप्नोति। विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। साध्ये धर्माभावं दृष्टान्तात् प्रसजतोऽपकर्षसमः। लोष्टः खलु क्रियावान् विभुर्दृष्टः, काममात्माऽपि क्रियावान् विभुरस्तु, विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति। ख्यापनीयो वर्ण्यः, विपर्ययादवर्ण्यः। तावेतौ साध्यदृष्टान्तधर्मौ विपर्यस्यतो किन्तु यह अव्यवस्था धर्मविशेष ( स्वाभाविक व्याप्तिसम्बन्ध ) में नहीं बनेगी। गौ की सिद्धि गोसाधर्म्य द्वारा गोत्वजातिविशेष से होती है, न कि केवल सास्नादि सम्बन्ध से। इसी तरह अश्वादि वैधर्म्य द्वारा गोत्व से ही गौ सिद्ध होती है न कि गुणादिभेद से। इन सब बातों का हम पीछे 'अवयवप्रकरण' ( १. १. ३९ ) में विस्तृत व्याख्यान कर चुके हैं कि 'प्रमाणों के अभिसम्बन्ध से वाक्य में एकार्थकारित्व समान ही हैं'। इस जात्युद्भा- वन से की जानेवाली अव्यवस्था का प्रयोग असत् साधनों ( हेत्वाभासों ) में करना चाहिये, न कि सत्साधनों (हेतुओं) में ॥ ३ ॥ साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से दोनों के ही सिद्ध होने से उत्कर्षसम, अप- कर्षसम, वर्ण्यसम, अवर्ण्यसम, विकल्पसम तथा साध्यसम—ये ६ प्रतिषेध बनते हैं ॥४॥ 'दृष्टान्त में अन्य दृष्ट धर्म का साध्य में वर्तमान धर्म के साथ आपादन 'उत्कर्षसम' प्रतिषेध कहलाता है। जैसे—यदि क्रियाहेतुगुणयोग से लोष्ट की तरह आत्मा क्रियावान् है तो वह लोष्ट की तरह स्पर्शवान् भी होना चाहिये, यदि स्पर्शवान् नहीं है तो लोष्ट की तरह क्रियावान् भी नहीं हो सकता। विपर्यय में विशेष हेतु बतलाना होगा। दृष्टान्त में दृष्ट धर्माभाव को साध्य में आपादन करना 'अपकर्षसम' कहलाता है; जैसे—'लोष्ट क्रियावान् तथा अविभु देखा गया है, क्यों न आत्मा को भी ऐसा ही मान लें, विपरीत में विशेष हेतु देना होगा। पक्ष एवं दृष्टान्त में साधर्म्यमात्र से पक्षधर्मत्व का निर्णय करना 'वर्ण्यसम' कहलाता है ! १. 'सास्नादीत्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः, तेन व्यभिचारिणः शृङ्गादयो गृह्यन्ते' इति तात्पर्याचार्याः ।
३४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वर्ण्यावर्ण्यसमौ भवतः । साधनधर्मयुक्ते दृष्टान्ते धर्मान्तरविकल्पात् साध्यधर्मविकल्पं प्रसजतो विकल्पसमः । क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चिद् गुरु यथा लोष्टः, किञ्चिल्लघु यथा वायुः । एवं क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चित्क्रियावत् स्यात् यथा लोष्टः, किञ्चिद- क्रियं यथा आत्मा । विशेषो वा वाच्य इति । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्मः साध्यः, तं दृष्टान्ते प्रसजतः साध्यसमः । 'यदि यथा लोष्टस्तथाऽऽत्मा'; प्राप्तस्तर्हि 'यथाऽऽत्मा तथा लोष्टः' इति । साध्य- श्चायमात्मा क्रियावानिति कामं लोष्टोऽपि साध्यः । अथ नैवम्, न तर्हि 'यथा लोष्टः तथाऽऽत्मा' ॥ ४ ॥ एतेषामुत्तरम्— किञ्चित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः ॥ ५ ॥ अलभ्यः सिद्धस्य निह्नवः, सिद्धं च किञ्चित्साधर्म्यादुपमानम्—'यथा गौस्तथा गवयः' इति । तत्र न लभ्यो गोगवययोर्धर्मविकल्पश्चोदयितुम् । एवं साधके धर्मे दृष्टान्तादिसामर्थ्ययुक्ते न लभ्यः साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पाद् वैधर्म्यात् प्रतिषेधो वक्तुमिति ॥ ५ ॥ दृष्टान्त के सादृश्यमात्र से पक्ष में साध्याभाव का आपादन 'अवर्ण्यसम' कहलाता है । साधनधर्मयुक्त दृष्टान्त में धर्मान्तरविकल्प से साध्यधर्मविकल्प का आपादन करना 'विकल्पसम' कहलाता है। जैसे—'क्रियाहेतुगुणयुक्त कोई गुरु होता है, जैसे लोष्ट, कोई लघु होता है जैसे वायु; इसी तरह क्रियाहेतुगुण-युक्त कोई क्रियावान् होगा, जैसे— लोष्ट, कोई अक्रिय भी होगा जैसे—आत्मा'। अन्यथा विशेष में कोई हेतु बतावें । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्म साध्य होता है, उसका दृष्टान्त में आपादन करना 'साध्यसम' कहलाता है। जैसे—'यदि जैसा लोष्ट है वैसा ही आत्मा है तो जैसा आत्मा है वैसा ही लोष्ट भी होना चाहिये, अभी तो आत्मा साध्य है, तो लोष्ट भी वैसा ही होना चाहिये, यदि ऐसा नहीं है तो जैसा लोष्ट है वैसा आत्मा नहीं है' ॥ ४ ॥ इन छहों जातिप्रतिषेधों का उत्तर है— किञ्चित्साधर्म्य से उपसंहारसिद्धि द्वारा वैधर्म्य से प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५ ॥ सिद्ध को छिपाया नहीं जा सकता, उसे जैसा है वैसा स्वीकार करना पड़ेगा । वे ही सिद्ध कुछ सादृश्य लेकर ही उपमान बनते हैं, जैसे—'जैसी गौ वैसा गवय होता है'—यहाँ गौ तथा गवय के पूर्णसादृश्य ( सास्नादिमत्त्वेन ) के लिये आप आग्रह नहीं कर सकते । कुछ न कुछ असमानता तो होगी ही । इस प्रकार साधक धर्म में दृष्टान्त के सभी धर्म न मिलें तो साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से प्रश्न तथा प्रतिषेध—दोनों ही अनुचित हैं ॥ ५ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
८. सू० ] प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् ३४९
८. सू० ] प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् ३४९ साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः ॥ ६ ॥ यत्र लौकिकपरीक्षकाणां बुद्धिसाम्यं तेनाविपरीतोऽर्थोऽतिदिश्यते प्रज्ञाप- नार्थम् । एवं साध्यातिदेशाद् दृष्टान्ते उपपद्यमाने साध्यत्वमनुपपन्नमिति ॥ ६ ॥ प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् [ ७-८ ] प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याऽविशिष्टत्वादप्राप्त्याऽसाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ ॥ ७ ॥ हेतुः प्राप्य वा साधयेत्, अप्राप्य वा ? न तावत् प्राप्य; प्राप्त्यामविशिष्टत्वा- दसाधकः । द्वयोर्विद्यमानयोः प्राप्तौ सत्यां किं कस्य साधकं साध्यं वा ! अप्राप्य साधकं न भवति, नाप्राप्तः प्रदीपः प्रकाशयतीति । प्राप्त्या प्रत्यवस्थानं प्राप्तिसमः, अप्राप्त्या प्रत्यवस्थानमप्राप्तिसमः ॥ ७ ॥ अनयोत्तरम्— घटादिनिष्पत्तिदर्शनात् पीडने चाभिचारादप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ साध्य के अतिदेश ( सादृश्य ) से दृष्टान्त की उपपत्ति हो जाती है ॥ ६ ॥ जहाँ साधारण तथा परीक्षक जनों का बुद्धिसाम्य हो उससे अनुकूल अर्थ अति- दिष्ट होता है । क्योंकि लोगों को समझना है । परन्तु साध्यसादृश्य से दृष्टान्त के उपपन्न किये जाने पर 'साध्यत्व' ही उसका क्या रहेगा ! ॥ ६ ॥ [ अब 'प्राप्तिसम' तथा 'अप्राप्तिसम' का लक्षण करते हैं—] प्राप्ति में विशेषता न होने से, हेतु से साध्य को प्राप्त कर या न प्राप्त कर प्राप्ति या अप्राप्ति द्वारा असाधक होने से 'प्राप्ति सम' तथा 'अप्राप्तिसम' दोष कहलाते हैं ॥ ७ ॥ हेतु साध्य से मिलकर ( संयुक्त होकर ) उसको सिद्ध करता है ? अथवा बिना मिले ? यदि मिल कर सिद्ध करता है तो दोनों में किसी एक की विशेषता न होने से कौन सिद्ध करता है, तथा कौन सिद्ध होता है—इसकी कुछ व्यवस्था न रहेगी ! अर्थात् प्राप्ति से उनमें साध्यसाधकभाव नहीं रह सकता । यदि बिना संयुक्त हुए सिद्ध करता है—यह मानोगे, तो भी साध्यसिद्धि न हो सकेगी । दीपक उसी वस्तु को प्रकाशित करता है, जिससे वह संयुक्त हो । जिस वस्तु का उसके प्रकाश से संयोग न हो उसे सिद्ध नहीं कर पाता । यों प्राप्ति से प्रतिषेध को 'प्राप्तिसम' तथा अप्राप्ति से प्रति- षेध को 'अप्राप्तिसम' कहते हैं ॥ ७ ॥ इन दोनों का समाधान यह है— घटादि की निष्पत्ति तथा पीड़न में अभिचार देखे जाने से उक्त प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ ८ ॥
प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् [ ९-११ ]
३५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० उभयथा खल्व्युक्तः प्रतिषेधः। कर्तृकरणाधिकरणानि प्राप्य मृदं घटादि- कार्यं निष्पादयन्ति, अभिचाराच्च पीडने सति दृष्टमप्राप्य साधकत्वमिति ॥ ८ ॥ प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् [ ९-११ ] दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात् प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ ॥ ९ ॥ साधनस्यापि साधनं वक्तव्यमिति प्रसङ्गेन प्रत्यवस्थानं प्रसङ्गसमः प्रतिषेधः। 'क्रियाहेतुगुणयोगो क्रियावान् लोष्टः' इति हेतुर्नापदिश्यते, न च हेतुमन्तरेण सिद्धिरस्तीति। प्रतिदृष्टान्तेन प्रत्यवस्थानं प्रतिदृष्टान्तसमः। 'क्रियावानात्मा; क्रियाहेतुगुण- योगाद्, लोष्टवत्' इत्युक्ते प्रतिदृष्टान्त उपादीयते—'क्रियाहेतुगुणयुक्तमाकाशं निष्क्रियं दृष्टम्' इति। कः पुनराकाशस्य क्रियाहेतुगुणः ? वायुना संयोगः संस्कारापेक्षः, वायुवनस्पतिसंयोगवदिति ॥ ९ ॥ उक्त दोनों ही प्रकार का प्रतिषेध युक्त नहीं; क्योंकि घटादि का निष्पादन कर्ता ( कुम्भकार ) करण ( दण्ड-चक्र आदि ) तथा अधिकरण ( भूतलादि ) इन सबके साथ मृत्पिण्ड मिलने पर ही होता है। तो क्या साधकत्व उनका अनुपपन्न है ? और उधर शत्रु के पीड़न के लिये जो अभिचार (मारण) क्रियाएँ की जाती हैं उनमें क्रियाकारक के साथ शत्रु का सम्मेलन आवश्यक नहीं, फिर भी उन क्रियाओं से शत्रुपीड़न देखा जाता है। यों प्राप्ति या अप्राप्ति से साध्यसाधनभाव का प्रतिषेध नहीं हो पाता ॥ ८ ॥ [ अब 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' का लक्षण करते हैं—] दृष्टान्त के कारणानभिधान से तथा प्रतिदृष्टान्त के प्रतिषेध से क्रमशः 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' प्रतिषेध कहलाते हैं ॥ ९ ॥ यद्यपि दृष्टान्त का दृष्टान्त नहीं हुआ करता, परन्तु वाद में जब दृष्टान्त का दृष्टान्त पूछा जाये तो उनके भी हेतु तथा दृष्टान्त का प्रसंग आ पड़ेगा, इसे 'प्रसंगसम' प्रतिषेध कहते हैं। जैसे 'क्रियाहेतुगुणयोगी क्रियावान् होता है, जैसे लोष्ट', यहाँ हेतु नहीं कहा गया, हेतु के बिना सिद्धि होती नहीं। अतः इस दृष्टान्त में प्रतिवादी पूछता है कि 'यह क्रियावान् क्यों हैं'। यही 'प्रसङ्गसम' है। विरोधी प्रतिदृष्टान्त से प्रतिषेध 'प्रतिदृष्टान्तसम' कहलाता है। उसमें भी साधन करना जैसे—'आत्मा क्रियावान् है, क्रियाहेतुगुणयोग से, लोष्ट की तरह'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी प्रतिदृष्टान्त दे सकता है—'क्रियाहेतुगुणयुक्त आकाश निष्क्रिय देखा गया है, अतः आत्मा निष्क्रिय है', यों प्रतिदृष्टान्त से वह वादी की बात का खण्डन करता है। फिर वादी पूछता है—'आकाश में क्रियाहेतुगुण क्या हैं' ? प्रतिवादी उत्तर देता है—'उसका वायु के साथ संस्कारापेक्ष संयोग, वायु-वनस्पतिसंयोग की तरह' ॥ ९ ॥
११. सू०] प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५१
११. सू०] प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५१ अनयोरुत्तरम्— प्रदीपोपादानप्रसङ्गनिवृत्तिवत् तन्निवृत्तिः ॥ १० ॥ इदं तावदयं पृष्टो वक्तुमर्हति–अथ के प्रदीपमुपाददते ? किमर्थं वेति ? दिदृक्षमाणा दृश्यदर्शनार्थमिति। अथ प्रदीपं दिदृक्षमाणाः प्रदीपान्तरं कस्मान्नोपाददते ? अन्तरेणापि प्रदीपान्तरं दृश्यते प्रदीपः, तत्र प्रदीपदर्शनार्थं प्रदीपोपादानं निरर्थकम्। अथ दृष्टान्तः किमर्थमुच्यत इति ? अप्रज्ञातस्य ज्ञापनार्थमिति। अथ दृष्टान्ते कारणापदेशः किमर्थं मृग्यते ? यदि प्रज्ञापनार्थम्, प्रज्ञातो दृष्टान्तः। स खलु 'लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः' इति। तत्प्रज्ञापनार्थः कारणापदेशो निरर्थक इति प्रसङ्गसमस्योत्तरम् ॥ १० ॥ अथ प्रतिदृष्टान्तसमस्योत्तरम्— प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्तं ब्रुवता न विशेषहेतुरुपदिश्यते–'अनेन प्रकारेण प्रतिदृष्टान्तः साधकः, न दृष्टान्तः' इति। एवम् 'प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे नाहेतुर्दृष्टान्तः' इत्युप- पद्यते। स च कथं हेतुर्न स्याद् ? यद्यप्रतिषिद्धः साधकः स्यादिति ॥ ११ ॥ इन दोनों में से 'प्रसङ्गसम' का समाधान यह है— दीपक के ग्रहण में प्रसङ्गनिवृत्ति की तरह इस प्रसङ्गसम की निवृत्ति है ॥ १० ॥ वादी, प्रतिवादी द्वारा उक्त प्रतिषेध करने पर, उससे यह पूछे–'प्रदीप को कौन तथा क्यों चाहते हैं'? वह कहेगा—'देखना चाहने वाले, दृश्य विषय को देखने के लिये'। तब उससे पूछिये—'वे देखना चाहनेवाले उस प्रदीप को देखने के लिये दूसरा प्रदीप क्यों नहीं चाहते ?' वह कहेगा 'दूसरे प्रदीप के बिना भी यह प्रदीप दीखता है, अतः वहाँ प्रदीप को देखने के लिये दूसरे प्रदीप का ग्रहण निरर्थक है। तब फिर उससे पूछें कि 'दृष्टान्त किस लिये दिया जाता हैं' ? वह कहेगा 'अप्रज्ञात के ज्ञापन के लिये'। 'फिर दृष्टान्त में कारणाभिधान क्यों चाहते हो ? यदि प्रज्ञापन के लिये, तो दृष्टान्त तो जाना हुआ है। दृष्टान्त इसे ही न कहते हो कि जहाँ लौकिक तथा परीक्षक–दोनों का बुद्धिसाम्य हो जाये (१.१.२५)। अब उस दृष्टान्त को बतलाने कें लिये कारणाभिधान निरर्थक ही हैं'। यह उक्त 'प्रसङ्गसम' का समाधान है ॥ १० ॥ अब 'प्रतिदृष्टान्तसम' का समाधान सुनिये— प्रतिदृष्टान्त के समाधानसामर्थ्य में दृष्टान्त असाधन नहीं है ॥ ११ ॥ प्रतिदृष्टान्त उपस्थित करने वाले प्रतिवादी द्वारा किसी विशेष हेतु का अभिधान नहीं किया जाता कि इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त साध्य का साधक है, अपितु दृष्टान्त नहीं। यों, प्रतिदृष्टान्त का साधकत्व मानने वाले को दृष्टान्त का भी साधकत्व मानना ही पड़ेगा। वह प्रतिदृष्टान्त दृष्टान्तहेतु क्यों नहीं होगा ? जब कि दृष्टान्त किसी बलवत्तर प्रमाण से बाधित न हो। अतः प्रतिदृष्टान्त के रहते हुए भी दृष्टान्त का साधकत्व अवश्य स्वीकार करना ही पड़ेगा ॥ ११ ॥
अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् [ १२-१३ ]
३५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १ आ० अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् [ १२-१३ ] प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, अपर आह— प्रागुत्पत्तेरनुत्पन्ने शब्दे प्रयत्ननान्तरीयकत्वमनित्यत्वकारणं नास्ति, तदभावाद् नित्यत्वं प्राप्तम्, नित्यस्य चोत्पत्तिर्नास्ति । अनुत्पत्त्या प्रत्यवस्थानम् अनु- त्पत्तिसमः ॥ १२ ॥ अस्योत्तरम्— तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः ॥ १३ ॥ तथाभावादुत्पन्नस्येति—उत्पन्नः खल्वयम् 'शब्दः' इति भवति, प्रागुत्पत्तेः शब्द एव नास्ति । उत्पन्नस्य शब्दभावाच्छब्दस्य सतः प्रयत्ननान्तरीयकत्वम- नित्यत्वकारणमुपपद्यते, कारणोपपत्तेरयुक्तोऽयं दोषः—'प्रागुत्पत्तेः कारणा- भावात्' इति ॥ १३ ॥ संशयसमप्रकरणम् [ १४-१५ ] सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः ॥ १४ ॥ 'अनित्यः शब्दः प्रयत्ननान्तरीयकत्वाद् घटवत्' इत्युक्ते, हेतौ संशयेन अब 'अनुत्पत्तिसम' का लक्षण करते हैं— उत्पत्ति से पूर्व कारण के अभाव से 'अनुत्पत्तिसम' प्रतिषेध होता है ॥ १२ ॥ जैसे—'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् होने से, घट की तरह'—यह कहने पर प्रतिवादी कहता है—'उत्पत्ति से पूर्व उसमें शब्द अनुत्पन्न है, प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यता का कारण नहीं है, उक्त कारण के अभाव से शब्द में नित्यत्व आ जायेगा, नित्य की उत्पत्ति हुआ नहीं करती'। यों अनुत्पत्ति से प्रतिषेध 'अनुत्पत्तिसम' कह- लाता है ॥ १२ ॥ इसका समाधान है— उत्पन्न के पश्चात् 'शब्द' कहलाने से तथा तभी कारणोपपत्ति से यह कारणाभाव प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ १३ ॥ उत्पन्न होने पर ही यह 'शब्द' कहलाता है; क्योंकि उत्पत्ति से पूर्व वह 'शब्द' था ही नहीं ! उत्पन्न होने से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् होना अनित्यत्वकारण बनता है । इस कारणोपपादन से आपका उत्पत्ति से पूर्व कारणाभाव वाला प्रतिषेध अयुक्त है ॥ १३ ॥ 'संशयसम' का लक्षण— सामान्य और दृष्टान्त में ऐन्द्रियकत्व समान होने से नित्यानित्य सादृश्य से 'संशयसम' प्रतिषेध होता है ॥ १४ ॥ 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह' ऐसा प्रयोग