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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

११६ पद्मावत । सो पद्मावत गुरुहौं चेला । योगतन्त जेहिकारने खेला ॥ तजै वह बारै न जानौंदूजा । जेहि दिन मिलै यात्रा पूजा ॥ जीवकांढ़ भुइँधरौं ललाटूँ । वहिकहँ देउँ हियौ महँपाटूँ ॥ को मोहिंलै सो छुवावै पाया । नौ अवतारैं देइ नइ काया ॥ जीवचाहि सोअधिकैं पियारी । मांगै जीव देउँ बलिहारी ॥ मांगै शीश देउँ मैं ग्रीवां । अधिक तेरे जो मारै जीवा ॥ अपने जिवकर लोभ न मोहीं । प्रेम वार होय माँगौं ओहीं ॥ दो० दरशन वहकादिया जस, हों मुखिकारी पतंग । जो करवै शिर सारी, मरत न मोरों अंग ॥ पद्मावत कमला शशि ज्योती । हँसै फूल रोवै तब मोती ॥ परजापतें हँसी औ रोनूँ । लाये दूत होय नित्तँखोजू ॥ जबहिं सूर्य्य कहँलागाराहू । तबहिंकमल मनभयो अग़ाहूँ ॥ बिरह अगस्ते जोविसमो भयउ । सरवरे हरषे सूखसब गयउ ॥ परगटै ढारसकै नहिं अंशू । घुटघुट मांसगुंस होयनाशू ॥ जस दिनमांझ रयनिहोय आई । विगसतकमल गयो मुरझाई ॥ रांतौं बदन गयो होय सेताँ । भवंत भँवर रहिगई अचेता ॥ दो० चितहिं जो चित्र कीन्हधुने, रोवोंअङ्ग समीप । सहसै सालदुख आहभर, मुरछै परीकामीप ॥ पद्मावत सँग सखी सयानी । गनकेनखत पीरशशि जानी ॥ वास्ते १ छोड़ना २ दरवाज़ा ३ शिर ४-११ दिल ५ तख़्त ६ नया जन्म ७ बदन ८ ज्यादा ६-१० गरदन १२ शिर उतारना १३ चाँद १४ बाप पद्मावत १५ रोना १६ हररोज़तलाश १७ तथा राजारतनसेन १८ तथा पद्मावत १६ ख़बर २० आग २१ तेज २२ तालाब २३ खुशी २४ ज़ाहिर २५ छिपा २६ लाल २७ सफ़ेद २८ याद २६ तसवीर ३० पद्मावत ३१ हज़ार ३२ बेहोशी दूरहोती ३३ चाँद तथा पद्मावत ३४ ॥

पद्मावत। ३१७ जानेहुमर्म कमलकर कोई। देख बिथा बिरहिन की रोई॥ बिरहा कठिन काल की कला। बिरहन सही कालपर भला॥ काल काढ़ि लैजीव सिधारा। बिरह काल मारे पर मारा॥ बिरह आग पर मेलै आगी। बिरहघावपर घावबिजाँगी॥ बिरह बानपर बान पसारा। बिरह रोग पर रोग सँचारा॥ बिरहसालै परसालि नवेला। बिरहकाल परकाल दहेला॥ दो० तनरावन होय शिरचढ़ा, बिरह भयो हनुमन्त। जारे ऊपर जरै, तजै न कै भसमन्त॥ कोइकुमोदैंपरसहिंकरपाया। कोइमलयागिरि छिड़कहिंकाया॥ कोइ मुख शीतलनीर चुवावै। कोइ अंचलसों पवनडुलावै॥ कोइमुखअमृत आननिचोवा। जनुबिषदोन्हअधिकैं धने सोवा॥ जोवहिंश्वास खनँहिखनसखी। कब जिव फिरै पवन औ पँखी॥ बिरहकाल होयहिये जो पैठा। जीव काढ़ लै हाथे बैठा॥ खनक मवन बांधा खनखोला। गहेसि जीभमुखजायनबोला॥ खनहि बीजै की बानन मारा। कँपकँप नारिमरै बिकरारा॥ दो० कतहू विरह न छोड़ै, भा शशिगहन गिराश। नखत चहूँदिशि रोवहिं, अँधरे धरत अकाश॥ घड़ीचारइमि गहनगिराशी। पुनिविधि हिये ज्योतिपरकाशी॥ निससे ऊभभर लीन्हे श्वासा। भइ अधार जीवनकी आसा॥ बिनवहिं सखी छूटशिशि राहू। तुम्हरी ज्योति ज्योतिसबकाहू॥ ⋆भेद १ कोकावेली २-७ आंग ३ सुराख ४ भारी ५ छोड़ना ६ चन्दन ८ ठण्ढापानी ६ बहुत १० पद्मावत ११ हरघड़ी १२ दिल १३ रुकना १४ बिजुली १५ बेकरार १६ चाँदगहन १७ इस तरह १८ ईश्वर १६ दिल २० रोशनी २१ बेहोश २२ कछु खाया २३ चाँद २४ना

३१६ पद्मावत। तूँ शशिबदनें जगतैं उजियारी। कै हरलीन्ह कीन्ह अँधियारी॥ तू गजगाँमिनि गर्व गहेली। अबकसअँस सतछांड़ दहेली॥ तूहर लंक हेराई केहरँ। अब कंसहार करेसि है हर॥ तू कोकिलि बैनी गजमोहा। कौनव्याधहोयगहीनिछोहा॥ दो० कमलकरी तू पद्मिन, गइ निशिं भयौ बिहान। अबहुँ न सम्पुट खोलिसि, जोरिउठाजगभानै॥ भाननाउँ सुनिकमल विकासा। फिरिकै भँवरलीन्ह मधुवासा॥ शरदचन्दें मुखजीभ उघेली। खंजननयनैं उठी करकेली॥ बिरह न बोल आव मुखमाई। मरमर बोल जीववरियाई॥ डोलबिरहदारुनैं हिये कांपा। खोलनजाय विरहदुखझांपा॥ उदंधिसमुद्रजंसतरंगै दिखावा। चेपंघूमहिंमुखबात न आवा॥ यह शठ लहर लहर परधावा। भँवरपरा जिव थाह न पावा॥ सखी आन विष देवतो मरनू। जीव न पेट मरन का डरनू॥ दो० खंनै उठै खनवूड़ै, अस हिय कमल सकेंत। हीरामनहिं बुलावहि, सखी कहन जिव लेत॥ चेरी धाय सुनत खन धाई। हीरामन लै आय बुलाई॥ जनहु वैद्य औषध लैआवा। रोगियें रोग मरतजिव पावा॥ सुनत अशीश नयनधनखोली। बिरहबैनकोकिलजिमि बोली॥ कमलहि बिरहबिथा जसबाढ़ी। केशरै बरनपीर हिय काढ़ी॥ कित कमलहि भा प्रेम अँगूरू। जो पै गहन लेह दिन सूरूँ॥ चाँद कैसा मुँह १ दुनियां २ हाथीकी चाल ३ गुरुर ४ भारी ५ कमर ६ चीता ७ आवाज ८ बेदर्द ९ रात १० सूर्य ११ कातिककी पूरनमांसीका चांद १२ ममोलाकी आंख १३ भारी १४ मुश्किल १५ दिल १६ नामसमुद्र १७ लहर १८ आंख १९ कभू २० बन्द २१ जिसतरह २२ पीला २३ सूर्य २४॥

| पद्मावत | ११६ पुरयन छाहिं कमल की करी। सकल विथा सुनियस तुमहरी॥ पुरुष गंभीर न बोलहिं काहू। जो बोलहिं तो और निबाहू॥ दो० इतना बोल कहत मुख, पुनि होइगई अचेत। पुनिकै चेत सँभारी, वही वकत मुखलेत॥ और दग्ध का कहौं अपारा। सती जो जरे कठिन असझारा॥ होय हनुमन्त पैठहै कोई। लङ्का दाह लाग तन सोई॥ लङ्का बुझी आग जो लागी। यहिन बुझैतस आँच विजागी॥ जनहु अगिनके उठहिं पहारा। वैसब लागहिं अंग अँङ्गारा॥ कट कट मांस सराँग पुरोवा। रक्तकी आंसु मांस सबरोवा॥ खनक वार मांस अस भूंजा। खनहिंचपायसिंह असगूंजा॥ यहरी दग्ध हत अतममरीजे। दग्ध न सही जीवपर दीजे॥ दो० जहँलग चन्दन मलयागिरि १०, औ सायर सबनीर २। सबमिल आय बुझावहिं, बुझहि न आगशरीर॥ हीरामंन जो देखेसि नारी। प्रीति बेल उपैजी हियें १३ बारी॥ कहेसि न तुम कस होहु दहेली १५। उरझी प्रेम प्रीतकी बेली॥ प्रीतिबेल जन उरझै कोई। उरझा मुये न छूटै सोई॥ प्रीति बेल ऐसे तन डाढ़ा। पलहत सुख बाढ़त दुख बाढ़ा॥ प्रीति बेलकी अमर को बोई। दिनदिनबढ़े क्षीण नहिं होई॥ प्रीतिबेल सँग विरह अपारा। स्वर्ग पताल जरै तेहिझारा॥ प्रीति अकेल बेल जहँ छावा। दूसर बेल न सरबर पांवा॥ दो० प्रीतिबेल उरझाय जब, तब सुजान सुखसाख। मिले प्रीतम आयके, दाखैं बेल रस चाख॥ सब १ अच्छे लोग २ जलन ३ मुशकिल ४ जलाना ५ आग ६ सीख ७ कभी ८ शेर ६ चन्दन १० तालाव ११ पानी १२ पैदा १३ दिल १४ भारी १५ घटना १६ आसमान १७ बराबरी १८ अंगूर १६॥

पद्मावत उठि टेंके पाया। तुमहुँ तो देखौ प्रीतम छाया ॥ कहत लाज और हिये¹ न जीव। इक दिशँ² आग दूसर दिशि पीव॥ तुमसो मोर खेवकै³ गुरु देवा। उतरों पार तेही विधि खेवा ॥ सूरै उदयगढ़ चढ़त सुंताना। गहने गहा कमल कुँभलाना॥ औ हत होय मरों नहिं झूरी। यह शठ मरों जो नेरहि दूरी॥ घट महँ वकत वकत भा मेरूँ। मिलहिन मिलहि परा तस फेरू॥ दमर्नाहिं नलहिं जोहंसमिलावा। तब हीरामन नाउँ कहावा॥ दो० मूरै संजीवन दूर है, सालै शक्की वान। प्राण मुक्ति⁹ अब होत है, वेगें¹⁰ देखावहि आन॥ हीरामन भुइँ धरा ललांटू। तुमरानी युगयुगैं सुखपोंटू॥ जेहिकै हाथ जरी औ मूरी¹⁴। सो योगी अब नाहीं दूरी ॥ पिता तुम्हार राज कर भोगी। पूजे विप्रे¹⁶ मरावै योगी ॥ पँवेरैं पँवर कुतवाल सो बैठा। प्रेमकलुम्बै¹⁷ सुरँग होय पैठा ॥ चढ़त रयनिगढ़ होयगा भोरू। आवत वोरें धराकै चोरू ॥ अब लैगयें देय वह शूरी। तेंहिसो अगौँहैं विधातुमपूरी ॥ अब जिव तुम कायों वह योगी। काया रोग जान पै रोगी ॥ दो० रूप तुम्हार योगी आपनं, पिंड कमावा फेर। रहा हेराय खंड तेहि आपै, काल न पावत हेर ॥ हीरामन जो बात यहि कही। सूर्य्यकी गहन चांद पुनि गही॥ सूर्य्यकीदुखजोशशि²² होयदुखी। सो कित दुखमाने करमुखी॥ अबजो योगि मेरै मोहिं नेहौँ। मोहिं वह साथ धर्तगगनेहौँ ॥ छाती १ इकतरफ़ २ मल्लाह ३ सूर्य्य ४ मुलाक़ात ५ रानीदमन ६ नाम राजा ७ नाम बूटी ८ सूराख ६ आख़िर १० जल्द ११ शिर १२ हमेशा १३ तख़्त १४ जड़ १५ ब्राह्मण १६ ड्योढ़ी १७ प्रेमका भराहुआ १८ दरवाज़ा १६- ख़बर २० बदन २१ चांद २२ मुहब्बत २३ ज़मीन-आसमान २४ ॥

रहै तो करौं जन्म भर सेवा । चलैतो यह जिव साथ परेवा ॥ कौनसो करं लैगहि गुरुसोई । पर कायां प्रवेश जो होई ॥ पलटसो कौन पंथै बिधिकेला । चेला गुरु गुरु होय चेला ॥ कौन खण्ड अस रहा लुकाई । आवै काल हेरै फिर जाई ॥ दो० चेला सिद्ध सो पावै, गुरुसों करैअछेद । गुरु करै जो कृपा, कहै सो चेला भेद ॥ अनरानी तुम गुरु वह चेला । मोहिं पूँछहु कै सिद्ध नवेला ॥ तुम चेला कहँ परशन भई । दरशन देय मँडफ चलगई ॥ रूप गुरू कर चेलहि दीठा । जितसमायहोयचित्रं सोपैठा ॥ जीव काढ़ लै तुम अपसई । वह भा काया जिव तुम भई ॥ क्या जो लाग धूप औ सेऊँ । क्या न जान जानि पै जीऊ ॥ भोग तुम्हार मिला वह जाई । जो वहबिथा सोतुम कहँआई ॥ तुम चहकी घट वह तुम माहां । काल कहां पावै वह छाहां ॥ दो० अस वह योगी अमरै भा, परकाया परबेश । आवकाल गुरु तनदेखी, फिर सोकरै अदेश ॥ सुनि योगी की आमर करनी । न्योरी बिरहबिथाकीमरनी ॥ कमलकरीहोय बिकसो जीव । जनु रविउदय छूटगासीवैं ॥ जो भा सिद्धको मारै पारा । नींबूरसते होय जो बारों ॥ कहो जाय अब मोर सँदेशू । तजो योगअबहोहु नरेशू ॥ जन जानहु हौं तुमसों दूरी । नयनहिं मांझ गड़ी वहशूरी ॥ तुम सँचेत घटै घट केरा । मोहिंघटजीव घटननहिंबेरा ॥


पाद-टिप्पणी (Footnotes): १ हाथ १ पकड़ना २ यत्न ३ राह ४ देखना ५-६ कमाल ६ दुई न राखै ७ नया ८ तसवीर १० छिपना ११ जाड़ा १२ हमेशा ज़िन्दा १३ सलाम १४ आख़िर १५ खिलना १६ सूर्यके उदय जाड़ा जाय १७ राख १८ छोड़ना १६ बहादुर २० पसीना २१ देर २२ ॥

१३२ पद्मावत । तुम कहँ पाटँ हिये² में साजा । अब तुम मोर दुहूँ जगराजा ॥ दो० जोरीजियहिं मिलगलरहै, मरहिं तोएकहिं दोउ । तुमपै जियनहोयकछु, मोजियहोयसोहोउ ॥ खण्डइक़ीसवां शूलीखण्डरतनसेन ॥ बाँधतपौ आनी जहँ शूरी । जुरेआय सब सिंहल पूरी ॥ पहिले गुरूदेय कहँ आना । देखरूप सब कोउ पछताना ॥ लोगकहें यहि होय न योगी । राजकुँवर कोउअहैवियोगीँ ॥ काहू लाग भयो है तपा । हिये सुम्राल केर मुखजपा ॥ जस मारे कहँ बाजा तूरूँ । शूरीदेख हँसा मन्मूरूँ ॥ चमके दशनँ भयो उजियारा । जो जहँ तहां वीज असमारा॥ योगी केर करो पै खोजूं । मंगे यहिहोय न राजा भोजू ॥ दो० सब पूँछहिं कहु योगी, जात जन्म औ नाउ । जहाँ ठाँव रावकर, हँसा सो कहु केहिभाउ ॥ का पूँछौ अब जात हमारी । हम योगी औ तपा भिखारी ॥ योगी जात कौन हो राजा । गारिन कोहमोरैं नहिं लाजा ॥ निलज भिखारलाजजेहिं खोई । तेहिकी खोज परै जन कोई ॥ जाकर जीव मरे पर बसा । शूरीदेख सो कसनहिं हँसा ॥ आज नेहसों होय निबेरौँ । आजभूमि¹⁴ तजें गगनें बसेरा॥ आज कर्या पिंजर बँद टूटा । आजहिं प्रान परेवां छूटा ॥ आज नेह सो होय नियारा । आज प्रेमसँग चला पियारा ॥ दो० आजअबध सरै पहुँची, गयेजाउँमुखराँते । तख़्त-१ दिल २-५-योगी ३ दुखी ४ नामवाजा ६ नाम मर्द कामिल ७ दांत ८ बिजुली ९ तलाश १० शायद ११ गुस्सा १२ जुदाई १३-१६ ज़मीन १४ छोड़ना १५ आसमान १६ चढ़न १७ उड़नेवाला १८ हद २० बराबर २१ लाल २२ ॥

[header] पद्मावत। ५२३ [/header]

बेगे होहु मोहिं मारहु, जन चालहु यह बात ॥ कहहिंसँवरि जेहि चाहेसिसँवरा। हमतुमकरहिं केतिकर भँवरा॥ कहेसि वही संवरों हर फेरा। मुयेजीत आहों जेहि केरा ॥ औ सुमिरों पद्मावत रामा। यहिजिवन्योछावरतेहिनामा ॥ रक्त की बूँद कया जब परहीं। पद्मावत पद्मावत कहहीं ॥ रहे तो बूँद बूँद महँ ठाँऊँ। परहुँ तो सोई लै लै नाऊँ ॥ रोम रोम तन तासो ओधो। सूतैहि सूत बेध जिवसोधो ॥ हाड़हिहाड़ शब्द सो होई। नस नस माँह उठै धुनिसोई ॥ दो० खाय बिरह गांताकर, गूद मांस किये हान। हों पुनि सांचा होयरहा, वहकी रूप समानाँ॥ योगिहि जबहिं गाढ़ै असपरा। महादेव कर आसन टरा ॥ औ हँसि पार्वती सो कहा। जानहुसूर गहन असगहा ॥ आज चढ़े गढ़ ऊपर तपी। राजैं गहा सूर तब छिपा ॥ जग देखेगा कौतुकै आजू। कीन्हें तपा मारे कहँ साजू ॥ पार्वती सुनि पाँयन परी। चलौ महेश देखें इक घरी ॥ भेष भाट भाटिन कर कीन्हा। औ हनुमन्तवीर सँगलीन्हा॥ आय गुसँ है देखन लागे। वहसूरति कस सती सभोंगे ॥ दो० कटकै असुझदेखके आपन, राजागर्व करेय। दईकीदिशाँ न देखे, वह काकहँ जयै देय ॥ आसन लिये रहा हो तपा। पद्मावत पद्मावत जपा ॥ मन समाध तासों धुन लांगी। जेहिदरशन कारण बैरागी ॥

जल्द १ चंदन २ जगह ३ बेधना ४ सुराख ५ आवाज़ ६ समाना ७ मुशकिल ८ सूर्य ९ योगी १० तमाशा ११ महादेवजी १२ छिपकर १३ सतीकी तरह क़ायम १४ फ़ौज १५ ग़रूर १६ ईश्वरकी तरफ़ १७ जीत १८॥

१२४ पद्मावत । रहा समाय रूप वह नाऊँ। और न सूझ वारे जहँ जाऊँ ॥ औ महेशँ कहँकरो अदेशू। जेहि यहपन्थै दीन्ह उपदेशू ॥ पार्बती पुनि सत्य सराहा। औ फिरमुख महेश करजाहौं ॥ हिये महेशँ भईजोमहेशी। कित शिरनावहिं ये परदेशी ॥ मरतेहुँ लीन्ह तुम्हारा नाऊँ। तुमचित कीन्ह रही यहठाँऊँ ॥ दो० मारतही परदेशी, राखलेहु यहि वीर। कोइ काहू कर नाहीं, जो हो चलै न तीर ॥ लै संदेश सोंटों गा तहाँ। शूली देहिं रतन को जहां ॥ देख रतन हीरामन रोवा। राजा जिव लोगनहठ खोवा ॥ देख रोदनै हीरामन केरा। रोवहिं सब राजा मुखहेरों ॥ मांगहिं सब विधीनों सों रोई। की उपकोरै छुड़ावै कोई ॥ कहि सँदेश सब विपतिसुनाई। बिकल बहुत कुछकहीनजाई ॥ काढ़ प्रान बैठ लिये हाथा। मरै तो मरों जियो इक साथा ॥ सुनि सँदेश राजा तब हँसा। प्रान प्रान घट घट महँ वसा ॥ दो० हीरामन औ भाट दसौंधी, भये जिवपर इकठाउँ । चल सो जाय अब देख तहँ, जहँ बैठो रहिराउँ ॥ राजा रहा दृष्टि १५ कै औंधी। रहिनसका तब भाट दसौंधी ॥ कहेसि मेलकै हाथ कटारी। पुरुप न आछे बैठि पिटारी ॥ कान्ह कोप कै मारा कंसू। गोकुल मांझ बजावा वंसू ॥ गन्धबसेन जहां रिस बाढ़ा। जाय भाट आगे भा ठाढ़ा ॥ ठाढ़ देख सब राजा राऊ। बायें हाथ दीन्ह वरभाँऊ ॥ दरवाज़ा १ महादेवजी २-७ सलाम ३ राह ४ देखना ५ दिल ६ मेहरबानी ८ जगह ६ तोत्ता १० रोना ११ देखना १२ ईश्वर १३ कोशिश १४ निगाह १५ आशीर्वाद १६ ॥

। पद्मावत । १२५ बोला गन्ध्रबसेन रिसाई। कैस योगि कस भांट असीई ॥ योगी पानि आग तू राजा। आगहि पानि जूझ नहिं छाजा ॥ दो० आग बुझाई पानि सो, जूझ न राजा बूझ। लीन्हे खप्पर बारै तुहिं, भिक्षा देहि न जूझ ॥ योगि न होय आहि सो मोंजू। जानहु भेद करो सो खोजू ॥ भारथे होय जूझै जो ओधा। होहिं सहाय आय सब योधा ॥ महादेव रण घण्ट बजावा। सुनिकै शब्दे ब्रह्म चलि आवा ॥ वासुकि फण पतार सों काढ़ा। अष्टोकली नाग भा ठाढ़ा ॥ छप्पन कोटि बसन्देरं बरा। सवालाख पर्वत फुरहरौ ॥ चढ़े अस्त्र लै कृष्ण मुरारी। इन्द्र लोग सब लाग गुहारी ॥ तेंतिस कोटि देवता साजा। औ छानबे मेघदल गाजा ॥ दो० नव्वे नाथ चलि आवहिं, औ चौरासी सिद्ध। आज महाभारत चलै, गगनैं गरुड़ै औ गिद्ध ॥ भइ अजौ को भाट औ भारूँ। बायें हाथ दिये बरभारूँ ॥ को योगी अस नगरी मोरै। जो दै सेंध चढ़े गढ़ चोरै ॥ इन्द्र डरै नित नावै माथा। जानत कृष्ण शेष जे नाथा ॥ ब्रह्मा डरै चतुरमुख जासू। औ पाताल डरै बलि बासू ॥ धरति डरै औ मण्डफ मेरू। चन्द्र सूर्य्य औ गगनैं गँभीरू ॥ मेघ डरहिं बिजुली जेहि डीठी। कूर्म डरै धरती जेहिं पीठो ॥ चहोंतो सबमोंकों धर केशा। और को गिनेतैं अनेग नरेशाँ ॥

  • बेंअदब १-१६ लड़ाई २ दरवाज़ा ३ भारी लड़ाई ४ मारना ५ मदद ६ आवाज़ ७ नाम राजा साँपों का ८-२० नाम हाथी ९ आग १० मौजूद ११ हथियार १२ आसमान १३ नाम राजा पक्षी १४ हुक्म १५ सलाम १७ चार मुँह १८ राजा दैत्य १६ नाम पहाड़ २१ आसमान २२ निगाह २३ कछुवा २४ फेरुआ देना २५ गिनती २६ राजा २७ ॥

१२६ | पद्मावत । दो० बोला भाट नरेश सुनि, गर्व न छाजा जीव । कुम्भकरणकी खोपड़ी, बूडत बाचों भीवँ ॥ रावण गर्व बिरोधों रामू । ओही गर्व भयो संग्रामू ॥ तसरावण असको बरबंडा । जेहिदशशीशँ बीसभुजदंडा ॥ सूरज जेहि की तपै रसोई । निज बसन्दर धोती धोई ॥ मूर्क मुनेटाँ शशिमसयारों । पवनैं करैनित बोरै बोहारा ॥ मीचैं लाये कै पादी बांधा । रहा न दूसर सपने कांधा ॥ जो अस बज्र टरहि नहिं टारा । सोउ मर दोउ तपेंसी करमारा ॥ नाती पूत कोटि दश अहा । रोवनहार न एको रहा ॥ दो० ओझ जान के काहू, जनकोइ गर्व करेय । ओछी पार दई है, जीत पत्र जो देय ॥ अबजो भाट तहां हंत आगे । बिनयें उठा राजा रिसलागे ॥ भाट अह्रै ईश्वर की कला । राजा सबराकैं अरकला ॥ भाट मीच पै आपन दीसा । ताकहँ कौन करै रिस रीसा ॥ भयो रजाये सुगन्ध्रब सेनी । काहिं मीचके चढ़ा नसेनी ॥ कह अनी बानी अस पढ़े । करसि न बुद्धे भेंट जो कढ़े ॥ जातभाट कितऔगुन लावस । बायें हाथँ राजबर भावसैं ॥ भाट नाउँ का मारों जीवा । अबहूं बोल नायके ग्रीवां ॥ दो० तुइरे भाट वै योगी, तोहि यह कहांक सङ्ग । कहां चढ़ै असपावा, कहां भया चित भङ्ग ॥

  • ग़रूर १ वचना २ नाम पहलवान ३ सज़ादेना ४ लड़ाई ५ ज़बरदस्त ६ शिर ७ नाम गुरु राक्षसोंका ८ चोबदार ६ चाँद मशालची १० हवा ११ दरवाज़ा १२ मौत १३ श्रीराम लक्ष्मण १४ ग़रूर १५ कमज़ोर की तरफ़ १६ अर्ज़ १७ मुकाबिला न चाही १८ हुक्म १६ सीढ़ी २० अक़्ल २१ बेहुनर २२ सलाम २३ गर्दन २४ ॥

पद्मावत। १२७ जो सत पूँछेसि गन्ध्रब राजा। सत पै कहूँ परे नहिं गाजा ॥ भाटहि काहि मीचसों डरना। हाथ कटार पेट हन मरना ॥ जम्बूद्वीप चितावर देशू । चित्रसेन बड़ तहां नरेशू ॥ रतनसेन यहि तांकर बेटा। कुल चौहान जाय नहिं मेटा ॥ खांडेअंचल सुमेरु सुभारू । टरै न जो लागै संसारू ॥ दान सुमेरु देत नहिं खांगो। जो यह मांग न औरहि मांगा ॥ दाहिन हाथ उठायों ताही। और को अस वरभावो जाही ॥ दो० नाउँ महापात्र गुहिं, तेहेकि भिखारी डीठँ । रिसलागे खरिवात कहि, खरि पै कहै वसीठँ ॥ ततखनं सुनि महेश मनलाजा। भाटकिरंनि है विनवां राजा ॥ गन्ध्रबसेन तू राजा महां। हों महेश मूरत सुनि कहा ॥ पै जो बात होय भल आगे। कहा चही काभा रिस लागे ॥ राजकुँवर यहिहोहिं न योगी। सुनि पद्मावत भयो वियोगी ॥ जम्बूद्वीप राजघर बेटा। जोहै लिखा सो जाय न मेटा ॥ तूरै सुवै जाय वह आना। औ जाकर बिरोकै तैमाना ॥ पुनि यह बात सुनीशिवलोका। कर सुविवाह धर्म है तोका ॥ दो० मांग भीख खप्पर लिये, मुये न छांड़ै बौरै। चूमदेखजो कनककचौरी, भीखदेह नहिंमार ॥ औ हेंट होहरे भाट भिखारी। का तू मोहिं देइ अस गारी ॥ को मोहियोगीं जगतहोइपारा। जासों हेरों जाय पतारा ॥ योगी यती आव जित कोई। सुनत त्रासे मान भा सोई ॥ बिजुली १, राजा २ तलवार बहादुर ३ कमी ४ शोख ५ वकील ६ उसी वक्त ७ महादेवजी ८ मानिन्द ९ तारीफ़ १० कहामान ११ दुःखी १२ गुस्सा १३ दरवाज़ा १४ सोने की कटोरी १५ दूर हो १६ लायक १७ देखना १८ डर १६ ॥

१३८ पद्मावत । भीखलेहु फिर मांगो आगे । यहि सब रयैंनि रहै गढ़लागे ॥ जसचहि इच्छै चहूँतेहिदीन्हा । नाहिं बेध शूली जिवलीन्हा॥ जेहि अससाधहोय जिवखोवा । सो पतंग दीपक तस रोवा॥ सुर नर मुनि गुनि गन्ध्रव देवा । तेहिं को गिने करहिं नितसेवा॥ दो० मोसों को सरवर्र करै, अरे सुनि झूठे भाट । क्षार होय जो चाजौं, गर्जै हस्तिर्न के ठाट॥ योगी धर मेले सब पाछे । उरये मालँ आये रण काछे ॥ मंत्रिन्र कहा सुनो हो राजा । देखहु अब योगिनकर काजा॥ हमजो कहा तुमकरहुंन जूझं । होत आवदेरं जगतअसूझा॥ खंने इकमहँ झुरमटहो बीता । दरमहँ चढ़ै जोरहै सोजीता ॥ कै धीरज राजा तब कोंपा । अङ्गद आय पांव रण रोपा ॥ हस्तिं पांच जो अगमनैं धाये । तें अङ्गद धर सूंडि फिराये॥ दीन्ह उड़ाय स्वर्ग कहँ गये । लौट न फिरैं तहहिं के भये ॥ दो० देखत रहें अचम्भो योगी, हस्ती बहुरन आय । योगीकर अस जूझव, भूमि न लागत पाँय॥ कहहिं बात योगी हम पाये । छिन इक मांह चहतहैं धाये ॥ जौ लहि धावहिं असका खेलहु । हस्तिहिंकर जूहे सब पेलहु ॥ जोगर्र्ज पेल होय रण आगे । तस वगमेल करहु संग लागे ॥ हस्ति की जूह आय अंगसारी । हनुमत तबै लँगूर पसारी ॥ जोहिसो सैनं बीच रण आई । सबै लपेट लँगूर चलाई ॥ बहुतक टूट भये नौ खण्डा । बहुतक जायपरे ब्रह्माण्डौ ॥ रात १ चाहना २ बराबरी ३ राख ४ हाथी मस्त ५ हाथी ६ पहलवान ७ सलाहकार ८ लड़ाई ६ फ़ौज १० पल ११ बालि का बेटा १२ हाथी १३ पहिले १४ आसमान १५-२१ ज़मीन १६ हलका १७ मस्त हाथी १८ मुक़ाबिला १६ फ़ौज २० ॥

बहुतक भुवन सोह अत्रीखा। रहे जो लाख भये ते लेखा ॥ दो० बहुतक परे समुद्रमहँ, परत न पावां खोज। जहां गर्व तहँ पीरा, जहां हँसी तहँ रोजै ॥ फिर आगे का देखे राजा। ईश्वर केर घ्रंट रण बाजा ॥ सुना शंख जो विष्णु अपूरा। आगे हनुमत केर लँगूरा ॥ लीन्हें फिरै लोक ब्रह्माण्डा। स्वर्ग पतारलोवा म़तमण्डाँ ॥ बलि बासुकि औ इन्द्रनरेन्दू। राहु नखत सूरज औ चन्दू ॥ जामवन्त दानव राक्षस पूरे। अहंतो बह्न आय रण जुरे ॥ जेहिकर गर्व करत हत राजा। सो सब फिरि बैरी होइ साजा ॥ जहँवां महादेव रण खड़ा। शीश नाय नृप पांयन पड़ा ॥ दो० केहिकारणे रिसकीजिये, हौं सेवक औ चेर। जेहिचाही तेहि दीजिये, बारि गुसाई केर ॥ जब महेश उठ कीन्हवसीठी। पहिले कडू अन्तहोय मीठी ॥ तू गन्ध्रब राजा जग पूजा। गुण चौदह सिख देइको दूजा॥ हीरामन जो तुम्हार परेवां। गा चितौर औ कीन्हेसि सेवा ॥ तेहि बुलाय पूँछौ वह देशू। औ पूँछौ योगिहि जस बेशू ॥ हमरे कहत रोप नहिं मानो। जो वह कहै सोई परमानो ॥ जहां बारितहँ आववर ओका। कर विवाह धर्म बड़ तोका ॥ जौ पहिले मन माननकांधे। परखै रतन गांठ तब बांधे ॥ दो० रतन छिपाये ना छिपै, पारख होय सो पेष। बाल कसौटी दीजिये, कनक कचोरी वेष ॥


१ फिरना २ बीच ३ मगर ३-११ रोना ४ महादेव जी ५-१५ जमीन ६ नाम राजा दैत्य ७ नाम राजी सांप ८ राजा ६-१२ पत्थर १० वास्ते १३ लड़की १४ वकालत १६ जानवर परिन्द १७ यकीन १८ सोने की कटोरी १६॥

१३० पद्मावत । हीरामन जो राजैं सुना । रोषे¹ बुझाय हिये² महँ गुना ॥ आज्ञाभई बोलावहु सोई । पण्डितहूते दोषै³ नहिं होई ॥ एक कहत सहसर्कै⁴ दशधाये । हीरामनहिं वेग लै आये ॥ खोला आगे आन मँजूसाँ⁵ । मिलानिकसिबहुदिनकररूसा॥ अस्तुति करत मिला बहुभांती⁶ । राजैं सुना हिये भइ शांती⁷ ॥ जानौं जरत अगिन जलपरा । होयफुलवाररहस हियभरा ॥ राजैं मिल पूँछी हँस बाता । कसतन पियर वरन मुखराताँ⁸ ॥ दो० चतुरबेदतुम पण्डित, पढ़े शास्त्र वो वेद । कहां चढ़े योगीगढ़, आन कीन्ह घर भेद ॥ हीरामन रसनाँ रस खोला । दैअशीश औ अस्तुति बोला ॥ इन्द्रराज राजेश्वर महा । सुनिहियैं रिसकुछ जाय न कहा॥ पै जो बात होय भल आगे । सेवक निडर कहै रिस लागे ॥ सुवा सुफल अमृत पैखोजा । होय न विक्रमें राजा भोजा ॥ हौं सेवक तुम आदि गुसांई । सेवा करों जियों जब तांई ॥ जो जिव दीन्ह देखावा देशू । सोपै जिय महँ बसै नरेशू ॥ जो वह सँवरै एकै तोहीं । सोई पंख जगत रतिमोहीं ॥ दो० नयन बैन औ श्रवण, सबही तोर प्रसाद । सेवा मोर यही नित, बोलों आशिरबाद ॥ जो अस सेवक जेहि तपँकसा । तेहिक जीभ पै अमृत वसा ॥ तेहिं सेवक कै करमहिं दोषू । सेवा करत करै पतिरोषू ॥ औ जेहिदोष निदोषहिं लागा । सेवक डरा जीव लै भागा ॥ गुस्सा १-१६ दिल २-११ क़सूर ३-१८ हज़ार ४ पिंजरा ५ बहुत तरह ६ तसल्ली ७ लाल ८ चार ६ ज़बान १० राजा विक्रमादित्य १२ सबसे पहिले १३ राजा १४ लालमुँह १५ आँख ज़बान कान १६ मेहनत की १७ बेक़सूर २० ॥

पद्मावत। १३१ जो पक्षी कहवां थिरै रहना। ताकै जहां जाय जो डहनाँ ॥ सप्तदीपँ फिर देखेउँ राजा। जम्बूदीप जाय तब बाजाँ ॥ तहँ चित्तौर देखो गढ़ ऊँचा। ऊँचराज शिर तोपहँ पहुँचा ॥ रतनसेन यह तहां नरेशू। सो आन्यो योगी कर बेशू ॥ दो० सुवासुफल लै आनी, है तेहि गुण मुखरातैं। कयाँ पीत सो तासों, सँवरौं बिक्रम बात ॥ पहिले भयो भाट सत भाखी। पुनि बोला हीरामन साखी ॥ राजा भा निश्चयें मन माना। बांधा रतन छोड़ कै आना ॥ कुल पूँछा चौहान कुलीना। रतन न बांधे होय मलीना ॥ हीरा दशन पान रँग पागी। विहँसत बदन बीजब्रतागी ॥ मुन्द्रा श्रवणँबीन सों चांपे। राजबैनँ उघरे सब झांपे ॥ आना काठर एक तुखारूँ। कहा सुफेरिभयो असवारू ॥ फेरा तुरी छतीसो खुरी। सबहिं बखानी सिंहलपुरी ॥ दो० कुँवर बतीसो लक्षना, सहसैं किरन जस भानैं। काह कसौटी कसिये, कञ्चैन बारह बान ॥ देख सूर्य्य करकमलँ सँयोगू। अस्तँअस्त बोला सबलोगू ॥ मिला सोवंश अंश उजियारा। भाविरोकं औ तिलक सँवारा ॥ अनिरुद्धको जो लिखजयमारा। को मेटै बाणासुर हारा ॥ आज मिलीअनिरुधकहूँ ऊपा। देव इन्द्र दीन्ह शिर दूषा ॥ खड्ग मूर भुइँ सरवरे केवा। वन खंड भँवरहोय रसलेवा ॥ क़ायम १ बाजू २ सातों मुल्क ३ पहुँचा ४ लाल ५ वदन ६ यक़ीन ७ कानकी बाली ८ सरदारी की बातें ६ घोड़ा १०-११ तारीफ़ १२ हज़ार १३ सूर्य्य १४-२० सोनाख़ालिस १५ तथा रतनसेन १६ तथा पद्मावत के लायक़ १७ इष्ट चाह १८ टीका १६ तालाब २१ ॥

१३२ पद्मावत । पच्छिम का बार पूर्बकी बारी । लिखी जो जोरी होयनन्यारी ॥ मानुषसाज लाख मन साजा । सोई होयजो बिधिउपराजा ॥ दो० गये बाजन जो बा जंत, जिय मारण रणमाहँ । फिर बाजन ते बाजे, मंगलचार उनाहँ ॥ बोल गुसाईं कर मैं माना । कहिसोजगतउतरे कहँआना ॥ मानाबोल हर्ष जिव बाढ़ा । औ बिरोकैं भा टीका गाढ़ा ॥ दोनों मिले मनावा भला । पुरुष आप आप कहँ चला ॥ लीन्ह उतारी जो हत योगू । जो तप करै सो पावै भोगू ॥ वह मन चित जो एकै अहा । मार लीन्ह न दूसर कहा ॥ जो अस कोई जिव परछैंवा । देवता आय करहिं तेहिसेवा ॥ दिनदश जीवन जो दुख देखा । भायुगयुगसुख जहानलेखा ॥ दो० रतनसेन का बरनों, पद्मावत कर व्याह । मन्दिरबेगि सँवारो, मन्दिर तोरा छाह ॥ खण्डबाईसवां ब्याह राजारतनसेनऔरपद्मावत ॥ लगन धरी औ रचा बिवाहू । सिंहल निवत फिरा सबकाहू ॥ बाजन बाजे कोटि पचासा । भा आनंद सगरे कैलासा ॥ जेहिदिनकानितदेवमनावा । सोई दिवसे पद्मावत पावा ॥ चांद सूर्य्य मन माथे भागू । औगावहिंसबनखेंत सुहागू ॥ रचरचमाणिकै माड़ौ छावहिं। औभुइँराति १४ बिछावबिछावहिं॥ चन्दन खम्भ रचे चहुँ पांती । माणिकदिया बरहिंदिनराती ॥ घर घर मन्दिर रचे दुवारा । जहँतक नगर गीत झंकारा ॥ . लड़का १ लड़की २ अलग ३ ईश्वरने पैदाकिया ४ जमाव ५ खुशी ६ टीका ७ खेलना ८ तारीफ़ करना ९ जल्द १० दिन ११ तथा सहेलियां १२ जवाहर १३ लाल १४ ॥

पद्मावत । १३३ दो० हाट बाट सब सिंहल, जहाँ देखी तहँ राते । धन रानी पद्मावत, जाकर ऐसि बरात ॥ रतनसेन कहँ कपड़ा आये । हीरा मोति पँदारथ लाये ॥ कुँवर सहसँ संग अहे सभागे । बिनयै करैं राजा पहँ लागे ॥ जेहिलग तुम साधा तप योगू । लेहु राज मानो सुख भोगू ॥ मज्जनें करहु बिभूति उतारो । करो अस्नानचित्रे समसारो ॥ काढ़हु मुन्द्रा फटक अभाऊ । पहिरो कुण्डल कनकॅजड़ाऊ ॥ छोरहु जटा फुलायल लेहू । झारहु केश मुकुट शिरदेहू ॥ काढ़हु कंथौ चिरकुट लावा । पहिरो राता दगला सुहावा ॥ दो० पांवरि तजहु देहुपगपैरी, आवा बांक तुखारं । बांध मौर धरि छत्र शिर, वेगेँ होहु असवार ॥ साजा राजा बाजन बाजे । मदनसहाय दोउदल गाजे ॥ औ राँता सोने रथ साजा । भई बरात गोहेन सब राजा ॥ बाजत गाजत भा असवारा । सब सिंहलने कीन्ह जुहारों ॥ चहुँदिशियश अलखततँरोई । सूरज चढ़ा चांद की ताई ॥ सब दिन तपे जैस हिये माहां । तैसि रात पाई सुख छाहां ॥ ऊपर छत्र राति तस छावा । इन्द्रलोक सब सेवा आवा ॥ आज इन्द्रअप्सर सौं मिला । सब कैलास होहिं सिंहला ॥ दो० धरती स्वर्ग चहुँ दिश, पूररही मशयार । बाजत आवै मंदिर कहँ, होहिं मंगलाचार ॥ पद्मावत धौराहरँ चढ़ी । धौकसरवि जाकहँशशि करी॥ लाल १-१२-१७ हज़ार २ अर्ज़ ३ नहाना ४ तसवीर ५ वाली नाचीज़ ६ सोना ७ गुदड़ी ८ खड़ाऊं ९ घोड़ा १० जल्द ११ साथ १३ सलाम १४: छोटे सितारे १५ दिल १६ इन्द्रलोक की परी १७ आसमान १८ महल २० सूर्य २१ चांद २२ ॥

१३४ पद्मावत । देख बरात सखिनसों कहा। यह महँ कौनसो योगी अहा॥ कैसो योग लै ओरै निवाहा। भयो सूरै चढ़चांद बिवाहा॥ कौन सिद्धसो ऐसो अकेला। जे शिर लाय प्रेमसो खेला॥ कासों पिता बचन असहारी। उतरै न दीन्हदीन्हतेहि वौरी॥ काकहँ दई ऐसो जिव दीन्हा। जे जिहमार जीत रण लीन्हा॥ धन पूरुष अस नवै न नाये। औसैं परसहो देश पराये॥ दो० को बरबन्द वीर अस, मोहिं देखे कर चावँ। पुनिजायहिजनवासहि, सखीरी वेगैं देखाव॥ सखी देखावहिं चमकहिं वाहू। तू जसचांद सूर्य्य तोरनाहूँ॥ छिपा न रहै सूर्य्य परकाशू। देखकमलमन भयो विकाशू॥ वह उजियार जगत उपराहीं। जगउजियारसो तेहिपरछाहीं॥ जस रवि११. देखउठै परभातों। उठा छत्र देखहिं सब राता॥ वही मांझ भा दूलह सोई। और बरात संग सब कोई॥ सहसैंहिं१३ किरणरूपविधि१४ गढ़ा। सोने के रथ आवै चढ़ा॥ मन माथे दरशन उजियारा। सौंहैं निरखनहिंजायनिहारा॥ दो० रूपवन्त जस दरपण, धन तू जाकर कन्त। चाही जैसो मनोहरा, मिलासो मनभावन्त॥ देखा चांद सूर्य्य जस साजा। सहसैंहिं भावमदैनतनगाजा॥ हुलसे नयन दरश मदमाते। हुलसे अधरैं रंग रस राते॥ हुलसा बदनै ऊपररवि२० आई। हुलसाहियों कंचुकि२२ नसमाई॥ हुलसे कुंचैं कसनी बँद टूटी। हुलसेभुजबैलियों कर फूटी॥ आखिरतक १ सूर्य्य २-११-२० जवाब ३ लड़की ४ इतमीनान ५ ज़बर्दस्त ६ चाह ७ जल्द ८ ख़ाविन्द ९ खिलना १० भोर १२ हज़ार १३- १६ ईश्वर १४ सामने देखना १५ काम पैदा हुआ १७ होंठ १८ मुँह १६ दिल २१ अँगिया २२ छाती २३ चूड़ी २४॥

पद्मावत। १३५ हुलसी लंक कि रावण राजू। रामलषणदर्र साजहिं साजू ॥ आज चांद घर आवा सूरू। आज श्रृंगारहोय सब चूरू ॥ आज कटकै जो राहत कामू। आज विरहकरहोय संग्रामू ॥ दो० अंग अंग सब हुलसैं, कोइ कतहूँ न समाय। ठांवहिं ठांव विमोही, गइ मुरछा गत आय॥ सखी सँभार पियावहिं पानी। राजकुँवरि काहे कुँभिलानी ॥ हमतो तोहिं देखावा पीव। तू मुरझान कैस भा जीव ॥ सुनहु सखी सब कहै विवाहू। मोकहँ जैसो चांद कहँ राहू ॥ तुम जानहु आवै पिउ साजा। यह धमधम मोकहँ सब बाजा ॥ जते बराती औ असवारा। यह सब मोरे चालनहारा ॥ सो आगमँ देखत हों भली। आपन रहन न देखों सखी ॥ होय विवाह पुनि होयहै गौना। गवनवतहां बहुरि नहिं अवना ॥ दो० अब सो मिलन कितहै सखी, परा विछोवा टूट। तैसि गांठ पिउ जोरब, जन्म न होय है छूट ॥ आय बजावत बैठ बराता। पान फूल सेंदुर सब राताँ ॥ जहाँ सोने कर चित्र सँवारी। आन बरात तहां बैठारी ॥ माझ सिंहासन पाट सँवारा। दूलह आन तहां बैठारा ॥ कनकके खंभ लागे चहुँ पांती। माणिकै दिया बरहि दिनराती ॥ भयो अचल धुवै योग पखेरू। फूलबैठ थिरै जैस सुमेरू ॥ आज दई हों कीन्ह सुभागा। जस दुख कीन्ह नेग सब लागा ॥ आज सूर शशिके घरआवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो मिलावा ॥ फ़ौज १-३ सूर्य २-१६ लड़ाई ४ दूरअंदेशी ५ लौटके ६ लाल ७ तस- वीर ८ बीचोबीच ६ तख्त १० सोना ११ जवाहिरात १२ नाम नखत जिसे कुतुब कहते हैं १३ क़ायम १४ नामपहाड़ १५ चाँद १७ ॥