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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

१६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [हाशिया: महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र] कुछ दानपत्रों की नक़लें और शिलालेखों की छापें हमारे पास आई हैं, जिनका आशय नीचे लिखे अनुसार है— ( १ ) वि० सं० १७३१ फाल्गुन सुदि ७ ( ई० स० १६७५ ता० २१ फ़रवरी ) रविवार का देवलिया में भोगीदासजी की बावड़ी के ताक में लगा हुआ शिलालेख, जिसमें सीसोदिया वंशी गोपाल के पौत्र और जोधा के पुत्र भोगीदास का उक्त बावड़ी बनवाकर महारावत प्रतापसिंह के राज्य- काल में उसकी प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है¹। ( २ ) वि० सं० १७३२ फाल्गुन वदि १३ (ई० स० १६७६ ता० १ फ़रवरी) का मागसा गांव का गढ़वी गोकल के नाम का दानपत्र, जिसमें मागसा गांव चारण गोकल को उक्त महारावत-द्वारा मिलने का उल्लेख है। ( ३ ) पाटणया गांव का वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ ( ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी ) का दानपत्र, जिसमें महारावत प्रतापसिंह का पाट- णया गांव मेहता जयदेव को दान करने का उल्लेख है²। यह दानपत्र संस्कृत ( १ ) देखो ऊपर पृ० १६३ टिप्पण संख्या ४। ( २ ) ॰॰॰॰॰॰॰॰॰महेंद्रसमेन श्रीमन्महाराजाधिराजमहाराजरावतश्री- प्रतापसिंहदेवेनालोच्येदेमुक्तं । वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यमापातमात्र- मधुरोविषयोपभोगः। प्राणास्तृणाग्रजलबिंदुसमा नराणां धर्मः सखा पर- महो परलोकयाने। तथा। या स्वसद्मनि पद्मेपिदिनावधि विराजते इन्दिरा मन्दिरे न्यस्य कथं स्थास्यति सा चिरमितो निःसारं संसारमाकलय्य सहेतुकसकलदुःखनाशकसकलनित्यानित्यसुखसाधकसाधनाग्रेसरकृतोभयै- कादशीव्रतोद्यापने द्यमाघशुक्लैका[द]श्यां मया प्रतापसिंहनृपेण महत्तर- जयदेवद्विजाय मतिपितृदत्तविद्यारायापरनाम्ने पाटणपुराख्यो ग्रामः स्वसीमा- वृक्षपर्वतजलाशयकार्मुकहल[ इमं ]राजामात्यादि सर्वलागटस्वीयपरकीय- टंकीचतुराघाटैः सह पञ्चशताधिकनिवर्त्तनोपेतः स्वस्तिपत्रेण चंद्रार्क- यावत् श्रीकृष्णार्पणेन दानवाक्येन दत्तः ॰॰॰॰॰॰॰॰वैजवापायनसगोत्रः

महारावत प्रतापसिंह १६३ में है और-इतिहास के लिए उपयोगी है, क्योंकि इसके प्रारंभ में गुहिल से लगाकर भर्तृभट्ट तक गुहिल राजाओं के नाम दिये हैं और फिर क्षेमकर्ण से लगाकर हरिसिंह तक प्रतापगढ़ के नरेशों का यथाक्रम वर्णन दिया है। इसके अतिरिक्त महारावत की माता, पट्टराज्ञी, राजकुमारों, भाइयों, सर- दारों, राजगुरु, राजकवियों, मंत्रियों आदि के नाम भी उसमें मिलते हैं। (४) वि० सं० १७५३ श्रावण सुदि २ ( ई० स० १६९६ ता० २१ जुलाई) का देवलिया (देवगढ़) के कोतवाली चबूतरे के पास लगा हुआ शिलालेख, जिसमें महारावत-द्वारा प्रत्येक चतुर्दशी को जानवर मारने और मांस बेचने की मनाई का उल्लेख है¹। महारावत प्रतापसिंह वीर, दानशील, साहसी, उदार और विद्वान् राजा था। वह विद्वानों को आदरपूर्वक अपने राज्य में रखकर उनका महारावत का व्यक्तित्व यथोचित सम्मान करता था, जिससे उसके राज्य- काल में भी वहां साहित्यिक जीवन बना रहा। उसने शाही दरबार से अपना संबंध समयानुकूल रखा और संभव है कि युद्ध आदि अवसरों पर भी शाही सेना के साथ उसने अपनी फ़ौज भेजी हो। राजपूताने के बीकानेर और जोधपुर राज्यों से वैवाहिक संबंध जोड़कर उसने मेल बढ़ाया। उदयपुर के महाराणाओं से भी उसने विरोध प्रतापसिंहदेवो पाटणपुरग्रामं प्रतापपुराख्यां विधाय पञ्चशताधिकनिवर्त्त- नोपेतं वत्ससगोत्राय हरिदेव शिवदेव रंगदेव गोपालदेवादि पुत्रपौत्रादि सहिताय महत्तरजयदेवशर्म्मणे········इत्याचन्द्रार्कयावत् प्रददे···· । संवत् १७३३ वर्षे माघ सुदि पूर्णिमास्यां लिखितमिदम् । सोनी हीरो । मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । (१) इस लेख के अतिरिक्त उक्त महारावत के समय का देवलिया में बड़े जैन मंदिर के बाहिर एक पाषाण लेख लगा हुआ है, जिसके संवत्, मिति आदि का भाग घिस गया है। २५

१६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास नहीं बढ़ने दिया, जो उसकी बुद्धिमत्ता का सूचक है १। उदार स्वभाव का राजा होने के कारण उसने बीकानेर में विवाह के अवसर पर त्याग आदि बंटवाने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी । वह धर्मात्मा और दयालु राजा था। प्रजा की भावनाओं का वह सदा आदर करता तथा उत्तम आचरण रखता था। फलतः उसने देवलिया में प्रत्येक अष्टमी को कुम्हारों-द्वारा आवा न पकाने एवं चतुर्दशी को जीव-हिंसा न करने और मांस न बेचने की आज्ञा जारी कर पाषाण-लेख लगवा दिये थे। इन कार्यों से पाया जाता है कि उसके राज्य-काल में वहां जैन धर्मावलंबियों का पूरा प्रभाव रहा होगा। महारावत के ऐसे कार्यों से बाहर से आकर उसके राज्य में व्यापारी लोग बसने लगे, जिससे राज्य में समृद्धि बढ़ी और थोड़े ही दिनों में उसका बसाया हुआ प्रतापगढ़ क़स्बा अच्छा आबाद हो गया एवं देवलिया की ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२ । प्रतापगढ़ राज्य-की कुछ ख्यातों में कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि मेवाड़ के महाराणाओं ने बादशाही सेवा स्वीकार कर लेने के कारण अप्रसन्न होकर कांठल का इलाक़ा जोधपुर के कुंवर रामसिंह को दहेज में दे दिया, जिसपर वह वहां अधिकार करने के लिए गया, परंतु महारावत के एक पिपाड़ा राजपूत के द्वारा मारा गया । उसकी छत्री बमोतर में अंबा- माता के पास विद्यमान है। इस कथन की पुष्टि किसी शिलालेख अथवा उदयपुर और जोधपुर राज्य के इतिहासों से नहीं होती। देवलिया का राज्य सोलहवीं शताब्दी में स्थापित हो गया था और वह एक प्रकार से स्वतंत्र था। मुग़ल बादशाहों के समय उसका शाही दरबार से संबंध था । जहांगीर और औरंगज़ेब के समय उसके कुछ परगनों का मेवाड़ के महाराणाओं के नाम फ़रमान भी हुआ; परंतु उनका अधिकार वहां अस्थायी ही रहा और फिर वे बादशाही दरबार से देवलियावालों को मिल गये । इस अवस्था में मेवाड़ के महाराणाओं का यह राज्य अपने दामाद जोधपुर के राजकुमार रामसिंह को दे देने और उसके वहां जाने पर मारे जाने की बात निर्मूल है । अंबामाता में, जहां रामसिंह की छत्री बताई जाती है, कोई लेख नहीं हैं, न जोधपुर राज्य की ख्यातों में महा- रावत प्रतापसिंह के समकालीन राजकुमारों की नामावली में रामसिंह का नाम है । अतएव उपर्युक्त कथन में संदेह होना स्वाभाविक है, क्योंकि जिस राज्य पर अधिकार नाम मात्र का न हो, वह राज्य दहेज में देना अस्वाभाविक बात है । संभव है इस छत्री का संबंध मालवे के किसी राठोड़ राजा या राजकुमार से हो, जिसके राज्य की सीमा प्रतापगढ़ राज्य से मिलती हो ।

महारावत प्रतापसिंहः १६५ भी उत्तरोत्तर वृद्धि होकर आगे जाकर वहां कई भव्य जिनालय बने। देव- लिया राज्य उसके समय में सम्पन्न रहा। उसका कांठल के मीणों पर पूरा आतंक था एवं चोर और लुटेरों को यथेष्ट दंड देकर उसने सर्वत्र शांति की स्थापना की। एक बार डोडियों ने एक ब्राह्मण को मार डाला, जिस- पर उसने डोडियों के गढ़ पिपलोदा पर चढ़ाई कर अपराधियों को दंड देने में किंचित् भी विलंब न किया। शरणागत-वत्सलता को वह क्षत्रियों का मुख्य धर्म समझता था। उसने बादशाह औरंगज़ेब के पौत्र और बहा- दुरशाह के पुत्र अज़ीमुश्शान के भेजे हुए शेरबुलंदखां नामक शाही सेवक को अपनी शरण में रखकर निर्भीकता का परिचय दिया। वह पूर्ण पितृभक्त और कर्त्तव्यपरायण राजा था। भाषा काव्य में उसकी गति अच्छी थी और रचना सरल होती थी। लोकोपयोगी कार्यों की ओर रुचि होने से उसके राज्य-समय में कई सार्वजनिक स्थानों का निर्माण हुआ। विष्णु का परमभक्त होने के कारण उसने श्रीकृष्ण नाम का साढ़े तीन करोड़ जप करवाया था¹, जिसकी समाप्ति उसने पूर्ण धूमधाम से कर सहस्रों रुपये व्यय-किये थे। उसका रतलाम के स्वामी से भी युद्ध होना ख्यातों में लिखा है, परंतु रतलाम के इतिहास से इसकी पुष्टि नहीं होती तो भी रतलामवालों के साथ युद्ध होने के संबंध में वहां निम्नलिखित पद्य प्रसिद्ध है— पातल थारा पीथला मत भेजे रतलाम। राठोड़े कागद लिख्यो महर करो दीवाण॥ (१) प्राकार्षीन्नितरां प्रतापनृपतिः श्रीदेवदुर्गे वरे स्मारं स्मारमनन्तनामविलसत्सार्धत्रिकोटिव्रतम्। तस्योद्यापनमद्भुतं च कृतवान् यादृङ् निबंधान् बहून् दृष्ट्वा तादृगिहोच्यते हरिपर श्रीमानसिंहाज्ञया॥ रामकृष्ण; नाग माहात्म्य।

१६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कवि कल्याण-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" खंडित काव्य¹ में उसकी माता मनभावती, मुख्य राणी पाटमदे, उसके पितृव्य मानसिंह, धमोतर के ठाकुर जोगीदास तथा उसके पुत्र जसकरण, जोगीदास के भाई भोगीदास और रायपुरवालों के पूर्वज दलपत, तुलसीदास, खरोटवालों के पूर्वज रूपसिंह, कल्याणपुरावालों के पूर्वज रणछोड़, भांतलावालों के पूर्वज कुशलसिंह, मंत्री वर्द्धमान, उदयभान हूंवड़, ग़रीबदास एवं महारावत के छोटे भाई अमरसिंह, मोहकमसिंह और माधवसिंह का भी परिचय दिया है। ( १ ) "प्रताप प्रशस्ति" में उसका रचना-काल नहीं दिया है; पर उसमें धमोतर के ठाकुर जोगीदास के भाई भोगीदास का उल्लेख है। देवलिया में भोगीदास के दो स्मारक लेख मिले हैं, जिनसे पाया जाता है कि वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ ( ई० स० १६७६ ता० १६ जून ) को भोगीदास का देहांत हुआ। अतएव वि० सं० १७३० और १७३६ के बीच "प्रताप प्रशस्ति" की रचना होना संभव है।

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महारावत पृथ्वीसिंह

पांचवां अध्याय महारावत पृथ्वीसिंह से सामन्तसिंह तक

पृथ्वीसिंह
महारावत प्रतापसिंह का परलोकवास होने पर वि० सं० १७६५
(ई० स० १७०८) के लगभग उसका कुंवर पृथ्वी-
राज्य-प्राप्ति सिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ।
जोधपुर के स्वामी महाराजा अजीतसिंह का एक विवाह महारावत
प्रतापसिंह की विद्यमानता में, महारावत पृथ्वीसिंह की राजकुमारी
(कल्याणकुंवरी ?) से, जबकि उक्त महाराजा का
महारावत की पुत्री का
जोधपुर के महाराजा के जालोर में निवास था, वि० सं० १७५३ (ई० स०
साथ विवाह होना १६६६) में हुआ था¹। महाराजा ने पुनः देवलिया
में जाकर वि० सं० १७६६ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १७०६ ता० ११ मार्च)
को महाराजा पृथ्वीसिंह की छोटी राजकुमारी (अनूपकुंवरी ?) से विवाह
किया।
जोधपुर राज्य की ख्यात में इस संबंध में लिखा है कि उन दिनों
अजमेर के सूबेदार शुजा ने महाराजा अजीतसिंह को जोधपुर से अजमेर
बुलवाकर धोखे से मार डालना चाहा। इस कार्य की सफलता के लिए
उसने महाराजा अजीतसिंह के पास समाचार भेजा कि बादशाह ने यह
सूबा मुझसे उतारकर फ़ीरोज़खां के बेटे को दिया है। इसलिए मैं यहां से
अपने घर जाता हूं और फ़ीरोज़खां का बेटा डरकर उज्जैन से आगरे गया
(१) टॉड; राजस्थान; जि० २, पृ० १०१०.।

१६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास है, जहां से वह मौक़ा होने पर अपनी जमीयत के साथ आवेगा । इसलिए अजमेर आकर आप यहां अधिकार कर लें । महाराजा अजीतसिंह यह समाचार मिलते ही अजमेर पहुंचा और कुछ दूर एक गांव में अपनी सेना के साथ ठहर गया । अजमेर में जब उसे खाई में शाही सेना के मोर्चें होने का हाल ज्ञात हुआ तो वह शुजाअतखां का कपट-व्यवहार जान गया । फिर महाराजा ने अजमेर को घेर लिया। महाराजा और शुजाअतखां की सेनाओं के बीच युद्ध भी हुआ । अंत में जब शुजाअतखां ने नगर की हालत खराब देखी तो सुलह का प्रयत्न किया और रूपनगर के राजा राजसिंह के समझाने से महाराजा ने एक हाथी, ८ घोड़े और ४५००० रुपये नक़द लेकर वहां से घेरा उठा दिया। तदनन्तर वह वहां से सीधा देवलिया गया और बिना लग्न के ही उसने वि० सं० १७६६ चैत्र सुदि १२ (ई० स० १७०६ ता० ११ मार्च) को महारावत पृथ्वीसिंह की पुत्री से विवाह किया¹ । ख्यात के इस कथन की पुष्टि बादशाह के राज्य समय के सन् जुलूस ३ ता० ४ सफ़र हि० स० ११२१ (वि० सं० १७६६ प्रथम वैशाख सुदि ६ = ई० स० १७०६ ता० ४ अप्रेल) के 'अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला' से भी होती है। उसमें लिखा है कि अजमेर के निवासियों की संपत्ति लूटने के बाद अजीतसिंह ने वहां का घेरा उठा लिया और फिर वह बीस हज़ार सवारों के साथ मालवे में देवलिया के पृथ्वीसिंह के यहां विवाह के लिए गया । महारावत प्रतापसिंह ने जिस प्रकार शाही दरबार से अपना संबंध रखा था, उसी प्रकार महारावत पृथ्वीसिंह ने भी मुग़ल बादशाह से अपना संबंध बनाये रखा । फिर धसाड़ का परगना, जो महारावत के नाम वसाड़ का पुनः फरमान और उसके मंसब में वृद्धि होना चग़तानखां को दे दिया गया था, बादशाह शाह- आलम बहादुरशाह ने महारावत प्रतापसिंह का देहांत हो जाने से पुनः महारावत पृथ्वीसिंह के नाम पर बहाल कर दिया और सन् जुलूस ३ हि० स० ११२१ ता० ५ जमादिउलूआखिर (वि० सं० १७६६ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १७०६ ता० १ अगस्त ) को वसांड़ ( १ ) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ६३-४।

की प्रजा तथा अधिकारियों के नाम निम्नलिखित आशय का आज्ञापत्र जारी किया— "बसाड़ परगने के, जो सूबा मालवे में सरकार मंदसोर के ताल्लुक़ है, चौधरियों, कानूनगो, प्रजाजनों और काश्तकारों को मालूम हो कि ४३६५८०० दाम की आय के परगने चग़तानखां बहादुर आदि से लेकर आधी साख सियालू तुर्की वर्ष के प्रारम्भ से देवलिया के रावत प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह की जागीर में कर दिये गये हैं। इसलिए उचित है कि माल और दीवानी के स्वत्वों से जो आय हो, वह पूर्णरूप से क़ायदे और दस्तूर के अनुसार उक्त रावत को देते रहो और उसकी ताबे- दारी से बाहिर न रहो¹।" महारावत पृथ्वीसिंह का मंसब प्रारंभ में ५०० ज़ात और ५०० सवारों का नियत हुआ था। अपने सन् जुलूस ५ ता० ६ शव्वाल हि० ११२३ (वि० सं० १७६८ कार्तिक सुदि ८ = ई० स० १७११ ता० ६ नवंबर) को बाद- शाह शाहआलम बहादुरशाह ने महारावत के मंसब में ५०० ज़ात और दो सौ सवारों की वृद्धि कर उसका मंसब एक हज़ार ज़ात और ७०० सवार का कर दिया²। वि० सं० १७६८ (ई० स० १७१२) में बादशाह शाहआलम बहादुर- शाह की मृत्यु हो जाने पर उसका बड़ा शाहज़ादा जहांदारशाह बादशाह हुआ। महारावत पृथ्वीसिंह का उक्त बादशाह से जहांदारशाह के पास से बसाड़ परगने का फ़रमान होना | भी अच्छा संबंध रहा। फलतः बसाड़ के परगने का फ़रमान, जो बहादुरशाह के समय हुआ था, बादशाह जहांदारशाह ने भी बहाल रखा तथा सन् जुलूस २ ता० १६ रबीउल्अव्वल हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ वैशाख वदि २ = ई० स० १७१२ ता० १२ अप्रेल) को वज़ीर आसफ़ुद्दौला ने मीर (१) बादशाह बहादुरशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। (२) बहादुरशाह के राज्य-समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।

२०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कज्जन (मंदसोर का हाकिम) के नाम नीचे लिखा आज्ञापत्र प्रेषित किया--- "वसाड़ परगने की ४१२५८०० दाम की जागीर प्रतापसिंह के पुत्र पृथ्वीसिंह को दी गई है। अतएव तुम्हें (मीर कज्जन को) लिखा जाता है कि उधर के ज़मींदारों को आज्ञा दो कि सब बक़ाया ठीक-ठीक चुका दें¹।" जहांदारशाह एक वर्ष भी राज्य न करने पाया था कि उस (जहां- दारशाह) को उसके छोटे भाई अज़ीमुश्शान (शाहआलम बहादुरशाह [पार्श्व-टिप्पणी: महारावत के नाम बादशाह. फ़र्रुख़सियर का फ़रमान] का छोटा पुत्र) के शाहज़ादे फ़र्रुख़सियर ने हराकर मुग़ल साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।.. इस अवसर पर महारावत पृथ्वीसिंह ने बादशाह के नाम अर्ज़ी भेजी। उसके उत्तर में वादशाह ने फ़रमान भेज महारावत को लिखा कि तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी, जो मित्रता का विश्वास दिलाने के लिए लिखी गई है, हमारे समीप रहनेवालों के द्वारा हमारी नज़र से गुज़री। हमारा असीम अनुग्रह अपने ऊपर समझकर अर्जियां भेजते रहो²।" इसके पीछे महारावत पृथ्वीसिंह के नाम सन् जुलूस २ ता० ८ रबी- उल्अव्वल हि० स० ११२६ (वि० सं० १७७१ चैत्र सुदि १० = ई० स० १७१४ ता० १४ मार्च) को वादशाह की ओर से उसके पास नीचे लिखा फ़रमान पहुंचा-- "अपने बराबरवालों में चुने हुए रावत राव पृथ्वीसिंह को बादशाही कृपा का उम्मेदवार रहकर ज्ञात हो कि इस शुभ और अच्छे समय में परमेश्वर की कृपा से हमको बड़ी विजय प्राप्त हुई है। इसलिए इस अच्छे समय में राजा बहादुर (किशनगढ़ का राजा राजसिंह³ ) के ( १) वादशाह जहांदारशाह के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) वादशाह फर्रुख़सियर के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( ३) राजा राजसिंह, किशनगढ़ के राजा मानसिंह का पुत्र और रूपसिंह का पौत्र था। वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०६) में मानसिंह का देहांत हो जाने

महारावत पृथ्वीसिंह २०१

निवेदन करने पर यह आज्ञा तुम्हारी प्रतिष्ठा-वृद्धि के लिए भेजी जाती है । सदैव स्वामिभक्ति के मार्ग में सुदृढ़ और दत्तचित्त रहकर हमारी कृपाओं को अपने लिए लाभदायक समझो¹ ।'' उन्हीं दिनों जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास से ता० २७ ज़िल्काद सन् जुलूस २ हि० स० ११२६ ( वि० सं० १७७१ मार्गशीर्ष वदि [हाशिया: महारावत का शाही इलाके में लूट-मार करना] १४ = ई० स० १७१४ ता० २४ नवंबर ) को समाचार पहुंचा कि भगवतीदास हरकारे ने खबर भेजी है कि दुश्मन नर्मदा के निकट पहुंच गये हैं² । इस पर वह वहां का स्वामी हुआ था । उसका शाही दरबार में अच्छा प्रभाव था, क्योंकि उसने जजाओ के युद्ध में बादशाह बहादुरशाह की तरफ़ रहकर अच्छी वीरता दिखलाई थी, जिससे पीछे से उसे बहादुरशाह ने "राजा बहादुर" की उपाधि दी थी ( वृंद कवि; सत्यरूपक; पृ० २६ ) । वह देवलिया-प्रतापगढ़ के स्वामी का दौहित्र होने से फ़र्रुख़सि- यर के समय देवलिया-प्रतापगढ़ के राजाओं का मददगार था । इस कारण से महारावत पृथ्वीसिंह ने उस (राजसिंह) के द्वारा ही शाही दरबार में अर्ज़ी भेजी होगी । "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०६४ ) से प्रकट है कि फ़र्रुख़सियर को मारने के षड्यन्त्र में कोटा का महाराव भीमसिंह तथा किशनगढ़ का स्वामी राजसिंह, कृतघ्न होकर महाराजा अजीतसिंह और सैयद बंधुओं से मिल गये थे ।


( १ ) बादशाह फ़र्रुख़सियर के महारावत पृथ्वीसिंह के नाम के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद । ( २ ) फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से । उपर्युक्त संवाद से प्रकट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय दक्षिण की तरफ़ से बढ़कर मरहटे मालवे में प्रवेश करना चाहते थे । वि० सं० १७६९ के माघ (ई० स० १७१३ फ़रवरी) मास में फ़र्रुख़सियर ने सिंहासनाारूढ़ होते ही आंबेर के महाराजा सवाई जयसिंह को मालवे का सूबेदार नियतकर आज्ञापत्र भेजा कि वह आंबेर से सीधा उज्जैन जाकर उधर का प्रबंध करे ( डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० ६६ एवं मालवा में युगांतर; पृ० १०६ )। "वंशभास्कर" ( जि० ४, पृ० ३०४२-३ ) से पाया जाता है कि रूपनगर ( किशनगढ़ राज्य ) के स्वामी महाराजा राजसिंह की सलाह से बादशाह ने महाराजा सवाई जयसिंह को उज्जैन का सूबेदार बनाया था और वह वि० सं० १७७० ( ई० स० १७१४ ) में बूंदी होता हुआ उज्जैन की तरफ़ गया था । २६

२०२ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

कारण नरयाना (? नौलाना) का ज़मींदार शिवसिंह¹, देवलिया का पृथ्वी- सिंह² तथा रामपुरा का खुशहालसिंह (कुशलसिंह) और वदनसिंह³, शाही परगनों में लूट-मार मचा रहे हैं। वहां का फ़ौजदार मुहम्मदखां पृथक् किये जाने के कारण उनको रोकने में विशेष कार्य नहीं कर रहा है। यदि नया फ़ौजदार मुहम्मदज़मां वहां शीघ्र भेज दिया जाय तो अच्छा हो। इस- पर बादशाह ने लतीफुल्लाखां को आज्ञा दी कि वह फ़ौजदार को शीघ्र जाने को कहे⁴। बादशाहत की कमज़ोर हालत और अपने पर बादशाह की नाराज़गी देखकर महारावत पृथ्वीसिंह को अपना राज्य बचाने की चिंता हो गई।

(१) इंदौर राज्य के देपालपुर ज़िले में नर्मदा के किनारे नौलाना नाम का चौहानों का छोटा ठिकाना है। संभव है उपर्युक्त नरयाना इसी नौलाना का सूचक हो और उस समय शिवसिंह वहां का सरदार रहा हो। (२) महारावत पृथ्वीसिंह को इसके पूर्व ही बादशाह फ़र्रुख़सियर ने 'रावत- राव' की उपाधि दे दी थी, जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है। फिर उसके विद्रोहा- चरण कर शाही इलाक़े में लूट-मार मचाने की बात समझ में नहीं आती, क्योंकि इसका कोई कारण देखने में नहीं आया। अनुमान होता है कि महाराजा सवाई जय- सिंह के मालवे में पहुंचने पर वहां उस (महारावत) का उपर्युक्त महाराजा से मेल नहीं रहा, जिसपर महाराजा द्वारा बादशाह के पास शिकायत होने से महारावत के सम्मान में कमी हुई हो, तब महारावत ने लूट-मार करना आरंभ किया हो। (३) खुशहालसिंह (कुशलसिंह) रामपुरा के चंद्रावत (सीसोदिया) राव गोपालसिंह का कुटुंबी और वदनसिंह उस (गोपालसिंह) का पौत्र था। जहांदारशाह के समय वदनसिंह का पिता रत्नसिंह (जिसका बादशाह औरंगज़ेब के समय मुसलमान हो जाने से इस्लामख़ां नाम हुआ) मालवे के सूबेदार अमानतख़ां से लड़कर मारा गया। तब गोपालसिंह ने, जो औरंगज़ेब के समय से ही रामपूरे की गद्दी से वंचित हो गया था, पीछा रामपूरे पर अधिकार करना चाहा, परंतु शाही दरबार से रुकावट हुई, जिससे अनुमान होता है कि खुशहालसिंह और वदनसिंह ने मालवे में लूट-मार आरंभ की हो। (४) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से।

[Page Header] महारावत पृथ्वीसिंह २०३

[Margin Note 1: L2-L6] महारावत का अपने कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर भेजना.

[Main Text] उस समय राजपूताना के नरेशों में महाराणा संग्रा- मसिंह (दूसरा) बड़ा ही मिलनसार था । वह बादशाह से भी अच्छा संबंध रखकर फ़ायदा उठाना चाहता था और उधर मरहटों से भी उसका मेल था । राजपूताना के प्रमुख राज्य जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि के नरेशों से उसका व्यवहार अच्छा था । वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) के लगभग महारावत पृथ्वीसिंह के ज्येष्ठ कुंवर पहाड़सिंह ने भी उदयपुर जाकर पहले के सब द्वेष को मिटा दिया । महाराणा ने उसको धरियावद का परगना देने की आज्ञा दी, किन्तु उक्त कुंवर का उदयपुर में रहते समय ही परलोकवास हो गया १ ।

इस संबंध में महाराजा सवाई जयसिंह के पास वहां के ख़बरनवीसों ने ता० ६ शव्वाल सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ आश्विन सुदि ७ = ई० स० १७१६ ता० १२ सितंबर) को यह समाचार भेजा कि मंदसोर सरकार की घटना से यह पता लगा है कि अपने पुत्र के राणा संग्रामसिंह (दूसरा) के पास चले जाने के कारण रुपयों की कमी हो जाने का बहाना कर देवलिया के रावत पृथ्वीसिंह ने अपनी जागीर के महाजनों से रुपयों की मांग की है। इस वजह से वहां के बहुत से ग़रीब और असमर्थ लोग भाग गये और भाग रहे हैं एवं उसके आगमन से बोहरे आदि व्यापारी भी भाग गये हैं । इसपर बादशाह ने शमसुद्दौला ख़ानदौराँ को (महाराजा जयसिंह से) दर्याफ़्त करने का हुक्म दिया २ ।

महारावत पृथ्वीसिंह की उपर्युक्त कार्यवाही से अनुमान होता है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की पीछे से उसपर अप्रसन्नता हो गई। ता० ४ ज़िल्हिज

[Margin Note 2: L24-L28] आंबेर और बूंदी के नरेशों का बादशाह से महारावत की शिकायत करना

सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्ग- शीर्ष सुदि ५ = ई० १७१६ ता० ८ नवंबर) को आंबेर (जयपुर) के राजा सवाई जयसिंह और बूंदी के महाराव

[Footnotes] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । (२) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से ।

२०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजा बुधसिंह की बादशाह के पास अर्जियां पहुंचीं कि देवलिया-प्रतापगढ़ का पृथ्वीसिंह शाही सेवकों के साथ ठीक आचरण नहीं कर रहा है और देवलिया के अहल्कारों को रखने में शाही अफ़सरों का बाधक हो रहा है। इसके उत्तर में शाही दरबार से उक्त दोनों राजाओं के पास पृथ्वीसिंह की बेजा कार्रवाई रोकने के लिए फ़रमान भेजा गया¹। ता० १२ ज़िल्हिज सन् जुलूस ४ हि० स० ११२८ (वि० सं० १७७३ मार्गशीर्ष सुदि १३ = ई० स० १७१६ ता० १६ नवंबर) को बादशाह के पास [हाशिया: शिकायतों की जांच के लिए कुतुबुलमुल्क का भेजा जाना] अर्ज़ी पहुंची कि देवलिया के ज़मींदार पृथ्वीसिंह के पास शाही सनद नहीं पहुंची है और वह अपनी जागीर के इलाक़े पर अधिकृत है। पहले वह सर- कार में ८००० रुपये देता था और नाज़िम के पास ज़ाबते के लिए पैदल और सवारों को रखता था। अब वह अपना कार्य नहीं कर रहा है एवं उसने बादशाही ज़मीन पर अधिकार कर लिया है। इसपर बादशाह ने कुतुबुलमुल्क को इस विषय में जांच करने की आज्ञा दी²। बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) ने चन्द्रावतों का रामपूरे का इलाक़ा अपने नाम पर लिखवा


(१) बादशाह फ़र्रुख़सियर के समय के अख़बारात-इ-दरबार-इ-मुअल्ला से। उपर्युक्त संवाद से स्पष्ट है कि बादशाह फ़र्रुख़सियर की महारावत पृथ्वीसिंह पर अप्रसन्नता हो गई थी, जिससे बादशाह ने वहां पर ज़ब्ती भेज दी, परंतु महारावत ने शाही अहल्कारों का अधिकार नहीं होने दिया। (२) वही। बादशाह फ़र्रुख़सियर के राज्यारंभ में बूंदी का महाराव राजा बुधसिंह शाही दरबार में नहीं गया था। इसपर बादशाह ने नाराज़ होकर बूंदी का राज्य कोटा के महाराव भीमसिंह को प्रदान कर दिया। इसलिए महाराव राजा बुधसिंह जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे में रहकर बादशाह को प्रसन्न कर पुनः राज्य-पाने का प्रयत्न करता था। "वंशभास्कर" में वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के मार्गशीर्ष मास में बुधसिंह को पीछा बूंदी का राज्य मिलने का उल्लेख है (जि० ३, पृ० ३०५३) है। इस संवाद से पाया जाता है कि वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१५) के पीछे भी महाराव राजा बुधसिंह, महाराजा सवाई जयसिंह के साथ मालवे की ओर रहा होगा।

महारावत पृथ्वीसिंह २०५ मंत्री बिहारीदास का रामपूरे से लौटते समय देवलिया में ठहरना लिया था तथा उक्त बादशाह के पांचवे राज्य-वर्ष वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसको डूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्यों का फ़रमान भी मिल गया था। इसपर महाराणा ने उन तीनों जगहों पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए मंत्री बिहारीदास पंचोली को ससैन्य रवाना किया। डूंगरपुर और बांसवाड़ा के नरेशों ने दूरदर्शिता से काम लेकर महाराणा का बड़प्पन स्वीकार किया और फिर वहां से वह सेना रामपुरा पहुंची और जब वहां का मामला तय हो गया तब वहां से मंत्री बिहारीदास, राठोड़ वीर दुर्गादास को वहां के प्रबंध का भार सौंपकर रवाना हो गया। फिर देवलिया, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि स्थानों में ठहरता हुआ आश्विन सुदि १० को वह उदयपुर पहुंचा¹। अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह का कुंवर पहाड़सिंह' वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में देवलिया से उदयपुर चला गया था, इस कारण से महाराणा की सेना ने वहां कुछ भी कार्यवाही न की। "वीर- विनोद" के इस कथन में कि कुंवर पहाड़सिंह का उदयपुर में रहते समय परलोकवास हुआ², यदि कोई तथ्य हो तो यही मानना पड़ेगा कि वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में भी उक्त कुंवर उदयपुर गया था; क्योंकि देवलिया के बड़े जैन मंदिर की वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की प्रशस्ति³ में महारावत पृथ्वीसिंह और (१) राठोड़ दुर्गादास का महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) के मन्त्री पंचोली बिहारीदास के नाम का वि० सं० १७७४ कार्तिक वदि ६ (ई० स० १७१७ ता० १४ अक्टूबर) भोमवार का पत्र (वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६६३-४)। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) संवत् १७७४ वर्षे शाके १६३६ प्रवर्त्तमाने माह (माघ) सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढनगरे महाराजधान्यां महाराजाधिराजमहारावतश्रीप्रथवी- (पृथ्वी) सिंघजीविजयीराज्ये कुंवरश्रीपहाड़सिंघविराजमाने..........। देवलिया के बड़े जैन मंदिर के भीतर लगी हुई प्रशस्ति।

२०६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कुंवर पहाड़सिंह के नाम अंकित हैं। इससे पाया जाता है कि उक्त सम्वत् के माघ सुदि १३ तक तो उक्त कुंवर जीवित था। इसके बाद ही उसका उदयपुर में रहते समय देहांत होना संभव है। महारावत के उत्तराधिकारी कुंवर पहाड़सिंह' का उसकी विद्यमानता में वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) के लगभग देहांत हो गया, जिसका महारावत (१) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में जहां महारावत पृथ्वीसिंह के पुत्रों के नाम दिये हैं, वहां पहाड़सिंह का नाम प्रथम और फिर उम्मेदसिंह, पद्मसिंह, कल्याणसिंह आदि नाम दिये हैं । इससे पाया जाता है कि पहाड़सिंह, महारावत का ज्येष्ठ पुत्र था, परंतु प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात का कथन इसके विपरीत है और उससे पद्मसिंह का पृथ्वीसिंह के पीछे गद्दी बैठने का संदेह हो सकता है, इसलिए "वीरविनोद" के लेखक ने (पृ० १०६३ टिप्पण १ में) इस विषय को स्पष्ट करने के लिए कुछ संकेत किया है। पद्मसिंह के राजगद्दी पर बैठने का अन्य जगह उल्लेख नहीं मिलता। वस्तुतः पृथ्वीसिंह के बाद उसका पौत्र संग्रामसिंह, जिसको रामसिंह भी कहते थे, गद्दी बैठा था। उसके कुछ दानपत्र भी मिले हैं। समय क्रम को देखते हुए पद्मसिंह का गद्दी पर बैठना सिद्ध नहीं होता । बड़वे की ख्यात में कुंवर पद्मसिंह की पत्नी का नाम भी दिया है। उसमें पहाड़सिंह का नाम पृथ्वीसिंह के तीसरे पुत्र के रूप में लिखा है एवं पहाड़सिंह की पत्नी और उसके पुत्र संग्रामसिंह (रामसिंह) का नाम ही नहीं है। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात (पृ० १०) में पहाड़सिंह को पद्मसिंह का पुत्र बतलाकर संग्रामसिंह (रामसिंह) को पहाड़सिंह का पुत्र लिखा है, पर महारावत पृथ्वीसिंह के समय के वि० सं० १७६६ (ई० स० १७१२) और वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) के शिलालेखों में पहाड़सिंह का नाम महारावत के नाम के साथ लिखा है, जिससे स्पष्ट है कि पहाड़सिंह, पृथ्वीसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी था, जिससे उसका नाम शिलालेखों में खोदा गया। संभव है वि० सं० १७६६ (ई० स० १७१२) के पूर्व कुंवर पद्मसिंह का देहांत हो गया हो, तब उसके स्थान पर पहाड़सिंह, जिसको बड़वे की ख्यात में पृथ्वीसिंह का तीसरा पुत्र बतलाया है, प्रचलित प्रथा के अनुसार पद्मसिंह की स्त्री के दत्तक बिठालाकर प्रतापगढ़ राज्य का भावी उत्तराधिकारी निर्वाचित किया गया हो। इस अवस्था में, जैसी कि प्रणाली है, वह पद्मसिंह का पुत्र भी लिखा जा सकता है; परन्तु जब तक यथेष्ट प्रमाण न मिले, इस संबंध में निश्चित मत प्रकट नहीं किया जा सकता।

महारावत पृथ्वीसिंह २०७ महारावत का देहांत को बड़ा दुःख हुआ और वह विशेष न जिया तथा वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में परलोक सिधारा। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत का देहांत वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) में दिया है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) तक उसके विद्यमान होने के कई लेख मिल चुके हैं, जो नीचे दिये गये हैं। उसके ६ राणियां थीं, जिनमें से एक विजयकुंवरी बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह की पौत्री और पद्मसिंह की पुत्री थी१। उसकी राणियों से पद्मसिंह, कल्याणसिंह, पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, गोपालसिंह और गुमान- सिंह नामक ६ कुंवर तथा कल्याणकुंवरी, पद्मकुंवरी, अनूपकुंवरी, रत्न- कुंवरी एवं सूरजकुंवरी नामक पांच पुत्रियां हुईं२। महारावत पृथ्वीसिंह के समय के कई दानपत्र और शिलालेख मिले हैं३, जिनमें से कुछ इतिहास के लिए महारावत के समय के उपयोगी हैं। उनका सारांश यहां दिया जाता शिलालेख और दानपत्र है— (१) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि ६ (ई० स० १७०८ ता० १२ जून) (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । (२) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात पृ० ६ । प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात; पृ० १० । “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवरों के नाम इस क्रम से दिये हैं—पहाड़सिंह, उम्मेदसिंह, पद्मसिंह, कल्याणसिंह और गोपालसिंह । उसमें गुमानासिंह का नाम नहीं है। प्रतापगढ़ राज्य की पुरानी ख्यात में महारावत की राणियों की संख्या केवल ६ दी है, जिनमें से चार राणियों के नाम और उनके वंश आदि बड़वे की ख्यात से मिलते हैं, बाक़ी नाम और उनके पितृकुल परस्पर नहीं मिलते । राजकुमारी रत्नकुंवरी तथा सूरजकुंवरी के नाम भी उपर्युक्त ख्यात में नहीं हैं। ख्यातों की पारस्परिक विभिन्नता को देखते हुए यह कहना कठिन है कि उनमें से किसका कथन सही है, पर यह स्पष्ट है कि अठारहवीं शताब्दी तक बड़वे, भाटों को वास्तविकता का बिल्कुल ज्ञान नहीं था । (३) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों और दानपत्रों की छापों में उसके समय

२०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास का चिलाईखेड़ु गांव का दानपत्र, जिसमें उक्त गांव गढ़वी चारण नाथा को प्रदान करने का उल्लेख है और उक्त दानपत्र में लेखक का नाम विद्या- शिरोमणि राय देकर शाह वर्द्धमान-द्वारा आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। (२) वि० सं० १७६५ आषाढ सुदि १५ (ई० स० १७०८ ता० २१ जून) का मोरझर गांव का ताम्रपत्र, जिसमें विद्या-शिरोमणि राय गोपाल को महारावत प्रतापसिंह-कथित उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है एवं उसमें लेखक का नाम कोठारी लाला दिया है। (३) वि० सं० १७६६ कार्तिक सुदि १३ (ई० स० १७१२ ता० ३१ ऑक्टो- वर) का दानपत्र, जिसमें अमलावद गांव में वर्द्धमान के खेतों में से १८ बीघा ज़मीन जोशी नाथू को देने का उल्लेख है। इस दानपत्र का लेखक कोठारी किशन दिया है एवं इसपर जो उर्दू मुहर लगी हुई है, उसमें "बादशाह जहांदारशाह ग़ाज़ी हि० स० ११२६" और "फ़िदवी पृथ्वीसिंह रावत राव" अंकित है¹। का एक ताम्रपत्र वि० सं० १७६४ पौष वदि का भी दिया है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह का जोशी किशना को ६१ बीघा ज़मीन जीमखेड़ा खेड़ी में रघुनाथ के यज्ञोपवीत में माता झाली (महारावत प्रतापसिंह की राणी)-द्वारा पुण्य देने का उल्लेख है; परंतु महारावत प्रतापसिंह के प्रसङ्ग में ऊपर पृ० १८७ में बतलाया गया है कि वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास में जब बादशाह बहादुरशाह का साथ छोड़कर मालवे से जोधपुर का महाराजा अजीतसिंह और जयपुर का महाराजा सवाई जयसिंह देवलिया होते हुए उदयपुर में पहुंचे उस समय महारावत प्रतापसिंह विद्यमान था। इस अवस्था में वि० सं० १७६४ के पौष वदि में पृथ्वीसिंह देवलिया का स्वामी नहीं हो सकता। इस अवस्था में उपर्युक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता में सन्देह होना स्वाभाविक है। (१) उपर्युक्त ताम्रपत्र पर फ़ारसी अक्षरों में जो छाप खुदी हुई है, उसमें बादशाह जहांदारशाह का नाम देकर हि० स० ११२६ अंकित है और फ़िदवी रावत राव पृथ्वीसिंह दिया है। जहांदारशाह हि० स० ११२४ (वि० सं० १७६६ = ई० स० १७१२) में बहादुरशाह की मृत्यु हो जाने पर अपने भाइयों को हराकर बादशाह हुआ, परंतु नौ महीने बाद ही फर्रुख़सियर ने उससे सल्तनत छीन ली। इस अवस्था में हि० स० ११२६ में जहांदारशाह बादशाह नहीं हो सकता। संभव है कि छाप में अंकित ६ का अङ्क ४ हो और उसको ६ पढ़ लिया गया हो। इस छाप को देखते हुए यह

· महारावत पृथ्वीसिंह · २०६ (४) वि० सं० १७६६ फाल्गुन सुदि ५ (ई० स० १७१३ ता० १८ फ़रवरी) का देवलिया के बड़े जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें कुंवर पहाड़सिंह और शाह वर्द्धमान के नाम अंकित हैं तथा तेलियों को प्रत्येक पंचमी तिथि पालने (घानी न जोतने) की आज्ञा दी गई है¹। (५) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें तेलियों को वर्ष भर में ४४ दिन तेल की घानी चलाने का निषेध किया गया है²। (६) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३(१७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार अनुमान होता है कि महारावत पृथ्वीसिंह को 'रावत राव' का ख़िताब जहांदारशाह ने दिया हो, परंतु शीघ्र ही उससे राज्य छिन गया। फिर फ़र्क़सियर ने बादशाह बनने पर उक्त ख़िताब को बहाल रक्खा, जिससे फ़र्क़सियर द्वारा यह ख़िताब मिलने की बात प्रसिद्ध हुई और इसी प्रसिद्धि के आधार पर उदयपुर के महाराणा अरिसिंह ने भी अपने वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फ़रवरी) गुरुवार के परवाने में उक्त ख़िताब महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फ़र्क़सियर द्वारा मिलने का समर्थन किया है (वीरविनोद; द्वितीय भाग; १०६४-५)। (१) संवत् १७६६ फागुन सुदि ५ महाराजश्री रावतश्रीप्रथी- (पृथ्वी) सींघजी कुंअर श्रीपहाड़सींघजी वचनातु·······। मूल शिलालेख की छाप से। ·(२) स्वस्त (स्ति) श्री संवत् १७७[४] वर्षे माघ सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढ़नगरे महारावत श्रीप्रथी (पृथ्वी) सिंघजी विजेराज्ये साह रहींआ जीवराज तथा पंच महाजन तेलीआं पासे पुंन धर्म्म अर्थ पालाव्युं समस्त तेलीए राजी थई ने पाल्युं तेनी बगत १ पजुसण सुतांबर दन ······। पजुसण दीगंबर दन १०। १ उली २ चैत्र सुदि ७ थी दन ······। आसोज सुदि ७ थी दन ६। १ अठाई। असाढ सुद ८ थी दन ८। जुमले दन ४४ अंके चुंन्नालीस ·····कोई घानी जोते [ते] श्रीजी[नो] खुनी ·····। मूल शिलालेख की छाप से। २७