भारतकोश
संग्रह पर लौटें

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

६६. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और सूरजमल के पास दूत भेजकर कहलाया कि आप महाराणा से संधि कर लें, परंतु उसने पृथ्वीराज का कथन स्वीकार न किया' । फिर क्या था, दोनों वीर परस्पर भिड़ गये और घमासान युद्ध हुआ²। दो-तीन दिन पीछे पृथ्वीराज ने सूरजमल के डेरों में जाकर मंत्री-द्वारा कुशल पुछवाई, तदात्मजो महावीरः पृथ्वीराजो रणाग्रणीः । तेनोत्थाय नमस्कृत्य वीटिका याचिता ततः ॥ २७ ॥ अवश्यं मारणीयो मे सूर्यमल्लो महाबली । निराधारोऽपि नालीकः सपत्तो हन्ति वैरिणः ॥ २८ ॥ गंगाराम; हरिमूषण महाकाव्य; सर्ग २ । (१) अथेति कृत्वोच्चपटीगृहान्सः संप्रेषयामास नृपः स्वदूतम् । वपुः प्रकर्षेण महद्वचोभिर्विराजमानं विनयप्रधानैः ॥ १ ॥ त्वरामुपादाय गतिं कुरुष्व श्रीसूर्यमह्लं प्रतिबोधयेति । त्वं रायमह्लेन कुरुष्व सन्धिं नो चेदथो मां किल राजपुत्रम् ॥ २॥ इत्थं जगाम त्वरया विमुक्तो वशी बभाषे वचनं स दूतः । स्फूर्जत्प्रतापानिलतापितारेः श्रीसूर्यमह्लस्य विभोःपुरस्तात् ॥३॥... महीपतिस्तस्य वचो निशम्य विकाशिताशो दशनांशुपूर्वैः । अगाधबुद्धिर्निजगाद वीरः क्षीरोदचेता वचनं वरिष्ठम् ॥१६॥... रसातलं गच्छति भूतधात्री सुमेरुमूलान्यपि संचलन्ति । वारां निधिः शुष्यति चेदपारस्तथापि मानो न कृशो मदीयः ॥१८॥ वही; सर्ग ३ । (२) ततो महासंयुगसांयुगीनैर्व्योम्नि स्फुरत्कान्तिकरालखङ्गैः ॥ परस्परं शस्त्रकठोरघातैर्भटैरुपक्रान्तमहो तदानीम् ॥ २५ ॥... आकृष्टकोदंडकठोरनादैरापूरिते भूगगनान्तराले । न शुश्रुवुः क्वापि वचांसि केषां हेषामहो स्वीयतुरङ्गमाणाम् ॥ ३६॥

महारावत सूरजमल ६७ जिसपर उसने पृथ्वीराज को अपने निकट बुलवाया । उक्त युद्ध में सूरजमल के ८४ घाव लगे थे, तो भी उसने खड़े होकर पृथ्वीराज का आलिङ्गन कर कुशल पूछी और फिर शिष्टाचार की बातें होने के पीछे वह विदा हुआ १।" तदनन्तर सूरजमल सादड़ी में और सारंगदेव बाठरड़े में रहने श्रीसूर्यमल्लोऽपि तदातपत्रमर्धेन्दुबाणेन ननाश तत्र । चिच्छेद सोऽपि ध्वजमुच्चमस्य श्रीचित्रकूटाधिपतिः स्वरोपैः॥४२॥ ध्वजे विनष्टे युधि पञ्चबाणैः कामातुरं काम इवाशु कोपात् । जघान गाढं हृदि देवलेशः सोऽपि प्रकुत्तो निजघान शक्त्या॥४३॥ गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ३ । ( १ ) विहाय युद्धं पुनरागतेन श्रीरायमल्लस्य सुतेन तेन । द्वित्रेर्द्दिनैस्तत्र समागतेन सुखस्य पृच्छा सचिवैरकारि ॥४५॥ आकारयामास महिपतिस्तमालिङ्ग्य हस्तैरभितिष्ठमानः । विराजमानोऽपि भृशं तदीयैरशीतिघातैरधिकैश्चतुर्भिः ॥ ४६ ॥ अवोचदित्थं वचनं महीशस्तं भूपतिं भूतलचक्रवर्ती । भूमिपते ! स्वागमनं क्षतानि मां न पीडयन्ति त्वयि दृष्टिमागते॥४७॥ भ्रातुः शरीरे सुखमस्ति किञ्चित्किं वा तुरुष्काधिपतिः प्रकुत्तः । किं चित्रकूटाधिपतेरधीनं मम स्वयं यद्भवता समागतम् ॥४८॥ इत्थं समुक्तः स्वजनेषु तेन प्रियं बभाषे वचनं नरेशः । या वीरसूः सा भवदीयमाता यत्सूर्यमल्लं सुषुवे कुमारम् ॥४९॥ मया पितृव्येण पितुर्निदेशात्त्वया कृतं युद्धमिह क्षमस्व । यतो हि भूमंडलमानराशे ! स्वीयं न युद्धे गणयन्ति धीराः ॥५०॥ समुत्थितः सोऽपि नृपः सभातः श्रीचित्रकूटाधिपतेस्तनूजः । स सूर्यमल्लोऽप्यचिरं ददर्श प्रबोधितो बन्दिजनैः प्रभातम् ॥५३॥ वही; सर्ग ३ ।

२. रावल समरसिंह, रत्नसिंह व प्रथम शाका

६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लगा। कुंवर पृथ्वीराज को सूरजमल और सारंगदेव का मेवाड़ में रहना खटकता सूरजमल का मेवाड़ छोड़ना था। एक दिन जब सूरजमल, सारंगदेव के पास बाठरड़े गया हुआ था, कुंवर पृथ्वीराज अपने एक हज़ार सवारों-सहित रात्रि के समय, जब वे लोग आग जलाकर निश्चिन्तता- पूर्वक ताप रहे थे, वहां पहुंचा और गांव का फलसा (फाटक) तोड़कर भीतर घुस गया। उधर के राजपूतों ने भी तलवारें संभालीं और युद्ध होने लगा; किंतु पृथ्वीराज को देखते ही सूरजमल ने कहा-"कुंवर हम तुम्हें मारना नहीं चाहते, क्योंकि तुम्हारे मारे जाने से राज्य डूबता है, मुझपर तुम शस्त्र चलाओ।" इतना सुनते ही पृथ्वीराज लड़ाई बंदकर घोड़े से उतरा और उसने पूछा-"काकाजी, आप क्या कर रहे थे ?" सूरजमल ने उत्तर दिया-"हम तो यहां निश्चिन्त होकर ताप रहे थे।" पृथ्वीराज ने कहा-"मेरे जैसे शत्रु के होते हुए भी क्या आप निश्चिन्त रहते हैं ?" उसने उत्तर दिया-"हां ।" उपर्युक्त 'हरिभूषण महाकाव्य' की हस्तलिखित प्रति मेरे संग्रह में थी, जिसकी प्रतिलिपि मैंने प्रतापगढ़ के भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह के पास भिजवाई । इसपर उक्त महारावत ने उसका सम्पादन-भार प्रतापगढ़ के आमेटा जातीय पंडित जगन्नाथ शास्त्री, संस्कृताध्यापक रघुनाथ संस्कृत पाठशाला और पिन्हे हाई स्कूल, प्रतापगढ़, को सौंपा जिसने भाषानुवाद-सहित उसका संपादन किया, जो वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी की आज्ञानुसार रघुनाथ यंत्रालय (प्रतापगढ़) में मुद्रित होकर प्रकाशित हुआ है । (१) कर्नल टॉड ने भी लिखा है कि सूरजमल एक बार अपने साथियों-सहित 'बाठरड़े के जंगल में ठहरा हुआ था और अपनी रक्षा के लिए चारों तरफ़ लकड़ी की मज़- बूत वाड़ (घेरा) बनाकर रात्रि के समय वह अपने साथी राजपूतों-सहित आग जलाकर ताप रहा था कि घोड़ों के टापों की आवाज़ सुनाई पड़ी। उसके साथी राजपूत चौंक उठे। सूरजमल ने कहा कि और कोई नहीं, यह मेरा भतीजा है। इतने में पृथ्वीराज अपने सवारों-सहित फलसा (फाटक) तोड़कर भीतर घुस गया। तब सूरजमल के साथी भी तलवारें निकाल उनसे भिड़ गये । पृथ्वीराज ने सूरजमल पर प्रहार किया, जिसकी चोट लगते ही वह गिरनेवाला था, परंतु सारंगदेव की सहायता से बच गया । सारंगदेव ने

महारावत सूरजमल ६६ दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही सूरजमल, जो पृथ्वीराज के स्वभाव से परिचित था, वहां से रवाना होकर सादड़ी की ओर चला गया और पृथ्वीराज ने सारंगदेव को देवी के दर्शन के बहाने अपने साथ मन्दिर में ले जाकर दर्शन करते समय मार डाला। फिर वह वहां से रवाना होकर सूरजमल के पास सादड़ी पहुंचा। उसने वहीं भोजन करना चाहा। सूरजमल की स्त्री ने भोजन तैयार करवाकर सामने रखा। भोजन के समय सूरजमल भी उसके शामिल बैठ गया। यह देख सूरजमल की स्त्री चौंक उठी और उसने शीघ्रतापूर्वक उस थाल में से एक कटोरे को उठा लिया, जिसमें विष मिला हुआ था। पृथ्वीराज ने सूरजमल से पूछा कि इस कटोरे को क्यों उठाया तो सूरजमल ने उत्तर दिया कि इसमें विष मिला होगा। राजपूतों में विश्वासघात बड़ा भारी पाप माना जाता है, अतएव अपनी स्त्री के इस जघन्य कृत्य से सूरजमल को बड़ा दुःख हुआ और उसने पृथ्वीराज से कहा—"मैं तुम्हारा काका हूं, इसलिए रक्त-संबंध से अपने भतीजे की मृत्यु को नहीं देख सकता, किंतु तुम्हारी काकी को तुम्हारी मृत्यु उसे लज्जित करते हुए कहा—इस समय का घूंसा पहले के घावों की अपेक्षा कहीं अच्छा है। इस पर सूरजमल ने कहा कि वह मेरे भतीजे के हाथ का हो। सूरजमल ने कुंवर से युद्ध बन्द करने की प्रार्थना कर कहा कि यदि मैं मारा जाऊं तो कुछ नहीं, मेरे पुत्र राजपूत हैं, वे देश में दौड़ेंगे और उनको सहारा मिल जायगा; किन्तु यदि, कुंवर, तुम मारे गये तो चित्तौड़ का क्या हाल होगा? मेरा मुंह काला होगा और सदैव के लिए मेरा नाम कलंकित हो जायगा। इसपर तलवारें म्यान में कर दी गईं और चाचा-भतीजे कंधे से कंधा मिलाकर मिले। पृथ्वीराज ने पूछा—काकाजी ! जब मैं आया उस समय आप क्या कर रहे थे? सूरजमल ने उत्तर दिया कि भोजन करने के पीछे मामूली बातें कर रहे थे। पृथ्वीराज ने कहा कि मेरे जैसा दुश्मन आपके सिर पर लगा हुआ होने पर भी आप इस प्रकार ग़ाफ़िल कैसे रहते हैं ? सूरजमल ने कहा—क्या करें, तुमने मेरे लिए कोई साधन न रखा और मुझे अपना मस्तक टिकाने को कोई जगह चाहिये (टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४६-७)।

७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास से क्या दुःख, इसीसे उसने ऐसा किया होगा।" यह सुनकर पृथ्वीराज ने कहा—"अब यह मेवाड़ का सारा राज्य तुम्हारे लिए तैयार है।" सूरजमल ने उत्तर दिया—"मैं अब कलंक-कालिमा लगाकर मेवाड़ में जल पीना भी नहीं चाहता।" तदनंतर वह मेवाड़ के बाहर कांठल में चला गया¹ और फिर पीछा मेवाड़ में न लौटा। इस घटना के थोड़े दिनों बाद ही सिरोही के राव जगमाल-द्वारा ज़हर दिये जाने पर कुंवर पृथ्वीराज का देहांत हो गया एवं वि० सं० १५६६ (ई० स० १५०६) में महाराणा रायमल भी स्वर्ग को सिधारा। फिर कुंवर संग्रामसिंह (सांगा) मेवाड़ का महाराणा हुआ, जिससे उस (सूरजमल) का मेल रहा² और पाया जाता है कि सादड़ी आदि की जागीर उसकी अविद्य- मानता में भी उसके नाम बनी रही। कर्नल टॉड का कथन है कि सूरजमल ने सादड़ी में रहते हुए अपने पहले के किये हुए इस प्रण को कि यदि वह अपनी भूमि न रख सकेगा तो ऐसे व्यक्तियों को दे देगा, जो राजाओं से भी अधिक शक्ति-शाली हों, पूरा किया। वह अपनी भूमि ब्राह्मणों, चारणों आदि में बांटकर मेवाड़ से निकल गया³। कांठल के जंगल की ओर जाते हुए उसे एक स्थान पर अच्छे शकुन हुए। इससे उसे चारणी की कही हुई भविष्यवाणी का स्मरण हो आया। उस शुभ शकुन को देख उसने वहां रुककर उधर के भील आदि लुटेरों का दमन किया और वहां देवलिया का क़सबा आबाद किया तथा वह कांठल प्रदेश का स्वामी हो गया⁴। (१) वीरविनोद; प्रथम भाग, पृ० ३४८-६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ३३८। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५४। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात में इन गांवों के नाम भीमळ, धारता, गोठिया, वींझणा, बोसोळा (बासोला), भरखिया, वालिया, ताहरून, चारणखेड़ी, खरदेवला, भारकी और सुआली दिये हैं (प्रथम भाग, पृ० ६४)। (४) टॉड; राजस्थान; जिल्द १, पृ० ३४७।

महारावत सूरजमल ७१ मेवाड़ छोड़ने के पीछे सूरजमल का जीवन कहां और किस प्रकार बीता, यह विषय अंधकार में है । उसके समय का कोई शिलालेख या सूरजमल का देहान्त ताम्रपत्र नहीं मिला है, जिससे उसके जीवन पर कुछ प्रकाश पड़े । प्रतापगढ़ राज्य की ख्यात से पाया जाता है कि सूरजमल का परलोकवास वि० सं० १५८७ ( ई० स० १५३०) में हुआ१ । ख्यातों के अतिरिक्त महारावत सूरजमल का मृत्यु- सम्वत् कहीं उपलब्ध नहीं हुआ है । ऐसी दशा में यदि ख्यात में उल्लिखित उसका मृत्यु-संवत् ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि वह मेवाड़ से चले जाने पर बीस वर्ष से अधिक जीवित रहा था । सूरजमल के पांच राणियां थीं, जिनसे उसके रणधीर२, बाघसिंह, ( १ ) महारावत सूरजमल का मृत्युकाल ख्यातों में कहीं वि० सं० १५८४ और कहीं १५८७ लिखा हुआ मिलता है । एक ख्यात में यह भी लिखा है कि सूरजमल ने बड़ी सादड़ी में वि० सं० १५५० ( ई० स० १४६३ ) में सूरसागर तालाब बनवाया था । सूरजमल और पृथ्वीराज के बीच २६ लड़ाइयां हुईं । बड़ी सादड़ी छोड़ने के बाद वह. साटोला ( मेवाड़ ) और कांठल के बीच के पहाड़ों में रहा और वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२७) में सीकरी के पास के मेवातियों से लड़ने में अपने पुत्र सैंसमल- सहित काम आया । ख्यातों में दिये हुए उपर्युक्त संवत्, मिती और वारों का मिलान करने पर ये सब कथन प्रक्षिप्त ठहरते हैं, क्योंकि जो वार दिये गये हैं, वे उक्त तिथि को नहीं मिलते । घटनाक्रम पर विचार करने से भी बहुधा संवत् कल्पित ही प्रतीत होते हैं । यह संभव है कि सूरजमल खानवे के युद्ध में महाराणा संग्रामसिंह के साथ गया हो और फ़तहपुर सीकरी के पास किसी स्थान में काम आया हो, परंतु इस संबंध में जब तक कोई पु प्रमाण न मिले निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता और न उसके मृत्यु-समय का निर्णय ही हो सकता है । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि रणधीर मेवाड़ के महाराणा की तरफ़ से किसी युद्ध में लड़कर मारा गया था । यदि ख्यातों का कथन ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि रणधीर, सूरजमल और पृथ्वीराज के बीच झगड़ा होने के पूर्व ही मारा गया होगा ।

७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जग्गा, सैंसमल^१ (सहसमल), रिड़मल^२ (रणमल), कल्ला और राजधर नामक [सूरजमल की रानियां और संतति] सात पुत्र और उम्मेदकुंवरी नामक एक पुत्री हुई^३ । जोधपुर के कविराजा बांकीदास के 'ऐतिहासिक बातों के संग्रह' से ज्ञात होता है कि महारावत सूरजमल के पुत्र वाघसिंह, संसारचंद, सहसमल, रणमल्ल और कल्ला हुए, जो बीकानेर के स्वामी लूणकर्ण के दोहिते थे^४, परन्तु प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में संसारचंद का नाम ही नहीं है और न इस राठोड़ राणी का नाम ही दिया है । उसमें रणधीर, और वाघसिंह का हाड़ी राणी श्रृंगारकुंवरी, सहसमल और रणमल का हाड़ी राणी तख्तकुंवरी, कल्ला तथा राजधर का सोनगरी राणी जड़ावकुंवरी और (१) सैंसमल (सहसमल) के लिए प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि उसको मेवाड़ की तरफ से निंबाहेड़ा जागीर में मिला था। सादड़ी की जागीर महारावत विक्रमसिंह से महाराणा उदयसिंह ने ले ली, तब सैंसमल का पुत्र कान्हलं (कांधल) उक्त महारावत के साथ चला गया, जिसको कांठल के इलाके में धमोतर कीं जागीर मिली। सैंसमल के नाम से उसके वंशधर सिंहावत कहलाते हैं। उनका प्रमुख ठिकाना धमोतर है, जो प्रतापगढ़ राज्य में प्रतिष्ठा और आय में बड़ा है। मारवाड़ राज्य में सालामंड का ठिकाना धमोतर के छोटे भाइयों का है। इसी धमोतर ठिकाने की एक शाखा पूरावत है, जो ठाकुर कान्हल के छोटे पुत्र पूरा से प्रसिद्ध हुई । इस पूरावत शाखा में जाजली का ठिकाना प्रथम वर्ग और वरखेड़ी का द्वितीय वर्ग में है । ये दोनों ठिकाने भी अधिक पुराने नहीं हैं । जाजली का ठिकाना महारावत सर रामसिंहजी ने प्रथम वर्ग में दाख़िल किया है और वरखेड़ी का ठिकाना महारावत रघुनाथसिंह के समय क़ायम हुआ है । (२) रिड़मल (रणमल) के लिए भी प्रतापगढ़ राज्य की ख्यात में लिखा है कि वह महाराणा उदयसिंह के समय मेवाड़ और बूंदी की सीमा पर किसी लड़ाई में काम आया था । उसके वंशज रणमलोत कहलाते हैं । रणमलोतों का कल्याणपुरे का ठिकाना प्रथम वर्ग में है । (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० १ । (४) कविराजा बांकीदास; ऐतिहासिक बातों का संग्रह; संख्या १३६७ ।

जग्गा का सांखली अंतरदे के उदर से उत्पन्न होना बतलाया है१। ऐसी स्थिति में बड़वे भाटों की ख्यातें इतिहास के लिए कहां तक उपयोगी हैं इसका निर्णय स्वयं इतिहास के पाठक कर सकते हैं। : महारावत सूरजमल वीर प्रकृति का पुरुष था। क्षत्रियोचित स्वभाव के अनुसार वह युद्ध के अवसर पर सदा आगे बढ़कर वीरता प्रदर्शित करता था। शत्रु सिर पर मंडराते रहने पर भी वह : सूरजमल का व्यक्तित्व : कभी नहीं घबराता था, वरन् उसका सम्मान कर उसको प्रसन्न कर देता, जिससे शत्रु भी उसका मित्र बन जाता था। कपट और विश्वासघात करना तो उसने सीखा ही न था। शत्रु को अकेला पाकर मारना वह सदैव नीच कार्य समझता था। इसका उसने अपने जीवन में पूर्णतः पालन किया। महाराणा रायमल के कुंवर पृथ्वीराज-द्वारा सदा अपना अनिष्ट होने पर भी उसने कपट-भाव से उसको मारने की चेष्टा न की। उसने अपनी पैतृक भूमि त्याग दी, जिसकी प्राप्ति में अनेक बार रक्त की धारें वही थीं। अपनी राणी के पृथ्वीराज को विष देकर मारने के प्रयत्न से उसको इतना दुःख हुआ कि वह जीवन भर पीछा मेवाड़ में नहीं गया। राजपूत जाति के इतिहास में राज्य-प्राप्ति के लिए छल-कपट आदि अधर्म-युक्त कार्यों के भी उदाहरण मिलते हैं, परन्तु सूरजमल इन बुराइयों से सर्वथा मुक्त था। वह युद्ध की अपेक्षा शांति को अधिक पसंद करता, किंतु जब आ पड़ती तब अपने प्राणों की भी बाज़ी लगा देता था। वह उदार राजा था। मेवाड़ में भीमल, धारता आदि गांव उसने चारणों और ब्राह्मणों को दे दिये, जो उसकी दानशीलता का परिचय देते हैं। 'हरिभूषण महाकाव्य से पाया जाता है कि वह चतुर और नीति निपुण था२। बड़ी सादड़ी में सूरसागर (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० १। (२) बभूवाथ महावीरः सूर्यमल्लस्तदात्मजः। कर्णेपिमेयो दानेन मानेनापि सुयोधनः ॥ १ ॥ वर्णाश्चत्वार एवैते नाप्नुवन्नन्यवाच्यताम् । वर्णा इव महीपाले तस्मिन् शासति मेदिनीम् ॥ २ ॥ १०

७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तालाब उस( सूरजमल )का ही बनवाया हुआ माना जाता है। वाघसिंह सूरजमल का ज्येष्ठ पुत्र रणधीर पिता की विद्यमानता में ही युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुका था¹, इसलिए उस( सूरजमल )का देहांत होने पर उसका दूसरा पुत्र वाघसिंह वि० सं० १५८७ राज्य-प्राप्ति (ई० स० १५३०) के लगभग उसका उत्तराधिकारी हुआ। मेवाड़ का स्वामी महाराणा संग्रामसिंह ( सांगा ) बड़ा वीर था। उसने मेवाड़-राज्य के गौरव में बहुत वृद्धि की। भारतवर्ष के हिंदू-राज्यों में मेवाड़ ही उस समय एक प्रधान राज्य था, वाघसिंह का खानवे के युद्ध में जिसकी धाक दिल्ली, गुजरात और मालवे के महाराणा के साथ रहना मुसलमानी राज्यों पर थी। उन दिनों दिल्ली पर लोदी सुलतानों का अधिकार था। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर भारत पर मुग़ल-राज्य स्थापित करने की दृष्टि से चग़ताई खान्दान के बाबर- शाह ने तुर्किस्तान की तरफ़ से बढ़कर कंधार के मार्ग से हिंदुस्तान में आकर वि० सं० १५८३ (ई० स० १५२६) में दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी पर आक्रमण किया । पानीपत के मैदान में बड़ी लड़ाई हुई, जिसमें इब्राहीम मारा गया एवं दिल्ली पर मुग़लों (बाबर) का अधिकार हो गया । इब्राहीम का एक शाहज़ादा और उसका सेनापति हसनखां महाराणा से सहायता लेने के लिए चित्तौड़ पहुंचे। महाराणा भी भारत में पुनः हिन्दू- साम्राज्य स्थापित करना चाहता था और अवसर की बाट देख रहा था। द्विजपूजापरो धीमान्धर्मज्ञो लोकवत्सलः । कामानपूरयत्तस्य नित्यं कामदुघेव भूः ॥ ३ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग २। ( १ ) देखो ऊपर पृ० ७१, टि० २।

महारावत बाघसिंह ७५ मुग़लों को दिल्ली से निकाल वहां अपना अधिकार जमाने का यह अच्छा अवसर जानकर, उसने एक विशाल सेना के साथ बाबर पर चढ़ाई की। महाराणा को अपनी विजय का दृढ़ निश्चय था, परन्तु खानवे के वि० सं० १५८४ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १५२७ ता० १७ मार्च) के युद्ध में उसके सिर में शत्रु का एक तीर लगा, जिससे वह मूर्च्छित हो गया। तत्काल कुछ सरदार उसको युद्ध से हटाकर अन्यत्र ले गये और उसके स्थान में झाला अज्जा को उसका प्रतिनिधि बनाकर लड़ने लगे। मुग़लों के साथ तोपखाना था। राजपूत तोपों और बन्दूकों से अपरिचित थे, अतएव उनकी मार से. राजपूतों की बड़ी क्षति हुई और बाबर विजयी हुआ। झाला अज्जा, रावत रत्नसिंह आदि महाराणा के कई बड़े-बड़े सरदार और कई सहायक राजाओं में से डूंगरपुर का स्वामी महारावल उदयसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ¹। 'वीरविनोद' में लिखा है कि इस युद्ध में रावत बाघसिंह ने बड़ी वीरता दिखलाई थी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में रावत सूरजमल की मृत्यु वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होने का उल्लेख है। ऐसी दशा में खानवे के युद्ध के समय बाघसिंह रावत नहीं हो सकता। यदि ख्यातों में उल्लिखित सूरजमल का देहांत वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होना ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि खानवे के युद्ध में बाघसिंह ने पिता की विद्यमानता में भाग लिया होगा। खानवे के युद्ध में हारने के पीछे महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) केवल कुछ मास तक जीवित रहा और वि० सं० १५८४ के माघ (ई० स० १५२८ जन- बाघसिंह का मालवे में जाना | वरी) मास में परलोक सिधारा। तब उसका कुंवर रत्नसिंह राजगद्दी पर बैठा, किन्तु उस (रत्नसिंह)- ने चार वर्ष ही राज्य किया और वि० सं० १५८८ (ई० स० १५३१) में वह पारस्परिक द्वेष के कारण बूंदी के हाड़ा राव सूरजमल से लड़कर मारा (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३७६ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६, टिप्पण १ ।

७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गया तथा सूरजमल की भी वहीं मृत्यु हुई। इसपर उसका छोटा भाई विक्रमादित्य मेवाड़ का स्वामी हुआ। वह (विक्रमादित्य) अपने राजपूत सरदारों का अपमान कर पहलवानों की नवीन सेना अपने पास रखता था, जिससे प्रायः सब बड़े-बड़े सरदार उससे असंतुष्ट थे और जब वह अकारण ही सरदारों की प्रतिष्ठा पर आघात करने लगा, तो अधिकांश बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों में जा बैठे। यही नहीं, महाराणा संग्रामसिंह का भतीजा नरसिंहदेव और राजा मेदिनीराय (चंदेरीवाला) आदि वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में सुलतान के पास चले गये¹ और उसको उसका भेद बताने लगे। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि रावत बाघसिंह भी महाराणा विक्रमादित्य के अनुचित व्यवहार से अप्रसन्न होकर मांडू के सुलतान के पास चला गया था², जहां उसको जागीर प्राप्त हुई। वहां रहते समय उस (बाघसिंह) ने अपनी जागीर में 'बाघवाड़ा' गांव बसाया; जिसका इस समय धार राज्य के अन्तर्गत होना बतलाया जाता है। महाराणा कुंभकर्ण और संग्रामसिंह के समय गुजरात और मालवे की सेना कई बार पराजित हुई थी, जिसको वहां के सुलतान भूले न थे, परन्तु उक्त महाराणाओं के प्रबल प्रताप के आगे वे बहादुरशाह की चित्तौड़ पर मेवाड़ राज्य की शक्ति को क्षीण न कर सके थे। चढ़ाइयां वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२७) के पीछे मालवे (मांडू) का मुसलमानी राज्य निर्बल हो गया और गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने, जो अपनी शाहज़ादगी के समय क्रमशः डूंगरपुर और चित्तौड़ के राजाओं के आश्रय में रहा था, वहां के सुलतान महमूद को (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । (२) ख्यातों के इस कथन की पुष्टि मुंशी देवीप्रसाद-रचित 'महाराणा रतन- सिंह और विक्रमादित्य के जीवनचरित्र' (पृ० ७०-१) से होती है। उसमें बाघसिंह के मांडू के सुलतान के पास जाने का उल्लेख है, जिसका अभिप्राय बहादुरशाह से हो, क्योंकि उन दिनों मांडू (मालवा) पर उसका अधिकार हो गया था।

महारावत बाघसिंह ७७ परास्त कर उक्त राज्य को अपनी सलतनत में मिला लिया, जिससे गुजरात का मुसलमानी राज्य अधिक शक्तिशाली हो गया। महाराणा रत्नसिंह का देहांत होने पर उसके उत्तराधिकारी विक्रमादित्य ने, सुलतान बहादुरशाह की रायसेन पर वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में चढ़ाई होने पर उस- (बहादुरशाह)के विरुद्ध रायसेन (मालवा) के स्वामी सलहदी का पक्ष लिया। महाराणा को सलहदी के पुत्र भूपतराय-सहित आते देख, बहादुरशाह ने भी मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए शीघ्र अपनी सेना रवाना की और स्वयं भी अपनी सेना में जा मिला। यह देख महाराणा बिना लड़े ही चित्तोड़ लौट गया। तब सुलतान भी पहले रायसेन को परास्त करने का विचार- कर पीछा मालवे को चला गया १। अपने पड़ोस में एक प्रबल हिंदू-राज्य का होना सुलतान को खटकता था। विक्रमादित्य के भूतपराय की सहायतार्थ जाने से सुलतान बहादुरशाह और भी चिढ़ गया। रायसेन पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् उसी वर्ष (वि० सं० १५८६ = ई० स० १५३२ में) बड़ी तैयारी कर उसने चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना रवाना की। मुसलमानी सेना के मन्दसोर पहुंचने पर महाराणा के वकील संधि का संदेश लेकर पहुंचे। महाराणा के कुछ सरदार सुलतान से जा मिले थे, जिससे उसको महाराणा की कमज़ोरियों का भेद मिलता रहा, अतएव संधि की बात स्वीकार न हुई। तब महाराणा भी अपनी सेना के साथ शत्रुओं के मुक़ा- बले के लिए नीमच तक आगे बढ़ गया२, पर पहले ही आक्रमण में उस- (महाराणा) को अपनी सेना-सहित पीछे हट जाना पड़ा। गुजराती सेना आगे बढ़ने लगी और स्वयं सुलतान भी मांडू से चलकर अपनी सेना में सम्मिलित हो गया। फिर उसने चारों तरफ़ से चित्तोड़ के क़िले को (१) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६१-६२। आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६२ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६५ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ ।

७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घेर लिया और दुर्ग की सुदृढ़ दीवारों को तोपों से उड़ा देने का प्रयत्न किया । दुर्गस्थ सैनिक भी अपनी रक्षा के लिए थोड़ा-बहुत मुक़ाबला कर रहे थे, पर गुजरात की प्रबल सेना के आगे उनका कुछ बस न चला और गुजराती सेना चित्तौड़ के नीचे के दो दरवाज़ों तक पहुंच गई१ । राजमाता हाड़ी कर्मवती (महाराणा संग्रामसिंह की राणी) ने उस समय दिल्ली के बादशाह हुमायूं से सहायता चाही, परंतु वहां से सहायता न मिली और जब दुर्ग बचने की आशा न दीख पड़ी तब राजमाता ने सुलतान बहादुरशाह के पास संधि की बात-चीत के लिए अपने वकीलों को भेजकर कहलाया कि महमूद खिलजी से लिये हुए मालवे के ज़िले लौटा दिये जावेंगे और महमूद का महाराणा संग्रामसिंह को दिया हुआ जड़ाऊ मुकुट तथा सोने की कमरपेटी भी दे दी जायगी । इनके अतिरिक्त दस हाथी, सौ घोड़े और नक़द रुपये भी दिये जायेंगे । राजमाता की इन शर्तों को मानकर वि० सं० १५८९ चैत्र वदि १४ (ई० स० १५३३ ता० २४ मार्च) को सुलतान वहां से लौट गया । बहादुरशाह की चित्तौड़ पर की इस चढ़ाई का महाराणा विक्रमादित्य ( १ ) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६६-७० । आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६६ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६२-६ । कर्नल टॉड ने बहादुरशाह की चित्तौड़ पर एक ही बार चढ़ाई होने का उल्लेख कर वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बाघसिंह का युद्ध में काम आना और वहां पर सुलतान का अधिकार हो जाना लिखा है; किंतु इसके विरुद्ध 'मिरात-इ-सिकंदरी' आदि से वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह का दूसरी बार चढ़ाई करना स्पष्ट है और 'तारीख़ फिरिश्ता' (ब्रिग़्ज़; जि० ४, पृ० १२६) से भी बहादुर- शाह का चित्तौड़ पर दूसरी बार चढ़कर जाना पाया जाता है। इसलिए टॉड ने बाघसिंह का वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बहादुरशाह की चढ़ाई के समय चित्तौड़ में काम आना लिखा, वह स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उदयपुर और प्रतापगढ़ राज्य से मिलनेवाली प्रायः सब ख्यातों में बाघसिंह का वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह के आक्रमण के समय मारा जाना लिखा है ।

महारावत बाघसिंह ७६ पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा । तब शेष बचे हुए सरदारों में से भी कई चित्तौड़ की रक्षार्थ बहादुर- सुलतान से जा मिले, तथा वे उसको वहां का शाह से लड़कर बाघसिंह भेद बताते रहे। पहली चढ़ाई में सुलतान को क़िले का मारा जाना. पर अधिकार करना कुछ कठिन जान पड़ता था, किन्तु महाराणा के सरदारों के जा मिलने से उसको चित्तौड़ पर अधिकार करना सरल जान पड़ा । निदान वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३४) में उसने पुनः चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए चढ़ाई की¹ । राजमाता हाड़ी कर्मवती को यह जानकर बड़ी चिंता हुई । उसने सरदारों को इस आशय के पत्र भिजवाये-“अब तक तो चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उनके हाथ से निकलने का समय आ गया है । मैं क़िला तुम्हें सौंपती हूं, चाहे तुम रखो, चाहे शत्रु को दे दो । मान लो, तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है, तो भी जो राज्य वंश-परंपरा से तुम्हारा है, उसके शत्रु के हाथ में चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी ।” राजमाता का यह पत्र पाते ही सरदारों में, जो महाराणा के व्यवहार से असंतुष्ट हो रहे थे, देश-प्रेम की लहर उमड़ पड़ी और इन उत्तेजनात्मक वाक्यों से वे चित्तौड़ की रक्षार्थ जान देने का संकल्प कर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ राजधानी में जाने लगे । उपर्युक्त आशय का एक पत्र राजमाता ने देवलिया के स्वामी बाघसिंह के पास भी भेजा, जिसको पाते ही उसने विक्रमादित्य-द्वारा होनेवाले अनुचित कार्यों का विस्मरण कर चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने का दृढ़ संकल्प कर लिया एवं सुलतान की दी हुई जागीर का परित्याग कर वह तत्काल अपने राजपूतों-सहित चित्तौड़ जा पहुंचा । शीघ्र ही चित्तौड़गढ़ वीर क्षत्रियों से भर गया, परंतु दुर्ग में खाने-पीने का सामान दो महीनों से अधिक चलने लायक़ न था तथा सुलतान की सेना में रसद, तोप, बारूद, गोले आदि प्रचुरता से थे । इसलिए सब सरदारों ने उभय पक्ष के बलाबल पर विचार ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २८ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास ; जि० १, पृ० ३६७ ।

८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कर महाराणा विक्रमादित्य एवं उसके छोटे भाई उदयसिंह को, जब तक युद्ध समाप्त न हो तब तक के लिए, उनके ननिहाल बूंदी भेजने और महाराणा के स्थान में रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बना उसकी आज्ञानुसार दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सैन्य से लड़ने का निश्चय किया । फिर उन्होंने सुलतान से लड़ने के लिए क़िले के चारों तरफ़ उचित स्थानों पर मोर्चे लगाकर वहां बड़े-बड़े सरदारों को नियत कर दिया¹ । मुंहणोत नैणसी का कथन है कि इस अवसर पर रावत बाघसिंह ने अपने पिता सूरजमल-द्वारा सादड़ी पर अधिकार रहते समय चारणों आदि को दिये हुए १७ गांवों के², उनके वंशधरों के अधिकार में बराबर बने रहने की राजमाता से प्रतिज्ञा कराली थी । जब सरदारों ने बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि नियत किया तो उसने उनसे कहा कि आप लोगों ने मुझको महाराणा का प्रतिनिधि बनाया है तो मेरा कर्त्तव्य है कि मैं आगे बढ़कर क़िले के मुख्य द्वार पर लड़ूं । निदान वह रावत नरबदै-सहित दुर्ग के प्रथम द्वार पाडलपोल पर जा डटा । इसी प्रकार अन्य सरदार भी अपने-अपने मोर्चों पर जा जमे । वीका- खोह पर हाड़ा अर्जुन, भैरवपोल पर सोलंकी भैरवदास, हनुमानपोल पर झाला सज्जा तथा सिंहा और गणेशपोल पर डोडिया भाण सुलतान से लड़ने के लिए प्रस्तुत थे⁴ । इधर तो राजमाता ने चित्तौड़ की रक्षा का यह उपाय किया और उधर राखी भेज उसने बादशाह हुमायूं से फिर सहायता की याचना की । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६-३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६७-६ । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ७० टि० ३ । ( ३ ) यह रावत अज्जा के पुत्र सारंगदेव का पौत्र और जोगा का बेटा था । इसके वंशधरों में मेवाड़ में कानोड़ के सरदार प्रथम वर्ग के उमराव हैं और सारंगदेवोत कहलाते हैं। ( ४ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ ।

महारावत बाघसिंह ८१

सुलताने बहादुरशाह और बादशाह हुमायूं के बीच अनबन थी, जिससे हुमायूं उसे नष्ट करना चाहता था । राजमाता कर्मवती का संदेश पाकर उसने उसको नष्ट करने का यह उपयुक्त अवसर समझा । वह अपनी सेना-सहित बहादुरशाह से लड़ने के लिए रवाना हुआ । ग्वालियर के पास पहुंचने पर उसको बहादुरशाह का पत्र मिला कि मैं इस समय जिहाद (धर्म-युद्ध) पर हूं, यदि तुम हिन्दुओं की सहायता करोगे तो खुदा के सामने क्या जवाब दोगे ? यह पत्र पाकर हुमायूं ग्वालियर में ही ठहर गया और चित्तौड़ के युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा । इस प्रकार हुमायूं के मार्ग में रुक जाने से बहादुरशाह को चित्तौड़ पर आक्रमण करने में सुभीता हो गया और उसने चारों तरफ़ से क़िले पर घेरा डालकर युद्ध आरंभ कर दिया । उसके साथ के तोपखाने में यूरोपियन (पोर्चुगीज़) गोलंदाज़ भी थे, जिन्होंने वेगपूर्वक गोलंदाज़ी शुरू कर दी । उसी समय वीका खोह की तरफ़ से सुरंग के द्वारा दुर्ग की पैंतालीस हाथ दीवार उड़ गई, जिससे हाड़ा अर्जुन अपने साथियों-सहित मारा गया । गिरी हुई दीवार के मार्ग से दुर्ग में प्रवेश करने के लिए गुजराती सेना ने प्रबल आक्रमण किया, जिसको राजपूतों ने बड़ी वीरता से रोका । बहादुर- शाह ने तोपों को आगे कर पाडलपोल, सूरजपोल और लाखोटा की बारी की तरफ़ से हमला किया । तब दुर्ग का द्वार खोलकर बड़ी वीरता से राजपूतों का समूह उनपर टूट पड़ा । उस समय महारावत बाघसिंह ने शत्रु- सेना से घोर युद्ध किया और अंत में वह पाडलपोल के बाहर शत्रु-सैन्य से लड़ता हुआ मारा गया¹ । वहां उसका स्मारक आज भी बना हुआ है और उसकी पूजा होती है । बाघसिंह के मारे जाने पर राजपूत-सेना का व्यूह भंग हो गया और गुजराती सेना आगे बढ़ने लगी । राजपूतों ने मुसलमान सेना का मुक़ाबला करने में कसर न रखी । उनके अनेक वीर हताहत हुए और जब राजपूतों के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध सरदार काम आ गये तो सुलतान की

(१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३०-३१ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६७-६ । ११

८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास. सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया। राजमाता कर्मवती ने जब दुर्ग बचने की आशा न देखी तो बहुतसी स्त्रियों के साथ जौहर किया। इस युद्ध में सुलतान बहादुरशाह विजयी हुआ और उसने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। यह युद्ध चित्तौड़ का 'दूसरा शाका' कहलाता है१। बहादुरशाह का थोड़े समय तक ही चित्तौड़ पर अधिकार रहा। वह अपना अधिकार स्थिर भी न करने पाया था कि बादशाह हुमायूं ने उसपर चढ़ाई कर दी। मन्दसोर के निकट दोनों में लड़ाई हुई, जिसमें बहादुरशाह हारकर मांडू की तरफ़ भाग गया। फिर तो हुमायूं ने उसका पीछाकर (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ५४-५। टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३०३। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ । मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवनचरित्र; पृ० ६६-७३ । मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३३) में बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने और दुर्ग पर सुलतान का अधिकार होने का उल्लेख किया है (भाग १, पृ० ५५), परन्तु उसका वि० सं० १५८६ में सुलतान का चित्तौड़ पर अधिकार होने का कथन ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि वहीं पहली बार की चढ़ाई में सुलतान के चित्तौड़ को घेर लेने और फिर संधि होकर लौट जाने तथा दूसरी बार की चढ़ाई में सरदारों के काम आने एवं जौहर होने के पीछे सुलतान का अधिकार होने का वर्णन है। ऐसी स्थिति में पहली चढ़ाई वि० सं० १५८६ में और दूसरी वि० सं० १५६१ में होकर उस समय जौहर होना एवं चित्तौड़ पर सुलतान का अधिकार होना मानना पड़ेगा। फ़ारसी तवारीखों में बहादुरशाह की चित्तौड़ की दोनों चढ़ाइयों की घटना आस-पास की होने से उनका वर्णन एक ही स्थल पर किया है और वर्णन भी कुछ अस्पष्ट है। इसलिए यह संभव है कि कर्नल टॉड ने भी ये दोनों घटनाएं एक ही समझ उनका संवत् १५८६ में घटित होना लिख दिया हो। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में एक स्थान पर माघ सुदि ४ शुक्रवार को बाघसिंह की मृत्यु होना लिखा है, परन्तु वि० सं० १५६१ माघ सुदि ४ को शुक्रवार नहीं, अपितु मंगलवार था। इसलिए ख्यात के लेखानुसार माघ सुदि ४ को मृत्यु होना माना नहीं जा सकता। 'वीरविनोद' में वि० सं० १५६२ चैत्र सुदि ५ को अंतिम युद्ध होना लिखा है, जो फ़ारसी तवारीखों से भी ठीक जान पड़ता है।

महारावत बाघसिंह ८३ मालवा और गुजरात के विशाल राज्यों को अपने अधीन कर लिया। अभागा बहादुरशाह अपना राज्य गंवाकर दीव बंदर के पास पोर्चुगीज़ों के हाथ से मारा गया। हुमायूं के मुक़ाबले में बहादुरशाह के परास्त होने का समाचार सुनकर चित्तौड़ में रही-सही गुजराती सेना भी भागने लगी। ऐसा सुअवसर देख मेवाड़ के बचे हुए सरदारों ने थोड़े-बहुत राजपूतों को एकत्र कर गुजराती सेना पर (जो चित्तौड़ में नियत थी) आक्रमण कर दिया, जिससे सुलतान की बची हुई सेना भाग गई और बिना अधिक रक्तपात के ही मेवाड़वालों का पुनः चित्तौड़ पर अधिकार हो गया¹। कर्नल टॉड ने इस युद्ध में महारावत बाघसिंह के काम आने की बड़ी प्रशंसा की है। उसका कथन है कि जिस दिन मेवाड़ का राज्य-चिह्न 'छांगी' सूरजमल के पुत्र (बाघसिंह) के शीश पर उठाई गई, उस दिन उसका जैसा प्रकाश हुआ, वैसा कभी न हुआ²। सचमुच अपने देश की रक्षा के लिए तो वीरों के युद्ध में मारे जाने के इतिहास में अनेक उदाहरण हैं, परन्तु निःस्वार्थ भाव से इस प्रकार आगे बढ़कर काम आने के उदाहरण बहुत कम मिलेंगे। बाघसिंह के पिता सूरजमल और पितामह क्षेमकर्ण से मेवाड़ के महाराणाओं का विरोध रहा था, पर चित्तौड़ पर आपत्ति के समय उन सब बातों को भूलकर अपने प्राणों की बाज़ी लगा देना अवश्य ही बाघसिंह के सद्गुणों का परिचायक है। महाराणा का प्रतिनिधि बन- कर चित्तौड़ की रक्षा में वीरगति प्राप्त करने के कारण उस (बाघसिंह) के वंशजों की उपाधि 'दीवान' हुई और वे देवलिया के दीवान कहलाते हैं³। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में लिखा है कि उस (बाघसिंह) के (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३२-३३। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४००। मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवन- चरित्र; पृ० ७४-६। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६३। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० टिप्पण १ तथा पृ० १०५४। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६८, टिप्पण २।

६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [बाघसिंह की राणियां और संतति] पांच राणियां थीं, जिनसे छः पुत्र—रायसिंह, जेतमाल भारमल, कान्हा, खानजी¹, मानजी—तथा दो पुत्रियां रामकुंवरी और शामकुंवरी उत्पन्न हुईं² । रावत बाघसिंह युद्ध-वीर, धर्मप्रिय और दानी नरेश था । स्वदेश- प्रेम और कुलाभिमान उसकी नसों में कूट-कूट कर भरा हुआ था । [रावत बाघसिंह का व्यक्तित्व] उसने निःस्वार्थ भाव से चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राण उत्सर्गकर संसार के सामने एक बड़ा आदर्श उपस्थित किया । उसमें एक विशेष गुण यह भी था कि अपने पूर्वजों-द्वारा दान में दी हुई भूमि उसने पीछी नहीं ली; अपितु जब वह युद्ध क्षेत्र में महाराणा का प्रतिनिधि बन कर लड़ने गया, उस समय उसने राजमाता कर्मवती हाड़ी से अपने पिता सूरजमल-द्वारा मेवाड़ में दान किये हुए गांव सदा के लिए बहाल रहने की प्रतिज्ञा करा ली। इस उदाहरण से उसके चरित्र की महत्ता सिद्ध होती है। यदि उस अवसर पर वह राजमाता से नया पट्टा तथा अधिक सम्मान मांगता तो वह भी मिल सकता था; परन्तु उस वीर ने अपने वंशजों के लिए राजपूती स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी याचना न कर केवल उपरिलिखित याचना की, जो उसके निर्मल चरित्र का परिचय देती है । 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम महारावत बाघसिंह की प्रशंसा करता हुआ, उसको विलासप्रिय नरेश बतलाता है³; किंतु गंगाराम का यह मत ग्राह्य नहीं हो सकता, क्योंकि यदि वह विलासप्रिय व्यक्ति होता तो युद्ध-क्षेत्र में मरने को कभी सन्नध नहीं होता । गंगाराम, बहादुरशाह से युद्ध होना तो लिखता है; किंतु बाघसिंह के धराशायी होने का कुछ भी वर्णन नहीं करता । गुजराती सैन्य का भाग जाना और

( १ ) खानजी के वंशज आंवीरामा और बोड़ी सालथली के प्रथम वर्ग के सर- दार हैं और वे खानावत कहलाते हैं । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( ३ ) गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ४, श्लोक ३-३१ ।

महारावत रायसिंह ८५ महाराणा की विजय होना आदि कथन¹ भी उसका ज्यों का त्यों स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि अनेक प्रमाणों से उपर्युक्त युद्ध में बाघसिंह की मृत्यु होना और बहादुरशाह की विजय होकर थोड़े दिनों तक उसका चित्तौड़ पर अधिकार रहना सिद्ध है, जैसा कि हम ऊपर बतला चुके हैं। बाघसिंह का कोई शिलालेख तथा ताम्रपत्र नहीं मिला है, जिससे उसके जीवन पर अधिक प्रकाश पड़ना कठिन है, तो भी उसका जो-कुछ इतिहास प्राप्त है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वह देशभक्त और वीर क्षत्री था ! रायसिंह बाघसिंह के वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३५) में मालवे की जागीर छोड़ने पर मेवाड़-राज्य ने सादड़ी आदि की पैतृक जागीर पुनः उसको [राज्य-प्राप्ति] बहाल कर दी, अतएव उसका कुटुंब सादड़ी में ही रहने लगा और जब बाघसिंह का बहादुरशाह की चढ़ाई के समय युद्ध में परलोकवास हो गया, तब उसका पुत्र रायसिंह अपने पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ। चित्तौड़ पर उसके पिता के वीरतापूर्वक काम आने से उसको मेवाड़-राज्य की तरफ़ से धरियावद की जागीर भी प्रदान की गई²। चित्तौड़ से गुजरात की सेना को भगाकर राजपूतों ने वहां पर पीछा अधिकार कर लिया और फिर विक्रमादित्य को बूंदी से बुलाकर उसको [धाय पन्ना का बनवीर के डर] चित्तौड़ का राज्य सौंप दिया; किन्तु उसका [से उदयसिंह को रायसिंह के] आचरण न सुधरा । उसने बात-बात पर सरदारों [पास ले जाना] का अपमान करना जारी रखा, यहां तक कि अपने पिता संग्रामसिंह (सांगा) को कुंवरपदे में भ्रातृ-विरोध के समय आश्रय देनेवाले पंवार कर्मचंद्र का भी उसने अपमान किया। यह देख सरदारों ( १ ) वही; सर्ग ५, श्लोक १-२० । ( २ ) अर्शकिंन; राजपूताना गैज़ेटियर (मेवार रेज़िडेंसी); जि० २ ए, पृ० १६७ (ई० स० १६०८)। एक ख्यात में साटोला भी जागीर में मिलने का उल्लेख है।