राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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महारावत उदयसिंह ३०१ इस मुल्क के लिए प्रचुर अनाज मंगवाने का प्रयत्न किया जावे । यह आज्ञा दी जाती है कि तमाम जांगीरदार, अहलकार, पटेल, पटवारी आदि निम्नलिखित बातों की तामील करें तथा जब तक ज़माना ठीक न हो, यहां के निवासियों और बाहर के मनुष्यों को कष्ट न पहुंचावें— ( १ ) श्रावण सुदि १५ तक अनाज की निकासी तथा रवानगी पर महसूल माफ़ किया जाता है । ( २ ) जो परदेशी परिश्रम कर सकते हों वे इमारती कार्य में लगाये जावें, जैसे कुएं खुदवाना, तालाब बनवाना आदि ताकि मुसीबत के समय वे अपना निर्वाह कर सकें । ( ३ ) प्रतापगढ़ में राज्य का एक और साहूकारों के कई सदाव्रत हैं । उनके कार्य-कर्ताओं को सूचित किया जाता है कि मारवाड़ी तथा अन्य लोग जो खैरात मांगें, उनको पूरे तौर से अर्थात् प्रत्येक आदमी को सेर भर आटे से कम न दें । ( ४ ) अनाज को राज्य में लाकर एकत्रित करने की रोक नहीं है, तथापि इश्तिहार जारी किया जाता है कि अनाज के व्यापार पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न होगा । इस मुल्क के समस्त व्यापारी अनाज अपने तौर पर ख़रीद कर बेचें । यही नहीं, उनको राज्य से सहायता भी दी जायगी । यदि कोई परदेशी सौदागर प्रतापगढ़ इलाक़े में ग़ल्ला लाना चाहे और रक्षा के लिए पहरा चाहे तो राज्य में सूचना करने पर पहरा मिल जावेगा । मार्ग रक्षित नहीं है, जिससे इस अकाल के समय सावधानी और निगरानी की आवश्यकता है । ( ५ ) जो पशु मारवाड़ तथा अन्य स्थानों से आये हुए हैं, वे पहाड़ के नज़दीक कटे हुए घास के बीड़ में बिना महसूल चरेंगे । यदि कोई शिकायत आवेगी कि किसी ने उनसे महसूल लिया है, तो महसूल लेने- वालों को सज़ा दी जावेगी । ( ६ ) रियासत के अहलकारों, जागीरदारों और मुत्सद्दियों को ज़रूरी है कि इस विषय में एजेंट गवर्नर-जनरल, राजपूताना ने जो इश्तिहार भेजा
३०२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास है, उसका पूरा लिहाज़ रखें १ ।" उन दिनों महारावत की प्रवृत्ति कुछ ऐयाशी की ओर बढ़ने लगी थी, जिससे शासन-प्रबंध में अव्यवस्था होने लगी। इसपर पोलिटिकल शासन-व्यवस्था में गड़बड़ी होना | एजेंट मेवाड़ ने प्रतापगढ़ के वकील को, जो उसके पास नियत था, महारावत को समझाने के लिए भेजा, जिसका महारावत पर अच्छा प्रभाव पड़ा और उसने फिर रियासत के कार्य में ध्यान देना आरंभ किया तथा फिर रतलाम से कामदार के पद पर ओंकारलाल व्यास को बुलाकर नियत किया २ । तदनन्तर महारावत ने अपने राज्य की न्याय-व्यवस्था ठीक करने के लिए दीवानी तथा फ़ौजदारी अदालतें स्थापित कीं, परंतु अपराधियों के अंग्रेज़ सरकार से अपराधियों के देन-लेन का इक़रारनामा होना | देन-लेन के विषय में क़ौल-क़रार न होने से उनकी गिरफ़्तारी में बाधाएं उपस्थित होती थीं। अतएव वि० सं० १९२५ (ई० स० १८६८) में महारावत और अंग्रेज़ सरकार के बीच कर्नल हचिन्सन, पोलिटिकल एजेंट, मेवाड़ के द्वारा नीचे लिखा अहदनामा हुआ— अपराधियों को एक दूसरे को सौंपने के सम्बन्ध में अंग्रेज़ सरकार तथा देवलिया प्रतापगढ़ के राजा हिज़ हाइनेस उदयसिंह, उनके बाल-बच्चों, वारिसों तथा और उत्तराधिकारियों के बीच का अहदनामा, जिसको एक तरफ़ लेफ़्टेनेंट-कर्नल अलेक्ज़ेंडर रॉस इलियट हचिन्सन, स्थानापन्न पोलि- टिकल एजेन्ट, मेवाड़ ने लेफ़्टेनेंट कर्नल रिचर्ड हार्ट कीटिङ्ग, सी० एस० आई० तथा वी० सी० एजेंट गवर्नर-जेनरल राजपूताना के आदेश से, जिसे हिंदुस्तान के वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल दि राइट आनुरेवल सर जॉन लॉर्ड मेयर लारेंस वैरोनेट, जी० सी० वी० एवं जी० सी० एस० आई० से तत्सम्बन्धी पूर्ण अधिकार प्राप्त हुए थे और दूसरी तरफ़ राजा उदयसिंह ने तैयार किया— ( १ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६०-१ । ( २ ) वही; जि० १, पृ० ५४६ ।
महारावत उदयसिंह ३०३ शर्त पहली—कोई व्यक्ति चाहे वह अंग्रेज़ी इलाक़े की प्रजा हो, या किसी और की, अंग्रेज़ी इलाक़े में कोई संगीन जुर्म करे और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर पनाह ले तो प्रतापगढ़ राज्य उसको गिरफ़्तार करेगा और तलब किये जाने पर साधारण नियम के अनुसार अंग्रेज़ सरकार को सौंप देगा। शर्त दूसरी—कोई व्यक्ति जो प्रतापगढ़ की प्रजा हो, प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर कोई भारी अपराध कर अंग्रेज़ी इलाक़े में शरण ले तो अंग्रेज़ सरकार उसको गिरफ़्तार करेगी और तलब करने पर रीति के अनुसार प्रतापगढ़ राज्य को सौंप देगी। शर्त तीसरी—कोई आदमी, जो प्रतापगढ़ की प्रजा न हो, प्रतापगढ़ राज्य की सीमा के भीतर कोई बड़ा अपराध कर अंग्रेज़ी इलाक़े में आश्रय ले तो वह गिरफ़्तार किया जायगा और उसके मुक़दमे का फ़ैसला वह अदालत करेगी, जिसको अंग्रेज़ सरकार आज्ञा दे। साधारण नियम के अनुसार ऐसे मुक़दमों का निर्णय उस पोलिटिकल एजेंट के इजलास में होगा, जिसके साथ प्रतापगढ़ राज्य का सम्बन्ध हो। शर्त चौथी—किसी भी अवस्था में कोई सरकार किसी व्यक्ति को, जिसपर किसी बड़े अपराध का अभियोग लगाया गया हो, तब तक सौंपने की पाबन्द न होगी, जब तक कि वह सरकार, जिसके इलाक़े में अपराध हुआ हो, अभियुक्त को क़ायदे के अनुसार तलब न करे और जुर्म की ऐसी शहादत पेश न हो, जिसके द्वारा जिस इलाक़े में वह (अपराधी) पाया जाय, उसके क़ानून के अनुसार उसकी गिरफ़्तारी वाजिब समझी जाय और यदि वही अपराध उस इलाक़े में किया जाता तो वहां भी अभियुक्त अपराधी ठहराया जाता। शर्त पांचवीं—नीचे लिखे हुए अपराध संगीन अपराध समझे जायेंगे— ( १ ) मनुष्य वध ( ४ ) ठगी ( २ ) मनुष्य वध करने का प्रयत्न ( ५ ) विष-प्रयोग ( ३ ) उत्तेजना की दशा में किया ( ६ ) बलात्कार हुआ दंडनीय मनुष्य वध ( ७ ) सख्त चोट पहुंचाना
३०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ( ८ ) बालक चुराना ( १६ ) जाली सिक्के बनाना तथा खोटे ( ६. ) औरतों को बेचना सिक्के चलाना ( १० ) डाका डालना ( १७ ) दंडनीय विश्वासघात ( ११ ) लूट करना ( १८ ) माल-अस्बाब राखन ( हजम ) ( १२ ) सेंध लगाना करना, जो जुर्म समझा जाय ( १३ ) पशुओं की चोरी ( १६ ) ऊपर लिखे हुए अपराधों में ( १४ ) मकान जलाना सहायता देना ( १५ ) जालसाज़ी शर्त छठी—ऊपर लिखी हुई शर्तों के अनुसार किसी अपराधी को गिरफ़्तार करने, रोक रखने या सुपुर्द करने में जो व्यय पड़ेगा, वह उस सरकार को देना पड़ेगा, जो उसको तलब करेगी । शर्त सातवीं—ऊपर लिखा हुआ अहदनामा तब तक क़ायम रहेगा, जब तक अहदनामा करनेवाले दोनों पक्षों में से कोई उसको तोड़ने की अपनी इच्छा दूसरे को न बतलावे । शर्त आठवीं—इस अहदनामे में जो शर्तें दी गई हैं, उनमें से किसी का भी असर ऐसे किसी अहदनामे पर न होगा, जो दोनों पक्षों के बीच पहले हुआ है, सिवाय किसी अहदनामे के उस अंश के जो इसके विरुद्ध हो । आज २२वीं दिसंबर ई० स० १८६८ (वि० सं० १६२५ पौष सुदि ८) को प्रतापगढ़ में तय हुआ । ( दस्तख़त ) ए० आर० ई० हर्चिसन् | मुहर | लेफ़्टेनेंट-कर्नल, स्थानापन्न पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ । | मुहर | प्रतापगढ़ देवलिया के राजा की मुहर तथा दस्तख़त । ( दस्तख़त ) मेयो, भारत का वाइसरॉय और गवर्नर-जेनरल ।
महारावत उदयसिंह ३०५ ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी (वि० सं० १६२५ फाल्गुन सुदि ८) को फ़ोर्ट विलियम (कलकत्ता) में भारत के वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल ने इस अहदनामे की तस्दीक़ की१। (दस्तख़त) डब्लयू० एस० सेटनकर, सेक्रेटरी, भारत गवर्नमेंट, वैदेशिक विभाग। अठारह वर्ष बाद इस अहदनामे की एक शर्त में परिवर्त्तन हुआ, जो नीचे लिखे अनुसार है— ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी को अपराधियों के सौंपने के संबंध में अंग्रेज़ सरकार एवं प्रतापगढ़ राज्य के बीच जो अहदनामा हुआ था, उसमें अंग्रेज़ी इलाक़े से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में शरण लेनेवाले अपराधियों को सौंप देने के लिए जो तजवीज़ हुई थी, वह अनुभव से ब्रिटिश भारत में प्रच- लित क़ानूनी अमल से कम आसान और कम कारगर पाई गई। इसलिए इस इक़रारनामे के द्वारा अंग्रेज़-सरकार तथा प्रतापगढ़ राज्य के बीच स्थिर हुआ है कि भविष्य में अहदनामे की शर्तें, जिनमें अभियुक्तों की सुपुर्दगी की बाबत तजवीज़ हुई है, वह ब्रिटिश भारत से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में आश्रय लेनेवाले अपराधियों की सुपुर्दगी के विषय में लागू न होंगी और इस समय ऐसे प्रत्येक मामले में अपराधियों को सौंपने के संबंध में ब्रिटिश भारत में जो क़ानूनी अमल जारी है, उसकी पाबंदी करनी होगी। ई० स० १८८७ ता० २६ अगस्त (वि० सं० १६४४ भाद्रपद सुदि ११) को प्रतापगढ़ में दस्तख़त हुए। (दस्तख़त, हिन्दी भाषा में) [मुहर] महारावत प्रतापगढ़। (दस्तख़त) ए० एफ० पिन्हे, लेफ़्टेनेन्ट, [मुहर] असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेंट, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़। ई० स० १८८८ ता० २८ मार्च (वि० सं० १६४५ द्वितीय चैत्र वदि १) (१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६३-५। ३६
३०६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को फ़ोर्ट विलियम में हिन्दुस्तान के वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल ने इस अहदनामे को मंजूर कर इसकी तसदीक़ की १ । ( दस्तखत ) एच० एम्० ड्युरंड, सेक्रेटरी, भारत गवर्नमेंट, फ़ॉरेन विभाग। प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा राज्य की सीमाएं मिली हुई होने से कभी- कभी इन दोनों राज्यों के बीच सीमा संबंधी झगड़े और उपद्रव होकर [बांसवाड़ा राज्य के साथ सीमा] विरोध हो जाया करता था। उन दिनों (बांसवाड़ा के [संबंधी झगड़ा होना] महारावल लक्ष्मणसिंह के राज्य समय ) बांसवाड़ा- वालों ने प्रतापगढ़ राज्य के रायपुर ठिकाने के बोरी, रींछड़ी आदि गांवों का नवीन झगड़ा उठाया, जो प्रतापगढ़ राज्य के अधिकार में बहुत वर्षों से चले आते थे। इस झगड़े ने बड़ा भीषण रूप धारण किया और वि० सं० १६२३ आश्विन सुदि ६ ( ई०स० १८६६ ता० १४ अक्टूबर ) को रात्रि के समय बांसवाड़ावालों ने एक बड़ी सेना के साथ जाकर रायपुर के ठाकुर पर, जो उस समय वहां के थाने पर सीमा की रक्षा के लिए प्रतापगढ़ की तरफ़ से नियत था, आक्रमण कर दिया। रायपुर के ठाकुर और उसके साथी ( प्रतापगढ़ के सरदार ) उस समय असावधान थे, इसलिए बांसवाड़ावालों का आक्रमण वे सह न सके और उनके आदमियों में से आंधीरामा के ठाकुर का पुत्र केसरीसिंह, रायपुर का अजीतसिंह, हिम्मतसिंह, चौहान लक्ष्मणसिंह, हम्मीरसिंह आदि ३५ व्यक्ति मारे गये और ५६ घायल हुए तथा बांसवाड़ावाले वहां से कई हज़ार रुपयों का माल भी लूट ले गये। इस झगड़े में बांसवाड़ा राज्य के दो आदमी मारे गये और चार घायल हुए। फिर पोलिटिकल अफ़सरों- द्वारा इस मुक़द्दमे की तहक़ीक़ात होने पर बांसवाड़ा राज्य की ज़्यादती प्रमाणित हुई और बांसवाड़ा राज्य के कामदार कोठारी चिमनलाल पर एक हज़ार रुपये जुरमाना होकर वह दस वर्ष के लिए बांसवाड़ा राज्य से निर्वासित कर दिया गया एवं पांच दूसरे अह्लकार, जो इस झगड़े में ( १ ) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६२ ।
महारावत उदयसिंह ३०७ शामिल थे, पांच-पांच वर्ष के लिए क़ैद कर उदयपुर के जेलखाने में रखे गये। अंत में मेवाड़ भील कोर के कमांडैंट मेजर गनिंग ने मौक़े पर जाकर वि० सं० १६३१ (ई० स० १८७५) में उचित फ़ैसला कर दोनों राज्यों की सीमा पर मीनारे खड़े करवा दिये'। इस फ़ैसले से तनाज़े की ३६ वर्ग मील भूमि पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार बहाल रहा और इस मुक़दमे में प्रतापगढ़ राज्य के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद अमृतराव दक्षिणी तथा बड़ा सेलारपुरा के ठाकुर विशनसिंह की कारगुज़ारी अच्छी रही, जिसकी मेजर गनिंग ने महारावत के पास प्रशंसा लिख भेजी। इसी प्रकार एक दूसरा झगड़ा प्रतापगढ़ राज्य के सांडनी गांव के नील के पठार नामक खेतों के सम्बन्ध में बांसवाड़ा राज्य के सेमलिया पट्टे के सूरजपुरा गांव के बीच वि० सं० १९२६ (ई० स० १८७२) में उत्पन्न हुआ। उसमें भी बांसवाड़ावालों ने अपनी सेना भिजवाकर प्रतापगढ़ राज्य के दो आदमियों को मार डाला। उसका फ़ैसला ई० स० १८७४ ता० १६ सितम्बर (वि० सं० १६३१ भाद्रपद सुदि ५) को मेवाड़ के असिस्टेन्ट पोलि- टिकल एजेंट पारसी फ़्रामजी सीकाजी ने, जो बांसवाड़ा में नियत था, किया। उसके अनुसार नील के पठार के क्षेत्रों का अधिकार प्रतापगढ़ राज्य का स्वीकार किया गया और सांडनी तथा सूरजपुरा गांव की सीमाएं निर्धारित कर मीनारे खड़े करवा दिये गये। इस मुक़दमें में महारावत के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद शाह जोधकरण और अर्जुनसिंह की कार- गुज़ारी अच्छी रही। बांसवाड़ा राज्य ने प्रतापगढ़ राज्य के अजंदा गांव को वि० सं० १६१७ (ई० स० १८६०) में बलपूर्वक दबा लिया था, जिसका मुक़दमा महारावत दलपतसिंह के समय से ही चल रहा था। उसका भी उन्हीं दिनों (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५२८ तथा ५४७ । उक्त पुस्तक में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से इस झगड़े में मारे जानेवाले व्यक्ति की संख्या २६ और घायलों की ५४ दी है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०३६) में बांसवाड़ा के कामदार चिमनलाल कोठारी पर दस हज़ार रुपये जुरमाना होने का उल्लेख है।
३०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास फ़ैसला हुआ, जिसमें उक्त गांव पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार कराया गया और बांसवाड़ा राज्य की ओर से सुंबूत में जो पत्र आदि पेश किये गये वे जाली माने गये । इस घटना से अंग्रेज़ सरकार का बांसवाड़ा के महारावल लछमणसिंह के प्रति बिलकुल विश्वास उठ गया और उसकी बहुत बदनामी हुई । फलस्वरूप अंग्रेज़ सरकार ने छः वर्ष तक के लिए उसकी सलामी की चार तोपें घटा दीं१, जो पीछे ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३६) तक न बढ़ीं । वि० सं० १९३२ (ई० स० १८७५ नवंबर) में भारत का वाइसरॉय और गवर्नर जनरल लॉर्ड नॉर्थब्रुक बम्बई से मालवे की तरफ़ होकर उदय- [महारावत का नीमच जाकर] पुर गया । उस समय नीमच के मुक़ाम पर महा- [वाइसरॉय लॉर्ड नॉर्थब्रुक से] रावत उदयसिंह ने जाकर उक्त वाइसरॉय से मुला- [मुलाक़ात करना] क़ात की२ और फ़रवरी ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३२) में उसने राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जनरल सर ए० सी० लॉयल से भी नीमच जाकर मुलाक़ात की३ । मेवाड़ तथा टोंक राज्य के नींवाहेड़ा परगने में बसनेवाले मोधिये बड़े जरायम पेशा थे । उन दिनों वे अवसर पाकर प्रतापगढ़ राज्य में [मोधियों को महारावत का] जा घुसे और वहां आबाद होने का विचार कर [अपने राज्य में न ठहरने] कुछ चौकीदारों में नौकर हो गये । इसकी इत्तला [देना] महारावत को मिलने पर उसने ऐसे जरायम पेशा लोगों को अपने राज्य में आबाद करने में हानि समझ, वहां उनको न ठहरने दिया४, जिससे उसके राज्य में चोरी-धाड़ों का भय कम हो गया । (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २४०। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०३६ । अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् बांसवाड़ा स्टेट; पृ० १६५। एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२-६। (२) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । (३) वही; जि० १, पृ० ५६४ । (४) वही; जि० १, पृ० ५६३-४ ।
महारावत उदयसिंह ३०६
महारावत का कामदार ओंकारलाल व्यास कारगुज़ार व्यक्ति था । वि० सं० १६३२ ( ई० स० १८७५ ) में उसको एक बदमाश सिपाही ने तल- [कामदार ओंकारलाल व्यास की मृत्यु] वार का प्रहार कर घायल कर दिया, जिससे वह कुछ दिनों पीछे मर गया । घातक उसी समय मार डाला गया और उसके शामिल रहनेवाले व्यक्तियों को क़ैद की सज़ा दी गई। महारावत ने उस ( ओंकारलाल ) के पुत्र कोम- लराम के प्रति सहानुभूति प्रकट कर उसको अपने यहां ही रक्खा और उससे राज्य का काम लेने लगे, किन्तु वस्तुतः राज्य का सब कार्य महारावत की आज्ञानुसार ही होता था¹ । प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश ज़मीन पैदावार के लिए बहुत ही उपयोगी है । वहां पहले अफ़ीम की काश्त अधिकता से होती थी, जो [महारावत का अपने राज्य की आबादी बढ़ाना] अच्छी ज़ात की होती थी एवं अनाज की पैदा- वारी भी अच्छी थी । महारावत के उदार विचार और प्रयत्न से वहां के ऊजड़ गांव फिर बस गये और काश्तकारों को रियायतें और तसल्ली देने से वहां की तमाम ज़मीन में खेती होने लगी तथा कृषि-योग्य भूमि में से कुछ भी खाली न बची । केवल एक गांव बांसवाड़ा के भीलों की ज़्यादती से वीरान था । बांस- वाड़ा के भील प्रतापगढ़ की प्रजा से चौथ लेने का दावा करते थे । ई० स० १८७३ ( वि० सं० १६३१ ) में मेवाड़ राज्य के धरियावद पट्टे की तरफ़ के गांगा की पाल के मीणों ने कप्तान चार्ल्स स्ट्रेटन पर हमला भी किया²; किंतु महारावत के अच्छे प्रबन्ध से प्रतापगढ़ राज्य के निवासी भील-मीणे
( १ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६०, ५६२-४ । ओंकार- लाल व्यास जाति का औदीच्य ब्राह्मण था । उसने कई वर्षों तक रतलाम राज्य में काम किया था, जिससे उसको अच्छा अनुभव हो गया था । वि० सं० १६३२ वैशाख बदि ३ ( ई० स० १८७५ ता० २३ अप्रेल ) को महारावत ने उसको बांसलाही गांव प्रदान किया, जो अद्यावधि उसके वंशजों के पास विद्यमान है । ( २ ) वही; जि० १, पृ० ५६४ ।
३१० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किसी भी उपद्रव में सम्मिलित न हुए और वे शांतिप्रिय बने रहे । श्रीमती महाराणी विक्टोरिया ने भारत का राज्याधिकार अपने हाथ में लेने के पीछे "सम्राज्ञी" (Empress of India) पदवी धारण की । दिल्ली दरबार के उपलक्ष्य में महारावत को झंडा मिलना उस सम्बन्ध में ई० स० १८७७ ता० १ जनवरी (वि०सं० १९३३ माघ वदि २) सोमवार को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल और वाइसरॉय लॉर्ड लिटन ने दिल्ली नगर में एक बृहत् दरबार करना निश्चित किया । इस अवसर पर भारत के नरेशों को भी दरबार में सम्मिलित होने के लिए निमन्त्रण पत्र भेजे गये । तदनुसार भारत के कई नरेश दिल्ली जाकर उक्त दरबार में सम्मिलित हुए । कारण विशेष से महारावत उदयसिंह दरबार में सम्मिलित नहीं हुआ, अतएव उसके लिए वाइसरॉय लॉर्ड लिटन ने शाही झंडा (निशान) भेजना स्थिर किया, जो वि० सं० १९३६ (ई० स० १८७९) में मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट मेजर टी० केडिल प्रतापगढ़ लेकर गया और एक बड़े दरबार में वह महारावत को दिया गया । वि० सं० १९३७ (ई० स० १८८१) के शीतकाल में इस राज्य में प्रथम बार मनुष्य-गणना हुई । इस अवसर पर उदयपुर राज्य में भीलों प्रतापगढ़ राज्य में प्रथम बार मनुष्य-गणना होना का उपद्रव हो गया था । प्रतापगढ़ राज्य, मेवाड़ राज्य से मिला हुआ है और वहां के अधिकांश निवासी भील, मीणे हैं, जिससे वहां भी उपद्रव हो जाने की आशंका हुई; परन्तु महारावत के उत्तम प्रबन्ध से प्रतापगढ़ राज्य में ऐसा उपद्रव न हुआ और शांतिपूर्वक मनुष्य गणना का कार्य होकर वहां की जन संख्या में ७६५६८ व्यक्तियों की गणना हुई१ । इसके दो वर्ष पीछे वि० सं० १९३९ (ई० स० १८८३) में महारावत नीमच की छावनी गया, जहां उस समय इंदौर का भूतपूर्व महाराजा (१) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २०१ ।
महारावत उदयसिंह ३११ इंदौर नरेश से मुलाक़ात के लिए महारावत का नीमच जाना | तुकोजीराव होल्कर ( द्वितीय ) भी गया हुआ था। वहां उपर्युक्त नरेश से उसकी कई मुलाक़ातें हुईं। फिर महाराजा के वहां से लौटने पर महा- रावत अपनी राजधानी में दाख़िल हुआ । वि० सं० १९४३ ( ई० स० १८८६ ) में महारावत ने मन्त्री पद पर पारसी फ़्रामजी भीकाजी को नियत किया, जिसने कई वर्षों तक अंग्रेज़ सरकार के राजनैतिक विभाग में दायित्वपूर्ण पदों महारावत का पारसी फ़्रामजी भीकाजी को कामदार बनाना | पर रहकर सेवाएं की थीं तथा मेवाड़ के पोलि- टिकल एजेंट के असिस्टेंट के पद पर रहकर बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्यों के बीच होनेवाले सीमा संबंधी झगड़ों को निपटाया था। उसके और महारावत के बनी नहीं, जिससे उसकी जगह मिर्ज़ा मुहम्मदी बेग वहां का कामदार बनाया गया । उसी वर्ष फाल्गुन सुदि ६ ( ई० स० १८८७ ता० १ मार्च) मंगलवार को सैलानेवाली मंझली महाराणी जुहारकुंवरी के उदर से महाराजकुमार अर्जुनसिंह का जन्म हुआ । महारावत के प्रथम महारावत की सैलानेवाली महाराणी से कुंवर उत्पन्न होना | राजकुमार का परलोकवास हो जाने के पीछे १७ वर्ष तक कोई संतान न होने से उत्तराधिकारी के विषय में वहां की प्रजा चिंतित थी । अतएव राजकुमार का जन्म होने से उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा । महारावत ने उक्त राजकुमार के उत्पन्न होने की प्रसन्नता में सहस्रों रुपये व्यय किये और अपने सगे संबंधी नरेशों में से सैलाना और सीतामऊ के राजाओं तथा कानोड़, आसींद (मेवाड़ राज्य) और कुशलगढ़ के सरदारों को अपने यहां निमंत्रित कर पुत्र-जन्मोत्सव मनाया; किंतु वह राजकुमार केवल डेढ़ वर्ष की आयु में ही काल कवलित हो गया, जिसका उक्त महारावत के शरीर पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा और संसार से उसको एकबार ही विरक्ति हो गई। वि० सं० १९४४ में महाराणी विक्टोरिया को शासन-सूत्र हाथ में लिये पचास वर्ष पूरे हो गये, जिसके उपलक्ष्य में इंग्लैंड और भारत में
३१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
स्वर्णजयंती मनाना निश्चित हुआ। तदनुसार महारावत महारानी विक्टोरिया की 'स्वर्ण जयन्ती का उत्सव ने भी अपने यहां दरबार कर स्वर्ण जयन्ती-महोत्सव मनाया जाना मनाया और इस शुभ दिवस के स्मरणार्थ राजधानी प्रतापगढ़ में आबादी से पूर्व की तरफ़ मंदसोर जाने- वाले मार्ग में एक नाले पर पक्का पुल बनवाया । उसी वर्ष महारानी विक्टोरिया के तृतीय शाहज़ादे ड्यूक ऑव् महारावत का नीमच जाकर कनाट का नीमच में आगमन हुआ । उस अवसर ड्यूक ऑव् कनाट से मुलाक़ात पर महारावत ने नीमच जाकर उक्त शाहज़ादे से करना मुलाक़ात की । महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १६२४ ( ई० स० १८६७ ) में प्रतापगढ़ में रोगियों की चिकित्सा के लिए डिस्पेंसरी खोली गई¹ । शीतला रोग से बचने के लिए उक्त महारावत के महारावत के अन्य प्रमुख कार्य समय वि० सं० १६२७ ( ई० स० १८७० ) में टीका लगवाने की व्यवस्था हुई²। बालकों की शिक्षा के लिए वि० सं० १६३२ ( ई० स० १८७५ ) में वहां पाठशाला की स्थापना की गई³ । स्टांप और कोर्ट फ़ीस का क़ायदा बनाया जाकर वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में वहां जारी किया गया । उसने अपने यहां सेना को बाक़ायदा क़वायद सिखलाने की भी व्यवस्था की थी⁴ । बांसवाड़ा राज्य और प्रताप- गढ़ राज्य के सीमा संबंधी मुक़द्दमे भी उसके समय में तय हुए, जिससे झगड़े मिट गये । पुलिस और गिराई की भी उसके समय में वहां कुछ-कुछ व्यवस्था हुई और वि० सं० १६४१ ( ई० स० १८८४ ) में वहां अंग्रेज़ी डाक- खाना भी खोला गया⁵ ।
( १ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २२१ । ( २ ) वही; पृ० २२१ । ( ३ ) वही; पृ० २२० । ( ४ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ( ५ ) अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० २१२ ।
महारावत उदयसिंह ३१३ केवल कुछ दिनों की बीमारी के पीछे वि० सं० १९४६ फाल्गुन वदि ११ (ई० स० १८९० ता० १५ फ़रवरी) को लगभग ४१ वर्ष की आयु में महारावत का परलोकवास महारावत उदयसिंह का निःसंतान परलोकवास हो गया । उसकी असामयिक मृत्यु से प्रजा में गहरी उदासी छा गई, क्योंकि वह प्रजा-प्रिय राजा था । महारावत उदयसिंह के तीन विवाह हुए थे । उनमें से एक राणी नामली के ठाकुर तख्तसिंह की पुत्री सरूपकुंवरी थी । गद्दी बैठने के बाद महारावत की राणियां उसके दो विवाह सैलाना के राजा दुलहसिंह की कुंवरियों—जुहारकुंवरी और फूलकुंवरी—से हुए थे¹ । उनमें से एक विवाह वि० सं० १९३२ ( ई० स० १८७५ ) में हुआ था² । महारावत के छब्बीस वर्ष के शासन में प्रतापगढ़ राज्य में बहुत कुछ लोकोपयोगी कार्य हुए, जिनमें से प्रतापगढ़ की धर्मशाला महारावत के लोकोपयोगी कार्य मुख्य है। उसके समय में प्रतापगढ़ के क़िले में कई मकान बने, जिनमें उदयविलास महल उल्लेखनीय है। अपने निवास के प्रतापगढ़ के नवीन बंगले के निकट राम- चंद्रजी का मंदिर बनवाकर उसने उस मंदिर के पूजन व्यय के लिए अमलावद और सींगपुरिया गांव में जागीर निकालकर अच्छी व्यवस्था कर दी थी। उदयसिंह वीर, प्रबंध-कुशल, प्रजा-प्रिय और उदार राजा था । वह शिकार का प्रेमी अवश्य था, परंतु उधर उसकी अधिक आसक्ति होना महारावत का व्यक्तित्व पाया नहीं जाता । राज्य के शासन-प्रबंध को वह अपना मुख्य कर्त्तव्य मानता था । उसकी प्रजा उससे सदा प्रेम करती थी, जिसका परिचय तत्कालीन पोलिटिकल एजेंटों को भी उसके राज्य में दौरा करते समय प्रजा से पूछ-ताछ करने पर ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ११ । सूवेनीर हिस्ट्री ऑव् सैलाना स्टेट; पृ० ३६-७ । ( २ ) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । ४०
३१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हुआ था¹। प्रजा की प्रार्थनाओं को वह स्वयं सुनकर यथाशक्ति उनके कष्टों को मिटाने का यत्न करता था। उसका चोर और डाकुओं पर भी आतंक था, जिससे उसके राज्य-काल में प्रतापगढ़ राज्य में उनके उपद्रव कम हो गये। जब कभी वह अपने राज्य में चोरी और डाकों की ख़बर सुनता तो भोजन करता हुआ भी उठ खड़ा होता था। इससे उसके इलाके का फ़ौजदारी सीग़े का इंतज़ाम अच्छा रहा, जिसकी पोलिटिकल अफ़सरों ने भी सराहना की²। उसकी अंग्रेज़ अफ़सरों तथा आस-पास के राजाओं से सदा मेल की नीति रही और थोड़ी ही आयु में उसने काफ़ी प्रसिद्धि पाई। वह अपने कर्मचारियों के कार्यों की पूरी देख-भाल करता और समय- समय पर उनकी सेवाओं की कद्र कर उन्हें पुरस्कृत करता था। विद्वान् और कवि लोगों को वह संदा आश्रय देकर अपने पास रखता एवं उनको जागीरें आदि देकर उनका सम्मान बढ़ाता था। सरदारों का भी वह पूरा आदर और मान रखता था। उसने कितने ही सरदारों से वसूल होनेवाले खिराज में कमी और कई सरदारों के सम्मान में वृद्धि की थी। न्याय की वह अवहेलना नहीं करता था। अपने कर्मचारियों को उसकी पूरी ताकीद थी कि वे प्रजा को प्रसन्न रखें तथा उनके साथ अन्याय न करें और न अनुचित रूप से उनसे धन लें। धमोतर के ठाकुर हमीरसिंह को जब जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह ने एक चंवर रखने का सम्मान दिया तो महारावत ने उसको अपनी तरफ़ से दूसरा चंवर रखने का सम्मान देकर अपनी नीति-कुशलता का परिचय दिया। उसकी काव्य- साहित्य की ओर रुचि थी, इसलिए अयोध्या (कनकभवन) के महंत जानकीप्रसाद (रसिकविहारी), प्रसिद्ध साहित्यसेवी स्वामी गणेश- पुरी और बाठरडा (मेवाड़ राज्य) के रावत दलेलसिंह के लघु भ्राता गुमानसिंह को (जो काव्य का ज्ञाता और योगी पुरुष था) आदर-पूर्वक अपने यहां रखकर गुण-ग्राहकता का परिचय दिया था। उसने बारहठ (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६२। (२) वही; जि० १, पृ० ५६२ ।
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महारावत सर रघुनाथसिंह, के. सी. आई. ई.
महारावत रघुनाथसिंह ३१५ ईसरदान और मेहडू चारण गुलाबसिंह को पैर में स्वर्णाभूषण पहनने का सम्मान देकर उसने उनकी प्रतिष्ठा-वृद्धि की थी¹। उसके राज्य-समय में प्रतापगढ़ राज्य ऋण-ग्रस्त हो गया, जिसका कारण उसकी विलासिता की तरफ़ प्रवृत्ति होना भी बतलाया जाता है। वि० सं० १६२५ (ई० सं० १८६८) के भयंकर अकाल में उसने जो उदारता दिखलाई थी, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। वह पूर्ण आस्तिक और धर्म-प्रेमी राजा था। लोकोपकार की तरफ़ सदा उसकी भावना रहती थी। वि० सं० १६२६ (ई० स० १८७२) में उस- (महारावत) ने पुष्कर-यात्रा भी की थी। भील और मीणों से, जो गायों को मारकर खा जाते थे, उक्त महारावत ने इक़रार लिखवाकर उक्त पशु की हिंसा बन्द करवाई और भविष्य में ऐसा कार्य करनेवालों को कठोर दंड देने का शिलालेख खुदवाकर देवलिया में लगवा दिया²। प्रतापगढ़ राज्य में सती-प्रथा और राजपूताने में होनेवाली कन्या-वध की प्रथा उसके ही समय से बंद होना मानना चाहिये। उसका वर्ण गौर, बदन भरा हुआ, क़द मंझला, चेहरा गोल, आंखे बड़ी-चड़ी, भुजदंड विशाल, वक्षस्थल चौड़ा और ललाट उन्नत था। उसके चेहरे से राजपूती आभा टपकती थी। रघुनाथसिंह महारावत रघुनाथसिंह, अरणीद के महाराज खुशहालसिंह (कुशल- सिंह) का पुत्र था। उसका जन्म वि० सं० १६१५ पौष वदि १० जन्म और गद्दीनशीनी (ई० स० १८५८ ता० २६ दिसंबर) को हुआ था। वह प्रारम्भ से ही पितृप्रेम से वंचित हो गया था, जिससे उसके बाल्यजीवन का अधिकांश भाग आसींद (मेवाड़) के रावत खुम्माणसिंह के यहां व्यतीत हुआ, जहां उसकी माता की ननसार थी। इस कारण वह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका और तत्कालीन शैली के (१) वंशभास्कर; तृतीय भाग, पृ० ५४ (भूमिका)। (२) वि० सं० १६४१ भाद्रपद सुदि ११ (ई० स० १८८४ ता० ३१ अग- स्त) रविवार का देवलिया के बोहरे की दूकान के सामने का शिलालेख।
अनुसार ही उसने हिंदी भाषा का आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया। वह कुछ वर्ष तक महाराणा शंभुसिंह के समय उदयपुर भी रहा था और जब उक्त महा- राणा वि० सं० १६२७ (ई० स० १८७०) में भारत के तत्कालीन वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल लॉर्ड मेयो से मुलाक़ात करने के लिए अजमेर गया, उस समय वह (रघुनाथसिंह) भी उसके साथ विद्यमान था। महारावत उदयसिंह का वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में अपुत्र देहांत होने से प्रतापगढ़ राज्य के सरदारों और राज-कर्मचारियों को बड़ी चिंता हुई; क्योंकि बिना किसी को उत्तराधिकारी निर्वाचित किये राज्य-प्रबन्ध में गड़बड़ी होने की संभावना थी और भूतपूर्व महारावत ने किसी को अपना उत्तराधिकारी नियत नहीं किया था। प्रतापगढ़ राज्य में महारावत के देहावसान होने पर गद्दी ख़ाली नहीं रहती और तत्काल नये महारावत के नाम की दुहाई फेरी जाती है। इस बात को दृष्टिकोण में रखकर धमोतर के ठाकुर तथा अन्य सरदारों एवं कामदार शाह रत्नलाल पाडलिया ने अरणीदं के महाराज रघुनाथसिंह को (जो समीपी बांधव था) हक़दार होने से गद्दी बिठलाने की राय स्थिर की। तदनन्तर उन्होंने अन्तःपुर की ड्योढ़ी पर जाकर परलोकवासी महारावत की राणियों से यह बात निवेदन करवाई, जिस-पर उन्होंने शाह कपूरचंद ख़ासगीवाले तथा लक्ष्मीराम नागर के द्वारा महाराज रघुनाथसिंह को गद्दी बिठलाने की स्वीकृति भेजी। फलस्वरूप उपस्थित सरदारों और प्रतिष्ठित कर्मचारियों ने महारावत उदयसिंह की राणियों के आदेशानुसार महाराज रघुनाथसिंह को राजगद्दी पर बिठला कर, उसको अपना स्वामी घोषित किया और राज्य में भी उसके नाम की दुहाई फेर दी। तदनन्तर उसकी गद्दीनशीनी की सूचना बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेन्ट पोलिटिकल ऑफ़िसर को दी जाने पर कप्तान पिन्हे ने स्वयं प्रतापगढ़ जाकर भूतपूर्व महारावत की राणियों से दर्याफ़्त कराया, तो उन्होंने रघुनाथसिंह को अपनी इच्छानुसार गद्दी बिठलाना स्वीकार किया। इसके पीछे मेवाड़ के रेज़िडेंट कर्नल पिकॉक ने भी प्रतापगढ़ जाकर
महारावत रघुनाथसिंह ३१७ परलोकवासी महारावत की राणियों से पूछताछ कराई तो उन्होंने पूर्ववत् ही उत्तर दिया। अन्त में रेज़िडेंट मेवाड़ की तरफ़ से रघुनाथसिंह को भूतपूर्व महारावत का दत्तक स्वीकार करने की मंज़ूरी होने की बाबत सदर में रिपोर्ट की, तब महाराणियों की इच्छानुसार अंग्रेज़ सरकार ने उस (रघुनाथसिंह) की गद्दीनशीनी को स्वीकार कर प्रतापगढ़ सूचना दी। इसपर महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १९४७ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १८६० ता० ४ मई) को तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड लैंसडौन के पास महारावत उदयसिंह के परलोकवास होने और अपनी गद्दीनशीनी का खरीता भेजा। राज्यारोहण के समय महारावत की आयु ३१ वर्ष की थी और वह स्वयं समझदार था तथा उसके कार्यकर्ता अनुभवी थे। इसलिए उस समय रीजेंसी कौंसिल निर्माण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और मुख्य-मुख्य कार्यों में बांसवाड़ा एवं प्रतापगढ़ के असिस्टैंट पोलिटिकल एजेंट का परामर्श लेना निश्चित होकर बाक़ी सारा कार्य पूर्ववत् महारावत की आज्ञानुसार चलता रहा। वि० सं० १९४७ पौष वदि ३० (ई० स० १८६१ ता० १० जनवरी) को महारावत के लिए गद्दीनशीनी के सम्बन्ध में उपर्युक्त वाइसरॉय का [हाशिया: अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से] खरीता और अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से गद्दीनशीनी [हाशिया: गद्दीनशीनी की ख़िलअत] की ख़िलअत लेकर राजपूताने का एजेंट गवर्नर [हाशिया: पहुंचना] जनरल कर्नल ट्रेवर प्रतापगढ़ गया और उसने एक बड़े दरबार में महारावत को गद्दीनशीनी की ख़िलअत देकर वाइसरॉय का ई० स० १८६० ता० २२ दिसम्बर (वि० सं० १९४७ मार्गशीर्ष सुदि ११) का खरीता पढ़कर सुनाया, जो नीचे लिखे अनुसार है— "मेरे मित्र, आपका ई० स० १८६० ता० ४ मई का लिखा हुआ कृपापत्र, जिसमें महारावत उदयसिंह के देहांत का समाचार था, मुझको मिला। इस ख़बर के सुनने से मुझे बड़ा शोक हुआ। यह लिखकर अब मैं आपको सूचित करता हूं कि मैंने आपकी गद्दीनशीनी को स्वीकृत
३१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया है। विश्वास है कि आपकी हुकूमत का युग दीर्घकाल तक उन्नति- शील बना रहेगा। आप मेरी मित्रता का पूरा भरोसा रखें। प्रत्येक समय मेरे राजपूताने के एजेंट तथा बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के असिस्टेंट पोलि- टिकल एजेंट आपका पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे। मैं आपके उत्तम स्वभाव और योग्यता की बात सुन चुका हूं, इसलिए मैं राज्याभिषेकोत्सव के दिन से ही आपको शासन के पूरे अधिकार सौंपता हूं। विश्वास है कि आप हर कार्य में शुभ अनुष्ठान करते हुए अपने को योग्य शासक सिद्ध करेंगे।" मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य की सीमा पर सीतामाता नामक पवित्र और प्राचीन स्थान है। महारावत उदयसिंह के पिछले समय में उसके लिए एक नया विवाद खड़ा हो गया और उक्त [सीमा संबंधी झगड़े तय] स्थान को मेवाड़ राज्य अपनी सीमा में तथा प्रता- [होना] पगढ़ राज्य अपनी हद के अन्दर बतलाने लगा। कप्तान पिन्हे (असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ राज्य) झगड़े के फ़ैसले के लिए नियत हुआ। उभय पक्ष की तरफ़ से उक्त स्थान अपने-अपने राज्य में होने के कई प्रमाण पेश किये गये और वहां अपना स्वत्व जमाने की दोनों तरफ़ से चेष्टाएं की गईं; परंतु उक्त कप्तान ने ई० स० १८७८ (वि० सं० १९३५) में प्रतापगढ़ राज्य के मोतमिद शाह रतनलाल-द्वारा पेश किये गये एक पत्र के आधार पर, जो पोलिटिकल एजेंट मेवाड़ की ओर से महाराणा सज्जनसिंह के उधर आगमन के अवसर पर सरबराह के प्रबंध के लिए लिखा गया था, वह स्थान प्रतापगढ़ राज्य के अन्तर्गत होना मानकर ई० स० १८९१ ता० २५ जून (वि० सं० १९४८ आषाढ वदि ४) को अपना फैसला दिया। उसी समय मेवाड़ राज्य और प्रतापगढ़ राज्य के बीच के सीमा सम्बन्धी और भी कुछ फ़ैसले हुए, जिससे दोनों राज्यों के बीच का सीमा सम्बन्धी विवाद मिट गया। उन्हीं दिनों महारावत ने मथुरा के नागर ब्राह्मण पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या को, जो उदयपुर में महन्द्राज सभा का सेक्रेटरी तथा