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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय सीसोदियों से पूर्व के राजवंश

प्रतापगढ़ राज्य की गणना पहले मालवा के अन्तर्गत होती थी,
इसलिए वहां पर पहले मौर्य, मालव, क्षत्रप, गुप्त और हूणों का राज्य रहना
संभव है। अनन्तर प्रतापी राजा यशोधर्मन् और बैसवंशी राजा श्रीहर्ष ने
क्रमशः मालवे पर अधिकार कर लिया तब प्रतापगढ़ राज्य भी उनके अधि-
कार में चला गया होगा, किन्तु अब तक प्रतापगढ़ राज्य से उनका कोई
शिलालेख, ताम्रपत्र या सिक्का नहीं मिला है¹। श्रीहर्ष की मृत्यु के पीछे
कन्नौज के महाराज्य में अव्यवस्था फैल गई। ऐसे समय में भीनमाल के
रघुवंशी प्रतिहारों ने बढ़कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उस समय
मालवा भी प्रतिहारों के अधिकार में चला गया और वे वहां के स्वामी हुए।
प्रतापगढ़ राज्य के घोटार्सों (घोंटवार्षिका) नामक गांव के वि० सं० १००३
(ई० स० ९४६) के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरा) के समय के
शिलालेख से वहां रघुवंशी प्रतिहार नरेशों का राज्य रहना निश्चित है²।
इसलिए यहां पर उनका उल्लेख करना आवश्यक है।
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(१) उपर्युक्त वंशों के इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास;
जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ६८-१६२।
(२) राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर की ई० स० १९१५-१६ की वार्षिक रिपोर्ट;
पृ० २। यह शिलालेख राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है। मैंने इसका
'एपिग्राफ़िया इंडिका' (जि० १४ पृ० १७६-८८) में संपादन किया है। प्रतापगढ़ राज्य
से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री में वहां के प्राचीन इतिहास के लिए यह बड़ा उपयोगी है
एवं रघुवंशी प्रतिहारों का राजपूताने में राज्य होने का समुचित प्रमाण है।

३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास रघुवंशी प्रतिहार 'प्रतिहार' नाम वंशकर्त्ता के नाम से चला हुआ नहीं, किन्तु राज्या- धिकार के पद से बना हुआ शब्द है। राज्य के भिन्न-भिन्न अधिकारियों में एक अधिकारी प्रतिहार होता था, जिसका काम राजा के बैठने के स्थान या रहने के महल के द्वार (ड्योढ़ी) पर रहकर उसकी रक्षा करना था। इस पद के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं किया जाता था, प्रत्युत राजा के विश्वसनीय पुरुष ही इस पद पर नियत होते थे। इसी से प्राचीन शिलालेखादि में ब्राह्मण¹, गुर्जर² (गूजर), ( १ ) विप्रः श्रीहरिचन्द्राख्य ऽ पत्नी भद्रा च क्षत्(त्रि)या ।... तेन श्रीहरिचन्द्रेण परिणीता द्विजात्मजा । द्वितीया क्षत्(त्रि)या भद्रा महाकुलगुणान्विता ॥ प्रतीहारा द्विजा भूता ब्राह्मण्यां येभवन्सुताः । राज्ञी भद्रा च यान्सूते ते भूता मधुपायिनः ॥****** नन्दावल्लं प्रहत्वा रिपुबलमतुलं भूभ्रकूपप्रयातं दृष्ट्वा भग्नां(न्) स्वपक्षां(न्) द्विजनृपकुलजां(न्) सत्प्रतीहारभूपां(न्) मंडोर के राजा बाउक की वि० सं० ८६४ ( ई० स० ८३७ ) की प्रशस्ति । मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १४-५, १६६ । ( २ )***परमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीक्षितिपालदेवपादानु- ध्यातपरमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीविजयपालदेवपादानामभिप्रव- र्द्धमानकल्याणविजयराज्ये संवत्सरशतेषु दशसु षोडशोत्तरकेषु माघमास- सितपक्षत्रयोदश्यां शनियुक्तायामेवं सं० १०१६ माघसुदि १३ शनावद्य श्रीराज्यपुरावस्थितो महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीमथनदेवो महाराजाधिराज- श्रीसावटसूनुर्गूज्जरप्रतिहारान्वयः कुशली । राजोरगढ़ (अलवर राज्य) से मिला हुआ गूजर प्रतिहारों का शिलालेख । एपिग्राफ़िया इंडिका; जि० ३, पृ० २६६ । नागरी प्रचारिणी पत्रिका; जिल्द ६ (वि० सं० १६८५), पृ० ३१६-७ । महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसाद (जयपुर); प्राचीन लेखमाला (प्रथम भाग); पृ० ५३-५।

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३१ चावड़े¹, परमार², रघुवंशी³ आदि प्रतिहारों के उदाहरण मिलते हैं। विक्रम की आठवीं शताब्दी से रघुवंशी-प्रतिहारों का उत्कर्ष होने लगा और वे बड़े पराक्रम- (१) द्योणिकल्पतरुः समीकसुभ(ग)श्चापोत्कटग्रामणीः योगीन्द्रो नवचंद्रनिर्मलगुणः स्फूर्जत्कलानैपुणः ॥ श्रीचौलुक्यनरेन्द्रवेत्रितिलकः श्रीसोमराजः स्वयं विद्वन्मण्डलमंडनाय तनुते संगीतरत्नावलीम् ॥ ५ ॥ संगीत रत्नावली; ना० प्र० प०, जि० ६, पृ० ३१६ । (२) श्रीमदुत्पलराजादिवंशे प्रामारभूभुजां । अस्ति त्रैलोक्यविख्यातो धारावर्षो महीपतिः ॥ २ ॥ द्वास्थः तस्याभवत् पूर्वं वीरो वारडवंशजः । नरपा[लस]मुद्भूतो हरिपाल इति श्रुतः ॥ ३ ॥ पुत्रस्तस्यास्ति विख्यातो भुवने लब्धविक्रमः । श्रीमत्साहणपालाह्वः वैरिवर्गक्षयंकरः ॥ ४ ॥...... संवत् १२६४ वर्षे चैत्र शुदि १३ गुरौ । म० जालाकप्रेरितेन स्वश्रेयोर्थं प्रती० साहणपालेन देवश्रीवैद्यनाथस्य मंडपः कारितः ॥...। ईडर राज्य के वढाली गांव के वैद्यनाथ शिवालय की प्रशस्ति । पुरातत्व (गुजराती, अहमदाबाद); जि० ४, पृ० २८१ । 'वारड' परमारों की एक शाखा का नाम है और दांता के राणा 'वारड' शाखा के परमार हैं । (३) मन्विद्वाकुकुकुस्थ(त्स्थ)मूलपृथवः दमापालकल्पद्रुमाः ॥ २ ॥ तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रेषु घोरं रामः पौलस्त्यहिन्श्रं (हिंस्रं) क्षतविहितसमित्कर्म्म चक्रे पलाशैः । श्लाघ्यस्तस्यानुजोसौ मघवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये सौमित्रिस्तीव्रदण्डः प्रतिहरणविधेर्य्यः प्रतीहार आसीत् ॥३॥ कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के समय की ग्वालियर की प्रशस्ति । ऐन्युअल रिपोर्ट ऑव् दि आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑव् इण्डिया, ई० स० १६०३-४; पृ० २८० । नागरी प्रचारिणी पत्रिका (नवीन संस्करण); भाग ६, पृ० ३१७ । मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ ।

३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शाली हो गये। तदनन्तर उन्होंने चावड़ों से भीनमाल का राज्य छीन लिया और फिर कन्नौज के महाराज्य को अपने हस्तगत कर वहीं अपनी राजधानी स्थिर की । ग्वालियर से मिले हुए रघुवंशी प्रतिहार राजा भोजदेव (प्रथम) के शिलालेख में, जो वि० सं० ६०० और ६५० (ई० स० ८४३ और ८६३) के बीच का है, लिखा है—"सूर्य-वंश में मनु, इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ आदि राजा हुए। उनके वंश में रावण का संहार करनेवाले रामचन्द्र हुए, जिनका प्रतिहार (ड्योढ़ीवान) उनका छोटा भाई लक्ष्मण था¹।" इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण को प्रतिहार का कार्य मिलने से उसके वंशज प्रतिहार कहलाने लगे। उक्त भोजदेव के पुत्र महेन्द्रपाल (दूसरा) की प्रशंसा में कवि राजशेखर ने अपने ग्रंथों में उसे 'रघुकुलतिलक²', 'रघुग्रामणी³' और 'रघुवंशमुक्तामणि⁴' लिखा है, जिससे सिद्ध है कि वे रघुवंशी थे। इस राजवंश की क्रम-पूर्वक वंशावली नागभट्ट से आरंभ होती है, जो नीचे लिखे अनुसार है— (१) नागभट्ट। (२) ककुत्स्थ (संख्या १ का भतीजा)। (३) देवराज (संख्या २ का छोटा भाई)। (४) वत्सराज (संख्या ३ का पुत्र)। (५) नागभट्ट (दूसरा, संख्या ४ का पुत्र)—उसको नागावलोक भी कहते थे। उसने चक्रायुध को परास्त कर कन्नौज का साम्राज्य भी (१) देखो ऊपर पृ० ३१, टिप्पण ३। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ टि० २। (२) रघुकुलतिलको महेंद्रपालः...। विद्धशाल भंजिका; १।६। (३) देवो यस्य महेंद्रपालनृपतिः शिष्यो रघुग्रामणिः....। बालभारत; १।११। (४) तेन(= श्रीमहीपालदेवेन) च रघुवंशमुक्तामणिना आर्यावर्त- महाराजाधिराजेन श्रीनिर्भयनरेन्द्रनंदनेनाधिकृताः सभासदः...। बालभारत।

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३३ छीन लिया। उस समय से ही इन भीनमाल के प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज स्थिर हुई। उसने आंध्र, सैंधव, विदर्भ (बरार), कलिंग और बंग के राजाओं को जीता तथा आनर्त, मालव, किरात, तुरुष्क, वत्स और मत्स्य आदि देशों के पहाड़ी क़िले भी ले लिये, ऐसा उपर्युक्त ग्वालियर की प्रशस्ति में लिखा मिलता है। राजपूताने में जिस नाहड़राव पड़िहार का नाम बहुत प्रसिद्ध है और जिसके विषय में पुष्कर में घाट बनवाने की ख्याति चली आती है, वह यही नागभट्ट (नाहड़) होना चाहिये। उसके समय का एक शिलालेख वि० सं० ८७२ (ई० स० ८१५) का बुचकला (जोधपुर राज्य के बिलाड़ा परगने में) से मिला है¹। नागभट्ट का स्वर्गवास वि० सं० ८६० भाद्रपद सुदि ५ (ई० स० ८३३ ता० २३ अगस्त) को हुआ², ऐसा जैन विद्वान् चन्द्रप्रभसूरि ने अपने 'प्रभावकचरित' में लिखा है। (६) रामभद्र (संख्या ५ का पुत्र)। (१) ॰॰॰॰॰॰॰॰संवत्सरशते ८७२ चैत्रस्य सितपक्षस्य पंचम्यां निवेसि(शि)ता महाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीवत्सराजदेवपादानुध्यात- परमभट्टारकमहाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीनागभट्टदेवस्वविषये प्रवर्द्ध- मानराज्ये राज्यघङ्ककडूग्रामे राज्ञी जायावली प्रतिहार स्व(स)गोत्रश्रीबपुक- पुत्रः॰॰॰॰॰। एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० ६, पृ० १६६-२००। (२) विक्रमतो वर्षाणां शताष्टके सनवतौ च भाद्रपदे। शुक्रे सितपंचम्यां चन्द्रे चित्राख्यऋक्षस्थे ॥ ७२० ॥ ... माभूत्संवत्सरोऽसौ वसुशतनवतेर्मा च ऋक्षेषु चित्रा धिग्मासं तं नभस्यं द्वयमपि स खलः शुक्लपक्षोपि यातु। संक्रान्तिर्या च सिंहे विशतु हुतभुजं पंचमी यातु शुक्रे गंगातोयाग्निमध्ये त्रिदिवमुपगतो यत्र नागावलोकः ॥७२५॥ 'प्रभावकचरित' में बप्पभट्टिप्रबंध; पृ० १७७। नागरी प्रचारिणी पत्रिका; भाग ६, पृ० ३२३-२४ टि०। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १८०। ५

(७) भोजदेव (संख्या ६ का पुत्र)—उसको मिहिर और आदि- वराह भी कहते थे। ताम्रपत्र और शिलालेखों के अतिरिक्त उसके चांदी तथा तांबे के सिक्के भी मिले हैं, जिनमें एक तरफ़ 'श्रीमदादिवराह' लेख और दूसरी तरफ़ 'नरवराह' की मूर्ति है। उसके दो तांबे के सिक्के प्रतापगढ़ राज्य से भी हमें मिले हैं। (८) महेंद्रपाल (संख्या ७ का पुत्र)। (६) महीपाल (संख्या ८ का पुत्र)। (१०) भोज (दूसरा, संख्या ६ का भाई)। (११) विनायकपाल (संख्या १० का छोटा भाई)। (१२) महेंद्रपाल (दूसरा, संख्या ११ का पुत्र)—उसके समय के उक्त घोटार्सी के वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ९४६ ता० १७ अक्टूबर) के शिलालेख से प्रकट है कि घोटार्सी के आस-पास का प्रदेश प्रतिहारों के सामन्त चौहानों के अधिकार में था। चौहान इंद्रराज ने, जो गोविंदराज का पुत्र और दुर्लभराज का पौत्र था, घोटार्सी गांव में अपने नाम से 'इंद्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य-मंदिर बनवाया। तब उसके लिए महेंद्रपाल की तरफ़ से 'धारापद्रक' (धरियावद, मेवाड़) नामक गांव तथा उस गांव से पृथक् उत्तर की ओर का कच्छुक नाम का रहँट भेंट किया गया। उसकी सनद पर उस(महेंद्रपाल)के तंत्रपाल (शासक, हाकिम), महासामंत और महादंडनायक माधव ने, जो दामोदर का पुत्र था तथा कार्यवशात् उज्जैन गया था, हस्ताक्षर किये थे। इसी भांति उसपर उस प्रदेश के शासक विदग्ध के भी हस्ताक्षर हुए थे¹। (१) स्वस्ति श्रीमदुज्जयन्त्या(यिन्यां) महासामन्तदण्डनायकश्री- माधवः ॥ तथा मण्डपिकायां परमेश्वरपादोपजीविब(व)लाधी(धि)- कृतश्रीकोक्कटनियुक्तश्रीशम्मे(शर्मणि)च व्यापारं कुर्व्वते इत्यस्मिन् काले वर्तमाने इहैव श्रीमदुज्जयन्त्यां(यिन्यां) कार्याभ्यागततंत्र- (न्त्र)पालमहासामन्तमहादण्डनायकश्रीमाधवेन (धवैः) श्रीदामोदरसुतेन-

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३५ 'इन्द्रराजादित्यदेव' के मंदिर के साथ लगे हुए या उससे सम्बन्ध रखने- वाले 'वटयक्षिणी देवी' के मंदिर और मठ के लिए भी महेंद्रपाल ने वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० १७ आक्टोबर) को 'खर्प्परपद्रक' (खेरोट, प्रतापगढ़ राज्य) गांव भेंट किया था, जिसकी सनद पर भी उक्त विदग्ध ने हस्ताक्षर किये थे¹। इस 'इंद्राजादित्यदेव' के मंदिर को मेवाड़ (तः) चाहमानान्वयमहा सामन्तश्रीइन्द्रराज(स्य) श्रीदुर्ल्लभराजसुतस्य प्रार्थनया(या)। श्रीविदग्धभोगावाप्तये धारापद्रकग्रामे समुपगतान् सर्व्वराजपुरुषान् ब्रा(ब्रा)ह्मणोत्तरीयान् प्रतिनिवासि(सि)जनपदांश्च वो(बो)धयत्यस्तु वस्संविदितं श्रीमहाकालदेवयतने सुस्नात्वा महादेव- मभ्यर्च्य मातापित्रोरात्मनश्च सुपुण्यकर्म्मयशोभिवृद्धये परलोकहिताय जलचन्द्रचपलजीवितंतेय(लं जीवितमवेत्य) क्षणदृष्टसंपदा(नष्टाः संपदः) समन(समनु)चिन्त्य(चिन्त्य) मीनसंक्रन्तौ(संक्रान्तौ) श्रीनित्यप्रमुदितदेवप्रति[बद्ध]घोंटार्षिकस्थाने श्रीमदिन्द्रादित्यदेवस्य खण्डस्फुटितसमारचनाय व(ब)लिचरुशत्रु(सत्र)प्रवर्त्तनाय ग्रामोयं स्वसीमापर्यन्त(न्तः) सवृक्षमाला[कु]लं(लः) सकाष्ट(ष्ठ)- तृणगोप्रचारं(रः) सजलस्थलसमेतं(तः) चतुष्कंकट(ष्कंटक)- विशुद्ध(द्धः) भागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिस्कंधकमा[र्गा]णाकादि- राजभाव्यैस्सहितं(तः) उदकपूर्वेकेन शासनेन प्रदत्तं(त्तः)॥ मत्वैतदस्मद्वङ्ग्श(द्वंश)जैरन्यैश्च धर्म्ममिदमनुपालनीयं(धर्म्मोयममुपाल- यः)। प्रतिनिवासी(सि)जनपदैश्चाज्ञाश्रवणविधेयैर्भूत्वा यथा दीयमानं च दातव्यं॥ अपरं[चै]तस्मिन्नेव ग्रामे उत्तरतो[दिग्भा]गे साधारं कच्छ[क] नाम अरहटेन तु संयुतं दत्तं। पुनः पत्रमण्डपकिटिकाः पञ्च(ञ्च) शासनेन प्रदत्ताः॥ स्वहस्तोयं श्रीमाधवस्य। स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य॥ एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८२-७। (१) देखो ऊपर पृष्ठ २३ टिप्पण १।

३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के स्वामी गुहिलवंशी खुम्माण (तृतीय) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट, द्वितीय) ने भी वि० सं० ९९९ श्रावण सुदि १ (ई० सं० ९४२ ता० १७ जुलाई) को पलासकूपिका (पलासिया, मंदसोर से १५ मील दक्षिण में) गांव और वंच्वूलिका नाम का कच्छ (काछा = तर भूमि) भेंट किया था¹। इसी प्रकार चामुंडराज के पुत्र देवराज ने 'इंद्रराजादित्यदेव' के मंदिर को 'कोसवाह' (चड़स से पिलाये जानेवाला) 'छित्तुलाक' नामक क्षेत्र, जिसमें दस माणी अन्न बोया जाता था, भेंट किया था²। (१३) देवपाल (संख्या ६ का पुत्र)। (१४) विजयपाल (संख्या १३ का भाई)। (१५) राज्यपाल (संख्या १४ का भाई)—उसके समय में इन रघुवंशी प्रतिहारों का राज्य अत्यंत निर्बल हो गया। ऐसे समय में हि० स० ४०६ ता० ८ शावान (वि० सं० १०७५ मार्गशीर्ष सुदि १० = ई० स० १०१८ ता० २१ नवम्बर) को सुलतान महमूद ग़ज़नवी ने कन्नौज पर चढ़ाई कर दी, जिसमें उस(राज्यपाल)की हार हुई और वह भाग गया। फिर उसने सुलतान की अधीनता स्वीकार कर संधि कर ली। सुलतान के भारत से लौट जाने के पीछे वि० सं० १०७८ (ई० स० १०२१) में उस(राज्यपाल)- पर कालिंजर के राजा गंड की चढ़ाई हुई, जिसमें वह (राज्यपाल) मारा गया। (१६) त्रिलोचनपाल (संख्या १५ का उत्तराधिकारी)। (१७) यशपाल (?)-उसके समय का वि० सं० १०६३ (ई० स० १०३६) का शिलालेख मिला है। राज्यपाल के समय से ही कन्नौज के (१) देखो ऊपर पृ० २२ टिप्पण संख्या १। (२) ॰॰॰॰॰॰श्रीदेवराजेन श्रीचामुण्डराजसुतः(सुतेन) श्रीमदिन्द्रा- दित्यदेवस्य कोसवाहे छित्तुल्लाकक्षेत्रं माणीवाप १० शासनेन प्रदत्तं। श्रीमदिन्द्रादित्यदेवजगत्यां। त्रैलोक्यमोहनदेवस्य श्रीमदिन्द्राजेन उंडि त्राकक्षेत्रं [अस्य] आघाटा लिख्यंते ॰॰॰॰॰॰॰॰एवं चतुराघाटोपलक्षितं शासनेन प्रदत्तं। एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८७-१८८।

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३७ प्रतिहार राज्य में निर्बलता आ गई थी, जिसका लाभ उठाकर उसके समय में 'बदायूं' के राष्ट्रकूट (राठोड़) राजाओं में से (जो उन दिनों उधर शक्तिशाली होते जाते थे) भुवनपाल के पुत्र गोपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया, परंतु गोपाल के वंश का वहां अधिक समय तक अधिकार रहना पाया नहीं जाता । शीघ्र ही गाहड़वाल चन्द्रदेव ने, जिसने सारे पांचाल (गंगा और यमुना के बीच का प्रदेश) पर अधिकार जमा लिया था, उधर बढ़- कर कन्नौज के प्रतिहार-राज्य पर अधिकार कर लिया और वहां अपनी राजधानी स्थिर की। इस प्रकार प्रतिहारों के महाराज्य का अन्त हो गया। इन प्रतिहारों के राज्य के उन्नतिकाल में अधिकांश राजपूताना, मालवा, गुजरात, काठियावाड़, सारा पश्चिमोत्तर प्रदेश एवं बिहार का पश्चिमी विभाग भी उनके अधीन था, जहां से उनके शिलालेख, ताम्रपत्र आदि मिलते हैं । फिर उनके राज्य की अवनति के समय उनके सामन्त स्वतंत्र हो गये। अब तो कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहारों के वंश में केवल बुंदेलखंड में नागोद का राज्य एवं अलिपुरा का ठिकाना तथा कुछ और छोटे-छोटे ठिकाने रह गये हैं । भाटों की पुस्तकों में नागोद के राजाओं की जो वंशावली मिलती है, उसमें सब पुराने नाम कृत्रिम हैं। परमार तथा सोलंकी कन्नौज के प्रतिहार-राज्य का पतन होने पर मालवे के परमार, जो संभवतः प्रतिहारों के सामंत थे, स्वाधीन नृपति बन गये । उनमें श्रीहर्ष, मुंज, सिंधुराज, भोज, उदयादित्य आदि प्रतापी और विद्वान् राजा हुए। अनन्तर उदयादित्य के पुत्र नरवर्मा और पौत्र यशोवर्मा के समय गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की मालवे पर चढ़ाइयां होने लगीं। नरवर्मा तो सोलंकियों के साथ की लड़ाई में मारा गया, पर यशो- वर्मा के समय परमार पराजित हो गये और मालवे पर सोलंकियों का अधिकार हो गया संभव है कि मालवे के कुछ भूमि-भाग पर सोलंकियों के समय भी परमारों ने किसी प्रकार अपना अधिकार रक्खा हो,

३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास क्योंकि उस समय भी मालवे में परमारों के ठिकाने थे¹ । सिद्धराज जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के समय तक सोलंकियों का प्रताप बढ़ता रहा। वि० सं० १२३० (ई० स० ११७३) के लगभग कुमारपाल का देहांत हो जाने पर गुजरात के प्रतापी सोलंकी राज्य की भी अवनति होने लगी और उसके सामंत स्वतंत्र हो गये । कुमारपाल के उत्तराधिकारी अजयपाल और उसके द्वितीय पुत्र भीमदेव (दूसरा, भोला भीम) के समय तो परमार पुनः इतने बलवान हो गये थे कि उन्होंने सोलंकियों को मालवे से निकालने की ठान ली। फलतः उपर्युक्त यशोवर्मा के पौत्र विंध्यवर्मा के समय परमारों और सोलंकियों के बीच युद्ध छिड़- गया, परंतु विंध्यवर्मा को इसमें सफलता नहीं हुई । विंध्यवर्मा की मृत्यु होने पर उसके पुत्र सुभटवर्मा ने गुजरातवालों से युद्ध जारी रखा । उसके समय में मालवे के परमार पुनः स्वतंत्र हो गये और उन्होंने वहां से सोलं- कियों का अधिकार बिलकुल उठा दिया² । विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हो गया और फिर उनके मालवे पर आक्रमण होने लगे, परंतु उनका वहां स्थिर रूप से अधिकार नहीं हुआ । मालवे में इस (परमार) वंश का अंतिम राजा जयसिंह (चतुर्थ) हुआ, जिसके दो शिलालेख वि० सं० १३२६ और १३६६ (ई० स० १२६६ और १३०६) के मिले हैं, जिनसे निश्चित है कि उस समय तक मालवे में उनका थोड़ा बहुत राज्य अवश्य था। अनन्तर सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवे पर आक्रमण कर वहां पर अधिकार कर लिया । तब से मालवे का मुख्य राज्य परमारों के हाथ से निकल गया, परंतु वहां ऊमटवाड़े का इलाक़ा अब भी परमारों की अधीनता में चला आता है एवं नरसिंहगढ़ तथा राजगढ़ दो राज्य वहां परमारों के विद्यमान हैं। मरहटों के समय में (१) परमारों के विस्तृत वर्णन के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १६०-२३८ । (२) सोलंकियों के विशद इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; ज़िल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० २३८-२६१ ।

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३६ पेशवाओं ने अपने सेनापति ऊदाजी पंवार को मालवे का कुछ इलाक़ा जागीर में दिया, जिसका मालवे के परमारों की मुख्य शाखा में होना प्रसिद्ध है। उसके वंश में अब धार और देवास के राज्य हैं। परमारों और सोलंकियों के अभ्युदय के समय वागड़, मेवाड़ और सुप्रसिद्ध चित्तौड़ दुर्ग पर उनका अधिकार होना निश्चित है । इस अवस्था में प्रतापगढ़ राज्य का—जो मालवा, वागड़ और मेवाड़ की सीमा के किनारे पर स्थित है—परमारों और सोलंकियों के अधिकार से मुक्त रहना असंभव है, परन्तु प्रतापगढ़ राज्य से परमारों और सोलंकियों के शिलालेख, दानपत्र, सिक्के आदि कुछ भी नहीं मिले हैं। अतएव यहां परमारों और सोलंकियों के शासनकाल के इतिहास पर प्रकाश डालना अनावश्यक है। ग्वालियर राज्य के नीमच ज़िले के जीरण क़सबे में देवलिया-प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी महारावत भानुसिंह(भाना) की स्मारक छत्री बनी हुई है, उसके स्तंभों पर गुहिलवंशी विग्रहपाल के वि० सं० १०५३, १०६५ और १०६६ के चार लेख खुदे हुए हैं, जिनमें उसकी उपाधि 'महासामंताधिपति' लिखी है और उसका नागह्रद (नागदा) से निकलना पाया जाता है। इससे विदित होता है कि उस समय वहां मेवाड़ के गुहिलवंशियों का अधिकार था और संभव है कि देवलिया (प्रतापगढ़) के आस-पास उनका अधिकार रहा हो एवं वहां के गुहिलवंशी परमारों के सामंत हों। जीरण से ही मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के राज्य-काल का वि० सं० १६१७ आषाढ वदि ११ (ई० स० १५६० ता० १६ जून) का लेख मिला है, जिसमें आल्हण की स्त्री-द्वारा एक मन्दिर के जीर्णोद्धार कराये जाने का उल्लेख है। मुसलमान शासक मालवे पर सबसे पहले दिल्ली के सुलतान शम्सुद्दीन अल्तमश ने हि० स० ६२४ (वि० सं० १२८३ = ई० स० १२२६) में चढ़ाई की थी।

⁠'४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तदनन्तर नासिरुद्दीन मुहम्मदशाह के समय उज्जैन, भेलसा आदि नगर मुसलमानों ने विजय किये, किन्तु मालवे पर उस समय उनका अधिकार स्थिर रूप से जमना पाया नहीं जाता। गुलाम वंश का अन्त होने पर दिल्ली के सिंहासन पर खिलजी-वंशियों का, अधिकार हुआ। तब हि० स० ६६० (वि० सं० १३४८ = ई० स० १२६१) में उक्त वंश के प्रथम सुलतान जलालुद्दीन फ़ीरोज़शाह खिलजी ने आक्रमण कर मालवे के कुछ प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। हि० स० ७०४ (वि० सं० १३६१ = ई० स० १३०४) में सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने सेना भेजकर मालवे का पूर्वी भाग भी ले लिया। फिर उक्त सुलतान ने विजित प्रदेश के प्रबंध के लिए मांडू, उज्जैन और धार में अपने हाकिम नियत किये। 'मिरात-इ- सिकंदरी' से पाया जाता है कि सुलतान मुहम्मद तुग़लक़ ने हि० स० ७४४ (वि० सं० १४०० = ई० स० १३४३) के आस-पास मालवे का सारा इलाक़ा अज़ीज़ हिमार को सौंप दिया था, जो पहले धार का ही हाकिम था। फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ के तीसरे पुत्र मुहम्मदशाह तुग़लक़ (वि० सं० १४४६-५० = ई० स० १३८६-६४) के समय दिलावरखां (दिलावरशाह गोरी, जिसका नाम अभीशाह भी लिखा मिलता है) मालवे का हाकिम नियत हुआ, जो दिल्ली के सुलतानों की अधीनता में वहां का शासन-प्रबंध करता था। महमूदशाह तुग़लक़ के समय तुग़लक़-वंश का प्रभाव घट जाने पर दिलावरखां ने वि० सं०१४५८(ई० स० १४०१) के लगभग स्वतंत्र होकर अपने को मालवे का सुलतान घोषित किया। उस (दिलावरखां) के पीछे होशंग (अल्पखां) और मुहम्मद (गज़नीखां) गोरी मालवे के सुलतान हुए। फिर खिलजी-वंश का महमूदशाह वहां का सुलतान हुआ, जो होशंग का एक सरदार था। महमूदशाह मेवाड़ के महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) का समकालीन था। उन्हीं दिनों महाराणा कुंभकर्ण से विरोध हो जाने के कारण उसका छोटा भाई क्षेमकर्ण, जो प्रतापगढ़वालों का पूर्वज था, सुलतान महमूद के पास चला गया और उक्त महाराणा की मृत्यु पर्यन्त

सीसोदियों के पूर्व के राजवंश ४१ वहीं रहा। वि० सं० १५३२ (ई० स० १४७५) में महमूदशाह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गयासशाह (गयासुद्दीन) मालवे का सुलतान हुआ। प्रतापगढ़ राज्य में देवलिया के पास गयासपुर नामक प्राचीन गांव है, जिसका गयासशाह के नाम पर बसाया जाना पाया जाता है। उस समय गयासपुर सम्पन्न था और देवलिया परगने का मुख्य स्थान था, जिससे देवलिया परगना पहले गयासपुर का परगना कहलाता था। प्रतापगढ़ राज्य के अरणोद ठिकाने के निकट गौतमेश्वर नामक शिवालय है। वहां के वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ (ई० स० १५०५ ता० १ जून) के शिलालेख से प्रकट है कि उस समय वहां सुलतान नासिरशाह का आधि- पत्य था और खानआलम मक़बलखां वहां का शासक था। उसी समय के आस-पास उपर्युक्त क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल ने मेवाड़ से जाकर देवलिया (प्रतापगढ़) राज्य की नींव डाली। नासिरशाह के पीछे उसका पुत्र महमूदशाह (दूसरा) खिलजी वि० सं० १५६८ (ई० स० १५११) में मालवे का स्वामी हुआ। उस (मह- मूदशाह) को हि० स० ६३७ (वि० सं० १५८७ = ई० स० १५३०) में गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने पकड़कर मालवे को गुजरात-राज्य में मिला लिया, किन्तु वह (बहादुरशाह) स्थिरतापूर्वक मालवे को अपने अधिकार में न रख सका और हि० स० ६४१ (वि० सं० १५६१ = ई० स० १५३४) में दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं से हारकर मालवा तथा गुजरात के राज्यों को खो बैठा एवं स्वयं दीव के बंदरगाह से लौटता हुआ मारा गया। बहादुरशाह को परास्तकर बादशाह हुमायूं ने मालवा अपने अधि- कार में कर लिया। इतने में बंगाल में शेरशाह सूर का उपद्रव खड़ा होने की ख़बर सुनकर वह उधर रवाना हुआ, परंतु शेरशाह से उसकी हार हुई। यह खबर जब मालवे में पहुंची तो मल्लूखां, जो खिलजियों का गुलाम था, हुमायूं के सरदारों को निकालकर सुलतान क़ादिर के नाम से वि० सं० १५६२ (ई० स० १५३५) में वहां का स्वामी हो गया। शेरशाह ने दिल्ली ६

४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास का स्वामी होने के पीछे हि० स० ९४६ ( वि० सं० १५६६ = ई० स० १५४२) में उस (कादिर) को परास्तकर मालवे को पुनः दिल्ली की अमलदारी में दाख़िल किया और शुजाखां को वहां का प्रबंधकर्ता बनाया। सूरवंश के अंतिम सुलतान मुहम्मदशाह के समय दिल्ली के पठान सुलतानों की सत्ता निर्बल हो गई, तब शुजाखां भी मालवे का स्वतंत्र सुलतान बन गया और राजधानी मांडू को छोड़कर सारंगपुर में रहने लगा । फिर उस- (शुजाखां) के पुत्र बाज़बहादुर से वि० सं० १६१६ ( ई० स० १५६२) के लगभग बादशाह अकबर ने मालवा पीछा छीनकर मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। उन्हीं दिनों सूरजमल के प्रपौत्र विक्रमसिंह (बीका) ने मेवाड़ में अपनी सादड़ी की जागीर का, जो उसके पूर्वजों के पास चली आती थी, सदा के लिए परित्याग कर स्थिरतापूर्वक कांठल में ही सूरजमल-द्वारा संस्थापित नवराज्य को अपने आधिपत्य में रखते हुए वहां की स्थिति सुदृढ़ की।

तीसरा अध्याय महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह (बीका) तक प्रतापगढ़ के स्वामी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। गुहिलवंश की सीसोदिया शाखा के चित्तोड़ (मेवाड़) के राजवंश से उनका क्षेमकर्ण से पूर्व के निकास हुआ है, जिसका वर्णन हमने उदयपुर राज्य गुहिलवंशी नरेश के इतिहास में किया है। उनकी उपाधि 'महारावत' है। अन्य राजवंशों की भांति गुहिलवंश का विक्रम की सातवीं शताब्दी के पूर्व का इतिहास अंधकार में है और उसके बाद भी कुछ पीढ़ियों का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता, तो भी प्राचीन शोध से जो कुछ सामग्री प्राप्त हुई है, उसके आधार पर यह निश्चित है कि संसार के वर्तमान राजवंशों में यही एक राजवंश ऐसा है, जो अनुमान चौदह सौ वर्षों से एक ही स्थान पर राज्य करता चला आ रहा है। इसका विशेष परिचय उदयपुर राज्य के इतिहास में दिया गया है, तथापि इतिहास का क्रम मिलाने के लिए हम यहां पर गुहिलोत और सीसोदिया वंश का प्राचीन इतिहास संक्षेप में देते हैं, ताकि प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के पाठकों को उक्त राजवंश के प्राचीन इतिहास की श्रृंखला की कुछ-कुछ जानकारी हो जाय। गुहिलवंश का इतिहास गुहिल से प्रारंभ होता है। ई० स० १८६६ (वि० सं० १६२६) में मि० कार्लाइल को आगरे के समीप भूमि में गड़े हुए चांदी के २००० से अधिक सिक्के मिले, जिनपर 'श्रीगुहिल' लेख है। इससे अनुमान किया जाता है कि गुहिल का उधर भी राज्य होगा और उसके सिक्के दूर-दूर तक चलते होंगे। जयपुर राज्य के चाटसू गांव में गुहिलवंशी राजाओं का वि० सं० १००० के आस-पास का शिलालेख मिला है, जिससे

[Page Header] ४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

निश्चित है कि उधर भी उनका राज्य था। गुहिल के पांचवें वंशधर शीलादित्य (शील) का मेवाड़-राज्य के भोमट ज़िले के सामोली गांव से वि० सं० ७०३ (ई० स० ६४६) का शिलालेख तथा कुछ सिक्के और उसके उत्तराधिकारी अपराजित का एकलिंगजी के निकटवर्ती कुंडा गांव से वि० सं० ७१८ (ई० स० ६६१) का शिलालेख मिला है, जिससे सिद्ध होता है कि मेवाड़ के वर्तमान राजवंश के पूर्वपुरुष गुहिल (गोभिल, गोहिल, गुहदत्त, गुहादित्य) अथवा शील से पूर्व उसके किसी पूर्वज ने मेवाड़ की तरफ़ बढ़कर वहां अपना राज्य स्थिर किया हो। शील का क्रमानुयायी अपराजित शक्तिशाली राजा था। उपर्युक्त कुंडा के लेख से स्पष्ट है कि अपराजित ने सब दुष्टों का नाश किया और अनेक राजा उसके आगे सिर झुकाते थे। तदनंतर महेंद्र और फिर कालभोज हुआ, जो बापा या बापा रावल के नाम से प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध है कि बापा ने मौर्यों से चित्तौड़ का दुर्ग ले लिया था और दूर-दूर तक अपनी विजय-ध्वजा फहराई थी। वि० सं० ८१० (ई० स० ७५३) में बापा ने राज्य त्यागकर संन्यास ग्रहण किया। उसकी समाधि एकलिंगजी के पास विद्यमान है। बापा की राजधानी एकलिंगजी के निकट नागदा (नागह्रद) थी, जिसके नाम से गुहिलवंशी 'नागदे' भी कहलाते हैं। वहां जो मंदिरों आदि के ध्वंसावशेष विद्यमान हैं, उनसे पाया जाता है कि वह उस समय समृद्ध नगर था। कालभोज के पीछे खुंमाण, मत्तट, भर्तृभट्ट, सिंह, खुंमाण (दूसरा), महायक और भर्तृभट्ट (दूसरा) क्रमशः मेवाड़ के राजा हुए। प्रतापगढ़ से प्राप्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) की वि० सं० १००३ (ई० स० ९४६) की प्रशस्ति के एक अंश से पाया जाता है कि भर्तृभट्ट (दूसरा) ने वि० सं० ९९९ श्रावण सुदि १ (ई० स० ९४२ ता० १७ जुलाई) को घोंटवार्षिका (घोटार्सों) गांव के इंद्रराजादित्य नामक सूर्य-मंदिर को पलासकूपिका (पलासिया, मेवाड़) गांव का वंव्वलिका नामक क्षेत्र भेंट किया। इससे यह अनुमान होना स्वाभाविक है कि वर्तमान प्रतापगढ़ राज्य का निकटवर्ती प्रदेश भर्तृभट्ट के राज्यान्तर्गत रहा हो।

महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह (बीका) तक ४५

: भर्तृभट्ट (दूसरा) के पीछे अल्लट, नरवाहन और शालिवाहन नामक राजा हुए। शालिवाहन के वंशजों ने खेड़(मारवाड़ राज्य) की तरफ़ जाकर वहां अधिकार किया। वहां से काठियावाड़ की तरफ़ बढ़कर वहां उन्होंने धीरे-धीरे अपने वंशजों के लिए भावनगर, पालीताणा आदि गोहिल-राज्यों की स्थापना कर ली। शालिवाहन की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र शक्ति- कुमार मेवाड़ का स्वामी हुआ। उपर्युक्त भर्तृभट्ट (दूसरा) से शक्तिकुमार तक पांच राजाओं का राज्यकाल वि० सं० ९९६-१०३४ (ई० स० ६४२- ९७७) तक निश्चित है। उस( शक्तिकुमार) के समय राजधानी आघाटपुर (आहाड़, जो उदयपुर से १ १/२ मील दूर है) भी रही, जिसको मालवे के परमार राजा मुंज ने तोड़ा था। परमारों के इस आक्रमण से मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की स्थिति निर्बल हो गई और चित्तौड़ उनके अधिकार से चला गया। वहां मुंज के छोटे भाई सिंधुराज के पुत्र प्रसिद्ध विद्यानुरागी राजा भोज का बनवाया हुआ 'त्रिभुवन-नारायण' का मंदिर है, जिसको मोकलजी और अद्भुत (अद्बद्) जी का मंदिर भी कहते हैं। शक्ति- कुमार का क्रमानुयायी अंबाप्रसाद हुआ, जो सांभर के चौहान राजा वाक्पतिराज के हाथ से मारा गया। : तदनन्तर शुचिवर्मा, नरवर्मा, कीर्तिवर्मा, योगराज, बैरट, हंसपाल, वैरसिंह, विजयसिंह, अरिसिंह, चोड़सिंह, विक्रमसिंह और रणसिंह (कर्णसिंह) नामक राजा हुए। रणसिंह से इस राजवंश की दो शाखाएं फंटीं-एक रावल और दूसरी राणा शाखा। रावल शाखा में प्रमुख क्षेमसिंह था, जिसके पुत्र सामंतसिंह और कुमारसिंह हुए। क्षेमसिंह के छोटे भाई माहप और राहप थे, जिनकी उपाधि 'राणा' हुई और उनको सीसोदे की जागीर मिली। इससे उनके वंशज सीसोदिया कहलाने लगे। उसी समय के आसपास गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह के मालवे का राज्य विजय कर लेने पर चित्तौड़ का दुर्ग भी उसके अधिकार में चला गया। क्षेमसिंह के पीछे सामंतसिंह मेवाड़ का स्वामी हुआ। उसने गुजरात के सोलंकी राजा अजयपाल को युद्ध में बुरी तरह से

४६. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

घायल किया, जिसपर गुजरातवालों ने उक्त हार का बदला लेने के लिए सामन्तसिंह पर चढ़ाई की । उस समय सामंतसिंह के सरदार उससे विद्रोही हो गये थे, अतएव उस (सामंतसिंह) को सोलंक्तियों के मुक़ाबले में परास्त होना पड़ा और वह मेवाड़ छोड़कर वागड़ में चला गया । वहां उसने गुहिल-राज्य की वि० सं० १२३६ (ई० स० ११७६) के पूर्व स्थापना कर बड़ोदा (वटपद्रक) में अपनी राजधानी नियत की । फिर महारावल डूंगरसिंह के समय डूंगरपुर आबाद होकर वही वागड़ की राजधानी हुई। तदनन्तर महारावल उदयसिंह (प्रथम) ने अपने राज्य के दो विभाग कर ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को राजधानी डूंगरपुर-सहित वागड़ का पश्चिमी भाग और छोटे पुत्र जगमाल को वागड़ का पूर्वी भाग दिया, जिसकी राजधानी बांसवाड़ा है। सामंतसिंह के अधिकार से मेवाड़ का राज्य निकल जाने पर उसके छोटे भाई कुमारसिंह ने सोलंक्तियों को प्रसन्न कर पुनः मेवाड़ का राज्य पाया। उसके पीछे मथनसिंह, पद्मसिंह और जैत्रसिंह क्रमशः मेवाड़ के राजा हुए। जैत्रसिंह वीर राजा था। उसकी गुजरात के सोलंक्तियों, नाडोल के चौहानों और मालवे के परमारों के साथ लड़ाइयां हुईं, जिनमें उसकी विजय हुई। अपने शत्रुओं को परास्तकर जैत्रसिंह ने चित्तौड़ पर पीछा मेवाड़ का अधिकार स्थापित किया। जैत्रसिंह के पीछे तेजसिंह, समरसिंह और रत्नसिंह क्रमशः मेवाड़ के स्वामी हुए। रत्नसिंह ने केवल एक वर्ष तक राज्य किया । उसके समय में दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ पर चढ़ाई हुई, जिसमें रत्नसिंह मारा गया और चित्तौड़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। रत्नसिंह के साथ चित्तौड़ की रावल शाखा की समाप्ति हुई । वि० सं० १३८२ (ई० स० १३२५) के आस- पास सीसोदे के राणा हम्मीरसिंह ने चित्तौड़ पीछा अपने अधीन किया। तब से चित्तौड़ पर गुहिलवंश की सीसोदिया शाखा का राज्य स्थिर हुआ । हम्मीरसिंह के पीछे क्रमशः क्षेत्रसिंह (खेता), लक्षसिंह (लाखा) और मोकल चित्तौड़ के स्वामी हुए। मोकल ने नागोर पर चढ़ाई कर फ़ीरोज़खां दंदानी

महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह ( बीका ) तक ४७ की सेना को नष्ट किया। सांभर, जालोर आदि विजय कर उसने अपने बाहुबल से गुजरात के सुलतान अहमदशाह को परास्त किया। हाड़ों से उसने जहाज़पुर छीना लिया था और मंडोवर का राज्य राव रणमल को दिलवाया था। वह बड़ा दानी था। उसने सोने और चांदी के २५ तुलादान किये, जिनमें से एक स्वर्ण तुलादान पुष्कर के आदिवराह के मंदिर में किया था। जो ब्राह्मण कृषक हो गये थे, उनके लिए उसने सांग (छः अंगों- सहित) वेद पढ़ाने की व्यवस्था की थी। उसके कुंभकर्ण (कुंभा), क्षेमकर्ण (खींवा) आदि सात पुत्र हुए। उनमें से कुंभकर्ण मेवाड़ का स्वामी हुआ, जिसके वंशधर मेवाड़ के महाराणा हैं और क्षेमकर्ण के वंशज प्रतापगढ़ के महारावत हैं, जिनका सविस्तर वर्णन आगे किया जायगा। क्षेमकर्ण ( क्षेमसिंह ) क्षेमकर्ण (जिसके दूसरे नाम क्षेमसिंह, खेमा या खींवा भी मिलते हैं) का जन्म महाराणा मोकल की सोलंकिनी राणी केसरकुंवरी के, जो राव क्षेमकर्ण का जन्म सोढ़ा की पुत्री और सांतल की पौत्री थी, उदर से हुआ था। वि० सं० १४६० (ई० स० १४३३) में महाराणा मोकल गुजरात के सुलतान अहमदशाह को दबाने के लिए चित्तौड़ से रवाना हुआ और झीलवाड़े की तरफ़ जाता हुआ बागोर के मुक़ाम पर महाराणा कुंभकर्ण और अपने पितामह महाराणा क्षेत्रसिंह (खेता) के दासी- क्षेमकर्ण के बीच विरोध होना पुत्र चाचा और मेरा के हाथ से मारा गया। तब उसका ज्येष्ठ पुत्र कुंभकर्ण (कुंभा) मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। फिर महाराणा कुंभकर्ण ने अपने छोटे भाइयों को प्रचलित रीति के अनुसार जागीरें देकर पृथक् करना चाहा। क्षेमकर्ण के लिए उसने जो जागीर निकाली, वह उस (क्षेमकर्ण) को पसंद नहीं हुई, क्योंकि वह उसके पद और मान-मर्यादा की दृष्टि से अपर्याप्त थी। ( १ ) उदयपुर राज्य के बड़वा देवीदान की ख्यात।