रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
गर्जन करते हुए उछल-कूद करने एवं पूँछ पटकने लगे और सब एकस्वर से हनुमान् की प्रशंसा करने लगे। ५८ वें सर्ग में जाम्बवान् ने सारा वृत्तान्त विस्तार सहित कहने का अनुरोध किया। क्रूरकर्मा रावण का सीता से कैसा व्यवहार है ? तुमने सीता को कैसे ढूँढ़ा ? उन्होंने क्या कहा ? सब सुनकर हम लोग विचार करेंगे कि राम के पास जाकर क्या कहना है एवं क्या नहीं कहना है-- यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” यह सुनकर हनुमान् ने रोमाञ्चयुक्त होकर हर्ष से उन सीतादेवी को नमस्कार कर अपनी यात्रा का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया । इसी में मैनाक, सुरसा, सिंहिका तथा लङ्किनी का वृत्तान्त भी कहा। सीतान्वेषण, सीतादर्शन, सीता-रावण-संवाद, सीता की दृढ़ता, त्रिजटा का स्वप्न एवं उसके द्वारा सीता का आश्वासन, सीता से संभाषण, मुद्रिकासमर्पण, सीता का आश्वासन, अभिज्ञानग्रहण, अशोकवन का उत्सादन, राक्षसों से युद्ध, मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र से बन्धन, रावण-भाषण, लङ्का-दहन, पुनः सीतादर्शन और लौटने का वर्णन किया। पुनः सीतामाहात्म्य और उनकी स्थिति का वर्णन ५९ वें सर्ग में किया है। ६० वें सर्ग में अङ्गद ने कहा कि हम सब लङ्का को नष्ट करके, रावण को मारकर एवं सीता को लेकर राम के सामने रख दें; यही ठीक है। परन्तु जाम्बवान् की बात मानकर सब लोगों ने राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाना ही उचित समझा। जाम्बवान्, अङ्गद, हनुमान् आदि के साथ सभी बलवान् वानर आनन्द एवं आह्लाद के उद्रेक में मधुवन में जाकर रक्षकों एवं दधिमुख आदि को निगृहीत कर मधु-पान, फल-भक्षण आदि करके आमोद-प्रमोद करने लगे । परिस्थिति के अनुसार मधुवन में प्रवेश कर मधु तथा फल आदि का खान-पान करना असङ्गत नहीं है । महान् कार्य सम्पादित करने के अनन्तर खुशियों में ऐसे कार्य होते ही हैं। रक्षकों के पुकार करने पर सब समाचार जानकर सुग्रीव ने सारी स्थिति का अनुमान कर लिया एवं रक्षकों के द्वारा ही सबको बुलाया। ६४ वें सर्ग में अङ्गद और हनुमान् को पुरस्कृत कर (नेता बनाकर ) सब लोग राम के पास आये । सुग्रीव ने कमलोचन रामको बतलाया कि अङ्गद की प्रसन्नता से स्पष्ट होता है कि कार्य करके वे लोग आये हैं, बिना कार्य किये मधुवनध्वंस करने का साहस नहीं हो सकता था और वह कार्य हनुमान् से ही हो सकता है। उनमें सिद्धि, मति, अध्यवसाय एवं शौर्य सब प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान् नेता हो, हनुमान् और अङ्गद अधिष्ठाता हों वहाँ कार्यसिद्धि में अन्यथा मति नहीं हो सकती । ६५ वें सर्ग में राम के सन्निधान में आकर हनुमान् ने सीता का वृत्तान्त बतलाया। सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? राम के इस कथन को सुनकर हनुमान् ने जिधर सीता थीं उस दिशा की ओर सीता को प्रणाम करके सीता का दर्शन बताया और देदीप्यमान काञ्चनमय दिव्यमणि राम को प्रदान की और हाथ जोड़कर राम से कहा कि सौ योजन समुद्र का लङ्घन कर मैं सीता-दर्शन की इच्छा से लङ्का गया। वहाँ दुरात्मा रावण के यहाँ मैंने सीता को देखा । वह आप में ही जीवन अर्पित करके राक्षसीगण द्वारा बार बार तर्जित होकर रह रही हैं। वे एकवेणीधारिणी, चिन्तापरायण, भूमिशयन से विशीर्णाङ्गी होकर हिमागम से पद्मिनी के समान मुरझायी हुई, मरने का निश्चय किये हुए, रावण से सर्वथा विमुख तथा आप में मन लगा कर स्थित हैं। मैंने शनैः शनैः इक्ष्वाकुवंश का कीर्तन करते हुए उन्हें आश्वासन दिया और उनसे भाषण किया । उन्हें यहाँ की स्थिति बतलायी । राम और सुग्रीव के सख्य का समाचार सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुईं । उनका उदात्त समाचार नियत है। आपमें उनकी सदा स्थिर भक्ति है। उग्र तपस्या और आपकी भक्ति से युक्त जनकनन्दिनी को मैंने देखा। यह काञ्चन मणिरूप अभिज्ञान देकर उन्होंने काकवृत्तान्त भी कहा। मनःशिला के तिलक का भी स्मरण दिलाया और कहा है कि मैं मास भर से अधिक जीवन नहीं रख सकूँगी । हनुमान् ने कहा, अतः शीघ्र ही सागर पारकर प्रस्थान करना चाहिये ।
बुल्के तो अप्टूडेट वकालती वर्णन चाहते हैं। वस्तुस्थिति या तो समझते ही नहीं या भूल जाते हैं। स्वाभाविक वर्णन को भी प्रक्षेप कहने का निराधार साहस करते हैं। ६६ वें सर्ग में हनुमान् की बात सुनकर मणि को हृदय से लगाकर राम रोने लगे और अश्रुपूर्ण नयनों से मणि को देखते हुए सुग्रीव से कहते हैं जैसे वत्स को देखकर वत्सला धेनु स्नेहस्रुत होती है वैसे ही इस मणिश्रेष्ठ को देखकर मेरा हृदय स्रुत होता है। यज्ञ से सन्तुष्ट होकर देवराज ने जनक को यह मणि प्रदान की थी। जनक ने विवाहकाल में सीता की माता के हाथ से लेकर मेरे पिता दशरथ के हाथ में दी थी। उन्होंने वैदेही के मूर्धा को उससे अलङ्कृत किया था। आज उस मणि के दर्शन से मैं वैदेही के मिलने के सुख का अनुभव कर रहा हूँ। राम पुनः हनुमान् से पूछने लगे, वैदेही ने और क्या कहा है। सौमित्रे, वैदेही के बिना आयी हुई मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे अधिक क्या दुःख होगा। वैदेही मास भर जीवित रहेगी यह तो बहुत है मैं तो क्षणभर भी उनके बिना जीवित नहीं रह सकता। इस प्रकार ६६ वें सर्ग में राम ने विलाप किया। हनुमान् ने पुनः ६७ वें सर्ग में सविस्तर सीता का सन्देश सुनाया। राम सेना सहित आकर लङ्का को विध्वस्त करके मुझे ले जायें, यही उनके स्वरूप के अनुरूप है। परन्तु समुद्र पारकर यहाँ सेना सहित राघव का आना कैसे हो सकेगा। इसपर मैंने कहा देवि, वानरों और भालुओं के राजा सुग्रीव के पास बहुत बड़े बलशाली तथा विक्रम-संपन्न योद्धा हैं। उनकी गति ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् कहीं भी रुद्ध नहीं होती। मैं तो उनमें से एक बहुत छोटा हूँ। एक छलाँग में हरिवीर यहाँ आ जायेंगे। राम और लक्ष्मण दोनों सूर्य और चन्द्र के तुल्य मेरे पृष्ठ पर आरूढ़ होकर आ जायेंगे। देवि, तुम नख-दंष्ट्रा आयुधवाले वीरों का गर्जन शीघ्र ही सुनोगी और शीघ्र ही वनवास की अवधि पूरी कर अयोध्या में अभिषिक्त राम को देखोगी। इस तरह कल्याणमयी अभीष्ट उदारवाणी द्वारा प्रसादित होकर अदीनभाषिणी एवं आपके विरह से अतिपीड़ित सीता ने शान्ति प्राप्त की (सर्ग ६८)। कानूनी लिखा-पढ़ी की बात पृथक् है। व्यावहारिक स्वाभाविक बात यही है कि बहुत काल के अनन्तर प्रियजन के सम्बन्ध में समाचार मिलने पर उससे बार-बार पूछा जाता ही है। सविस्तर जानकारी की इच्छा होती ही है। उन्हीं स्वाभाविक व्यावहारिक चरित्रों का चित्रण वाल्मीकि ने किया है। यह भूमिका भी न भूलनी चाहिए कि सीता वाल्मीकि के आश्रम में थीं। सीता के चरित्रों के सम्बन्ध में कुछ विपरीत चर्चाओं के कारण उन्हें बनवास दिया गया था। उसके लिए अनेक अन्य उपायों के बदले आप्तकाम, पूर्णकाम, अभ्रक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, वीतराग महर्षि के द्वारा सीता के पवित्र चरित्रों का सत्य वर्णन किया जाय। इसी दृष्टि से पुनः पुनः विभिन्न प्रसङ्गों द्वारा सीता के चरित्रों का वर्णन करना आवश्यक था। जाम्बवान् तथा राम की भी जिज्ञासा के प्रसङ्ग से महर्षि ने सीता की जीवनचर्या, वार्तालाप, सीता-रावण-संवाद तथा सीता की दृढ़ तपस्या और उनके तनिक तनिक व्यवहारों और वार्तालापों का वर्णन किया है। इसी दृष्टि से विभिन्न घटनाओं का भी यथावत् वर्णन किया गया है, जिससे उस समय के उन लोगों को जिन्होंने उन घटनाओं को आँखों से देखा था, आँखों देखी घटनाओं का यथावत् वर्णन सुनकर उस इतिहास या काव्य में विश्वास होना स्वाभाविक था। उसी सम्बन्ध से उन लोगों ने सीतासम्बन्धी घटनाओं की भी सच्चाई जानना चाहा होगा और महर्षि वाल्मीकि द्वारा ठीक वर्णन सुनकर उन्हें अवश्य ही समाधान प्राप्त हुआ होगा।
अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में लङ्काभियान, राम द्वारा हनुमान् के कार्यों की प्रशंसा और उनको स्वात्म- परिष्वङ्ग प्रदान, समुद्र की बाधा के विचार से राम की निराशा तथा प्रोत्साहन देते हुए सुग्रीव का सेतुबन्ध का प्रस्ताव, हनुमान् द्वारा लङ्का का वर्णन, समुद्र तक पहुँचना, राम का विग्रहवर्णन, रावण के सभासदों द्वारा रावण को विजय का आश्वासन, विभीषण द्वारा चेतावनी, कुम्भकर्ण का जगना, रावण को दोष देना, अन्त में युद्ध में सहायता करने की प्रतिज्ञा करना, पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप का रावण द्वारा वर्णन करना (सर्ग १३), विभीषण की शरणागति, सुग्रीवादि का विभीषण को ग्रहण करने में मतभेद, हनुमान् की सहमति, शरणागतरक्षण व्रत के कारण विभीषण का ग्रहण, अङ्गुल्यग्रमात्र से पृथिवी भर के सभी दैत्यों, दानवों, राक्षसों और पिशाचों का वध करने की सामर्थ्य बतलाकर राम का सबको आश्वस्त करना। विभीषण का राम द्वारा अभिषेक, प्रायोपवेशन द्वारा समुद्र को अनुकूल बनाने की विभीषण की मन्त्रणा, शार्दूल द्वारा रावण को रामसेना की सूचना देना, सेतुबन्ध, शुक, सारण, शार्दूल तथा विद्युज्जिह्व द्वारा राम का मायामय शीर्ष प्रदर्शन। वानर भटों द्वारा लङ्कावरोध, शरपाशबन्धन, राम और रावण का द्वन्द्वयुद्ध, कुम्भकर्ण का वध, द्वन्द्वयुद्ध, पुनः लंका-दहन, इन्द्रजित्-वध, विभिन्न युद्धों में रावण-वध, अग्निपरीक्षा, प्रत्यावर्तन, अयोध्याप्रवेश ये सभी अंश रामायण के हैं। तीनों पाठों में अनेक पाठ-भेद हैं और सब प्रामाणिक हैं। वेदों में तथा सप्तशती में भी ऐसे पाठभेद मिलते हैं। पाठभेदों का अनुचित लाभ उठाकर बुल्के आदि पाश्चात्य प्रक्षेप सिद्ध करते हैं। साथ ही जो तीनों पाठों में भी उनके स्वाभिमत-विरुद्ध होता है उसको भी वे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। ५६१ वें अनु० में बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि “तीनों पाठों की उपर्युक्त विभिन्नता से स्पष्ट है कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया", क्योंकि यदि गायकों को मूलपाठ में बढ़ाने का अधिकार होता तो आज भी पाठभेद बढ़ाया जा सकता है। आधुनिक साहित्यिकों एवं व्यासों में श्लोकनिर्माण की क्षमता कम नहीं है। अतएव सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार है। याकोबी के अनुसार सर्ग २३-४० को प्रक्षिप्त कहना भी तर्काभास के आधार पर है। क्योंकि बहुत-सी वास्तविक घटनाओं को भी हटा देने पर किसी अंश का अभाव परिलक्षित नहीं होगा। विधि का विधान या घटनाएँ किसी की सङ्गति की अपेक्षा नहीं रखतीं हैं। अपितु घटनाओं के अनुसार कथाएँ होती हैं। उनका यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि “इस अंश में बालकाण्ड में वर्णित वानरों की उत्पत्ति का निर्देश मिलता है (२८।५ और ३०।२७); प्रामाणिक सर्गों में बालकाण्ड की सामग्री का उल्लेख नहीं होता", इससे तो यही सिद्ध होता है कि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों ही काण्डों को अर्वाचीन कहने की धृष्टता सर्वथा अनुचित है। तभी तो युद्धकाण्ड के उक्त वर्णनों से बालकाण्ड का सम्बन्ध जुड़ता है। इसके अतिरिक्त बुल्के, याकोबी आदि के यहाँ कोई भी काण्ड प्रामाणिक है ही नहीं। क्योंकि वे सर्वत्र प्रक्षेप कहने को प्रस्तुत रहते हैं। केवल जो अंश पाश्चात्यों के विचार से फिट बैठता हो वही उनका प्रामाणिक अंश है। प्रामाणिकता की कसौटी संभवतः उनके पास है ही नहीं। सर्ग २८ और ३० दोनों ही स्थलों में विशिष्ट वानर वीरों की उत्पत्ति और विशिष्ट देवताओं का वानर आदि योनियों में अवतार-ग्रहण प्रमाणित होता है।
अध्याय युद्धकाण्ड ५३७ ५६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं "सर्ग ४२-११२ से इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता पायी जाती है कि यह समस्त सामग्री वाल्मीकि जैसे महान् कवि की रचना हो ही नहीं सकती" पर उनका यह तर्क तर्काभास है, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णन भावुकता एवं रसिकता निरपेक्ष ही होता है । दर्शन एवं गणित का विषय नीरस होने पर भी व्यास आदि ने श्रीमद्भागवत आदि में उसका वर्णन किया ही है। पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा के अत्यन्त जटिल नीरस विषयों का भी वर्णन वेदान्तदेशिक आदि ने अपने काव्यों में किया ही है। आपके परस्पर विरोधी उदाहरण भी अकिञ्चित्कर हैं । आप कहते हैं "सर्ग ५० में गरुड़ के आगमन का वर्णन किया गया है। राम और लक्ष्मण मूच्छित होकर पड़े हुए हैं और गरुड़ के आने पर नागपाश के मुक्त हो जाते हैं। किन्तु सर्ग ४९ में शरपाशबद्ध राम के जागने का उल्लेख हो चुका है। अतः सर्ग ५० का अनावश्यक वृत्तान्त बाद का प्रक्षेप सिद्ध होता है।" परन्तु उक्त कथन बुल्के की अनभिज्ञता का ही सूचक है, क्योंकि ४९वें सर्ग में यह नहीं कहा गया है कि राम नागपाशमुक्त हो गये थे । ४४वें सर्ग के अनुसार भीमकर्मा वालिपुत्र से र्निजित होकर, इन्द्रजित् अन्तर्धान होकर ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के कारण अदृश्य रहकर ही वज्रतुल्य निशित बाण छोड़ने लगा । वह नागमय बाणों के द्वारा राम और लक्ष्मण दोनों के सर्व गात्रों का भेदन करने लगा । कूटयोधी इन्द्रजित् ने क्रुद्ध होकर मायासवृत रहकर युद्ध में दोनों राघववीरों को मोहित करते हुए शरबन्ध से बाँध दिया । “रामं च लक्ष्मणं चैव घोरैर्नागमयैः शरैः ।” ( वा० रा० ६।४४।३४ ) भीषण नाग ही शररूप में परिणत हुए थे । उन्हीं के द्वारा उसने राम और लक्ष्मण को बाँध दिया— “बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरो रामलक्ष्मणौ ।” ( वा० रा० ६।४४।३६ ) ४५ वें सर्ग में इन्द्रजित्कृत बन्धन का ही विस्तार है। राम ने उसकी स्थिति जानने के लिए नील, अङ्गद, शरभ, द्विविद, हनुमान्, ऋषभ आदि दस वीरों को आदेश दिया । वे उसे ढूँढ़ने आकाश में प्रविष्ट हुए । परन्तु उस अस्त्रवित् ने अपने परमास्त्र से उन्हें वारित कर दिया । वे भीमवेगवाले भीषण बाणों से विक्षत होकर मेघ से आवृत सूर्य के समान उसको नहीं देख सके । पुनश्च वह और वेग से राम एवं लक्ष्मण के गात्रों में सर्वदेहभेदी बाणों को छोड़ने लगा । बाणरूपता को प्राप्त हुए पन्नगों के द्वारा उसने दोनों के शरीरों को सब ओर से विद्ध कर दिया । “पन्नगैः शरतां गतैः” (वा० रा० ६।४५।८) बड़े ही भीषण वेग से गर्जन के साथ बाणों से भेदन करते हुए उसने सभी स्थानों में बाणों को ठूंंस दिया । रणभूमि में दोनों भाई शरबन्धन से बँध गये । शरवेष्टितसर्वाङ्ग तथा रुधिर से सराबोर होकर दोनों वीर शयन में शयान हो गये । उनके गात्र में एक अङ्गुल भी भीषण बाणों से अविद्ध तथा अक्षत प्रदेश नहीं रहा । ४६ वें सर्ग में इन्द्रजित् अपनी सेना को हर्षित करता हुआ सब को निर्भय करके लङ्का चला गया । विभीषण सब को धैर्य बँधाते रहे । ४७ वें सर्ग में रावण पुष्पक पर त्रिजटा के साथ सीता को बैठाकर रणाङ्गण में शयान राम और लक्ष्मण को देखने के लिए भेजता है । सीता उनकी स्थिति देखकर संतप्त होती है । सर्ग ४८ में संतप्त सीता को त्रिजटा आश्वासन देती है । ४९ वें में घोर शरबन्धों से बद्ध, रुधिर से लथपथ तथा रणभूमि में शयान राम और लक्ष्मण को घेरकर बैठे वानरश्रेष्ठों में शोक की लहर व्याप्त हो रही थी । इसी बीच नागबाणों से निबद्ध होते हुए भी स्थिर होने तथा विशिष्ट सत्त्व के योग से राम प्रतिबुद्ध हो गये और लक्ष्मण की दशा को देखकर विविध प्रकार से विलाप करने लगे । यहाँ ध्यान देने योग्य है कि राम को तात्कालिक प्रबोधमात्र हुआ था— ६८
५३८ रामायणमीमांसा अष्टादश
"एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । स्थिरत्वात् सत्त्वयोगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन् ॥ ( वा० रा० ६।४९।३ ) अभी तक वे नागपाश से मुक्त नहीं हुए थे । इससे प्रतीत होता था कि वे नागपाश से बद्ध होने पर भी विशिष्ट सत्त्वयोग से कुछ क्षणों के लिए ही प्रतिबुद्ध होकर लक्ष्मण के लिए शोक करने लगे थे । उसी बीच गदाधारी विभीषण सम्पूर्ण सेना को व्यवस्थित कर वहाँ आये । उनको दूर से आते देखकर इन्द्रजित् समझ कर वानर इधर उधर दौड़ने लगे । सेना को अव्यवस्थित देख अङ्गद और जाम्बवान् ने सेना को आश्वासन दिया । विभीषण ने आकर राम और लक्ष्मण दोनों को देखा और उनकी अवस्था पर विषण्ण हुए । सुषेण ( वैद्य ) के परामर्श से क्षीरोद सन्निहित पर्वतस्थ महौषधि को लाने के लिए हनुमान् को प्रेषित करने की बात चल रही थी कि इसी बीच विद्युत्- सहित मेघों और द्वीप के महाद्रुमों को अपने पक्षवात से प्रकम्पित करते हुए सुपर्ण ( गरुड़ ) आ गये । उनके आते ही त्रस्त होकर बाणरूपी पन्नग भाग गये। दोनों भ्राता बन्धनमुक्त हो गये । वैनतेय के स्पर्श से राम और लक्ष्मण दोनों के व्रण नष्ट हो गये । दोनों के शरीर सुन्दर वर्णवाले तथा स्निग्ध हो गये । तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, बुद्धि, स्मृति आदि द्विगुण हो गये । इस तरह पूर्वापर के प्रसङ्ग से ५० वाँ सर्ग अत्यन्त महत्त्व का है। उसके बिना नाग- बाणबन्ध की निवृत्ति की उपपत्ति ही नहीं होती । ऐसे पाश्चात्यों की बुद्धि पर दया आती है जो बिना सोचे समझे आर्ष ग्रन्थों पर अपनी कलमकुल्हाड़ी चलाने को तैयार रहते हैं । वस्तुस्थिति प्रदर्शनार्थ इतना लिखा गया है । वस्तुतः यह ४९ वें सर्ग के ३ श्लोकों की केवल व्याख्या है जिससे बुल्के के उक्त तर्कों का खण्डन होता है । इसी तरह उनका दूसरा तर्क निम्नोक्त है—"सर्ग ५९ में अकम्पन और नरान्तक को जीवित माना गया है, किन्तु उनके वध का उल्लेख क्रमशः ५६ और ५८ सर्गों में हो चुका है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में राम और रावण के युद्ध का वर्णन है। यद्यपि आगे चलकर राम के प्रथम बार रावण से युद्ध करने का स्पष्ट उल्लेख है ( दे० ६।१००।४६-५१ ) । वास्तव में लक्ष्मण के शक्ति से आहत होने का जो वर्णन इस सर्ग में किया गया है वह १०० वें सर्ग का अनुकरणमात्र प्रतीत होता है। अतः सर्ग ५९ की प्रक्षिप्तता असंदिग्ध है,” परन्तु यह भी उनका कथन आपातरमणीय है, क्योंकि—"शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ।” ( वा० रा० ६।५६।२९ ) । "द्विविदो गिरिशृङ्गेण जघानेकं नरान्तकम् ।” ( वा० रा० ६।५८।२० ) । यद्यपि इन वचनों से अकम्पन तथा नरान्तक का वध वर्णित है । तथापि उनसे भिन्न भी सर्ग ५९ के १४ और २२ वें श्लोकों के— “ह्याकम्पनं त्वेनमवेहि राजन्”, “नरान्तकोऽसौ नगशृङ्गयोधी” इन वचनों द्वारा अन्य अकम्पन तथा नरान्तक का होना मानना चाहिये । इसी लिए विशेषणों का भी प्रयोग किया गया है। सर्ग ५६ के अकम्पन को राक्षसेन्द्र कहा गया है, किन्तु ५९ का गजारूढ़ अकम्पन रावण का अङ्गरक्षक है । अतएव तिलककार ने स्पष्ट लिखा है कि यह पूर्वहत अकम्पन से भिन्न ही है । इसका विशेषण नगशृङ्ग- योधी है । तिलककार कहते हैं । अर्थात् इसके मुकाबले का कोई प्रतियोद्धा नहीं उपलब्ध होता तो वह अपनी भुजाओं की कण्डू ( खुजलाहट ) दूर करने के लिए महान् गिरिशृङ्गों से ही युद्ध करता है “प्रतियोद्ध्रभावाद् भुजकण्डू- निवृत्त्यर्थमिति भावः ।” इतना ही क्यों त्रिशिरा यद्यपि खर-दूषण के साथ मारा जा चुका था तथापि यहाँ १९ वें श्लोक में उससे अन्य त्रिशिरा का भी वर्णन है । जब आजकल भी कालिदास और वाचस्पति मिश्र अनेक हो सकते हैं तो अभिन्न नाम के अनेक राक्षसों के होने में शङ्का क्यों होनी चाहिए । प्रमाणयुक्त होने से अनेक अदृष्टों की कल्पना की जा सकती है—'प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि' केवल समान नाम मात्र देखकर प्रमाणभूत महत्त्व- पूर्ण ५९ वें सर्ग का ही अपलाप करना अत्यन्त असङ्गत है । यदि ऐसा ही है तब तो जिन पाँच काण्डों को आप सब प्रमाण मानते हैं जब उनमें भी अनेक प्रक्षेप हैं तो उन पाँच काण्डों को ही अप्रमाण क्यों न माना जाये ? इष्टापत्ति करने पर आपकी रामकथा भी समुद्र में फेंकने लायक रह जायगी ।
अष्टम प्राय युद्धकाण्ड ५३९ सर्ग ५९ का राम और रावण का मुकाबला सहेतुक ५९ वें सर्ग के प्रारम्भ में ही दिखलाया गया है । ५८ वें सर्ग के अनुसार वानरी सेना के सेनापति नील के द्वारा राक्षसी सेना के सेनापति प्रहस्त का वध हो गया तो रावण उत्तेजित हो उठा । उसने प्रधान प्रधान राक्षसयूथमुख्यों से कहा कि उन रिपुओं की अवज्ञा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये जिन्होंने हमारे ससैन्य सकुञ्जर सेनापति को मार डाला है । अतः अब मैं स्वयं विजय के लिए रणभूमि में जा रहा हूँ । यह कहकर अमरराजशत्रु राक्षसराज रावण रणभेरी, पणव आदि के प्रणादों और आस्फोटों, शौर्यप्रकाशक शब्दों, सिंहनादों तथा पुण्यस्तवों से स्तूयमान होता हुआ अपने दलबल के साथ भूतों से घिरे हुए रुद्र के समान रणाङ्गण की ओर चल पड़ा । महार्णवों एवं बादलों के गर्जनों के तुल्य गर्जती हुई तथा महान् वृक्षों एवं शैलों को हाथों में ली हुई प्रचण्ड राक्षसी सेना को देखकर राम ने विभीषण से पूछा कि वह अक्षोभ्य अभीरु वीरों तथा महेन्द्रपर्वतसदृश गजेन्द्रों से युक्त किसकी सेना है। विभीषण ने मुख्य वीरों का वर्णन करते हुए बताया कि यह प्रबलप्रताप तेजोमय रावण है जो कि दैत्यों और देवताओं के भी दर्प का हनन करनेवाला है । उसे देख श्रीराम भी सीता-हरणसंभव क्रोध को उसके ऊपर छोड़ने के लिए संनद्ध हो गये । किन्तु लक्ष्मण के अनुरोध करने पर उन्हें युद्ध करने की अनुमति दे दी । पहले सुग्रीव से रावण का संग्राम हुआ । बाद में गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, नल आदि वानरों ने भी युद्ध किया । अन्त में लक्ष्मण सामने उपस्थित हुए । बीच में हनुमान् से रावण का युद्ध होने लगा । एक बार तो रावण ने तलप्रहार से हनुमान् को विचलित कर दिया, पर तेजस्वी महामति हनुमान् ने तल से आहत होकर दशग्रीव भूकम्प में महापर्वत के समान विचलित एवं विकम्पित हो उठा । पुनः हनुमान् पर मुष्टिप्रहार कर वह नील से भीड़ गया । भीषण युद्ध के बाद उसने आग्नेय अस्त्र से नील को मारा परन्तु अग्निपुत्र नील अत्यन्त आहत होने पर भी मृत नहीं हुए । तदनन्तर लक्ष्मण और रावण का तुमुल संग्राम हुआ । लक्ष्मण के हस्तलाघव से रावण विस्मित हुआ । रावण ने कालाग्निप्रभ स्वयम्भूदत्त शर से लक्ष्मण के सिर पर प्रहार किया तो लक्ष्मण सायक से पीड़ित होकर मूच्छित हो गये । कठिनाई से होश में आकर राक्षसराट्नाथ रावण ने स्वयम्भू से प्राप्त रिपुवित्रासनी महाशक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण ने अनेक अग्नितुल्यबाणों से उसका प्रतीकार किया, किन्तु वह अमोघ दिव्य शक्ति थी । उसने लक्ष्मण को घायल कर दिया । रावण ने घायल लक्ष्मण को दोनों भुजाओं से उठाने का प्रयास किया। जो हिमाचल, मन्दर एवं त्रैलोक्य को उठा सकता था वह लक्ष्मण को उठा नहीं सका । ब्राह्मी शक्ति से ताड़ित होने पर भी लक्ष्मण ने विष्णु के अमीमांस्य भाग स्वात्मा का अनुसन्धान किया, अतः रावण उन्हें उठाने में समर्थ नहीं हुआ । इसी बीच हनुमान् ने आकर रावण पर मुष्टिप्रहार किया, वह मूच्छित होकर जानुओं के बल से रथ-पृष्ठभूमि पर गिर पड़ा । उसके मुख, नेत्र और कानों से रक्त की धारा बह चली। वह निश्चेष्ट होकर रथ-मध्य में बेहोश हो गिर गया । हनुमान् ने अपनी बाहुओं से लक्ष्मण को उठा लिया । वायुपुत्र हनुमान् के सौहार्द एवं परम भक्ति से वे अनायास ही उठ गये । फिर महातेजा रावण होश में आकर वानर सेना को विद्रावित करने लगा । तब गरुड़ारूढ़ विष्णु के समान हनुमान् पर आरूढ़ होकर राम ने रावण से संग्राम किया । रावण ने हनुमान् पर भी बहुत बाण चलाये, पर स्वाभाविक तेज से सम्पन्न हनुमान् उनसे अधिकाधिक तेजस्वी हो गये । राम ने रावण पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसका चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खड्ग सहित रथ नष्ट हो गया । फिर वज्रतुल्य बाण से उसकी भुजा में ऐसा प्रहार किया कि वह अत्यन्त आर्त होकर विचलित हो गया। उसके हाथ से धनुष छूट गया। उसे विह्वल देखकर राम ने पुनः अर्धचन्द्र से विशालकाय रावण के किरीटों को काट डाला । अनन्तर राम ने कहा तुम आज बहुत थक गये हो, अतः आज तुम्हें मृत्यु के वश में नहीं भेजूंगा । रात्रिञ्चर, जा लङ्का में विश्राम कर । पुनः रथी धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना । इस तरह शरादित, निकृत्तचाप तथा भग्नकिरीटकूट होने से रावण का हर्ष और दर्प चूरचूर हो गया । वह लङ्का चला गया। इस महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहने का प्रयास दुरभिसन्ध्विमूलक ही है। इसमें राम, लक्ष्मण,
५४० रामायणमीमांसा अष्टादश हनुमान् आदि का अलौकिक महत्त्व वर्णित है। इसमें भी राम और लक्ष्मण की विष्णुरूपता सिद्ध होती है, इसलिए बुल्के हठात् इसे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं । किन्हीं समान घटनाओं में एक दूसरे का अनुकरण नहीं कहा जा सकता । महर्षि वाल्मीकि ने घटनाओं का वर्णन सत्यता के आधार पर ही किया है । "सन्तुष्यतु दुर्जनः" न्याय से ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि ५९ वें सर्ग में अकम्पन और नरान्तक का वर्णन प्रक्षेप है, परन्तु सिर्फ दो नामों की पुनरुक्ति के आधार पर इतने महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहना ही अति साहस है । १०० वें सर्ग में लक्ष्मण पर रावण द्वारा शक्ति-प्रयोग का वर्णन है । परन्तु दोनों के स्वरूप में बहुत भेद है । सर्ग १०० में लक्ष्मण ने रावण के रथ, सारथि तथा मनुष्यशीर्ष ध्वज काट कर रावण के धनुष एवं घोड़ों को नष्ट कर दिया । उस समय विभीषण ने रावण पर प्रहार किया था । भग्न रथ से हटकर रावण ने विभीषण पर क्रोध करके शक्ति का प्रयोग किया पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही नष्ट कर दिया । उसके बाद रावण ने और भी तीव्र काल से भी भीषण वज्रोपम शक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण फिर विभीषण को बचाकर स्वयं सामने आकर भीषण बाणों से रावण पर प्रहार करने लगे तब उसने अष्ट घण्टावाली महास्वना शक्ति का प्रयोग लक्ष्मण पर ही कर डाला । उस समय राम ने— "स्वस्त्यस्तु लक्ष्मणायेति मोघा भव हतोद्यमा ।” कहकर शक्ति को मोघ बनाया और राम ने स्वयं उस महाशक्ति को लक्ष्मण की छाती से निकाला और तोड़ डाला । इस बीच रावण ने शक्ति निकालते समय राम पर भीषण मर्मभेदी बाण चलाये । उनकी कुछ चिन्ता न करते हुए राम हनुमान् आदि वानरों को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर स्वयं रावण से निबटने के लिए प्रस्तुत हुए । (श्लोक ४६-५२) तक में यह नहीं कहा गया है कि राम ने पहले पहल ही रावण को देखा है । किन्तु इसकी ५९ वें सर्ग से सङ्गति लगाकर यही निश्चित करना चाहिये कि आज के पराक्रम का यह काल बहुत समय से ईप्सित था । उस दिन परिश्रान्त जानकर रावण को पराजित करके छोड़ दिया था । मौत के घाट उसे नहीं उतारा था । तब से वह अब तक सामने नहीं आया । अब इस समय पापात्मा दशग्रीव का वध अवश्य करना है । जैसे ग्रीष्मान्त में चातक को मेघदर्शन अभीष्ट होता है वैसे ही वध के लिए मुझे रावण का दृष्टिगत होना अभीष्ट है । इस क्षण मैं प्रतिज्ञा करता हूँ अब वानर लोग जगत् को अरावण या अराम ही देखेंगे। अतः यह चक्षु के गोचर होकर जीवित नहीं रह सकता- “सोऽद्यमद्य रणे पापश्चक्षुर्विषयमागतः । चक्षुर्विषयमागम्य नायं जीवितुमर्हति ॥” ५१ ॥ आज यह पापी मेरे चक्षु का विषय बनकर जीवित नहीं रह सकता । इससे यह नहीं निकलता कि अभी तक राम के सामने रावण आया ही नहीं था । इतना ही क्यों सर्ग के अन्त में भी कहा गया है कि दीप्तधनुष्मान् राम से मर्दित रावण भय से वैसे ही भाग गया जैसे प्रबल वायु के भय से बलाहक भाग जाते हैं । पुनः रावण सर्ग १०३ में तैयार होकर आता है । अतः सर्ग १०० के श्लो० ४६-५२ के बलपर भी ५९ वें सर्ग को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता । बुल्के का यह भी कहना है कि सर्ग ६९ और ७० भी प्रक्षेप हैं । यत्र तत्र इन्द्रवज्रा छन्दों के प्रयोग के अतिरिक्त इन सर्गों की कथावस्तु इन्हें प्रक्षिप्त ठहराती है । इनमें दो राक्षसों का वध वर्णित है, जो पहले मारे जा चुके हैं । त्रिशिरा (३।२७।१८,१९) तथा नरान्तक ( ६।५८।२० ) में । महोदर और महापार्श्व एवं दो अन्य राक्षसों के वध का उल्लेख है जिनका वध बाद में फिर किया गया है । महोदर का ( ६।९७ ) तथा महापार्श्व का ( ६।९८ ) में । परन्तु बुल्के की यह भ्रान्ति ही है । वस्तुतः यह किसी भ्रान्त व्यास द्वारा वर्णित प्रक्षेप नहीं है, किन्तु सत्य घटना के आधार पर ही वाल्मीकिरामायण का वर्णन है । ६।७०।९४-९६ में नरान्तक का वध अङ्गद द्वारा हुआ है एवं नील के द्वारा महोदर का वध ७०।१२६ में हुआ है । त्रिशिरा रावण पुत्र था तथा महोदर उसका पितृव्य था ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५४१ त्रिशिरा का वध राम के द्वारा ७०।१३८-१४२-१४४ में वर्णित है। ३।२७ में दूषण के भाई त्रिशिरा का वध राम के द्वारा हुआ था। महापाश्वं का वध ऋषभ द्वारा उसी की गदा से ७०।१५३-१६१ में हुआ है। द्विविद द्वारा नरान्तक का वध (५८।२०) में हुआ है। यह नरान्तक प्रहस्त के सचिवों में एक था— “नरान्तकः कुम्भहनुः महानादः समुन्नतः। एते प्रहस्तसचिवाः ॥” अङ्गद द्वारा निहत नरान्तक इससे भिन्न ही था। (६।९७) में महोदर एवं सुग्रीव का तुमुल युद्ध होता है। (६-३७) श्लोकों में इसका वध वर्णित है। इससे रावण के महान् शोक एवं राघव को महती प्रसन्नता हुई थी। महापाश्वं का वध अङ्गद द्वारा (६।७८।१-२२) श्लोकों में होता है। उक्त वर्णन भ्रान्ति के परिणाम नहीं हैं। बुल्के को विदित होना चाहिये कि विभिन्न त्रिशिरों, नरान्तकों, महोदरों एवं महापाश्वों के अस्त्र-शस्त्रों, युद्धप्रकारों एवं प्रतिद्वन्द्वियों में भेद है। अतः नाम समान होने पर भी उन व्यक्तियों में भेद है। यदि वस्तुस्थिति वैसी न होती तो नामान्तर भी कल्पित किये जा सकते थे। पुनः बुल्के कहते हैं, “इन्द्रजित् के वध के बाद स्पष्ट शब्दों में उल्लेख (९१।१६) है कि उस समय तक युद्ध केवल तीन दिन से चल रहा था। रावणवध के लिए एक दिन और रखने पर अनुमान किया जाता है कि आदि- रामायण के अनुसार प्रथम दिन सामूहिक युद्ध और नागपाश-प्रसङ्ग, दूसरे दिन कुम्भकर्ण-वध, तीसरे दिन इन्द्रजित्- वध और चौथे दिन रावण-वध हुआ होगा।” परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार ही नहीं किन्तु प्रमाणान्तरों से विरुद्ध भी है। ९१।१६वाँ श्लोक निम्नोक्त है— “अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद्विनिपातितः । निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥” अर्थात् तीन दिन रातों में वीर इन्द्रजित् मारा गया है। इससे आज मैं निरमित्रप्राय हो गया हूँ। शत्रु का मुख्य वीर मारा गया। अब रावण स्वयं युद्ध में आयेगा। तिलककार के अनुसार दशमी के चतुर्थ प्रहर से इन्द्रजित् से युद्ध प्रारम्भ हुआ था और त्रयोदशी के चतुर्थ प्रहर में वह मारा गया था। इस कथन से चार दिन में युद्ध की समाप्ति की अटकलें लगाना अनभिज्ञता ही है, क्योंकि इस श्लोक का स्पष्ट अर्थ यह है कि तीन दिनों में मेघनाद मारा गया न कि सारा युद्ध तीन दिन चला। १०८वें सर्ग के ३४वें श्लोक में कतक तथा तीर्थ टीकाकारों के अनुसार श्रीराम ने जिस दिन सुवेल पर्वत पर आरोहण किया था वहीं सूर्य अस्त हो गये थे। “ततोऽस्तमगमत् सूर्यः सन्ध्ययाप्रतिरञ्जितः । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥” इससे प्रतीत होता है कि उस दिन पूर्णिमा की रात्रि थी। इस दृष्टि से कृष्णपक्ष से युद्ध प्रारम्भ हुआ था। उसी रात्रि में नागपाश-बन्ध और उससे मुक्ति हुई थी। द्वितीया के दिन धूम्राक्ष-वध, तृतीया को वज्रदंष्ट्र का वध तथा चतुर्थी को अकम्पन का वध हुआ था। षष्ठी को रावण का मान-भङ्ग एवं सप्तमी को कुम्भकर्ण-वध हुआ था। अष्टमी को अतिकाय-वध तथा नवमी को इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था। दशमी को निकुम्भ-वध और उसी रात्रि को मकराक्ष-वध हुआ था। एकादशी से त्रयोदशी तक इन्द्रजित् का वध हुआ था। चतुर्दशी को मूलबल का वध, अमावस्या को रावण-युद्ध एवं उसका वध हुआ था।
५४२ रामायणमीमांसा अष्टादश तिलककार के अनुसार महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवों का १३ वर्ष का वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था । यह विराट्पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है । इसी तरह श्रीरामजी का १४ वर्ष का वनवास भी अधिक मास को लेकर ही पूरा हुआ था । इस तरह अमान्त मान से आश्विन कृष्ण चतुर्दशी में पूर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षों की पूर्ति होती है । अन्यथा चैत्रमास की शुक्ला दशमी से आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नहीं हो सकती थी । परन्तु अधिक मास की गणना से ११ दिन कम ६ मास की वृद्धि हो जाती है । तभी १४ वें वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है । अतः १२ वर्ष पूरे होने पर १३ वें वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुनशुक्ल अष्टमी को सीताहरण हुआ था । १४वें वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीरामजी लङ्का के समीप पहुँचे थे । “वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम ।” ( वा० रा० ५।३७।८ ) इसी सीतोक्ति के अनुसार सावन मान से स्वहरण दिन से १० मास बीत चुकने पर हनुमान् का सीता- संवाद हुआ था । “पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता” इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल १४शी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकूट- शिखर पर आये थे । हनुमान् के लङ्का प्रवेशकाल में— “हिमव्यपायेन च शीतरश्मिरभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः ।” “द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।” इन वाक्यों से प्रतीत होता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के बाद दो दिन के भीतर हनुमान् का लङ्काप्रवेश हुआ है । अन्यत्र मार्गशीर्षकृष्ण अष्टमी को राम का प्रस्थान कहा गया है । पौषपूर्णिमा को राम त्रिकूट पर आये । उसके बाद १५ दिन सेनानिवेश, दूतप्रेषण आदि में बीत गये । तब युद्धारम्भ हुआ । तब से लेकर भाद्र और श्रावण उभय अमान्त पर्यन्त लङ्कापुर के बाहर दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ तथा बहुत राक्षसों के क्षय से भयभीत होकर राक्षस लङ्का में प्रविष्ट हो गये । उस दिन युद्ध का अवहार ( युद्धबन्दी ) रहा । तदुत्तर प्रतिपदा को शरबद्ध राम का सीता ने दर्शन किया और उन्होंने कहा कि अक्षोभ्य सागर पार करके गोष्पद में दोनों भाई मारे गये— “तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ।” इससे प्रतीत होता है बहुत दिन के युद्ध में बहुत से राक्षस मारे गये थे । कतिपय यूथपों सहित थोड़ी ही सेना बांकी थी । उसी समय शरबन्ध हुआ था । “अयं ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल ।” यह कुम्भकर्ण के प्रति रावण ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि छः मास से अधिक कुम्भकर्ण को सोते बीत गये थे । सेतुबन्ध आदि वृत्तान्त तुम नहीं जानते । रावण के इस कथन से प्रतीत होता है कि मन्त्रणा के अनन्तर बीच में कुम्भकर्ण नहीं जगा था । यह भी प्रतीत होता है कि शरबन्धन कृष्णप्रतिपदा को नहीं हुआ, क्योंकि पूर्णिमा के अनन्तर की प्रतिपदा में सम्पूर्ण रात्रि में चन्द्रमा रहता है । इस स्थिति में “तस्मिंस्तमसि दारुणे” यह उक्ति सङ्गत नहीं होगी । अतः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा ही मानना युक्त है । अमावस्या को ही रावण-वध हुआ है, यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि इन्द्रजित् वध के अनन्तर यह कहा गया है कि तुम आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रु-विजय के लिए गमन करो । यह रावण के प्रति सुपार्श्व ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि चतुर्दशी को रावण-बल-वध के अनन्तर अमावस्या को रावण रणभूमि में आया और रात्रि में उसने राम तथा लक्ष्मण से युद्ध किया । शक्तिघात के अनन्तर वह राम से पराभूत होकर लङ्का चला गया—
अध्याय युद्धकाण्ड ५४३ लक्ष्मण की चिकित्सा के अनन्तर पुनः राम और रावण का युद्ध वाल्मीकि द्वारा वर्णित है। अतः अमावस्या का रावण-वध होना संभव ही नहीं था। अगस्त्य ने आदित्यहृदय का उपदेश दिन को ही दिया था, क्योंकि वहीं यह उल्लेख है कि आदित्य का दर्शन कर तथा आदित्यहृदय का जप करके राम प्रसन्न हुए— "आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वाेदं परं हर्षमवाप्तवान्।" (वा० रा० ६।१०५।२९) उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य का स्थिरप्रभ होना कहा गया है— "स्थिरप्रभश्चाप्यभवद् दिवाकरः।" (वा० रा० ६।१०८।३२) इससे प्रतीत होता है कि दिन में ही रावण वध हुआ था, अतः चिरकाल तक युद्ध होने के बाद लक्ष्मण पर शक्तिघात हुआ, तदर्थ औषधपर्वत का आनयन हुआ था। अमावस्या की रात्रि को शक्तिघात और रावण का मानभङ्ग कहा गया है इससे अमावस्या को रावण-वध नहीं कहा जा सकता। पद्मपुराण में कहा गया है— "ततो जज्ञे महायुद्धं संकुलं कपिरक्षसाम् । मध्याह्ने प्रथमं युद्धं प्रारब्धं प्रतिपद्यभूत् ॥" यहाँ प्रतिपदा का अर्थ शुक्ल प्रतिपदा है। उस दिन मध्याह्न में वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध हुआ। पर उसी दिन रात्रि को मायावी इन्द्रजित् ने नागपाश से दोनों भाइयों (राम और लक्ष्मण) को बाँध दिया था। "ततो निशि समागम्य मायावी शक्रजिद् बली । बबन्ध नागपाशैस्तौ राघवौ च हरिव्रजान् ॥" यहाँ ततः का अर्थ है बहुत काल तक युद्ध के बाद उसी दिन नहीं अन्यथा 'तस्यामेव निशि' ऐसा कहना उचित होता। अगले प्रसङ्गों में 'द्वितीयेऽह्नि षष्ठ्यां' कहा गया है। और रामायण में "दारुणे तमसि" भी कहा गया है। अतः भाद्रश्रावणोत्तर प्रतिपदा की रात्रि को इन्द्रजित् ने नागपाश का प्रयोग किया था। "वैनतेयस्तदाभ्येत्य तानि चास्त्राण्यमोचयत् । द्वितीयेऽह्नि धूम्राक्षं हनूमान्निजघान वै ॥" "तृतीयेऽह्नि वज्रदंष्ट्रं खड्गाच्छिच्छेद चाङ्गदः । जघान हनूमान् भूयश्चतुर्थेऽह्न्यकम्पनम् ॥" "प्रहस्तं पञ्चमीतिय्यां नीलश्छिच्छेद मूर्धनि । रावणः परिभूतोऽभूत् षष्ठ्यां रामेण धन्विना ॥" "अथ लङ्केश्वरः खिन्नः कुम्भकर्णं सहोदरम् ॥ शैलमुद्गरघाताश्वधावनाद्यैरबोधयत् । जघान तं कुम्भकर्णं रामः सप्तमवासरे ॥" अर्थात् तब गरुड़ ने आकर नागपाश से राम और लक्ष्मण को मुक्त किया। द्वितीय दिन हनुमान् ने धूम्राक्ष को मारा, तीसरे दिन वज्रदंष्ट्र को अङ्गद ने मारा। चौथे दिन हनुमान् ने अकम्पन को मारा। पञ्चमी तिथि को नील ने प्रहस्त का वध किया। षष्ठी को रावण राम के द्वारा अभिभूत हुआ। इससे स्पष्ट है कि पद्मपुराण से भी यही सिद्ध होता है कि प्रहस्त-वध के बाद रावण और राम का मुकाबला हुआ था। अतः बुल्के जो इसे प्रक्षेप कहते हैं, वह निर्मूल है। तब लङ्केश्वर ने खिन्न होकर कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयास किया। जगाने के लिए उसपर शैल और मुद्गर गिराये गये तथा घोड़े दौड़ाए गये। कुम्भकर्ण को राम ने मारा। दो दिन में कुम्भकर्ण को जगाया गया।
५४४ रामायणमीमांसा अष्टादश बोधित कुम्भकर्ण को बोधनोत्तर सातवें दिन मारा गया । इसी लिए सप्तमी का उल्लेख न होकर सप्तम वासर का उल्लेख है । जो लोग कहते हैं षष्ठी को जागरण और सप्तमी को ही वध हो गया उनका कथन ठीक नहीं है । उसके प्रबोधन का प्रयास दो दिन में सम्भव नहीं था । जागकर वह रावण मन्दिर में गया । वहाँ कहा गया है कि सूर्य की प्रभा से रावण का मन्दिर अत्यन्त भास्वर हो रहा था । मन्त्रणा आदि में समय लगने से सप्तमी के दिन युद्ध ही नहीं हो सकता था । इन्द्रजित् का वध तीन दिनों में हुआ था, पर इसका वध छः प्रहरों में हुआ है । अन्यथा—"वधोऽस्य यामषट्केन" इसके साथ सङ्गति न हो सकेगी । अतः भाद्रपद पूर्णिमा को इसका वध युक्त है । दूसरे दिन लक्ष्मण ने रावण-पुत्र अतिकाय को मारा था । अन्य दिन में इन्द्रजित् ने सुग्रीव, विभीषण एवं वानरों को ब्रह्मास्त्र से बाँधा था । उसी दिन हनुमान् ओषधिपर्वत लाये थे । उस पर्वत के औषधस्पृष्ट वायु से सब वानर उठ पड़े थे— “जघान लक्ष्मणोऽन्येद्युरतिकायं दशास्यजम् । बबन्धान्येद्युरिन्द्रारिर्ब्रह्मास्त्रेण नृपौ कपीन् ॥ हनूमता समानीतो महौषधमहीधरः । तस्यानिलस्पर्शवशात् सर्वे एते समुत्थिताः ॥” × × × “अन्येद्युः कपिराट् कुम्भं निकुम्भं वायुजोऽवधीत् । तस्यां निशि रघुश्रेष्ठो जघान मकराक्षम् ॥ मायासीतावधं चक्रे शक्रजिद् रणमूर्धनि । तेन खिन्नोऽभवद्रामः आश्वस्तो लक्ष्मणेन सः ॥ त्रयोदशाहे सौमित्रिस्त्रिदिनं योधयन् बली । जघान शक्रजेतारं रामध्यानेन हेतुना ॥” अन्य दिन सुग्रीव ने कुम्भ को तथा हनुमान् ने निकुम्भ को मारा । उसी दिन राम ने मकराक्ष को मारा । उसी रात को इन्द्रजित् ने मायासीता का रणभूमि में वध किया । उससे राम बहुत खिन्न हुए । लक्ष्मण ने उन्हें आश्वस्त किया । तेरहवें दिवस सौमित्रि ने रामध्यान के प्रभाव से तीन दिनों में मेघनाद को मारा । यहाँ अतिकाय के ग्रहण को त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, महोदर तथा महापार्श्व का उपलक्षण समझना चाहिये । अतः 'अन्येद्युः' का अर्थ अन्य दिनों में ऐसा करना चाहिये । तथाच छः दिनों में इन छहों का वध हुआ था, क्योंकि रामायण में क्रम से ही उनका वध कहा गया है । अन्येद्युः अर्थात् सप्तमी को इन्द्रजित् ने ब्रह्मास्त्र से वानरों को बाँधा । हनुमान् महौषध- पर्वत अष्टमी को लाये और अन्येद्यु अर्थात् नवमी को कुम्भ तथा निकुम्भ का वध हुआ । उसी रात्रि को राम ने मक- राक्ष को मारा । उसी रात्रि के अन्त में इन्द्रजित् ने मायासीता का वध किया । दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर की अवधि में लक्ष्मण ने इन्द्रजित् को मारा । “ततोऽवधीन्मूलबलं चतुर्दश्यां रघूद्वहः । दर्शोऽथ निर्ययौ राजा योद्धुं रामेण संयुगे ॥ चतुरङ्गबलैः सार्धं मन्त्रिभिर्दशकन्धरः । छत्रचामरसंयुक्तः सर्वाभरणभूषितः ॥ महारथगतो द्वारादुत्तरान्निर्ययौ बहिः । आगतो रक्षसां राजा ब्रह्मघ्नो देवकण्टकः ॥
अध्याय युद्धकाण्ड ५४५ योद्धुं रघुवरेणेति शुश्रुवे कलहध्वनिः । तत्र युद्धं समभवद् वानराणाञ्च रक्षसाम् ॥ रामरावणयोश्चैव तथा सौमित्रिणा सह । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धः सोऽनुजं प्रति रावणः ॥ वक्षसा धारयामास सौमित्रिस्तां वियद्गताम् । तया स वध्यमानः सन् पपात धरणीतले ॥ हनूमता जीवितोऽभूदोषध्यानयनात् पुनः। ततः क्रुद्धो महातेजा राघवो राक्षसान्तकः ॥ जघान राक्षसान् सर्वान् शरैः कालान्तकोपमैः । भयात् प्रदुद्राव रणे लङ्कां प्रति निशाचरः ॥ जगद् राममयं पश्यन् निर्वेदात् स्वगृहं विशत् । निकुम्भिलां ततः प्राप्तो होमं चक्रे जिगीषया ॥ ध्वंसितं वानरेन्द्रैस्तदभिचारात्मकं रिपोः । पुनरुत्थाय पौलस्त्यो रामेण सह योधितुम् । दिव्यं स्यन्दनमारुह्य राक्षसैर्निययौ बहिः ॥” चतुर्दशी को राघव ने रावण के मूलबल (खास सेना) को मारा। अमावस्या को रावण राम से लड़ने निकला। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना और उत्तम मन्त्री थे। छत्र, चामर तथा सर्वाभरणसम्पन्न राजा रावण महारथ पर आरूढ़ होकर उत्तर द्वार से बाहर निकला। राक्षसों का राजा, देवकण्टक तथा ब्रह्मघ्न रावण रघुवर से युद्धार्थ बाहर आया ऐसा हल्ला सुनायी दिया। वहाँ वानर और राक्षसों का घोर युद्ध हुआ। राम के साथ तथा सौमित्रि के साथ भी रावण का युद्ध हुआ। रावण ने विभीषण के प्रति शक्ति चलायी। लक्ष्मण ने उसे अपनी छाती पर रोका और उससे बाधित होकर वे धरती पर गिर पड़े। हनुमान् ने औषधि लाकर लक्ष्मण को जिलाया। उसके बाद राम ने काल तथा यम के तुल्य बाणों द्वारा सभी राक्षसों को मारा। भयभीत होकर रावण लङ्का भाग गया। रावण भय से सारे जगत् को राममय देखने लगा। उसने निकुम्भिला में प्रवेश कर होम करना आरम्भ किया। वानरेन्द्रों ने उस होम का विध्वंस किया। पुनः उठकर पौलस्त्य रावण राम से युद्ध करने के लिए दिव्य स्यन्दन द्वारा राक्षसों के साथ निकला। रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। “ततः शतमखो दिव्यं रथं हर्यश्वसंयुक्तम् । राघवाय स्वसूतेन प्रेषयामास भक्तिमान् ॥ तं तु मातलिनानीतमारुह्य रथसत्तमम् । स्तूयमानः सुरगणैः युयुधे तेन रक्षसा ॥ ततो युद्धमभूद् घोरं रामरावणयोर्महत् । साप्ताह्निकमहोरात्रं शस्त्रास्त्रैरतिभीषणैः ॥” इन्द्र ने हर्यश्वों से युक्त रथ मातलि के द्वारा भेजा। देवताओं से स्तूयमान राम ने स्यन्दन पर आरूढ़ होकर रावण से युद्ध किया। राम-रावण का घोर युद्ध हुआ। मातलि द्वारा रथ लाने के बाद सात दिन तक घोर युद्ध के पश्चात् रावण का वध हुआ। इसी पक्ष का समर्थन कालिकापुराण से होता है— ६९
'५४६ रामायणमीमांसा अष्टादश
“रामस्यानुग्रहार्थं वै रावणस्य वधाय च। रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा॥ ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते। जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद् राघवः पुरा॥ आगत इति शेषः। इदमागमनं रात्र्यन्ते, तदैव मातलि-रथागमनम् । रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी। यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत ॥ तावत्तु अष्टरात्राणि सर्वैर्देवैः सुपूजिता। निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः। विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः॥” राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी। राम और रावण का सात दिन तक युद्ध कराया। नवमी को राम से रावण का वध कराया। सब देवताओं तथा ब्रह्मा के द्वारा ८ दिन तक दुर्गा की पूजा होती रही। अग्निवेश्य प्रसिद्ध रामायण में कहा गया है— मार्गशुक्लदशम्यां तु वसन्तीं रावणालये। सम्पातिर्दशमे मासि आचख्यौ वानरेषु ताम् ॥ एकादश्यां महेन्द्राग्रात् पुप्लुवे शतयोजनम्। तद्रात्रिशेषे सीताया दर्शनं हि हनूमतः ॥ द्वादश्यां शिंशपावृक्षे हनूमान् पर्यवस्थितः। तस्यां निशायां सीताया विश्वासालापसत्कथाः ॥ अक्षादिभिस्त्रयोदश्यां ततो युद्धमवर्तत। वधो ह्यक्षकुमारस्य वनविध्वंसनं तथा॥ × × × पौषशुक्लप्रतिपदस्तृतीयां यावदम्बुधेः। उपस्थानं ससैन्यस्य राघवस्य बभूव ह॥ विभीषणश्चतुर्थ्यां वै रामेण सह संगतः। समुद्रतरणार्थाय पञ्चम्यां मन्त्र उद्गमः ॥ प्रायोपवेशनं चक्रे रामो दिनचतुष्टयम्। समुद्रवरलाभश्च सेतूपायप्रकीर्तनम् ॥ सेतोर्दशम्यामारम्भस्त्रयोदश्यां समापनम्। चतुर्दश्यां सुवेलाग्रे रामः सैन्यं न्यवेशयत् ॥ पौर्णमास्यां द्वितीयान्तं सम्पन्नं सैन्यतारणम्। दशम्यन्तं मन्त्रणमेकादश्यां शुकसारणयोः सैन्यप्राप्तिः। माघेऽसितायां द्वादश्यां सैन्यसंख्या कृता। सारणेन कपीनां तु सारासारोपवर्णनम् ॥
अध्याय युद्धकाण्ड ५४७
अग्निवेश्यरामायण के अनुसार मार्गशुक्ल दशमी को सीता लङ्का में लायी गयी। दशवें मास में सम्पाति ने वानरों को उनका समाचार बताया। ११वें दिन महेन्द्र पर्वत से कूदकर हनुमान् १०० योजन समुद्र पारकर लङ्का गये। उसी दिन रात को सीता का दर्शन हुआ। द्वादशी को शिंशपा में हनुमान् स्थित रहे। उसी रात्रि को सीता से वार्तालाप हुआ। त्रयोदशी को अक्षकुमार का वध हुआ। चतुर्दशी को इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से बन्धन हुआ। चतुर्दशी को लङ्कादाह हुआ। सप्तमी को लौटकर राम को प्रत्यभिज्ञान दिया। अष्टमी उत्तराफाल्गुनी में अभिजित् मुहूर्त में लङ्का के लिए राम का प्रस्थान हुआ। सातवें दिन में समुद्र के तीर पर सेनानिवेश हुआ। पौषशुक्ल प्रति- पदा से ४ दिन तक समुद्र के प्रति प्रायोपवेशन, १० मी से १३शी तक सेतुबन्ध, चतुर्दशी को सुवेलारोहण, पूर्णमासी से द्वितीया तक सैन्यतारण, ३या से १० मी० तक मन्त्रणा, माघशुक्ल १२शी को सारण ने सेना की संख्या की, फिर सारण ने वानरों के सारासार का वर्णन किया। ययावथाङ्गदो दौत्यं माघशुक्लादिवासरे। माघशुक्लद्वितीयादिदिनैः सप्तभिरेव तु ॥ रक्षसां वानराणां तु युद्धमासीत् सुदारुणम् । माघशुक्लनवम्यां तु रात्राविन्द्रजिता रणे ॥ रामलक्ष्मणयोर्नागपाशैर्बन्धो बभूव ह। नागपाशविमोक्षार्थं दशम्यां गरुडोऽभ्यगात् ॥ अत्रावहारः कथितः दशम्यादिदिनद्वयम् । द्वादश्यामाञ्जनेयेन धूम्राक्षस्य वधः कृतः॥ त्रयोदश्यां तु तेनैव निहतोऽकम्पनो रणे। माघशुक्लचतुर्दश्यां यावत् कृष्णादिवासरम् ॥ त्रिदिनेन प्रहस्तस्य नीलेन विहितो वधः। माघासितद्वितीयायाश्चतुर्थ्यन्तं त्रिभिर्दिनैः ॥ रामेण तुमुले युद्धे रावणो द्रावितो रणात्। पञ्चम्यास्त्वष्टमीं यावद् रावणेन प्रबोधितः॥ कुम्भकर्णः समुत्तस्थावत्रायुद्ध्यच्चतुर्दिनम् । कुम्भकर्णो दिनैः षड्भिर्नवम्यास्तु चतुर्दशीम् ॥ रामेण निहतो युद्धे बहुवानरभक्षकः । अमावस्या दिने शोकादवहारो बभूव ह॥ फाल्गुनादिप्रतिपदश्चतुर्थ्यन्तदिने नरान्तकप्रभृतयः पञ्च राक्षसा हताः। पञ्चम्याः सप्तमीं यावदतिकायो हतः। अष्टम्या द्वादशीं यावत् निकुम्भकुम्भावूध्वं मकराक्षश्चतुर्दिनैः । फाल्गुनकृष्णद्वितीयायां शक्रजिता जितम्। ततः पञ्च दिनान्यवहारः। त्रयोदशीमारभ्य षड्भिर्दिनैः लक्ष्मणेनेन्द्रजित् हतः। अमावस्यां ययौ वीरः युद्धाय दशकन्धरः ॥ चैत्रशुक्लप्रतिपदः पञ्चमीं दिनपञ्चकैः। रावणस्य प्रधानानां युद्ध्यतामभवत् क्षयः॥
चैत्रषष्ठ्याष्टमीं यावन्महापाश्र्वादिमारणम् । चैत्रशुक्लनवम्यां तु सौमित्रेः शक्तिभेदनम् ॥ द्रोणाद्रिराजनेयेन लक्ष्मणार्यमुपाहृतः । दशम्यामवहारोऽभूद् रात्रौ युद्धं नृरक्षसोः ॥ एकादश्यां तु रामाय रथो मातलिसारथिः । अष्टादशदिने रामो द्वैरथे रावणं वधीत् ॥ द्वादश्याः शुक्लपक्षस्य यावत्कृष्णचतुर्दशीम् । माघशुक्लद्वितीयायाश्चैत्रकृष्णचतुर्दशीम् ॥ अष्टाशीतिदिनं युद्धं मध्ये पञ्चदशाहकम् । युद्धावहारं संग्रामस्त्रिसप्तविदिनान्यभूत् ॥ संस्कारो रावणदीनाममावास्या दिनेऽभवत् । वैशाखादितिथौ रामः सुवेलं पुनरागमत् ॥ अभिषिक्तो द्वितीयायां लङ्काराज्ये विभीषणः । सीताशुद्धिस्तृतीयायां देवेभ्यो वरलम्भनम् ॥ वैशाखस्य चतुर्थ्यां तु रामः पुष्पकमास्थितः । पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां माधवस्य तु ॥ भरद्वाजाश्रमं रामः ससीतः पुनरागमत् । नन्दिग्रामे तु षष्ठ्यां वै भरतेन समागतः ॥ सप्तम्यामभिषिक्तोऽसावयोध्यायां रघूत्तमः । माघ शुक्ल १ को अङ्गद-दौत्य, २ या से सात दिन तक वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध, माघ शुक्ल ९ मी को नागपाशबन्ध, १० मी को गरुड़ द्वारा मुक्ति, दो दिन अवहार, १२ शी को धूम्राक्ष-वध, १३ शी को अकम्पन का हनुमान् द्वारा वध, माघशुक्ल १४ शी से तीन दिन में प्रहस्तवध, २ या से चतुर्थी तक राम से युद्ध में रावण का विद्रावणम् । पञ्चमी से ८ मी तक ४ दिनों में कुम्भकर्ण-प्रबोधन । नवमी से १४ शी तक ६ दिनों में कुम्भकर्णवध, ३० अमावस्या को अवहार, फा० शु० १ से ४ तक नरान्तकादिवध, ५ मी से ७ मी तक तीन दिन में अतिकाय-वध, ८ मी से १२ शी तक निकुम्भादि-वध, ४ दिनों में मकराक्ष-वध, फा० कृ० २ या को शक्रजित् की विजय, ३ या को औषधि आनयन, तदनन्तर ५ दिनों का अवहार ( युद्धबन्दी ), १३ शी से ६ दिन में इन्द्रजित् का वध, ३० अमा० को रावण की युद्ध यात्रा, चै० शु० ३ या से पाँच दिनों में रावण के प्रधानों का वध, चै० शु० ६ ष्ठी से ८ मी तक महापाश्र्वादि का वध, शुक्ल ९ मी को लक्ष्मण पर शक्ति औषधपर्वतानयन, १० मी को अवहार, ११ शी को मातलि आगमन, तदनन्तर १८ दिनों में रावण-वध । इस तरह माघशुक्ल २ या से चैत्रकृष्ण चतुर्दशी तक ८८ दिन तक युद्ध चला । बीच में १५ दिन अवहार रहा । अमा को रावण-संस्कार हुआ । वैशाख २ या को विभीषण का अभिषेक, ३ या को सीताशुद्धि, चतुर्थी को पुष्पकारोहण, वै० ५ मी को १४ वर्ष पर भरद्वाजाश्रम आगमन, ६ष्ठी को भरतभेंट और ७ मी को राम का अभिषेक । यद्यपि रावण-वध के अनन्तर सीता के दर्शन में विलम्ब होना अस्वाभाविक-सा लगता है तथापि कल्पभेद से कालगणनाभेद वश अग्निवेश्य-कथा की भी संगति हो सकती है । सर्वथापि ४ दिन में ही युद्धसमाप्ति की बात असम्भव ही है । अभी अभी बंगलादेश की स्वाधीनता का युद्ध १४ दिनों में समाप्त हुआ है । परन्तु अटकल के आधार पर कोई कह सकता है कि दो दिन में खुलना, कुष्ठिया आदि पर अधिकार, तीन दिन में चटगाँव, ढाका आदि पर
अधिकार कर लिया गया होगा । स्पष्ट ही है कि वस्तुस्थिति एवं अटकल में बहुत भेद होता है । बुल्के स्वयं मानते हैं कि प्रक्षिप्त सर्गों का ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है । हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५६४ वें अनु० में वे कहते हैं, "हनुमान् की हिमालय-यात्रा का दो बार सर्ग ७४ और सर्ग १०१ में वर्णन हैं । वे कहते हैं इसके प्रक्षिप्त होने का सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क हनुमान् के समुद्र-लङ्घन का वर्णन है (वा० रा० ५।१) । हिमालय की यात्रा इस लङ्घन से कहीं अधिक असाधारण है। फिर भी इस कार्य की कठिनाई का वर्णन नहीं किया गया । यदि समुद्र-लङ्घन तथा हिमालय यात्रा का वर्णन दोनों एक के ही द्वारा रचित होते तो हिमालय-यात्रा को अधिक महत्त्व दिया जाता । महाभारत में हनुमान् की हिमालय-यात्रा का उल्लेख नहीं है ।" परन्तु यह भी उनकी भ्रान्ति ही है, कारण स्पष्ट है । १०० योजन समुद्र का लङ्घन ही कठिन काम था, क्योंकि उसमें बीच में कहीं ठहरने या रुकने का अवकाश नहीं था। हिमालय-यात्रा में वह कठिनाई नहीं थी । पर्वतों और वृक्षों को उखाड़ कर लाना तो उन असाधारण बन्दरों के लिए कठिन था ही नहीं । इसके अतिरिक्त एक बड़ी कठिनाई के वर्णन के बाद पुनः पुनः वैसा ही वर्णन महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता । महाभारत का रामोपाख्यान तो संक्षेप कथानक ही है । अतः उसमें हिमालय-यात्रा का वर्णन न होना लाघवार्थ ही है । बुल्के कहते हैं कि "त्रिष्टुप् छन्दों का बाहुल्य भी प्रामाणिकता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करता है । सर्ग १०१ को हटाने पर १०० का १०२ से सुगमता से मेल बैठ जाता है । १०० के कुछ श्लोक १०२ में दुहराये गये हैं । इससे भी १०० का प्रक्षिप्त होना सिद्ध होता है," पर यह भी तर्क लचर ही है, क्योंकि महाकाव्यों में विविध छन्दों का होना दूषण न होकर भूषण ही है । मेल तो सर्गान्त के श्लोकों से ही हो जाता है फिर तो बीच के सभी श्लोक प्रक्षिप्त ही ठहरेंगे । इस दृष्टि से देखा जायगा तो सारी बाइबिल प्रक्षिप्त ही सिद्ध होगी । चमत्कारवाली सारी घटनाएँ बाइबिल की प्रक्षिप्त ही सिद्ध होंगी । अग्नि-परीक्षा ५६५ अनु०, अग्नि-परीक्षा के सम्बन्ध में पिछले प्रकरण में विचार हो ही चुका है । इसी तरह ५६६ वें अनु० में पुष्पक-यात्रा सर्ग १२३ को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । "यदि रावण के पास पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसका उपयोग वर्णित होता, किन्तु अरण्यकाण्ड में उसका उल्लेख नहीं है । सुन्दरकाण्ड का पुष्पक-वर्णन सर्ग भी प्रक्षिप्त है । युद्धकाण्ड की अन्तरङ्ग परीक्षा से भी प्रतीत होता है कि आदिरामायण में वापसी यात्रा में पुष्पक का कोई उल्लेख नहीं था । सर्ग १२३ के अन्त में पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुँचने का उल्लेख किया गया है, किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर राम के भरद्वाज आश्रम में पहुँचने का वर्णन है । लङ्का में राम ने विभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था— “अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ।” (वा० रा० ६।१२१।७) भरद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान माँग लिया था कि मार्ग में सभी वृक्ष अकाल में भी फल- दार हों “अकालफलिनो वृक्षाः ।” इसके अतिरिक्त हनुमान् से समाचार प्राप्त करने के पश्चात् जब अयोध्यावासी राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब वानर-सेना द्वारा गोमती नदी पार करने का तथा उनके द्वारा उड़ायी गयी धूल का उल्लेख किया गया है— "मन्ये वानर-सेना सा नदीं तरति गोमतीम् । रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥" (वा० रा० ६।१२७।२८)
५५० रामायणमीमांसा अष्टादश
इन उद्धरणों से अनुमान किया जा सकता है कि आदिरामायण में राम स्थल-मार्ग से ही अयोध्या लौटे थे । अतः पुष्पकविषयक सामग्री को विशेषकर सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिये।" बुल्के की उक्तियाँ कुशकाशावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। पहले नास्तिक लोग यह विश्वास ही नहीं करते थे कि उड़ने- वाला यथेष्ट मनुष्यों को लेकर चलनेवाला भी विमान हो सकता है ? परन्तु आज विमानों के बाहुल्यकाल में समझदार लोग अब वैसी शङ्का नहीं करते हैं, पर फिर भी पाश्चात्यों का यह अन्धविश्वास आज भी बना हुआ है कि दुनिया में सभ्यता या विज्ञान का विकास ईसा के पहले हो ही नहीं सकता। इसी कारण वाल्मीकिरामायण तथा सभी रामायणों में प्रसिद्ध पुष्पक यान को बुल्के झुठलाने का प्रयत्न करते हैं। इसी लिए वे सुन्दरकाण्ड के पुष्पक-वर्णन को भी झुठलाते हैं। यह कोई तर्क ही नहीं है कि यदि पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसी का प्रयोग होता। आज भी वायुयान रहने पर कई बार राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री मोटर पर भी यात्रा करते हैं। एतावता कौन कह सकता है कि राष्ट्रपति को वायुयान सुलभ नहीं है। इतना ही क्यों पुष्पक यान द्वारा ही रावण ने युद्ध क्यों नहीं किया ? यह भी शङ्का हो सकती है। बुल्के को क्या अभीष्ट है ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि पुष्पक यान था ही नहीं ? या था तो परन्तु उसका प्रयोग ही नहीं हुआ ? दोनों बातों में उक्त हेतु सङ्गत नहीं है, क्योंकि अमुक समय पर उसके प्रयोग का उल्लेख न होना उसके अभाव का साधक नहीं होता। जब कि उसके विपरीत सुन्दरकाण्ड में पुष्पक का वर्णन है। पुष्पक द्वारा राम की यात्रा का भी वर्णन है। केवल एक स्थल के अनुल्लेख से दो स्थलों के उल्लेख को अनुल्लेख कैसे मान लिया जाय ? यदि अरण्यकाण्ड में उल्लेख होता भी तो भी सुन्दरकाण्ड के उल्लेख के समान ही उसको प्रक्षिप्त कहने में आपको क्या बाधा हो सकती थी ? दूसरा तर्क और भी निस्सार है। यदि आप सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक को प्रमाण मानते हैं तो उसके पूर्वापर के श्लोकों को भी प्रमाण मानना ही पड़ेगा । अयोध्या का दुर्गम मार्ग है, यह कहने का प्रसङ्ग ही क्यों आया और फिर उसका समाधान क्या हुआ ? इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि विभीषण ने प्रार्थना की कि ये अलङ्कारकुशल पद्माक्षी स्त्रियाँ आपको विधिवत् उद्वर्तन, अभ्यङ्ग, स्नान, अङ्गराग, वस्त्राभरण, चन्दन तथा दिव्य माल्य धारण करायेंगी। इसपर राम ने विभीषण से कहा कि सुग्रीव प्रभृति मुख्य वानरों को स्नानादि करने को निमन्त्रित करो। वह धर्मात्मा सुखोचित सुकुमार सत्यसंश्रय महाबाहु भरत मेरे लिए तपस्याभिरत होकर संतप्त हैं। उन कैकेयीपुत्र धर्मचारी भरत के विना मुझे स्नान, वस्त्राभरण आदि कुछ भी इष्ट नहीं है। अतः हम शीघ्र ही जाना चाहते हैं। अयोध्या जाने का रास्ता बड़ा ही दुर्गम है। राम का ऐसा वचन सुनकर ही विभीषण ने कहा कि मैं आपको एक ही दिन में अथवा झटिति अयोध्या पहुँचाऊँगा । सूर्यसंनिभ पुष्पक नामक विमान, जो कि कुबेर का था, जिसे बलवान् रावण ने जीत लिया था। वह कामगामी दिव्य विमान आपके लिए प्रस्तुत है। इससे आप शीघ्र ही अयोध्या पहुँच जायँगे। इससे स्पष्ट है कि अयोध्या का मार्ग दुर्गम है। भरत का विश्लेष अधिक काल तक अब सह्य नहीं है। इस स्थिति में पुष्पक का प्रयोग उपयुक्त ही है। बुल्के के अनुसार यदि पद-यात्रा होती तो लङ्का से अयोध्या पहुँचने में कम से कम तो एक मास का समय अपेक्षित होता। बहुसंख्यक वानर दल को लेकर इतनी दूर की यात्रा का उल्लेख भी कहीं नहीं है, अतः सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक से ही पुष्पक यान द्वारा राम की अयोध्या-यात्रा प्रमाणित होती है। वहीं विभीषण ने यह भी कहा, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, यदि आप मेरे गुणों और सेवाओं को स्मरण करते हैं, यदि मुझमें आपका सौहार्द है तो आप यहाँ सर्वकामों से अचित होकर कुछ समय निवास करें। ससैन्य तथा ससुहृद्गण मेरी सत्क्रिया को स्वीकार करें। मैं बड़े प्रणय, संमान तथा सौहार्द से आपसे प्रार्थना करता हूँ। मैं आपका प्रेष्य ( सेवक ) हूँ, आज्ञा नहीं प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या का प्रस्थान करें। राम ने सुन रहे सभी वानरों और राक्षसों के बीच में कहा कि वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट साचिव्य ( मन्त्रणा ) से पूजित हो चुका हूँ। मैं तुम्हारी बात न मानूंगा यह नहीं, किन्तु राक्षसेश्वर, अपने उस भरत को
अध्याय युद्धकाण्ड ५५१ देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर है, जो मुझे लौटाने के लिए चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने के लिए प्रार्थना कर रहा था, फिर भी जिसकी बात को मैंने नहीं स्वीकार किया। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी, सुहृद् गुहराज तथा जानपदों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है, अतः मुझे जाने की ही अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसेश्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं । शीघ्र ही विमान लाओ— “स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः । सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ तं विना कैकेयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् । न मे स्नानं बहुमतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ एतत्पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छामि तां पुरीम् । अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः । अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसन्निभम् । त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥” (वा० रा० ६।१२१।५–११) इस प्रसङ्ग से स्पष्ट ही पुष्पक-यात्रा की सङ्गति प्रतीत होती है । सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त मान लेने से यही कहना पड़ेगा कि एकदम १४ वर्ष पूर्ण होने पर पञ्चमी के दिन भरद्वाज के आश्रम में आ गये । पर यह वर्णन अस्वाभाविक ही होगा, स्वाभाविक यही है कि पुष्पक यान के द्वारा लौटते हुए राम सीता को त्रिकूटशिखरस्थित लङ्का, युद्धस्थली, रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि के वधस्थलों को बतलाते हुए सेतुबन्ध महादेव आदि की चर्चा करते हुए किष्किन्धा आये । वहाँ से सुग्रीवादि के अन्तःपुर को लेकर ऋष्यमूक, पम्पा, कबन्ध-वधस्थल, जटायुमुक्ति- स्थान, गोदावरी, अगस्त्य और शरभङ्ग के आश्रम और चित्रकूट दिखलाते हुए ऊपर से दिखायी देनेवाली अयोध्या को दिखलाकर भरद्वाज के आश्रम में उतरे । कोई दुस्तर्क ही करने बैठे तो कह सकता है राम अगस्त्य के आश्रम में तथा चित्रकूट आदि में क्यों नहीं रुके । भरद्वाज के आश्रम में ही क्यों रुके, सीधे अयोध्या क्यों नहीं चले आये ? अस्तु, सर्ग १२४ में राम ने स्वयं वरदान नहीं माँगा, किन्तु महर्षि ने ही सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन कर कहा कि जैसे ब्रह्मादि देवताओं ने वरप्रदान किया था वैसे ही मैं भी आपको वरप्रदान करता हूँ। तब राम ने वानरों के सुख के लिए वरदान माँगा कि सभी वृक्ष उत्तमोत्तम अमृततुल्य रस और गन्धयुक्त फलवाले तथा उत्तमोत्तम मधुस्रावी हो जायँ । पर इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि राम पदाति वानरों के साथ चल रहे थे । इसी तरह वानर- सेना गोमती पार कर रही थी, उससे उड़ी हुई धूलि से इतना ही सिद्ध होता है कि वानर-सेना नदी पार कर रही थी और वही वहाँ पदाति चल रही थी । सेतुबन्ध होने पर भी बहुत से बन्दर उड़कर तथा कूदकर पार जा रहे थे । हनुमान् तथा अङ्गद पर आरूढ होकर राम और लक्ष्मण वानरी-सेना के आगे चल रहे थे । बहुत से वानर बीच में, बहुत से अगल बगल चल रहे थे, कई लोग सलिल मार्ग से चल रहे थे एवं बहुत से सुपर्ण के तुल्य आकाशमार्ग से ही चल रहे थे— “सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे । केचिद् वेहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥” (वा० रा० ६।१२४।८१ )
इसी तरह वानर लोग मधुर फल एवं सुगन्धित मधु पान करते हुए भूमिमार्ग पर चल रहे थे। वे ही लोग गोमती पार करते हुए धूलि उड़ा रहे थे । उसी सर्ग १२७ का जहां वानरों के गोमती पार करने की चर्चा है वहीं यह भी वर्णन है कि हनुमान् ने बतलाया यह तरुणादित्य संकाश विमान आ रहा है । इसमें वैदेही के साथ राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। उनके साथ सुग्रीव एवं राक्षसराज विभीषण बैठे हैं। इस तरह प्रधान प्रधान लोग विमान में थे । अन्य बहुत से लोग आकाश-मार्ग तथा स्थल-मार्ग से चल रहे थे । “विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।” ३०।। “एतस्मिन् भ्रातरो वीरो वैदेह्या सह राघवौ । सुंग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ।। "३२।। (वा० रा० ६।१२९) यदि इसे प्रक्षेप कहें तो गोमती तरणवाले श्लोक को ही क्यों न प्रक्षेप कहा जाय ? अतः १२५ वें सर्ग के अनुसार समझना चाहिये कि आकाश-मार्ग से आते हुए राम ने अयोध्या देखकर विचार किया कि आज पञ्चमी को ही १४ वाँ वर्ष पूर्ण हो रहा है। भरद्वाज के आश्रम में विलम्ब हो सकता है। भरत की प्रतिज्ञा थी कि यदि १४ वर्ष पूर्ण होने पर आपका दर्शन न होगा तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा । इसलिए राम ने हनुमान् पर दृष्टि डाली और कहा तुम अयोध्या शीघ्र जाओ और जानो कि सब लोग सकुशल हैं ? शृङ्गवेरपुर जाकर मेरे आत्मतुल्य सखा निषाद- राज से कुशल कहो । वे सब अयोध्या की स्थिति बतलायेंगे । भरत को सब समाचार बताओ और भरत आदि का अभिप्राय जानो । यदि वे राज्य चाहते हों तो वही सम्पूर्ण वसुधा का शासन करें । इस तरह भरत का अभिप्राय जान जब तक आश्रम से दूर अयोध्या के समीप न पहुँचें तभी तक लौटकर सब समाचार बताओ । हनुमान् आकाशमार्ग से शीघ्र ही गुहराज से मिल कर भरत से मिले । भरत को सविस्तर राम का सारा समाचार सुनाया और भरत की दृढ़ प्रीति की स्थिति का प्रत्यक्ष दर्शन किया । पद्मपुराण के अनुसार पञ्चमी को ही हनुमान् ने अयोध्या जाकर देखा कि भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं— "अग्निप्रवेशे सोद्योगः काले भ्रातुरनागमात् । न्यवेदयत्तदा तस्मै श्रीरामागमनोत्सवम् ॥” ( वा० रा० ६।१२५।१ टीकोद्धृत पद्मपुराणवचन ) भ्राता राम के न आने के कारण भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे थे । हनुमान् ने जाकर उन्हें श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार सुनाया था । अपने सखा वानरेन्द्र सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गदादि तथा विभीषण आदि की प्रियकामना से ही समुचित स्वागत आदि के लिए राम ने हनुमान् को अयोध्या भेजा था— “प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ।” ( वा० रा० ६।१२६।१ ) सभी वानरों के सम्मान एवं स्वागत के लिए ही राम ने भरद्वाज से दिव्य गन्ध और रस से युक्त अमृतो- पम फलों से युक्त एवं मधुस्रावी वृक्षों के होने का वरदान माँगा था। भरद्वाज के वर-प्रदान से सभी वृक्ष कल्पवृक्ष के समान दिव्य पुष्प और फलों से लद गये थे । शुष्क वृक्ष भी पत्र, पुष्प, फल तथा दिव्य मधु प्रस्रवणशील हो गये । अयोध्या के मार्ग में सब तरफ तीन तीन योजन तक यही स्थिति रही— “अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसन्निभाः । निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥ शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः । सर्वतो योजनास्तिस्रो १ गच्छतामभवंस्तदा ॥" (वा० रा० ६।१२६।२१,२२) १. योजना त्रीणि इति वा पाठः ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५५३ यह सब वानरों के विश्रामार्थ ही हुआ । यहाँ तिलककार ने "वानराणां विश्रामार्थमिति शेषः" कहा है । अतएव वानर भरद्वाज के आश्रम से फलों, फूलों तथा मधुररस फलों का स्वाद लेते हुए पुष्पक छोड़कर आकाश-मार्ग एवं स्थल-मार्ग से ही चल पड़े । इसी लिए वानर-सेना के पदाति चलने तथा गोमती पार करने का उल्लेख सार्थक ही है । यदि पुष्पक-प्रयोग न हुआ होता तो अवश्य ही उल्लेख होना आवश्यक था कि राम पैदल चले या किसी रथ पर चले । रथ भी तो कौन ? रावण-रथ के समान आकाशचारी रथ था या भूमिचारी था और राम कितने दिनों में भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे ? पूर्वोक्त गणना के क्रम से और सर्ग १२१ की भरतसम्बन्धी रामचिन्ता से स्पष्ट निश्चय होता है १४ वर्ष पूरे होने में एक दो दिन ही शेष थे । अतः पुष्पक यान के बिना इतनी शीघ्रता से अयोध्या पहुँचना असम्भव ही था । बुल्के आगे चलकर ५६७ वें अनु० में युद्धकाण्ड में विकास की बात करते हैं । वस्तुतः प्राणी को एक झूठ का समर्थन करने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं । ऐसे ही बुल्के को एक अंश को प्रक्षिप्त सिद्ध करने के लिए तत्सम्बन्धित अनेक स्थलों को भी क्षेपक कहना पड़ता है । युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम हनुमान् की प्रशंसा करते हुए लङ्का-दहन का उल्लेख करते हैं तथा समुद्र के कारण चिन्तित होते हैं । इस अंश को बुल्के इसलिए प्रक्षेप कहते हैं कि वे लङ्का-दहन को प्रक्षिप्त कह चुके हैं । सर्ग २ और ३ को भी वे विकास मानते हैं, क्योंकि उनमें लङ्का-दहन की बात है । सेतुनिर्माण के उल्लेख को वे इसलिए प्रक्षेप मानते हैं कि सेतुनिर्माण का अब तक निर्णय हुआ ही नहीं था, क्योंकि राम ने समुद्र के तट पर पहुँचकर कहा कि अब हमें समुद्र पार करने के उपाय पर परामर्श करना चाहिये— "सम्प्राप्तो मन्त्रकालो नः सागरस्येह लङ्घने ।” ( वा० रा० ६।४।१०१ ) इस सर्ग में सेना के अभियान का वर्णन किया गया है । बुल्के का यह तर्क निराधार है, कारण कि अन्तिम निर्णय होने के पहले भी सम्भावना के आधार पर आश्वासन देना असम्भव नहीं है । समुद्रपार लङ्कास्थित सीता का आनयन करना ही है । हनुमान् जैसे अध्यवसायी, उद्योगी और प्रयत्नशील हैं वैसे सब नहीं हैं, अतः समुद्र में सेतुबन्ध द्वारा ही इतनी बड़ी सेना उतारी जा सकती है । सुग्रीव का यह आश्वासन देना कि समुद्र में सेतु बाँधकर हम लोग समुद्र उतरेंगे असम्भव नहीं कहा जा सकता है । इतनेमात्र से सर्ग के सर्ग को प्रक्षिप्त मानना असङ्गत ही है । मन्त्रणा द्वारा अन्तिम निर्णय किया जाता है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि मन्त्रणा के पहले वैसी बातें किसी के मन में आ ही नहीं सकतीं । अतएव सुग्रीव का यह वाक्य युक्त ही है— "अबध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये । लङ्का न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥" ( वा० रा० ६।२।११ ) घोर वरुणालय समुद्र में सेतुबन्ध के बिना सेन्द्रादि सुरासुर भी लङ्का का मर्दन नहीं कर सकते । अतः— "सेतुरत्र यथा बध्येद्यथा पश्येम तां पुरीम् ।” ( वा० रा० ६।२।९ ) वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार भरत ने भी सीताहरण का समाचार सुनकर राजाओं को आमन्त्रित कर युद्ध की तैयारी की थी । परन्तु उनके वहाँ गमन के पहले ही वानर-सेना सहित राम ने लङ्काविजय कर ली थी । "भरतेन वयं पश्चात् समानीता निरर्थकम् ।” ( वा० रा० ७।३९।४ )