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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

शास्त्रों के अनुसार निराकार निर्गुणोपासना भी विहित है। उससे भी दोष दूर होते हैं। एक निर्गुणो- पासक के हृदय में प्रतिशोध की भावना सङ्गत नहीं है। गुह की उपासना के विपरीत निराकारवादी कबीर की प्रवृत्ति धर्मयुक्त नहीं हो सकती। यदि निराकार राम सगुण साकार राम हो सकते हैं तो यह सत्य वस्तुस्थिति सिद्ध संत कबीर के मन में अवश्य आनी चाहिये थी। सिद्ध के मन में ऐसी प्रतिक्रिया हो जिससे वह सत्य से मुंह मोड़ ले, यह कैसी सङ्गति और कैसी सिद्धि है ? वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार वैसे ही सम्भव नहीं, जैसे नेत्र के बिना रूपसाक्षात्कार असम्भव है। “दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय । घर की चकिया कोई ना पूजे जाकर पीसा खाय ॥” यह कबीर का कथन असङ्गत है, क्योंकि आस्तिक पत्थर नहीं पूजते । किन्तु वेद प्रमाण के अनुसार पाषाणमयी प्रतिमा में आवाहित परमेश्वर की ही पूजा करते हैं। फिर कबीर को तो इतना भी ज्ञान नहीं था कि हिन्दू चाकी ही नहीं अपितु कुम्हार के चाक को भी पूजते हैं। श्रीराम ने शम्बूक को सत्कर्म करने का अनधिकारी कभी नहीं माना। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। वर्णा- श्रम-मर्यादा का उल्लङ्घन करने के कारण ही श्रीराम रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड देने को बाध्य हुए थे। फिर यदि वे वर्णाश्रममर्यादोल्लङ्घी किसी को दण्ड दें तो उनका क्या दोष है ? शास्त्रानुसार ब्राह्मण भले अखण्ड भूमण्ड का स्वामी हो, राजा हो, परन्तु उसे राजसूय यज्ञ का अधिकार नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय जाति का राजा ही राजसूय यज्ञ कर सकता है, अन्य नहीं । इस सत्य निष्पक्ष स्थिति में कबीर अगर दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम को ईश्वर नहीं मानते तो क्या प्रतिक्रियावादी या दुराग्रही नहीं कहे जायेंगे ? श्रीराम ने तो वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए भी शबरी, गीध, कोल, भिल्ल, किरात, वानरों और भालुओं से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था। फिर, उन्हें किसी प्रकार भी अनीश्वर कैसे कहा जा सकता है ? “एक दारुगत देखिय एकू । पावक युग सम ब्रह्मबिबेकू ॥” ( रा० मा० १।२२।२ ) दारुगत अग्नि निराकार है। पर वही दाहकत्व और प्रकाशकत्व विशिष्ट होकर साकार भी हो जाता है । “जो गुणरहित सगुन सो कैसे । जिमि हिम उपल बिलग नहिं जैसे ॥” (रा० मा० १।११५।२) जब दशरथनन्दन रघुवर ईश्वर हो सकते हैं तब राम को अनैतिहासिक भी कैसे कहा जा सकता है ? यदि कोई रघुवंश नहीं हो तो व्यापक नित्य राम को दशरथनन्दन कैसे कहा जा सकता था ? “बन्दहुँ राम नाम रघुवर को” ( रा० मा० १।१८।१ ) “महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। यदि उन्हें उनमें पूर्ण मानवता का साक्षात्कार हुआ था तो वह स्वाभाविक ही था। किन्तु तुलसी ने राम को देखा तब उन्हें वे केवल मानव के रूप में कैसे दिख सकते थे । काल की इस विशाल परिधि में स्वयं अपने को अभिव्यक्त करनेवाला ईश्वर को छोड़कर अन्य कोई नहीं हो सकता था।” परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकि श्रीराम को माधुर्यभाव की दृष्टि से, राजकुमार की दृष्टि से वर्णन करते हुए भी परमेश्वर ही मानते हैं। “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । जज्ञे विष्णुर्महातेजा आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥”

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६५ "भवान्नारायणो देवः" ( वा० रा० यु० का० ) तुलसीदास उक्त तर्क के आधार पर नहीं, किन्तु वेद और पुराण, महाभारत के आधार पर राम को परमेश्वर मानते थे । क्योंकि काल की इस विशाल परिधि के पार तो कई सिद्ध भी अपने को अभिव्यक्त कर सकते थे । योगभाष्य के अनुसार जैगीषव्य दस महाकल्पों के अनन्तर भी अपने को व्यक्त कर सकते थे । "दशसु महाकल्पेषु विपरिवर्तमानेन मया यत्किञ्चिदनुभूतं तद् दुःखमेव ।" तभी तो तुलसीदास श्रीराम का कोशलपाल के रूप में ही स्मरण करते हैं । "तुलसी तो को कृपालु जो कियो कोशलपाल । चित्रकूट को चरित्र चेत चित करि सो ॥" यह कहना भी गलत है कि "गोस्वामी के मन में इतिहास के प्रति कोई आकर्षण नहीं था । उनके लिए राम पुराण या त्रेतायुग के बीते हुए पात्र नहीं हैं। वह तो उनके शाश्वत विद्यमान रहनेवाले राम हैं ।" क्योंकि उनकी दृष्टि में वाल्मीकि के अनुसार राम केवल त्रेतायुग के ही नहीं हैं। वे विष्णु, नारायण या वेदवेद्य परमात्मा ही थे । अतएव शाश्वत हैं । तभी तो राम को रघुवंशमणि एवं कोशलपाल कृपालु कहते हैं। अतः त्रेता युग में चक्रवर्ती दशरथनन्दन के रूप में प्रकट राम ही तुलसी के शाश्वत राम भी हैं । वस्तुतः तुलसी के निर्मल पवित्र भाव पर जो उन्हें वर्णाश्रमधर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते हैं ऐसे वक्ताओं से जनता को ईश्वर ही बचाये । वे कहते हैं कि "राघवेन्द्र केवट के उस दैन्य को मिटा देना चाहते थे, जिसे समाज ने उसपर लाद दिया था । वह धन की दृष्टि से ही नहीं, हर तरह से हीन कर दिया गया था । वह अस्पृश्य था । "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ।" वह किसी राजा के समक्ष मुख खोलने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।" यह वही सुधारवाद है जिसका भूत आधुनिक लोगों पर सवार होता है । कथावाचक सज्जन भी उसके अपवाद नहीं हैं। परन्तु उनके अनुसार राम एवं तुलसी को अवश्य ही नयी आचारसंहिता प्रचलित करनी चाहिये थी । कम से कम "जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा" का उत्तर अवश्य देना चाहिये था । वक्ता कह सकता है कि भगवान् ने उसे गले लगाकर ही इसका उत्तर दे दिया था । परन्तु वह भूल करता है । क्योंकि शास्त्रसंस्कारी तो यह समझ लेगा कि आचार में धर्मशास्त्र प्रमाण होता है, इतिहास नहीं। हिन्दी व्यवहार में आदरणीय नहीं, किन्तु कांस्टिट्यूशन ही व्यवहार में आदरणीय है । ईश्वरों का सब आचरण काम में नहीं लाना चाहिये, किन्तु उनकी आज्ञा का ही पालन करना चाहिये— "ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।" (भाग० १०।३३।३२) शास्त्राविरुद्ध ही आचरण अनुष्ठानयोग्य होता है। वैदिक भी यही कहते हैं— "यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि ।" (तै० उ० १।११।२) जो हमारे अनवद्य निर्दोष शास्त्राविरुद्ध आचरण हैं उनका ही आदर करना चाहिये अन्य का नहीं । समाज ने कोई चीज किसी पर लाद दी, यह निष्प्रमाण है। विशेषतः वह शास्त्रानुसारी समाज जिसमें श्रीराम का अवतरण हुआ उसने कोई अनुचित स्थिति किसी पर लादी होती तो क्या उसमें राम का प्रादुर्भाव होना

७६६ रामायणमीमांसा एकविंश उचित था ? शास्त्रानुसारी समाज सदा से प्राणीमात्र को आदर देता है । 'वासुदेवः सर्वमिति' सब वासुदेव ही हैं । यह उसका दर्शन है । रन्तिदेव आदि का उदाहरण दिया जा चुका है । तुलसी ने 'गिरा ग्राम्य सिय राम जस' इस वचन से नम्रता प्रकट की है । परन्तु वक्ता इससे भी संस्कृत काव्यों पर छीटाकसी करता है । 'जिनके अन्तःकरण में यह भय था कि वाल्मीकि, व्यास, भवभूति तथा कालिदास की दिव्य देवभाषा से अलंकृत रामकथा की तुलना में तुलसी के 'ग्राम्य गिरा सियराम जस' में आकर्षण होगा ? किन्तु समय ने उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी शङ्का कितनी निर्मूल थी । कभी-कभी वस्त्रालङ्कार हमारी दृष्टि को इतना उलझा देते हैं कि अन्तराल में छिपे हुए सौन्दर्य को सहज रूप में देख पाना कठिन हो जाता है । आभूषणों का सौन्दर्य हमें व्यक्ति के स्थान पर आभूषणनिर्माता के कौशल की ओर ही ले जाता है । काव्य के रचयिता का पाण्डित्य भी कभी-कभी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न कर देता है । किसी महाकाव्य को पढ़ते हुए यदि हमारी दृष्टि नायक के स्थान पर काव्यकौशल की ओर अधिक जाती हो तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह किसी कवि की सफलता है ? यदि किसी रचनाकार का उद्देश्य अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन हो तो उसको उसमें सफलता की अनुभूति हो सकती है । किन्तु एक भक्त के लिए यह स्थिति सर्वथा असह्य होगी । रचना का वास्तविक उद्देश्य तो नायक को ही पाठक के अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करना होना चाहिये । गोस्वामीजी का दृष्टिकोण यही था । गोस्वामीजी को ऐसा लगा कि वस्त्र और आभूषणों को हटा देने पर राघवेन्द्र का सौन्दर्य उसी रूप में झलक उठे जैसे काई को हटा देने पर जल । राम के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ ।” आधुनिक लोग समझते हैं कि संसार की सारी बुद्धि हमारे ही पास है और कुछ जानते ही नहीं । पर वस्तुतः आधुनिक तथोक्त अभिमानी ही सर्वज्ञान शून्य हैं, क्योंकि कोई भी भूषण, अलङ्कार मुख्य नायक का उपकरण है, अङ्ग है, स्वयं अङ्गी नहीं है । उस अञ्जन की कीमत नहीं जिससे आँख फूट जाय । उस अलङ्कार का कोई महत्त्व नहीं जिससे अलङ्करणीय की शोभा, आभा, प्रभा छिप जाय । श्रीभागवत में स्पष्ट ही कहा है कि —'परं पदं भूषण- भूषणाङ्गम् ।' भगवान् का मङ्गलमय अङ्ग भूषणों का भूषण है। अलङ्कारों से भगवान् के श्रीअङ्ग अलंकृत नहीं होते अपितु अलङ्कार ही भगवान् के अङ्गों से अलंकृत होते हैं । अतएव वैसे भले ही अलङ्कार काई के तुल्य सौन्दर्य के आवरक हों, किन्तु प्रभु के अङ्गों से अलंकृत होने से वे कोटि-कोटि गुणित चमत्कृत होकर भगवान् के अङ्ग को अलंकृत करनेवाले हो जाते हैं । तभी दृश्य, अदृश्य, लौकिक, अलौकिक भगवान् के सभी श्रीविग्रहों को विविध वस्त्रालङ्कारों से विभूषित सुसज्जित अलंकृत किया ही जाता हैं। भूषणों की ही बात क्या ? गुणों का भी तो यही हाल है । प्रभु स्वयं कहते हैं कि—'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम् ।' मुझ निरपेक्ष निर्गुण को गुण ही भजते हैं । जैसे प्रभु के मुकुट, किरीट, कुण्डल, कौस्तुभादि अलङ्कार जन्मजन्मान्तरों की तपस्याओं से प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्ध जोड़कर धन्य धन्य होते हैं । वैसे ही गुण भी तपस्याओं के द्वारा प्रभु को प्रसन्न कर प्रभु से सम्बन्धित होकर धन्य धन्य होते हैं । क्योंकि जैसे सीमित सौन्दर्यवाले व्यक्ति में ही अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान हो सकता है। निःसीम सौन्दर्य में अलङ्कारों से सौन्दर्य का आधान नहीं हो सकता है। वैसे ही गुण भी सातिशय महत्त्ववाले स्वाश्रय में महत्त्वातिशय का आधान कर सकते हैं । सीमित आनन्दवाले में आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं । परन्तु जिसका निःसीम स्वाभाविक महत्त्व तथा निःसीम स्वाभाविक आनन्द है उसमें गुण किस प्रकार महत्त्वातिशय या आनन्दातिशय का आधान कर सकते हैं ? अनर्थ-निवर्हण भी गुण वहीं कर सकते हैं जहाँ अनर्थ की सत्ता हो, भगवान् तो नित्य निरस्तसमस्तानर्थ- सत्ताक हैं । वे ब्रह्म निरतिशय बृहत् हैं । अनन्तपदसमभिव्याहृत ब्रह्मपद से तो निरतिशय निरुपाधिक देश, काल और

वस्तुपरिच्छेद से रहित वृहत् ब्रह्म वस्तु ही बोधित होती है और वे निरतिशयानन्दस्वरूप हैं। फिर प्राकृत या अप्राकृत कोई भी गुण महत्त्वातिशयाधान द्वारा या अनर्थनिवर्हण द्वारा भगवान् में कैसे सार्थक हो सकते हैं। तो भी गुण जन्म- जन्मान्तरों की तपस्याओं एवं उपासनाओं द्वारा प्रभु से सम्बन्धित होते ही हैं। तुलसी के मानस में भी काव्यगुणों की कमी नहीं है। एतावता भी उसकी उद्देश्यपूर्ति में बाधा नहीं पड़ी। फिर वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि के काव्यगुणों से भगवान् के स्वरूप का आवरण कैसे होता है ? अतः व्यर्थ ही यहाँ वाल्मीकि, व्यास, भवभूति और कालिदास के काव्यों एवं तुलसी के-“गिराग्राम्य सियराम जस” के तारतम्य वर्णन का प्रयास किया गया है। तुलसी स्वयं जिन्हें पूज्य और वन्दनीय मानते हैं, उनके विरुद्ध तुलसी की पंक्तियों को जोड़ना धृष्टता ही नहीं, अक्षम्य अपराध भी है। यह कथन नितरां असङ्गत है कि “भूतभावन शिव और तुलसीदास दोनों की दृढ़ मान्यता है कि श्रीराम एक व्यक्ति न होकर साक्षात् ईश्वर हैं। इसी लिए व्यक्ति के इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।” क्योंकि यह बात शिवजी एवं तुलसी की ही क्यों वसिष्ठ, वाल्मीकि और व्यास को भी यही सम्मत था। लेखक तो केवल तुलसी के मानस के अनुसार तुलसी और शिव के सम्बन्ध में राय प्रकट कर सकता है। अलग से तो शिवजी की मान्यता के सम्बन्ध में उसके पास कोई प्रमाण ही नहीं है। यदि इतिहास और पुराणों के आधार पर कुछ कहेगा तो वह इतिहास-पुराणों का ही मत समझा जायगा। वस्तुतः यदि तुलसी के ही कथनानुसार तुलसी की बात मान्य है तब उसी तरह कबीर, सूर, नानक आदि की मान्यताएँ ठहरेंगी। उस स्थिति में मानस की कोई विशेषता नहीं सिद्ध होगी। वस्तुतः बेसिरपैर की निराधार ' कल्पनाओं की अपेक्षा तुलसी के अनुसार उनके मानस का आधार नानापुराणनिगमागम ही है। तुलसी की परम्परा और उनके मूल शिव का भी आधार नानापुराणनिगमागम ही है। प्रत्यक्ष में भी सहस्रों चौपाइयों का आधार अध्यात्मरामायण एवं श्रीभागवत में ज्यों का त्यों मिलता है। वाल्मीकिरामायण को वे स्वयं महान् सेतु मानकर उसी के आधार पर चलनेवाली पिपीलिका के समान अपने आपको मानते हैं। वेद, वाल्मीकिरामायण और व्यास के पुराण डङ्के की चोट पर इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत करते हैं। “एक व्यक्ति जन्म लेकर कुछ वर्षों के पश्चात् मृत्यु का ग्रास बन जाता है। उसके जीवन में जो घटनाएँ घटती हैं, उन्हीं को इतिहास में रखा जाता है। व्यक्ति पुनः उसी रूप में लौट कर पृथिवी पर नहीं आ सकता।” यह कोई वेदाज्ञा या राजाज्ञा नहीं। ‘इति ह आस ऐतिह्य’ यही इतिहास है। वेद में भी इतिहास है। ‘इतिहासः पुराणम्’ बृहदारण्यकोपनिषद्, उर्वशी-पुरूरवा-संवाद, यम-यमीसंवाद, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीसंवाद, याज्ञवल्क्यगार्गीसंवाद इतिहास है। परन्तु वेद अनादि हैं—‘अनादिनिधना नित्या’ (म० भा० शा० २३३।२४), ‘वाचा विरूपनित्यया’, ‘अतएव च नित्यत्वम्’ (ब्र० सू० १।३।२९) इत्यादि वैदिक प्रमाण स्पष्ट हैं। यहाँ घटना के अनन्तर इस इतिहास का उल्लेख नहीं हुआ। वेद और मनु के अनुसार वेदशब्दों के अनुसार सृष्टि होती है। यही बात “शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से कही गयी है। ऐसे इतिहास नित्य इतिहास कहे जाते हैं। जैसे सामान्य नियम है कि कोई देहधारी नित्य नहीं होता। किन्तु राम, कृष्ण आदि के शरीरों के सम्बन्ध में यह अपवाद है। उनके शरीर नित्य हो सकते हैं। उसी तरह सामान्य ऐतिहासिक व्यक्ति उत्पन्न और नष्ट होने-

७६८ रामायणमीमांसा एकविंश वाले होते हैं । वे फिर लौटकर नहीं आते, किन्तु वैदिक तथा रामायण और महाभारत, पुराण आदि के अनुसार श्रीराम, कृष्ण आदि ऐतिहासिक होते हुए भी नित्य हैं । वे ईश्वर के अवतार हैं, साक्षात् ब्रह्म ही हैं । यह सब उन्हीं ग्रन्थों से सिद्ध है । साथ ही यह भी सिद्ध है कि वे बार-बार लौटकर भी आते ही हैं । वेद में घटनाओं के अनुसार आख्यान नहीं होते, किन्तु आख्यानों के अनुसार घटनाएँ होती हैं । अतएव वाल्मीकिरामायण पूर्व वर्णित होने पर भी तदनुसार अवतार घटना सम्पन्न हुई थी । ‘कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं।’ ( रा० मा० १।१३९।१ ) यह भी वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों से ही सिद्ध है । केवल तुलसी की वाणी ही प्रमाण नहीं हो सकती है । तुलसी तो क्या कृष्ण साक्षात् परब्रह्म ही थे, फिर गीता केवल उनकी वाणी होने से ही प्रमाण नहीं मानी जाती । किन्तु वह उपनिषद्रूप गायों का दुग्ध है । कृष्ण उसके दोग्धा हैं— “सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।” इसलिए वेदमूलक होने से ही उसका प्रामाण्य है । बुद्ध भी भगवान् ही थे । फिर वेदनिन्दा के कारण वे स्वयं निन्दित हो गये । उनकी वाणी का प्रामाण्य वैदिक जनों में मान्य नहीं है । यह तुलसी का मत है— “जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ।” “विभिन्न रामायणों के घटनाक्रमों में बिलगाव क्यों ? इसका उत्तर इतिहास की दृष्टि से प्राप्त नहीं होता है । इसके स्पष्टीकरण के लिए गोस्वामीजी ने लीला शब्द का आश्रयण किया है ।” परन्तु यह कहना निरर्थक है क्योंकि लीला शब्द भी तुलसी का अपना नहीं है । यह भी व्यास के पुराणों का ही शब्द है— “लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्” ( ब्र० सू० २।१।३३ ), “लीलावतारचरितं पुरुषोत्तमस्य ।” मन्त्र, ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं और उपनिषद् भी वेद हैं । रामतापनीय उपनिषद् में भी रामचरित्र वर्णित है । उसमें भी इतिहास के रूप में रामचरित्र का वर्णन है और उसमें राम का परात्पर ब्रह्मरूप से ही वर्णन किया गया है । मन्त्रों में भी रामचरित्र तथा अयोध्या आदि का वर्णन है । किं बहुना, राम परमेश्वर हैं और शाश्वत हैं । वे लीलाविग्रह धारण करते हैं । यह भी इतिहास है । राम की ब्रह्मरूपता और अवतरण यह सब वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवतादि पुराणों से ही सिद्ध हैं । “भगवान् शङ्कर के द्वारा रचित रामचरितमानस के रचनाकाल के विषय में मेरी सुनिश्चित धारणा है कि वह श्रीराम के अवतार के पूर्व ही निर्मित हुआ है । इसके समर्थन के लिए भगवान् शङ्कर की त्रिकालज्ञता की दुहाई नहीं देना चाहूँगा । भगवान् शङ्कर ने सारे रामचरित्र को लीला नाटक के रूप में प्रस्तुत किया है । इतिहास व्यक्ति के बाद लिखा जाता है । किन्तु नाटक तो लिखे जाने के पश्चात् ही खेला जाता है । भगवान् शिव ने रामचरितमानस के रूप में एक महानाटक की रचना की और त्रेतायुग में अवतरित होकर भगवान् राम ने उसे विश्वरङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किया ।” यह सब भी कोई नयी बात नहीं है । ‘लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्’ के अनुसार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के निर्माण की घटना भी परमेश्वर की लीला ही है । फिर उनका ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में प्रकट होना भी लीला ही है । यह केवल तुलसी की ही मान्यता नहीं है । तुलसी ने तो पुरानी मान्यता को ही दुहराया है ।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७६९ भगवान् के चरित्र का सम्यग् ज्ञान प्राप्त करने के लिए त्रिकालज्ञता की दुहाई की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती है। इसी लिए तो भले वाल्मीकि राम के समकालिक भी हों तो भी वे सुनी सुनायी बातों के आधार पर रामायण लिखते तब तो सीता-चरित्र के सम्बन्ध में भी उन्हें वैसी ही बात लिखनी पड़ती जैसी कुछ भ्रान्त जनों की धारणा थी । परन्तु उन्होंने तो ब्रह्मा के आज्ञानुसार समाधि द्वारा अतीत, अनागत और वर्तमान सब चरित्रों का साक्षात्कार करके ही रामायण ग्रन्थ लिखा था और उनके अनुसार भी वह इतिहास भी है और लीला भी है। महानाट्य-निर्माता को भी त्रिकालज्ञ नहीं तो अतीतज्ञ तो होना ही चाहिये, क्योंकि नाट्य भो किसी ऐतिहासिक आधार पर ही होता है। भरत मुनि के अनुसार यही नाटक का रूप होता है। 'सति कुड्ये चित्रोल्लेखः' भित्ति होने पर ही चित्र का निर्माण होता है। अतः इतिहासप्रसिद्ध राम के आधार पर श्रीराम का नाटक लिखा जा सकता था। यदि ऐतिहासिक राम भिन्न हैं और उनका अनुकरण करनेवाले राम उनसे भिन्न हैं। तब दशरथ-सुत से भिन्न कोई राम हैं ? पार्वती के इस प्रश्न से शिवजी को क्षोभ क्यों होता । फिर तो जैसे अभिनेता जिसका अभिनय करता है उससे भिन्न होता है। उसी तरह दशरथनन्दन राम का अभिनय करनेवाले राम स्पष्टतः उनसे भिन्न ही होंगे। उस स्थिति में "रघुकुलमणि सोइ स्वामि मम" इस कथन का क्या अर्थ रह जायगा । फिर त्रेतायुग में अभिनेता राम ने उस नाट्य का अनुसरण दशरथगृह में ही जन्म लेकर क्यों किया ? नाटक में तो स्पष्टतः अभिनेय से अभिनेता भिन्न ही होता है। फिर आज के अभिनेता भी तो वैसे ही अभिनेय से भिन्न हैं। उनमें क्या भेद होगा ? श्रीशिवजी तो रघुपति चरित ही का वर्णन करते हैं— "रघुपति चरित महेश तब हरषित वरनै लीन ।" (रा० मा० १।१११।४) चरित शब्द भी इतिहास का बोधक है। सतीजा का प्रश्न रघुपति-कथा प्रसङ्ग का ही है— "पूछउ रघुपति कथा प्रसङ्गा ।" (रा० मा० १।१११।४) "तुम्ह रघुवीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रश्न जगतहित लागी ॥" (रा० मा० १।१११।४) "बरनहुँ रघुपति बिसद जस श्रुतिसिद्धान्त निचोरि ।" (रा० मा० १।१०९) श्रीशिवजी ऐतिहासिक राम और सर्वव्यापी राम की एकता का ही वर्णन करते हैं— "पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ ॥" (रा० मा० १।११६) जो प्रसिद्ध पुरुष पुरुषोत्तम हैं, जो प्रकाशनिधि हैं, जो परावरनाथ हैं वही रघुकुलमणि मेरे स्वामी हैं। संस्कृत में 'सोऽयम्' वही यह इस प्रत्यभिज्ञा के द्वारा 'स एव अयम्' इन दोनों पदार्थों की एकता का बोध कराया जाता है। ऊँचे से ऊँचे वेदान्तवेद्य ब्रह्म के रूप का निरूपण करके शिवजी उसको अवधपति कहते हैं। "सब कर परम प्रकाशक जोई। राम अनादि अवधपति सोई ॥" (रा० मा० १।११६।३) "जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरजा सोइ कृपालु रघुराई ॥" (रा० मा० १।११६।२) "बिन पद चले सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बक्ता बड़ जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहे घ्रान बिनु बास असेषा ॥ अस सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहि बरनी ॥" (रा०मा० १।११७।३,४) ९७

७७० रामायणमीमांसा एकविंश "जेहि इमि गावहिं बेद जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान ॥" (रा० मा० १।११।८) याद रहे कि रघुकुलमणि, अवधपति, रघुराई, दशरथनन्दन, कोशलपति आदि सभी शब्द ऐतिहासिक हैं— "सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुवर सब उर अंतरयामी ॥" (रा० मा० १।११०।१) इसमें स्पष्ट ही रघुवर को अन्तरयामी कहा गया है । "भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती।" (रा० मा० १।११८।४) इतना ही नहीं, जो ऐतिहासिक रघुपति राम से पृथक् किसी सर्वव्यापी राम को मानते हैं उनका निरा- करण करते हुए शिवजी स्वयं कहते हैं। एक बात तुम्हारी हमको अच्छी नहीं लगी । यद्यपि तुमने मोह के वश होकर ही वैसा कहा था। तुमने जो यह कहा था कि वह राम दशरथसुत राम से कोई अन्य हैं। जिनका मुनि ध्यान करते हैं। भगवान् श्रीराम शाश्वत हैं इसमें दो मत नहीं हैं। फिर भी रघुकुलमणि रघुवंशभूषण, दशरथ- नन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन, दशरथ-अजिरविहारी और अवधेश उनके असाधारण नाम हैं और रघुकुल, दशरथ, कौसल्या आदि की ऐतिहासिकता का अपलाप करना सर्वथा असङ्गत ही है। शाश्वत सिद्ध करने की धुन में इन नामों का अपलाप भी अनभिज्ञता ही होगी। फिर तो श्रीराम को आधुनिकतम बनाने की दृष्टि से श्रीराम के हाथ से धनुष-बाण हटाकर उनके हाथ में बन्दूक, तोप, परमाणु बम और हाइड्रोजन बम देना पड़ेगा। धनुष-बाण आदि तो पुराने जमाने की वस्तुएँ हैं। अतः यही मानना युक्त है कि भगवान् अनादि होते हुए भी ऐतिहासिक हैं और ऐतिहासिक होते हुए भी शाश्वत हैं। जैसे भगवान् का पञ्चायतन श्रीविग्रह नित्य है। वैसे ही उनके लीलापरिकर भी नित्य ही हैं। धाम भी नित्य हैं। इस दृष्टि से अयोध्या, दशरथ, कौशल्या आदि भी नित्य ही हैं। श्रीराम तथा सभी अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य हैं। अतः ऐतिहासिक होने से उनमें जरा, मरण आदि की कल्पना करना भी अनभिज्ञता है। भगवान् के जन्म और कर्म का चिन्तन भवबन्धन काटने का परम उपाय है। कहा जाता है— "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह । जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह ॥" (वा० रा० १।१२१) कहा जाता है कि सती वृन्दा का व्रत भगवान् विष्णु ने छलपूर्वक नष्ट किया। जब उसने इस रहस्य को जाना तब उसने क्रुद्ध होकर शाप दिया। भगवान् ने केवल वृन्दा को ही पातिव्रत से च्युत किया, इतना ही नहीं, अपितु रामचरितमानस में ही ब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ देवर्षि नारद को अपनी विश्वमोहिनी माया के द्वारा वासना- भिभूत कर दिया। नारद को ब्रह्मचर्य से च्युत करना अथवा वृन्दा के पातिव्रत को नष्ट करना वस्तुतः एक ही सत्य को प्रकट करता है। देवर्षि का ब्रह्मचर्य यदि उन्हें अहङ्कारी बनाकर असुर बनने की प्रेरणा देता है तो ऐसे ब्रह्मचर्य को विनष्ट कर देना ही नारद के लिए और लोक के लिए परम कल्याणकारी था।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७१ कामजय के पश्चात् जहाँ देवर्षि अहङ्कार में उन्मत्त हो उठते हैं, वहाँ कामग्रस्त होने के पश्चात् भगवान् के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी त्रुटि स्वीकार करते हैं। पतिव्रता वृन्दा का व्रत नष्ट करना भी इसी सत्य को प्रकट करने के लिए था। निष्ठा का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि व्यक्ति अपनी उस शक्ति के द्वारा अधर्म को अमर बनाने की चेष्टा करे। निष्ठा का केन्द्र भी व्यक्ति नहीं आदर्श को ही होना चाहिये। जब तक दोनों का समन्वय नहीं होगा तब तक ऐसा धर्म किसी व्यक्ति के अहं को, उसके गौरव को प्रतिष्ठापित तो कर सकता है, किन्तु उस व्यक्ति का वह धर्म लोकमङ्गल के लिए घातक सिद्ध होता है। निष्ठा का वास्तविक तात्पर्य सर्वव्यापक ब्रह्म को एक केन्द्र से अभिव्यक्त करना चाहिये। जब पतिव्रता पति के प्रति निष्ठावती बनती है तब इसका अभिप्राय पति में ईश्वर का साक्षात्कार करना है। यदि पति के प्रति ऐसी पूर्णता की भावना पतिव्रता के मन में न हो तब उसके लिए निष्ठा का निर्वाह असम्भव है। यदि व्यक्ति किसी आराध्य के चित्र को सामने रखकर पूजा कर रहा हो और उसी का आराध्य देव आकर द्वार खटखटाने लगे तब क्या पुजारी चित्र की पूजा ही करता रहे, अथवा उठकर आराध्य का स्वागत करे ? निष्ठा की अन्तिम परिणति ईश्वर की उपलब्धि है। वृन्दा ने जिसे अपने पातिव्रत की च्युति मान लिया था वस्तुतः वह उसकी निष्ठा की सच्ची सार्थकता थी। इसी लिए वृन्दा तुलसी के रूप में परिणत हो गयी और भगवान् विष्णु शालिग्राम के रूप में तुलसी को मस्तक पर धारण करते हैं। विष्णु ने वैसा करके पतिव्रता को अतुल गौरव प्रदान किया। तुलसी के रूप में अपनी सङ्गिनी बनाकर वृन्दा को भी इस सत्य का साक्षात्कार करा दिया कि निष्ठा का चरम लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार है। निष्ठा साधन है साध्य नहीं। पातिव्रत की शक्ति जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से प्रेरित हो जिस व्यक्ति का जीवन समाज के लिए घातक हो उस समय धर्म और अधर्म के सूक्ष्म विवाद का अवसर आता है। वहाँ पतिव्रता की शक्ति का दुरुपयोग हो रहा था। ऐसी स्थिति में धर्म अधर्म का कवच बनकर उसे अनिष्ट से बचाने की चेष्टा करता है। युद्ध में योद्धा पर विजय प्राप्त करने के लिए कवच को नष्ट करना ही पड़ता है, क्योंकि कवच व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है। जब धर्म अधर्म के लिए कवच का कार्य करे तो उस समय धर्म पर प्रहार न करने से अधर्म ही विजयी होता है। ऐसा धर्म जो अधर्म के विजय में सहायक हो, जो धर्म को ही नष्ट करने में सहायता दे तो क्या उसे धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये ? जालन्धर की मृत्यु से अगणित स्त्रियों के पातिव्रत का रक्षण हुआ है। अतः लोकधर्म की रक्षा के लिए एक व्यक्ति की निष्ठा को मिटाना आवश्यक ही था। उक्त समाधान बहुत अंशों में ठीक हो सकता है। परन्तु इसपर भी सूक्ष्म विचार आवश्यक है। कई लोग तो इसी कारण कहते हैं कि वह विष्णु जो वृन्दा का पातिव्रत नष्ट करता है, ईश्वर ही नहीं है। वह कोई विषयी जीव था। इसी लिए उनकी दृष्टि में पुराणों पर अधिक विश्वास करना ही उचित नहीं है। इतना ही नहीं वे शास्त्रप्रामाण्य केवल व्याकरण तक ही सीमित मानते हैं। “शब्दप्रमाणका वयं तस्माद् यदाह शब्दः तदेव नः प्रमाणम्” परन्तु उनका उक्त कथन भ्रमपूर्ण है। महाभाष्य से भी अधिक प्राचीन और प्राणभूत गीता तो हर एक कार्य और अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र को ही प्रमाण कहती है। उसकी दृष्टि में शास्त्रविधि को छोड़कर मनमानी चेष्टा करनेवाले को सिद्धि, सुख, परागति इनमें कुछ भी नहीं मिलता है—

७७२ रामायणमीमांसा एकविंश “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” (गीता १६।२३,२४) यदि वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य स्वीकृत न होगा तो विष्णु, जालन्धर, वृन्दा आदि का अस्तित्व भी सिद्ध न हो सकेगा । यह नहीं हो सकता कि मुर्गी का आधा हिस्सा पकाकर खा लें और आधा भाग अण्डा देने के लिए छोड़ दें । शास्त्र के एक अंश को मान लें और अन्य अंश को छोड़ दें । नितरां स्थिति को ही निष्ठा कहा जाता है । सब निष्ठाओं का पर्यवसान भगवान् में नहीं होता । अधर्मनिष्ठा प्राणी को नरक ही ले जाती है । काम्यकर्मनिष्ठ प्राणी को स्वर्गादि में पहुँचाती है । भक्ति, ज्ञाननिष्ठा तथा निष्काम शास्त्रोक्त कर्मनिष्ठा साक्षात् या परम्परा से ब्रह्मप्राप्ति में हेतु होती है। नारद की ब्रह्मचर्यनिष्ठा का कोई दोष नहीं था । दोष था अहङ्कार का । यदि किसी को भक्त होने का अहङ्कार हो तो उससे भी हानि ही होती है । भगवान् ने देवर्षि नारद के ब्रह्मचर्यव्रत को नष्ट नहीं किया था, किन्तु नष्ट होने से बचाया था । यदि विवाह हो जाने दिया जाता तो देवर्षि का ब्रह्मचर्य भङ्ग हो जाता । जैसे कुपथ्य मांगनेवाले रोगी को कुपथ्य न देकर हितैषी उसकी रक्षा ही करता है । वैसे ही भगवान् ने नारद की कुपथ्यसम्बन्धी माँग को न देकर उनकी ब्रह्मचर्यनिष्ठा की रक्षा की थी । परन्तु शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अधर्म प्रतीत होने पर भी धर्म ही होते हैं । जैसे झूठ बोलना पाप, सत्य बोलना धर्म है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध है— “सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप ।” “अश्वमेधसहस्रञ्च सत्यञ्च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥” सहस्रों अश्वमेधों की अपेक्षा एक सत्य ही श्रेष्ठ होता है, फिर अगर उसी सत्य से किसी गाय या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो वह सत्य ही पाप है । वहाँ वैसी गोहत्या और ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ ही बोलना उचित है । किसी महात्मा के सामने से कोई गाय या सन्त एवं सज्जन ब्राह्मण भागकर जङ्गल में छिप गया हो और उसका पीछा करनेवाला हत्यारा (घातक) आकर उसके सम्बन्ध में पूछ-ताछ करता है तो महात्मा को चाहिये कि यदि मौन रहने से काम चल जाता हो तो मौन रहकर वैसे सज्जनों के प्राण बचाने चाहिये । परन्तु यदि मौन रहने में घातकों के उस मार्ग से अपने शिकार के पास पहुँच जाने का सन्देह पैदा होता हो तो झूठ बोलकर भी उनकी रक्षा करनी चाहिये । “येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ॥ अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथञ्चन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन् वाऽप्यकूजनात् ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।” (म० भा० शा० प० १०९।१४, १५) जो चोर, डाकू आदि अन्याय से किसी का धन लेना चाहते हैं। उन्हें धनिक का पता नहीं बताना चाहिये । जो दान, भिक्षादि द्वारा धन लेना चाहते हैं । उन्हें बताने में कोई दोष नहीं है। इतना ही नहीं यदि मौन

रहने से काम चल जाय तो मौन रहना ठीक है। यदि मौन से साधु पुरुषों की रक्षा नहीं होती हो, न बोलने से शङ्का होती हो और अवश्य बोलना पड़े तो झूठ बोलकर भी सत्पुरुषों का बचाव करना चाहिये । “यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथादपि । न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथञ्चन ॥ पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।” (म० भा० शान्ति प० १०९।१६,१७) झूठी शपथ द्वारा भी दुष्टों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिये । यहाँ सत्य की अपेक्षा झूठ ही श्रेष्ठ है, क्योंकि दुष्टों को दिया हुआ धन दाता को भी पीड़ा ही पहुँचाता है। “मा हिंस्यात्” इस वेदवचन से निषिद्ध होने के कारण यद्यपि हिंसा अधर्म है तथापि “अग्नीषोमीयं पशुमालभेत” के अनुसार क्रतु के उपकार के लिए की गयी हिंसा धर्म ही है। यह सब “अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्” ( ब्र० सू० ३।१।२५ ) में स्पष्ट है। कहीं सत्य कहीं अनृत ही बोलना चाहिये। जहाँ अहिंसा के कारण अनृत सत्य हो जाता हो और हिंसा के कारण सत्य अनृत हो जाता हो, जहाँ सत्य अहिंसा, उपकार आदि में पर्यवसित न होता हो उस स्थल में मूढ़ सत्यवादी भी बाधित होता है। सत्य और अनृत का यथावत् जाननेवाला धर्मतत्त्वज्ञ होता है। इसी आधार पर अकृतप्रज्ञ अतिदारुण अनार्य भी उसी तरह महान् पुण्य का भागी होता है जैसे वलाक सब प्राणियों के वधार्थ उद्यत अन्ध घ्राणचक्षु के वध से पुण्य का भागी हुआ था। इसमें आश्चर्य क्या है ? धर्म की कामनावाला भी सत्यवादी अधर्म निश्चय के कारण डाकुओं एवं गोघातकों को साधुओं एवं गायों का पता बताकर पाप का भागी हुआ था। तत्त्वज्ञ उसी प्रकार पुण्य का भागी होता है, जैसे गङ्गातीर में सर्पिणी के अण्डों को नष्ट करके उलूक पुण्य का भागी हुआ था— “भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् । यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिश्चितम् । सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ।। अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः । सुमहत् प्राप्नुयात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ।। किमाश्चर्यञ्च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् । सुमहत्प्राप्नुयात्पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ।।”(म०भा० राजधर्मानुशासनपर्व १०९।५-८) वस्तुतः प्राणियों में प्रभव के लिए अर्थात् अभ्युदय, अहिंसा, अपीडन और धारण के लिए ही धर्म का प्रवचन किया गया है। अतः व्यापक रूप से प्राणियों का अभ्युदय, अपीडन और संरक्षण जिससे होता है, वह चाहे सत्य हो चाहे असत्य, किन्तु वही धर्म है। यद्यपि अहिंसा और सत्य दोनों ही शास्त्रविहित हैं तथापि अहिंसाविरोधी सत्य अग्राह्य है। इसी लिए गीता ने हित, मित, प्रिय और सत्य भाषण को ही सत्य कहा है, केवल सत्य को नहीं— “प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यात्प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मेण विधृताः प्रजाः । यः स्याद्धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।। अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् । यः स्यादहिंसासंपृक्तः स धर्मं इति निश्चयः ।।"

७७४ रामायणमीमांसा एकविंश जहाँ सत्य निरपराधों का संरक्षक न होकर उनके नाश का कारण बनता हो वह धर्म नहीं है ! इसी दृष्टि से यदि किसी एक स्त्री के पातिव्रत से सुरक्षित जालन्धर लाखों स्त्रियों का पातिव्रत्य-भङ्ग करता हो और शिव की पार्वती को अपनी पत्नी बनाने का प्रयत्न करता हो और संसार में हिंसा का विस्तार कर के सम्पूर्ण वैदिक धर्म-कर्म को नष्ट कर के लोक का उत्सादन करता हो और जिस पातिव्रत्य के कारण शिवजी के लिए भी अजेय बना हो उस एक स्त्री के पातिव्रत्य का भङ्ग करना धर्म ही है अधर्म नहीं, क्योंकि उससे लाखों का पाति- व्रत्य बचेगा, लाखों की जानें बचेंगी । वेदोक्त धर्म-कर्म की रक्षा होगी । उससे उस अन्यायी असुर का विनाश होगा जिसके द्वारा अहिंसा, धर्म, न्याय और संसार की रक्षा को खतरा उत्पन्न हुआ है । अधर्म का बचाव करनेवाले कवच- रूपी धर्म का विनाश करना ही उचित है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसमें वृन्दा का क्या दोष है ? जो दोष है वह जालन्धर का है । वृन्दा तो अपना धर्म पालन करती है । पति को परमेश्वर मानकर पूजती है । यही उसका धर्म है । उस अपने इष्ट की रक्षा करना भी उसका कर्त्तव्य ही है । पर उसका उद्देश्य अधर्म, हिंसा या व्यभिचार फैलाना तो नहीं है । पर जिस किसी तरह से भी हो चाहे न चाहे उसके पातिव्रत्य से उसका अत्याचारी हिंसक जब अपरिगणित पतिव्रताओं का पातिव्रत्य नाशक असुर अमर होता है, अवध्य होता है तो उसके मूलभूत एक पातिव्रत्य का कोटि-कोटि पातिव्रत्यों की रक्षा के लिए ध्वंस होना ही उचित है । लाघव और गौरव की दृष्टि से भी यही धर्म है । फिर भी जैसे अनधिकृत व्यक्ति द्वारा हत्यारे की भी हत्या पाप ही है । हत्यारे की हत्या करनेवाला अन- धिकृत व्यक्ति भी मृत्युदण्ड पाता है । राजा ही दण्ड देने का अधिकारी होता है । उसके द्वारा नियुक्त अधिकृत व्यक्ति ही हत्यारे को प्राणदण्ड दे सकता है, अन्य नहीं । इसी तरह कर्मफल दाता भगवान् विष्णु ही हैं । वे ही लाखों के पातिव्रत्य के रक्षणार्थ, लोकरक्षणार्थ तथा धर्मरक्षणार्थ एक वृन्दा का पातिव्रत्य-भङ्ग कर सकते हैं और वृन्दा को पातिव्रत्य धर्म का सर्वोत्कृष्ट फल भी प्रदान कर सकते हैं । आखिर सभी धर्मों का अन्तिम परमफल तो भगवत्प्राप्ति ही है । भगवान् ने सीधे उसके धर्म का हरण करके उसके धर्म का परमफल भगवत्प्राप्ति उसे सुलभ करा दिया । शास्त्रों के अनुसार जैसे विष्णु, विष्णुप्रतिमा शालग्राम की पूजा करते करते प्राणी विष्णु की प्राप्ति कर लेता है वैसे ही स्त्री परम मुख्य पति विष्णु की प्रतिमास्वरूप लौकिक पति की पूजा करते करते परम मुख्य पति विष्णु को प्राप्त कर लेती है । विवाह में वर को विष्णुरूप मानकर उसे लक्ष्मीरूपा कन्या का प्रदान किया जाता है । वैसा ही संकल्प पढ़ा जाता है—"इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे" । इस स्थिति में जैसे विष्णु-प्राप्ति होने पर शालग्राम की पूजा का छूट जाना कोई दोष नहीं है उसी तरह परमपति विष्णु की प्राप्ति में वृन्दा का जालन्धरसम्बन्धी पातिव्रत्य-भङ्ग हो जाना कोई दोष नहीं है, क्योंकि उसका फल उसे प्राप्त हो गया । भगवान् शङ्कराचार्य के अनुसार और तुलसी के अनुसार ईश्वर जीव का सम्बन्ध वारिवीचिसम्बन्ध जैसा ही है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) "सो तैं ताहि तोहि नहि भेदा । बारि बीचि जिमि गावहि बेदा ॥” (रा०मा० ७।११०।३) हे नाथ ! यद्यपि हमारा आपका भेद नहीं है तथापि मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं । जैसे समुद्र का तरङ्ग कहा जाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहा जाता है । वह तू है उसमें तुझमें भेद नहीं है । भेद वैसा ही है जैसा वारि और वीचि का भेद है ।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७५ इस दृष्टि से विष्णु सच्चिदानन्द-समुद्र हैं । अनन्तानन्त जीव उनकी अनन्तानन्त तरङ्ग ही हैं । अतएव वे भी चेतन, अमल, सहजसुखराशि हैं । संसार के सभी जीव तरङ्ग ही हैं । पति, पुत्रादि जीव का आपसी सम्बन्ध वैसा ही है जैसे तरङ्गों का आपसी सम्बन्ध । एक तरङ्ग का अपर तरङ्गों के साथ सम्बन्ध स्थायी नहीं होता है । तरङ्गों के समान ही संयोग-वियोग होता ही रहता है । जैसे चौराहे के प्याऊ पर चारों तरफ से राहगीर आकर इकट्ठे होते हैं । आपस में मेलजोल और प्रेम की बातें करते हैं । फिर अपने-अपने रास्ते सब चले जाते हैं । किसी का कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं होता । “कति नाम सुता न लालिताः कति वा नेह वधूरभुञ्जि हिं । क्व नु ते क्व नु ताश्च के वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः ॥” कितने पुत्रों का लालन-पालन नहीं किया, कितनी ही वधुओं का सम्बन्ध नहीं किया । परन्तु आज कहाँ वे सब हैं कहाँ हम हैं । निश्चित भवसङ्गम पान्थ-सङ्गम ही है । नदी की बाढ़ में इधर-उधर से आकर काष्ठ मिल जाते हैं । कुछ दूर तक मिले भी रहते हैं । परन्तु प्रवाह के थपेड़ों से सब पुनः विभक्त होकर बह जाते हैं । वैसे ही जीव कर्मों के अनुसार पति-पत्नी आदि रूप से मिल जाते हैं— “यथा काष्ठञ्च काष्ठञ्च समेयातां महोदधौ । संयुज्य च व्यपेयातां तद्वज्जीवसमागमः ॥” परन्तु किसी भी हालत में तरङ्ग का जैसे जल के साथ वियोग नहीं होता है, उसी तरह जीवों का परमेश्वर के साथ वियोग नहीं होता । अतएव जीवों के सच्चे सङ्गी-साथी परमेश्वर ही हैं । जीव नहीं । मुख्य पति- पत्नी का सम्बन्ध भी वारि-वीचि जैसा ही है । “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीतारामपद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) सीता और राम का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा गिरा एवं अर्थ का तथा जल एवं वीचि का । इस दृष्टि से सब तरङ्गरूप जीवों के परम पति समुद्रस्वरूप भगवान् ही हैं । उनमें मुख्य निष्ठा ही मुख्य पातिव्रत्य है । उन्हें छोड़कर अन्य जीवों से सम्बन्ध जोड़ना ही पातिव्रत्य-भङ्ग है । इस तरह लौकिक पातिव्रत्य धर्म है तो परम परमेश्वर के साथ अखण्डसम्बन्ध-निष्ठारूप परम पातिव्रत्य परम धर्म है । इस तरह वृन्दा के. लौकिक पातिव्रत्य को भङ्ग कर के जहाँ भगवान् ने जालन्धर का वध कराकर अगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य और लोक की रक्षा की वहीं वृन्दा को परम पातिव्रत्यरूप परम धर्म प्रदान कर उसे कृतार्थ कर लोकोत्तर पद प्रदान किया । बड़े बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र जिस भगवान् से प्रेम की भीख माँगते हैं वही भगवान् वृन्दा से प्रेम की भीख माँगते हैं । वृन्दा के लिए पागल होकर अपने लौकिक पति के साथ भस्मीभूत वृन्दा की चिता की भस्म में महीनों लोटते रहे । इसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया है कि भगवान् प्रेमास्पद ही नहीं, किन्तु प्रेमाश्रय भी हैं । जैसे भगवान् से मिलने के लिए भक्त लालायित होते हैं वैसे ही भगवान् वृन्दा से मिलने के लिए लालायित होते हैं । यहाँ तक कि छल-छद्म से भी वृन्दा की प्राप्ति के लिए सचेष्ट होते हैं । उसके प्रेम न करने पर भी उससे प्रेम करते हैं । उसके शाप देने पर भी उसके शाप को अङ्गीकार कर के शालग्राम शिला बनकर भी तुलसी का वियोग नहीं सहन कर सकते । हजारों व्यञ्जन समर्पण करने पर भी तुलसी बिना कोई नैवेद्य ग्रहण नहीं करते हैं ।

७७६ रामायणमीमांसा एकविंश तुलसी के पातिव्रत्य धर्म से ही सन्तुष्ट होकर अथवा उसके जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों एवं भक्ति-भावनाओं के वशीभूत होकर ही भगवान् तुलसीरूप में भी वृन्दा को अपनाते हैं। उसके रूपसौन्दर्य या यौवन के वशीभूत होकर नहीं। सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी जिसकी दासी है। सौन्दर्य-माधुर्य सारसर्वस्व राधारानी जिसकी अनन्य आराधिका है। अनन्त अनन्त लक्ष्मीरूप गोपाङ्गनाएँ जिसके पीछे पीछे पागल हुई भटकती हैं, उसे वृन्दा के रूप और यौवन की अपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। गोपाङ्गना ऊपर से नन्दरानी के पास गोपाल की शिकायत करने जाती थीं, परन्तु भीतर से चाहती थीं कि कृष्ण हमारे घरों में दधि, नवनीत की चोरी के लिए पधारें और उनकी बाट जोहती थीं। कृष्ण उनसे छाछ मांगते थे। दधि और नवनीत की चोरी करते थे। तभी तो भक्त कहता है कि— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैर्मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु” यह ठीक है कि वेदविहित कर्म पुण्य है और वेदनिषिद्ध कर्म अधर्म है— “वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।” ( भाग० ६।१।४० ) इस दृष्टि से पत्नी का एकपतिनिष्ठ होना शास्त्र विहित है, अतः पातिव्रत्य धर्म है और उत्कृष्ट धर्म है। उसके प्रभाव से सावित्री ने अपने पति को यम के हाथों से लौटा लिया था। उसी के प्रभाव से शाण्डिली ने सूर्योदय रोक दिया था। उसी के प्रभाव से वृन्दा का पति जालन्धर अजेय हो गया था। फिर भी वही विहित कृत्य धर्म है जो अनर्थशून्य हो। वेदविहित भी वही कृत्य धर्म है, जो फलकाल में भी अनर्थ से सम्बद्ध न हो। जो केवल प्रीति का हेतु हो। इसी लिए—‘‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’’ ( जै० सू० १।१।२ ) इस धर्मलक्षणबोधक जैमिनिसूत्र में अर्थ इस पद का संनिवेश है। इसी कारण श्येनादि अनर्थकारण याग अर्थरूप न होने से धर्म नहीं हैं। भट्टपाद ने कहा है कि— “फलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबद्ध्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वात् तद् धर्म इति कथ्यते ॥” फल द्वारा भी जो कर्म अनर्थ से संसृष्ट नहीं होता जो केवल सुख का हेतु हो वही धर्म है। श्येनादि याग का फल है शत्रुमरण। वह अन्त में नरक का हेतु होता है। अतः वह धर्म नहीं है। “नानापुराणनिगमागमसम्मतम् ।” ( रा० मा० १। मङ्गलाचरण ७ ) ‘ तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥ तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोही ।” ( रा० मा० १।१२०।२, ३ ) “अब सुनु परम विमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ।।” ( रा० मा० ७।८५।१ ) आदि अनेक वचनों से तुलसीदासजी वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य वर्णन करते हैं और उनकी सब उक्तियों का परम आधार वेदादि शास्त्र ही हैं। उसके सम्बन्ध में आजकल के वक्ताओं का किन्तु, परन्तु सर्वथा उपेक्षणीय ही है।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७७ वृन्दा "तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्म वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥" तप, अध्ययन, स्वाभाविक वेदविधान-यज्ञ, उञ्छ, शिल आदि वृत्तियाँ सुपुण्य हैं, पाप नहीं। किन्तु वही सब भावदुष्ट होने पर पाप बन जाती हैं। भगवान् राम ने तपस्वियों के तप की रक्षा के लिए दण्डकवन की यात्रा की थी। परन्तु धुन्धु नामक दैत्य महान् तप कर रहा था। वह किसी समुद्र की रेती में विलीन रहकर प्राणायाम करता था। साल, साल के कुम्भक के बाद जब वह रेचक करता था तो धरित्री में कम्प होता था। धरित्री की धूलि चन्द्र, सूर्य को आच्छन्न कर देती थी। पर्वतों में हड़कम्प मच जाता था। समुद्र उद्वेलित हो अपनी उत्ताल तरङ्गों से विश्व को आप्लावित करने लगता था। पर उसके तप का लक्ष्य था शक्तिसम्पन्न होकर वेदादि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम धर्म का विनाश करना। इसी लिए देवता और ऋषि उसके वध के लिए प्रयत्नशील हो धुन्धुमार नामक राजा को प्रेरित कर के उसका वध कराते हैं। यज्ञ का बहुत बड़ा महत्त्व है। राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए बड़ा परिश्रम किया था। परन्तु जब लङ्का में मेघनाद और रावण का यज्ञ चल रहा था तब उसके विनाश के लिए अङ्गद, हनुमान्, लक्ष्मण आदि ने प्रयत्न किया। क्यों ? इसी लिए कि ऐसे तप एवं यज्ञ, भावदुष्ट होने के कारण, धर्म नहीं अधर्म हो गये हैं। यदि उनका यज्ञ सफल होता तो रावण और मेघनाद अजेय ही हो जाते। वस्तुतः उनका यज्ञ तो दूसरों की बहू-बेटियों के अपहरण के लिए ही था। ऐसा यज्ञ धर्म नहीं। इसी तरह वृन्दा का पातिव्रत्य-धर्म भी हजारों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु हो रहा था। अतः वह अधर्मप्राय हो गया था। उसका विध्वंस ही उस परिस्थिति में धर्म था। भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम एवं परम निष्काम थे। अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी उनकी पत्नी थी। माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता और राधा श्रीराम और श्रीकृष्ण रूप में उनकी पत्नी थीं। काम, वसन्त तथा अप्सराएँ उनके मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सके थे। लोग क्रोधवृत्ति से काम को नष्ट कर सकते हैं। परन्तु क्रोध का उपशमन करना उनके लिए कठिन ही है। वह क्रोध जिनके मन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनसे डरता है; उनके मन में काम कहाँ से कैसे आ सकता है ? भगवान् ने काम से और अप्सराओं से वर माँगने के लिए कहा और अपने ऊरु से उर्वशी जैसी दिव्य अप्सरा को प्रकट कर के इन्द्रलोक के लिए भूषण के रूप में प्रदान किया था। उसका सौन्दर्य, माधुर्य एवं कान्ति निहारकर देवता और अप्सराएँ दोनों हतप्रभ हो गये थे, अतः वे विषयभोग की दृष्टि से जालन्धर की पत्नी के पातिव्रत्य-भङ्ग के लिए प्रयत्न क्यों करते ? उन्होंने अकीर्ति या शाप आदि की चिन्ता न करके लोककल्याण ही किया- "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।" ( रा० मा० १।१२३ ) माता, पिता, गुरु और पति की महिमा शास्त्रों में बहुत वर्णित है। परन्तु वे ही सब यदि श्रीराम-प्राप्ति में बाधक हों तो उन सबका त्याग ही प्रशस्त है- "जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये तिनहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही ।

७७८ रामायणमीमांसा एकविंश पितहि तजे प्रह्लाद विभीषण बन्धु भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कान्त ब्रज वनितन भे जगमङ्गलकारी ॥” सीताहरण के कारण लंका जलायी गयी। बड़े-बड़े प्रबल राक्षसों का संहार हो गया। कुम्भकर्ण को जगाया गया। उससे सीताहरण आदि की चर्चा की गयी। उसने पहले रावण की इस अनीति के कारण भर्त्सना की। पश्चात् उसने कहा—'जब आप उस पतिव्रता धरित्री-सुता को लाये और वह पतिव्रता होने के कारण वशवर्तिनी नहीं होती थी तो माया द्वारा स्वयं राम का स्वरूप क्यों नहीं धारण कर लिया ?' रावण ने कहा मैंने वह भी कर के देख लिया। जिस समय मैंने दूर्वादलश्याम 'राम का रूप धारण किया तो मुझे ब्रह्मपद भी तुच्छ प्रतीत होने लगा फिर परस्त्रीसङ्ग की वासना का तो प्रसङ्ग ही कैसे उठ सकता था ? “आनीता भवता यदा पतिरता साध्वी धरित्रीसुता स्फूर्जद्राक्षसमायया न च कथं रामाङ्गमङ्गीकृतम् । कर्तुंञ्चेतसि रामरूपममलं दूर्वादलश्यामलं तुच्छं ब्रह्मपदं परवधूसङ्गप्रसङ्गः कुतः ॥” फिर स्वयं उन भगवान् में कामवासना से परस्त्री के पातिव्रत्य-भङ्ग में प्रवृत्ति कैसे हो सकती थी ? जालन्धर दैत्य अपनी पतिव्रता पत्नी के बल के कारण अवध्य था। वह अनेक पतिव्रताओं का पातिव्रत्य- भङ्ग करता था। रुद्रपत्नी रुद्राणी का भी वह हरण करना चाहता था। परन्तु उसका वध वृन्दा के पातिव्रत्य रहते सम्भव ही नहीं था। यहाँ धर्म ही अधर्म की रक्षा कर रहा था और अधर्म का अभेद्य दुर्ग बन रहा था। अतः जैसे शत्रु-वध के लिए उसके अभेद्य दुर्ग या अभेद्य कवच का विध्वंस आवश्यक होता है वैसे ही जालन्धर-वध के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करना आवश्यक था। वही काम भगवान् ने किया। पर वह सब किया जगन्मंगल के लिए, धर्म-रक्षा के लिए एवं लाखों पतिव्रताओं के पातिव्रत की रक्षा के लिए; काम से या स्वार्थ से नहीं । यह काम दूसरा नहीं कर सकता था, क्योंकि अन्य को वैसा करने का अधिकार नहीं था। हत्या के अपराधी को फाँसी देने का अधिकार राजा या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को ही होता है, अन्य को नहीं। अन्य व्यक्ति वैसा करेगा, तो उसको स्वयं भी फाँसी पर लटकना पड़ेगा। राजा के दण्ड से अपराधी पापों से मुक्त हो जाता है, परन्तु औरों के द्वारा वध से अपराधी अपराध से मुक्त भी न होगा और फाँसी देनेवाला भी स्वयं फाँसी पायेगा। दूसरा कोई वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करता तो वह भी नरक का भागी होता और वृन्दा का पातिव्रत- पालन निष्फल हो जाता, क्योंकि ईश्वर ब्रह्म भगवान् को छोड़कर सब जीव हैं। निषेधातिक्रमण से वे सभी पाप के भागी होते हैं। ईश्वर विधि-निषेधातीत होता है और वही कर्मफलदाता होता है। भगवान् ने यद्यपि संसार के हित के लिए अगणित पतिव्रताओं की रक्षा के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भंग किया तथापि वृन्दा के पातिव्रत का फल वृन्दा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वही कर्मफल दाता हैं। वस्तुतः पातिव्रतधर्म के द्वारा भी परमेश्वर की प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है। जैसे शालग्राम की पूजा से विष्णु-प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है एवं जैसे शालग्राम की विष्णुबुद्धि से ही पूजा की जाती है वैसे ही परमपति परमेश्वर की प्राप्ति के लिए नारी अपने पति की उपासना करती है। कन्यादान के अवसर पर संकल्प भी वैसा ही होता है—

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७९ “इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे” इस लक्ष्मीरूपा कन्या को मैं विष्णुरूपी वर के लिए प्रदान करता हूँ। भगवान् ने वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग कर के पातिव्रत का परमफल उसे प्रदान कर दिया अर्थात् उसे परम पति परमेश्वर भगवान् विष्णु की प्राप्ति हो गयी। बड़े बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र जिसकी प्राप्ति के लिए जप, तप, योग, समाधि का अभ्यास करते हैं वही भगवान् वृन्दा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हुए। छल-छद्म से भी वे उसे प्राप्त करते हैं। भक्तों के लिए भगवान् प्रेम के विषय होते हैं। परन्तु यहाँ तो वृन्दा प्रेम का विषय थी, प्रेम की आस्पद थी। भगवान् तो प्रेम के आश्रय हुए। रहस्य विदित होने पर वृन्दा भगवान् को शाप देती है कि “तुम पाषाण हो जाओ” भगवान् उसके शाप को स्वीकार कर शालग्राम बन जाते हैं। फिर भी वृन्दा को तुलसी के रूप में साथ ही रखते हैं। हजारों पकवानों के होने पर भी तुलसी-दल के बिना स्वीकार नहीं करते हैं। वन्दा अपने पति जालन्धर के साथ चिता में जल जाती है, भगवान् की उपेक्षा कर के। फिर भी प्रभु उसके विप्रलम्भजन्य तीव्र ताप में विह्वल होकर उसके चिताभस्म में विलुष्ठित होते रहे। यह एकाङ्गी प्रेम अद्भुत है। भगवान् में भक्त का नहीं किन्तु भक्त में भगवान् का एकाङ्गी प्रेम, यह भक्त परवशता का उदाहरण है। वस्तुतः वृन्दा भगवान् की ही सदा सर्वदा दिव्य शक्ति लक्ष्मी के समान ही थी। किसी शापादि वश वह जालन्धर की पत्नी बनी थी। उसी स्वाभाविकी प्राचीन भक्तिवशात् भगवान् हठात् छल-छद्म से उसे प्राप्त करते हैं। उसके अधीन सदा के लिए बन जाते हैं। इससे अधिक पातिव्रत का फल क्या होगा ? वास्तव में भगवान् आनन्द- समुद्र हैं। जीव उनकी तरङ्ग चेतन अमर सहज सुखराशि हैं। तरङ्ग का जल के साथ स्थिर सम्बन्ध है। एक तरङ्ग का दूसरी तरङ्ग के साथ स्थिर सम्बन्ध नहीं है। पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि के सम्बन्ध बनते बिगड़ते रहते हैं। अतः लौकिक पति-पत्नी का सम्बन्ध अस्थिर है, वही व्यभिचार है। भगवान् का सम्बन्ध ही स्थिर होने से अव्यभिचरित सम्बन्ध है। जीवात्मा भगवान् से विमुख होकर इतर जीवों पति, पुत्रादि में आसक्त रहता है, तो वही व्यभिचार है। सबसे विमुख होकर भगवान् में अभिमुख होना ही उसका शुद्ध पातिव्रत है। यही गोपाङ्गना-भाव है। पति की काया की छाया बनना ही पातिव्रत है। तरङ्ग की स्थिति, गति और प्रवृत्ति जल की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति, गति तथा प्रवृत्ति बिम्ब की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। घटाकाश महाकाश के पराधीन होता है। जीवात्मा इसी प्रकार भगवान् की काया की छाया बनकर भगवान् को प्राप्त कर लेता है। कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण कुछ लोग कुब्जा के प्रसङ्ग को लेकर श्रीकृष्ण के चरित्र पर आक्षेप करते हैं, परन्तु जिस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण का कुब्जा के साथ अङ्गसङ्ग वर्णित है उसी में श्रीकृष्ण को परात्पर ब्रह्म कहा गया है और यह भी कहा गया है कि प्राणीमात्र के कल्याणार्थ निर्गुण निराकार भगवान् का श्रीकृष्णरूप में प्राकट्य हुआ है। अतः उनमें काम, क्रोध, भय और स्नेह से अथवा किसी तरह भी मन लगाने से प्राणी का कल्याण हो सकता है—

७८० रामायणमीमांसा एकविंश “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” काम से और भय से जैसे प्राणी तन्मयता को प्राप्त होता है वैसे अन्य उपायों से नहीं । “यथा कामाद् भयाद् वापि मर्यस्तन्मयतामियात् । न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥” वही वस्तु लोकसम्बन्ध में निन्य होने पर भी भगवत्सम्बन्ध से प्रशंसनीय हो जाती है। संसार की तृष्णा निन्द्य है, परन्तु भगवान् के पाने की तृष्णा प्रशंसनीय होती है। संसार की इच्छाएँ त्याज्य होती हैं, भगवत्तत्त्वज्ञान की इच्छा जिज्ञासा यज्ञ, तप, दान आदि से साध्य होती है— “तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन ।” (बृ०उ० ४।४।२२) जैसे चिन्तामणि की ओर दीपकबुद्धि से भी प्रवृत्ति होने से चिन्तामणि की ही प्राप्ति होती है, दीपक की नहीं। उसी तरह श्रीकृष्ण परमात्मा में जार (उपपति) बुद्धि से भी प्रवृत्ति होने पर परमेश्वर की ही प्राप्ति होती है, जार की नहीं। लौकिक जार धर्म, पुण्य और परलोक को जलाता है। किन्तु श्रीकृष्ण अविद्या-ग्रन्थि, कर्म-जाल तथा पञ्चकोशों को जलाते हैं। इसी लिए वे भी जार हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान् आनन्दसमुद्रतुल्य हैं। जीव सब उनके तरङ्गतुल्य हैं। यही शङ्कराचार्य भी मानते हैं— “सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” ( षट्पदी ) “बारि बीचि जिमि गावहिं बेदा ।” ( रा० मा० ७।११०।३ ) एक तरङ्ग का तरङ्गान्तरों के साथ सम्बन्ध अस्थिर तथा व्यभिचरित होता है। किन्तु तरङ्गों का समुद्र के साथ सम्बन्ध स्थिर नित्य होता है। वैसे ही पति, पुत्र और पत्नी रूप से जीवों का सम्बन्ध अस्थिर एवं अनित्य ही होता है। किन्तु उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध ही स्थिर हैं। इस तरह कुब्जा एवं गोपाङ्गनाएँ तथा उनके पति सभी जीव हैं। उनका पारस्परिक सम्बन्ध अस्थिर है। भगवान् का सम्बन्ध ही समुद्र-तरङ्ग के तुल्य नित्य है। अतः कुब्जा आदि का लौकिक पति आदि जीवों का सम्बन्ध ही व्यभिचार है, भगवत्सम्बन्ध ही शुद्ध पातिव्रत है। पति-पत्नी का सम्बन्ध भी वारिवीचि से उपमित है— “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) नन्ददासजी के अनुसार गोपाङ्गनाओं के अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम रोम में श्रीकृष्ण इस तरह भरपूर हैं जैसे तरङ्गों में जल भरपूर होता है— “तरङ्गनि वारि ज्यों ।” सम्भोग भी भोक्ता का भोग्य के साथ तादात्म्यापत्ति ही है। “सविता गोभी रसं भुङ्क्ते” सविता अपनी किरणों से भूमि के रस का सम्भोग करते हैं। दिव्यदम्पती पति-पत्नी भी प्रेमोद्रेक में व्यवधानशून्य होकर मिलते हैं। हार, भूषण, कञ्चुकी आदि का व्यवधान असह्य होता है। प्रेमोद्रेकजनित रोमाञ्च-व्यवधान भी बाधक प्रतीत होता है। सर्वाधिक व्यवधानराहित्य तरङ्ग और जल में ही है।

किसी दृष्टि से तो चन्द्र-चन्द्रिका तथा भानु-प्रभा जैसा अव्यवधान अभीष्ट होता है। जैसे गङ्गाजल से भी अन्तरङ्ग उसकी शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता का सम्बन्ध होता है। आनन्दसिन्धु की तरङ्ग की अपेक्षा भी उसकी मधुरिमा का सम्बन्ध अन्तरङ्ग होता है। उसी तरह आनन्दसुधासिन्धु कृष्ण में तरंगस्थानीया गोपाङ्गनाएँ हैं किन्तु उनके माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री श्रीराधा हैं। उनका सम्बन्ध अत्यधिक अन्तरंग है। इस अत्यन्त अभेद में रमण और सम्भोग शब्द का प्रयोग होता है। भारतीय शास्त्रों में इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग मिलते हैं जो कि अश्लील-से प्रतीत होते हैं। गीता में कहा गया है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । ( गीता १४।३ ) महद् ब्रह्म प्रकृति मेरी योनि है। इसमें मैं गर्भाधान करता हूँ। यहाँ प्रकृति में ब्रह्मरूपी बिम्ब का प्रतिबिम्ब डालना ही गर्भाधान है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि जैसे कोई प्रियतमा भार्या का आलिंगन करके आनन्दोद्रेक में आन्तर और बाह्य सभी प्रपञ्चों को भूल जाता है वैसे ही जीवात्मा सुषुप्तिकाल में परमात्मा से मिलकर आनन्दोद्रेक में सब कुछ भूल जाता है— “तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तर- मेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम् ।।” (बृ०उ० ४।३।२१) “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते । (छा० उ० ६।८।१) कबीरदास तक सातवें आसमान में अपने निर्गुण पिया की सेज की कल्पना कर वहाँ पहुँचने की तैयारी करते हैं। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के सम्मिलन में नायिका तथा नायक के सम्मिलन और रमण का आरोप किया जाता है। इसमें भी स्वसुखसुखित्व की भावना के कारण कुब्जा की साधारणी रति मणि तुल्य दुर्लभ होती है। रुक्मिणी प्रभृति की समञ्जसा रति में तत्सुखसुखित्व एवं स्वसुखसुखित्व का समन्वय होने से वह चिन्ता- मणि के तुल्य अतिदुर्लभ है। गोपाङ्गनाओं की रति शुद्ध तत्सुखसुखित्व की होने से वह समर्था रति कौस्तुभमणि के तुल्य अनन्यलभ्य है। संसार से विमुख होकर भगवत्सम्मिलन-सुख प्राप्त करना योगीन्द्र-मुनीन्द्रों का लक्ष्य होता है। परन्तु वहाँ भी “निःसंगः प्रज्ञया भवेत्” के अनुसार सुखास्वादन की आसक्ति का त्याग विवक्षित होता है। इसे पर वैराग्य कहा जा सकता है। दृष्ट एवं आनुश्रविक विविध विषयों से वितृष्णता अपर वैराग्य है। परन्तु गुणों से भी शान्ति, सत्त्वपुरुषान्यताख्याति आदि दिव्य सात्त्विक भावों से भी निःस्पृहता होनी ‘पर वैराग्य’ है। ब्रह्मरसास्वादन में भी स्वसुख के लिए नहीं, किन्तु कृष्णसुख के लिए ही सर्वचेष्टा तत्सुखसुखित्व है। इसी प्रकार अन्यपरा श्रुतियाँ परकीया मानी जाती हैं। ब्रह्मपरा स्वकीया मानी जाती है। “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” (क० उ० २।१५ ) के अनुसार सभी वेद-मन्त्रों का महातात्पर्य ब्रह्म में ही है, फिर भी इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि के भी सूक्त हैं। वे इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं का भी प्रतिपादन करते हैं। परन्तु इसका अभिप्राय यही है कि उन उन मन्त्रों और सूक्तों का अवान्तर तात्पर्य उन उन देवताओं में होने पर भी उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्म में ही है। वस्तुतः जैसे किसी पादुका, पाषाण या प्रासाद कहीं पर भी पादविन्यास भूमण्डल पर ही पादविन्यास हैं, क्योंकि वे सभी भूमण्डल के ही विकार हैं। उसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि किसी का भी प्रतिपादन ब्रह्म का ही

७८२ रामायणमीमांसा एकविंश प्रतिपादन है, क्योंकि वे सभी ब्रह्म के ही विकार हैं। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० उ० २।१), 'विज्ञानं ब्रह्म' (तै० उ० ३।५), 'आनन्दो ब्रह्म' (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियाँ अन्यसम्बन्ध के बिना शुद्धरूप से ब्रह्मसम्बद्ध ही हैं। प्रथम कोटि की श्रुतियाँ अन्यपूर्विका हैं, द्वितीय कोटि की अनन्यपूर्विका हैं। अन्यपूर्विका श्रुतियाँ कृष्ण की परकीया हैं तथा अनन्यपूर्विका स्वकीया हैं। उनके पति उनके प्रतिपाद्य इन्द्र, वरुण आदि भिन्न भिन्न देव हैं। रघुवंश महाकाव्य में शिव एवं पार्वती को वाक् और अर्थ के समान परस्पर संपृक्त माना है— “वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” (रघुवं० १।१) इस प्रकार के सम्बन्ध को ही 'गिरा अर्थ जल वीचि सम' इस पद्य में तुलसीदासजी ने भी व्यक्त किया है। ऐसे अभेद, तादात्म्य आदि सम्बन्धों को ही रमण और सम्भोग आदि संज्ञा दे दी जाती है। विद्वानों की दृष्टि में 'स्वातन्त्र्यं पुंस्त्वम्' और 'पारतन्त्र्यं स्त्रीत्वम्' का सिद्धान्त है। सभी जीवों में परतन्त्रतारूप स्त्रीत्व स्वाभाविक है। स्वातन्त्र्य तो केवल एक परमेश्वर में ही है। इस दृष्टि से सभी जीव परतन्त्र होने से स्त्री ही हैं। स्वतन्त्र होने से पुरुष तो एकमात्र श्रीकृष्ण भगवान् ही हैं। इसी लिए गोपाङ्गना-भाव की प्राप्ति ही जीव के कल्याण का मार्ग है। जैसे पतिव्रता पति की काया की छाया बन जाती है। पति के मन में मन, हृदय में हृदय एवं आत्मा में आत्मा मिलाकर तदधीन स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाली हो जाती है। इसी तरह जीव भी यदि भगवान् की स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाला हो तो उसकी स्थिति ही गोपाङ्गना-भाव है। इसी दृष्टि का चित्रण करते समय स्त्री-पुरुष के रमण का रूपक दे दिया जाता है। इसी दृष्टि से कुब्जा और कृष्ण की कथा है। केवल बाहुपाश और स्तन के भीतर ही नहीं, किन्तु अपने अन्तःकरण, अन्तरात्मा और रोम-रोम में श्रीकृष्ण को स्थापित करना ही जीव का भगवान् के साथ रमण है। हरिश्चन्द्र हरिश्चन्द्र के सम्बन्ध में भी लेखक का दोषारोपण निरर्थक ही है। हरिश्चन्द्र ने वरुण से कहा था कि यदि आपकी कृपा से मेरे पुत्र हो तो उसके द्वारा मैं आपका यजन करूँगा। रोहिताश्व पुत्र उत्पन्न हुआ। वरुण ने कहा "पुत्र हो गया अब उससे यजन करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा "अभी तो नामकरण नहीं हुआ, नामकरण के बाद यजन करेंगे।" नामकरण के बाद फिर वरुण आये। तब कहा कि अभी दन्तहीन है। दन्त होने के अनन्तर यजन करेंगे इत्यादि। युवक होते ही रोहिताश्व आखेट के प्रसङ्ग से अरण्य चला गया। वहाँ से कई बार नगर आने को प्रस्तुत हुआ, परन्तु इन्द्र उसे विचरण का ही उपदेश करके रोकते रहे। अन्त में रोहिताश्व के पिता हरिश्चन्द्र जलोदर रोग से ग्रस्त हो गये। वरुण के प्रति की गयी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने के लिए शुनःशेप को खरीद कर वरुण का यजन किया। विश्वामित्र के उपदेश से शुनःशेप भी विभिन्न सूक्तों से वरुणादि की स्तुति कर मुक्त हो गया। इस ढंग की कथा ऐतरेयब्राह्मण आदि ब्राह्मणग्रन्थों में है। परन्तु अनादि जीव के अनादि जीवन में कौन-कौन घटनाएँ होती हैं। इसका ठिकाना नहीं। कभी का डाकू वाल्मीकि कालान्तर में महर्षि वाल्मीकि हो सकता है, हरिश्चन्द्र की पूर्वोक्त घटनाएँ तो कोई बहुत अनुचित नहीं हैं। अपने शिशु के बचाने की दृष्टि से कालातिक्रमण का प्रयत्न अनुचित

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८३ नहीं कहा जा सकता है। फिर 'अन्ते या मतिः सा गतिः', 'अन्त भला सो भला' के अनुसार हरिश्चन्द्र की अन्तिम स्थिति की सत्यनिष्ठा सर्वोत्कृष्ट रही। उन्होंने सत्यरक्षा के लिए राज्य त्याग दिया। पत्नी और पुत्र का विक्रय कर अपना भी विक्रय किया और डोम के गुलाम बनकर सत्यनिष्ठा से उसकी नौकरी बजायी। मृत पुत्र के दहनादि के लिए अपेक्षित टैक्स वसूल करते समय पत्नी और पुत्र को पहचान लेने पर भी वे कर्तव्य पालन से नहीं हटे। अनादि काल में एक बार की ब्रह्मात्मनिष्ठा निर्णयरूप में आदरणीय होती है वैसे ही अन्तिम धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा प्राणी के जीवन को अलौकिक कर देती है। विश्वामित्र इसी प्रकार श्रीविश्वामित्र के सम्बन्ध में लेखक ने बहुत सी अनर्गल कल्पनाएँ की हैं। यहाँ भी भले उनके प्राक्कालिक जीवन में अनेक उग्रताएँ भी रही हों। परन्तु अन्तिम स्थिति में वे महातपा ब्रह्मविद्वरिष्ठ हो गये। महा- सिद्ध महर्षि वसिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि कहा और वे महाभाष्य के अनुसार स्वयं ही नहीं, किन्तु अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के सहित ब्रह्मर्षि हो गये। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ने उनके शिष्य होकर पाद-संवाहनादि सेवाएँ कीं। वसिष्ठ श्रीवसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक ने और भी अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ की हैं। परन्तु वसिष्ठ साक्षात् ब्रह्मा के पुत्र थे। निमि के शाप से देहपरित्याग कर मैत्रावरुण के तेज से महर्षि अगस्त्य के समान वे वसतीवरी यज्ञपात्र से उत्पन्न होकर कुम्भज भी कहलाये। किसी दिव्य अप्सरा के दर्शनप्रसङ्गज से ही मित्र एवं वरुण के तेज का प्राकट्य हुआ था। इतने मात्र से उन्हें वेश्यापुत्र कहना सर्वथा उपेक्षणीय है। सामान्यतया मनुष्यत्व, पशुत्व आदि जातियों में देह के रहते परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी लिए पशु, पक्षी आदि जातियाँ जैसे उसी देह में बदलती नहीं उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियाँ देह के रहते बदलती नहीं हैं। परन्तु जैसे विशेष तप या वर या शाप से राजा नहुष अजगर हो गया, नन्दी देवता हो गये, उसी प्रकार तपस्या विशेष से क्षत्रिय आदि ब्राह्मण हो सकते हैं। प्रकृति में सब शक्तियाँ विद्यमान होती हैं। सिद्धों के सङ्कल्पविशेष से प्रकृति का आवरण भेद होकर प्रकृत्यापूर से जात्यन्तर परिणाम हो सकता है। पूर्वजात्यारम्भक परमाणुओं का विघटन होकर अभीष्ट जात्यारम्भक परमाणुओं के सङ्घटन द्वारा अभीष्ट जात्यन्तर का निर्माण हो जाता है। विश्वामित्र स्वयं तो महर्षि ऋचीक के संकल्पित चरु एवं विधानों के द्वारा ब्राह्मतेज से पूर्ण थे ही। उन्हें तपस्या द्वारा केवल क्षेत्रान्तरजनित जात्यन्तरांश की निवृत्ति ही करनी पड़ी थी। परन्तु उनके पिता, पितामह, प्रपितामह आदि तो शुद्ध क्षत्रिय थे। तथापि विश्वामित्र के संकल्प विशेष से उनमें प्रकृत्यापूर द्वारा ब्रह्मर्षित्व सम्पन्न हुआ था। महर्षि वसिष्ठ तो ब्रह्मर्षि-पुत्र ही थे। देहान्तर से वे शुद्ध मैत्रावरुण थे। अतः उनके सम्बन्ध किसी भी आक्षेप को अवकाश नहीं है। वे उच्चकोटि के महातपा, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, ब्राह्मतेज से सम्पन्न, परमसिद्ध थे। सूर्यवंश एवं सूर्यवंशावतंस श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के गुरु थे। जिनकी महिमा सर्वविदित है। दाक्षायणी इसी तरह सती दाक्षायणी के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनर्गल प्रलाप है। वस्तुतः—