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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२७ “ततः पितामहो वाणीं त्वन्तरिक्षादभाषत । आगच्छ विष्णो ! भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोऽपि राघव ॥ भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्व स्विकां तनुम् । यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम् ॥ वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाकाशं सनातनम् । त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते !। ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम् । त्वामचिन्त्यं महद्भूतमक्षयं चाजरं तथा !' यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम् ।।” (वा० रा० ७।१००।८-११) श्रीपितामह का वचन सुनकर महामति राम अनुजों के साथ सशरीर वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए । जैसे जल में जल प्रविष्ट होता है वैसे ही चिन्मय तेजःस्वरूप श्रीराम चिन्मय वैष्णव स्वरूप तेजःपुञ्ज में प्रविष्ट हो गये । एतावता भगवान् का स्वरूप भौतिक न होकर चिन्मय तेजःस्वरूप ही होता है, यह सिद्ध है । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३।१२।९।७) जिस चिन्मय तेज से इद्ध होकर सूर्य तपता है वही चिन्मय तेज वैष्णवरूप है । न केवल श्रीराम ही अपितु भरत आदि श्रीभगवान् राम के अनुज भी सशरीर ही वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए थे। उस समय साध्य, मरुद्गण, इन्द्र, अग्नि सहित सब देवता, आदित्य, ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, दैत्य, दानव, मानव, राक्षस, सुपर्ण, नाग, यक्ष आदि सभी ने भगवान् श्रीराम की अर्चना की । सभी पुष्ट एवं प्रमुदित हो गये । सबके मनोरथ पूर्ण हुए । साधु साधु शब्द का सर्वत्र उद्घोष होने लगा । त्रिदिव त्रिताप रहित हो गया— “पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः । विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥ ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः । साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः । सुपर्णानागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ॥ सर्वं पुष्टं प्रमुदितं सुसम्पूर्णमनोरथम् । साधु साध्विति तैर्देवैस्त्रिदिवं गतकल्मषम् ॥ (वा०रा० ७।११०।१२-१५) उसके बाद विष्णुभावापन्न श्रीराम या रामस्वरूप विष्णु ने पितामह से कहा—“मेरे साथ में आये हुए जनसमूह को उत्तम लोक देने की व्यवस्था करें। ये सब मेरे स्नेह से सब त्याग कर मेरा अनुगमन करनेवाले हैं, भक्त हैं, अतएव भजनीय हैं ।” भगवान् विष्णु का वचन सुनकर ब्रह्मा पितामह ने कहा—“ये सब सन्तानक ( साकेत ) लोक को प्राप्त करेंगे । पशु-पक्षी जो भी आपका चिन्तन करते हुए प्राणत्याग करेंगे वे सभी सन्तानक लोक में निवास करेंगे। वह सन्तानक लोक ब्रह्मलोक के सभी गुणों से युक्त है। ब्रह्मलोक के अनन्तर है। सभी वानर और ऋक्ष आदि तक उसी लोक को प्राप्त हो गये । ब्रह्मलोकनिवासियों के समान ही उन्हें निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार और शुद्धब्रह्म की प्राप्ति भी उनके हस्तगत ही है— “अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह । एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत ॥

१२८ रामायणमीमांसा पञ्चम इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशस्विनः । भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते ॥ तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः । लोकान् सन्तानकान्नाम यास्यन्तीमे समागताः ॥ यच्च तिर्यग्गतं किञ्चित्त्वामेवमनुचिन्तयत् । प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या तत् सन्तानेषु निवत्स्यति ॥ सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युक्ते ब्रह्मलोकादनन्तरे । वानराश्च स्विकां योनिमृक्षाश्चैव तथा ययुः ॥” (वा० रा० ७।११०।१६-२०) अवधवासी सभी प्रजा ने प्रसन्नता एवं हर्षपूर्ण आनन्दाश्रु से विह्वल होकर सरयू में स्नान करके स्वेच्छा से प्राणत्याग किया और विमान पर आरूढ़ होकर वे सन्तानकलोक पहुँच गये । न केवल मनुष्य ही; किन्तु पशु-पक्षी भी सरयूजल से क्लिन्न होकर प्रभावान् दिव्य देह से युक्त होकर दिव्य देवलोक में चले गये— “भेजिरे सरयू सर्वे हर्षपूर्णाश्रुविक्लवाः । अवगाह्याप्सु यो यो वै प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत् ॥ मानुषं देहमुत्सृज्य विमानं सोऽध्यरोहत । तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम् ॥ सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवपूंषि तु । दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन् ॥ गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च । प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन् ॥” (वा० रा० ७।११०।२३-२६) इतने स्पष्ट उल्लेख पर भी यह कहना कि श्रीराम ने अपनी प्रजा के साथ जलसमाधि ले ली—स्पष्ट ही सत्य का तिरस्कार है और प्रजा की आँखों में धूलिप्रक्षेप करना है। इस तरह स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण का नाम लेकर मिथ्या कल्पना के आधार पर ही आनन्द कौसल्यायन ने जो ‘राम की जबानी राम की कहानी’ लिखी है वह निराधार, निष्प्रमाण अतएव उपेक्षणीय ही है । ✤ जैनमत में रामकथा बुल्के के कथनानुसार जैनधर्म में रामकथा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। राम (पद्म), लक्ष्मण और रावण न केवल जैनधर्मावलम्बी थे; किन्तु उनकी गणना जैनियों के त्रिषष्टि महापुरुषों में होती है। इन त्रिषष्टि महापुरुषों का वर्णन इस प्रकार है—२४ तीर्थङ्कर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव । इन सब की जीवनियां जैनधर्म में महाभारत, रामायण तथा पुराणों के समान आदरणीय हैं । त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण, आदिपुराण, उत्तरपुराण एवं पउमचरियं में उनका विस्तृत वर्णन है। पउम- चरियं (रामचरित) चौथी शती ई० का माना जाता है। प्रत्येक कल्प में ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव होते हैं। वे ही क्रमशः राम, लक्ष्मण और रावण माने जाते हैं। बलदेव और वासुदेव किसी राजा की विभिन्न

अध्याय जैनमत में रामकथा १२९ रानियों के पुत्र हैं। वासुदेव अपने बड़े भाई बलदेव के साथ प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) से युद्ध कर उसका वध करते हैं। दिग्विजय कर वे भारत के तीन खण्डों पर अधिकार कर अर्धचक्रवर्ती बन जाते हैं। मरने पर वासुदेव को प्रतिवासुदेव के वध के कारण नरक जाना पड़ता है। नौ वासुदेवों में लक्ष्मण और कृष्ण विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। बलदेव अपने भाई की मृत्यु के कारण शोकाकुल होकर जैनदीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। प्रतिवासुदेव सदैव वासुदेव का विरोध करते हैं और वासुदेव के चक्र से मारे जाते हैं। जैन कथा के अनुसार वानर और राक्षस दोनों विद्याधरवंश की विभिन्न शाखायें हैं। कथासरित्सागर, रामायण तथा महाभारत में विद्याधर देवयोनि का वर्णन अवश्य है। परन्तु महाभारत तथा रामायण के अनुसार उनका कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। महाभारत आदि में हनुमान्, वाली, सुग्रीव आदि विद्याधर नहीं, किन्तु वायु, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं के अंशभूत विशिष्ट वानर ही थे। जैनों के अनुसार ऋषभ ने अपने सौ पुत्रों में से भरत को अपना राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली। पश्चात् नमि और विनमि ने उनके पास पहुँचकर राज्यलक्ष्मी माँगी तो उनको विविध विद्यायें मिलीं। ऋषभ के परामर्शानुसार विन्ध्य-प्रदेश में उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया। ये ही दो राजकुमार विद्याधरों के पूर्वज हैं (पउमचरियं पर्व ३)। ये सब मनुष्य ही थे। उनको कामरूपत्व, आकाशगामित्व आदि विद्यायें सिद्ध थीं। वानर-वंशीय विद्याधरों की ध्वजाओं एवं महलों पर वानरों के चिह्न होते थे। इसलिए वे 'वानर' कहलाये (पउमचरियं ६।८९)। जैन रामकथाओं में प्रारम्भ में ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने की असत्य कथायें वर्णित हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैन रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद ही प्रचारित हुई है। वस्तुतः अनादि वेद तथा उपनिषद् मूलक वाल्मीकिरामायण ही राम के चरित्र में परम प्रमाण है। रामचरित्र की अत्यन्त लोकप्रियता देखकर जैन तीर्थङ्करों ने यह सोचा होगा कि यदि जैन जनता वाल्मीकिरामायण की ओर आकर्षित हुई तो स्वभावतः उनकी प्रीति वेद एवं ईश्वर तथा वैदिक कर्मकाण्ड में हो जायगी, परन्तु यह जैनधर्म के विरुद्ध है; अतः वाल्मीकिरामायण से रामचरित लेकर उसे विकृत रूप में उपस्थित किया जाय । श्वेताम्बर-सम्प्रदाय में विमलसूरि की राम-कथा प्रचलित है; दिगम्बर सम्प्रदाय में विमलसूरि एवं गुणभद्र की रामकथा का प्रचलन है। विमलसूरि की परम्परा की चर्चा करते हुए बुल्के ने स्पष्ट कहा है कि "विमलसूरि ने पउमचरियं लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है" (पृ० ६७ अनु० ५८)। विमलसूरि का काल जैन-परम्परा के अनुसार (पउमचरियं ११८।१०३) पउमचरियं ७२ ई० की रचना है। भाषा के आधार पर डा० याकोबी आदि विद्वान् पउमचरियं को तीसरी अथवा चौथी शती ई० की रचना मानते हैं। यह ग्रन्थ शुद्ध जैन-महाराष्ट्री में लिखा गया है। इसका संस्कृत रूपान्तर रविषेणाचार्य ने ६६० ई० में किया, जो पद्मचरित के नाम से प्रसिद्ध है। बुल्के के अनुसार "संघदासकृत वसुदेवहिण्डि में जो संक्षिप्त रामकथा मिलती है वह विमलसूरि की अपेक्षा वाल्मीकि के अधिक निकट है।" यद्यपि विमलसूरि का कहना है कि पद्मचरित आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा है और नामावली- बद्ध था; पर इसका इतना ही अर्थ है कि कथा के प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों, भवान्तरों आदि के नाम ही उसमें होंगे। पल्लवित कथा का रूप विमलसूरि ने ही निर्मित किया है। १७

१३० रामायणमीमांसा पञ्चम वस्तुतः यह भी वाल्मीकि का ही अनुकरण है; क्योंकि वहाँ भी रामायण को वेद-उपनिषद् पर आधारित माना जाता है। बुल्के ने प्राकृत पद्मचरित या रामचरित की चर्चा करते हुए विमलसूरिकृत पउमचरियं को ईसा की तीसरी या चौथी शताब्दी की रचना स्वीकार किया है, साथ ही ईसा की नवीं शताब्दी में शीलाचार्यकृत रामलक्खणचरिय को विमलसूरि की परम्परान्तर्गत मानते हुए भी वाल्मीकीय रामायण से अधिक प्रभावित माना है। भद्रेश्वरकृत कहावली के अन्तर्गत रामायण, भुवनतुङ्गसूरिकृत सीयाचरिय तथा रामलक्खणचरिय को भी ग्यारहवीं ई० शती की रचना माना है। संस्कृत जैन रामायणों की चर्चा में रविषेणकृत पद्मचरित को सन् ६६० ई० का माना है। हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र की टीका में सीतारामकथानकम्, जिनदासकृत रामायण या रामदेवपुराणम् को ईसा की १५ वीं; पद्मदेवविजयगणिकृत रामचरित और सोमसेनकृत रामचरित को १६ वीं तथा सोमप्रभकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुष- चरित और मेघविजयगणिवरकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित को ई० १७ वीं शती की रचना माना है। इसी तरह पद्मपुराण अथवा रामचरित्र, सीताचरित्र, रामायणकथानकम्, सीताकथानकम् आदि ग्रन्थों की भी प्रसिद्धि है। अपभ्रंश में प्राप्त स्वयम्भूदेवकृत पउमचरिउ अथवा रामायणपुराण ८ वीं ई० शती, रइधूकृत पद्मपुराण अथवा बलभद्र- पुराण १५ वीं शती, कन्नड़ में पम्परामायण या रामचन्द्रचरितपुराण ११ वीं, कुमुदेन्दुकृत रामायण और देवप्पकृत रामविजयचरित १६ वीं शती तथा चन्द्रसागरवर्णीकृत जिनरामायण १९ वीं शती की रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। उक्त सभी ग्रन्थ ईसा की तीसरी चौथी शती के बाद की ही रचनाएँ हैं, अतः बाल्मीकिरामायण से अर्वाचीन ही हैं, सुतरां उन सब का मूल वाल्मीकिरामायण ही है। रावणचरित (पर्व १-२०) के प्रारम्भ में विद्याधरलोक, राक्षस-वंश तथा वानर-वंश का वर्णन है, जो वाल्मीकिरामायण के उत्तर-काण्ड में वर्णित रावण से सम्बन्धित होने पर भी उससे पर्याप्त भिन्न भी है। रावणचरित के अनुसार राक्षसराज रत्नश्रवा से कैकेसी में दशमुख (रावण), भानुकर्ण (कुम्भकर्ण), चन्द्रनखा (शूर्पणखा) और विभीषण ये चार सन्तानें हुईं। रत्नश्रवा ने जब अपने पुत्र को पहले पहल देखा तब वह अपने गले में एक माला पहने हुए था; उस माला में पिता को बालक के दस सिर दिखाई पड़े; अतः उस शिशु का नाम दशमुख रख दिया गया। अपने मौसेरे भाई वैश्रवण का विभव देखकर दशमुख ने अपने भाइयों के साथ तप किया और विभिन्न विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उसने मन्दोदरी तथा अन्य छः विद्याधर कन्याओं से विवाह किया और कालान्तर में वैश्रवण और यम को परास्त कर पुष्पक विमान प्राप्त कर लङ्का में प्रवेश किया। रावणवालि-संघर्ष रावण ने वाली के पास अपना दूत भेज कर कहलाया कि वह स्वयं आकर उसको प्रणाम करे और अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह उसके साथ कर दे। वाली जिनवरेन्द्र से अन्य किसी को भी प्रणाम नहीं करता था; अतः वह अपने भाई सुग्रीव को राज्य देकर स्वयं जैनदीक्षा लेने चला गया (पर्व ९)। सुग्रीव ने रावण को प्रणाम किया और उसके साथ अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह भी कर दिया। बाद में, वाली द्वारा रावण को पराजित किये जाने का वृत्तान्त एक सर्वथा नवीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। तदनुसार वाली रामायणीय कथा के शिव का रूप लेता है और रावण द्वारा उठाये हुए पर्वतों को अपने पैर के अंगूठे से दबा देता है। आगे रावण द्वारा इन्द्र, वरुण एवं यम पर विजय प्राप्त करने का भी वर्णन है। जैनकथानुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी है। उसने जैन-मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाया और ऐसे यज्ञों पर, जिनमें पशुवध होता हो, रोक लगायी (पर्व ११), नलकूबर की पत्नी उपरम्भा के प्रेम-प्रस्ताव को अस्वीकार किया (पर्व १२) और अनन्तवीर्य के धर्मोपदेशों को सुन कर व्रत ले लिया है कि वह विरक्त परनारी के साथ रमण नहीं करेगा।

अध्याय] जैनमत में रामकथा [१३१ वस्तुतः अत्यन्त परोक्ष अतीत घटनाओं में प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं होता । वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ रामराज्य-काल में ही लेखबद्ध किया गया था । एकमात्र वही प्रामाणिक ग्रन्थ है; वह अनादि वेदों के उपबृंहणार्थ लिखा हुआ आर्ष इतिहास है । रामायण की लोकप्रियता के कारण ही धर्मान्ध लोगों ने उसको विकृत कर अपने धर्म-प्रचारार्थ उसका दुरुपयोग किया है । यदि रावण धर्मभीरु और सदाचारी होता तो वह सीताहरण ही क्यों करता ? और राम उसका वध क्यों करते ? इसी तरह हनुमान् के चरित्रवर्णन में भी मनमानी तथा उलटफेर किया गया है। उन्हें पवनञ्जय एवं अञ्जनासुन्दरी का पुत्र माना गया है जैन-कथानुसार हनुमान् वरुण के विरुद्ध रावण की सहायता करते हैं ! चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा के साथ विवाह करते हैं, साथ ही अनेक अन्य विवाह भी करते हैं। अखण्डब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ हनुमान् के सम्बन्ध में उक्त कल्पनाएँ सर्वथा निराधार हैं । जैनकथा में राम और सीता के जन्म एवं विवाह के सम्बन्ध में बहुत सी कल्पनाएँ हैं जो वाल्मीकि- रामायण के सर्वथा विपरीत हैं। तदनुसार ( पर्व २१-३२ ) अपराजिता और सुमित्रा के साथ दशरथ का विवाह हो जाने पर नारद ने उनको सूचना दी कि विभीषण उनको मारना चाहता है, क्योंकि एक नैमित्तिक के कथनानुसार दशरथ का पुत्र सागर के मार्ग से आकर जनक-पुत्री सीता के कारण रावण को मारेगा । नारद ने जनक को भी सावधान किया । दशरथ और जनक दोनों ही राजा अपने अपने राज्य छोड़ कर पृथ्वी-भ्रमण करने लगे और उनके मन्त्रियों ने उनके प्रतिरूप बनवा कर उनके महलों में रखवा दिये । विभीषण ने दशरथ की मूर्ति का सिर कटवाया । रविषेण के अनुसार परदेश में घूमते हुए दशरथ एवं जनक कैकेयी के स्वयंवर में पहुँचे । स्वयंवरा ने दशरथ के गले में माला डाल दी। इसपर अन्य राजाओं के साथ युद्ध हुआ जिसमें कैकेयी ने बड़े कौशल से दशरथ के रथ का संचा- लन किया । विवाह सम्पन्न होने पर दोनों राजा अपनी अपनी राजधानी लौट गये । घर पहुँच कर दशरथ ने कैकेयी को वर दिया । कैकेयी ने कहा कि अवसर आने पर इच्छित वर माँग लूँगी। श्रीराम या पद्म का अपराजिता ( कौशल्या ) से, लक्ष्मण का सुमित्रा से और भरत एवं शत्रुघ्न का कैकेयी से जन्म हुआ । रविषेण के अनुसार शत्रुघ्न का जन्म दशरथ की चतुर्थ महिषी सुप्रभा से हुआ था । अधिकांश जैन लेखक रविषेण का ही अनुसरण करते हैं । राजा जनक की विदेहा रानी से एक पुत्री सीता और एक पुत्र भामण्डल का जन्म हुआ । राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की, जिसके फलस्वरूप राम तथा सीता का वाग्दान हुआ। तदनन्तर सीतास्वयंवर के समय राम ने धनुष चढ़ाया और राम सीता का विवाह सम्पन्न हुआ । पश्चात् दशरथ को वैराग्य हुआ । उस समय कैकेयी ने पूर्व वरदान के बल पर भरत के लिए राज्य माँग लिया; यह सुन कर राम, सीता और लक्ष्मण दक्षिण दिशा की ओर वन चले गये । पश्चात्तापिनी कैकेयी के अनुरोध पर भरत ने वन में जाकर राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध किया । राम के अस्वीकार करने पर भरत अयोध्या लौट आये और राज्यभार ग्रहण किया तथा किसी मुनि के सामने उन्होंने प्रतिज्ञा की कि राम के प्रत्यागमन पर मैं दीक्षा ग्रहण कर लूँगा । जैन-ग्रन्थों में अपने धर्म के प्रति इतनी धर्मान्धता है कि वे देवता, दानव, मानव सब को जैन-दीक्षा ग्रहण करवा देते हैं । पउमचरियं के वन-भ्रमण ( पर्व ३३-४२ ) में चित्रकूट का उल्लेख है; परन्तु वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से अत्यन्त भिन्न है । 'वन-भ्रमण के उल्लेखानुसार वज्रकर्ण ने ८ तथा सिंहोदर आदि राजाओं ने ३०० कन्याएँ लक्ष्मण को प्रदान की थीं। इसके अतिरिक्त वनमाला; रतिमाला और जितपद्मा नामक कन्याओं को भी लक्ष्मण ने प्राप्त किया ।

१३२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की आज्ञा से राजा सुरप्रभ ने वंशपर्वत पर बहुत से मन्दिर बनवाये थे; इससे उसका नाम रामगिरि हुआ (पर्व ४०) । दण्डकारण्य में प्रवेश करने पर एक मुनिवर ने जटायु से सीता की रक्षा करने के लिए निवेदन किया। सीताहरण और अन्वेषण (पर्व ४३-५३) विमलसूरि के कथनानुसार चन्द्रनखा के पुत्र शम्बूकने सूर्यहास खड्ग की सिद्धि के लिए बारह वर्ष पर्यन्त साधना की। उसकी सफल साधना से खड्ग प्रकट हुआ। संयोगवशात् उसी समय लक्ष्मण वहाँ पहुँचे और खड्ग को उठाकर पास के बाँस को काटकर शम्बूक का सिर भी काट दिया। चन्द्रनखा अपने मृत पुत्र को देखकर विलाप करती हुई बन में भटकने लगी । भटकते-भटकते राम-लक्ष्मण के पास पहुँच कर उसने उनकी पत्नी बननेका प्रस्ताव किया । प्रस्ताव के अस्वीकार होने पर वह अपने पति के पास गयी और उसको पुत्र-वध का समाचार सुनाया। रावण को भी सूचना भेजी गयी। इस बीच लक्ष्मण अकेले ही खरदूषण की सेना को रोक लेते हैं। रावण वहाँ पहुँचता है। रावण अवलोकनी-विद्या के द्वारा यह जान लेता है कि लक्ष्मण ने रामको बुलाने के लिए सिंहनाद का संकेत बताया है, अतः वह सिंहनाद कर राम को लक्ष्मण के पास भेज कर सीता हरण-करने में सफल हो जाता है। सीता-हरण के पश्चात् सुग्रीव तथा राम के सख्य का वर्णन है। साहसगति ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य छीन लिया था। राम ने साहसगति को मारकर सुग्रीव को उसका राज्य लौटा दिया। सुग्रीव ने राम के लिए अपनी तेरह कन्याएँ समर्पित कीं; किन्तु सीता के वियोग में राम को उनके संग सुख नहीं मिलता था। सुग्रीव की आज्ञा से विद्याधर सीता की खोज करने जाते हैं। खोज लेते हुए सुग्रीव ने रत्नजटी से सुना कि रावण ने सीता का हरण किया है। यह सुनकर सब विद्याधरों ने रावण से भयभीत हो युद्ध करने से अस्वीकार कर दिया। उस समय सुग्रीव को स्मरण होता हैं कि अनन्तवीर्य ने रावण से कहा था कि जो कोटिशिला उठा सकेगा उससे तेरी मृत्यु होगी। वे सब विमान पर चढ़ कर वहाँ जाते हैं; लक्ष्मण कोटिशिला उठा लेते हैं; परन्तु विद्याधर रावण के भय से मुक्त नहीं हो पाते और हनुमान् को रावण के पास भेज कर विभीषण की सहायता से उसको समझाने का प्रयास करने की सलाह देते हैं। हनुमान् अपनी इस यात्रा में अपने नाना महेन्द्र को परास्त करते हैं; क्योंकि उन्होंने हनुमान् की माता अञ्जना को अपने घर से निकाल दिया था। तदनन्तर वे दधिमुखनगर के राजा की तीन कन्याओं से, जिनका विवाह साहसगति को मारनेवाले के साथ करने का निश्चय किया गया था, भेट करते हैं। लङ्का के पास पहुँच कर विभीषण द्वारा निर्मित प्राचीर पार कर वज्रमुख का वध करते हैं; तदनन्तर उसकी कन्या लङ्कासुन्दरी को परास्त कर उसके साथ रातभर क्रीड़ा करते हैं। लङ्का में प्रवेश कर सीता से मिलते हैं। वहाँ के महलों एवं उद्यानों का विध्वंस करते हैं। ओर इन्द्रजित् द्वारा बाँधे जाकर रावण के सामने उपस्थित किये जाते हैं। हनुमान् रावण को धमका कर अपने बन्धनों को तोड़ रावण का महल ध्वस्त कर सीता का सन्देश राम के पास ले जाते हैं। युद्ध (पर्व ५४-७७) युद्धपर्व के उल्लेखों में भी वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से निम्नाङ्कित स्थानों में भिन्नता है। १. वाल्मीकिरामायण में वर्णित सेतुबन्ध प्रसङ्ग का यहाँ सर्वथा भिन्न वर्णन दिया गया है। तदनुसार समुद्र नामक एक राजा वानरों की सेना को रोक लेता है, परन्तु नल द्वारा पराजित होकर लक्ष्मण को अपनी चार कन्याएँ समर्पित कर देता है।

अध्याय जैनमत में रामकथा १३३ २. विभीषण द्वारा सीता को लौटा देने का अनुरोध किये जाने पर रावण विभीषण को अपने नगर से निकल जाने का आदेश देता है; फलतः वह अपनी समस्त सेना के साथ हंसद्वीप जाकर राम की शरण लेता है। उसी समय सीता के भाई भामण्डल भी राम के साथ युद्ध में भाग लेने के लिए आ पहुँचते हैं। ३. सुग्रीव तथा भामण्डल इन्द्रजित् के नागपाश में बँध जाते हैं और गरुड़-केतु लक्ष्मण द्वारा मुक्त किये जाते हैं। राम और लक्ष्मण नागपाश में नहीं बँधे (पर्व ६०)। ४. लक्ष्मण को रावण की शक्ति लगने पर द्रोणमेघ को कन्या विशल्या उनकी चिकित्सा करती है। तदनन्तर लक्ष्मण और विशल्या का विवाह सम्पन्न हो जाता है। वे दोनों पूर्वजन्म के पुनर्वसु एवं अनङ्गशरा थे (पर्व ६१-६४)। ५. रावण ने सामन्त नामक अपने दूत को राम के पास सन्धि प्रस्ताव लेकर भेजा। इस सन्धि की शर्त थी—'राम सीता का त्याग कर दें और कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् एवं मेघवाहन को छोड़ दें तो रावण राम को अपने राज्य का एक अंश और तीन हजार कन्याएँ देगा (पर्व ६५)। ६. रावण बहुरूपा साधक विद्या को सिद्ध करने के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में साधना करता है। वानरों के द्वारा उसका ध्यान-भङ्ग करने का निष्फल प्रयास किया जाता है। अन्ततोगत्वा रावण अपनी विद्यासाधना में सफल होता है (पर्व ६६-६८)। बहुरूपा विद्या सिद्ध करने पर रावण सीता के पास जाकर उसको धमकी देता है कि अब मैं अवश्य ही राम का वध कर तुमको अपनी रानी बना लूँगा। ७. सीता उत्तर देती हैं कि मेरा जीवन राम के जीवन पर अवलम्बित है और मूर्च्छा खाकर गिर पड़ती है। राम के प्रति सीता के प्रेम को देखकर रावण पश्चात्ताप करता है कि वह राम एवं लक्ष्मण को संग्राम में हराकर सीता को लौटा देगा (पर्व ६९)। ८. लक्ष्मण (नारायण) ने ही रावण (प्रतिनारायण) का वध किया। ९. रावण के वध के बाद उसके दोनों पुत्र इन्द्रजित् तथा मेघवाहन ओर कुम्भकर्ण जो युद्ध में बन्दी किये गये थे, मुक्त कर दिये जाते हैं। वे तीनों विरक्त होकर तप करने चले जाते हैं। साथ ही मन्दोदरी, चन्द्रनखा आदि आठ हजार युवतियाँ भी महलों को त्याग कर साधनामय जीवन व्यतीत करने लगती हैं (पर्व ७५)। १०. लङ्का-प्रवेश कर राम सर्वप्रथम सीता से मिलने जाते हैं। देवता दोनों का मिलन देख कर पुष्पवृष्टि करते हैं तथा सीता के निर्मल चरित्र की साक्षी देते हैं। राम के किसी सन्देह तथा सीता की अग्निपरीक्षा का कोई सङ्केत नहीं मिलता (पर्व ७६)। ११. तदनन्तर राम एवं लक्ष्मण रावण के महलों में रहने लगते हैं और उन कन्याओं को, जिनके साथ उनकी मँगनी हो चुकी थी, बुला कर विवाह करते हैं। यह विवाह लङ्का में ही सम्पन्न होता है। राम एवं लक्ष्मण छः वर्ष पर्यन्त लङ्का में रहते हैं (पर्व ७७)। उत्तरचरित (पर्व ७८-११८) नारद लङ्का में राम के पास जाकर पुत्र-वियोग के कारण दुःखित अपराजिता की दशा का वर्णन करते हैं, जिससे राम और लक्ष्मण साकेत लौटने का निश्चय करते हैं (पर्व ७८)। उनके आगमन के पश्चात् भरत को वैराग्य उत्पन्न होता है और वे दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त करते हैं (पर्व ८०-८४)। अनन्तर लक्ष्मण के राज्याभिषेक और उनके द्वारा विद्याधर राजाओं पर विजय प्राप्त करने का वर्णन है। लक्ष्मण की विशल्या आदि आठ पटरानियाँ

१३४ रामायणमीमांसा पञ्चम तथा सोलह हजार रानियां और राम की आठ हजार पत्नियां बतायी गयी हैं, जिनमें सीता, प्रभावती, रतिनिभा तथा श्रीदामा प्रधान कही गयी हैं (पर्व ८५-९१)। सीता-त्याग की भी कथा वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसके अनुसार सीता के दो पुत्र लवण तथा अंकुश थे। वे नारद के भड़काने पर राम एवं लक्ष्मण से युद्ध के लिए आते हैं। युद्ध के अनन्तर सुग्रीव, हनुमान् और विभीषण आदि के अनुरोध पर राम सीता को बुला भेजते हैं, परन्तु उनके सतीत्व का प्रमाण भी चाहते हैं : सीता अग्निपरीक्षा में सफल होकर दीक्षा ग्रहण कर लेती हैं और स्वर्ग में इन्द्र बन जाती हैं¹। राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा के लिए देवताओं ने लक्ष्मण को राम के देहान्त का समाचार दिया, इससे लक्ष्मण का देहान्त हो जाता है। शोकातुर होकर मरने से नरक जाते हैं। लक्ष्मण की अन्त्येष्टि के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और १७ हजार वर्ष साधना कर निर्वाण को प्राप्त होते हैं। अन्त में कहा गया है कि लक्ष्मण, सीता और रावण भी अनेक जन्म लेने के बाद मुक्त हो जायेंगे (पर्व ११०-११२)। अनीश्वरवादी जैनाचार्य ईश्वर मानते ही नहीं, अतः अपने मत के रक्षार्थ ही साक्षात् परब्रह्मरूप राम तथा परब्रह्मरूपिणी सीता को मनुष्य ही मानकर उनके दीक्षा-ग्रहण की धृष्ट कथाओं का प्रचार करते हैं। इसी तरह भगवान् राम के स्वरूप लक्ष्मण के नरक जाने को वेद-शास्त्र विरुद्ध जैन-कथा सर्व वैदिक-धर्म-द्वेषमूलक ही है। बुल्के कहते हैं—परवर्ती जैन-कथाओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। हरिभद्रकृत उपदेशपद, भद्रेश्वरकृत कहावली और हेमचन्द्रकृत जैनरामायण एवं रामचरित्र से रावण का चित्र सीता के परित्याग का कारण माना जाता है। हेमचन्द्रकृत सीतारावणकथानकम् के अनुसार कैकेयी अपने दूसरे वरदान के बदले में राम, लक्ष्मण और सीता के लिए १४ वर्ष पर्यन्त का वनवास माँगती है। गुणभद्र की रामकथा उत्तरपुराण में आठवें बलदेव, नारायण तथा प्रतिनारायण—जो वाल्मीकिरामायण के राम, लक्ष्मण तथा रावण हैं—का चरित्र ६७वें और ६८वें पर्वों में १११७ श्लोकों में वर्णित है। यह कथा विमलसूरि और वाल्मीकि दोनों से बहुत भिन्न है। इसमें सीता को रावण एवं मन्दोदरी की औरस पुत्री कहा गया है। सीताजन्म की कथा का इस रूप में उल्लेख सर्वप्रथम सङ्घदासकृत वसुदेवहिण्डि में प्राप्त होता है। गुणभद्र का आधार अज्ञात है; परन्तु कहा जा सकता है कि वे विमलसूरि तथा सङ्घदास की रचनाओं तथा परम्पराओं से परिचित थे। जिनसेन अपने ग्रन्थ आदिपुराण में कवि परमेश्वर की गद्यकथा का उल्लेख करते हैं और उसे ही अपनी रचना का आधार मानते हैं। गुणभद्र जिनसेन की अधूरी रचना पूर्ण करते हैं; अतः बहुत सम्भव है कि वे भी परमेश्वर कवि की कथा पर निर्भर रहे हों। परमेश्वर कवि की रचना अप्राप्य है। तिब्बती रामायण तथा अन्य तिब्बती ग्रन्थों में भी सीता मन्दोदरी की पुत्री ही मानी गयी हैं। जैन कवियों ने इसे अपने जैन धर्म के ग्रन्थों में स्थान दिया होगा। चामुण्डराय त्रिषष्टिलक्षणमहापुरुष के लेखकों की सूची में कूचिभट्टारक, नन्दिमुनीश्वर, कवि परमेश्वर, जिनसेन और गुणभद्र का उल्लेख करते हैं। गुणभद्र की रामकथा अन्य जैन-ग्रन्थों में भी सुबद्ध मिलती है। गुणभद्र- १. अपने धर्म के प्रचार और दीक्षा की महत्ता को स्थापित करने की दृष्टि से ही जैन तीर्थङ्कर सीता, राम, भरत आदि के द्वारा जैन-दीक्षा ग्रहण करने की कपोल-कल्पित कथाओं की चर्चा करते हैं। इसी आधार पर जैन-धर्माचार्य तुलसी ने भी अपनी पुस्तक ‘अग्निपरीक्षा’ में सीता एवं राम के सम्बन्ध में जनापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है।

अध्याय जैनमत में रामकथा १३५ कृत संस्कृत उत्तरपुराण नवीं श० ई०, कृष्णदासकृत पुण्यचन्द्रोदयपुराण १६ वीं श० ई०, कन्नड़ चामुण्डरायकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषपुराण १०वीं श० ई०, बन्धुवर्मा कृत जीवनसम्बोधन १२ श० ई० और नागराजकृत पुण्यश्रव- कथासार १३३१ ई० की रचनाएँ हैं। इनके अनुसार दशरथ वाराणसी के राजा थे। उनके चार पुत्र हुए। सुबाला के गर्भ से राम और कैकेयी से लक्ष्मण उत्पन्न हुए। कालान्तर में राजा दशरथ ने साकेत को अपनी राजधानी बना लिया। यहाँ आने पर उनके दो और पुत्र भरत एवं शत्रुघ्न किसी अन्य रानी के गर्भ से, जिसका नाम नहीं दिया है, उत्पन्न हुए। दशानन विनमि विद्याधरवंश के पुलस्त्य का पुत्र है। असितवेग की पुत्री मणिमती को तपस्या करते हुए देखकर रावण उस पर आसक्त हो जाता है; अतः उसकी साधना में विघ्न डालता है। विघ्न के कारण मणिमती निदान करती है कि मैं रावण की पुत्री बनकर उसको मारूँगी। रावण की रानी मन्दोदरी के गर्भ से मणिमती का ही पुनर्जन्म सीता के रूप में होता है। ज्योतिषियों द्वारा यह बताये जाने पर कि यह कन्या अपने पिता के नाश का कारण बनेगी। रावण भयभीत हो मारीचि को आज्ञा देता है कि वह उस कन्या को कहीं छोड़ आये। मारीचि कन्या को मञ्जूषा में रखकर मिथिला देश में गाड़ आता है। हलकी नोक से उलझ जाने के कारण वह मञ्जूषा दिखलायी पड़ती है, और लोगों द्वारा जनक के पास ले जायी जाती है। मञ्जूषा खोल कर देखने पर जनक ने उसमें एक कन्या को देखा; इस कन्या का नाम सीता रखकर वे उसका पुत्रीवत् पालन करने लगे। बहुत दिनों बाद राजा जनक अपने यज्ञ की रक्षा के लिये राम एवं लक्ष्मण को बुलाते हैं। यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सीता और राम का विवाह हो जाता है। तदनन्तर राम सात अन्य कुमारियों से भी विवाह करते हैं। लक्ष्मण भी पृथ्वीदेवी आदि कई कन्याओं से विवाह करते हैं। राम एवं लक्ष्मण दोनों ही दशरथ की आज्ञा से वाराणसी में ही रहने लगते हैं। नारद से सीता के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण उसे हर लाने का सङ्कल्प करता है; सीता की मनोभावना जानने के लिए रावण शूर्पणखा को भेजता है। शूर्पणखा लौटकर आने पर बताती है कि सीता के मन को चलायमान करना असम्भव है। जब चित्रकूट में राम और सीता वाटिका में विहार कर रहे थे तब मारीच स्वर्णमृग के रूप में आकर राम को दूर ले गया और उसी समय रावण राम का रूप धारण कर आया और सीता से कहा कि मैंने मृग को महल में भेज दिया है; साथ ही, उनको पालकी पर चढ़ने की आज्ञा दी। वह पालकी वास्तव में पुष्पक विमान ही था; उसके द्वारा रावण सीता को लङ्का ले गया। रावण सीता का स्पर्श नहीं करता था; क्योंकि पतिव्रता के स्पर्श से उसकी आकाशगामिनी विद्या नष्ट हो जाती। दशरथ को स्वप्न में ज्ञात हुआ कि रावण ने सीता का हरण कर लिया है, अतः वे राम का समाचार जानने के लिए उनके पास दूत भेजते हैं। उसी समय सुग्रीव और हनुमान् राम के पास वाली के विरुद्ध सहायता माँगने पहुँच जाते हैं। हनुमान् लङ्का जाते हैं और सीता को सान्त्वना देकर लौट आते हैं। तदनन्तर लक्ष्मण के द्वारा वाली का वध होता है और सुग्रीव अपने राज्य का अधिकारी पुनः बन जाता है। वानरों और राम की सेना विमान से लङ्का पहुँचायी जाती है। लक्ष्मण चक्र से रावण का सिर काटते हैं। राम परीक्षा लिए बिना ही सीता को स्वीकार कर लेते हैं। पश्चात् राम लक्ष्मण को साथ लेकर ५२ वर्ष पर्यन्त दिग्विजय यात्रा करते हैं, परन्तु अर्धचक्रवर्ती बनकर अयोध्या लौट आते हैं। दोनों का सम्मिलित अभिषेक होता है। कुछ समय बाद राम एवं लक्ष्मण भरत एवं शत्रुघ्न को राज्य देकर वाराणसी चले जाते हैं। सीता को विजयराम आदि आठ पुत्र होते हैं। इन गाथाओं में सीता के त्याग की चर्चा नहीं है। लक्ष्मण किसी असाध्य रोग से मर जाते हैं और रावण-वध के कारण नरक में जाते हैं। राम लक्ष्मण के पुत्र पृथ्वीचन्द को राज्यपद पर और सीता के कनिष्ठ पुत्र अजितञ्जय को युवराजपद पर अभिषिक्त कर स्वयं सुग्रीव, अणुमान् और विभीषण आदि पाँच सौ राजाओं तथा अपने १८० पुत्रों के साथ साधना करने चले जाते हैं। ३९५ वर्ष बीत जाने के बाद राम को केवल्य ज्ञान उत्पन्न होता है; सीता भी अन्य अनेक रानियों के साथ दीक्षा लेती हैं। अन्त में राम तथा अणुमान् की मोक्ष-प्राप्ति का उल्लेख हुआ है।

१३६ रामायणमीमांसा पञ्चम सीता स्वर्ग पहुँचती है। लक्ष्मण के सम्बन्ध में उल्लेख है कि वे भी नरक से निकल कर संयम धारण करेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे। प्राचीन एवं अर्वाचीन जैन विद्वानों की दृष्टि में जैनधर्म-दीक्षाप्रचार मुख्य लक्ष्य रहा है। उसी लक्ष्य के अनुसार उन्होंने रामकथा की लोकप्रियता का उपयोग किया है। यदि वास्तविक वाल्मीकीय रामकथा की ओर जैन बन्धुओं की प्रवृत्ति होती तो वेदप्रामाण्य एवं ईश्वरवाद का भाव उनपर अवश्य पड़ता, परन्तु यह इष्ट नहीं था। इसीलिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण की कथा को ही विकृत करके जैन जनता के सामने उपस्थित किया है। आजकल लोग अहिंसा और सत्य का नाम लेकर लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करके उसकी ओट में हिंसा का अकाण्डताण्डव करते हैं। तेरहपन्थी आचार्य तुलसी ने अग्निपरीक्षा नाम की पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने श्रीसीता और राम के लिए बहुत अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। अनादि अपौरुषेय मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों में राम का वर्णन मिलता है। काण्वसंहिता में अनेक स्थलों पर राम नाम का प्रयोग मिलता है। महाभारत एवं हरिवंश के टीकाकार नीलकण्ठ चतुर्धर ने मन्त्ररामायण एवं मन्त्रभागवत लिखकर ऋग्वेद के मन्त्रों के आधार पर श्रीराम- चरित्र तथा श्रीकृष्णचरित्र का वर्णन किया है। रामतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा सीतोपनिषद् एवं मुक्तिकोपनिषद् में सीता और राम की महिमा वर्णित है। अन्य पचीसों उपनिषदों में भी श्रीरामवन्दनारूप ही मङ्गलाचरण किया गया है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा के श्रीरामरूप से अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि के मुखारविन्द से रामायण के रूप में प्रकट हुए हैं। महर्षि ने वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीब्रह्माजी के आदेश से समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, श्रीदशरथ, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, सीता, हनुमान् आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित—सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके रामायण का निर्माण किया है। रामायण आर्ष आदिकाव्य होते हुए भी शुद्ध आर्ष इतिहास भी है और वह आधुनिक इतिहासों के समान संवाददाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टर के समाचारों के आधार पर विरचित इतिहास नहीं है। इसी लिए ब्रह्माजी का महर्षि वाल्मीकि को वरदान प्राप्त हुआ था कि इस काव्य में तुम्हारा एक वाक्य भी अनृत न होगा— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” (वा० रा० १।२।३५) ऋतम्भरा प्रज्ञा ऋत (परम सत्य) ही को धारण करती है। आर्षज्ञान लौकिक प्रत्यक्ष से भी अधिक प्रमाण होता है। लोक में तो आँखों देखी घटनाओं में भी मतभेद हो जाता है। युद्धकाल में आँखों देखी घटनाओं के वर्णन विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न ढंग के निकलते हैं। तभी यद्यपि श्रीहनुमान्जी ने अपने हनुमन्नाटक में बहुधा आँखों देखी घटनाओं का ही वर्णन किया है, तथापि रामचरित्र का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही मान्य है। इसलिए महाभारत के भावदीपटीकाकार ने महाभारत में लक्ष्मण द्वारा वर्णित कुम्भकर्ण-वध को गौणार्थ मानकर उसे वाल्मीकिरामायण के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है। कल्पभेद से रामकथा में भेद हो सकता है। परन्तु मूलतः उसमें भेद नहीं होता। “राम अनन्त अनन्त गुनानी” (रा० मा० ७।५१।२) का यह अर्थ नहीं है कि राम ने निरीश्वरवादी जैनमत की भी दीक्षा ले ली थी या राम ने अपनी बहन सीता से विवाह किया था। पर जब ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के बिना भी मनमानी कल्पना हो सकती है तब तो परम वैदिक एवं वैदिक धर्म-मार्ग के प्रतिष्ठापक श्रीराम को ईश्वर, वेद एवं वैदिक यज्ञादिविरोधी जैन भी कहा ही जा सकता है। प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ये सब कल्पनाएँ निःसार ही हैं। जैनमत के सज्जन कहते हैं—अग्निपरीक्षा सीताराम की आराधना को उजागर करने की दृष्टि से लिखा गया छोटा सा खण्डकाव्य है, पर विचारे साधक को ज्ञात नहीं है कि जैनमत में सीताराम परमेश्वर नहीं, किन्तु एक णमोकार मन्त्र जपनेवाले जैनी हैं। निरीश्वरवादी जैनमत

अध्याय जैनमत में रामकथा १३७ में ईश्वर भी मान्य नहीं है। फिर उस मत में सीता और राम का ईश्वर होना कैसे सम्भव है। साधक कहते हैं— कवि की प्रतिभा स्वतन्त्र होती है। विधि-निषेधों की रेखाओं से उसे बाँधा नहीं जा सकता। पर साधक यह भूल जाते हैं कि इसी सम्बन्ध में एक जैन सज्जन ने अग्निपरीक्षा बनाम आर्यपरीक्षा पुस्तक लिखी है। उसमें लेखक ने लिखा है कि काव्य के कुछ नियम होते हैं। प्रामाणिक इतिहास पुराणादि का आश्रयण करके ही कवि-काव्य यशस्वी होता है। यदि कवि प्रमाणनिरपेक्ष कोई कल्पना करता है तो वह प्रतिभा का स्वातन्त्र्य उच्छृङ्खलता का ही रूप धारण कर लेता है। जो प्रतिभा प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं समझती वह भी क्या प्रतिभा कहलाने योग्य है ? धर्मान्तरण उक्त सज्जन को लगता है कि जब हिन्दुओं में से किसी के ईसाई, मुसलमान और बौद्ध बनने में कोई बाधा नहीं डाली जाती है तो उनमें से जैन बनाने में ही क्यों बाधा डाली जाती है ? परन्तु क्या यह भी कोई दलील है। क्या यह कोई चोर या डाकू नहीं कह सकता कि जब अमुक अमुक खजाने से बहुत रत्न चुरा लिये, तब हमपर ही प्रतिबन्ध क्यों ? उसे यह समझना चाहिए कि एक पाप के उदाहरण से दूसरा पाप पुण्य नहीं बन जाता ? और किसी सनातनधर्मी प्रहरी के लिए यह कोई उत्तर नहीं है। जो भी वैदिक सनातनियों को बहकाकर, धोखा देकर, धर्मान्तरण की बात करते हैं, वे सब दण्डनीय हैं। हिन्दू और जैन प्रश्न करते हैं—क्या हिन्दुओं से जैन अलग हैं ? जन्म से मरण तक सारे क्रियाकलाप ब्राह्मणों से करानेवाले जैनों को जानबूझकर हिन्दुसमाज से अलग करना क्या हिन्दुधर्म के हित में होगा ? जो बुद्ध एवं ऋषभदेव को अवतार मानते हैं, चार्वाक जैसे नास्तिक को भी महामुनि मानते हैं, उन अहिंसा को आदर्श मानने- वाले जैनों से झगड़ना क्या घर के चिराग से घर में आग लगाना जैसा कार्य नहीं है ? इससे सारी सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायगी। रिश्ते नाते टूट जायेंगे। हिन्दुसमाज विभाजित हो जायगा। पर यह प्रश्न तो तुलसी से ही करना चाहिये, क्योंकि तुलसी स्वयं हिन्दू की धर्ममूलक कोई परिभाषा नहीं मानते हैं। उनकी दृष्टि में तो हिन्दुस्तान में रहनेवाला ही हिन्दु होता है। इस दृष्टि से जैसे हिन्दुस्तान में रहनेवाले ईसाई और मुसलमान को हिन्दू या हिन्दी कहा जा सकता है वैसे ही जैन को भी। श्रीविनोवा के साथ हुए वार्तालाप में उन्होंने हिन्दू परिभाषा में गोरक्षा का सन्निवेश भी अनुचित कहा है। हिन्दूपरिभाषा के विचारकों की दृष्टि से तो वैदिक स्मृति- ग्रन्थों पर आधृत मिताक्षरादि निबन्ध ग्रन्थों के अनुसार जन्म-मरणादि संस्कार तथा दायभाग की व्यवस्था स्वीकार करने के कारण जैन भी हिन्दू ही हैं; परन्तु पन्थी जैनाचार्य ही इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार वेद तथा वैदिक ब्राह्मणों द्वारा जैनों को विवाहादि संस्कार नहीं कराना चाहिये। वस्तुतः वैदिक अवैदिक का, ईश्वरवादी निरीश्वरवादी का रिश्ता नाता रहना उचित भी नहीं है। सही बात तो यह है कि जैनधर्म में वर्णाश्रमधर्म मान्य ही नहीं है। फिर भी जैनों में वैश्य जाति के ही लोग अधिकांश हैं। वे व्यापारी होने से निकृति एवं क्षमा का ही आदर करते हैं—“अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च”। इसी लिए बौद्धों के समान अक्खड़ नहीं हैं। व्यवहार में वर्णभेद मानते रहे हैं। वैश्यों में ही शादी-ब्याह, खान-पान करते रहे हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियों या अन्त्यजों, शूद्रों से शादी-ब्याह उन्होंने नहीं किया; परन्तु बौद्धों ने धड़ल्ले से वर्णधर्म का व्यवहार में भी विरोध किया। मनमानी शादियाँ कीं। मनमाना खानपान किया। इसी कारण वे इस देश में न रह पाये। परन्तु जैन अपनी नीति से नम्र होने के कारण यहाँ रह गये। इसी कारण जैनों का सनातनी वैश्यों में विवाह होता रहा और उस सम्बन्ध से ही उनके कर्मों में ब्राह्मणों का सम्बन्ध रहा। पर आज के कट्टर जैन इसका खुलकर विरोध करते हैं। जैनों के पक्ष से कहा जाता है—"ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै" के अनुसार हिन्दुओं और जैनों में मेल-जोल रहेगा ही। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक विशाल देश है। पर क्या ही अच्छा होता यदि

१३८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसके साथ वेद तथा वैदिक यज्ञों तथा ईश्वर का खण्डन करनेवाले ग्रन्थों तथा उनके लेखक और प्रचारक जैनों की भी उपेक्षा की जाती । उनके जाल में फँसे हुए ही अपने बन्धुओं को बचाने का प्रयास किया जाता । पर वस्तुस्थिति भिन्न है। वास्तव में ऐसे लोगों के द्वारा ही भारत की सांस्कृतिक विशालता का खण्डन होता है। जैनपन्थी छद्मनीति से ऐसी बातें कहते हैं पर राम जैसे सर्वमान्यचरित्र कभी भी ऐसी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना एवं भावात्मक एकता का प्रतिनिधि राम के अतिरिक्त है कौन ? वास्तव में राम-भक्तों को क्या श्रीराम को ईश्वर न मानकर एक जैन जीव माननेवाले नास्तिकों का खण्डन करने का साहस नहीं करना चाहिए ? वैदिकों ने तो ऋषभदेव एवं बुद्ध को अवतार मानकर उन्हें सम्मानित कर ऊँचे पद पर बैठाया है, पर और लोग अपने उन तुलसी जैसे जैनों के कृत्यों पर ध्यान नहीं देते, जिन्होंने वैदिक दृष्टि से परमेश्वर राम को अपने समान ही णमुक्कार मन्त्र जपनेवाला जीव बनाकर रावणवादियों के समान ही सीता और राम के लिए लोकापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिन ग्रन्थों ने ऋषभदेव या बुद्ध को अवतार बताया है उन्होंने यह भी कह दिया है कि ब्रह्मात्मनिष्ठ ऋषभदेव के सर्वोत्कृष्ट परमहंसभाव को न समझकर ही उनके बाह्य आचरणों के आधार पर किसी राजा ने जिस प्रकार जैनधर्म चला दिया था उसी प्रकार वैदिक धर्म के अनधिकारी कुछ असुरों के व्यामोहनार्थ ही बुद्ध एवं बृहस्पति ने बौद्ध एवं चार्वाक धर्म का उपदेश किया था। अतएव वैदिक ऋषभदेव, बुद्ध एवं वृहस्पति का सम्मान करते हुए भी वेदविरुद्ध जैन, बौद्ध और चार्वाक आदि मतों का आदर नहीं करते। वस्तुतः जैसे आजकल हिन्दुओं के मेलों में ईसाई प्रचारक स्त्री-पुरुष खड़े होकर लोगों को बटोरने के लिए श्रीराम एवं श्रीकृष्ण का गुणगान करते हैं और जब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब उन्हें यीशु की महिमा बताकर पुस्तक बाँटकर हिन्दू धर्म की निन्दा करके उन्हें ईसाई बनने की प्रेरणा देते हैं, ठीक वैसे ही श्रीराम की लोकप्रियता के कारण जैन श्रीराम की चर्चा करते हैं, परन्तु उन्हें ईश्वर न मानकर लोगों को यह बताते हैं कि अन्त में दुःखी होकर राम सोलह हजार राजाओं एवं सीता आदि रानियों के साथ जैनी हो गये। क्या यही श्रीराम की भक्ति है ? तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि का अणुव्रत और सर्वधर्मसम्मेलन आदि आन्दोलन ईसाइयों के समान केवल गैर जैनियों को बटोरकर जैनधर्म-प्रचार करने का साधनमात्र है। उसकी ओट में वे शुद्ध कट्टर साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं। जैन रामायण की चाहे कितनी भी प्राचीनता क्यों न मानी जाय, अन्ततः तो वैदिक रामायण से वह अर्वाचीन ही है। इतिहास की दृष्टि से सबसे प्राचीन जैन रामकथा विमलसूरि की ही है। वह जैन विद्वानों के अनुसार ही ईशा की प्रथम शती की है। परन्तु आधुनिक इतिहास की दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण कम से कम विक्रमशती से ६०० वर्ष प्राचीन है। वास्तव में तो वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ के अपने अक्षरों के अनुसार वह सिंहासनासीन राम के समकाल में लिखा गया है। व्यास की प्राचीनता भी कुछ कम नहीं है। फिर क्या यह नहीं कहा जा सकता कि वाल्मीकि एवं व्यास द्वारा वर्णित रामकथा को ही जैनियों ने अपने मत के अनुसार परिवर्तित किया। स्पष्ट है कि वाल्मीकि तथा व्यास द्वारा रचित रामायणों में, ईश्वर का, वेदों का और यज्ञों का महत्त्व वर्णित है। वहाँ राम को ईश्वर माना गया है। यह सब जैनों के मत से विरुद्ध था। इसलिए जैनों ने उसी रामकथा को विकृत कर अपने रूप में गढ़ा। आधुनिक जैनपन्थियों का कहना है—महर्षि वाल्मीकि, व्यास, विमलसूरि, रविषेण, हेमचन्द्र, कालिदास आदि अनेक महाकवियों ने रामायण काव्य लिखा है। हिन्दुस्तान, नेपाल, वर्मा, जावा, सुमात्रा, श्याम, थाईलैण्ड आदि में रहनेवाले लोगों के भी राम आराध्य हैं। आराध्य की आराधना आराधकों ने लिखी। वह सब रामचरित है। इसी प्रसङ्ग में उन्होंने कामिल बुल्के की रामकथा पुस्तक का स्मरण कर रामायण क्या है ? उसका विस्तार कैसा है ? उसका किन-किन रूपों में भक्तों ने विस्तार किया, कथाभेद रहने पर भी समूची दुनिया में श्रीराम स्मरणीय क्यों हैं ?

अध्याय जैनमत में रामकथा १३९ वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन अनेक प्रकार से रामायण से संबल पाता है। इसी लिए— "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ० सं०) एक ही सत्य अनेक रूपों में व्यक्त किया गया है। तब जैनरामायण के पुस्तकीकरण से किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिये ? क्या इन समस्त रामायणों के रचयिताओं का व्याख्यावैशिष्ट्य ही तुलसीदास के इस कथन को प्रमाणित नहीं करता ? "राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं, जिन्ह के बिमल बिचार।।" ( रा० मा० १।३३ ) यह तो ठीक ही है कि श्रीराम की कथा सब देशों में प्रचलित है और उनमें कुछ भेद भी है; परन्तु वस्तु- स्थिति को दृष्टि में रखते हुए तथ्य का मूल्याङ्कन करना चाहिये। क्रिया में विकल्प मान्य होने पर भी वस्तु में विकल्प नहीं हो सकता। कोई व्यक्ति पैदल चलता है, कोई घोड़े से चलता है, कोई नहीं चलता—ये सब विकल्प सम्भव हैं और यथार्थ हैं, परन्तु मन्दान्धकार में स्थित रज्जु में अनेक विरुद्ध ज्ञानों का समन्वय नहीं हो सकता। कोई उसे रज्जु कहे, कोई उसे सर्प कहे, कोई उसे माला कहे और कोई भूछिद्र कहे, तो उसमें सबका होना संभव नहीं है। वस्तुस्थिति के अनुसार एक ही ज्ञान को सत्य और अन्य को मिथ्या मानना ही पड़ता है। इतिहास भी वस्तुस्थिति से सम्बन्ध रखता है। इसी लिए इतिहास-शोधक प्रमाणों से अन्वेषण कर मिथ्या एवं सत्य इतिहास का भेद खोलते हैं; अतः यदि राम एवं रामचरित काल्पनिक नहीं हैं, कोई वस्तु है तो उसका कोई प्रामाणिक रूप तो जानना ही पड़ेगा। इस दृष्टि से देखने से भी राम के समकाल में निर्मित वाल्मीकिरामायण को ही राम एवं उनके चरित्र में मुख्य प्रमाण अवश्य ही मानना पड़ेगा। कामिल बुल्के आदि उस विकासवाद के दृष्टिकोण से ही रामकथा का विकास समझते हैं जिसके अनुसार आत्मा या परमात्मा का विकास हुआ है। उसके अनुसार जङ्गली मनुष्य, जङ्गल के वर्षा, बिजली एवं अन्धकार से भयभीत होकर अपने इर्द-गिर्द हजारों भूतों-प्रेतों की कल्पना करता है और फिर वही भूत-प्रेतों की कल्पना सभ्यता के साबुन में धुलते धुलते आत्मा या ईश्वर की कल्पना का रूप धारण कर लेती है; पुनः वही विज्ञान के चमत्कार से चमत्कृत होकर निर्गुण ब्रह्म कल्पना का रूप धारण कर लेती है। पर वास्तव में कल्पना तो कल्पना ही है। यदि इसी तरह राम और उनका चरित्र एक कल्पना है तो अवश्य मनमानी विभिन्नता लायी जा सकती है। पर उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं और न वह आराधकों एवं भक्तों का आराध्य या भजनीय ही हो सकता है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनके अनुसार राम या कृष्ण नाम का कोई व्यक्ति हुआ ही नहीं। पूर्ण ज्ञान में ही कवि-कल्पनाप्रसूत राम एवं उनके चरित्रों की कल्पना है, परन्तु प्रमाणों का आदर करनेवाले वैदिकों की दृष्टि में राम और उनका वर्णन करनेवाला रामायण ग्रन्थ कल्पना नहीं है, किन्तु वह अनादि, अपौरुषेय, स्वतःप्रमाण, वेदों, उप- निषदों एवं तन्मूलक वाल्मीकिरचित रामायण, महाभारत तथा पुराणों के प्रमाणों पर आधृत है। इसलिए श्रीबुल्के ने भी रामकथा के सम्बन्ध में वेदों, आरण्यकों एवं स्मार्त सूत्रों तथा वाल्मीकिरामायण को ही प्राथमिकता दी है। हमारे सामने थाईलैण्ड की रामकीर्ति के इङ्गलिश का हिन्दी अनुवाद है स्वामी सत्यानन्दपुरी का। वे लिखते हैं— "जिन काव्यरचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य सर्वोपरि है। भारत ही नहीं बाहर के देशों को भी उसने प्रभावित किया है। और अनेक सदियों की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वहाँ के धर्म, कला तथा साहित्य को सुव्यवस्थित किया है। विश्व में यदि कभी कोई ऐसा कवि उत्पन्न हुआ है जिसने न केवल साहित्य के व्यापक क्षेत्र में बल्कि धर्म और कला के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किया है तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृत काव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। उनके अनुयायी विभिन्न कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृतियों को अमर बनाया है। यही नहीं

१४० रामायणमीमांसा पञ्चम बल्कि खेतों में काम करनेवाले किसान और नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित नहीं रहे, जो उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं । निःसन्देह वाल्मीकि की लेखनी ने मानवमात्र पर जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा प्रभाव और किसी कवि की लेखनी डालने में सफल नहीं हुई । रामकीति के रचयिता छठे राम राजा ने रामकीति के मूल का पता लगाया है । उनके पाण्डित्यपूर्ण विश्लेषण से मूल रामायण के रचयिता वाल्मीकि के बारे में ज्ञात हुआ है ।” यद्यपि रामकीर्ति की मूलकथा रामायण की मुख्य कथा से पूरा मेल खाती है, तथापि विस्तार में वह मूलकथा से एकदम भिन्न है । रामकीर्ति में भी राम को नारायण का अवतार माना गया है, अन्य अनेक पात्रों के नामों में भेद है । उसके प्राक्कथन के अनुसार थाईलैंड में रामायण भिन्न-भिन्न देशों एवं भिन्न-भिन्न मार्गों से आयी हुई प्रतीत होती है । इसी लिए उसमें अनेक अंशों में भिन्नता पायी जाती है । यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि जब भारत से दूर-दूर प्रदेशों में पहुँची हुई रामकथाओं का आधार वाल्मीकिरामायण है तब भारत में ही विकसित जैनरामकथा का आधार वाल्मीकिरामायण को छोड़कर अन्य क्या हो सकता है ? आधुनिक वैज्ञानिकों का भी इसी भाव से मेल खाता है । समान ज्ञान या समान कला कृतियों का विभिन्न देशों में स्वतन्त्ररूप से विकास मानने की अपेक्षा एक देश से किसी सूत्र द्वारा उसका अन्यत्र पहुँचना ही संभव और उचित माना जाता है; अतः रामकथा का भी स्वतन्त्ररूप से सर्वत्र विकास मानना तर्कशून्य ही है । ऐसी स्थिति में वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि ही उसके विकास के भी स्रोत हैं । अतएव मूल के अविरुद्ध कल्पनाएँ क्षम्य हो सकती हैं, पर सिद्धान्त एवं आदर्शविरुद्ध कल्पनाएँ सर्वथा अक्षम्य ही हैं । तुलसीदास के “राम अनंत अनंत गुन अमित”’ ( रा० मा० १।३३ ) के अनुसार रामकथा के सम्बन्ध में मनमानी या अराजकता का समर्थन नहीं किया जा सकता । उनका तात्पर्य तो वेद, वाल्मीकिरामायण एवं अध्यात्मरामायण आदि के अविरुद्ध ही रामकथाओं के समन्वय में है । जैन कथाओं में राम को ईश्वर न मानकर मनुष्य माना गया है; पर उसका जोरदार शब्दों में श्री- तुलसीदासजी खण्डन करते हैं । “रामु मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥” (रा० मा० ६।२५।३) रे शठ अड़वङ्ग रावण, क्या राम मनुष्य हैं ? क्या काम कोई साधारण धन्वी है ? क्या गङ्गा कोई नदी है ? अब कहिये क्या तुलसीदास की इन बातों को लेखक मानेंगे । श्रीराम परमात्मा या परमेश्वर नहीं हैं, वे एक महापुरुष मनुष्य हैं—ऐसा माननेवाले के प्रति तुलसीदासजी की भर्त्सना सुनिये— “तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥” (रा० मा० १।११३।४) “कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच । पाखंडी हरिपद बिमुख, जानहिं झूठ न साच ॥” ( रा० मा० १।११४ ) “अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥ कहहिं ते वेद असंमत बानी । जिन्हके सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन पुनि नयन बिहीना । रामरूप देखहिं किमि दीना ॥ बातुल भूत बिबश मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्हकर कहा करिअ नहिं काना ॥” ( रा० मा० १।११४।१-४)

अध्याय | जैनमत में रामकथा | १४१


शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं कि तुमने जो शङ्का के रूप में यह कहा है कि श्रीराम वेदवेद्य एवं योगीन्द्र मुनीन्द्र ध्येय परमात्मा नहीं हैं, किन्तु परमेश्वर से भिन्न कोई और ही हैं, वह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा तो अधम लोग ही कहते सुनते हैं । जो मोह-पिशाच से ग्रस्त होते हैं । ऐसे लोग पाखण्डी तथा हरिपदविमुख हैं । वे क्या सत्य है क्या मिथ्या है कुछ भो नहीं जानते । वे अज्ञानी, मूर्ख और अभागे हैं । उनके मनरूपी दर्पण में विषयमयी काई लगी है, अतः वे राम को नहीं जान पाते । लम्पट कपटी कुटिल लोग जिन्होंने कभी सन्त-सभा नहीं देखी है, वे ही लोग वेद-असम्मत वाणी बोलते हैं । उनको वास्तविक हानि, लाभ का कुछ ज्ञान नहीं होता । जिनका मनरूप दर्पण मलिन है और जिनके पास वेदादि-शास्त्ररूप नेत्र नहीं हैं वे रामरूप को जान भी कैसे सकते हैं ? ऐसे लोग वातुल एवं भूतविवश मतवाले हैं । वे बिना विचार बोलते रहते हैं । जिन्होंने महामोहरूप मदिरा पी रखी है उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिये । आधुनिक जैन लेखकों को गम्भीरता से सोचना चाहिये कि क्या श्रीतुलसीदासजी श्रीसीताराम को परब्रह्म परमेश्वर नहीं मानते ! अवश्य मानते हैं । और जो मानते हैं कि श्रीराम ने दुःखी होकर जैनमन्त्र की दीक्षा ली उनकी राम-कथा का तुलसीदास के रामचरितमानस के द्वारा समर्थन हो सकता है ? तुलसीदास स्वयं कपीश्वर हनुमान् से भी प्रथम वाल्मीकि की वन्दना करते हैं । “वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ।” वे स्पष्ट कहते हैं जैसे कोई राजा बड़ी नदी पर सेतु निर्माण करता है और चींटी भी उसी पर चढ़कर श्रम के बिना नदी पार कर जाती है, वैसे ही महर्षि वाल्मीकि आदि मुनियों ने जो रामायण का निर्माण किया है वही रामचरित महासरिता-सेतु है । उसी मार्ग पर चलने में हम लोगों को सुगमता है— “मुनिन्ह प्रथम हरिकीरति गाई। तेहि मग चलत सुगम मोहिं भाई ॥” (रा० मा० १।१३) “अति अपार जे सरितबर जौं नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥” (रा० मा० १।१३) इसी तरह बिना समझे साधकजी ने 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" वेदवाक्य को छेड़ा है । उनके जैना- चार्यों को वेद का प्रामाण्य मान्य ही नहीं है और उस मन्त्र का अर्थ उनके अनुकूल नहीं है । उसके द्वारा यह कहा गया है 'विप्र लोग उस एक ही सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश ब्रह्म का सोपाधिकरूप से अग्नि, यम, मित्र, वरुण, गरुत्मान् आदि अनेक रूपों में वर्णन करते हैं।' मन्त्र का यह अर्थ नहीं है कि वही वेदान्तियों का ब्रह्म है, वही जैनों का पुद्गल तथा मध्यम परिमाण आत्मा है और वही बौद्धों का क्षणभङ्ग विज्ञान है। जो राम को अनन्त मानते हैं, राम को गुणगणधाम मानते हैं तथा उस एक ही अनन्त राम का कल्पभेद से अवतार मानते हैं एवं तदनुसार राम की कल्प- भेद से कथा का भेद मानते हैं वे विमल विचारवाले लोग कल्प-भेद सम्बन्धी कथाभेद सुनकर आश्चर्य नहीं मानते। यह है आपके उद्धृत— राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार । सुनि आचरजु न मानिहहिं जिनके बिमल विचार ॥ (रा० मा० १।३३) दोहे का अभिप्राय । कहिये, क्या आप या आपके जैनाचार्य श्रीराम को अनन्त मानते हैं या मध्यम परिमाण ? श्रीराम को अनन्तगुण परमेश्वर मानते हैं ? यदि नहीं, तो इस प्रकार के वचनों को उद्धृत करके लोगों की आँख में धूल क्यों डालते हैं ? धर्मान्ध लेखक के उद्धृत—

१४२ रामायणमीमांसा पंचम "रामकथा की मिति जग नाहीं । अस प्रतीति जिनके मन माहीं । नाना भाँति राम अवतारा । रामायण शतकोटि अपारा ।।" (रा० मा० १।३२ (३) का भी अभिप्राय है श्रीराम सबके हैं; पर आवश्यकता है मानने की । इसी तरह उस पुस्तक में कहा गया है—राम किसके हैं ? यदि तुलसीदास की भावना के अनुसार— "कहाँ कहौं छवि आजु की भले बने हो नाथ । तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण लो हाथ ।।" उनका यह वचन सुनकर कृष्ण तत्काल श्रीराम के रूप में परिवर्तित हो गए; तो फिर यह मानने में क्यों झिझक होती है कि भगवान् राम ने जैनों की भावना का रक्षण करना भी अस्वीकार नहीं किया । भावना के भूखे भगवान् को अपने ही साँचे में फिट करने की कल्पना करनेवाले आग्रही हैं, बेसमझ हैं । उन्हीं के कारण असीम को ससीम बनानेवाले सम्प्रदाय फल फूल रहे हैं । वस्तुतः राम सर्वेश्वर हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड के कण-कण उनके ही हैं और वे सबके हैं । पर वैसा मानना ही आस्तिकता है न मानना नास्तिकता है । ऐसी स्थिति में यहाँ लेखक से प्रश्न है कि क्या वे कृष्ण की मूर्ति का रामरूप में परिवर्तित हो जाना सत्य मानते हैं ? यदि नहीं, तो दृष्टान्त ही असिद्ध है फिर उसके आधार पर श्रीराम का जैन भावना के अनुसार जैन हो जाना कैसे मान्य हो सकता है ? इसके अतिरिक्त दृष्टान्तमात्र वस्तुसिद्धि का हेतु नहीं होता । उसमें सद् हेतु भी होना चाहिए । इसी लिए तो अग्नि के दृष्टान्त से जल को उष्ण नहीं कहा जा सकता । यदि उक्त घटना सत्य है तो क्या लेखक और उसके अन्य जैन बन्धु तुलसीदास के समान ही श्रीराम को ईश्वरावतार मानते हैं ? यदि नहीं तो भी उक्त कथन असङ्गत है । यदि मानते हैं, तो लेखक का स्वसिद्धान्तविरोध होगा; क्योंकि जैन-न्यायदर्शन, न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रन्थों में जब समारोह के साथ ईश्वर का ही खण्डन है तब जैनों के अनुसार राम को ईश्वरावतार मानना वदतो व्याघात ही है । वैदिक दृष्टिकोण से तो ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है । वही वेदादि शास्त्रों के अनुसार श्रीराम हैं, वही श्रीकृष्ण हैं । फिर तो भक्त की भावना के अनुसार श्रीकृष्ण का श्रीराम हो जाना कोई कठिन बात नहीं है । पर क्या कोई मनुष्य जीव भी किसी की भावना के अनुसार कुछ का कुछ हो सकता है ? यदि कोई सिद्ध आम को कटहल बना दे तो वह उस सिद्ध की ही विशेषता होगी, आम की नहीं । यदि भावना के आधार पर वस्तुस्थिति में परिवर्तन हो तो क्या महावीरस्वामी को भावनावश कोई बौद्ध या वाम- मार्गी या गोमांस-भक्षक बना सकता है ? और उसे आप का (पूर्वपक्षलेखक का) सिद्धान्त स्वीकार करता है ? धर्मानन्द कौशाम्बी की 'भगवान् बुद्ध' नामक पुस्तक प्रकाशित है । उसमें उन्होंने लिखा है भगवान् बुद्ध तथा महावीर सूकर आदि का मांस खाकर मरे थे । यदि यह बात उनके प्रमाणों एवं भावना के अनुसार ठीक थी तो जैन विद्वानों ने उसका खण्डन क्यों किया था ? इसी लिए भावनाओं की भी सीमा होती है । शास्त्रानुसार भावना से ईश्वर या देवताओं में भावनानुरूप रूप-भेद शास्त्रसम्मत है । "तं यथा यथोपासते" (श० ब्रा० १०।५।२। २०) के अनुसार नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव परमेश्वर बद्ध जीव नहीं बन सकता । देहात्मवादी चार्वाक या वेद- विरोधी जैन, बौद्ध ईश्वर नहीं हो सकता । सब कुछ ब्रह्म ही है यह बाधसमानाधिकरण व्यपदेश है । जैसे सर्प को बाधित कर रज्जु सर्प है वैसे ही सबको बाधित करके ब्रह्म सब है । प्रबोधचन्द्रोदय में जैन क्षपणक तथा बौद्ध भिक्षु को वाममार्गी बनते हुए दर्शाया गया है । क्या यह उनके भावनानुसार ठीक है ? आगे लेखक कहता है—ऋषभ को हिन्दुओं ने विकृत करके पेश किया है । वह जैनों की भावनाओं को उभाड़नेवाला है; पर जैन उभड़े नहीं । उन्होंने हिन्दुओं से इसके लिए तकरार नहीं की ।

अध्याय जैनमत में रामकथा १४३ जिन्हके रही भावना जैसी। प्रभुमूरति देखी तिन्ह तैसी ।। (रा० मा० १।२४०।२) के आदर्श को अस्वीकार करने पर भी व्यवहार में उसे मान्य कर लिया। यहाँ लेखक अपने ही पूर्वापरविरोध को भूल गया। पहले उसने कहा—जैन हिन्दुओं से अलग नहीं हैं, पर अब यहाँ वह स्वयं हिन्दू और जैन का बिलकुल पृथक्-पृथक् उल्लेख करने लगा। यही है लेखक के मन की सत्य भावना जो उसके सिर पर चढ़ कर बोलने लगी। पीछे मैंने लिखा है कि वैदिकों ने ऋषभदेव का अपमान नहीं किया; किन्तु जैन मतानुसार ऋषभदेवजी का वैदिकों ने उन्हें ईश्वर मानकर आदर ही किया। फिर, तकरार का प्रश्न ही कहाँ उठता था। किन्तु जैन ने तो वैदिकों के परमेश्वर राम को एक दुःखी जीव बनाकर उनका अपमान ही किया है। महत्त्व तो उन्होंने उनको जैनदीक्षा में दीक्षित करके दिया। लेखक ने मुझपर आरोप लगाते हुए कहा है कि 'मैं अपने ही चश्में में सबको देखना चाहता हूँ; पर आर्यसमाजी ही वैसा नहीं मानते ।' वस्तुतः यह उल्टी बात है। मैं तो लीपापोती ही को दोष मानता हूँ। स्पष्टरूप से प्रमाण-प्रमेय विचार तो भिन्न-भिन्न मतों के हैं ही; क्योंकि जैनों के श्वेताम्बर, दिगम्बर, तेरापन्थी आदि आपस में ही कुछ कम खण्डन-मण्डन नहीं करते हैं। बौद्ध और जैन दोनों ही अवैदिक, निरीश्वरवादी तथा वर्णाश्रमविरोधी होते हुए भी क्या एक दूसरे की बात मानते हैं ? अपने-अपने मत में दृढ़ रहने से सबको अपने ही चश्मे से नहीं देखना चाहते हैं ? क्या बुद्ध और महावीर एक दूसरे के सर्वज्ञ होने का दावा मानते थे ? आर्यसमाजी तो फिर भी ईश्वर की सत्ता एवं वेद के ही कुछ ग्रन्थों को प्रमाण मानते ही हैं। रामचरित के सम्बन्ध में भी वे वाल्मीकि- रामायण को ही प्रमाण मानते हैं, जैनी रामकथा को नहीं। लेखक कहता है, "आखिर जैनरामायण में क्या है ? क्या राम को रावण बना दिया, क्या राम को गोमांसभक्षी बनाया गया है ?" परन्तु जब मनमानी ही है, प्रमाण की अपेक्षा नहीं है तो कोई राम को वैसा भी तो कह और लिख सकता ही है। वैसे साक्षात् परब्रह्म, परमेश्वर को दुःखी मनुष्य मानकर उनका अवैदिक, निरीश्वरवादी जैन मत में दीक्षित होने का वर्णन करना उनका कुछ कम अपमान नहीं है। आगे लेखक कहता है—"जैनरामायण में सर्वत्र नैतिक पक्ष निखारा गया है जो समस्त आर्य-साहित्य का गौरव है। हिंसा के बीच अहिंसा की प्रतिष्ठा का यह साङ्गोपाङ्ग दर्शन है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।" किन्तु विचार करना चाहिए, क्या यह ठीक है ? वस्तुतः यही तो मतिभ्रम है। क्या वाल्मीकिरामायण के याथातथ्य वर्णन में नैतिकपक्ष कमजोर है ? क्या रावण जैसे दुर्दान्त सर्वधर्मघातक का वध हिंसा है ? हिंसा के बीच अहिंसा का तो यही अर्थ है कि श्रीराम रावण के अन्यायों के प्रतीकारस्वरूप उसे दण्ड तो देते हैं, पर उसका अहित नहीं चाहते। उससे द्वेष नहीं मानते। विभीषण से श्रीराम ने कह दिया कि तुम रावण का और्ध्वदेहिक संस्कार करो। जैसा यह तुम्हारा है वैसा ही हमारा। श्रीराम ने विराध का वध किया, पर उसका और्ध्वदेहिक कृत्य उसके इच्छानुसार ही किया। गीताकार ने— “साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।” (गी० ६।९) इस वचन के अनुसार सुहृद् मित्र, अरि एवं उदासीन तथा साधु एवं असाधु सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का उपदेश करते हुए भी धर्मयुक्त संग्राम से मुंह मोड़ने को कायरता बतलाया और कहा— "क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ !" (गी० २।३) अर्जुन, तुम क्लैब्य मत धारण करो। यहाँ तक कह दिया कि यदि तुम धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होओगे तो तुम्हारे स्वधर्म एवं कीर्ति का नाश ही नहीं होगा, तुम्हें पाप भी लगेगा। अन्याथियों को दण्ड न देना ही अन्याय एवं

१४४ रामायणमीमांसा पञ्चम हिंसा को बढ़ावा देना है। वास्तव में जो मुखपर पट्टी बाँधकर अपने को अहिंसाव्रती घोषित करते हैं, साथ ही दूसरों के इष्ट देवताओं को अपमानित करते हैं और वेदों एवं यज्ञों का खण्डन करते हैं वे ही अहिंसा के बीच में हिंसा की प्रतिष्ठा करते हैं। इससे बचना सबसे पहला काम है। जैसा कि मैंने पहले कहा है, वाल्मीकिरामायण में ईश्वर और यज्ञों का वर्णन किया है एवं वेद का महत्त्व वर्णित है, वह जैनाचार्यों के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध है। परन्तु रामकथा पर जनसामान्य का अनुराग है; अतः जैन भी यदि वाल्मीकिरामायण पढ़ेंगे तो अवश्य ही उससे प्रभावित होंगे, अतः वाल्मीकिरामायण को अपने धर्म के साँचे में ही ढालकर रामकथा से वेद, ईश्वर तथा यज्ञ निकाल कर जैनरामकथाओं में उसे विकृत किया गया है। यही जैनों की रामायण-रचना है। स्वतन्त्रता हमारी ही नहीं और लोगों की भी है; अतः यदि स्वतन्त्रताएँ टकरायेगी तो शान्ति और अहिंसा टिक नहीं सकेगी। इसी लिए वैदिकों ने कहा है— “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।” जो अपने लिए प्रतिकूल हो वह दूसरों के लिए न करना यह धर्म का सर्वस्व है। जैसे हमारे इष्ट देवता का खण्डन हमारे लिए उद्वेजक है वैसे ही दूसरों के धर्म, धर्मग्रन्थ या देवता का खण्डन दूसरों के लिए भी उद्वेगकर होगा ही और वह हिंसा ही होगी। तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि की रामकथा के द्वारा तो आर्यमर्यादा एवं नैतिक पक्ष का हनन ही हुआ है। वस्तुतः निखरना या पालिश करना आदि ही कृत्रिमता का हेतु हैं। सत्य स्वयं में देदीप्यमान होता है। सूर्य को निखारने की आवश्यकता नहीं होती। निखार का अर्थ है आधुनिक सुधार और आधुनिक सुधार के नाम पर शास्त्रीय एवं स्वाभाविक स्थिति को बिगाड़ कर उसे अपने अभीष्ट अन्य रूप में परिणत करना, किन्तु यह एक घोर अपराध है। अन्यथाभूत वस्तु का अन्यथा वर्णन करना चोरी है, पाप है। इसे कविप्रतिभा का स्वातन्त्र्य नहीं माना जा सकता। भगवान् मनु ने कहा है— “योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥” ( म० ४।२५५ ) महाभारत में भी स्पष्ट कहा है— “ अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा यः प्रपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥” जो अन्यथाभूत वस्तु को अन्यथा समझता या वर्णन करता है, उस आत्मापहारी चोर ने कौन सा पाप नहीं किया ? सत्य को जैसा का तैसा रहने देना ही ठीक है। उसको निखारने का प्रयत्न करना उसमें विकृति लाना है। आगे लेखक स्वयं स्वीकार करता है—जैनरामायण की कथा अपने ढंग की है। उसका सारा विवेचन, दर्शन और परिणाम स्वतन्त्र है। वह वाल्मीकि की नकल नहीं है। पर यह स्वतन्त्रता ही तो उच्छृङ्खलता है। क्या बिना कुड्य के चित्रोल्लेख सम्भव है ? आखिर जैनरामकथा का आधार क्या है ? वाल्मीकि राम के समकाल के महर्षि थे। उस समय की घटना का उन्हें ज्ञान होना असम्भव नहीं। फिर ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा से भी उन्हें परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होना सम्भव है। क्या विमलसूरि या तुलसी आदि जैन आचार्य भी राम के समय में थे ? नहीं थे तो स्वतन्तरूप से रामचरित्र कैसे विदित हुआ ? बिना किसी प्रमाण के कल्पनामात्रप्रसूत कोई गल्प या उपन्यास हो सकता है। उसका वस्तुस्थिति से सम्बन्ध नहीं रहता है। वैदिक लोग भी जैन तीर्थङ्करों के सम्बन्ध में बेसिर-पैर की कल्पना कर सकते थे; पर उन्होंने इसे जघन्य अपराध समझकर वैसा

अध्याय जैनमत में रामकथा १४५ नहीं किया; किन्तु अहिंसात्मक शान्त आन्दोलन के द्वारा श्रीतुलसी को उसे परिवर्तित करने का ही आग्रह किया है । आपने यह भी लिखा है— “कवि न होउँ नहिं चतुर कहाऊँ। मति अनुरूप राम गुण गाऊँ ॥” जैसे गोस्वामीजी ने रामकथा का विस्तार किया है वैसे ही जैनों ने किया है । आचार्य तुलसी का भी यही आधार है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास का तो दर्शन परिणाम स्वतन्त्र नहीं है । यह पहले कहा जा चुका है कि वे तो आदि महर्षियों के रचित रामायणरूप सेतु पर चढ़कर चींटी के समान ही अपने रामचरितरूपी अपार सरित्त्वर के पार जाने की बात करते हैं । कोई भी चरित्र निराधार निष्प्रमाण हो भी कैसे सकता है ? यदि किसी को स्वतन्त्र विवेचन, दर्शन लिखना है तो उसको अ, व, ख आदि किसी अन्य नाम का प्रयोग करना चाहिये । क्या कोई मुहम्मद साहब का नाम लेकर ऐसा स्वतन्त्र मनमाना विवेचन लिख सकता है । अग्निपरीक्षा का परिचय आगे अग्निपरीक्षा पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक कहता है—‘‘उसमें सीता को महासती के रूप में प्रस्तुत करके शील और पवित्र जीवन बिताने की शिक्षा दी गयी है, जिसमें सीता का शौर्य भरा जीवन दीखता है । सन्देश नया, आदेश नया, उपदेश नया तथा नारी जागृतिका उन्मेष नया; परन्तु यहाँ आधुनिक सुधारवाद की भावना से ओत-प्रोत तेरापन्थी आचार्य तुलसी की अपनी भावना है । प्रामाणिक प्राचीनतम रामायण की भावना नहीं है और आधुनिक नारीस्वातन्त्र्य आन्दोलन से प्रभावित श्रीतुलसी के हृदय में आर्यमर्यादानुरूप नारी का प्राचीन गौरव नहीं है । सुधारकों में नवीनता का भूत चढ़ा ही होता है । लेखक के आर्यसाहित्य के गौरव का यही नमूना है । महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित आर्य नारी का गौरव देखिये । अपने प्रियतम से परित्यक्त होने के कारण श्रीसीता को उद्वेग हुआ । उसी में वह कह उठीं—‘‘लक्ष्मण ! तुम मेरी ओर से राजा से कहना लङ्का में मेरी आपके समक्ष अग्निपरीक्षा हुई है फिर भी लोकवादश्रवण के कारण आपने जो मेरा त्याग किया है, क्या यह आपके श्रुत— वेदादि-स्वाध्यायाध्ययन अथवा आपके कुल के अनुरूप है ? “वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य तत् किं सदृशं कुलस्य ॥” ( रघु० १४।६१ ) परन्तु तत्क्षण ही वह भारतीय परम्परागत नारीगौरव के अनुसार संभलकर कहती हैं— “कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥” ( रघु० १४।६२ ) अथवा आप तो कल्याणबुद्धि हैं, सबका ही हित चाहते हैं, कभी अरि का भी अहित नहीं चाहते । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।३ ) “कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” ( वा० रा० २।१।११ ) श्रीराम कभी किसी तरह किये हुए एक उपकार से सन्तुष्ट होते हैं फिर आत्मवान् होने के कारण वे सैकड़ों अपकारों का स्मरण तक नहीं करते; अतः मेरे सम्बन्ध में आपके कामचार ( मनमानी ) की शङ्का नहीं हो सकती; १९.

किन्तु मेरे ही जन्मान्तरीय दुष्कृतों का यह असह्य दुर्विपाक वज्र मेरे सामने आया है और पुनः श्रीसीता वही भाव व्यक्त करती हैं, जो श्रीसीताजी के ही अनुरूप है। तथा है समस्त वेदादि-शास्त्रानुप्राणित संस्कृति के परम अनुरूप । “साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥” ( रघु० १४।६६ ) आपसे परित्यक्ता होने पर भी मैं (सीता) प्रसूति के अनन्तर सूर्यनिविष्टदृष्टि होकर ऐसी तपश्चर्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और कभी आपसे मेरा विप्रयोग न हो । आगे लेखक दलबदलुओं का दृष्टान्त देकर श्रीराम के जैनधर्म में प्रवेश का समर्थन करता है; परन्तु परमेश्वरावतार राम को निरीश्वरवादी जीव बना देना ही तो सबसे बड़ा अपराध है । अति प्राचीन वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण के द्वारा परमेश्वररूप से प्रतिपादित श्रीराम को जैनी के रूप में देखना ही तो अपने ही चश्मे से देखने का मूढ़ामह है । आगे लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रशंसा करते हुए कहा है 'गोस्वामीजी ने जैनरामायण को भी देखा ही होगा। सबको दृष्टि में रखते हुए रामचरितमानस लिखा है। इसी लिए किसी ने जैन या जैनेतर ने उसके विरुद्ध कलम नहीं उठायी । वह अनुपम भक्ति-काव्य ग्रन्थ है ।' यह ठीक है। पर जब यह मानते हैं तो उसके अनुसार श्रीराम को— “व्यापक ब्रह्म निरञ्जन निर्गुन बिगत बिनोद । सोइ अज भक्त प्रेमवश कौशल्या की गोद ॥” ( रा० मा० १।१०८ ) क्यों नहीं मानते ? उन्हें जैनी जीव बनाने का जघन्य अपराध क्यों करते हैं ? आगे तो लेखक ने बहुत ही छिछले शब्दों से आधुनिक मनचले लेखकों के जैसे आक्षेप करते हुए वस्तुस्थिति को अन्यथा रूप में व्यक्त किया है, जिसका उसी रूप में उत्तर देना मेरे लिए असम्भव ही है । पर साथ ही वह यह भी मान लेता है । 'गये शहर में आप मुझे तब ले न गये साथ । बकबक करनेवालों को दिखला देता दो हाथ ॥ छन्द पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि ये पद्य आचार्य तुलसी के प्रौढ़ कवित्व के कितने परिचायक हैं ? पर वह यह मानता है—'आजाद भारत के आजाद युवक समाधान की खोज में भटक रहे हैं । उन्हें एक प्यास है । वह प्यास धर्म, दर्शन से नहीं बुझती । उस तृष्णा की पूर्ति का सङ्केतात्मक प्रयास आचार्य तुलसी ने किया है ।' लेखक ने यह बात अवश्य पते की कही, तभी सिनेमाप्रिय आजाद युवकों के लिए उन्होंने अग्निपरीक्षा में सिनेमा के गानों का सन्निवेश किया है; परन्तु यह तृष्णापूर्ति तो सिनेमा से ही होगी । इससे तेरापन्थी तुलसी का घासलेट साहित्य सफल न होगा । लेखक ने आठवें पृष्ठ में लिखा है 'आचार्य तुलसी घोषित कर चुके हैं कि मुझे अपनी ओर से इस ग्रन्थ के बारे मे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है ।' १० वें पृष्ठ में लिखा है 'उन्होंने अपनी कृति में संशोधन करना स्वीकार कर लिया है ।' क्या यह बुद्धिमानी है । लेखक ने— 'तुलसी जाके मुखन ते धोखेहु निकसत राम । ताके पग की पानही मेरे तन की चाम ॥' इस दोहे का स्मरण किया है। यदि यह दाम्भिक भाव से न होकर शुद्ध भाव से स्मरण-पथ में लाया गया हो तो इसका यही अर्थ है— “भाव कुभाव अनख आलस हूँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।” ( रा० मा० १।२७।१ )