रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१४२ रामायणमीमांसा पंचम "रामकथा की मिति जग नाहीं । अस प्रतीति जिनके मन माहीं । नाना भाँति राम अवतारा । रामायण शतकोटि अपारा ।।" (रा० मा० १।३२ (३) का भी अभिप्राय है श्रीराम सबके हैं; पर आवश्यकता है मानने की । इसी तरह उस पुस्तक में कहा गया है—राम किसके हैं ? यदि तुलसीदास की भावना के अनुसार— "कहाँ कहौं छवि आजु की भले बने हो नाथ । तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण लो हाथ ।।" उनका यह वचन सुनकर कृष्ण तत्काल श्रीराम के रूप में परिवर्तित हो गए; तो फिर यह मानने में क्यों झिझक होती है कि भगवान् राम ने जैनों की भावना का रक्षण करना भी अस्वीकार नहीं किया । भावना के भूखे भगवान् को अपने ही साँचे में फिट करने की कल्पना करनेवाले आग्रही हैं, बेसमझ हैं । उन्हीं के कारण असीम को ससीम बनानेवाले सम्प्रदाय फल फूल रहे हैं । वस्तुतः राम सर्वेश्वर हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड के कण-कण उनके ही हैं और वे सबके हैं । पर वैसा मानना ही आस्तिकता है न मानना नास्तिकता है । ऐसी स्थिति में यहाँ लेखक से प्रश्न है कि क्या वे कृष्ण की मूर्ति का रामरूप में परिवर्तित हो जाना सत्य मानते हैं ? यदि नहीं, तो दृष्टान्त ही असिद्ध है फिर उसके आधार पर श्रीराम का जैन भावना के अनुसार जैन हो जाना कैसे मान्य हो सकता है ? इसके अतिरिक्त दृष्टान्तमात्र वस्तुसिद्धि का हेतु नहीं होता । उसमें सद् हेतु भी होना चाहिए । इसी लिए तो अग्नि के दृष्टान्त से जल को उष्ण नहीं कहा जा सकता । यदि उक्त घटना सत्य है तो क्या लेखक और उसके अन्य जैन बन्धु तुलसीदास के समान ही श्रीराम को ईश्वरावतार मानते हैं ? यदि नहीं तो भी उक्त कथन असङ्गत है । यदि मानते हैं, तो लेखक का स्वसिद्धान्तविरोध होगा; क्योंकि जैन-न्यायदर्शन, न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रन्थों में जब समारोह के साथ ईश्वर का ही खण्डन है तब जैनों के अनुसार राम को ईश्वरावतार मानना वदतो व्याघात ही है । वैदिक दृष्टिकोण से तो ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है । वही वेदादि शास्त्रों के अनुसार श्रीराम हैं, वही श्रीकृष्ण हैं । फिर तो भक्त की भावना के अनुसार श्रीकृष्ण का श्रीराम हो जाना कोई कठिन बात नहीं है । पर क्या कोई मनुष्य जीव भी किसी की भावना के अनुसार कुछ का कुछ हो सकता है ? यदि कोई सिद्ध आम को कटहल बना दे तो वह उस सिद्ध की ही विशेषता होगी, आम की नहीं । यदि भावना के आधार पर वस्तुस्थिति में परिवर्तन हो तो क्या महावीरस्वामी को भावनावश कोई बौद्ध या वाम- मार्गी या गोमांस-भक्षक बना सकता है ? और उसे आप का (पूर्वपक्षलेखक का) सिद्धान्त स्वीकार करता है ? धर्मानन्द कौशाम्बी की 'भगवान् बुद्ध' नामक पुस्तक प्रकाशित है । उसमें उन्होंने लिखा है भगवान् बुद्ध तथा महावीर सूकर आदि का मांस खाकर मरे थे । यदि यह बात उनके प्रमाणों एवं भावना के अनुसार ठीक थी तो जैन विद्वानों ने उसका खण्डन क्यों किया था ? इसी लिए भावनाओं की भी सीमा होती है । शास्त्रानुसार भावना से ईश्वर या देवताओं में भावनानुरूप रूप-भेद शास्त्रसम्मत है । "तं यथा यथोपासते" (श० ब्रा० १०।५।२। २०) के अनुसार नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव परमेश्वर बद्ध जीव नहीं बन सकता । देहात्मवादी चार्वाक या वेद- विरोधी जैन, बौद्ध ईश्वर नहीं हो सकता । सब कुछ ब्रह्म ही है यह बाधसमानाधिकरण व्यपदेश है । जैसे सर्प को बाधित कर रज्जु सर्प है वैसे ही सबको बाधित करके ब्रह्म सब है । प्रबोधचन्द्रोदय में जैन क्षपणक तथा बौद्ध भिक्षु को वाममार्गी बनते हुए दर्शाया गया है । क्या यह उनके भावनानुसार ठीक है ? आगे लेखक कहता है—ऋषभ को हिन्दुओं ने विकृत करके पेश किया है । वह जैनों की भावनाओं को उभाड़नेवाला है; पर जैन उभड़े नहीं । उन्होंने हिन्दुओं से इसके लिए तकरार नहीं की ।
अध्याय जैनमत में रामकथा १४३ जिन्हके रही भावना जैसी। प्रभुमूरति देखी तिन्ह तैसी ।। (रा० मा० १।२४०।२) के आदर्श को अस्वीकार करने पर भी व्यवहार में उसे मान्य कर लिया। यहाँ लेखक अपने ही पूर्वापरविरोध को भूल गया। पहले उसने कहा—जैन हिन्दुओं से अलग नहीं हैं, पर अब यहाँ वह स्वयं हिन्दू और जैन का बिलकुल पृथक्-पृथक् उल्लेख करने लगा। यही है लेखक के मन की सत्य भावना जो उसके सिर पर चढ़ कर बोलने लगी। पीछे मैंने लिखा है कि वैदिकों ने ऋषभदेव का अपमान नहीं किया; किन्तु जैन मतानुसार ऋषभदेवजी का वैदिकों ने उन्हें ईश्वर मानकर आदर ही किया। फिर, तकरार का प्रश्न ही कहाँ उठता था। किन्तु जैन ने तो वैदिकों के परमेश्वर राम को एक दुःखी जीव बनाकर उनका अपमान ही किया है। महत्त्व तो उन्होंने उनको जैनदीक्षा में दीक्षित करके दिया। लेखक ने मुझपर आरोप लगाते हुए कहा है कि 'मैं अपने ही चश्में में सबको देखना चाहता हूँ; पर आर्यसमाजी ही वैसा नहीं मानते ।' वस्तुतः यह उल्टी बात है। मैं तो लीपापोती ही को दोष मानता हूँ। स्पष्टरूप से प्रमाण-प्रमेय विचार तो भिन्न-भिन्न मतों के हैं ही; क्योंकि जैनों के श्वेताम्बर, दिगम्बर, तेरापन्थी आदि आपस में ही कुछ कम खण्डन-मण्डन नहीं करते हैं। बौद्ध और जैन दोनों ही अवैदिक, निरीश्वरवादी तथा वर्णाश्रमविरोधी होते हुए भी क्या एक दूसरे की बात मानते हैं ? अपने-अपने मत में दृढ़ रहने से सबको अपने ही चश्मे से नहीं देखना चाहते हैं ? क्या बुद्ध और महावीर एक दूसरे के सर्वज्ञ होने का दावा मानते थे ? आर्यसमाजी तो फिर भी ईश्वर की सत्ता एवं वेद के ही कुछ ग्रन्थों को प्रमाण मानते ही हैं। रामचरित के सम्बन्ध में भी वे वाल्मीकि- रामायण को ही प्रमाण मानते हैं, जैनी रामकथा को नहीं। लेखक कहता है, "आखिर जैनरामायण में क्या है ? क्या राम को रावण बना दिया, क्या राम को गोमांसभक्षी बनाया गया है ?" परन्तु जब मनमानी ही है, प्रमाण की अपेक्षा नहीं है तो कोई राम को वैसा भी तो कह और लिख सकता ही है। वैसे साक्षात् परब्रह्म, परमेश्वर को दुःखी मनुष्य मानकर उनका अवैदिक, निरीश्वरवादी जैन मत में दीक्षित होने का वर्णन करना उनका कुछ कम अपमान नहीं है। आगे लेखक कहता है—"जैनरामायण में सर्वत्र नैतिक पक्ष निखारा गया है जो समस्त आर्य-साहित्य का गौरव है। हिंसा के बीच अहिंसा की प्रतिष्ठा का यह साङ्गोपाङ्ग दर्शन है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।" किन्तु विचार करना चाहिए, क्या यह ठीक है ? वस्तुतः यही तो मतिभ्रम है। क्या वाल्मीकिरामायण के याथातथ्य वर्णन में नैतिकपक्ष कमजोर है ? क्या रावण जैसे दुर्दान्त सर्वधर्मघातक का वध हिंसा है ? हिंसा के बीच अहिंसा का तो यही अर्थ है कि श्रीराम रावण के अन्यायों के प्रतीकारस्वरूप उसे दण्ड तो देते हैं, पर उसका अहित नहीं चाहते। उससे द्वेष नहीं मानते। विभीषण से श्रीराम ने कह दिया कि तुम रावण का और्ध्वदेहिक संस्कार करो। जैसा यह तुम्हारा है वैसा ही हमारा। श्रीराम ने विराध का वध किया, पर उसका और्ध्वदेहिक कृत्य उसके इच्छानुसार ही किया। गीताकार ने— “साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।” (गी० ६।९) इस वचन के अनुसार सुहृद् मित्र, अरि एवं उदासीन तथा साधु एवं असाधु सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का उपदेश करते हुए भी धर्मयुक्त संग्राम से मुंह मोड़ने को कायरता बतलाया और कहा— "क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ !" (गी० २।३) अर्जुन, तुम क्लैब्य मत धारण करो। यहाँ तक कह दिया कि यदि तुम धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होओगे तो तुम्हारे स्वधर्म एवं कीर्ति का नाश ही नहीं होगा, तुम्हें पाप भी लगेगा। अन्याथियों को दण्ड न देना ही अन्याय एवं
१४४ रामायणमीमांसा पञ्चम हिंसा को बढ़ावा देना है। वास्तव में जो मुखपर पट्टी बाँधकर अपने को अहिंसाव्रती घोषित करते हैं, साथ ही दूसरों के इष्ट देवताओं को अपमानित करते हैं और वेदों एवं यज्ञों का खण्डन करते हैं वे ही अहिंसा के बीच में हिंसा की प्रतिष्ठा करते हैं। इससे बचना सबसे पहला काम है। जैसा कि मैंने पहले कहा है, वाल्मीकिरामायण में ईश्वर और यज्ञों का वर्णन किया है एवं वेद का महत्त्व वर्णित है, वह जैनाचार्यों के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध है। परन्तु रामकथा पर जनसामान्य का अनुराग है; अतः जैन भी यदि वाल्मीकिरामायण पढ़ेंगे तो अवश्य ही उससे प्रभावित होंगे, अतः वाल्मीकिरामायण को अपने धर्म के साँचे में ही ढालकर रामकथा से वेद, ईश्वर तथा यज्ञ निकाल कर जैनरामकथाओं में उसे विकृत किया गया है। यही जैनों की रामायण-रचना है। स्वतन्त्रता हमारी ही नहीं और लोगों की भी है; अतः यदि स्वतन्त्रताएँ टकरायेगी तो शान्ति और अहिंसा टिक नहीं सकेगी। इसी लिए वैदिकों ने कहा है— “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।” जो अपने लिए प्रतिकूल हो वह दूसरों के लिए न करना यह धर्म का सर्वस्व है। जैसे हमारे इष्ट देवता का खण्डन हमारे लिए उद्वेजक है वैसे ही दूसरों के धर्म, धर्मग्रन्थ या देवता का खण्डन दूसरों के लिए भी उद्वेगकर होगा ही और वह हिंसा ही होगी। तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि की रामकथा के द्वारा तो आर्यमर्यादा एवं नैतिक पक्ष का हनन ही हुआ है। वस्तुतः निखरना या पालिश करना आदि ही कृत्रिमता का हेतु हैं। सत्य स्वयं में देदीप्यमान होता है। सूर्य को निखारने की आवश्यकता नहीं होती। निखार का अर्थ है आधुनिक सुधार और आधुनिक सुधार के नाम पर शास्त्रीय एवं स्वाभाविक स्थिति को बिगाड़ कर उसे अपने अभीष्ट अन्य रूप में परिणत करना, किन्तु यह एक घोर अपराध है। अन्यथाभूत वस्तु का अन्यथा वर्णन करना चोरी है, पाप है। इसे कविप्रतिभा का स्वातन्त्र्य नहीं माना जा सकता। भगवान् मनु ने कहा है— “योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥” ( म० ४।२५५ ) महाभारत में भी स्पष्ट कहा है— “ अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा यः प्रपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥” जो अन्यथाभूत वस्तु को अन्यथा समझता या वर्णन करता है, उस आत्मापहारी चोर ने कौन सा पाप नहीं किया ? सत्य को जैसा का तैसा रहने देना ही ठीक है। उसको निखारने का प्रयत्न करना उसमें विकृति लाना है। आगे लेखक स्वयं स्वीकार करता है—जैनरामायण की कथा अपने ढंग की है। उसका सारा विवेचन, दर्शन और परिणाम स्वतन्त्र है। वह वाल्मीकि की नकल नहीं है। पर यह स्वतन्त्रता ही तो उच्छृङ्खलता है। क्या बिना कुड्य के चित्रोल्लेख सम्भव है ? आखिर जैनरामकथा का आधार क्या है ? वाल्मीकि राम के समकाल के महर्षि थे। उस समय की घटना का उन्हें ज्ञान होना असम्भव नहीं। फिर ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा से भी उन्हें परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होना सम्भव है। क्या विमलसूरि या तुलसी आदि जैन आचार्य भी राम के समय में थे ? नहीं थे तो स्वतन्तरूप से रामचरित्र कैसे विदित हुआ ? बिना किसी प्रमाण के कल्पनामात्रप्रसूत कोई गल्प या उपन्यास हो सकता है। उसका वस्तुस्थिति से सम्बन्ध नहीं रहता है। वैदिक लोग भी जैन तीर्थङ्करों के सम्बन्ध में बेसिर-पैर की कल्पना कर सकते थे; पर उन्होंने इसे जघन्य अपराध समझकर वैसा
अध्याय जैनमत में रामकथा १४५ नहीं किया; किन्तु अहिंसात्मक शान्त आन्दोलन के द्वारा श्रीतुलसी को उसे परिवर्तित करने का ही आग्रह किया है । आपने यह भी लिखा है— “कवि न होउँ नहिं चतुर कहाऊँ। मति अनुरूप राम गुण गाऊँ ॥” जैसे गोस्वामीजी ने रामकथा का विस्तार किया है वैसे ही जैनों ने किया है । आचार्य तुलसी का भी यही आधार है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास का तो दर्शन परिणाम स्वतन्त्र नहीं है । यह पहले कहा जा चुका है कि वे तो आदि महर्षियों के रचित रामायणरूप सेतु पर चढ़कर चींटी के समान ही अपने रामचरितरूपी अपार सरित्त्वर के पार जाने की बात करते हैं । कोई भी चरित्र निराधार निष्प्रमाण हो भी कैसे सकता है ? यदि किसी को स्वतन्त्र विवेचन, दर्शन लिखना है तो उसको अ, व, ख आदि किसी अन्य नाम का प्रयोग करना चाहिये । क्या कोई मुहम्मद साहब का नाम लेकर ऐसा स्वतन्त्र मनमाना विवेचन लिख सकता है । अग्निपरीक्षा का परिचय आगे अग्निपरीक्षा पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक कहता है—‘‘उसमें सीता को महासती के रूप में प्रस्तुत करके शील और पवित्र जीवन बिताने की शिक्षा दी गयी है, जिसमें सीता का शौर्य भरा जीवन दीखता है । सन्देश नया, आदेश नया, उपदेश नया तथा नारी जागृतिका उन्मेष नया; परन्तु यहाँ आधुनिक सुधारवाद की भावना से ओत-प्रोत तेरापन्थी आचार्य तुलसी की अपनी भावना है । प्रामाणिक प्राचीनतम रामायण की भावना नहीं है और आधुनिक नारीस्वातन्त्र्य आन्दोलन से प्रभावित श्रीतुलसी के हृदय में आर्यमर्यादानुरूप नारी का प्राचीन गौरव नहीं है । सुधारकों में नवीनता का भूत चढ़ा ही होता है । लेखक के आर्यसाहित्य के गौरव का यही नमूना है । महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित आर्य नारी का गौरव देखिये । अपने प्रियतम से परित्यक्त होने के कारण श्रीसीता को उद्वेग हुआ । उसी में वह कह उठीं—‘‘लक्ष्मण ! तुम मेरी ओर से राजा से कहना लङ्का में मेरी आपके समक्ष अग्निपरीक्षा हुई है फिर भी लोकवादश्रवण के कारण आपने जो मेरा त्याग किया है, क्या यह आपके श्रुत— वेदादि-स्वाध्यायाध्ययन अथवा आपके कुल के अनुरूप है ? “वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य तत् किं सदृशं कुलस्य ॥” ( रघु० १४।६१ ) परन्तु तत्क्षण ही वह भारतीय परम्परागत नारीगौरव के अनुसार संभलकर कहती हैं— “कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥” ( रघु० १४।६२ ) अथवा आप तो कल्याणबुद्धि हैं, सबका ही हित चाहते हैं, कभी अरि का भी अहित नहीं चाहते । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।३ ) “कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” ( वा० रा० २।१।११ ) श्रीराम कभी किसी तरह किये हुए एक उपकार से सन्तुष्ट होते हैं फिर आत्मवान् होने के कारण वे सैकड़ों अपकारों का स्मरण तक नहीं करते; अतः मेरे सम्बन्ध में आपके कामचार ( मनमानी ) की शङ्का नहीं हो सकती; १९.
किन्तु मेरे ही जन्मान्तरीय दुष्कृतों का यह असह्य दुर्विपाक वज्र मेरे सामने आया है और पुनः श्रीसीता वही भाव व्यक्त करती हैं, जो श्रीसीताजी के ही अनुरूप है। तथा है समस्त वेदादि-शास्त्रानुप्राणित संस्कृति के परम अनुरूप । “साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥” ( रघु० १४।६६ ) आपसे परित्यक्ता होने पर भी मैं (सीता) प्रसूति के अनन्तर सूर्यनिविष्टदृष्टि होकर ऐसी तपश्चर्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और कभी आपसे मेरा विप्रयोग न हो । आगे लेखक दलबदलुओं का दृष्टान्त देकर श्रीराम के जैनधर्म में प्रवेश का समर्थन करता है; परन्तु परमेश्वरावतार राम को निरीश्वरवादी जीव बना देना ही तो सबसे बड़ा अपराध है । अति प्राचीन वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण के द्वारा परमेश्वररूप से प्रतिपादित श्रीराम को जैनी के रूप में देखना ही तो अपने ही चश्मे से देखने का मूढ़ामह है । आगे लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रशंसा करते हुए कहा है 'गोस्वामीजी ने जैनरामायण को भी देखा ही होगा। सबको दृष्टि में रखते हुए रामचरितमानस लिखा है। इसी लिए किसी ने जैन या जैनेतर ने उसके विरुद्ध कलम नहीं उठायी । वह अनुपम भक्ति-काव्य ग्रन्थ है ।' यह ठीक है। पर जब यह मानते हैं तो उसके अनुसार श्रीराम को— “व्यापक ब्रह्म निरञ्जन निर्गुन बिगत बिनोद । सोइ अज भक्त प्रेमवश कौशल्या की गोद ॥” ( रा० मा० १।१०८ ) क्यों नहीं मानते ? उन्हें जैनी जीव बनाने का जघन्य अपराध क्यों करते हैं ? आगे तो लेखक ने बहुत ही छिछले शब्दों से आधुनिक मनचले लेखकों के जैसे आक्षेप करते हुए वस्तुस्थिति को अन्यथा रूप में व्यक्त किया है, जिसका उसी रूप में उत्तर देना मेरे लिए असम्भव ही है । पर साथ ही वह यह भी मान लेता है । 'गये शहर में आप मुझे तब ले न गये साथ । बकबक करनेवालों को दिखला देता दो हाथ ॥ छन्द पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि ये पद्य आचार्य तुलसी के प्रौढ़ कवित्व के कितने परिचायक हैं ? पर वह यह मानता है—'आजाद भारत के आजाद युवक समाधान की खोज में भटक रहे हैं । उन्हें एक प्यास है । वह प्यास धर्म, दर्शन से नहीं बुझती । उस तृष्णा की पूर्ति का सङ्केतात्मक प्रयास आचार्य तुलसी ने किया है ।' लेखक ने यह बात अवश्य पते की कही, तभी सिनेमाप्रिय आजाद युवकों के लिए उन्होंने अग्निपरीक्षा में सिनेमा के गानों का सन्निवेश किया है; परन्तु यह तृष्णापूर्ति तो सिनेमा से ही होगी । इससे तेरापन्थी तुलसी का घासलेट साहित्य सफल न होगा । लेखक ने आठवें पृष्ठ में लिखा है 'आचार्य तुलसी घोषित कर चुके हैं कि मुझे अपनी ओर से इस ग्रन्थ के बारे मे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है ।' १० वें पृष्ठ में लिखा है 'उन्होंने अपनी कृति में संशोधन करना स्वीकार कर लिया है ।' क्या यह बुद्धिमानी है । लेखक ने— 'तुलसी जाके मुखन ते धोखेहु निकसत राम । ताके पग की पानही मेरे तन की चाम ॥' इस दोहे का स्मरण किया है। यदि यह दाम्भिक भाव से न होकर शुद्ध भाव से स्मरण-पथ में लाया गया हो तो इसका यही अर्थ है— “भाव कुभाव अनख आलस हूँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।” ( रा० मा० १।२७।१ )
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अध्याय जैनमत में रामकथा १४७ परन्तु जिन राम का सादर ससम्मान परमेश्वररूप से स्मरण करने से तत्काल शान्ति मिलती है; उनका क्या रावण बनकर शत्रुभाव से नाम लेना बुद्धिमानी की बात है ? १३ वें पन्ने में भी लेखक ने वही तेरापन्थी तुलसी द्वारा उपयुक्त कुलटा, व्यभिचारिणी शब्दों का समर्थन करते हुए उसका खण्डन करने वालों को धर्मान्ध कहने की धृष्टता की है और उनपर भ्रान्ति फैलाने का आरोप लगाया है । गाली का अनुवाद भी पाप है । वस्तुतः लेखक अपने समान ही अपने चश्मे से ही सबको धर्मान्ध एवं पूर्वापर विवेकशून्य मानता है, अन्यथा यह कौन नहीं जानता कि अग्निपरीक्षा के षड्यन्त्र-प्रकरण द्वारा लोकापवाद का चित्रण किया गया है, परन्तु ऐसा होने पर ही अग्निपरीक्षा लेखक दोषमुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षात् राघवेन्द्र राम की स्वरूपभूता महालक्ष्मी सीता के लिए या महासती के लिए अथवा अपनी माँ के लिए पिता द्वारा या अन्य दुष्ट जनों द्वारा दी हुई गालियों का अनुवाद भी पाप है । “कथापि खलु पापानामलमश्रेयसे यतः” (शि० २।४०) । पापियों की पापसम्बन्धिनी कथा भी अकल्याणकारिणी होती है । शिशुपाल ने कृष्ण को सौ गालियाँ दी थीं । वे भी ऐसी उद्वेजक नहीं थीं । प्रसिद्ध टीकाकार श्रीधर स्वामी ने लिखा है कि भगवान् को गाली देने के लिए प्रवर्तित होने पर भी उसकी सरस्वती ने भगवान् की स्तुति ही की है । और तदनुसारी अर्थ भी उन्होंने उन गालियों का व्यक्त किया है । निष्प्रमाण गालो- कल्पना घोर पाप है; परन्तु यहाँ तो वस्तुस्थिति भी वैसी नहीं है । जब पूर्ववर्ती व्यास-वाल्मीकिरामायणों में भी ऐसी गालियों का वर्णन नहीं है, तब वस्तुस्थिति के विपरीत वैसी गालियों की कल्पना सुतरां उच्छृङ्खलता है । यहाँ तक कि पूर्व जैनकथाओं में भी ऐसे अनुचित शब्दों का उल्लेख नहीं है । कुन्दमालाकार भी एक महान् जैन कवि हैं । उत्तररामचरित्र के तुल्य ही उनका उत्तररामचरित्रसम्बन्धी एक दिव्य नाटक है । उसमें उन्होंने भी इस प्रसङ्ग में नियन्त्रित सन्तुलित शब्दों का ही प्रयोग किया है । इसी लिए शास्त्रनियन्त्रित कवि की स्वतन्त्र प्रतिभा उन्मार्गगामिनी और उच्छृङ्खल नहीं होती है । इसी लिए प्रामाणिक ग्रन्थों की कथावस्तु के अनुसार ही काव्य, नाटकों के प्रणयन का निर्देश शास्त्रों में किया गया है । बिना अपवाद के भी अग्निपरीक्षा यद्यपि तुलसी झुक गये, अपनी कृति में संशोधन करना मान लिया, फिर भी लेखक अपने मूढ़ आग्रह के कारण उसका समर्थन करते हुए कहता है—"जनापवाद को इस सीमा तक पहुँचाये बिना सीता के वनवास की प्रक्रिया नहीं बन सकती थी । सामान्य स्थिति में क्या कोई पति अपनी पत्नी का परित्याग कर सकता है ? पर यह भी कितनी निःसार दलील है । लेखक ने यदि कभी वाल्मीकि आदि के रामायण ग्रन्थ पढ़े हों या उसे कभी आर्यशास्त्र सुनने पढ़ने को मिले हों तो उसको मालूम होना चाहिये कि एक वैदिक आर्य पुरुष तो स्वतन्त्ररूप से कतिचित् क्षण भी परगृहोषिता पत्नी को त्याग देता है । तभी तो श्रीराम ने लङ्का ही में जब कि किसी ने कुछ भी नहीं कहा था, स्वयं शङ्का उपस्थित कर श्रीसीता को अग्निपरीक्षा का अवसर दिया था । ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि अपवाद को बिना चरम सीमा पर पहुँचाये सीता के परित्याग की प्रक्रिया नहीं बैठ सकती थी । इतना ही क्यों अग्निपरीक्षा के बाद भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार यत्किञ्चित् लोकवाद के कारण ही राम ने सीता को वनवास दिया । यों तो आधुनिक ऐसे भी लोग हैं जो हजार अपवाद होने पर भी पत्नीत्याग नहीं करते । इतना ही क्यों, अनेक लोगों की भूतपूर्व पत्नियों को भी अपनी पत्नी बनाने में कुछ लोग संकोच नहीं करते । वस्तुतः यह पुस्तक कई वर्षों से छपी थी । इसे कोई जानता भी न था । इस वितण्डावाद के मूल भी आचार्य तुलसी ही हैं । रायपुर में जब उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में श्रीसीता के लिए निन्दित शब्द का प्रयोग किया तो वहाँ के लोगों ने क्षुब्ध होकर उसका आधार पूछा । तब उन्होंने अपनी अग्निपरीक्षा पुस्तक बतायी । उसका भी आधार पूछा गया तो वाल्मीकिरामायण को उन्होंने आधार बताया । जब लोगों ने वाल्मीकिरामायण दिखाया
१४८ रामायणमीमांसा पञ्चम और कहा कि इसमें तो ऐसे कोई भी शब्द नहीं हैं। तब उन्होंने जैनरामायण का नाम लिया, पर जब जैनरामायण में भी उसका कोई आधार नहीं मिला। तब उन्होंने उसे अपनी कल्पना मान लिया था। तेरापन्थी आचार्य तुलसी के उक्त ग्रन्थ को देखकर श्रीविनोवाजी ने कहा—यह तो किसी बालक का ग्रन्थ है। यदि आचार्य तुलसी का हो तो भी उनकी बाल्यावस्था का ग्रन्थ हो सकता है। जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरीपीठाधीश्वर तथा ब्रह्मीभूत ज्योतिष्पीठाधीश्वर ने भी इसकी निन्दा की । साधुसमाज के भी प्रतिष्ठित महात्माओं ने इसकी निन्दा की है। स्वामी आत्मानन्द ने कहा कि इसमें लोकापवाद का चित्रण इतने विस्तार और स्थूलता से किया गया है कि वह अत्यन्त मोटी और खटकनेवाली बात हो गयी है। उक्त काव्य में राम को बहुपत्नीधारी बताया गया है और उन्हें एक सामान्य मानव के रूप में दर्शाया गया है। सीता को अणुव्रती बताकर अणुव्रत का प्रोपेगण्डा किया गया है। अग्निपरीक्षा हिन्दू-भावना पर ठेस पहुँचानेवाली पुस्तक है। प्रकाशवती मिश्र ने इस पुस्तक का सक्रिय घोर विरोध किया है। बलदेवप्रसाद मिश्र डी. लिट्. ने लिखा है—'अग्निपरीक्षा रामचरित्र के उच्च आदर्शों को नीचे गिराने का उपक्रम करती है। अग्निपरीक्षा साम्प्रदायिकता का प्रचारक साहित्य बन गया है। उच्छृङ्खल बातें लिखकर अपनी कलम की स्वतन्त्रता भले ही मान लें; परन्तु यह शोभा की बात नहीं है।' उपयोगिता की दृष्टि से अग्निपरीक्षा पुस्तक न होती तो कोई हानि न थी। सीता के चरित्र को लिखने की आज कोई आवश्यकता नहीं है। जन-जन के मानस में सीता की जगज्जननी के रूप में संप्रतिष्ठा है ही। इसके लिए वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानस पर्याप्त हैं। अपने अणुव्रत या तथोक्त अध्यात्म-प्रचार के लिए अन्य किसी कथा का आश्रयण कर लिया जा सकता था। इस पुस्तक में आदि से अन्त तक सिनेमा के छिछले तर्जों के गायनों में वाल्मीकिरामायण, रामचरितमानस एवं श्रीसीता और राम के आदर्शों के विरुद्ध अनेक चित्रण हैं। रामायणों के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपने परम मित्र के श्रृङ्गवेरपुर में भी प्रवेश नहीं किया। सुग्रीव एवं विभीषण का राजतिलक करने के लिए भी किष्किन्धा एवं लङ्का में उन्होंने प्रवेश नहीं किया। लक्ष्मण के द्वारा ही उनका तिलक हुआ। ठीक उसके विपरीत अग्निपरीक्षा पुस्तक में श्रीराम लङ्का में राज्यसिंहासन पर बैठे दिखाये गये हैं। इस प्रकार ग्रन्थ के आरम्भ से ही श्रीराम की मर्यादाओं का भङ्ग दिखलाया गया है। प्रासाद दिव्य दशकन्धर का दिखलाता अपनी नव्य प्रभा । सिंहासन पर रघुवर लक्ष्मण रविचन्द्र तुल्य थे चमक रहे ॥” ( पृ० १ ) वैदिक रामायणों के अनुसार श्रीराम, भरत और माताओं चिन्ता में अधीर हैं। विभीषण उनको शीघ्र ही पुष्पक विमान द्वारा पहुँचाने का आश्वासन देते हैं, पर अग्निपरीक्षा के अनुसार राम माताओं को भूलकर लङ्का में आनन्द मना रहे हैं। सबको भूले हैं। “तुम तो आनन्द मनाते हो, रोती हैं वे माताएँ । माता के मन को ममता को, मैं तुम्हें सुनाने आया हूँ। लो कान खोलकर सुनो करुण, सन्देशा माँ का लाया हूँ ॥” वैदिक रामायण के अनुसार राम एकपत्नीव्रत हैं। इतना ही क्यों, गोस्व.मीजी के अनुसार तो 'एक नारि- व्रत सब नर नारी।' हैं। पर अग्निपरीक्षा में श्रीराम बहुत रमणियों के भोक्ता हैं। वे लिखते हैं—'रमणियां राम की सोच रही हैं। सीता रहते किंचित् सुख हमें नहीं है।' ( पृ० २३ )
अध्याय जैनमत में रामकथा १४९ जहाँ वैदिक ग्रन्थों ने पत्नी को पति की काया की छाया, चाँद की चाँदनी एवं भानु की प्रभा माना जाता है, वहाँ सुधारवादी तुलसी के रामराज्य में भी नारियों के समानाधिकार का चित्रण नहीं छूटा। वे लिखते हैं— “नारियों का स्थान पुरुषों से न किञ्चित् हीन था। आत्मनिर्णय में रहा चिन्तन सदा स्वाधीन था॥” वैदिक रामायणों के अनुसार राजनीति के चारों अङ्गों से साम और दाम का ही प्रयोग होता था। दण्ड केवल दण्डी संन्यासियों के हाथ में और भेद केवल नर्तक-नृत्यसमाज में ही परिलक्षित होता था। पर अग्निपरीक्षा में उसी रामराज्य में भी भीषण षड्यन्त्र चलता है। उसके अनुसार रामराज्य में बहुपत्नी प्रथा, सौतिया डाह, असत्य भाषण तथा भ्रष्टाचार दिखाई पड़ता है। दूत, दूतियाँ प्रलोभनवश सीता का अपवाद घर घर पहुँचाती हैं। प्रलोभनवश ही वे लोग राम से भी अत्यन्त प्रपञ्चयुक्त आपत्तिजनक शब्द कहते हैं। सीता के लिए अत्यन्त निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग करते हैं। रावण के चरणों का चित्र बनाकर सीता के द्वारा पूजा करने की कथा भी राम के सामने पहुँचायी जाती है। बिठा अकेली पुष्पक में, रावण ले जाया करता था। निर्जन उपवन में प्रमोद से, जी बहलाया करता था॥ विद्या यन्त्र मन्त्र से जिसने, लिए देव देवी भी कील। क्या सम्भव है उसके आगे, रहा अखण्डित शील॥ हाय कलङ्कित हो रहा, सूर्यवंश अभिराम। दुराचारिणी के बने, रघुकुल राम गुलाम॥ (पृ० ३७) पत्नी के पीछे पागल बन, राघव ने लोपी कुलकार। महासती का जामा पहने, कभी न पतिता छिप सकती। सती साध्वी और रानियां, बैठे बैठे रोती हैं। उल्टा युग आया देखो, कुलटा पटरानी होती है॥ पर वे देवी रावण के, चरणों की पूजा करती। इन पापाचारों से कैसे, टिक पायेगी यह धरती॥ (पृ० ३८) देखो भाई दीख रहे हैं, कलियुग के आसार रे। राजघराने में भी पलते, ऐसे पापाचार रे॥ रावण के साथ रहा निश्चित, उसका अनुचित व्यवहार रे। हाँ में हाँ भरने वालों की, बनी आज सरकार रे॥ (पृ० ३९) सीता का पापाचार यहाँ। (पृ० ४०) री पापिन क्यों कर रही, मुझे राम के तुल्य। जिसने पत्नी के लिए, खोया अपना मूल्य॥ सिंहासन को बदनाम किया, भयभीत वहाँ वह कायर है। उस दुराचारिणी से अपना, किञ्चित् सम्बन्ध न तो इसका॥ (पृ० ४४) स्पष्ट है ऐसे पापपूर्ण अनुचित शब्द वैदिक रामायण में तो क्या जैनरामायण में भी नहीं हैं। यही है तेरापन्थी तुलसी का जघन्य अक्षम्य अपराध। जिसके कारण उन्हें रायपुर में उसका फल भोगना पड़ा। यह सब मिथ्या कल्पना है एवं प्रमाणविरुद्ध है। तेरापन्थी की अपनी दुर्भावना और नास्तिकता का दुष्परिणाम है।
१५० रामायणमीमांसा पञ्चम वास्तव में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम प्रजावत्सल राजा हैं। उन्होंने प्रजारञ्जन के लिए स्नेह, राज्य, सौख्य सब कुछ त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। और वैसा ही उसका पालन भी किया था— "स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥" ( उ० रा० च० १।१२ ) उनके राज्य में, उनकी प्रजा में तेरापन्थी तुलसी वर्णित षड्यन्त्र, मिथ्या प्रलाप, वैर, सौतिया डाह सम्भव ही नहीं था। रामराज्य का वर्णन श्रीगोस्वामीजी ने यों किया है— वैर न कर काहू सन कोई । राम प्रताप विषमता खोई ॥ दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य काहू नहिं व्यापा ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ ( रा० मा० ७।१९-२०।४-१ ) अग्निपरीक्षा में वर्णित कथानक से आदर्श रामराज्य के आदर्श की पूर्ण हत्या ही व्यक्त होती है। भीषण से भीषण कलियुग में निकृष्ट शासन प्रणाली में जो दुराचार और मिथ्या प्रलाप हो सकता है वही तेरापन्थी तुलसी ने रामराज्य में दिखाया है और निकृष्ट गालियाँ जो हो सकती हैं वे सीता को दिलाई हैं। सिर्फ सीता-त्याग की भूमिका बनाने के लिए जब कि वाल्मीकि के अनुसार कामवासनोपरक्त दुष्ट चक्षु से दृष्ट होने से ही राम ने सीता को त्याज्य समझा था। "दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा ।" ( वा० रा० ६।११९।२० ) अग्निपरीक्षा में यद्यपि सीता को महासती कहा गया है, परन्तु वह सब जैनों का णमुक्कार मन्त्र जपने के प्रभाव से बतलाया गया है। करती है कभी आत्मचिन्तन अन्तरवेग हटाने को । रटती जाती है णमुक्कार महामन्त्र शान्ति सुख पाने को ॥ अरिहन्त सुगुरु सद्धर्म बिना है कोई त्राण नहीं । डिग जाता ऐसी स्थितियों में जिसकी श्रद्धा सप्राण नहीं ॥ अर्थ—सद्गुरु अर्हन् के णमुक्कार मन्त्र को सीता ने जपा ऐसे सुन्दर गुरु के सद्धर्म बिना त्राण का कोई रास्ता नहीं ( पृ० ७४ ) । यह है साम्प्रदायिकता की पराकाष्ठा । ऐसे लोग अपने चश्मे से ईश्वर को भी अपने धर्म में दीक्षित करने का साहस करते हैं। आगे चलकर अग्निपरीक्षा के अनुसार वन में श्रीसीता के पास भिक्षोपजीवी अकिंचन जैन सिद्ध पुरुष आते हैं। उनका सीता सम्मान करती है। सीता अपने पुत्रों के पढ़ाने की चिन्ता प्रकट करती है। वह जैन साधु लवण और अङ्कुश को पढ़ाने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है। लेता हूँ दायित्व स्वयं मैं कर मत इसका तनिक विचार । मेरी विद्याओं के सच्चे पात्र मिले मन के अनुसार । वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि के आश्रम में ही सीता रही। कालिदास, हर्षवर्धन आदि ने इसका समर्थन किया है। महर्षि वाल्मीकि से ही उन्हें वेदादि शास्त्रों तथा अन्य-शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्त हुई थी। परन्तु उदारता एवं सर्वधर्मसमन्वय का दम्भ रचनेवाले तेरापन्थी तुलसी का वेद-विद्वेष इतना उग्र हो उठा कि वे ठीक उसके विपरीत उनकी किसी जैनी सिद्ध से शिक्षा की व्यवस्था करते हैं। इतने पर भी दूसरों को साम्प्रदायिक कहने का साहस ! स्कूलों में कोई शरारती विद्यार्थी किसी शान्त विद्यार्थी को चिकोटी काटता है। यदि वह रोता है तो
अध्याय जैनमत में रामकथा १५१ चिकोटी काटनेवाला उसपर कोलाहल मचाने का आरोप लगाता है। ठीक वैसे ही कट्टरसम्प्रदायवादी तेरापन्थी तुलसी वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि से सर्वथा निष्कलङ्क प्रमाणित अनादिकाल से सर्वलक्षण सीता और राम के चरित्र को दूषित करते हैं और उनके चेले तुलसीरामायण से उसका समर्थन करने का साहस करते हैं। वे इस मिथ्यावाद को भी उचित ठहराते हैं कि— रामकथा की मिति जग नाहीं, अस प्रतीति जिनके मन माहीं। नाना भाँति राम अवतारा, रामायण शतकोटि अपारा ।। (रा० मा० १।३२(३)) किमाश्चर्यमतः परम् । जो ईश्वर नहीं मानता, राम को ईश्वरावतार नही मानता वही अपने जघन्य अपराधों को, मिथ्यावादों को शतकोटिप्रविस्तर रामायण में सम्मिलित करना चाहता है और स्वाभिमत किसी जैनी जीव को रामावतार बनाने की दुश्चेष्टा करता है और ऐसे दुष्कृत्य का ही तेरापन्थी तुलसी को शङ्कराचार्य एवं आचार्य विनोबा के समान परम प्रतिष्ठित घोषित करने का दुःसाहस करता है। अन्त में भी तेरापन्थी तुलसी परमेश्वरी श्रीसीता से जैन तीर्थङ्कर की वन्दना कराकर उसका अग्निप्रवेश वर्णन करते हैं— मंगल लोकोत्तम शरण विघ्नहरण है चार । अर्हद्वतनु मुनि धर्म को रटती बारम्बार ।। नमोकार मन्त्र जप करके हृद् था बना विशाल । जलती ज्वाला कुण्ड में कूद पड़ी तत्काल ।। (पृ० ९६५ ) और उसी मन्त्र के प्रभाव से अग्नि पानी हो गया और कुण्ड एक महान् पानी का सरोवर हो गया । “सरवर हो रहा तरङ्गाकुल खिल रहे कमल उत्पल शतदल ।” आगे सीता की महिमा का वर्णन किया है। परन्तु वह जैन दीक्षिता सीता की महिमा है वेदादि शास्त्रोक्त ईश्वरस्वरूप सीता की नहीं । अग्निपरीक्षा की भूमिका के लेखक महेन्द्रकुमार ने वाल्मीकि के राम को एक महामानव के रूप में प्रस्तुत किया है। आदि से अन्त तक राम एक मानव रहते हैं । वह कहते हैं उनमें ईश्वरता का आरोप कवि ने नहीं किया । पर यह सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि प्रस्तुत लेख में ही मैंने वाल्मीकि के ही राम को परात्पर ब्रह्म बतलाने- वाले सैकड़ों वचन प्रस्तुत किये हैं। युद्धकाण्ड में ब्रह्मा ने स्वयं कहा है— “भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ॥” आप चक्रधारी संसार के आदिकर्ता नारायण देव हैं। आगे भूमिका में कहता है—‘आज के बुद्धिप्रधान युग में जैनरामायणें बुद्धिगम्यता की दिशा में अधिक प्रशस्त मानी गयी हैं। वहाँ अधिकांश घटनाएँ स्वाभाविक और सम्भवरूप में मिलती हैं। वैदिक रामायणों में रावण के दस मुख माने गये हैं। स्वयम्भूकृत पद्मचरित में वैदिक परम्परा में चलनेवाली असङ्गतियों को प्रस्तुत किया गया है। रावण के दस मुख और बीस हाथ कैसे, कुम्भकर्ण छः महीने कैसे सोता था, करोड़ों महिषों को कैसे खा जाता था। कूर्म ने पृथ्वी को कैसे पीठ पर धारण किया था। इस प्रकार अवतारवादिता और विविध अस्वाभावकताओं को लेकर जैन और वैदिक परम्पराओं में बहुत से भेद आते हैं। परन्तु भूमिका लेखक को यह बात समझ में क्यों नहीं आयी कि णमुक्कार मन्त्र जप कर सीता के अग्निकुण्ड में कूदने से अग्नि पानी कैसे हो गया ? अग्निकुण्ड महान् सरोवर कैसे हो गया ? उसमें विविध कमल कैसे खिल गये ? क्या यह सब महावीर या तेरापन्थी तुलसी के करिश्मे से हो गया ? धर्मान्ध साम्प्रदायिक अपने सम्प्रदाय की असम्भव बातों को भी सम्भव मानता है, परन्तु अन्य सम्प्रदाय की तर्कसङ्गत बातें भी उसे असङ्गत जँचती हैं। कहा जाता है “जब वैदिक रामायणों में भी कथाभेद है। किसी रामायण में यह वर्णित है कि सीता जिस पर्णशाला में रहती थीं
१५२ रामायणमीमांसा पञ्चम रावण वहाँ की जमीन सहित पर्णशाला को ही लङ्का ले गया था। फिर जैन रामकथा का भेद क्यों अनुचित कहा जाय । प्रत्येक रचयिता प्रायः कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़ता ही है। कवि इसे अपना मौलिक अधिकार मानता है।' परन्तु यह बात भी उचित नहीं, क्योंकि वैदिक रामकथाओं के भेद में कल्पभेद से तथा अवतारभेद से कथाओं का भेद सम्भव होता है— कल्प भेद हरि चरित सुहाये । भांति अनेक मुनीसन गाये ॥ (रा० मा० १।३२।४) अतः भेद समूल हो सकते हैं परन्तु जिनके मतानुसार ईश्वर एवं अवतारवाद मान्य नहीं है, उनके यहाँ कथाभेद भूमिका-लेख के अनुसार कवि की अपनी ही कल्पना हो सकती है, जो वस्तुस्थिति से विरुद्ध होती है। हां, मूल कथावस्तु को ही सजाने और रोचक बनाने में शब्दालङ्कार आदि की योजना में कवियों की स्वतन्त्रता अवश्य मान्य होनी चाहिये । अन्यथा जैसे गल्प, उपन्यास आदि का कोई श्रद्धा से पाठ नहीं करता वैसे ही रामायण का भी पाठ नहीं कर सकेगा। ऐसे ही अप्रामाणिक तथा मिथ्याकल्पनापूर्ण वर्णनों को धार्मिक ग्रन्थ तो कहा ही नहीं जा सकता । नागेश के अनुसार वाल्मीकि ने नारद से भगवान् राम के गुणवर्णन का श्रवण किया और स्वयं भी राम- गुणवर्णन की इच्छा की। श्रीराम का गुण करुणरसमय है, अतः अतिकरुण व्यक्ति का ही रामायण-वर्णन में अधिकार है। अतः मुनि के चित्त में कारुण्य जानने के लिए और भृगुदत्त शाप का ही वाल्मीकि द्वारा दृढ़ीकरणार्थ श्रीराम ने ही मुनि के देखते देखते निषाद रूप धारण कर राक्षसवशेषरूप क्रौञ्च को मार दिया। अन्तर्यामी श्रीराम के इच्छानुसार ही उनकी प्रेरणा से ही इसने महान् अधर्म किया, इस क्रोध से महर्षि ने कहा पापबुद्धे जो तू ने काम- मोहित क्रौञ्च जोड़े के एक क्रौञ्च को मारा है अतः तू भी आयुःशेषभूत बहुत वर्षों तक प्रतिष्ठा—स्त्रीसहित होनेवाली सुख-शान्ति—न प्राप्त करेगा, किन्तु अल्पकाल ही सुख पावेगा। पद्मपुराण के अनुसार स्पष्ट विदित होता है। कोई एक दुर्वृत्त व्यक्ति ही ऐसा था जिसने सीता की निन्दा की थी। रामाभिरामी टीकाकार नागेशभट्ट के अनुसार पद्मपुराण में शिवशिवा-संवाद में कहा है— “ततो जानपदः कश्चित् पामरः काष्ठविक्रयी । स्ववधूगर्हणद्वारा रावणस्य गृहोषिताम् ॥ गर्हयामास वैदेहीं दुर्वृत्तो लोकनिन्दकः । तच्छ्रुत्वा देवि चारेभ्यो भीतो लोकापवादतः ॥ आहूय लक्ष्मणं प्राह रामो राजीवलोचनः । शृणु मे वचनं गुह्यं सीतासन्त्यागकारणम् ॥ वाल्मीकिनाथ भृगुणा शप्तोऽस्मि किल लक्ष्मण । तस्मादेनां त्यजाम्यद्य जनो नैवात्र कारणम् ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) किसी काष्ठविक्रयी दुर्वृत्त लोकनिन्दक ने अपनी स्त्री की निन्दा करते हुए रावणगृहोषिता वैदेही जानकी की निन्दा की थी। गुप्तचरों द्वारा यह सुनकर लोकापवादभय से राजीवलोचन राम ने लक्ष्मण को बुलाकर बतलाया कि वाल्मीकि और भृगु ने मुझे पत्नीवियोगदुःख का शाप दे रखा है। इसलिए साधारण आदमी इसका कारण नहीं है। जानकी का त्याग करना ही है। शाप के द्वारा अर्थात् शापप्राय श्लोक के मुख से निकलने से अकल्मष प्राचेतस मुनि सन्तप्त हो रहे थे। ब्रह्माजी ने वहाँ आकर महर्षि से सत्कृत होकर महर्षि से कहा—'वह निषाद नहीं था, किन्तु श्रीराम ही थे।
मृगया के लिए आये थे । तुम रामचन्द्र का यश वर्णन करने से ही संसार में सुश्लोक्य (प्रशंसनीय) होगे ।' यह कह कर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये । तब वाल्मीकि ने कोटि-कोटि ग्रन्थों (श्लोकों) द्वारा राम का वर्णन किया । यह स्कन्दपुराण पातालखण्ड की बात है— “शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥ न निषादः स वै रामः मृगयां चर्तुमागतः । तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥ ततः स वर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥” कोटिभिः का अर्थ है शतकोटिभिः, क्योंकि “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्” यह अन्यत्र (पद्मपुराण ५।१।२४ में) उक्त है और वह सब ब्रह्मलोक में है। यह ऐतिह्य है। मनुष्यलोक में तो कुश और लव के लिए २४ हजार श्लोकोंवाला रामायण ग्रन्थ है । वाल्मीकि ब्रह्मा के अंशभूत थे । उन्होंने नारद के अनुग्रह से निश्शेष रामचरित को जानकर भूलोकवर्ती चार वर्णों के तापत्रय-विमोचन के लिए स्वकृत शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्रीरूप ब्रह्मविद्या के विलासभूत चौबीस हजार श्लोकों के रूप में लव और कुश को पढ़ाया । श्रीराम के अवतार और पत्नीवियोगजन्य दुःख के कारण और भी बहुत से पुराणों तथा योगवासिष्ठ में उक्त हैं । यद्यप्येतत्सर्वं वाल्मीकिकृतमेव तथापि कुशलवगेयतयास्य काव्यस्य करणात्तदुक्तितयैवमुक्तिः । अन्यथा स्वचिन्तायाः स्वापरोक्षत्वाद् बभूवेति लिड्संगतिः स्यात् । (वा० रा० १।४।२१ की टीका) प्रथम सर्ग से ही सम्पूर्ण वाल्मीकिरामायण वाल्मीकिकृत ही है । तथापि वह कुश एवं लव के द्वारा गेयरूप से निर्मित है, अतएव इसमें कुश-लव के द्वारा ही वाल्मीकि वृत्तान्त भी वर्णित किया गया है । ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः’ ( वा० रा० १।२।१५ ) इत्यादि श्लोक उच्चारण के बाद महर्षि के हृदय में चिन्ता हुई । यहाँ ‘बभूव’ लिट्लकार का प्रयोग सङ्गत है । अन्यथा अपनी चिन्ता अपने को प्रत्यक्ष ही होती है, अतः परोक्ष निर्देश सङ्गत न होता । “त्यक्त्वा जीर्णदुकूलवद्वसुमतीं बद्धोऽम्बुधिर्बिन्दुवद् बाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः । लङ्का कापि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽर्पिता श्रुत्वैवं रघुनायकस्य चरितं को वा नरो नाञ्चति ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) श्रीरघुनाथजी ने जीर्ण वस्त्र के समान पृथ्वी का राज्य पिता के आज्ञानुसार त्याग दिया । बिन्दु के तुल्य समुद्र को बाँध दिया, बाणाग्र से बूढ़े कबूतर के समान रावण को मार डाला एवं साधारण मुद्रा के समान लङ्का विभीषण को प्रदान कर दी । ऐसे राम के अलौकिक चरित्र को सुनकर कौन मनुष्य उनकी पूजा न करेगा । नाट्याचार्य भरतमुनि ने काव्य, नाटकों के सम्बन्ध में कुछ निर्देश दिये हैं— “अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि काव्यबन्धविकल्पनम् । प्रख्यातवस्तुविषयं प्रख्यातोदात्तनायकं चैव ॥ राजर्षिवंशचरितं तथा दिव्याश्रयोपेतम् । नानाविभूतिसंयुतमृद्धिविलासादिभिर्गुणैश्चापि ॥ अङ्कप्रवेशकाव्यं भवति हि तन्नाटकं नाम ।” ( ना० शा० २०।९-११ )
१५४ रामायणमीमांसा पञ्चम काव्य तथा नाटक की कथा वस्तु प्रख्यात ( इतिहास-पुराण प्रसिद्ध ) होनी चाहिए और उसका नायक प्रख्यात एवं उदात्त होना चाहिये । राजर्षिवंश-चरित तथा दिव्य आश्रययुक्त, नाना विभूतियों से संयुक्त, विविध विलासों से युक्त अङ्कप्रवेश सहित नाटक होता है । दशरूपककार धनञ्जय के अनुसार भी— “प्रख्यातवंशो राजर्षिर्दिव्यो वा यत्र नायकः। तत्प्रख्यातं विधातव्यं वृत्तमत्राधिकारिकम् ॥ यत्तत्रानुचितं किञ्चिन्नायकस्य रसस्य वा। विरुद्धं तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत् ॥” ( द० रू० ३।२३–२५ ) नाटक का प्रख्यात वंश का राजर्षि या कोई दिव्य पुरुष नायक होना चाहिए । नायक की आधिकारिक ( प्रधानभूत ) कथावस्तु प्रख्यात ( पुराणादि-प्रसिद्ध ) ही होनी चाहिये । कथा वस्तु में जो अंश नायक या रस के अनुचित या विरुद्ध हो उसका त्याग कर देना चाहिए अथवा उसकी रस के अनुगुण नवीन कल्पना कर लेनी चाहिए । साहित्यदर्पण के अनुसार भी नाटक का लक्षण— “नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्.................... । प्रख्यातवंशो राजर्षिर्धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ दिव्योऽथ दिव्यादिव्यो वा गुणवान्नायको मतः ॥” ( ६।७–९ ) नाटक प्रख्यातवृत्त ही होना चाहिये । प्रख्यात वंश का राजर्षि धीरोदात्त प्रतापवान् दिव्य या दिव्यादिव्य गुणवान् नायक होना चाहिये । आचार्यदण्डी के काव्यादर्श में महाकाव्य का लक्षण कहा गया है— “सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् । आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् ॥ इतिहासकथोद्भूतमितरद्वा सदाश्रयम् । चतुर्वर्गफलोपेतं चतुरोदात्तनायकम् ॥ अलङ्कृतमसंक्षिप्तं रसभावनिरन्तरम् । सर्गैरनतिविस्तीर्णैः श्रव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ॥ सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरञ्जनम् । काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृति ॥” सर्गबन्धयुक्त चतुवर्ग फलोपेत काव्य ग्रन्थ होता है । उसमें आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक अथवा वस्तु- निर्देशात्मक मङ्गल होना चाहिये । इतिहासकथोद्भूत या अन्य सदाश्रय चतुर तथा उदात्त काव्य का नायक होना चाहिये । वह अलङ्कारों से युक्त, विस्तृत तथा आद्योपान्त निरन्तर रसमय होना चाहिये । अनतिविस्तीर्ण सर्गों एवं सुश्लिष्ट भव्य वृत्तान्तों से युक्त होना चाहिये । विभिन्न प्रकार के वृत्तान्तों से युक्त तथा लोकरञ्जन समीचीन अलङ्कारोंवाला ग्रन्थ काव्य कल्पान्तर पर्यन्त रहता है । भामह तथा रुद्रट सर्गबन्ध नामक काव्य का लक्षण देते हैं, किन्तु वे यह नहीं लिखते हैं कि उस प्रकार के काव्य या उसकी कथा-वस्तु प्रख्यात या इतिहासप्रसिद्ध हो ।
अध्याय जैनमत में रामकथा १५५ साहित्यदर्पण के अनुसार भी काव्यलक्षण— “सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्तगुणान्वितः ॥ एकावंशभवा भूपा कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद् वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् ॥” सर्गबन्धयुक्त काव्य होता है । उसका एक नायक होता है । वह देवता हो या सद्वंशीय क्षत्रिय हो । वह धीरोदात्त एवं गुणयुक्त होना चाहिये । एक वंश में उद्भूत एवं कुलप्रसूत बहुत राजा भी नायक हो सकते हैं । इसमें शृङ्गार, वीर या शान्त कोई एक अङ्गी रस होना चाहिये और रसों का अङ्गरूप में संनिवेश होना चाहिए । इस दृष्टि से काव्य और नाटक के नाम पर भी कोई मानमाने अप्रामाणिक मिथ्या कथानकों का उल्लेख नहीं कर सकता है । श्रीकामिल बुल्के ने आदि कवि वाल्मीकि को अपनी रामकथा समर्पित करते हुए कहा है कि जिनकी प्रतिभा ने रामकथा को भारत तथा निकटवर्ती देशों के साहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया है और भारतीय संस्कृति का एक उज्ज्वल प्रतीक बना दिया, उन आदि कवि वाल्मीकि को रामकथा की दिग्विजय का प्रस्तुत विवरण सश्रद्ध समर्पित है । “त्वदीयं वस्तु वाल्मीके तुभ्यमेव समर्प्यते ।” जैनकथा की सारी विशेषता का वर्णन करते हुए बुल्के ने दिखाया है कि उनमें प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की ६ महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है । बुल्के यह भी मानते हैं कि विमलसूरि ने पउमचरिय लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है (पृ० ६७) । आगे वे कहते हैं कवि का कहना है कि यह पद्मचरित्र आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा था और नामावलीबद्ध था । इसका अर्थ यह हो सकता है कि रामचरित केवल नामा- वली के रूप में रहा होगा अर्थात् उसमें कथा के प्रधान प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों और भवान्तरों आदि के नाम ही होंगे । वह पल्लवित कथा के रूप में न होगा और इसी की विमलसूरि ने विस्तृत चरित के रूप में रचना की होगी (पृ० ६७) । बुल्के के अनुसार वाल्मीकिरामायण के पूर्व रामकथासम्बन्धी आख्यान प्रचलित थे । इसका आभास महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व के संक्षिप्त रामचरित से तथा अन्य निर्देशों से मिलता है । वे आख्यान आजकल अप्राप्य हैं इस प्रकार वाल्मीकिकृत रामायण रामकथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध होती है (पृ० २७) । वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि श्रीराम ने स्वयं कहा है कि सीते, तुम्हारे चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह है । तुम हमारे लिए वैसे ही प्रति- कूल प्रतीत होती हो जैसे नेत्ररोगी के लिए दीप-शिखा । कौन कुलीन पुरुष परगृहोषित नारी को अपने घर रखेगा । रावण के अङ्क में पड़ी हुई और उसके दुष्ट चक्षु से निरीक्षित तुम्हें पुनः कैसे ग्रहण किया जाय । दिव्यरूपा मनोहरा तुम्हें अपने गृह में प्राप्त करके रावण चिरकाल तक कैसे तुमसे दूर रह सका होगा—
१५६ रामायणमीमांसा पञ्चम "प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता । दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥ कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोुषिताम् । तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ॥ रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा । कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत् ॥ नहि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपणां मनोरमाम् । मर्षयत्यचिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम् ॥” (वा० रा० ६।११६।१७-२४) उक्त वचनों से श्रीसीता के चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह प्रकट किया गया है। सर्वत्र ही सन्देह शुद्धि की भूमिका होती है । श्रीराम के ही वचनों द्वारा यह स्पष्ट है कि सीता के प्रति उनको कोई सन्देह नहीं था । केवल संसार को विश्वस्त करने की दृष्टि से ही उन्होंने सीता को अग्निपरीक्षा के लिए अवसर दिया था । सीता के प्रति कुछ अन्य लोगों को भी सन्देह हो सकता था, पर सन्देह भिन्न वस्तु है, मत या धारणा अन्य वस्तु है । ईश्वर नहीं है, धर्म नहीं है, वेदप्रामाण्य नहीं है, यह मत नास्तिकता का है । सीता दुश्चरित्रा थी यह मत भी नास्तिकता का है । रामराज्य में वैसा होना असम्भव था, ईश्वर है या नहीं, धर्म है या नहीं, वेदप्रामाण्य है या नहीं, सीता का लङ्का में शीलरक्षण कैसे सम्भव हुआ ? यह शङ्का का स्वरूप है। शङ्का से ही जिज्ञासा, विचार, प्रमाण, पर्येषण, तत्त्वज्ञान एवं संशय- निवृत्ति होती है । पूर्वोत्तरमीमांसा, खण्डनखण्डखाद्य, न्यायकुसुमाञ्जलि आदि ग्रन्थों में उसी रीति से तत्त्वनिर्णय किया गया है । 'को हि वेद यद्यमुष्मिँल्लोके अस्ति वा न वा' कौन जानता है परलोक में कुछ है या नहीं, 'वयं ब्राह्मणाः स्मो वा न वा' हम लोग ब्राह्मण हैं या नहीं । इस प्रकार की शङ्काएँ अर्थवादरूप में यज्ञ-मण्डप में अतीकाश ( वातायन ) रखने के लिए और प्रवरानुमन्त्रणा के लिए की गयी हैं। वस्तुतः परलोक में संशय हो तो यज्ञादि में प्रवृत्ति तथा ब्राह्मणत्व में संशय होने से ब्राह्मणत्वादिमूलक कर्मों में प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। निष्कर्ष यह है कि वाल्मीकिरामायण आदि में लङ्का में रहने के कारण सीता के शील में शङ्का व्यक्त की गयी है। वह भी शुद्धि की भूमिका के रूप में । परन्तु तेरापन्थी तुलसी की अग्निपरीक्षा में कैसा भौंडा लोक-मत वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष या अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती । उनमें तो किसी सर्वज्ञ या योगज ऋतम्भरा प्रज्ञावाला परम आप्त ही प्रमाण हो सकता है, न कि कोई दूरस्थ तुकबन्दी करनेवाला । पूर्वोक्त कथनानुसार महर्षि वाल्मीकि ने योगजबल से जैसा दर्शन किया । उसके विपरीत किसी अन्य को कुछ भी कल्पना करने का किञ्चित् भी अधिकार नहीं है । अतः जिन दुराचारिणी या पतिता आदि शब्दों के प्रयोग में कोई प्रमाण नहीं है, उनका प्रयोग सर्वथा अनुचित ही है । माँ के लिए पिता द्वारा या विरोधी द्वारा दी गयी गालियों का पुत्र द्वारा अनुवाद भी पातक- जनक अत्यन्त ही अनुचित व्यवहार है । वैदिक आदर्शों के अनुसार ही वाल्मीकिरामायण में सीता के सामने आते ही राम ने वे शङ्काएँ व्यक्त की थीं जैसे कि कोई भी वैदिक पुरुष परगृहोषिता अपनी पत्नी के विषय में कर सकता था । श्रीसीता ने तत्काल ही अग्नि-प्रवेश कर अपने परम पवित्र चरित्र को प्रमाणित किया। ठीक इसके विपरीत तेरापन्थी तुलसी के जैन राम श्रीसीता के मिलने पर कुछ भी शङ्का नहीं करते। वे तो अयोध्या में राजगद्दी पर बैठने के बहुत दिनों बाद सीता के अन्तर्वत्नी होने के पश्चात् जनापवाद के द्वारा सीता को वनवास देने को प्रस्तुत होते हैं। जनापवाद भी वाल्मीकि के अनुसार बहुत मर्यादितरूप में आता है । सीता रावण द्वारा बलात् लङ्का ले जायी गयी । राक्षसों के पराधीन
अध्याय जैनमत में रामकथा १५७ अशोकवाटिका में रखी गयी । यदि राम ने ऐसी धर्षणा को सहन कर लिया तो अन्य लोगों के लिए भी वैसा सह्य हो सकेगा। पुरवासियों को लङ्का की अग्निपरीक्षा का ज्ञान नहीं था। राम चाहते तो उसी का प्रचार कराकर जन- भ्रम दूर कर सकते थे। पर वैसा करना एक सरकारी प्रचार ( प्रोपेगण्डा ) समझा जाता । सीता की शुद्धि का उल्लेख अब्भक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, परमाप्त, राज्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र महर्षि के द्वारा होने में ही महत्त्व है। इसी दृष्टि से महर्षियों के आश्रमों के सन्निधान में सीता को छोड़ा गया । श्रीराम के इस कार्य से नीति में बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी आदर हुआ है । “सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय ।” भाई-भतीजावाद का अत्यन्त उन्मूलन हुआ है । श्रीराम ने एक हजार वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत पालन- पूर्वक ब्रह्मात्मनिष्ठा के द्वारा परमार्थ तथा तपोवन में भावी सम्राट् के संस्कार, विद्या, शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था कर परमार्थ और स्वार्थ का समन्वय किया है । “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ॥” ( रा० मा० २।२५३।३ ) श्रीराम ने एक पत्नीव्रत के अनुसार सीता के वनवास के पश्चात् भी अन्य पत्नी का वरण नहीं किया । यज्ञों में काञ्चनी सीता को ही रखा जाता था । “काञ्चनीं मम पत्नीं च दीक्षायां ज्ञांश्च कर्मणि । अग्रतो भरतः कृत्वा गच्छत्वग्रे महायशाः ॥” ( वा० रा० ७।९१।२५ ) यहाँ श्रीराम ने आदेश दिया है कि महायशस्वी भरत मेरी दीक्षानिमित्ता काञ्चनी पत्नी और कर्म के विषय में विज्ञ महर्षियों को लेकर आगे चलें । यहाँ यह भी विचार है, यह समझना चाहिए कि यज्ञों में पति और पत्नी दोनों का सहाधिकार होता है, अतः पति-पत्नी दोनों ही यजमान होते हैं । “स्वामिनोऽग्नेर्देवतायाश्चशब्दात् कर्मणश्च प्रतिनिधिर्निवृत्तः ।” इस आपस्तम्ब सूत्र के अनुसार स्वामी, अग्नि तथा देवता का प्रतिनिधि नहीं होता । ऐसी स्थिति में मुख्य पत्नी ही यज्ञ में अपेक्षित होती है । काञ्चनी प्रतिमा सीता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती । तथापि वचनान्तरों के अनुरोध से कई परिस्थितियों में पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है । “यस्य भार्यान्यदेशस्था नेष्यते पतिनाथवा । अशक्ता प्रतिकूला वा तस्याः प्रतिनिधिक्रिया ॥” जिसकी भार्या अन्य देश में हो या पति को इष्ट न हो, असमर्थ या प्रतिकूल हो वहाँ पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है। “अन्ये कुशमयीं पत्नीं कृत्वा तु गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते यावज्जीवमनुव्रताः ॥ सौवर्णीं वा षोडशपलैः माषकैः षोडशैरपि ।”
१५८ रामायणमीमांसा पञ्चम “मृतायामपि भार्यायां वैदिकीं न त्यजेद् द्विजः । उपाधिनापि तत्कर्म यावज्जीवं समापयेत् ॥” ( विष्णु स्मृ० ) इत्यादि वचनों के अनुसार कुशमयी, सौवर्णी या षोडशमाषमयी पत्नी प्रतिनिधि के रूप में धर्मशास्त्र- सम्मत है । विशेषतः प्रकृत में तो श्रीराम की सौवर्णी पत्नी प्रतिनिधि नहीं है किन्तु देवता प्रतिमाओं के समान उसमें सीताबुद्धि ही थी, सादृश्यबुद्धि नहीं । भगवान् के संकल्प से और ऋषियों के आवाहनसामर्थ्य से उसमें ठीक सीताबुद्धि का ही उदय हुआ था। और उसके द्वारा पूर्णरूप से आज्यावेक्षण आदि पत्नीकर्म की निष्पत्ति होती थी । यही बात अन्य सर्गों में उक्त है । श्रीराम ने सीता से व्यतिरिक्त भार्या का वरण नहीं किया । प्रत्येक यज्ञ में पत्नी का कार्य करने के लिए काञ्चनी जानकी ही राम की पत्नी होती थी। उसी काञ्चनी सीता के द्वारा श्रीराम दस सहस्र वर्ष पर्यन्त वाजि- मेध, वाजपेय, अग्निष्टोम, अतिरात्र आदि बहु सुवर्णादि दक्षिणावाले महाधनसमृद्ध यज्ञों का अनुष्ठान करते रहे । “न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ दशवर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ॥” ( वा० रा० ७।९९।७-८ ) लोकवाद से भी राम को सीता के प्रति भ्रान्ति नहीं हुई । वे सर्वथा ही सीता को पवित्र मानते रहे हैं। लङ्का में अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में श्रीराम ने कहा था कि रावण के अन्तःपुर में दीर्घ काल तक सीता रही थी, अतः सीता की अग्निशुद्धिरूप पवित्रता अपेक्षित थी । बिना शोधन किये सीता का ग्रहण करने में दशरथात्मज राम कामात्मा एवं बालिश हैं, यह साधारण लोग कह सकते थे । अतः अग्निशुद्धि के लिए सीता के अग्नि-प्रवेश की मैंने अनुमति दी थी । सीता अनन्यहृदया हैं, मेरे में ही नित्य स्थिर होने के कारण वह अपने शील की रक्षा कर सकती है, ऐसा मैं जानता हूँ । अपने तेज से ही सीता पूर्ण परिरक्षित है । सीता जैसे अग्नि को शीतल कर सकती है वैसे ही रावण को भस्म भी कर सकती थी । तभी तो सीता ने कहा था, राम का आदेश न होने एवं तपस्या-रक्षा की दृष्टि से दशग्रीव, मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं करती हूँ— “असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥” ( वा० रा० ५।२२।२० ) महोदधि जैसे बेला का अतिक्रमण नहीं कर सकता वैसे ही रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । दुष्टात्मा रावण अप्राप्य दीप्त अग्निशिखा के समान मैथिली का मन से भी प्रधर्षण नहीं कर सकता था। रावण के अन्तःपुर में रहकर भी वह वैक्लव्य कातर्य को नहीं प्राप्त हो सकती थी । भास्कर की प्रभा के समान सीता मुझसे अभिन्न है । सीता तीनों लोकों में विशुद्ध है । आत्मवान् जैसे कीर्ति से रहित नहीं हो सकता वैसे मैं सीता से वियुक्त नहीं हो सकता— “अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावनमर्हति । दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥ बालिशो बत कामात्मा रामो दशरथात्मजः । इति वक्ष्यति मां लोको जानकीमविशोध्य हि ॥ अनन्यहृदयां सीतां मच्चित्तपरिरक्षिणीम् । अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥
अध्याय जैनमत में रामकथा १५९ इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा । रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ॥ न च शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम् । प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तमग्निशिखामिव ।। नेयमर्हति वैक्लव्यं रावणान्तःपुरे सती । अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ॥ विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा । न विहातुं मया शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ।।” ( वा० रा० ६।१२०।१३-१९ ) “प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसन्निधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥ लोकापवादो बलवान् येन त्यक्ता हि मैथिली । सेयं लोकभयाद् ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता ॥ परित्यक्ता मया सीता तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।” ( वा० रा० ७।९७।३,४ ) श्रीराम ने वाल्मीकि से कहा कि पहले ही लङ्का में देवताओं के सन्निधान में सीता का शपथ हो चुका है । तभी सीता राजभवन में प्रविष्ट हुई थी । फिर भी लोकापवाद के कारण, सीता निष्पाप है, यह समझते हुए भी, सीता का वन में त्याग किया गया है । आप क्षमा करें । रामायण से ही यह भी सिद्ध है कि रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । उसे इस सम्बन्ध में अनेक प्रकार के शाप दिये गये थे कि यदि इतः परं किसी अकामा स्त्री का कामभाव से स्पर्श करेगा तो तत्क्षण भस्म हो जायगा । रावण ने कुबेर-पुत्र नलकूवर की निमन्त्रिता पत्नी रम्भा का बलात् घर्षण किया था । तभी नलकूवर ने शाप दिया था कि यदि किसी भी अकामा स्त्री को कामार्त होकर धर्षित करेगा तो उसी क्षण उसका मस्तक सप्तधा विशीर्ण हो जायगा— “उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम् । तस्मात्स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति ।। यदा ह्यकामां कामार्तो धर्षयिष्यति योषितम् । मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥ श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् । नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत् ।।” (वा० रा० ७।२६।५५-५९) रावण ने भी कहा है एक बार पुञ्जिकस्थला अप्सरा पितामह के भवन जा रही थी । तब मैंने बलात् सम्भोग किया था । इसपर ब्रह्मा ने शाप दिया था कि आज से तुम यदि बलात् अन्य नारी का भोग करोगे तो तुम्हारे मूर्धा के सौ टुकड़े हो जायेंगे— “अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥
१६० रामायणमीमांसा पञ्चम इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव तां । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ॥” ( वा० रा० ६।१३।१४,१५ ) वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा तेरापन्थी जैन आचार्य तुलसी की अग्निपरीक्षा नामक पुस्तक पर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने हेतु जबलपुर उच्चन्यायालय में उपस्थापित याचिका में अनेक तर्क दिये गये हैं। किन्तु उनमें से एक भी तर्क ऐसा नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि जैन रामकथा वैदिक रामकथा के बाद की नहीं है और उसे अपने मत के लोकप्रचार के लिए रूपान्तरित नहीं किया गया है। उच्चन्यायालय में दायर अर्जी में यह स्वीकार किया गया है कि जैन रामकथा का सबसे प्राचीन ग्रन्थ विमलसूरि द्वारा प्राकृत में रचित पउमचरियं है। इसका रचनाकाल महावीर के स्वर्गवास के बाद ५३० वाँ वर्ष है। जो लगभग ईसवी सन् का आरम्भ काल है। स्वयं वादी ने भी इसे विक्रम संवत् ६० की कृति कहा है। वैदिक रामकथा का प्राचीनतम ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण है। जिसे आधुनिक इतिहासकारों ने भी ईसा पूर्व छठी शती की रचना माना है। वैसे सत्य तो यह है कि यह राम की समकालीन कृति है और अत्यन्त प्राचीन है। यह कहा जा चुका है कि यह काव्य संस्कृत भाषा में है। इसका नाम पौलस्त्यवध और रामचरित है। किन्तु इसका प्रतिपाद्य सीताचरित ही है वाल्मीकिरामायण के ही— “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् । पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः ॥” ( वा० रा० १।४।७ ) इस पद्य से यह तथ्य स्पष्ट है। यह इसलिए भी मान्य है कि रामायण का निर्माण निर्वासित सीता के वाल्मीकि आश्रम पहुँचने के पश्चात् आरम्भ होता है और सीता के करुण क्रन्दन से जनित महर्षि का शोक ही क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन से अधिक बढ़ जाता है और वही उच्छलित होकर निम्नलिखित श्लोक के रूप में प्रकट होता है— “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” स्वयं रामायण में कहा गया है— “शोकः श्लोकत्वमागतः ।” ( वा० रा० १।२।४० ) शोक ही श्लोक बन गया यह प्रक्षिप्त नहीं है, क्योंकि कालिदास और आनन्दवर्धन ने इस वाक्य को इसी रूप में अपनाया और उद्धृत किया है— “निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ।” ( रघु० १४।७० ) शोकः श्लोकत्वमागतः । ( ध्वन्यालोक ४।५ ) इस प्रकार भगवती सीता के विषय में भी यही रामायण भारतीय साहित्य का आदि स्रोत है। इसी दृष्टि से कालिदास ने इसे ‘कविप्रथमपद्धति’ बतलाया है। रघुवंश १५।३३ में इसे वेदों के साथ अध्येय बतलाया है। वाल्मीकीय रामायण की कथा और घटनाओं को वास्तविक और सब प्रकार से सत्य इतिहास भी स्वीकार किया गया है। ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्येक घटना का साक्षात्कार कर ही वाल्मीकि ने इसे लिखा है। इसलिए नैमिषारण्य में रामाश्वमेध के समय उपस्थित अयोध्या की जनता में रामायण का गान होने पर उसके अयोध्याकाण्ड की प्रत्येक घटना को प्रत्येक अयोध्यावासी ने सर्वथा यथार्थ माना है।
अध्याय वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६१ “साङ्गं च वेदमध्याप्य किञ्चिदुत्क्रान्तशैशवौ । स्वकृतिं गापयामास कविप्रथमपद्धतिम् ॥” यही कारण है कि परवर्ती सभी वैदिक रामकथाएँ उस रामायण के अनुरूप रहने पर ही प्रामाणिक मानी जाती हैं । जहाँ कहीं आंशिक अन्तर उपस्थित हुआ है वहाँ उस अंश में इसी रामायण को प्रमाण माना गया है । महाभारत से लेकर पद्मपुराण तक रामकथा के विषय में इसी रामायण को मूलमन्त्र माना गया है और उनकी भिन्न योजनाओं की इसके अनुरूप ही व्याख्या की गयी है (नीलकण्ठ) । इस रामायण (वाल्मीकि) में राम को ईश्वर और महासती सीता को उनकी महाशक्ति स्वीकार किया गया है । युद्धकाण्ड की ब्रह्मा-स्तुति (सर्ग १२०) इसका स्पष्ट प्रमाण है । इसी आधार पर सनातन स्थान सर्वातिशायी है । जैन-परम्परा इन दोनों तथ्यों को स्वीकार नहीं करती । उसमें न ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है और न यज्ञों पर ही कोई आस्था रखी जाती है । वे वेदों को प्रमाण नहीं मानते । वाल्मीकिरामायण में इन दोनों तथ्यों की प्रतिष्ठा देख उसकी कथा को जैन-सम्प्रदाय ने अपने अनुरूप गढ़ा और एक नवीन झूठी रामकथा को जन्म दिया । बौद्धों ने भी ऐसा ही किया । इस परिवर्तन को तबतक सहा जा सकता था जबतक इसमें अधिक्षेप और अपमान की भाषा का उपयोग नहीं हुआ था । किन्तु जब यह परिवर्तन इस निम्नस्तर पर जा पहुँचा तो सनातनधर्मवलम्बियों की भावनाओं को ठेस पहुँची । अग्निपरीक्षा इसका प्रमाण है । इसमें राम और सीता को जिस स्तर का बतलाया गया है वह उनका अपमान ही है । सीता को तो बाद में महासती बतलाया भी गया किन्तु राम को उनकी सनातनोचित प्रतिष्ठा इस ग्रन्थ में प्रदान नहीं की गयी । सीता को भी जिन शब्दों से सम्बोधित किया गया है वे शब्द पूर्वपक्ष के रूप में भी ग्राह्य और प्रयोगयोग्य नहीं हैं । प्राचीन जैनपुराणों ने भी ऐसा नहीं किया है। इस ग्रन्थ में राम और सीता को णमुक्कार मन्त्र का जप करते हुए जैनधर्म में दीक्षित बतलाया गया है। यह वैसा ही है जैसा महावीरस्वामी को वाममार्ग में दीक्षित बतलाया जाय या मुहम्मदसाहब को वैदिक धर्म में । निश्चित ही राम की महती प्रतिष्ठा का उपयोग जैन-सम्प्रदाय ने अपने पक्ष में करना चाहा है, किन्तु तेरापन्थी आचार्य तुलसी ने उससे आगे बढ़कर पूर्वपक्ष के रूप में राम और सीता की प्रतिष्ठा को सांकेतिक ढङ्ग से उसी प्रकार नीचे गिराना चाहा है जिस प्रकार रावणपन्थी कुछ कर रहे हैं । राम पर बहुपत्नीत्वाक्षेप सर्वथा निराधार आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रामायण ही श्रीराम-चरित्र के सम्बन्ध में परम प्रमाण है । भगवान् वेदव्यास द्वारा पुराणों में तथा अन्यान्य रामायण, आनन्दादि अन्य रामायणों तथा सम्प्रदायान्तर अथवा देशान्तर में प्राप्त राम-कथाओं को तथा हिन्दी में रचित रामायण और रामचरितमानस आदि ग्रन्थों को मूल आधार के रूप में वाल्मीकिरामायण का ही आश्रयण करना पड़ता है । जैनमुनि की अग्निपरीक्षा पुस्तक को देखने में पहले यह सन्देह होता था कि जैनमुनि ने उक्त पुस्तक में जगज्जननी सीता के लिए जिन अपशब्दों का प्रयोग किया है वे सब पूर्वपक्ष के विन्यासरूप हों आगे उनका उत्तर द्वारा खण्डन ही इष्ट हो । कानून में भी सन्देह का लाभ अभियुक्त को देना उचित है, अभियोक्ता को नहीं । इसी कारण जैन आचार्य तुलसी श्रीसीता के चरित्र के प्रति श्रद्धा और भक्ति से प्रेरित हो ऐसे दुर्वचनों का प्रयोग केवल उनके निराकरणार्थ ही करते हों ऐसा सन्देह हो सकता था और उसका लाभ उनको दिया जाना चाहिये था । किन्तु जब उनके आगे के प्रयास को देखा जिसमें उन्होंने अपनी स्थिति की पुष्टि के लिए वाल्मीकि- रामायण के आधार पर मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को बहुपत्नीसम्पन्न अथवा परस्त्रीरमण करनेवाला सिद्ध करने