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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

४२८ रामायणमीमांसा त्रयोदश नहीं है। लोक में कोई व्यक्ति पुत्र-प्राप्ति के लिए अनेक महात्माओं और अनेक देवताओं की सेवा करता है, अनेक व्रत और अनेक तपस्याएँ भी करता है सभी की कृपा का फल एक हो सकता है। इसी प्रकार जलन्धर रावण हुआ या हरगण रावण और कुम्भकर्ण हुए या जय और विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए, इस सम्बन्ध में कल्पभेद से समाधान सम्भव है। रामचरितमानस का भानुप्रताप भी कल्पभेद से रावण हुआ था। शापवश जय और विजय के तीन जन्म होने प्रसिद्ध हैं। जैसे अनेक सात्त्विकी शक्तियों का विष्णु एवं सीता में सायुज्य सम्भव है वैसे ही अनेक राजस और तामस शक्तियों का रावण में भी सायुज्य सम्भव ही है अर्थात् जब जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए तब उन्हीं में जलन्धर, भानुप्रताप और उनके साथियों का सम्मिलितरूप से अवतार मानना श्रुतार्थापत्ति प्रमाण सम्मत ही है। “पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते” यहाँ दिवा भोजन न करके भी दृष्ट पीनता की उपपत्ति के लिए जैसे अर्थापत्ति द्वारा रात्रिभोजन की कल्पना होती है वैसे ही प्रामाणिक श्रुत अर्थ की उपपत्ति के लिए भी उपपादक की कल्पना की जाती है। उक्त पुराणादि भारतीय परम्परा में परम प्रामाणिक हैं ही। उनके लेखक व्यास सर्वज्ञकल्प थे, अतः उनकी रचनाओं में भविष्य वृत्तों का वर्णन भी हुआ है। किसी अर्वाचीन घटना के वर्णनमात्र से पुराणों की अर्वाचीनता नहीं सिद्ध हो जाती है। अद्भुतरामायण के अनुसार लक्ष्मी की परिचारिकाओं द्वारा नारद का अपमान हुआ था, अतः नारद के शाप के अनुसार राक्षसों के यहाँ लक्ष्मी के जन्म लेने की कथा का भी समन्वय हो जाता है, क्योंकि सीता की अन्य शक्तियों के समान ही लक्ष्मी का भी अभेद है। नारद श्रीबुल्के के अनुसार “प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था, किन्तु परवर्ती प्रचलित रामायण से लेकर परवर्ती राम-कथाओं की यह विशेषता है कि उनमें नारद का महत्त्व बढ़ता गया है।” परन्तु यह उनका नितान्त विभ्रम है। उनका प्रामाणिक रामायण ही वस्तुतः अप्रामाणिक है, क्योंकि उसका नाम निशान आज तक दुनियाँ में कहीं नहीं है। वर्तमान परम्पराप्राप्त वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है। इसी पर तीर्थ, कतक, भूषण, रामाभिरामी आदि प्रामाणिक टीकाएँ हैं। आस्तिक लोग इसी का पाठ करते हैं। बुल्के के सभी तर्क निःसार हैं। उनके अनुसार बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड दोनों ही अप्रामाणिक रामायण हैं। पाँच काण्डों में भी अवतारवर्णन तथा सीता को लक्ष्मी बतलानेवाले सब अंश प्रक्षेप ही हैं। उनकी प्रामाणिक रामायण उनके सिवा किसी भी आस्तिक को मान्य नहीं है। वर्तमान रामायण का प्रथम सर्ग मूलरामायण के नाम से प्रसिद्ध है। वह वाल्मीकि-नारद-संवादरूप है। बुल्के की भ्रान्त दृष्टि में वह सब प्रक्षेप ही है। उत्तरकाण्ड की नारद-सम्बन्धित कथाओं को भी प्रक्षेप कहना भ्रान्ति ही है। (वा० रा० ७ । सर्ग २०,२१) के अनुसार नारद ने रावण को यम पर आक्रमण करने को उकसाया नहीं, किन्तु मनुष्यलोक को बाधित नहीं करना चाहिए। देव, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व तथा राक्षसों द्वारा तुम अवध्य हो, तुम्हें मनुष्य-लोक को क्लेश नहीं पहुँचाना चाहिए। सदा ही श्रेयःप्राप्ति में संमूढ़, नाना प्रकार के बड़े-बड़े दुःखों तथा बुढ़ापा एवं विविध व्याधियों से पीड़ित, सदा ही अनिष्टों से पूर्ण, क्षुधा-पिपासा से एवं विषाद-शोक से व्याप्त मनुष्यलोक को मत सताओ। यदि तुम्हें लड़ना ही है तो यम पर आक्रमण करो, क्योंकि अन्त में सबको ही यम के वश में होना पड़ता है। यम के जीत लेने से सबपर विजय अपने आप हो जायगी। “किमर्थं वध्यते तात त्वयाऽवध्येन दैवतैः । हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥ देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः ॥ नित्यं श्रेयसि संमूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् । हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥” (वा० रा० ७।२०।७-९) ।

अध्याय बालकाण्ड ४२९ ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का रहस्योद्घाटन (सर्ग ७४) भी ठीक ही है। वाल्मीकिरामायण पश्चिमो- त्तरीय पाठ (६।२७।७-४१) के अनुसार नारद द्वारा राम को उनके नारायणत्व का स्मरण दिलाकर गरुड़ को बुलाने का परामर्श देना तथा वाल्मीकिरामायण (गो० पा० ६।६० पश्चिमो० पा० ६।४१) के अनुसार कुम्भकर्ण द्वारा यह कहा जाना कि नारद ने मुझे विष्णु अवतार द्वारा रावण-वध की योजना बतायी थी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार नारद के द्वारा प्रेषित रावण श्वेतद्वीप जाकर वहाँ की स्त्रियों द्वारा पराजित होता है इत्यादि सभी नारद- सम्बन्धी घटनाएँ ऋषि-स्वरूप के अनुरूप तथा प्रामाणिक एवं पुराणों के संगत भी हैं। बुल्के भारतीय शास्त्रों एवं पुराणों से अपरिचित हैं। इसी लिए उन्हें विविध कार्यों में नारद का हस्तक्षेप अस्वाभाविक्स प्रतीत होता है। परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से नारद वसिष्ठ के समान ही एक महान् आधिकारिक पुरुष हैं। जगत्कल्याणार्थ विविध क्षेत्रों में इसी लिए उनकी प्रख्याति उपलब्ध होती है। अतएव वे वाल्मीकि के हृदयपरिवर्त्तन के भी कारण बनते हैं। जयन्त को राम के पास भेजना सन्त-हृदय के अनुकूल ही था। “नारद देखा विकल जयंता । लागि दया कोमलचित्त संता ॥” (रा० मा० ३।१।५) नारद द्वारा रावण को सीता-हरण के लिए उकसाना भी देव-कार्य के लिए उपयोगी था। श्रीमद्भागवत में भी कंस को कृष्ण-जन्म का भेद बतलाकर नारद ने उसे मृत्यु की ओर बढ़ने की ही प्रेरणा दी है। अतएव तुलसीदास ने उन्हें एक आदर्श सन्त और रामभक्त के रूप में ही चित्रित किया है और वे बार-बार अयोध्या आया करते थे। “बार-बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम कर गावहिं ॥” (रा० मा० ७।४१।२) अतः बुल्के का यह निष्कर्ष भी अशुद्ध है कि "प्रामाणिक रामायण में भले ही नारद का नाम तक न आया हो, किन्तु परवर्ती कथाओं में हमें पग-पग पर नारद का दर्शन होता है", क्योंकि वस्तुतः प्रामाणिक रामायण का सूत्रपात ही नारद के द्वारा ही होता है। इसी लिए उसका प्रसिद्ध नाम ही मूलरामायण है। राम का बाल-चरित ३७५ वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ के अर्वाचीन प्रक्षेप के अनुसार राम तथा उनके भाइयों की जन्मतिथि चैत्र शुक्ल नवमी बतायी गयी है", परन्तु क्या वे अपनी तथाकथित प्रामाणिक रामायण के अनुसार कोई तिथि बतला सकते हैं ? अथवा क्या प्रामाणिक रामायण के राम का जन्म ही नहीं हुआ ? सामान्य चरितनायक की भी जन्मतिथि का वर्णन आवश्यक होता है तब क्या महर्षि वाल्मीकि जिन राम का विस्तृत चरित्र वर्णन करने जा रहे हैं, उनके जन्म और जन्मकाल का वर्णन न करते, यह संभव है। वस्तुतः बुल्के भ्रान्ति एवं दुरभिसन्धि से ही रामजन्म के काल-वर्णन को प्रक्षेप कहते हैं। अतः वाल्मीकिरामायण ( १।१८।८-१५) श्लोकों में राम एवं उनके भाइयों के जन्म का वर्णन है और उन श्लोकों पर सभी टीकाकारों ने टीकाएँ की हैं। वे टीकाकार भी प्रामाणिक ही हैं। अध्यात्मरामायण ( १।३), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड अ० २६९), कृत्तिवासीय रामायण (१।४२), रामचरितमानस (१।१९१), भावार्थरामायण आदि में वही राम आदि के जन्म का समय वर्णित है। राम-जन्म के समय अलौकिक घटनाओं का होना भी स्वाभाविक ही है। अतएव पउमचरियं के अनुसार भी राम की माता ने सिंह, सूर्य और चन्द्रमा को देखा था एवं सुमित्रा ने कमळधारिणी लक्ष्मी को देखा था। कालिदास ने रघुवंश (१०।६०-६४) में लिखा है कि रामादि के जन्म के पूर्व दशरथ की रानियों को ऐसे स्वप्न दिखाई देते थे कि कमल, खड्ग, गदा, धनुष और चक्र लिए कोई बौना-सा पुरुष हमारी रक्षा कर रहा है; गरुड़ हमें आकाश में उड़ा- कर ले जा रहे हैं, लक्ष्मी हाथ में कमल का पङ्खा लेकर हमारी सेवा कर रही हैं एवं सप्तर्षिगण वेदपाठ करते हुए

४३० रामायणमीमांसा त्रयोदश हमारी उपासना कर रहे हैं। अपनी रानियों से इन स्वप्नों को सुनकर दशरथ प्रसन्न हुए और समझ गये कि मैं जगद्गुरु का पिता बनने जा रहा हूँ । बुल्के का यह कहना कि कालिदास ने पउमचरियं से प्रभावित होकर ऐसा लिखा है अशुद्ध है, क्योंकि महाकवि कालिदास विक्रम की सभा के विद्वान् थे । वे पउमचरियं के निर्माण से प्राचीनकालिक हैं। दूसरे वे वैदिक विद्वान् थे । वे वेद, रामायण, महाभारत, पुराणों और उपपुराणों के आधार पर ही रघुवंश महाकाव्य लिखने में प्रवृत्त हुए थे । वेद, ईश्वर तथा वैदिक धर्म-कर्मविरोधी जैनों और बौद्धों का अनुसरण करना उन्हें कदापि अभीष्ट नहीं था । महाकवि के अनुसार बालक के तेज से सूतिका-गृह के दीपकों की ज्योति मन्द पड़ गयी तथा उस समय संसार के सारे दोष भाग गये, चारों और गुण ही गुण फैल गये । मानो भगवान् विष्णु का अनुसरण करता हुआ स्वर्ग भी पृथ्वी पर उतर आया हो— “अन्वगादिव हि स्वर्गो गां गतं पुरुषोत्तमम्” ( रघुवंश १०।७२ ) । उसी समय लङ्का में अपशकुन होने लगे । रावण के मुकुटों से कुछ मणियाँ पृथिवी पर गिर पड़ीं मानो राक्षसों की लक्ष्मी अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही हो । ठीक ही है राम परब्रह्म थे, ज्योतियों के भी ज्योति थे—‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः ।", "सूर्यास्यापि भवेत् सूर्यः ।" फिर उनके उदय होने पर दीपक आदि की ज्योतियों का मन्द पड़ जाना उचित ही था । जैसे सूर्य के उदय से तमिस्रा रात्रि एवं उसके दोष भाग जाते हैं वैसे ही सकलगुणधाम राम के प्राकट्य से दोषों का पलायन करना भी उचित ही था । देवताओं की सौभाग्यलक्ष्मी के प्रकट होने पर रावणादि की सौभाग्यलक्ष्मी का अश्रुनिर्मोचन भी ठीक ही था । कृत्तिवासीय रामायण के अनुसार रावण का मुकुट भूमि पर गिर पड़ा । आकाशवाणी से रावण को यह विदित हो गया कि विष्णु का अवतार हो गया है और रावण ने उन्हें मारने के लिए शुक और सारण को भेजा । वे शिशु को प्रणाम करते हैं ओर भक्ति का वरदान पाकर लङ्का लौट जाते हैं । मूलप्रोक्त सामान्य के अविरुद्ध विशेष को स्वीकार करने में कोई बाधा न होने से ऐसे अन्य अंश भी मान्य हो हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार कौशल्या राम को विष्णु के ही रूप में देखती हैं— “नीलोत्पलदलश्यामः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।” और उनकी स्तुति करती है इसपर राम अपनी माता को उनके पूर्वजन्म की तपस्या तथा वरप्राप्ति का स्मरण दिलाकर बालक का रूप धारण कर लेते हैं । बुल्के कहते हैं, "अध्यात्मरामायण में श्रीमद्भागवत के अनुकरण पर यह उल्लेख है। अध्यात्मरामायण के अनुसार अन्य ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख हुआ है", परन्तु उनका यह कथन भी अशुद्ध है । वस्तुतः “प्रीयमाने जगन्नाथं सर्वलोकनस्कृतम् । कौशल्याऽजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुक्तम् ।।" ( वा० रा० १।१८।१० ) इस श्लोक के द्वारा भी यह सब सूचित ही किया गया है, इसलिए रामाभिरामी तिलक टीका में स्पष्ट कहा गया है— 'तेनादौ प्रादुर्भावसमये मायाविराड्रूपस्य दर्शनमेव ततस्तद्रूपदर्शनविस्मयात्तया नमस्कृतः सन्मायया बालभावं दधाविति सूचितम् ।" अर्थात् 'जगन्नाथं सर्वलोकनस्कृतम्' इससे ही यह सूचित होता है कि श्रीराम जगन्नाथ हैं, सर्वलोकनस्कृत हैं । कौशल्या ने विराट्रूप में उन्हें देखा और नमस्कार किया एवं प्रार्थना की कि आप शिशुरूप में ही प्रकट हों । इसपर राम बालकरूप में प्रकट हुए । इसी सूचित अर्थ का पद्मपुराण ( उत्तरखण्ड- २६९।८० ) में वर्णन है । पद्मपुराण भी आर्ष ग्रन्थ ही है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रामचरितमानस, तत्त्वसंग्रहरामायण आदि में सब ने इन्हीं आर्ष प्रमाणों पर वैसा उल्लेख किया है । रामचरितमानस के अनुसार काकभुशुण्डि और शिव दोनों मनुष्य का रूप धारण कर रामजन्म-महोत्सव के समय अयोध्या आये थे, यह ठीक ही

अध्याय बालकाण्ड ४३१ है। शिव, भुशुण्डि, याज्ञवल्क्य तथा भरद्वाज की परम्परा के अनुसार ही रामचरित का आविर्भाव हुआ है। कृष्ण भगवान् ने विराट् रूप अर्जुन को दिखलाया था (गी० अ० ११) । यशोदा को कृष्ण ने अपने मुख में ब्रह्माण्ड दिखाया था, रामकथाओं में भी वैसा उल्लेख है। बुल्के इसे भी अनुकरण और प्रक्षिप्त मानते हैं। इन सब बातों का एक ही मूल कारण है कि वे पद्मपुराण आदि को आधुनिक और काल्पनिक मानते हैं; परन्तु यह उनका नितान्त भ्रम है। रामलिङ्गामृत और रामचरितमानस में ही नहीं पद्मपुराण (उत्तरखण्ड १६९।८) के अनुसार भी राम ने अपने को विष्णुरूप में प्रकट करते हुए अपने विश्वरूप का भी दर्शन कराया था; अतएव नानापुराणनिगमागमानुगामी तुलसी- दास ने भी उसका उल्लेख किया है— "लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।" (रा० मा० १।१९१।१) "दिखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड । रोम रोम प्रति राजहि कोटि-कोटि ब्रह्मांड ।।" (रा० मा० १।२०१) इसी तरह परशुराम, हनुमान् तथा भुशुण्डि को भी भगवान् का दिव्य रूप दिखाना सङ्गत है। भगवान् राम की बाल-लीला या अन्य लीलाओं पर कृष्ण-लीलाओं का प्रभाव मानने का अर्थ यह होता है कि वैसी वस्तुस्थिति नहीं है, किन्तु भक्तों ने वैसी कल्पना कर ली है, परन्तु यह अनुकरणशील (नकलची) कवियों के सम्बन्ध में भले ही कहा जा सके, किन्तु व्यासादि कवियों तथा तुलसीदासादि सन्तों के सम्बन्ध में ऐसा कहना साहसपूर्ण पाप ही है। धीरोदात्त राम में भी अवस्थानुरूप चापल्य संभव ही है। राक्षसों का आक्रमण भी अस्वाभाविक नहीं है, अतः संहिताओं में वैसा वर्णन स्वतन्त्र ही समझना चाहिये। किंबहुना बहुत सी बातें तो प्राकृत बालकों में भी कृष्ण जैसी ही मिलती है "बबन्ध प्राकृतं यथा।" फिर, राम में वैसी बात न हुई होगी यह कैसे कहा जा सकता है। ३७७ वें अनु० में वाल्मीकिरामायण में वसिष्ठ द्वारा नामकरण के अवसर पर राम तथा लक्ष्मण के विषय में कहा गया है— "रामस्य लोकरामस्य" (वा० रा० १।१८।२९) लोक को रमण करानेवाले राम हैं। "लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः" (वा० रा० १।१८।२८) "लक्ष्मणो लक्ष्मिसंपन्नः" (वा० रा० १।१८।३०)। लक्ष्मीवर्धन या लक्ष्मीसम्पन्न ही लक्ष्मण हुए हैं। अध्यात्मरामायण में भरत और शत्रुघ्न के भी सम्बन्ध में लिखकर न्यूनता की पूर्ति ही की गयी है— "रमणाद्राम इत्यपि । भरणाद्भरतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् । शत्रुघ्नं शत्रुहन्तारमेवं गुरुरभाषत ।। (अध्या० रा० १।३।४०,४१) पद्मपुराण में त्रिभुवनाभिरामता राम शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त कहा गया गया है और रूपशौर्यादि लक्ष्मी की योग्यता को लक्ष्मण शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त कहा गया है। दूसरे भाइयों के सम्बन्ध में भी कहा गया है— "भवं भारात्तारयतीति भरतः । शत्रून् हन्तीति शत्रुघ्नः ।।" (पद्मपु० पातालखं० ११२।३३,३४) । अर्थात् संसार को भार से तारनेवाले भरत हैं और शत्रुहनन करनेवाले शत्रुघ्न हैं। पद्मपुराण (उ० खं० अ० २६९) में वसिष्ठ द्वारा राम का जातकर्म सम्पन्न होता है। केवल राम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नाम का कारण बताया गया है। "श्रियः कमलवासिन्या रमणोऽयं महाप्रभुः । तस्माच्छ्रीराम इत्यस्य नाम सिद्धं पुरातनम् ॥७४॥"

४३२ रामायणमीमांसा त्रयोदश कमलवासिनी श्री के यह रमण ( पति ) हैं अतएव श्रीराम इनका पुरातन नाम है। लक्ष्मण को 'शुभलक्षण' और शत्रुघ्न को देवशत्रुतापक कहा गया है। बुल्के को इनमें परस्पर विरोध दिखता है; परन्तु तुलसीदास तो सबका समन्वय और सार संकलन करते हुए कहते हैं— “सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक विश्रामा ॥ विश्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई ॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन वेद प्रकासा ॥” ( रा० मा० १।१९६।३,४) । “लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार । गुरु वसिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार ॥” ( रा० मा० १।१९७ ) । बुल्के ३९७ वें अनु० में कहते हैं “अध्यात्मरामायण में राम की नटखटी, माखनचोरी, बरतनों का फोड़ना आदि स्पष्टतः भागवतपुराण पर निर्भर है,” परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि बालस्वभावसुलभ ऐसी अनेक लीलाएँ राम में भी संभव ही हैं। ईसा की बहुत सी घटनाएँ बुद्ध जैसी हैं तो क्या बुल्के यह मानते हैं कि वे सब बुद्धचरित्र पर ही निर्भर हैं ? इसी तरह पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।३९-४६ ) के अनुसार एक ब्रह्मराक्षस वात्या का रूप धारण कर आता है और राम को गिरा कर मूच्छित कर देता है। वसिष्ठ मन्त्र पढ़कर राक्षस को शापमुक्त करते हैं। ब्रह्मराक्षस बतलाता है कि मैं पूर्वजन्म में वेदगर्वित ब्राह्मण था । परधन हथियाने के कारण ब्रह्मराक्षस बन गया। पद्मपुराण ( गौड़ीय पातालखण्ड अ० १५ ) के अनुसार बालक राम एक पुष्वनिर्मित धनुष से एक राक्षस को, जो मृग के रूप में आया था, मार डालते हैं। भुशुण्डिरामायण में भी रावण द्वारा राम को मारने के लिए भेजे गये अनेक राक्षसों को राम मार डालते हैं। दशरथ राम को गुप्त स्थान पर भेज देते हैं। सरयूपार गोपप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित एवं उनकी स्त्री माङ्गल्या राम का पालन-पोषण करते हैं। कृत्तिवासरामायण में अनेक राक्षस रामभक्त बन जाते हैं। बुल्के की भ्रान्त दृष्टि में यह सब भागवत या कृष्ण-कथा का ही प्रभाव है, परन्तु यही बात वे ईसा के सम्बन्ध में मानने को तैयार न होंगे। भुशुण्डि ३८१ वें अनु० में भुशुण्डि के सम्बन्ध में बुल्के योगवासिष्ठ के अनुसार यह तो मानते हैं कि पिता के कहने से वे सुमेरु पर्वत पर निर्विकार एवं चिरजीवी होकर रहे (निर्वा० प्रकरण १४।२४ ) । परन्तु वे कहते हैं वहां उनके पूर्वजन्म की कथा तथा रामभक्ति का उल्लेख नहीं है। वस्तुतः यह कहना बुल्के का ठीक नहीं, क्योंकि यह आवश्यक नहीं होता कि किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में एक ही स्थान में सब कथाएँ वर्णित की जायँ । रामचरितमानस में अपनी परम्परा के अनुसार वे पूर्व काल में अयोध्यावासी शूद्र थे । गुरु का सत्कार न करने से वह शिव-शाप से सर्प हो गये । बाद में वह गुरु एवं शिव की कृपा से सगुण राम के उपासक बन गये । लोमश ऋषि आदि के शाप से उन्हें काक-योनि की प्राप्ति हुई । इतना ही क्यों काकभुशुण्डि ने शिवजी के सङ्ग राम-जन्म के उत्सव में अयोध्या जाकर भगवान् की लीलाओं का रसास्वादन किया । सत्योपाख्यान में ही नहीं रामचरितमानस में भी राम को शष्कुली खाते देखकर काकभुशुण्डि को राम के नारायण होने में सन्देह होता है और वे परीक्षार्थ राम के हाथ से शष्कुली लेकर भागते हैं, परन्तु राम की भुजा उनका पीछा करती है । रामचरितमानस के अनुसार वे ब्रह्माण्ड के ससावरण का भी भेद कर भागे परन्तु वे राम की भुजा को अपने पास ही देखते रहे ।

अध्याय बालकाण्ड ४३३ “सप्तावरन भेद करि जहां लगे गति मोरि । गयउ तहां प्रभु निरखि व्याकुल भयउ बहोरि ॥” (रा० मा० ७।७९ ) भयभीत होकर उन्होंने आँखें बन्द कर लीं और अपने को अयोध्या में पाया । राम उनके सामने हँसते हुए खड़े रहे । भुशुण्डि ने मुख में प्रविष्ट होकर भीतर बहुत से ब्रह्माण्ड देखे । इस तरह उनका मोह दूर हुआ । उक्त कथा चतुविंशत्साहस्रीसंहितारूप रामायण में यद्यपि नहीं मिलती है तो भी इसे मिथ्या या कल्पनामात्र नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह विशेष कथा सामान्य कथा से अविरुद्ध ही है। इसी प्रकार बालक राम से हनुमान् की मित्रता का उल्लेख भी रामचरितमानस के क्षेपकों तथा विश्रामसागर के २० वें संस्करण सन् १९५९ ई० पृ० ४१८ में वर्णित है । शिवजी मदारी बनकर हनुमान् बन्दर को लेकर अयोध्या आते हैं । राम बन्दर को देखकर उसपर मुग्ध हो जाते हैं । मदारी बन्दर को अयोध्या में ही छोड़ जाता है । हनुमान् राम के साथ रहकर उनकी सेवा और मनोरञ्जन करते हैं और बाद में राम उन्हें किष्किन्धा भेज देते हैं । वस्तुतः सनातनधर्मी आस्तिकों की प्रामाणिक दृष्टि के अनुसार ईश्वर अनादि, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान् है । उसी का अवतार श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के रूप में होता है । ईश्वर की सभी लीलाएँ नित्य हैं । उपासकों को उन लीलाओं का उपासना के प्रभाव से साक्षात्कार होता है । उसी दृष्टि से कई अपूर्व लीलाओं की भी अनुभूति होती है । इसी दृष्टि से श्रीभागवत में अनुक्त भी अनेक लीलाओं का वर्णन सूरदास, हरिदास, हरिवंश, ध्रुवदास आदि भक्तों ने किया है । इसी तरह रामसम्बन्धी भी अनेक लीलाओं का वर्णन समझना चाहिये । प्रारम्भिक कृत्य वाल्मीकिरामायण ( १।१८।३१ ) के अनुसार राम मृगया खेलने जाते थे तो लक्ष्मण धनुष लेकर उनके साथ जाते थे— “यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः । अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन् ॥” ( वा० रा० १।१८।३१, ३२ ) इस सामान्य वर्णन का विशेष अध्यात्मरामायण आदि से समझना चाहिये । अध्यात्मरामायण ( १।३। ६२, ६३ ) के अनुसार राम और लक्ष्मण नित्य प्रति दुष्ट पशुओं का शिकार करते थे । मानस ने यह भी विशेष बताया कि— “जो मृग राम बान के मारे । ते तनु तजि सुर लोक सिधारे ॥” ( रा० मा० १।२०४।२ ) । सत्योपाख्यान के अनुसार वे पशु दिव्य रूप धारण कर अपना परिचय भी देते थे । इस तरह राम का आखेट भी मुक्तिप्रद कहा गया है । “निर्वाणदायक क्रोध जाकर” ( रा० मा० ३।२५ छन्द ) । “क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः” ( भागवत ? ) । सत्योपाख्यान के अनुसार किसी दिन राम एक नराकृति वल्मीक देखते हैं । उनके स्पर्शमात्र से वह दिव्य देह धारण कर अपना परिचय देता है कि वह एक किरात था । ऋषियों के उपदेश से तपस्या करने लगा । वह रामावतार का रहस्य जानता है तथा राम द्वारा रावण-वध की भविष्यवाणी करता है । अन्त में राम उसे वैकुण्ठवास का वरदान देते हैं ( अ० ४२ ) । कृत्तिवासरामायण के अनुसार मृगया में ही राम ने मारीच को देखा था। ब्रह्मा ने मृगया के कारण राम की थकावट मिटाने के लिए इन्द्र को इसलिए भेजा कि वे उस मृणाल में अमृत भर दें, जिसे राम और लक्ष्मण दोनों खानेवाले हैं। वृहत्कौशलखण्ड के अनुसार दशरथ ने राम को शम्बरासुर ५५

के वधार्थ भेजा था ( अ० ४) । पउमचरियं के अनुसार राम-लक्ष्मण ने उन म्लेच्छों को हरा दिया था जो जनक के राज्य पर आक्रमण की तैयारियां कर रहे थे ( पर्व २७) । वाल्मीकिरामायण में गुह को राम का सखा कहा गया है— "तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा ।" ( २।५०।३३ ) । उसी का विशेष विवरण सत्योपाख्यान में किया गया है । वनवास से पूर्व राम गुह से मृगया की शिक्षा प्राप्त करते हैं ( पूर्वार्ध अ० ४३ ) । अन्यत्र इसका और भी विस्तृत वर्णन है । कृत्तिवासरामायण के अनुसार किसी दिन दशरथ अपने पुत्रों के साथ गङ्गास्नान करने गये थे । वहाँ गुहक अपने तीन करोड़ सैनिकों द्वारा दशरथ की सेना को रोक लेता है तथा राम को देखने की इच्छा प्रकट करता है, पर दशरथ राम को रथ में छिपा कर उससे युद्ध करके उसे हराकर और बाँधकर रथपर रखवा देते हैं । इसपर गुहक पैर के अंगूठे से बाण मारता है । राम यह कौतुक देखने आते हैं। वह राम का दर्शन कर अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाता है कि मैं पूर्वजन्म में वसिष्ठ-पुत्र वामदेव था । दशरथ अन्ध मुनि के पुत्रवध का प्रायश्चित्त पूछने गये थे । उस दिन वसिष्ठ घर पर नहीं थे । मैंने ही दशरथ को तीन बार राम-नाम जपने का परामर्श दिया था । पिताजी के आने पर जब मैंने वह प्रसङ्ग सुनाया तब उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझे चण्डाल बन जाने का शाप दिया । उन्होंने कहा एक ही बार के रामनाम के उच्चारण से सब पाप कट जाते हैं, फिर तीन बार रामनाम जपने का उपदेश तुमने क्यों किया ? वसिष्ठ ने मुझसे कहा जब दशरथ के घर राम-जन्म होगा तब उनका चरण-स्पर्श कर तुम मुक्त होओगे । राम ने दशरथ की अनुमति से उसे बन्धनमुक्त किया और उससे मैत्री की (१।५३) । असमीया बालकाण्ड के अनुसार गङ्गास्नान के समय वहीं गुहक भी स्नान करने का साहस करता है । अनुचरों ने उसे पकड़कर राजा के सम्मुख उपस्थित किया । राम भी वहाँ थे । राम का दर्शन करने पर उसे अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो आया । उसने कहा मैं ब्राह्मण था, पर गङ्गा की उपेक्षा करने के कारण गङ्गा ने मुझे चण्डाल बनने का शाप दिया । बाद में कहा राम का दर्शन करके मुक्त होओगे । ये सब कथाएँ भी शिष्टसंमत हैं एवं सामान्य से अविरुद्ध हैं, अतः आदरणीय हैं । विश्वामित्र के आगमन के पूर्व राम की तीर्थयात्राओं का वर्णन योगवासिष्ठ वैराग्यप्रकरण ३ में वर्णित है । वह भावार्थरामायण ( १।७ ) से मिलता है । सत्योपाख्यान में विवाह के बाद तीर्थयात्राओं का उल्लेख है, अन्य रचनाओं में रावण-वध के बाद तीर्थयात्राओं का वर्णन मिलता है । परन्तु इन वर्णनों में कोई विरोध नहीं है । तीर्थ-यात्रा तीन बार भी हो ही सकती है । वैराग्य-काल में राम ने वैयक्तिक रूप से तीर्थयात्रा की, विवाह के बाद सपत्नीक राम ने तीर्थयात्रा की एवं रावण-वध के अनन्तर प्रायश्चित्त के रूप में तीर्थ-यात्रा की । इनमें बुल्के जी को किस दर्पण में विरोध दिखा । सेरीराम के अनुसार राम और लक्ष्मण विवाह के पूर्व तीन महीने नीलपूर्व नामक मुनि के यहाँ रहकर तपस्या करते हैं तथा उनसे जादू सीखते हैं । नीलपूर्व उनको एक धनुष तथा नागस्कन्द पतीक देव नामक तपस्वी उनको तीन बाण प्रदान करते हैं । योगवासिष्ठ के राम १६ वर्ष की अवस्था में विरक्त होकर वसिष्ठ के उपदेशानुसार कर्तव्य-पालन में तत्पर होते हैं । भावार्थरामायण में भी इसका वर्णन है । रामलिङ्गामृत के अनुसार तथा बृहत्कोशलखण्ड के अनुसार बाल-क्रीडा के अनन्तर ही उनकी रास-क्रीडा भी प्रारम्भ होती है । बुल्के इसे कृष्णलीला का अनुकरणमात्र मानते हैं' । यह उनका भ्रम है, क्योंकि राम को ईश्वर का अवतार माननेवाले भक्त अपनी भावना के अनुसार उनकी रास-लीला का भी अनुभव कर ही सकते हैं । वाल्मीकिरामायण ( १।१९ ) के अनुसार विश्वामित्र मारीच तथा सुबाहु के उपद्रवों से यज्ञरक्षार्थ राम की सहायता माँगने आते हैं । सत्योपाख्यान के अनुसार वे शिव की प्रेरणा से आते हैं । कृत्तिवासरामायण के अनुसार राक्षसों के उत्पात से मिथिलाप्रदेश को यज्ञहीन देखकर जनक विश्वामित्र को प्रेषित करते हैं । रामकेर्ति के अनुसार काकनासुर के वधार्थ विश्वामित्र राम को लेने के लिए अयोध्या आते हैं । रामकियेन के अनुसार सुबाहु और मारीच दोनों काकनासुर के पुत्र माने जाते हैं ।

अध्याय बालकाण्ड ४३५ बुल्के कहते हैं, "कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण के स्थान पर भरत और शत्रुघ्न को विश्वामित्र के साथ भेज दिया था।" सरयूतट पर जाकर विश्वामित्र ने राजकुमारों से कहा- "यहाँ से दो पथ हैं। पहले पथ से जाने में तीन दिन लगेंगे और दूसरे पथ से तीसरे पहर पहुँच जायेंगे। किन्तु इस पथ पर ताड़का राक्षसी का भय है।" भरत ने कहा- "दूसरे पथ से हमें क्या प्रयोजन है।" यह सुनकर विश्वामित्र समझ गये कि दशरथ ने हमें धोखा दिया है और वे अयोध्या जाकर राम को माँग लाते हैं। यह कथा पूर्व भारत में उत्पन्न होकर हिन्दोनेशिया तक फैल गयी। एक आदिवासी कथा के अनुसार विश्वामित्र का प्रस्ताव था कि पहला मार्ग सुगम है और सुन्दर नगर की ओर ले जाता है; दूसरा भयङ्कर वन की ओर ले जाता है जहाँ व्याघ्र, ऋक्ष आदि हिंसक पशु रहते हैं। वस्तुतः दशरथ का राम में प्रेमातिशय दिखाने के उद्देश्य से अन्य कल्पना अर्थवादरूप ही है। उसका स्वार्थ में तात्पर्य न समझकर प्रेम-स्तुति में ही तात्पर्य समझना चाहिये। सेरीराम के अनुसार महारीसी कली सीता के पोषक पिता (पोष्य नहीं) दशरथ से निवेदन करते हैं कि उनके पुत्र स्वयंवर में भाग लें। दशरथ भरत और शत्रुघ्न को भेजते हैं। कली उनसे १७।२०।२५ और ४० दिनों में तय होने वाले मार्गों में से एक मार्ग चुनने को कहते हैं। वे अन्तिम मार्ग को निरापद तथा अन्य मार्गों में क्रमशः राक्षसी, गैंडे और नागिन का भय बताते हैं। भरत और शत्रुघ्न, ४० दिन का लम्बा मार्ग चुनने के कारण, अयोग्य ठहरते हैं। कली (विश्वामित्र) लौटकर दूसरी बार राम और लक्ष्मण को साथ में ले जाते हैं। वस्तुतः भरत और शत्रुघ्न विष्णु के ही अंश और शङ्ख और चक्र के अवतार हैं। उनकी अयोग्यता की बात अप्रामाणिक है। निरापद मार्ग चुनना बुद्धिमानी है। वह अयोग्यता का परिचायक नहीं कहा जा सकता, अतः उक्त कल्पना दशरथ के सर्वाधिक रामप्रेम वर्णन में ही पर्यवसित है। ३८९ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण में विश्वामित्र के साथ राम तथा लक्ष्मण के प्रस्थान से लेकर मिथिला पहुँचने तक का वृत्तान्त ३४ सर्गों में वर्णित है। इसकी अधिकांश सामग्री पौराणिक कथाएँ हैं, जिनका प्रायः उस प्रदेश से सम्बन्ध है, जिसे विश्वामित्र पार कर रहे हैं। यात्रा के पूर्वार्ध में काम-दहन (सर्ग २३), ताड़का (सर्ग २४) तथा वामनावतार (सर्ग २९) की कथाएँ और मिथिला के रास्ते में विश्वामित्रवंश, गङ्गा का स्वर्गा- रोहण, शिव-उमाविवाह, गङ्गावतरण, समुद्रमथन तथा अहल्या की कथा (सर्ग ३१-४८) सुनाते हैं। मिथिला में शतानन्द ने विश्वामित्र के ब्राह्मण बनने का वृत्तान्त (सर्ग ५९-६५) सुनाया है। इन कथाओं में केवल अहल्या की कथा का राम से सीधा सम्बन्ध है, अतः यह सब विकास या प्रक्षेप ही है।" पर बुल्के की उपर्युक्त दलील कितनी लचर है, इसे कोई भी समझ सकता है। विश्वामित्र चक्रवर्ती नरेश दशरथ के प्रिय पुत्र राम तथा लक्ष्मण को अपने यज्ञ के रक्षार्थ लाये हैं। पदयात्रा करनी है। तो क्या यह समझना चाहिए कि वे सब गुमसुम मौन ही चलते रहे ? परन्तु यह समझना असङ्गत है। यहाँ तो उचित यही था कि वे जिस-जिस प्रदेश से होकर जा रहे थे उस-उस प्रदेश के सम्बन्ध में राम ने प्रश्न किया होगा विश्वामित्र ने उनका मन बहलाव एवं ऐतिहासिक तथा भौगोलिक ज्ञान सिखाने की दृष्टि से तत्तत्सम्बन्धित कथाओं का वर्णन किया होगा। शास्त्रीय दृष्टि से, स्मृति का विषय होकर उपेक्षा के अनर्ह (अयोग्य) होना ही सङ्गति है। "स्मृतिविषयत्वे सत्युपेक्षानर्हत्वं सङ्गतित्वम्" इस तरह तत्तत् प्रदेशों से सम्बन्धित काम-दहन तथा ताटका की कथाएँ अत्यन्त सङ्गत हैं। ताटका-वध के सम्बन्ध से भी ताटका का वर्णन सङ्गत है। २७ वें सर्ग में ताटका के वध से प्रसन्न होकर विश्वामित्र राम को नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र प्रदान करते हैं। २८ वें सर्ग में उन शस्त्रास्त्रों का राम के वशवर्ती होने का वर्णन है। २९ वें सर्ग में स्वयं विश्वामित्र जिस आश्रम में रहते हैं, जहाँ यज्ञ करते हैं, उसकी कथा के प्रसङ्ग से वामन-कथा का वर्णन स्वाभाविक ही है। वे अन्त में यह भी कहते हैं कि वामन की भक्ति से ही मैं उनके इस आश्रम में रहता हूँ। यह आश्रम जैसा मेरा हैं वैसा ही आप का भी है, क्योंकि आप ही तो वामनरूपधारी विष्णु हैं, यह ध्वन्यर्थ है—

४३६ रामायणमीमांसा त्रयोदश "तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम ।" (वा० रा० १९।२४) । "तदेतदाश्रमपदं यथा मम स्वभूतं तथा तवापि विष्ण्ववतारत्वादिति गूढाभिसन्धिः"-तिलक। यज्ञपूति के बाद ३१वें सर्ग में राम विश्वामित्र के साथ मिथिला के मार्ग में पुनः प्रश्न करते हैं। तब विश्वामित्र कुशवंश का वर्णन करते हैं सर्ग ३३ तक । इसके पश्चात् शोण-गङ्गा-समागम स्थल पर जाकर किसी भी आस्तिक को गङ्गा के सम्बन्ध में जिज्ञासा हो सकती थी, फिर मर्यादा- पुरुषोत्तम राम को जिज्ञासा क्यों न होती ? अतः रामने प्रश्न किया, "भगवन्, त्रिपथगा नदी के सम्बन्ध में मैं सुनना चाहता हूँ। इसपर मुनि ने गङ्गा की कथा प्रारम्भ कर दी । गङ्गा का वर्णन सुनने पर भी संतुष्ट न होकर पुनः राम तथा लक्ष्मण दोनों ही प्रश्न करते हैं और विस्तार से पूछते हैं। गङ्गा तीन लोकों में जाकर त्रिपथगामिनी कैसे हुई इत्यादि प्रश्न पर प्रसङ्गानुसार उमा की कथा कहकर गङ्गा की कथा, कार्तिकेय की उत्पत्ति आदि का वर्णन किया । इसी प्रकार प्रसङ्गानुसार सगर की कथा का वर्णन भी संगत है। सङ्गति के छः भेद होते हैं- 'सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुतावसरस्तथा । निर्वाहकैक्यकार्यैक्ये षोढा सङ्गतिरुच्यते ॥" प्रसङ्ग १, उपोद्घात २, हेतुता ३, अवसर ४, निर्वा- हैक्य ५, एककार्यत्व ६, ये छः प्रकार की सङ्गतियाँ होती हैं। इनमें से किसी भी सङ्गति के अनुसार वस्तु का निरूपण सङ्गत होता है। प्रसङ्गानुसार विशाला के राजवंशसम्बन्धी प्रश्न के अनुसार इन्द्र, सागरमन्थन, अमृतोत्पत्ति, दितिपुत्र मरुतों की उत्पत्ति आदि का वर्णन है। अहल्या-कथा को आप सङ्गत मानते ही हैं। अहल्यापुत्र शतानन्द ने विश्वामित्र से अपनी माता अहल्या के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के अनन्तर राम से कहा कि राम तुम धन्य हो जो तुम्हें महातेजा विश्वामित्र का संरक्षण प्राप्त है। इसी प्रसङ्ग में विश्वामित्र के वृत्तान्त का वर्णन सङ्गत ही है। वेदों में भी पुराणों का महत्त्व वर्णित है- "ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद् दिवि देवा दिवि श्रिताः ॥" अथर्ववेद के इस मन्त्र में कहा गया है कि ऋक्, साम और यजु के साथ पुराण भी उस उच्छिष्ट परमेश्वर से उत्पन्न हुए, अतः राम और विश्वामित्र के संवाद में पौराणिक कथाओं का वर्णन असङ्गत नहीं कहा जा सकता है। आश्चर्य है कि एक प्रामाणिक ग्रन्थ के अनेकों सर्गों को तोड़मरोड़ कर अपने मस्तिष्क के फितूरों के आधार पर प्रक्षेप कहने का साहस किया जाता है। महाकवि कालिदास तथा आनन्दवर्धनाचार्य जैसे महाविद्वान् बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सहित समस्त रामायण को आदि कवि वाल्मीकि की कृति कहते हैं। फिर भी दुरभिसन्धिपूर्ण कुछ पाश्चात्यों के अनुयायी बुल्के दोनों काण्डों को प्रक्षेप कहते हैं। उसी प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में राम और विश्वामित्र के संवाद में अन्य कथाओं का वर्णन है यह तो प्रमाणसिद्ध है, परन्तु यह मिथ्या है कि राम ने प्रश्न नहीं किया तथा विश्वामित्र ने उक्त कथाओं का निरूपण नहीं किया। इसमें बुल्के के पास कोई प्रमाण है ? बला और अतिबला विद्या या जया और विजया विद्या की प्राप्ति का वर्णन ठीक ही है। असमिया बालकाण्ड (अ० २७) के अनुसार दशरथ किसी समय अपने चारों पुत्रों सहित भारद्वाज के आश्रम में गये थे। वहाँ राम ने स्वप्न में देखा कि इन्द्र ने उनका अभिषेक कर उन्हें मन्त्र सिखलाया और धनुष-बाण भी प्रदान किये। जागने पर राम ने अपने हाथ में धनुष-बाण देखे और मन्त्र का भी उच्चारण किया। विशेष कथा सामान्य कथा से अविरुद्ध होने से मान्य ही है। ताटका-वध, यज्ञ-रक्षण, सुबाहु आदि राक्षसों का वध और मानवास्त्र द्वारा मारीच के शतयोजन दूर प्रक्षेप की कथा के सम्बन्ध में विप्रतिपत्ति न होने पर भी बुल्के को ताटका की कथा में विकास दिखता है। वाल्मीकि- रामायण के अनुसार ताटका राम के बाणों से विद्ध होकर भूमि पर गिर कर मर जाती है, किन्तु अध्यात्मरामायण, पद्मपुराण (उ० खं० २६९।१२१) तथा रामचरितमानस के अनुसार ताटका दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग के लिए प्रस्थान करती है, परन्तु यह विशेष प्रमाणसिद्ध हैं; अतः वाल्मीकिरामायण के सामान्य से अविरुद्ध होने से आदरणीय ही हैं। अन्य रामायणों के अनुसार तीन करोड़ राक्षसों, महाकाय गैंडों, सुनागिन, काकनासुर आदि के वध का वर्णन

अध्याय बालकाण्ड ४३७ भी उन-उन देशों में प्रचलित कथानकों पर ही निर्भर है। रामकथा में वाल्मीकिरामायण की ही सर्वोत्कृष्ट प्रामाणि- कता है, क्योंकि वह समाधिजा प्रज्ञा के आधार पर महर्षि द्वारा निर्मित वेदमूलक आर्ष ग्रन्थ है। व्यास आदि महर्षियों की उक्तियाँ भी उससे समन्वित हैं। अन्य सब उक्तियाँ तदनुगुण होकर ही प्रमाण हैं। राम-सीता-विवाह ३९० वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "प्रचलित वाल्मीकिरामायण में धनुर्भङ्ग के बाद चारों भाइयों के विवाह का वर्णन है। महाभारत रामोपाख्यान में, जो रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है, न तो धनुर्भङ्ग है और न राम को छोड़ अन्य भाइयों के विवाह का निर्देश किया गया है, अतः ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में केवल राम और सीता के विवाह का ही उल्लेख रहा होगा। धनुर्भङ्ग तथा अन्य भाइयों का विवाह बाद में जोड़ा गया होगा। इस अनुमान की पुष्टि वाल्मीकिरामायण के अरण्यकाण्ड से होती है, जिसमें लक्ष्मण को अविवाहित कहा गया है।" इन अंशों का सविस्तर खण्डन पीछे हो चुका है। वस्तुतः बुल्के की दृष्टि में अरण्यकाण्ड भी पूर्ण प्रामाणिक नहीं है। उसमें भी अवतार-प्रसङ्ग उन्हें मान्य नहीं है। फिर, अटकलमात्र से धनुर्भङ्ग और चारों भाइयों के विवाह को प्रक्षिप्त कैसे कहा जा सकता है ? महाभारत रामोपाख्यान में तो संक्षिप्त राम-कथा का ही वर्णन है। संक्षेप-कथन में बहुत से अंश छूटते ही हैं। अरण्यकाण्ड में राम ने उपहास विनोद में ही कहा है— "श्रीमानकृतदारश्च लक्षमणो नाम वीर्यवान् ।" (वा० रा० ३।१८।४) टीकाकारों ने बालकाण्ड के विवाह का ध्यान रखते हुए अकृतदार का 'असंनिहितदारः' अर्थ किया है। मीमांसा के उपक्रमन्याय से आरम्भ के अनुसार ही अन्त के वाक्यों का अर्थ लगाया जाता है। अतः बालकाण्ड में लक्ष्मण का विवाह हो चुका है; तदनुसार 'अकृतदार' का अर्थ 'असंनिहितदार' ही है अर्थात् लक्ष्मण की पत्नी उनके साथ नहीं है। "स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रिया याश्च वराङ्गनाः । ऐश्वर्यञ्च विशालायां ................................. ॥ पितरं मातरं चापि संमान्याभिप्रसाद्य च । अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजा ॥" (वा० रा० ५।३८।५४-५६) उक्त वचनों के आधार पर भी बुल्के लक्ष्मण के अविवाहित होने का समर्थन करते हैं, पर उक्त वचन उनके विरुद्ध ही पड़ते हैं, क्योंकि त्याग तो विद्यमान का ही होता है। जैसे माता-पिता विद्यमान थे, अपूर्व सुख- संपदाएँ प्राप्त थीं वैसे ही प्रिय वराङ्गनाएँ भी प्राप्त थीं। तभी उनका परित्याग कहा जा सकता है। धनुर्भङ्ग वाल्मीकिरामायण प्रोक्त है, अतः अन्य रचनाओं में भी उसका महत्त्व होना स्वाभाविक ही है। महावीरचरित के अनुसार विश्वामित्र के आश्रम में ही राम और लक्ष्मण सीता और उर्मिला को देखकर उनकी ओर आकृष्ट होते हैं। उसी आश्रम में रावण एक दूत द्वारा सीता को माँगता है तथा राम द्वारा धनुर्भङ्ग किया जाता है। अनर्घराघव में भी रावण की मांग का उल्लेख है। सत्योपाख्यान में बहुत से राजा परीक्षा में असफल होते हैं। इसमें प्रहस्त आकर कहता है कि शिव के प्रति श्रद्धा रखने के कारण रावण धनुष-परीक्षा में सम्मिलित नहीं होते। स्वयंवर के पश्चात् राम द्वारा धनुर्भङ्ग का वर्णन है (उत्तरार्ध सर्ग ३)। देवीभागवत में रावण सीता से कहता है कि शिवचाप के भय से मैं स्वयंवर में नहीं आया। उपर्युक्त वृत्तान्तों तथा रघुवंश आदि अधिकांश रामकथाओं में वाल्मीकि के अनुसार धनुर्भङ्ग के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति का उल्लेख नहीं है तथा चारों भाइयों के विवाह का उल्लेख है। वस्तुतः सत्योपाख्यान के अनुसार यहाँ भी समन्वय ही अभीष्ट है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार यहाँ भी धनुर्भङ्ग की शर्त पर ही सीता का विवाह निश्चित है। तो यह मानना चाहिये कि राम के पूर्व अनेक राजा उस

परीक्षा में असफल होकर निवृत्त हो गये थे । तब राम आये और सफल हुए । वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड के ६६ वें सर्ग में जनक ने विश्वामित्र से कहा ही है । 'वीर्यशुल्का' सीता के लिए बहुत से राजा शिव-धनुष की परीक्षा में शामिल हुए, परन्तु कोई उसे उठाने या ग्रहण करने में भी सफल नहीं हुआ । तब परम कोप से राजाओं ने मिथिला घेर ली । देवताओं की सहायता से मैंने उनको पराजित कर दिया । यदि राम इस धनुष को चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा सीता कन्या राम को दूंगा । महानाटक में कहा गया है कि सभी सुरगण, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा महोरग किसी की भी सामर्थ्य इस धनुष के उठाने, चढ़ाने तथा हिलाने तक की नहीं हुई फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या थी— “नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः । गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ क्व गतिर्मानुषाणाञ्च धनुषोऽस्य प्रपूरणे । आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा ॥” ९, १०॥ इससे स्पष्ट ही है कि धनुष की परीक्षा में अगणित राजा ही नहीं देवता, दानव आदि भी आये थे । महाभारत में संक्षेप के कारण ही धनुर्भङ्ग का उल्लेख नहीं हुआ । जैनों के उत्तरपुराण में जनक ही अपने यज्ञ के रक्षार्थ राम और लक्ष्मण को दशरथ से मांग कर लाते हैं और यज्ञरक्षा के पुरस्कारस्वरूप अपनी दत्तक पुत्री सीता का प्रदान करते हैं । जैनों द्वारा वाल्मीकिरामायण को ही विकृत करने का प्रयत्न किया है। तिब्बती रामायण में सीता कृषकों द्वारा पाली जाती है। उन्हीं के अनुरोध से राम ने अपनी तपस्या छोड़कर सीता के साथ ब्याह किया । खोतानी- रामायण के अनुसार राम और लक्ष्मण दोनों ही सीता से विवाह करते हैं । दशरथजातक में राम सहोदरी बहन सीता से विवाह करते हैं । कहना न होगा कि वर्णाश्रम तथा वेद-शास्त्र के विरोधी बौद्धों ने भी अपनी भावनाओं के अनुसार रामायण गढ़ने का प्रयास किया है, अतः वह वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध रामकथा का विकृत रूप ही है । उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार जनक का कथन है कि देवताओं ने मेरे पूर्वज निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात को शिव-धनुष दिया था ( वा० रा० १।६६।८-१२ ) । परशुरामतेंजोभङ्ग के प्रसङ्ग में कहा गया है कि स्वयं शिव ने ही देवरात को धनुष दिया था, किन्तु अनसूया से सीता ने कहा था कि वरुण ने देवरात को धनुष दिया था ( वा० रा० २।११८ ) । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा पद्मपुराण के अनुसार शिव ने उससे त्रिपुर को नष्ट किया था । सत्योपाख्यान ( उत्तरार्द्ध अ० २ ) तथा बृहत्कोशलखण्ड ( अ० ६ ) के अनुसार शिव ने स्वप्न में जनक को दर्शन देकर कहा था कि धनुर्भङ्ग करनेवाला ही सीता के साथ विवाह करे । अनेक राम-कथाओं में जनक ने ही उस धनुष को प्राप्त किया था । पद्मपुराण ( पातालखण्ड अ० ११२ ) के अनुसार जनक को चिन्ता थी कि राम के साथ सीता-विवाह कैसे निश्चित हो । वह शिव और पार्वती से प्रार्थना करते हैं । फलतः शिव उन्हें अजगव धनुष प्रदान कर कहते हैं कि उसे तोड़ने में राम ही समर्थ होंगे । कृत्तिवास- रामायण के अनुसार ब्रह्मा ने शिव से कहा था ऐसी युक्ति सोची जाय, जिससे सीता का विवाह राम से ही हो । इसपर शिव ने परशुराम को अपना धनुष देकर आदेश दिया कि मेरा यह धनुष जनक के घर में रख दो और जनक से कहना कि सीता के साथ वही विवाह करे जो इस धनुष को तोड़ सके । काश्मीरीरामायण के अनुसार शिव ने इस शर्त पर जनक को एक धनुष दिया कि जो इसे चढ़ा सके वही सीता से विवाह करे । सेरीराम के अनुसार देवताओं ने इस धनुष को किसी महर्षि की अस्थियों से बनाया था; शिव ने उसे ब्रह्मा को दिया एवं ब्रह्मा ने सीता

अध्याय बालकाण्ड ४३९ के पिता को दिया । सेरतकाण्ड के अनुसार जनक के पास वह आकाश से गिरकर आया । रामकेत्ति के अनुसार सीता का अपूर्व सौन्दर्य देखकर जनक ने मन्त्रों द्वारा एक दिव्य धनुष की सृष्टि की थी और यह प्रण किया था कि जो इस धनुष को उठाने में समर्थ होगा उसी को मैं सीता प्रदान करूँगा ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण ( १।३।४७ ) तथा भावार्थरामायण ( १।१७ ) में कहा गया है कि जो शिव-धनुष जनक के पास है उसी धनुष से परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों का नाश किया था । एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार धनुष के साथ ही सीता यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुई थी । आनन्दरामायण, भावार्थरामायण, बिहौरराम-कथा आदि के अनुसार सीता ने धनुष उठाकर उस जगह को लीपा था तब जनक ने यह प्रण किया कि जो इसे तोड़ेगा उसी से सीता का विवाह होगा । उसी से जनक ने सीता को लक्ष्मी जाना । भावार्थरामायण ( १।१७ ) के अनुसार परशुराम ने जनक के महल में उस धनुष से सीता को खेलते देखकर जनक को यह सुझाव दिया था कि जो धनुष-भङ्ग करने में समर्थ हो वही सीता का पति बने । जो भी हो, अनेक वर्णनों में विकृतियाँ हो सकती हैं। परन्तु आर्ष प्रमाणों में कल्पभेद या सामान्य-विशेष भाव से समन्वय किया जाना उचित है । नाटक, काव्य आदि में रसोत्पत्ति के लिए मूल कथा में कुछ हेरफेर करने की परिपाटी है ही; किन्तु सबकी दृष्टि से धनुर्भङ्ग और धनुष की असाधारणता स्पष्ट है । सीता-स्वयंवर के प्रसङ्ग में बहुत से राजाओं की धनुष तोड़ने या चढ़ाने में असफलता के पश्चात् उनका मिथिला पर आक्रमण कहा गया है । उसके बाद "सुदीर्घस्य तु कालस्य" बहुत दिनों बाद राम ने धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया ( वा० रा० २।११८ ) । यहाँ बुल्के कहते हैं बाद की कथाओं में सीता-स्वयंवर तथा राजाओं के आक्रमण का राम से सम्बन्ध स्थापित हो गया । परन्तु यह कोई असम्भावित बात नहीं है । सुदीर्घ काल का अर्थ सौ दो सौ वर्ष न होकर आपेक्षिक महीना १५ दिन भी हो सकता है और राजाओं के सीता-प्राप्त्यर्थ धनुषपरीक्षण की प्रवृत्ति कुछ-कुछ चलती ही रही, इसलिए दोनों बातें सङ्गत हो जाती हैं । प्रथम अधिकाधिक राजा लोग एकत्रित हुए। तभी असफल होकर जनक पर आक्रमण किया । जब देवताओं से चतुरङ्ग बल पाकर जनक ने उन्हें पराजित कर दिया तब वैसी प्रवृत्ति धीमी पड़ गयी । राम के आगमन पर भी कुछ राजा या राजकुमार धनुष के परीक्षणार्थ आये होंगे । राम की सफलता देखकर ईर्ष्यावश राम पर आक्रमण की बात सोचते रहे होंगे । कल्पभेद से भी दोनों स्थितियों का समाधान कर लेना उचित है । पउमचरियं के अनुसार राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की थी, अतः पुरस्कारस्वरूप जनक ने उन्हें सीता-प्रदान किया । विवाह के पूर्व नारद सीता को देखने आते हैं । सीता भयभीत होकर छिप गयी, इसपर नारद को महल से निकाल दिया गया । नारद ने भामण्डल के उद्यान में सीता का चित्र बना दिया, जिसे देखकर भामण्डल उसपर अनुरक्त हो गया । उसकी विरहव्यथा देख उसके पालक पिता ने एक मायावी विद्याधर द्वारा जनक को अपने पास बुला लिया और भामण्डल से सीता के विवाह का अनुरोध किया । जनक ने उत्तर दिया कि मैंने राम को सीता देने की प्रतिज्ञा कर ली है । फिर उसके अनुरोध से जनक ने यह शर्त स्वीकार कर ली कि राम को पहले वज्रावर्त्त धनुष चढ़ाना होगा इसपर स्वयंवर का आयोजन हुआ । राम ने धनुष चढ़ा दिया । विभिन्न लेखक अपनी कृति में चमत्कार लाने के लिए बहुत से काल्पनिक अंशों को जोड़ देते हैं; परन्तु आर्ष ग्रन्थों में तो वस्तुस्थिति का ध्यान रखते हुए ही कृति में सौष्ठव लाने का प्रयास किया जाता है । नृसिंहपुराण ( अ० ४७ ), भागवतपुराण ( ९।१० ), अध्यात्मरामायण ( १।६।२४ ), कम्ब- रामायण, सूरसागर आदि के अनुसार अन्य राजाओं की उपस्थिति में स्वयंवर के समय राम धनुष उठाते हैं । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ) के अनुसार नारद के अनुरोध पर सीता-स्वयंवर का आयोजन हुआ । दशरथ ने अपने पुत्रों के विवाहार्थ अपने दूतों को नाना देशों में भेजा था । एक ने शीघ्र ही लौटकर समाचार दिया कि विदेह की पुत्री वैदेही विवाहयोग्य है, इसपर वसिष्ठ को भेजा गया जो लग्न निश्चित कर अयोध्या लौटते हैं । अनन्तर विवाह- मङ्गल गाती हुई युवतियों आदि के साथ बरात मिथिला के लिए प्रस्थान करती है । जनक स्वागत कर उन्हें विदेह-

४४० रामायणमीमांसा नगर के एक महल में ठहराते हैं। वहाँ नारद आते हैं और अगले दिन विवाह के लिए जनक द्वारा आमन्त्रित किये जाते हैं । नारद कहते हैं यह मुहूर्त ठीक नहीं है। नारद गर्ग आदि के साथ परामर्श कर दशरथ की अनुमति से स्वयं- वर में अन्य राजाओं को भी बुलाते हैं। उसी रात शिवजी से जनक अजगव धनुष प्राप्त करते हैं, जिसे राम को छोड़कर कोई भी उठाने में समर्थ नहीं होता (पद्मपु० पातालखण्ड १११।४९-९०) । नृसिंहपुराण, पद्मपुराण आदि अर्वाचीन नहीं, आर्ष ग्रन्थ हैं। उनका परस्पर समन्वय करना ही उचित है । किसी वस्तु की प्रशंसा के लिए अर्थवाद वेदों में भी होते हैं । अर्थवादों का स्वार्थ में तात्पर्य न होकर स्तुति में ही तात्पर्य होता है। सीता-राम के विवाह का उत्कर्ष वर्णन करने की दृष्टि से कुछ विरुद्ध भी अर्थवाद हो सकते हैं। महावीरचरित आदि में सीता-स्वयंवर में रावण का दूत उपस्थित रहता है । राजशेखरकृत बालरामायण आदि ग्रन्थों में सीता-स्वयंवर के समय रावण भी उपस्थित रहता है और वह धनुष-परीक्षा में शामिल नहीं होता । परन्तु प्रसन्नराघव आदि के अनुसार रावण तथा बाणासुर दोनों धनुष चढ़ाने में असफल होते हैं। रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार रावण ने धनुष उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु धनुष उलट गया और वह उसके नीचे दबकर छटपटाने लगा। जब कोई भी धनुष नहीं उठा सका तब विश्वामित्र ने राम को रावण के प्राण बचाने का आदेश दिया। आनन्दरामायण (१।३।७७-८५) तथा तोरवेरामायण में भी ऐसा वृत्तान्त है । बलरामदासरामायण में पुष्पक में ही बैठा रावण धनुर्भङ्ग देखकर डरकर लङ्का लौट जाता है। सेरीराम में उल्लेख है कि इन्द्रजित् भी स्वयंवर में विद्यमान था, पर वह इसलिए धनुष के पास नहीं गया कि वह पुत्री- कोमालदेवी नामक अपनी प्राणप्यारी सहधर्मिणी के लिए किसी को सपत्नी नहीं बनाना चाहता था। जो भी हो, मूल अर्थ वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध अन्य घटनाएँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं, अतः उनका अपलाप करने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। अर्वाचीन राम कथाओं में ही क्यों प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में भी देवताओं की उपस्थिति सीता-स्वयंवर में थी । पद्मपुराण (पा० ख० ११२।९९-१०३) के अनुसार महेन्द्र, सूर्य तथा वायु ने धनुष उठाने का निष्फल प्रयास किया था। रामचरितमानस के अनुसार देवता मनुष्य का रूप धारण कर विवाह में सम्मिलित होते हैं । अन्य देव विमानों में चढ़कर स्वयंवर देखते हैं— "देखहि सुर नर चढ़े विमाना" ( रा० मा० १।२४५।४) तथा “देव दनुज धरि मनुजसरीरा।" (रा० मा० १।२५०।४) । सेरतकाण्ड के अनुसार सीता के पोषक पिता रंसिकल को आकाश से गिरा एक धनुष मिला और उसने संकल्प किया कि जो इस धनुष से चलाए हुए बाण के द्वारा सप्त ताल वृक्षों को विद्ध करे उसी को सीता मिलेगी। रावण छः वृक्षों को विद्ध कर सका। ये ताल एक साँप की पीठ पर खड़े थे। लक्ष्मण ने उस साँप को दबाकर सीधा कर दिया, तब राम ने लक्ष्मण की सहायता से सप्ततालों को वेध दिया। रामकेर्ति में ब्रह्मा, इन्द्र, शिव, वायु, अग्नि आदि कई देवताओं की चर्चा है जो एक-एक करके धनुष के उत्तोलन में असफल हुए थे। यह धनुष की गुरुता की प्रशंसामात्र समझना चाहिए । वस्तुतः ब्रह्मा, शिव ईश्वरकोटि के देव हैं। उन्हें राम और सीता के असाधारण स्वरूप का ज्ञान था ही, अतः वे सीता की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील नहीं हो सकते थे । सेरीराम के अनुसार जनक काकासुर का वध करने के लिए राम से निवेदन करते है। यह काकासुर यज्ञ में प्रयुक्त होनेवाला दूध पीकर यज्ञों में विघ्न डाला करता था । राम का बाण काक का पीछा करता हुआ समुद्र के एक टापू पर पहुँचता है । काक भयभीत होकर प्रतिज्ञा करता है कि आगे वह महारीसी कली को कष्ट नहीं देगा । राम का बाण काक का सन्देश लेकर मिथिला वापस आता है। इसके बाद विवाह होता है ।

अध्याय बालकाण्ड ४४१ विवाहोत्सव वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार राम के विवाह के साथ लक्ष्मण का ऊर्मिला से, भरत और शत्रुघ्न का क्रमशः माण्डवी और श्रुतकीर्ति से विवाह होता है। गुणभद्र के उत्तरपुराण, तिब्बती रामायण, खोतानी रामायण तथा बौद्ध जातकों में सीता और राम का ही विवाह वर्णित है। भट्टिकाव्य, सेरीराम, रामकेलि, रामकियेन आदि में राम और लक्ष्मण का विवाह वर्णित है। वह्निपुराण और पद्मपुराण (गौडीय पातालखण्ड) में राम और भरत का विवाह वर्णित है। राम और सीता के विवाह के कारण भरत को उदास देखकर कैकेयी ने भरत और सुभद्रा के विवाह का प्रस्ताव किया। सुभद्रा जनक के भाई कनक की कन्या है। इसपर सुभद्रा के स्वयंवर का आयोजन होता है। स्वयंवर में सुभद्रा भरत को चुनती है। तत्त्वसंग्रहरामायण में विवाह में ब्रह्मा की उपस्थिति का उल्लेख है। रामचरितमानस में देवता ब्राह्मण का रूप धारण कर विवाह में भाग लेते हैं। होम के समय पूजा स्वीकार करते हैं। "सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानहिं नाना जूथा ॥ प्रेमपुलक तन हृदय उछाहू । चले बिलोकन राम बिआहू॥" (रा० मा० १।३१३।१,२) "ब्रह्मादि सुरवर विप्रवेष बनाई कौतुक देखहीं ॥" (रा० मा० १।३१९ छन्द) उनकी स्त्रियां छद्मवेश में परछन के समय राम की आरती उतारती हैं। "सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी । कपटनारि बर बेष बनाई । मिली सकल रनवासहिं जाई ॥" (रा० मा० १।३१७।३,४) कृत्तिवासरामायण में चन्द्रमा ने नर्तकी का रूप धारण कर अपने नृत्य से सबको मन्त्रमुग्ध कर दिया, जिससे शुभ मुहूर्त्त टल गया जिसे देवता चाहते थे (१।६२)। अतएव लौकिक दृष्टि से वह विवाह सुखदायक नहीं हुआ। इसी के आधार पर अन्य कल्पनाएँ हुई हैं। विवाह की अवस्था वाल्मीकिरामायण में उक्त 'ऊनषोडशवर्षः (१।२०) के अनुसार राम की १६ वर्ष से कम उम्र थी एवं (वा० रा० १।७७।१४) तथा अनसूयासंवाद (वा० रा० २।११८।२७-५२) के अनुसार सीता की पतिसंयोगसुलभ अवस्था का उल्लेख है। पर बुल्के इसे और अनसूया-संवाद को प्रक्षेप कहते हैं, परन्तु उनकी यह कल्पना भी निराधार ही है। क्योंकि भारतीय टीकाकारों ने उसे परम्पराप्राप्त मानकर ही उसपर टीकाएँ की हैं। अरण्यकाण्ड (३।४७) के अनुसार विवाह के पश्चात् सीता १२ वर्ष तक अयोध्या में रही थीं। वनगमन के समय राम और सीता की अवस्था क्रमशः २५ तथा १८ की थी (वा० रा० ३।४७।१०-११)। विवाह के समय राम तथा सीता की उम्र १३ और ६ वर्ष की थी। अयोध्याकाण्ड के (वा० रा० २।२०।४५) के अनुसार राम की अवस्था १७ वर्ष की थी। (वा० रा० ५।३३।१७) में वनवास के पहले १२ वर्ष अयोध्या में रहना कहा गया है। स्कन्दपुराण (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यखण्ड अ० ३०) तथा पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ३३) में विवाह के समय दोनों की उम्र क्रमशः १५ और ६ वर्ष की मानी गयी है। बुल्के उन सबमें परस्पर मतभेद भी दिखला कर प्रक्षेप सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु वस्तुतः इन सबका समन्वय ही है। सीता अयोनिया एवं दिव्य होने के कारण ६ वर्ष की अवस्था में भी पतिसंयोगसुलभ प्रतीत होती थीं। 'ऊनषोडशवर्षः' यह वचन कहकर दशरथ ने विश्वामित्र से यह कहना चाहा था कि १६ वर्ष का क्षत्रिय- पुत्र युद्धयोग्य होता है, किन्तु राम अभी षोडश वर्ष के नहीं हुए, अतः युद्ध के अयोग्य हैं। उपक्रमन्याय से बालकाण्ड ५६

४४२ रामायणमीमांसा त्रयोदश के अनुसार ही अयोध्याकाण्ड के वचन का अर्थ लगाना उचित है। "सप्त दश च वर्षाणि जातस्य तव राघव।" (वा० रा० २।२०।४५) का अर्थ रामाभिरामी के अनुसार यह है कि उपनयन संस्कार रूप द्वितीय जन्म से राम वनवास के समय १७ वर्ष के थे। इस तरह राम विश्वामित्र-यज्ञ के समय १५ वर्ष के थे। १२ वर्ष विवाह के बाद अयोध्या में रहे और वनगमन के समय २७ वर्ष के ही थे। दश वर्ष की अवस्था में उपनयन हुआ था। यद्यपि “मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः। अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते ।। (वा० रा० ३।४७।१०-११) इस वचन से वनगमन के समय में क्रमशः राम और सीता की आयु २५ और १८ वर्ष की प्रतीत होती है तथापि इस वचन का भी पूर्व वचनों के अनुसार ही अर्थ करना उचित है। अतएव टीकाकारों ने पञ्चविंशक का अतितरुण अर्थ किया है। अथवा २४ तत्त्वों से पृथक् पञ्चविंशक सांख्यीय चैतन्य पुरुष ही राम हैं। पञ्चतन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत, पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, अहङ्कार, बुद्धि, मनरूप १८ वर्ष पूर्व मेरे कार्य गिने जाते हैं। मैं मूलप्रकृति हूँ। ‘पतिसंयोगसुलभम्’ का भी अर्थ पाणिग्रहणयोग्यता ही विवक्षित है। यही रामाभिरामी टीका का मत है। पूर्वराग अनेक रामायणों के अनुसार सीता और राम का परस्पर प्रेम हो जाता है। आनन्दरामायण ( १।३।१११- १२०) स्वयंवर के समय रामाभिराम को देखकर सीता प्रेमविह्वल हो जाती हैं। वे देवताओं से प्रार्थना करती हैं कि धनुष को पुष्पवत् बना दें। कल्किपुराण (३।३।२९) के अनुसार जनकनन्दिनी सीता के कटाक्ष से अर्चित होकर राम धनुष चढ़ाते हैं—‘जनकजेक्षितैरचितः’। कम्बरामायण के अनुसार सीता कन्या-भवन पर खड़ी थी और राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ आ रहे थे। दोनों की दृष्टि दोनों पर पड़ी। दोनों प्रेमनिमग्न हो गये। रामचरितमानस के अनुसार पुष्पवाटिका में दोनों एक दूसरे को देखकर प्रभावित होते हैं— “सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत । चकित विलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ।।” (रा० मा० १।२२९) “..................‘सियमुख ससि भय नयन चकोरा । भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दृगंचल ॥ देखि सीय सोभा सुखु पावा । हृदय सराहत बचनु न आवा।।” (रा० मा० १।२२९।२,३) “सियसोभा हिय बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि ।।” (रा० मा० १।२३०) सीताजी भी— “देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥ थके नयन रघुपतिछबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥ अधिक सनेहु देह भै भोरी । सरदससिहि जनु चितव चकोरी ॥ लोचनमग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ।।” (रा० मा० १।२३१।२-४) और सीता राम-प्राप्ति के लिए गौरी से मूक प्रार्थना करती हैं— “मोर मनोरथ जानहु नीके । बसहु सदा उर पुर सबही के ॥” (रा० मा० १।२३५।२)

भवानी ने भी प्रसन्नता से वरदान दिया, यह जानकर सीता प्रसन्न होती हैं— "जानि गौरि अुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।" (रा० मा० १।२३६) राघवोल्लास के अनुसार स्वप्न में सीता को राम का दर्शन होने से वे अनुरागवती होती हैं । भुशुण्डि- रामायण के अनुसार पक्षी के द्वारा रामप्रेषित राम का चित्र देखकर और बृहत्कोशलखण्ड में गुणश्रवण द्वारा सीता पूर्वानुरागवती होती हैं । तुलसीदास के अनुसार यह स्वाभाविक पुनीत प्रेम था और सीता के नयन निजनिधि पहचान कर ललक उठे । आर्ष रामायण के अविरुद्ध ऐसी स्थितियों का वर्णन भी असङ्गत नहीं है । राम एकपत्नीव्रत थे । वाल्मीकि के अनुसार राम सत्यपराक्रम, पितृभक्त एवं स्वदारनिरत थे । अन्य रामायणों में भी राम को एकपत्नीव्रत कहा गया है । परन्तु बुल्के इसे भी विकास मानते हैं । यहाँ बुल्के कहते हैं, "उच्चाशय मानव का चित्रण करते हुए भी वाल्मीकि का दृष्टिकोण यथार्थवादी ही था, अतः उनकी रचना में ऐसी उक्तियाँ भी मिलती हैं जो परवर्ती रामकथाओं के मर्यादावाद को आघात पहुँचाती हैं । जैसे— "हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः ।" (वा० रा० २।१८।१२) अर्थात् राम के अभिषेक के बाद राम की परम स्त्रियाँ प्रहृष्ट होंगी । ऐसे ही— "भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ।" (वा० रा० ६।२१।३) । अनेकधा परम नारियों की भुजाओं से स्पृष्ट राम की बाँह का उल्लेख किया गया है ।" परन्तु बुल्के भारतीय शास्त्रीय समन्वय की पद्धति से अपरिचित हैं । इसी लिए उन्हें इस प्रकार का भ्रम हुआ है । ऐसे प्रसङ्गों में टीकाकारों ने एकपत्नीव्रत के अनुकूल ही अर्थ किया है । राम की सीता एवं सीता की सखियाँ प्रसन्न होंगी । स्त्री का अर्थ पत्नी ही नहीं होता है । रामसम्बन्धिनी परम उत्कृष्ट स्त्रियां प्रसन्न होंगी । यही उक्त वचन का अर्थ है । उपनिषद में आया है "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठ उ० १।३।१) । यहाँ पिबन्तौ से यही प्रतीत होता है कि जीव और ईश्वर दोनों ऋत (कर्मफल) का पान करनेवाले हैं । परन्तु जीव और ईश्वर के स्वभाव भिन्न होने के कारण ईश्वर भोक्ता नहीं होता । "अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" (मु० उ० ३।१।१) ईश्वर भोजन न करता हुआ केवल प्रकाशक रहता है । इस श्रुति के कारण पिबन्तौ का मीमांसासम्मत अर्थ यह होता है कि— 'जीवः पिबति ईश्वरः पाययति' अर्थात् जीव कर्म-फल का भोक्ता है ईश्वर जीव को कर्मफल भोगार्थ प्रेरित करता है । इसी तरह 'परमाः स्त्रियः' में राम की पत्नी सीता एवं उसकी सखियाँ ही गृहीत होती हैं । अतएव "बहुवचनेन सीतासख्यः" यही अर्थ रामाभिरामी टीका में किया गया है । इसी प्रकार दूसरे वचन का भी अर्थ यह है कि मणि, काञ्चन, मुक्तादि सर्वोत्तम भूषण युक्त परम नारियों (धात्रीजनों) के द्वारा स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की बाहें स्पृष्ट होती हैं । रामाभिरामी का स्पष्टतः कहना है— "परमनारीणामेकदारव्रतत्वेनेतरस्त्रीप्रसङ्गाभावादुत्तमधात्रीजनानां भुजैरनेकधा स्तनपनालङ्कर- णादिकाले स्पृष्टम् ।" अर्थात् राम एकदारव्रत हैं, अतः उनका अन्य नारी-स्पर्श का प्रसङ्ग न होने से धात्रीजनों की भुजाओं से स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की भुजा स्पृष्ट होती थी । वाल्मीकिरामायण में ही राम को एक- पत्नीव्रत कहा गया है और उसी के कारण यज्ञों में भी सुवर्णमयी सीता की प्रतिमा का प्रयोग हुआ । न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ।। (वा० रा० ७।९९।७) अर्थात् राम ने सीता से भिन्न भार्या का वरण नहीं किया, इसलिए पत्नी के स्थान में यज्ञों में सीता की काञ्चनी प्रतिमा ही उपयुक्त होती थी । इसी प्रकार बुल्के यह भी कहते हैं कि यद्यपि सीता के प्रति

राम-प्रेम की असंख्य बार रामायण में चर्चा है तथापि भरत के अभिषेक की बात सुनकर राम ने कहा है कि पिता की आज्ञा से मैं भरत को अपना राज्य, सम्पत्ति, अपना जीवन तथा सीता को भी सहर्ष प्रदान कर सकता हूँ। “अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥” ( वा० रा० २।१९।७ ) परन्तु इससे सीता-प्रेम में विरोध कैसे प्रतीत होता है ? यह तो वही जानें, पर वस्तुतः प्राण या जीवन से ही पत्नी का सम्बन्ध होता है, जो अपने प्राण एवं जीवन ही भरत को प्रदान करने को प्रस्तुत है तब उसके सीता के प्रदान में प्रेम की न्यूनता कहाँ आती है। इसी तरह घोर शरपाशबन्धन से मूच्छित लक्ष्मण को देखकर विलाप करते हुए राम कहते हैं, मैं युद्ध में मूच्छित लक्ष्मण को देख रहा हूँ। इस स्थिति में सीता के मिलने या जीवन से भी मुझे क्या करना है। ढूँढने पर मर्त्यलोक में सीता जैसी नारी मिल सकती है, पर लक्ष्मणसदृश साम्परायिक ( युद्ध का सच्चा साथी ) भ्राता नहीं मिल सकता ( वा० रा० ६।४७।५, ६ ) । इससे भी बुल्के को सीता-प्रेम में कमी दिखती है, परन्तु वस्तुतः यहाँ शोकसन्तप्त राम का तात्पर्य लक्ष्मण के महत्त्व-वर्णन में ही है, सीता के अपकर्ष-वर्णन में नहीं । “यत्परः शब्दः स शब्दार्थः” शब्द का जिसमें तात्पर्य होता है वही शब्दार्थ होता है। फिर भी बुल्के अनिश्चितता की ही स्थिति में रह जाते हैं और कहते हैं कि उपर्युक्त उद्धरणों का उत्तरदायित्व वाल्मीकि पर है या प्राचीन गायकों पर है, इसका निर्णय असंभव है। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण पर विश्वास करनेवाले आस्तिकों को तो पूर्वोक्त ढंग से समन्वित अर्थ ही प्रतीत होता है, विरोध का अवकाश ही नहीं। वाल्मीकिरामायण ( २।६४।४३ ) में वर्णित— ‘एकपत्नीव्रतस्य’ राम के एकपत्नीव्रत की महिमा ठीक ही है। सीता को भी राम के ‘स्वदारनिरतः’ ( वा० रा० ३।९।६ ) के अनुसार स्वदाररत होने का पूर्ण विश्वास है ही। वे उन्हें ‘स्थिरानुराग’ मानती हैं। कैकेयी भी यह स्पष्ट कहती है कि राम कभी परस्त्री को चक्षु से भी नहीं देखते । “न रामः परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति ।” ( वा० रा० २।७२।४८ ) आनन्दरामायण में तो राम स्वयं ही कहते हैं कि सीता को छोड़कर सभी नारियाँ उनके लिए कौशल्या के तुल्य हैं— अन्यत् सीतां विनाऽन्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये ॥ ( आ० रा० विलासकाण्ड सर्ग ७ ) जैनों ने राम की ८००० और लक्ष्मण की १६००० पत्नियां मानी हैं, जो आर्षरामायणविरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रसिकसम्प्रदाय की दृष्टि में राम परमेश्वर हैं। उनमें बहुतों की पतिभावना हो सकती है, परन्तु वह भावना की बात है, व्यावहारिक नहीं। इसी प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के सीता से विवाह करने की बात खोतानी रामायण, राम वानररूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करते हैं ( सेरीराम ), राम वाली की विधवा से विवाह कर अङ्गद के पिता बनते हैं ( अनु० ३२७ ) रामकथा, आदि सब को रामायण की विकृतियां ही समझना चाहिये । अयोनिजा सीता ४०५ वें अनु० में बुल्के सीता के जन्म के सम्बन्ध में कहते हैं “सीता के कुलपरम्परासम्बन्धी तथ्यों के अभाव के कारण अनेक प्रकार की कथाएँ प्रचलित हुई हैं। जनक, रावण और दशरथ तीनों ही सीता के पिता माने गये हैं।” परन्तु यह उनका भ्रम ही है। रामायण के अनुसार सीता अयोनिजा ही हैं। उनके अनुसार महाभारत,

अध्याय बालकाण्ड ४४५ हरिवंश, पउमचरियं और आदिवाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता जनकजा है । यद्यपि प्रचलित रामायण से भिन्न आदिरामायण नाम की कोई वस्तु नहीं है। वह केवल पाश्चात्यों के मस्तिष्क का फितूर ही है। महाभारत रामो- पाख्यान में सीता को जनक की आत्मजा अवश्य कहा गया है । विदेहेराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो ।” ( म० भा० ३।१५८।९ ) परन्तु यहाँ आत्मजा शब्द पुत्री का ही बोधक है जैसे अग्निजा द्रौपदी भी द्रुपदात्मजा या द्रौपदी हुई वैसे ही अयोनिजा सीता भी पुत्रीत्वेन जनक द्वारा स्वीकृत होने के कारण जनकात्मजा या जानकी हो ही जाती हैं। हरिवंश ( १।४१ ) का भी यही समाधान है । संक्षेप कथा के कारण ही उनमें सीताजन्म का विशेष विवरण न होना स्वाभाविक ही है। अनसूया-सीता-संवाद में, अशोकवाटिका में हनुमान् द्वारा तथा अग्निपरीक्षा प्रसंग में सीता को भूमिजा अयोनिजा कहा गया है और इन काण्डों को बुल्के प्रामाणिक भी कहते हैं फिर भी इन प्रसङ्गों को वे प्रक्षेप कहते हैं, जिसका कि मैंने अनेक प्रसङ्गों में खण्डन कर दिया है । प्रामाणिक टीकाकारों ने सातों काण्ड रामायण को प्रमाण मानकर उन सभी काण्डों और उक्त सर्गों पर भी टीकाएँ लिखी हैं। अयोध्याकाण्ड के ११८ वें सर्ग के अनुसार अत्रि-पत्नी अनसूया सीता से प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य वस्त्र, आभरण और महार्ह दिव्य अङ्गराग तथा मालाएँ प्रदान करती हैं और सीता से उनके स्वयंवर की कथा पूछती हैं। उसी प्रसङ्ग में सीता कहती हैं मेरे पिता मिथिलाधिपति हल से ( चयन-यज्ञप्रसङ्ग में ) यज्ञयोग्य क्षेत्रमण्डल का कर्षण कर रहे थे मैं पृथिवी-भेदन करके निकल पड़ी थी । गुण्ठित सर्वाङ्गवाली मुझे देख विस्मित होकर जनक ने अनपत्य होने के कारण स्नेह से अङ्क में मेरी पुत्री कह कर उठा लिया और मुझे अपनी ज्येष्ठ पत्नी को प्रदान किया । उसने मातृभाव से मेरा पालन किया । उसी प्रसङ्ग में सीता ने अपने को अयोनिजा भी कहा है— “तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् । अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता । अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम् । ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः । अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ॥” (वा० रा० २।११८ २८-३७) यही बात वाल्मीकिरामायण ( ५।१६ ) में कही गयी है जो हलमुखक्षत क्षेत्रमण्डल में मेदनी-भेदन करके उत्पन्न हुई है वह धर्मशील जनकराज की पतिव्रता पुत्री है— “उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते । पद्मररेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः ॥” इसी तरह अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में भी सीता ने साधारण स्त्रियों से अपनी विशेषता बतलाते हुए अपने को अयोनिजा या भूमिजा कहा है— “अपदेशो हि जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् । मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ॥” ( वा० रा० ६।११६।१५ ) नृपशार्दूल, आपने रोष का ही अनुवर्तन करते हुए सामान्य पुरुषों के समान स्त्रीत्वमात्र की दृष्टि से मेरे सम्बन्ध में शङ्काएँ व्यक्त की हैं। इसपर ध्यान नहीं दिया कि मेरा वैदेही ऐसा नाम और व्यवहार जनकयज्ञ भूमिमात्र के सम्बन्ध से ही है । जनक से मेरी उत्पत्ति नहीं हुई, किन्तु वसुधातल से ही मेरी अभिव्यक्ति हुई है । इस तरह मनुष्य-योनि से अनुत्पत्ति के कारण मुझे प्राकृत स्त्री नहीं कहा जा सकता और मेरे बहुमान चरित्र को भी आपने महत्त्व नहीं दिया ।

४४६ रामायणमीमांसा त्रयोदश वाल्मीकिरामायण के उक्त सभी स्थलों में कतक, तीर्थ, तिलक, भूषण आदि टीकाएँ हैं, अतः इन्हें प्रक्षेप कह देना साहसमात्र है। अतएव यह कहना कि आदिरामायण के अनुसार सीता जनक की औरसी पुत्री थी, सर्वथा अशुद्ध है ( वा० रा० १।१।२७; ५।१३।४; २।२८।३ तथा ३।४७।३ ) के वचनों का भी यही अर्थ हैं कि विदेहकुल में सीता जनक द्वारा पुत्रीरूप से गृहीत हुई है। "जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।" ( वा० रा० १।१।२७ ) यहाँ नागेश रामाभिरामी में लिखते हैं-- "यद्यप्येषाऽयोनिजा तथापि सीरध्वजस्य देवयजनलाङ्गलपद्धतावाविर्भूतत्वादेवमुक्तिः ।" यद्यपि सीता अयोनिजा हैं फिर भी सीरध्वज जनक के देवयजनक्षेत्र की लाङ्गल पद्धति से उनका आविर्भाव हुआ है, अतः जनक के कुल में उद्भूत मानी गयी हैं। आश्चर्य है, स्वाभिमत विरुद्ध होने से स्वयं प्रमाणत्वेन स्वीकृत २-६ काण्डों में सीता के अयोनिजा कही जाने पर भी बुल्के उसे स्वीकार नहीं करते हैं और बालकाण्ड को प्रामाणिक न मानने पर भी उसके अनुसार सीता को जनक की औरसी पुत्री सिद्ध करने की निर्लज्ज चेष्टा करते हैं । "जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा ।" ( वा० रा० ५।१३।१४ ) इस प्रसङ्ग में भी पूर्वोक्त ही अभिप्राय है। विशेषतः जनककुल की कन्या और राम की पत्नी रावण के वश में कथमपि नहीं हो सकती । “सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा ।" ( वा० रा० २।१८।३ ) यहाँ भी सीता जनक की औरसी पुत्री नहीं कही गयी हैं। इसी तरह अन्य उद्धरणों को भी उपक्रमन्याय से बालकाण्ड-कथा के अनुसार ही लगाना चाहिये । बालकाण्ड के ६६वें सर्ग में विवाह के समय स्वयं ही जनक ने सीता की उत्पत्ति का वर्णन किया था— "अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ।। भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा । वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा ।।" ( वा० रा० १।६६।१३-१५ ) क्षेत्र-शोधनार्थ अग्निचयन के लिए देवयजन क्षेत्रमण्डल का कर्षण करते हुए मेरी लाङ्गलपद्धति से सीता का उत्थान हुआ था, इसी लिए उसका नाम सीता रखा गया है। भूतल से उत्थित अतएव अयोनिजा सीता मेरी पुत्री है । टीकाकारों ने भी ऐसी ही व्याख्या की है। पद्मपुराण में “अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य पुरे स्वतः । शुभक्षेत्रे हलोत्खाते तारे चोत्तरफाल्गुने ।। अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतसन्निभा । सीतामुखे समुत्पन्ना बालभावेन सुन्दरी ।। सीतामुखोद्भवात्सीता इत्यस्यै नाम चाकरोत् ।” लोकेश्वरी लक्ष्मी जनकपुर में उत्तराफाल्गुनी शुभ नक्षत्र में हलोत्खात यज्ञीय शुभ क्षेत्र में अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतभास्वरा स्वतः आविर्भूत हुई । टीकाकारों ने भी यही सब बातें लिखी हैं । लङ्काकाण्ड के अनुसार अग्नि में प्रविष्ट होकर भी सीता ने अपने दिव्य रूप का अनुभव कराया और अन्त में उत्तरकाण्ड के अनुसार दिव्य-

अध्याय बालकाण्ड ४४७ सिंहासनासीन होकर दिव्य लोक पधार गयीं । इन सबको प्रक्षेप कहना सचमुच पाश्चात्य-मनोवृत्ति का साहस ही है । बुल्के ने यह भी लिखा है कि ब्रज के प्रचलित लोकगीत के अनुसार सीता भाट की बेटी थी । शिकार खेलते समय राम का उनसे परिचय हुआ । वस्तुतः आर्ष वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणादि आर्ष ग्रन्थ ही राम ओर सीता के वृत्त में प्रमाण हो सकते हैं । तद्विरुद्ध कल्पनाएँ निराधार तथा निरर्गल ही हैं । आश्चर्य तो यह है कि एक ओर बुल्के भाटों के लोकगीतों को प्रमाण मानते हैं और दूसरी ओर वाल्मीकि जैसे महर्षि की खिल्ली उड़ाने में नहीं सकुचाते । पउमचरियं के अनुसार जनक की पत्नी विदेहा से सीता अपने भ्राता भामण्डल के साथ उत्पन्न हुई थीं । जन्मते ही भामण्डल को कोई देवता उठा ले जाकर किसी अन्य राजा के यहाँ छोड़ देता है । यह वृत्तान्त भी वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने से अनादरणीय ही है । कालिकापुराण (अ० ३८) के अनुसार नारद निःसन्तान जनक को यज्ञ करने का परामर्श देते हुए कहते हैं कि यज्ञ के प्रभाव से दशरथ के चार पुत्र हुए हैं । तदनुसार जनक यज्ञ के लिए क्षेत्र तैयार करते समय एक पुत्री और पुत्र पाते हैं । यह कथा भी किसी कल्प की हो सकती है, पर इसके अनुसार भी सीता अयोनिजा ही हैं । विष्णुपुराण में यज्ञभूमि से ही सीता के आविर्भाव का वर्णन है । पद्मपुराणीय उत्तरखण्ड के बङ्गीय पाठ के अनुसार जनक को भूमि में पेटिकानिहित एक धनुष मिला था, जिसे खोलने पर जनक ने एक कन्या देखी । उसे सीता नाम देकर ग्रहण किया । सीतोपनिषद् में भी हलाग्रजात होने के कारण सीता नाम का उल्लेख हुआ है । उसके अनुसार भी सीता ही श्री, भू, नीला आदि दिव्य शक्तियों का दिव्य केन्द्र हैं । वीरलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी आदि सब उसी के अंश हैं । इसी दृष्टि से वह कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी मानी जाती हैं । अतएव वैदिक सीता ऐतिहासिक न होकर लाङ्गलपद्धति के मानवीकरण का परिणाम है, बुल्के का यह कथन सर्वथा निराधार है । क्योंकि वैदिक साहित्य की व्याख्या ही रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासों एवं पुराणों में की गयी है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी जिसका अंश है, वह महालक्ष्मी ही ऐतिहासिक राजकुमारी सीता के रूप में प्रकट हुई थी । यही भारतीय आस्तिकसमाज सम्मत वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों का सारार्थ है । गौडीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों की मेनका सम्बन्धित जनक की मानसी पुत्री भी हलाग्रसमुद्भूत सीता में ही गतार्थ है । बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है कि सीता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई एक वृत्तान्त प्रामाणिक नहीं माना जाता था, क्योंकि वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों में अयोनिजा सीता प्रामाणिक है ही । वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण तथा बलरामदासरामायण का भी अभिप्राय लगाना उचित है । मेनका या उर्वशी को देखकर उसी के समान कन्या प्राप्त करने की इच्छा जनक जैसे ज्ञानी को नहीं हो सकती है । ज्ञानी को कामवासना नहीं हो सकती है । जनक का तपोमय तेज भी परम्परा से भूमिजा सीता में हेतु हुआ हो तब भी सीता अयोनिजा तो रही ही । वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग १७ में वेदवती सीता के रूप में उत्पन्न हुई । ४१० वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं कि “वेदवती की कथा में सीता के पूर्वजन्म का वर्णन किया गया है, अतः उसकी उत्पत्ति के समय सीता के लक्ष्मी के अवतार होने का सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं था !” उनका यह कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि पूर्वजन्म की कथा-मात्र से अवतारत्व का विरोध नहीं होता, क्योंकि पुराणों में सीता का जन्मान्तर में रुक्मिणी होना भी प्रसिद्ध ही है । राम का भी जन्मान्तर में कृष्ण होना प्रसिद्ध है । “राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि ।” (वि० पु०) लक्ष्मी ही विष्णु के राघव होने पर सीता होती हैं एवं कृष्ण होने पर रुक्मिणी होती हैं । सभी जीव सीताराम के ही अंश होते हैं । उपासना और तपस्या के बलपर उन्हें उनका सायुज्य भी प्राप्त होता है । वेदवती ने