रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
चैत्रषष्ठ्याष्टमीं यावन्महापाश्र्वादिमारणम् । चैत्रशुक्लनवम्यां तु सौमित्रेः शक्तिभेदनम् ॥ द्रोणाद्रिराजनेयेन लक्ष्मणार्यमुपाहृतः । दशम्यामवहारोऽभूद् रात्रौ युद्धं नृरक्षसोः ॥ एकादश्यां तु रामाय रथो मातलिसारथिः । अष्टादशदिने रामो द्वैरथे रावणं वधीत् ॥ द्वादश्याः शुक्लपक्षस्य यावत्कृष्णचतुर्दशीम् । माघशुक्लद्वितीयायाश्चैत्रकृष्णचतुर्दशीम् ॥ अष्टाशीतिदिनं युद्धं मध्ये पञ्चदशाहकम् । युद्धावहारं संग्रामस्त्रिसप्तविदिनान्यभूत् ॥ संस्कारो रावणदीनाममावास्या दिनेऽभवत् । वैशाखादितिथौ रामः सुवेलं पुनरागमत् ॥ अभिषिक्तो द्वितीयायां लङ्काराज्ये विभीषणः । सीताशुद्धिस्तृतीयायां देवेभ्यो वरलम्भनम् ॥ वैशाखस्य चतुर्थ्यां तु रामः पुष्पकमास्थितः । पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां माधवस्य तु ॥ भरद्वाजाश्रमं रामः ससीतः पुनरागमत् । नन्दिग्रामे तु षष्ठ्यां वै भरतेन समागतः ॥ सप्तम्यामभिषिक्तोऽसावयोध्यायां रघूत्तमः । माघ शुक्ल १ को अङ्गद-दौत्य, २ या से सात दिन तक वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध, माघ शुक्ल ९ मी को नागपाशबन्ध, १० मी को गरुड़ द्वारा मुक्ति, दो दिन अवहार, १२ शी को धूम्राक्ष-वध, १३ शी को अकम्पन का हनुमान् द्वारा वध, माघशुक्ल १४ शी से तीन दिन में प्रहस्तवध, २ या से चतुर्थी तक राम से युद्ध में रावण का विद्रावणम् । पञ्चमी से ८ मी तक ४ दिनों में कुम्भकर्ण-प्रबोधन । नवमी से १४ शी तक ६ दिनों में कुम्भकर्णवध, ३० अमावस्या को अवहार, फा० शु० १ से ४ तक नरान्तकादिवध, ५ मी से ७ मी तक तीन दिन में अतिकाय-वध, ८ मी से १२ शी तक निकुम्भादि-वध, ४ दिनों में मकराक्ष-वध, फा० कृ० २ या को शक्रजित् की विजय, ३ या को औषधि आनयन, तदनन्तर ५ दिनों का अवहार ( युद्धबन्दी ), १३ शी से ६ दिन में इन्द्रजित् का वध, ३० अमा० को रावण की युद्ध यात्रा, चै० शु० ३ या से पाँच दिनों में रावण के प्रधानों का वध, चै० शु० ६ ष्ठी से ८ मी तक महापाश्र्वादि का वध, शुक्ल ९ मी को लक्ष्मण पर शक्ति औषधपर्वतानयन, १० मी को अवहार, ११ शी को मातलि आगमन, तदनन्तर १८ दिनों में रावण-वध । इस तरह माघशुक्ल २ या से चैत्रकृष्ण चतुर्दशी तक ८८ दिन तक युद्ध चला । बीच में १५ दिन अवहार रहा । अमा को रावण-संस्कार हुआ । वैशाख २ या को विभीषण का अभिषेक, ३ या को सीताशुद्धि, चतुर्थी को पुष्पकारोहण, वै० ५ मी को १४ वर्ष पर भरद्वाजाश्रम आगमन, ६ष्ठी को भरतभेंट और ७ मी को राम का अभिषेक । यद्यपि रावण-वध के अनन्तर सीता के दर्शन में विलम्ब होना अस्वाभाविक-सा लगता है तथापि कल्पभेद से कालगणनाभेद वश अग्निवेश्य-कथा की भी संगति हो सकती है । सर्वथापि ४ दिन में ही युद्धसमाप्ति की बात असम्भव ही है । अभी अभी बंगलादेश की स्वाधीनता का युद्ध १४ दिनों में समाप्त हुआ है । परन्तु अटकल के आधार पर कोई कह सकता है कि दो दिन में खुलना, कुष्ठिया आदि पर अधिकार, तीन दिन में चटगाँव, ढाका आदि पर
अधिकार कर लिया गया होगा । स्पष्ट ही है कि वस्तुस्थिति एवं अटकल में बहुत भेद होता है । बुल्के स्वयं मानते हैं कि प्रक्षिप्त सर्गों का ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है । हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५६४ वें अनु० में वे कहते हैं, "हनुमान् की हिमालय-यात्रा का दो बार सर्ग ७४ और सर्ग १०१ में वर्णन हैं । वे कहते हैं इसके प्रक्षिप्त होने का सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क हनुमान् के समुद्र-लङ्घन का वर्णन है (वा० रा० ५।१) । हिमालय की यात्रा इस लङ्घन से कहीं अधिक असाधारण है। फिर भी इस कार्य की कठिनाई का वर्णन नहीं किया गया । यदि समुद्र-लङ्घन तथा हिमालय यात्रा का वर्णन दोनों एक के ही द्वारा रचित होते तो हिमालय-यात्रा को अधिक महत्त्व दिया जाता । महाभारत में हनुमान् की हिमालय-यात्रा का उल्लेख नहीं है ।" परन्तु यह भी उनकी भ्रान्ति ही है, कारण स्पष्ट है । १०० योजन समुद्र का लङ्घन ही कठिन काम था, क्योंकि उसमें बीच में कहीं ठहरने या रुकने का अवकाश नहीं था। हिमालय-यात्रा में वह कठिनाई नहीं थी । पर्वतों और वृक्षों को उखाड़ कर लाना तो उन असाधारण बन्दरों के लिए कठिन था ही नहीं । इसके अतिरिक्त एक बड़ी कठिनाई के वर्णन के बाद पुनः पुनः वैसा ही वर्णन महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता । महाभारत का रामोपाख्यान तो संक्षेप कथानक ही है । अतः उसमें हिमालय-यात्रा का वर्णन न होना लाघवार्थ ही है । बुल्के कहते हैं कि "त्रिष्टुप् छन्दों का बाहुल्य भी प्रामाणिकता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करता है । सर्ग १०१ को हटाने पर १०० का १०२ से सुगमता से मेल बैठ जाता है । १०० के कुछ श्लोक १०२ में दुहराये गये हैं । इससे भी १०० का प्रक्षिप्त होना सिद्ध होता है," पर यह भी तर्क लचर ही है, क्योंकि महाकाव्यों में विविध छन्दों का होना दूषण न होकर भूषण ही है । मेल तो सर्गान्त के श्लोकों से ही हो जाता है फिर तो बीच के सभी श्लोक प्रक्षिप्त ही ठहरेंगे । इस दृष्टि से देखा जायगा तो सारी बाइबिल प्रक्षिप्त ही सिद्ध होगी । चमत्कारवाली सारी घटनाएँ बाइबिल की प्रक्षिप्त ही सिद्ध होंगी । अग्नि-परीक्षा ५६५ अनु०, अग्नि-परीक्षा के सम्बन्ध में पिछले प्रकरण में विचार हो ही चुका है । इसी तरह ५६६ वें अनु० में पुष्पक-यात्रा सर्ग १२३ को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । "यदि रावण के पास पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसका उपयोग वर्णित होता, किन्तु अरण्यकाण्ड में उसका उल्लेख नहीं है । सुन्दरकाण्ड का पुष्पक-वर्णन सर्ग भी प्रक्षिप्त है । युद्धकाण्ड की अन्तरङ्ग परीक्षा से भी प्रतीत होता है कि आदिरामायण में वापसी यात्रा में पुष्पक का कोई उल्लेख नहीं था । सर्ग १२३ के अन्त में पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुँचने का उल्लेख किया गया है, किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर राम के भरद्वाज आश्रम में पहुँचने का वर्णन है । लङ्का में राम ने विभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था— “अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ।” (वा० रा० ६।१२१।७) भरद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान माँग लिया था कि मार्ग में सभी वृक्ष अकाल में भी फल- दार हों “अकालफलिनो वृक्षाः ।” इसके अतिरिक्त हनुमान् से समाचार प्राप्त करने के पश्चात् जब अयोध्यावासी राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब वानर-सेना द्वारा गोमती नदी पार करने का तथा उनके द्वारा उड़ायी गयी धूल का उल्लेख किया गया है— "मन्ये वानर-सेना सा नदीं तरति गोमतीम् । रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥" (वा० रा० ६।१२७।२८)
५५० रामायणमीमांसा अष्टादश
इन उद्धरणों से अनुमान किया जा सकता है कि आदिरामायण में राम स्थल-मार्ग से ही अयोध्या लौटे थे । अतः पुष्पकविषयक सामग्री को विशेषकर सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिये।" बुल्के की उक्तियाँ कुशकाशावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। पहले नास्तिक लोग यह विश्वास ही नहीं करते थे कि उड़ने- वाला यथेष्ट मनुष्यों को लेकर चलनेवाला भी विमान हो सकता है ? परन्तु आज विमानों के बाहुल्यकाल में समझदार लोग अब वैसी शङ्का नहीं करते हैं, पर फिर भी पाश्चात्यों का यह अन्धविश्वास आज भी बना हुआ है कि दुनिया में सभ्यता या विज्ञान का विकास ईसा के पहले हो ही नहीं सकता। इसी कारण वाल्मीकिरामायण तथा सभी रामायणों में प्रसिद्ध पुष्पक यान को बुल्के झुठलाने का प्रयत्न करते हैं। इसी लिए वे सुन्दरकाण्ड के पुष्पक-वर्णन को भी झुठलाते हैं। यह कोई तर्क ही नहीं है कि यदि पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसी का प्रयोग होता। आज भी वायुयान रहने पर कई बार राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री मोटर पर भी यात्रा करते हैं। एतावता कौन कह सकता है कि राष्ट्रपति को वायुयान सुलभ नहीं है। इतना ही क्यों पुष्पक यान द्वारा ही रावण ने युद्ध क्यों नहीं किया ? यह भी शङ्का हो सकती है। बुल्के को क्या अभीष्ट है ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि पुष्पक यान था ही नहीं ? या था तो परन्तु उसका प्रयोग ही नहीं हुआ ? दोनों बातों में उक्त हेतु सङ्गत नहीं है, क्योंकि अमुक समय पर उसके प्रयोग का उल्लेख न होना उसके अभाव का साधक नहीं होता। जब कि उसके विपरीत सुन्दरकाण्ड में पुष्पक का वर्णन है। पुष्पक द्वारा राम की यात्रा का भी वर्णन है। केवल एक स्थल के अनुल्लेख से दो स्थलों के उल्लेख को अनुल्लेख कैसे मान लिया जाय ? यदि अरण्यकाण्ड में उल्लेख होता भी तो भी सुन्दरकाण्ड के उल्लेख के समान ही उसको प्रक्षिप्त कहने में आपको क्या बाधा हो सकती थी ? दूसरा तर्क और भी निस्सार है। यदि आप सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक को प्रमाण मानते हैं तो उसके पूर्वापर के श्लोकों को भी प्रमाण मानना ही पड़ेगा । अयोध्या का दुर्गम मार्ग है, यह कहने का प्रसङ्ग ही क्यों आया और फिर उसका समाधान क्या हुआ ? इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि विभीषण ने प्रार्थना की कि ये अलङ्कारकुशल पद्माक्षी स्त्रियाँ आपको विधिवत् उद्वर्तन, अभ्यङ्ग, स्नान, अङ्गराग, वस्त्राभरण, चन्दन तथा दिव्य माल्य धारण करायेंगी। इसपर राम ने विभीषण से कहा कि सुग्रीव प्रभृति मुख्य वानरों को स्नानादि करने को निमन्त्रित करो। वह धर्मात्मा सुखोचित सुकुमार सत्यसंश्रय महाबाहु भरत मेरे लिए तपस्याभिरत होकर संतप्त हैं। उन कैकेयीपुत्र धर्मचारी भरत के विना मुझे स्नान, वस्त्राभरण आदि कुछ भी इष्ट नहीं है। अतः हम शीघ्र ही जाना चाहते हैं। अयोध्या जाने का रास्ता बड़ा ही दुर्गम है। राम का ऐसा वचन सुनकर ही विभीषण ने कहा कि मैं आपको एक ही दिन में अथवा झटिति अयोध्या पहुँचाऊँगा । सूर्यसंनिभ पुष्पक नामक विमान, जो कि कुबेर का था, जिसे बलवान् रावण ने जीत लिया था। वह कामगामी दिव्य विमान आपके लिए प्रस्तुत है। इससे आप शीघ्र ही अयोध्या पहुँच जायँगे। इससे स्पष्ट है कि अयोध्या का मार्ग दुर्गम है। भरत का विश्लेष अधिक काल तक अब सह्य नहीं है। इस स्थिति में पुष्पक का प्रयोग उपयुक्त ही है। बुल्के के अनुसार यदि पद-यात्रा होती तो लङ्का से अयोध्या पहुँचने में कम से कम तो एक मास का समय अपेक्षित होता। बहुसंख्यक वानर दल को लेकर इतनी दूर की यात्रा का उल्लेख भी कहीं नहीं है, अतः सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक से ही पुष्पक यान द्वारा राम की अयोध्या-यात्रा प्रमाणित होती है। वहीं विभीषण ने यह भी कहा, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, यदि आप मेरे गुणों और सेवाओं को स्मरण करते हैं, यदि मुझमें आपका सौहार्द है तो आप यहाँ सर्वकामों से अचित होकर कुछ समय निवास करें। ससैन्य तथा ससुहृद्गण मेरी सत्क्रिया को स्वीकार करें। मैं बड़े प्रणय, संमान तथा सौहार्द से आपसे प्रार्थना करता हूँ। मैं आपका प्रेष्य ( सेवक ) हूँ, आज्ञा नहीं प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या का प्रस्थान करें। राम ने सुन रहे सभी वानरों और राक्षसों के बीच में कहा कि वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट साचिव्य ( मन्त्रणा ) से पूजित हो चुका हूँ। मैं तुम्हारी बात न मानूंगा यह नहीं, किन्तु राक्षसेश्वर, अपने उस भरत को
अध्याय युद्धकाण्ड ५५१ देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर है, जो मुझे लौटाने के लिए चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने के लिए प्रार्थना कर रहा था, फिर भी जिसकी बात को मैंने नहीं स्वीकार किया। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी, सुहृद् गुहराज तथा जानपदों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है, अतः मुझे जाने की ही अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसेश्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं । शीघ्र ही विमान लाओ— “स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः । सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ तं विना कैकेयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् । न मे स्नानं बहुमतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ एतत्पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छामि तां पुरीम् । अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः । अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसन्निभम् । त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥” (वा० रा० ६।१२१।५–११) इस प्रसङ्ग से स्पष्ट ही पुष्पक-यात्रा की सङ्गति प्रतीत होती है । सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त मान लेने से यही कहना पड़ेगा कि एकदम १४ वर्ष पूर्ण होने पर पञ्चमी के दिन भरद्वाज के आश्रम में आ गये । पर यह वर्णन अस्वाभाविक ही होगा, स्वाभाविक यही है कि पुष्पक यान के द्वारा लौटते हुए राम सीता को त्रिकूटशिखरस्थित लङ्का, युद्धस्थली, रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि के वधस्थलों को बतलाते हुए सेतुबन्ध महादेव आदि की चर्चा करते हुए किष्किन्धा आये । वहाँ से सुग्रीवादि के अन्तःपुर को लेकर ऋष्यमूक, पम्पा, कबन्ध-वधस्थल, जटायुमुक्ति- स्थान, गोदावरी, अगस्त्य और शरभङ्ग के आश्रम और चित्रकूट दिखलाते हुए ऊपर से दिखायी देनेवाली अयोध्या को दिखलाकर भरद्वाज के आश्रम में उतरे । कोई दुस्तर्क ही करने बैठे तो कह सकता है राम अगस्त्य के आश्रम में तथा चित्रकूट आदि में क्यों नहीं रुके । भरद्वाज के आश्रम में ही क्यों रुके, सीधे अयोध्या क्यों नहीं चले आये ? अस्तु, सर्ग १२४ में राम ने स्वयं वरदान नहीं माँगा, किन्तु महर्षि ने ही सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन कर कहा कि जैसे ब्रह्मादि देवताओं ने वरप्रदान किया था वैसे ही मैं भी आपको वरप्रदान करता हूँ। तब राम ने वानरों के सुख के लिए वरदान माँगा कि सभी वृक्ष उत्तमोत्तम अमृततुल्य रस और गन्धयुक्त फलवाले तथा उत्तमोत्तम मधुस्रावी हो जायँ । पर इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि राम पदाति वानरों के साथ चल रहे थे । इसी तरह वानर- सेना गोमती पार कर रही थी, उससे उड़ी हुई धूलि से इतना ही सिद्ध होता है कि वानर-सेना नदी पार कर रही थी और वही वहाँ पदाति चल रही थी । सेतुबन्ध होने पर भी बहुत से बन्दर उड़कर तथा कूदकर पार जा रहे थे । हनुमान् तथा अङ्गद पर आरूढ होकर राम और लक्ष्मण वानरी-सेना के आगे चल रहे थे । बहुत से वानर बीच में, बहुत से अगल बगल चल रहे थे, कई लोग सलिल मार्ग से चल रहे थे एवं बहुत से सुपर्ण के तुल्य आकाशमार्ग से ही चल रहे थे— “सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे । केचिद् वेहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥” (वा० रा० ६।१२४।८१ )
इसी तरह वानर लोग मधुर फल एवं सुगन्धित मधु पान करते हुए भूमिमार्ग पर चल रहे थे। वे ही लोग गोमती पार करते हुए धूलि उड़ा रहे थे । उसी सर्ग १२७ का जहां वानरों के गोमती पार करने की चर्चा है वहीं यह भी वर्णन है कि हनुमान् ने बतलाया यह तरुणादित्य संकाश विमान आ रहा है । इसमें वैदेही के साथ राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। उनके साथ सुग्रीव एवं राक्षसराज विभीषण बैठे हैं। इस तरह प्रधान प्रधान लोग विमान में थे । अन्य बहुत से लोग आकाश-मार्ग तथा स्थल-मार्ग से चल रहे थे । “विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।” ३०।। “एतस्मिन् भ्रातरो वीरो वैदेह्या सह राघवौ । सुंग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ।। "३२।। (वा० रा० ६।१२९) यदि इसे प्रक्षेप कहें तो गोमती तरणवाले श्लोक को ही क्यों न प्रक्षेप कहा जाय ? अतः १२५ वें सर्ग के अनुसार समझना चाहिये कि आकाश-मार्ग से आते हुए राम ने अयोध्या देखकर विचार किया कि आज पञ्चमी को ही १४ वाँ वर्ष पूर्ण हो रहा है। भरद्वाज के आश्रम में विलम्ब हो सकता है। भरत की प्रतिज्ञा थी कि यदि १४ वर्ष पूर्ण होने पर आपका दर्शन न होगा तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा । इसलिए राम ने हनुमान् पर दृष्टि डाली और कहा तुम अयोध्या शीघ्र जाओ और जानो कि सब लोग सकुशल हैं ? शृङ्गवेरपुर जाकर मेरे आत्मतुल्य सखा निषाद- राज से कुशल कहो । वे सब अयोध्या की स्थिति बतलायेंगे । भरत को सब समाचार बताओ और भरत आदि का अभिप्राय जानो । यदि वे राज्य चाहते हों तो वही सम्पूर्ण वसुधा का शासन करें । इस तरह भरत का अभिप्राय जान जब तक आश्रम से दूर अयोध्या के समीप न पहुँचें तभी तक लौटकर सब समाचार बताओ । हनुमान् आकाशमार्ग से शीघ्र ही गुहराज से मिल कर भरत से मिले । भरत को सविस्तर राम का सारा समाचार सुनाया और भरत की दृढ़ प्रीति की स्थिति का प्रत्यक्ष दर्शन किया । पद्मपुराण के अनुसार पञ्चमी को ही हनुमान् ने अयोध्या जाकर देखा कि भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं— "अग्निप्रवेशे सोद्योगः काले भ्रातुरनागमात् । न्यवेदयत्तदा तस्मै श्रीरामागमनोत्सवम् ॥” ( वा० रा० ६।१२५।१ टीकोद्धृत पद्मपुराणवचन ) भ्राता राम के न आने के कारण भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे थे । हनुमान् ने जाकर उन्हें श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार सुनाया था । अपने सखा वानरेन्द्र सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गदादि तथा विभीषण आदि की प्रियकामना से ही समुचित स्वागत आदि के लिए राम ने हनुमान् को अयोध्या भेजा था— “प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ।” ( वा० रा० ६।१२६।१ ) सभी वानरों के सम्मान एवं स्वागत के लिए ही राम ने भरद्वाज से दिव्य गन्ध और रस से युक्त अमृतो- पम फलों से युक्त एवं मधुस्रावी वृक्षों के होने का वरदान माँगा था। भरद्वाज के वर-प्रदान से सभी वृक्ष कल्पवृक्ष के समान दिव्य पुष्प और फलों से लद गये थे । शुष्क वृक्ष भी पत्र, पुष्प, फल तथा दिव्य मधु प्रस्रवणशील हो गये । अयोध्या के मार्ग में सब तरफ तीन तीन योजन तक यही स्थिति रही— “अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसन्निभाः । निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥ शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः । सर्वतो योजनास्तिस्रो १ गच्छतामभवंस्तदा ॥" (वा० रा० ६।१२६।२१,२२) १. योजना त्रीणि इति वा पाठः ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५५३ यह सब वानरों के विश्रामार्थ ही हुआ । यहाँ तिलककार ने "वानराणां विश्रामार्थमिति शेषः" कहा है । अतएव वानर भरद्वाज के आश्रम से फलों, फूलों तथा मधुररस फलों का स्वाद लेते हुए पुष्पक छोड़कर आकाश-मार्ग एवं स्थल-मार्ग से ही चल पड़े । इसी लिए वानर-सेना के पदाति चलने तथा गोमती पार करने का उल्लेख सार्थक ही है । यदि पुष्पक-प्रयोग न हुआ होता तो अवश्य ही उल्लेख होना आवश्यक था कि राम पैदल चले या किसी रथ पर चले । रथ भी तो कौन ? रावण-रथ के समान आकाशचारी रथ था या भूमिचारी था और राम कितने दिनों में भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे ? पूर्वोक्त गणना के क्रम से और सर्ग १२१ की भरतसम्बन्धी रामचिन्ता से स्पष्ट निश्चय होता है १४ वर्ष पूरे होने में एक दो दिन ही शेष थे । अतः पुष्पक यान के बिना इतनी शीघ्रता से अयोध्या पहुँचना असम्भव ही था । बुल्के आगे चलकर ५६७ वें अनु० में युद्धकाण्ड में विकास की बात करते हैं । वस्तुतः प्राणी को एक झूठ का समर्थन करने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं । ऐसे ही बुल्के को एक अंश को प्रक्षिप्त सिद्ध करने के लिए तत्सम्बन्धित अनेक स्थलों को भी क्षेपक कहना पड़ता है । युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम हनुमान् की प्रशंसा करते हुए लङ्का-दहन का उल्लेख करते हैं तथा समुद्र के कारण चिन्तित होते हैं । इस अंश को बुल्के इसलिए प्रक्षेप कहते हैं कि वे लङ्का-दहन को प्रक्षिप्त कह चुके हैं । सर्ग २ और ३ को भी वे विकास मानते हैं, क्योंकि उनमें लङ्का-दहन की बात है । सेतुनिर्माण के उल्लेख को वे इसलिए प्रक्षेप मानते हैं कि सेतुनिर्माण का अब तक निर्णय हुआ ही नहीं था, क्योंकि राम ने समुद्र के तट पर पहुँचकर कहा कि अब हमें समुद्र पार करने के उपाय पर परामर्श करना चाहिये— "सम्प्राप्तो मन्त्रकालो नः सागरस्येह लङ्घने ।” ( वा० रा० ६।४।१०१ ) इस सर्ग में सेना के अभियान का वर्णन किया गया है । बुल्के का यह तर्क निराधार है, कारण कि अन्तिम निर्णय होने के पहले भी सम्भावना के आधार पर आश्वासन देना असम्भव नहीं है । समुद्रपार लङ्कास्थित सीता का आनयन करना ही है । हनुमान् जैसे अध्यवसायी, उद्योगी और प्रयत्नशील हैं वैसे सब नहीं हैं, अतः समुद्र में सेतुबन्ध द्वारा ही इतनी बड़ी सेना उतारी जा सकती है । सुग्रीव का यह आश्वासन देना कि समुद्र में सेतु बाँधकर हम लोग समुद्र उतरेंगे असम्भव नहीं कहा जा सकता है । इतनेमात्र से सर्ग के सर्ग को प्रक्षिप्त मानना असङ्गत ही है । मन्त्रणा द्वारा अन्तिम निर्णय किया जाता है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि मन्त्रणा के पहले वैसी बातें किसी के मन में आ ही नहीं सकतीं । अतएव सुग्रीव का यह वाक्य युक्त ही है— "अबध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये । लङ्का न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥" ( वा० रा० ६।२।११ ) घोर वरुणालय समुद्र में सेतुबन्ध के बिना सेन्द्रादि सुरासुर भी लङ्का का मर्दन नहीं कर सकते । अतः— "सेतुरत्र यथा बध्येद्यथा पश्येम तां पुरीम् ।” ( वा० रा० ६।२।९ ) वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार भरत ने भी सीताहरण का समाचार सुनकर राजाओं को आमन्त्रित कर युद्ध की तैयारी की थी । परन्तु उनके वहाँ गमन के पहले ही वानर-सेना सहित राम ने लङ्काविजय कर ली थी । "भरतेन वयं पश्चात् समानीता निरर्थकम् ।” ( वा० रा० ७।३९।४ )
५५४ रामायणमीमांसा अष्टादश गौड़ीय पाठ ५६८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि विभीषण-चरित रावणसभा-सम्बन्धी सर्गों में से दो ही सर्ग प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। सर्ग ९ की मुख्य कथावस्तु है विभीषण द्वारा लङ्का के विनाश की आशङ्का तथा सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध । १६ वें सर्ग में रावण सम्बन्धियों की सामान्य निन्दा करते हुए कहता है जाति के लोग ही स्वार्थ- प्रयुक्त घोर भयावह होते हैं । विभीषण को कुलपांसन भी कहा गया है । इस घोर भर्त्सना से घबराकर विभीषण चार राक्षसों के साथ लङ्का छोड़ देता है (सर्ग १६) । किन्तु बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है । इन सर्गों को प्रक्षिप्त मानना भी प्रमाद ही है। क्योंकि ९ वें सर्ग में विभीषण ने रावण के पार्श्ववर्तियों के बड़े-बड़े अनर्गल प्रलापों को सुनकर बड़ी नम्रता से सबको बैठाकर समझाया और कहा कि तात ! जो अर्थ प्राप्त हो सकता है उसी के लिए विक्रम किया जाना उचित है। प्रमत्तों में, शस्त्रादि आक्रान्त जनों में एवं दैव से प्रहत लोगों में विधिप्रयुक्त विक्रम सफल नहीं होते हैं। जो विजिगीषु अप्रमत्त है और बलयुक्त है, जितरोष एवं दुराधर्ष है उसकी धर्षणा नहीं हो सकती। नदनदीपति-समुद्र का उल्लङ्घन कर लङ्का आनेवाले हनुमान् की गति को कौन जान सकता है और कौन उस सम्बन्ध में तर्क भी कर सकता है ? शत्रु के अपरि- मेय बलों एवं वीर्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये । राम ने राक्षसराज रावण का क्या अपराध किया था जो जनस्थान से उनकी भार्या को अपहरण करके ले आये हैं। यदि खर ने मर्यादा का अतिक्रमण किया तो उसे दण्ड दिया गया। प्राणी को अपने प्राणों की रक्षा का अधिकार तो है ही । इन सबका निमित्त वैदेही का अपहरण है । उसका शीघ्र ही परित्याग करना चाहिये । धर्मानुवर्ती वीर्यवान् राम से निरर्थक कलह में कोई लाभ नहीं । जब तक राम साश्व, सगज, बहुरत्नसमाकुला पुरी को अपने बाणों से विदीर्ण न करें उसके पहले ही मैथिली को प्रदान कर देना चाहिये । १० वें सर्ग में साहित्यिक ढङ्ग से वर्णन किया गया है कि विभीषण पुनः रावण के समृद्धि-सम्पन्न भवन में पहुँचे । वहाँ वेदविद् विद्वानों द्वारा विजयानुगुण पुण्य घोष सुना, लोक-परलोकविद् आचारकोविद विभीषण ने शिष्टा- चार के साथ तेजों से दीप्यमान राक्षसों से पूजित ज्येष्ठ भ्राता रावण का वन्दन किया और मन्त्रियों की सन्निधि में सान्त्वना के साथ रावण का प्रसादन करते हुए अत्यन्त युक्तियुक्त एवं हित की वैसी ही बात कही जो देश, काल एवं अर्थ के अनुगुण थी । उन्होंने बतलाया कि जब से वैदेही लङ्का में आयी हैं उसी समय से अशुभ निमित्त परिलक्षित हो रहे हैं। अरणि-मन्थनादि द्वारा उत्पन्न होते हुए तथा प्रणयन काल में धूम-कलुषित चिनगारीयुक्त अग्नि का उदय होता है। विधिवत् मन्त्रसंघ से होम करने पर भी अग्निदेव अभिवृद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। आपकी अग्निशाला तथा वेदाध्ययन स्थान में सर्प दिखायी देते हैं । हवनीय हवि में पिपीलिकाएँ मिलती हैं। गायों का दूध सूख गया है, कुञ्जर मदहीन हो रहे हैं, अश्व दीन शब्दों में हिनहिनाते हैं और खूब खाने पर भी भूखे ही बने रहते हैं । खर, उष्ट्र और अश्वतर ऊर्ध्वरोमा (जिनके रोयें खड़े हैं) होकर आँसू गिराते हैं, नाना प्रकार की चिकित्सा होने पर भी स्वस्थ नहीं होते हैं। कौए संघ के संघ एकत्रित होकर विमानों के अग्रभाग में स्थित होकर क्रूर बोली बोलते हैं। सायं प्रातः गृध्र पुरी के ऊपर मँडराते रहते हैं। शृगालियाँ अमंगल नाद करती हैं। पुरी के द्वारों पर संघबद्ध भेड़िये और मृग एकत्रित होते हैं। विद्युत्पात तथा घनगर्जन के निर्घोष सुनायी पड़ते हैं । इन सबका प्रायश्चित्त यही है कि सीता राघव को दे दी जायें। मोह से या लोभ से आप मेरे वचनों में दोषबुद्धि न करें। मैंने जो कहा है, वह सबको प्रत्यक्ष है, बाहर भीतर राक्षस राक्षसी सभी अनुभव करते हैं। आपके भय से मन्त्री लोग कुछ नहीं कहते हैं तथापि जो देखा और सुना है, उसके अनुसार आपके हितार्थ सब कुछ कहना कर्तव्य है । ११ वें सर्ग में भी बड़े उत्तम ढङ्ग से महान् ऐश्वर्यपूर्ण सपरिकर राजा रावण का तथा विभीषण का समागमन और यथायोग्य उपवेशन वर्णित है । १२ वें सर्ग में प्रहस्त सेनापति अपने आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा-प्रबन्ध
अध्याय युद्धकाण्ड ५५५
का निरूपण करता है । प्रहस्त का वचन सुनकर रावण अपनी सीताविषयिणी कामना का निरूपण करते हुए अपना दैन्य व्यक्त करता हुआ कहता है सीता को प्राप्त करने के लिए राम और लक्ष्मण समुद्र-तट पर आ गये हैं । जिस तरह सीता न देनी पड़े और वे दोनों मारे जायें इस प्रकार की मन्त्रणा करें— “अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ । भवद्भिमंन्त्र्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम् ॥” (वा० रा० ६।१२।२५ ) कामव्याकुल रावण का परिदेवन, काम, शोक और प्रलाप सुनकर क्रुद्ध होकर कुम्भकर्ण ने कहा “यदि पहले ही विचार कर यह कार्य किया गया होता तो आपके चित्त की यह दशा न होती । हम लोगों के साथ पहले से ही विचार करना आवश्यक था । जो राजा न्याय से राजकार्य करता है, उसे पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता । जैसे अभिचारप्राय अपवित्र यज्ञों में हुत हवि उलट कर प्रयोक्ता के लिए ही अशुभकारक होते हैं “प्रत्यगेनमभिचारस्तुनोते” उसी तरह मन्त्रियों द्वारा सामादि उपायों का विचार बिना किये मोह से स्वयं जो विपरीत अनुचित कार्यों को करता है वे कर्म ही कर्ता के लिए अनिष्टकारक होते हैं । जो प्रथम कार्य को पीछे करना चाहता है और पश्चात् कर्तव्य को पहले ही कर डालता है वह नय-अनय कुछ भी नहीं जानता । जैसे प्रथम सामप्रयोग के स्थान पर दण्ड का प्रयोग करता है और पश्चात् प्रयोक्तव्य दण्ड का प्रथम ही प्रयोग करता है । शत्रु लोग अधिक बल देखकर भी विषय-चापल्य के कारण उसी तरह रन्ध्र ढूँढ ही लेते हैं जैसे हंस लोग दुर्लङ्घ्य भी क्रौञ्च पर्वत को लांघने के लिए उसमें कीर्तिकेय- शक्ति द्वारा किये हुए छिद्रों को ढूँढ़ लेते हैं । ऐसा अप्रचिन्तित महान् अनुचित कर्म करने पर राम ने आपका वध नहीं किया आप जीवित हैं, यह सौभाग्य की बात है । विषमिश्र आमिष भक्षण के तुल्य प्रबल दारहरणरूप कार्य आपने अप्रतिम अनुचित कार्य किया है । फिर भी मैं तुम्हारे शत्रुओं का हनन करके तुम्हारा कार्य सब ठीक करूँगा ।” १३वें सर्ग में कुम्भकर्ण की बात से क्रुद्ध रावण को देखकर महापार्श्व ने रावण से अनुरोध किया कि वह बल-प्रयोग से अपनी कामनापूर्ण करें, पर रावण ने पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप की चर्चा करके बल-प्रयोग में लाचारी प्रकट की । १४वें सर्ग में विभीषण ने पुनः रावण से राम के प्रबल पराक्रम और उनके घोर बाणों की चर्चा करते हुए कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापार्श्व, महोदर, कुम्भ, निकुम्भ, अतिकाय आदि को अकिञ्चित्कर बतलाया और यह कहा कि यह सब मित्ररूप अमित्र ही हैं जो असमीक्ष्यकारी राजा का अनुसरण कर रहे हैं । निष्काम सुहृदों का कर्तव्य है कि सहस्रमूर्धावाले अनन्त देहवाले महावल भीम नागपाश से वेष्टित राजा की केशग्रहणान्त अनुचित कार्य करके भी वैसे ही रक्षा करें जैसे भीमबलवाले भूतों से गृहीत पुरुष की उसके अभिभावक निगृहीत करके रक्षा करते हैं । विभीषण ने कहा सुचरितरूपी जल से पूर्ण राघवरूप सागर से प्रच्छाद्यमान तथा निमज्ज्यमान और पाताल-मुख में गिरते हुए राजा को मेरा यह कथन पुर और राष्ट्र सहित, राक्षस जाति सहित तथा सुहृदों सहित राजा के लिए अत्यन्त पथ्य है कि राम को मैथिली प्रदान की जाय, परकीय बल एवं स्वबल को देखकर बलस्थिति और उसके उपचय को देखकर मन्त्री को यथावत् करना चाहिए । प्रकृत में वानरों की सहायता से परकीय बल का उपचय हुआ है । हमारा बल खर, दूषण आदि के नाश से क्षीण हुआ है । १५वें सर्ग में बृहस्पतितुल्य बुद्धिवाले विभीषण की बात को सुनकर नैर्ऋतराजमुख्य इन्द्रजित् ने कहा—तात कनिष्ठ, आप बहुत भययुक्त अनर्थक बात कह रहे हैं । जो इस महान् पौलस्त्य-कुल में नहीं उत्पन्न हुआ वह भी ऐसा नहीं बोल सकता । सत्त्व, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज से रहित एक ही पुरुष तात कनिष्ठ विभीषण ही इस कुल में हुए हैं— “सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च । एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तातकनिष्ठ एषः ॥” ( वा० रा० ६।१५।३ ) वे मानुषपुत्र राम और लक्ष्मण क्या हैं ? एक प्राकृत राक्षस भी उन्हें मार सकता है । भीरो ! क्या
५५६ रामायणमीमांसा अष्टादश डरवाते हो त्रिलोकनाथ देवराज इन्द्र को भी जीतकर मैंने धरातल में निविष्ट कर दिया था। भयभीत होकर देवगण विभिन्न दिशाओं की ओर भग गये थे। निःस्वन उन्माद करते हुए ऐरावत को भी मैंने भूमि में गिरा दिया था। उसके दाँतों को बलात् खींच कर मैंने समग्र देवताओं को डराया था। मैं देवताओं का दर्पहन्ता एवं दैत्योत्तमोँ का शोकहर्ता हूँ। क्या मैं प्राकृत दो मनुष्य राजपुत्रों का निग्रह नहीं कर सकता ? इस तरह इन्द्रकल्प सुदुरासद-महोर्जा इन्द्रजित् का बचन सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण महार्थ वचन बोले, हे तातपुत्र ! अभी भी तुम अपरिपक्वबुद्धि बालक हो, मन्त्र में कृत्याकृत्य-विचार में तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है । इन्द्रजित्, पुत्रप्रवाद से तुम भी रावण के मित्रशत्रु ही हो, क्योंकि तुम राघव के द्वारा मोहवश रावण को विनाश की अनुमति दे रहे हो। तुम दुर्मति एवं वध्य हो। इतना ही नहीं वह भी वध्य है जो तुम्हारे जैसे बालक एवं दृढ़साहसिक को मन्त्रणा करनेवालों के बीच में लाया है। इन्द्रजित्, तुम कृत्याकृत्यविवेकहीन, मतिप्रागल्भ्यहीन, अविनीत, अनयमर्ति, दुरात्मा एक साहसी हो, बालकपन के कारण प्रलाप कर रहे हो। ब्रह्मादण्ड के समान प्रकाशवाले कालतुल्य ज्योतिष्मान् तथा यमदण्डतुल्य राम के बाणों को युद्ध में कौन सहन कर सकेगा ? अतः धन, रत्न, सुन्दर भूषणों, वसनों, दिव्यमणयों के साथ राम को सीता समर्पण करने से ही हम लोग सुख से रह सकेंगे। १६ वें सर्ग में युक्तियुक्त हित वाक्य बोलनेवाले विभीषण को कालचोदित रावण ने परुष वचन कहे और सामान्यतया ज्ञातियों से सबको भय होता है, यह भी कहा—कुलपांसन, यदि अन्य कोई ऐसा कहता तो वह जीवित नहीं रह सकता था। तुम सोदर होने से वधानर्ह हो। तुम्हारे लिये धिक्कार ही दण्ड है। ऐसा परुष वचन सुनकर न्यायवादी विभीषण ने क्रुद्ध होकर चार साथी राक्षसों के साथ अन्तरिक्ष में जाकर राक्षसाधिप रावण से कहा- राजन्, आप भ्रान्त हो, जो इच्छा हो सो कहो । आप मेरे ज्येष्ठ, मान्य तथा पितृसमान हैं। आप धर्मपथ पर स्थित नहीं हैं। राजन्, कालवश हुए अकृतात्मा प्राणी हितैषी के हित वाक्य को नहीं सुनते। राजन्, प्रियवादी पुरुष सदा सुलभ होते हैं, परन्तु अप्रिय किन्तु पथ्य के वक्ता और श्रोता दुर्लभ ही होते हैं— “सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता सुदुर्लभः ॥” ( वा० रा० ६।१६।२१ ) आप अपनी एवं राक्षसों सहित अपने पुर और राष्ट्र की रक्षा करो। आपका स्वस्ति हो, मैं जा रहा हूँ। आप सुखी हों । बुल्के कहते हैं कि “घबराकर विभीषण लङ्का छोड़ देता है, परन्तु इन श्लोकों में घबराने जैसी कोई बात ही नहीं है। इतने महत्त्वपूर्ण प्रसङ्गों को साधारण बाजारू तर्कों के बलपर बुल्के प्रक्षिप्त कहना चाहते हैं। वस्तुतः ज्ञान-विज्ञान तथा नीतिसार सर्वस्वसंयुक्त स्वाभाविक स्थिति का चित्रण करनेवाले इन सर्गों का अपलाप करना वस्तु- स्थिति का ही अपलाप है। इसी तरह विभीषण की महत्त्वपूर्ण शरणागति के प्रसङ्ग को भी बुल्के महत्त्वहीन बनाने के लिए सचेष्ट हैं। १७ वें सर्ग के अनुसार विभीषण मुहूर्त्तमात्र में उत्पन्नप्रतिपन्न रावण का त्यागकर जहाँ लक्ष्मण के साथ राम विराजमान थे वहाँ पहुँच गया। वानराधिपों ने मेरुशिखर के तुल्य दीप्त विद्युत के तुल्य गगनस्थ विभीषण को देखा । विभीषण के अनुचर भीमविक्रम ओर कवच, आयुध आदि से युक्त तथा भूषणोत्तमों से भूषित थे। विभीषण मेघपर्वत तुल्य वज्रायुध के समान दीप्यमान वरायुध धारण करनेवाला दिव्याभरणभूषित था। बुद्धिमान् वानरेन्द्र सुग्रीव ने वानरों से विचार कर हनुमत्प्रमुख वानरों से कहा-देखो, सर्वायुधसम्पन्न चार राक्षसों के साथ यह राक्षस हम लोगों के अभिघात के लिए आया है। सुग्रीव का वचन सुनकर शैल और शाल वृक्ष लेकर वानर भट उनके वध के लिए प्रस्तुत हो गये । वे आपस में विमर्श कर ही रहे थे कि आकाश में ही स्थिर रहकर महाप्राज्ञ विभीषण ने सुग्रीव
अध्याय युद्धकाण्ड ५५७
एवं उनके साथियों को देखकर धीर गम्भीर महान् स्वर से कहा, रावण नामक दुर्वृत्त राक्षसराज का मैं छोटा भाई विभीषण हूँ । रावण ने जनस्थान से जटायु को मारकर सीता का हरण किया है। विवश, दीन तथा अवरुद्ध सीता राक्षसियों द्वारा सुरक्षित हैं। मैंने युक्तियुक्त वाक्यों से उसे राम को सीता प्रदान करने के लिए समझाया पर काल- प्रेरित होकर उसने स्वीकार नहीं किया । मैं रावण से परुषित तथा दासवत् अपमानित होकर पुत्रों और पत्नी को छोड़कर राम की शरण में आया हूँ । सर्वलोकशरण्य महात्मा राम को निवेदन कर दो कि विभीषण उपस्थित है— “सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः । त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।। निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने । सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥” ( वा० रा० ६।१७।१६,१७ ) ऐसा वचन सुनकर सुग्रीव ने लक्ष्मण के सामने राम से संरम्भ के साथ कहा, अतर्कित यह शत्रु शत्रुसैन्य में आ गया है। छिद्र पाकर उलूक ने जैसे वायसों का संहार किया था वैसे ही यह अवसर पाकर घातक हो सकता है । परन्तप ! मन्त्र, कार्याकार्य-विचार, सेनासंनिवेश तथा सेनानयन में परबल-वृत्तान्तादि के ज्ञानार्थ चार पुरुष प्रवर्तन में अत्यन्त सावधान होना उचित है। कामरूपी राक्षस अन्तर्धान रहकर कपटोपाय से विप्रियकरण में चतुर होते हैं । इनपर विश्वास करना कभी भी युक्त नहीं । यह रावण का प्रणिधि ( चार ) हो सकता है अथवा रावण भी हो सकता है। हम लोगों में प्रविष्ट होकर हम लोगों में भेदनीति का प्रयोग कर सकता है अथवा स्वयं ही विश्वास प्राप्त कर प्रहार कर सकता है। नीति के अनुसार आरण्यक मित्र से प्रेषित बल एवं आप्त बन्धुओं से प्रेषित बल तथा तात्कालिक वेतनदान से प्राप्त बल का संग्रह करना उचित है। परन्तु शत्रुबल का सदा परिहार ही करना चाहिये । प्रकृत्या राक्षस कुटिल होते हैं । तत्रापि अमित्र रावण का भाई यह रिपु ही है। इसमें कैसे विश्वास किया जा सकता है ? क्षमाशिलों में श्रेष्ठ, मेरी दृष्टि में तो इसका निग्रह करना ही श्रेष्ठ है। यह नृशंस रावण का भ्राता हैं, तीव्र दण्ड से इसे दण्डित करना ही उचित है । राम ने हनुमान् प्रभृति वानरों से कहा, कपिराज ने विभीषण के प्रति जो सहेतु बातें कहीं हैं, उन्हें आप सबने सुना है। बुद्धिमान् और समर्थ को चाहिये कि संकट की घड़ी में शाश्वती भूति चाहने- वाले मित्र को उचित परामर्श दे । इस तरह राम के पूछने पर रामप्रियचिकीर्षु सभी मित्रों ने अपना अपना मत व्यक्त किया । राघव, तीनों लोकों में कोई बात आप से अज्ञात नहीं है, तो भी सुहृद्भाव से हम सबको सम्मान देने की दृष्टि से ही आपका यह प्रश्न है । आप सत्यव्रत तथा शूर हैं, धार्मिक एवं दृढ़विक्रम हैं एवं परीक्ष्यकारी, स्मृतिमान् और सुहृदों में विश्वास करनेवाले हैं । अतः आपके सभी सचिव मतिमान् तथा समर्थ हैं । अपना अपना मत प्रकट करें । इसपर अङ्गद ने कहा, शत्रु के पक्ष से आया हुआ व्यक्ति अवश्य शङ्कास्पद है । सहसा विश्वास न कर उसकी परीक्षा करनी चाहिये । आत्मा को आवृत्त करके शठबुद्धि व्यवहार करते हैं । रन्ध्र पाने पर वे अवश्य ही प्रहार करते हैं । अतः अर्थानर्थ का निश्चय करके गुण होने के संग्रह करना उचित है। शरभ ने कहा शीघ्र ही चार का प्रयोग करना उचित है। सूक्ष्मबुद्धि चार के द्वारा परीक्षण करके यथान्याय ग्रहण करना उचित है। विचक्षण जाम्बवान् ने शास्त्रबुद्धि से दोषवजित तथा गुणयुक्त वाक्य कहा, राम से वैर बाँधनेवाले पाप- युक्त रावण के समीप से अदेशकाल में आनेवाला विभीषण सर्वथा शङ्कास्पद है। अर्थात् स्वामिदेश को छोड़कर शत्रुदेश में आना और स्वामी के संकटकाल में उससे विपरीत होकर उसपर प्रहार करना अनुचित है। इस तरह अदेशकाल में आने से विभीषण शङ्कनीय है। जो अपने पुराने मालिक के प्रति निष्ठावान् नहीं है वह अन्यत्र भी लाभदायक नहीं हो सकता । नयानयकोविद मैन्द ने कहा—यह रावण का अनुज है । नरपतीश्वर, धीरे से मधुरता से इससे बात की जाय । इसके भाव का ज्ञान प्राप्त करके कार्य किया जाय । यदि दुष्ट न हो तो ग्रहण किया जाय । सचिवश्रेष्ठ हनुमान् ने स्निग्ध मधुर गम्भीर अर्थ युक्त थोड़े शब्दों में कहा वक्ताओं में श्रेष्ठ, समर्थ एवं मतिवान् आपसे
अधिक बृहस्पति भी क्या कह सकते हैं। राघवेन्द्र, मैं तर्ककुशलता दिखलाने के लिए नहीं, आपके अन्य मन्त्रियों की स्पर्धा से नहीं, अधिक बुद्धिमत्ता के अभिमान से नहीं तथा अपनी इच्छा से भी नहीं, किन्तु कार्य-गौरव की दृष्टि से यथार्थ बात यह कहता हूँ कि आपके सचिवों मे अर्थानर्थ निमित्त जो बातें कही हैं, उनमें मैं अंशतः वैगुण्य देखता हूँ। विभीषण शङ्कनीय है, परीक्षणीय है यह तो ठीक है, किन्तु कुछ निश्चय न होने के कारण यह उत्तर नहीं है। परीक्षणरूपा क्रिया का यह समय नहीं है। नियोग के बिना सामर्थ्य का ज्ञान नहीं हो सकता । अर्थात् उसे बुलाकर सब वृत्तान्त सुने बिना त्याग या परिग्रह के औचित्य का निर्णय नहीं किया जा सकता । साथ ही सहसा नियोग भी उचित नहीं है अर्थात् सहसा राजसंनिधि में लाकर वृत्तान्त प्रतिपादन का अनुज्ञादानरूप नियोग भी मुझे दोष प्रतीत होता है । तस्मात् किसी समर्थ अधिकृत द्वारा उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर ही आपके पास विभीषण का लाया जाना उचित है। कहा जा सकता है कि फिर तो शरभ का ही मत आपका भी है, पर यह ठीक नहीं; क्योंकि चार के प्रेषण का यहाँ कोई कारण नहीं दिखता है। चार-प्रेषण से सिद्ध होनेवाले प्रयोजन की यहाँ अनुपपत्ति ही है। यदि परीक्षणीय व्यक्ति सन्निहित न हो और उसका वृत्तान्त प्रकट न हो तभी चार-प्रेषण उचित होता है। जो प्रत्यक्ष उपस्थित है एवं अपना वृत्तान्त निवेदन करने के लिए प्रस्तुत ही है, उसके प्रति चार-प्रेषण व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि कपटयुक्त व्यक्ति प्रत्यक्षरूप से सामने स्थित होकर भी अपनी स्थिति एवं वृत्तान्त को अन्यथा व्यक्त कर सकता है, यह ठीक है, किन्तु चार द्वारा परोक्षरूप से ही वस्तुस्थिति का ज्ञान हो सकता है और उसके लिए परोक्षता और अधिक काल अपेक्षित होता है। तत्काल तो कपटयुक्त व्यक्ति भी सावधानी से कपट के साथ अपने को चार के प्रति भी अन्यथा व्यक्त कर ही सकता है । जो यह कहा गया है कि अदेशकाल में विभीषण आया है । इसके सम्बन्ध में भी मेरा यह कहना है कि रावण जैसे पापी पुरुष की अपेक्षा उत्तम पुरुष को प्राप्त कर के बुद्धि से गुण और दोष का विवेचन कर जो विभीषण ने रावण को त्यागकर राम की शरण ग्रहण करने का निर्णय किया है यह तो उसकी बुद्धिमत्ता ही है। वस्तुतः विभीषण के शरण में आने का यही योग्य देश एवं योग्य काल है। रावण का परदार-हरणरूप दौर्रात्म्य देखकर एवं जिसने रावण को बगल में दबाकर चारों समुद्रों का परिक्रमण किया था उस वाली को एक बाण से मारनेवाले आपका लोकोत्तर विक्रम देखकर इस समय उसका आगमन उसकी बुद्धिमत्ता के अनुरूप ही है। जो यह कहा गया है कि अज्ञात कुल, शील और प्रयोजनवाले गुप्तचरों के द्वारा उसका हृदय जानना चाहिये । यह भो उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि यह क्रिया बहुकाल सापेक्ष होती है। अज्ञात पुरुष के पास जाकर आप कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? ऐसा प्रश्न करने पर प्रष्टा के स्वरूपज्ञान के बिना बुद्धिमान् पुरुष सहसा शङ्का कर सकता है कि मैं इसे जानता नहीं, यह किसके द्वारा प्रेषित है और क्यों पूछता है ? केवल इस प्रकार शङ्काकुल ही नहीं होगा, किन्तु उत्तर भी नहीं देगा। यदि प्रष्टा का शनैः शनैः ज्ञान होगा, तब तो स्वागत हो करेगा । यदि मित्रभाव ज्ञात होगा तो प्रश्न से मित्रभाव में दूषण भी आ सकता है। यह सोचा जा सकता है कि क्यों अन्य पुरुष के द्वारा इस प्रकार का विचार किया जा रहा है ? उससे स्नेह कुण्ठित हो सकता है और मित्रता में व्यवधान आ सकता है। यदि वस्तुतः शत्रु होगा तो चारों के द्वारा सहसा प्रश्नमात्र से उसका अभिप्राय विदित नहीं हो सकता । अज्ञातकुलशील द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक ही नहीं समझा जाता है। उलटे शत्रु प्रेषित होने से दण्ड देना ही सम्भव है। कहा जा सकता है कि इस तरह तो संसार में चार- प्रेषण ही निरर्थक समझा जायगा, पर यह भो ठीक नहीं। बहुत काल तक साथ में स्थिति संभव होने से उसके स्वाभाविक वचनों और व्यवहारों से हर्ष, अमर्ष आदि से शत्रुत्व तथा मित्रत्व जानने के लिए चार-प्रेषण सार्थक हो ही सकता है। अतः आप स्वयं ही उसके व्यवहार के मध्य में ही उसके विलक्षण स्वरों, कण्ठध्वनियों से निपुणतया उसकी साधुता या असाधुता का निर्णय कर सकते हैं। भय से, वाष्पकण्ठ से तथा पूर्वापर असंगत कथन ने असाधु समझा जा सकता है अन्यथा साधु समझा जा सकता है—
"अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धं परस्य वै १। अन्तरेण स्वरैर्भिन्नैर्नैपुण्यं पश्यतां भृशम् ॥" ( वा० रा० ६।१७।६१ ) सामान्यतया अपने में निपुणता देखनेवाला व्यक्ति भी आपाततः प्रसन्नार्थ वाक्यों से भी गूढ अभिप्रायवाले भाषणों से परकीय अभिप्राय को सहसा नहीं समझ सकता । यदि यह कहा जाय कि पहले तुम्हीं परीक्षण करो तो मैंने तो परीक्षा कर ली है। मुझे तो उसके भाषण में कोई दुष्टता, वचन एवं चेष्टाओं से उसके अन्तःकरण की दुष्टता नहीं प्रतीत होती । प्रसन्नवदनता स्पष्ट परिलक्षित होती है । अतः मुझे उसके प्रति तथा उसकी बुद्धि के प्रति कोई संशय नहीं है । रामशरणगमन ही मेरा इष्टसाधन है, इस तरह वह निःशङ्क एवं स्वस्थ अर्थात् साधुस्वभाववाला ही शरणागत हुआ है । गूढविप्रियबुद्धिवाला नहीं है। उसकी वाणी में कोई भी दोष नहीं है। यद्यपि शठ भी वैसा भाषण कर सकता है तथापि आन्तर भाव को छिपाने का शक्तिभर प्रयत्न करने पर भी वह सर्वथा छिपाया नहीं जा सकता, किन्तु अन्तर्यामी देवता बलात् भीतर की असाधुता या साधुता को, तादृश वचनादि की प्रेरणा कर, प्रकट कर देता है। कार्यविदों में श्रेष्ठ, उसका इस समय का आगमन देश-काल के अनुसार है । प्रयोग से, अनुष्ठान से सम्पादित ईदृश कार्य को शीघ्र ही सफल करें । आपका रावणवधविषयक उद्योग तथा मिथ्याबलगर्वित पापवृत्त रावण को देखकर रावण से भी अधिक बलवाले वाली का वध एवं सुग्रीव का अभिषेक सुनकर उसने बुद्धि से निश्चय किया है कि वाली के समान ही राम रावण को मार कर सुग्रीव के समान ही मुझे लङ्का का राज्य देंगे । शरणागतवत्सल राम अवश्य मेरी रक्षा करेंगे । इस तरह बुद्धिपूर्वक वह शरण में आया है । उसका संग्रह करना उचित है । इस तरह मैंने यथाशक्ति विभीषण का आर्जव वर्णन किया है । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ आप से अधिक कहना उचित नहीं, शेष कृत्य के निर्णय में आप ही प्रमाण हैं । हनुमान् का वचन सुनकर १८ वें सर्ग में राम ने अपना अभिप्राय भी सुनने के लिए सबसे अनुरोध करके कहा—मित्रभाव से सम्यक् प्राप्त शरणागत विभीषण का त्याग उचित नहीं है । यदि उसमें सुग्रीव आदि के कथना- नुसार रन्ध्र में प्रहरण-कामना आदि दोष भी हों तो भी शरणागत दुष्ट का रक्षण भी सत्पुरुषों की दृष्टि से गर्हित नहीं है । हनुमान् ने निर्दोषत्व प्रतिपादनपूर्वक इसकी ग्राह्यता कही है । अन्य लोगों ने दोषनिरूपणपूर्वक अग्राह्यता का प्रतिपादन किया है । पर भगवान् ने तो प्रौढिवाद से रन्ध्र-प्रहारित्वरूप दोष स्वीकार कर के भी ग्राह्यता का ही प्रतिपादन किया है । 'राघवं शरणं गतः' इस प्रसन्न वचन से मित्रभावना का अनुमान होता है । स्निग्धभाव से पति को सम्यक् प्राप्त होनेवाली पत्नी के समान मित्रभाव से प्राप्त विभीषण को रन्ध्रप्रहारित्व के भय से मैं किसी भी देश, काल और अवस्था में त्याग नहीं सकता । वस्तुतः तो विभीषण में कोई दोष है ही नहीं। शरणागत होने के कारण शत्रुपक्षीय होने के भय से उसका त्याग नहीं किया जा सकता । आप लोगों ने जो दोष कहे हैं वे और उनसे अतिरिक्त भी दोष उसमें हों तो भी उसका मैं त्याग नहीं करूँगा । यद्यपि दुष्टजनपरिग्रह शिष्टविर्गाहत है तथापि "वध्यं प्रपन्नं न प्रतियच्छन्ति" वध्य होने पर भी प्रपन्न ( शरणागत ) का परित्याग नहीं करना चाहिये । शास्त्रवचन के अनुसार सदोष शरणागत का ग्रहण भी पूजित ही है । इसपर पुनः सुग्रीव ने कहा कि भले यह दुष्ट हो अथवा अदुष्ट भी हो तो भी क्या है, जो ऐसी विपत्ति में पड़े हुए अपने बड़े भ्राता का परित्याग कर सकता है वह ऐसा कौन है जिसका त्याग नहीं कर सकता । अतः विश्वासघाती एवं कृतघ्न होने से विभीषण सर्वथा त्याज्य ही है । वानराधिपति का वचन सुनकर सबकी ओर निहार कर, लक्ष्मण की ओर भी देखकर थोड़ा हँसते हुए सत्यपराक्रम काकुत्स्थ राम ने कहा—सुग्रीव ने जैसी बात कही है शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन बिना किये और वृद्धों
१. 'अन्तःस्वभावैर्गौतैस्तैर्नैपुण्यं पश्यता भृशम् ।' इति पाठान्तरम् ।
की सम्यक् सेवा बिना किये वैसी बात नहीं कही जा सकती है तो भी इस सम्बन्ध में मुझे कुछ सूक्ष्मतर बात प्रतीत होती है। भ्रातृ-त्यागरूप दोष सभी राजाओं में प्रत्यक्षसिद्ध है और सब लोकों में प्रसिद्ध होने से वह लौकिक ही है। लोक-स्थिति यह है कि राजाओं के अमित्र (शत्रु) दो प्रकार के होते हैं। एक तो तत्कुलीन अर्थात् उनकी ज्ञाति के लोग और दूसरे आसन्न देशवासी लोग । ये दोनों ही प्रकार के शत्रु आध्यात्मिकादि त्रिविध कष्टों के द्वारा प्रहार करते हैं। अतः नाना प्रकार के उत्पीड़क प्रहर्त्ता ज्ञातिजनों के भय से स्वात्मत्राणार्थ विभीषण का शरण में आना सम्भव है अथवा व्यसन में प्रहार करनेवाले स्वजातीय होने के कारण व्यसनी रावण पर प्रहार करने की दृष्टि से उसका आना सम्भव है। केवल ज्ञातिमात्र का होना ही शत्रुता का प्रयोजक नहीं होता, किन्तु परस्पर अनिष्ट चिन्तन के कारण भी शत्रुता होती है। परस्पर अनिष्ट चिन्तारहित पापशून्य लोग परस्पर हितैषी होकर अपने हित का रक्षण करते हैं, परन्तु राजाओं की स्थिति इससे भिन्न होती है। उनमें तो शोभन मित्र भी ज्ञाति के व्यक्ति शङ्कनीय होते हैं, क्योंकि उन्हें भी महत्तर राज्य एवं ऐश्वर्य का लोभ होना सम्भव होता है। भेदनीति का प्रभाव भरत की माता कैकेयी आदि में भी देखा गया है। इस दृष्टि से अपने से शङ्कित रावण से अनिष्ट की सम्भावना से रावण को त्याग कर विभीषण आया होगा। “यो हिंसार्थमभिक्रान्तं हन्ति मन्युरेव मन्युं स्पृशति न तस्मिन् दोषः ।” इस आपस्तम्ब-वचन के अनुसार जो हिंसार्थ उद्यत शत्रु का हनन करता है। मन्यु ही मन्यु का हनन करता है, इस दृष्टि से यदि रावण के नाशार्थ विभीषण आया है तो भी दोष नहीं है। शत्रुपक्ष के परिग्रह में जो दोष कहा गया है उसका भी समाधान यह है कि हम लोग न रावण के जातीय हैं और नहीं उसके प्रतिदेश्य हैं। अतः हममें राज्य की जिघृक्षा नहीं हो सकती है। इसलिए हम लोगों में प्रहार की कल्पना नहीं हो सकती। किन्तु हम लोगों के द्वारा स्वजाति शत्रु का विनाश कर निज राज्य की आकाङ्क्षा हो सकती है। अतः हम लोगों पर प्रहार करना उपजीव्य-विरोध ही होगा। यद्यपि तमःप्रधान मूर्ख राक्षसों में ऐसा विचार करना कम सम्भव है तथापि पर्यालोचनापूर्वक कर्त्तव्यनिश्चय में समर्थ पण्डित सर्वत्र ही होते हैं। एकपितृजन्य होने पर भी जैसे कुम्भकर्ण अति- तामस है, रावण अतिराजस है, इसी तरह विभीषण अतिसात्त्विक होने से ऐसा विचार विभीषण में असम्भव नहीं है, अतः विभीषण ग्राह्य है ! अव्यग्र, अनाकुल तथा प्रहृष्ट सौभ्रात्र से परस्पर मिलजुल कर रहते हैं। परन्तु विपरीत जातीय लोग राज्य-लोभादि से भेदभाव को प्राप्त होते हैं। तभी उनमें युद्धादि कोलाहल होता है। सौभ्रात्र के अपगत होने पर किसी हेतु से वैर उत्पन्न हो जाने से शरण में आना सम्भव ही है। कहा जा सकता है कि भरत आदि भ्राताओं में ऐसा दोष नहीं देखा जाता है। उन्होंने तो प्राप्त राज्य का भी परित्याग करके सौभ्रात्र को निभाया है। परन्तु भरत के समान प्राप्त राज्य को त्याग कर सौभ्रात्र निभानेवाले भ्राता, मेरे तुल्य सुखलोभ से पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन न करनेवाले पुत्र और कपिराज सुग्रीवादि जैसे सब सुख त्याग कर सर्व बल से तथा सब यत्नों से मित्रकार्यसाधक सुहृद् सब नहीं हो सकते— “न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः । मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ॥” ( वा० रा० ६।१८।१५ ) राम के ऐसे वचनों को सुनकर लक्ष्मण सहित महाप्राज्ञ सुग्रीव ने प्रणत होकर कहा कि विभीषण रावण द्वारा भेजा हुआ गुप्तचर ही है। अतः उसका निग्रह करना ही उचित है। यह कुटिलबुद्धि से संदिग्ध होकर आया हुआ है। विश्वास प्राप्त कर लेने पर आपपर या विश्वस्त होने से मुझपर या लक्ष्मण पर प्रहार कर सकता है,
अध्याय युद्धकाण्ड ५६१ क्योंकि यह नृशंस रावण का भ्राता है। ऐसा कहकर सुग्रीव मौन हो गये। सुग्रीव के वाक्य को सुनकर विचार कर राम ने सुग्रीव के प्रति शुभतर बात कही। कपिराज, दुष्ट हो या अदुष्ट तो भी यह रजनीचर क्या कर सकता है ? मेरा यह सूक्ष्म भी अहित नहीं कर सकता है। पृथिवी भर में जितने पिशाच, दानव, यक्ष तथा राक्षस हैं उन सभी का इच्छा करूँ तो एक अँगुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ— "पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ।।" (वा० रा० ६।१८।२३ ) राम के ईश्वरत्वसाधक ऐसे वचनों से घबड़ा कर ही बुल्के ऐसे महत्त्वपूर्ण सर्गों एवं वचनों को क्षेपक कहने का साहस करते हैं । कहा जाता है कि फिर तो सुग्रीव, हनुमान् तथा वानर-सेना का संग्रह करना व्यर्थ ही होगा ? इसी का उत्तर देते हुए कहते हैं यदि इच्छा करूँ तो किन्तु इस समय तो रावण को ब्रह्मा के रूप में मैंने ही वर प्रदान कर रखा है कि देवभावोपेत निज अशेष विलासों से भी उसका वध नहीं होगा । अतः उसके कल्याणार्थ स्वशक्ति से ही अपने दिव्य भाव को छिपाकर मानवमर्यादा में ही स्थित रहकर आप ऐसे सहायों का संग्रह किया गया है। वस्तुतः तो मुझे स्वातिरिक्त किसी भी अन्य की अपेक्षा नहीं है । वस्तुतः रन्ध्र मिलने पर प्रहार कर सकता है, इस भीति को दूर कर भी शरणागत की रक्षा करना परम धर्म है, यह कपोत के दृष्टान्त से भगवान् राम ने स्पष्ट किया। उन्होंने कहा—सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आये हुए शत्रु व्याध का यथान्याय अर्चन किया और अपना मांस भोजन करने के लिए उससे प्रार्थना की । उसी व्याध ने उसकी भार्या का अपहरण किया था, तो भी कपोत ने उसका आतिथ्य किया । जब इस प्रकार तिर्यक् प्राणी ने भी शरण में आये हुए भार्या-हर्ता की भी उपेक्षा नहीं की तो फिर मेरे सदृश सकल धर्मों के रहस्यज्ञ क्षत्रिय अपकार न करनेवाले शरणागत की उपेक्षा कैसे कर सकता है ? उसकी काया तथा वाणी के व्यवहारों से शरणागति स्पष्ट ही लक्षित होती है । सत्यवादी महर्षि कण्डु ने प्राचीनकाल में शरणागत- रक्षणसम्बन्धिनी धर्मिष्ठा गाथा गायी है। उसे सुनो— हाथ जोड़े हुए दीनता से शरण माँगते हुए शत्रु को भी आनृशंस्य (अघातुकतासिद्धि ) के लिए या आश्रितरक्षणरूप परमधर्मसिद्धि के लिए नहीं मारना चाहिये । इतना ही नहीं आर्त हो अथवा दृप्त ( घमण्डी ) हो जो भी शत्रुओं के भय से शरणागत हुआ हो, भले वह शत्रु ही क्यों न हो, कृतात्मा प्राणी को चाहिये कि वह अपने प्राणों का परित्याग कर के भी उसकी रक्षा करे । जो उससे या उसके शत्रु द्वारा सम्भावित भय से या कार्यान्तर में व्यस्तता से होनेवाली विस्मृति से या उसके शत्रु द्वारा मिलनेवाले लाभ के लोभ से अपनी शक्ति द्वारा सहायता या धनदानादि द्वारा यथान्याय रक्षा नहीं करता वह अरक्षित के पाप तथा लोकगर्हित निन्दा को प्राप्त होता है। इतना ही नहीं शरण में आया हुआ व्यक्ति अगर रक्षक के देखते देखते विनष्ट होता है तो वह अरक्षित रक्षक का सब पुण्य लेकर चला जाता है । इस तरह प्रपन्न के अरक्षण से महान् दोष होता है । वह अस्वर्ग्य, अयशस्य और बल-वीर्य का विनाश करनेवाला है । अतः मैं कण्डु के धर्मिष्ठ, यशस्य तथा फलोदय काल में स्वर्ग्य वचन का पालन करूंगा । इसके अतिरिक्त मुझ परम कारुणिक ईश्वर का तो सर्वभूत अभय प्रदानरूप एक व्रत ( संकल्प ) ही है— "सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।" (वा० रा० ६।१८।३३ ) जो 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य अखण्डाकार वृत्ति से मुझे प्रपन्न होता है अथवा जो औपाधिक भेद का आश्रयण कर आप मेरे आश्रय या रक्षक हैं, मैं आपका आश्रित या रक्षणीय हूँ इस रूप से आश्रयप्रदान या रक्षण की याच्ञा करता है उसे मैं सर्वभूतों से अभय प्रदान करता हूँ । सब प्राणियों के लिए अथ च सर्वभूतों से भयभीत सभी ७१
प्राणियों के लिए अभय-प्रदान करना मेरा नित्य सत्सहज धर्म है। ‘ददामि’ इस वर्तमान काल की क्रिया के प्रयोग से नित्य प्रगृहीत नित्य निज प्रतिष्ठित धर्म है। तात्कालिक चोर, शत्रु, व्याघ्रादि से जनित भय की निवृत्तिरूप और आत्यन्तिक संसारभय की निवृत्तिरूप दोनों ही प्रकार का अभयप्रदान करता हूँ। प्रपत्ति या शरणागति ही अभय प्रदान में हेतु है, अतः प्रपत्ति या शरणागति विहीन को अभय न मिलने पर भी ईश्वर में वैषम्य तथा नैर्घृण्य दोष नहीं होता । साधन, अभ्यास और परिपाक भेद से वह प्रपत्ति या शरणागति तीन प्रकार की होती है। साधनकाल में ‘तस्यैवाहम्’ मैं भगवान् का ही हूँ ऐसी एक स्थिर निष्ठा होती है, अभ्यासदशा में ‘ममैवासौ” भगवान् मेरा ही है ऐसी निष्ठा होती है और पाकद्शा में “सोऽहम्’ मैं प्रभु से अभिन्न ही हूँ, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यजन्य ऐसी निष्ठा होती है। प्रथम का उदाहरण है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) अद्वैतवाद के अनुसार यद्यपि मुझमें और आपमें भेद नहीं है फिर भी मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं, जैसे समुद्र का और तरङ्ग का अभेद होने पर भी समुद्र का ही तरङ्ग कहलाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहलाता है। दूसरी निष्ठा का उदाहरण है— “हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाद् यदि चेद् यासि पौरुषं गणयामि ते ॥” कृष्ण ! हाथ छुड़ाकर जा रहे हो यह कोई अद्भुत बात नहीं है। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् से हाथ छुड़ा सकता है। यदि आप मेरे हृदय से निकल जायें तो मैं भी आपकी सर्वशक्तिमत्ता देखूँगा । तीसरी निष्ठा का उदाहरण है— “सकलमिदमहं च वासुदेवः ।”, “वासुदेवः सर्वमिति ।” ( गी० ७।१९ ) यह सब कुछ वासुदेव है और मैं भी तदभिन्न ही हूँ । वस्तुतः शरणागति या प्रपत्ति सम्पूर्ण सच्छास्त्रों का सिद्धान्त है— “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥” ( श्वे० उ० ६।१८ ) जो परमेश्वर ब्रह्मा का निर्माण कर उनको वेद प्रदान करते हैं उन्हीं आत्मबुद्धिप्रकाश भगवान् को हम शरण ( “शरणं गृहरक्षित्रोः” अमर० ३।३।५३ ) आश्रयरूप रक्षकरूप से प्रपन्न होते हैं । “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।” ( गी० १५।४ ) जिससे पुरानी विश्व-प्रवृत्ति प्रसृत है उस आद्य पुरुष परमात्मा को मैं आश्रयरूप से प्रपन्न होता हूँ । “मामेकं शरणं व्रज” ( गी० १८।६६ ) मुझे ‘अस्मत्’ पद के लक्ष्यार्थ एक सर्वभेदवर्जित परमात्मा को शरण ( आश्रय ) निश्चय करो अथवा मुझ परमेश्वर को रक्षक समझो— “माम् ‘अहम्’ पदलक्ष्यार्थम् एकमद्वितीयं परमात्मानं शरणं आश्रयं रक्षकं वा व्रज अवगच्छ निश्चिनु ।”
अध्याय युद्धकाण्ड ५६३ जैसे अध्वर्यु या आचार्य का यज्ञनिर्वाहकत्वेन वरण किया जाता है, जैसे 'वृतोऽस्मि' कहकर आचार्य आदि वरण स्वीकार कर लेते हैं तो निश्चिन्तता हो जाती है इसी तरह भगवान् भी यदि 'वृतोऽस्मि' कहकर वरण अङ्गीकार कर लेते हैं तो प्राणी सदा सर्वदा के लिए निश्चिन्त हो जाता है। इसी दृष्टि से वेद तथा महाभारत के समान ही वाल्मीकिरामायण का भी यही सिद्धान्त "सकृदेव प्रपन्नाय" इत्यादि वाक्य से घोषित किया गया है। परन्तु बुल्के आदि तो ईश्वरत्वबोधक एवं अवतारप्रतिपादक ऐसे सभी वचनों को मोहवश प्रक्षेप ही कहने का आग्रह करते हैं । अस्तु, वेदान्त के महावाक्यों द्वारा जनित 'सोऽहम्' इस प्रकार की पाकदशापन्न शरणागति या प्रपत्तिवाला व्यक्ति तत्काल आत्यन्तिक अभयप्रदान का पात्र होता है। औपाधिक भेद का अवलम्बन कर अन्य साधन तथा अभ्यास दशा- वाली शरणागति से युक्त प्राणी भी तात्कालिक अभयदान का पात्र होकर सगुण ब्रह्मलोक-प्राप्ति के क्रम से आत्यन्तिक अभयदान का भी पात्र हो जाता है। श्रीराम अपरिग्रहतावादी वानरेन्द्र सुग्रीव को ही परिग्रहता स्वीकार कराकर भेजते हैं हरिश्रेष्ठ, उसे लाओ मैंने अभय-प्रदान कर दिया । सुग्रीव, विभीषण हो या रावण हो शरण आये हुए को मैं सर्वथा अभय प्रदान करता हूँ— कोटि विप्रबध लागे जाही । आये शरण तजउँ नहिं ताही ॥ ( रा० मा० ५।४३।१ ) [
५६४ रामायणमीमांसा अष्टादश ही सुग्रीव की (सर्ग ४६) तथा बाद में राम और लक्ष्मण की आँखों को जल से धोया था (सर्ग ५०) । महाभारत के अनुसार यह जल कुबेर ने भेजा था । विभीषण सामान्यतया युद्ध में भाग लेते ही थे । सर्ग ४३, ८९ और ९० के अनुसार उन्होंने इन्द्रजित् की सेना का सामना किया था। सर्ग १०० के अनुसार लक्ष्मण के विरुद्ध लड़ते हुए रावण के घोड़ों का वध किया था । रावण ने विभीषण पर घातक शक्ति का प्रयोग किया पर उसे लक्ष्मण ने अपनी छाती पर रोककर उन्हें बचा लिया, यह पीछे कहा जा चुका है । बुल्के कहते हैं कि "रावण-वध के बाद विभीषण ने पहले रावण की अन्त्येष्टि करना अस्वीकार कर दिया था, किन्तु जब राम ने समझाया "मरणान्तानि वैराणि" (वा० रा० ६।१११) तब उन्होंने रावण का दाहकर्म संस्कार किया । अतः रावण-वध पर विभीषण विलापसम्बन्धी सर्ग अस्वाभाविक प्रतीत होता है । दा० पा० १०९ और गौ० पा० ९३ वास्तव में यह सर्ग प्रक्षिप्त है । प० पा० में यह नहीं मिलता ।" परन्तु यह संगत नहीं है, क्योंकि १०९ सर्ग प्रामाणिक है । टीकाकारों ने इसपर टीकाएँ की हैं । किसी पाठ में न मिलना उसके प्रक्षेप होने में हेतु नहीं है । बन्धु के साथ वैर या मतभेद होने पर भी मृत्यु के बाद उसके गुणों का स्मरण तथा विलाप आदि स्वाभाविक ही है । सुग्रीव का भी वाली के साथ विरोध था फिर भी वाली के मरने पर सुग्रीव को भी शोक हुआ ही था— “तत शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम् ।” (वा० रा० ४।२६।१ ) पश्चात् शोकवेग कम होने पर परदाराभिमर्शनरूप दोष के कारण विभीषण ने रावण का संस्कार करना अनुचित माना । परन्तु राम के समझाने पर वे संस्कार करने के लिए प्रवृत्त हुए । राम ने कहा भले ही यह राक्षसेश्वर अधर्म-अनृतयुक्त रहा है तथापि तेजस्वी, बलवान् एवं शूर था । इन्द्र प्रभृति देवताओं से भी वह कभी पराजित नहीं हुआ । मरणान्त ही वैर होते हैं । मेरा कार्य सम्पन्न हो गया । अब इसका संस्कार करना उचित है । जैसे यह तुम्हारा सम्बन्धी है वैसा ही मेरा भी है, क्योंकि मित्र का सम्बन्धी भी सम्बन्धी ही होता है— “क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।” (वा० रा० ६।१११।१०१) राम की आज्ञा से लक्ष्मण विभीषण का अभिषेक करते हैं । राम के साथ ही विभीषण अयोध्या में राम के अभिषेकोत्सव में सम्मिलित होते हैं । विभीषण-चरित उत्तरकाण्ड के अनुसार विभीषण की धर्मनिष्ठा प्रसिद्ध ही है । वे धार्मिक, स्वाध्यायनिरत, नियताहार तथा जितेन्द्रिय (वा० रा० ७।९।३१) थे । घोर तपस्या के बाद वर पाकर भी धर्मबुद्धि ही वर के रूप में उन्होंने मांगी थी— “परमापद्गतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत् ।” (वा० रा० ७।१०।३०) परम धाम पधारते समय राम ने विभीषण के लिए कहा था जब तक प्रजा रहेगी तब तक तुम लङ्का में रहोगे । सूर्य, चन्द्र और मेदिनी जब तक रहेगी एवं जब तक मेरी कथा रहेगी तब तक तुम्हारा लङ्का में राज्य रहेगा (वा० रा० ७।१०८।२४,२५) । रामचरितमानस के अनुसार प्रतापभानु के मन्त्री धर्मरुचि ही विभीषण हुए थे । रामलिङ्गामृत के असनुरा विभीषण प्रह्लाद के अवतार थे (१।३०) । महाभागवतपुराण के अनुसार विभीषण धर्म के अवतार थे ( ३७।१४) । एक कथा के अनुसार विभीषण विष्णु के अंश थे । रामकियेन (अध्याय ४) के अनुसार विस्सुझन नामक देवता राम की सहायता के लिए विमेक के रूप में अवतीर्ण हुए थे । उनके पास एक मायावी दर्पण था जिससे वे भविष्य
जान लेते थे। तुलसीदास के रामचरितमानस (१।७७) के अनुसार विभीषण ने तपस्या से भगवान् के चरणों में अमल अनुराग माँगा था । बुल्के इन सब बातों को भावुकतावश कल्पनामात्र मानते हैं। परन्तु यह कहा जा चुका है कि रामचरित- मानस की कथा एक प्रामाणिक परम्परा पर आधारित है। अन्य अनेक विषयों में विभीषण की कथाओं में भेद है। उनमें आर्ष कथाओं का समाधान कल्पभेद से होता है। तद्विरुद्ध तद्भिन्न अंशों में कल्पभेद न होकर कल्पना का ही भेद समझना चाहिये । बुल्के कहते हैं कि "लङ्का-दहन प्रक्षिप्त होने के कारण विभीषण के पूर्वपरिचय का उल्लेख नहीं मिलता।" परन्तु यह कथन अशुद्ध है, क्योंकि पूर्वकथनानुसार लङ्का-दहन प्रामाणिक है। हनुमान् ने जो विभीषण की ग्राह्यता का प्रतिपादन किया था यह कौन कह सकता है कि उसमें पूर्वपरिचय भी मूल नहीं था। सामूहिक मन्त्रणा में व्यक्तिगत सम्बन्ध गौण होते हैं। इसी लिए विशेष अनुल्लेख सङ्गत है। पउमचरियं की कथा का उद्देश्य तो जैनदीक्षा प्रचार- मात्र है। सरस्वतीकण्ठाभरण के अनुसार विभीषण ने राम के प्रसाद से मय द्वारा निर्मित लङ्का एवं मन्दोदरी को भी प्राप्त किया था। अन्य भी बहुत सी विकृत कथाएँ हैं, उन्हें अप्रमाण ही समझना चाहिये। विभीषण के अनुरोध से सेतुभङ्ग किये जाने और राम द्वारा ब्राह्मणों के कारागार से विभीषण की मुक्ति पुराणों में प्रतिपादित है । सेतुबन्ध ५७३वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि अनेक कथाओं में सेतुबन्ध का उल्लेख नहीं है। पउमचरियं के अनुसार समुद्र नामक राजा नल द्वारा पराजित किया जाता है । हेमचन्द्रकृत जैनरामायण के अनुसार राम-लक्ष्मण सेना सहित आकाश-मार्ग से लङ्का के पास पहुँचते हैं, नल और नील द्वारा समुद्र एवं सेतु नाम के राजाओं को पराजित किया जाता है। उत्तरपुराण (सर्ग ६८।५२२) के अनुसार राम और लक्ष्मण विमान के द्वारा जाकर सेना सहित लङ्का के समीप उतरते हैं। अभिषेकनाटक के अनुसार जब राम बाण चलाने को तत्पर होते हैं तब वरुण प्रकट होकर समुद्र के जल को दो विभागों में विभक्त कर देते हैं, जिससे राम की सेना समुद्रतल से पार होती है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अध्याय ११२) के अनुसार राम ने सहायता के लिए शिव की प्रार्थना की थी। शिव ने प्रसन्न होकर अजगव धनुष दिया । राम ने उस धनुष को समुद्र में फेंक दिया और उसी पर समस्त सेना ने समुद्र पार किया। बिहोररामकथा में हनुमान् अपनी पूँछ बढ़ाते हैं। उसी पर राम, लक्ष्मण आदि पार होते हैं। वस्तुतः आर्ष विज्ञान पर आदृत वाल्मीकिरामायण की कथा ही परम प्रमाण है। अन्य कथाओं को उसके अनुगुण ही जोड़ना उचित है । ५७४वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "प्रचलितरामायण में अधिकांश सेतुबन्धविषयक सामग्री प्रक्षिप्त है । तत्सम्बन्धी वर्णन में अलौकिक तत्त्वों का बाहुल्य है और तीनों पाठों का वैभिन्य इस अनुमान का आधार है।" परन्तु इस तरह तो बुल्के की मारी ही बाइबिल प्रक्षिप्त हो जायगी, क्योंकि उसमें भी सम्प्रदायभेद, पाठभेद तथा अलौकिक तत्त्वों का बाहुल्य है ही। उनके अनुसार "नल के नेतृत्व में वृक्षों तथा पत्थरों से वानरों द्वारा सेतु का निर्माण तथा बाद में वानर-सेना का समुद्रतरण इस प्रसङ्ग का मूलरूप रहा होगा (वा० रा० ६।२१।४१-७७)।" परन्तु वे यह भी मानते हैं कि अपेक्षाकृत प्राचीनकाल से ही सेतुबन्धवर्णन में अलौकिक तत्त्वों का समावेश किया गया है। तीनों पाठों में राम का तीन दिन प्रायोपवेशन करने तथा क्रुद्ध होकर समुद्र को अपने बाणों से क्षुब्ध करने का वर्णन किया गया है। सर्ग २१ में सागर का प्रकट होकर विश्वकर्मा के पुत्र नल द्वारा सेतु-निर्माण का सुझाव देना भी तीनों पाठों में समान है।
बुल्के यत्र-तत्र पाठभेद के कारण प्रक्षेप कह देते हैं। परन्तु यहाँ तीनों पाठों में समान वर्णन होने पर भी अलौकिकता के कारण प्रक्षेप कह देते हैं । इस तरह ईसाइयत को छोड़कर और कोई कारण नहीं कि उक्त टीकाकारों से सम्मत परम्पराप्राप्त सर्गों को प्रक्षेप कह दिया जाय । वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम साक्षात् परब्रह्म के अवतार ही थे । तब उनके बाण से भयभीत होकर समुद्र के अधिष्ठाता देव का प्रकट होना और सेतुबन्ध का सुझाव देना सर्वथा ही सङ्गत है । इसमें असङ्गति का स्वप्न बुल्के ही सोच सकते हैं । ऐसे लोग पहले तो कूटनीति से जहाँ तहाँ से ऐसी सामग्री उपस्थित करते हैं, जिससे पहले यह विश्वास किया जा सके कि सेतुबन्ध के बिना काम चल सकता था, पर अगर सेतुबन्ध मानना ही पड़े तो सामान्य रूप से बन्दरों ने वृक्षों और पत्थरों को डालकर सेतु बाँधा होगा । राम या उनके बाण की विशिष्ट शक्ति तथा नल और नील की विशेषता को झुठलाना बुल्के के उक्त प्रपञ्च का उद्देश्य है । अतः सेतुबन्ध-सम्बन्धी अलौकिक घटनाएँ सर्वथा प्रामाणिक ही हैं । द्रुमकुल्य-विनाश राम के ब्रह्मास्त्र का संधान करते ही सागर प्रकट होता है । राम ने कहा मेरा बाण अमोघ है । इसे कहाँ चलाऊँ । सागर ने द्रुमकुल्य देश पर चलाने का सुझाव दिया, जहाँ बहुत से दस्यु निवास करते थे । राम ने बाण चलाया । बाद में वह देश मरुकान्तार के नाम से विख्यात हुआ ( वा० रा० ६।२२।२५-४०) । गौड़ीय पाठ के अनुसार दशरथ और सागर की मैत्री तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार समुद्रतरण के पश्चात् समुद्र का प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को कवच एवं आयुध प्रदान करना भी प्रामाणिक ही है । सम्प्रदाय- भेद से पाठभेद प्रामाणिक ही होते हैं । पद्मपुराण भी आर्ष एवं प्राचीन ग्रन्थ है, अतः उसके २६९ वें अध्याय के अनुसार राम ने अपने बाणों से समुद्र को सोख लिया तथा सागर के विनय करने पर वारुणास्त्र द्वारा उसमें पुनः जल भर दिया । कल्पभेद से उक्त कथा की सङ्गति हो जाती है । विभिन्न कल्पों में राम के अवतार होते हैं । उनमें अधिकांश चरितों में समता होने पर भी किन्हीं अंशों में विलक्षणता भी होती है । राम सर्वशक्तिमान् परमेश्वरावतार थे, अतः उनका बाणों से समुद्र सोख लेना और वारुणास्त्र से पुनः समुद्र को भर देना असम्भव नहीं है । महाभारत की रामोपाख्यानकथा तो वाल्मीकिरामायण से मिलती ही है । राम को स्वप्न में समुद्र दर्शन देकर कहता है कि नल द्वारा फेंके पदार्थ समुद्र में नहीं डूबेंगे । अतः नल के द्वारा पाषाण आदि के न डूबने से सेतु-निर्माण योजना सफल होती है । स्कन्दपुराण सेतुमाहात्म्य ( अध्याय २ ) की भी सङ्गति हो जाती है । अद्भुतरामायण के अनुसार क्रुद्ध लक्ष्मण के शरीरताप से समुद्र सूखता है और राम के सीता-विरहजन्य आँसुओं से समुद्र पुनः भर जाता है ( सर्ग १६ ) । इस कथन का आशय स्पष्टतः यही है कि लक्ष्मण के प्रखर प्रताप से सागर भी शुष्क हो सकता है और राम के कारुण्य से समुद्र भी भर सकता है । अनामकं जातकं के अनुसार लघु वानर के रूप में इन्द्र ने सेतु-निर्माण का परामर्श दिया और हनुमान् ने ही सेतु का निर्माण किया । शरीर के जितने बाल थे उतने ही पत्थर वे प्रत्येक बार लाते थे । तत्त्वसंग्रहरामायण ( ६।६ ) के अनुसार सागरपुत्री कन्याकुमारी ने राम के पास विवाह का प्रस्ताव किया । राम ने युद्धव्याज से विवाह अस्वीकार करके सेतु बनवाने की अनुमति मांगी । वाल्मीकिरामायण ( ६।२२।४१ ) के अनुसार नल राम से कहता है मुझे अपने पिता विश्वकर्मा की सामर्थ्य प्राप्त है । विश्वकर्मा ने नल की माता को यह वरदान दिया था कि तुम्हारा पुत्र मेरे ही समान होगा— “मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति ।” ( वा० रा० ६।२२।४७ ) रङ्गनाथरामायण ( ६।२५ ) के अनुसार नल मुनियों की पूजा की प्रतिमाओं को समुद्र में फेंक देते थे । अतः मुनि ने यह कह दिया था कि यह बालक जो कुछ भी वस्तु समुद्र में फेंकेगा वह जल पर तैरती रहेगी । तुलसी- दास ने नल और नील दोनों भाइयों को ऐसे वर की प्राप्ति मानी है । इस तरह की अन्यान्य कथाओं का भी निष्कर्ष
अध्याय युद्धकाण्ड ५८७ इतना ही है कि नल और नील के स्पर्श से पाषाण समुद्र में डूबते नहीं थे । फलतः आसानी से समुद्र में सेतु बना दिया गया । वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध अन्य कथाओं का उसके साथ समन्वय करना ही उचित है । रामकियेन तथा सेरीराम आदि में हनुमान् एवं नल-नील के विवाद की कथा विकृति ही है । वाल्मीकिरामायण तथा अध्यात्मरामायण आदि के अनुसार हनुमान् एक महान् दिव्यगुणसम्पन्न ज्ञानी तथा भक्त थे । नल और नील भी देवांश थे । उनके समन्वय से ही सेतुबन्ध जैसा महान् कार्य सम्पन्न हो सका था । आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण का यह कथन भी विरुद्ध नहीं है कि रामनाम के दोनों अक्षरों से अङ्कित होने के कारण पत्थरों में आपस में दृढ़ संयोग बना रहा । गिलहरियों ने समुद्र में गोता लगाकर अपने अंग के बालू को सेतु पर गिरागिराकर पुल बाँधने में सहायता की थी । इसपर राम ने उनपर अनुग्रह कर अपना हाथ उनपर फेरा था । यह कथा राम की सर्वप्रियता ही व्यक्त करती है । इसका मूलकथा से कोई विरोध तो है ही नहीं । बल्कि कहते हैं तुलसीदास ने तो सभी जलचरों को रामभक्त बना दिया, परन्तु इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है ? जब राम ब्रह्मरूप ही हैं उनका दर्शन जिन जिन लोगों को प्राप्त हुआ वे भगवद्भक्त ही हो सकते हैं— देखन कहँ प्रभु करुणा कन्दा । प्रकट भये सब जलचर बृन्दा ॥ प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे । मन हरषित सब भये सुखारे ॥ सेरीराम के अनुसार रावण अपने पुत्र गङ्गामहासूरा को बुलाता है जो समुद्र की रानी गंगा महादेवी के गर्भ से उत्पन्न है । गंगामहासूरा मछलियों को समुद्र-सेतु नष्ट करने का आदेश देता है । उनका आक्रमण देखकर हनुमान् अपनी पूँछ हिलाते हैं । उससे समुद्र का जल पंकिल हो जाता है । मछलियाँ ऊपर आ जाती हैं। वानरों द्वारा फँसायी और खायी जाती हैं । बाद में एक केकड़ा सेतु पर आक्रमण करता है । हनुमान् केकड़े को स्थल पर पटक देते हैं । वह इतना बड़ा था कि उसे खाकर समस्त सेना तृप्त हो जाती है । हनुमान् रानी के पास जाकर उससे सेतु पुनः बनवाते हैं । उससे एक पुत्र उत्पन्न करते हैं । रामकेर्ति (सर्ग ७) के अनुसार सागर ने नागों और मछलियों को सेतु नष्ट करने का आदेश दिया । जब राम समुद्र पर बाण चलाने को तैयार हुए तो समुद्र ने क्षमा माँग ली । रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार रावण अपनी पुत्री सुवर्णमच्छा को सेतु नष्ट करने का आदेश देता है । वह अपनी सेना लेकर सेतु नष्ट करने गयी । हनुमान् उससे पुनः सेतु बनवाते हैं और उससे एक पुत्र मच्छानु को भी उत्पन्न करते हैं । सेरीराम के अनुसार सागर का एक स्थल नहीं पटता था । जब राम क्रुद्ध होकर बाण चलाना चाहते थे तब एक सुन्दरी ने प्रकट होकर कहा—यह स्थल पाताल जाने का मार्ग है । यहाँ का जल पीकर आपके सैनिक अजेय हो जायेंगे । राम ने सेना को जल पीने का आदेश दिया । उक्त अनेक ऐसी कथाओं का तात्पर्य राम और हनुमान् की महिमा वर्णन करने में ही है । “यत्परः शब्दः स शब्दार्थः” शब्दों का जिसमें तात्पर्य होता है, वही उनका अर्थ होता है । ५७९ वें अनु० में बालरामायण के अनुसार रावण मायामय जानकी का वध करता है । पश्चात् रावण- पुत्र सिंहनाद प्रकट होता है, उसका राम के द्वारा वध किया जाता है । एक प्रभञ्जनी राक्षसी राम-लक्ष्मण का वध करने के लिए आती है । उसे अङ्गद मारते हैं । रामकियेन के अनुसार विभीषण पुत्री बेंजकाया रावण की आज्ञा के अनुसार सीता के रूप में मृतवत् बहती हुई दिखती है । उसे देख राम निराश होते हैं । हनुमान् उस बनावटी सीता को चिता पर रखते हैं तब वह चिल्लाकर अपने रूप में प्रकट होती है । सुग्रीव के द्वारा कोड़ों से पिटने पर वह अपने को विभीषण की पुत्री बताती है । इसपर राम विभीषण को उसे उचित दण्ड देने का आदेश देते हैं । विभीषण ने उसे प्राणदण्ड की सजा सुनायी । राम विभीषण की निष्पक्षता देखकर हनुमान् के साथ उसे लङ्का भेज देते हैं । हनुमान् द्वारा उससे एक पुत्र भी उत्पन्न होता है । राम, लक्ष्मण एवं हनुमान् के आदर्शों एवं आचारों के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण ही परम प्रमाण है । उसके विपरीत आचरण का उल्लेख विकृति ही है ।