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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय युद्धकाण्ड ५८९ परिणामस्वरूप सम्पूर्ण रामायण के प्रति अनास्था और अविश्वास ही उत्पन्न होगा। यह सब ईसाइयत के प्रचार की भूमिका है। यही बुल्के का उद्देश्य है। वस्तुतः अनादि अपौरुषेय मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेद परम प्रमाण हैं। वही रामकथा का मूल है। वाल्मीकिरामायण द्वारा उसी का उपबृंहण होता है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण, पुराण आदि राम-कथा के भिन्न-भिन्न प्रस्थान हैं। कल्पभेद से उनमें कुछ विलक्षणताएँ भी होती हैं। अन्य अर्वाचीन भारतीय एवं अभारतीय रामायणों के वही स्रोत हैं। देश और काल के व्यवधान से उनमें वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध विकृतियाँ भी आ गयी हैं। रामकियेन आदि का तो अधिकांश भाग वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है। कुछ अंशों में विकृतियाँ भी हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान् आदि का आदर्श वैदिक धर्म की मर्यादाओं के अनुरूप ही है।

एकोनविंश अध्याय उत्तरकाण्ड बुल्के उत्तरकाण्ड, जो उनकी दृष्टि में प्रक्षेप है, में रावणचरित को प्रक्षेप मानते हैं । रामचरित से अलग रावण के विषय में स्वतन्त्र काव्य का कहीं निर्देश नहीं है । वैदिक साहित्य में रावण, कुबेर, विश्रवा, वैश्रवण आदि का संकेत नहीं किया गया है । पाली जातकट्ठवण्णना में बेस्सवण ( यक्षों के राजा ) का बहुत स्थलों पर उल्लेख है; रावण का कहीं भी उल्लेख नहीं है, किन्तु धनेश, कुबेर, वैश्रवण आदि का उल्लेख स्वतन्त्ररूप से बहुत स्थलों पर किया गया है । इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि वैश्रवण अथवा कुबेर रावण-कथा से पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुके थे । बाद में ही रावण के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित किया गया है । पर बुल्के का उक्त कथन निस्सार एवं निराधार ही है । वैदिक साहित्य में कुबेर, वैश्रवण नाम हैं तो वैदिक साहित्य में राम, दशरथ, जनक आदि के नाम भी हैं ही । रावण का नाम भी रामतापनीय आदि उपनिषदों में है ही । अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का भी स्पष्ट उल्लेख है । उपनिषद् भी वैदिक साहित्य ही हैं । रावण भी विश्रवा का पुत्र है, यह रामायण से सिद्ध ही है । रामायण वेद का ही उपबृंहण है । वेद का विवरण धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण आदि द्वारा ही होता है । शिखा और यज्ञोपवीत का नाममात्र वेदमन्त्रों में है । परन्तु शिखा कहाँ हो, यज्ञोपवीत कैसे बने और कहाँ पहना जाय, इसका स्पष्ट निरूपण धर्मशास्त्रों से ही होता है । इसी तरह वैश्रवण, कुबेर कौन हैं ? विश्रवा कौन हैं ? उनके पिता कौन हैं ? पत्नी कौन है ? वैश्रवण के कितने भाई थे ? इन सब बातों का परिज्ञान इतिहास-पुराणों से ही होता है । तत्तद्वैदिक शाखाओं में प्रवक्ता कौन हैं ? गोत्र क्या है ? वेदाधिकारी कौन होते हैं ? इत्यादि सब बातों का पूरा परिज्ञान इतिहास- पुराण से ही संभव है । अन्यथा मिथ्या सम्बन्ध कल्पना किसने की ? किसने देखा ? इत्यादि बातों का उत्तर देना बुल्के के लिए मुश्किल हो जायगा । बुल्के यह भी कहते हैं कि रावण के नाम से बहुत सी अर्वाचीन रचनाओं का उल्लेख मिलता है— अर्कप्रकाश ( वैद्यक ), कुमारतन्त्र, इन्द्रजाल ( उड्डीश ), प्राकृतकामधेनु, प्राकृतलङ्केश्वर, ऋग्वेदभाष्य, रावणभेट आदि । बलरामदास के रामायण में माना गया है कि रावण ने वैदिक मन्त्रों का सम्पादन कर वेदों की एक नयी शाखा चलायी थी । बुल्के का यह भी कथन निस्सार है कि वे अपने मतानुसार ही इन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहते हैं । उनके अनुसार तो वेद भी, जो लाखों वर्ष पुराने ही नहीं, किन्तु अनादि हैं, रावण की अपेक्षा अर्वाचीन ही ठहरेंगे, क्योंकि पाश्चात्य ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष की ही वेदरचना मानते हैं । परन्तु यह मत असङ्गत है, क्योंकि वेद नित्य, अनादि और अपौरुषेय हैं । ( देखिये वेद की अपौरुषेयता ) । वेद के साथ ही वेदाङ्ग भी होते हैं । किसी को क्या आवश्यकता पड़ी है कि जो स्वयं ऋग्भाष्य लिखकर उसे रावण के नाम से प्रसिद्ध करे । वेदों की कोई नई शाखा मान्य नहीं होती है, अतः रावणनिर्मित वेदशाखा सर्वथा अप्रामाणिक है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामाभिषेक के बाद तपस्वी लोग राम का अभिनन्दन करने आये थे । इसी अवसर पर अगस्त्य ने राक्षसवंश का इतिहास सुनाया था । महाभारत में रावणचरितवर्णन रामोपाख्यान के प्रारम्भ में है । पउमचरियं राक्षस तथा वानरों के वंश के इतिहास से प्रारम्भ होता है ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९१ तिब्बती तथा खोतानी रामायण, हिन्देशिया के सेरीराम तथा सेरतकाण्ड, श्याम के रामकियेन में रावण- चरित का कुछ वर्णन भूमिका में ही रखा गया है । काश्मीरीरामायण में प्रस्तुत रावणचरित की सामग्री सुन्दरकाण्ड के अन्तर्गत रखी गयी है। सुन्दरकाण्ड में लङ्का में सीता की खोज करते हुए हनुमान् रावण का वर्णन नारद से सुनते हैं । बुल्के कहते हैं कि रावण के चरित के सम्बन्ध में प्रामाणिक काण्ड मौन हैं, परन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। बाल और उत्तर दोनों ही प्रामाणिक काण्ड हैं। बुल्के के तथाकथित प्रामाणिक काण्ड में यदि रावणचरित होता भी तो उसे प्रक्षेप कहने में उन्हें क्या कठिनाई होती ? वाल्मीकिरामायण के अनुसार शूर्पणखा रावण की बहन है। कुम्भकर्ण और विभीषण दो भाइयों के अतिरिक्त तीसरे भाई खर का भी उल्लेख है जिसका सेनापति दूषण था। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार रावण की माता कैकसी थी। अन्य पाठों के अनुसार रावण की माता का नाम निकषा है। (वाल्मीकिरामायण गो० पा० ५।७६; प० पा० ५।७५) तथा भागवत (७।१।४३) में उसे केशिन कहा गया है । बुल्के कहते हैं युद्धकाण्ड में रावण को क्षत्रिय उपाधि दी गयी है (वा० रा० ६।१०९।१९)। परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि रावण जन्मतः ब्राह्मण है। युद्ध प्रधानरूप से क्षत्रिय-धर्म है। क्षत्रधर्म में प्रतिष्ठित होने के कारण ही उसे क्षत्रिय कहा गया है— "नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥" क्षत्रधर्म में व्यवस्थित रणनिहत क्षत्रिय शोचनीय नहीं होता— "क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः।" (वा० रा० ७।१०९।१५-१८) वे यह भी कहते हैं कि राम-कथा के विकास के साथ-साथ रावण का महत्त्व भी बढ़ने लगा था। जिससे उत्तरकाण्ड की रचना के समय तक रावण को ब्रह्मा का वंशज माना गया है। यह भी बुल्के का प्रमाद ही है। मिथ्या कल्पना को विकास कहना भी भ्रामक है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो रावण ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य का पौत्र एवं विश्रवा का पुत्र है। बुल्के को बतलाना चाहिये कि रावण किसका पुत्र है ? और वह भी किस प्रमाण के बल से ? पुराण भी रामायण के ही पक्ष को अङ्गीकार करते हैं। प्रजापति ने जल की सृष्टि के बाद प्राणियों की सृष्टि की। उनको जल की रक्षा करने का आदेश दिया । उनमें से कुछ ने 'रक्षामः' कहा और कुछ ने 'यक्षामः' कहा। अतः ब्रह्मा ने क्रम से उन्हें राक्षस एवं यक्ष कह दिया (वा० रा० ७।४।९-१२)। राक्षसों के हेति, तथा प्रहेति दो नेता थे। हेति के पुत्र विद्युत्केश से सुकेश उत्पन्न हुआ। सुकेश के माल्यवान्, सुमाली और माली तीन पुत्र हुए। तीनों ने तपस्या कर अमरत्व का वरदान पाया। विश्वकर्मा ने उनके लिए त्रिकूट पर लङ्का बना दी। आनन्दरामायण के अनुसार गरुड़ एक गज, ग्राह तथा गृध्र को लेकर क्षीरसागर के स्वर्णवृक्ष पर बैठे। उनके भार से वह शाखा टूट पड़ी। उसके नीचे ऋषि तप करते थे, अतः उस शाखा को भी लेकर गरुड़ ने लङ्का पहुँच कर तीनों को खा लिया। तीनों की अस्थियों का ही त्रिकूट पर्वत बन गया। वह स्वर्णशाखा पाषाण बन गयी। लङ्का-दहन के समय वह द्रवित हो गयी, अतः लङ्काभूमि स्वर्णमयी हो गयी। रंगनाथ के अनुसार वायु द्वारा हेमाद्रि का एक हेममय शिखर उड़कर वहाँ आ पड़ा था, वही त्रिकूट हो गया। वाल्मीकिरामायण (३।३५।२७-३२)

५९२ रामायणमीमांसा एकोनविंश में कहा गया है कि गरुड़ के हस्ती और कच्छप को लेकर महान् न्यग्रोध पर बैठने से उसकी सौ योजन की एक शाखा टूट पड़ी थी। ऋषियों की रक्षा के लिए गरुड़ ने उस शाखा को भी लेकर सिन्धु के अनूप में एक पाद से उनका भक्षण किया था। वे तीनों राक्षस देवताओं तथा तपस्वियों को सताते थे। विष्णु ने माली का वधकर राक्षसों को परास्त किया। वे सुमाली के नेतृत्व में लङ्का छोड़कर रसातल चले गये। कुछ दिनों के बाद सुमाली अपनी पुत्री कैकसी के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। सुमाली ने विश्रवा के पुत्र वैश्रवण को पुष्पक पर विराजमान देखकर अपनी पुत्री को विश्रवा के पास भेजने का निश्चय किया। पिता के आदेशानुसार कैकसी विश्रवा के पास गयी। विश्रवा अग्निहोत्र कर रहे थे। उन्होंने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और कहा तुम दारुण वेला में आयी हो, अतः तुम्हारे पुत्र क्रूरकर्मा राक्षस होंगे। कैकसी के अनुनय पर अन्तिम पुत्र के धर्मात्मा होने का वरदान दिया। कैकसी ने—दशग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को जन्म दिया। दशग्रीव और कुम्भकर्ण लोक के उद्वेजक हुए। पर विभीषण धर्मात्मा, वेदों के अध्ययन में तत्पर, जितेन्द्रिय तथा नियताहार हुए (सर्ग ९)। महाभारत के रामोपाख्यान (अध्याय २९९) में पुलस्त्य वैश्रवण के पिता बन जाने के बाद स्वयं विश्रवा का रूप धारण करते हैं तथा विभिन्न पत्नियों से रावणादि को उत्पन्न करते हैं। पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण को, मालिनी से विभीषण को तथा राका से खर तथा शूर्पणखा को उत्पन्न करते हैं। रामोपाख्यान रामायण का ही संक्षेप है। अतः उसके अनुसार ही रामोपाख्यान की संगति लगानी चाहिये। आत्मा ही पुत्ररूप में प्रकट होता है, अतः पुलस्त्य का विश्रवारूप धारण करना सङ्गत ही है। पुष्पोत्कटा आदि को कैकसी का ही रूपान्तर समझना उचित है। कूर्मपुराण के अनुसार विश्रवा ने देववर्णिनी से वैश्रवण को, कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न किया था, पुष्पोत्कटा से महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व, खर तथा कुम्भीनसी को एवं वाका से त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व को उत्पन्न किया था। सौरपुराण (अध्याय ३०) में भी वैसी ही उत्पत्ति वर्णित है। किन्तु उसमें पुष्पोत्कटा के पुत्र खर का उल्लेख नहीं है। क्षेमेन्द्र के दशावतारचरित में रावणादि को पुष्पोत्कटा की सन्तान माना गया है। आनन्दरामायण (१।१३।२४) में विश्रवा तथा कैकसी के तीन पुत्र तथा तीन पुत्रियों का उल्लेख है—रावण, कुम्भकर्ण, क्रौञ्ची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी तथा विभीषण। काश्मीरीरामायण आदि के अनुसार रावण, खर, शूर्पणखा, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा वैश्रवण सब सहोदर भाई-बहन हैं। अद्भुतरामायण के अनुसार सहस्रस्कन्ध रावण भी विश्रवा तथा कैकसी का पुत्र था। वस्तुतः उपनिषदों में विभिन्न प्रकार की सृष्टि का विगान है। कहीं तेज, आप और अन्न की सृष्टि वर्णित है। कहीं आकाश, वायु, तेज, आप और पृथ्वी की उत्पत्ति वर्णित है। कहीं सीधे लोकों की सृष्टि कही गयी है। कहीं अन्य प्रकार से सृष्टि वर्णित है। यद्यपि तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार सबका समन्वय करके आकाश आदि के क्रम से सृष्टि का निर्णय किया गया है तथापि विगान के कारण सृष्टि को मायामयी अतात्त्विक माना गया है। उसी तरह रावणादि की सृष्टि में विगान या विविधता के कारण इसे भी मायामयी मानना उचित है। पउमचरियं के अनुसार सुकेश के माली, सुमाली और माल्यवान् पुत्र होते हैं। सुमाली का पुत्र रत्नश्रवा अपनी पत्नी कैकसी से क्रमशः दशमुख, भानुकर्ण, चन्द्रनखा और विभीषण को उत्पन्न करते हैं। वैश्रवण को यक्षपुर के राजा विश्वसेन तथा कैकसी की बहन कौशिकी का पुत्र माना जाता है। गुणभद्र के उत्तरपुराण में रावण के पूर्वजों की वंशावली निम्नरोक्त है—सहस्रग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव, पुलस्त्य एवं रावण। वसुदेवहिण्डि में क्रमशः बलि, सहस्रग्रीव, पञ्चशतग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव और विंशतिग्रीव। विंशतिग्रीव की चार पत्नियां हैं—१—देववर्णिनी

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९३ २—वक्रा ३—कैकेयी (कैकसी) और ४—पुष्पकूट । इनसे रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, त्रिजटा तथा शूर्पणखा का जन्म होता है । जैनियों ने मनगढन्त ही नामों की कल्पनाएँ की हैं । केदारखण्ड के अनुसार शिव के भद्र-सुभद्र नामक गण ही जय-विजय तथा वे ही रावण-कुम्भकर्ण हुए हैं । काशी केदारखण्ड के अनुसार ब्रह्मा की प्रार्थना तथा श्रीशिव की आज्ञा के अनुसार श्रीगणेश सनक, वीरभद्र सनन्दन, नन्दिकेश्वर सनातन तथा कार्तिकेय सनत्कुमार नाम से ब्रह्मा के मानस पुत्र हुए थे । वे सदा पञ्चवर्षवयस्क ही रहते थे । सभी परम तत्त्वविद् तथा शिवभक्त थे । उनकी सर्वत्र ही अव्याहत गति थी । उधर भगवान् शङ्कर के ही सुभद्र और भद्र नामक गण भी भगवान् विष्णु की प्रार्थना से और शिवजी की आज्ञा से विष्णु के पार्षद हुए थे । “सुभद्रभद्रनामानौ स्वगणौ प्राह चाह्वयन् ॥” २३-४१ यद्यपि गणों को भगवान् शिव का वियोग असह्य था तो भी शिवाज्ञा भी दुर्लङ्घ्य थी । शिवजी ने कल्प के पश्चात् सनकादि के शाप के व्याज से पुनः अपने धाम में बुला लेने का आश्वासन दिया था । सुभद्र और भद्र ने विष्णु के विरोधी बहुत से दैत्यों और दानवों को पराजित करके विष्णु के लिए विजयप्रदान किया था, इसी लिए विष्णु ने उनका नाम जय और विजय रखा था । बहुत काल के अनन्तर शिवेच्छा से ही सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार विष्णु के दर्शनार्थ विष्णु- लोक में गये । विष्णु लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे । जय और विजय द्वारपाल थे । उन्होंने भीतर जाने से उन्हें रोक दिया । तभी उन्होंने जय और विजय को तीन जन्म तक आसुरी योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया । पश्चात् विष्णु सहित लक्ष्मी की प्रार्थना तथा जय और विजय की प्रार्थना से उन्हें उनके उद्धार का आश्वासन दिया । सनक ही हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के रूप में उत्पन्न हुए थे— “कशिपोः पुत्रभावेन प्रह्लादः सनकस्त्वभूत् ।” (का० मा० २३।८ ) लक्ष्मी ने आश्वासन दिया कि दूसरे जन्म में इन्हें मोहित कर के शिवाविष्ट विष्णु के द्वारा वध कराकर मैं इनका उद्धार करूँगी । तीसरे जन्म में विष्णु ने कहा मैं स्वयं इनका उद्धार करूँगा । वही सुभद्र और भद्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र होकर अन्त में पुनः शिवभाव को प्राप्त हो गये थे । काशीकेदारखण्ड के अध्याय २३ के अनुसार नित्यसिद्ध ज्ञानी निर्विकार भाव से जन्मादि से भी मोहित नहीं होते हैं । शिवाज्ञा-पालनतत्पर ज्ञानी शिवभक्त कोटि कोटि जन्मों से भी उद्विग्न नहीं होते हैं । एक बार गौरी को स्वात्मतत्त्वोपदेश करने के लिए शिव ने शिवा को आदेश दिया कि सभी प्राणियों को हटा दिया जाय । शिवा ने प्राणिमात्र कीट, पतङ्ग आदि तक को हटा दिया । एक पारावत रुग्ण था और दूर वृक्ष के कोटर में था; वह नहीं हटाया जा सका । शिव ने बतलाया कि मुझ अखण्ड चिदात्मा में संसारप्रपञ्च का अभाव रहता हुआ भी प्रातिभासिक रूप से जगत् भासमान होता है । अखण्ड चेतन ही ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का सार है । नेति नेति इत्यादि उपनिषद्वाक्यों से स्वात्मैकवेद्य स्वानुभवमात्र चिद्धन वस्तु लक्षित होती है । वह अनादि, अनन्त, अखण्डैकरसच्चिदानन्दनिर्भर है । वही शिव है, शान्त है, तुरीयातीत अद्वय है । सारे जगत् का कारण मिथ्या माया ही विश्ववैचित्र्य का निदान है । आत्मा स्वतः भासमान है, स्वतः सत्य है, स्वतः स्थितः है । वही श्रुत्यनुग्रहित सहस्रों अनुमानों से भी वेद्य है । वह स्वस्वरूप है, स्वप्रतिष्ठ है तथा भावाभावविवर्जित है— ७५

५९४ रामायणमीमांसा एकोनविंश "स्वात्मन्यभाववद्भावातत्त्वब्रह्मात्मनिर्णयम् । तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थसारं चाखण्डचेतनम् ॥ नेति नेतीत्युपनिषद्वोधशीर्षनिरञ्जनम् । स्वात्मैकवेद्यं स्वानुभवमात्रं तद्धि चिद्घनम् ॥ अनाद्यनन्ताखण्डैकसच्चिदानन्दनिर्भरम् । शिवं शान्तं तुरीयांशं तुरीयातीतमद्वयम् ॥ कारणं जगतां माया मिथ्यावेचित्र्यसद्मनाम् । स्वतो भान्तं स्वतः सत्यं स्वतः सिद्धं स्वतः स्थितम् ॥ श्रुत्यनुग्राहिताशेषानेकानुमोदितम् । स्वातन्त्र्यं स्वप्रतिष्ठानं भावाभावविवर्जितम् ॥" इस प्रकार महागुरु शिव के उपदेश से गौरी देहाद्यतीत स्वानन्यभाव से जीवतत्त्व को जानकर तदनन्य हो गयीं । भावनाबर्जित देहादिसंघात वासनाशून्य होकर गिर गया। कोटरस्थ पक्षी भी गुरु की महिमा से देहात्मवासना- शून्य होकर अखण्ड ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त हो गया। उसका देहादिसंघात कोटर से नीचे गिर पड़ा। आश्चर्यचकित होकर शिव ने ज्ञानदृष्टि से सब कुछ जान लिया । लोकलीला विनोदाथं देवी के शरीर का स्पर्श किया। देवी ने उत्थित होकर पक्षी को देखा और शिव से पक्षी को ज्ञानप्राप्ति की बात जानकर शिव से प्रार्थना की कि इसे पुनः जीवित कर दें, क्योंकि इसने आज्ञा का उल्लङ्घन किया है, अतः इसका ब्राह्मणयोनि में एक जन्म होगा। शिव-शक्ति से पक्षी जीवित हो गया। उसने गुरुदम्पति को प्रणाम कर प्रसन्नता से हँसते हुए कहा- सद्गुरु, अब अनेक कोटि जन्म भी हों तो भी मेरी कोई हानि नहीं । द्विजत्व, क्षत्रियत्व तथा कोई भी जन्म हो या त्रिमूर्ति ब्रह्मादिजन्म भी हो मैं उनसे रागवान् नहीं होऊँगा । स्वात्मानन्द गुरु की कृपा से अब मैं स्वयंभासमान आत्मा ही हूँ। पक्षी की बात सुनकर गौरी और हर दोनों ही ने जाना कि इसका ज्ञान परिपक्व हो गया है तो भी एक जन्म होगा और गर्भ में ही इसे पुनः स्वात्मसाक्षात्कार होगा । उससे कहा- तुम्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया है तथापि अब्राह्मण होने से वह सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि उपनिषद्ज्ञान के लिए द्विजत्व अपेक्षित है, तस्मात् एक ब्राह्मणजन्म प्राप्त कर तुम मुक्त हो जाओगे । "लब्धमप्यात्मविज्ञानमद्विजत्वान्न सिध्यति द्विजत्वमुपनिषदामर्थज्ञानाय कारणं मतम् । तस्मादेकं विप्रजन्म प्राप्य मामाप्स्यसि ध्रुवम् ॥" सेरीराम के अनुसार ब्रह्मराजनामक इन्द्रपुर का राजा 'ब्रह्मा का वंशज था। उसके एक पुत्र का नाम चित्रवहा ( विश्रवा ) था । चित्रवहा ने दतिआ कूअच नामक राक्षस को परास्त कर उसकी पुत्री रक्षपन्दी से विवाह किया । उससे दशग्रीव रावण का जन्म हुआ। रावण दुराचारी था । निर्वासित होकर लङ्का पहुँच गया। इसके बाद ही कुम्भकर्ण, विनुसनम ( विभीषण ) तथा सूरपंदाकी (शूर्पणखा ) उत्पन्न हुई । सेरतकाण्ड में चित्रवहा इन्द्रतनी से रावण को उत्पन्न करते हैं तथा दूसरी पत्नी सुकेशी से अम्बकर्ण ( कुम्भकर्ण ), शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न करते हैं। रामकियेन ( अ० ३) में चतुर्र्वक्त्र के पुत्र लस्तियेन ( पुलस्त्य ) की पाँच पत्नियों का उल्लेख है : १-सुनन्दा कुबेर की माता, १- चित्रमाली देवनासुर की माता, ३- सुवर्णमाला अशघाता की माता, ४-वरप्रभा मारण की माता तथा ५- रजता दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दूषण, खर और सम्मक्खा ( शूर्पणखा ) की माता हुई ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९५ पालकपालाम के अनुसार ब्रह्मा ही दशरथ की देवरानी के गर्भ में प्रवेश करके हाथ में धनुष तथा तलवार लिये जन्म लेकर रावण कहलाते हैं। ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का के महाराज की पुत्री विवाह करना अस्वीकार करती है। किसी ऋषि के यहाँ साधना करने जाती है। किसी दिन ब्रह्मा आकर उससे कहते हैं—तुम तीन पुत्रों की माँ बनोगी। उसकी नाभि तीन बार छूकर चले जाते हैं। बाद में वह ब्रह्मचक्र (रावण), कुम्भकर्ण तथा विभीषण को जन्म देती है। तीनों ब्रह्मा की सन्तान माने जाते हैं। ब्रह्मा का वर पाकर रावण पृथ्वी का सबसे बड़ा योद्धा बनना चाहता है, कुम्भकर्ण नींद माँगता है एवं विभीषण प्रज्ञा और धार्मिकता का वर माँगता है। ब्रह्मा ने रावण को आश्वासन दिया कि तुम बुद्ध तथा वानरों को छोड़कर और सबों पर विजय पाओगे। आर्ष ग्रन्थों से दूर होने के कारण इन कथाओं में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण तथा महाभारत में रावण और कुम्भकर्ण के पूर्वजन्म अथवा शाप के कारण उनकी राक्षस्योनि की प्राप्ति का उल्लेख नहीं मिलता।” परन्तु बुल्के को ज्ञात होना चाहिए कि वैदिक ग्रन्थों में विभिन्न ग्रन्थों के समन्वय से ही तत्त्वज्ञान होता है। भले भारत और रामायण में वैसा वर्णन न हो, परन्तु अन्य पुराणों के अनुसार यह सिद्ध ही है कि विष्णु के द्वारपाल जय और विजय शापवश हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में उत्पन्न हुए थे। पुराण सर्वाधिक प्राचीन हैं। बुल्के जैसे पाश्चात्य लोग विभिन्न ग्रन्थों की विभिन्न कथाओं के समन्वय के बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं। अतएव वे सब को मिथ्या कल्पना या विकास कहकर भ्रम पैदा करते हैं। सिद्धान्ततः वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र तथा आगमों का समन्वय ही है। अन्य कथाओं को भी उनके अनुसार ही लगाना चाहिये। देशभेद से एक ही स्त्री या पुरुष का नामभेद सङ्गत हो जाता है। समन्वय न कर सकने के कारण ही बुल्के स्वयं भ्रान्त होकर अपने पाठकों को भी भ्रम में ही डालते हैं। वे कहते हैं कि हिरण्यकशिपु की प्राचीनतम कथाएँ जय-विजय के सम्बन्ध में मौन हैं। महाभारत (आदि पर्व ६१।५) में दितिपुत्र हिरण्यकशिपु का उल्लेख है। वह नृसिंह द्वारा नहीं मारा जाता। उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं होता। उसके भाई हिरण्याक्ष का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। शान्तिपर्व (अ० ३२६।७३) में नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। किन्तु दोनों में किसी प्रकार के सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। पर बुल्के को जानना चाहिये कि जिस विषय में एक ग्रन्थ मौन है, उसका ज्ञान अन्य वचनशील ग्रन्थ से जानना चाहिये। अतएव हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का कोई सम्बन्ध उक्त नहीं है, हिरण्यकशिपु का नृसिंह द्वारा वध नहीं हुआ, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं हुआ इत्यादि उक्तियाँ बालभाषित ही हैं। आगे वे स्वयं हरिवंश के प्रथम पर्व (अध्याय ४१) की कथा का वर्णन करते हुए मानते हैं कि वह ११५०० वर्ष तपस्या करके देव, असुर, गन्धर्व आदि द्वारा अवध्यता का वर प्राप्त कर अत्याचार करता हैं। विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर उसका वध किया। २य पर्व के अनेक स्थलों पर (अर्थात् अध्याय २२, ४७ और ७१ में) नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। अन्तिम पर्व (अ० ३६।३२) में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों को दिति का पुत्र माना गया है। प्रह्लाद ने नृसिंह का दिव्य रूप देखा था और पिता को सावधान किया था (अध्याय ४३)। पुनः बुल्के कहते हैं कि हरिवंश में कहीं भी हिरण्यकशिपु तथा रावण में किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। परन्तु बुल्के को इसी लिए समझ जाना चाहिये कि अल्पश्रुत अल्पज्ञ किसी एक ग्रन्थ के सहारे किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता। अल्पश्रुत से वेद डरता हैं कि यह अल्पज्ञ मुझपर प्रहार करेगा अर्थ का अनर्थ करेगा—

"बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।" फिर वे कहते हैं कि पहले पहल विष्णुपुराण ( १। अध्याय १७-२०) में हिरण्यकशिपु एवं उसके विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद के संघर्ष की कथा मिलती है और यह भी वर्णन है कि हिरण्यकशिपु ने पहले रावण पश्चात् शिशुपाल के रूप में जन्म लिया । यह उनका प्रलाप मात्र है, क्योंकि जैसे वेदों की विभिन्न शाखाएँ अनादि हैं। उनमें कोई पहली और कोई पिछली नहीं है । वैसे ही पुराण सभी अनादि हैं। उनमें कोई पहला और कोई पिछला नहीं, अतः सबका समन्वय करके यह निश्चित होता है कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों कश्यप एवं दिति के पुत्र थे। दोनों सगे भाई थे। प्रह्लाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था। वह महान् विष्णुभक्त था। उसकी रक्षा के लिए विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकशिपु को मारा। हिरण्याक्ष को वारहरूप धारण कर के विष्णु ने मारा था। वे दोनों विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनकादि के शाप से तीन जन्म के लिए उन्हें आसुरी योनि प्राप्त हुई थी। ये सब बातें भागवतपुराण ( ३। अध्याय १५-१९) से भी सिद्ध हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड ५६।४६-४९), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २६९।४) आदि में भी यही बात स्पष्ट है। किसी समय विष्णु के द्वारपाल चण्ड और प्रचण्ड ने लक्ष्मी को नारायण की सभा में जाने से रोका था । अतः क्रुद्ध होकर लक्ष्मी के शाप से वे दोनों राक्षस बने । नारायण ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—तुम पृथ्वी को जीत कर जय और विजय नामों से प्रसिद्ध होओगे। लक्ष्मी को सीता के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। कहीं कहीं वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया था, ऐसी कथा उल्लिखित है। इसी तरह शापों के योग भी उक्त हैं। बलरामदास के अनुसार दुर्वासा नारायण से मिलना चाहते थे। नारायण लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे। दुर्वासा ने हठ किया। द्वारपालों ने उन्हें गला पकड़ कर हटा दिया। उन्होंने १०० जन्मों तक राक्षस होने का उन्हें शाप दे दिया । नारायण ने उसे तीन जन्मों तक ही सीमित कर दिया । अन्य कथाएँ भी कल्पभेद से सङ्गत हैं। शिवपुराण के अनुसार दो शिवगण नारद के शाप से रावण, कुम्भकर्ण बने थे। वह्निपुराण में वर्णित है कि मधु और कैटभ ही हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बने थे । रामचरितमानस के अनुसार एक बार जलन्धर रावण बना था तथा किसी कल्प में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण क्रम से पूर्व जन्म के प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्म- रुचि थे । रामकियेन के अनुसार नन्दक ने रावण के रूप में जन्म लिया, जो शिव के गणों में एक था। उसने ईश्वर से वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसकी ओर इशारा करे वह मर जाय । उसने उक्त वर के प्रभाव से बहुत देवताओं का वध किया । अन्त में नारायण अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को नृत्य सिखाने लगे । जिसमें नन्दक अंगुली से अपने शरीर की ओर इशारा करके मर गया था। वही दशग्रीव बना था। अप्रतिषिद्ध अन्य मत भी अनुमत होता है। अतः वाल्मीकिरामायण द्वारा अप्रतिषिद्ध उक्त मत भी किसी कल्प के अनुसार सत्य है ही। ऐसे ही अन्य जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थों में उनके पूर्व जन्म के नामान्तर भी प्रसिद्ध हैं। किन्तु उनमें साम्प्रदायिक दुराग्रह तथा मिथ्या आडम्बरों का प्राधान्य है। तप और वर वाल्मीकिरामायण के अनुसार वैश्रवण ने तपस्या कर चतुर्थ लोकपाल का पद तथा पुष्पक विमान प्राप्त किया था । विश्रवा के आदेशानुसार वे लङ्का में रहते थे। वैश्रवण का वैभव देखकर विश्रवा की द्वितीय पत्नी कैकसी ने उस ओर रावण का ध्यान आकर्षित किया। दशग्रीव माता की प्रेरणा से तप करने गोकर्ण गया ( वा० रा० ७।९।४७ ) । वहाँ तीनों भाई १०००० वर्ष तक घोर तप करते रहे । दशग्रीव प्रति हजारवर्षों के अन्त में अपना सिर

अग्नि में अर्पित करता था । उसने नौ हजार वर्ष तक नौ सिरों का अग्नि में होम कर दिया। दसवें हजार वर्ष में दसवाँ सिर काटनेवाला ही था कि ब्रह्मा संतुष्ट होकर प्रकट हुए । उन्होंने उसे सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवताओं द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया एवं उसके नौ सिर लौटाकर उसे कामरूपी होने का भी वरदान दिया । विभीषण ने धार्मिक होने का वर माँगा, कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से निद्रा माँग ली। रावण ने सुमाली की प्रेरणा से प्रहस्त को भेजकर लङ्का की माँग की । पिता के परामर्श से वैश्रवण लङ्का छोड़कर कैलास चले गये । वाल्मीकिरामायण ( युद्धकाण्ड अध्याय ६१ ) के अनुसार ब्रह्मा ने कुम्भकर्ण के अत्याचार के कारण उसे शाप दिया था कि वह छः महीने सोयेगा और एक ही दिन जागेगा । उसी दिन वह पृथ्वी पर विचरता हुआ बहुत लोगों को खा जायगा । बुल्के कहते हैं कि महाभारत ( ३।२५९।२८ ) के अनुसार कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से नहीं वरन् अपनी ही तामसी दुर्बुद्धि के कारण दीर्घ नींद का वरदान माँग लिया था— “स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ।।” ( ३।२५९।२८ ) परन्तु इसमें कोई विरोध नहीं है । सरस्वती की प्रेरणा से ही तामसी शक्ति का विकास मानना चाहिये । अतएव आनन्दरामायण ( १।१३।५५ ) में कहा गया है कि सरस्वती से मोहित होकर कुम्भकर्ण ने छः महीने की निद्रा माँगी । कृत्तिवासरामायण के अनुसार ब्रह्मा ने कहा था कि नर और वानरों के सिवा कोई भी तुम्हें न मार सकेगा । सिर कटने पर तुम न मर सकोगे । रावण की शिवभक्ति प्रसिद्ध है । स्कन्दपुराण ( माहेश्वरखण्ड अ० ८ ) तथा पद्मपुराण ( उत्तरख० अ० २६९ ) के अनुसार शिव ही रावण तथा उसके भाइयों को वर देते हैं । पउमचरियं के अनुसार तपस्या द्वारा रावण ने ५५ विद्याएँ, भानुकर्ण ने ५ विद्याएँ एवं विभीषण ने ४ विद्याएँ सिद्ध कर लीं तथा आकाशगामिनी विद्या तीनों भाइयों ने प्राप्त की थी । सेरीराम के अनुसार केवल रावण ने ही घोर तप किया था । अल्लाह ने नवी आदम का निवेदन स्वीकार कर रावण को चार ( १ स्वर्ग, २ पृथ्वी, ३ पाताल और ४ महासागर ) लोकों में राज्यस्थापन का अधिकार दिया बशर्ते कि वह न्यायपूर्वक शासन करे । रामकियेन ( अध्याय ९ ) के अनुसार रावण ने अपने गुरु के परामर्श से ऐसा यज्ञ किया था जिसके फलस्वरूप वह जीवित रहते हुए अपना जीवन शरीर से अलग करने में समर्थ हुआ था । रावण अपना जीव गुरु की रक्षा में छोड़कर अत्याचार करता हुआ भी अवध्य रहा । विवाह और सन्तति वाल्मीकिरामायण ( उत्तरकाण्ड सर्ग १२ ) के अनुसार रावण ने मृगया के समय अपनी पुत्री के साथ टहलते हुए मय को देखा । परस्पर परिचय के बाद मय ने रावण को कन्यादान के साथ एक अमोघ शक्ति भी दी । जिससे उसने लक्ष्मण को आहत किया था । आनन्दरामायण के अनुसार रावण ने गान द्वारा शिव को प्रसन्न कर अपनी माता कैकसी के लिए शिव- लिङ्ग और अपने लिए पार्वती को माँग लिया । शिव ने सावधान करके कैकसी के लिए पूजनार्थं शिवलिङ्ग देकर कहा

५९८ रामायणमीमांसा एकोनविंश कि कहीं पृथ्वी पर रख देने पर यह अटल हो जायगा । रावण लिङ्ग एवं पार्वती को लेकर चला । पार्वती ने विष्णु का स्मरण किया । विष्णु ने अपने अंग के चन्दन से सुन्दरी मन्दोदरी की सृष्टि कर उसे मय के घर धर दिया । स्वयं ब्राह्मण वेष में रावण से कहा शिव ने धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपा दिया है । यह सुनकर रावण वास्तविक पार्वती को लौटा कर पाताल जाने लगा । रास्ते में लघुशङ्का करने के लिए आत्मलिङ्ग उस विष्णुरूपी ब्राह्मण को दे दिया । देर तक लघुशङ्का होती रही । ब्राह्मण आत्मलिङ्ग को गोकर्ण में भूमि पर रख कर अन्तर्धान हो गये । रावण आत्मलिङ्ग उठाने में समर्थ नहीं हुआ तब उसने पाताल से मन्दोदरी को प्राप्त किया । रामकियेन (अध्याय ५) के अनुसार कोई मण्डूकी चार ऋषियों के पास रहती थी । कोई गाय वहीं एक पात्र में दूध दे जाती थी । ऋषि लोग स्वयं पीकर कुछ मण्डूकी को दे देते थे । किसी दिन सर्पिणी ने अपना विष डाल दिया । मण्डूकी ने सोचा ऋषि लोग मर जायेंगे ! अतः उनके प्राण बचाने के लिए वह स्वयं दूध में कूदकर मर गयी । ऋषियों को रहस्य विदित हुआ । उन्होंने उसे दिव्य सुन्दरी युवती बनाकर ईश्वर को समर्पित कर दिया । ईश्वर ने उमा को दे दिया । रावण ने ईश्वर को प्रसन्न कर उमा को प्राप्त कर लिया किन्तु उमा स्वयं तप्त लोहप्रतिमा के तुल्य हो गयीं । रावण स्पर्श करने में असमर्थ होकर उन्हें सिर पर धारण कर ले चला । नारायण माली का रूप धारण कर उल्टे ढंग से वृक्ष का रोपण कर रहे थे । रावण माली की मूर्खता पर हँसने लगा तो माली ने कहा—तुम मन्दोदरी को छोड़कर इस तप्त प्रतिमा को सिर पर ढो रहे हो, अतः तुम हमसे भी अधिक मूर्ख हो, सुनकर रावण ने ईश्वर के पास जाकर उमा को लौटाकर मण्डो को ले लिया । अतिकाय की माता धान्यमालिनी भी रावण की एक और पत्नी थी एवं अनेक और भी उसकी पत्नियाँ थी । जैन कथाओं के अनुसार सुग्रीव की बहन श्रीप्रभा भी रावण की पत्नी थी । इनके अतिरिक्त ६०० विद्याधरियाँ उसकी पत्नियाँ थीं । पुत्रों में इन्द्रजित् सर्वाधिक प्रसिद्ध था । अक्षकुमार, अतिकाय आदि तथा देवान्तक, नरान्तक अन्य भी अनेक उसके पुत्र थे । पाताल का महीरावण, गङ्गामहासूरा आदि भी उसके पुत्र थे । कुछ ग्रन्थों में सीता को रावण की पुत्री माना गया है । वाल्मीकिरामायण (सर्ग ९) के अनुसार रावण वर प्राप्त कर देव, ऋषि, गन्धर्व और यक्षों को सताता था । कुबेर ने दूत भेजकर सदुपदेश दिया, पर उसने दूत को ही मार डाला । कुबेर पर आक्रमण कर पुष्पक छीन लिया । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण ने मरुत्त, दुष्मन्त, सुरथ, गाधि, मय, पुरूरवा, अनरण्य आदि को जीत लिया । अन्त में नारद के परामर्श से उसने यम पर आक्रमण किया । यम ने रावण का वध करना चाहा, किन्तु ब्रह्मा का अनुरोध मानकर अन्तर्धान हो गये । रावण ने यमलोक जीत कर वरुणालय के वासुकि को परास्त किया । दैत्यों से सन्धि कर ली । विद्युज्जिह्व का वध कर वरुण की सेना को हराया । रावण की अन्य विजय-यात्राएँ रावण की अनुपस्थिति में मधु ने कुम्भीनसी का अपहरण किया । रावण ने मधु पर आक्रमण किया । किन्तु कुम्भीनसी ने रावण का स्वागत करके मधु के लिए अभयदान माँग लिया । रावण कुम्भीनसी की प्रार्थना मानकर कैलास की ओर बढ़ा । मार्ग में रम्भा के साथ बलात्कार करने के कारण नलकूबर के शाप का भागी हुआ । इन्द्रलोक में राक्षसों और देवताओं का घोर युद्ध हुआ । वहाँ सुमाली मारा गया । तब मेघनाद जयन्त को परास्त कर इन्द्र को वन्दी बनाकर लङ्का ले आया । ब्रह्मा ने इन्द्रजित् नाम देकर इन्द्र को छुड़ाया । प्रक्षिप्त सर्गों में रावण की सूर्यलोक तथा चन्द्रलोक की यात्रा भी वर्णित है । पउमचरियं के अनुसार यम, सहस्रकिरण, इन्द्र, वरुण आदि देवता न होकर राजा ही थे, पर यह सब वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध है ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९९ वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण कैलास के ऊपर जा रहा था तो पुष्पक अचानक रुक गया। रावण पुष्पक से उतरा, नन्दी का उपहास करके उसने कैलास पर्वत उठाया। पर्वत हिलने लगा। महादेव ने पादाङ्गुष्ठ से पर्वत को दबाया। रावण की भुजाएँ कैलास के नीचे जकड़ गयीं। वह क्रोध और पीड़ा से चिल्लाने लगा। मन्त्रियों के परामर्श से वह विविध स्तोत्रों से महादेव को सन्तुष्ट करने लगा। सहस्र वर्ष तक विलाप करता रहा तब भगवान् प्रसन्न हुए। उन्होंने दशग्रीव की भुजाएँ मुक्त कर दीं। उसका नाम रावण रखा, क्योंकि उसने पर्वत से आक्रान्त होकर दारुण राव किया था। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शिव ने उसको चन्द्रहासनामक खड्ग दिया था (सर्ग १६)। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३१) में यह भी मिलता है कि रावण सदा ही सुवर्णलिङ्ग अपने पास रखता था और उसकी पूजा करता था। पउमचरियं के अनुसार रावण ने उस चन्द्रहासनामक खड्ग से भुजा काटकर उसकी शिराओं से वीणा का तार बनाकर जिन की स्तुति की थी। यह देखकर धरणेन्द्र मुनि ने रावण को अमोघविजया शक्ति का वर दिया था। अन्य रचनाओं के अनुसार शिव ने रावण को अपनी अँगुली से दबा लिया था। इसपर रावण ने एक सिर तथा एक भुजा मुक्त कर उस सिर से वीणा बनाकर शिव को अपने गायन से प्रसन्न किया था। इस तरह रावण को त्रिलोक पर अधिकार मिला। रामकियेन के अनुसार एक देवता ने किसी दिन कैलास पर एक छिपकली पर इतना प्रबल प्रहार किया कि पर्वत एक ओर झुक गया। देवता कैलास सीधा करने में असमर्थ रहे। तब ईश्वर ने रावण को बुलाया। उसने कैलास को उठाकर पूर्ववत् सीधा कर दिया। वर पाकर रावण ने उमा को माँग लिया और विष्णु की माया से उसने उमा को छोड़कर मण्डो को प्राप्त किया। बुल्के कहते हैं कि रामायण के प्रामाणिक सर्गों में कहीं भी रावण के प्रति किसी शाप का उल्लेख नहीं है, परन्तु शापबोधक सर्गों को अप्रामाणिक कहना सर्वथा निराधार ही है। युद्धकाण्ड (सर्ग ९४।३५) के अनुसार महादेव ने देवताओं को आश्वासन दिया था कि एक स्त्री के कारण रावण का नाश होगा। महाभारत का रामोपाख्यान बुल्के की दृष्टि से रामायण के प्रक्षेपों की कसौटी है। परन्तु उसमें भी नलकुबर के शाप का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि उनकी कसौटी भी तभी तक कसौटी है जब तक उनके मत की वह पोषक है। सुन्दरकाण्ड में त्रिजटा कहती है कि रम्भा के कारण अभिशप्त रावण किसी अनिच्छुक नारी का कुछ बिगाड़ नहीं सकता (म० भा० ३।२६४।५९)। रावण-वध के बाद राम को सीता के विषय में सन्देह होता है और उसी समय देवता प्रकट होते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि मैंने नलकूबर-शाप के द्वारा सीता की रक्षा का प्रबन्ध कर लिया था। नलकूबर-शाप यह था कि उसे न चाहनेवाली पराई स्त्री का सेवन करने पर रावण के सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे— “यदि ह्यकामामासेवेत् स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् । शतधाऽस्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥” (म० भा० ३।२९१।३४) वाल्मीकिरामायण (७। सर्ग २६) में इसका विस्तृत वर्णन है। रम्भा को देखकर रावण उसपर आसक्त हुआ। रम्भा ने कहा-मैं आपकी पुत्रवधू नलकूबर की पत्नी हूँ। रावण ने कहा-अप्सराओं का कोई पति नहीं होता। बाद में नलकूबर ने कहा था— “यदि ह्यकामां कामार्त्तो धर्षयिष्यति योषितम् । मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥”

इस प्रकार बुल्के के माने हुए युद्धकाण्ड में भी शाप का उल्लेख होने पर भी बुल्के झूठ बोलने में कितने निपुण हैं, यह पाठक विचार करें । पउमचरियं के अनुसार रावण ही उपरम्भा का प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार करता है, क्योंकि अनन्तवीर्य का उपदेश सुनकर विरक्त हुए उसने परनारी के साथ रमण न करने का व्रत लिया था । जैनों और बौद्धों के अनुसार रावण पक्का धर्मभीरु जैनी या बोधिसत्त्व है । परन्तु यह सब उनके वैदिकधर्मविरोधी होने का ही दुष्परिणाम है । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग १६ ) के अनुसार रावण ने नन्दी को वानरमुख देखकर उसका उपहास किया था । नन्दी ने यह शाप दिया था कि तुम्हारे कुल के नाश के लिए मेरे समान रूप और बल से सम्पन्न वानर होंगे ( वा० रा० ७ । सर्ग १६, १७ )। वेदवती का शाप भी उत्तरकाण्ड में उल्लिखित है। उत्तरकाण्ड ( सर्ग १९ ) के अनुसार अयोध्या के राजा अनरण्य द्वन्द्वयुद्ध में रावण द्वारा मारे गये थे । उन्होंने शाप दिया था कि इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न राम तुम्हारा वध करेंगे । पुञ्जिकस्थला अप्सरा से उसकी इच्छा के विरुद्ध रावण ने रमण किया था । ब्रह्मा ने सारा हाल जानकर शाप दिया था कि आज से यदि बलात् किसी नारी का गमन करोगे तो तुम्हारा सिर शतधा फट जायगा ( वा० रा० ६।१३।१४ ) । यह शाप भी बुल्के के मान्य काण्ड का है । फिर बुल्के किस मुँह से कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण में शाप नहीं है । कैलास-शिखरचालन के समय उमा ने भी कहा कि स्त्रीनिमित्त से ही रावण का मरण होगा ( वा० रा० ७।१६।२६ ) । रावण-पराजय महाभारत में परशुराम द्वारा कार्तवीर्य के वध का उल्लेख है ( अध्याय १३३ ) । हरिवंश के अनुसार कार्तवीर्य ने उग्र तप द्वारा सहस्र भुजाएँ प्राप्त कीं और सबको जीत लिया । कीर्तवीर्य ने सेना सहित रावण को परास्त किया था और उसे बन्दी बना लिया था । पुलस्त्य ने जाकर उसे छुड़ाया । उत्तरकाण्ड ( सर्ग ३४ ) कार्तवीर्य के कारावास से मुक्त होकर योग्य प्रतिद्वन्द्वियों की खोज में रावण पृथ्वी पर भ्रमण कर रहा था । किष्किन्धा पहुँचकर उसने सुना वाली दक्षिणी समुद्र पर सन्ध्या कर रहा है। रावण पुष्पक द्वारा वाली के पास गया । वाली रावण को अपनी काँख में दबाकर आकाश-मार्ग से पश्चिम सागर और उत्तर सागर पर गया, सन्ध्या समाप्त कर किष्किन्धा लौटा तभी उसने रावण को मुक्त किया। रावण ने वाली के पराक्रम की प्रशंसा की और उससे सख्य करने की प्रतिज्ञा की । आनन्दरामायण ( सर्ग १।१३।१०० ) में अङ्गद के पालने के नीचे बद्ध रावण—‘‘अङ्गदस्य मूत्रधारा- धोताननः'' होता है। सेरीराम के अनुसार वाली अपने राज्य पर पुष्पक को उड़ते देख रावण पर आक्रमण करता है तथा मन्दूदा ( मन्दोदरी ) को छीनकर पुष्पक सहित रावण को समुद्र में फेंक देता है। मन्दूदा से विवाह कर लेता है । कुछ दिनों बाद उसने हनुमान् को आदेश दिया कि गर्भवती मन्दूदा की सेवा के लिए २४ राजकुमारियों को लायें । रावण ने वाली के गुरु के पास जाकर मन्दूदारी के हरण का समाचार बताया । गुरु ने आश्वासन दिया कि वह तुमको वापस मिल जायगी, पर तुम तपस्वियों के आश्रमों को नष्ट न करो । गुरु के अनुरोध से वाली ने कहा—वह गर्भवती है। गुरु ने गर्भ निकाल कर बकरी के शरीर में रख दिया। रावण मन्दूदा को पाकर घर चला गया । गुरु ने हनुमान् से इन्द्रपवानम पर्वत से फूल लाने को कहा—वे समस्त पर्वत उठा लाये । गुरु ने मन्त्रों की सहायता से उन फूलों से एक मण्डूक की सृष्टि की और मण्डूक से सुन्दर स्त्री की सृष्टि की। गुरु ने उसका नाम देवीवरमाकोमाल रखा। उसे वाली को पत्नी के रूप में प्रदान किया। बकरी से उत्पन्न पुत्र का नाम अंग्गाद रखा गया। वरमाकोमाल ने अनूल नामक पुत्र उत्पन्न किया । अन्त में हनुमान् और वाली दोनों तप के लिए चले गये ।

अध्याय उत्तरकाण्ड ६०१ सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार रावण वाली के भवन में कैदी के रूप में रखा गया था। महासिकुल के अनुरोध से वाली ने मुक्त किया। जब अङ्गद की अवस्था दस वर्ष की थी, रावण उसे मारना चाहता था; क्योंकि अङ्गद मण्डो के अपमान का स्मरण दिलाता था। रावण छिपकर किष्किन्धा आया, किन्तु सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। वाली ने द्वन्द्वयुद्ध में उसे परास्त कर अपने यहाँ बन्दी बनाकर रखा। उत्तरकाण्ड (सर्ग २३) के बाद प्रक्षिप्त सर्ग में रावण यमलोक से बलि के भवन पहुँचा। बलि ने रावण को बता दिया कि भवन के द्वार पर जिस श्याम पुरुष से तुम्हारी भेंट हुई थी वही विष्णु हैं। यह सुनकर रावण लड़ने गया। किन्तु ब्रह्मा के वर का ध्यान रखकर विष्णु अन्तर्धान हो गये। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार बलि ने अपने यहाँ पड़े चक्र को दिखाकर रावण से कहा, उसे उठाकर मेरे पास लाओ। रावण उसे हिलाने में समर्थ नहीं हुआ। अन्त में सारी शक्ति लगाकर उसे उठाया किन्तु मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बलि ने कहा—यह चक्र मेरे पूर्वज का कुण्डल है तुम जिसे उठा नहीं सके। विष्णु ने उस महाशक्तिशाली को भी मार दिया था, जिसने इस कुण्डल को कान में पहना था। अध्यात्मरामायण (सर्ग १।१३।१०७-११५) के अनुसार बलि पत्नी के साथ चौसर खेलता था। बलि के हाथ से पासा गिर गया। बलि ने रावण से उठाने को कहा, वह रावण से उठा ही नहीं। दासी ने झट उठा दिया। भवन से रावण के निकलने पर बलि के अनुचरों ने उसे पकड़ लिया। घोड़े की लीद फेंकने का रावण से काम लिया। कुछ समय बाद द्वारस्थित विष्णु से उसने प्रार्थना की। विष्णु ने उसे पादाङ्गुष्ठ से आकाश में उछाल दिया और वह लङ्का पहुँच गया। रावण ने किसी दिन पश्चिम सागर में भीषणाकार कपिल को देखा। उनसे युद्ध करने की इच्छा की। कपिल ने प्रहार कर रावण को भूमि पर गिरा दिया और पाताल चले गये। रावण ने पीछा किया। वहाँ कपिल के समान तीन कोटि पुरुषों को देखकर वह वहाँ से शीघ्रता से निकल गया। एक अन्य स्थल पर रावण ने शयन कर रहे विष्णु के पास बैठी लक्ष्मी को देखा। लक्ष्मी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाना चाहा। विष्णु हँस पड़े और वह भूमि पर गिर पड़ा। विष्णु ने रावण को अभयदान दिया एवं परिचय पूछने पर अपना विराट् रूप दिखा दिया (सर्ग २३ के बाद पञ्चम प्रक्षिप्त सर्ग)। रावण किसी दिन श्वेतद्वीप गया। वहाँ की युवतियों ने उसे लीलापूर्वक एक दूसरे के पास फेंक दिया। भयातुर रावण सागर मध्य में गिर गया। आनन्दरामायण के अनुसार श्वेतद्वीप की एक स्त्री ने रावण को परलङ्का तक फेंक दिया एवं वह अपनी बहन क्रौञ्चा के शौचकूपक में जा गिरा। भविष्यपुराण में हनुमान् द्वारा भी रावण की पराजय वर्णित है। उत्तरकाण्ड की कथा वस्तु वैश्रवण—विश्रवा और देववर्णिनी के पुत्र वैश्रवण का चतुर्थ लोकपाल तथा धनेश बनना एवं पुष्पक विमान प्राप्त कर लङ्का निवास (सर्ग १-३)। प्रहेति के वंश और हेति के वंश में उत्पन्न राक्षसों का लङ्का में निवास तथा विष्णु द्वारा पराजित होकर पाताल प्रवेश। रावण का जन्म, विश्रवा और कैकसी से दसग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म। तीनों भाइयों की तपस्या तथा ब्रह्मा से वरप्राप्ति (सर्ग ९, १०) रावण की आशङ्का से वैश्रवण का लङ्का त्याग तथा कैलास पर निवास। राक्षसों का लङ्का में प्रवेश तथा मन्दोदरी के साथ रावण का विवाह (सर्ग ११-१२)। ७६

६०२ रामायणमीमांसा एकोनविंश रावण की विजय-यात्रा—वैश्रवण को पराजित कर पुष्पक-प्राप्ति (सर्ग १३-१५)। रावण को नन्दी का शाप, रावण का कैलास उठाना, शिव से रावण नाम तथा चन्द्रहास खड्ग की प्राप्ति (सर्ग १६)। वेदवती का रावण को शाप प्रदान (सर्ग १७)। रावण द्वारा अनेक राजाओं को पराजित करना तथा राजा अनरण्य का रावण को शाप देना (सर्ग १८, १९)। रावण का यम पर आक्रमण तथा ब्रह्मा द्वारा उनकी रक्षा (सर्ग २०-२२)। शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह्व का रावण द्वारा वध तथा वरुण-पुत्रों की पराजय (सर्ग २३)। रावण द्वारा अनेक कन्याओं और पत्नियों का हरण, नलकूबर का रावण को शाप देना (सर्ग २४-२६)। मेघनाद द्वारा इन्द्रबन्धन, देवताओं की प्रार्थना से मुक्ति और देवताओं से मेघनाद को वरप्राप्ति। हनुमत्कथा—हनुमान् की जन्मकथा और चरित्र (सर्ग ३५, ३६), सीतातयाग (सर्ग ३७), अतिथियों का प्रस्थान (सर्ग ३८-४०), नृग, निमि ययाति की कथाएँ (सर्ग ५३-५९)। शत्रुघ्न चरित्र (सर्ग ६०-७२), शम्बूक-वध (सर्ग ७३-८२), अश्वमेध और उसका माहात्म्य (सर्ग ८३-९०), नैमिषारण्य में अश्वमेध के अवसर पर लव-कुश का राम की सभा में रामायण का गान करना, कुशलव को सीता-पुत्र जान कर राम का वाल्मीकि के पास सन्देश भेजना, सभा के सम्मुख अपनी शुद्धि का साक्ष्य देने के लिए सीता से अनुरोध करना, सीता का शपथ- ग्रहण, पृथिवी का सीता को अपने साथ ले जाना (सर्ग ९१-९५), राम द्वारा सीता को लौटाने का पृथिवी से अनुरोध (सर्ग ९६-९८), कुश और लव द्वारा उत्तरकाण्ड का गान, सभाविसर्जन, माताओं का देहान्त (सर्ग ९९)। विजय-यात्राएँ—भरत-पुत्रों (तक्ष और पुष्कल) के तक्षशिला, पुष्कलावती में राज्यों की स्थापना, लक्ष्मण-पुत्रों (अङ्गद और चन्द्रकेतु) के अङ्गद्वीप और चन्द्रकान्त में राज्यों की स्थापना, काल का राम को विष्णु- रूप में आने का स्मरण कराना, दुर्वासा के आग्रह से लक्ष्मण का राम और काल के पास जाना, इसके कारण, काल के साथ हुई शर्त के अनुसार राम द्वारा लक्ष्मण का त्याग और लक्ष्मण का देह त्याग कर शेषरूप में व्यक्त होना, राम का कुशावती में कुश एवं श्रावस्ती में लव को प्रतिष्ठित करना, अपने पुत्रों (सुबाहु तथा शत्रुघाती) को राज्य देकर शत्रुघ्न का अयोध्या आना, सुग्रीव और वानरों का आना, राम द्वारा विभीषण एवं हनुमान् को अमरत्व का वरदान देना, राम का अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में तथा वानरों का अंशानुसार देवताओं में प्रवेश करना एवं नागरिकों की सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति। फलश्रुति (सर्ग १०९-१११)। उत्तरकाण्ड का विश्लेषण उत्तरकाण्ड के विश्लेषण में बुल्के कहते हैं कि "तीनों पाठों में इतनी ही विभिन्नता है कि दाक्षिणात्य पाठ में भृगु द्वारा विष्णु को प्रदत्त शाप सीता-त्याग का कारण माना गया है।" इतनी कम विभिन्नता से भी वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसकी रचना अन्य काण्डों के बाद में हुई थी। यद्यपि यह स्वाभाविक ही है कि अन्तिम चरित्र की रचना अन्त में होती है तथापि उनका आशय इतना ही नहीं है। उनका अभिप्राय तो यह है कि उत्तर- काण्ड महर्षि वाल्मीकि की कृति ही नहीं है। यह तो किन्हीं अन्य व्यासों ने पीछे से जोड़ दिया है। परन्तु यह कथन अशुद्ध एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। क्योंकि पाठों एवं टीकाकारों की परम्पराओं में बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड भी सम्मिलित हैं ही। टीकाकारों ने समानरूप से सब पर टीकाएँ भी लिखी हैं। उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के तर्कों का पीछे खण्डन किया जा चुका है। बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण में दो ही विस्तृत अंश हैं, जिनमें अशुद्ध श्लोकों का बाहुल्य पाया जाता है। विश्वामित्र की कथा (बालकाण्ड सर्ग ५७-६५) तथा रावणचरित (उत्तरकाण्ड सर्ग १-३६)। अशुद्धियों का बाहुल्य इन दोनों वृत्तान्तों को प्रक्षेप सिद्ध करता है।" परन्तु बुल्के के ये तर्क बिलकुल गलत हैं। वस्तुतः जिन अंशों को बुल्के अशुद्धियाँ कहते हैं वे आर्ष पाठ हैं, अशुद्धियाँ नहीं हैं। अन्यथा रघुवंश, माघ, किरात आदि में

अध्याय उत्तरकाण्ड ६०३ बिल्कुल अशुद्धियाँ न होने से उन्हें वेदों से भी प्राचीन मानना पड़ेगा और वेदों में वैसी अशुद्धियाँ होने से उन्हें अत्यन्त अर्वाचीन कहना होगा, परन्तु यह सब वस्तुस्थिति के बिलकुल विरुद्ध है । 'वधंसे' के स्थान में 'वधंसि' प्रयोग कर ( १।२८ इत्यादि स्थानों में ) टीकाकारों ने समाधान भी किया है । विशेषकर 'तिलक' व्याख्याकार तो महावैयाकरण नागेश भट्ट हैं । अतिथियों की पुनः विदाई का वैसा ही समाधान है जैसा कि पहले संक्षेप में वर्णनीय विषय का वर्णन कर उसका विस्तृत रूप में पुनः वर्णन किया जाता है । इतना ही नहीं सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप मानकर भी उस प्रक्षेप में भी प्रक्षेप की वे कल्पना करते हैं । अतएव रावणचरित आदि को वे प्रक्षेप में प्रक्षेप मानते हैं । उनकी दृष्टि में "उत्तरकाण्ड का मूल रूप सीता-त्याग के वर्णन से प्रारम्भ हुआ होगा ( सर्ग ४२-५२ ) । शेष सामग्री से पौराणिक कथाओं को तथा शम्बूकवध की कथा को हटाने पर जो वृत्तान्त रह जाता है वही प्रारम्भिक उत्तरकाण्ड रहा होगा । अर्थात् शत्रुघ्नचरित, कुश और लव का जन्म, राम का अश्वमेध, कुश तथा लव द्वारा रामायणगान, सीता का भूमि-प्रवेश, रामादि के पुत्रों की राज्य-स्थापना, लक्ष्मण का देहान्त, राम का स्वर्गारोहण ।” परन्तु यह सब बुल्के की अटकलमात्र है । कोई ठोस आधार और प्रमाण उनकी इस कल्पना में नहीं है । परम्परा एवं टीकाएँ तो प्रचलित सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता ही सिद्ध करती हैं । उत्तरकाण्ड का अर्थ ही यह है कि जो वस्तु छः काण्डों में अपेक्षित थी, उसका वर्णन किया जाय । रावण, मेघनाद आदि का जन्म, कार्य तथा हनुमान् आदि का भी जन्म तथा चरित आदि का वर्णन प्रासङ्गिक ही है । परस्पर विचारविनियम के प्रसङ्ग में निमि, नृग, ययाति आदि का वर्णन भी अत्यन्त प्रासङ्गिक है, अतः इतने बड़े अंशों को प्रक्षेप कहना अवश्य ही साहस है । शत्रुघ्न-चरित प्रचलित रामायण में वर्णित ज्यों का त्यों प्रामाणिक ही है। सौदास की कथा वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग ६५ ) में वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को सौदास की कथा सुनायी थी । सौदास ने मृगया के समय व्याघ्ररूपधारी दो राक्षसों को देखकर एक को मार डाला । प्रतीकार करने का संकल्प लेकर दूसरा राक्षस अन्तर्हित हो गया । कालान्तर में सौदास वसिष्ठ के नेतृत्व में अश्वमेध यज्ञ करते हैं । यज्ञान्त में राक्षस ने वसिष्ठरूप धारण कर सामिष भोजन माँगा । राजा ने तैयार करने का आदेश दिया । राक्षस नरमांस का भोजन हाथ में लेकर रसोइये के रूप में राजा के सामने उपस्थित हुआ । राजा ने अपनी पत्नी मदयन्ती के साथ यह भोजन परोस दिया । मानुष्यामिष भोजन समझ कर वसिष्ठ ने राजा को यह शाप दे दिया कि यही तुम्हारा भोजन होगा । शाप सुनकर क्रोधवश सौदास भी प्रतिशाप देने के लिए प्रस्तुत हुए, किन्तु मदयन्ती के रोकने से सौदास ने क्रोधमय शाप-जल को अपने पैर पर ही डाल दिया जिससे उसके पैर पर काले धब्बे पड़ गये । इसी लिए कल्माषपाद नाम से उसकी प्रसिद्धि हुई । अन्त में राक्षस का कपट जानकर वसिष्ठ ने शाप १२ वर्ष के लिए सीमित कर दिया । फलतः १२ वर्ष के बाद कल्माषपाद शापमुक्त होकर पुनः राज्याधिकारी होकर प्रजापालन करने लगे । विष्णुपुराण ( ४।४।३८-५८ ); भागवत ( ९।९।२०-२५ ) तथा स्कन्दपुराण ( ३।३।२ ) में भी यह कथा है । स्कन्दपुराण के अनुसार वसिष्ठ द्वारा सन्तति प्राप्त कर वह तपस्या के लिए बन जाता है । वहाँ ब्रह्महत्या सामने आती है । उससे मुक्ति के लिए वह तीर्थों में भ्रमण करता है । अन्त में वह गौतम के आदेशानुसार गोकर्ण में शिवलिङ्ग के दर्शन कर मुक्त होता है । कृत्तिवासरामायण के अनुसार वह गङ्गाजल से मुक्त होता है । बुल्के के अनुसार “रामकथासाहित्य में इस कथा के तीन रूप मिलते हैं । कोई व्यक्ति अनजान में मांसाहार परोसने के कारण ब्राह्मण-शाप का भाजन बनता है और वह राम द्वारा मुक्त होता है । अन्तिम दो कथाओं में किसी शत्रु के षड्यन्त्र के कारण नरमांस परोसा गया था तथा तीसरी कथा के अनुसार राजा प्रतापभानु ब्राह्मणों का

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६०४ रामायणमीमांसा एकोनविंश कोपभाजन बनकर रामायण का प्रतिनायक राक्षस रावण के रूप में प्रकट होता है।" परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार है। प्रतापभानु की कथा सौदाश की कथा से सर्वथा भिन्न है। दोनों के नामों एवं रूपों में भी भिन्नता है। संसार में मांसभक्षण, सुरापान की सैकड़ों समान घटनाएँ घटती हैं। किन्तु सब की अभिन्नता नहीं कही जा सकती। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ५९ के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार गौतम नामक ब्राह्मण ने किसी दिन राजा ब्रह्मदत्त के यहाँ भोजन माँगा। संयोग वश आहार में कुछ मांस पड़ गया जिससे गौतम ने राजा को गीध बन जाने का शाप दिया। राजा के विनय से गौतम ने कहा कि राम के स्पर्श से तुम मुक्त होओगे। ब्रह्मदत्त गीध बन गया। वह राम का स्पर्श कर दिव्य रूपधारी पुरुष बन गया। इस कथा का भी सौदाश के साथ सम्बन्ध जोड़ना निराधार है। नामभेद तथा परिणामभेद भिन्नता के हेतु स्पष्ट ही हैं। मनुष्यमांस का निषेध सदा ही था। ज्ञानाज्ञानवश उसके प्रयोग से अनेक स्थलों पर अनर्थ संभावित हैं ही। अध्यात्मरामायण (६।५।५-५४) तथा आनन्दरामायण (१।१०।२१५-२१९) में रावण के गुप्तचर शुक के पूर्वजन्म के विषय में कथा मिलती है कि शुक नामक वनवासी ब्राह्मण देवताओं का हितकारी होने के कारण राक्षसों का शत्रु बन गया। एक दिन अगस्त्य उसके आश्रम में आये तो अवसर का लाभ उठाकर वज्रदंष्ट्र नामक राक्षस ने अगस्त्य का रूप धारण कर लिया और शुक से सामिष भोजन माँगा। वज्रदंष्ट्र ने शुक की पत्नी को मूच्छित कर दिया और स्वयं उसी का रूप धारण कर नरमांस परोसा और अन्तर्हित हो गया। इसपर अगस्त्य ने शाप दिया कि तुम नरमांसभक्षी राक्षस बन जाओ। शुक के द्वारा कारण पूछे जाने पर मुनि ने राक्षस की करतूत जान ली और शुक को आश्वासन दिया कि राम के आगमन पर तुम रावण-दूत बनकर राम का दर्शन पाओगे। रावण को तत्त्वज्ञान का उपदेश कर परम पद पाओगे। इस कथा का भी सौदाश के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। बुल्के ने सौदाश या सुदास नाममात्र के आधार पर ६२१ वें अनु० में अनेक व्यक्तियों का सम्बन्ध जोड़ लिया है। ऋग्वेद के अनुसार सुदास नामक राजा के दो पुरोहित थे। विश्वामित्र और वसिष्ठ। उन दोनों में वैर उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य में (विश्वामित्र की प्रेरणा से) सौदासों द्वारा वसिष्ठ-पुत्र का वध तथा यज्ञ के प्रभाव से सौदासों पर वसिष्ठ की विजय उल्लिखित हैं। यहाँ भी सुदास पुरोहित ब्राह्मण थे। सौदाश राजा से उनका सम्बन्ध जोड़ना व्यर्थ है। जब वसिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ही सुदास थे तब वसिष्ठ का सौदासों पर विजय की कहानी भी कल्पनामात्र ही है। बृहद्देवता में अध्याय ६ में कहा गया है कि वसिष्ठ ने सुदास को राक्षस बन जाने का शाप दिया था। इसी से यह क्यों न समझा जाय कि वसिष्ठ सुदास या सुदासों से भिन्न थे। बुल्के कहते हैं कि "इस कथा पर बौद्ध संसार में प्रसिद्ध सुतसोमजातक का प्रभाव पड़ा है। ब्राह्मण-धर्म के ग्रन्थों में सौदाश की कथा के दो रूप मिलते हैं। एक महाभारत का रूप, जिसमें वसिष्ठ दूसरों द्वारा अभिशप्त सौदाश को मुक्त करते हैं और दूसरा रामायण का रूप जिसके अनुसार वसिष्ठ ने सौदाश को राक्षस बन जाने का शाप दिया था। दोनों में समान रूप से यह तत्त्व विद्यमान है कि नरमांसाहार प्रदान करने के कारण सौदाश को १२ वर्ष तक राक्षस बनना पड़ा था।" सौदासीय कथा के रूपान्तर भी मिलते हैं। जिनके द्वारा राम का महत्त्व तथा उनकी दयालुता का भी प्रतिपादन है। महाभारत और रामायण के दोनों सौदासों पर विचार आगे किया जायगा। दोनों में तुल्यता होने पर भी उसका आधार बौद्ध साहित्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत और रामायण दोनों ही बौद्ध साहित्य के पूर्ववर्ती हैं। बुद्ध के जन्म से बहुत पहले महाभारत की रचना हो चुकी थी। रामायण तो

बुद्ध एवं बौद्ध साहित्य से लाखों वर्ष पहले निर्मित हो चुकी थी। यह इतिहास-विवेचन में देखें। इसके अतिरिक्त बौद्ध साहित्य के महासुतसोम की इनसे भिन्नता भी है। ५२२ वें अनु० में सुतसोम के सम्बन्ध में कहा गया है कि सुतसोम इन्द्रप्रस्थ के राजा कौरव्य का राज- कुमार था। जो तक्षशिला में ब्रह्मदत्त के रूप कल्माषपाद का सहपाठी था। बाद में अपने पिता के स्थान पर राजा बन गया था। कल्माषपाद भी वाराणसी का राजा था। वह पूर्व जन्म में नरभक्षक यक्ष था। अतः वह प्रतिदिन मांस खाता था। किसी दिन कुत्ते राजा का मांसाहार ले गये। रसोइये ने मनुष्य मांस बनाकर परोस दिया। राजा ने उसे पसन्द किया। तब रसोइये ने रहस्य खोला। राजा ने प्रतिदिन के लिए नरमांस तैयार करने का आदेश दिया। राजा ने सब कैदियों को खा लिया। बाद में नागरिकों का भी वध होने लगा। जनता में खलबली मच गयी। रसोइया रँगे हाथ पकड़ा गया। उसने कहा—राजा को नरमांस अपेक्षित होता है। राजा तथा रसोइया दोनों निर्वासित कर दिये गये। राजा वन में मनुष्य-वध किया करता था और रसोइया उनका मांस भूनकर परोसता था। किसी दिन राजा रसोइये को भी खा गया। एक ब्राह्मण के अपहरण के कारण लोगों ने राजा का पीछा किया। राजा के पैर में चोट आ गयी। राजा ने एक वृक्ष-देवता से यह प्रतिज्ञा की कि अच्छा होने पर मैं तुम्हें भारतवर्ष भर के १०१ राजकुमारों को अर्पित करूँगा। सात दिन भोजन न करने के कारण उसका घाव भर गया। उसने समझा कि यह देवता की कृपा है। वह पूर्व जन्म के अपने साथी यक्ष से मन्त्र पाकर शीघ्रगामी यक्ष बन गया और उसने एक सो राजाओं को कैद कर लिया। इसके बाद उसने देवता के आदेश से सुतसोम को भी पकड़ लिया। सुतसोम ने उस दिन पूजा करते समय किसी ब्राह्मण को आश्वासन दिया था कि स्नान से लौटकर आपकी बात सुनूँगा, इसलिए उसने नरभक्षक से निवेदन किया मुझे ब्राह्मण के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पूरा करने का अवसर दिया जाय। नरभक्षक ने उसे अनुमति दे दी। सुतसोम ब्राह्मण के पास जाकर चार गाथाएं सीखकर और बदले में उसे चार हजार मुद्राएँ देकर कल्माषपाद के पास लौटा। वह इन चार गाथाओं को सुनकर प्रसन्न हुआ और उसने सुतसोम से चार वर माँगने को कहा। सुतसोम ने कहा—१. मैं आपको सौ वर्ष तक जीवित देखना चाहता हूँ। २. आप उन एक सौ राजकुमारों को न खायें। ३. आप उनका राज्य वापस कर दें। ४. आप नरभक्षण त्याग दें। दोनों में देर तक वार्तालाप होता रहा। फलतः कल्माषपाद ने अपनी आदत को छोड़ना स्वीकार कर लिया। राजकुमारों को छोड़ दिया और उनके राज्य भी वापस दे दिये। जिस स्थान पर नरभक्षक का हृदय-परिवर्तन हुआ, वहाँ कम्मासदम्भ नामक नगर बस गया। बौद्ध साहित्य की परवर्ती रचनाओं में मांसाहारी कल्माषपाद को तथा सौदास को अभिन्न माना गया है और सौदास के मांसाहारी बनने का कारण यह बताया गया है कि वह सिंहिनी की सन्तान था। कथा का यह रूप जातकमाला के सुतसोमजातक, लङ्कावतारसूत्र, सिंहसौदासमांसभक्षणनिवृत्ति के चीनी अनुवाद, भद्रकल्पावदान आदि में सुरक्षित है। जैनी ग्रन्थों में इसकी चर्चा है (पउमचरियं २२।७२-९५) । महाभारत अश्वमेधपर्व (अध्याय ५६-५८) में सत्यसन्ध उत्तंक तथा सौदास के विषय में जो कथा मिलती है उसपर बौद्ध जातक की छाप स्पष्ट है। किन्तु बुल्के का यह अनुमान सही नहीं है कि बौद्ध साहित्य का प्रभाव रामायण या महाभारत पर पड़ा है। जैसा कहा जा चुका है कि महाभारत और रामायण उससे पूर्ववर्ती हैं। बौद्ध- कथा तो अहिंसा एवं मांसभक्षणनिवृत्ति के उद्देश्य से लिखी गयी है। वह ऐतिहासिक ही हो यह आवश्यक नहीं है। सुखावबोधार्थ आख्यायिकाएँ कल्पित भी होती हैं। कल्माषपाद नाम और नरमांसभक्षण तुल्य होने पर भी रामायण के अनुसार यह अनजान में हुए अपराध के कारण वसिष्ठ-शाप से १२ वर्ष के लिए राक्षस हुआ था। उसके कल्माषपाद होने का हेतु भी क्षमा एवं सहिष्णुता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। उसके विपरीत सुतसोमजातक के कल्माषपाद की

कथा में कहीं अधिक नरमांसभक्षण की उद्दाम प्रवृत्ति है। दोनों कथाओं में एकता का परिचायक कोई सूत्र नहीं है। बौद्धों का कल्माषपाद सौदास से भिन्न है। विकासवाद एवं ऐतिहासिकों के अनुसार विकसित कथा को नवीन एवं संक्षिप्त को प्राचीन माना जाता है। क्योंकि पूर्व की बातों को जानकर और परिष्कृत एवं रोचक बनाकर उनका निरूपण करना उत्तर वक्ता के लिए स्वाभाविक ही है। रामायण और महाभारत दोनों की अपेक्षा बौद्धों की कथा कहीं अधिक विकसित है, अतः उसकी नवीनता ही सिद्ध होती है। महाभारत आदिपर्व (अध्याय १७६–१७८) के अनुसार राजा कल्माषपाद किसी दिन मृगया के समय वन में वसिष्ठपुत्र शक्ति से मिलते हैं। मार्ग देने के प्रश्न पर विवाद छिड़ जाने पर राजा शक्ति पर कोड़े का प्रहार करते हैं। जिस पर शक्ति राजा को पुरुषाद बन जाने का शाप देते हैं। दोनों का विवाद सुनकर वसिष्ठ का अनर्थ चाहने- वाले विश्वामित्र किंकर राक्षस को आदेश देते हैं कि वह कल्माषपाद के शरीर में प्रवेश करे। बाद में किसी दिन एक ब्राह्मण ने कल्माषपाद से सामिष भोजन माँगा। राक्षसग्रस्त राजा ने अन्य मांस अप्राप्त होने के कारण ब्राह्मण को नरमांस खिलाने का आदेश दिया। पाचक ने वैसा ही किया, जिससे ब्राह्मण ने शक्ति के शाप का स्मरण दिलाकर राजा को पुरुषाद बनने का पुनः शाप दिया। राक्षस के आवेश तथा उपर्युक्त दो शापों के कारण कल्माषपाद वास्तव में नरभक्षक बन गया। उसने सर्वप्रथम शक्ति का ही भक्षण किया। अनन्तर विश्वामित्र के आदेश से किंकर राक्षस ने राजा को वसिष्ठ के १०० पुत्रों को खाने के लिए प्रेरित किया। पुत्रों की मृत्यु से वसिष्ठ आत्महत्या का असफल प्रयत्न करते हैं। बहुत समय बाद वन में कल्माषपाद वसिष्ठ के सामने आता है। अभिमन्त्रित जल द्वारा वसिष्ठ राक्षसत्व एवं शापों से उसे मुक्त कर देते हैं। इतना ही नहीं कल्माषपाद की प्रार्थना पर उसके लिए सन्तति भी उत्पन्न करते हैं। १२ वर्ष तक गर्भधारण करने के बाद अश्म से उदर खोलने से उसका जन्म होने से उसका नाम अश्मक हुआ। बुल्के कहते हैं कि “वैदिक साहित्य में वसिष्ठ और विश्वामित्र का वैर प्रसिद्ध है। महाभारत की और वैदिक साहित्य की कथा में मुख्य अन्तर यह है कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ शाप नहीं देते उल्टे वह कल्माषपाद को शाप से मुक्त कर देते हैं। अतएव कल्माषपाद के राक्षस बनने के शक्ति का शाप, किंकर राक्षस का प्रवेश एवं नरमां- साहार देने के कारण किसी ब्राह्मण का शाप इत्यादि अन्य कारण बताये गये हैं। अन्तिम कारण में सुतसोमजातक का प्रभाव देखा जा सकता है। सुतसोम में साधारण मांस के अभाव में राजा को नरमांस परोसा जाता है जैसा कि यहाँ अन्य मांस अप्राप्य होने से ब्राह्मण को नरमांस दिया जाता है।” परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि प्रमेयत्व और वाच्यत्व रूप से तो सर्वत्र साम्य होता ही है, पर कथा में वह सादृश्य अभेद का प्रयोजक नहीं होता। सुतसोम- जातक एवं महाभारत की परस्पर अत्यन्त विलक्षणता उसकी भिन्नता ही सिद्ध करती है। "आत्मा वै पुत्रनामासि" आत्मा ही पुत्र होता है। इस दृष्टि से वसिष्ठ-पुत्र शक्ति का शाप भी वसिष्ठ का ही शाप माना जा सकता है। वसिष्ठ शापमुक्त होने की बात तो रामायणसम्मत है ही। वैदिक साहित्य का सौदास या सुदास पुरोहित होने से ब्राह्मण है। रामायण तथा महाभारत का सौदास क्षत्रिय राजा है। सुतसोमजातक का कल्माषपाद तो सौदास से भिन्न ही है। परवर्ती कथाओं में उन दोनों का अभेद पूर्णतया विरुद्ध होने से काल्पनिक ही है। बुल्के कहते हैं कि "बृहद्देवता के अनुसार वसिष्ठ ने सौ पुत्रों के वध के कारण सुदास को शाप दिया था। किन्तु महाभारत में सौदास शापग्रस्त होने के पश्चात् ही वसिष्ठ-पुत्रों का भक्षण करता है जैसा कि सुतसोमजातक में कल्माषपाद नरभक्षक बनने के बाद ही १०१ राजाओं का बलिदान तैयार करता है। जातक में बोधिसत्त्व सुतसोम नरभक्षक को उपदेश देकर व्यसन छोड़ने को प्रेरित करता है। जैसा कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ अभिमन्त्रित जल से कल्माषपाद को मुक्त करते हैं। इस प्रकार महाभारत की कथा पर सुतसोम की गहरी छाप है।” परन्तु यह भी संगत नहीं, क्योंकि कहा जा चुका है कि महाभारत प्राचीन है। सुतसोमजातक उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है। इसके अतिरिक्त महाभारत का कल्माषपाद शाप आदि वश ही नरभक्षक बनता है, किन्तु सुत-

सोम का कल्माषपाद प्राचीन संस्कार वशात् पहले मांसभक्षक और फिर शाप आदि के बिना ही नरभक्षक बनता है। महाभारत का कल्माषपाद १०० ब्राह्मणों को खाता है, किन्तु सुतसोम जातक का कल्माषपाद देवता को बलिदान करने के लिए १०१ राजकुमारों को बटोरता भर है, खाता नहीं और बाद में उनको छोड़कर उनका राज्य लौटा देता है। महाभारत का कल्माषपाद शाप से एवं राक्षसावेश से नरभक्षक बनता है और अभिमन्त्रित जलप्रोक्षण कर वसिष्ठ के अनुग्रह वश मुक्त होता है। जातक का कल्माषपाद सुतसोम के उपदेश से ही आदत छोड़ता है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। सुतसोमजातक का आख्यान लौकिक स्वाभाविक होने से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है, किन्तु महाभारत और रामायण के दोनों आख्यान वर, शाप आदि अलौकिकता से सम्बन्ध रखते हैं, अतः वे प्राचीन हैं। महाभारत और रामायण की कथा संक्षिप्त है तथा सुतसोमजातक की कथा सविस्तर है। इस तरह दोनों में महान् अन्तर है। वेद के उपबृंहणार्थ ही महाभारत तथा रामायण का आविर्भाव है, अतः वैदिक साहित्य की कथा से उनका मेलजोल हो सकता है। बृहद्देवता की कथा का सुतसोमजातक की कथा से साम्य नहीं है, यह बुल्के भी मानते हैं। महाभारत में दो शापों का उल्लेख है। बुल्के कहते हैं कि "कल्माषपाद नाम का वैदिक साहित्य में सर्वथा अभाव है। महासुतसोमजातक गाथा ४७२, महाभारत तथा रामायण तीनों में समानरूप से मिलता है। इनमें सुतसोमजातक सबसे प्राचीन है। अतः पहले पहल यह नाम बौद्ध साहित्य में ही प्रयुक्त हुआ है। महाभारत, रामायण तथा पुराणों में सौदास, मित्रसह तथा कल्माषपाद तीनों नाम दिये हैं", पर यह सभी कुशकाशावलम्बन है। महाभारत और रामायण की बुद्ध से भी प्राचीनता सिद्ध की जा चुकी है। हरिवंशपुराण भी महाभारत समकालीन ही है। उसमें स्पष्ट उल्लेख है— "सुदासस्य सुतस्त्व्वासीत् सौदासो नाम पार्थिवः । ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥" (हरिवं० १।५५।२१) अतः बुल्के का यह कहना "एक दीर्घकालीन विकास के अन्त में सौदास की कथा भक्तवत्सल भगवान् राम के गुणगान में परिणत हो गयी।" कथमपि सङ्गत नहीं है, अवश्य ही सौदास की कथा प्राचीन ही नहीं अतिप्राचीन है। परन्तु वह अतिप्राचीन काल से ही रामायण के अन्तर्गत होने से राम गुणगान के रूप में स्वीकृत है, पर बुल्के के विकासक्रम से नहीं। महाभारत, रामायण तथा पुराण सभी वेद के उपबृंहणार्थ ही निर्मित हैं। अतः वैदिक साहित्य से ही उनका सम्बन्ध है। किञ्चित् भेद होने पर कल्पभेद से समाधान है ही। आश्चर्य है कि बुल्के वेद में आनेवाले राम, सीता, दशरथ, जनक आदि का सम्बन्ध रामायण के राम, सीता, दशरथ आदि से मानने में आनाकानी करते हैं। वेदप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण के वाल्मीकि का सम्बन्ध वे नहीं मानते हैं। वैदिक सौदास से सुतसोमजातक के सौदास का अत्यन्त वैलक्षण्य होने पर भी वे यथा- कथञ्चित् बादरायणसम्बन्ध-स्थापना का हठ करते हैं। 'किमाश्चर्यमतः परम् ।' शम्बूक-वध ६२८ वें अनु० में शम्बूक-वध के सम्बन्ध में उत्तरकाण्ड के अनुसार कहा गया है कि राम नारद से यह जान लेते हैं कि एक शूद्र का तपस्या करना ही ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का हेतु है। राम पुष्पक पर आरूढ़ होकर शूद्र का पता लगाकर उसका वध करते हैं। राम के इस कार्य से वह स्वर्ग प्राप्त न कर सकेगा। इस कथन का इतना ही अभिप्राय है कि शम्बूक जो सदेह स्वर्ग प्राप्त करना चाहता था वह न कर सकेगा। किन्तु राजदण्ड से मृत्यु प्राप्त कर तो वह स्वर्गभागी होगा ही, अतः इसका अन्य वचनों के साथ समन्वय ही है, विरोध नहीं है। राम मृत पुत्र के पुनर्जीवन का वरदान माँग लेते हैं। अगस्त्य राम को श्वेत राजा और दण्डकारण्य की कथा सुनाते हैं।

६०८ रामायणमीमांसा एकोनविंश पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अध्याय ३२।८९ तथा उत्तरखण्ड अध्याय २३०।४७) में भी देवताओं के वरदान से द्विज-पुत्र के जीवित होने का उल्लेख है। महाभारत शान्तिपर्व में कहा गया है कि— “श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः। जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥” (म० भा० १२।१४९।६२) इसमें देवताओं के वरदान से नहीं, किन्तु राम के धर्म से द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होना माना गया है। वस्तुतः बुल्के समन्वय की बात सोचते ही नहीं। उन्हें सर्वत्र विरोध ही दिखायी देता है। अन्यथा देवताओं के प्रसाद या धर्म से पुनर्जीवन में विरोध ही क्या है। धर्म भी तो देवता-प्रसाद का साधन है, अतः राम के धर्म से देवता-प्रसाद और उससे द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होने में विरोध का लेश भी तो नहीं है। यही श्लोक इस बात का भी परम प्रमाण है कि रामायण महाभारत की अपेक्षा अति प्राचीन है। अतः रामकथा पर कृष्णकथा का प्रभाव अथवा महाभारत के रामोपाख्यान को वाल्मीकिरामायण का मूल मानना सर्वथा भ्रान्ति ही है। कालिदास के रघुवंश एवं उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक-वध के द्वारा ही ब्राह्मण पुत्र पुनर्जीवन प्राप्त करता है— “कृतदण्डः स्वयं राज्ञा लेभे शूद्रः सतां गतिम् । तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविलङ्घिना ॥” (र० वं० १५।५३) राजा के द्वारा दण्ड दिये जाने के कारण शूद्र को उत्कृष्ट सद्गति मिल गयी, जो कि स्वमार्गविपरीत दुश्चर तप से भी नहीं मिल सकती थी। उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक, वध के बाद, दिव्य रूप में प्रकट होकर राम से कहता है, मैं आपके प्रसाद से शाश्वत पद प्राप्त करूँगा। बुल्के कहते हैं कि परवर्ती राम-कथाओं में देवताओं के वरदान का उल्लेख नहीं है, किन्तु राम द्वारा शम्बूक-वध की क्रिया ही ब्राह्मण-पुत्र के पुनर्जीवन एवं शम्बूक की स्वर्गप्राप्ति दोनों घटनाओं की कारण मानी गयी है। किन्तु बुल्के यह नहीं समझते कि मीमांसकों के अनुसार कर्म ही फल देता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार देवताप्रसाद द्वारा कर्म फल देता है। परिणाम दोनों का एक ही है। देवताओं का वरदान भी सत्कर्म द्वारा होता है। इसी लिए कहा गया है कि— ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करै सो तस फल चाखा॥’ (रा० मा० २।२७।२) अतः प्रकृत में दोनों का समन्वय ही है। आनन्दरामायण के अनुसार मृत ब्राह्मण-बालक के माता-पिता को प्रीतिपूर्वक कहा गया था कि यदि उनका पुत्र पुनर्जीवित न होगा तो उन्हें कुश और लव मिल जायेंगे। ब्राह्मण ही नहीं अयोध्या में पाँच शव और एकत्रित हो गये थे : एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक तेली, एक लुहार की पुत्र-वधू एवं एक चमार। राम ने जैसे शूद्र को मारा सब जीवित हो गये। राम ने पहले शूद्र को वरदान दिया। उसने अपने उद्धार के अतिरिक्त अपनी जाति के लिए सद्गति माँगी। राम ने रामनाम का जप और कीर्तन शूद्रों की सद्गति का उपाय बताया। यह भी कहा कि शूद्र लोग आपस में मिल कर एक दूसरे से मिलते हुए नमस्कार के रूप में राम राम कहेंगे। इसी से उनका उद्धार होगा। तुम भी मेरे हाथ से मरकर वैकुण्ठ जाओगे।