रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७७६ रामायणमीमांसा एकविंश तुलसी के पातिव्रत्य धर्म से ही सन्तुष्ट होकर अथवा उसके जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों एवं भक्ति-भावनाओं के वशीभूत होकर ही भगवान् तुलसीरूप में भी वृन्दा को अपनाते हैं। उसके रूपसौन्दर्य या यौवन के वशीभूत होकर नहीं। सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी जिसकी दासी है। सौन्दर्य-माधुर्य सारसर्वस्व राधारानी जिसकी अनन्य आराधिका है। अनन्त अनन्त लक्ष्मीरूप गोपाङ्गनाएँ जिसके पीछे पीछे पागल हुई भटकती हैं, उसे वृन्दा के रूप और यौवन की अपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। गोपाङ्गना ऊपर से नन्दरानी के पास गोपाल की शिकायत करने जाती थीं, परन्तु भीतर से चाहती थीं कि कृष्ण हमारे घरों में दधि, नवनीत की चोरी के लिए पधारें और उनकी बाट जोहती थीं। कृष्ण उनसे छाछ मांगते थे। दधि और नवनीत की चोरी करते थे। तभी तो भक्त कहता है कि— “गोपालाजिरकर्दमे विहरसे विप्राध्वरे लज्जसे ब्रूषे गोधनहुंकृतैः स्तुतिशतैर्मौनं विधत्से सताम्। दास्यं गोकुलपुंश्चलीषु कुरुषे स्वाम्यं न दान्तात्मसु” यह ठीक है कि वेदविहित कर्म पुण्य है और वेदनिषिद्ध कर्म अधर्म है— “वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।” ( भाग० ६।१।४० ) इस दृष्टि से पत्नी का एकपतिनिष्ठ होना शास्त्र विहित है, अतः पातिव्रत्य धर्म है और उत्कृष्ट धर्म है। उसके प्रभाव से सावित्री ने अपने पति को यम के हाथों से लौटा लिया था। उसी के प्रभाव से शाण्डिली ने सूर्योदय रोक दिया था। उसी के प्रभाव से वृन्दा का पति जालन्धर अजेय हो गया था। फिर भी वही विहित कृत्य धर्म है जो अनर्थशून्य हो। वेदविहित भी वही कृत्य धर्म है, जो फलकाल में भी अनर्थ से सम्बद्ध न हो। जो केवल प्रीति का हेतु हो। इसी लिए—‘‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’’ ( जै० सू० १।१।२ ) इस धर्मलक्षणबोधक जैमिनिसूत्र में अर्थ इस पद का संनिवेश है। इसी कारण श्येनादि अनर्थकारण याग अर्थरूप न होने से धर्म नहीं हैं। भट्टपाद ने कहा है कि— “फलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबद्ध्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वात् तद् धर्म इति कथ्यते ॥” फल द्वारा भी जो कर्म अनर्थ से संसृष्ट नहीं होता जो केवल सुख का हेतु हो वही धर्म है। श्येनादि याग का फल है शत्रुमरण। वह अन्त में नरक का हेतु होता है। अतः वह धर्म नहीं है। “नानापुराणनिगमागमसम्मतम् ।” ( रा० मा० १। मङ्गलाचरण ७ ) ‘ तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥ तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोही ।” ( रा० मा० १।१२०।२, ३ ) “अब सुनु परम विमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ।।” ( रा० मा० ७।८५।१ ) आदि अनेक वचनों से तुलसीदासजी वेदादि शास्त्रों का प्रामाण्य वर्णन करते हैं और उनकी सब उक्तियों का परम आधार वेदादि शास्त्र ही हैं। उसके सम्बन्ध में आजकल के वक्ताओं का किन्तु, परन्तु सर्वथा उपेक्षणीय ही है।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७७ वृन्दा "तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्म वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥" तप, अध्ययन, स्वाभाविक वेदविधान-यज्ञ, उञ्छ, शिल आदि वृत्तियाँ सुपुण्य हैं, पाप नहीं। किन्तु वही सब भावदुष्ट होने पर पाप बन जाती हैं। भगवान् राम ने तपस्वियों के तप की रक्षा के लिए दण्डकवन की यात्रा की थी। परन्तु धुन्धु नामक दैत्य महान् तप कर रहा था। वह किसी समुद्र की रेती में विलीन रहकर प्राणायाम करता था। साल, साल के कुम्भक के बाद जब वह रेचक करता था तो धरित्री में कम्प होता था। धरित्री की धूलि चन्द्र, सूर्य को आच्छन्न कर देती थी। पर्वतों में हड़कम्प मच जाता था। समुद्र उद्वेलित हो अपनी उत्ताल तरङ्गों से विश्व को आप्लावित करने लगता था। पर उसके तप का लक्ष्य था शक्तिसम्पन्न होकर वेदादि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम धर्म का विनाश करना। इसी लिए देवता और ऋषि उसके वध के लिए प्रयत्नशील हो धुन्धुमार नामक राजा को प्रेरित कर के उसका वध कराते हैं। यज्ञ का बहुत बड़ा महत्त्व है। राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए बड़ा परिश्रम किया था। परन्तु जब लङ्का में मेघनाद और रावण का यज्ञ चल रहा था तब उसके विनाश के लिए अङ्गद, हनुमान्, लक्ष्मण आदि ने प्रयत्न किया। क्यों ? इसी लिए कि ऐसे तप एवं यज्ञ, भावदुष्ट होने के कारण, धर्म नहीं अधर्म हो गये हैं। यदि उनका यज्ञ सफल होता तो रावण और मेघनाद अजेय ही हो जाते। वस्तुतः उनका यज्ञ तो दूसरों की बहू-बेटियों के अपहरण के लिए ही था। ऐसा यज्ञ धर्म नहीं। इसी तरह वृन्दा का पातिव्रत्य-धर्म भी हजारों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु हो रहा था। अतः वह अधर्मप्राय हो गया था। उसका विध्वंस ही उस परिस्थिति में धर्म था। भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम एवं परम निष्काम थे। अनन्त ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी उनकी पत्नी थी। माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता और राधा श्रीराम और श्रीकृष्ण रूप में उनकी पत्नी थीं। काम, वसन्त तथा अप्सराएँ उनके मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सके थे। लोग क्रोधवृत्ति से काम को नष्ट कर सकते हैं। परन्तु क्रोध का उपशमन करना उनके लिए कठिन ही है। वह क्रोध जिनके मन में प्रवेश नहीं कर सकता, जिनसे डरता है; उनके मन में काम कहाँ से कैसे आ सकता है ? भगवान् ने काम से और अप्सराओं से वर माँगने के लिए कहा और अपने ऊरु से उर्वशी जैसी दिव्य अप्सरा को प्रकट कर के इन्द्रलोक के लिए भूषण के रूप में प्रदान किया था। उसका सौन्दर्य, माधुर्य एवं कान्ति निहारकर देवता और अप्सराएँ दोनों हतप्रभ हो गये थे, अतः वे विषयभोग की दृष्टि से जालन्धर की पत्नी के पातिव्रत्य-भङ्ग के लिए प्रयत्न क्यों करते ? उन्होंने अकीर्ति या शाप आदि की चिन्ता न करके लोककल्याण ही किया- "छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।" ( रा० मा० १।१२३ ) माता, पिता, गुरु और पति की महिमा शास्त्रों में बहुत वर्णित है। परन्तु वे ही सब यदि श्रीराम-प्राप्ति में बाधक हों तो उन सबका त्याग ही प्रशस्त है- "जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये तिनहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही ।
७७८ रामायणमीमांसा एकविंश पितहि तजे प्रह्लाद विभीषण बन्धु भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कान्त ब्रज वनितन भे जगमङ्गलकारी ॥” सीताहरण के कारण लंका जलायी गयी। बड़े-बड़े प्रबल राक्षसों का संहार हो गया। कुम्भकर्ण को जगाया गया। उससे सीताहरण आदि की चर्चा की गयी। उसने पहले रावण की इस अनीति के कारण भर्त्सना की। पश्चात् उसने कहा—'जब आप उस पतिव्रता धरित्री-सुता को लाये और वह पतिव्रता होने के कारण वशवर्तिनी नहीं होती थी तो माया द्वारा स्वयं राम का स्वरूप क्यों नहीं धारण कर लिया ?' रावण ने कहा मैंने वह भी कर के देख लिया। जिस समय मैंने दूर्वादलश्याम 'राम का रूप धारण किया तो मुझे ब्रह्मपद भी तुच्छ प्रतीत होने लगा फिर परस्त्रीसङ्ग की वासना का तो प्रसङ्ग ही कैसे उठ सकता था ? “आनीता भवता यदा पतिरता साध्वी धरित्रीसुता स्फूर्जद्राक्षसमायया न च कथं रामाङ्गमङ्गीकृतम् । कर्तुंञ्चेतसि रामरूपममलं दूर्वादलश्यामलं तुच्छं ब्रह्मपदं परवधूसङ्गप्रसङ्गः कुतः ॥” फिर स्वयं उन भगवान् में कामवासना से परस्त्री के पातिव्रत्य-भङ्ग में प्रवृत्ति कैसे हो सकती थी ? जालन्धर दैत्य अपनी पतिव्रता पत्नी के बल के कारण अवध्य था। वह अनेक पतिव्रताओं का पातिव्रत्य- भङ्ग करता था। रुद्रपत्नी रुद्राणी का भी वह हरण करना चाहता था। परन्तु उसका वध वृन्दा के पातिव्रत्य रहते सम्भव ही नहीं था। यहाँ धर्म ही अधर्म की रक्षा कर रहा था और अधर्म का अभेद्य दुर्ग बन रहा था। अतः जैसे शत्रु-वध के लिए उसके अभेद्य दुर्ग या अभेद्य कवच का विध्वंस आवश्यक होता है वैसे ही जालन्धर-वध के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करना आवश्यक था। वही काम भगवान् ने किया। पर वह सब किया जगन्मंगल के लिए, धर्म-रक्षा के लिए एवं लाखों पतिव्रताओं के पातिव्रत की रक्षा के लिए; काम से या स्वार्थ से नहीं । यह काम दूसरा नहीं कर सकता था, क्योंकि अन्य को वैसा करने का अधिकार नहीं था। हत्या के अपराधी को फाँसी देने का अधिकार राजा या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को ही होता है, अन्य को नहीं। अन्य व्यक्ति वैसा करेगा, तो उसको स्वयं भी फाँसी पर लटकना पड़ेगा। राजा के दण्ड से अपराधी पापों से मुक्त हो जाता है, परन्तु औरों के द्वारा वध से अपराधी अपराध से मुक्त भी न होगा और फाँसी देनेवाला भी स्वयं फाँसी पायेगा। दूसरा कोई वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग करता तो वह भी नरक का भागी होता और वृन्दा का पातिव्रत- पालन निष्फल हो जाता, क्योंकि ईश्वर ब्रह्म भगवान् को छोड़कर सब जीव हैं। निषेधातिक्रमण से वे सभी पाप के भागी होते हैं। ईश्वर विधि-निषेधातीत होता है और वही कर्मफलदाता होता है। भगवान् ने यद्यपि संसार के हित के लिए अगणित पतिव्रताओं की रक्षा के लिए वृन्दा का पातिव्रत-भंग किया तथापि वृन्दा के पातिव्रत का फल वृन्दा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वही कर्मफल दाता हैं। वस्तुतः पातिव्रतधर्म के द्वारा भी परमेश्वर की प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है। जैसे शालग्राम की पूजा से विष्णु-प्राप्ति का ही प्रयत्न किया जाता है एवं जैसे शालग्राम की विष्णुबुद्धि से ही पूजा की जाती है वैसे ही परमपति परमेश्वर की प्राप्ति के लिए नारी अपने पति की उपासना करती है। कन्यादान के अवसर पर संकल्प भी वैसा ही होता है—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७७९ “इमां लक्ष्मीरूपां कन्यां विष्णुरूपाय वराय तुभ्यमहं संप्रददे” इस लक्ष्मीरूपा कन्या को मैं विष्णुरूपी वर के लिए प्रदान करता हूँ। भगवान् ने वृन्दा का पातिव्रत-भङ्ग कर के पातिव्रत का परमफल उसे प्रदान कर दिया अर्थात् उसे परम पति परमेश्वर भगवान् विष्णु की प्राप्ति हो गयी। बड़े बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र जिसकी प्राप्ति के लिए जप, तप, योग, समाधि का अभ्यास करते हैं वही भगवान् वृन्दा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हुए। छल-छद्म से भी वे उसे प्राप्त करते हैं। भक्तों के लिए भगवान् प्रेम के विषय होते हैं। परन्तु यहाँ तो वृन्दा प्रेम का विषय थी, प्रेम की आस्पद थी। भगवान् तो प्रेम के आश्रय हुए। रहस्य विदित होने पर वृन्दा भगवान् को शाप देती है कि “तुम पाषाण हो जाओ” भगवान् उसके शाप को स्वीकार कर शालग्राम बन जाते हैं। फिर भी वृन्दा को तुलसी के रूप में साथ ही रखते हैं। हजारों पकवानों के होने पर भी तुलसी-दल के बिना स्वीकार नहीं करते हैं। वन्दा अपने पति जालन्धर के साथ चिता में जल जाती है, भगवान् की उपेक्षा कर के। फिर भी प्रभु उसके विप्रलम्भजन्य तीव्र ताप में विह्वल होकर उसके चिताभस्म में विलुष्ठित होते रहे। यह एकाङ्गी प्रेम अद्भुत है। भगवान् में भक्त का नहीं किन्तु भक्त में भगवान् का एकाङ्गी प्रेम, यह भक्त परवशता का उदाहरण है। वस्तुतः वृन्दा भगवान् की ही सदा सर्वदा दिव्य शक्ति लक्ष्मी के समान ही थी। किसी शापादि वश वह जालन्धर की पत्नी बनी थी। उसी स्वाभाविकी प्राचीन भक्तिवशात् भगवान् हठात् छल-छद्म से उसे प्राप्त करते हैं। उसके अधीन सदा के लिए बन जाते हैं। इससे अधिक पातिव्रत का फल क्या होगा ? वास्तव में भगवान् आनन्द- समुद्र हैं। जीव उनकी तरङ्ग चेतन अमर सहज सुखराशि हैं। तरङ्ग का जल के साथ स्थिर सम्बन्ध है। एक तरङ्ग का दूसरी तरङ्ग के साथ स्थिर सम्बन्ध नहीं है। पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि के सम्बन्ध बनते बिगड़ते रहते हैं। अतः लौकिक पति-पत्नी का सम्बन्ध अस्थिर है, वही व्यभिचार है। भगवान् का सम्बन्ध ही स्थिर होने से अव्यभिचरित सम्बन्ध है। जीवात्मा भगवान् से विमुख होकर इतर जीवों पति, पुत्रादि में आसक्त रहता है, तो वही व्यभिचार है। सबसे विमुख होकर भगवान् में अभिमुख होना ही उसका शुद्ध पातिव्रत है। यही गोपाङ्गना-भाव है। पति की काया की छाया बनना ही पातिव्रत है। तरङ्ग की स्थिति, गति और प्रवृत्ति जल की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति, गति तथा प्रवृत्ति बिम्ब की स्थिति, गति और प्रवृत्ति के पराधीन होती है। घटाकाश महाकाश के पराधीन होता है। जीवात्मा इसी प्रकार भगवान् की काया की छाया बनकर भगवान् को प्राप्त कर लेता है। कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण कुछ लोग कुब्जा के प्रसङ्ग को लेकर श्रीकृष्ण के चरित्र पर आक्षेप करते हैं, परन्तु जिस ग्रन्थ में श्रीकृष्ण का कुब्जा के साथ अङ्गसङ्ग वर्णित है उसी में श्रीकृष्ण को परात्पर ब्रह्म कहा गया है और यह भी कहा गया है कि प्राणीमात्र के कल्याणार्थ निर्गुण निराकार भगवान् का श्रीकृष्णरूप में प्राकट्य हुआ है। अतः उनमें काम, क्रोध, भय और स्नेह से अथवा किसी तरह भी मन लगाने से प्राणी का कल्याण हो सकता है—
७८० रामायणमीमांसा एकविंश “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” काम से और भय से जैसे प्राणी तन्मयता को प्राप्त होता है वैसे अन्य उपायों से नहीं । “यथा कामाद् भयाद् वापि मर्यस्तन्मयतामियात् । न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥” वही वस्तु लोकसम्बन्ध में निन्य होने पर भी भगवत्सम्बन्ध से प्रशंसनीय हो जाती है। संसार की तृष्णा निन्द्य है, परन्तु भगवान् के पाने की तृष्णा प्रशंसनीय होती है। संसार की इच्छाएँ त्याज्य होती हैं, भगवत्तत्त्वज्ञान की इच्छा जिज्ञासा यज्ञ, तप, दान आदि से साध्य होती है— “तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन ।” (बृ०उ० ४।४।२२) जैसे चिन्तामणि की ओर दीपकबुद्धि से भी प्रवृत्ति होने से चिन्तामणि की ही प्राप्ति होती है, दीपक की नहीं। उसी तरह श्रीकृष्ण परमात्मा में जार (उपपति) बुद्धि से भी प्रवृत्ति होने पर परमेश्वर की ही प्राप्ति होती है, जार की नहीं। लौकिक जार धर्म, पुण्य और परलोक को जलाता है। किन्तु श्रीकृष्ण अविद्या-ग्रन्थि, कर्म-जाल तथा पञ्चकोशों को जलाते हैं। इसी लिए वे भी जार हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान् आनन्दसमुद्रतुल्य हैं। जीव सब उनके तरङ्गतुल्य हैं। यही शङ्कराचार्य भी मानते हैं— “सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” ( षट्पदी ) “बारि बीचि जिमि गावहिं बेदा ।” ( रा० मा० ७।११०।३ ) एक तरङ्ग का तरङ्गान्तरों के साथ सम्बन्ध अस्थिर तथा व्यभिचरित होता है। किन्तु तरङ्गों का समुद्र के साथ सम्बन्ध स्थिर नित्य होता है। वैसे ही पति, पुत्र और पत्नी रूप से जीवों का सम्बन्ध अस्थिर एवं अनित्य ही होता है। किन्तु उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध ही स्थिर हैं। इस तरह कुब्जा एवं गोपाङ्गनाएँ तथा उनके पति सभी जीव हैं। उनका पारस्परिक सम्बन्ध अस्थिर है। भगवान् का सम्बन्ध ही समुद्र-तरङ्ग के तुल्य नित्य है। अतः कुब्जा आदि का लौकिक पति आदि जीवों का सम्बन्ध ही व्यभिचार है, भगवत्सम्बन्ध ही शुद्ध पातिव्रत है। पति-पत्नी का सम्बन्ध भी वारिवीचि से उपमित है— “गिरा अर्थ जल बीचि जिमि कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दहुँ सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न ॥” ( रा० मा० १।१८ ) नन्ददासजी के अनुसार गोपाङ्गनाओं के अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम रोम में श्रीकृष्ण इस तरह भरपूर हैं जैसे तरङ्गों में जल भरपूर होता है— “तरङ्गनि वारि ज्यों ।” सम्भोग भी भोक्ता का भोग्य के साथ तादात्म्यापत्ति ही है। “सविता गोभी रसं भुङ्क्ते” सविता अपनी किरणों से भूमि के रस का सम्भोग करते हैं। दिव्यदम्पती पति-पत्नी भी प्रेमोद्रेक में व्यवधानशून्य होकर मिलते हैं। हार, भूषण, कञ्चुकी आदि का व्यवधान असह्य होता है। प्रेमोद्रेकजनित रोमाञ्च-व्यवधान भी बाधक प्रतीत होता है। सर्वाधिक व्यवधानराहित्य तरङ्ग और जल में ही है।
किसी दृष्टि से तो चन्द्र-चन्द्रिका तथा भानु-प्रभा जैसा अव्यवधान अभीष्ट होता है। जैसे गङ्गाजल से भी अन्तरङ्ग उसकी शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता का सम्बन्ध होता है। आनन्दसिन्धु की तरङ्ग की अपेक्षा भी उसकी मधुरिमा का सम्बन्ध अन्तरङ्ग होता है। उसी तरह आनन्दसुधासिन्धु कृष्ण में तरंगस्थानीया गोपाङ्गनाएँ हैं किन्तु उनके माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री श्रीराधा हैं। उनका सम्बन्ध अत्यधिक अन्तरंग है। इस अत्यन्त अभेद में रमण और सम्भोग शब्द का प्रयोग होता है। भारतीय शास्त्रों में इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग मिलते हैं जो कि अश्लील-से प्रतीत होते हैं। गीता में कहा गया है— “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । ( गीता १४।३ ) महद् ब्रह्म प्रकृति मेरी योनि है। इसमें मैं गर्भाधान करता हूँ। यहाँ प्रकृति में ब्रह्मरूपी बिम्ब का प्रतिबिम्ब डालना ही गर्भाधान है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि जैसे कोई प्रियतमा भार्या का आलिंगन करके आनन्दोद्रेक में आन्तर और बाह्य सभी प्रपञ्चों को भूल जाता है वैसे ही जीवात्मा सुषुप्तिकाल में परमात्मा से मिलकर आनन्दोद्रेक में सब कुछ भूल जाता है— “तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तर- मेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम् ।।” (बृ०उ० ४।३।२१) “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते । (छा० उ० ६।८।१) कबीरदास तक सातवें आसमान में अपने निर्गुण पिया की सेज की कल्पना कर वहाँ पहुँचने की तैयारी करते हैं। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के सम्मिलन में नायिका तथा नायक के सम्मिलन और रमण का आरोप किया जाता है। इसमें भी स्वसुखसुखित्व की भावना के कारण कुब्जा की साधारणी रति मणि तुल्य दुर्लभ होती है। रुक्मिणी प्रभृति की समञ्जसा रति में तत्सुखसुखित्व एवं स्वसुखसुखित्व का समन्वय होने से वह चिन्ता- मणि के तुल्य अतिदुर्लभ है। गोपाङ्गनाओं की रति शुद्ध तत्सुखसुखित्व की होने से वह समर्था रति कौस्तुभमणि के तुल्य अनन्यलभ्य है। संसार से विमुख होकर भगवत्सम्मिलन-सुख प्राप्त करना योगीन्द्र-मुनीन्द्रों का लक्ष्य होता है। परन्तु वहाँ भी “निःसंगः प्रज्ञया भवेत्” के अनुसार सुखास्वादन की आसक्ति का त्याग विवक्षित होता है। इसे पर वैराग्य कहा जा सकता है। दृष्ट एवं आनुश्रविक विविध विषयों से वितृष्णता अपर वैराग्य है। परन्तु गुणों से भी शान्ति, सत्त्वपुरुषान्यताख्याति आदि दिव्य सात्त्विक भावों से भी निःस्पृहता होनी ‘पर वैराग्य’ है। ब्रह्मरसास्वादन में भी स्वसुख के लिए नहीं, किन्तु कृष्णसुख के लिए ही सर्वचेष्टा तत्सुखसुखित्व है। इसी प्रकार अन्यपरा श्रुतियाँ परकीया मानी जाती हैं। ब्रह्मपरा स्वकीया मानी जाती है। “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” (क० उ० २।१५ ) के अनुसार सभी वेद-मन्त्रों का महातात्पर्य ब्रह्म में ही है, फिर भी इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि के भी सूक्त हैं। वे इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं का भी प्रतिपादन करते हैं। परन्तु इसका अभिप्राय यही है कि उन उन मन्त्रों और सूक्तों का अवान्तर तात्पर्य उन उन देवताओं में होने पर भी उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्म में ही है। वस्तुतः जैसे किसी पादुका, पाषाण या प्रासाद कहीं पर भी पादविन्यास भूमण्डल पर ही पादविन्यास हैं, क्योंकि वे सभी भूमण्डल के ही विकार हैं। उसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि किसी का भी प्रतिपादन ब्रह्म का ही
७८२ रामायणमीमांसा एकविंश प्रतिपादन है, क्योंकि वे सभी ब्रह्म के ही विकार हैं। परन्तु 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० उ० २।१), 'विज्ञानं ब्रह्म' (तै० उ० ३।५), 'आनन्दो ब्रह्म' (तै० उ० ३।६) इत्यादि श्रुतियाँ अन्यसम्बन्ध के बिना शुद्धरूप से ब्रह्मसम्बद्ध ही हैं। प्रथम कोटि की श्रुतियाँ अन्यपूर्विका हैं, द्वितीय कोटि की अनन्यपूर्विका हैं। अन्यपूर्विका श्रुतियाँ कृष्ण की परकीया हैं तथा अनन्यपूर्विका स्वकीया हैं। उनके पति उनके प्रतिपाद्य इन्द्र, वरुण आदि भिन्न भिन्न देव हैं। रघुवंश महाकाव्य में शिव एवं पार्वती को वाक् और अर्थ के समान परस्पर संपृक्त माना है— “वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” (रघुवं० १।१) इस प्रकार के सम्बन्ध को ही 'गिरा अर्थ जल वीचि सम' इस पद्य में तुलसीदासजी ने भी व्यक्त किया है। ऐसे अभेद, तादात्म्य आदि सम्बन्धों को ही रमण और सम्भोग आदि संज्ञा दे दी जाती है। विद्वानों की दृष्टि में 'स्वातन्त्र्यं पुंस्त्वम्' और 'पारतन्त्र्यं स्त्रीत्वम्' का सिद्धान्त है। सभी जीवों में परतन्त्रतारूप स्त्रीत्व स्वाभाविक है। स्वातन्त्र्य तो केवल एक परमेश्वर में ही है। इस दृष्टि से सभी जीव परतन्त्र होने से स्त्री ही हैं। स्वतन्त्र होने से पुरुष तो एकमात्र श्रीकृष्ण भगवान् ही हैं। इसी लिए गोपाङ्गना-भाव की प्राप्ति ही जीव के कल्याण का मार्ग है। जैसे पतिव्रता पति की काया की छाया बन जाती है। पति के मन में मन, हृदय में हृदय एवं आत्मा में आत्मा मिलाकर तदधीन स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाली हो जाती है। इसी तरह जीव भी यदि भगवान् की स्थिति, गति और प्रवृत्ति वाला हो तो उसकी स्थिति ही गोपाङ्गना-भाव है। इसी दृष्टि का चित्रण करते समय स्त्री-पुरुष के रमण का रूपक दे दिया जाता है। इसी दृष्टि से कुब्जा और कृष्ण की कथा है। केवल बाहुपाश और स्तन के भीतर ही नहीं, किन्तु अपने अन्तःकरण, अन्तरात्मा और रोम-रोम में श्रीकृष्ण को स्थापित करना ही जीव का भगवान् के साथ रमण है। हरिश्चन्द्र हरिश्चन्द्र के सम्बन्ध में भी लेखक का दोषारोपण निरर्थक ही है। हरिश्चन्द्र ने वरुण से कहा था कि यदि आपकी कृपा से मेरे पुत्र हो तो उसके द्वारा मैं आपका यजन करूँगा। रोहिताश्व पुत्र उत्पन्न हुआ। वरुण ने कहा "पुत्र हो गया अब उससे यजन करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा "अभी तो नामकरण नहीं हुआ, नामकरण के बाद यजन करेंगे।" नामकरण के बाद फिर वरुण आये। तब कहा कि अभी दन्तहीन है। दन्त होने के अनन्तर यजन करेंगे इत्यादि। युवक होते ही रोहिताश्व आखेट के प्रसङ्ग से अरण्य चला गया। वहाँ से कई बार नगर आने को प्रस्तुत हुआ, परन्तु इन्द्र उसे विचरण का ही उपदेश करके रोकते रहे। अन्त में रोहिताश्व के पिता हरिश्चन्द्र जलोदर रोग से ग्रस्त हो गये। वरुण के प्रति की गयी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने के लिए शुनःशेप को खरीद कर वरुण का यजन किया। विश्वामित्र के उपदेश से शुनःशेप भी विभिन्न सूक्तों से वरुणादि की स्तुति कर मुक्त हो गया। इस ढंग की कथा ऐतरेयब्राह्मण आदि ब्राह्मणग्रन्थों में है। परन्तु अनादि जीव के अनादि जीवन में कौन-कौन घटनाएँ होती हैं। इसका ठिकाना नहीं। कभी का डाकू वाल्मीकि कालान्तर में महर्षि वाल्मीकि हो सकता है, हरिश्चन्द्र की पूर्वोक्त घटनाएँ तो कोई बहुत अनुचित नहीं हैं। अपने शिशु के बचाने की दृष्टि से कालातिक्रमण का प्रयत्न अनुचित
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८३ नहीं कहा जा सकता है। फिर 'अन्ते या मतिः सा गतिः', 'अन्त भला सो भला' के अनुसार हरिश्चन्द्र की अन्तिम स्थिति की सत्यनिष्ठा सर्वोत्कृष्ट रही। उन्होंने सत्यरक्षा के लिए राज्य त्याग दिया। पत्नी और पुत्र का विक्रय कर अपना भी विक्रय किया और डोम के गुलाम बनकर सत्यनिष्ठा से उसकी नौकरी बजायी। मृत पुत्र के दहनादि के लिए अपेक्षित टैक्स वसूल करते समय पत्नी और पुत्र को पहचान लेने पर भी वे कर्तव्य पालन से नहीं हटे। अनादि काल में एक बार की ब्रह्मात्मनिष्ठा निर्णयरूप में आदरणीय होती है वैसे ही अन्तिम धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा प्राणी के जीवन को अलौकिक कर देती है। विश्वामित्र इसी प्रकार श्रीविश्वामित्र के सम्बन्ध में लेखक ने बहुत सी अनर्गल कल्पनाएँ की हैं। यहाँ भी भले उनके प्राक्कालिक जीवन में अनेक उग्रताएँ भी रही हों। परन्तु अन्तिम स्थिति में वे महातपा ब्रह्मविद्वरिष्ठ हो गये। महा- सिद्ध महर्षि वसिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि कहा और वे महाभाष्य के अनुसार स्वयं ही नहीं, किन्तु अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के सहित ब्रह्मर्षि हो गये। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ने उनके शिष्य होकर पाद-संवाहनादि सेवाएँ कीं। वसिष्ठ श्रीवसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक ने और भी अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ की हैं। परन्तु वसिष्ठ साक्षात् ब्रह्मा के पुत्र थे। निमि के शाप से देहपरित्याग कर मैत्रावरुण के तेज से महर्षि अगस्त्य के समान वे वसतीवरी यज्ञपात्र से उत्पन्न होकर कुम्भज भी कहलाये। किसी दिव्य अप्सरा के दर्शनप्रसङ्गज से ही मित्र एवं वरुण के तेज का प्राकट्य हुआ था। इतने मात्र से उन्हें वेश्यापुत्र कहना सर्वथा उपेक्षणीय है। सामान्यतया मनुष्यत्व, पशुत्व आदि जातियों में देह के रहते परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी लिए पशु, पक्षी आदि जातियाँ जैसे उसी देह में बदलती नहीं उसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियाँ देह के रहते बदलती नहीं हैं। परन्तु जैसे विशेष तप या वर या शाप से राजा नहुष अजगर हो गया, नन्दी देवता हो गये, उसी प्रकार तपस्या विशेष से क्षत्रिय आदि ब्राह्मण हो सकते हैं। प्रकृति में सब शक्तियाँ विद्यमान होती हैं। सिद्धों के सङ्कल्पविशेष से प्रकृति का आवरण भेद होकर प्रकृत्यापूर से जात्यन्तर परिणाम हो सकता है। पूर्वजात्यारम्भक परमाणुओं का विघटन होकर अभीष्ट जात्यारम्भक परमाणुओं के सङ्घटन द्वारा अभीष्ट जात्यन्तर का निर्माण हो जाता है। विश्वामित्र स्वयं तो महर्षि ऋचीक के संकल्पित चरु एवं विधानों के द्वारा ब्राह्मतेज से पूर्ण थे ही। उन्हें तपस्या द्वारा केवल क्षेत्रान्तरजनित जात्यन्तरांश की निवृत्ति ही करनी पड़ी थी। परन्तु उनके पिता, पितामह, प्रपितामह आदि तो शुद्ध क्षत्रिय थे। तथापि विश्वामित्र के संकल्प विशेष से उनमें प्रकृत्यापूर द्वारा ब्रह्मर्षित्व सम्पन्न हुआ था। महर्षि वसिष्ठ तो ब्रह्मर्षि-पुत्र ही थे। देहान्तर से वे शुद्ध मैत्रावरुण थे। अतः उनके सम्बन्ध किसी भी आक्षेप को अवकाश नहीं है। वे उच्चकोटि के महातपा, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, ब्राह्मतेज से सम्पन्न, परमसिद्ध थे। सूर्यवंश एवं सूर्यवंशावतंस श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के गुरु थे। जिनकी महिमा सर्वविदित है। दाक्षायणी इसी तरह सती दाक्षायणी के सम्बन्ध में बहुत कुछ अनर्गल प्रलाप है। वस्तुतः—
७८४ रामायणमीमांसा एकविंश “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥” (रा० मा० १। मङ्गलाचरण २) के अनुसार भवानी और शङ्कर श्रद्धा और विश्वास रूप हैं । श्रद्धा और विश्वास के बिना सिद्ध लोग भी स्वान्तस्थ परमेश्वर को भी नहीं पहचानते । भवानी और शङ्कर दोनों अभिन्नरूप हैं । ‘‘वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥” ( रघुवं० १।१ ) वाक् एवं अर्थ के समान दोनों सदा संपृक्त रहनेवाले हैं । जगत् के माता-पिता पार्वती और परमेश्वर की वाग् एवं अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए हम वन्दना करते हैं । जैसे शालग्राम की विष्णु-बुद्धि से पूजा की जाती है वैसे ही वाग् एवं अर्थ में पार्वती तथा परमेश्वर बुद्धि की जाती है । उसी तरह श्रद्धा और विश्वास को भवानी एवं शङ्कररूप कहा है । यद्यपि श्रद्धा एवं विश्वास दोनों अन्तःकरण के वृत्तिरूप हैं । वस्तुतस्तु शिव और विष्णु दोनों एक ही हैं । यह सब लीला शिव की महिमा के प्रख्यापनार्थ ही है । ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार विष्णु के दसों अवतार भगवती के दस नखों से ही प्रकट होते हैं—‘‘कराङ्गु- लिनखोत्पन्ना नारायणदशाकृतिः ।’’ जैसे विष्णु शिव की उपासना करके उनकी शरणागति ग्रहण कर उनके सम्बन्ध में मोह, अज्ञान और संशय प्रकट कर उनका माहात्म्य ख्यापन करते हैं वैसे ही भवानी और शङ्कर दोनों ही राम की महिमा का प्रख्यापन करने के लिए उनकी उपासना करते हैं । वस्तुतः सती ही पार्वती हैं । वे अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी परब्रह्मस्वरूपिणी हैं । उनमें अज्ञान, संशय, मोह और भ्रम की कल्पना नहीं की जा सकती है । जैसे राम ने कहा— “आत्मानं मानुषं मन्ये जातं दशरथात्मजम् ।” ( वा० रा० ६।११९।११ ) मैं अपने को मनुष्य मानता हूँ । यह सब जैसे लीलामात्र है वैसे ही सती का मोह भी । दाक्षायणी इतनी शिवभक्त थी कि वे शिव का अपमान नहीं सह सकीं । बल्कि उन्होंने अपने शरीर को इसी लिए त्याग दिया कि वह शिवद्रोही दक्ष के शुक्र से सम्भूत था । वस्तुतः सती एवं पार्वती दोनों ही एक तत्त्व हैं । सती में न कुतर्क था और न संशय ही था । उन्होंने तो श्रीराम का लोकोत्तर माहात्म्य प्रकट करने के लिए मोह का रूपक उपस्थित किया था । श्रीराम ने जैसे अज्ञान और मोह का रूपक उपस्थित कर के अगस्त्यजी से शिव का माहात्म्य और भक्ति सीखी वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गमय भगवान् शिव का ओर-छोर जानने के लिए हजारों वर्ष तक भटकते रहे, अन्त नहीं पा सके । यह सब लीलामात्र है । संशय आदि सब श्रीरामकथा की भूमिका मात्र हैं । तभी तो सीताजी भगवती की स्तुति करती हुईं उन्हें परब्रह्मरूपिणी ही कहती हैं— “जय जय गिरिवरराजकिसोरी । जय महेशमुखचन्द चकोरी ॥ जय गजबदन षडानन माता । जगतजननि दामिनिदुति गाता ॥ भव भव विभव पराभव कारिनि । विश्वविमोहिनि स्वबशबिहारिनि ॥ नहि तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाव बेद नहिं जाना ॥” (रा०मा० १।२३४।३,४) श्रुति और सूत्रों के अनुसार विश्वप्रपञ्च का उत्पादक, पालक और संहारक ही ब्रह्म होता है । वही आदि, मध्य और अवसान से रहित होता है ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८५ मानस में कहा गया है कि श्रीदशरथ और जनक के समान किसी ने शिव की आराधना नहीं की थी । इनके समान किसी ने फल नहीं साधा अर्थात् शिव की आराधना के प्रभाव से ही इनको सीता और राम की प्राप्ति हुई है— "इन सम काहू न शिव आराधे । काहु न इन समान फल साधे ॥" (रा०मा० १।३०७।१) भुशुण्डिरामायण के अनुसार भी श्रीसीता-राम की सभी लीलाओं में पार्वती-परमेश्वर का ही हाथ रहता है । श्रीसहजानन्दिनी की जन्मजात जड़ता, मूकता, भावमूर्च्छा आदि के निवारण के लिए श्रीराम की प्रेरणा से शिवजी ही जाकर एकान्त में दिव्य स्तुतियों द्वारा उन्हें प्रबुद्ध एवं सचेष्ट करने का प्रयत्न करते हैं । विवाहोत्तर पुनरपि जाड्यावस्थापन्न श्रीमहजानन्दिनी की स्वस्थता के लिए बटुवेषधारी श्रीराम कामेश्वर शिव की उपासना में उन्हें प्रवृत्त करते हैं और स्वयं आचार्य होकर उनसे श्रीशिव की आराधना सम्पन्न कराते हैं । गोपकन्याओं का अभीष्ट सिद्ध करने के लिए श्रीराम ने शिवजी का मामपर्यन्त व्रत करके उन्हें प्रसन्न कर मार्गदर्शन प्राप्त किया । कहा जाता है कि "मानस के आचार्य अपने सिद्धान्त के समर्थन में वैदिक परम्परा का ही उल्लेख करते हैं । मानस के परमाराध्य भगवान् राम भी अपने वाक्य की पुष्टि के लिए वेद की दुहाई देते हैं । किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे वेद, पुराणों की परम्परा की स्वीकृति से उत्पन्न समस्याओं से परिचित न रहे हों । वेद, पुराणों के लिए समुद्र की उपमा देकर जहाँ वे उनकी अगाधता और गम्भीरता की ओर इंगित करते हैं । वहीं साधा- रण व्यक्ति के लिए उनकी अगम्यता का भी परिचय देते हैं । मेघ यद्यपि समुद्र से ही जल ग्रहण करता है । किन्तु उस जल के परिष्कृत होने पर यह विश्वास करना भी कठिन हो जाता है कि यह जल खारेपन से भरे समुद्र का ही है । कई बार आलोचकों ने गोस्वामीजी पर यह आरोप लगाया कि वे जो कुछ वेद के नाम पर कहते हैं । वह वेदों में उपलब्ध नहीं है । ऐसे आरोपों के सन्दर्भ में— "वेद पुराण उदधि घन साधू ।” ( रा० मा० १।३५।२ ) इस पङ्क्ति का स्मरण आता है । विचारा आलोचक उसी व्यक्ति की भाँति है जो समुद्र में स्नान कर चुका है । उसके जल का स्वाद चख चुका है । किन्तु जब उससे कहा गया कि मेघ की वर्षा से प्राप्त जल भी समुद्र का ही है । तब उसके लिए इसपर विश्वास करना असम्भव हो गया, क्योंकि आकृति, प्रकृति और स्वाद किसी भी दृष्टि से उसे समुद्र के जल और मेघ के जल में सादृश्य की अनुभूति नहीं होती । परम्परा का तात्पर्य किसी सिद्धान्त को यदि शब्दशः स्वीकार करना हो तो इस प्रकार की परम्परावादिता गोस्वामीजी में नहीं है । इसे निःसंकोच मानूंगा । परम्परा के प्रति ऐसा आग्रह जड़ता ही है । परम्परावादियों के इस दुराग्रह से तुलसीदास परिचित थे । "श्रुति पुरान बहु कहहिं उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥" ( रा०मा० ७।११६।३ ) इस पङ्क्ति से उनकी इसी दृष्टि का परिचय मिलता है । वेद और पुराणों ने मनुष्य को बन्धनमुक्त करने के लिए अनेक उपाय बताये हैं । किन्तु व्यक्ति उनसे छूटने के स्थान पर अधिकाधिक उलझता ही गया । यह एक ऐसा यथार्थ सत्य है जिसका अनुभव समाज में पद पद पर होता है । जहाँ परम्परा के नाम पर स्थिरता होगी वहाँ जड़ता और अस्वस्थता को छोड़कर और आ ही क्या सकता है ? गोस्वामीजी की परम्परावादिता उस नदी की भाँति है जो अपने मूल स्रोत से कभी भी विच्छिन्न नहीं होतो, फिर भी उसमें प्रतिक्षण नूतन जल प्रवाहित होता है । अगणित वर्षों से प्रवाहित होनेवाली गंगा में स्नान करते
७८६ रामायणमीमांसा एकविंश हुए व्यक्तियों को यह अनुभव होता है कि वे उसी जल में स्नान कर रहे हैं जिसमें उनके हजारों पुरुषों ने स्नान किया था। अपने आप में यह सत्य होते हुए भी शब्दशः यथार्थ नहीं है। एक सरोवर का जल कई वर्षों तक यह तो दावा कर सकता है कि वह सच्चा परम्परावादी है, क्योंकि उसका जल स्थिर है। किन्तु यही स्थिरता उसमें सड़न उत्पन्न कर देती है। जिसे देखकर न उसमें स्नान करने का मन होगा और न पीने का ही। इन दोनों नियमों का पालन करनेवाले सरोवर के समान घोर परम्परावादी व्यक्ति ही हो सकते हैं। दूसरी ओर स्थिरता का एक प्रतीक समुद्र भी है। अगणित युगों से समुद्र स्थिर है। उसमें अगाध जल विद्यमान है। अतः उसमें मलिनता का वैसा भय नहीं है जैसा कि सरोवर में। किन्तु उसका जल पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया का पण्डित तो मेघ ही है। गोस्वामीजी सन्तों की तुलना मेघ से करते हैं। तब उनका तात्पर्य यही है कि भले ही वेद, पुराण परम प्रमाण हैं। पर जनसमाज को सन्त के माध्यम से ही उनके सच्चे अर्थ का ज्ञान प्राप्त होता है।” कहना न होगा कि उक्त कथन सुधारवाद के भूत से ही प्रेरित है। यही तो आधुनिक सुधारक भी कहते हैं कि हम जो कुछ भी कह रहे हैं वह वेदादि शास्त्रों का ही तात्पर्य है। कबीर आदि सन्त तो और आगे बढ़ कर कहते हैं कि हम वेद से भी आगे की बात कहते हैं। कोई भी व्यक्ति सन्त का बाना धारण कर के वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कह सकता है। यदि उससे उसका आधारभूत वैदिक प्रमाण पूछा जाय तो वही आपका उत्तर सुना देगा। यह तो वेदों का सार है शब्दशः वेद नहीं है। जैन और बौद्ध भी यही कह सकते हैं कि वेदों का सार और वेदों से भी उच्च सिद्धान्त ही हमारा सिद्धान्त है। अर्थात् यदि शब्दों को देखने की बात न हो तो वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कही जा सकती है। जैसे समुद्र के जल की आकृति, प्रकृति और स्वाद से मेघ का जल विसदृश होने पर भी मेघ-जल समुद्र का ही है। उसी तरह हमारी बात भी वेद की आकृति, प्रकृति और स्वाद से विसदृश होने पर भी वेदसम्मत ही है। क्या यह उत्तर ठीक होगा ? क्या किसी तत्त्व का निर्णय हो सकेगा ? परस्परविरोधी वादी और प्रतिवादी वेद प्रमाण पूछनेवाले को समुद्रजल के स्वाद से परिचित व्यक्ति का ही उदाहरण देकर समाधान कर देगा ? किन्तु स्थिति इसके विपरीत हैं। द्वैतवादी, अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी, शुद्धाद्वैतवादी तथा द्वैताद्वैतवादी अपनी अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिए वेद प्रमाण उपस्थित करते हैं। उसपर विचार किया जाता है कि क्या इस वैदिक वाक्य के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण और उपक्रम, उपसंहार आदि के आधार पर विवक्षित अर्थ सिद्ध होता है या नहीं ? तात्पर्य का निर्धारण भी मनमानी से नहीं होता । उपक्रम एवं उपसंहार के शब्दार्थों की एकरूपता, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन षड्विध लिङ्गों के आधार पर ही तात्पर्य का निर्धारण होता है, मनमाने ढंग से नहीं । आधुनिक लोग भी कहते हैं कि वेद की बुद्धिसंगत बातों को हम मानते हैं पर शब्दशः मानने को तैयार नहीं। क्या तुलसीदास भी ऐसे ही सुधारक थे ? किन्तु वे तो वेद को तर्क से दूषित करनेवाले को कोटि-कोटि कल्पभर नरक में पड़ने की बात कहते हैं। किसी भी दृष्टान्त की दार्शनिक में आंशिक ही तुल्यता होती है। जब “पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इस अनुमान में महानस का दृष्टान्त दिया जाता है तब धूम और वह्नि का सम्बन्धमात्र ही ग्राह्य होता है। भले महानस ( रसोईघर ) में रोटी, दाल और चावल पकाया जाता है और पर्वत में वैसा नहीं होता है तो भी धूम और वह्नि का सम्बन्ध उभयत्र तुल्य ही है। उसी तरह वेद को समुद्र के समान कहने का इतना ही अर्थ है कि वेद समुद्र के समान गम्भीर एवं अगाध है और सर्वसाधारण के लिए अगम्य है।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८७ जैसे समुद्र-जल स्वयं समुद्र से ग्रहण करने से खारा ही जल मिलता है। परन्तु वही जल मेघ के द्वारा प्राप्त होता है तो मधुर होता है। उसी तरह मनमानी वेद को पढ़कर उसका मनमानी अर्थ ग्रहण करने पर वह खारे जल के समान ही अग्राह्य होगा। जैसे मेघ के द्वारा आनीत वही जल मधुर होता है, उसी तरह गुरु-परम्परा से या आचार्य-परम्परा से अधीत वेद एवं वेदार्थ ही ग्राह्य एवं उपयोगी होगा । यह कथन भी मनमानी नहीं है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) इस विधि के आधार पर ऐसा अर्थ विदित होता है । अत्यन्त अप्राप्त की ही विधि होती है। प्राप्त की विधि में अज्ञातज्ञापकत्व न होने से प्रामाण्य नहीं होता, क्योंकि अनधिगत अबाधित अर्थज्ञान ही प्रमा कही जाती है उसके असाधारण कारण को ही प्रमाण कहा जाता है । अध्येतव्य अर्थ के ज्ञान में अध्ययन की हेतुता लोकसिद्ध है । "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) यह नियमविधि होने से ही सार्थक हो सकती है । गुरु-परम्परा से ही वेदों का अध्ययन करना चाहिये मनमाने तौर से नहीं । वेद को अनुश्रव कहते हैं । जिसका अर्थ ही यह है कि वे गुरु-परम्परा से ही सुने जाते हैं । उनका निर्माण नहीं होता। इसी प्रकार अर्थज्ञान भी पारम्पर्य से ही प्राप्त करना चाहिये इसके लिये भी प्रमाण है—"आचार्यवान् पुरुषो वेद" ( छा० उ० ६।१४।२ ), "आचार्याद् ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छा० उ० ४।९।३ ), "तद्विज्ञानार्थं गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" ( मुण्ड० उ० १।२।१२ ) अर्थात् आचार्य-परम्परा से प्राप्त विद्या ही फलदायिनी होती है। ब्रह्म के जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का ही अभिगमन करना चाहिये । आजकल पुस्तकें सुलभ हैं । अनेक टीकाएँ एवं तर्जुमे भी हैं । उन्हीं के आधार पर लोग वेद और पुराण पढ़ते हैं । इसी लिए समुद्र के खारे पानी के समान ही उनको वेदार्थ सर्वथा अग्राह्य ही प्रतीत होता है। यही आज की नास्तिकता का मुख्य कारण है । उक्त विचारक महाशय भी उसी कोटि के हैं । धर्म और ब्रह्म वैदैकसमधिगम्य हैं। अन्य प्रमाणों से उनका बोध होता ही नहीं । इसी लिए भगवान् शिवजी, राम तथा अन्य समस्त आस्तिक आचार्य तथा गोस्वामी भी धर्म और ब्रह्म के लिए पद पद पर वेद और पुराणों की दुहाई देते हैं । वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा नदी के समान नहीं मान्य है। गङ्गा में नित्यनूतन जल का प्रवाह उचित है, क्योंकि गोमुख से लेकर गंगासागर तक भगीरथरथखातावच्छिन्न अविच्छिन्न जलप्रवाह का ही नाम गङ्गा है । उस प्रवाह में इतर नदियों तथा झरनों की तो बात ही क्या रथ्योदक भी गङ्गाप्रवाह में पड़कर गङ्गा हो जाता है । “रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ।” ( भामती ) इसी लिए उस प्रवाह में स्नान करनेवाला यह ठीक ही अनुभव करता है कि पूर्वजों ने जिस गङ्गा में स्नान किया था उसी में हम भी स्नान कर रहे हैं । उक्त परिभाषा के अनुसार भगीरथरथखातावच्छिन्न जलप्रवाह ही गङ्गा है। उसी का माहात्म्य श्रुति, स्मृति और पुराणों में वर्णित है। वैदिक परम्परा तो गङ्गा के तुल्य तभी मानी जा सकती है जब गङ्गा में जैसे विभिन्न झरनों, नदियों तथा रथ्याओं के उदक मिलकर गङ्गा हो जाते हैं वैसे ही विभिन्न देश और काल के नये नये शब्द एवं नये अर्थ वैदिक परम्परा में मिलकर वेद ही हो जाते, परन्तु वेद के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। वेद तो नियत वर्णों की नियत वर्णानुपूर्वी को ही कहते हैं । उनमें तो एक वर्ण और स्वर का व्यत्यास हो जाने पर वेदत्व ही नहीं रहता । 'अग्निर्मूर्धा' वेद है 'मूर्धा अग्निः' वेद नहीं है । ज्यों के त्यों शब्दों में भी पौर्वापर्य में परिवर्तन होने से
ही वेदत्व मिट जाता है । इतर ग्रन्थों में मूलपाठ की रक्षा पर पूर्ण ध्यान रखा जाता है। वेदों की आनुपूर्वी किसी कल्प में नहीं बदलती है । ईश्वर भी आनुपूर्वी बदलने में स्वतन्त्र नहीं होता। यही वेदों की अपौरुषेयता एवं नित्यता है । अनादि काल से शिष्य अपने अपने आचार्यों द्वारा उच्चारित आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का उच्चारण करते हैं । ईश्वर भी सृष्टि के समय पूर्वकल्प की वेदानुपूर्वी का स्मरण कर के वैसी आनुपूर्वी का उपदेश करते हैं । नवीन आनुपूर्वी का नहीं । “यत्ततः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता ।” यदि उनमें नये नये शब्द नये नये अर्थ मिलते रहें । तब वे भी अपौरुषेय एवं अनादि नहीं रह सकते, फिर तो यह शङ्का बनी रहेगी कि किन्हीं भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से दूषित पुरुषों के भी शब्द और वाक्य वेदों में मिल गये होंगे । अतः वेद अपौरुषेय या ईश्वरवाक्य ही हैं यह नहीं कहा जा सकता । इतिहास और पुराण वैसे ( वेदों जैसे ) अनादि और अपौरुषेय नहीं हैं, किन्तु वे प्रत्येक कल्प में सर्वज्ञ- कल्प महर्षियों के द्वारा वेदों के अनुसार निर्मित होते हैं । परन्तु सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यन्त उनकी आनुपूर्वी एक सी ही रहती है । उनमें भी नदी के समान नये नये शब्द और मिलते जायें तो वे भी आर्ष वचन के रूप में प्रमाण नहीं हो सकते । इतना ही क्यों मानस के ही शुद्ध पाठ की रक्षा का प्रयास यही सिद्ध करता है कि किसी भी ग्रन्थ में यदि नये नये शब्द और अर्थ मिलते रहेंगे तो वह प्रमाण रूप में आदरणीय नहीं हो सकेगा । अन्यथा विविध क्षेपकों सहित मानस भी गङ्गादि नदी के समान मानस ही माना जाना चाहिये । यदि नदी के समान उसमें नये नये शब्दों एवं विचारों का सन्निवेश माना जायगा तो वैदिक या आर्ष वचनों की शक्ति और चमत्कृति समाप्त हो जायेगी । इतिहास और पुराणों की शब्दानुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही हैं । किन्हीं भी ग्रन्थों में नदी के समान नये विचारों का सन्निवेश मानने पर तो उनका स्वरूप और प्रामाण्य सर्वथा भंग ही हो जायगा । प्रकृत में तो जैसे ईश्वर आत्मा नित्य है, स्थिर है उसी प्रकार ईश्वर के नित्यविज्ञान में स्थित वेदवाणी भी नित्य है । जैसे सूर्य और अग्नि एकरस होकर ही संसार का प्रकाशन करते हैं वैसे ही नित्य स्थिर वेद ही स्थिर सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं । स्थिरता होने से सरोवर के समान सड़न आ जायगी एवं सरोवरजल के समान वेद अग्राह्य हो जायेंगे इत्यादि कल्पना निराधार ही है । समुद्र के स्थिर रहने पर भी जैसे अगाधता के कारण उसमें सड़न नहीं होती है, वैसे ही वैदिक शब्द और अर्थ अपौरुषेय तथा ईश्वरीय होने से वे सदा अगाध एवं निर्विकार ही रहते हैं । सूर्य कल्पपर्यन्त स्थिर रहने पर भी जैसे निर्विकार रहते हैं, वैसे वेद भी निर्विकार ही रहते हैं । उनकी अस्थिरता ही अशुद्धि एवं विकार का कारण बनेगी । विकार नहीं अपितु घोर विकार अथवा सर्वनाश का भी कारण बन सकती है जैसे सूर्य, समुद्र आदि की अस्थिरता घोर विकार अथवा सर्वनाश का कारण बन जाती है । पर इसे सुधारोन्मादयुक्त कथावाचक कैसे समझें । मानस में भी यदि नये शब्द, नये विचार और सिद्धान्त आ आ कर मिलते रहेंगे तो वह भी अप्रमाण एवं विकृत हो जायेगा । वैदिकों के यहाँ तो शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक नित्य सम्बन्ध माना जाता है । अर्थात् वैदिक शब्द, उनका अर्थ तथा शब्दार्थ का सम्बन्ध तीनों ही नित्य माने जाते हैं और वस्तुतः वे नित्य हैं ही । इन स्थितियों को न जानने से ही अनर्गल प्रलाप चल सकते हैं । वस्तुतः विच्छू का मन्त्र भी न जानना और साँप के बिल में अँगुली डालने के समान वेदों के सम्बन्ध में पूर्वोक्त प्रलाप किये गये हैं ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८९ गोस्वामीजी वैसे परम्परावादी नहीं थे, यह कहना ही जड़ता है। आचार्य-परम्परा से वेद एवं वेदार्थ का ग्रहण न करने से ही वे खारे समुद्र के समान अग्राह्य एवं अनिष्टकारक भी हो सकते हैं। वेदों के ही आधार पर यह सिद्ध है कि किसी भी मन्त्र में एक स्वर के व्यत्यास से वह मन्त्र वाग्वज्र होकर यजमान का ही घातक बन जाता है— "मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥" स्वरभेद के कारण 'इन्द्रस्य शत्रुर्घातयिता' यह अभीष्ट तत्पुरुषार्थ न होकर 'इन्द्रशत्रो विवर्धस्व' 'इन्द्रः शत्रुर्घातयिता यस्य' इस बहुव्रीहि के अनुसार अनिष्ट अर्थ होने से ही वृत्र इन्द्र का घातक न बन सका, किन्तु इन्द्र ही उसका घातक हुआ। अतएव "श्रुति पुराण बहु कहहिं उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ (रा० मा० ७।११६।३) इस पंक्ति से उनको श्रुति और पुराणों पर आक्षेप करना अभीष्ट नहीं है। यह तो वेद और पुराणों के विरोधियों के दिमाग का फितूर है। यदि आलोकरूप सहकारी साधन के अभाव में निर्दोष नेत्र से भी रूप का ज्ञान न हो तो इसमें नेत्र प्रमाण का दोष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह यदि विवेक, वैराग्य, शम, दमादि साधनचतुष्टय- सम्पत्तिरूप साधन के बिना वेद-वेदान्तों से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार न हो तो इसमें वेदप्रमाण का कोई दोष नहीं है। कहा जाता है कि "दिन रात रामनाम जपने वालों के आचरण और स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता, यह क्या यथार्थ सत्य नहीं है ?" परन्तु इसमें भगवन्नाम का क्या दोष है ? इसमें नामापराधराहित्य का अभाव ही कारण है। इसी तरह विवेक, वैराग्यादि साधन न होने से ही वेद और पुराणों के उपाय बतलाने पर भी ग्रन्थि नहीं खुलती उलटे उलझती ही जाती है। "बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ।" (रा० मा० २।१७६।२ ) "जैसे बिनु बिराग संन्यासी ॥" (रा० मा० १।२५०।२ ) आदि पंक्तियों से उन्होंने अपना अभिप्राय व्यक्त कर दिया है। उन्होंने भक्ति के लिए वेद और पुराणों को आकर माना है— "पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना । मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ज्ञान बिराग नयन उरगारी ॥" (रा० मा० ७।११९।७) यहाँ भी मर्मी सज्जन और सुमति कुदारी न होने से ही वेद-पुराण पावन-पर्वत, रामकथा भी भक्तिमणि प्रकट नहीं कर सकते । एतावतापि पावन-पर्वत, वेद-पुराण और नाना रामकथा रूप रुचिराकर की कोई न्यूनता नहीं होती । कारण, जब ज्ञान, विरागरूप नयन न हो तो सफलता कैसे मिल सकती है ? "आस्तिक हिन्दू वेद को परम प्रमाण मानता है। पुराणों को भी वेद का ही विस्तार स्वीकार किया जाता है । श्रीव्यास ने करुणा से प्रेरित होकर वेदों का उपबृंहण किया है। वही पुराण कहलाता है । शब्दशः विचार करने पर यह भी विरोधाभास सत्य ही प्रतीत होता है। वैदिक मन्त्रों का सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र ही है। उसी को केन्द्रित कर के ऋचाएँ लिखी गयी हैं। उसी की स्तुतियाँ की गयी हैं। यज्ञ में आहुति देकर उससे विविध वस्तुओं की याचना की गयी है। किन्तु पुराणों में पहुँचकर इन्द्र अपनी महिमा खो बैठा है। उसके चरित्र की अनेक त्रुटियों का रहस्योद्घाटन किया गया है। वह दैत्यों से परास्त होता है। अन्त में उनसे त्राण पाने के लिए वह नारायण का आश्रय लेता है।
७९० रामायणमीमांसा एकविंश वेद के मुख्य देवता जहां इन्द्र, वरुण और अग्नि हैं वहाँ पुराणों में इनके स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिष्ठा की गयी है। त्रिदेवों में भी ब्रह्मा की महिमा कम हो जाती है। मुख्य पूजा शिव और विष्णु को रह जाती है। पुराणों में उनकी अभिन्नता के प्रतिपादन के साथ कभी कभी उन्हें प्रतिद्वन्द्वी के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। रामचरितमानस में वेदों और पुराणों की महिमा और साक्ष्य का वर्णन करते हुए भी भगवान् राम को ही सर्वोत्कृष्ट पद प्रदान किया है। विष्णु और शिव भी उनके अंश से ही समुद्भूत कहे गये हैं— "शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना। उपजहिं जासु अंश विधि नाना। (रा० मा० १।१४३।३) स्थूल दृष्टि से देखने पर वेद और पुराण परस्पर विरोधी मत का प्रतिपादन करते हुए प्रतीत होते हैं। तब तीनों के एकत्व का तात्पर्य क्या हो सकता है ? कई आलोचकों के अनुसार दशरथ, राम, सीता आदि के नाम वेदों में कहीं प्राप्त नहीं होते। वहीं दूसरे विद्वानों ने इनके नाम अनेक ऋचाओं में खोज निकाले हैं। इन खोजों को प्रामाणिक मानने के बाद भी यह तो असंदिग्धरूप से कहा ही जा सकता है कि उन्हें वह गौरवपूर्ण पद नहीं प्राप्त है जो पुराणों अथवा रामचरितमानस में दिया गया है।" वस्तुतः सारी विडम्बना वेदों और पुराणों के गुरु-परम्परा से अध्ययन न करने का ही परिणाम है। ठीक ही है मेघ बिना समुद्र का पानी खारा लगता है। आचार्य, गुरु और सन्तों के बिना वेदों का अर्थ और अभिप्राय कैसे समझ में आये ? यह ठीक है कि वेदों और पुराणों के तात्पर्य को हृदयङ्गम करने के लिए व्यक्ति को अपनी पूर्वाग्रहयुक्त बुद्धि के स्थान पर सन्त का आश्रय लेना चाहिये। परन्तु शब्दप्रामाण्यवादी के लिए तो शब्दशः अर्थग्रहण की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अतः पुराणों के शब्दों की उपेक्षा कर के मनमानी अर्थग्रहण करना वेदार्थ या पुराणार्थ नहीं ही हो सकता। अतः गुरु, आचार्य या सन्त भी शब्दों के अनुसार ही तात्पर्यार्थ वर्णन करते हैं अन्यथा तात्पर्य वर्णन के लिए पूर्वोक्त रीति से शब्दों के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति षड्विधलिंग के विचार की आवश्यकता ही क्या है ? फिर सन्त तो विभिन्न सभी सम्प्रदायों में होते हैं। फिर तो उन सन्तों के अनुसार या "बाबावाक्यं प्रमाणम्" के अनुसार भिन्न भिन्न वेदों के तात्पर्य भी होंगे। ऐसी स्थिति में— "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्रह्मसू० १।१।१ )। विचार-पूर्वोत्तरमीमांसा निरर्थक ही हो जायँगी। विचारविनिमय सम्बन्धी आचार्यों के महान् ग्रन्थ भी निरर्थक हो जायेंगे। फिर तो विचार बिना ही विभिन्न सन्त जो कह दें वही मान लेना होगा। स्वयं विचार को अवकाश ही नहीं रहेगा। तब तो सांख्य, मीसांसक, जैन, बौद्ध आदि सन्तों के अनुसार अनीश्वरवाद भी मानना पड़ेगा, क्योंकि श्रद्धालु को शब्दतः विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि कोई वैदिक इतिहास और पुराणों को वेदविरुद्ध होने से, पौरुषेय होने से अप्रमाण कहे तथा कोई पौराणिक रामचरितमानस को वेदपुराणविरुद्ध होने के कारण अप्रमाण कहे तो उसका क्या समाधान किया जा सकता है ? यदि केवल सन्त का कहना ही पर्याप्त है तो सन्त को भी वेद-पुराण की दुहाई देने की क्या आवश्यकता ? यदि कोई किसी सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्त कहे और उसे वेद से न सिद्ध कर सके तो वह वैदिक सिद्धान्त कैसे सिद्ध होगा ? जो हम कहते हैं कि श्रद्धालु होकर मान लो, विश्वास करो इतनेमात्र से तो काम नहीं चल सकता। यदि ऐसी ही बात थी तो रामचरितमानस पर भी ऊहापोह करने की क्या आवश्यकता ? फिर मानसचिन्तन तथा मानसमुक्तावली की क्या आवश्यकता ? क्या यह विचार अश्रद्धा का द्योतक न होगा ? क्या गोस्वामीजी के अभिप्रेत अर्थ का अनर्थ करना न होगा ?
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९१ गोस्वामी वेद-पुराण के पावन पर्वत में ही रामकथा रुचिराकार को सत्ता कहते हैं। परन्तु वेद में राम और सीता का वर्णन ही न हो और उनका वेदों में कोई महत्त्वपूर्ण पद ही न हो। वेदों में इन्द्र ही परम पूज्य हो और रामचरितमानस में श्वानतुल्य इन्द्र निन्दनीय हो; क्या यह प्रत्यक्ष वेद-विरोध नहीं है ? इसका समाधान केवल ‘बाबावाक्यम्’ से नहीं हो सकता । महानुभाव ! वस्तुतः वेद, पुराण और मानस में विरोध खड़ा करना कुटिलता है। वेद और पुराण को नीचा दिखाने की दुश्चेष्टा है। इससे तुलसी या मानस की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, किन्तु प्रतिष्ठा घटेगी । तुलसी वाल्मीकि कवीश्वर को कपीश्वर के समान ही सीताराम-गुणग्राम-पुण्यारण्यविहारी कहते हैं । रामायण को दूषणसहित होने पर भी दोषरहित कहते हैं। सखर सकोमल कहते हैं। आप वाल्मीकि की भूल सुधार उन्हीं तुलसी द्वारा कराना चाहते हैं— “अहो मोह महिमा बलवाना ।” हाँ, तो अब सुनिये वेद, रामायण और मानस का समन्वय । पहले आपको जानना चाहिये कि वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास, जैमिनि, शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व, वल्लभ, शवरस्वामी, कुमारिल, विद्यारण्य, मधुसूदन, श्रीधर, उब्बट, महीधर, पाणिनि, पतञ्जलि तथा कात्यायन सभी वैदिक दयानन्दियों को छोड़कर मन्त्र, ब्राह्मण एवं उपनिषदों को मिलाकर वेद मानते हैं। साथ ही चार संहिता ही वेद नहीं हैं, किन्तु ११३१ ग्यारह सौ एकतीस संहिताएँ तथा उतने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि सब वेद हैं। जिनमें से बहुत आज मर्त्यलोक में अप्राप्त भी हैं। अतएव उपलब्ध ऋचाएँ उनमें से कुछ अंश ही हैं। यजुःसंहिताएँ एवं उनके ब्राह्मण, उपनिषद् आदि भी वेद हैं और ऋचाएँ किसी के द्वारा लिखी या निर्मित नहीं होती हैं । किन्तु सभी वेद भगवान् के निःश्वास से प्रकट होते हैं— “जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ ) ईश्वर के तुल्य ही वे नित्य एवं अनादि हैं। वेदों में सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र हैं । उनको ही केन्द्रित करके ऋचाएँ लिखी गयी हैं । ये विचार पाश्चात्य वेदविरोधियों के हैं, आस्तिकों के नहीं । बेबर, मैक्समूलर, राय आदि ही दुरभिसन्धिवशात् ऐसा लिखते हैं । यह हमारी रामायणमीमांसा में स्पष्टरूप से वर्णित है । वेदों और उपनिषदों के अनुसार सब वेदों का तात्पर्य सच्चिदानन्द परब्रह्म में ही है— “जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ ) “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्....यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।” ( श्वेता० उ० ४।८ तथा बह्वृचोपनिषत् ) “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” ( कठउ० २।१५ ) ऋक् उपलक्षित सभी वेदों का तात्पर्य अक्षर ब्रह्म में ही है जो उसको नहीं जानता तो उसे ऋक् से क्या लाभ ? गीता भी यही कहती है— “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” ( गीता० १५।१५ ) सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ ।
७९२ रामायणमीमांसा एकविंश जैसे पादुका, शिविका, सिंहासन आदि पर पैर धरने से भी कोई नहीं कह सकता कि मैं पृथिवी पर पैर नहीं धरता । क्योंकि वे सब भी पृथिवी के विकार हैं। इसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि का प्रतिपादन भी परमात्मा का ही प्रतिपादन है, क्योंकि वे सब परमात्मा के ही विकार हैं— “कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ।” (भाग० १०।८७।१५–वेदस्तुतिः ) वेदलक्षणा भारती उक्थजड़ों को अपनी अभिधा, लक्षणा, गौणी आदि वृत्तियों से भ्रमित कर देती है। वेदों में इन्द्र, अग्नि आदि की स्तुतियाँ अवश्य अधिक हैं। परन्तु शिव तथा विष्णु के भी बहुत से मन्त्र हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि वेदों में जिसका बहुत वर्णन हो वही वेदार्थ है। क्योंकि वेदों में तो कर्मकाण्ड का ही अधिक वर्णन है। उससे कम उपासना का वर्णन है। ज्ञानकाण्ड का तो बहुत ही कम वर्णन है, तथापि मुख्य ज्ञान- काण्ड ही है। साध्य-सिद्धि के लिए अधिकांश प्रयास तो साधन में ही करना पड़ता है। कुल्हाड़ी से वृक्ष काटा जाता है। सारा प्रयास कुठार के उद्यमन तथा निपातन में ही किया जाता है। काष्ठ का द्वैधीभाव फल तो साधन-व्यापार में ही सम्पन्न होता है। प्राणियों की ब्रह्म-प्राप्ति होने में मल, विक्षेप और आवरण ये तीन ही बाधक होते हैं। तीनों की निवृत्ति के लिए कर्म, उपासना और ज्ञान की अपेक्षा होती है। प्रत्येक शाखा के लक्ष संख्यावाले वेदों में अस्सी- हजार मन्त्र और ब्राह्मण कर्म का प्रतिपादन करते हैं। सोलह हजार उपासना का और चार हजार ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं। कर्मों में भी काम्य कर्मों का प्रतिपादन अधिक है, निष्काम कर्मों का कम, क्योंकि पाशविक काम, कर्म, ज्ञानरूप मृत्यु का अतिक्रमण करने के लिए पहले वैदिक कर्मज्ञान की अपेक्षा होती है। “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” ( ईशोपनिषद् ११ ) इन्द्र, अग्नि आदि कर्म के प्रधान देवता हैं अतः उनका अधिक वर्णन ठीक ही है। देवता भी ईश्वर के ही अंश हैं। फिर उनका ऐश्वर्य निःसीम नहीं है। परन्तु कर्मफलदाता तो ईश्वर हैं। देवताओं में निरतिशय सर्वज्ञता नहीं होती। वे जगत् के कारण भी नहीं होते। अनन्त ब्रह्माण्डात्मक विश्व का कारण परमेश्वर होता है। यह नासदीय आदि सूक्तों और अपरिगणित मन्त्रों एवं उपनिषदों से सिद्ध है। कर्माङ्गभूत इन्द्र की खूब महिमा वर्णित है। पर उसे जगत् का निरपेक्ष कारण नहीं कहा गया है। देवतारूप इन्द्र भी उत्कृष्ट कोटि का जीव ही है। यह ब्रह्मसूत्रों की प्रतर्दन-विद्या में स्पष्टतया कहा गया है। इसी लिए बृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषदों में अखण्ड भूमण्डलाधिपति द्रढिष्ठ, बलिष्ठ और धर्मिष्ठ सम्राट् के मानवानन्द से शतगुणित आनन्द मानवगन्धर्व का माना गया है। उससे सौ गुना देवगन्धर्व का आनन्द और उससे सौ गुना देवों का, उससे सौ गुना कर्मदेवों का, उससे सौ गुना बृहस्पति का आनन्द, उससे सौ गुना प्रजापति का, उससे सौ गुना ब्रह्मा का, उससे भी अनन्त गुना अधिक परब्रह्म का आनन्द होता है। ब्रह्मा आदि का आनन्द ब्रह्मानन्द का एक कणमात्र है। ब्रह्मानन्द तो अनन्त समुद्र तुल्य है— “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० उ० २।५।२१ ) इत्यादि स्थलों में तो इन्द्रशब्द का अर्थ शुद्ध परमात्मा ही है, देवात्मा नहीं। इसी तरह—'इन्द्रवरुणं मित्रवरुणम्' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ), 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं १।१६४।४६ ) इत्यादि स्थलों में इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि शब्दों का परमेश्वर ही अर्थ है, परिच्छिन्न देवता नहीं। ब्रह्मसूत्रों के प्रकरणानुसार आकाश, प्राण आदि शब्दों से भी परमात्मतत्त्व ही विवक्षित कहा गया है। विशेष जानकारी के लिए उन उन प्रकरणों को देखें। परन्तु विष्णु, रुद्र आदि सूक्तों द्वारा शिव या विष्णु को जगत् का परम कारण परब्रह्म कहा गया है—
“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । “दिवीव चक्षुराततम्” (ऋ० सं० १।२२।२०), “जागृवांसः समिन्धते ॥” (ऋ० सं० १।२२।२१), “विष्णोः कर्माणि पश्यत ।” “इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधाऽस्य निदधे पदम् ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० ) “पुरुष एवेदं सर्वम् ।” “एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे । शिव और विष्णु सम्बन्धी थोड़े मन्त्रों में भी उन्हें ईश्वर परमात्मा सर्वकारण कहा गया है । परन्तु इन्द्र, अग्नि आदि के बहुत मन्त्रों में भी उनकी ईश्वरता का वर्णन नहीं किया गया है । “येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥” ( गीता ९।२३ ) “लभन्ते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ।” ( गीता ७।२२ ) इन्द्र, वरुण और अग्नि के यजन-पूजन से अपरिगणित फल मिलते हैं । इसी लिए उन्हें कर्मफल देनेवाला भी कहा जाता है । परन्तु जो अनन्त ब्रह्माण्डों एवं एक एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं उनके अनन्त जन्मों एवं एक एक जन्म के अनन्त कर्मों को जान सकता है वह परमेश्वर ही मुख्य फलदाता है । उन देवताओं की पूजा भी परमेश्वर की ही पूजा है । उनका भी फल भगवान् ही देते हैं । ईश्वर एक ही होता है । उनके नाम और स्वरूप भिन्न हो सकते हैं । परन्तु तत्त्व एक ही होता है । अतः भिन्न स्थलों में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, सीता, राधा आदि रूप में उसी का वर्णन होता है । “यथा अनेक वेष धरि नृत्य करे नट कोई । जोइ जोइ रूप दिखावइ आपुनु होइ न सोइ ॥” ( रा० मा ७।७२ ) वेद के ही शिव का शिव, स्कन्द आदि पुराणों में सर्वातिशायी महत्त्व वर्णित है । वेद के ही विष्णु का विष्णुपुराण और पद्मपुराण में लोकोत्तर माहात्म्य वर्णित है । विष्णुपुराण के अनुसार विष्णु ही राम हैं । वही कृष्ण हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार उन्हीं अनन्त ब्रह्माण्डनायक ईश्वर विष्णु का राम के रूप में वर्णन है । पुराणों, अध्यात्म आदि अनेक रामायणों में भी परब्रह्म रूप में राम का वर्णन है । वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्ण भी कहा गया है—“कृष्णश्चैव बृहद्बलः” श्रीभागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि में उसी परमविष्णु का कृष्ण के रूप में वर्णन है । भिन्न भिन्न नामों से एक वेदवेद्य परमात्मा का ही वर्णन है । समन्वय कर सकने में असमर्थ अनभिज्ञ लोग हो भिन्न भिन्न शिव, विष्णु, राम और कृष्ण को अलग अलग मानकर भ्रान्त होते हैं । “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥” खण्डन-मण्डन तथा उत्कर्ष-अपकर्ष के वर्णन का तात्पर्य उन उन स्वरूपों की प्रशंसा में ही है, खण्डन या निन्दा में तात्पर्य नहीं है— “नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् ।” निन्दा का तात्पर्य निन्दा में न होकर विधेय की स्तुति में ही होता है । इस दृष्टि से वेदों में कर्माङ्गदेवता के रूप से वर्णित इन्द्र का अधिक वर्णनमात्र देखकर अनभिज्ञ उन्हीं को सर्वोत्कृष्ट देवता मानने लगते हैं । पुराणों में नहीं, मन्त्रों और ब्राह्मणों में इन्द्र को वृत्र के हनन में विष्णु की १००
७९४ रामायणमीमांसा एकविंश सहायता लेनी पड़ी है और वेदों में ही इन्द्र को अहल्या का जार आदि कहा गया है । कौषीतकि उपनिषद् में इन्द्र स्वयं अपने अनेक दोषों का वर्णन कर के कहता है कि मैंने त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र का वध किया । अरुन्मुख यतियों को मारकर कुत्तों को खाने के लिए दे दिया । परन्तु ब्रह्मज्ञान के प्रभाव से मेरा बाल भी बाँका नहीं हुआ— “त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनम् अरुन्मुखान् यतीन् शालावृकेभ्यः प्रायच्छम् लोम च नामीयते ।” (कौषी० उ० ३।१) वेदों में ही विष्णु का वर्णन है । विष्णु ही कृष्ण हैं और वही राम हैं । गोपालतापनीय आदि अनेक उपनिषदों में कृष्ण को ब्रह्म कहा गया है । रामतापनीय आदि अनेकों उपनिषदों में राम को परब्रह्म कहा गया है । उनमें रामकथा का भी वर्णन है । अतः यह स्पष्ट है कि भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से अनुष्ठीयमान कर्मों से बुद्धि शुद्ध होने पर निष्काम उपासनाओं से मन एकाग्र होता है । एकाग्र मन से ही स्वप्रकाशब्रह्मात्मसम्बन्धी आवरण- भङ्ग होता है । तभी ब्रह्मात्मसाक्षात्कार होता है । तभी अनन्यप्रेमलक्षणा भक्ति सम्पन्न होती है। इस तरह कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड का वर्णन करती हुई श्रुतियों का ब्रह्मसाक्षात्कार में ही उपयोग होने से उनका तात्पर्य ब्रह्म- साक्षात्कार में ही होता है । ज्ञानकाण्ड स्पष्टरूप से परमेश्वर का प्रतिपादन करते ही हैं । दूसरी वह दृष्टि है, जिसके अनुसार अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड और तद्गत सभी वस्तुएँ एक-मात्र अनन्त सत् ब्रह्म का ही विकार या विवर्त हैं, अतः इन्द्र, वरुणादि सभी वस्तुएँ ब्रह्मरूप ही हैं । उनका प्रतिपादन भी ब्रह्म का ही प्रतिपादन है । इसके अतिरिक्त मीमांसकों ने सभी शब्दों की जाति में शक्ति मानी है । घटत्व, पटत्व आदि त्व, तलादि प्रत्ययों से संवेद्य जाति का भाव ही अर्थ है, क्योंकि भाव अर्थ में ही त्वत्, तलादि प्रत्यय होते हैं । तथा च घटशब्द का घटत्व अर्थ है, घटत्व का अर्थ है घटका भाव । अन्वय और व्यतिरेक से घटरूप में परिणत मृत्तिका ही घट का भाव है । वही घटत्व है । मृत्तिकाभाव अपने कारण जल में ही पर्यवसित होता है । अतः सभी शब्दों के जातिवाचक होने से तत्तद्रूप में परिणत ब्रह्म ही सब शब्दों का अर्थ है । इस प्रकार सभी शब्दों का आपात दृष्टि से तत्तत्प्रसिद्ध अर्थ होने पर भी सब शब्दों का अन्तिम अर्थ ब्रह्म ही है । वेदवेदान्तवेद्य ब्रह्म ही वेदों का ब्रह्म है । वही रामायण का राम है, वही भागवत का कृष्ण, विष्णु- पुराण का विष्णु एवं शिवपुराण का शिव है । वही शाक्त, सौर, गाणपत्य आदि आगमों का शक्ति, सूर्य और महा- गणपति भी है । राम, विष्णु और कृष्ण एक ही वस्तु के भिन्न भिन्न नाममात्र हैं । एक-एक ब्रह्माण्ड के भी उत्पादक, पालक और संहारक भी ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होते हैं और अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के भी उत्पादक, पालक और संहारक भी ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र कहे जाते हैं । एक एक ब्रह्माण्ड के उत्पादक, पालक और संहारक कार्य ब्रह्म होते हैं । अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक एवं संहारक कारण ब्रह्म हैं । “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ॥” (तै० उ० ३।१) रामायण के राम, भागवत के कृष्ण, विष्णुपुराण के विष्णु एवं शिवपुराण के शिव कारणब्रह्म ही हैं । जो शम्भु, विरञ्चि और विष्णु राम के अंश से उद्भूत होते हैं वे कार्यब्रह्म हैं, कारणब्रह्म नहीं । कृष्ण के भी एक एक रोम में अगणित ब्रह्माण्डों का वर्णन है— “क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भूसंवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः । क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ॥”(भाग० १०।१४।११)
Here is the line-by-line transcription of the Hindi text from the provided image:
अष्टम अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९५ ब्रह्माजी कहते हैं कि तम प्रकृति, महान्, अहं, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी आदि अष्टावरणोंसे समावृत सात वितस्ति (बित्ता) परिमाणवाला ब्रह्माण्ड का अभिमानी कहाँ ब्रह्मा मैं और कहाँ अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके एक एक रोम में परिभ्रमण करते हैं ऐसी आपकी महिमा । इसी प्रकार शिव की महिमा का भी वर्णन है। शिवजी के भी अंश से अनेक ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, इन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं। शिवपुराण, शिवरहस्य, स्कन्दपुराण काशीखण्ड, केदारखण्ड आदि में यह स्पष्ट है। अतएव रामभक्ति की दृष्टि से श्रीराम ही वेदों, पुराणों, तन्त्रों और आगमों में अनेक नामों एवं रूपों में वर्णित हैं। वही नाम- रूपातीत निर्गुण निर्विशेष रूप में भी वर्णित हैं । जब राम, कृष्ण, विष्णु, शिव एक ही वस्तु हैं तब कौन कह सकता है कि वेदों में उनको महत्त्वपूर्ण पद नहीं प्राप्त है। वेदों में ब्रह्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है । वही ब्रह्मा, विष्णु, राम और कृष्ण हैं । सीता का भी मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं उपनिषदों में महत्त्वपूर्ण वर्णन है। सीता लाङ्गुलपद्धति के रूप में वर्णित होती हुई भी निर्विशेष सत्तासामान्यरूप में तथा ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के रूप में भी वर्णित है । प्रणव बहुत छोटा सा मन्त्र है । परन्तु उसी से सम्पूर्ण वेद का प्रादुर्भाव होता है। वेद उसी की व्याख्या है। व्यक्ति और समाज को वेदादि शास्त्रानुसारी बनना चाहिए । वेदों, शास्त्रों और पुराणों को समाज के अनुसार बनाने की रीति भारतीय नहीं है। फिर यह कहना कहाँ तक सङ्गत है कि "वेदों और पुराणों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे शब्दशः ग्रहण करने पर व्यक्ति और समाज दोनों का अकल्याण ही हो सकता है । हरिश्चन्द्र पूर्वपक्ष - यद्यपि उनमें शतशः ऋषियों और अगणित राजपुरुषों के चरित्रों का वर्णन आता है। धर्म और जीवन के किसी किसी अङ्ग पर उनसे प्रकाश पड़ता है। किन्तु वे ऋषि या महापुरुष दुर्बलताओं से सर्वथा शून्य नहीं हैं। उनमें जीवन की समग्रता का आदर्श प्राप्त नहीं होता । महाराज हरिश्चन्द्र की गणना महा- पुरुषों में की जाती है। सत्यवादिता के प्रतीक के रूप में वे समाज में सर्वमान्य हैं । सत्य की रक्षा के लिए वे बड़ा से बड़ा बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । पर उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी है। वे सन्तान की कामना से प्रेरित होकर यह मनौती मान लेते हैं कि सन्तान होने पर मैं बालक का ही बलिदान कर दूंगा। इससे उनकी मोहान्धता का परिचय मिलता है । लगता है कि वे अनपत्यता के कलङ्क से इतने भयभीत थे कि समाज पुत्रहीन समझ कर उनको हेय दृष्टि से देखे यह उनको असह्य था। इस कलङ्क को मिटाने के लिए वे इस सीमा तक जाने को प्रस्तुत होते हैं। सोचा कि पहले पुत्र हो फिर देखा जायगा । पुत्र होने के बाद बलिदान के वचन को टालते गये । अन्त में वे अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए तथा स्वयं की रुग्णता के निवारणार्थ शुनःशेप नाम के बालक को खरीद कर उसका बलिदान करने को प्रस्तुत होते हैं । महर्षि विश्वामित्र की कृपा से बालक की रक्षा होती है । यह भाग उनके चरित्र के निम्नतम भावों एवं दुर्बलताओं का परिचायक है । हरिश्चन्द्र का एक महापुरुष के रूप में वर्णन करने का भी दुष्परिणाम हो सकता है कि व्यक्ति जीवन के उत्तरार्द्ध में उनकी सत्यवादिता के स्थान पर बलिदान के द्वारा निःसन्तान को पुत्रप्राप्ति की परम्परा का अन्ध-