रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९५ वेदशैलावतीर्णेन नीरजस्का मही कृता । कलशब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्वुजम् ॥ कथाविस्तीर्णसलिलं काष्णं वेदं महाह्रदम् । तदिदं भारताख्यानं बह्वर्थमिह विस्तरम् ॥ तत्त्वतो ज्ञातुकामोऽहं भगवंस्त्वामुपस्थितः ।" इति एतेन उपाख्यानसहितस्य महाभारतस्य वेदव्यासैककर्तृकत्वं सिद्धयति । किञ्च विरोधा- भावत्वं सकलशास्त्रसम्प्रदायसमन्वितत्वं च । सूतसंहितायां अ० १- “व्यस्तवेदतया व्यास इति लोके श्रुतो मुनिः । अयं साक्षान्महायोगी व्यासः सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ महाभारतमाश्चर्यं निर्ममे भगवान् गुरुः ।” इति “कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥ देवीभागवते अ० १- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः । भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥” श्रीमद्भागवते स्कन्ध १ अ० ५- “स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥” मत्स्यपु० अ० ५५- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः । भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥” “प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचन्द्रमाः ।” इति स्कन्दपु० प्रभासखण्ड अ० २ ‘सत्यवतीसुतः•••• •••• •••• •••• •••• •••• । भारताख्यानमकरोद् वेदार्थैरुपबृंहितम् ॥ लक्षेणैकेन तत् प्रोक्तं द्वापरान्ते महात्मना ।” शौनकोक्तचरणव्यूहपरिशि० ९ “लक्षं तु चतुरो वेदा लक्षं भारतमेव च ॥” गीताध्यायान्ते इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्याम् इत्यादि । आर्यासप्तशत्यां गोवर्द्धनाचार्यकृतायाम् (१०८०-११३० मध्ये) “व्यासगिरां निर्यासं सारं विश्वस्य भारतं वन्दे । भूषणतयेव संज्ञां तदेकतां भारती वहति ॥” एतानि सर्वाणि वचनानि महाभारतस्य लक्षग्रन्थात्मकतां व्यासैककर्तृकतां महाभारतभारत- नामभ्यामेक एव ग्रन्थः इत्यादिकं ऐककण्ठ्येन निःसंशयेन च उद्घोषयन्ति । उपर्युक्त विविध पुराणवचनों में कहा गया है कि लक्ष श्लोकों का महाभारत व्यासकृत है । व्यास सर्वज्ञ विष्णु के अवतार ही हैं । महाभारत सब वेदों का एवं शास्त्रों का समन्वित सार है ।
८९६ रामायणमीमांसा द्वार्बिंश “जयो नामेतिहासोऽयम्” यह भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत के लिए ही कहा गया है। विशेषरूप से उद्योगपर्व के अध्याय १३३ से १३६ तक कुन्ती द्वारा कथित विदुलोपाख्यान नाम से प्रसिद्ध इतिहास जय नाम से कहा गया है। “जयनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।” (म० भा० ५।१३६।१८) इसी जयोपाख्यानरूप बीज का महान् वृक्षरूप महाभारत को मानकर उसका भी जयनाम लें तो उचित ही है। इतना ही क्यों, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत निम्नोक्त वचन के आधार पर अठारह पुराण, रामायण, कृष्ण- द्वैपायनोक्त पञ्चमवेद महाभारत, शाश्वत विष्णुधर्म एवं शिवधर्म इन सबका जय नाम है। इस तरह महाभारत का ही जय नाम है उसी का भारत तथा महाभारत नाम है— “अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा । काष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥ तथैव विष्णुधर्माश्च शिवधर्माश्च शाश्वताः । जयेति नाम तेषाञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥” इसी दृष्टि से आरम्भ में और अनेकों बार महाभारत में— “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ कहा गया है। अर्थात् नारायण परमेश्वर कृष्ण और नर अर्जुन तथा नरोत्तम प्रत्यक्चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्म तथा ब्रह्मविद्यारूपिणी सरस्वती को नमस्कार करके ही जय का वर्णन करना चाहिये । पूर्वोक्त रीति से पुराणादि सभी का नाम जय है। तथापि विशेषरूप से १८ संख्यावाले महाभारत ग्रन्थ का जय यह संकेत है। वाल्मीकिरामायण के टीकाकार सर्ग के श्लोकों की संख्या अक्षरों के संकेत से करते हैं। यथा— “कादयोऽङ्गाष्टादयोऽङ्गा पाद्या पञ्च प्रकीर्तिताः । यादयोऽष्टौ ज्ञनो पूर्णे विजेयस्वरशास्त्रके ॥” क से झ तक के अक्षर क्रमशः एक से नौ तक के वाचक हैं। ट से ध तक के अक्षर भी एक से नौ तक के वाचक हैं। प से म तक एक से पाँच तक के वाचक हैं। य से ह तक के अक्षर एक से आठ तक के वाचक हैं। ज्ञ और न ये दो अक्षर पूर्ण संख्या के वाचक हैं । जैमिनिसूत्र तथा आर्षसिद्धान्त भी ऐसी संख्या का वर्णन करते हैं । उपर्युक्त रीति से ज ८ का वाचक है और य एक का वाचक है । ‘अङ्कानां वामतो गतिः’ के अनुसार जय शब्द १८ संख्या का बोधक है । महाभारत १८ पर्व का है, महाभारतयुद्ध भी अठारह दिन हुआ । दोनों दलों में सेना १८ अक्षौहिणी थी । गीता १८ अध्याय की है । इस तरह ग्रन्थ का नाम जय हुआ । कुछ लोग कहते हैं, भारत के पात्र युधिष्ठिर, अर्जुन आदि ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु धर्म, अधर्म, देव, असुर के तुल्य ही कौरव तथा पाण्डव कल्पनामात्र हैं, पर यह ठीक नहीं, क्योंकि महाभारत के पात्र यदि कल्पित होते, ऐतिहासिक न होते तो दूसरे ग्रन्थ अपने ग्रन्थों में उन्हें स्थान न देते, परन्तु महाभारत के युधिष्ठिर आदि
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९७ पाण्डवों का उल्लेख पुराणों, ज्योतिषशास्त्रों “शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ ।” बृहत्संहिता ज्योतिषशास्त्र तथा पाणिनिसूत्र ‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ ४।३।९८ में उल्लेख आता है । मनु के आख्यानानीतिहासांश्च ३।२३२ की टीका मेधातिथि एवं कुल्लूक ने ‘इतिहासा भारतादयः’ कहा है । भारतीय इतिहास का निम्नोक्त लक्षण है— “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” गड़े मुर्दों के उखाड़ने जैसी पुरानी बातों को बार-बार दोहराना ही इतिहास नहीं है, किन्तु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश के साथ वृत्तान्तों का वर्णन ही इतिहास है । भले ही कहीं कहीं महाभारत को पुराण कहा है— “द्वैपायनेन यत्प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा । इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते ॥” ( १।२।१७ ) तथापि महाभारत में इसे इतिहास और महाभारतकाव्य ही कहा गया है— “कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ।” ( १।१।९१ ) “तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम् । इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ॥” ( म० भा० आ० प० १।५४ ) कविता के भेद से कर्ता के भेद की कल्पना भी निःसार है, क्योंकि स्वयं व्यास ने ही स्वीकार किया है कि आठ हजार आठ सौ श्लोक बड़े ही कठिन हैं उन्हें कोई नहीं जान सकता है और उनका निर्माण गणेश भगवान् की लेखनी के किञ्चित् अवरोध के लिए ही किया गया है — “ग्रन्थग्रन्थिं तदा चक्रे मुनिर्गूढं कुतूहलात् । यस्मिन् प्रतिज्ञया प्राह मुनिर्द्वैपायनस्त्विदम् ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ॥” ( म० भा० १।१।८०, ८१ ) और यह अन्य कवियों में भी देखा ही जाता है । विषयभेद से, परिस्थितिभेद से एवं मानस के उल्लास और अनुल्लास आदि के भेद से भी काव्यभेद होता ही है । इसी तरह समास-व्यास-भेद से पुनरुक्तियों का भी समाधान किया जा सकता है । “विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” ( म० भा० १।१।५१ ) महाभारत का काल-निर्णय महाभारत में ही महाभारत के निर्माण का काल निर्दिष्ट है— “त्रीनग्नीनिव कौरव्यान् जनयामास वीर्यवान् । उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥ जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति । तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ ११३
८९८ रामायणमीमांसा द्वाविंश अब्रवीत् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महर्षिः । जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न करके तपस्या के लिए वन में अपने आश्रम में चले गये। जब तीनों ही पुत्र परमगति को प्राप्त हो गये तब महर्षि व्यास ने मनुष्य-लोक में महाभारत का निरूपण किया। हजारों ब्राह्मणों के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को आज्ञा दी कि तुम इन लोगों को महाभारत सुनाओ । वैशम्पायन ने यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ के बीच बीच में बारम्बार उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया। इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पसत्रयज्ञ से पूर्व और पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर के देहावसान के पश्चात् महाभारतसंहिता की रचना हुई। पाण्डु युद्ध के पहले ही देह त्याग चुके थे । महाभारतयुद्ध के २०वें वर्ष में धृतराष्ट्र को परम पद प्राप्त हुआ था । युद्ध के पश्चात् १५ वर्ष तक धृतराष्ट्र युधिष्ठिर के साथ रहे थे । सोलहवें वर्ष भीम के वाग्बाण से पीड़ित हो विरक्त होकर विदुर के साथ वन चले गये । “ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः । राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः ॥” (आश्रमवासिक पर्व अध्याय ६।१५) वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं— “तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् । वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥” ( आश्रमवासिक पर्व २।३२ ) मैंने इन्द्र के मुख से सुना है कि धृतराष्ट्र की परमायु अभी ३ वर्ष शेष है। तथा च भारत युद्ध के २० वर्ष बीतने पर महाभारत का निर्माण हुआ । भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित् का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित् ने ६० वर्ष तक राज्य किया । “प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् । ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥” ( आदिपर्व ४९।७ ) मन्त्रियों ने जनमेजय से कहा था कि तुम्हारे पिता ६० वर्ष तक पृथिवी का पालन करके हम सबकी दुःखजनक मृत्यु को प्राप्त हुए । सौप्तिक पर्व में भी यही कहा है— “विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते रतः । षष्टिवर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ॥” ( सौप्तिक पर्व १६।१४ ) महाभारत-युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यदशा में ही जनमेजय का राज्याभिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ और कुछ ही दिनों बाद उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्रयज्ञ आरम्भ किया । उसी में वैशम्पायन ने महाभारत सुनाया । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जयनामक महाकाव्य के रूप में विविध उपाख्यानों के सहित लिखा । वही भारतीय युद्ध का विशद इतिहास है। यह युधिष्ठिर के विजय के उपलक्ष्य में लिखा गया था। इसीलिए युद्ध के २० वर्ष बाद और युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के १६ वर्ष पहले युधिष्ठिर के समय में ही लिखा गया था। यद्यपि ऐसे काव्य विजय के बाद शीघ्र ही लिखे जाते हैं तथापि धृतराष्ट्र के सामने उसका लिखा जाना उचित नहीं था, क्योंकि युधिष्ठिर बड़ी तत्परता से धृतराष्ट्र को प्रसन्न और तुष्ट रखने का प्रयत्न करते रहते थे ।
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९९ “यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किञ्चिद् दुःखमाप्नुयात् । इति तानन्वशाद्राजा नित्यमेव युधिष्ठिरः ॥ निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृद् । विपरीतश्च मे शत्रुः नियम्यश्च भवेन्नरः ॥” (म०भा०आदिपर्व २५।२,३) महाभारत में वासुदेव की महिमा और युधिष्ठिर की प्रशंसा के साथ धार्तराष्ट्रों की निन्दा भी है— “वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् । दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान् भगवानृषिः ॥” अतः धृतराष्ट्र के परमपदप्राप्ति के पश्चात् ही महाभारत का उल्लेख सङ्गत है, किन्तु गीता का प्रादुर्भाव तो युद्धारम्भ के प्रथम दिन ही हुआ था । महाभारत युद्धकाल पुराणों में कलियुग का आरम्भकाल, महाभारत-युद्धकाल और परीक्षित् का जन्मकाल एक ही माना गया है । महाभारत-युद्धकाल का पुष्ट प्रमाण निम्नोक्त है— “अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥” ( म० भा० आदिपर्व २।१३) कलियुग और द्वापर के मध्य में समन्तपञ्चक कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का युद्ध हुआ था । कलिसंवत् एवं भारतयुद्धसंवत् के रूप में वही काल कहा जाता है । ज्योतिषग्रन्थों तथा पञ्चाङ्गों के अतिरिक्त कुछ शिलालेखों में भी इसका उल्लेख है । श्रीमद्भागवत से भी उक्त काल पुष्ट होता है— “तेनैव ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् । ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ॥ यदा देवर्षयः सप्त मघासु विचरन्ति हि । तदा प्रवृत्तस्तु कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः ॥” प्रत्येक नक्षत्र पर सप्तर्षि १०० वर्ष रहते हैं। वे सप्तर्षि तुम्हारे जन्मकाल में मघा नक्षत्र पर थे और आज तुम्हारे अन्तकाल में भी मघा नक्षत्र पर ही हैं। और जब सप्तर्षि मघा पर आये हैं तभी से दिव्य (देवताओं के) १२०० वर्षों का ४ लाख बत्तीस हजार मानव वर्षोंवाला कलियुग प्रवृत्त हुआ है। इसका आरम्भ ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ३१०२ वर्ष पूर्व फरवरी मास की ८वीं तारीख के प्रातःकाल से हुआ था । इस तरह महाभारत की प्राचीनता सिद्ध होने से पाश्चात्यों एवं बुल्के का मत सुतरां खण्डित हो जाता है। जब महाभारत पाँच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है तब महाभारत में वर्णित रामायण की अत्यधिक प्राचीनता सुतरां सिद्ध होती है। पुराणवचनों के अनुसार भी २४वें त्रेता में वसिष्ठसहित राम का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी समय महर्षि वाल्मीकि का भी आविर्भाव हुआ था। इस दृष्टि से २४वें त्रेता में द्वापर की सन्धि में अर्थात् इस वर्ष से एक करोड़ सतहत्तर लाख उनचास हजार तिहत्तर १७७४९०७३ वर्ष पूर्व श्रीराम के शासनकाल में रामायण का निर्माण हुआ था। इस तरह रामायण संसार का सर्वाधिक प्राचीन आर्ष इतिहासग्रन्थ है ।
३ पृष्ठ खाली प रि शि ष्ट ( १ ) रामोपासना अथ भूशुद्ध्यादि—“देवो भूत्वा यजेद् देवान् नादेवो देवमर्चयेत्” (आह्निककारिका) के अनुसार सभी प्रकार की उपासनाओं में भूशुद्ध्यादि अपेक्षित होते हैं । स्नान, सन्ध्यादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रातःकाल पवित्र आसन पर बैठकर 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः तीन बार आचमन कर प्राणायाम करना चाहिये । रां बीज से प्राणायाम करते हुए मूलाधार में ज्योतिर्मयलिङ्ग को साढ़े तीन वलय से वेष्टित करके स्थित कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिये । ह्रीँ बीज से कुण्डलिनी को जागरित कर हृदयप्रदेश में अवस्थित प्रकाशपुञ्जमय जीव को मुख में रखकर ब्रह्मरन्ध्र में ले जाकर हंसः सोहम् इस मन्त्र से ब्रह्म के साथ जीव की एकरूपता के साथ मिलाप की भावना करनी चाहिये । दक्षिण कुक्षि में अवस्थित अधोमुख पापपुरुष का ध्यान करते हुए पूरक में यं बीज का १६ बार उच्चारण करते हुए पापपुरुष का शोषण कर कुम्भक में रं बीज का ६४ बार उच्चारण कर पाप- पुरुष को भस्म कर देना चाहिये । पुनः रेचक में ३२ बार यं बीज का उच्चारण कर पापपुरुष का भस्म बाहर निकाल देना चाहिये । ब्रह्मरन्ध्रगत चन्द्रमण्डल में अवस्थित होकर अमृतवर्षा करनेवाली अमृतेश्वरी देवी का ध्यान कर उनके शरीर से झरनेवाली अमृत-वर्षा से अपने को आप्लावित होने की भावना करनी चाहिए इसका नाम भूशुद्धि है । “ब्रह्मरन्ध्रगते चन्द्रमण्डलेऽमृतवर्षिणीम् । भवानीं भूमिशुद्धयर्थं भावयेदमृतेश्वरीम् ॥ ततस्तन्मौलिनिष्यन्दसुधाकल्लोलवृष्टिभिः । चिन्तयेन्मनसात्मानं भूमिशुद्धिरियं भवेत् ॥” अथ भूतशुद्धिः—प्राणायाम करके कुम्भक में लं वं रं यं हं इन पाँच महाभूतों के बीजों की एक आवृत्ति करके अपवादप्रक्रिया द्वारा समस्त पार्थिव प्रपञ्च पृथिवी में, पृथिवी जल में, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश अहंतत्त्व में, अहंतत्त्व महत्तत्त्व में, महत्तत्त्व अव्यक्त तत्त्व में एवं अव्यक्त तत्त्व परम सत्तत्त्व में में लीन हो गया ऐसी भावना करनी चाहिए । वं बीज से प्राणायाम करते हुए कुम्भक में अध्यारोपप्रक्रिया द्वारा पर- ब्रह्म से महदादिक्रमेण आकाश, आकाश से वायु, वायुसे तेज, तेज से जल, जल से पृथिवी और पृथिवी से सद्वासनात्मक दिव्य तेजोमय उपासनायोग्य अपना शरीर उत्पन्न कर सोहं इस मन्त्र से परब्रह्म में मिली हुई कुण्डलिनी का अवहार कर उसके मुख में स्थित जीव को हृदयदेश में रखकर मूलाधार में ज्योतिर्लिङ्ग को साढ़े तीन घेरों से वेष्टित कर अवस्थित हुई कुण्डलिनी की भावना करनी चाहिये । इसके पश्चात् आं ह्रीं क्रों तीन बीजों का उच्चारण कर 'मम प्राणा इह प्राणाः, मम जीव इह स्थितः, मम सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि, मम श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणवाक्पादपाणिपायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर हृदय प्रदेश में अङ्गुष्ठ- स्थापित कर अमुनी ते० और मनो जूति० दोनों मन्त्र पढ़ने चाहिये यह प्राणप्रतिष्ठा है ।
९०४ रामायणमीमांसा परिशिष्ट "रक्ताम्भोधिस्यपोतोल्लसदरुणसरोजारूढा कराब्जैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवमथगुणमप्यङ्कुशं पञ्चबाणान्॥ बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः॥ इस मन्त्र का उच्चारण करे। इष्टमन्त्र से पाँच प्राणायाम कर के— "अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥" इस मन्त्र का उच्चारण कर एक साथ वामपाद की एड़ी से भूतल का तीन बार ताड़न, तीन बार कर का आस्फोटन और क्रूर दृष्ट्यवलोकन एवं तालत्रय से भौम, आन्तरिक्ष तथा दिव्य सभी विघ्नों का उत्सारण करना चाहिए। पश्चात् आत्मा में देवत्व-भावना करते हुए देह में न्यास आदि करने चाहिये। अथ मातृकान्यासः— अस्य मातृकान्यासमहामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः मातृका सरस्वती देवता हलो बीजानि स्वराः शक्तयः बिन्दवः कीलकानि न्यासे विनियोगः। ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीच्छन्दसे नमो मुखे। मातृकासरस्वतीदेवतायै नमो हृदये। हल्भ्यो बीजेभ्यो नमो गुह्ये। स्वरेभ्यः शक्तिभ्यो नमः पादयोः। बिन्दुभ्यः कीलकेभ्यो नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। करसम्पुट में (अर्थात् अञ्जलि बाँधकर) सभी मातृकाओं की भावना करके तीन बार अपने सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करना चाहिये। हृदयादिन्यास और करादिन्यास में उपनीत त्रैवर्णिक प्रणव का प्रयोग कर सकते हैं। अन्य लोगों को ऐं ह्रीं श्रीं अथवा रां बीज का प्रयोग करना चाहिये। रां अं कं खं गं घं ङं आं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं तर्जनीभ्यां नमः। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं मध्यमाभ्यां नमः। रां एं तं थं दं धं नं ऐं अनामिकाभ्यां नमः। रां ओं पं फं बं भं मं औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रां अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। रां अं कं खं गं घं ङं आं हृदयाय नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं शिरसे स्वाहा। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं शिखायै वषट्। रां तं थं दं धं नं ऐं कवचाय हुम्। रां ओं पं फं बं भं मं औं नेत्रत्राय वौषट्। रां अं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः अस्त्राय फट्। ये दोनों करादिन्यास और हृदयादिन्यास करने चाहिये। इसी प्रकार "पञ्चाशद्वर्णभेदैर्विहितवदनदोःपाद्युक्कुक्षिवक्षो- देशां भास्वत्कपर्दाकलितशशिकलामिन्दुकुन्दावदाताम्। अक्षस्रक्कुम्भचिन्तालिखितवरकरां त्रीक्षणामब्जसंस्था- मच्छायकल्पामतुच्छस्तनजघनभरां भारतीं तां नमामः॥" इस मन्त्र से मातृका सरस्वती का ध्यान करके निम्नोक्त रीति से एक-एक वर्ण का अङ्गों में न्यास करना चाहिये।
संख्या १ रामोपासना ९०५
अं नमः शिरसि । आं नमो मुखे । इं नमो दक्षनेत्रे । ईं नमो वामनेत्रे । उं नमो दक्षकणे । ऊं नमो वामकर्णे । ऋं नमो दक्षनासायाम् । ॠं नमो वामनासायाम् । ऌं नमो दक्षगण्डे । ॡं नमो वामगण्डे । एं नम ऊर्ध्वोष्ठे । ऐं नमोऽधरोष्ठे । ओं नम ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ । औं नमोऽधोदन्तपङ्क्तौ । अं नमः शिरसि मुखान्ते जिह्वाग्रे । अः नमो मुखान्ते कण्ठे च । कं नमो दक्षबाहुमूले । खं नमो दक्षबाहुमध्यसन्धौ । गं नमो दक्षमणिबन्धे । घं नमो दक्षाङ्गुलिमूले । ङं नमो दक्षाङ्गुल्यग्रे । चं नमो वामबाहुमूले । छं नमो वामबाहुसन्धौ । जं नमो वाममणिबन्धे । झं नमो वामाङ्गुलिमूले । ञं नमो वामाङ्गुल्यग्रे । टं नमो दक्षोरूमूले । ठं नमो दक्षजानुनि । डं नमो दक्षजङ्घापाद- सन्धौ । ढं नमो दक्षपादाङ्गुलिमूले । णं नमो दक्षपादाङ्गुल्यग्रे । तं नमो वामोरूमूले । थं नमो वामजानुनि । दं नमो वामजङ्घापादसन्धौ । धं नमो वामपादाङ्गुलिमूले । नं नमो वामपादाङ्गुल्यग्रे । पं नमो दक्षपार्श्वे । फं नमो वामपार्श्वे । बं नमः पृष्ठे । भं नमो नाभौ । मं नमो जठरे । यं नमो हृदि । रं नमो दक्षस्कन्धे । लं नमो वामस्कन्धे गलपृष्ठे ककुदि । वं नमो वामस्कन्धे । शं नमो हृदयादिदक्षकराङ्गुल्यन्तम् । षं नमो हृदयादिवामकराङ्गुल्यन्तम् । सं नमो हृदयादिदक्षपादाङ्गुल्यन्तम् । हं नमो हृदयादिवामपादाङ्गुल्यन्तम् । लं नमो हृदयादिगुह्यान्तम् । क्षं नमो हृदयादिमूर्धान्तम् । अथान्तर्मातृकान्यासः— “आधारे लिङ्गनाभौ हृदयसरसिजे तालुमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदले द्वादशार्धे चतुष्के । वासान्ते भालमध्ये डफकठसहिते कण्ठदेशे स्वराणां हं क्षं तत्त्वार्थयुक्तं सकल दलगतं वर्णरूपं नमामि ॥ के अनुसार मूलाधार चतुर्दलकमल के चारों दलों पर वं शं षं सं इन चारों वर्णों का ध्यान करके सिद्धि- बुद्धिसहित महागणपति का स्मरण कर पञ्चोपचार मानस पूजन कर ६०० हंसः सोहम् इस अजपागायत्री मन्त्र का जप उन्हें समर्पण करना चाहिए । स्वाधिष्ठान के षट् दलों पर बं भं मं यं रं लं इन ६ बीजों का ध्यान कर उन बीजों पर अधिष्ठित महासरस्वती सहित ब्रह्मा का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें छः हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । मणिपूर में दशदलों पर डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं इन दश बीजों का ध्यान कर उनपर अधिष्ठित महालक्ष्मीसहित विष्णु का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें ६००० अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । अनाहत के द्वादश दलों पर कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं इन बीजों का ध्यान कर उन बीजों पर अधिष्ठित पार्वतीसहित परमशिव का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें छः हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । विशुद्ध के षोडश दलों पर अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः इन षोडश बीजों का ध्यान कर उनपर अधिष्ठित प्राणशक्तिसहित जीव का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उसे एक हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । आज्ञाचक्र में द्विदलपद्म पर हं क्षं इन वर्णों का ध्यान कर वहाँ अधिष्ठित ज्ञानशक्ति सहित गुरु को एक सहस्र अजपागायत्री जप का समर्पण करना चाहिये । ब्रह्मरन्ध्र से सहस्र दलों पर उक्त सभी बीजों का विंशति आवर्तन करके उनपर स्थित इष्टदेवता के लिए एक सहस्र अजपाजप निवेदन करना चाहिये । अजपाजपस्वरूप— “हकारेण बहिर्याति सकारेणाविशेत् पुनः । हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ शतानि षट् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२॥ ११४
एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥ अस्याः सङ्कल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते ॥६३॥” प्रत्येक प्राणी के श्वास लेने पर स एवं श्वास निकालने पर ह का स्वाभाविक रूप से उच्चारण होता है। हंकार उच्चारण करता हुआ श्वास बाहर जाता है एवं सकार उच्चारण करता हुआ भीतर वापस लौटता है। इसी प्रकार रा एवं म इन दोनों अक्षरों की भावना की जा सकती है। राममन्त्र के समान ही हंसमन्त्र परमेश्वर का मन्त्र है। अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार हंसः सोहं इस प्रकार अनुलोम विलोम में मैं (जीव) सः वह (परमात्मा) है और वह (परमात्मा) मैं त्वंपदलक्ष्यार्थ साक्षी रूप हूँ इत्यादि अर्थ होता है। स्वभाव से इस मन्त्र का अहोरात्र में २१ हजार ६ सौ जप हो जाता है। प्रातः नियमित समय में पूर्वोक्त विधि से भावनापूर्वक तत्तत् चक्रस्थ देवताओं को समर्पणमात्र से महान् फल होता है। उसका संक्षिप्त सङ्कल्प निम्नोक्त है—“षट्शताधिकैकविंशतिसाहस्रिकां निःश्वासोच्छ्वासरूपां अजपागायत्रीं मूलाधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तसप्तचक्रनिवासिनीभ्यो देवताभ्यो निवेदयामि। पृथक् पृथक् सङ्कल्प निम्नोक्त है—मूलाधारे रक्तवर्णे वं शं षं सं चतुरक्षरे चतुर्दलपद्मे ऐरावतवाहनस्थिते चतुष्कोणयन्त्रे लं बीजे स्थिताय कुङ्कुमवर्णाय सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये षट्शतपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। स्वाधिष्ठाने सिन्दूरवर्णे बं भं मं यं रं लं षडक्षरे षड्दलपद्मे मकरवाहनस्थिते अर्धचन्द्रयन्त्रे वं बीजे स्थिताय महासरस्वतीसहिताय ब्रह्मणे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। मणिपूरे नीलवर्णे डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशाक्षरे दशदलपद्मे मेषवाहनस्थिते त्रिकोणयन्त्रे रं बीजे स्थिताय महालक्ष्मीसहिताय विष्णवे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। अनाहतचक्रे अरुणवर्णे कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशाक्षरे द्वादशदलपद्मे हरिणवाहनस्थिते षट्कोणयन्त्रे यं बीजे स्थिताय पार्वतीसहिताय परमशिवाय षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। विशुद्धौ धूम्रवर्णे अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशाक्षरे षोडशदलपद्मे हस्ति- वाहनस्थिते शून्ययन्त्रे हं बीजे स्थिताय प्राणशक्तिसहिताय जीवाय सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं निवेदयामि। आज्ञाचक्रे श्वेतवर्णे हं क्षं द्व्यक्षरे द्विदलयद्मे नादवाहनस्थिते ॐकारान्तर्गते लिङ्गमन्त्रे स्थिताय ज्ञानशक्ति- सहिताय गुरवे सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। ब्रह्मरन्ध्रे चित्रवर्णे सहस्रदलपद्मे पञ्चाशद्भि,मातृकाभिर्विंशतिकृत्वोऽ- धिष्ठिते बिन्दुवाहनस्थिते विसर्गयन्त्रे पूर्णचन्द्रमण्डले आनन्दमहासमुद्रमध्ये चिन्मयमणिद्वीपे चित्सारचिन्तामणिमन्दिरे कल्पवृक्षाधस्तले अव्यक्तब्रह्ममर्हासिंहासने स्थिताय चिच्छक्तिसहिताय परमात्मने सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। जपप्रकारो यथा—अस्य श्रीरामषडक्षरमहामन्त्रराजस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः श्रीरामचन्द्रपरमात्मा देवता रां बीजं नमः शक्ती रामायेति कीलकम् चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। अथ ऋष्यादिन्यासः—ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीछन्दसे नमो मुखे। रामचन्द्रपरमात्मदेवतायै नमो हृदये। रां बीजाय नमो गुह्ये। नमः शक्तये नमः पादयोः। रामायेति कीलकाय नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। कुछ क्षण हंसः सोहं इस प्रकार श्वासोच्छ्वास में भावना करनी चाहिये। फिर मन्त्रजप करना चाहिये। अथ करन्यासः—रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रीं तर्जनीभ्यां नमः। रूं मध्यमाभ्यां नमः। रैं अनामिकाभ्यां नमः। रौ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
संख्या १ रामोपासना ९७७ अथ हृदयादिषडङ्गन्यासः—रां हृदयाय नमः । रीं शिरसे स्वाहा । रूं शिखायै वषट् । रैं कवचाय हुम् । रौं नेत्राभ्यां वौषट् । रः अस्त्राय फट् । उपनीत द्विजाति को ही स्वाहा का उच्चारण करना चाहिये । अन्य लोगों को नमः का उच्चारण करना चाहिये । अथ अङ्गन्यासः—रां नमो ब्रह्मरन्ध्रे । रां नमो भ्रुवोर्मध्ये । मां नमो हृदि । यं नमो नाभौ । नं नमो लिङ्गे (उदकस्पर्शः) । मं नमः पादयोः । अथ ध्यानम्— “कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितं मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं हस्ताम्बुजं जानुनि । सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवं पश्यन्तीं मुकुटाङ्गदादिविविधाकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे ॥” आनन्दसमुद्र के मध्य में चिन्मयमणिद्वीप में चित्सारचिन्तामणिमन्दिर में कल्पवृक्ष के मूल में अव्याकृत ब्रह्ममय दिव्य सिंहासन पर श्रीरामचन्द्र प्रभु विराजमान हैं। बायें करकमल को घुटने पर रखकर दाहिने से ज्ञानमयी मुद्रा धारण किये हुए अविरत वीरासन से स्थित नीलनीरद नीलकमल नीलमणि के तुल्य मञ्जुल कान्तिवाले, मुकुट, अङ्गद आदि विविध भूषणालङ्कारों से अलंकृत, दिव्य अङ्गवाले श्रीराम और उनके पार्श्व में विराजमान निर्निमेष नयनों से श्रीराम की ओर निहारती हुई करकमलधारिणी विद्युद्वर्णा भगवती सीता का हम भजन करते हैं। इस प्रकार ध्यान करके सर्वतोभद्रमण्डल में श्रीराम की अर्चा की जाती है । सर्वप्रथम सर्वतोभद्रमण्डल में मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः इस मन्त्र से पीठदेवताओं की गन्धपुष्पसमर्पण द्वारा पूजा करनी चाहिए । सर्वतोभद्रपीठ में पूर्वादि प्रदक्षिणक्रम से विमला आदि आठ शक्तियों का और मध्य में एक शक्ति का ध्यान करते हुए नमः मन्त्र से पूजन करना चाहिये । पीठे पूर्वादिक्रमेण—(१) विमलायै नमः (२) उत्कर्षिण्यै नमः (३) ज्ञानायै नमः (४) क्रियायै नमः (५) योगायै नमः (६) प्रह्वयै नमः (७) सत्यायै नमः (८) ईशानायै नमः मध्ये (९) अनुग्रहायै नमः, नमो भगवते रामाय सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठात्मने नमः, इति पुष्पासनं दत्त्वा (इस मन्त्र से पुष्प का आसन समर्पण कर ) पीठमध्ये स्वेष्टदेवं संस्थाप्य (पीठ के मध्य में भगवान् श्रीराम की मूर्ति या यन्त्र की स्थापना करके प्राणप्रतिष्ठा करके ध्यानपूर्वक पुष्पान्त पूजा करके ) प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा पुष्पैर्ध्यात्वा पुष्पान्तैरुपचारैः सम्पूज्य, देवाज्ञां गृहीत्वा आवरणपूजां कुर्यात् । इष्टदेव की आज्ञा लेकर आवरणपूजा करनी चाहिये । अञ्जलि में पुष्प लेकर— “संविन्मयः परो देवः परामृतरसप्रिय । अनुज्ञां देहि मे राम परिवारार्चनाय ते ॥” इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि अर्पण करके आवरणपूजा करनी चाहिये । (१) देववामपार्श्वे सीतायै नमः सीताश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (२) अग्निकोणे शां शार्ङ्गाय नमः शार्ङ्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (३) दक्षिणे शं शराय नमः शरश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) वामे चां चापाय नमः चापश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि दत्त्वा “अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥” पुनः पुष्पाञ्जलि दत्त्वा प्रथमावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।”
९०८ रामायणमीमांसा परिशिष्ट
केसरेषु षट्कोणे अग्निकोणं प्रारभ्य--- (१) रां हृदयाय नमः हृदयशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) नैर्ऋते रीं शिरसे स्वाहा शिरः- शक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) पश्चिमायां रूं शिखायै वषट् शिखाशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (४) वायव्ये रैं कवचाय हुम् कवचशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) ऐशान्यां रौं नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रत्रयशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) पूर्वस्यां रः अस्त्राय फट् अस्त्रशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा द्वितीयावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” षट्कोणाद् बहिरष्टदलेषु पूर्वादिप्रादक्षिण्यक्रमणेन--- (१) हं हनुमते नमः हनुमच्छ्रीपादुकां पूजयायि तर्पयामि नमः । (२) सुं सुग्रीवाय नमः सुग्रीवश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) भं भरताय नमः भरतश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) विं विभीषणाय नमः विभीषणश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) लं लक्ष्मणाय नमः लक्ष्मण श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) अं अङ्गदाय नमः अङ्गदश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) शं शत्रु- घ्नाय नमः शत्रुघ्नश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) जां जाम्बवते नमः जाम्बवच्छ्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा--- तृतीयावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” अष्टदलाग्रेषु तेनैव क्रमेण---(१) धृं धृष्टये नमः धृष्टिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) जं जयन्ताय नमः जयन्तश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) विं विजयाय नमः विजयश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) सुं सुराष्ट्राय नमः सुराष्ट्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (५) रां राष्ट्रवर्धनाय नमः राष्ट्रवर्धनश्रीपादुकां पूजयामि तर्प- यामि नमः । (६) अं अकोपाय नमः अकोपनश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) धं धर्मपालाय नमः धर्मपाल- श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) सुं सुमन्ताय नमः सुमन्तश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— चतुर्थाविरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” भूपुरे प्रवेशद्वारेषु सूर्योदयाप्रागादिषु प्रादक्षिण्यक्रमणेन—(१) लं इन्द्राय नमः इन्द्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) रं अग्नये नमः अग्निश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) मं यमाय नमः यमश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) क्षं निर्ऋतये नमः निर्ऋतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) वं वरुणाय नमः वरुणश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) यं वायवे नमः वायुश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) कुं कुबेराय नमः कुबेरश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) हं ईशानाय नमः ईशानश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (९) ईशानीप्रागन्तराले आं ब्रह्मणे नमः ब्रह्मश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (१०) निर्ऋतिवरुणान्तराले ह्रीं शेषाय नमः शेषश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं पञ्चमावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— पञ्चमावरदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।”
संख्या १ रामोपासना ९०९ भूपुरप्रवेशद्वाराद् बहिः पूर्वादिक्रमेण—(१) वं वज्राय नमः वज्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) शं शक्त्यै नमः शक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ! (३) दं दण्डाय नमः दण्डश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) खं खड्गाय नमः खड्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) पां पाशाय नमः पाशश्रीपादुकां पूजयामि तर्प- यामि नमः । (६) अं अङ्कुशाय नमः अङ्कुशश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) गं गदायै नमः गदाश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) त्रिं त्रिशूलाय नमः त्रिशूलश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (९) पं पद्माय नमः पद्मश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं षष्ठाख्यावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— षष्ठावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” इत्यावरपूजां कृत्वा धूपादि नमस्कारान्तं सम्पूज्य नमस्कुर्यात् । अथ प्रार्थना— “रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥” “वर्णलक्षं जपेन्मन्त्री तद्दशांशं सरोरुहैः । जुहुयादर्चिते वह्नौ ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ॥” श्रीसुतीक्ष्ण के प्रश्न पर अगस्त्य ने कहा था— “रामं पद्मपलाशाक्षं कालाम्बुदसमप्रभम् । स्मितवक्त्रं सुखासीनं चिन्तयेत् चिन्तिताप्तये ॥” पद्मपलाश के तुल्य नेत्रवाले नीलाम्बुदश्यामल स्मितमुख सुखासीन श्रीराम का अभीष्टसिद्धि के लिए ध्यान करना चाहिये— “रागादिक्लुषं चित्तं वैराग्येण सुनिर्मलम् । कृत्वा ध्यायेत् सदा रामं भवबन्धविमुक्तये ॥” रागादिदूषित चित्त को वैराग्य से निर्मल करके भवबन्ध विमुक्ति के लिए श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । प्रातः शुद्ध होकर विविक्त देश में ध्यान, पूजादि करने चाहिये । नाभिकन्द में उद्भूत कदलीपुष्प के तुल्य स्निग्ध वर्ण- वाले अष्टदल हृदयकमल का ध्यान करना चाहिये । श्रीराम-नाम से ही उस पङ्कज को प्रफुल्लित करके उसके पत्रों पर क्रमेण सोम, सूर्य तथा अग्निमण्डल का चिन्तन करना चाहिये । उसके ऊपर दिव्य रत्नमय उज्ज्वलपीठ या सिंहा- सन स्थापित करके उसपर कोटि-कोटिसूर्यसमप्रभ श्रीराम का ध्यान करना चाहिए । “नाभिकन्दसमुद्भूतं कदलीकुसुमोपमम् । अष्टपत्रं स्निग्धवर्णं ध्यायेद्धृदयपङ्कजम् ॥ तत्पत्रं रामनाम्नैव फुल्लं कृत्वास्य मध्यमे । भावयेत् सोमसूर्याग्निमण्डलान्यत्तरोत्तरम् ॥
९१० रामायणमीमांसा परिशिष्ट तस्योपरिन्यसेद्दिव्यं पीठं रत्नमयोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत् सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥” नीलकमल के तुल्य विशाल नेत्र और विशाल वक्षःस्थलवाले उदीयमान भास्कर के तुल्य कुण्डलों से शोभित सुन्दर वस्त्र एवं सुन्दर किरीट से युक्त, शुभ्रकपोल तथा शुचिस्मित ज्ञानमुद्रायुक्त दो भुजाओं से शोभित कम्बुग्रीव सुन्दर स्निग्ध सुचिकृष्ण श्यामल अलकावलियों से युक्त श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । नाना रत्नों से युक्त दिव्यहारों से भूषित अव्यय विद्युत्पुञ्ज के समान देदीप्यमान पीतवस्त्र और उत्तरीयवस्त्र धारण किये हुए सन्तानतरूमूल में वे दिव्य सिंहासन पर स्थित हैं। दिव्य गन्ध, अङ्गविलेपन तथा वनमाला से सुशोभित श्रीराम के वामपार्श्व में तप्तस्वर्ण- वर्ण्य लीलापङ्कजधारिणी चारुहासिनी शुभानना भूषणों से अलंकृत स्निग्ध दृष्टि से श्रीराम को निहारती हुई श्रीसीता विराजमान हैं। छत्र-चामर हाथ में लेकर श्रीलक्ष्मण उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। हनुमान्, सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद आदि वानरों से सेवित, सनन्दनादि तथा अन्य योगिवृन्दों से संस्तुत, सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ तथा योगसिद्धिप्रद श्रीराम का सदैव हृदय में ध्यान करना चाहिये । १. आवाहन— “आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥” हम उन विश्व के स्वामी जानकीवल्लभ विभु कौशल्यानन्दवर्धन प्रकृति से पर विष्णुस्वरूप श्रीराम का आवाहन करते हैं । उक्त मन्त्र से आवाहनीमुद्रा में श्रीराम का आवाहन करना चाहिये । २. आसनम्— “राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥” हे राजाधिराज, हे राजेन्द्र, हे रामचन्द्र, हे महीपते, आपके लिए रत्नमय दिव्य सिंहासन अर्पित करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । ३. सन्निधापन— “श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर नृपोत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ॥ रामचन्द्र महेश्वास रावणान्तक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत् सन्निहितो भव ॥” हे श्रीराम, हे भगवन्, हे रघुवीर नृपोत्तम, हे राजेन्द्र, जानकी के साथ आइये और हे महेश्वास सुस्थिर होकर, हे रामचन्द्र, हे रावणान्तक जब तक मैं पूजा करूँ तब तक आप सन्निहित रहिये । उक्त मन्त्र से सन्निधापनी मुद्रा से सन्निधापन करना चाहिये । ४. सम्मुखीकरण— “रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुनन्दन मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ॥” हे रघुनन्दन, हे राजर्षे, हे राजीवलोचन, हे देवेश पूजा के लिए मेरे अभिमुख हों उक्त मन्त्र से सम्मुखी- करण करना चाहिये । ५. प्रार्थना— “शरणं मे जगन्नाथः शरणं भक्तवत्सलः । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम ॥” जगन्नाथ भक्तवत्सल श्रीराम ही मेरे शरण हैं, आश्रय हैं । राजन्, श्रीराम आप ही मेरे लिए वरद हैं और आप ही मेरे रक्षक हैं उक्त मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये ।
संख्या १ रामोपासना १११ ६. पाद्य— "त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक। पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन ॥" हे त्रैलोक्यपावन, हे अनन्त, हे रघुनायक, हे राजीवलोचन राजर्षे, आप पाद्य ( पाद प्रक्षालनार्थ जल ) ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से दूर्वा, कमल, विष्णुक्रान्ता तथा विविध पुष्पों से युक्त जल श्रीराम के चरण में अर्पित करना चाहिये । ७, अर्घ्य— "परिपूर्णपरानन्द नमो रामाय वेधसे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥" हे परिपूर्णपरानन्द, सर्वोत्पादक श्रीरामरूप में आपको नमस्कार है । हे कृष्ण, हे विष्णो, आप मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से गन्ध, पुष्प, यव, सर्षप, दूर्वा, तिल, कुश, अक्षत के साथ रत्नमय स्वर्णपात्र में गङ्गादि का जल डालकर भगवान् के हस्तारविन्द में अर्घ्य प्रदान करना चाहिये । ८. आचमन— "राजराजेन्द्र देवेश शरणागतवत्सल । गृहाणाचमनं देव नित्यशुद्ध परात्पर ॥" हे देवेश, हे शरणागतवत्सल, हे नित्यशुद्ध आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से जातीफल, कङ्कोल, लवङ्ग और गन्ध से युक्त अमृततुल्यजल जाचमन के लिए प्रदान करना चाहिये । ९. मधुपर्क "ॐ (श्री) नमो वासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । मधुपर्कं गृहाणेमं राजराजाय ते नमः ॥" सत्यज्ञानस्वरूप हे राजन्, आप मधुपर्क ग्रहण करें, इस मन्त्र से रत्नपात्र में दधि, मधु और घृत रखकर रत्नमय पात्रान्तर से ढँककर मधुपर्क समर्पण करना चाहिये । फिर भगवान् से निम्नलिखित मन्त्र से प्रसन्न होने की प्रार्थना करनी चाहिये— "प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसीद सुरेश्वर । प्रसन्नो भव मे राजन् प्रसन्नो मधुसूदन ॥" १०. मधुपर्काङ्ग आचमन— "नमः सत्याय शुद्धाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । गृहाणाचमनं नाथ सर्वलोकैकनायक ॥" सत्य, शुद्ध और तत्त्वज्ञान स्वरूप भगवान् श्रीराम को नमस्कार है, हे त्रैलोक्यनायक आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से शुद्ध जल आचमन के लिए प्रदान करे । ११. स्नान— "ब्रह्माण्डोदरमध्यस्थैस्तीर्थैश्च रघुनन्दन । स्नपयिष्याम्यहं भक्त्या सङ्गृह्णाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से विविध तीर्थोदकों तथा गङ्गोदक से भगवान् श्रीराम को स्नान कराना चाहिये । १२. पञ्चामृतस्नान— "पञ्चामृतं समानीतं पयो दधि घृतं मधु । सशर्करं मया दत्तं श्रीराम प्रतिगृह्यताम् ॥" इस मन्त्र से भगवान् श्रीराम का दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पृथक् स्नान कराकर इन पाँचों को सम्मिलित कर पञ्चामृत स्नान कराना चाहिये । उसके पश्चात् उष्णोदक से स्नान कराना चाहिये ।
९१२ रामायणमीमांसा परिशिष्ट १३. वस्त्र— "सन्तप्तकाञ्चनप्रख्यं पीताम्बरमिदं हरे। सङ्गृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से तपाये हुए स्वर्ण के तुल्य दिव्य पीताम्बर आदि विविध वस्त्र सीतासहित राम को अर्पित करने चाहिये। १४. यज्ञोपवीत— "श्रीरामाच्युत यज्ञेश श्रीधरानन्त राघव । ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण रघुनायक ॥" इस मन्त्र से उत्तरीय (दुपट्टा) सहित यज्ञोपवीत अर्पित करना चाहिये । १५. नाना प्रकार के आभूषण—"किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमेखलाः । ग्रैवेयकौस्तुभोदाररत्नकङ्कणनूपुराः ॥ एवमादीनि सर्वाणि भूषणानि नृपोत्तम । अहं दास्यामि सद्भक्त्या सङ्गृहाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से दिव्यदम्पती श्रीसीताराम को किरीट, हार, केयूर, रत्नकुण्डल, मेखला, ग्रैवेयक, कौस्तुभ, सुन्दर रत्नकङ्कण, नूपुर आदि विविध आभूषण अर्पित करने चाहिये । १६. गन्ध— "प्रधानदेवनीयञ्च सर्वमाङ्गल्यकर्मणि । प्रगृह्यतां दीनबन्धो गन्धोऽयं मङ्गलप्रदः ॥" इस मन्त्र से कुङ्कुम-कर्पूरयुक्त दिव्यगन्ध (यक्षकर्दम आदि) अर्पित करना चाहिये । "कुङ्कुमागुरुकस्तूरीकर्पूरोन्मिश्रचन्दनम् । तुभ्यं दास्यामि विश्वेश श्रीराम स्वीकुरु प्रभो ॥" इस मन्त्र से दिव्य चन्दन अर्पण करना चाहिये । १७. पुष्पमाला तथा तुलसी—"तुलसीकुन्दमन्दारजातीपुन्नागचम्पकैः । कदम्बकरवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥ नीलाम्बुजैर्बिल्वदलैः पुष्पमाल्यैश्च राघव । पूजयिष्याम्यहं भक्त्या सङ्गृहाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से तुलसी, कुन्द, मन्दार
संख्या १ रामोपासना ११३ ७. श्रीविश्वामित्रप्रियाय नमः नाभिं पूजयामि ८. श्रीपरमात्मने नमः हृदयं पूजयामि ९. श्रीश्रीकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि १०. श्रीसर्वास्त्रधारिणे नमः बाहू पूजयामि ११. श्रीरघूद्वहाय नमः मुखं पूजयामि १२. श्रीपद्मनाभाय नमः जिह्वां पूजयामि १३. श्रीदामोदराय नमः दन्तान् पूजयामि १४. श्रीजलदवर्णाय नमः नासिकां पूजयामि १५. श्रीश्रुतिगोचराय नमः कर्णौ पूजयामि १६. श्रीपुण्डरीकाक्षाय नमः नेत्रे पूजयामि १७. श्रीसीतापतये नमः ललाटं पूजयामि १८. श्रीज्ञानगम्याय नमः शिरः पूजयामि १९. श्रीसर्वात्मने नमः सर्वाङ्गं पूजयामि १९. धूप— “वनस्पतिरसैर्दिव्यैर्गन्धाढ्यैः सुमनोहरैः । रामचन्द्र महीपाल धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥” इस मन्त्र से भगवान् को दिव्य धूप अर्पण करना चाहिये । २०. दीप— “ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय वेधसे । गृहाण दीपकं राजन् त्रैलोक्यतिमिरापह ॥ इस मन्त्र से दीपक निवेदन करना चाहिये । २१. नैवेद्य—हाथ धोकर नैवेद्य समर्पण करना चाहिये । “इदं दिव्यान्रममृतं रसैः षड्भिः समन्वितम् । श्रीराम राम राजेन्द्र नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ कर्पूरवासितं तोयं सुवर्णकलशे स्थितम् । गृहाणाचमनं नाथ जानक्या सह राघव ॥” कर्पूरवासित जल सुवर्णकलश में रखकर जानकी के साथ श्रीराम को अर्पण करते हैं, इस मन्त्र से आचमन कराकर शालि का भात, दाल, हजारों प्रकार के शाक, दही, बड़ी, पकौड़ी, पूड़ी, मालपूआ, खीर, रबड़ी, हलुआ, जिलेबी, गुलाबजामुन, रसगुल्ला, पञ्चामृत, मक्खन, मिश्री आदि विविध प्रकार का नैवेद्य भगवान् श्रीराम को भोग लगाना चाहिये । २२. फल— “इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥” इस मन्त्र से भगवान् श्रीराम के सम्मुख आम, जामुन, नारङ्ग, एरण्ड, कपित्थ, पनस, दाडिम, गान्धार- दाडिम, सेव, कदली आदि फल समर्पण कर सभी परिवार के सहित भगवान् श्रीराम भोजन कर रहे हैं ऐसी भावना करनी चाहिये । अन्त में 'अमृतापिधानमसि स्वाहा' से आपोशान कराकर हस्तप्रक्षालन, मुखप्रक्षालन आदि कराना चाहिये । हाथ की चिकनाई दूर करने के लिए चन्दन देना चाहिये । ११५
९१४ रामायणमीमांसा परिशिष्ट २३. ताम्बूल— "नागवल्लीदलैर्युक्तं पूगीफलसमन्वितम् । ताम्बूलं गृह्यतां राम कर्पूरादिसमन्वितम् ॥" इस मन्त्र से ताम्बूल समर्पण करना चाहिये । २४. राजोपचार— "नृत्यगीतादिवाद्यानि (?) पुराणपठनादिभिः । राजोपचारैरखिलैः सन्तुष्टो भव राघव ॥" इस मन्त्र से छत्र, चामर, व्यजन, नृत्य, गीत, वाद्य, पुराणपठनादि राजोपचार समर्पण करने चाहिये । २५. उत्तरार्घ्य— "नमस्ते जानकीनाथ रामचन्द्र महीपते । पूर्णानन्दैकरूपस्त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से उत्तरार्घ्य समर्पण करना चाहिये । २६. नीराजन— "मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे । सङ्गहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥" इस मन्त्र से आरात्रिक्य समर्पण करना चाहिये । २७. प्रार्थना— "नमो भगवते श्रीरामायाथ परमात्मने । सर्वभूतान्तरस्थाय ससीताय नमो नमः ॥ नमो भगवते श्रीमद्रामचन्द्राय व्यापिने । सर्ववेदान्तवेद्याय ससीताय नमो नमः ॥ नमो भगवते श्रीमद्विष्णवे परमात्मने । परात्पराय रामाय ससीताय नमो नमः ॥" इस मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये । २८. दक्षिणा— "कार्तिकीपूर्णिमायांन्तु रासे राधामहोत्सवे । आविर्भूता दक्षिणांशात्तेन कृष्णस्य दक्षिणा ॥ यज्ञो दक्षिणया सार्धं पुत्रेण च फलेन च । कर्मिणां फलदाता चेत्येवं वेदविदो विदुः ॥" इस मन्त्र से दक्षिणा समर्पण करना चाहिये । २९. अपराधक्षमापन— "अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ॥" इस मन्त्र से अपराधक्षमापन करना चाहिये । ३०. समर्पण— "साधु वासाधु वा कर्म यद्यदा चरितं मया । तत्सर्वं कृपया देध गृहाणाराधनं मम ॥" इस मन्त्र से यह पूजारूप शुभ कर्म भगवान् को समर्पण करना चाहिये । ३१. पूर्णता की प्रार्थना— "प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद् विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
संख्या १ रामोपासना ११५ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥ इस मन्त्र से कर्मसम्पूर्णता की प्रार्थना भगवान् से करनी चाहिए । ३२. शान्तिपाठ— "स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः । गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥ काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी । देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः ॥ अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः सन्तु पौत्रिणः । अधनाः सधनाः सन्तु जीवन्तु शरदां शतम् ॥ सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥" इस मन्त्र को पढ़कर सबके कल्याण के लिए भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए । अथाग्निमुखम्— "सूर्यग्रहणकाले तु नान्यदन्वेषितं भवेत् । सूर्यग्रहणकालेन समानो नास्ति कश्चन ॥ तत्र यद्यत्कृतं सर्वमनन्तफलदं भवेत् ।" अन्यथा गुरुशुक्रशुद्धौ शुभनक्षत्रयोगवारादिषु शुद्धाहात् प्रथमेऽहनि सङ्कल्पपूर्वकमुपोष्य अङ्कुरारोपणस्वस्ति- पुण्याहवाचननान्दीमुखश्राद्धादिपञ्चाङ्गं कर्म स्वगृह्यानुसारं विदधीत । मण्डपं निर्माय तत्र वेद्यां नीलपीतसीतासि- तैस्तण्डुलैः सर्वतोभद्रमुल्लिख्य धान्याञ्जलिद्वयं निधाय तीर्थोदपूरितं वस्त्रयुग्मवेष्टितं पञ्चरत्नसमन्वितं आम्राश्वत्थप्रसूनाढ्यं शाखाभिरुपेतं नारिकेलफलोपेतं कलशं मङ्गलैः स्थापयित्वा तत्र हरिमर्चयेत् । ऋग्यजुःसामसूक्तैः स्मातैः पौराणिकै- स्तान्त्रिकैर्वा मन्त्रैर्देवमर्चयित्वा वासःकुण्डलादिभूषणैर्ब्राह्मणान् वरयेत् । गुरुः भूतशुद्धयादिकं न्यासजातं च विधिवत् कुर्यात् । गन्धपुष्प-ताम्बूल-सद्वासो-भूषणादिकमन्नपानीयादिकं पुण्यस्त्रीभ्यो गृहस्थेभ्यो दद्यात् । रात्रौ जागरणं दिवा रात्रौ च त्रिकालं पूजयेत् । तथैव परेऽहनि विधिवद्रामं पूजयित्वाग्निकार्यं कुर्यात् । तत्रादौ मण्डप-कुण्ड-वेद्यादिकं विधिवन्निर्माय कुण्डस्थलं सम्यग्गोमयेनोपलिप्य सूपविष्टः प्राणानायम्य अनन्यधीर्मनसा मन्त्रं जपेत् । सङ्कल्प्य कुण्डे मध्यतस्तिस्रः पूर्वाग्रा उत्तराग्राश्चापरास्तिस्रो रेखाः कृत्वा षट्कोणे त्रिकोणे वा वह्निमादधीत । "प्रोक्ष्योपसार्य तत्पश्चाद् दत्त्वा विष्टरमादरात् । लक्ष्मोमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च ॥ ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।" विधिनाग्निं प्रमथ्य आहिताग्निगृहाद् वानीयाधाय कुशैः प्रज्वाल्य सम्प्रोक्ष्य क्रव्यादग्निं बहिष्कृत्य निरस्य यज्ञियैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेत् । प्राणानायम्य कुशाङ्कुरैः परिस्तीर्य स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिनामभिः पात्राण्या- साद्य इध्ममन्त्रेण तान्यपोक्ष्य पवित्रेण चोत्तानानि विधाय पुनः प्रोक्ष्य पात्रामानीय शुभाम्बुनाऽऽपूर्य तत्राक्षतान् पवित्रं च दत्वा उत्पूय उत्तरस्यां निधाय तत्र प्रणीतापात्रे विष्णुं ब्राह्मणंयुतं ब्रह्माणं च पूजयेत् । आज्यं संस्कृत्य विधिवत्स्रूक्स्रुवा- वोमिति ब्रुवन् । गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत् ।। एकैकस्य संस्कारस्य कृते तारेणाष्टावष्टौ जुहुयात् । अर्चितेऽग्नौ वौषडन्तं कर्म समाप्य कर्मान्तरं समारभ्य तदपि समापयेत् । इध्माधानादि आज्यभागौ पुनर्जुहुयात् । तत्राग्नौ वैष्णवं
९१६ रामायणमीमांसा परिशिष्ट चरुं श्रपयेत् । अत्राग्नौ साङ्गावरणं रामं पूजयेत् । समिदाज्यचरूणां प्रत्येकं षोडशाहुतीः मूलमन्त्रेण जुहुयात् । परिवारेभ्यो विनायकादिभ्यस्तिस्र आहुतीः, द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यः पुनस्तिस्र आहुतीराज्येन तत्तद्द्रव्यैश्च मनोहरै- द्वारपीठसुरेभ्यो जुहुयात् । अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः पृथक् पृथक् तिस्र आज्याहुतीर्दत्वा घृतेन स्विष्टकृतं हुत्वा जलेन विधिवत् समन्ततः परिषिञ्चेत् । प्रणीतामार्जनं कृत्वा स्ववित्तानुसारेण ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान् भोजयेत् । अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत् । एकीभूतं विचिन्त्य स्वस्तिवाचनं कारयेत् । विदुषामाशीर्वचो- भिरेधमानः हुतशेषं प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकं रामगायत्र्याभिमन्त्रितं तस्मै बलि हरेत् । इति अग्निमुखविधानम् । अथाभिषेकः—कलशस्थाय रामाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा शिष्यमुपानीय प्राणानायम्य भूतशुद्ध्यादिकं विधाय बहुभिः ब्राह्मणैः सह तं मूर्ध्नि अभिषिञ्चेत् । तत्र मन्त्राः— “सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । वासुदेवो जगन्नाथस्तथा सङ्कर्षणो विभुः ॥ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते । आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो वै निर्ऋतिस्तथा ॥ वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथाश्विनौ । ब्रह्मणा सहिता होते दिक्पालाः पान्तु ते सदा ॥ कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः । बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिर्माया निद्रा च भावना ॥ एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु तुष्टिः कान्तिः क्षमा तथा । आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधजीवसितार्कजाः ॥ ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः । देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च । देवपत्न्यो ध्रुवा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः ॥ अस्त्राणि चैव शस्त्राणि राजानो वाहनानि च । औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये ॥ सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदा नदाः । एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥” इति वशिष्ठसंहितोक्ता मन्त्रा रामार्चनचन्द्रिकायाम् । “नारायणः स्वयं रामः शिष्ये सन्निदधातु वै । सर्वंगः सर्वतोऽप्यस्ति प्रसीदतु दयानिधिः ॥ इति संस्मृत्य संस्मृत्य तज्जलैरभिषेचयेत् ।” इत्यभिषेकः । अथ मन्त्रदीक्षा— सुवासः परिधाय चन्दनाद्यवलिप्य कुण्डले अङ्गुलीयकञ्च धारयित्वा न्यसेत् । शिष्यशिरसि स्वस्य हस्तं दत्त्वा मनुमष्टोत्तरशतं जपित्वा उदकपूर्वकं मन्त्रं दद्यात् । आवयोस्तुल्यफलदो भवत्वैवमुदीरयेत् । प्रसन्नवदनो गुरुर्ज्योतिर्मयीं विद्यां शिष्ये गच्छन्तीं भावयेत् । शिष्यश्च तादृशीमागतां विद्यां भावयेत् ।
संख्या १ रामोपासना ११७ “कृतकृत्यस्तदा शिष्यः सर्वं तस्मै निवेदयेत् । यच्च यावच्च तद् भक्त्या गुरवे हृष्टचेतनः ॥ गोभूहिरण्यविपिनगृहक्षेत्रादिकं बहुः न चेदधं तदर्धं वा तद्दशांशमथापि वा ॥ अक्लेशादन्नवस्त्रादि दद्याद् वित्तानुसारतः । ब्राह्मणाशीर्वचोभिर्गुर्वाशीर्वचोभिः समेधितः कृतार्थः स्यात् ।। अथ संक्षेपतो दीक्षाप्रकारः— “मुहूर्ते सर्वतोभद्रे नवं कुम्भं निधाय च । सोदकं गन्धपुष्पाभ्यामचितं वस्त्रसंवृतम् ॥ सर्वौषधीपञ्चरत्नपञ्चपल्लवसंयुक्तम् । ततो देवार्चनं कृत्वा हुनेदष्टोत्तरं शतम् ॥ शिष्यं स्वलङ्कृतं वेद्यामुपाग्निमुपवेशयेत् । मन्त्रितं प्रोक्षणीतोयैः शान्तिकुम्भजलैस्तथा ।। मूलमन्त्रेणाष्टशतं मन्त्रितैरभिषेचयेत् । अथ सम्पादयन्मन्त्रं हस्तं शिरसि धारयन् ॥ समोऽस्त्वित्यक्षतान् दद्यादथ शिष्योऽर्चयेद् गुरुम् ।” अथ स्वधर्मनिष्ठा—“विना स्वधर्मं यत्किञ्चिद्देवताराधनादिकम् । सद्यो नश्येत् कृतं यस्मात् क्षणात्सैकतहर्म्यवत् ॥” स्वधर्म का पालन करते हुए ही देवता की आराधना करनी चाहिए । अन्यथा सैकतहर्म्य (बालू के महल) के तुल्य सब शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अथ प्रातःस्मरणम्—“ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय चिन्तयेद् रघुनन्दनम् । राम रामेति रामेति तारकाख्यं शुभं परम् ॥ श्रीपूर्वं जयमध्यस्थं द्विर्जयान्तं विचक्षणः ।” “प्रातः स्मरामि दिननायकवंशभूषणं वेदान्तवेद्यमभयं कृतराजवेषम् । वैदेहिलक्ष्मणयुतं स्वजनाभिरामं संसारसर्पगरलोपशमाय रामम् ॥ १ ॥ प्रातर्गृणामि चरितं दुरितं निहन्तुं रामस्य तस्य पलभक्षककृतान्तकस्य । यः सिन्धुबन्धकथया भवबन्धहन्ता राज्यं तनोति च विभीषणराज्यरत्या ॥ २ ॥ प्रातः करोमि कलिकल्मषनाशकर्म तच्छर्मदं भवतु भक्तिकरं परं मे । अन्तःस्थितेन सुखभानुचिदात्मकेन रामेण बाह्यगुरुदेहवता नियुक्तः ॥ ३ ॥” प्रातः सूर्यवंशभूषण, वेदान्तवेद्य, अभय, राजवेष धारण किये हुए, वैदेही और लक्ष्मण से युक्त, स्वजनाभि- राम, संसारसर्प के विष का शमन करनेवाले राम का मैं स्मरण करता हूँ । समुद्रबन्धन की कथा से भवबन्ध दूर करने वाले, राक्षसों का अन्त करनेवाले, विभीषण के राज्य की रति के कारण उसको राज्य प्रदान करनेवाले भगवान् राम के चरित्र का मैं प्रातः स्मरण करता हूँ । कलिकल्मष का नाश करनेवाला श्रीराम का कर्म मेरे लिए शान्ति तथा भक्ति देनेवाला हो । सब प्राणियों के अन्तःस्थित सुखरूप, सूर्यरूप और चिद्रूप से तथा बाहर श्रीगुरुदेहधारी राम से