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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

सव्योषेण तिलक्वाथेनामशूलं व्यपोहति । शम्बूकक्षारसहितः पक्तिशूलनिबर्हणः ॥५१॥ मूत्रयुतः कटुतिक्तकविश्वक्वाथयुतो हरतीह हि शोफम् । दारुनिशात्रिफलाक्वथिताढ्यः कामलिनां खलु मङ्गलकारी ॥५२॥ नवोद्धतस्नुहीक्षारद्रवभावितया भृशम् । हरीतक्या युतः सूतो जठरामयनाशनः । ५३॥ त्रिकटुत्रिफलामरिचप्रथितत्रिपुटीफलतैलयुतः पुरकः । मृतसूतयुतो नियतं त्वचिरात् चिरजां विनिहन्ति हि तुन्दिलताम् ॥५४॥ रसोनसिद्धेन तिलोद्भवेन तैलेन सार्द्धन्तु रसो निपीतः । वातोद्भवानत्र बहून् विकारान् निहन्ति घोरानपि वा चिरोत्थान् ॥५५॥ हरीतकी गुडूचिका जलं गुडः समं समम् । विचूर्णितेन योजितो हरेत्समीरशोणितम् ॥५६॥ विश्वभेषजरुबूकसंस्कृतः क्षीरकेण विनियोजितो रसः । गृध्रसीं हरति दीर्घकालजामन्धकारपटलीं यथा रविः ॥५७॥ शशाङ्कलेखया तथा फलत्रिकेण संयुतः । समार्कवो मृतो रसो निहन्ति वै किलासकम् ॥५८॥ कृमिघ्ननिम्बदाडिमत्रिपर्णचूर्णसंयुतः । समाक्षिकस्तु पारदो मृतो हरेत्कृमीन् द्रुतम् ॥५९॥ राजिकानलरसोननीलिकाभृङ्गराजमृदुपल्लवैः समम् । वीरवृक्षफलसंयुतं पचेत्तैलमत्र पयसा समन्वितम् ॥६०॥ अनेन तैलेन युतो रसेशः कुष्ठान्यशेषाणि निहन्ति शीघ्रम् । यथा मृगेन्द्रो वनमध्यचारी मृगानुपैतानिह निर्विशङ्कः ॥६१॥ वरोबलावाजिगन्धामोचामूलकषायकैः रसेश्वरो हरेत्कार्श्यं मासद्वयनिषेवितः ॥६२॥ सौवर्चलत्र्यूषणहिङ्गुमूत्रैर्विपाचितेनेह घृतेन युक्तः । रसेश्वरः सप्तदिनप्रयोगात् सर्वानपस्मारकफान्निहन्ति ॥६३॥ मधूकपारावतविड्-युतेन मनःशिलायाः खलु चूर्णकेन । रसाऽञ्जनाद्दारुणलक्षणान्यानुन्मादरोगान्विनिहन्ति शीघ्रम् ॥६४॥ मृतं रसेशं मधुना विलिह्य क्षौद्रान्वितं कोष्णजलं पिबेद्यः । स्थौल्यात्तु मेदःप्रभवान्नितान्तं चिरोत्थिताञ्चापि विमुच्यतेऽसौ ॥६५॥

वरागिरिजतुव्योषैः शृङ्गवेररसभावितैः । मृतः सूतो हरेत्सत्यं प्रमेहान् सकलानपि ॥ ६६ ॥ मूर्वास्वरससंयुक्तो मृतः सूतोऽतिदारुणाम् । मसूरिकां निहन्त्येव लेपनाद् भक्षणादपि ॥ ६७ ॥ कन्यामूलरसेनाथ तण्डुलीयजलेन वा । मृतः सूतो द्रुतं हन्याद् विषं स्थावरजंगमम् ॥६८॥ तण्डुलोदकसंयुक्तो यथाविधि मृतो रसः । नस्ये पाने विशेषेण विषार्तस्य प्रशस्यते ॥६९॥ गोपुरीषसलिलेन भावयेत् सप्तधेह घनसारमुत्तमम् । तद्युतः खलु मृतो रसेश्वरः स्थावरादिविषभेदनाशनः ॥७०॥ नृमूत्रपिष्टेन पुनर्नवायाः बीजेन मूलेन रसान्वितेन । मृतो रसेशः खलु लेपनेन विषं सदा वृश्चिकजं निहन्ति ॥७१॥ वन्ध्याकर्कोटकामूलफलेनापि समन्वितः । सूतः सुदारुणं हन्ति विषं स्थावरजंगमम् ॥७२॥ कपित्थफलसंयुतोऽथ खलु देवदालीयतः सधूममदनोऽथवा तु शरपुङ्खबीजान्वितः । मृतः खलु रसेश्वरो ह्यविरतं प्रलेपादिना निहन्ति भृशदारुणां प्रमदमूषिकाणां विषम् ॥७३॥ नागिनीरसपिष्टेन नागरेणोह कांस्यके समन्वितो रसो हन्याद् वृश्चिकार्ति सुदारुणाम् ॥७४॥ “रसायनं त्रिदोषघ्नी योगवाह्यतिशुक्रलः। भस्मसूतोऽखिलातङ्कनाशनस्त्वनु- पानतः ॥” इति हि प्राञ्च आहुः, तस्मादनुपानविशेषानुदाहरति दिङ्मात्रम् । पांशुरिति-पांशुः पर्पटम्, सुरसा तुलसी, सिंहिका बृहती, क्षीरवृक्षा न्यग्रोधोदुम्बरा- श्वत्थप्लक्षकवेतसपादपाः, पञ्चपल्लवं आम्रजम्बूकपित्थबीजपूरबिल्वानां पत्राणि, रसालः आम्रः, कणा पिप्पली, जलं वालकम् , वैदेही पिप्पली, शम्बूकः क्षुद्रशङ्खस्तस्य क्षारं भस्मेति यावत् , कटुः कटुकी, तिक्तकं पटोलं निम्बो वा, कटुतिक्तकं वा भूनिम्बः, विश्वं शुण्ठी, त्रिपुटीफलतैलं एरण्डस्य तैलम् , पुरकः गुग्गुलः, समीरशोणितं वातरक्तम्, रुबूकः एरण्डः, शशाङ्कलेखा सोमराजी, मार्कवो भृङ्गराज, किलासं श्वित्रम् । कृमिघ्नो विडङ्गः, त्रिपर्णा पलाशस्तस्य बीजानि ग्राह्याणि, माक्षिकं मधु । वीरवृक्षो भल्लातकः, वरी शतावरी, मोचामूलं

१६४ रसतरङ्गिणी कदलीकन्दः, अञ्जनादक्षणोरिति शेषः। घनसारं कर्पूरम्, पुनर्नवायाः बीजं मूलं रसश्च गृह्यते। नागिनीरसद्वारा कांस्यके पिष्टेन नागरेण समन्वित इति योजना ॥ ४१-७४ ॥ भा.टी.—पारदभस्म को पित्तपापड़ा तथा मोथाक्वाथ से अथवा तुलसीक्वाथ या पिप्पलीक्वाथ के साथ सेवन किया जाय तो यह ज्वर को नष्ट करता है। लाक्षाचूर्ण, हरीतकीचूर्ण या वासाचूर्ण के साथ मिलाकर मधु से सेवन करने पर रक्तपित्त रोग नष्ट होता है। कास को नष्ट करने के लिये इसको छोटी कटैलीकषाय में पिप्पलीचूर्ण मिलाकर सेवन कराना चाहिये। पाण्डुरोग में इसको त्रिफला और हल्दी के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये। भीषण अतीसार में इसको पञ्चक्षीरी वृक्षकषाय अथवा पूर्वोक्त पञ्चपल्लव के स्वरस या कषाय से सेवन कराना चाहिये। प्रवाहिका को दूर करने के लिये पारदभस्म को, आम तथा जामुन के पत्तों के रस का बाल-बिल्वचूर्ण, सौंठ तथा गुड़ मिला अग्नि में पकाकर अवलेह सा बनालें, इस अवलेह के साथ सेवन करायें। पारदभस्म को हींग और पिप्पलीचूर्ण के साथ प्रयोग करने से भयंकर विसूचिका रोग नष्ट हो जाता है इसको हरीतकीचूर्ण और काञ्जी के साथ सेवन करने से बहुत शीघ्र ही अजीर्ण नष्ट हो जाता है। पुरातन तथा नवीन अर्श रोग के लिये पारदभस्म को पुट-पक्व जीमीकन्द में तिलतैल तथा सैन्धानमक मिलाकर इसके साथ सेवन करना चाहिये। बिजौरानींबू का रस तथा सौंचल नमक के साथ इसका सेवन करने से पाँचों प्रकार की हिक्का नष्ट हो जाती है। वमन और अन्तर्दाह के लिये खीलों के चूर्ण को जल में घोलकर उसमें मिश्री तथा मधु मिलाकर इसका सेवन कराना चाहिये। क्षतयुक्त क्षय में बकरी के दूध तथा पिप्पलीकल्कसिद्ध घृत में गन्धक मिलाकर उसके साथ सेवन करने से विशेष लाभ होता है। गोक्षुरादिकषाय अथवा मसूरक्वाथ में मधु मिलाकर सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र रोग में आराम होता है। तिलों के क्वाथ में त्रिकटुचूर्ण मिला- कर इसके साथ पारदभस्म सेवन करने से आमजन्य शूल नष्ट होता है। शम्बूूक (क्षुद्र शंख घोंघा) भस्म और यवक्षार के साथ पारदभस्म परिणाम शूल को नष्ट करती है। शोथ में पारदभस्म को कुटकी तथा सौंठ के कषाय में गोमूत्र मिलाकर सेवन कराना चाहिये। दारूहल्दी तथा त्रिफलाक्वाथ के साथ पारदभस्म सेवन से कामला रोग में आराम आता है। नवीन थोहर के क्षारजल में हरीतकी की भावना देकर उसके चूर्ण के साथ पारदभस्म का प्रयोग करने से उदर रोग शान्त होते हैं। स्थूलता या मोटापा को दूर करने के लिये शुद्ध गूगल

सप्तमस्तरङ्गः १६५ न त्रिकटु, त्रिफला तथा मरिच-चूर्ण और एरण्डतैल मिलाकर खूब कूट लें जिससे यह अवलेह सा बन जाय, इसमें पारदभस्म मिलाकर सेवन करना चाहिये । लहसुन के स्वरस तथा कल्क से पकाये हुए तिलतैल के साथ पारद भस्म सेवन करने से पुराने और नवीन सब प्रकार के वातविकार नष्ट हो जाते हैं। वातरक्त रोग में पारदभस्म को हरड़ और गिलोय के क्वाथ में गुड़ मिला कर सेवन करना चाहिये । अथवा हरड़ आदि का चूर्ण करके पारदभस्म सेवन करनी चाहिये । साँठ और एरण्डबीजचूर्ण से पहिले क्षीरपाक विधि के अनुसार दुग्ध सिद्ध कर लें, अब इससे प्रतिदिन एक या दो बार पारदभस्म सेवन करने से पुरातन गृध्रसी रोग उसी प्रकार शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य से अन्धकार। बकुची, त्रिफला तथा भृंगराजचूर्ण के साथ पारदभस्म सेवन करने पर किलास (सफेद कोढ़) रोग नष्ट हो जाता है। उदरकृमियों के लिये इसको विडंग, नीम, दाडिमत्वक् , पलाशबीजचूर्ण के साथ मधु मिलाकर सेवन कराना चाहिये । त्वक् रोगों तथा कुष्ठ के लिए इसे निम्नलिखित तैल के साथ प्रयोग करना चाहिये । राई, चित्रकमूलत्वक् , लहसुन, नीममूलत्वक् , भांगरा और शुद्धभिलावा, प्रत्येक समभाग में लेकर सब तेल से चतुर्थांश तिलतैल, इनसे चौगुना अधिक तथा पाकार्थ जल तेल से चौगुना लेकर राई आदि द्रव्यों को जल के साथ पीसकर कल्क बना जल और तेल में मिला तेल पकाकर छान लें । अब इस तैल के साथ पारदभस्म का प्रयोग करें । इसके प्रयोग से सब कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हैं। शरीर की कृशता को दूर करने के लिये दो मास तक पारदभस्म को शतावरी, खरेंटी, असगन्ध और कदलीकन्द कषाय के साथ सेवन करना चाहिये । सौंचलनमक, त्रिकटु तथा हिंगु; इनका कल्क कर इसमें कल्क से चौगुना गोघृत और उससे चौगुना गोमूत्र मिलाकर घृत सिद्ध कर लें । इस घृत के साथ सात दिन तक पारदभस्म का सेवन कराने से सब प्रकार के अपस्मार रोग नष्ट हो जाते हैं । मुलेठी, कबूतर की विष्ठा तथा मनःशिला प्रत्येक समभाग ले लेकर चूर्ण करके इसमें पारदभस्म मिला आँखों में अञ्जन करने से भयंकर लक्षणयुक्त उन्माद रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । पारदभस्म को मधु में मिला चाट करके अनुपान रूप में मधुमिश्रित गुनगुना जल पीने से बहुत पुराना चर्बी बढ़ने से होनेवाला मोटापा दूर हो जाता है । त्रिफला, शिलाजीत तथा त्रिकटुचूर्ण को भांगरे के रस की सात भावना देकर इस चूर्ण के साथ पारदभस्म सेवन करने से सम्पूर्ण प्रमेह रोग नष्ट हो जाते हैं ।

१६६ रसतरङ्गिणी मूर्वास्वरस में पारदभस्म मिलाकर खिलाने और शरीर में लेप करने से मसूरिका रोग शान्त हो जाता है। स्थावर तथा जंगम विषों के प्रभाव को शरीर से दूर करने के लिये पारदभस्म को कुमारीमूलस्वरस अथवा चौलाईस्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये। विषपीड़ित मनुष्य को विष से मुक्त करने के लिए पारद भस्म को चौलाई के स्वरस में मिलाकर नस्य देना या पिलाना चाहिये। कर्पूर को गोबर के रस से सात भावना देकर इसमें पारदभस्म मिला लें, इसका शरीर में लेप करने से अनेक प्रकार के स्थावर विषों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। पुनर्नवामूल और बीजों को मनुष्य के मूत्र में पीसकर उसमें पारदभस्म मिलाकर बिच्छू के दंश पर लेप करने से विष शीघ्र उतर जाता है। बाँझक- कोड़े की मूल और फल के साथ पारदभस्म पीसकर प्रयोग करने से स्थावर तथा जंगम दोनों प्रकार के विष उतर जाते हैं। विषैले चूहों के विष को नष्ट करने के लिए पारदभस्म को कैंथ का गूदा और देवदाली के फल के साथ पीसकर लेपादि करने अथवा घर का धुँआ और मैनफलचूर्ण के साथ अथवा शरपोंखाबीज चूर्ण के साथ पारदभस्म मिलाकर निरन्तर कुछ काल तक लेप आदि करना चाहिये। काँसे के पात्र में पारदभस्म को सोंठचूर्ण मिलाकर पान के रस से पीसकर लेप करने से बिच्छू काटने की भयंकर पीड़ा नष्ट हो जाती है ॥ ४१-७४ ॥ अथ रसायनादौ पारदसेवन विधिः यद्याधिव्याधिविध्वंसि वयसः स्थापकन्तथा । मेध्यं वृष्यं तथा नेत्र्यं भेषज्यं तद्रसायनम् ॥७५॥ क्षेत्रीकृत्य निजं देहं सेवेतेह रसायनम् । विधिना मितपथ्याशी देहसिद्धिं हि बिन्दति ॥७६॥ रसायनं यः कुरुते क्षेत्रीकरणमन्तरा । देहसिद्धिर्न तस्य स्यात् प्रत्युत क्लेशकृद्भवेत् ॥७७॥ सुबीजमपि संस्कृतं कृषिविधानदत्तैरिह प्ररोहति न कर्हिचित् सुविततोषरोप्तं यथा । तथैव सुभिषग्वरैरकृतपञ्चकर्मक्रमे नरे हि न रसायनं फलति जातु संयोजितम् ॥७८॥ रसायनलक्षणं यदिति—प्रायो रसायनं मेधां बलं नेत्रशक्तिं चापि वर्धयति, यथा त्रिफला क्षेत्रीकृतेति—यथा बीजावापयोग्यं विधाय क्षेत्रं पश्चादुप्तं बीजं साधु फलतीति तथा शरीरमपि रसायनोपयोगि भवति विरेकादिशुद्धमिति दर्श-

सप्तमस्तरङ्गः १६७ यति अन्यथा तु हानिर्वर्ण्यते देहसिद्धिर्न तस्य स्यात् इति । तदेतदुक्तं सुबीजम- पीति ॥ ७५-७८ ॥ भा.टी.—जो औषधि प्रयोग करने पर शारीरिक तथा मानसिक रोगों को नष्ट करे, जिससे शीघ्र आनेवाला बुढ़ापा रुक जाय, जिससे मेधा (बुद्धि) वृद्धि, शारीरिक धातुओं की पुष्टि और नेत्रों की ज्योति बढ़ती हो उसे रसायन औषधि कहते हैं । रसायन सेवन करने के पूर्व शरीर को उपयुक्त क्षेत्र (जैसे बीज बोने के पूर्व जमीन को तैयार किया जाता है) बनाकर रसायन का विधिपूर्वक सेवन करने से और सेवनकाल में लघु अल्प पथ्याहार करने से अवश्य रसायन का फल (रोगनाश) मिलता है । जो मनुष्य अपने शरीर को रसायन सेवनोपयोगी क्षेत्र किये बिना ही रसायन सेवन करने लगता है उसे रसायन का कोई फल नहीं मिलता, किंतु इससे उसे और कष्ट हो जाता है । कृषि-विद्या के द्वारा परीक्षित और संस्कृत तथा सुन्दर नवीन बीज को यदि ऊसर जमीन में बो दिया ( उगाया ) जाय तो उसमें से किसी तरह अंकुर नहीं निकल सकता है इसी तरह यदि वैद्य बिना पञ्चकर्म ( वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन, नस्य ) किये हुए मनुष्य को रसायन सेवन कराये तो उसका कोई फल नही होगा ॥ ७५-७८ ॥ क्षेत्रीकरणस्य स्वरूपम् सञ्जातपञ्चकृत्यस्य जैत्रैर्यद् गदनाशनम् । रसायनादौ तत्प्राज्ञैः क्षेत्रीकरणमुच्यते ॥ ७९ ॥ क्षेत्रीकरणलक्षणम्—जैत्रैर्भेषजैः ॥ ७९ ॥ भा.टी.-रसायन औषधि सेवन कराने से पूर्व मनुष्य को पञ्चकर्म कराकर तत्तद्रोगनाशक औषधि सेवन करने से रोग की शान्ति कर लेना क्षेत्री-करण कहा जाता है ॥ ७९ ॥ क्षेत्रीकरणप्रक्रिया आदौ तु पञ्चकर्माणि कारयित्वा भिषग्वरः । पश्चात्सिद्धौषधैर्यत्नाद्रोगशान्तिं प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥ यदि बालः कृशः क्षीणः स्याद्रसायनसेवकः । तदा तु पञ्चकर्माणि कारयेन्न भिषग्वरः ॥ ८१ ॥ समयज्ञस्तदा युक्त्या रेचनं कारयेन्न वा । ततस्तु सिद्धभैषज्यैर्नौरुजञ्चापि कारयेत् ॥ ८२ ॥

[ १५ ] रसतरङ्गिणी सिद्धौषधप्रयोगाच्च रोगशान्तिर्यदा भवेत् । मृताभ्रमुख्ययोगांश्च तदा संयोजयेद्भिषक् ॥ ८३ ॥ क्षत्रीकृतनिजकायः कामं शाल्योदनादिपथ्याशी । लब्धबलो रसभोक्ता विदधीत रसायनं प्राज्ञः ॥ ८४ ॥ तदेतदाह-पश्चात् सिद्धौषधैर्यत्नाद्रोगशान्तिं प्रकल्पयेत्, यदाहुः-“स्निग्ध- स्विन्नविरिक्तं यन्नीरुजं सिद्धभेषजैः । एतत्क्षेत्रं समासेन रसबीजवपनक्षमम्” इति । अथ पञ्चकर्मापवादो देशकालादियोग्यतावशात् यदीति-“पञ्चकर्मभयत्रस्तैः सुकुमारैर्नरैरिह । रेचनान्ते इदं सेव्यं सर्वदोषापनुत्तये ॥” इत्यपि केचिदाहुः । समयज्ञः कालविशेषयोग्यताज्ञाता सिद्धान्तज्ञाता वा । तथा चाहुः-“मृताभ्रं भक्षयेन्मासमेनमादौ विचक्षणः । पश्चात्संयोजयेद्देहे क्षेत्रीकरणमिच्छतः ॥” इति तदेतदाह मृताभ्रमुख्ययोगांश्चेत्यादि ॥ ८०-८४ ॥ भा.टी.-रसायन सेवन कराने के लिए पहिले मनुष्य को पञ्चकर्म द्वारा शुद्ध कर लें । पञ्चकर्म के पश्चात् उचित समय तक पथ्य सेवन करायें और फिर पूर्ण सोच-विचार के साथ सिद्ध औषधियों से वर्तमान रोग को दूर करें । यदि रसायन सेवन करनेवाला मनुष्य बालक हो अथवा कृश या क्षीण हो उसे पञ्चकर्म (सम्पूर्ण) न करावें, किन्तु उसे समय के अनुसार युक्तिपूर्वक रेचन ही करायें अथवा रेचन कराना भी उचित न हो तो इसे भी न करायें । क्योंकि इससे और भी दुर्बलता बढ़ने का डर रहता है । विरेचन अथवा पंचकर्म के अनन्तर सिद्ध औषधियों के प्रयोग से उसके वर्तमान कष्ट को शान्त करें । सिद्धप्रयोग से रोगशान्ति होने के बाद उसे अभ्रकभस्म आदि के मुख्य-मुख्य योगों का सेवन करायें । उक्त क्रम से शरीर को रसायनेोपयोगी उत्तम क्षेत्र बनाते हुए शालि चावल आदि पथ्य भोजन कराने चाहिये । जब शरीर में बल आ जाय तब उसे रसायन का सेवन आरम्भ करायें ॥ ८०-८४ ॥ रसायनेोचितो रसः हिरण्यजीर्णो घनसव्वजीर्णो वज्रादिजीर्णोऽप्यथवा मृतश्च । रसायनार्थं हि रसो नितान्तं प्रशस्यते ह्यत्र रसागमज्ञैः ॥ ८५ ॥ भा.टी.-रसायनप्रयोग के लिये रसशास्त्रज्ञ लोग स्वर्णजारित या अभ्रक सत्वजारित अथवा वज्र आदि जारित पारद का अथवा केवल विशुद्ध मृत पारद का प्रयोग उत्तम मानते हैं ॥ ८५ ॥

सप्तमस्तरङ्गः १६६ रसभक्षणकालः प्रत्यूषे भक्षयेत्सूतं पथ्यं यामे तदादिमे । द्वितीययामे मतिमानश्नीयाद् भोजनं हितम् ॥८६॥ रससेवनकालक्रमः प्रत्यूष इति—हितमिति वक्ष्यमाणपथ्यानुसारि ॥ ८६ ॥ भा. टी.—पारदभस्म या पारद के योगों को प्रातःकाल से लेकर तीन घंटे के अन्दर पथ्य सेवन करें, दूसरे पहर में क्षुधा लगने पर आगे लिखे अनुसार अनुकूल भोजन खिलाना चाहिये ॥ ८६ ॥ अथ मात्राभेदः हिरण्यजीर्णसूतस्य गुञ्जार्द्धं वितरेद्भिषक् । जीर्णवैक्रान्तकस्यापि तथा मात्रां प्रकल्पयेत् ॥८७॥ जीर्णवज्ररसेशस्य गुञ्जापादः प्रशस्यते । गुञ्जेकां तु तदन्येषां मात्रां प्राज्ञः प्रकल्पयेत् ॥८८॥ तथा इति गुञ्जार्द्धकमेव ॥ ८७-८८ ॥ भा.टी.—यदि रसायन कार्य के लिये स्वर्णजारित पारद का प्रयोग करना हो तो इसकी आधी रत्ती मात्रा देनी चाहिये । इसी तरह वैक्रान्तजीर्ण पारद की भी आधी रत्ती मात्रा देनी चाहिये । यदि वज्र (हीरा ) जीर्ण पारद का प्रयोग कराना हो तो इसकी चौथाई रत्ती देनी चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य पारद योगों की मात्रा एक रत्ती तक समझनी चाहिये ॥ ८७-८८ ॥ अथ रसायनसेवनेऽपथ्यानि मिथ्याहारविहारपानसलिलक्रीडातिनिद्रादिकं कोपं दुःखमतिस्पृहामतिमुदं स्नानं तथोद्वर्तनम् । स्त्रीणां नित्यमतिप्रसंगमनिशं चिन्तामसूयां तृषां क्षुद्रोधञ्च मदं रसायनसुधासेवी सदा वर्जयेत् ॥८९॥ अतिस्पृहां अतिकामनाम् । तथा चाहुः प्राज्ञाः-‘‘अतिमानं चात्यशनमति- निद्रातिजागरम् । स्त्रीणामतिप्रसङ्गञ्च आध्मानञ्च विवर्जयेत् ॥ अतिकोपञ्चातिहर्षम- तिदुःखमतिस्पृहाम् । शुष्कवादं जलक्रीडामतिचिन्ताञ्च वर्जयेत् इति ॥ ८६ ॥ भा.टी.—रसायन-सेवनकाल में मनुष्य को मिथ्या आहार, मिथ्या विहार, द्रवपदार्थों का अधिक सेवन, नदी में तैरना तथा अधिक शयन करना, क्रोध करना, दुःखानुभव करना, किसी चीज की अत्यधिक इच्छा, सहसा अत्यधिक हर्ष,

स्नान करना, शरीर में उबटन करना, स्त्रियों के साथ सदा उठना-बैठना, सदा चिन्तित रहना या किसी से मन में कुढ़ते रहना, जल न पीकर प्यासा रहना, भूख को रोकना, मद्यपान करना त्याग देना चाहिये ॥ ८६ ॥ वक्तव्य—पूर्वोक्त अपथ्य के अतिरिक्त अधिक जागरण, अधिक भाषण, अत्यधिक भोजन, भोजन के ऊपर और भोजन करना आदि भी अपथ्य सम- झना चाहिये। रससेवने पथ्यम् शृङ्गवेराज्यधानेयजीरकैः परिसंस्कृतम् । वातिङ्गनं पटोलञ्च तण्डुलीयं च वास्तुकम् ॥६०॥ शाकं पौनर्नवञ्चापि पद्ममूलादिकन्तथा । पुराणाः शालयो गव्यं दुग्धं दधि घृतन्तथा ॥६१॥ गोधूमो मुद्गसूपञ्च तथा हंसोदकं हिमम् । रसेन्द्रस्य बुधैः प्रोक्तं पथ्यमेतत्समासतः ॥६२॥ रससेवने च पथ्यं शृङ्गवेरेति—तथा च रसार्णवे “दिवारात्रं जपेन्मन्त्रं नास- त्यवचनं वदेत् । हितं दुग्धान्नमुद्गाज्यशाल्यन्नानि सदा मतम् ॥ शाकं पौनर्नवं देवि ! मेघनादं सवास्तुकम् । सैन्धवं नागरं मुस्तां पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥ आत्मज्ञानं कथा पूजा शिवस्य च विशेषतः ॥” इत्यादि ॥ ६०–६२ ॥ भा.टी.—साधारणतः पारदभस्म या इनके योगों के सेवनकाल में बैगन, परवल, चौलाई, बथुआ, पुनर्नवापत्र, भसींड़ की सब्जी या शाकों में अदरक, धनिया तथा जीरा मसाला डालकर घी से छौंककर सेवन करना चाहिये । अन्नों में पुराने बासमती साठी आदि चावल, गेहूँ, मूंग की दाल लेनी चाहिये । स्निग्ध पदार्थों में गोदुग्ध, दही और घी का सेवन करना चाहिये । पीने के लिये जल के स्थान में हंसोदक (चन्द्रमा और सूर्यकिरणों से शुद्ध और संस्कृत भौमजल) लेना चाहिये । पारद-सेवनकाल में संक्षेप से यह पथ्यविधान बताया गया है ॥ ६०–६२ ॥ कूष्माण्डं कमठः कलिङ्गकफलं कोलं कुलत्थास्तथा कर्कोटी कतकं कपित्थकफलं वै काञ्चनीयं सुमम् । कङ्गुः काञ्जिककारवेल्लकफलं कर्कोटकः कर्कटी कौसुम्भञ्च कपोतकः खलु गणः प्रोक्तः कफारादिकः॥६३॥

सप्तमस्तरङ्गः १७१ ककारादिगणोक्तानि भेषजानि कदाचन । रसायनफलाकाङ्क्षी रससेवी न भक्षयेत् ॥६४॥ माषं मसूरकं तैलं कलायञ्च सुरासवान् । नारंगं नारिकेलञ्च धान्याम्लं निम्बुकादिकम् ॥६५॥ अनूपमांसं वेत्राग्रं नाश्नीयात्कुक्कुटांस्तथा । रम्भादले भोजनञ्च तक्रभक्तं सुवर्चलम् ॥६६॥ कांस्यपात्रे न चाश्नीयाद् गुरु विष्टम्भि भोजनम् । कट्वम्लतिक्तं तीक्ष्णोष्णं भोजनन्तु भृशं त्यजेत् ॥६७॥ कुङ्कुमालेपनं जह्यात् घनसारञ्च सर्वथा । मध्याह्ने पर्यटेन्नैव न कुर्याद् वादजल्पनम् ॥६८॥ केषाञ्चिन्मते ककाराष्टकनिषेधः कलिंगं कारवेल्लञ्च कदली काकमाचिका । कुसुम्भिका च कर्कोटी कूष्माण्डं कर्कटी तथा ॥६६॥ ककाराष्टकमेतद्धि प्रोक्तं रसविशारदैः । वर्जयेद्रससेवी च नित्यमेतत्प्रयत्नतः ॥१००॥ अथापथ्यं ककारादिगणः कूष्माण्डमिति। ककाराष्टकादिवर्जनं रसेन्द्रस्य शरीरात्स्त्रावबद्धार्थम्। यथोक्तम्—“स्रवति न यथा रसेन्द्रो न च नश्यति जाठरो वह्निः” इति। कमठः कच्छपः। कलिङ्गफलं तरबूज इति प्रसिद्धम्, काञ्चनीयं सुमं काञ्चनारपुष्पम्। धान्याम्लं काञ्जिकम्, तक्रेण सहितं भक्तं तक्रभक्तं, सुव- र्चलं सौवर्चललवणम् ॥ ६३–१०० ॥ पेठा, तरबूज, बेर, कुलथी की दाल, ककोड़ा, निर्मलीबीज, कैथ का गूदा, कचनारपुष्प, कँगनी, काञ्जी, करैला, कमलपुष्पशाक, ककोड़ाभेद, ककड़ी, कसुम्भ- पुष्पशाक, कबूतर-मांस इसको ककरादिगण कहा जाता है। इस ककारादिगणोक्त द्रव्योंको रसायनफल प्राप्त करनेके लिये पारद-सेवनकाल में मनुष्य को कभी नहीं सेवन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त नारंगी, नारियल, काञ्जी, नीबू आदि अम्ल- द्रव्य, अनूप (जलप्रधान देश) देशीयमांस, बेंत की कोपल, और मुर्गमांस भी नहीं खाना चाहिये। केले के पत्ते में भोजन मठा और भात मिलाकर भोजन, साँचल नमक का सेवन तथा कांसे के पात्र में भोजन, गुरु, विष्टम्भि भोजन अथवा कटु अम्ल तिक्तरस तथा तीक्ष्ण उष्णगुण भोजनों का सेवन बिलकुल नहीं करना

१७२ रसतरङ्गिणी चाहिये । शरीर में केसर तथा कपूर का लेप नहीं करना चाहिये । दोपहर को तेज धूप में नहीं घूमना और व्यर्थ वाद-विवाद भी नहीं करना चाहिये ॥ ६३-६८ ॥ किन्हीं रस वैद्यों के विचार से तरबूज, करेला, कदलीफल, मकोय ( बरै ), ककोड़ा, पेठा तथा ककड़ी ये आठ द्रव्य ककाराष्टक में लिये जाते हैं। इनका पारद-सेवन करनेवाले को अच्छी तरह त्याग करना चाहिये ॥ ६६-१०० ॥ वक्तव्य—ककाराष्टक त्याग करनेके विषय में अन्यत्र यह कारण दिया है कि ककाराष्टक के सेवन से शरीर में से मलमूत्रादि के रूप में पारद का अधिक स्राव होता है जिससे पारद का प्रभाव अच्छी तरह शरीर में नहीं हो सकता है—"स्रवति न यथा रसेन्द्रो न च नश्यति जाठरो वह्निः” । अथ रसवैकृतौ सुखाचारः शिशिरसलिलसेकस्तापसन्तप्तकाये मलयजघनलेपश्चोत्तमांगे निकामम्। सुरभिहिमसमीरे मन्दमन्दप्रचारो हिमकरकरसंगः काव्यगाथाप्रसंगः ॥१०१॥ उरसि भवति तापे शीततोयावगाहो मनसि मलिनतायामासवारिष्टपानम् अनिशमिह तृषायां नारिकेलीयनीरं त्वपि हि झटिति सेव्यं शीतलं यच्च पथ्यम् ॥१०२॥ गुडूचिकोशीरकधान्यकानां मधुस्रवार्पटचन्दनानाम् । तुगासिताचूर्णयुतः कषायो रसोद्भवं तापगदं निहन्यात् ॥१०३॥ विद्रुमो रंगकं तुल्यमेतत् द्वयं रङ्गपादो न्मतं काञ्चनं मौक्तिकम् । वंशजातन्त्रिकासत्त्वयुक्तं समं भक्षयेद्वारिभिस्तत्र कूष्माण्डजैः॥१०४॥ रसविकारे चिकित्सामाह शिशिरेति—मलयजश्चन्दनम्, हिमकरकरसङ्गः चन्द्रकिरणसंपर्कः, मधुस्रवा = मधुयष्टिः, वंशजा = वंशलोचना, तन्त्रिकासत्त्वं गुडूचीसत्त्वम् ॥ १०१-१०४ ॥ भा.टी.—पारदभस्म या पारदयोगों के सेवनकाल में कुपथ्य होने पर शरीर में ताप की वृद्धि से शरीर बहुत गरम हो जाय तो रोगी के शिर में शीतल जल सिञ्चन करना चाहिये, साथ ही इसके बाद माथे में चन्दन का गाढ़ा लेप

सप्तमस्तरङ्गः १७३ भी कर देना चाहिये । और सम्भव हो तो रोगी को सुगन्धित शीत तथा मन्दवायु में धीरे-धीरे घुमाना चाहिये और रोगी को चन्द्रमा की शीतल चाँदनी में बैठाकर सुन्दर काव्य की कथायें सुनानी चाहिये । यदि रोगी की छाती में अत्यधिक गर्मी मालूम पड़ती हो तो उसे ठंडे जल के टव में बैठाकर स्नान कराना चाहिये । यदि मानसिक शक्ति दुर्बल मालूम पड़ती हो तो उसे द्राक्षा- सव, अश्वगंधारिष्ट आदि बलदायक आसवारिष्ट पिलाने चाहिये । हर समय अत्यधिक प्यास लगने पर उसे कच्चे नारियल का जल पिलाना और दूध, भात, मिश्री, मक्खन आदि शीत पथ्य देना चाहिये । शरीर के दाह तथा ताप को कम करने के लिये गुडूची, खस, धनियाँ, मुलेठी, पित्तपापड़ा और लालचन्दन; इनका कषाय बना उसमें वंशलोचन तथा मिश्री चूर्ण मिला थोड़ा-थोड़ा करके पिलाना चाहिये । अथवा प्रवालभस्म और वंगभस्म एक-एक भाग, स्वर्णभस्म और मुक्तापिष्टी प्रत्येक चौथाई भाग, वंशलोचन तथा गुडूचीसत्त्व एक-एक भाग मिलाकर इसमें से एक रत्ती से दो रत्ती मात्रा में पेठे के जल के साथ देना चाहिये ॥ १०१-१०४ ॥ अमूर्च्छितामृतसूतभक्षणजन्यक्लेशो गन्धकविधानम् आज्यदुग्धौषधैः शोधितं गन्धकं मात्रया युक्तितो नागवल्लीरसैः । पारदक्लेशितो भक्षयेत्सन्ततं यान्ति दोषा द्रुतं शान्तिमेकान्ततः॥१०५॥ औषधैः भृङ्गराजादिभिः, मात्रया यथोचितया ॥ १०५ ॥ भा.टी.—अमूर्च्छित तथा अमृत (ठीक भस्म न हुआ) पारद के सेवन से उत्पन्न होनेवाले विकारों को दूर करने के लिये, घी और दूध में शोधित गन्धक को योग्य मात्रा में लेकर पान के रस के साथ खिलाने से (दो चार दिन निरन्तर खिलाने से) पारदजन्य सम्पूर्ण विकार शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ॥ १०५ ॥ कूष्माण्डादिगणः कूष्माण्डम्तुलसी लाक्षा खण्डश्च शतपुष्पिका । लवंगं वत्सनाभश्च तण्डुलीयस्य मूलकम् ॥१०६॥ कूष्माण्डादिगणो ह्येष पूर्वाचार्यैर्निरूपितः । अमूर्च्छितामृतरसविकारकुलकण्डनः ॥१०७॥ कूष्माण्डादिगणोत्थैर्द्विगुणेनैकेन गन्धकम् । माषद्वयं भक्षयित्वा ततो गव्यं पयः पिबेत् ॥१०८॥ पारदस्य विकारा ये भेषजानां शतैरपि । शान्ति न यान्ति तत्रेमं योगं दद्याद्भिषग्वरः ॥१०६.॥

१७४ रसतरङ्गिणी काकमाचीरसः पीतः प्रत्यहं तोलकोन्मितः । निहन्ति मासमात्रेण विकारान् दुष्टसूतजान् ॥११०॥ नागिनीदलकल्केन युक्तेन सुरसाद्रवैः । गात्रलेपाय वितरेद् गन्धं रसचिकित्सकः ॥१११॥ इति पारदमारणविज्ञानीयो नाम सप्तमस्तरङ्गः कूष्मांडादिगणः—शरीरांत् पारदावशेषांशपातनोपयोगी निर्दिष्टः । खंडः सितशर्करा, वत्सनाभो विषविशेषः । एतद्गणसेवनप्रकारः कूष्माण्डादिगणो- द्दिष्टेति । जैत्रेणैकेन अन्यतमोषधेन । स्पष्टमन्यत् । "यद्यज्ञानात्कथमपि नागादि- कलङ्कितो रसो भुक्तः । तत्स्त्रावणाय विज्ञः पिवेच्छिफां कारवेल्लिभवाम् ॥" इत्यप्याहुः ॥ १०६–१११ ॥ भा.टी.—पेठा, तुलसी, लाख, खांड, सौंफ, या गुलाब के फूल, लौंग, वत्सनाभविष, चौलाई की जड़; इनको-पूर्वाचार्यों ने कूष्माण्डादिगण कहा है। यह गण (औषधियाँ) अमूर्च्छित और अमृत-पारदभक्षणजन्य सम्पूर्ण विकारों को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त कूष्माण्डादिगणोक्त औषधियों में किसी एक औषधि के साथ दो माशे शुद्ध गन्धक खिलाकर अनुपान में गाय का दूध पिलायें तो इसके द्वारा वे पारदविकार, जो सैकड़ों औषधियों से भी अच्छे न हुए हों, तो भी शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। यदि शरीर से अशुद्ध पारद का विष कुछ अंश में रह गया हो तो ऐसी अवस्था में एक मास तक मकोय का स्वरस एक तोला मात्रा में प्रतिदिन पिलाने से उसके सब बचे हुए अंश बाहर निकल आते हैं। यदि अशुद्ध पारद के सेवन से शरीर में फोड़ा-फुन्सी आदि विकार उत्पन्न हो गये हों तो पान के पत्ते तुलसी के रस में गन्धक पीसकर सारे शरीर में लेप करें। इससे त्वक्-रोग शान्त हो जाते हैं ॥ १०६–१११ ॥ नोट—दुष्टपारद या नाग आदि दोषयुक्त पारद के सेवन से होनेवाले विकारों में करेले की जड़ घोटकर पिलाने से भी शीघ्र आराम आता है। यह पारदमारणविज्ञानीय नाम सप्तम तरङ्ग समाप्त हुआ। —:०:— अथ गन्धकविज्ञानीयोऽष्टमस्तरङ्गः अथ गन्धकनामानि गन्धको गन्धपाषाणः गन्धी च रसगन्धकः । सुगन्धिको गन्धिकश्च गन्धः सौगन्धिकस्तथा ॥१॥

षष्ठस्तरङ्गः १७५ पूतिगन्धोऽतिगन्धश्च पामारिः कीटनाशनः । बलिर्बलिवसाख्यश्च कुष्ठारिः शरभूमिजः ॥२॥ शुल्बारिर्नवनीतश्च दैत्येन्द्रो गन्धमादनः । कीटघ्नः क्रूरगन्धश्च स एव परिकीर्तितः ॥३॥ तत्रादौ गन्धकनामानि रसतन्त्रव्यवह्रियमाणानि ॥ १-३ ॥ भा. टी.—रसतन्त्र के व्यवहार में आनेवाले गन्धक के निम्नलिखित नाम पाये जाते हैं—गन्धक, गन्धपाषाण, गन्धी, रसगन्धक, सुगन्धिक, गन्धिक, गन्ध, सौगन्धिक, पूतिगन्ध, अतिगन्ध, पामारि, कीटनाशन, बलि, बलि-वसा, कुष्ठारि, शरभूमिज, शुल्बारि, नवनीत, दैत्येन्द्र, गन्धमादन, कीटघ्न, क्रूरगन्ध ये सब नाम गन्धक के हैं ॥ १-३ ॥ अथ गन्धकस्वरूपम् निर्मलस्तु रजनीसमप्रभो दीप्तिमांश्च नवनीतकोमलः । कीर्तितो ह्यमलसारसंज्ञको गन्धको रसरसायने वरः ॥४॥ रजनीसमप्रभः पीतवर्णः । अत्र हि चतुर्धा प्राग्भिर्निर्दिष्टो गन्धको न व्यव- हृतः भेदान्तराणामप्राप्यत्वात् । "पुरागन्धक" भेदस्तु रसायनानुपयुक्तत्वान्नोक्त इति ज्ञेयम् । गन्धस्य खटिकारूप आयुर्वेद्प्रकाशकारोक्तो निर्गन्ध एवेति नासौ गन्धक इति विभावयन्तु विज्ञाः ॥ ४ ॥ भा.टी.—गन्धक की चतुर्विध जाति में से प्रायः सर्वोपलब्ध आमलासार गन्धक साफ, हरिद्रा के समान कांतिवाला, चमकीला, मक्खन सदृश-कोमल होता हैं। यही आंवलासार गंधक रस तथा रसायनप्रयोगों में उत्तम माना जाता है ॥४॥ वक्तव्य—यद्यपि तन्त्रान्तर में श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार प्रकार का पाया जाता है, परन्तु इनमें से रक्त तथा कृष्ण वर्ण गन्धक के अप्राप्य होने से इनका वर्णन न करके केवल आंवलासार गंधक का ही यहाँ पर वर्णन किया गया है । बाजार में पाया जानेवाला नैतुआगंधक भी आंवला- सारगंधक का ही मिश्रण होने से पृथक् वर्णन नहीं किया गया । अशोधितगन्धकदोषनिरूपणम् अशोधितः सुगन्धिकस्तनौ तनोति तापकम् । भृशञ्च चित्तविभ्रमं करोति रक्तजान् गदान् ॥५॥ प्रसन्नतां सुरूपतां शरीरबन्धचारुताम् । प्रभां बलञ्च नाशयत्यतो विशोधयेत्तु तम् ॥६॥

१७६ रसतरङ्गिणी अशुद्धगन्धकस्य सविषत्वात् तत्सेवनाद् विकारास्तनुतापादयः स्पष्टाः॥५-६॥ भा.टी.—अशोधित गन्धक का सेवन करने से शरीर का ताप बढ़ जाता है जिससे चित्त में व्याकुलता तथा शरीर में रक्तविकृतिजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीरगठन, सौन्दर्य, कान्ति तथा बल का नाश हो जाता है। अतः इसको शुद्ध करके ही अन्त:प्रयोग करना चाहिये ॥५-६॥ अथ गन्धकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः दीप्तानलायां सुचिरं हसन्त्यां संस्थापयेन्निर्मललोहपात्रम् । आज्यं विशुद्धं त्वथ गन्धतुल्यं विनिक्षिपेत्तापयितुं रसज्ञः ॥७॥ आज्यं सुतप्तं तु विलोक्य तस्मिन् क्षिपेत्समानं खलु गन्धचूर्णम् । मन्दानलेनाथ विपच्यमानं विद्रावयेद् गन्धकमामयज्ञः ॥८॥ दुग्धपूर्णोदरं पात्रं तनुवस्त्रेण रोधयेत् । विद्रुतं गन्धकञ्चाथ तनुवस्त्रोपरि क्षिपेत् ॥९॥ सारयेद्विधिना गन्धं दुग्धमध्ये यथा पतेत् । दुग्धमध्यगतं गन्धं सम्यक् प्रक्षालयेत्ततः ॥१०॥ एवं वारद्वयं पक्त्वा दुग्धेऽन्यस्मिन् पुनः क्षिपेत् । एवं त्रिवारं संशुद्धो गन्धको विमलो भवेत् ॥११॥ अनेनैव विधानेन शतवारं विशोधितः । गन्धको निजगन्धन्तु जहातीह न संशयः ॥१२॥ हसन्त्यां अङ्गारधानिकायाम् । अत्र दुग्धमत्यन्ततप्तं ग्राह्यमन्यथा शीतदुग्धे निर्वापणेन ससुषिरं आज्यदुग्धान्वितं गन्धं जायते । अत्युष्णे क्षिप्तन्तु कठिनब- न्धमसुषिरं आज्यदुग्धरहितञ्चेति विशेषः । अत्र च गन्धकवर्णरक्षा मन्दानल- पाकाद्विधेया, अन्यथा खरपाके गुणवर्णहानी भवतः इति ॥७-१२॥ भा.टी.—गन्धकशोधन के लिये कोयलों की आगवाली अँगेठी में एक साफ लोहपात्र या लोहे की कढ़ाई रखें, अब इसमें गन्धक के बराबर भाग शुद्ध घी डालकर गरम करें। जब घी अच्छी तरह खूब इसमें गरम हो जाय तो इसमें घी के समभाग गन्धक का चूर्ण डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकाते हुए गन्धक को पिघलायें। अब इस पिघले हुए गन्धक को, एक पात्र में दूध भर उसके मुख पर एक बारीक छानने के योग्य कपड़ा बांध दें और इसके ऊपर डाल दें। दूध में पड़े हुए गन्धक को निकाल गरम जल से अच्छी तरह धो लें और फिर

१२ अष्टमस्तरङ्गः १७७ उक्त विधि से पिघलाकर दूसरे नूतन दुग्धवाले पात्र में डाल दें। इस प्रकार तीन बार पिघलाकर दूध में डालें तो गन्धक शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार यदि गन्धक को सौ बार पिघलाकर दूध में डाला जाय तो उसमें गन्धक की गन्ध नहीं रहने पाती है ॥ ७-१२ ॥ वक्तव्य—पात्र में दूध गरम होना चाहिये, ठंढ़े दूध में गन्धक डालने से उसके छिद्रों में दूध और घी भर जाता है जो गन्धक को सुगन्धित कर देता है। तेज अग्नि में गन्धक पिघलाने से गन्धक जल जाता है और उसका वर्ण कुछ काला पड़ जाता है। अत्यधिक पक जाने पर वह खरपाक होने से औषधि के काम का नहीं रहता है। द्वितीयः शोधनप्रकारः दुग्धपूर्णोदराद्धें तु घृतपात्रे विनिःक्षिपेत् । तन्मुखं तनुवस्त्रेण त्वहतेनाथ रोधयेत् ॥१३॥ चूर्णीकृतं गन्धकञ्च वसनोपरि विन्यसेत् । आच्छादयेच्च विधिना खर्परेणाथ गन्धकम् ॥१४॥ सवस्त्रकुट्टितमृदा तयोः सन्धिं निरोधयेत् । आकण्ठं भाजनं गर्ते निधाय भिषजाग्रणीः ॥१५॥ वन्योपलैस्तु ज्वलनं ज्वलयेद् भाण्डमूर्धनि । एवं तु विद्रुतो गन्धो दुग्धे पतति तत्क्षणात् ॥१६॥ गन्धं शीतं सुविज्ञाय क्षालयेत्सलिलेर्भृशम् । एवमैकेन वारेण गन्धकः निर्मलो भवेत् ॥१७॥ अथ द्वितीयः शोधनप्रकारः। दुग्धपूर्णोदराद्धें तु इत्यादिना—अहतेन नवी- नेन स्वच्छेन च। सलिलैरिति उष्णसलिलैः क्षालनं दुग्धादिमन्धनाशाय नैर्म- ल्याय च इति एवं शोधनफलञ्च—“एवं विशोधितो गन्धः पाषाणानम्बरे त्यजेत्। घृते विषं तृणाकारं दुग्धे शुद्धिमुपैति च ॥” इत्याहुः प्राञ्चः ॥१३-१७॥ भा.टी.—एक पात्र में आधा दूध भरकर उसमें घृत डाल दें और पात्र के मुख को एक बारीक बिना फटे हुये वस्त्र से ढककर अच्छी तरह बांध दें, अब इस कपड़े पर गन्धकचूर्ण डालकर एक मिट्टी के खर्पर अथवा तवे से इस गन्धक को ढककर दुग्धपात्र और ढक्कन की सन्धि को गाढ़ी मिट्टी और कपड़े से लेप कर दें अब इस पात्र को गले तक एक गढ़े में गाड़कर तवे के ऊपर जंगली उपलों से अग्नि जलायें। इस प्रकार ऊपर के अग्निताप से गन्धक पिघल कर

७८ | रसतरङ्गिणी

शीघ्र ही दूध में जा गिरता है। जब पात्र का गन्धक ठंडा हो जाय तो इसे निकालकर गरम जल से धो डालें। इस प्रकार एक ही बार में गन्धक शुद्ध हो जाता है ॥ १३-१७ ॥ वक्तव्य—दूधवाले पात्र के मुख पर कपड़ा बाँधकर पात्रमुख के किनारों पर चारों तरफ एक या दो अंगुल ऊँची गोल गारे की दीवार सी बना लें, अब इसके ऊपर तवा या थाली टिकाकर इसको अच्छी तरह से कपड़मिट्टी कर दें। पात्र में घृत गन्धक के समभाग डालना उत्तम होता है। इस प्रकार से शुद्ध किया हुआ गन्धक छोटे-छोटे दानोंवाला मुक्ताकार होता है । तृतीयः शोधनप्रकारः सार्षपं तिलजं वापि कौसुम्भं तैलमुत्तमम् । कटाहे निक्षिपेद्युक्त्या वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥१८॥ तैलं सुतप्तं विज्ञाय तत्समं गन्धचूर्णकम् । तैले विनिक्षिपेत्प्राज्ञः पचेन्मन्दाग्निना बलिम् ॥१९॥ विद्रुतं तु बलिं ज्ञात्वा द्रुतं क्षीरे बिनिक्षिपेत् । प्रक्षालयेत्तत्तस्तोयैर्विशुद्धो जायते बलिः ॥२०॥ अथ तृतीयः-तैलद्वारा गन्धकशोधनं तत्तद्विशेषयोगयोग्यताथम् ॥१८-२०॥ भा.टी.—सरसों अथवा तिलों के तेल को अथवा बरें के तेल को एक कढ़ाई में डालकर चूल्हे पर रखकर अग्नि जलावें। जब तेल गरम हो जाय तो उसमें तेल के बराबर भाग का चूर्ण डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकावें। जब गन्धक पिघल जाय तो उसे शीघ्र ही एक पात्र में रखे हुये दूध में डाल दें। ठंडा होने पर गन्धक को निकाल कर गरम जल से धोकर सुखा लें ॥ १८-२० ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः विधाय चूर्णं गन्धस्य द्रावयेल्लोहभाजने । भृङ्गराजरसे क्षिप्त्वा क्षालयेच्चाथ वारिभिः ॥२१॥ अनेनैव विधानेन सप्तवारं विशोधयेत् । भोक्तुं पृथक् त्रिवारन्तु योगार्थं भिषजां वरः ॥२२॥ चतुर्थः शोधनप्रकारो-भृङ्गरसादिना पर्पट्याद्युपयोगी व्याख्यायते ॥२१-२२॥ भा. टी.—गन्धक के चूर्ण को एक लोहे के पात्र में पिघलाकर भृंगराज के स्वरस में डाल दें जब ठंडा हो जाय तो उसे निकाल गरम जल से धोकर पुनः

उक्त पात्र में गरम करके भृंगराजस्वरसं में डालें । इस प्रकार सात बार पिघला कर भांगरे के स्वरस में डालने से वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार सात बार शुद्ध किया हुआ गन्धक पर्पटी आदि योगों में डालने के काम आता है॥२१-२२॥ खल्वे सौगन्धिकं क्षिप्त्वा दृढं सम्पे षयेत्ततः । श्लक्ष्णचूर्णं ततो ज्ञात्वा चतुष्पलमितं बलिम् ॥२३॥ यन्त्रे डमरुसंज्ञे च पचेद्यामचतुष्टयम् । ऊर्ध्वलग्नं बलिं पीतं यत्नतो ह्यवतारयेत् ॥२४॥ एवं संशोधितो गन्धः शुद्धमायात्यनुत्तमाम् । पाषाणादिकदोषांश्च सर्वथा विजहात्ययम् ॥२५॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः—निःस्नेहोज्ज्वलः स्वर्णवङ्गान्तर्धूममकरध्वजादिनि- र्माणोपयोगी । अत्र मध्याग्निना पाकः प्रायः, यतो मन्दाग्निना नोर्ध्वं लगति गन्धः ॥ २३-२५ ॥ भा.टी.—एक खरल में गन्धक डालकर उसे खूब अच्छी तरह से पीस लेवें, जब इसका बारीक चिकना-सा चूर्ण हो जाय तो इसमें से चार पल प्रमाण गन्धक लेकर डमरुयंत्र में डालकर सन्धलेप करके चार पहर मध्यम- मध्यम अग्नि से पकावें । चार पहर के बाद स्वांगशीतल होने पर यंत्र को खोल कर ऊपर के पात्र के भीतर लगेहुए पीतवर्ण गन्धक को सावधानी से निकाल लें । इस प्रकार शुद्ध करने से गन्धक विशेष रूप से शुद्ध माना जाता है । क्योंकि इसमें पाषाण आदि उड़कर नहीं जा सकते हैं । यह साफ और दूध- या घी के संयोग से रहित होता है ॥ २३-२५ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः दग्धचूर्णोपलस्येह भागमेकं समाहरेत् । त्रिगुणे सलिले चाथ युक्त्या निर्वापयेद् भिषक् ॥२६॥ भागद्वयं गन्धकस्य त्रयोदश जलस्य च । भागान् संगृह्य चुल्ल्याञ्च निधाय द्रावयेद् भृशम् ॥२७॥ कपिलाभं ततो ज्ञात्वा सारयेत्पृथुवाससा । मृत्पात्रे काचलिप्ते वा काचपात्रे निधापयेत् ॥२८॥ शीतलञ्चाथ विज्ञाय लवणद्रावकं भिषक् । शनैः शनैः क्षिपेद्यावद् गन्धकस्तु पतत्यधः ॥२६॥

१८० रसतरङ्गिणी अधःस्थं गन्धकं ज्ञात्वा जलांशमन्यभाजने । स्थापयित्वा ततो गन्धं क्षालयेत्सलिलैर्भृशम् ॥३०॥ सौगन्धिकं विशोष्याथ श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत् । एवं संशोधितं गन्धं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३१॥ षष्ठः शोधनप्रकारो नव्यपरिभाषासम्मतः। दुग्धेति—चूर्णोपलं सुधापाषाणम्। जलस्य चूर्णोदकस्य, लवणद्रावकं वक्ष्यमाणनिर्माणप्रकारम्, स्पष्टमन्यत्॥२६-३१॥ भा.टी.—अनबुझा चूने का पत्थर एक भाग लेकर इसको तीन भाग जल में बुझा लें, जो स्वच्छ जल ऊपर आये उसे युक्ति से पृथक् कर लें। इस प्रकार प्राप्त किया हुआ चूने का पानी तेरह भाग और गन्धक दो भाग लेकर दोनों को एक पात्र में डालकर चूल्हे में तीव्र अग्नि से पिघलायें। जब गन्धक और जल अग्निताप से कपिल वर्ण का दिखाई दे तो इसे एक मोटे कपड़े से छान एक कांचलिप्त मिट्टी के पात्र में अथवा कांच के पात्र में रख दें। जब यह ठंडा हो जाय तो इसमें धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके लवणद्रावक मिलायें जब तक कि सब गन्धक नीचे बैठ जाय। गन्धक के नीचे बैठने पर ऊपरी जलीयांश को एक दूसरे पात्र में अलग कर लें। और गन्धक को अच्छी तरह कई बार धोयें और सुखाकर इसका सूक्ष्म चूर्ण करके रख लें। इस प्रकार शुद्ध किये हुये गन्धक को बिना संकोच के योगों से काम लावें ॥ २६-३१ ॥ अथ सुधालवणम् पृथक् कृतं जलांशन्तु संशोष्याथ विचूर्णयेत् । सुधालवणमित्युक्तं रक्तस्रुतिहरं परम् ॥३२॥ सुधालवणम्—सुगमम् ॥ ३२ ॥ भा.टी.—गन्धक के ऊपर से पृथक् किये हुये जलीयांश को सुखाकर चूर्ण कर लें, इसी को सुधालवण कहते हैं। यह प्रयोग करने पर शरीर के रक्त-स्राव को बन्द करने में उत्तम माना जाता है ॥३२॥ अथ गन्धकस्य गन्धनाशनप्रकारः सुगन्धिकं विचूर्णीतं पचेत्तु दुग्धमध्यगम् । यदा घनत्वमाप्नुयात्तदा सुवर्चलारसम् ॥३३॥ क्षिपेदथो पुनः पचेच्छनैः शनैर्भिषग्वरः । जले फलत्रिकोद्भूवे विनिक्षिपेत्ततो बुधः ॥३४॥

अष्टमस्तरङ्गः १८१ स्वगन्धमत्र गन्धको जहात्यशेषतो द्रुतम् । चिराशनार्थमीदृशं बलिं नियोजयेद्भिषक् ॥३५॥ गन्धकगन्धनाशनप्रकारः सफलः । सुवर्चला सूर्यभक्ता "हुरहुर" इति ख्याता, चिराशनार्थमेतादृशंबलिं प्रयोजयेत् ॥ ३३-३५ ॥ भा.टी.—गन्धक का चूर्ण करके दूध में डालकर पकाने पर जब वह गाढ़ा हो जाय तो इसमें हुलहुल का स्वरस डालकर इसे पुनः धीरे-धीरे मन्द-मन्द अग्नि में पकाकर त्रिफलाक्वाथ में डालकर ठंडा कर लें । इस प्रकार पिघलकर सुवर्चला रस और त्रिफलाक्वाथ से शुद्ध होने से गन्धक अपनी स्वाभाविक सम्पूर्ण गन्ध को छोड़ देता है । इस तरह शुद्ध ( गन्ध दूर की हुई ) की हुई गन्धक चिरकालतक खाने के काम आती है ॥ ३३-३५ ॥ अथ विशुद्धगन्धकस्य गुणाः गन्धः शुद्धो गर-विषहरः क्षुद्रकुष्ठेभसिंहः कासं श्वासं हरति नितरां दद्रुदावानलश्च । आधिव्याधिप्रशमनपटुः काममामं निहन्यात् दिव्यां दृष्टिं वितरतितरां जाठराग्निं प्रसूते ॥३६॥ सुगन्धिकः सुनिर्मलः सरो रसायनोत्तमः । कटूष्णवीर्यपाचनो रसेन्द्रवीर्यवर्द्धनः ॥३७॥ विकारानाशयत्याशु दुष्टसूताशनोत्थितान् । दुष्टाहिभक्षणोत्थांश्च शिरोदाहादिकानपि ॥३८॥ अथ विशुद्धगन्धकगुणाः—गरं कृत्रिमं विषम् । आमं अपक्वरसम् । सरः मल- सारकः, दुष्टाहिभक्षणं अशुद्धसीसकसेवनं तत्समुत्थान् शिरोदाहप्रभृतीन्॥३६-३८॥ भा. टी.—शुद्ध गन्धक प्रयोग करने पर शरीर का गरविष नष्ट हो जाता है और क्षुद्र कुष्ठ, त्वग्रोग नष्ट हो जाते हैं । कास श्वास रोग को दूर करता है और दाद के लिये दावानल ( वन की अग्नि के सम ) है । मानसिक तथा शारीरिक रोगों को दूर करता है और आम ( अपरिपक्वरस) को नष्ट करता है । चिरकाल तक उचित अनुपान तथा सहपान के साथ सेवन करने से नेत्रों की ज्योति को बढ़ाता है और जठराग्नि को दीप्त करता है । शुद्ध गन्धक (आंतों की मलसरण क्रिया लेक्जेटिव के लिये ) उत्तम रसायन औषधि है । इसमें कटु रस होता है, वीर्य में यह उष्णप्रकृति का और पाचन गुणवाला है । इसके योग से पारद की शक्ति बढ़ जाती है । विकृत तथा अशुद्धपारद खाने से होने-