भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । (४३१) सहतमें मिलाकर सेवन करे । तथा कफोल्बण रोगमें सहत और घृतके साथ भक्षण करे । इसको वडवाग्नि लोह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ वडवाग्निरस । शुद्धसूतं समं गन्धं ताम्रं तालं समं समम् । अर्कक्षीरैर्दिनं मद्यं क्षौद्रैर्लेह्यं द्विगुञ्जकम् ॥ वडवाग्निरसो नाम्ना स्थौल्यमाशु नियच्छति ॥ ६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे स्थौल्याधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, तांबाभस्म और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके दूधमें एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे स्थूलता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ ६ ॥ इति स्थौल्याधिकार समाप्त । अथ उदररोगाधिकार । त्रैलोक्यसुन्दर रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं ताम्राभ्रं सैन्धवं विषम् । कृष्णजीरं विडङ्गञ्च गुडूचीसत्त्वचित्रकम् ॥ १ ॥ उग्रगन्धा यवक्षारं प्रत्येकं कर्षमात्रकम् । निर्गुण्डिकाद्रवैश्चग्निबीजपूरद्रवैर्दिनम् ॥ २ ॥ मर्दयेच्छोषयेत्सोऽयं रसस्त्रैलोक्यसुन्दरः । गुञ्जाद्वयं घृतैर्लेह्यं वातोदरकुलान्तकम् ॥ ३ ॥ वह्निचूर्णं यवक्षारं प्रत्येकञ्च पलद्वयम् । घृतंप्रस्थं विपक्तव्यं गोमूत्रैश्च चतुर्गुणैः ॥ घृतावशेषं कर्त्तव्यं कर्षमात्रं पिबेदनु ॥ ४ ॥

( ४३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा १ तोले, गंधक २ तोले तथा तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, सेंधानमक, विष, काला जीरा, वायविडंग, गिलोयका सत, चित्रककी जड़, वच और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हालूके पत्तोंके रस, चित्रककी जड़के रस और बिजौरे नींबूके रसमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, इस औषधिको घृतमें मिलाकर चाटनेसे वातोदर रोग नष्ट होता है। चित्रककी जड़का चूर्ण २ पल और जवाखार २ पल, घृत १ प्रस्थ और गोमूत्र ४ प्रस्थ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर यथाविधिसे पकावे । जब केवल घृत बाकी रह जाय तब उतार लेवे । इस औषधिक सेवन करनेके पश्चात् इस घृतको पान करे । इसको त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ वैश्वानरी वटी । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मृताकार्य्यःशिलांजतु । रसमानं प्रदातव्यं रसस्य द्विगुणं विषम् ॥ ५ ॥ त्रिकटु चित्रकं वीरा निर्गुण्डी मूसलीरजः । अजमोदा विषांशेन प्रत्येकञ्च नियोजयेत् ॥ ६ ॥ निम्बपञ्चांगुलक्वाथैर्भावनाश्चैकविंशतिः । भृङ्गराजरसैः सप्त दत्त्वा क्षौद्रैर्विलोडयेत् ॥ ७ ॥ भक्षयेद्बदरास्थ्याभां वटिकां तां दिवानिशि । श्लेष्मोदरं निहन्त्याशु नाम्ना वैश्वानरी वटी ॥ ८ ॥ देवदारुवह्निमूलकल्कं क्षीरेण पाययेत् । भोजनं मेषदुग्धेन कुलत्थानां रसेन तु ॥ ९ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, तांबाभस्म, लोहाभस्म और शिला- जीत यह प्रत्येक एक एक भाग, विष २ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, क्षीरकाकोली, सम्हालूके पत्ते, मूसली और अजवायन

भाषाटीकासहित । (४३३) यह प्रत्येक दो दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके नीमके पत्तोंके रसमें इक्कीस २१ बार, एरण्डकी जड़के क्वाथमें २१ बार और भांगरेके रसमें सात भावना देकर बेरकी गुठली बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि दिनमें एकबार और रात्रिमें एकबार सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे श्लेष्मोदर-रोग नष्ट होता है । इस औषधिके भक्षण करनेके अन्तमें देवदारु और चित्रककी जड़का चूर्ण समान भाग लेकर पीसकर दूधके साथ सेवन करे । इसपर भेड़के दूध और कुलथीके क्वाथके साथ भात खाये । इसको वैश्वानरी वटी कहते हैं ॥ ५-९ ॥ जलोदरारि रस । पिप्पली मरिचं ताम्रं रजनीचूर्णसंयुतम् । स्नुहीक्षीरैर्दिनं मद्यं तुल्यं जैपालबीजकम् ॥ १० ॥ निष्कं खादेद्विरेकं स्यात्सद्यो हन्ति जलोदरम् । रेचनानाञ्च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम् ॥ दिनान्ते च प्रदातव्यमन्नं वा मुद्गयूषकम् ॥ ११ ॥ पीपल, कालीमिरच, तांबाभस्म और हलदी इन सब औषधि- योंका चूर्ण समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । और फिर उसमें सब औषधिकी बराबर शुद्ध जमालगोटेका चूर्ण मिलाकर एक वार दो मासे परिमाण सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होकर जलोदर रोग नष्ट होता है । विरेचनको रोकनेके लिये इस पर दहीके साथ भात हितकारी है । अतएव इस औष- धिके सेवन करनेपर जब अच्छे प्रकारसे दस्त होजायँ तब संध्याके समय दहीके साथ भात खाय । अथवा मूंगके यूषके साथ भात खाय । इसको जलोदरारि रस कहते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥

( ४३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वह्निरस । सूतस्य गन्धकस्याष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः । प्रत्येकञ्च द्विभागं स्यात्त्रिवृज्जैपालचित्रकम् ॥ १२ ॥ प्रत्येकञ्च त्रिभागञ्च व्योषं दन्तिकजीरकम् । प्रत्येकं सप्तभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ १३ ॥ जयन्ती स्नुकपयो भृंगवह्निवातारितैलकैः । प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक् पृथक् ॥ १४ ॥ असौ वह्निरसो नाम्ना निष्कमुष्णजलैः पिबेत् । विरेचनं भवेत्तेन तक्रभक्तं ससैन्धवम् ॥१५॥ दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् । सर्वोदरहरः प्रोक्तः श्लेष्मवातहरः परः ॥ १६ ॥ पारा ८ भाग, गंधक ८ भाग, हलदी, हरड़, बहेड़ा, आमला और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग, निसोथकी जड़, जमालगोटे और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि तीन तीन भाग, सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीके बीज और जीरा यह प्रत्येक औषधि सात सात भाग लेवे । सबको एकत्र पीसकर जयंतीके पत्तोंके रस, थूहरके दूध, भांगरेके रस, चित्रककी जड़का रस और एरण्डीके तेलमें अलग अलग सात सात भावना देकर ४ मासे परिमाण औषधि गरम जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होगा । दिनके अंतमें तक्र, भात और सेंधानमक मिलाकर पथ्य देवे । इसके सेवन करनेपर शीतल जलको त्याग देवे । इससे सब प्रकारके उदररोग और वातकफोत्पन्न रोग नष्ट होते हैं । इसको वह्निरस कहते हैं १२-१६॥ त्रैलोक्यडुम्बर रस । द्वौ भागौ शिवबीजस्य गन्धकस्य चतुष्टयम् । अभ्रवह्निविडङ्गानां गुडूचीसत्त्वनागयोः ॥१७॥

भाषाटीकासहित । (४३६) कृष्णजीरकटूनाञ्च लवणक्षारयोरपि । प्रत्येकं भागमादाय मर्दयेत्सुरसाद्रवैः ॥ १८ ॥ बीजपूररसैर्भूयो मर्दयित्वा विशोषयेत् । त्रैलोक्यडुम्बरो नाम वातोदरकुलान्तकः ॥ १९ ॥ गुञ्जाद्वयं ततश्चास्य ददीत घृतसंयुतम् । भोजयेत्स्निग्धमुष्णञ्च पायसञ्च विवर्जयेत् ॥ २० ॥ पारा २ भाग, गंधक ४ भाग, अभ्रकभस्म, चित्रककी जड़, वाय- विडंग, गिलोयका सत, सीसाभस्म, काला जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, सेंधानमक और जवारखार यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके तुलसीके पत्तोंके रस और बिजौरे नींबूके रसमें मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, घृतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे वातजन्य उदररोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेपर गरम और स्निग्ध पदार्थ भक्षण करे । किन्तु दूधसम्बन्धी किसी प्रकारका कोई पदार्थ नहीं खावे । इसको त्रैलोक्य- डुम्बर रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ महावह्नि रस । चतुः सूतस्य गन्धाष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः । प्रत्येकन्तु त्रिभागं स्याद्दन्तीत्र्यूषणजीरकम् ॥ २१ ॥ प्रत्येकमष्टभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् । जयन्तीस्नुकूपयोभृङ्गवह्निवातारितैलकैः ॥ २२ ॥ प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक्पृथक् । महावह्निरसो नाम निष्कमुष्णजलैः पिबेत् ॥ २३ ॥ विरेचनं भवेत्तेन तक्रमुष्णं ससैन्धवम् । दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् ॥ सर्वोदरहरः प्रोक्तो मूढवातहरः परः ॥ २४ ॥

( ४३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा ४ भाग, गंधक ८ भाग, हलदी, हरड़, बहेड़ा, आमला और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि तीन तीन भाग लेवे । दंतीकी जड़, सोंठ, मिरच, पीपल और जीरा यह प्रत्येक औषधि आठ आठ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चूर्ण कर लेवे । पश्चात् इस चूर्णको जयंतीके पत्तोंके रसमें, थूहरके दूध, भांगरेके रस, चित्रककी जड़के रस और एरंडीके तेलमें अलग अलग सात सात भावना देवे । इस औषधिमेंसे चार मासे औषधि लेकर गरम जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे जब अच्छे प्रकारसे दस्त होजायँ तब दिनके अंतमें गरम तक्र और सेंधानमक मिलाकर पथ्य देवे । और शीतल जल त्याग करा देवे । इससे सर्व प्रकारके उदररोग और मूढवात नष्ट होते हैं । इसको महावह्नि रस कहते हैं ॥ २१–२४ ॥ इच्छाभेदी रस । शुण्ठीमरिचसंयुक्तं रसगन्धकटङ्कणम् । जैपालो द्विगुणः प्रोक्तः सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ २५ ॥ इच्छाभेदी द्विगुञ्जः स्यात्सितया सह दापयेत् । पिबेत्तु चुल्लुकान्यावत्तावद्वारान्विरेचयेत् ॥ २६ ॥ सोंठ, मरिच, पारा, गंधक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, जमालगोटे २ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । मिश्रीके साथ इस औषधिका सेवन करे, इसके ऊपर जितने वार उड़दोंके धोवनका जल पान करे उतने ही वार विरेचन होता है । इसको इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ पिप्पलीमूलाद्य लोह । पिप्पलीमूलचित्राभ्रत्रिकत्रयेन्दुसैन्धवम् । सर्वचूर्णसमं लोहं हन्ति सर्वोदरामयम् ॥ २७ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४३७ ) पीपलामूल, चित्रककी जड़, अभ्रकभस्म, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा, वायविडंग, कपूर और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहेका चूर्ण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसे उदररोग नष्ट होता है । इसको पिप्पलीमूलाद्य लोह कहते हैं ॥ २७ ॥ उदरारि रस । पारदं शुक्तितुत्थञ्च जैपालं पिप्पलीसमम् । आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २८ ॥ माषमात्रां वटीं खादेत्स्त्रीणां जलोदरं जयेत् । चिञ्चाफलरसञ्चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ दकोदरहरश्चैव तीव्रेण रेचनेन च ॥ २९ ॥ रससिन्दूर, सीपकी भस्म, तूतिया, जमालगोटे, पीपल और अमलतासका गूदा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे स्त्रियोंका जलोदररोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके अंतमें इमलीका रस और दहीके साथ भात खाय । इस औषधिसे अच्छे प्रकारसे विरेचन होकर घोरतर जलोदर रोग नष्ट होता है । इसको उदरारि रस कहते हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥ वङ्गेश्वर रस । सूतभस्म वङ्गभस्म भागैकं संप्रकल्पयेत् । गन्धकं मृतताम्रञ्च प्रत्येकञ्च चतुःपलम् ॥ ३० ॥ अर्कक्षीरैर्दिनं मर्द्य सर्वं तद्गोलकीकृतम् । रुद्धा। तद्भूधरे पक्त्वा पुटकेन समुद्धरेत् ॥ ३१ ॥ एष वङ्गेश्वरो नाम पीतो गुल्मोदरं जयेत् ।

( ४३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । घृतैर्गुञ्जाद्वयं लेह्यं निष्कां श्वेतपुनर्नवाम् ॥ गवां मूत्रैः पिबेच्चानु रजनीं वा गवां जलैः ॥ ३२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे उदररोगाधिकारः । रससिन्दूर और वंगकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, गन्धक और तांबाभस्म यह प्रत्येक चार चार पल इन सब औष- धियोंको एकत्र आकके दूधमें खरल करके गोला बना लेवे । इस गोलेको मूषामें रखकर भूधर यंत्रमें पकावे; जब शीतल हो जाय तब इसको पीसकर चूर्ण करलेवे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर घीमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे चार मासे सफेद पुनर्नवा अथवा चार मासे हलदीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे । इससे गुल्म और उदररोग नष्ट होता है । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ इति उदररोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ प्लीहरोगचिकित्सा । रोहितकसमायुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः । प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृतञ्च विनाशयेत् ॥ १ ॥ रोहेड़ा, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहा दश भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करे तो प्लीहा, अग्रमांस और यकृत् रोग नष्ट होते हैं ॥ १ ॥ लोकनाथ रस । पारदं गन्धकञ्चैव समभागं विमर्दयेत् । मृताभ्रं रसतुल्यञ्च यत्नतः परिमर्दयेत् ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । (४३९) रसाद्द्विगुणलौहञ्च लौहतुल्यञ्च ताम्रकम् । भस्म वराटिकायाश्च ताम्रतस्त्रिगुणं कुरु ॥ ३ ॥ नागवल्लीदलेनैव मर्दयेद्यत्नतो भिषक् । पुटेद्गजपुटे विद्वान्स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ४ ॥ यकृत्प्लीहोदरं गुल्मं श्वयथुञ्च विनाशयेत् । पिप्पलीमधुसंयुक्तां सगुडां वा हरीतकीम् ॥ गोमूत्रञ्च पिबेच्चानु गुडं वा जीरकान्वितम् ॥ ५ ॥ पारा, गन्धक और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, लोहभस्म २ भाग, तांबाभस्म २ भाग और कौड़ीकी भस्म ६ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पानके रसमें खरल करके मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । जब शीतल हो जाय तब चूर्ण कर लेवे । यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । इस औष- धिके अन्तमें पीपलका चूर्ण और सहत, अथवा हरड़का चूर्ण और गुड़, किंवा गोमूत्र या जीरेका चूर्ण और गुड़ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे यकृत्, प्लीहा, उदर, गुल्म और शोथरोग नष्ट होते हैं ॥ २-५ ॥ बृहल्लोकनाथ रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले कृत्वा तु कज्जलीम् । सूततुल्यं जारिताभ्रं मर्दयेत्कन्यकाम्बुना ॥ ६ ॥ ततो द्विगुणितं दद्यात्ताम्रं लौहं प्रयत्नतः । काकमाचीरसेनैव सर्वं तत्परिमर्दयेत् ॥ ७ ॥ सूताच्च द्विगुणं गन्धं वराटीसम्भवं रजः । पिष्ट्वा जम्बीरनीरेण मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥

( ४४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तन्मध्ये गोलकं क्षिप्त्वा यत्नेनच्छादयेद्भिषक् । शरावसम्पुटं कृत्वा मृद्भस्मलवणाम्बुभिः ॥ ९ ॥ शरावसन्धिमालिप्य चातपे शोषयेत्क्षणम् । ततो गजपुटं दत्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ पिष्ट्वा तु सर्वमेकत्र स्थापयेद्भाजने शुभे ॥ १० ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक २ भाग, दोनोंकी एकत्र कज्जली बना लेवे। फिर इस कज्जलीमें अभ्रककी भस्म १ भाग मिलाकर घीकारके रसमें खरल करके पश्चात् उसमें तांबेकी भस्म २ भाग और लोहेकी भस्म २ भाग मिलावे। फिर मकोयके रसमें खरल करके सुखा लेवे। तदनन्तर उसमें गन्धक २ भाग और कौड़ीकी भस्म २ भाग मिलाकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके गोलासा बना लेवे। फिर इस गोलेके दो भाग करके एक भग एक सिकोरेमें रखे और दूसरा भाग दूसरे सिकोरेमें रखे। पश्चात् दोनों सिकोरोंके ऊपर दो सिकोरे ढककर दोनोंके संधिस्थानों ( जोड़ों ) को अच्छे प्रकारसे मृत्तिका, राख और लवण तथा जल इनसे बंद कर देवे, फिर थोड़ी देरतक धूपमें रख देवे जब सूख जाये तब गजपुटमें पकावे। शीतल होनेपर चूर्ण करके उत्तम पात्रमें भरकर रख देवे ॥ ६-१० ॥ खादेद्वल्लद्वयञ्चास्य मूत्रञ्चानु पिबेन्नरः । मधुना पिप्पलीचूर्ण सगुडां वा हरीतकीम् ॥ ११ ॥ अजाजीं वा गुडेनैव भक्षयेत्तुल्ययोगतः । यकृत्प्लीहोदरोयञ्च श्वयथुञ्च विनाशयेत् ॥ १२ ॥ वाताष्ठीलाञ्च कमठीं प्रत्यष्ठीलां तथैव च । कांस्यक्रोडायमांसञ्च शूलञ्चैव भगन्दरम् ॥ वह्निमान्द्यञ्च कासञ्च लोकनाथरसोत्तमः ॥ १३ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४४१ ) इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर चार रत्ती पीपलके चूर्ण और चार रत्ती सहत, अथवा चार रत्ती हरड़का चूर्ण और चार रत्ती गुड़,अथवा चार रत्ती जीरेका चूर्ण और चार रत्ती गुड़के साथ भक्षण करे और ऊपरसे गोमूत्रको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे यकृत, प्लीहा, प्रवृद्ध उदररोग, शोथ, वाताष्ठीला, कमठी, प्रत्यष्ठीला, कांस्यक्रोड, अग्रमांस, शूल, भगन्दर, मंदाग्नि और कासरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहल्लोकनाथ रस कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ ताम्रेश्वरवटी । हिंगु त्रिकटुकञ्चैव अपामार्गस्य पत्रकम् । अर्कपत्रन्तथा स्नुहीपत्रञ्च समभागकम् ॥ १४ ॥ सैन्धवं तत्समं ग्राह्यं लौहं ताम्रञ्च तत्समम् । प्लीहानं यकृतं गुल्ममामवातं सुदारुणम् ॥ १५ ॥ अर्शांसि घोरमुदरं मूर्च्छा पाण्डुं हलीमकम् । ग्रहणीमतिसारञ्च यक्ष्माणं शोथमेव च ॥१६॥ हींग, सांठ, पीपल, काली मिरच, चिरचिटेके पत्तोंका खार, मदार और थूहरके पीले पत्ते समान भाग और इन सबके बराबर सेंधानमक, लोहा और तांबाभस्म लेकर खरल करके यथोचित मात्रानुसार भक्षण करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, आमवात, अर्श, उदररोग, मूर्च्छा, पांडु, हलीमक, संग्रहणी, अतिसार, राजयक्ष्मा और शोथरोग नष्ट होते हैं । इसको ताम्रेश्वरवटी कहते हैं ॥ १४-१६ ॥ अग्निकुमार लोह । तुत्थरामठटङ्कानि सैन्धवं धान्यजीरकम् । यमानी मरिचं शुण्ठी लवङ्गैला विडङ्गकम् ॥ १७ ॥ प्रत्येकं तोलकं चूर्णं लौहचूर्णन्तु तत्समम् । रसस्य गन्धकस्यापि पलैकं कज्जलीकृतम् ॥ १८ ॥

( ४४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । घृतेन मधुना खाद्यं लौहमग्निकुमारकम् । यकृत्प्लीहोदरहरं गुल्मञ्चापि हलीकम् ॥ १९ ॥ बलवर्णाग्निजननं कान्तिपुष्टिविवर्द्धनम् । श्रीमद्गहननाथेन निर्मितं विश्वसम्पदे ॥ २० ॥ तूतिया, हींग, सुहागा, सेंधानमक, धनिया, जीरा, अजवायन, काली मिरच, सोंठ, लौंग, इलायची और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण और लोहेका चूर्ण सब औषधिकी बराबर लेवे । पारा १ पल और गंधक १ पल लेवे । इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर घी और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे यकृत, प्लीहा, उदररोग, गुल्म और हलीमक रोग दूर होते हैं । तथा बल, वर्ण, अग्नि, कान्ति और पुष्टिकी वृद्धि होती है । संसारकी रक्षा करनेके लिये इस अग्निकुमार लोहेको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ १७–२० ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टंकणं त्रिकम् ॥ २१ ॥ प्रत्येकञ्च पलं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषितम् । चतुर्गुञ्जां वटीं खाद्दारिणा मधुनापि वा ॥ २२ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्द-भाषितः । दोषं रोगञ्च संवीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ॥२३॥ निहन्ति कामलां पाण्डुमानाहं श्लीपदार्बुदम् । गलगण्डं गण्डमालां व्रणानि च हलीमकम् ॥२४॥ अपचीं वातरक्तञ्च कण्डूं विस्फोटकुष्ठकम् । नातः परतरः श्रेष्ठः कामलार्त्तिभयेष्वपि ॥ २५ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४५३ ) लोहा, तांबा, कौड़ी इनकी भस्म, तूतिया, हींग, हरड़, बहेडे, आमले, थूहरकी जड़, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे. इन सब औषधियोंको एकत्र बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बनाकर सहत अथवा जलके साथ सेवन करे । दोषोंका बलाबल और रोगका बलाबल विचारकर; अथवा और किसी युक्तिसे चार रत्ती या अधिक बढाकर देवे । इस औष- धिके सेवन करनेसे कामला, पांडु, आनाह, श्लीपद, अर्बुद, गलगण्ड, गण्डमाला, व्रण, हलीमक, अपची, वातरक्त, कण्डू, विस्फोटक और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं । कामला रोगको दूर करनेवाली इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है ॥ २१-२५ ॥ यकृदरि लोह । द्विकर्षं लौहचूर्णस्य चाभ्रकस्य वलार्द्धकम् । कर्षं शुद्धं मृतं ताम्रं लिम्पाकांघ्रित्वचं पलम् ॥२६॥ मृगाजिनभस्मपलं सर्वमेकत्र कारयेत् । नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २७ ॥ यकृत्प्लीहोदरञ्चैव कामलाञ्च हलीमकम् । कासं श्वासं ज्वरं हन्याद्वलवर्णाग्निकारकम् ॥ यकृदरि त्विदं लौहं वातगुल्मविनाशकम् ॥ २८ ॥ लोहभस्मका चूर्ण २ कर्ष, अभ्रकभस्म २ तोले, शुद्ध तांबाभस्म १ कर्ष, कागजी नींबूकी छाल १ पल और हिरनके चर्मकी भस्म १पल लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे यकृत्, प्लीहो- दर, कामला, हलीमक, खाँसी, श्वास और ज्वर नष्ट होते हैं । यह बल, वर्ण और अग्निको दीपन करता है तथा वातगुल्मनाशक है । इसको यकृदरि लोह कहते हैं ॥ २३-२८ ॥

( ४४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मृत्युञ्जय रस । शुद्धसूतं समं गन्ध जारिताभ्रं समं समम् । गन्धकाद्विगुणं लौहं मृतताम्रञ्चतुर्गुणम् ॥ २९ ॥ द्विक्षारं टङ्गणविडं वराटमथ शंखकम् । चित्रकं कुनटीतालकटुकीरामठन्तथा ॥ ३० ॥ रोहितकं त्रिवृच्चिञ्चा विशालाधवमङ्कोठम् । अपामार्ग तालमूलं मल्लिका च निशायुगम् ॥ ३१ ॥ कानकं तुत्थकञ्चैव यकृन्मर्द रसाञ्जनम् । एतानि समभागानि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ३२ ॥ आर्द्रकस्वरसेनेव गुडूच्याः स्वरसेन च । मधुनः कुडवैर्भाव्यं वटिका माषमात्रतः ॥ ३३ ॥ शुद्ध पारा, गन्धक और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहाभस्म २ भाग, तांबाभस्म ४ भाग, जवारखार, सज्जी, सुहागा, विडनमक, कौड़ीकी भस्म, शंखकी भस्म, चित्रककी जड़ मैनशिल, हरिताल, कुटकी, हींग, रोहिड़ा, निसोथकी जड़, इमलीका खार, इन्द्रायनकी जड़, धावेके फूल, अंकोल, चिरचिटेका खार, ताड़की जड़की राख, हल्दी, दारुहल्दी, धतूरेके बीज, तूतिया, जमालगोटे और रसौंत यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेने, सबको एकत्र पीस- कर अदरख और गिलोयके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर एक कुडव परिमाण सहतमें भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे ॥ २९-३३ ॥ अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्या दोषानुसारतः । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकम् ॥ ३४ ॥ प्लीहानं ज्वरमुग्रञ्च कासञ्च विषमज्वरम् । चिरजं कुलजञ्चैव श्लीपदं हन्ति दारुणम् ॥ ३५ ॥

भाषाटीकासहित । (४५५) रोगानीकविनाशाय धन्वन्तरिकृतं पुरा । मृत्युञ्जयमिदं लोहं सिद्धिदं शुभदं नृणाम् ॥ ३६ ॥ यथादोषानुसार इसके अनुपानकी कल्पना करे । सम्पूर्ण रोग- नाशक इस औषधिको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे तो प्लीहा, ज्वर, खाँसी, विषमज्वर, बहुत पुराना और वंशज श्लीपद रोग नष्ट होता है । समस्त रोगोंको दूर करनेके लिये पूर्वकालमें मनुष्योंको सिद्धि देने- वाली और मंगल कामनाओंको देनेवाली यह औषधि धन्वन्तरि भगवान्ने कही है ॥ ३४-३६ ॥ प्लीहार्णव रस । हिंगुलं गन्धकं टङ्कमभ्रकं विषमेव च । प्रत्येकं फलिकं भागं चूर्णयेदतिचिक्कणम् ॥ ३७ ॥ पिप्पली मरिचञ्चैव प्रत्येकञ्च पलार्द्धकम् । मर्दयित्वा वटीं कुर्याद्वल्लमात्रां प्रयत्नतः ॥ ३८ ॥ सेव्या शेफालिदलजैर्वटी माक्षिकसंयुता । प्लीहानं षट्प्रकारञ्च हन्ति शीघ्रं न संशयः ॥ ३९ ॥ ज्वरं मन्दानलञ्चैव कासं श्वासं वमिं भ्रमिम् । प्लीहार्णव इति ख्यातो गहनानन्दभाषितः ॥ ४० ॥ सिंग्रफ, गन्धक, सुहागा, अभ्रकभस्म और विष इन प्रत्येकका बारीक चूर्ण एक २ पल, पीपल और काली मिरचोंका चूर्ण प्रत्येक दो दो तोले, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । हरसिंगारके पत्तोंके रस और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे छः प्रकारकी प्लीहा, ज्वर, मंदाग्नि, खाँसी, श्वास, वमन और भ्रमरोग नष्ट होते हैं । इस प्लीहार्णव रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३७-४० ॥

( ४४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्लीहशार्दूल रस । सूतकं गन्धकं व्योषं समभागं पृथक्पृथक् । एभिः समं ताम्रभस्म योजयेद्वैद्यबुद्धिमान् ॥ ४१ ॥ मनःशिला वराटञ्च तुत्थं रामठलौहकम् । जयन्ती रोहितञ्चैव क्षारटङ्कणसैन्धवम् ॥ ४२ ॥ विडं चित्रं कनकञ्च रसतुल्यं पृथक्पृथक् । भावयेत्रिदिनं यावत्त्रिवृच्चित्रकणार्द्रकैः ॥ ४३ ॥ गुञ्जामात्रां वटीं खादेत्सद्यः प्लीहविनाशनम् । मधुपिप्पलिसंयुक्तां द्विगुञ्जां वा प्रयोजयेत् ॥ ४४ ॥ प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृद्गुल्मं सुदुस्तरम् । आमाशयेषु सर्वेषु चोदरे शोथविद्रधौ ॥ ४५ ॥ अग्निमान्द्ये ज्वरे चैव प्लीह्नि सर्वज्वरेषु च । रसोऽयं प्लीहशार्दूलो गहनानन्दभाषितः ॥ ४६ ॥ शुद्ध पारा, गन्धक, सोंठ, मिरच, पीपल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, तांबेकी भस्म ५ भाग, मैनशिल, कौड़ीकी भस्म, शुद्ध तूतिया, हींग, लोहभस्म, जयंतीके पत्ते, रोहिड़ेकी छाल, जवाखार, सुहागा, सेंधानमक, विडनमक, चित्रककी जड़ और जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर निसोधकी जड़के रस, चित्रक रस, पीपलका क्वाथ और अदरखके रसके साथ अलग अलग तीन तीन भावना देकर एक रत्ती अथवा दो रत्ती भरकी गोली बना लेवे । पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिका सेवन करे । प्लीहा, अग्रमांस, यकृत् और गुल्मरोग, आमाशयके रोग, उदररोग,शोथरोग,विद्रधि, मन्दाग्नि,ज्वर, प्लीहा और सर्व प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाली यह औषधि गहनानन्द- नाथने कही है । इसको प्लीहशार्दूल रस कहते हैं ॥ ४१-४६ ॥

भाषाटीकासहित । (४४७) प्लीहारि रस । द्विकर्षं लौहभस्मापि कर्षं ताम्रं प्रदापयेत् । शुद्धसूतं तथा गन्धं कर्षमानं भिषग्वरः ॥ ४७ ॥ मृगाजिनं पलं भस्म लिम्पाकांघ्रित्वचः पलम् । एवं भागक्रमेणैव कुर्यात्प्लीहारिकां वटीम् ॥ ४८ ॥ नवगुञ्जामितां खादेच्चाथ नित्यं हि पूतवान् । प्लीहानं यकृतं गुल्मं हन्त्यवश्यं न संशयः ॥ ४९ ॥ लोहकी भस्म २ कर्ष, तांबा, शुद्ध पारा और गन्धक प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, हिरनके चमड़ेकी भस्म और कागजी नींबूकी जड़की छाल प्रत्येक चार चार तोले लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर नौ नौ रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन इन गोलियोंमेंसे एक एक गोली सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत् और गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥ ४७-४९ ॥ अपर प्लीहारि रस । कर्षैकं तालचूर्णस्य तत्पादांशं सुवर्णकम् । पलार्द्धं मृतताम्रञ्च तत्समं शुद्धमभ्रकम् ॥ ५० ॥ मृगाजिनस्य भस्मापि कर्षमत्र प्रदापयेत् । लिम्पाकांघ्रित्वचस्तद्वत्सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ५१ ॥ रसगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेत्ततः । मधुना वह्निचूर्णेन खादेन्नित्यं यथाबलम् ॥ ५२ ॥ असाध्यमपि प्लीहानं हन्त्यवश्यं न संशयः । यकृतं पाण्डुरोगं च गुल्मादिकभगन्दरान् ॥ ५३ ॥ हरिताल १ तोला, सोना ३ मासे, तांबा और अभ्रक प्रत्येक दो दो तोले, हिरनके चमड़ेकी भस्म और कागजी नींबूकी जड़की छाल प्रत्येक एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र

( ४४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पीसकर छः छः रत्तीकी गोली बना लेवे । चित्रककी जड़के चूर्ण और सहतके साथ प्रतिदिन इस औषधिके सेवन करनेसे असाध्य प्लीहारोग, यकृत्, पाण्डु, गुल्म और भगन्दररोग नष्ट होते हैं ॥ ५०-५३ ॥ लोहमृत्युञ्जय रस । रसगन्धकलौहाभ्रं कुनटी मृतताम्रकम् । विषमुष्टिवराटञ्च तुत्थं शङ्खरसाञ्जनम् ॥ ५४ ॥ जातीफलञ्च कटुकी द्विक्षारं कानकन्तथा । व्योषं हिङ्गु सैन्धवञ्च प्रत्येकं सूततुल्यकम् ॥ ५५ ॥ श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वमेकत्र भावयेत्ततः । सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च ॥ ५६ ॥ सूर्यावर्तेन मतिमान्वटिकां कारयेत्ततः । प्लीहानं यकृतं गुल्ममष्ठीलाञ्च विनाशयेत् ॥ ५७ ॥ अग्रमांसं तथा शोथं तथा सर्वोदराणि च । वातरक्तञ्च कमठं चान्तर्विद्रधिमेव च ॥ ५८ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मैनशिल, तांवाभस्म, कुचला, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, शंखकी भस्म, रसौत, जायफल, कुटकी, जवाखार, सज्जी, जमालगोटे, सोंठ, मिरच, पीपल, हींग और सेंधानमक यह सब औषधि समान भाग लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके हुलहुलके रसमें सात भावना देवे; फिर बेलके पत्तोंके रसमें सात भावना देवे । फिर हुलहुलके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत्, गुल्म, अष्ठीला, अग्रमांस, शोथ, सर्व प्रकारके उदररोग, वातरक्त, कमठी और अन्त- र्विद्रधि रोग नष्ट होते हैं । इसको लोहमृत्युञ्जय रस कहते हैं५४-५८॥ महामृत्युञ्जय रस । रसगन्धकलोहाभ्रं कुनटीतुत्थताम्रकम् । सैन्धवञ्च वराटञ्च वागुजीविडशङ्ककम् ॥ ५९ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४४९ ) चित्रकं हिंगु कटुकी द्विक्षारं कट्फलन्तथा । रसाञ्जनं जयन्ती च टङ्कणं समभागिकम् ॥ ६० ॥... एतत्सर्वं विचूर्ण्याथ दिनमेकं विभावयेत् । आर्द्रकस्वरसेनैव गुडूच्याः स्वरसेन च ॥ ६१ ॥ गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा भक्षयेन्मधुना सह । नानारोगप्रशमनो यकृद्गुल्मोदराणि च ॥ ६२ ॥ अग्रमांसं तथा प्लीहमग्निमान्द्यमरोचकम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ महामृत्युञ्जयो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ ६३ ॥ शुद्ध पारा, गंधक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मैनासिल, तूतिया, तांबाभस्म, सेंधानमक, कौड़ीकी भस्म, बावचीके बीज, विडनमक, शंखकी भस्म, चित्रककी जड़, हींग, कुटकी, जवाखार, सज्जी, काय- फल, रसौत, जयंती और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर गिलोयके रस और अदरखके रसमें एक दिनतक भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे यकृत्, गुल्म, उदररोग, अग्रमांस, प्लीहा, मंदाग्नि और अरुचि आदि समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस महामृत्युञ्जय रसको स्वयं महादेवने कहा है ॥ ५९-६३ ॥ बृहद् गुडपिप्पली । विडङ्गं त्र्यूषणं हिंगु कुष्ठं लवणपञ्चकम् । त्रिक्षारं फेनकं चव्यं श्रेयसी कृष्णजीरकम् ॥ ६४ ॥ तालपुष्पोद्भवं क्षारं नाड्याः कूष्माण्डकस्य च । अपामार्गोद्भवं क्षारं चित्रायाश्चित्रकं तथा ॥ ६५ ॥ एतानि समभागानि पुराणो द्विगुणो गुडः । गुडतुल्यं प्रदातव्यं चूर्णञ्चैव कणोद्भवम् ॥ ६६ ॥

( ४५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मर्दयित्वा दृढे पात्रे मोदकानुपकल्पयेत् । भक्षयेद्वर्द्धयेन्नित्यं प्लीहानं हन्ति दुस्तरम् ॥ ६७ ॥ प्रमेहं पाण्डुरोगं च कामलां वह्निमान्द्यकम् । यकृतं पञ्चगुल्मं च तूदरं सर्वरूपकम् ॥ ६८ ॥ जीर्णज्वरं तथा शोथं कासं पञ्चविधं तथा । अश्विभ्यां निर्मिता ह्येषा सुबृहद्गुडपिप्पली ॥ ६९ ॥ वायविडंग, त्रिकुटा, हींग, कूठ, पांचों लवण, जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, चव्य, हरड़, कालाजीरा, ताड़की जड़का खार, पेठेका खार, चिरचिटेका खार, इमलीका खार और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे तथा पीपलका चूर्ण गुड़ की बराबर लेवे, इन सब पदार्थोंको एकत्र मर्दन करके मोदक बना लेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक मोदक बढ़ाकर सेवन करनेसे प्लीहा, प्रमेह, पांडु, कामला, मंदाग्नि, यकृत्, पांच प्रकारका गुल्म, सर्व उपद्रवयुक्त उदररोग, जीर्णज्वर, शोथ और पांचों प्रकारकी खाँसी दूर होती है । यह बृहद्गुडपिप्पली महात्मा अश्विनीकुमारोंने कही है ॥ ६४-६९ ॥ ताम्रकल्प । अक्षपारदगन्धं च कर्षद्वयमितं पृथक् । सर्वैः समं भवेत्ताम्रं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥ ७० ॥ सूर्यावर्त्तरसैः पश्चात्कणामोचरसेन च । योजयेत्तीव्रघर्मे तु यावत्सर्वन्तु जीर्यति ॥ ७१ ॥ जम्बीरस्य रसैर्भूयो रसं दण्डेन चालयेत् । दृढे शिलामये पात्रे चूर्णयेदतिशोभनम् ॥ ७२ ॥