रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ४५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मर्दयित्वा दृढे पात्रे मोदकानुपकल्पयेत् । भक्षयेद्वर्द्धयेन्नित्यं प्लीहानं हन्ति दुस्तरम् ॥ ६७ ॥ प्रमेहं पाण्डुरोगं च कामलां वह्निमान्द्यकम् । यकृतं पञ्चगुल्मं च तूदरं सर्वरूपकम् ॥ ६८ ॥ जीर्णज्वरं तथा शोथं कासं पञ्चविधं तथा । अश्विभ्यां निर्मिता ह्येषा सुबृहद्गुडपिप्पली ॥ ६९ ॥ वायविडंग, त्रिकुटा, हींग, कूठ, पांचों लवण, जवाखार, सज्जी, सुहागा, समुद्रफेन, चव्य, हरड़, कालाजीरा, ताड़की जड़का खार, पेठेका खार, चिरचिटेका खार, इमलीका खार और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे तथा पीपलका चूर्ण गुड़ की बराबर लेवे, इन सब पदार्थोंको एकत्र मर्दन करके मोदक बना लेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक मोदक बढ़ाकर सेवन करनेसे प्लीहा, प्रमेह, पांडु, कामला, मंदाग्नि, यकृत्, पांच प्रकारका गुल्म, सर्व उपद्रवयुक्त उदररोग, जीर्णज्वर, शोथ और पांचों प्रकारकी खाँसी दूर होती है । यह बृहद्गुडपिप्पली महात्मा अश्विनीकुमारोंने कही है ॥ ६४-६९ ॥ ताम्रकल्प । अक्षपारदगन्धं च कर्षद्वयमितं पृथक् । सर्वैः समं भवेत्ताम्रं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥ ७० ॥ सूर्यावर्त्तरसैः पश्चात्कणामोचरसेन च । योजयेत्तीव्रघर्मे तु यावत्सर्वन्तु जीर्यति ॥ ७१ ॥ जम्बीरस्य रसैर्भूयो रसं दण्डेन चालयेत् । दृढे शिलामये पात्रे चूर्णयेदतिशोभनम् ॥ ७२ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४५१ ) रक्तिद्वयक्रमेणैव योज्यं माषद्वयावधि । ह्रासयेच्च क्रमेणैव तथा चैव विवर्द्धयेत् ॥ ७३ ॥ काला नमक, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष और तांबेकी भस्म ६ कर्ष इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके हुलहुलके रस, पीपलके क्वाथ और मोचरसके क्वाथमें मर्दन करे । फिर इसको सूर्यकी तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर फिर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करे । जबतक यह औषधि अच्छे प्रकारसे जीर्ण न होजाय तबतक मर्दन करे । पश्चात् सूख जाय तब उत्तम शुभ्र खरलमें पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । प्रथम दिन दो रत्ती, दूसरे दिन चार रत्ती, इस प्रकार प्रतिदिन दो दो रत्ती बढ़ाकर सेवन करे । जब बढ़ते बढ़ते दो मासे पर्यंत होजाय तब घटाने लगे ॥ ७०-७३ ॥ जीर्णे भुञ्जीत शाल्यन्नं क्षीरं घृतसमन्वितम् । हन्त्यम्लपित्तं विविधं ग्रहणीं विषमज्वरम् ॥ ७४ ॥ चिरज्वरं प्लीहगदं यकृद्रोगं सुदुस्तरम् । अग्रमांसं तथा शोथं कांस्यक्रोडं सुदुर्जयम् ॥ ७५ ॥ कमठं च तथा शोथमुदरं च सुदारुणम् । धातुवृद्धिकरं वृष्यं बलवर्णकरं शुभम् ॥ ७६ ॥ सद्यो वह्निकरं चैव सर्वरोगहरं परम् । मुखशुद्धिर्विधातव्या पर्णैश्चूर्णसमन्वितैः ॥ ताम्रकल्पमिदं नाम्ना सर्वरोगप्रशान्तये ॥ ७७ ॥ इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें औषधिके जीर्ण होनेपर शालि चावलोंका भात, दूध और घृत भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे विविध प्रकारका अम्लपित्त, संग्रहणी, विषमज्वर, चिरज्वर, प्लीहा, यकृत्, अग्रमांस, शोथ, कांस्यक्रोड, कमठ, शोथ और
( ४५२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उदररोग नष्ट होते हैं । यह अत्यंत धातुको बढ़ानेवाली, वृष्यकारक, बल और वर्णको बढ़ानेवाली, अग्निजनक और सर्वरोगनाशक है । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें चूनेके साथ पानको भक्षण करके मुखको शुद्ध करे । सर्व रोगोंको हरनेके लिये यह औषधि सेवन करानी चाहिये । इसको ताम्रकल्प कहते हैं ॥ ७४-७७ ॥ दारुभस्म । दारुसैन्धवगन्धं च भस्मीकृत्य प्रयत्नतः । प्लीहानमग्रमांसं च यकृतं च विनाशयेत् ॥ ७८ ॥ दारुमूंष, सेंधानमक और गंधक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र खरलकर मूषामें रखकर पुटमें पकाकर सेवन करे तो प्लीहा, अग्रमांस और यकृतरोग दूर होते हैं । ( दारुमूंषसे कुछ वैद्य संखिया लेते हैं ) ॥ ७८ ॥ वज्रक्षार । सामुद्रं सैन्धवं काचं यवक्षारं सुवर्चलम् । टंकणं स्वर्जिकाक्षारस्तुल्यं सर्वं विचूर्णयेत् ॥ ७९ ॥ अर्कक्षीरैः स्नुहीक्षीरैरातपे भावयेत् त्र्यहम् । तेन लिप्तार्कपत्रं च रुद्धा चान्तःपुटे पचेत् ॥ ८० ॥ तत्क्षारं चूर्णयेत्पश्चात् त्र्यूषणं त्रिफलारजः । जीरकं रजनीवह्निनवभागं समं समम् ॥ ८१ ॥ क्षाराद्धमेव सर्वं च एकीकृत्य प्रयोजयेत् । वज्रक्षारमिदं सिद्धं स्वयं प्रोक्तं पिनाकिना ॥ ८२ ॥ सर्वोदरेषु गुल्मेषु शूलदोषेषु योजयेत् । अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णेऽपि भक्ष्यं निष्कद्वयं द्वयम्८३॥
An accurate, line-by-line transcription of the text from the image into pure Unicode Devanagari:
भाषाटीकासहित । ( ४५३ ) वाताधिके जलं कोष्णं घृतं वा पैत्तिके हितम् । कफे गोमूत्रसंयुक्तमारनालं त्रिदोषजे ॥ ८४ ॥ सामुद्रिक लवण, सेंधानमक, काचलवण, जवाखार, काला नमक, सुहागा और सज्जी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर आकके दूध और थूहरके दूधमें धूपमें रखकर अलग अलग तीन तीन भावना देकर गोला बनाकर उस गोलेको आकके पत्तोंमें लपेटकर एक हाण्डी में रख संधि बन्द करके गजपुट में फूंकदे; फिर आकके भस्म हुए पत्तों सहित चूर्ण करके उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, जीरा, हल्दी और चित्रककी जड़ इन सबका चूर्ण उपरोक्त चूर्णसे आधा भाग लेवे । सबको एकत्र मिलाकर एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे । प्रतिदिन इस औषधिमेंसे आठ मासे लेकर वाताधिक रोगमें किंचित् गरम जलके साथ, पित्तरोगमें घृत, कफज रोगमें
४५४) रसेन्द्रसारसंग्रह । औद्भिदलवण, सामुद्रिक लवण, अजवायन और हींग सब यह औषधि समान भाग लेकर जामुनकी छालके क्वाथमें या रसके द्वारा सूर्यकी प्रचण्ड धूपमें सात भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली खावे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात मदिरा और जलको पान करे । इसके सेवन करनेसे व्रणज रोग, यकृत, क्रिमि, अग्रमांस, कमठ, प्लीहा, जलोदर, मन्दाग्नि, गुल्म, अत्यंत आमदोष और अम्लपित्त रोग नष्ट होते हैं । इसको उदरामय कुम्भिकेसरी रस कहते हैं ॥ ८५-८७ ॥ वारिशोषण रस । चतुर्विंशतिभागाः स्युर्गन्धादङ्गं तदर्द्धकम् । वङ्गभागाङ्गवेदार्द्धः पारदः कृष्णमभ्रकम् ॥ ८८ ॥ चतुर्दशविभागं स्यान्मृतं तद्दीयते पुनः । मृतलौहमष्टभागं मृतताम्रं नवात्र तत् ॥ ८९ ॥ मृतहेमद्वयं तेषां मृतरूप्यं च सप्तकम् । अतिशुद्धमतिस्थूलं मृतं हीरं त्रयोदश ॥ ९० ॥ भागा ग्राह्या माक्षिकस्य विशुद्धस्यात्र षोडश । अष्टादशमितं ग्राह्यं नव काशीशकं पुनः ॥ ९१ ॥ तुत्थकञ्च षडेवात्र नवीनं ग्राह्यमेव च । तालकञ्च चतुर्भागं शिला योज्यात्रयो बुधैः ॥९२॥ शैलेयं पञ्च दातव्यं सर्वमेकत्र नूतनम् । मृतमौक्तिकभागैकं सौभाग्यं द्वयमेव च ॥ ९३ ॥ कुट्टयित्वा विचूर्ण्याथ जम्बीरस्य रसेन वै । भावयेत्सप्तधा गाढं गुटिकां तस्य कारयेत् ॥ ९४ ॥
भाषाटीकासहित । (४५५) गन्धक २४ भाग, वंगभस्म १२ भाग, पारा ६ भाग, कृष्णाभ्रक भस्म १४ भाग, लोहाभस्म ८ भाग, तांबाभस्म ९ भाग, सोनाभस्म २ भाग, रूपाभस्म ७ भाग, हीराभस्म १३ भाग, सोनामाखीभस्म १६ भाग, हीराकसीस १८ भाग, तूतिया ६ भाग, हरिताल ४ भाग, मैनशिल ३ भाग, शिलाजीत (शिलारस) ५ भाग, मोती १ भाग और सुहागा २ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें सात भावना देकर पश्चात् खरल करके गोली बना लेवे ॥ ८८-९४ ॥ पानकद्वितये कृत्वा मुद्रयेत्पानकद्वयम् । घटमध्ये निवेश्याथ दत्त्वा पूर्वञ्च वालुकाम् ॥९५॥ ऊर्ध्वञ्च तां पुनर्द्दत्त्वा वालुकां मुद्रयेन्मुखम् । अहोरात्रं दहेदग्नौ स्वांगशीतं समुद्धरेत् ॥ ९६ ॥ बकुलस्य च बीजेन कण्टकारिद्वयेन च । गुडूचीत्रिफलावारा भावयेत्सप्तसप्ततः ॥ ९७ ॥ वृद्धदाररसेनापि तथा देयास्तु भावनाः । गिरिकर्ण्या रसेनापि रोहितमत्स्यपित्ततः ॥ ९८ ॥ एवं सिद्धो भवेत्सम्यक् रसोऽसौ वारिशोषणः । देवान्गुरून्समभ्यर्च्य यतिनो ब्राह्मणांस्तथा ॥९९॥ रक्तिकाद्वितयं देयं सन्निपाते समुच्छ्रये । मरिचेन समं देयं तेन जागर्ति मानवः ॥ १०० ॥ श्लैष्मिके च गदे देयं ग्रहण्यामग्निमान्द्यके । प्लीह्नि पाण्डौ प्रयोक्तव्यं त्रिकटुत्रिफलाम्भसा १०१॥ शूलरोगे प्रयोक्तव्यमुदावर्त्ते विशेषतः । कुष्ठे सुदुष्टे देयोऽयं काकोडुम्बरिकाम्भसा ॥१०२॥
( ४५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अतिवह्निकरः श्रीदो बलवर्णाग्निवर्द्धनः । धन्वन्तरिकृतः सद्यो रसः परमदुर्लभः । सर्वरोगे प्रयोक्तव्यो निःसंदेहं भिषग्वरैः ॥ १०३ ॥ फिर इन गोलियोंको शराव सम्पुटमें रखकर कपरमिट्टी कर देवे । फिर इस सम्पुटको एक हांडीमें रख बालूसे भर देवे । फिर इस हांडीके मुखको कपरमिट्टीसे बंद करके एक दिनरात पकावे । शीतल होनेपर उतारकर उसका चूर्ण कर लेवे, फिर इस चूर्णको मौलसिरीके बीजोंके क्वाथ, कटेरीके क्वाथ, बड़ीकटेरीके क्वाथ, गिलोयके क्वाथ, त्रिफलेके क्वाथ, बिधारेके बीजोंके क्वाथ, अपराजिताकी जड़के रस और मछलीके पित्तमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् देवता, गुरु, साधु और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । संज्ञाहीन सन्निपातग्रसित रोगीको मारिचोंके चूर्णके साथ इस औषधिका सेवन करावे तो संज्ञा प्राप्त होजाती है । कफज रोग, संग्रहणी, मंदाग्नि, प्लीहा, पाण्डु, शूल और उदावर्त रोगमें इस औषधिको त्रिकुटे और त्रिफलेके क्वाथके साथ और कुष्ठरोगमें कठूमरके रसके साथ इसका प्रयोग करे । यह अत्यंत अग्निको दीपन करनेवाली, लक्ष्मीजनक, बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाली है । भिषक्गण निश्चय चित्तसे सब रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करें । इस वारिशोषण रसको स्वयं धन्वन्तरि भगवान्ने कहा है ॥ ९५-१०३ ॥ सर्वतोभद्र रस । सूतं गन्धं तपनगगनं कान्तलौहस्य चूर्णं, कृत्वैकस्मिन्दृषदि पिषितं शृङ्गवेरस्य वारा । युञ्ज्याद्रोगे यकृति गुदजे प्लीह्नि सर्वज्वरेषु, शोथे पाण्डौ क्रिमिकृतगदे सर्वतः कामलायाम् ॥ १०४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४५७ ) कासे श्वासे च मेहे जठरजलगदे सर्वदोषप्रभूते,ख्यातो योगःसुराणामधिपतिविहितःसर्वतोभद्र एषः १०५॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे प्लीहाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, तांवाभस्म, अभ्रकभस्म और कान्तलोहभस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरकके रसमें खरल करके यकृत, अर्श, प्लीहा, सब प्रकारके ज्वर, शोथ, पांडु, क्रिमिजन्य रोग, कामला, खांसी, श्वास, प्रमेह और त्रिदोषज जलोदररोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । इस सर्वतोभद्र रसको महात्मा इन्द्रदेवने कहा है ॥ १०४ ॥ १०५ ॥ इति प्लीहरोगचिकित्सा समाप्त । अथ शोथरोगचिकित्सा । त्रिकट्वाद्यलोह । त्रिकटु त्रिफला दन्ती मार्गत्रिमदशुण्ठकैः । पुनर्नवासमायुक्तं शोथं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ लौहं शोथोदरस्थौल्यं जलोदरनिवारणम् ॥ १ ॥ सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड, बहेडा, आमला, दंतीकी जड़, चिरचिटेकी जड़, चित्रक, नागरमोथा, वायविडंग, सोंठ और पुनर्नवा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहा १३ भाग लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार यथोक्त अनु- पानके साथ सेवन करनेसे दुर्निवार शोथरोग, उदररोग, मेदरोग और जलोदररोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकट्वाद्यलोह कहते हैं ॥ १ ॥ कटुकाद्यलोह । कटुकी त्र्यूषणं दंती विडंगं त्रिफला तथा । चित्रको देवकाष्ठञ्च त्रिवृद्धारणपिप्पली ॥ २ ॥ तुल्यान्येतानि चूर्णानि द्विगुणं स्यादयोरजः । क्षीरेण पीतमेतत्तु श्रेष्ठं श्वयथुनाशनम् ॥ ३ ॥
( ४५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुटकी, सोंठ, मिरच, पीपल, दंती, वायविडंग, हरड, बहेडा, आमला, चित्रककी जड, देवदारु, निसोथकी जड और गज- पीपल इन सब औषधियोंका चूर्ण प्रत्येक एक एक भाग और लोह- भस्मका चूर्ण सब औषधिसे दुगुना लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके यथोचित मात्रासे दूधके साथ सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको कटुकाद्यलोह कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ त्र्यूषणाद्यलोह । अयोरजस्त्र्यूषणयावशूकं चूर्णञ्च पीतं त्रिफला- रसेन । शोथं निहन्यात्सहसा नरस्य यथाऽशनि- र्वृक्षमुदीर्णवेगः ॥ ४ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्मका चूर्ण ४ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथके साथ यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको त्र्यूषणाद्यलोह कहते हैं ॥ ४ ॥ सुवर्चलाद्यलोह । सुवर्चला व्याघ्रनखं चित्रकं कटुरोहिणी । चव्यञ्च देवकाष्ठञ्च दीप्यकं लोहमेव च ॥ शोथं पाण्डुं तथा कासमुदराणि निहन्ति च ॥ ५ ॥ काला नमक, नखी, चित्रककी जड, कुटकी, देवदारु और अजवायन यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म ७ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानु- सार सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु, खांसी और सब प्रकारके उदररोग नष्ट होते हैं । इसको सुवर्चलाद्यलोह कहते हैं ॥ ५ ॥ क्षारगुटिका । क्षारद्वयं स्याल्लवणानि पञ्च अयश्चतुष्कं त्रिफला च व्योषम् । सपिप्पलीमूलविडङ्गसारं मुस्ताजमोदा-
भाषाटीकासहित । ( ४५९ ) ऽमरदारु बिल्वम् ॥ ६ ॥ कलिङ्गकश्चित्रकमूल- पाठा यष्ट्याह्वयं सातिविषं पलाशम् । सहिंगुकर्षं त्वतिसूक्ष्मचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठिकानाम् ॥ ७ ॥ स्याद्भस्मनस्तत्सलिलेन साध्यमालोक्य यावद्धनमप्यदग्धम् । स्त्यानं ततः कोलसमां च मात्रां कृत्वा तु शुष्कां विधिना प्रयुंज्यात् ॥ ८ ॥ प्लीहोदरं श्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोथ- शोषान् । विषूचिकागुल्मगराश्मरीश्च सश्वास- कासान् प्रणुदेत् सकुष्ठान् ॥ ९ ॥ जवारखार, सज्जी, *पांचों लवण, कान्तलोह, तीक्ष्णलोह, मुण्डलोह, मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, पीपलामूल, वायविडंग, नागरमोथा, अजवायन, देवदारु, बेलकी जड़की छाल, इन्द्रजौ, चित्रककी जड़, पाठ, मुलैठी, अतीस, ढाकके बीज और हींग इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । फिर सूखी मूलीकी भस्म एक द्रोण परिमाण लेकर आठगुने जलमें पकावे; जब पककर आधा जल बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इसको २१ वार टपकावे और जो क्षार इकट्ठा होय उसको उतारकर एक बर्त्तनमें करलेवे । फिर इस क्षारजलमें उपरोक्त यवक्षारादिके चूर्णसे चौगुना जल डालकर पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब उसमें उक्त जवारखारादिका चूर्ण डालकर खूब करछीसे घोटकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । जब यह सूख जाय तब विधि
- “सौवर्चलं सैन्धवञ्च विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रलवणञ्चात्र जलमष्टगुणं भवेत् ॥”
( ४६० ) रसेंद्रसारसंग्रह । पूर्वक इसका सेवन करे । इससे प्लीहोदर, श्वित्र, हलीमक, बवासीर, पाण्डुरोग, अरुचि, शोथ, शोष, विसूचिका, गुल्म, विषदोष, अश्मरी, श्वास, खाँसी और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ ६-९ ॥ वंगेश्वर रस । सूतभस्म वंगभस्म भागैकैकं प्रकल्पयेत् । गन्धकं मृतताम्रञ्च प्रत्येकञ्च चतुर्गुणम् ॥ १० ॥ अर्कक्षीरैर्द्दिनं मर्द्यं सर्वं तद्गोलकीकृतम् । रुद्ध्वा तु भूधरे पक्त्वा पुटकेन समुद्धरेत् ॥ ११ ॥ एष वंगेश्वरो नाम्ना प्लीहगुल्मोदराञ्जयेत् । घृतैर्गुञ्जाद्वयं लिह्यान्निष्कां श्वेतपुनर्नवाम् ॥ गवां मूत्रैः पिबेच्चानु रजनीं वा गवां जलैः ॥ १२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शोथाधिकारः । रससिन्दूर और वंगभस्म यह प्रत्येक दोनों एक एक भाग लेवे, गन्धक और तांबाभस्म यह प्रत्येक चार चार भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर आकके दूधमें खरल करके गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर और उस मूषाको बन्द करके भूधर- यन्त्रमें पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब उतारकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर घृतमें मिलाकर चाटनेसे प्लीहा, गुल्म और उदररोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे अन्तमें चार मासे परिमाण श्वेतपुनर्नवाके चूर्ण अथवा चार मासे हल्दीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ १०-१२ ॥ इति शोथरोगचिकित्सा समाप्त ।
भाषाटीकासहित । (४६१) अथ अर्बुदरोगचिकित्सा । रौद्ररस । शुद्धसूतं समं गन्धं मर्द्यं यामचतुष्टयम् । नागवल्लीरसैर्युक्तं मेघनादपुनर्नवैः ॥ १ ॥ गोमूत्रपिप्पलीयुक्तं मर्द्यं रुध्वा पुटेल्लघु । लिह्यात्क्षौद्रे रसो रौद्रो गुञ्जामात्रोऽर्बुदं जयेत् ॥२॥ शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर चार प्रहरतक पानाके रस, चौलाईके रस, पुनर्नवेके रस, गोमूत्र और पीपलके क्वाथमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर लघुपुटमें पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे अर्बुदरोग नष्ट होता है । इसको रौद्ररस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ रामबाणादिकान्योगवाहिनोऽत्र प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्बुदाधिकारः । रामबाण प्रभृति समस्त योगवाही औषधि इस अर्बुदरोगमें प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ३ ॥ इति अर्बुदरोगचिकित्सा समाप्त । अथ श्लीपदरोगचिकित्सा । नित्यानन्द रस । हिंगुलसम्भवं सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् । वङ्गं तालञ्च तुत्थञ्च शंखं कांस्यं वराटकम् ॥ १ ॥ त्रिकटुत्रिफलालौहं विडङ्गं पटुपञ्चकम् । चविका पिप्पलीमूलं हबुषा च वचा तथा ॥ २ ॥ शटी पाठा देवदारु एला च वृद्धदारकम् । एतानि समभागानि वटिकां कुरु यत्नतः ॥ ३ ॥ १६
( ४६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हरीतकीरसं दत्त्वा पञ्चगुञ्जामितां शुभाम् । एकैकां भक्षयेन्नित्यं शीतं वारि पिबेदनु ॥ ४ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसगतञ्च यत् । मेदोगतं धातुगतं हन्त्यवश्यं न संशयः ॥ ५ ॥ श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो विश्वसम्पदे । नित्यानन्दकरश्चायं यत्नतः श्लीपदे गदे ॥ ६ ॥ सिंगरफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, तांबाभस्म, वंगभस्म, हरि- तालभस्म, तूतिया, शंखकी भस्म, काँसाभस्म, कौड़ीकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोहा, वायविडंग, पांचों लवण, चव्य, पीपलामूल, हाऊबेर, वच, कचूर, पाठ, देवदारु, इला- यची और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर हरड़के रसमें खरल करके पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रति- दिन एक एक गोली सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफवातजनित श्लीपद रोग, रुधि- रगत, मांसगत, मेदोगत और धातुगत श्लीपदरोग नष्ट होता है । श्रीमान् गहनानन्दनाथने संसारकी रक्षाके लिये सदैव आनन्दजनक ऐसी यह औषधि कही है । इसको नित्यानन्द रस कहते हैं ॥ १–६ ॥ कणादि वटी । कणावचादारुपुनर्नवानां चूर्णं सबिल्वं समवृद्धदारकम् । संमर्द्य चैतस्य निहन्ति वल्लःसकाञ्जिकःश्लीपदमुग्रवेगम् ७ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे श्लीपदाधिकारः । पीपल, वच, देवदारु, पुनर्नवा, बेलागिरी और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । कांजीके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रबल श्लीपदरोग नष्ट होता है ॥ ७ ॥ इति श्लीपदरोगचिकित्सा समाप्त ।
भाषाटीकासहित । (४६३) अथ भगन्दररोगचिकित्सा । वारिताण्डव रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं कुमारीरसमर्दितम् । त्र्यहान्ते गोलकं कृत्वा ततस्तेन प्रलेपयेत् ॥ १ ॥ द्वयोः समं ताम्रपत्रं हण्डिकान्तर्निवेशयेत् । तद्भाण्डं भस्मनापूर्य चुल्ल्यां तीव्राग्निना पचेत्॥२॥ द्वियामान्ते समुद्धृत्य चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् । जम्बीरस्य रसैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सप्तपुटे पचेत् ॥ ३ ॥ गुञ्जैकां मधुनाज्येन लेह्याद्धन्ति भगन्दरम् । मूसली लवणञ्चानु आरनालयुतं पिबेत् ॥ ४ ॥ भुञ्जीत मधुराहारं दिवा स्वप्नञ्च मैथुनम् । वर्जयेच्छीतलाहारं रसेऽस्मिन्वारिताण्डवे ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर घीकारके रसमें तीन दिन तक खरल करके कल्कसा बना लेवे. फिर बराबर भाग पारे और गंधकके तांबेके पत्रोंको लेकर उनके ऊपर इसका लेप कर देवे । फिर उपरोक्त ताम्रपत्रोंको एक हांडीमें रखकर उसके ऊपर एक छोटासा सिकोरा ढक देवे और उसके ऊपरके भागको राखसे भर देवे । फिर तीव्र अग्निसे दो प्रहरतक पकावे, जब अपने आप शीतल होजाय तब उसका चूर्ण कर लेवे । पश्चात् जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सुखा लेवे । फिर इसको मूषामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस प्रकार सात बार जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सात बार पुट देवे । इस- मेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहत और घीमें मिला करके चाटे तो भगन्दर रोग नष्ट होता है । इसके भक्षण करनेके बाद मुसली, सेंधानमक और कांजी इनको एकत्र मिलाकर पान करे । इसके सेवन
भाग और गंधक->भाग. In line 5: शुद्धवलिना. Let's look at व: indeed, no cut inside. But let's check: in Sanskrit it's often written शुद्धबलिनाorशुद्धवलिना(व/ब interchangeable). I will transcribeशुद्धवलिनाorशुद्धबलिना? In line 7: निम्बूजलैः(ब with dot/loop). In line 8:गुञ्जोन्मितः. Let's look closely at शुद्धवलिनाvsशुद्धबलिना: there is a very faint diagonal slash or is it just व? It looks like व, but शुद्धवलिनाis totally normal in Sanskrit prints.) * Line 6:शुद्धं ताम्रमयः समस्ततुलितं पात्रं निधायोपरि । Wait,ताम्रमयः->ताम्रमयः(taamramayah = copper and iron, ताम्र + अयस्). समस्ततुलितं-> equal to all (i.e. equal to mercury + sulfur). पात्रं निधायोपरि । * Line 7:स्वेद्यं यामयुगञ्च भस्म पिठरे निम्बूजलैः सप्तधा, -स्वेद्यं यामयुगञ्च` (with
भाषाटीकासहित । ( ४६५ ) अथ कुष्ठरोगचिकित्सा । कन्याकोटिप्रदानेन गङ्गायां पितृतर्पणे । विश्वेश्वरपुरीवासे तत्फलं कुष्ठनाशने ॥ १ ॥ गवां कोटिप्रदानेन अश्वमेधशतेन च । वृषोत्सर्गे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं कुष्ठनाशने ॥ २ ॥ जो फल करोड़ कन्या प्रदान करनेसे होता है, जो फल गंगामें पितृ- तर्पण करनेसे होता है, जो फल काशीमें निवास करनेसे होता है, जो फल करोड़ गोदान करनेसे होता है, जो फल सौ अश्वमेध यज्ञ कर- नेसे होता है तथा जो पुण्य वृषोत्सर्ग करनेसे संचय होता है वही फल केवल एक कुष्ठरोगीको आरोग्य करनेमें होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गलत्कुष्ठारि रस । रसो वलिस्ताम्रमयः पुरोऽग्निशिलाजतु स्याद्विष- तिन्दुकोग्रे । सर्वञ्च तुल्यं गगनं करञ्जबीजं तथा भागचतुष्टयञ्च ॥ ३ ॥ संमर्द्य गाढं मधुना घृतेन वल्लद्वयञ्चास्य निहन्त्यवश्यम् । कुष्ठं किलासं ह्यपि वातरक्तं जलोदरं वाथ विबद्धमूलम् । विशीर्णकर्णा- ङ्गुलिनासिकोऽपि भवेत्प्रसादात्स्मरतुल्यमूर्तिः ॥४॥ पारा, गन्धक, तांबाभस्म, लोहभस्म, गूगल, चित्रककी जड़, शिला- जीत, शुद्ध कुचले और वच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, अभ्रक और करंजके बीज यह प्रत्येक चार चार भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थोड़ेसे घी और सहतमें सानकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठ, किलास, वातरक्त और बँधी हुई जड़वाला जलोदर रोग नष्ट हो जाता है । कुष्ठरोगमें जिस मनुष्यके कान, अंगुली और नासिका गल गई वह इस औषधिके प्रभावसे कामदेवके समान स्वरूपवान् होजाता है । इसको गलत्कुष्ठारि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
( ५६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उदयभास्कर । गन्धकेन मृतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतञ्च द्विभागिकम् ॥ ५ ॥ सूक्ष्मचूर्णीकृतं सर्वं रक्तिकैकप्रमाणतः । दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः ॥ ६ ॥ गलिते स्फुटिते चैव विषूच्यां मण्डले तथा । विचर्चिकादद्रुपामाकुष्ठरोगप्रशान्तये ॥ ७ ॥ गंधकसे मारा हुआ तांबा १० भाग, काली मिरच ५ भाग, विष २ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको यथोचित अनुपानके साथ कुष्ठरोगीको देवे । गला हुआ और फूटा हुआ ऐसे कुष्ठरोगमें, विषू- चिकामें, मण्डलरोगमें और विचर्चिका, दद्रु, पामा इत्यादि कुष्ठ रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करे । इसको उदयभास्कर रस कहते हैं॥५-७॥ तालकेश्वर रस । धात्रीटंकणतालानां दशभागं समुद्धरेत् । धात्र्या रसैर्मर्दयित्वा शिखरीमूलवारिणा ॥ सर्वकुष्ठहरः सेव्यः सर्वदा भोजनप्रियः ॥ ८ ॥ आमला, सुहागा और हरिताल यह प्रत्येक औषधि दश तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर आमले और चिरचिटेके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कुष्ठ रोग नष्ट होता है ॥८॥ ब्रह्म रस । भागैकं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं त्वथवागुजी । चूर्णन्तु ब्रह्मबीजानां प्रतिद्वादशभागिकम् ॥ ९ ॥ त्रिंशद्भागं गुडस्यापि क्षौद्रेण गुटिका कृता । अयं ब्रह्मरसो नाम्ना ब्रह्महत्यादिनाशनः ॥ १० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६७ ) द्विनिष्कं भक्षणाद्धन्ति प्रसुतिकुष्ठमण्डलम् । पातालगरुडीमूलं जलैः पिष्ट्वा पिबेदनु ॥ ११ ॥ मूर्च्छित पारा १ भाग, गंधक, चित्रककी जड़, बावचीके बीज और ढाकके बीज यह प्रत्येक द्वादश ( बारह १२ ) भाग और पुराना गुड़ ३० भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र सहतमें पीसकर आठ आठ मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ब्रह्म- हत्यादिजन्य प्रसुतिरोग और मण्डल कुष्ठ नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके बाद पातालगरुडी (छिरहिंटा) की जड़को जलमें पीसकर सेवन करे । इसको ब्रह्मरस कहते हैं ॥ ९-११ ॥ चन्द्रानन रस । सूतव्योमाग्नयस्तुल्यास्त्रिभागो गन्धकस्य च । काठोडुम्बरिकाक्षीरैः सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ १२ ॥ माषमात्रां गुटीं कृत्वा कुष्ठरोगे प्रयोजयेत् । देहशुद्धिं पुरा कृत्वा सर्वकुष्ठानि नाशयेत् ॥ एष चन्द्राननो नाम साक्षाच्छ्रीभैरवोदितः ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म और चित्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गन्धक ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कठूमरके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रथम वमन और विरेचनके द्वारा शरीरको शुद्ध करके कुष्ठरोगमें इस औषधिका प्रयोग करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । इस चन्द्रानन रसको श्रीभैरवजीने कहा है ॥ १२ ॥ १३ ॥ कुष्ठकालानल रस । गन्धं रसं टङ्कणताम्रलोहं भस्मीकृतं मागधिकासमेतम् । पञ्चाङ्गनिम्बेन फलत्रिकेन विभावितं राजतरोस्तथैव ॥ नियोजयेद्वल्लकयुग्ममानं कुष्ठेषु सर्वेषु च रोगसंघे १४॥
( ४६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गंधक, पारा, सुहागा, तांबाभस्म, लोहभस्म और पीपल इन सबको समान भाग लेकर नींवके पञ्चांगके रसमें सात वार, त्रिफलेके रसमें सात वार और अमलतासके क्वाथमें सात वार भावना देकर चार चार रत्ती परिमाण औषधिका कुष्ठरोग और अन्यान्य समस्त रोगोंमें प्रयोग करे । इसको कुष्ठकालानल रस कहते हैं ॥ १४ ॥ वज्रवटी । शुद्धसूताग्निमरिचं सूताद्द्विगुणगन्धकम् । काठोडुम्बरिकाक्षीरैर्दिनं मर्द्यं प्रयत्नतः ॥ १५ ॥ वराव्योषकषायेण वटीञ्चास्य समाचरेत् । लिह्याद्वज्रवटी ह्येषा पामारोगविनाशिनी ॥ १६ ॥ शुद्ध पारा और चित्रककी जड़, मरिच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, गंधक २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके कठूमरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । पश्चात् त्रिफला और त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पामा रोग नष्ट होता है । इसको वज्रवटी कहते हैं ॥१५॥१६॥ चन्द्रकान्त रस । पलत्रयं मृतं ताम्रं सूतमेकं द्विगन्धकम् । त्रिकटुत्रिफलाचूर्णं प्रत्येकञ्च पलं पलम् ॥ १७ ॥ निर्गुण्ड्याश्चार्द्रकद्रावैर्वह्निद्रावैर्विमर्दयेत् । दिनैकं तद्विशोष्याथ तुषाग्नौ स्वेदयेद्दिनम् ॥ १८ ॥ समुद्धृत्य विचूर्ण्याथ वागुजीतैलमर्दितम् । त्रिदिनं भावयेत्तेन निष्कैकं भक्षयेत्सदा ॥ १९ ॥ चन्द्रकान्तरसो नाम्ना कुष्ठं हन्ति न संशयः । तैलं करञ्जबीजोत्थं वह्निगन्धकसैन्धवैः ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं कल्कं वा वागुजीभवम् ॥ २० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६९ ) तांबेकी भस्म ३ पल, पारा १ पल, गंधक २ पल, त्रिकुटा ३ पल और त्रिफला ३ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हा- लूके पत्तोंके रस, अदरखके रस और चित्रककी जड़के रसमें खरल करके सूर्यकी धूपमें एक दिन सुखाकर मूषामें रखे, पश्चात् तुषोंकी अग्निमें मूषाको रखकर पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब बारीक पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको बावचीके तेलमें खरल करके उसी तेलमें ३ दिन भावना देवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे औषधि सेवन करनेसे अवश्य कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् करंजके तेलमें पिसी हुई चित्रककी जड़, गन्धक और सेंधानमक अथवा बावचीके कल्कको भक्षण करे। इसको चन्द्रकान्त रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ सङ्कोच रस । मृतताम्राभ्रकं तुल्यं तयोः सूतश्चतुर्गुणम् । शुद्धं तन्मर्दयेत्खल्ले गोलकं कारयेत्ततः ॥ २१ ॥ त्रिभिस्तुल्यं शुद्धगन्धं लोहपात्रे क्षणं पचेत् । तन्मध्ये गोलकं पाच्यं यावज्जीर्णं तु गन्धकम्॥२२॥ एतन्मृद्वग्निना तावत्समुद्धृत्य विचूर्णयेत् । गुग्गुलुंनिम्बपञ्चाङ्गं त्रिफला चामृता विषम् ॥ २३ ॥ पटोलं खादिरं सारं व्याधिघातं समं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यं निष्कमौदुम्बरापहम् ॥ रसः संकोचनामायं कुष्ठे परमदुर्लभः ॥ २४ ॥ तांबेकी भस्म १ भाग, अभ्रककी भस्म १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर उसमें दश भाग गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें डालकर पकावे । जबतक गन्धक जीर्ण न होजाय तबतक इसको मन्द मन्द अग्निसे