ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
वे चितकबरे रंग की गाएं तीनों सवनों में इंद्र से संबंधित सोमरस को अपने दूध से
मिश्रित करती हैं जो देवों के जन्मस्थान एवं आदित्य के मनपसंद द्युलोक में प्रवेश कर सकती
हैं एवं जिनके दूध से कुआं भर सकता है. (३)
अभि प्र गोपर्ति गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (४)
गायों के पालक, यज्ञ के पुत्र एवं साधुओं का पालन करने वाले इंद्र की स्तुति उसी
प्रकार करो, जिस प्रकार वे यज्ञ के प्रति जाने का रास्ता जान सकें. (४)
आ हरयः ससृजिरेऽरुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि सन्नवामहे.. (५)
दीप्तिशाली एवं हरितवर्ण के अश्व इंद्र को कुश पर स्थापित करें. हम वहां स्थित इंद्र की
स्तुति करेंगे. (५)
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुहे वज्रिणे मधु. यत्सीमुपह्वरे विदत्.. (६)
जिस समय वज्रधारी इंद्र समीप में रखे हुए सोमरस को प्राप्त करते हैं, उस समय गाएं
इंद्र के लिए मधुर दूध देती हैं जो सोमरस में मिलाया जा सके. (६)
उद्वद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि.
मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (७)
मैं एवं इंद्र जिस समय सूर्य के निवासस्थान में जाते हैं, उस समय मधुर सोमरस पीकर
सबके सखा आदित्य के इक्कीस स्थानों में हम एकत्रित हों. (७)
अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत.. (८)
हे प्रियमेध ऋषि के वंश वाले लोगो! इंद्र की विशेष रूप से पूजा करो. तुम्हारे पुत्र और
तुम इंद्र की इस प्रकार पूजा करो, जिस प्रकार शत्रु का नगर नष्ट करने वाले वीर की पूजा की
जाती है. (८)
अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्षणत्.
पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (९)
घर्घर ध्वनि करता हुआ युद्ध का बाजा बज रहा है. हाथों पर बंधा हुआ गोह का चमड़ा
भी शब्द कर रहा है. पीले रंग की धनुषडोरी शब्द कर रही है. इंद्र को लक्ष्य करके इस समय
स्तुति बोलो. (९)
आ यत्पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः.
अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (१०)
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जिस समय सफेद रंग की, शोभन जल देने वाली एवं बहुत अधिक बढ़ी हुई नदियां
बहती हैं, उस समय तुम इंद्र के पीने के लिए सोमरस को ले जाओ. (१०)
अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत.
वरुण इदिह क्षयत्तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (११)
इंद्र ने सोमरस पिया एवं अग्नि ने सोमरस पिया. देवगण सोमरस पीकर तृप्त हुए. वरुण
सोमरस पीने के लिए यज्ञशाला में निवास करें. गाएं जिस प्रकार बछड़े से मिलने दौड़ती हैं,
उसी प्रकार उक्थ मंत्र वरुण की स्तुति करते हैं. (११)
सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धव:.
अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (१२)
हे वरुण! तुम शोभन देव हो. तुम्हारे समुद्ररूपी तालु में गंगा आदि सात नदियां इस
प्रकार गिरती हैं जिस प्रकार सूर्य के सामने किरणें गिरती हैं. (१२)
यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे.
तक्वो नेता तदिद्वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१३)
जो इंद्र विविध गमन वाले के रथ में भली प्रकार जुते हुए घोड़ों को हव्यदाता यजमान
के पास जाने के लिए चलाते हैं, वे उपमा देने योग्य हैं, यज्ञ में आते हैं, यज्ञ के फल के नेता हैं
एवं उदक उत्पन्न करते हैं. वे असुर आदि से मुक्त रहते हैं. (१३)
अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विष:.
भिनत्कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (१४)
शक्र (इंद्र) युद्ध में सभी शत्रुओं का अतिक्रमण करके चलते हैं. वे सभी द्वेषियों को
छोड़ देते हैं. सुंदर एवं मेघों के ऊपर वर्तमान इंद्र गर्जन एवं वज्र के शब्द से ताड़ित करके
मेघों का भेदन करते हैं. (१४)
अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम्.
स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम्.. (१५)
बालक के समान छोटे शरीर वाले कुमार इंद्र प्रशंसनीय रथ पर बैठते हैं. इंद्र महान् एवं
माता-पिता के सामने इधरधर दौड़ने वाले मृगशावक के समान अनेक कर्मों वाले मेघ को वर्षा
के लिए प्रेरित करते हैं. (१५)
आ तू सुशिप्र दम्पते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्.
अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१६)
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हे शोभन-नासिका वाले एवं गृहस्वामी इंद्र! तुम रथरूपी घर में बैठो. वह रथ सोने का
बना हुआ है, दीप्त, अनेक पहियों वाला, कुशलतापूर्वक चलने वाला एवं पापरहित है. हम
दोनों उस रथ में मिलें. (१६)
तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते.
अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१७)
हव्य-अन्न धारण करने वाले लोग इस प्रकार विराजमान इंद्र की उपासना करते हैं. जब
इंद्र को चलकर स्वयं आने एवं दान के योग्य स्तुतियां प्रेरित करती हैं, तब इंद्र का भली प्रकार
स्थापित धन प्राप्त होता है. (१७)
अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्.
पूर्वामनु प्रयतिं वृक्त बर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१८)
प्रियमेध ऋषि के परिवार वाले लोगों ने देवों के पुराने स्थान अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त
किया है, मुख्य दान के लक्ष्य से कुशों का विस्तार किया है तथा सोमरस आदि प्राप्त किया है.
(१८)
सूक्त—५९ देवता—इंद्र
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः.
विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे.. (१)
मैं प्रजाओं के राजा, रथ द्वारा चलने वाले, गमन में निर्बाध, सभी सेनाओं को तारने
वाले, ज्येष्ठ एवं वृत्रहंता इंद्र की स्तुति करता हूं. (१)
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि.
हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (२)
हे पुरुहन्मा ऋषि! तुम अपनी रक्षा के लिए इंद्र को अलंकृत करो. तुम्हारे विधाता इंद्र
का स्वभाव उग्र एवं कोमल दो प्रकार का है. इंद्र अपने हाथ में दर्शनीय एवं आकाश में सूर्य
के समान दिखाई देने वाला वज्र धारण करते हैं. (२)
नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्.
इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्ण्वोजसम्.. (३)
जो यज्ञसाधनों द्वारा सदा वृद्धि करने वाले, सबके स्तुतियोग्य, महान् अन्यों द्वारा
पराभवरहित एवं सबको दबाने वाली शक्ति से युक्त इंद्र को यज्ञसाधनों द्वारा अपने अनुकूल
बना लेते हैं, उनके कर्म में कोई व्यक्ति बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता. (३)
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अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुजयः.
सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षामो अनोनवुः.. (४)
मैं दूसरों के लिए असहनीय, उग्र व शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले इंद्र की स्तुति
करता हूं. इंद्र के जन्म के समय विशाल एवं वेगशालिनी गायों ने, द्युलोक तथा धरती ने स्तुति
की थी. (४)
यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः.
न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (५)
हे इंद्र! यदि सौ द्यौ एवं सौ भूमियां हो जावें, तब भी तुम्हें नापा नहीं जा सकता. हे
वज्रधारी इंद्र! सौ सूर्य तुम्हें प्रकाशित नहीं कर सकते और न आठ द्यावा-पृथिवी तुम्हारी सीमा
बना सकते हैं. (५)
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा.
अस्माँ अव मघवन्गोमति व्रजे वज्रिश्चित्राभिरूतिभिः.. (६)
हे अभिलाषापूरक, अतिशय शक्तिशाली, धनस्वामी एवं वज्रधारी इंद्र! तुमने अपनी
महान् शक्ति द्वारा शत्रुओं की आयुध बरसाने वाली सेनाओं को वश में किया है. तुम नाना
रक्षासाधनों द्वारा शत्रुओं से हमारी गोशाला की रक्षा करो. (६)
न सीमदेव आपदिषं दीर्घायो मर्त्यः.
एतग्वा चिद्य एतशा युयोजते हरी इन्द्रो युयोजते.. (७)
हे दीर्घ आयु वाले इंद्र! देवों को न मानने वाला मनुष्य सब अन्न प्राप्त नहीं करता. जो
मनुष्य इंद्र के श्वेतवर्ण अश्वों को रथ में जोड़ता है, इंद्र अपने घोड़ों की सहायता से उसी के
यज्ञ में आते हैं. (७)
तं वो महो महाय्यमिन्द्रं दानाय सक्षणम्.
यो गाधेषु य आरणेषु हव्या वाजेष्वस्ति हव्यः.. (८)
हे महान् ऋत्विजो! दान पाने के लिए तुम उस पूज्य इंद्र की सेवा करो. इंद्र जलप्राप्ति
के लिए निचले स्थानों में पहुंचने के लिए तथा युद्ध में विजय पाने के लिए बुलाने योग्य हैं.
(८)
उद् षु णो वसो महे मृशस्व शूर राधसे.
उद् षु मह्यै मघवन्मघत्तय उदिन्द्र श्रवसे महे.. (९)
हे निवासस्थान देने वाले एवं शूर इंद्र! महान् अन्न देने के लिए हमें उन्नत करो. हे
धनस्वामी एवं शूर इंद्र! हमें महान् धन एवं विशाल कीर्ति देने का प्रयास करो. (९)
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त्वं न इन्द्र ऋतयुस्त्वानिदो नि तृम्पसि.
मध्ये वसिष्व तुविन्मृणोर्वोर्नि दासं शिश्नथो हथैः.. (१०)
हे यज्ञाभिलाषी इंद्र! तुम अपने निंदक का धन छीनकर बहुत प्रसन्न होते हो. हे अधिक
धन वाले इंद्र! हमारी रक्षा के लिए तुम हमें अपनी दोनों जांघों के बीच छिपा लो एवं हमसे
द्वेष करने वाले दासों को आयुधों द्वारा मारो. (१०)
अन्यव्रतममानुषमयज्वानमदेवयुम्.
अव स्वः सखा दुधुवीत पर्वतः सुघ्नाय दस्युं पर्वतः.. (११)
हे इंद्र! तुम्हारे मित्र पर्वत ऋषि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के लिए यज्ञ करने वाले,
मानव से भिन्न, यज्ञरहित व देवों को न मानने वाले को स्वर्ग से नीचे गिरा देते हैं एवं दस्यु को
मृत्यु की ओर प्रेरित करते हैं. (११)
त्वं न इन्द्रासां हस्ते शविष्ठ दावने.
धानानां न सं गृभायास्मयुर्द्धिः सं गृभायास्मयुः.. (१२)
हे शक्तिशाली इंद्र! तुम हमें देने की अभिलाषा से गायों को इस प्रकार ग्रहण करो, जिस
प्रकार जौ हाथ में लिए जाते हैं. तुम हमें देने की अभिलाषा से अधिक वस्तुएं हाथ में लो.
(१२)
सखायः क्रतुमिच्छत कथा राधाम शरस्य.
उपस्तुतिं भोजः सूरियों अहयः.. (१३)
अध्वर्यु मित्रो! तुम इंद्र संबंधी यज्ञ करने की इच्छा करो. हम शत्रुहिंसक इंद्र की स्तुति
कैसे करेंगे? शत्रुओं को खाने वाले एवं मित्रों के रक्षक इंद्र शत्रुओं को झुकाते हैं. (१३)
भूरिभिः समह ऋषिभिर्बर्हिष्मद्भिः स्तविष्यसे.
यदित्यमेकेमेकमिच्छर वत्सानपराददः.. (१४)
हे सब लोगों द्वारा पूज्य इंद्र! बहुत से ऋषियों और ऋत्विजों द्वारा तुम्हारी स्तुति की
जाती है. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम स्तोताओं को एक-एक करके अनेक प्रकार से बछड़े देते हो.
(१४)
कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत्. अजां सूरिर्न धातवे.. (१५)
धनी इंद्र संग्राम में शत्रुओं से छीनी हुई गायों को एवं उनके बछड़ों को कान पकड़कर
हमारे पास इस प्रकार ले आवें, जिस प्रकार बालक बकरी को पानी पिलाने ले जाता है. (१५)
सूक्त—६० देवता—अग्नि
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः. उत द्विषो मर्त्यस्य.. (१)
हे अग्नि! तुम महाधन देकर दानरहित लोगों से हमारी रक्षा करो एवं हमें शत्रु लोगों से बचाओ. (१)
नहि मन्युः पौरुषेय ईशे हि वः प्रियजात. त्वमिदसि क्षपावान्.. (२)
हे प्रिय जन्म वाले अग्नि! पुरुषों का क्रोध तुम्हें बाधा नहीं पहुंचा सकता. तुम ही रात में तेजस्वी हो. (२)
स नो विश्वेभिर्देवेभिरूर्जो नपाद्द्रशोचे. रयिं देहि विश्ववारम्.. (३)
हे शक्ति के नाती एवं स्तुति योग्य प्रकाश वाले अग्नि! तुम सब देवों के साथ मिलकर हमें सबके वरण करने योग्य धन दो. (३)
न तमग्ने अरातयो मर्तं युवन्त रायः. यं त्रायसे दाश्वांसम्.. (४)
हे अग्नि! तुम जिस हव्यदाता यजमान का पालन करते हो, उसे धनी एवं दानरहित लोग अपने से अलग नहीं कर सकते. (४)
यं त्वं विप्र मेधसातावग्ने हिनोषि धनाय. स तवोती गोषु गन्ता.. (५)
हे अग्नि! जिस हव्यदाता यजमान का तुम यज्ञ में धन देने के लिए प्रेरित करते हो, वह तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर गायों वाला बनता है. (५)
त्वं रयिं पुरुवीरमग्ने दाशुषे मर्ताय. प्र णो नय वस्यो अच्छ.. (६)
हे अग्नि! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को अनेक वीर पुत्रों से युक्त धन देते हो, इसलिए हमें भी निवासस्थान देने योग्य धन दो. (६)
उरुष्या णो मा परा दा अघायते जातवेदः. दुराध्ये३ मर्ताय.. (७)
हे जातवेद अग्नि! हमारी रक्षा करो. हमें पाप की इच्छा करने वाले एवं हिंसकबुद्धि मनुष्य को मत सौंपो. (७)
अग्ने माकिष्टे देवस्य रातिमदेवो युयोत. त्वमीशिषे वसूनाम्.. (८)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम धनों के स्वामी हो. कोई भी देवरहित व्यक्ति तुम्हारे दान को दूर नहीं कर सकता. (८)
स नो वस्व उप मास्यूर्जो नपान्माहिनस्य. सखे वसो जरितृभ्यः.. (९)
हे बल के नाती, सखा एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम हम स्तोताओं को महान्
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धन दो. (९)
अच्छ नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्.
अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (१०)
हमारी स्तुतियां जलाने वाली ज्वालाओं से युक्त एवं दर्शनीय अग्नि के सामने जावें. रक्षा
पाने के लिए हमारे यज्ञ हव्य अन्न से युक्त होकर अधिक धन वाले एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित
अग्नि के समीप जाएं. (१०)
अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्.
द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वो होता मन्द्रतमो विशि.. (११)
सभी स्तुतियां वरण करने योग्य, धनदान के निमित्त, बल के पुत्र एवं जातधन अग्नि के
सामने जाएं. मरणरहित अग्नि मनुष्यों में दो रूपों में रहते हैं. देवों में अमर एवं मानवों में होम
पूरा करने वाले तथा प्रजाओं में अतिशय प्रसन्न करने वाले. (११)
अग्निं वो देवयज्ययाग्निं प्रयतध्वरे.
अग्निं धीषु प्रथममग्निमर्वत्यग्निं क्षेत्राय साधसे.. (१२)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे देवसंबंधी यज्ञ के आरंभ होने पर अग्नि की स्तुति करता हूं. मैं
यज्ञ प्रारंभ करने के समय, बंधु-भाव प्राप्त होने पर एवं क्षेत्र-लाभ होने पर सब देवों से पहले
अग्नि की स्तुति करता हूं. (१२)
अग्निरिषां सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम्.
अग्निं तोके तनये शश्वदीमहे वसुं सन्तं तनूषाम्.. (१३)
वरण करने योग्य धनों के स्वामी अग्नि हम मित्रों को अन्न दें. हम निवासस्थान देने वाले
एवं अंगों का पालन करने वाले अग्नि से अपने पुत्र और पौत्र के लिए बहुत सा धन मांगते हैं.
(१३)
अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्.
अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरोऽग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१४)
हे पुरुमीढ ऋषि! तुम मंत्रों द्वारा दाहक ज्वालाओं वाले अग्नि की स्तुति रक्षा एवं धन
पाने के लिए करो. अन्य यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. तुम अग्नि से मेरे लिए घर
मांगो. (१४)
अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे.
विश्वासु विश्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुतॄंऋषूणाम्.. (१५)
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सूक्त—६१ देवता—अग्नि
हम शत्रुओं से बचने के लिए सुख एवं भयहीनता के लिए अग्नि की स्तुति करते हैं.
संपूर्ण प्रजाओं के रक्षक अग्नि ऋषियों को निवासस्थान देने वाले तथा बुलाने योग्य हैं. (१५)
सूक्त—६१ देवता—अग्नि
हविष्कृणुध्वमा गमदध्वर्युर्वनते पुनः. विद्वाँ अस्य प्रशासनम्.. (१)
हे अध्वर्युगण! अग्नि आए हैं. तुम उन्हें शीघ्र हव्य दो. हव्य देना जानने वाले अध्वर्यु यज्ञ
की पुनः सेवा करते हैं. (१)
नि तिग्ममभ्यं१ शुं सीदद्धोता मनावधि. जुषाणो अस्य सख्यम्.. (२)
होता तीखी ज्वाला वाले अग्नि की मित्रता यजमान से कराता हुआ अग्नि के पास
बैठता है. (२)
अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया. गृभ्णन्ति जिह्वया ससम्.. (३)
होता अपनी बुद्धि के बल से यजमान का मनोरथ पूरा करने के लिए दुःख नष्ट करने
वाले अग्नि को सामने स्थापित करना चाहते हैं. होता बाद में अग्नि की स्तुतियां बोलते हुए
ग्रहण करते हैं. (३)
जाम्यतीतपे धनुर्वयोधा अरुहद्वनम्. दृषदं जिह्वयावधीत्.. (४)
अन्य देने वाले अग्नि सबसे ऊपर वर्तमान अंतरिक्ष को भी अतिक्रमण कर जाते हैं.
अपनी ज्वाला से मेघ का वध करने वाले अग्नि जल को मुक्त करने के लिए ऊपर चढ़ते हैं.
(४)
चरन्वत्सो रुशन्निह निदातारं न विन्दते. वेति स्तोतव अम्ब्यम्.. (५)
बछड़े के समान इधर-उधर घूमने वाले एवं श्वेत रंग वाले अग्नि को इस संसार में रोकने
वाला कोई नहीं मिलता, वे स्तोता के स्तोत्रों की कामना करते हैं. (५)
उतो न्वस्य यन्महदश्वावद्योजनं बृहत्. दामा रथस्य ददृशे.. (६)
अंतरिक्ष में आदित्यरूपी अग्नि के रथ में घोड़े जोड़ने का महान् एवं विशाल कार्य
दिखाई देता है तथा रथ की रस्सियां दिखाई देती हैं. (६)
दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः. तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे.. (७)
शब्द करने वाले सिंधु तट पर सात ऋत्विज् जल का दोहन करते हैं. इन में भी दो शेष
पांच को प्रयुक्त करते हैं. (७)
आ दशभिर्विवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत्. खेदया त्रिवृता दिवः.. (८)
यजमान ने दस उंगलियों द्वारा इंद्र से याचना की. इंद्र ने आकाश में तीन प्रकार की
किरणों द्वारा मेघ से जल टपकाया. (८)
परि त्रिधातुरध्वरं जूर्णिरिति नवीयसी. मध्वा होतारो अञ्जते.. (९)
तीन रंगों वाले एवं वेगवान् अग्नि अपनी नवीन ज्वाला के साथ यज्ञ में जाते हैं. अध्वर्यु
आदि घी एवं मधु से उसकी पूजा करते हैं. (९)
सिञ्चन्ति नमसावतमूच्चाचक्रं परिज्मानम्. नीचीनबारमक्षितम्.. (१०)
अध्वर्यु नमस्कार के द्वारा अवनत, ऊपर स्थित चक्र वाले, सब ओर व्याप्त, नीचे की
ओर द्वार वाले एवं अक्षीण अग्नि को सींचते हैं. (१०)
अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु. अवतस्य विसर्जने.. (११)
आदर करते हुए अध्वर्युगण समीपवर्ती एवं रक्षक अग्नि के विसर्जन के समय
विशालपात्र में मधु सिक्त करते हैं. (११)
गाव उपावतावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१२)
हे गायो! यज्ञ के लिए दोहन के समय तुम रक्षक अग्नि के पास जाओ. अग्नि के दोनों
कान सोने के हैं. (१२)
आ सुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम्. रसा दधीत वृषभम्.. (१३)
हे अध्वर्युगण! दूध दुह लेने के बाद द्यावा-पृथिवी पर आश्रित दूध को सींचो. इसके बाद
बकरी के दूध में अग्नि को स्थापित करो. (१३)
ते जानत स्वमोक्यं१ सं वत्सासो न मातृभिः. मिथो नसन्त जामिभिः.. (१४)
गायों ने अपने निवासदाता अग्नि को जाना. बछड़े जिस प्रकार अपनी माताओं से
मिलते हैं, उसी प्रकार गाएं अपने साथ की दूसरी गायों को लेकर अग्नि से मिलती हैं. (१४)
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि. इन्द्रे अग्ना नमः स्वः.. (१५)
ज्वाला के द्वारा भक्षण करने वाले अग्नि का अन्न अंतरिक्ष में इंद्र और अग्नि का पोषण
करता है. इंद्र एवं अग्नि को हव्य अन्न दो. (१५)
अधुक्षत्पिप्युषीमिषमूर्जं सप्तपदीमरिः. सूर्यस्य सप्त रश्मिभिः.. (१६)
अध्वर्यु वायु एवं गतिशील माध्यमिकी वाक् के द्वारा सूर्य की सात किरणों से बढ़े हुए
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अन्न एवं रस को दुहते हैं. (१६)
सोमस्य मित्रावरुणोदिता सूर आ ददे. तदातुरस्य भेषजम्.. (१७)
हे मित्र व वरुण! निकल आने पर सूर्य सोमरस ग्रहण करते हैं. वह ग्रहण हम बीमारों
की दवा है. (१७)
उतो न्वस्य यत्पदं हर्यतस्य निधान्यम्. परि द्यां जिह्वयातनत्.. (१८)
सोमरस देने वाले मुझ हर्यत ऋषि का स्थान हव्य रखने योग्य है. वहां बैठकर अग्नि
अपनी ज्वाला से द्युलोक को भरते हैं. (१८)
सूक्त—६२ देवता—अश्विनीकुमार
उदीराथामृतायते युञ्जाथामश्विना रथम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ की अभिलाषा करने वाले मेरे लिए उन्नत बनो एवं यज्ञ में आने
के लिए रथ में घोड़े जोड़ो. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (१)
निमिषश्चिज्जवीयसा रथेना यातमश्विना. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! आंखों के निमेष से भी अधिक गतिशील रथ द्वारा हमारे यज्ञ में
आओ. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (२)
उप स्तृणीतमत्रये हिमेन घर्ममश्विना. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! असुरों द्वारा अग्नि में फेंके हुए अत्रि ऋषि की जलन दूर करने के
लिए जल छिड़को. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (३)
कुह स्थ: कुह जग्मथु: कुह श्येनेव पेतथु:. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम कहां हो, कहां जाते हो और बाज के समान कहां गिरते हो?
तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (४)
यदद्य कर्हि कर्हि चिच्छ्रुश्रूयातमिमं हवम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! हमें यह पता नहीं है कि आज तुम कहां और कब हमारी पुकार
सुनोगे? तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (५)
अश्विना यामहूतमा नेदिष्ठं याम्याप्यम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (६)
मैं उचित समय पर बुलाने योग्य अश्विनीकुमारों एवं उनके समीपवर्ती बंधुओं के पास
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जाता हूं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (६)
अवन्तमत्रये गृहं कृणुतं युवमश्विना. अन्ति षद्भूतू वामवः... (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अत्रि की रक्षा के लिए घर बनाया था. तुम्हारी रक्षा हमारे
समीप रहे. (७)
वरेथे अग्निमातपो वदते वल्ग्वत्रये. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! मनोहर स्तुति करने वाले की उष्णता से रक्षा करो. तुम्हारी रक्षा हमारे
समीप रहे. (८)
प्र सप्तवध्रिराशसा धारामग्नेरशायत. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (९)
महर्षि सप्तवध्रि ने तुम अश्विनीकुमारों की स्तुति करके अग्नि को मंजूषा से निकालकर
पुनः उसीमें सुला दिया था. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (९)
इहा गतं वृषण्वसू शृणुतं म इमं हवम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१०)
हे वर्षाकारक एवं धनसंपन्न अश्विनीकुमारो! यहां आओ और हमारी पुकार सुनो.
तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१०)
किमिदं वां पुराणवज्ज्रतोरिव शस्यते. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (११)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हें पुराने एवं बुड्ढे व्यक्ति के समान बार-बार क्यों बुलाना पड़ता
है? तुम्हारी रक्षा हमारे साथ रहे. (११)
समानं वां सजात्यं समानो बन्धुरश्विना. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे जन्म एवं बंधु समान हैं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१२)
यो वां रजांस्यश्विना रथो वियाति रोदसी. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ सारे लोकों एवं द्यावा-पृथिवी में घूमता है. तुम्हारी रक्षा
हमारे साथ रहे. (१३)
आ नो गव्येभिरश्व्यैः सहस्रैरुप गच्छतम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! हजारों गायों एवं अश्वों को लेकर हमारे पास आओ, तुम्हारी रक्षा
हमारे पास रहे. (१४)
मा नो गव्येभिरश्व्यैः सहस्रेभिरति ख्यतम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१५)
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हे अश्विनीकुमारो! हजारों गायों एवं अश्वों को हमसे दूर मत करना. तुम्हारी रक्षा हमारे
पास रहे. (१५)
अरुणप्सुरुषा अभूदकञ्ज्योतिर्र्ऋतावरी. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! श्वेत वर्ण वाली उषा प्रकाश फैलाती हुई सब जगह जाती है. तुम्हारी
रक्षा हमारे पास रहे. (१६)
अश्विना सु विचाकशद्वृक्षं परशुमाँ इव. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार लकड़हारा कुल्हाड़ी से पेड़ काटता है, उसी प्रकार
अग्नि अंधकार को मिटाते हैं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१७)
पुरं न धृष्णवा रुज कृष्णया बाधितो विशा. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१८)
हे शत्रुओं को दबाने वाले ऋषि सप्तवध्रि! तुम काले संदूक में बंद थे. बाद में
अश्विनीकुमारों की कृपा से तुमने बाहर निकल कर उसे जला दिया था. अश्विनीकुमारों की
रक्षा हमारे पास रहे. (१८)
सूक्त—६३ देवता—अग्नि आदि
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्.
अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (१)
हे अन्नाभिलाषी ऋत्विजो एवं यजमानो! तुम सारी प्रजा के अतिथि एवं बहुतों के प्रिय
अग्नि की सेवा स्तुति द्वारा करो. मैं तुम्हारी सुखप्राप्ति के लिए सुंदर स्तुतियों द्वारा गूढ़वचन
बोलता हूं. (१)
यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम्. प्रशंसन्ति प्रशस्तिभिः.. (२)
लोग हव्य धारण करके एवं घी का हवन करते हुए अग्नि की स्तुति सूर्य के समान करते
हैं. (२)
पन्यांसं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता. हव्यान्यैरयद्दिवि.. (३)
अग्नि स्तोता के यज्ञकर्म की प्रशंसा करने वाले, जातवेद तथा यज्ञ में डाले गए हव्य को
स्वर्ग में ले जाने वाले हैं. (३)
आगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्.
यस्य श्रुतर्वा बृहन्नाक्षों अनीक एधते.. (४)
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मैं पापों का भली प्रकार नाश करने वाले, प्रशंसनीय एवं मानवहितकारी उन अग्नि की
स्तुति करता हूं, जिनकी ज्वालाओं में श्रुतर्वा एवं महान् ऋक्षपुत्र यज्ञकर्म करते हैं. (४)
अमृतं जातवेदसं तिरस्तमांसि दर्शतम्. घृताहवनमीड्यम्.. (५)
मैं मरणरहित, जातवेद, अंधकार का नाश करने वाले, घृत द्वारा हवन करने योग्य एवं
स्तुतिपात्र अग्नि के पास जाता हूं. (५)
सबाधो यं जना इमेऽग्निं हव्यभिरीळते. जुह्वानासो यतस्रुचः.. (६)
अभिलाषायुक्त अध्वर्यु आदि यज्ञ करते हुए एवं हाथ में स्रुच लेकर हव्यों द्वारा अग्नि की
स्तुति करते हैं. (६)
इयं ते नव्यसी मतिरग्ने अधाय्यस्मदा.
मन्द्र सुजात सुक्रतोऽमूर दस्मातिथे.. (७)
प्रसन्न, शोभन-जन्म वाले, शोभन-यज्ञ वाले, बुद्धिमान्, दर्शनीय एवं अतिथि के समान
पूज्य अग्नि! मैं तुम्हें नवीन स्तुति अर्पित करता हूं. (७)
सा ते अग्ने शन्तमा चनिष्ठा भवतु प्रिया. तया वर्धस्व सुष्टुतः.. (८)
हे अग्नि! वह स्तुति तुम्हें अत्यंत सुखकर, अधिक अन्न देने वाली एवं प्रिय हो. तुम मेरी
स्तुति द्वारा भली-भांति स्तुत होकर बढ़ो. (८)
सा द्युम्नैर्द्युम्निनी बृहदुपोप श्रवसि श्रवः. दधीत वृत्रतूर्ये.. (९)
हमारे द्वारा की जाती हुई स्तुति अधिक अन्नयुक्त है. वह युद्ध में अन्न के ऊपर अधिक
अन्न धारण करे. (९)
अश्वमिद्गां रथप्रां तवेषमिन्द्रं न सत्पतिम्.
यस्य श्रवांसि तूर्वथ पन्यंपन्यं च कृष्टयः.. (१०)
प्रजाएं अग्नि की स्तुति तेज चलने वाले घोड़े तथा सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र के
समान करती हैं. अग्नि हमारे रथों को धनों से भरते एवं शक्ति द्वारा शत्रु के अन्न और धन को
नष्ट करते हैं. (१०)
यं त्वा गोपवनो गिरा चनिष्ठदग्ने अङ्गिरः. स पावक श्रुधी हवम्.. (११)
हे सर्वत्र गमनशील एवं पवित्रकर्ता अग्नि! गोपवन ऋषि ने तुम्हें अतिशय अन्नदाता
बनाया था. तुम उनकी पुकार सुनो. (११)
स त्वा जनास ईळते सबाधो वाजसातये. स बोधि वृत्रतूर्ये.. (१२)
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हे अग्नि! दुःखी लोग अन्न एवं धन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम युद्ध में
जागो. (१२)
अहं हुवान आर्क्षे श्रुतर्वणि मदच्युति.
शर्धांसीव स्तुकाविनां मृक्षा शीर्षा चतुर्णाम्.. (१३)
मैं यज्ञदीक्षा के लिए बुलाए जाने पर शत्रुगर्वनाशक, ऋक्षपुत्र एवं श्रुतर्वा नामक राजाओं
द्वारा दिए गए बालों वाले चार घोड़ों का शीश इस प्रकार स्पर्श करता हूं, जिस प्रकार लोग
बालों को छूते हैं. (१३)
मां चत्वार आशवः शविष्ठस्य द्रवित्नवः.
सुरथासो अभि प्रयो वक्षन्वयो न तुप्र्यम्.. (१४)
अतिशय अन्न वाले राजा श्रुतर्वा के द्रुतगामी एवं शोभन रथ में जुते हुए चार घोड़े अन्न
को इस प्रकार ढोते हैं, जिस प्रकार अश्विनीकुमारों द्वारा भेजी गई नावों ने तुंग के पुत्र भुज्यु
को वहन किया था. (१४)
सत्यमित्त्वा महेनदि परुष्ण्यव देदिशम्.
नेमापो अश्वदातरः शविष्ठादस्ति मर्त्यः.. (१५)
हे महती परुष्णी नदी एवं महान् जल! मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूं. इस शक्तिशाली
राजा श्रुतर्वा की अपेक्षा कोई भी मनुष्य अधिक घोड़े नहीं दे सकता है. (१५)
सूक्त—६४ देवता—अग्नि
युक्ष्वा हि देवहूतमाँ अश्वाँ अग्ने रथीरिव. नि होता पूर्व्यः सदः.. (१)
हे अग्नि! रथी जिस प्रकार घोड़ों को रथ में जोड़ता है, उसी प्रकार तुम भी देवों को
बुलाने में कुशल अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो. तुम प्रधान होता बनकर बैठो. (१)
उत नो देव देवाँ अच्छा वोचो विदुष्टरः. श्रद्धिश्वा वार्या कृधि.. (२)
हे अग्नि देव! तुम देवों के समीप हमें अधिक विद्वान् बताओ एवं हमारे वरणयोग्य धन
को देवों के पास पहुंचाओ. (२)
त्वं ह यद्यविष्ठ्य सहसः सूनवाहुत. ऋतावा यज्ञियो भुवः.. (३)
हे अतिशय युवा, बल के पुत्र एवं सब ओर से बुलाए गए अग्नि! तुम सत्ययुक्त एवं यज्ञ
के योग्य हो. (३)
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अयमग्निः सहस्रिणो वाजस्य शतिनस्पतिः. मूर्धा कवी रयीणाम्.. (४)
ये अग्नि सैकड़ों और हजारों प्रकार के अन्नों के पालक, श्रेष्ठ, मेधावी एवं धनों के स्वामी
हैं. (४)
तं नेमिमृभवो यथा नमस्व सहूतिभिः. नेदीयो यज्ञमङ्गिरः... (५)
हे गतिशील अग्नि! ऋभुगण जिस प्रकार रथ की नेमि को लाते हैं, उसी प्रकार तुम
अन्य देवों के साथ यज्ञ को लाओ. (५)
तस्मै नूनमभिद्यवे वाचा विरूप नित्यया. वृष्णे चोदस्व सुष्टुतिम्.. (६)
हे विरूप नामक ऋषि! तुम नित्य वचनों द्वारा दीप्तिशाली एवं वर्षाकारक अग्नि की
शोभन स्तुति करो. (६)
कमु ष्विदस्य सेनयाग्नेरपाकचक्षसः. पणिं गोषु स्तरामहे.. (७)
हम बड़ी आंखों वाले अग्नि की ज्वालारूपी सेनाओं द्वारा गायों की प्राप्ति के लिए किस
पणि की हिंसा करेंगे? (७)
मा नो देवानां विशः प्रस्नातीरिवोसाः. कृशं न हासुरघ्न्याः.. (८)
हे अग्नि! हम देवपरिचारकों को उसी प्रकार न छोड़ें, जिस प्रकार लोग दुधारू गाय को
नहीं छोड़ते अथवा गाएं अपने छोटे बछड़ों को नहीं छोड़तीं. (८)
मा नः समस्य दूढ्य१ः परिद्वेषसो अंहतिः. ऊर्मिर्न नावमा वधीत्.. (९)
सागर की लहरें जिस प्रकार नाव को बाधा पहुंचाती हैं, उसी प्रकार सभी शत्रुओं की
दुष्ट बुद्धि हमें बाधा न पहुंचावे. (९)
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः. अमैरमित्रमर्दय.. (१०)
हे अग्नि देव! प्रजाएं शक्ति पाने के लिए तुम्हें नमस्कार करती हैं. तुम अपनी शक्तियों
द्वारा शत्रुओं को मर्दित करो. (१०)
कुवित्सु नो गविष्टयेऽग्ने संवेषिषो रयिम्. उरुक्कृदुरुणस्कृधि.. (११)
हे अग्नि! गायों की खोज करने के लिए हमें बहुत सा धन दो. हे समृद्ध बनाने वाले
अग्नि! हमें समृद्ध बनाओ. (११)
मा नो अस्मिन्महाधने परा वर्भारभृद्यथा. संवर्गं सं रयिं जय.. (१२)
हे अग्नि! भार ढोने वाला जिस प्रकार अंत में भार को छोड़ देता है, उसी प्रकार तुम हमें
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युद्ध में छोड़ मत देना. शत्रुओं द्वारा संगृहीत धन को तुम हमारे लिए जीतो. (१२)
अन्यमस्मद्विया इयमग्ने सिषक्तु दुच्छुना. वर्धा नो अमवच्छवः.. (१३)
हे अग्नि! यह भय हमारे अतिरिक्त लोगों के पास जाए. तुम युद्ध में हमारे बल एवं वेग
को बढ़ाओ. (१३)
यस्याजुषन्नमस्विनः शमीमदुर्मखस्य वा. तं घेदग्निर्वृधावति.. (१४)
जिस नमस्कार करने वाले एवं दोषहीन यज्ञयुक्त व्यक्ति का यज्ञकर्म अग्नि स्वीकार
करते हैं, उसी के पास अग्नि जाते हैं. (१४)
परस्या अधि संवतोऽवराँ अभ्या तर. यत्राहमस्मि ताँ अव.. (१५)
हे अग्नि! शत्रुओं की सेनाओं को हमारी सेनाओं से पराजित कराओ. मैं जिस सेना के
बीच में हूं, तुम उसकी रक्षा करो. (१५)
विद्या हि ते पुरा वयमग्ने पितुर्यथावसः. अधा ते सुम्नमीमहे.. (१६)
हे पालक अग्नि! हम पहले के समान इस समय भी तुम्हारी रक्षा को जानते हैं. उस
समय हम तुमसे सुख मांगते हैं. (१६)
सूक्त—६५ देवता—इंद्र
इमं नु मायिनं हुव इन्द्रमीशानमोजसा. मरुत्वन्तं न वृज्जसे.. (१)
मैं यज्ञशाली, अपनी शक्ति द्वारा सब पर शासन करने वाले एवं मरुतों के साथ इंद्र को
शत्रुओं का छेदन करने के लिए बुलाता हूं. (१)
अयमिन्द्रो मरुत्सखा वि वृत्रस्याभिनच्छिरः. वज्रेण शतपर्वणा.. (२)
इंद्र ने मरुतों के साथ मिलकर सौ पर्वों वाले वज्र द्वारा वृत्र का सिर काटा. (२)
वावृधानो मरुत्सखेन्द्रो वि वृत्रमैरयत्. सृजन्त्समुद्रिया अपः.. (३)
इंद्र मरुतों की सहायता लेकर बढ़े. इंद्र ने वृत्र का सिर काटा और अंतरिक्ष का जल
बनाया. (३)
अयं ह येन वा इदं स्वर्मरुत्वता जितम्. इन्द्रेण सोमपीतये.. (४)
ये इंद्र वह ही हैं, जिन्होंने मरुतों को साथ लेकर सोमरस पीने के लिए स्वर्ग को जीता
था. (४)
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मरुत्वन्तमृजीषिणमोजस्वन्तं विरप्शिनम्. इन्द्रं गीर्भिर्हवामहे.. (५)
हम मरुतों से युक्त, ऋजीष के भागी, वृद्धियुक्त एवं महान् इंद्र को स्तुतियों द्वारा बुलाते
हैं. (५)
इन्द्रं प्रत्नेन मन्मना मरुत्वन्तं हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (६)
हम इस सोम को पीने के लिए मरुतों सहित इंद्र को प्राचीन स्तोत्रों द्वारा बुलाते हैं. (६)
मरुत्वाँ इन्द्र मीढ्वः पिबा सोमं शतक्रतो. अस्मिन्यज्ञे पुरुष्टुत.. (७)
हे फलदायक, शतक्रतु, मरुतों से युक्त एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम इस यज्ञ में
आकर सोमरस पिओ. (७)
तुभ्येदिन्द्र मरुत्वते सुताः सोमासो अद्रिवः. हृदा हूयन्त उक्थिनः.. (८)
हे वज्रधारी इंद्र! मरुतों सहित तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ा गया है. उक्थ मंत्र बोलने
वाले लोग मन से तुम्हें बुलाते हैं. (८)
पिबेदिन्द्र मरुत्सखा सुतं सोमं दिविष्टिषु. वज्रं शिशान ओजसा.. (९)
हे मरुतों के मित्र इंद्र! तुम हमारे यज्ञों में निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ एवं अपनी शक्ति
द्वारा वज्र को तेज करो. (९)
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः. सोममिन्द्र चमू सुतम्.. (१०)
हे इंद्र! तुम पात्र में भरे सोमरस को पीकर शक्ति के साथ बड़े होओ एवं अपने जबड़ों
को कंपाओ. (१०)
अनु त्वा रोदसी उभे ऋक्षमाणमकृपेताम्. इन्द्र यद्दस्युहाभवः.. (११)
हे शत्रुओं का विनाश करने वाले इंद्र! जब तुम दस्यु लोगों का नाश करते हो, तभी
द्यावा-पृथिवी दोनों तुम्हारा कल्याण करते हैं. (११)
वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतस्पृशम्. इन्द्रात् परि तन्वं ममे.. (१२)
मैं इंद्र की स्तुति करता हूं तथा आठ एवं नौ दिशाओं में यज्ञ स्पर्श करने वाली स्तुति को
भी इंद्र से कम समझता हूं. (१२)
सूक्त—६६ देवता—इंद्र
जज्ञानो नु शतक्रतुर्वि पृच्छदिति मातरम्. क उग्राः के ह शृण्विरे.. (१)
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शतक्रतु इंद्र ने जन्म लेते ही अपनी माता से पूछा— “कौन उग्र एवं कौन प्रसिद्ध है?”
(१)
आदीं शवस्यब्रवीदौर्णवाभमहीशुवम्. ते पुत्र सन्तु निष्टुरः.. (२)
इंद्र की माता शवसी ने तभी कहा— “ऊर्णनाभ, अहीशुव आदि अनेक असुर हैं. तुम
उन्हें समाप्त करो.” (२)
समित्तान्वत्रहाखिदत्खे अराँ इव खेदया. प्रवृद्धो दस्युहाभवत्.. (३)
वृत्रनाशक इंद्र ने उन्हें एक साथ इस प्रकार खींचा जिस प्रकार रस्सी से चक्र के अरे
खींचे जाते हैं. इंद्र दस्युजनों को मारकर बढ़े. (३)
एकया प्रतिधापिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम्. इन्द्रः सोमस्य काणुका.. (४)
इंद्र ने एक साथ ही सोमरस से भरे हुए तीन सुंदर उक्थ मंत्रों को पी लिया. (४)
अभि गन्धर्वमतृणद्बुध्नेषु रजः स्वा. इन्द्रो ब्रह्मभ्य इदवृधे.. (५)
इंद्र ने ब्राह्मणों की वृद्धि के लिए आधाररहित अंतरिक्ष में मेघ को सब ओर से मारा. (५)
निराविध्यद् गिरिभ्य आ धारयत्पक्वमोदनम्. इन्द्रो बुन्दं स्वाततम्.. (६)
इंद्र ने मनुष्यों के लिए पके हुए अन्न का निर्माण करने के लिए बड़ा सा बाण लेकर
बादल को छेदा. (६)
शतब्रध्न इषुस्तव सहस्रपर्ण एक इत्. यमिन्द्र चकृषे युजम्.. (७)
हे इंद्र! तुम युद्ध में जिस एकमात्र बाण की सहायता लेते हो, उस में आगे फलक हैं एवं
पीछे हजार पंख हैं. (७)
तेन स्तोतृभ्य आ भर नृभ्यो नारिभ्यो अत्तवे. सद्यो जात ऋभुष्ठिर.. (८)
हे इंद्र! हम स्तोताओं, हमारे पुत्रों और हमारी नगरियों के भोग के लिए उसी बाण की
सहायता से पर्याप्त धन ले आओ. तुम जन्म के समय ही विशाल एवं स्थिर थे. (८)
एता च्यौत्नानि ते कृता वर्षिष्ठानि परीणसा. हृदा वीड्वधारयः.. (९)
हे इंद्र! तुमने इन उत्कृष्ट, अतिशय बढ़े हुए एवं चारों ओर फैले पर्वतों को बनाया है. तुम
इन्हें बुद्धि में स्थिररूप से धारण करो. (९)
विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः.
शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र एमुषम्.. (१०)
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हे इंद्र! आकाश में घूमने वाले एवं तुम्हारे द्वारा प्रेरित आदित्य तुम्हारे द्वारा बनाए जल
संसार को देते हैं. इंद्र ने सौ भैंसें, दूध के साथ पका हुआ भात एवं जल चुराने वाला बादल
बनाया. (१०)
तुविक्षं ते सुकृतं सूमयं धनुः साधुर्बुन्दो हिरण्ययः.
उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदूपे चिद्ददूवृधा.. (११)
हे इंद्र! तुम्हारा धनुष अनेक बाण फेंकने वाला, भली प्रकार बना हुआ एवं सुखदाता है
तथा तुम्हारा बाण सोने का है. तुम्हारी भुजाएं रमणीय, भली प्रकार अलंकृत एवं युद्ध में हनन
करने वाली हैं. (११)
सूक्त—६७ देवता—इंद्र
पुरोळाशं नो अन्धस इन्द्र सहस्रमा भर. शता च शूर गोनाम्.. (१)
हे इंद्र! हमारे दिए हुए पुरोडाश अन्न को स्वीकृत करके हमें सौ और हजार गाएं दो. (१)
आ नो भर व्यञ्जनं गामश्वमभ्यञ्जनम्. सचा मना हिरण्यया.. (२)
हे इंद्र! हमें सोने के मनोहर अलंकारों के साथ गाएं, घोड़े और तेल दो. (२)
उत नः कर्णशोभना पुरूणि धृष्णवा भर. त्वं हि शृण्विषे वसो.. (३)
हे शत्रुओं को नष्ट करने वाले एवं निवासस्थान देने वाले इंद्र! हमने तुम्हारा यश सुना है.
तुम हमें बहुत से कान के गहने दो. (३)
नकीं वृधीक इन्द्र ते न सुषा न सुदा उत. नान्यस्त्वच्छूर वाघतः.. (४)
हे शूर इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी बढ़ाने वाला नहीं है. तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी
संग्राम में सहायता करने वाला एवं उत्तम दाता नहीं है. तुम्हारे अतिरिक्त यजमान का कोई इंद्र
नहीं है. (४)
नकीमिन्द्रो निकर्तवे न शक्रः परिशक्तवे. विश्वं शृणोति पश्यति.. (५)
शक्तिशाली इंद्र किसी का न तिरस्कार करते हैं और न किसी से पराजित हो सकते हैं.
इंद्र संसार को सुनते और देखते हैं. (५)
स मन्युं मर्त्यानामदब्धो नि चिकीषते. पुरा निदश्विकीषते.. (६)
अपराजेय इंद्र किसी के भी प्रति मन में क्रोध नहीं करते. इंद्र निंदा के पूर्व मन में निंदा
को स्थान नहीं देते. (६)
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क्रत्व इत्पूर्णमुदरं तुरस्यास्ति विधतः. वृत्रघ्नः सोमपाव्नः.. (७)
शीघ्रता करने वाले, वृत्रनाशक एवं सोमरस पीने वाले इंद्र का उदर यजमान के यज्ञ से
ही पूर्ण है. (७)
त्वे वसूनि सङ्गता विश्वा च सोम सौभगा. सुदात्वपरिह्वृता.. (८)
हे सोमरस पीने वाले इंद्र! हमारे अभिलषित पदार्थ तुम्हारे पास एकत्र हैं. तुम में सभी
सौभाग्य मिलित हैं. तुम्हारे शोभन दान कुटिलतारहित होते हैं. (८)
त्वामिद्यवयुर्मम कामो गव्युर्हिरण्ययुः. त्वामश्वयुरेषते.. (९)
हे इंद्र! मेरा मन जौ, गाय, सोने और घोड़े का अभिलाषी बनकर तुम्हारे समीप जाता है.
(९)
तवेदिन्द्राहमाशासा हस्ते दात्रं चना ददे.
दिनस्य वा मघवन्तत्सम्भृतस्य वा पूर्धि यवस्य काशिना.. (१०)
हे इंद्र! तुम्हारी आशा करके ही मैं हाथ में दरांत धारण करता हूं. तुम पहले दिन काटे
और साफ किए जौ से मेरी मुट्ठी पूरी करो. (१०)
सूक्त—६८ देवता—सोम
अयं कृत्नुरगृभीतो विश्वजिदुद्भिदित्सोमः. ऋषिर्विप्रः काव्येन.. (१)
ये सोम सब कुछ करने वाले, अन्नों द्वारा गृहीत न होने वाले, सबके नेता, फल को
उत्पन्न करने वाले, ज्ञानवान्, मेधावी एवं स्तोत्र द्वारा पूज्य हैं. (१)
अभ्यूर्णोति यन्नग्नं भिषक्ति विश्वं यत्तुरम्. प्रेमान्धः ख्यन्निः श्रोणो भूत्.. (२)
सोम नंगों को ढकते हैं एवं सभी रोगियों की चिकित्सा करते हैं. सोम ऊंचे होने पर भी
देखते हैं और लूले होकर भी चलते हैं. (२)
त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषोभ्योऽन्यकृतेभ्यः. उरु यन्तासि वरूथम्.. (३)
हे सोम! तुम शरीर का छेदन करने वाले अन्य राक्षसों के प्रिय कार्यों से हमारी रक्षा
करते हो. (३)
त्वं चित्ती तव दक्षैर्दिव आ पृथिव्या ऋजीषिन्. यावीरघस्य चिद् द्वेषः.. (४)
हे ऋजीष वाले सोम! तुम अपनी प्रजा और बलों द्वारा द्युलोक एवं धरती से हमें मारने
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