ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
यजमानों ने अग्नि के द्वारा यज्ञपूर्ण किया है. यही सर्वप्रथम कर्त्तव्यकर्म था. महत्त्वपूर्ण
यजमान स्वर्ग में एकत्र हैं. वहां पूर्ववर्ती यज्ञकर्त्ता भी दिव्य रूप में रहते हैं. (५०)
समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः.
भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः.. (५१)
एक ही प्रकार का जल है. वह गरमी के दिनों में ऊपर जाता है एवं वर्षा के दिनों में नीचे
आता है. बादल धरती को प्रसन्न करते हैं एवं अग्नि द्युलोक को संतुष्ट करती है. (५१)
दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भं दर्शतमोषधीनाम्.
अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि.. (५२)
मैं दिव्य, शोभनगति वाले, गमनशील, विशाल, गर्भ के समान वर्षा का जल उत्पन्न करने
वाले, ओषधियों के दर्शन एवं वर्षा के जल द्वारा सरोवरों को पूर्ण एवं सरिताओं का पालन
करने वाले सूर्य का अपनी रक्षा के लिए आह्वान करता हूं. (५२)
सूक्त—१६५ देवता—इंद्र
कया शुभा सवयसः सनीळाः समान्या मरुतः सं मिमिक्षुः.
कया मती कुत एतास एतेऽर्चन्ति शुष्मं वृषणो वसूया.. (१)
इंद्र ने कहा—"समान अवस्था वाले और एक स्थान के निवासी मरुद्गण ऐसी महान्
शोभा वाले हैं, जिसे सब लोगों को जानना कठिन है. वे धरती को सींचते हैं. मन में क्या
विचार रखते हैं और कहां से आए हैं? आकर जल बरसाने वाले बादल क्या धन की इच्छा से
शक्ति की उपासना करते हैं? (१)
कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवानः को अध्वरे मरुत आ ववर्त.
श्येनाँ इव ध्रजती अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम.. (२)
नित्य तरुण मरुद्गण किसका हवि स्वीकार करते हैं? यज्ञ में आए हुए उन्हें कौन हटा
सकता है? वे बाज पक्षी के समान आकाश में उड़ते हैं. हम उन्हें किस महान् स्तोत्र द्वारा
प्रसन्न करें? (२)
कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त इत्था.
सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे.. (३)
मरुद्गणों ने कहा— “हे सज्जनों के पालक एवं पूजनीय इंद्र! तुम अकेले कहां जा रहे
हो? क्या तुम इसी प्रकार के हो? तुम हमसे मिलकर जो पूछ रहे हो, यह उचित है. हे घोड़ों के
स्वामी! हमसे जो कहना हो, वह हमसे शोभन वचनों द्वारा कहो." (३)
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ब्रह्माणि मे मतयः शं सुतासः शुष्म इयर्ति प्रभृतों मे अद्रिः.
आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ.. (४)
इंद्र ने कहा—“सारा यज्ञकर्म एवं स्तुतियां मेरी हैं. सामने रखा हुआ सोम मेरा है. मैं जब
अपना शक्तिशाली वज्र फेंकता हूं तो यह कभी असफल नहीं होता. यजमान मेरी ही प्रार्थना
करते हैं. ऋग्वेद के मंत्र मेरी ही कामना करते हैं. ये हरि नाम के घोड़े हवि ग्रहण करने को
मुझे ही वहन करते हैं.” (४)
अतो वयमन्तमेभिर्युजानाः स्वक्षत्रेभिस्तन्व१ः शुम्भमानाः.
महोभिरेताँ उप युज्महे न्विन्द्र स्वधामनु हि नो बभूथ.. (५)
मरुद्गण बोले—“इसी कारण हम अपने शरीरों को महान् तेज से चमकाते हुए
समीपवर्ती एवं विशाल बल वाले अश्वों के साथ इस महान् यज्ञ में आने को तैयार हुए हैं. हे
इंद्र! हमारे बल का अनुभव करते हुए तुम भी हमारे साथ रहो.” (५)
क्व१ स्या वो मरुतः स्वधासीद्यन्मामेकं समधत्ताहिहत्ये.
अहं ह्यु१ ग्रस्तविषस्तुविष्मान्विश्वस्य शत्रोरनमं वधस्नैः.. (६)
इंद्र ने कहा—“हे मरुतो! जब मैंने अकेले ही अहि का वध किया था, तब साथ रहने
वाला तुम्हारा बल कहां था? मैं उग्र शक्ति वाला एवं महान् हूं. मैंने हनन में कुशल वज्र द्वारा
संपूर्ण शत्रुओं का विनाश किया है.” (६)
भूरि चकर्थ युज्येभिरस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः.
भूरीणि हि कृणवामा शविष्ठेन्द्र क्रत्वा मरुतो यद्वशाम.. (७)
मरुतों ने कहा—“हे कामवर्षी इंद्र! हम तुम्हारे समान शक्ति वाले हैं. तुमने हमारे साथ
मिलकर बहुत से कर्म किए हैं. हे बलवान् इंद्र! हमने तुमसे भी बढ़कर काम किए हैं. हम
मरुत् होने के कारण तुम्हारे साथ कर्म करके वर्षा की इच्छा करते हैं.” (७)
वधीं वृत्रं मरुत इन्द्रियेण स्वेन भामेन तविषो बभूवान्.
अहमेता मनवे विश्वश्चन्द्राः सुगा अपश्चकर वज्रबाहुः.. (८)
इंद्र ने कहा—“हे मरुद्गण! मैंने क्रोध युक्त होकर अपने निजी बल से वृत्र को मारा था,
मैं वज्र अपने हाथ में रखता हूं, इसलिए मैं समस्त मनुष्यों की प्रसन्नता के लिए वर्षा करता
हूं.” (८)
अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ अस्ति देवता विदानः.
न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध.. (९)
मरुद्गण बोले—“हे इंद्र! तुम्हारा सब कुछ उत्तम है. कोई भी देव तुम्हारे समान विद्वान्
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नहीं है. हे महान् शक्तिशाली! तुमने जो करने योग्य काम किए हैं, उन्हें न कोई इस समय कर
सकता है और न पहले कर पाया था.” (९)
एकस्य चिन्मे विभव१ स्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा.
अहं ह्यु१ ग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम्.. (१०)
इंद्र बोले— “मुझ अकेले की ही शक्ति सब जगह फैले. मैं मन से जो भी इच्छा करूं,
वही काम कर सकूं. हे मरुतो! मैं उग्र एवं विद्वान् हूं. जिन संपत्तियों को मैं जानता हूं, उन पर
मेरा ही अधिकार है.” (१०)
अमन्दन्मा मरुतः स्तोमो अत्र यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र.
इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभिः.. (११)
“हे मित्र मरुतो! इस विषय में तुमने मेरी जो स्तुतियां की हैं, वे मुझे आनंदित करती हैं.
मैं कामवर्षक, शोभन यज्ञों वाला, अनेक रूपधारी एवं तुम्हारा सखा हूं. (११)
एवेदेते प्रति मा रोचनामा अनेद्यः श्रव एषो दधानाः.
सञ्चक्ष्या मरुतश्चन्द्रवर्णा अच्छान्त मे छदयाथा च नूनम्.. (१२)
हे सुनहरे रंग वाले मरुतो! तुमने मेरे प्रति प्रसन्न होकर और प्रशंसनीय यश एवं अन्न
धारण करते हुए मुझे भली प्रकार चारों ओर से ढक लिया है. तुम निश्चित रूप से मुझे ढको.”
(१२)
को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखीँरच्छा सखायः.
मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम्.. (१३)
अगस्त्य ने कहा— “हे मरुतो! कौन तुम्हारी पूजा करता है? हे सबके मित्रो! यजमानों
के सामने जाओ. हे सुंदर मरुद्गण! तुम सब मनोरम धनों को प्राप्त कराओ एवं मेरे
सत्यकर्मों को जानो.” (१३)
आ यद्दुवस्याद्दुवसे न कारुरस्माञ्चक्रे मान्यस्य मेधा.
ओ षु वर्त्त मरुतो विप्रमच्छेमा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत्.. (१४)
“हे मरुतो! तुम्हारी सेवा करने में समर्थ स्तोत्र द्वारा माननीय यजमान की स्तुतिकुशल
बुद्धि सेवा करने के लिए हमारे सामने आती है. इसलिए तुम मुझ मेधावी यजमान के सामने
आओ. स्तोता तुम्हारे इन उत्तम कर्मों को लक्ष्य करके तुम्हारा आदर करता है. (१४)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१५)
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सूक्त—१६६ देवता—मरुद्गण
हे मरुतो! यह स्तोत्र एवं यह स्तुतिरूप वाणी प्रसन्नता देने वाली है एवं शरीर को पुष्ट
करने के लिए तुम्हें प्राप्त होती है. हम बल, अन्न एवं जयशील दान प्राप्त करें.” (१५)
सूक्त—१६६ देवता—मरुद्गण
तन्नु वोचाम रभसाय जन्मने पूर्वं महित्वं वृषभस्य केतवे.
ऐधेव यामन्मरुतस्तुविष्मणो युधेव शक्रास्तविषाणि कर्तन.. (१)
हे मरुतो! मैं तुम्हारे प्राचीनतम महत्त्व का इसलिए वर्णन कर रहा हूं कि तुम यज्ञवेदी पर
शीघ्र आकर यज्ञ संपन्न कराओ. हे गमन के समय विशाल ध्वनि करने वाले एवं समस्त कार्य
करने में समर्थ! तुम्हारे यज्ञस्थल में आते ही समिधाओं की ज्वाला उसी प्रकार महती हो
जाती है, जिस प्रकार तुम रण में अपना पराक्रम दिखाते हो. (१)
नित्यं न सूनुं मधु बिभ्रत उप क्रीळन्ति क्रीळा विदथेषु घृष्वयः.
नक्षन्ति रुद्रा अवसा नमस्विनं न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम्.. (२)
प्रिय पुत्र के समान मधुर हव्य धारण करने वाले एवं यज्ञों में रक्षा करने में प्रवृत्त
मरुद्गण प्रसन्नचित्त होकर क्रीड़ा करते हैं. नम्र यजमान की रक्षा के लिए स्वाधीन शक्ति वाले
एवं यजमान को कभी कष्ट न पहुंचाने वाले रुद्रपुत्र मरुद्गण आते हैं. (२)
यस्मा ऊमासी अमृता अरासत रासस्पोषं च हविषा ददाशुषे.
उक्षन्त्यस्मै मरुतो हिता इव पुरू रजांसि पयसा मयोभुवः.. (३)
हवि देने वाले जिस यजमान की आहुति के कारण प्रसन्न, सबके रक्षक एवं मरणरहित
मरुद्गण अधिक मात्रा में धन देते हैं, उसी यजमान के हितकारी सखा के समान मरुद्गण
सारे संसार को सुखरूपी जल से भली-भांति सींचते हैं. (३)
आ ये रजांसि तविषीभिरव्यत प्र व एवासः स्वयतासो अध्वजन्.
भयन्ते विश्वा भुवनानि हर्म्या चित्रो वो यामः प्रयतास्वृष्टिषु.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे घोड़े अपनी शक्ति के द्वारा सारे संसार का भ्रमण करते हैं. वे सारथि
के बिना ही तेज चलते हैं. तुम्हारी गति इतनी विचित्र है कि तुम्हारे चलने से समस्त प्राणी और
अट्टालिकाएं उसी प्रकार कांप उठती हैं, जिस प्रकार कोई युद्ध में उठी हुई तलवार को
देखकर कांपता है. (४)
यत् त्वेषयामा नदयन्त पर्वतान्दिवो वा पृष्ठं नर्या अचुच्यवुः.
विश्वो वो अज्मन्भयते वनस्पती रथीयन्तीव प्र जिहीत ओषधिः.. (५)
शीघ्र गति वाले मरुद्गण जिस समय पर्वतों एवं गुफाओं को गुंजाते हैं अथवा मानवों के
कल्याण हेतु पर्वतों की चोटियों पर चढ़ते हैं, उस समय तुम्हारे गमन के कारण समस्त
वनस्पतियां डर जाती हैं और जिस प्रकार रथ पर बैठी स्त्री एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली
जाती है, उसी प्रकार उड़कर दूर पहुंच जाती हैं। (५)
यूयं न उग्रा मरुतः सुचेतुनारिष्टग्रामाः सुमतिं पिपर्तन.
यत्रा वो विद्युद्रदति क्रिविर्दती रिणाति पश्वः सुधितेव बर्हणा.. (६)
हे विशाल शक्ति संपन्न मरुतो! तुम शोभनचित्त एवं हिंसारहित होकर हमारी सुबुद्धि को
बढ़ाओ. जिस समय तुम्हारी चलते हुए दांतों वाली बिजली बादलों को प्रकाशित करती है,
उस समय वह तलवार के समान पशुओं का नाश करती है. (६)
प्र स्कम्भदेष्णा अनवभ्रराधसोऽलातृणासो विदथेषु सुष्टुताः.
अर्चन्त्यर्कं मदिरस्य पतिये विदुर्वीरस्य प्रथमानि पौंस्या.. (७)
अविरत दान वाले, नाशरहित धन वाले, सकल शत्रुनाशक एवं यज्ञों में भली प्रकार
स्तुति पाने वाले मरुद्गण यज्ञ में अपने मित्र इंद्र की अर्चना करते हैं, क्योंकि वे शत्रुनाशक इंद्र
के पूर्वकृत वीर कर्मों को जानते हैं. (७)
शतभुजिभिस्तमभिद्रुतेरघातपूर्भी रक्षता मरुतो यमावत.
जनं यमुग्रास्तवसो विरप्शिनः पाथना शंसात्तनयस्य पुष्ठिषु.. (८)
हे महान् तेजस्वी एवं शक्तिशाली मरुतो! जिस मनुष्य को तुमने कुटिल स्वभाव वाले
पाप से बचाया है एवं पुत्र-पौत्रादि की पुष्टि से संबंधित निंदा से रक्षा की है, उसका पालन
अगणित भोग वस्तुओं द्वारा करो. (८)
विश्वानि भद्रा मरुतो रथेषु वो मिथस्पृध्येव तविषाण्याहिता.
अंसेष्वा वः प्रपथेषु खादयोऽक्षो वश्चक्रा समया वि वावृते.. (९)
हे मरुद्गण! तुम्हारे रथों पर समस्त कल्याणकारी वस्तुएं रखी हुई हैं. तुम्हारी भुजाओं
में एक से एक शक्तिशाली शस्त्र वर्तमान हैं. सभी विश्राम स्थानों पर तुम्हारे लिए खाने की
वस्तुएं उपस्थित हैं. तुम्हारे रथों के पहिए धुरियों के साथ घूमते हैं. (९)
भूरीणि भद्रा नर्येषु बाहुषु वक्षःसु रुक्मा रभसासो अञ्जयः.
अंसेष्वेताः पविषु क्षुरा अधि वयो न पक्षान्व्यनु श्रियो धीरे.. (१०)
मानवों का कल्याण करनेवाली अपनी भुजाओं में मरुद्गण कल्याणकारी अनंत पदार्थ
धारण करते हैं. उनके वक्षस्थलों पर कांतिमय एवं स्पष्ट दीखने वाले स्वर्णाभूषण, कंधों पर
श्वेत मालाएं, वज्र के समान आयुधों पर छुरा एवं पक्षियों के पंखों के समान शोभा धारण
करते हैं. (१०)
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महान्तो मह्ना विभ्वो३ विभूतयो दूरेदृशो ये दिव्या इव स्तृभिः.
मन्द्राः सुजिह्वाः स्वरितार आसभिः संमिश्रा इन्द्रे मरुतः परिष्टुभः.. (११)
महान्, महिमामंडित, विस्तृत ऐश्वर्य वाले, आकाश के नक्षत्रों के समान दूर से प्रकाशित,
प्रसन्न, सुंदर जिह्वा वाले, मुखों से शब्द करने वाले, स्तुतिसंपन्न एवं इंद्र के सहायक मरुद्गण
हमारे यज्ञ में पधारें. (११)
तद्वः सुजाता मरुतो महित्वनं दीर्घं वो दात्रमदितेरिव व्रतम्.
इन्द्रश्चन त्यजसा वि ह्रुणाति तज्जनाय यस्मै सुकृते अराध्वम्.. (१२)
हे शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हारा महत्त्व एवं दान अदिति के व्रत के समान
अविच्छिन्न है. तुम जिस पुण्यशील यजमान के लिए इष्ट धन देते हो, उसके प्रति इंद्र भी
कुटिलता नहीं करते. (१२)
तद्वो जामित्वं मरुतः परे युगे पुरू यच्छंसममृतास आवत.
अया धिया मनवे श्रुष्टिमाव्या साकं नरो दंसनैरा चिकित्रिरे.. (१३)
हे मरुद्गण! हमारे प्रति तुम्हारी प्रसिद्ध मैत्री अतीत काल में भी थी. तुम लोग हमारी
स्तुतियों की भली-भांति रक्षा करते हो एवं श्रद्धालु यजमान के यज्ञ के नेता बनकर उसके मन
की बात जान लेते हो. (१३)
येन दीर्घं मरुतः शूशवाम युष्माकेन परीणसा तुरासः.
आ यत्ततनन्व्जने जनास एभिर्यज्ञेभिस्तदभीष्टिमश्याम्.. (१४)
हे वेगशाली मरुतो! तुम्हारे महान् आगमन के पश्चात् हम दीर्घकाल तक चलने वाला
यज्ञ आरंभ करते हैं. तुम्हारा आगमन हमारे लोगों को युद्ध में विजयी बनाता है. इस प्रकार के
यज्ञों द्वारा मैं तुम्हारा उत्तम आगमन प्राप्त करूं. (१४)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१५)
हे मरुतो! आहार के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति
स्तुतिकर्त्ता की शरीर पुष्टि की कामना से तुम्हें प्राप्त होती है. हम भी इसके द्वारा अन्न, बल
एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१५)
सूक्त—१६७ देवता—इंद्र एवं मरुत्
सहस्रं त इन्द्रोतयो नः सहस्रमिषो हरिवो गूर्ततमाः.
सहस्रं रायो मादयध्यै सहस्रिण उप नो यन्तु वाजाः.. (१)
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हे इंद्र! तुम्हारे हजारों प्रकार के रक्षण उपाय हजारों तरह से हमारे पास आवें. हे अश्वों
के स्वामी! तुम्हारे हजारों तरह के प्रसिद्ध अन्न हमें प्राप्त हों. तुम्हारे पास जो हजारों प्रकार के
धन हैं, वे हमें प्रसन्नता देने के लिए मिलें. हमें हजारों पशु प्राप्त हों. (१)
आ नोऽवोभिर्मरुतो यान्त्वच्छा ज्येष्ठेभिर्वा बृहद्दिवाः सुमायाः.
अध यदेषां नियुतः परमाः समुद्रस्य चिद्धनयन्त पारे.. (२)
मरुद्गण रक्षा के साधनों सहित हमारे पास आवें. शोभन बुद्धि वाले मरुद्गण परम
प्रसिद्ध एवं दीप्तिशाली धन के साथ हमारे समीप आवें. उनके नियुत नामक घोड़े समुद्र के
उस पार रहते हुए भी धन धारण करते हैं. (२)
मिम्यक्ष येषु सुधिता घृताची हिरण्यनिर्णिगुपरा न ऋषिः.
गुहा चरन्ती मनुषो न योषा सभावती विदथ्येव सं वाक्.. (३)
भली प्रकार स्थित, जल बरसाती हुई एवं सुनहरे रंग की बिजली मरुतों के साथ
मेघमाला, छिपे हुए स्थान में रहने वाली राजपुरुष की पत्नी अथवा यज्ञीय वाणी के समान
रहती है. (३)
परा शुभ्रा अयासो यव्या साधारण्येव मरुतो मिमिक्षुः.
न रोदसी अप नुदन्त घोरा जुषन्त वृधं सख्याय देवाः.. (४)
जिस प्रकार युवक साधारण नारी से मिलते हैं, उसी प्रकार शोभन अलंकारों वाले परम
वेगशाली एवं महान् मरुद्गण बिजली के साथ संगत होते हैं. भयंकर वर्षा करने वाले
मरुद्गण धरती और आकाश का त्याग नहीं करते. देवगण मित्रता के कारण मरुतों की उन्नति
का प्रयत्न करते हैं. (४)
जोषद्वदीमसूर्या सचध्यै विषितस्तुका रोदसी नृमणाः.
आ सूर्येव विधतो रथं गात्त्वेषप्रतीका नभसो नेत्या.. (५)
बिखरे हुए बालों वाली मरुत्-पत्नी बिजली समागम के निमित्त इनकी सेवा करती है.
जिस प्रकार सूर्य की पुत्री अश्विनीकुमारों के रथ पर सवार हुई थी, उसी प्रकार तेजस्वी शरीर
वाली चंचल बिजली मरुतों के रथ पर बैठकर यज्ञस्थल पर आती है. (५)
आस्थापयन्त युवतिं युवानः शुभे निमिश्लां विदथेषु पज्राम्.
अर्को यद्वो मरुतो हविष्मान्गायद्गाथं सुतसोमो दुवस्यन्.. (६)
नित्य तरुण मरुद्गण नियम से मिलन करने वाली एवं शक्तिशाली तरुणी बिजली को
वर्षा के लिए अपने रथ पर बैठा लेते हैं. उसी समय पूजा के मंत्र बोलते हुए हव्यदाता एवं
सोमरस निचोड़ने वाले यजमान मरुतों की सेवा करते हुए स्तुतियां पढ़ते हैं. (६)
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प्र तं विवक्मि वक्म्यो य एषां मरुतां महिमा सत्यो अस्ति.
सचा यदीं वृषमणा अहंग्युः स्थिरा चिज्जनीर्वहते सुभागाः.. (७)
मैं मरुतों की प्रशंसनीय एवं सरलता से समझ में न आने वाली महिमा का वर्णन करता
हूं. मरुतों से संबंधित बिजली बरसने की इच्छा वाली, अहंकार युक्त स्थिर सौभाग्यशालिनी
एवं जननसमर्थ प्रजाओं को धारण करने वाली है. (७)
पान्ति मित्रावरुणाववद्याच्चयत ईमर्यमो अप्रशस्तान्.
उत च्यवन्ते अच्युता ध्रुवाणि वावृध ईं मरुतो दातिवारः.. (८)
हे मरुतो! मित्र, वरुण और अर्यमा इस यज्ञ की निंदा से रक्षा करते हैं तथा यज्ञ के
दोषयुक्त पदार्थों का नाश करते हैं. इन्हीं के कारण समय पर मेघ का अच्युत एवं ध्रुव जल
टपक पड़ता है. जल की अधिकता से मित्रादि ही जगत् की रक्षा करते हैं. (८)
नही नु वो मरुतो अन्त्यस्मे आरात्ताच्चिच्छवसो अन्तमापुः.
ते धृष्णुना शवसा शूशुवांसोऽर्णो न द्वेषो धृषता परि ष्ठूः.. (९)
हे मरुद्गण! हम लोगों में से एक भी व्यक्ति दूर रहकर भी तुम्हारे बल की सीमा नहीं
जान सका. तुम शत्रुओं को हराने वाले बल से जलराशि के समान बढ़ते हो और अपनी शक्ति
से उन्हें हराते हो. (९)
वयमद्येन्द्रस्य प्रेष्ठा वयं श्वो वोचेमहि समर्यें.
वयं पुरा महि च नो अनु द्यून तन्न ऋभुक्षा नरामनु ष्यात्.. (१०)
आज हम इंद्र के अत्यंत प्रिय बनकर यज्ञ में उनकी महिमा का वर्णन करेंगे. हमने
प्राचीन काल में इंद्र की महिमा का वर्णन किया था और प्रतिदिन कर रहे हैं. इसलिए महान्
इंद्र अन्य लोगों की अपेक्षा हमारे अनुकूल बनें. (१०)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११)
हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति इस
अभिलाषा से तुम्हारे पास जाती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा
अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११)
सूक्त—१६८ देवता—मरुद्गण
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियन्धिं वो देवया उ दधिध्वे.
आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१)
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हे मरुतो! सभी यज्ञों के प्रति तुम्हारी समान भावना जान पड़ती है. तुम अपने जल-
प्रदान आदि सारे कर्मों को देवों को प्राप्त कराने के लिए धारण करते हो. मैं तुम्हें महान् स्तोत्र
के द्वारा अपने सामने इसलिए बुलाता हूं कि तुम धरती और आकाश की भली प्रकार रक्षा
कर सको. (१)
वव्रासो न यो स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः.
सहस्रियासो अपां नोर्मय आसा गावो वन्द्यासो नोक्षणः.. (२)
रूपसंपन्न, स्वयं उत्पन्न एवं कंपनशील मरुद्गण अन्न एवं स्वर्ग आदि के साधन बनकर
प्रकट होते हैं. समुद्र की लहरों के समान हजारों उत्तम दुधारू गाएं जिस प्रकार दूध देती हैं,
उसी प्रकार वे जल बरसाते हैं. (२)
सोमासो न ये सुतास्तृप्तांशवो हृत्सु पीतासो दुवसो नासते.
ऐषामंसेषु रम्भिणीव रारभे हस्तेषु खादिश्च कृतिश्च सं दधे.. (३)
जिस प्रकार सोमलता पहले जल से सींची जाने पर बढ़ती है एवं बाद में रस निचोड़कर
पीने से सेविका के समान मन को आनंद देती है, उसी प्रकार मरुद्गण भी लोगों को प्रसन्न
करते हैं. स्त्री के समान आयुध इनके कंधों को चूमते हैं एवं इनके हाथों में हस्तत्राण तथा
तलवार सुशोभित है. (३)
अव स्वयुक्ता दिव आ वृथा ययुरमर्त्याः कशया चोदत त्मना.
अरेणवस्तुविजाता अचुच्युवुर्दृळ्हानि चिन्मरुतो भ्राजदृष्टयः.. (४)
मरुद्गण एक-दूसरे से मिले हुए स्वर्ग से नीचे आते हैं. हे मरुतो! अपनी वाणी से हमें
प्रेरित करो. तेजस्वी एवं पापरहित मरुद्गण अनेक यज्ञों में जब उपस्थित होते हैं तो स्थिर
पर्वत भी कांपने लगते हैं. (४)
को वोऽन्तर्मरुत ऋष्टिविद्युतो रेजति त्मना हन्वेव जिह्वया.
धन्वच्युत इषां न यामनि पुरुप्रैषा अहन्यो३ नैतशः.. (५)
हे आयुधधारी मरुतो! जबड़ों को चलाने वाली जीभ के समान तुम्हारे भीतर रहकर तुम्हें
कौन चलाता है? अर्थात् कोई नहीं. जल बरसाने वाला बादल जिस प्रकार दिन में चलता है,
उसी प्रकार यजमान अन्न प्राप्त करने के लिए तुम्हें चलाता है. (५)
क्व स्विदस्य रजसो महस्परं क्वावरं मरुतो यस्मिन्नायय.
यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम्.. (६)
हे मरुतो! उस विशाल वर्षा जल का आदि और अंत कहां है? जिसे बरसाने के लिए
तुम जिस समय ढीली घास के समान जल को बिखराते हो, उस समय तेजस्वी बादल को
वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर देते हो. (६)
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सातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुतः पिपिष्वती.
भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुञ्ज्रयी असुर्येव जञ्जती.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारे धन के समान ही तुम्हारा दान भी प्रशंसनीय है. इंद्र तुम्हारे दान में
सहायता करते हैं. उस में सुख, तेज, फल का परिपाक एवं किसानों का कल्याण है. तुम्हारा
दान दाता की दक्षिणा के समान तुरंत फल देने वाला एवं अपनी शक्ति के समान सबको हराने
वाला है. (७)
प्रति ष्टोभन्ति सिन्धवः पविभ्यो यदभ्रियां वाचमुदीरयन्ति.
अव स्मयन्त विद्युततः पृथिव्यां यदि घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति.. (८)
जिस समय नीचे गिरने वाला जल चलता है, उस समय वज्र के शब्द के समान गर्जन
करता है. जब मरुद्गण धरती पर जल बरसाते हैं, उस समय बिजली नीचे की ओर मुंह
करके प्रकट हो जाती है. (८)
असूत पृश्निर्महते रणाय त्वेषमयासां मरुतामनीकम्.
ते सप्सरासोऽजनयन्ताभ्वमादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.. (९)
पृश्नि ने शीघ्र गति वाले मरुतों के समूह को विशाल युद्ध के लिए जन्म दिया है. समान
रूप वाले मरुतों ने जल को उत्पन्न किया. इसके पश्चात् सब लोगों ने अभिलषित अन्न के
दर्शन किए. (९)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०)
हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति तुम्हें
इस अभिलाषा से प्राप्त होती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा
अन्न, बल एवं दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (१०)
सूक्त—१६९ देवता—इंद्र
महश्चित्त्वमिन्द्र यत एतान्महश्चिदसि त्यजसो वरूता.
स नो वेधो मरुतां चिकित्स्वान्त्सुम्ना वनुष्व तव हि प्रेष्ठा.. (१)
हे इंद्र! तुम रक्षा करने वाले महान् मरुतों को नहीं छोड़ते हो, इसलिए तुम निश्चित रूप
से महान् हो. हे मरुतों को बुलाने वाले! तुम हमारे प्रति अनुग्रह करके हमें अत्यंत प्रिय सुख
प्रदान करो. (१)
अयुज्रन्त इन्द्र विश्वकृष्टीर्विदानासो निषिधो मर्त्यत्रा.
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मरुतां पृत्सुतिर्हासमाना स्व॑र्मीळ्हस्य प्रधनस्य सातौ.. (२)
हे इंद्र! सब मनुष्यों के स्वामी, मनुष्यों के कल्याण के लिए जल बरसाने वाले एवं
विद्वान् मरुद्गण तुम्हारे साथ मिलें. मरुतों की सेना उस युद्ध में विजय पाने के लिए हंसती
हुई सदा आगे बढ़ी है जो सुख पाने के हेतु लड़ा जाता है. (२)
अम्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे सनेम्यभ्वं मरुतो जुनन्ति.
अग्निश्चिद्धि ष्मातसे शुशुक्वानापो न द्वीपं दधति प्रयांसि.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारा विशेष आयुध वज्र हमारी उन्नति के लिए बादलों के पास पहुंचता है.
मरुत् भी चिरकाल से एकत्र किए हुए जल को धरती पर बरसा देते हैं. अग्नि भी महान् यज्ञ
के लिए दीप्त हुए हैं. जिस प्रकार जल द्वीपों को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि हव्य को
धारण करता है. (३)
त्वं तू न इन्द्र तं रयिं दा ओजिष्ठया दक्षिणयेव रातिम्.
स्तुतश्च यास्ते चकनन्त वायोः स्तनं न मध्वः पीपयन्त वाजैः.. (४)
हे दाता इंद्र! तुम वह धन हमें दो जो तुम्हारे देने योग्य है, जिस प्रकार यजमान अधिक
दक्षिणा देकर ऋत्विज् को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हें प्रसन्न करूंगा. स्तोता शीघ्र
वर देने वाले तुम्हारी स्तुति करना चाहते हैं. जिस प्रकार लोग दूध पाने के लिए नारी के स्तन
को पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हें अन्न देकर पुष्ट करेंगे. (४)
त्वे राय इन्द्र तोशतमाः प्रणेतारः कस्य चिदृतायोः.
ते षु णो मरुतो मृळयन्तु ये स्मा पुरा गातूयन्तीव देवाः.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारा धन परम संतोषदाता एवं यजमान के यज्ञ को पूरा करने वाला है. वे
मरुद्गण हमें प्रसन्न करें जो पहले ही यज्ञ में आने के लिए तत्पर हैं. (५)
प्रति प्र याहीन्द्र मीळहुषो नॄन्महः पार्थिवे सदने यतस्व.
अध यदेषां पृथुबुध्नास एतांस्तीर्थे नार्यः पौंस्यानि तस्थुः.. (६)
हे इंद्र! तुम जल बरसाने वाले विश्व के नेता एवं महान् मेघों के सम्मुख जाओ एवं
अंतरिक्ष में स्थित रहकर प्रयत्न करो. जिस प्रकार युद्धक्षेत्र में राजा की सेनाएं ठहरती हैं, उसी
प्रकार मरुतों के चौड़े खुरों वाले घोड़े स्थित होते हैं. (६)
प्रति घोराणामेतानामयासां मरुतां शृण्व आयतामुपब्दिः.
ये मर्त्यं पृतनायन्तमूर्मैर्ऋणावानं न पतयन्त सर्गैः.. (७)
हे इंद्र! भयानक, काले रंग वाले एवं गमनशील मरुतों के आने का शब्द सुनाई दे रहा है.
जिस प्रकार अधम शत्रु को पीड़ा देकर उसका धन छीनते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण अपने
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रक्षणोपायों द्वारा अपने शत्रु मेघ को गिरा लेते हैं. (७)
त्वं मानेभ्य इन्द्र विश्वजन्या रदा मरुद्भिः शुरुधो गोअग्राः.
स्तवानेभिः स्तवसे देव देवैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८)
हे समस्त प्राणियों को जन्म देने वाले इंद्र! तुम मरुतों के साथ आओ और अपनी
प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए शोकनाशिनी एवं जलधारण करने वाली घटा को विदीर्ण करो. हे देव!
स्तुति किए जाते हुए देवगण तुम्हारी स्तुति करते हैं. हमें अन्न, बल और दीर्घ आयु दो. (८)
सूक्त—१७० देवता—इंद्र
न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम्.
अन्यस्य चित्तमभि सञ्चरेण्यमुताधीतं वि नश्यति.. (१)
इंद्र ने कहा—"आज या कल वास्तव में कुछ नहीं है. जो कार्य विचित्र है, उसे कौन
जानता है? अन्य लोगों का मन इतना चंचल होता है कि वे जो भी पढ़ते हैं, सो भूल जाते हैं."
(१)
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव.
तेभिः कल्पस्व साधुया मा नः समरणे वधीः.. (२)
अगस्त्य बोले—"हे इंद्र! तुम क्या मुझे मारना चाहते हो? अपने भ्राता मरुतों के साथ
जाकर भली प्रकार यज्ञ के भागों का भोग करो. संग्राम में हमारी हत्या मत करना." (२)
किं नो भ्रातरगस्त्य सखा सन्नति मन्यसे.
विद्या हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि.. (३)
इंद्र बोले—"हे भाई अगस्त्य! तुम मित्र होकर हमारा अपमान क्यों कर रहे हो? तुम्हारे
मन में जो बात है, उसे हम जानते हैं. तुम हमें हव्य देना नहीं चाहते हो." (३)
अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुरः. तत्रामृतस्य चेतनं यज्ञं ते तनवावहै.. (४)
हे ऋत्विजो! तुम वेदी को अलंकृत करो एवं हमारे सामने अग्नि को जलाओ. हम और
तुम उस अग्नि में अमृत की सूचना देने वाला यह करेंगे." (४)
त्वमीशिषे वसुपते वसूनां त्वं मित्राणां मित्रपते धेष्ठः.
इन्द्र त्वं मरुद्भिः सं वदस्वाध प्राशान ऋतुथा हवींषि.. (५)
अगस्त्य ने कहा—"हे धन के अधिपति, मित्रों के मित्र, सबके स्वामी एवं आश्रय इंद्र!
तुम मरुतों से कहो कि हमारा यज्ञ पूरा हो गया है. तुम ठीक समय पर आकर हमारा हव्य
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सूक्त—१७१ देवता—मरुद्गण
भक्षण करो.” (५)
सूक्त—१७१ देवता—मरुद्गण
प्रति व एना नमसाहमेमि सूक्तेन भिक्षे सुमतिं तुराणाम्.
रराणता मरुतो वेद्याभिर्नि हेळो धत्त वि मुचध्वमश्वान्.. (१)
हे वेगशाली मरुतो! मैं अपना नमस्कार और स्तुति वचन लेकर तुम्हारे समीप आता हूं
एवं तुम्हारी दया की याचना करता हूं. तुम स्तुतियों से चित्त प्रसन्न करो, क्रोध त्यागो और
घोड़ों को रथ से अलग कर दो. (१)
एष वः स्तोमो मरुतो नमस्वान्हृदा तष्टो मनसा धायि देवाः.
उपेमा यात मनसा जुषाणा यूयं हिष्ठा नमस इदवृधासः.. (२)
हे तेजस्वी मरुतो! तुम्हारे प्रति बोला जा रहा स्तोत्र अन्न सहित है. यह स्तोत्र तुम में
श्रद्धा रखने वाली बुद्धि से निकला है, इसलिए हमारे प्रति कृपा करके मन से इसे सुनो एवं
इसे स्वीकार करके शीघ्र आओ. तुम हविरूप अन्न की वृद्धि करने वाले हो. (२)
स्तुतासो नो मरुतो मृळयन्तूत स्तुतो मघवा शम्भविष्ठः.
ऊर्ध्वा नः सन्तु कोम्या वनान्यहानि विश्वा मरुतो जिगीषा.. (३)
हे मरुतो! स्तुति सुनकर हमें सुखी करो. सर्वाधिक सुखदाता इंद्र हमें प्रसन्न करें. हे
मरुतो! हम जितने दिन जीवित रहें, वे दिन सबसे अधिक उत्तम, चाहने योग्य एवं भोगपूर्ण
हों. (३)
अस्मादहं तविषादीषमाणा इन्द्राद्भिया मरुतो रेजमानः.
युष्मभ्यं हव्या निशितान्यासन्तान्यारे चक्रमा मृळता नः.. (४)
हे मरुतो! हम इस बलवान् इंद्र के भय से कांपते हुए भागने लगे. हमने तुम्हारे लिए जो
हवि तैयार किया था, उसे दूर कर लिया. तुम हमारी रक्षा करो. (४)
येन मानासश्चितयन्त उस्रा व्युष्टिषु शवसा शश्वतीनाम्.
स नो मरुद्भिर्वृषभ श्रवो धा उग्र उग्रेभिः स्थविरः सहोदाः.. (५)
हे इंद्र! तुझ बलशाली के अनुग्रह से अभिमानपूर्ण किरणें नित्य प्रति उषाकाल होने पर
प्राणियों को जगा देती हैं. हे कामवर्षी, उग्र, शत्रुओं को हराने वाले बल के दाता एवं पुरातन
इंद्र! तुम परम बलशाली मरुतों के साथ मिलकर हमें अन्न दो. (५)
त्वां पाहीन्द्र सहीयसो नॄन्भवा मरुद्भिरवयातहेळाः.
सुप्रकेतेभिः सासहिर्दधानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६)
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सूक्त—१७२ देवता—मरुद्गण
हे इंद्र! तुम मरुतों की रक्षा करो. तुम्हारी कृपा से ही वे अधिक शक्तिशाली बने हैं.
मरुतों के साथ-साथ हमारे प्रति भी क्रोधरहित बनो. शोभन बुद्धि वाले मरुतों के साथ
मिलकर तुम शत्रुओं को हराते हुए हमारे प्रति कृपालु बनो. हम अन्न, बल और दीर्घ आयु
प्राप्त करें. (६)
सूक्त—१७२ देवता—मरुद्गण
चित्रो वोऽस्तु यामश्चित्र ऊती सुदानवः. मरुतो अभिभानवः.. (१)
हे मरुतो! हमारे यज्ञ में तुम्हारा आगमन आश्चर्यजनक हो. हे शोभन दान एवं उत्तम
प्रकाश वाले मरुतो! आपका शुभ आगमन हमारी रक्षा करे. (१)
आरे सा वः सुदानवो मरुत ऋञ्जती शरुः. आरे अश्मा यमस्यथ.. (२)
हे शोभनदानशील मरुतो! तुम्हारे चमकते हुए एवं हिंसक आयुध हमसे दूर रहें. तुम्हारे
द्वारा फेंका गया पाषाणमय आयुध हमसे दूर रहे. (२)
तृणस्कन्दस्य नु विशः परिवृङ्क्त सुदानवः. ऊर्ध्वान्नः कर्त जीवसे.. (३)
हे शोभन दान वाले मरुतो! यद्यपि मेरी प्रजा तिनकों के समान तुच्छ हैं तथापि उनकी
रक्षा करो तथा हमें चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उन्नत करो. (३)
सूक्त—१७३ देवता—इंद्र
गायत्साम नभन्यं१ यथा वेरर्चाम तद्वावृधानं स्वर्वत्.
गावो धेनवो बर्हिष्यदब्धा आ यत्सद्मानं दिव्यं विवासान्.. (१)
हे इंद्र! उद्गाता सामवेद को इस प्रकार गाता है कि वह आकाश में गूंज जाए और आप
उसे समझ लें. हम उस बढ़ते हुए सामगान की पूजा स्वर्ग के समान करते हैं. जिस प्रकार
दुधारू और हिंसारहित गाएं अपने स्थान पर बैठती हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारी सेवा करता हूं.
(१)
अर्चद्वृषा वृषभिः स्वेदुहव्यैर्मृगो नाश्वो अति यज्जगुर्यात्.
प्र मन्द्युर्मनां गूर्त होता भरते मर्यो मिथुना यजत्रः.. (२)
यजमान हव्य देने वाले अध्वर्यु को साथ लेकर इंद्र की पूजा करते हैं. वे सोचते हैं कि इंद्र
प्यासे मृग के समान हव्य के प्रति शीघ्र आ जाएंगे. हे बलशाली इंद्र! स्तोत्र की इच्छा करने
वाले देवों की स्तुति करता हुआ होता, यजमान एवं उसकी पत्नी भली प्रकार यज्ञ पूरा करते
हैं. (२)
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नक्षद्धोता परि सद्म मिता यन्भरद्गर्भमा शरदः पृथिव्याः.
क्रन्ददश्वो नयमानो रुवद्गौरन्तर्दूतो न रोदसी चरद्वाक्.. (३)
हवन पूर्ण करने वाले अग्नि, गार्हपत्य आदि स्थानों के चारों ओर फैले हैं एवं वर्ष भर में
धरती से उत्पन्न होने वाले अन्न को धारण करते हैं. अग्नि घोड़े और बैल की तरह शब्द करते
हुए हवि का अन्न लेकर धरती और आकाश के मध्य में दूत के समान बातें करते हैं. (३)
ता कर्माषितरास्मै प्र च्यौत्नानि देवयन्तो भरन्ते.
जुजोषदिन्द्रो दस्मवर्चा नासत्येव सुगम्यो रथेष्ठाः.. (४)
हम इंद्र को लक्ष्य करके अत्यंत व्यापक हवि प्रदान करेंगे. देवों को अपने अनुकूल
बनाने के लिए यजमान उत्तम स्तोत्र पढ़ते हैं. अश्विनीकुमारों के समान तेजस्वी, सुंदर एवं
सुख से प्राप्त करने योग्य इंद्र रथ पर बैठकर हमारी स्तुतियों को सुनें. (४)
तमु ष्टुहीन्द्रं यो ह सत्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः.
प्रतीचश्चिद्घोधीयान्व्ऋषण्वान्ववृषश्चित्तमसो विहन्ता.. (५)
हे होता! इंद्र की स्तुति करो. वे अनंत शक्ति वाले, शूर, धनवान्, रथ पर स्थिर, सामने
लड़ने वाले योद्धाओं में उत्तम, वज्रधारणकर्त्ता एवं मेघ के विनाशक हैं. (५)
प्र यदित्था महिना नृभ्यो अस्त्यरं रोदसी कक्ष्यें३ नास्मै.
सं विव्य इन्द्रो वृजनं न भूमा भर्ति स्वधावाँ ओपशमिव द्याम्.. (६)
इंद्र अपने महत्त्व के कारण यज्ञकर्त्ता यजमानों को स्वर्ग प्रदान करने में समर्थ हैं. धरती
और आकाश उनके संचरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं. जैसे बैल सींगों को धारण करता है, उसी
प्रकार अन्न के स्वामी इंद्र स्वर्ग को धारण करते हैं. जैसे आकाश धरती को घेरे हुए है, उसी
प्रकार इंद्र तीनों लोकों को व्याप्त करते हैं. (६)
समत्सु त्वा शूर सतामुराणं प्रपथिन्तमं परितंसयध्यै.
सजोषस इन्द्रं मदे क्षोणीः सूरिं चिद्ये अनुमदन्ति वाजैः.. (७)
हे शूर इंद्र! तुम युद्धों में उन लोगों को बल प्रदान करते हो एवं उत्तम मार्ग दिखाते हो,
जो तुम्हारा ही आश्रय लेकर युद्ध में प्रवृत्त होते हैं. तुम्हारी सेवा करके प्रसन्न होने वाले
मरुद्गण युद्ध में प्रयत्न करते हैं. (७)
एवा हि ते शं सवना समुद्र आपो यत्त आसु मदन्ति देवीः.
विश्वा ते अनु जोष्या भूद्गौः सूरीँश्चिद्यदि धिषा वेषि जनान्.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारे उद्देश्य से किए गए सोम याग इस प्रकार सुखकर हों कि आकाश में
स्थित दिव्य-जल प्रजाओं के कल्याण के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. स्तोत्र रूपी समस्त वाणी तुम्हें
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प्रसन्न करे और तुम वर्षा करके स्तुतिकर्त्ता भक्तों की इच्छा पूरी करो. (८)
असाम यथा सुखखाय एन स्वभिष्टयो नरां न शंसै:.
असद्यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था.. (९)
हे स्वामी इंद्र! ऐसी कृपा करो कि हम तुम्हारे सखा बनकर अपनी स्तुतियों द्वारा उसी
प्रकार अपनी अभिलाषाएं पूर्ण कर सकें, जिस प्रकार राजा की स्तुति से करते हैं. हे इंद्र! हम
जिस समय स्तुति करें, उस समय तुम उपस्थित होकर हमारी स्तुतियों के साथ ही हमारे यज्ञ
को भी शीघ्र स्वीकार करो. (९)
विष्पर्धसो नरां न शंसैरस्माकासदिन्द्रो वज्रहस्त:.
मित्रायुवो न पूर्षतिं सुशिष्ठौ मध्यायुव उप शिक्षन्ति यज्ञै:.. (१०)
मनुष्य जिस प्रकार स्तुति द्वारा विरोधियों को मित्र बना लेते हैं. उसी प्रकार हम भी इंद्र
को सखा बनाएंगे. वज्रधारी इंद्र की शक्ति हमारी बनेगी. जिस प्रकार मित्र बनने के इच्छुक
लोग नगर के योग्य शासक स्वामी की पूजा करते हैं, उसी प्रकार हम श्री और यश प्राप्त करने
की इच्छा वाले अध्वर्यु इंद्र की पूजा करते हैं. (१०)
यज्ञो हि ष्मेन्द्रं कश्चिदृन्धञ्जुहुराणश्चिन्मनसा परियन्.
तीर्थे नाच्छा तातृषाणमोको दीर्घो न सिध्रमा कृणोत्यध्वा.. (११)
यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला यज्ञ द्वारा इंद्र की ओर बढ़ता है एवं कुटिल गति व्यक्ति
सदा मन में दु:खी रहता है, जैसे मार्ग में स्वच्छ जल सामने पाकर प्यासा व्यक्ति प्रसन्न होता है
एवं जल तक देर में पहुंचने वाला टेढ़ा मार्ग प्यासे को दु:खी करता है. (११)
मो षू ण इन्द्रात्र पृत्सु देवैरस्ति हि ष्मा ते शुष्मिन्नवया:.
महश्चिद्यस्य मीळ्हुषो यव्या हविष्मतो मरुतो वन्दते गी:.. (१२)
हे इंद्र! संग्राम उपस्थित होने पर मरुद्गणों के साथ हमें छोड़ मत देना. हे शक्तिशाली!
तुम्हारा यज्ञभाग मरुतों से अलग है. हमारी फलों से मिली हुई स्तुति हवियुक्त एवं दानशील
मरुतों की वंदना करती है. (१२)
एष स्तोम इन्द्र तुभ्यमस्मे एतेन गातुं हरिवो विदो न:.
आ नो ववृत्या: सुविताय देव विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१३)
हे इंद्र! यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. हे अश्वस्वामी इंद्र! इस स्तोत्र रूपी मार्ग से हमारे
यज्ञ को जानो और सहज ही हमारे समीप आओ. हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें.
(१३)
सूक्त—१७४ देवता—इंद्र
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त्वं राजेन्द्रे ये च देवा रक्षा नॄन्पाह्यसुर त्वमस्मान्.
त्वं सत्पतिर्मघवा नस्तरुत्रस्त्वं सत्यो वसवानः सहोदाः.. (१)
हे इंद्र! तुम समस्त विश्व और देवों के राजा हो. तुम मनुष्यों की रक्षा करो. हे शत्रुनाशक!
तुम हमारा पालन करो. तुम सज्जनों के पालक, धन के स्वामी एवं हमारे उद्धारकर्त्ता हो. तुम
सत्य फल वाले, अपने तेज से सबको ढकने वाले एवं स्तुतिकर्ताओं के शक्तिदाता हो. (१)
दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्दत्.
ऋणोरपो अनवद्यार्णा यूने वृत्रं पुरुकुत्साय रन्धीः.. (२)
हे इंद्र! जिस समय तुमने पूरे वर्ष तक दृढ़ की गई सात नगरियों को नष्ट किया था, उस
समय वहां रहने वाली एवं क्षमायाचना करती हुई प्रजा का सुख से दमन किया था. हे
अनिंदित इंद्र! तुमने बहने वाला जल दिया एवं तरुण अवस्था वाले राजा पुरुकुत्स के
कल्याण के निमित्त वृत्र का हनन किया था. (२)
अजा वृत इन्द्र शूरपत्नीर्द्यां च येभिः पुरुहूत नूनम्.
रक्षो अग्निमशुषं तूर्वयाणं सिंहो न दमे अपांसि वस्तोः.. (३)
हे बहुतों द्वारा स्तुत्य इंद्र! तुम असुरों द्वारा रक्षित पुरियों को जीतते जाते हो. तुम वहां से
मरुत् आदि अनुचरों सहित स्वर्ग में जाते हो. वहां तुम अशांत एवं शीघ्रगंता अग्नि की इसलिए
रक्षा करते हो कि वे यज्ञगृह में अपना यज्ञकर्म पूरा कर सकें. जैसे सिंह वन की रक्षा करता है,
उसी प्रकार तुम अग्नि की रक्षा करते हो. (३)
शेषन्नु त इन्द्र सस्मिन्योन्नौ प्रशस्तये पवीरवस्य मह्ना.
सृजदर्णांस्यव यद्युधा गास्तिष्ठद्धरी धृषता मृष्ट वाजान्.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारे शत्रु वज्र की प्रशंसा के बहाने तुम्हारी महिमा का वर्णन करते हुए अपने
उत्पत्ति स्थान में सो जावें. जब तुम प्रहार का साधन वज्र लेकर जाते हो, तब नीचे की ओर
जल बरसाते हो और अपने अश्वों वाले रथ पर बैठते हो. तुम अपनी शक्ति से फसलों की
वृद्धि करते हो. (४)
वह कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्च्यूमन्यू ऋञ्ज्रा वातस्याश्वा.
प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीकेऽभि स्पृधो यासिषद्वज्रबाहुः.. (५)
हे इंद्र! जिस यज्ञ में तुम कुत्स ऋषि की इच्छा करते हो एवं अपने सततगामी, सरलगति
वाले एवं वायुवेग वाले घोड़ों को हांककर ले जाते हो, सूर्य अपने रथ का चक्र उस यज्ञ के
समीप ले जावें एवं वज्र हाथ में पकड़ने वाले इंद्र संग्राम करने वाले शत्रुओं का सामना करें.
(५)
जघन्वाँ इन्द्र मित्रैरूचोदप्रवृद्धो हरिवो अदाशून्.
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प्र ये पश्यन्नर्यमणं सचायोस्त्वया शूर्ता वहमाना अपत्यम्.. (६)
हे अश्वस्वामी इंद्र! तुमने स्तोत्रों से वृद्धि प्राप्त करके ऐसे लोगों का वध किया जो दान
नहीं देते थे और तुम्हारे मित्र यजमानों के शत्रु थे. जो तुम्हें आश्रयदाता के रूप में देखते एवं
जो हव्य देने के लिए तुम्हारे सामने आते हैं, वे तुमसे संतान पाते हैं. (६)
रपत्कविरिन्द्रार्कसातौ क्षां दासायोपबर्हणीं कः.
करत्तिस्रो मघवा दानुचित्रा नि दुर्योणे कुयवाचं मृधि श्रेत्.. (७)
हे इंद्र! अन्न प्राप्ति के निमित्त क्रांतदर्शी होता तुम्हारी स्तुति करता है. तुमने दास असुर
का वध करके धरती को उसकी शय्या बनाया था. इंद्र ने तीन भूमियों का दानरूपी विचित्र
कार्य करके दुर्योणि राजा के कल्याण के लिए कुयवाच को मारा था. (७)
सना ता त इन्द्र नव्या आगुः सहो नभोऽविरणाय पूर्वीः.
भिनत्पुरो न भिदो अदेवीर्ननमो वधरदेवस्य पीयोः.. (८)
हे इंद्र! नवीनतम ऋषि तुम्हारे अति प्राचीन वीरकर्मों की स्तुति करते हैं. तुमने युद्ध
समाप्त करने के लिए अनेक हिंसकों को समाप्त किया है. तुमने विरोधियों के देवशून्य नगरों
को नष्ट किया तथा दानरहित विरोधी वृत्र के ऊपर अपना वज्र झुकाया. (८)
त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः.
प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति.. (९)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं को कंपित करने वाले हो, इसलिए बहती हुई सीरा नदी के समान
तरंगों वाला जल धरती पर बहाते हो. हे शूर! तुमने सागर को जल से पूर्ण करते समय यदु
और तुर्वसु राजाओं का पालन करके उनका कल्याण किया. (९)
त्वमस्माकमिन्द्र विश्वध स्या अवृकतमो नरां नृपाता.
स नो विश्वासां स्पृधां सहोदा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०)
हे इंद्र! तुम सदा हमारे उत्तम रक्षक एवं मनुष्यों के रक्षक बनो, तुम हमारी सेना को बल
प्रदान करो. हम अन्न, धन और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१०)
सूक्त—१७५ देवता—इंद्र
मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः.
वृषा ते वृष्ण इन्दुवाजी सहस्रसातमः.. (१)
हे अश्वस्वामी इंद्र! महान् एवं पूज्य सोमरस जिस प्रकार पात्र में रखा है, उसी प्रकार तुम
भी इसे स्वीकार करो. तुम इसे पीकर प्रसन्नता प्राप्त करोगे. हे कामवर्षी इंद्र! यह सोम तुम्हारी
अभिलाषा पूर्ण करके अभिमत सुख देगा. (१)
आ नस्ते गन्तुमत्सरो वृषा मदो वरेण्यः. सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाळमर्त्यः.. (२)
हे इंद्र! प्रसन्नतादाता, कामवर्षी, तृप्त करने वाला, श्रेष्ठ, शक्तिशाली, शत्रु सेनाओं का
नाश करने वाला एवं अविनाशी सोमरस तुम्हें मिले. (२)
त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्. सहावान्दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा.. (३)
हे शूर एवं दाता इंद्र! मुझ मनुष्य की अभिलाषा पूरी करो. सोमरस तुम्हारा सहायक है.
अग्नि जिस प्रकार अपनी लपटों से अपने ही आधारभूत पात्र को जलाता है, उसी प्रकार तुम
व्रतहीन असुर को नष्ट करो. (३)
मुषाय सूर्य कवे चक्रमीशान ओजसा. वह शुष्णाय वधं कुत्सं वातस्याश्वैः.. (४)
हे मेधावी एवं समर्थ इंद्र! तुमने अपनी शक्ति से सूर्य के एक पहिए को चुरा लिया था.
तुम शुष्ण नामक असुर का वध करने के लिए वायु के समान तेज चलने वाले घोड़ों की
सहायता से वज्र लेकर आओ. (४)
शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतुः.
वृत्रघ्ना वरिवोविदा मंसीष्ठा अश्वसातमः.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता सबसे अधिक शक्तिशाली है एवं तुम्हारे यज्ञ में सबसे अधिक
अन्न होता है. हे अश्व रूप अनेक धन देने वाले इंद्र! तुम वृत्रघाती एवं धन देने वाले दोनों यज्ञों
का समर्थन करो. (५)
यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयड्वापो न तृष्यते बभूथ.
तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६)
हे इंद्र! तुमने प्राचीन स्तोताओं को उसी प्रकार सुख दिया, जिस प्रकार जल प्यासे
व्यक्ति को प्रसन्न करता है. इसी कारण हम बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं कि हम अन्न, बल
और दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें. (६)
सूक्त—१७६ देवता—इंद्र
मत्सि नो वस्यइष्टय इन्द्रमिन्दो वृषा विश.
ऋघायमाण इन्वसि शत्रु्रमन्ति न विन्दसि.. (१)
हे सोम! तुम हमारी धनप्राप्ति के लिए इंद्र को प्रसन्न करो एवं कामवर्षी इंद्र के भीतर
प्रवेश करो. तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए उन्हें घेर लेते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारे समीप नहीं
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आता. (१)
तस्मिन्ना वेशया गिरो य एकश्चर्षणीनाम्.
अनु स्वधा यमुप्यते यवं न चर्कृषद्वृषा.. (२)
हे होता! अपनी स्तुतिरूपी वाणी को इंद्र में स्थापित करो. वे ज्ञान वाले मनुष्यों के
एकमात्र आश्रय हैं. स्वधा शब्द के बाद उन्हें भी हव्य अन्न दिया जाता है. किसान जिस प्रकार
पके जौ को ग्रहण करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारा हव्य स्वीकार करते हैं. (२)
यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु.
स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग्दिव्येनाशनिर्जहि.. (३)
जिन इंद्र के हाथों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद पांचों प्रकार के जनों को
प्रसन्न करने वाला सभी प्रकार का अन्न है, वे इंद्र हमसे द्रोह करने वाले को वज्र बनकर नष्ट
करें. (३)
असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न ते मयः.
अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते.. (४)
हे इंद्र! सोमरस न निचोड़ने वालों, दुःसाध्य विनाश वालों एवं सुख न पहुंचाने वालों का
नाश करो. ऐसे लोगों का धन हमें दो. तुम्हारा स्तोता ही धन पाता है. (४)
आवो यस्य द्विबर्हसोऽर्केषु सानुषगसत्.
आजाविन्द्रस्येन्दो प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (५)
हे सोम! उस यजमान की रक्षा करो, जिसके स्तोत्र और हव्य संबंधी मंत्रों में तुम सदा
स्थित रहते हो. हे सोम! धन के लिए होने वाले युद्धों में अन्न के स्वामी इंद्र की रक्षा करो. (५)
यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मयइवापो न तृष्यते बभूथ.
तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (६)
हे इंद्र! जिस प्रकार जल प्यासे को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुमने प्राचीन स्तुतिकर्त्ता
पर कृपा की थी. इसीलिए मैं तुम्हारी सुखदायक स्तुति बार-बार कर रहा हूं. मैं अन्न, बल एवं
दीर्घ आयु प्राप्त करूं. (६)
सूक्त—१७७ देवता—इंद्र
आ चर्षणिप्रा वृषभो जनानां राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः.
स्तुतः श्रवस्यन्नवसोप मद्रिग्र्युक्त्वा हरी वृषणा याह्यर्वाङ्.. (१)
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