सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा सरिताओं के तटों को जलपूर्ण किया था,
अश्वविरहित रथ को विजय के लिए चलाया था तथा त्रिशोक को अपनी चुराई हुई गायों को
पाने में समर्थ किया था, उन्हीं उपायों को साथ लेकर आओ. (१२)
याभिः सूर्य परियाथः परावति मन्धातारं क्षेत्रपत्येष्यावतम्.
याभिर्विप्रं प्र भरद्वाजमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा सूर्य को ग्रहण के अंधकार से मुक्त करने जाते
हो, तुमने जिन उपायों द्वारा मांधाता की क्षेत्रपति कर्म में रक्षा की एवं मेधावी भरद्वाज को
अन्न देकर बचाया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१३)
याभिर्महामतिथिग्वं कशोजुवं दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्.
याभिः पूर्भिद्ये त्रसदस्युमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा महान् अतिथि सत्कार करने वाले एवं
राक्षसों के भय से जल में घुसने को प्रस्तुत दिवोदास को शंबर असुर द्वारा मारे जाते समय
बचाया था तथा संग्राम में त्रसदस्यु ऋषि की रक्षा की, उन्हीं उपायों को लेकर आओ. (१४)
याभिर्वम्रं विपिपानमुपस्तुतं कलिं याभिर्वित्तजानिं दुवस्यथः.
याभिर्व्यश्वमुत पृथिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा पीने में संलग्न एवं स्तुति किए गए वम्र की,
पत्नी प्राप्त करने वाले कलि की एवं अश्वहीन पृथि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों के साथ
आओ. (१५)
याभिर्नरा शयवे याभिरत्रये याभिः पुरा मनवे गातुमीषथुः.
याभिः शारीराजतं स्यूमरश्मये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१६)
हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शंयु, अत्रि एवं प्रथम मनु को दुःख
से निकलने का मार्ग बताया था एवं स्यूमरश्मि की रक्षा के उद्देश्य से उनके शत्रुओं पर बाण
चलाया था, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ. (१६)
याभिः पठर्वा जठरस्य मज्मनाग्निर्नादीदेच्चित इद्धो अज्मन्ना.
याभिः शर्यातमवथो महाधने ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! जिन उपायों द्वारा पठर्वा ऋषि शरीर बल पाकर संग्राम में उसी प्रकार
दीप्त हुए, जिस प्रकार काष्ठों द्वारा जलाई गई अग्नि चमकती है. जिन उपायों से युद्ध में
शर्यात की रक्षा की गई, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (१७)
याभिरङ्गिरो मनसा निरण्यथोऽग्रं गच्छथो विवरे गोअर्णसः.
ebook converter DEMO Watermarks*

याभिर्मनं शूरमिषा समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से मननीय स्तोत्र द्वारा प्रसन्न होकर अंगिराओं की
रक्षा की थी, पणियों द्वारा गुफा में छिपाई गई गायों के स्थान पर सबसे पहले पहुंचे थे एवं
अन्न देकर वीर्यवान मनु की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१८)
याभिः पत्नीर्विमदाय न्यूहथुरा घ वा याभिररुणीरशिक्षतम्.
याभिः सुदास ऊहथुः सुदेव्यं१ ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा विमद ऋषि के लिए पत्नी एवं लाल रंग की
गाएं दीं एवं सुदास को प्रसिद्ध धन दिया, उन्हीं उपायों सहित आओ. (१९)
याभिः शंताती भवथो ददाशुषे भुज्युं याभिरवथो याभिरधिगुम्.
ओम्यावतीं सुभरामृतस्तुभं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२०)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जिन उपायों द्वारा हविदाता यजमान के लिए सुखकर्त्ता
बनते हो, भुज्यु एवं अधिगु की रक्षा की तथा ऋतुस्तुभ ऋषि को सुखकर और भरण योग्य
अन्न प्रदान किया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२०)
याभिः कृशानुमसने दुवस्यथो जवे याभिर्युनो अर्वन्तमावतम्.
मधु प्रियं भरथो यत्सरङ्ग्भ्यस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ने जिन उपायों से युद्ध में कृशानु की रक्षा की, युवा
पुरुकुत्स के दौड़ते हुए घोड़े को बचाया तथा मधुमक्खियों को सर्वप्रिय मधु प्रदान किया,
उन्हीं उपायों के साथ आओ. (२१)
याभिर्नरं गोषुयुधं नृषाह्ये क्षेत्रस्य साता तनयस्य जिन्वथः.
याभी रथाँ अवथो याभिर्वतस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम जिन उपायों द्वारा गौ प्राप्ति के निमित्त युद्ध करने वाले मनुष्यों
की संग्राम में रक्षा करते हो, क्षेत्र एवं धन प्राप्ति में यजमान के सहायक होते हो एवं उसके
रथों तथा घोड़ों की रक्षा करते हो, उन्हीं के साथ आओ. (२२)
याभिः कुत्समार्जुनेयं शतक्रतू प्र तुर्वीतिं प्र च दभीतिमावतम्.
याभिर्ध्वसन्तिं पुरुषन्तिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्.. (२३)
हे शतक्रतु अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों से अर्जुन के पुत्र कुत्स, तुर्वीति एवं
दधीति की रक्षा की थी तथा ध्वसंति और पुरुषंति नामक ऋषियों को सुरक्षित किया, उन्हीं
उपायों के साथ यहां आओ. (२३)
ebook converter DEMO Watermarks*

अप्रस्वतीमश्विना वाचमस्मे कृतं नो दस्रा वृषणा मनीषाम्.
अद्यूत्येऽवसे नि ह्वये वां वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (२४)
हे कामवर्षी अश्विनीकुमारो! हमारी वाणी को विहित कर्मों से युक्त एवं बुद्धि को वेद
ज्ञान में समर्थ बनाओ. प्रकाशरहित रात्रि के अंतिम प्रहर में हम तुम्हें अपनी रक्षा के निमित्त
बुलाते हैं. हमारे अन्नलाभ में सहायक बनो. (२४)
द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगोभिः.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! हमें दिवसों, निशाओं एवं विनाशरहित सौभाग्यों द्वारा सुरक्षित
बनाओ, मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश इस स्तुति का आदर करें. (२५)
सूक्त—११३ देवता—उषा और रात्रि
इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा.
यथा प्रसूता सवितुः सवायँ एवा रात्र्युषसे योनिमारैक्.. (१)
द्योतमान ग्रहनक्षत्रादि में श्रेष्ठ ज्योति उषा आई. इसकी बहुरंगी एवं विश्व को प्रकाशित
करने वाली रश्मियां सभी जगह फैल गईं. जिस प्रकार रात्रि सूर्य से उत्पन्न होती है, उसी
प्रकार उषा का उत्पत्ति स्थान रात्रि है. (१)
रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः.
समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने.. (२)
सूर्य की माता, तेजस्विनी एवं श्वेतवर्ण वाली उषा आई है. कृष्णवर्णा रात्रि ने उसे अपना
स्थान दे दिया है. यद्यपि ये दोनों एक ही सूर्य से संबंधित एवं मरणरहिता हैं, तथापि एक-
दूसरी के पीछे आती हैं एवं एक-दूसरे का रूप नष्ट करती हुई आकाश में विचरण करती हैं.
(२)
समानो अध्वा स्वसोरनन्तस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे.
न मेथते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे.. (३)
इन दोनों बहिनों का अनंत गमनमार्ग एक ही है, जिस पर सूर्य द्वारा निर्देश पाकर ये
एक-एक करके चलती हैं. वे सुंदर जन्मदात्री एवं परस्पर भिन्न रूप वाली होकर एकमत को
प्राप्त करके आपस में किसी की हिंसा नहीं करतीं तथा कभी स्थिर नहीं रहतीं. (३)
भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आवः.
प्राप्र्या जगद्व्यु नो रायो अख्यदुषा अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

हम प्रकाशसंपन्न एवं वाणियों की नेत्री उषा को जानते हैं. विचित्र उषा ने हमारे लिए
अंधकार के बंद द्वार खोल दिए हैं, सारे संसार को प्रकाशित करके हमें धन दिए हैं एवं समस्त
लोक को प्रकाशित किया है. (४)
जिह्मश्ये३चरितवे मघोन्याभोगय इष्टये राय उ त्वं.
दभ्रं पश्यद्भ्य उर्विया विचक्ष उषां अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (५)
उषा टेढ़े सोए हुए लोगों में कुछ को अपने अपेक्षित स्थान को जाने के लिए, कुछ को
भोग के लिए, कुछ को यज्ञ के लिए एवं कुछ को धन के लिए जगाती है. यह अंधकार के
कारण थोड़ा देखने वालों के विशिष्ट प्रकाश के लिए सारे भुवनों को प्रकाशित करती है. (५)
क्षत्राय त्वं श्रवसे त्वं महीया इष्टये त्वमर्थमिव त्वमित्यै.
विसदृशा जीविताभिप्रचक्ष उषा अजीगर्भुवनानि विश्वा.. (६)
उषा किसी को धन के लिए, किसी को अन्न के लिए, किसी को महायज्ञ के लिए एवं
किसी को अभीष्ट वस्तु प्राप्ति के लिए जगाती है. वह नानारूप जीविकाओं के निमित्त समस्त
विश्व को प्रकाशित करती है. (६)
एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि व्युच्छन्ती युवतिः शुक्रवासाः.
विश्वस्येशाना पार्थिवस्य वस्व उषो अद्येह सुभगे व्युच्छ.. (७)
आकाश की पुत्री यह उषा मनुष्यों द्वारा नित्य यौवना, श्वेतवसना, तमोविनाशिनी एवं
समस्त संपत्तियों की अधीश्वरी के रूप में देखी गई है. हे शोभनधनसंपन्न उषा! तुम आज यहां
अंधकार नष्ट करो. (७)
परायतीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्.
व्युच्छन्ती जीवमुदीरयन्त्युषा मृतं कं चन बोधयन्ती.. (८)
अतीत उषाओं के मार्ग का अनुवर्तन वर्तमान उषा करती है. यह आने वाली अगणित
उषाओं की आदि है. यह अंधकार को मिटाती, प्राणियों को जागृत करती एवं निद्रा में मृतवत्
बने लोगों को चेतन बनाती है. (८)
उषो यदग्निं समिधे चकर्थ वि यदावश्चक्षसा सूर्यस्य.
यन्मानुषान्यक्ष्यमाणाँ अजीगस्तद्देवेषु चकृषे भद्रमप्रः.. (९)
हे उषा! तुमने जो अग्नि को प्रज्वलित किया है, अंधकारावृत विश्व को सूर्य के प्रकाश से
स्पष्ट किया है एवं यज्ञ करते हुए मनुष्यों को अंधकार से छुटकारा दिलाया है, ये काम तुमने
देवों के कल्याण के लिए किए हैं. (९)
कियात्या यत्समया भवाति या व्युषुर्याश्च नूनं व्युच्छान्.
ebook converter DEMO Watermarks*

अनु पूर्वाः कृपते वावशाना प्रदीध्याना जोषमन्याभिरेति.. (१०)
पता नहीं कितने समय से उषा उत्पन्न हो रही है और कितने समय तक उत्पन्न होती
रहेगी? वर्तमान उषा पूर्ववर्तिनी उषाओं का अनुकरण करती है तथा आगामिनी उषाएं इसके
प्रकाश का अनुवर्तन करेंगी. (१०)
ईयुष्टे ये पूर्वतरामपश्यन्व्युच्छन्तीमुषसं मर्त्यासः.
अस्माभिरू नु प्रतिचक्ष्याभूदो ते यन्ति ये अपरीषु पश्यान्.. (११)
जिन मनुष्यों ने अतिशय पूर्ववर्तिनी उषाओं को प्रकाश करते देखा था, वे समाप्त हो
गईं. उषा हमारे द्वारा इस समय देखी जाती है. होने वाली उषाओं को जो लोग देखेंगे, वे आ
रहे हैं. (११)
यावयद्द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती.
सुमङ्गलीर्बिभ्रती देववीतिमिहाद्योषः श्रेष्ठतमा व्युच्छ.. (१२)
हे उषा! तुम हमसे द्वेष करने वालों को दूर हटाने वाली, सत्य की पालनकर्त्री, यज्ञ के
निमित्त उत्पन्न सुखयुक्त वचनों की प्रेरक, कल्याणसहिता एवं देवों के अभिलषित यज्ञ को
धारण करने वाली हो, तुम उत्तम प्रकार से आज इस स्थान को प्रकाशित करो. (१२)
शश्वत्पुरोषा व्युवास देव्यथो अद्येदं व्यावो मघोनी.
अथो व्युच्छादुत्तराँ अनु द्यूनजरामृता चरति स्वधाभिः.. (१३)
देवी उषा पूर्वकाल में प्रतिदिन प्रकाश देती थी, धन की स्वामिनी उषा आज भी इस
विश्व को अंधकार से छुटकारा दिलाती है एवं इसी प्रकार भविष्य के दिनों में प्रकाश प्रदान
करेगी. वह जरा एवं मरण से रहित होकर अपने तेज से विचरण करती है. (१३)
व्य१ञ्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्यावः.
प्रबोधयन्त्यरुणेभिरश्वैरोषा याति सुयुजा रथेन.. (१४)
आकाश की विस्तृत दिशाओं में उषा प्रकाशक तेजों से उदित होती है एवं उसने रात्रि
द्वारा निर्मित काला रूप समाप्त कर दिया है. वह सोते हुए प्राणियों को जगाती हुई लाल रंग
के घोड़ों वाले अपने रथ से आ रही है. (१४)
आवहन्ती पोष्या वार्याणि चित्रं केतुं कृणुते चेकिताना.
ईयुषीणामुपमा शश्वतीनां विभातीनां प्रथमोषा व्यश्वैत्.. (१५)
उषा पोषण समर्थ, वरणीय धनों को लाती हुई एवं समस्त मनुष्यों को चेतनायुक्त करती
हुई विचित्र किरणें प्रकाशित करती है. पूर्ववर्तिनी उषाओं की उपमान एवं आगामिनी विशेष
प्रकाशयुक्त उषाओं की प्रथमा यह उषा अपने तेज से बढ़ती है. (१५)
ebook converter DEMO Watermarks*

उदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति.
आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (१६)
हे मनुष्यो! उठो, हमारे शरीर का प्रेरक जीव आ गया है. अंधकार चला गया एवं प्रकाश
आ रहा है. उषा सूर्य के गमन के लिए रास्ता साफ करती है. हे उषा! हम उस देश में जाते हैं,
जिसमें तुम अन्न की वृद्धि करती हो. (१६)
स्यूमना वाच उदियर्ति वह्निः स्तवानो रेभ उषसो विभातीः.
अद्या तदुच्छ गृणते मघोन्यस्मे आयुर्नि दीदिहि प्रजावत्.. (१७)
स्तुतियों को वहन करने वाला स्तोता प्रकाशमान उषा की स्तुति करता हुआ
सुव्यवस्थित वेद वचन बोलता है. हे धनस्वामिनी उषा! इसलिए आज इस स्तोता का रात्रि
संबंधी अंधकार मिटाओ तथा हमें प्रजायुक्त धन दो. (१७)
या गोमतीरुषसः सर्ववीरा व्युच्छन्ति दाशुषे मर्त्याय.
वायोरिव सूनृतानामुदर्के ता अश्वदा अश्ववत्सोमसुत्वा.. (१८)
गोसंपन्न एवं समस्त शूरों से युक्त जो उषाएं स्तुति वचन समाप्त होते ही हव्य देने वाले
यजमान का वायु के समान शीघ्र अंधकार नष्ट करती हैं, वे ही अश्व देने वाली उषाएं सोमरस
निचोड़ने वाले यजमान को व्याप्त करें. (१८)
माता देवानामतितेरनीकं यज्ञस्य केतुर्बृहती विभाहि.
प्रशस्तिकृद् ब्रह्मणे नो व्युच्छा नो जने जनय विश्ववारे.. (१९)
हे देवों की माता एवं अदिति से प्रतिस्पर्धा करने वाली उषा! तुम यज्ञ का ज्ञापन करती
हुई एवं महत्त्व प्राप्त करती हुई प्रकाशित एवं हमारे स्तोत्र की प्रशंसा करती हुई उदित बनो. हे
वरणीय उषा! हमें संसार में प्रसिद्ध बनाओ. (१९)
यच्चित्रमप्र उषसो वहन्तीजानाय शशमानाय भद्रम्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (२०)
उषाएं जो विचित्र एवं प्राप्त करने योग्य धन लाती हैं, वह हवि देने वाले एवं स्तुति करने
वाले पुरुष के लिए कल्याणकारी है. मित्र, वरुण, सिंधु धरती एवं आकाश इस प्रार्थना की
पूजा करें. (२०)
सूक्त—११४ देवता—रुद्र
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः.
यथा शमसद्द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

हम प्रवृद्ध जटाधारी एवं वीरनाशक रुद्र के लिए ये मननीय स्तुतियां इसलिए अर्पित कर
रहे हैं, जिससे द्विपद एवं चतुष्पद की रोगशांति हो. गांव में सब लोग पुष्ट तथा अनातुर रहें.
(१)
मृळा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते.
यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु.. (२)
हे रुद्र! हमारे निमित्त तुम सुखकारक बनी एवं हमें सुख प्रदान करो. हम नमस्कारपूर्वक
वीरनाशक रुद्र की सेवा करते हैं. पिता मनु ने जो रोगशांति और निर्भयता प्राप्त की थी, हे
रुद्र! तुम्हें नमस्कार करने पर हम भी उन्हें प्राप्त करें. (२)
अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्वः.
सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हविः.. (३)
हे कामवर्षक रुद्र! हम वीरनाशक एवं मरुत् सहयोगी तुम्हारी कृपा देवयज्ञ के द्वारा
पावें. हमारी प्रजाओं के सुख की इच्छा करते हुए तुम उनके समीप आओ. प्रजा को
हानिरहित देखकर हम तुम्हारे लिए हव्य देंगे. (३)
त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञसाधं वङ्ककविमवसे नि ह्वयामहे.
आरे अस्मद्दैव्यं हेळो अस्यतु सुमतिमिद्वयमस्या वृणीमहे.. (४)
हम रक्षा के निमित्त दीप्त, यज्ञसाधक, कुटिलगति एवं क्रांतदर्शी रुद्र को बुलाते हैं. रुद्र
अपना दीप्त क्रोध दूर करें एवं हम उनकी शोभन कृपादृष्टि प्राप्त करें. (४)
दिवो वराहमरुषं कपर्दिनं त्वेषं रूपं नमसा नि ह्वयामहे.
हस्ते बिभ्रद्भेषजा वार्याणि शर्म वर्म च्छर्दिरस्मभ्यं यंसत्.. (५)
हम वराह के समान दृढ़ांग, प्रकाशशील, जटाधारी, तेजोदीप्त एवं निरूपणजीव रुद्र को
नमस्कार द्वारा बुलाते हैं. वे अपने हाथों में वरणीय ओषधियां धारण करते हुए हमें सुख,
कवच एवं गृह प्रदान करें. (५)
इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादोः स्वादीयो रुदाय वर्धनम्.
रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ.. (६)
मरुतों के पिता रुद्र को लक्ष्य करके हम स्वादिष्ट पदार्थों से भी मधुर एवं वृद्धिकारक
स्तुति वचन बोल रहे हैं. हे मरणरहित रुद्र! हमें मानवों का भोजन प्रदान करो एवं अपने
पुत्ररूप मेरी तथा मेरे पुत्र की रक्षा करो. (६)
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्.
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे रुद्र! हम लोगों में से वयोवृद्ध, बालक, गर्भाधान समर्थ युवक एवं गर्भस्थ शिशु की
हिंसा मत करना, हमारी माता अथवा पिता की हिंसा एवं हमारे प्रिय शरीर का नाश भी मत
करना. (७)
मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः.
वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे.. (८)
हे रुद्र! हमारे पुत्र, पौत्र, दास, गाय एवं घोड़ों की हिंसा एवं क्रोधित होकर हमारे वीरों
का वध मत करना. हम सदैव हवि लेकर तुम्हें बुलाते हैं. (८)
उप ते स्तोमान्पशुपा इवाकरं रास्वा पितर्मरुतां सुम्नमस्मे.
भद्रा हि ते सुमतिर्मूळयत्तमाथा वयमव इत्ते वृणीमहे.. (९)
हे मरुत्पिता! जिस प्रकार गोप दिन भर चराने के बाद पशु मालिक को लौटा देता है,
उसी प्रकार मैं तुम्हारा स्तोत्र तुम्हें लौटा रहा हूं. हमें सुख दो. तुम्हारी कल्याणी बुद्धि परम
रक्षक एवं सुखकारिणी है, इसी कारण हम तुमसे रक्षा की याचना करते हैं. (९)
आरे ते गोघ्नमुत पूरुषघ्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु.
मृळा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च नः शर्म यच्छ द्विबर्हाः.. (१०)
हे वीरनाशक रुद्र! गोहनन एवं मनुष्य हनन का साधन तुम्हारा आयुध हमसे दूर रहे.
हमारे पास तुम्हारा दिया सुख रहे. हमें सुखी करो एवं हमारे प्रति पक्षपात रखने वाले वचन
बोलो. तुम धरती और आकाश के स्वामी बनकर हमें सुख दो. (१०)
अवोचाम नमो अस्मा अवस्यवः शृणोतु नो हवं रुद्रो मरुत्वान्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११)
रक्षा के इच्छुक हम लोग यह सूक्त बोलते हैं. इस रुद्र को नमस्कार हो. रुद्र मरुतों के
साथ हमारी यह पुकार सुनें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना
का आदर करें. (११)
सूक्त—११५ देवता—सूर्य
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (१)
मित्र, वरुण एवं अग्नि के चक्षु, किरणों के समूह एवं आश्चर्यकारी सूर्य उदय हुए हैं.
उन्होंने धरती, आकाश एवं दोनों के मध्य भाग को तेज से पूर्ण किया है. वे जंगम एवं स्थावर
के स्वरूप हैं. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्.
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्.. (२)
सूर्य दीप्यमान उषा का अनुगमन उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार पुरुष नारी के पीछे-
पीछे चलता है. इसी समय लोग सूर्य संबंधी यज्ञ करने की इच्छा से कार्य विस्तार करते हैं.
कल्याण पाने के लिए हम सूर्य की स्तुति करते हैं. (२)
भद्रा अश्वा हरितः सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः.
नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थुः परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः.. (३)
सूर्य के कल्याणकारक, विचित्र लोगों द्वारा क्रमशः स्तुत एवं हमारे द्वारा नमस्कृत हरित
नाम के घोड़े आकाश के ऊपर उपस्थित होकर शीघ्र ही धरती और आकाश का परिभ्रमण
कर लेते हैं. (३)
तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं सं जभार.
यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै.. (४)
यही सूर्य का ईश्वरत्व और महत्त्व है कि वह संसार के कर्म समाप्त होने से पहले ही
विश्व में फैली अपनी किरणें समेट लेते हैं. वे जब अपने रथ से हरित नामक घोड़ों को अलग
करते हैं, तभी रात्रि इस प्रकार अंधकार फैलाती है, जैसे जगत् पर परदा डाल रही हो. (४)
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे.
अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. (५)
सूर्य धरती और आकाश के बीच अपना सर्वप्रकाशक तेज इसलिए फैलाते हैं, जिससे
मित्र और वरुण उन्हें सम्मुख देख सकें. सूर्य के घोड़े एक ओर अवसानरहित, जगत्प्रकाशक
बल एवं दूसरी ओर काले रंग का अंधेरा धारण करते हैं. (५)
अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिपृता निरवद्यात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (६)
हे सूर्यकिरणो! इस सूर्योदय के समय हमें पापों से बचाओ. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु,
पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना को स्वीकार करें. (६)
सूक्त—११६ देवता—अश्विनीकुमार
नासत्याभ्यां बर्हिरिव प्र वृञ्जे स्तोमाँ इयर्म्यभ्रियेव वातः.
यावर्भगाय विमदाय जायां सेनाजुवा न्यूहतू रथेन.. (१)
जिस प्रकार कोई यजमान यज्ञ के निमित्त कुश छेदन करता है अथवा वायु बादलों के
ebook converter DEMO Watermarks*

जल को प्रेरित करता है, उसी प्रकार मैं अश्विनीकुमारों की पर्याप्त स्तुति करता हूं. उन्होंने
किशोर विमद को अपने रथ द्वारा शत्रुओं से पहले ही स्वयंवर में पहुंचाकर पत्नी प्राप्त कराई
थी. उनके रथ को शत्रु सेना नहीं पा सकी. (१)
वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां वा जूतिभिः शाशदाना.
तद्रासभो नासत्या सहस्रमाजा यमस्य प्रधने जिगाय.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने बलपूर्वक उछलने वाले एवं शीघ्रगामी अश्वों तथा इंद्रादि
देवों की प्रेरणाओं से प्रेरित हो. तुम्हारा वाहन रासभ इंद्र को प्रसन्न करने वाले बहुधनशाली
संग्रामों में हजारों बार विजयी हुआ था. (२)
तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवाँ अवाहाः.
तमूहथुर्नौभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार कोई मरता हुआ व्यक्ति धन का त्याग करता है, उसी
प्रकार शत्रुपीड़ित तुग्र ने अपने पुत्र थुज्यु को शत्रु विजय के लिए नाव से गमन करने के
निमित्त सागर में भेजा. तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को अंतरिक्ष में चलने वाली एवं
जलप्रवेशरहित अपनी नाव द्वारा तुग्र के पास पहुंचाया था. (३)
तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतङ्गैः.
समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथैः शतपद्भिः षळश्वैः.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को सौ पहियों वाले, छह घोड़ों से खींचे जाते हुए, तीन
दिन एवं तीन रात से अधिक चलने वाले तीन शीघ्रगामी रथों द्वारा जलपूर्ण सागर के जलहीन
किनारे पर पहुंचाया था. (४)
अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणे समुद्रे.
यदश्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने सागर में डूबते हुए भुज्यु को सौ डांडों से चलने वाली नौका में
बैठाकर अपने घर पहुंचाया था. वह सागर आलंबनरहित, भू प्रदेश से भिन्न, हाथ से पकड़ने
योग्य शाखा आदि से हीन था, जिसमें तुमने यह पराक्रम किया. (५)
यमश्विना ददथुः श्वेतमश्वमघाश्वाय शश्वदित्स्वस्ति.
तद्वां दात्रं महि कीर्तेन्यं भूत्पैद्वो वाजी सदिमद्धिद्वयो अर्यः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अघाश्व पेदु को नित्यविजय दिलाने वाला श्वेत अश्व दिया था.
तुम्हारा वह दान महान् एवं प्रशंसनीय है एवं पेदु का उत्तम अश्व सदा हमारा आदरणीय रहेगा.
(६)
ebook converter DEMO Watermarks*

युवं नरा स्तुवते पज्रियाय कक्षीवते अरदतं पुरन्धिम्.
कारोतराच्छफादश्वस्य वृष्णः शतं कुंभाँ असिञ्चतं सुरायाः.. (७)
हे नेताओ! तुमने स्तुति करने वाले अंगिरागोत्रीय कक्षीवान् को पर्याप्त बुद्धि दी थी.
जिस प्रकार शराब बनाने वाले कारोतर नामक पात्र से सुरा का आसवन करते हैं, उसी प्रकार
तुमने अपने सवन-समर्थ अश्व के खुर से सौ घड़े शराब निकाली. (७)
हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्तं.
ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतमून्निन्थ्युः सर्वगणं स्वस्ति.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने ठंडे जल से उस अग्नि को बुझाया था, जो असुरों द्वारा उन्हें
पीड़ा पहुंचाने के लिए जलाई गई थी. तुमने उन्हें अन्नसहित बलप्रद क्षीर दिया था. अत्रि
यंत्रपीड़ार्गह में नीचे को मुंह करके लटकाए गए थे, तुमने उन्हें उनके साथियों सहित छुड़ाया.
(८)
परावतं नासत्यानुदेथामुच्चाबुधं चक्रथुर्जिह्मबारम्.
क्षरन्नापो न पायनाय राये सहस्राय तृष्यते गोतमस्य.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! तुम गौतम ऋषि के समीप कुएं को ले गए थे. उसका मूल ऊपर एवं
द्वार नीचे कर दिया था. उस में से हव्य देने वाले एवं सहनशील गौतम के पीने के निमित्त जल
निकलने लगा था. (९)
जुजुरुषो नासत्योत वव्रिं प्रामुञ्चतं द्रापिमिव च्यवानात्.
प्रातिरतं जहितस्यायुर्देसादित्पतिमकृणुतं कनीनाम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जीर्ण च्यवन ऋषि को व्याप्त करने वाले बुढ़ापे को कवच के
समान दूर कर दिया था. हे दर्शनीयो! तुमने पुत्रों द्वारा परित्यक्त च्यवन का जीवन बढ़ाया एवं
उन्हें कन्याओं का पति बनाया. (१०)
तद्वां नरा शंस्यं राध्यं चाभिष्टिमन्नासत्या वरूथम्.
यदिद्धांसा निधिमिवापगूळ्हमुद्दर्शतादूपथुर्वन्दनाय.. (११)
हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! तुमने गुप्त धन के समान कुएं में छिपे वंदन ऋषि को
जानकर वहां से निकाला. तुम्हारा यह कर्म चाहने योग्य, वरणीय एवं प्रशंसनीय है. (११)
तद्वां नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम्.
दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाच.. (१२)
हे नेताओ! अथर्वा के पुत्र दध्यंग ऋषि ने तुम्हारे सामर्थ्य से अश्व की ग्रीवा धारण करके
मधुर वचन बोले थे. यह तुम्हारे उग्र कर्म को उसी प्रकार प्रकट करता है, जिस प्रकार बादल
ebook converter DEMO Watermarks*

का गर्जन बादल के भीतर जल को बताता है. (१२)
अजोहवीन्नासत्या करा वां महे यामन्पुरुभुजा पुरन्धिः.
श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम्.. (१३)
हे लंबे हाथों वाले अश्विनीकुमारो! परम बुद्धिमती ऋषिपत्नी वध्रिमती ने अपने पूजनीय
स्तोत्र में तुम अभिमत फलदाताओं को बार-बार बुलाया था. तुमने शिष्य के समान उसकी
पुकार सुनी एवं उसे हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया. (१३)
आस्नो वृकस्य वर्तिकामभीके युवं नरा नासत्यामुक्तम्.
उतो कविं पुरुभुजा युवं ह कृपमाणमकृणुतं विचक्षे.. (१४)
हे नेताओ! तुमने वृक और वर्तिका के संग्राम में वृक के मुख से वर्तिका को छुड़ाया था.
तुमने स्तुतिकर्त्ता विद्वान् को देखने की शक्ति दी थी. (१४)
चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्.
सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम्.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार पक्षी का पंख अलग हो जाता है, उसी प्रकार खेल राजा
की पत्नी विश्पला का पैर युद्ध में कट गया था. तुमने शत्रुओं द्वारा छिपाया हुआ धन प्राप्त
करने के निमित्त चलने के लिए विश्पला के लिए रात भर में लोहे का पैर बनाकर दिया था.
(१५)
शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्धं चकार.
तस्मा अक्षी नासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा भिषजावनर्वन्.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! ऋज्राश्व ऋषि ने अपनी वृकी के भोजन के लिए सौ भेड़ों को काट
दिया था. इससे उनके पिता ने उन्हें अंधा कर दिया था. हे देवों के वैद्यो! तुमने ऋज्राश्व की
देखने में असमर्थ दोनों आंखों को देखने में समर्थ बना दिया था. (१६)
आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य कार्ष्मेवातिष्ठदर्वता जयन्ती.
विश्वे देवा अन्वमन्यन्त हृद्भिः समु श्रिया नासत्या सचेथे.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दौड़ने वाले घोड़ों में सबसे आगे वाला निश्चित स्थान पर
गड़ी लकड़ी तक पहले पहुंचता है, उसी प्रकार अवधि पर शीघ्र पहुंचने वाले घोड़ों के कारण
सूर्यपुत्री सूर्या तुम्हारे रथ पर बैठ गई. सारे देवों ने सहर्ष यह बात मान ली और तुमने कांति
प्राप्त की. (१७)
यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायश्विना हयन्ता.
रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारश्च युक्ता.. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! दिवोदास ने अन्न हव्य रूप में देकर तुम्हारी स्तुति की तो तुम उसके
घर गए. उस समय तुम्हारी सेवा करने वाला रथ अन्न ले गया था. उस में घोड़े और मगर जुड़े
थे. (१८)
रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं नासत्या वहन्ता.
आ जाह्नावीं समनसोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम्.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! समान मन वाले तुम दोनों शोभन बल, धन, संतान एवं सुंदर
शक्तियुक्त अन्न लेकर जह्नु ऋषि की प्रजाओं के पास गए थे. उन्होंने हव्य अन्नों के साथ
दैनिक यज्ञ के तीनों भाग तुम्हें अर्पित किए थे. (१९)
परिविष्टं जाहुषं विश्वतः सीं सुगेभिर्नक्तमूहथू रजोभिः.
विभिन्दुना नासत्या रथेन वि पर्वताँ अजरयू अयातम्.. (२०)
हे अश्विनीकुमारो! जरारहित तुम दोनों ने शत्रुओं द्वारा चारों ओर से घेरे हुए जाहुष राजा
को अपने सर्वभेदक लौह-निर्मित रथ द्वारा रात में सरल मार्ग से बाहर निकाला एवं ऐसे पर्वतों
पर गए, जहां शत्रु न चढ़ सकें. (२०)
एकस्या वस्तोरवतं रणाय वशमश्विना सनये सहस्रा.
निरहतं दुच्छुना इन्द्रवन्ता पृथुश्रवसो वृषणावरातीः.. (२१)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने वश ऋषि की इसलिए रक्षा की थी कि वे एक दिन में हजार
धन प्राप्त कर सकें. हे कामवर्षको! तुमने इंद्र के साथ मिलकर पृथुश्रवा को कष्ट देने वाले
शत्रुओं को मारा था. (२१)
शरस्य चिदार्त्तकस्यावतादा नीचादुच्चा चक्रथुः पातवे वाः.
शयवे चिन्नासत्या शचीभिर्जसुरये स्तर्यं पिप्यथुर्गाम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने कुएं के नीचे से जल को इसलिए ऊपर उठाया था, जिससे कि
तुम्हारा स्तोता, ऋचत्क पुत्र शर जल पी सके. थके हुए शंयु की प्रसवरहित गाय को तुमने
अपने कर्मों द्वारा दुग्धपूर्ण बनाया था. (२२)
अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः.
पशुं न नष्टमिव दर्शनाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय.. (२३)
हे अश्विनीकुमारो! कृष्ण के पुत्र सीधे-सादे विश्वकाय ऋषि ने अपनी रक्षा की इच्छा से
तुम्हारी प्रार्थना की. जिस प्रकार कोई खोया हुआ पशु उसके स्वामी को दिखा दे, उसी प्रकार
तुमने उसके खोए हुए पुत्र विष्णापु को दिखा दिया था. (२३)
दश रात्रीरशिवेना नव द्यूनवनद्धं श्रथितमप्स्व१न्तः.
ebook converter DEMO Watermarks*

विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्धथुः सोममिव स्रुवेण.. (२४)
असुर शत्रुओं ने रेभ ऋषि को पीटा और दुःखद रस्सियों से बांधकर कुएं में डाल दिया.
व्यथित एवं जल से भीगे रेभ दस रात और नौ दिन तक वहीं पड़े रहे. जिस प्रकार अध्वर्यु
सुच की सहायता से सोमरस निकालता है, उसी प्रकार तुमने उन्हें कुएं से निकाला. (२४)
प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पतिः स्यां सुगवः सुवीरः.
उत पश्यन्नश्रुवन्दीर्घमायुरस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम्.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! मैंने तुम्हारे पुराकृत कर्मों का वर्णन किया है. मैं सुंदर गायों एवं वीरों
का स्वामी होने के साथ-साथ राष्ट्र का स्वामी बनूं. जिस प्रकार घर का मालिक घर में बिना
बाधा के घुसता है, उसी प्रकार मैं भी आंखों से देखता हुआ दीर्घ आयु भोग कर बुढ़ापे में
प्रवेश करूं. (२५)
सूक्त—११७ देवता—अश्विनीकुमार
मध्वः सोमस्याश्विना मदाय प्रत्नो होता विवासते वाम्.
बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं नासत्योप वाजैः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पुराना होता तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मधुर सोमरस से
तुम्हारी सेवा करता है. ऋत्विजों द्वारा स्तुति के साथ ही कुशों पर हव्य रखा गया है. हमारे
लिए देवबल और अन्न के साथ हमारे यहां आओ. (१)
यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथः स्वश्वो विश आजिगाति.
येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मन से भी अधिक तीव्रगामी एवं सुंदर घोड़ों वाला तुम्हारा जो रथ
प्रजाओं की ओर जाता है तथा जिससे तुम सुंदर यज्ञ करने वाले लोगों के घर जाते हो, हे
नेताओ! तुम उसी रथ द्वारा हमारे समीप आओ. (२)
ऋर्षिं नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन.
मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृष्णा चोदयन्ता.. (३)
हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने पांच जनों द्वारा पूजित अत्रि को शतद्वार
यंत्रगृह की पाप रूप तुषानल से पुत्र-पौत्रों सहित छुड़ाया था. इसके लिए तुमने शत्रुओं की
हिंसा एवं दस्युओं की दुःखदायिनी माया का क्रमशः विनाश किया. (३)
अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरैवैर्ऋर्षिं नरा वृषणा रेभमप्सु.
सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने दुर्दांत दस्युओं द्वारा कुएं के जल में डुबाए
गए रेभ ऋषि को बाहर निकालकर उनका विकलांग शरीर घोड़े के समान अपनी दवाओं से
ठीक किया था. तुम्हारे पूर्वकृत कार्य अभी पुराने नहीं हुए हैं. (४)
सुषुप्व़ांसं न निर्ऋतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम्.
शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय.. (५)
हे दर्शनीयो! तुमने धरती के ऊपर सोए हुए मनुष्य के समान पड़े हुए, कुएं में पड़ने वाले
सूर्यबिंब के समान तेजस्वी एवं शोभन स्वर्ण निर्मित अलंकार के समान दर्शनीय कूपपतित
वंदन ऋषि को बाहर निकाला था. (५)
तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्.
शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम्.. (६)
हे नेता रूप नासत्यो! अभीष्ट प्राप्ति के कारण कहे जाने वाले अनुष्ठान के समान ही मैं
अंगिरावंशी कक्षीवान् तुम्हारे यज्ञ की प्रतिज्ञा करता हूं. तुमने वेगवान् घोड़ों के खुरों से निकले
हुए मधु से अपेक्षित लोगों के लिए सैकड़ों घड़े भर दिए थे. (६)
युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय.
घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम्.. (७)
हे नेताओ! कृष्ण के पुत्र विश्वकाय ने तुम लोगों की स्तुति की तो तुमने उसके खोए हुए
पुत्र विष्णायु को लाकर दे दिया. हे अश्विनीकुमारो! कुष्ठ रोग के कारण पति को प्राप्त न
करके अपने पिता के घर बैठी हुई एवं वृद्धावस्था को प्राप्त घोषा को तुमने पति प्रदान किया.
(७)
युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्व़ाय.
प्रवाच्यं तद्वृषणा कृतं वां यन्नार्षदाय श्रवो अध्यधत्तम्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने कोढ़ी श्याव ऋषि को उज्ज्वल त्वचा वाली स्त्री प्रदान की एवं
दृष्टिरहित होने के कारण चलने में अशक्त कण्व को तेजपूर्ण नेत्र दिए. हे कामवर्षको! तुमने
नृषद के बहरे पुत्र को कान प्रदान किए. तुम्हारे ये कार्य प्रशंसा के योग्य हैं. (८)
पुरू वर्पांस्याश्विना दधाना नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम्.
सहस्रसां वाजिनमप्रतीतमहिहनं श्रवस्यं1 तरुत्रम्.. (९)
हे बहुरूपधारी अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु ऋषि को शीघ्रगामी सहस्र संख्या वाले धन
का दाता, बलवान्, शत्रुओं द्वारा जीतने में अशक्य, शत्रुहंता, स्तुतिपात्र एवं रक्षक अश्व दिया
था. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*

एतानि वां श्रवस्या सुदानू ब्रह्माङ्गूषं सदनं रोदस्योः.
यद्द्वां पज्रासो अश्विना हवन्ते यातमिशा च विदुषे च वाजम्.. (१०)
हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे वीर-कार्य सबके जानने योग्य हैं. धरती और
आकाश के रूप में वर्तमान तुम दोनों की स्तुति प्रसन्नतादायक एवं घोषणा करने योग्य है.
अंगिरागोत्रीय यजमान तुम्हें जब-जब बुलावें, तब-तब देने योग्य अन्न लेकर आओ एवं तुम्हारी
स्तुति जानने वाले मुझको बल प्रदान करो. (१०)
सूनोर्मनेनाश्विना गृणाना वाजं विप्राय भुरणा रदन्ता.
अगस्त्ये ब्रह्मणा वावृधाना सं विस्पलां नासत्यारिणीतम्.. (११)
हे पोषणकर्त्ता एवं सत्य स्वभाव वाले अश्विनीकुमारो! तुमने कुंभ से उत्पन्न अगस्त्य
ऋषि की स्तुतियों का विषय बनकर मेधावी भरद्वाज ऋषि को अन्न दिया एवं मंत्रों से वृद्धि
पाकर तुमने विष्पला की जंघा को तोड़ा. (११)
कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा.
हिरण्यस्येव कलशं निखातमूदूथुर्दशमे अश्विनाहन्.. (१२)
हे सूर्यपुत्र एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुम किस निवासस्थान में वर्तमान काव्य की
शोभन स्तुति सुनने जाते हो? जिस प्रकार सोने से भरे एवं धरती में गड़े कलश को कोई
जानकार ही निकालता है, उसी प्रकार तुमने कुएं में पड़े रेभ ऋषि को दसवें दिन बाहर
निकाला था. (१२)
युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः.
युवो रथं दुहिता सूर्यस्य सह श्रिया नासत्यावृणीत.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने ओषधि दान के कार्य द्वारा वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा
बनाया. हे सत्य स्वभावो! सूर्य की पुत्री संपत्ति के साथ तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (१३)
युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना.
युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुऋञ्जेभिरश्वैः.. (१४)
हे दुःखनिवारको! तुम जिस प्रकार प्राचीन समय में तुग्र के स्तुतिपात्र थे, उसी प्रकार
बाद में भी स्तुतिपात्र रहे. तुम सेना के साथ डूबे हुए भुज्यु को अधिक जलयुक्त सागर में
गमनशील नौकाओं एवं शीघ्रगति वाले अश्वों द्वारा ले आए थे. (१४)
अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्.
निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! तुग्र द्वारा समुद्र में भेजे गए एवं जल में डूबे हुए भुज्यु ने
ebook converter DEMO Watermarks*

सरलतापूर्वक सागर के पार जाकर तुम्हारी स्तुति की थी. हे मनोवेगयुक्तो एवं कामवर्षको!
तुम शोभन अश्वों वाले रथ द्वारा क्षेमपूर्वक भुज्यु को लाए थे. (१५)
अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्नो यत्सीममुञ्चतं वृकस्य.
वि जयुषा ययथुः सान्वद्रेर्जातं विष्वाचो अहतं विषेण.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! वर्तिका ने उस समय तुम दोनों का आह्वान किया था, जिस समय
तुमने वृक के मुख से उसे बचाया था. तुम अपने जयशील रथ द्वारा जाहुष को लेकर पर्वत
की चोटियों पर चले गए थे एवं विष्वाच राक्षस के पुत्र को तुमने विष से मारा था. (१६)
शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तमः प्रणीतमशिवेन पित्रा.
आक्षी ऋज्राश्वे अश्विनावधत्तं ज्योतिरन्धाय चक्रथुर्विचक्षे.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! वृकों के निमित्त सौ मेषों को समर्पित करने वाले एवं दुःखदायी पिता
द्वारा अंधे बनाए गए ऋजाश्व को तुमने नेत्र दिए एवं उस अंधे को संसार देखने योग्य बनाया.
(१७)
शुनमन्धाय भरमह्वयत्सा वृकीरश्विना वृषणा नरेति.
जारः कनीन इव चक्षदान ऋज्राश्वः शतमेकं च मेषान्.. (१८)
हे नेताओ एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! दृष्टिहीन को पोषण का कारणभूत सुख देने की
इच्छा से वृकी ने तुम्हें बुलाया था, क्योंकि ऋजाश्व ने उसी प्रकार एक सौ एक मेष के टुकड़े
करके मुझे दिए हैं, जिस प्रकार यौवन प्राप्त कामुक किसी परस्त्री को बहुत सा धन देता है.
(१८)
मही वामूतिरश्विना मयोभूरूत स्रामं धिष्ण्या सं रिणीथः.
अथा युवामिदह्वयत्पुरन्धिरागच्छतं सीं वृषणाववोभिः.. (१९)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा महान् रक्षाकार्य सुख का कारण है. हे स्तुतिपात्रो! तुमने
व्याधित पुरुषों को स्वस्थ शरीर वाला बनाया था. बहुबुद्धिसंपन्ना घोषा ने रोग नाश के निमित्त
तुम्हीं को बुलाया था. हे कामवर्षको! अपने रक्षणकार्य सहित यहां आओ. (१९)
अधेनुं दस्रा स्तर्य१ं विषक्तामपिन्वतं शयवे अश्विना गाम्.
युवं शचीभिर्विमदाय जायां न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषाम्.. (२०)
हे दर्शनीयो! तुमने विशेषरूप से कृश अंगों वाली, निवृत्तप्रसवा एवं दुग्धहीना गाय को
शंयु के निमित्त दुधारू बनाया था. तुमने अपने कर्मों द्वारा पुरुमित्र की कन्या को विमद ऋषि
की पत्नी बनाया था. (२०)
यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा.
ebook converter DEMO Watermarks*

अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरायर्याय.. (२१)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुमने विद्वान् मनु के लिए हल द्वारा जुते हुए खेत में जौ
बोए, अन्न की हेतुभूत वर्षा की एवं भासमान वज्र द्वारा दस्युओं का नाश करके अपना
माहात्म्य विस्तृत किया. (२१)
आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम्.
स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपिकक्ष्यं वाम्.. (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि के धड़ पर घोड़े का सिर लगाया था.
उसने पूर्वकृत प्रतिज्ञा को सत्य बनाते हुए त्वष्टा से प्राप्त मधुविद्या तुम्हें बताई थी. हे
दर्शनीयो! वही तुम लोगों से संबंधित प्रवर्ग्य नामक विद्या बनी. (२२)
सदा कवी सुमतिमा चके वां विश्वा धियो अश्विना प्रावतं मे.
अस्मे रयिं नासत्या बृहन्तमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथाम्.. (२३)
हे क्रांतदर्शी अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी कल्याणकारिणी अनुग्रह बुद्धि की सदा प्रार्थना
करता हूं. तुम मेरे सभी कर्मों की रक्षा करो. हे दर्शनीयो! हमें महान्, संतानयुक्त एवं
प्रशंसनीय धन दो. (२३)
हिरण्यहस्तमश्विना रराणा पुत्रं नरा वधिमत्या अदत्तम्.
त्रिधा ह श्यावमश्विना विकस्तमुज्जीवस ऐरयतं सुदानू... (२४)
हे दाता एवं नेता अश्विनीकुमारो! तुमने तीन भागों में विच्छिन्न श्याव को जीवन दिया है.
(२४)
एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन्.
ब्रह्म कृण्वन्तो वृषणा युवभ्यां सुवीरासो विदथमा वदेम.. (२५)
हे अश्विनीकुमारो! मेरे द्वारा कहे गए तुम्हारे इन वीर-कर्मों को प्राचीन लोगों ने कहा है.
हे कामवर्षको! तुम्हारी स्तुति करते हुए हम शोभन वीरों से युक्त होकर यज्ञ के अभिमुख हों.
(२५)
सूक्त—११८ देवता—अश्विनीकुमार
आ वां रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ्.
यो मर्त्यस्य मनसो जवीयान्त्रिवन्धुरो वृषणा वातरंहाः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा घोड़ों से चलने वाला सुखयुक्त एवं धनयुक्त रथ हमारे सामने
आए. हे कामवर्षको! वह मानव मन के समान वेगवान् त्रिबंधुर एवं वायु के समान तीव्रगामी
ebook converter DEMO Watermarks*

है. (१)
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता रथेन त्रिचक्रेण सुवृता यातमर्वाक्.
पिन्वतं गा जिन्वत मर्वतो नो वर्धयतमश्विना वीरमस्मे.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिबंधुर, तीन पहियों वाले, तीन लोकों में चलने वाले एवं
शोभन गति वाले रथ द्वारा हमारे समीप आओ. हमारी गायों को दुधारू, हमारे घोड़ों को
प्रसन्न एवं हमारे पुत्रादि को वृद्धियुक्त करो. (२)
प्रवद्यामना सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः.
किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! अपने शीघ्रगामी एवं शोभन आकृति वाले रथ द्वारा आकर
आदर करने वाले स्तोता की वाणी सुनो. क्या भूतकाल में उत्पन्न मेधावियों ने तुम्हें स्तोताओं
की दरिद्रता मिटाने के लिए जाने वाला नहीं कहा था. (३)
आ वां श्येनासो अश्विना वहन्तु रथे युक्तास आशवः पतङ्गाः.
ये अप्तुरो दिव्यासो न गृध्रा अभि प्रयो नासत्या वहन्ति.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! रथ में जुड़े हुए सर्वत्र गतिशील, उछलने में समर्थ एवं प्रशंसनीय
गमन वाले घोड़े तुम्हें लावें. हे सत्यस्वरूपो! जल के समान अथवा आकाशचारी गृध्र पक्षी के
समान शीघ्र गति वाले घोड़े तुम्हें हव्य अन्न के सामने लाते हैं. (४)
आ वां रथं युवतिस्तिष्ठदत्र जुष्ट्वी नरा दुहिता सूर्यस्य.
परि वामश्वा वपुषः पतङ्गा वयो वहन्त्वरुषा अभीके.. (५)
हे नेताओ! सूर्य की युवती कन्या प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. तुम्हारे सुंदर,
उछलने में समर्थ, गतिशील एवं तेजस्वी घोड़े तुम्हें तुम्हारे घर के पास ले जावें. (५)
उद्वन्दनमैरतं दंसनाभिरुद्रेभं दस्रा वृषणा शचीभिः.
निष्टौग्र्यं पारयथः समुद्रात्पुनश्च्यवानं चक्रथुर्युवानम्.. (६)
हे दर्शनीय एवं कामवर्षको! तुमने वंदन ऋषि को कुएं से निकाला था. तुग्र के पुत्र भुज्यु
को सागर से पार किया तथा च्यवन ऋषि को दोबारा युवक बनाया. (६)
युवमत्रयेऽवनीताय तप्तमूर्जमोमानमश्विनावधत्तम्.
युवं कणवायापिरिप्ताय चक्षुः प्रत्यधत्तं सुष्टुतिं जुजुषाणा.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने शतद्वार पीड़ागृह में बंद अत्रि को बचाने के लिए अग्नि को
बुझाया एवं उन्हें सुखकारी अन्न दिया. तुमने शोभन स्तुति स्वीकार करके अंधेरे में पड़े कण्व
ebook converter DEMO Watermarks*

ऋषि को नेत्र दिए. (७)
युवं धेनुं शयवे नाधितायापिन्वतमश्विना पूर्व्याय.
अमुञ्चतं वर्तिकामंहसो निः प्रति जङ्घां विशपलाया अधत्तम्.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने प्राचीन याचक शंयु ऋषि के लिए गाय को दुधारू किया
था. तुमने वर्तिका को पाप से बचाया एवं विशपला को दूसरी जंघा लगाई थी. (८)
युवं श्वेतं पेदव इन्द्रजूतमहिहनमश्विनादत्तमश्वम्.
जोहूत्रमर्यो अभिभूतिमुग्रं सहस्रसां वृषणं वीळ्वङ्गम्.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु को श्वेत-वर्ण, इंद्रप्रदत्त, शत्रुहंता एवं संग्राम में शत्रुओं
को ललकारने वाला, शत्रुपराभवकारी, उग्र, हजारों धन देने वाला, सेचन समर्थ एवं दृढांग
घोड़ा दिया था. (९)
ता वां नरा स्ववसे सुजाता हवामहे अश्विना नाधमानाः.
आ न उप वसुमता रथेन गिरो जुषाणा सुविताय यातम्.. (१०)
हे नेता एवं शोभनजन्म वाले अश्विनीकुमारो! धन की याचना करते हुए हम तुम्हें रक्षा के
लिए बुलाते हैं. तुम हमारी स्तुतियों को स्वीकार करके हमें सुख देने के लिए अपने धनयुक्त
रथ द्वारा हमारे सामने आओ. (१०)
आ श्येनस्य जवसा नूतनेनास्मे यातं नासत्या सजोषाः.
हवे हि वामश्विना रातहव्यः शश्वत्तमाया उषसो व्युष्टौ.. (११)
हे सत्यस्वरूप अश्विनीकुमारो! तुम समान प्रीतयुक्त एवं प्रशंसनीय गति वाले घोड़े के
नए वेग से युक्त होकर हमारे समीप आओ. हम तुम्हें देने योग्य हवि लेकर नित्य उषा के उदय
काल में बुलाते हैं. (११)
सूक्त—११९ देवता—अश्विनीकुमार
आ वां रथं पुरुमायं मनोजुवं जीराश्वं यज्ञियं जीवसे हुवे.
सहस्रकेतुं वनिनं शतद्वसुं श्रुष्टीवानं वरिवोधामभि प्रयः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! मैं जीवन एवं अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हारे आश्चर्यपूर्ण, मन के समान
शीघ्र चलने वाले, वेगशील अश्वों से युक्त, यज्ञों में बुलाने योग्य हजार झंडों वाले, उदकपूर्ण,
सौ धनों सहित, शीघ्रगामी एवं धन देने वाले रथ का आह्वान करता हूं. (१)
ऊर्ध्वा धीतिः प्रत्यस्य प्रयामन्धायि शस्मन्त्सम्यन्त आ दिशः.
स्वदामि घर्मं प्रति यन्त्यूतय आ वामूर्जानी रथमश्विनारुहत्.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*