ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
प्रमुख बल एक ही है. (१७)
वीरस्य नु स्वश्व्यं जनासः प्र नु वोचाम विदुरस्य देवाः.
षोळहा युक्ताः पञ्चपञ्चा वहन्ति महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१८)
हे मनुष्यो! शूर इंद्र के सुंदर घोड़ों का हम शीघ्र भांति-भांति से वर्णन करते हैं. उन्हें
देवगण जानते हैं. वे ऋतुओं के रूप में छः एवं हेमंत, शिशिर के मिलकर एक हो जाने से
पांच अश्वों के रूप में इंद्र को ढोते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१८)
देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जजान.
इमा च विश्वा भुवनान्यस्य महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१९)
सबके प्रेरक एवं नाना रूप धारी त्वष्टा देव प्रजाओं को अनेक प्रकार से उत्पन्न करते हैं
एवं पालते हैं. संपूर्ण भुवन उन्हीं के हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१९)
मही समैरच्चम्वा समीची उभे ते अस्य वसुना न्युष्टे.
शृण्वे वीरो विन्दमानो वसूनि महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२०)
इंद्र ने विशाल एवं एक-दूसरे से मिले हुए धरती-आकाश दोनों को पशुपक्षियों से पूर्ण
किया है. ये दोनों इंद्र के तेज से पूरी तरह व्याप्त हैं. वीर इंद्र शत्रुओं की संपत्ति छीनने के लिए
प्रसिद्ध हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (२०)
इमां च नः पृथिवीं विश्वधाया उप क्षेति हितमित्रो न राजा.
पुरःसदः शर्मसदो न वीरा महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२१)
विश्व का पालन करने वाले एवं हमारे राजा इंद्र धरती एवं आकाश के समीप रहते हैं.
वीर मरुत् संग्राम में इंद्र के आगे रहते हैं तथा उनके घर में निवास करते हैं. देवों का प्रमुख
बल एक ही है. (२१)
निष्षिध्वरीस्त ओषधीरुतापो रयिं त इन्द्र पृथिवी बिभर्ति.
सखायस्ते वामभाजः स्याम महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२२)
हे मेघ रूप इंद्र! ओषधियों ने तुमसे सिद्धि पाई है, जल तुम्हीं से निकले हैं एवं धरती
तुम्हारे भोग के योग्य धन को धारण करती है. तुम्हारे मित्र हम धन के भागी बनें, देवों का
प्रमुख बल एक ही है. (२२)
सूक्त—५६ देवता—विश्वेदेव
न ता मिनन्ति मायिनो न धीरा व्रत देवानां प्रथमा धुवाणि.
न रोदसी अद्गुहा वेद्याभिर्न पर्वता निनमे तस्थिवांसः.. (१)
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बनते. धरती पर ऊंचे खड़े पर्वतों को कोई झुका नहीं सकता. (१)
मायावी असुर एवं विद्वान् इंद्र आदि देवों के प्रथम स्थिर एवं प्रसिद्ध कर्मों में बाधा नहीं
डालते. द्वेष-भाव से हीन धरती-आकाश प्रजाओं के साथ देवों के लिए विघ्नकारक नहीं
बनते. धरती पर ऊंचे खड़े पर्वतों को कोई झुका नहीं सकता. (१)
षड्भाराँ एको अचरन्बिभर्त्यृतं वर्षिष्ठमुप गाव आगुः.
तिस्रो महीरुपरास्तस्थुरत्या गुहा द्वे निहिते दर्शैका.. (२)
एक स्थिर वर्ष छः ऋतुओं को धारण करता है. सत्य एवं अतिशय वृद्ध सूर्यरूप संवत्सर
को किरणें प्राप्त करती हैं. उत्पन्न और नष्ट होने वाले तीनों लोक एक-दूसरे के ऊपर स्थित हैं.
उन में ही स्वर्ग और अंतरिक्ष गुहा में छिपे हैं. एकमात्र धरती ही दिखाई देती है. (२)
त्रिपाजस्यो वृषभो विश्वरूप उत त्र्युधा पुरुध प्रजावान्.
त्र्यनीकः पत्यते महिनावान्त्स रेतोधा वृषभः शश्वतीनाम्.. (३)
ग्रीष्म, वर्षा एवं हेमंत-तीन ऋतुएं संवत्सर का हृदय हैं एवं वसंत, शरद् एवं हेमंत तीन
ऋतुएं स्तन हैं. जल बरसाने वाला, विविध रूपधारी, जौ, गेहूं आदि अनेक प्रकार की प्रजाओं
से युक्त, ग्रीष्म, वर्षा तथा शीत तीन गुणों सहित एवं महत्त्वशाली संवत्सर आता है. वह वीर्य
धारण में समर्थ है एवं सबके लिए जल लाता है. (३)
अभीक आसां पदवीरबोध्यादित्यानामह्वे चारु नाम.
आपश्चिदस्मा अरमन्त देवीः पृथग्व्रजन्तीः परि षीमवृञ्जन्.. (४)
संवत्सर ओषधियों के समीप रहकर फल-पुष्पादि उत्पादन के लिए सावधान रहते हैं. मैं
आदित्यों का चैत्र आदि मनोहर नाम बोलता हूं. द्योतमान एवं अलग-अलग बहने वाले जल
चार मास तक संवत्सर को प्रसन्न करते हैं एवं शेष आठ मासों में छोड़ देते हैं. (४)
त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट्.
ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः.. (५)
हे नदियो! तीन गुण वाले तीन लोक देवों के निवासस्थान हैं. तीनों लोकों के बनाने वाले
सूर्य यज्ञों के राजा हैं. जलपूर्ण एवं आकाश में गमन करने वाली इला, सरस्वती एवं भारती
परस्पर मिली हुई देवियां यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (५)
त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिवे आ सुव त्रिर्नो अह्नः.
त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्राताधिषणे सातये धाः.. (६)
हे आदित्य! स्वर्गलोक से प्रतिदिन तीन बार आकर हम लोगों को धन दो. हे सबके द्वारा
सेवा योग्य एवं सबके रक्षक आदित्य! हमें पशु, कनक एवं रत्न रूप तीन प्रकार का धन दो.
हे वाग्देवी! हमें धनलाभ के लिए प्रेरित करो. (६)
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त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी.
आपश्चिदस्य रोदसी चिदुर्वी रत्नं भिक्षन्त सवितुः सवाय.. (७)
सविता दिन में तीन बार हमें धन दें. दीप्तिमान् एवं शोभन हाथों वाले हम विस्तृत
धरती-आकाश, मित्र-वरुण, अंतरिक्ष एवं सविता देव की प्रेरणा से मनचाहा अर्थ चाहते हैं.
(७)
त्रिरुत्तमा दूणशा रोचनानि त्रयो राजन्त्यसुरस्य वीराः.
ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः.. (८)
द्युतिमान तीन उत्तम स्थान हैं, जिन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता. इन तीनों स्थानों में
संवत्सर के अग्नि, वायु एवं सूर्य तीन पुत्र सुशोभित होते हैं. यज्ञादि कर्मों से युक्त, शीघ्र गति
वाले एवं अतिरस्करणीय देवगण हमारे यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (८)
सूक्त—५७ देवता—विश्वेदेव
प्र मे विविक्वाँ अविदन्मनीषां धेनुं चरन्तीं प्रयुतामगोपाम्.
सद्यश्चिद्या दुदुहे भूरि धासेरिन्द्रस्तदग्निः पनितारो अस्याः.. (१)
ज्ञानवान् इंद्र इधर-उधर जाती हुई, अकेली इच्छानुसार घूमती हुई गाय के समान मेरी
देव-संबंधी स्तुति को जानें. इंद्र और अग्नि इस स्तुतिरूपी गाय की प्रशंसा करें, जिससे तुरंत
ही अधिक अभिलषित फल दुहा जाता है. (१)
इन्द्रः सु पूषा वृषणा सुहस्ता दिवो न प्रीताः शशयं दुदुह्रे.
विश्वे यदस्यां रणयन्त देवाः प्र वोऽत्र वसवः सुम्नमश्याम्.. (२)
इंद्र! पूषा, कामवर्षी एवं शोभन हाथों वाले अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर आकाश में सोने
वाले मेघ से मनचाही वृष्टि प्राप्त करते हैं. हे निवासस्थान देने वाले विश्वेदेव! इस वेदी पर
रमण करो, जिससे हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख पा सकें. (२)
या जामयो वृष्ण इच्छन्ति शक्तिं नमस्यन्तीर्जानते गर्भमस्मिन्.
अच्छा पुत्रं धेनवो वावशाना महश्चरन्ति बिभ्रतं वपूंषि.. (३)
जो ओषधियां जल बरसाने वाले इंद्र की शक्ति को चाहती हैं, वे नम्र होकर इंद्र की
गर्भाधान की शक्ति जानती हैं. फल की कामना करने वाली एवं सबको प्रसन्न करने वाली
ओषधियां भांति-भांति के रूप धारण करने वाले जौ, गेहूं आदि पुत्रों के समान घूमती हैं. (३)
अच्छा विवक्मि रोदसी सुमेके ग्राव्णो युजानो अध्वरे मनीषा.
इमा उ ते मनवे भूरिवारा ऊर्ध्वा भवन्ति दर्शता यजत्राः.. (४)
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यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए पत्थर लेकर हम शोभन रूप वाले धरती-आकाश के
सामने होकर स्तुति रूप वाणी से प्रशंसा करते हैं. अग्नि को वरण करने योग्य, दर्शनीय एवं
पूज्य दीप्तियां मनुष्यों के व्यवहार के लिए ऊपर मुख करती हैं. (४)
या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची.
तयेह विश्वाँ अवसे यजत्राना सादय पायया चा मधूनि.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारी जो ज्वाला-रूपिणी जीभ जलपूर्ण एवं बुद्धियुक्त है एवं देवों को
बुलाने के लिए प्रेरणा देती है, उसी जिह्वा से यज्ञ के योग्य समस्त देवों को हमारी रक्षा के
निमित्त इस यज्ञ में बैठाओ एवं मादक सोम पिलाओ. (५)
या ते अग्ने पर्वतस्येव धारास्रवन्ती पीपयद्देव चित्रा.
तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्वजन्याम्.. (६)
हे अग्नि देव! विविध रूपधारिणी एवं हमें त्यागकर अन्यत्र न जाने वाली तुम्हारी उत्तम-
बुद्धि हम लोगों को उसी प्रकार बढ़ाए, जिस प्रकार बादलों से उत्पन्न जलधारा वनस्पतियों
को बढ़ाती है. हे निवासदाता एवं जातवेद अग्नि! हमें वही परहितसमर्थ एवं
सर्वजनहितकारिणी बुद्धि दो. (६)
सूक्त—५८ देवता—अश्विनीकुमार
धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानान्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः.
आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषाः स्तोमो अश्विनावजीगः.. (१)
प्रसन्न करने वाली उषा पुरातन-अग्नि के निमित्त सुंदर दूध देती है. उषा का पुत्र सूर्य
उषा के भीतर विचरण करता है. उज्ज्वल गति वाला दिवस सर्वप्रकाशक सूर्य को धारण
करता है. उषा से पहले ही अश्विनीकुमारों की स्तुति करने वाले जागते हैं. (१)
सुयुग्वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः.
जरेथामस्मद्दि पणेर्मनीषां युवोरवश्वकृमा यातमर्वाक्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! रथ में भली प्रकार जुड़े हुए घोड़े सत्यरूपी रथ के द्वारा यज्ञ में आने
के लिए तुम्हें वहन करते हैं. पुत्र जिस प्रकार माता-पिता को देखकर जाता है, उसी प्रकार
यज्ञ तुम्हारे सामने जाते हैं. आसुरी बुद्धि को हमसे बहुत दूर करो. हम तुम्हारे लिए हव्य तैयार
करते हैं. तुम हमारे सामने आओ. (२)
सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः.
किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३)
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हे अश्विनीकुमारो! सुंदर पहियों वाले रथ में बैठकर एवं भली प्रकार जुते हुए अश्वों द्वारा
खींचे जाकर तुम दोनों स्तोताओं की स्तुतियां सुनो. मेधावी पुरातन ऋषियों ने क्या तुमसे नहीं
कहा कि तुम दोनों हमारी वृत्ति की हानि मत करो. (३)
आ मन्येथामा गतं कच्चिद्देवैर्विश्वे जनासो अश्विना हवन्ते.
इमा हि वां गोऋजीका मधूनि प्रमित्रासो न ददुरूस्रो अग्रे.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हमारी स्तुति को जानो और अश्वों द्वारा यज्ञ में पधारो. सभी स्तोता
तुम्हें बुलाते हैं. वे मित्रों के समान तुम्हें दूध मिला हुआ एवं मादक सोमरस देते हैं. सूर्य उषा के
आगे उदय होते हैं. (४)
तिरः पुरू चिदश्विना रजांस्याङ्गूषो वां मघवाना जनेषु.
एह यातं पथिभिर्देवयानैर्दसाविमे वां निधयो मधूनाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! अनेक लोकों को अपने तेज से तिरस्कृत करते हुए तुम दोनों देवमार्ग
द्वारा यहां आओ. संपत्तिशाली अश्विनीकुमारो! स्तोताओं के पास तुम्हारे लिए बोला जाने
वाला स्तोत्र है. हे शत्रुनाशको! तुम्हारे लिए मदकारक सोमरस के पात्र तैयार हैं. (५)
पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्रनरा द्रविणं जह्नाव्याम्.
पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों की पुरानी मित्रता सेवा करने योग्य एवं कल्याण करने
वाली है. हे हमारे यज्ञकर्म के नेताओ! तुम्हारा धन जाह्नवी गंगा में है. तुम दोनों की सुख मैत्री
को बार-बार प्राप्त करते हुए मादक सोमरस से हम भी शीघ्र प्रसन्न हों. (६)
अश्विना वायुना युवं सुदक्षा नियुद्भिश्न सजोषसा युवाना.
नासत्या तिरोअह्नयं जुषाण सोमं पिबतमस्रिधा सुदानू.. (७)
हे शोभन सामर्थ्य से युक्त, नित्य तरुण, असत्यरहित एवं शोभन फल देने वाले
अश्विनीकुमारो! वायु और नियुतों के साथ मिलकर स्थायी प्रेमयुक्त एवं नाशरहित तुम दोनों
दिवस छिपने पर सोम पान करो. (७)
अश्विना परि वामिषः पुरूचीरीयुर्गीर्भिर्यतमाना अमृध्राः.
रथो ह वामृतजा अद्रिजूतः परि द्यावापृथिवी याति सद्यः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! बहुत से हविरूपी अन्न तुम्हारे समीप जाते हैं. तिरस्कारहीन एवं
यज्ञकर्म में संलग्न स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. स्तोताओं द्वारा खींचा गया
तुम्हारा जल बरसाने वाला रथ धरती-आकाश के बीच में शीघ्र गमन करता है. (८)
अश्विना मधुषुत्तमो युवाकुः सोमस्तं पातमा गतं दुरोणे.
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सूक्त—५९ देवता—मित्र
रथो ह वां भूरि वर्पः करिक्रत्सुतावतो निष्कृतमागमिष्ठः.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर-रस से युक्त सोमरस को पिओ एवं हमारे घर आओ. तुम्हारा
अतिशय धन देने वाला रथ सोम निचोड़ने वाले यजमान के शुद्ध घर में बार-बार आता है.
(९)
सूक्त—५९ देवता—मित्र
मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवीमुत द्याम्.
मित्रः कृष्टीरनिमिषाभि चष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत.. (१)
स्तुति किए जाने पर मित्र देव सभी लोगों को खेती आदि कामों में लगा देते हैं. वे धरती
और आकाश दोनों को धारण करते हैं एवं यज्ञकर्म करने वालों को भली प्रकार देखते हैं. घी
मिला हुआ हव्य मित्र के लिए हवन करो. (१)
प्र स मित्र मर्तो अस्तु प्रयस्वान्यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन.
न हन्यते न जीयते त्वोतो नैनमंहो अश्नोत्यन्तितो न दूरात्.. (२)
हे आदित्य देव! जो गाय का घृत लेकर तुम्हें हव्य देता है, वह मनुष्य अन्न का स्वामी
बने. तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे न कोई नष्ट कर सकता है और न हरा सकता है. उसे
पास से या दूर से पाप भी नहीं छू सकता. (२)
अनमीवास इळया मदन्तो मितज्ञवो वरिमन्ना पृथिव्याः.
आदित्यस्य व्रतमुपक्षियन्तो वयं मित्रस्य सुमतौ स्याम.. (३)
हे मित्र! निरोग एवं अन्न के कारण प्रसन्न हम धरती के विस्तृत भाग में घुटने टेककर
इच्छानुसार चलते हुए आदित्य के यज्ञ के समीप निवास करते हैं. हम लोग आदित्य की
कृपादृष्टि में रहें. (३)
अयं मित्रो नमस्यः सुशेवो राजा सुक्षत्रो अजनिष्ट वेधाः.
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (४)
सबके नमस्कार करने योग्य, सुख से सेव्य, सर्व जगत् के स्वामी, शोभन बलयुक्त एवं
सबके विधाता सूर्य उत्पन्न हुए हैं. उन यज्ञपात्र सूर्य की अनुग्रह बुद्धि तथा कल्याण करने
वाली मित्रता का हम पावें. (४)
महाँ आदित्यो नमसोपसद्यो यातयज्जनो गृणते सुशेवः.
तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत.. (५)
महान् आदित्य लोगों को अपने-अपने कर्म में लगाने वाले एवं नमस्कार द्वारा सेवा करने
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योग्य हैं। वे स्तुति करने वालों के प्रति प्रसन्न होते हैं। उन अत्यंत स्तुति योग्य मित्र के निमित्त
अग्नि में हव्य डालो। (५)
मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि. द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्.. (६)
वर्षा द्वारा मनुष्यों का पालन करने वाले मित्र का अन्न सबके द्वारा भोगयोग्य एवं उनका
धन अतिशय कीर्तियुक्त है. (६)
अभि यो महिना दिवं मित्रो बभूव सप्रथा:. अभि श्रवोभिः पृथिवीम्.. (७)
जिस मित्र ने अपनी महिमा से अंतरिक्ष को हरा दिया है, उसी कीर्तिशाली ने धरती को
अन्न से भली प्रकार पूर्ण किया है. (७)
मित्राय पञ्च येमिरे जना अभिष्टिशवसे. स देवान्विश्वान्बिभर्ति.. (८)
ब्राह्मण आदि पांच जन शत्रुओं को हराने वाले बल से युक्त मित्र के लिए हवि देते हैं. वे
मित्र सभी देवों को धारण करते हैं. (८)
मित्रो देवेष्वायुषु जनाय वृक्तबर्हिषे. इष इष्टव्रता अकः.. (९)
दिव्य गुण वाले मनुष्यों में जो व्यक्ति कुश छेदन करता है, उसे मित्र देव कल्याणकारी
अन्न देते हैं. (९)
सूक्त—६० देवता—ऋभुगण
इहेह वो मनसा बन्धुता नर उशिजो जग्मुरभि तानि वेदसा.
याभिर्मायाभिः प्रतिजूतिवपर्सः सौधन्वना यज्ञियं भागमानश.. (१)
हे ऋभुओ! तुम्हारे कर्मों को सब लोग मन से जानते हैं. हे नेताओ एवं सुधन्वा के पुत्रो!
तुम अपने ज्ञान से उन कर्मों को जान लेते हो, जिन कर्मों द्वारा तुम शत्रु को हराने वाला तेज
पाने के लिए यज्ञ के भाग की अभिलाषा करते हो. (१)
याभिः शचीभिश्चमसाँ अपिंशत यया धिया गामरिणीत चर्मणः.
येन हरी मनसा निरतक्षत तेन देवत्वमृभवः समानश.. (२)
हे ऋभुओ! जिस शक्ति द्वारा तुमने चमस के चार भाग किए थे, जिस बुद्धि से तुमने
गाय को चर्मयुक्त किया था एवं जिस ज्ञान से तुमने इंद्र के हरि नामक घोड़ों को बनाया, उन्हीं
कर्मों द्वारा तुमने देवत्व पाया है. (२)
इन्द्रस्य सख्यमृभवः समानशुर्मनोर्नपातो अपसो दधन्विरे.
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सौधन्वनासो अमृतत्वमेरिरे विष्ट्वी शमीभिः सुकृतः सुकृत्यया.. (३)
अंगिरा के पुत्र ऋभुओं ने यज्ञकर्म द्वारा इंद्र की मित्रता भली प्रकार प्राप्त करके प्राण
धारण किए हैं. सुधन्वा के पुत्र एवं पवित्र कर्म करने वाले ऋभुगण देवत्व प्राप्ति के हेतु एवं
शोभन कर्मों से युक्त होकर अमृत पद को प्राप्त कर चुके हैं. (३)
इन्द्रेण याथ सरथं सुते सचाँ अथो वशानां भवथा सह श्रिया.
न वः प्रतिमै सुकृतानि वाघतः सौधन्वना ऋभवो वीर्याणि च.. (४)
हे ऋभुआे! तुम इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर सोम निचोड़ने के स्थान यज्ञ में जाओ
एवं यजमानों की स्तुतियां स्वीकार करो. हे सुधन्वा के पुत्रो एवं मेधावी ऋभुआे! तुम्हारे
शोभन कर्मों की सीमा जानना संभव नहीं है और न तुम्हारी शक्ति की. (४)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः.
धियेषितो मघवन्दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्स्वा नृभिः.. (५)
हे इंद्र! तुम अन्न वाले ऋभुओं के साथ मिलकर जल द्वारा भली प्रकार गीले एवं पत्थरों
द्वारा निचोड़े हुए सोम को दोनों हाथों से पकड़कर पिओ. हे मघवा! तुम स्तुति से प्रेरणा
पाकर यजमान के घर में सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं के साथ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (५)
इन्द्र ऋभुमान्वाजवान्मत्स्वेह नोऽस्मिन्त्सवने शच्या पुरुष्टुत.
इमानि तुभ्यं स्वसराणि येमिरे व्रता देवानां मनुषश्च धर्मभिः.. (६)
हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम ऋभुओं तथा अन्न से युक्त होकर एवं इंद्राणी को
साथ लेकर हमारे इस तृतीय सवन में प्रसन्न बनो. तुम्हारे सोमपान के लिए ये दिन एवं अग्नि
आदि देवों तथा मनुष्यों के कर्म निश्चित हैं. (६)
इन्द्र ऋभुभिर्वाजिभिर्वाजयन्निह स्तोमं जरितुरुप याहि यज्ञियम्.
शतं केतेभिरिषिरेभिरायवे सहस्रणीथो अध्वरस्य होमनि.. (७)
हे इंद्र! तुम अन्नयुक्त ऋभुओं के साथ स्तोता को अन्न देते हुए इस यज्ञ में स्तोता का
स्तोत्र सुनने के लिए आओ. सौ मरुतों एवं चलने में कुशल घोड़ों के साथ तुम यजमान द्वारा
हजार प्रकार से तैयार किए गए सोम वाले यज्ञ में आओ. (७)
सूक्त—६१ देवता—उषा
उषो वाजेन वाजिनि प्रचेताः स्तोमं जुषस्व गृणतो मघोनि.
पुराणी देवि युवतिः पुरन्धिरनु व्रतं चरसि विश्ववारे.. (१)
हे अन्न एवं धनयुक्त उषा! तुम उत्तम ज्ञानसंपन्न होकर स्तोता के स्तोत्रों को स्वीकार
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करो. हे सबके द्वारा वरण करने योग्य, पुरातन, युवती एवं बहुतों द्वारा स्तुत उषा! तुम
यज्ञकर्म के अनुसार चलती हो. (१)
उषो देव्यमर्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सूनृता ईरयन्ती.
आ त्वा वहन्तु सुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णां पृथुपाजसो ये.. (२)
हे मरणरहित, सोने के रथ वाली, प्रिय एवं सत्य वाणी बोलती हुई उषा! तुम सूर्यकिरणों
से प्रकाशित बनो. महान् बलशाली, लाल रंग वाले एवं रथ में सरलता से जोड़ने योग्य घोड़े
तुझ सुनहरे रंग वाली को बुलावें. (२)
उषः प्रतीची भुवनानि विश्वोर्ध्वा तिष्ठस्यमृतस्य केतुः.
समानमर्थं चरणीयमाना चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व.. (३)
हे समस्त प्राणियों के सामने आनेवाली एवं मरणरहित सूर्य का ज्ञान कराने वाली उषा!
तुम आकाश में ऊंची ठहरती हो. हे अति नवीन उषा! एक ही मार्ग में चलने की इच्छुक तुम
बार-बार उसी मार्ग में इस तरह चलो जैसे आकाश में सूर्य का पहिया एक ही मार्ग पर चलता
है. (३)
अव स्यूमेव चिन्वती मघोन्युषा याति स्वसरस्य पत्नी.
स्वर्जनन्ती सुभगा सुदंसा आन्ताद्दिवः पप्रथ आ पृथिव्याः.. (४)
धन की स्वामिनी उषा कपड़े के समान फैले अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य की पत्नी
बनकर चलती है. अपना तेज उत्पन्न करती हुई, शोभन-धन वाली एवं अग्निहोत्र आदि उत्तम
कर्मों से युक्त उषा आकाश ओर धरती के अंत तक प्रकाशित होती है. (४)
अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्.
ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसन्दृक्.. (५)
हे स्तोताओ! तुम अपने सामने शोभन पाती हुई उषा की सुंदर स्तुति नमस्कार सहित
करो. स्तुति धारण वाली उषा आकाश में ऊपर जाने वाला तेज धारण करती है. तेजस्विनी
एवं देखने में सुंदर उषा अच्छी तरह चमकती है. (५)
ऋतावरी दिवो अर्कैर्बोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्.
आयतीमग्न उषसं विभातीं वाममेषि द्रविणं भिक्षमाणः.. (६)
सत्ययुक्त उषा को दिव्य तेज के कारण सब जानते हैं. धनवाली उषा अपने विविध रूपों
से धरती-आकाश को भर देती है. हे अग्नि! तुम्हारे सामने आती हुई एवं प्रकाशयुक्त उषा से
मांगते हुए तुम सुंदर धन पाते हो. (६)
ऋतस्य बुध्न उषसामिषण्यन्वृषा मही रोदसी आ विवेश.
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सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि
मही मित्रस्य वरुणस्य माया चन्द्रेव भानुं वि दधे पुरुत्रा.. (७)
जल बरसाने वाले सूर्य सत्यरूप दिन के आरंभ में उषा को प्रेरित करते हुए विशाल
धरती-आकाश के बीच में प्रवेश करते हैं. महती उषा मित्र एवं वरुण की प्रभा बनकर इस
प्रकार अपना प्रकाश सब जगह फैलाती है, जैसे सोना अपनी चमक फैलाता है. (७)
सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि
इमा उ वां भृमयो मन्यमाना युवावते न तुज्या अभूवन्.
क्व१ त्यादिन्द्रावरुणा यशो वां येन स्मा सिनं भरथः सखिभ्यः.. (१)
हे इंद्र व वरुण! शत्रुओं द्वारा सताई हुई एवं घूमती हुई तुम्हारी प्रजाएं बलवान् शत्रुओं
द्वारा नष्ट न हो जावें. तुम्हारा वह यश कहां है, जिससे तुम हम मित्रों को अन्न देते हो? (१)
अयुम वां पुरतमो रयीयञ्छश्वत्तममवसे जोहवीति.
सजोष़ाविन्द्रावरुणा मरुद्भिर्दिवा पृथिव्या शृणुतं हवं मे.. (२)
हे इंद्र व वरुण! धन का इच्छुक एवं महान् यजमान अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को
सदा बुलाता है. तुम दोनों मरुतों, द्युलोक एवं धरती के साथ मिलकर मेरी स्तुति सुनो. (२)
अस्मे तदिन्द्रावरुणा वसु ष्यादस्मे रयिर्मरुतः सर्ववीरः.
अस्मान्वरूत्रीः शरणैरवन्त्वस्मान्होत्रा भारती दक्षिणाभिः.. (३)
हे इंद्र व वरुण! हमारे पास मनचाहा उत्तम धन हो. हे मरुतो! हमारे पास सब काम में
कुशल एवं वीर पुत्र हों एवं देवपत्नियां वर देकर हमारी रक्षा करें. अग्निपत्नी होत्रा एवं
सूर्यपत्नी भारती दक्षिणा के रूप में गाएं देकर हमारी रक्षा करें. (३)
बृहस्पते जुषस्व नो हव्यानि विश्वदेव्य. रास्व रत्नानि दाशुषे.. (४)
हे सब देवों के हितकारी बृहस्पति! इन लोगों के हव्य का सेवन करो एवं यजमान को
उत्तम धन दो. (४)
शुचिमर्कैर्बृहस्पतिमध्वरेषु नमस्यत. अनाम्योज आ चके.. (५)
हे ऋत्विजो! तुम यज्ञ में स्तुतियों द्वारा पवित्र बृहस्पति की सेवा करो. मैं उनसे वह बल
मांगता हूं, जिसे शत्रु न हरा सकें. (५)
वृषभं चर्षणीनां विश्वरूपमदाभ्यम्. बृहस्पतिं वरेण्यम्.. (६)
कामवर्षी, विश्वरूप नामक बैल की सवारी वाले, तिरस्कार न करने योग्य एवं सबके
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सेवा योग्य बृहस्पति से मैं मनचाहा फल मांगता हूं. (६)
इयं ते पूषन्नाघृणे सुष्टुतिर्देव नव्यसी. अस्माभिस्तुभ्यं शस्यते.. (७)
हे पूषादेव! यह अतिशय नवीन एवं शोभन स्तुति तुम्हारे लिए है. इसे हम तुम्हारे निमित्त
बोलते हैं. (७)
तां जुषस्व गिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्. वध्यूरिव योषणाम्.. (८)
हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के
समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८)
यो विश्वाभि विपश्यति भुवनां सं च पश्यति. स नः पूषाविता भुवत्.. (९)
जो सूर्य सब लोकों को विशेष रूप से देखते हैं एवं सभी वस्तुओं को वास्तव में जानते
हैं, वे हमारे रक्षक हैं. (९)
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (१०)
हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जिन्होंने हमारी बुद्धि को प्रेरित
किया. (१०)
देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरंध्या. भगस्य रातीमीमहे.. (११)
अन्न की अभिलाषा करते हुए हम लोग तेजस्वी सविता देव के धन का दान उनकी
स्तुति द्वारा चाहते हैं. (११)
देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुवृक्तिभिः. नमस्यन्ति धियेषिताः.. (१२)
यज्ञकर्मकुशल एवं मेधावी अध्वर्यु आदि यज्ञ करने की भावना से प्रेरित होकर हव्य एवं
स्तुतियों द्वारा सविता देव की सेवा करते हैं. (१२)
सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम्. ऋतस्य योनिमासदम्.. (१३)
मार्ग को जानने वाला सोमरस गंतव्य स्थान दिखाता है एवं देवों के बैठने योग्य यज्ञस्थल
में जाता है. (१३)
सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे. अनमीवा इषस्करत्.. (१४)
सोम हम मानवों तथा दो पैर और चार पैर वाले पशुओं को रोगरहित अन्न दे. (१४)
अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः. सोमः सधस्थमासदत्.. (१५)
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सोमदेव हमारी आयु बढ़ाते हुए एवं यज्ञ में विघ्न डालने वाले शत्रुओं को हराते हुए
हमारे यज्ञ में बैठें. (१५)
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजांसि सुक्रतू.. (१६)
हे शोभन कर्म वाले मित्र व वरुण! हमारी गोशाला को दूध से सींच दो एवं हमारे घरों
को मधुर रस से भर दो. (१६)
उरुशंसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथ:. द्राघिष्ठाभि: शुचिव्रता.. (१७)
हे पवित्र कर्म वाले मित्र व वरुण! तुम बहुतों द्वारा स्तुत एवं हव्य अन्न से वृद्धि को प्राप्त
हो. तुम विशाल स्तुतियों द्वारा धन का महत्त्व पाकर सुशोभित बनो. (१७)
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पातं सोममृतावृधा.. (१८)
हे मित्र व वरुण! तुम जमदग्नि ऋषि द्वारा स्तुत होकर यज्ञ में बैठो. यज्ञकर्म का फल
बढ़ाने वाले तुम दोनों सोम पिओ. (१८)
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सूक्त—१ देवता—अग्नि, वरुण
चतुर्थ मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि, वरुण
त्वां ह्यग्ने सदमित्समन्यवो देवासो देवमरतिं न्येरिरे इति क्रत्वा न्येरिरे.
अमर्त्य यजत मर्त्येष्वा देवमादेवं प्रचेतसं विश्वमादेवं जनत प्रचेतसम्.. (१)
हे शीघ्रगामी अग्नि देव! बराबर वालों से स्पर्धा करते हुए इंद्रादि देव तुम्हें युद्ध के लिए
प्रेरित करते हैं एवं यजमान यज्ञ में देवों को बुलाने के लिए प्रेरणा देते हैं. हे यज्ञ योग्य,
मरणरहित, तेजस्वी एवं उत्तम-ज्ञान वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें यज्ञकर्त्ता मानवों में आने एवं
विभिन्न यज्ञों में उपस्थित रहने के लिए जन्म दिया है. (१)
स भ्रातरं वरुणमग्न आ ववृत्स्व देवाँ अच्छा सुमती यज्ञवनसं ज्येष्ठं यज्ञवनसम्.
ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम्.. (२)
हे अग्नि! तुम अपने भाई, हवि द्वारा सेवा योग्य, यज्ञ का भाग करने वाले, अतिशय
प्रशंसनीय, जलों के स्वामी, अदिति के पुत्र, जल देकर मनुष्यों को धारण करने वाले,
शोभनबुद्धि संपन्न एवं राजमान वरुणदेव को स्तोताओं के प्रति अभिमुख करो. (२)
सखे सखायमभ्या ववृत्स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या.
अग्ने मृळीकं वरुणे सचा विदो मरुत्सु विश्वभानुषु.
तोकाय तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि.. (३)
हे दर्शनीय एवं सखा अग्नि! तुम अपने मित्र वरुण को उसी प्रकार हमारी ओर
अभिमुख करो, जैसे चलने में कुशल एवं रथ में जुते हुए घोड़े तेज चलने वाले पहिए को लक्ष्य
की ओर ले जाते हैं. तुमने वरुण एवं मरुतों की सहायता से सुखकारक हव्य पाया है. हे
तेजस्वी अग्नि! हमारे पुत्र-पौत्रों को सुखी करो एवं हमारा कल्याण करो. (३)
त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेळोऽवयासिसीष्ठाः.
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (४)
हे उपायों को जानने वाले अग्नि! तुम हमारे ऊपर होने वाला वरुणदेव का क्रोध दूर
करो. हे सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता, हव्य के अतिशय वहन करने वाले एवं दीप्तिशाली अग्नि!
सभी पापों को हमसे दूर करो. (४)
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स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ.
अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो वीहि मृळीकं सुहवो न एधि.. (५)
हे अग्नि! तुम रक्षा करने के लिए एवं उषा की समाप्ति पर यज्ञकर्म के निमित्त हमारे
अत्यंत समीप आओ. हे हमारे दिए हुए हव्य से प्रसन्न अग्नि! तुम वरुण द्वारा किए जाने वाले
रोगों का नाश करो एवं यह सुखदायक हवि खाओ. हे हमारे द्वारा भली प्रकार बुलाए गए
अग्नि! हमारे पास आओ. (५)
अस्य श्रेष्ठा सुभगस्य सन्दृग्देवस्य चित्रतमा मर्त्येषु.
शुचि घृतं न तप्तमघ्न्यायाः स्पार्हा देवस्य मंहनेव धेनोः.. (६)
परम सेवनीय अग्नि की उत्तम कृपा मनुष्यों में उसी प्रकार नितांत पूज्य है, जिस प्रकार
दूध की कामना करने वाले देवों के लिए गाय का शुद्ध, तरल एवं गरम दूध अथवा गाय मांगने
वाले मनुष्य के लिए दुधारू गाय. (६)
त्रिरस्य ता परमा सन्ति सत्या स्पार्हा देवस्य जनिमान्यग्नेः.
अनन्ते अन्तः परिवीत आगाच्छुचिः शुक्नो अर्यो रोरुचानः.. (७)
अग्नि देव के तीन प्रसिद्ध एवं वास्तविक जन्मों (अग्नि, वायु, सूर्य) की सभी अभिलाषा
करते हैं. आकाश में अपने तेज से घिरे हुए सबके शोधक, तेजस्वी, अनंत दीप्ति से युक्त एवं
सबके स्वामी अग्नि हमारे यज्ञ में आवें. (७)
स दूतो विश्वेदभि वष्टि सद्मा होता हिरण्यरथो रंसुजिह्वः.
रोहिदश्वो वपुष्यो विभावा सदा रण्वः पितुमतीव संसत्.. (८)
देवों के दूत, सुनहरे रथ वाले एवं सुंदर ज्वालाओं से युक्त अग्नि सभी यज्ञस्थलों में जाने
की अभिलाषा करते हैं. लाल घोड़ों वाले, परम सुंदर एवं कांतिशाली अन्न से पूर्ण वे घर के
समान सदा रमणीय लगते हैं. (८)
स चेतयन्मनुषो यज्ञबन्धुः प्र तं मह्या रशनया नयन्ति.
स क्षेत्यस्य दुर्यासु साधन्देवो मर्तस्य सधनित्वमाप.. (९)
यज्ञ के बंधु अग्नि यज्ञकार्य में लगे हुए मनुष्यों को जानते हैं. अध्वर्युगण स्तुति रूपी
विशाल रस्सी से अग्नि को उत्तर-वेदी में लाते हैं. वे अभिलाषाएं पूरी करते हुए यजमान के
घर में रहते हैं एवं उसके साथ एकरूपता धारण कर लेते हैं. (९)
स तू नो अग्निरनयतु प्रजानन्नच्छा रत्नं देवभक्तं यदस्य.
धिया यद्विश्वे अमृता अकृण्वन्द्यौष्पिता जनिता सत्यमुक्षन्.. (१०)
सब जानते हुए अग्नि अपने उत्तम रत्न को शीघ्र हमारे सामने लावें. मरणरहित सब देवों
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ने यज्ञकर्म के हेतु अग्नि को बनाया है. आकाश उसका जनक तथा पालनकर्त्ता है एवं अध्वर्यु
घी की आहुतियों से उसे सींचते हैं. (१०)
स जायत प्रथमः पस्त्यासु महो बुध्ने रजसो अस्य योनौ.
अपादशीर्षा गुहमानो अन्तायोयुवानो वृषभस्य नीळे.. (११)
श्रेष्ठ अग्नि यजमानों के घरों एवं विशाल आकाश की मूलरूपी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं.
बिना पैर और सिर वाले अग्नि अपने शरीर को छिपाकर बादल के घर अर्थात् आकाश में धुएं
का रूप धारण करते हैं. (११)
प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याँ ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे.
स्पार्हो युवा वपुष्यो विभावा सप्त प्रियासोऽजनयन्त वृष्णे.. (१२)
हे अग्नि! स्तुतिसंपन्न जल के उत्पत्ति स्थान एवं बादलों के घोंसले के तुल्य आकाश में
बिजली के रूप में वर्तमान तुम्हारे पास तेज सबसे पहले पहुंचता है. सात प्रिय होता
अभिलाषा करने योग्य, अत्यंत सुंदर एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि को लक्ष्य करके स्तुति करते हैं.
(१२)
अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशूषाणः.
अश्मव्रजाः सुदुघा वव्रे अन्तरुदुस्रा आजन्नुषसो हुवानाः.. (१३)
इस लोक में हमारे पूर्वज अंगिरा यज्ञ करते हुए अग्नि के सामने गए थे. उन्होंने उषाओं
का आह्वान करते हुए पर्वत की गुफा में वर्तमान, अंधकार में स्थित एवं पणियों द्वारा चुराई
गई दुधारू गायों को प्राप्त किया था. (१३)
ते मर्मृजत दद्वांसो अद्रिं तदेषामन्ये अभितो वि वोचन्.
पश्वयन्त्रासो अभि कारमर्चन्विदन्त ज्योतिश्चकृपन्त धीभिः.. (१४)
उन अंगिराओं ने गायों को छिपाने वाले पर्वत को तोड़ते हुए अग्नि की सेवा की. अन्य
ऋषियों ने उनका यह कार्य सभी जगह कहा. पशुओं के निकलने के उपाय जानने हेतु
अंगिराओं ने अभिमत फल देने वाले अग्नि की स्तुति करते हुए प्रकाश पाया एवं अपने
बुद्धिबल से यज्ञ किया. (१४)
ते गव्यता मनसा दृध्रमुब्धं गा येमानं परि षन्तमद्रिम्.
दृळ्हं नरो वचसा दैव्येन व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (१५)
यज्ञकर्मों के नेता एवं अग्नि की कामना करने वाले अंगिराओं ने गायों को पाने के
विचार से दृढ़बंद, गायों को रोकने वाले, चारों ओर फैले हुए, कठोर, गायों से युक्त एवं
गोशाला के समान पर्वत को अग्नि संबंधी स्तुतियों से उद्घाटित कर दिया था. (१५)
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ते मन्वत प्रथमं नाम धेनोस्त्रिः सप्त मातुः परमाणि विन्दन्.
तज्जानतीरभ्यनूषत व्रा आविर्भूवदरुणीर्यशसा गोः.. (१६)
हे अग्नि! स्तुति करने वाले अंगिराओं ने माता वाणी से संबंधित एवं स्तुति में सहायक
शब्दों को पहले जाना. बाद में स्तुतिसंबंधी इक्कीस छंदों का ज्ञान प्राप्त किया. इसके पश्चात्
सबको जानती हुई उषा की स्तुति की. फिर सूर्य के तेज से अरुण वर्ण की उषा उत्पन्न हुई.
(१६)
नेशत्तमो दुधितं रोचत द्यौरुद्देव्या उषसौ भानुरर्त.
आ सूर्यो बृहतस्तिष्ठदज्राँ ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्.. (१७)
उषा की प्रेरणा से रात का अंधकार नष्ट हुआ एवं आकाश चमकने लगा. इसके बाद
उषा का प्रकाश उत्पन्न हुआ. मनुष्यों के सत् एवं असत् कर्मों को देखते हुए सूर्य महान् पर्वत
के ऊपर पहुंच गए. (१७)
आदित्पश्चा बुबुधाना व्यख्यन्नादिद्रत्नं धारयन्त द्युभक्तम्.
विश्वे विश्वास्तु दुर्यासु देवा मित्र धिये वरुण सत्यमस्तु.. (१८)
अंगिराओं ने सूर्योदय के बाद पणियों द्वारा चुराई गई गायों को जानते हुए पीछे से उन
गायों को भली-भांति देखा एवं देवों द्वारा दिए गए गोरूप धन को पाया. अंगिराओं के सभी
घरों में सभी देव पधारे. हे मित्रतुल्य एवं वरुण के रोगों का नाश करने वाले अग्नि! यजमान
को सत्य फल प्राप्त हो. (१८)
अच्छा वोचेय शुशुचानमग्निं होतारं विश्वभरसं यजिष्ठम्.
शुच्यूधो अतृणन्न गवामन्धो न पूतं परिषिक्तमंशोः.. (१९)
अत्यंत दीप्तिशाली, देवों को बुलाने वाले, विश्व के पोषक एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता
अग्नि को लक्ष्य करके हम स्तुतियां बोलते हैं. यजमान तुम्हारी आहुति के निमित्त गायों के
थनों से पवित्र दूध का दोहन एवं सोमरसरूपी अन्न को पवित्र करते हुए घर में क्षेपण न करके
केवल स्तुति ही बोलते हैं. (१९)
विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्.
अग्निद्देवानांमव आवृणानः सुमृळीको भवतु जातवेदाः.. (२०)
अग्नि सभी यज्ञ योग्य देवों की माता के समान पोषक एवं सभी मनुष्यों के लिए अतिथि
के समान पूज्य हैं. स्तोताओं का अन्न भक्षण करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि सुखदाता हों. (२०)
सूक्त-२ देवता—अग्नि
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यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि.
होता यजिष्ठो महा शुचध्यै हव्यैरग्निर्मनुष ईरयध्यै.. (१)
जो मरणरहित एवं दिव्य अग्नि मनुष्यों में सत्ययुक्त, इंद्रादि देवों के शत्रुओं को हराने
वाले, देवों को बुलाने वाले एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता हैं, वे अपने महान् तेज से दीप्त होने
एवं यजमानों को स्वर्ग भेजने के लिए उत्तर वेदी पर स्थापित किए गए हैं. (१)
इह त्वं सूनो सहसो नो अद्य जातो जाताँ उभयाँ अन्तरग्ने.
दूत ईयसे युयुजान ऋष्व ऋजुमुष्कान्वृषणः शुक्रांश्च.. (२)
हे बल के पुत्र एवं दर्शनीय अग्नि! तुम आज हमारे यज्ञ में उत्पन्न हुए हो एवं अपने
सीधे, मोटे, तेजस्वी तथा शक्तिशाली घोड़ों को रथ में जोतकर नभ से भिन्न देवों और मनुष्यों
के बीच हव्य वहन के लिए दूत बनते हो. (२)
अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा.
अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्मांश्च देवान्विश आ च मर्तान्.. (३)
हे सत्यरूप अग्नि! मैं तुम्हारे लाल रंग वाले, मन से भी अधिक वेगशाली एवं अन्न तथा
जल बरसाने वाले घोड़ों की स्तुति करता हूं. उन तेजस्वी घोड़ों को रथ में जोतकर यज्ञ के
पात्र देवों एवं सेवा करने वाले मनुष्यों के बीच भली-भांति जाते हो. (३)
अर्यमणं वरुणं मित्रमेषामिन्द्राविष्णू मरुतो अश्विनोत.
स्वश्वो अग्ने सुरथः सुराधा एदु वह सुहविषे जनाय.. (४)
हे उत्तम अश्वों, उत्तम रथ एवं उत्तम धन वाले अग्नि! तुम उत्तम हवि वाले यजमान के
लिए अर्यमा, वरुण, मित्र, इंद्र विष्णु, मरुद्गण एवं अश्विनीकुमारों को बुलाओ. (४)
गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः.
इळावाँ एषो असुर प्रजावान्दीर्घो रयिः पृथुबुध्नः सभावान्.. (५)
हे शक्तिशाली अग्नि! हमारा यह यज्ञ गाय, भेड़ एवं घोड़ों से युक्त हो. अध्वर्यु एवं
यजमान वाला यज्ञ सदैव नष्ट न करने योग्य, हव्य अन्न से युक्त, पुत्र-पौत्र आदि सहित,
लगातार चलने वाला, धनपूर्ण, अनेक संपत्तियों का कारण तथा उपदेशकत्र्ताओं से भरा हो.
(५)
यस्त इध्मं जभरत्सिष्विदानो मूर्धानं वा ततपते त्वाया.
भुवस्तस्य स्वतवाँः पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य.. (६)
हे अग्नि! जो मनुष्य पसीना बहाकर तुम्हारे लिए लकड़ियां ढोकर लाता है एवं तुम्हें
पाने की अभिलाषा से अपना सर लकड़ी के बोझे से दुःखी करता है, उसे तुम धनशाली
बनाते हो, पालन करते हो एवं अनिष्ट कामना करने वालों से उसकी रक्षा करते हो. (६)
यस्ते भरादग्नियेत चिदन्नं निशिषन्मन्द्रमतिथिमुदीरत्.
आ देवयुरिनधते दुरोणे तस्मिन्न्रायिर्ध्रुवो अस्तु दास्वान्.. (७)
हे अग्नि! जो अन्न की अभिलाषा करने वाले तुम्हारे लिए हव्य अन्न धारण करता है,
नशा करने वाला सोम अधिक मात्रा में देता है, पूज्य अतिथि के समान तुम्हें उत्तर वेदी पर
स्थापित करता है एवं देव बनने की अभिलाषा से तुम्हें अपने घर में प्रज्वलित करता है,
उसका पुत्र पक्का आस्तिक एवं विशिष्ट दानी हो. (७)
यस्त्व दोषा य उषसि प्रशंसात्प्रियं वा त्वा कृणवते हविष्मान्.
अश्वो न स्वे दम आ हेम्यावान्तमंहसः पीपरो दाश्वांसम्.. (८)
हे अग्नि! जो पुरुष रात में या प्रातःकाल तुम्हारी स्तुति करता है अथवा हाथ में प्रिय
हव्य लेकर तुम्हें प्रसन्न करता है, यज्ञशाला में सुनहरी काठी वाले घोड़े के समान घूमते हुए
तुम दरिद्रता से उसे बचाओ. (८)
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय दाशद् दुवस्त्वे कृणवते यतस्रुक्.
न स राया शशमानो वि योषन्नैनमंहः परि वरदघायोः.. (९)
हे मरणरहित अग्नि! जो यजमान तुम्हें हव्य देता है, अथवा माला हाथ में लेकर तुम्हारी
सेवा करता है, वह स्तोत्र को बोलने वाला यजमान धनहीन न हो तथा हिंसकों का कष्ट उसे न
छू सके. (९)
यस्य त्वमग्ने अध्वरं जुजोषो देवो मर्तस्य सुधितं रराणः.
प्रीतेदसद्धोत्रा सा यविष्ठासाम यस्य विधतो वृधासः.. (१०)
हे प्रसन्न, युवक एवं दीप्तिशाली अग्नि! तुम जिस यजमान का भली प्रकार अर्पित एवं
हिंसारहित अन्न खाते हो, वह होता अवश्य प्रसन्न होता है. अग्नि की सेवा करने वाले जिस
यजमान का यज्ञ होता आदि बढ़ाते हैं, हम उसीसे संबंध रखेंगे. (१०)
चित्तिमचित्तिं चिनवद्वि विद्वान्पृष्ठेव वीता वृजिना च मर्तान्.
राये च नः स्वपत्याय देव दितिं च रास्वादितिमुरुष्य.. (११)
विद्वान् अग्नि मनुष्यों के पुण्य एवं पाप को उसी प्रकार अलग कर दें. जिस प्रकार घोड़ों
को पालने वाला कोमल और कठोर पीठ वाले घोड़ों को अलग-अलग छांट देता है. हे अग्नि
देव! हमें सुंदर संतान के साथ धन दो. तुम दान करने वाले को धन दो और दानहीन से धन
को बचाओ. (११)
कविं शशासुः कवयोऽदब्धा निधारयन्तो दुर्यास्वायोः.
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अतस्त्वं दृश्याँ अग्न एतान्यङ्ग्भिः पश्येरद्भुताँ अर्य एवैः.. (१२)
हे अग्नि! मनुष्यों के घरों में रहने वाले तिरस्कारशून्य एवं क्रांतदर्शी देवों ने तुझ मेधावी
से होता बनने के लिए कहा है. हे यज्ञस्वामी! तुम अपने गतिशील तेजों से इन दर्शनीय एवं
आश्चर्ययुक्त देवों को देखो. (१२)
त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ.
रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथुश्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः.. (१३)
हे अतिशय युवा, दीप्तियुक्त, मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं उत्तर वेदी पर
स्थापित करने योग्य अग्नि! सोम निचोड़ने वाले व तुम्हारी सेवा तथा स्तुति करने वाले
यजमान की रक्षा के लिए उसे अधिक मात्रा में आनंददायक एवं उत्तम धन दो. (१३)
अधा ह यद्द्यमग्ने त्वाया पड्भिर्हस्तेभिश्चकृमा तनूभिः.
रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमुः सुध्य आशुषाणाः.. (१४)
हे अग्नि! हम हाथों, पैरों एवं शरीर के अन्य अवयवों द्वारा जिस प्रयोजन के लिए तुम्हें
उत्पन्न करते हैं, उत्तम कर्मों वाले एवं यज्ञादि कर्मों में तल्लीन अंगिरा भी अपनी भुजाओं से
अरणिमंथन करके तुम्हें उसी कर्म के लिए इस प्रकार उत्पन्न करते हैं, जिस प्रकार कारीगर
रथ तैयार करता है. (१४)
अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्.
दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः.. (१५)
हम आठ श्रेष्ठ मेधावी (छः अंगिरा एवं सातवें वामदेव) जनों ने उषा माता से अग्नि की
किरणों को लिया है. तेजस्वी सूर्य के पुत्र हम अंगिरा दीप्तियुक्त होते हुए गोधन को रोकने
वाले एवं जलपूर्ण पर्वत को भेदेंगे. (१५)
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशूषाणाः.
शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (१६)
हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ, पुरातन एवं सच्चे यज्ञ के करने में संलग्न पूर्वजों ने तेजस्वी स्थान
तथा दीप्ति प्राप्त की थी, उक्थमंत्र बोलकर अंधकार को नष्ट किया था तथा पणियों द्वारा
चुराई गई लाल रंग वाली गायों को बाहर निकाला था. (१६)
सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः.
शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अगमन्.. (१७)
यागादि शोभन कार्य करने वाले, उत्तम-दीप्तिसंपन्न एवं देवों की अभिलाषा करने वाले
स्तोतागण यज्ञादि द्वारा अपना मनुष्यजन्म इस प्रकार निर्मल कर रहे हैं, जिस प्रकार लोहार
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धौंकनी के द्वारा लोहे को साफ करता है. अग्नि को दीप्तिशाली करते एवं इंद्र को बढ़ाते हुए
उन लोगों ने यज्ञ के चारों ओर बैठकर महान् गोधन को प्राप्त किया था. (१७)
आ यूथेव क्षुमति पश्वो अख्यद्देवानां यज्जन्निमान्त्युग्र.
मर्तानां चिदुर्वशीरकृप्रन्वृधे चिदर्य उपरस्यायोः.. (१८)
हे तेजस्वी अग्नि! अंगिराओं के पर्वत में बंद गोसमूह को इंद्र ने उसी प्रकार देखा, जिस
प्रकार लोग अन्न वाले घर में पशुसमूह को देखते हैं. अंगिराओं द्वारा लाई गईं गायों से प्रजाएं
संपन्न बनी थीं. स्वामी संतान के पालन एवं दास अपने पालन में समर्थ हुए थे. (१८)
अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्त्रनुषसो विभातिः.
अनूनमग्निं पुरुधा सुश्चन्द्रं देवस्य मर्मृजतश्चारु चक्षुः.. (१९)
हे अग्नि! हम तुम्हारी सेवा करते हुए शोभन कर्मों वाले बनें. प्रकाश वाली उषाएं सबको
तेज से ढक देती हैं तथा प्रसन्नताकारक अग्नि को अनेक बार पूर्ण रूप से धारण करती हैं. हे
तेजस्वी अग्नि! हम तुम्हारे मनोहर तेज की सेवा करके शोभनकर्मयुक्त बनें. (१९)
एता ते अग्न उचथानि वेधोऽवोचाम कवये ता जुषस्व.
उच्छोचस्व कृणुहि वस्यसो नो महो रायः पुरुवार प्र यन्धि.. (२०)
हे विधाता एवं मेधावी अग्नि! अपने उद्देश्य से बोले गए इस मंत्रसमूह को स्वीकार करो
एवं उद्दीप्त होकर हमें परमसंपत्तिशाली बनाओ. हे बहुतों द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! हमें
महान् धन दो. (२०)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः.
अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (१)
हे यजमानो! वज्र के समान ध्रुवमृत्यु से पहले ही यज्ञ के स्वामी, देवों को बुलाने वाले,
शत्रुओं को रुलाने वाले, धरती-आकाश को अन्न देने वाले एवं सुनहरी प्रभा से युक्त अग्नि की
अपनी रक्षा के निमित्त हवि से सेवा करो. (१)
अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः.
अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः.. (२)
हे अग्नि! जिस प्रकार पति की अभिलाषा करती हुई एवं शोभन वस्त्रों वाली पत्नी
अपने समीप पति को स्थान देती है, उसी प्रकार हम तुम्हारे लिए उत्तर वेदी रूप स्थान
निश्चित करते हैं. हे उत्तम कर्मों वाले अग्नि! तुम देवों से घिरे हुए हमारे सामने बैठो. समस्त
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