सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
अष्टक वर्ग विचार : १३३
पिता को लक्ष्मी एवं सिद्धि--त्रिकोण एकाधिपत्य शोधन करने पर २ रेखा युक्त केन्द्र में शनि, चन्द्र, बुध, सूर्य हों तो १० वर्ष के पश्चात् जातक के पिता कों सब प्रकार से सिद्धि से युक्त राजलक्ष्मी प्राप्त हो । पितामरण जानने का अन्य प्रकार कुण्डली में जहाँ सूर्य है उससे नवम स्थान पिता का हुआ । इस नवम स्थान से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी सूर्य अष्ट० में रेखा लेकर योग पिंड का गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष रहे उसके त्रिकोण में जब शनि जायगा तब पिता या पिता न हो तो पिता तुल्य किसी कुटुम्बी को कष्ट होगा । जैसे सूर्य मीन में है उससे नवम वृश्चिक हुई । इस वृश्चिक राशि से अष्टम मिथुन है सूर्य अष्टक० में इस मिथुन राशि मेंशरेखा हैं । सूर्य का योगपिंड ९३ है । ९३ % =
४६५ --१२=३८१३न्शेष ९ धनराशि पर या इसके त्रिकोण की मेष या सिंह राशि में जव गोचर में शनि जायगा तो पिता को या पिता न हो तो पितृ तुल्य कुटुम्बी को
कष्ट होगा । : जातक की मृत्यु
सूर्याष्ट० में छग्न से अष्टम स्थान की रेखाओं को सूर्य योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग दो जो शेष रहे उस मास में या उससे त्रिकोण राशि के मास में गतायु होने
पर जातक की मृत्यु होती है।
जसे कु डली में लग्न से अष्टमस्थान में मकर राशि है। मकर राशि में सूर्य अष्ट०
की २ रेखा हैं २% ९३ गोगपिंड=१५६ -- १२=१५६५= शेष ६ कन्या राशि या इसके
त्रिकोण की राशि मकर या वृष में जब सूर्य होगा तब मृत्यु संभव है ।
पिता को मृत्यु का समय
सूर्य केन्द्र या कोण में हो ६, ५, ७, ८ रेखा हों तो क्रमशः २२, २५, ३०, ३६ वर्षो में पिता की मृत्यु हो ।
चन्द्र का अष्टक वर्गानुसार फल
चन्द्रमा के चतुर्थ स्थान से माता घर ग्राम आदि का विचार होता है।
( १ ) चन्द्रमा से चतुर्थं भाव की राशि की शुभ रेखाओं में चन्द्र के योगपिड का
गुणाकर २७ का भाग देना-शेष जो नक्षत्र हो उसमें या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जब
शनि जावे तब माता की हानि या उस त्रिकोण में जहाँ दशा का शुन्य भाग हो माता
की हानि कहना ।
जैसे चन्द्र कुम्भ में है उसके चौथे में वृष राशि है। चंद्र अष्टक० में वृष राशि में ३
रेखा है । चन्द्र का योग पिंड ३६ है । ३६ % ३=१०८ -+- २७-४ ३७८२७ शेप० नक्षत्र= रेवती । रेवती का त्रिकोण १० वां आश्लेषा, १९ वां ज्येष्ठा है इन नक्षत्रों में जव शनि
गोचर में जायगा तब माता की हानि या कष्ट होगा माता के अभाव में माता के तुल्य
को कष्ट होगा ।
(२ ) चन्द्रमा से चतुथं स्थान से अष्टम स्थान मे जो राशि हो उसको रेखा को
१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष बचे उस राशि का उसके त्रिकोण में जब
शनि जावे तब माता को कष्ट होता है।
जैसे चन्द्र से चतुर्थ में वृष राशि है । इस वृष राशि से अष्टम में धन राशि है चंद्र
अष्ट० में घन राशि में ७ रेखा हैं । चंद्र का योगपिंड ३६ है ३६% ७८२५२ -+ १२८
२१३६ ६-शेष मीन राशि आई इसके त्रिकोण में ककं और वृश्चिक राशि है । इन
राशियों में गोचर में जब शनि जायगा तब माता को कष्ट होगा ।
( ३ ) यदि उसी समय अभ्यन्तर चन्द्रमा स्थित राशि से या लग्न से चतुर्थ में मंगल
या शनि गोचर में पड़ता हो या चन्द्रमा लग्न से चतुथं स्थान पर मंगल व शनि की
दृष्टि हो तो माती की मृत्यु होती है ।
यदि जातक की माता न हो तो स्वयं जातक को इससे मृत्यु का भय होता है। या
देशान्तर में गमन करने से वहीं मृत्यु होतो है।
(४) जन्म का चन्द्र यदि सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में हो और चंद्र स्थिति
राशि में चन्द्र अष्ट० में ३ या कम रेखा हों तो वाल्यावस्था में माता की मृत्यु हो या
माता जीवन पर्यन्त रोगी रहे ।
(५) जन्म का चन्द्र केन्द्र में हो या द्वादश स्थान में हो. और चन्द्र स्थित राशि में
चन्द्र अष्ट० में ३ था कम रेखा हों तो जातक के छठे वर्ष माता की मृत्यु होती है ।
(६) चन्द्रमा से ४-८ भाव में मंगल, ५-९ भाव में सूर्य हो तो माता का वियोग
हो लग्न से ऐसा योग हो तो पिता को मरण कहुनां ।
चंद्र का अष्टक वर्ग फल
(१) जन्म का चंद्र लग्न में हो और चन्द्र अष्ट में चन्द्र स्थित राशि में यदि १,२
या ३ रेखा पड़े तो जातक निबंछ और रोगी होता है कभी क्षय रोग भी हो जाता है
(२) चन्द्र लग्न में हो और चन्द्रमा के साथ यदि २ या ३ ग्रह बठ हों तथा उस
चन्द्र स्थित राशि में २ या ३ रेखा चन्द्र अष्ट० में हों तो जातक की मृत्यु ३७ वें
वषं में हो ।
(३) जन्म का चन्द्र त्रिकोण या लाभ भाव गत क्षीण, शत्रुगृही या नीच हो और
चन्द्र अष्ट० में उस राशि की २-३ रेखा हों तो चन्द्र स्थित भाव की हानि होती है
अर्थात् पंचम स्थान में चन्द्र हो तो पुत्र की हानि, लाभ में हो तो लाभ की हानि आदि
होती है। यदि उपरोक्त योग में चन्द्रमा क्षीण न हो और ४ या अधिक रेखा हों तो चंद्र
स्थित राशि का फल अच्छा होगा । भाव फल की वृद्धि होगी ।
(४) लग्न में क्षीण चन्द्र हो चन्द्र स्थित राशि में चन्द्र के अष्ट० में ३ या ३ से
कम रेखा हों तो दमा की बीमारी हो ।
(५) चन्द्र केन्द्र मे हो चन्द्र अष्ट० में उस राशि को ८ रेखा मिली हों तो वह विद्वान्, धनी, माननीय, बली, ख्यातियुक्त नृपतुल्य होता है । (६) चन्द्र अष्ट की किसी राशि में सबसे अधिक रेखा हों । और किसी अन्य
पुरुष का जन्म उसी राशि में हो तो उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध करने या मित्रता
अष्टक वर्ग विचार : १३५
करने से अति शुभदायक होता है। ऐसों के साथ व्यापोर आदि करने से लाभ होता है। (७) चन्द्रमा से अष्टम भाव का स्वामी जिस नक्षत्र में हो उसके त्रिकोण के नक्षत्र में रोग दुःख आदि होता है । जेसे चन्द्रमा कुंभ राशि में है उससे अष्टम कन्या राशि हुई । कन्या का स्वामी बुध है यह पूर्वभाद्रपद में है तो इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र पुनर्वसु और विशाखा में व्याधि दुःख आदि होंगे । इसमे शुभ काम न करना । (८) चन्द्र से गिनने पर चतुर्थ के स्वामी या अष्टम के स्वामी का नवांश निकालो जब इस स्थान में या इससे त्रिकोण में सूर्यं जावे तब माता की हानि संभव है । इसी प्रकार पिता की मृत्यु का विचार लग्न से करना । मंगल के अष्टकवग से फल विचार
मंगल के अष्टकवर्ग से भाई, पराक्रम और धेय का विचार होता है मंगल जिस राशि में बैठा हो उस राशि से तीसरे स्थान से भाई का विचार होता है। (१) इस तीसरे स्थान से एवं इस तीसरे स्थान के अष्टम स्थान से भाई के कष्ट
का विचार करने को उस स्थान की रेखा से मंगळ के अष्टकवर्ग योगपिड से गुणा कर २७ का भाग देनो शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में गोचर में जब शनि आवे तब भाई को कष्ट होगा या योगपिंड और उक्त राशि रेखा + १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण
में जव शनि आवे तव भ्रातु कष्ट होगा । जैसे वृश्चिक में मंगल है उससे तीसरे स्थान में मकर है । मंगल अष्टक० में मकर में २ रेखः है योग पिंड ५५ है। २% ५५११० ~+ २७=४३३=्शेष २ भरणी नक्षत्र या उसके त्रिकोण के नक्षत्र पू० फा० या पू० षा०
पर जब शनि गोचर में आयेगा तव भाई को कष्ट होगा ।
या भ्रातृ स्थान यहाँ मकर आया उससे अष्टम सिंह हुआ। सिंह में ५ रेखा हैं ५% योग पिंड ५१--२७५-:-१२-२२३१--शेष ११ कुंभ राशि या इसके त्रिकोण की
मिथुन या तुळा राशि में जब शनि आवेगा तव भ्रातृ कष्ट होगा ।
(२) त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस रथान में अधिक रेखा हों उससे पृथ्वी, घर
सत्री एवं परिवार की वृद्धि, भ्रातृ का उत्तम सुख प्रगट होता है जब मंगल उस राशि
में जावे ।
(३) मंगल अष्ट० में जिस राशि में हो उस राशि में ८ रेखा हों तो जिमीदार हो ।
(४) मंगल लग्न, द्वितीय या दशम मों हो और उस स्थान की ८ रेखा हों तो
राजा हो किसी राज वंश का हो तो अवश्य राजा होता है ।
(५) यदि मंगल उच्च या स्वगृही होकर लग्न, चतुर्थ नवम या दशम में हो और
उस राशि पर ८ रेखा हों तो वह लक्षाधीश बहुत धनाढ्य और राजा होता है ।
(६) यदि मंगल केन्द्र में हो ९,५,१०, या ८ राशि का हो और मंगल की ४ रेखा
से अधिक हो तो अतिधनी हो । (७).मंगल दशम या लग्न में हो और मंगल की ८ रेखा हो तो धनी हो । यदि राजकुल का हो तो अवश्य राजा होता है । यदि मंगल उच्च का या स्वक्षेत्री हो तो
महाराजा होता है ।
१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) जन्म लग्न ४,५,९ या १० हो उसमें मंगल हो मंगल की ४ रेखा हों तो राजा
तुल्य होता है ।
(९) मंगल हितीयेश होकर षष्ठ स्थान में हो । जहाँ मंगल हो उस राशि की ६
रेखा हों तो शत्रु अधिक हों अल्पायु में ही जातक व्यभिचारी हो ।
(१०) मंगल ६-८ या १२ घर में नीच का या अस्तंगत हो उसके साथ चन्द्रमा
भी हो और जिस राशि में मंगल हो उसमें ६ रेखा हों तो उसका भाई नहीं होता ।
(११) नीच का या अस्तंगत मंगल ६-८ या १२ भाव में हो, मंगल जहाँ हो
उसकी ६ रेखा हों, चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो, तथा मंगल अष्ट० में चन्द्र जहाँ हो
उस राशि में ६ रेखा हो तो उसका भाई नहीं होता ।
(१२) मंगल केन्द्र में या पंचम में हो मंगल जहाँ हो उस राशि में ४ रेखा हो
तो उसका भाई नहीं होता ।
(१३) मंगल लग्न से तीसरे स्थान में हो वहाँ जो राशि हो उसमें ४ या अधिक
रेखा हो और मंगल पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो तो कई भाई बहिन हों ।
(१४) मंगल के साथ शनि हो उस राशि में ३ या अधिक रेखा हों तो जातक के
भाइयों की मृत्यु होती है ।
(११) मंगल जहाँ हो या मंगल स्थिति राशि से पंचम या नवम स्थान पर शुभ
ग्रह की दृष्टि हो और मंगल स्थिति राशि या उसके त्रिकोण.की नवम पंचभ राशि पर
जितनी रेखायें हों उतनी संख्या जातक के भाई वहिनो की होगी । जैसे वृश्चिक का
मंगळ है इसके त्रिकोण में मीन और कर्क है । केवल ककं राशि पर उसकी दृष्टि है
ओर किसी पर शुभ दृष्टि पूर्ण नहीं है। मंगल के अष्ट० में कर्क की ३ रेखा हैं तो ३
भाई हैं। यदि शुभ ग्रह की अद्धं पौन आदि दृष्टि हो तो उनका पूर्ण जीवन नहीं रहता ।
(१६) मंगल १, ९ या ९० राशि में नीच या शत्रु गृही न हो। मंगल की उस
राशि में ४ या अधिक रेखा हो तो राज सुख भोगे । र
(१७) मंगल यदि शनि से युक्त या दृष्ट हो मंगल स्थित राशि की ४ या अधिक
रेखा हो तो कई ग्राम का अधिपति हो एवं दण्ड देने का अधिकारी होता है ।
(१८) मंगल बुध से युक्त या दृष्ट होकर लग्न से किसी भाव में हो । मंगल स्थित
राशि में ३ या कम रेखा हों तो आजन्म धन हीन हो।
(१९) मंगल चन्द्र से युक्त या दृष्ट होकर किसी भाव में हो मंगल स्थिति राशि
में ४ या अधिक रेखा हों तो कई ग्रामों का अधिपति हो ।
(२०) मंगल स्वगृही दशम या चतुर्थ में हो और मंगल स्थिति राशि में ४ या
अधिक रेखा हों तो राज्य या किला या दुर्ग का अधिकारी या सेनापति होकर सुखमय
जीवन व्यतीत करता हैः।
(३) उपरोक्त नियम २ का समय जानने का उदाहरण
मंगळ अष्ट० में त्रिकोण शोधनं के पश्चात सबसे अधिक ३ रेखा मिथुन की हैं ।
आम योगपिड ५५ है। ५५ ७८ ३:१६५-- २७-६ईउत्शेष ३ कृतिका नक्षत्र आया
अष्टक वर्ग विचार : १३७
इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र के उ० फा और उ० षा० में जब शनि आयगा तब
घर भूमि आदि प्राप्त होगी स्त्री एवं कुटुम्ब की वृद्धि होगी ।
बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब धन पुत्रादि एवं मामा का विचार होता है बुध से
पंचम में मन्त्र विद्या, लिपि ( लिखने की शक्ति ) वुद्धि आदि का विचार होता है ।
(१) बुध के चतुर्थ स्थान की रेखा % बुध योर्गपड -:- २७-शेष नक्षत्र में या
उसके त्रिकोण में जव शनि आये तो बंधु मित्रादि को कष्ट होता है जसे बुध कुम्भ में
है इससे चतुर्थं में वृष राशि है । बुध अष्ट० में वृष में ४ रेखा है योगपिड० है ।
४% ०-० -- २७८-० रेवती नक्षत्र आया । इसमें या इससे त्रिकोण की आश्लेषा
और ज्येष्ठा में जव शनि आयगा तब वंधु मित्रादि को कष्ट होगा ।
या योगपिंड > ३ रेखा=०-- १२८० राशि मीन पर या उससे त्रिकोण कर्क या
वुश्चिक पर जब शनि जायेगा तब मित्रादि को कष्ट होगा ।
(२) इसी प्रकार वुध से पंचम स्थान की रेखा % बुध योगपिड -:- २७-शेष नक्षत्र
में या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जव शनि गोचर में जायगा तब बुद्धि आदि सम्बन्ध
के विषयों में कष्ट होगा या रेखा % योगपिंड + १२-शेष राशि या उसके त्रिकोण में
जब शनि जाये तब उपरोक्न्न वुद्धि सम्बन्धी विषयों का कष्ट होगा ।
(३) बुध लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो और उसमे ८ रेखा हों तो भाग्यशाली होता है । अपने जातीय व्यवसाय या विद्या में ख्याति पाता है ।
(४) बुध उच्च या स्वगृही हो उस भाव में १, २या ३ ही रेखा हों तो बुध
स्थित भाव के फल की वृद्धि होती है ।
(५) बुध अष्ट» में जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि के सौर मास .
में विद्या आरम्भ करने से विद्या में पूणं सफलता हो या विद्या सम्बन्धी कार्यों के
- आरम्भ से उसमें सफलता हो ।
(६) बुध अष्ट० में जिस राशि में कोई रेखा न हो उस राशि में गोचर में जब
शनि जावे तब किसी धन वन्धु या ज्ञाति की मृत्यु हो और उस समय जो सुख भोग
रहा हो उसका नाश हो ।
(७) बुध जिस स्थान में हो उससे द्वितीय स्थान में यदि कोई रेखा न हो तो
जातक गू गा होता है। उक्त द्वितीय स्थान में ३ या कम रेखा हो तो यह सारहीन
चक्ता होता है। ४ रेखा-साध।रण वक्ता, ५-६ रेखा=उत्तम वक्ता ही अपने विषय
का पर्ण रूप से समर्थन कर सकता है । ७ रेखा=वार्ताळाप में कुशल ओर प्रिय उच्च»- कोटि का वक्ता हो ।
(८) बुध से द्वितीय भाव में अपग्रह की रेखा हो तो जातक कठोर एवं व्यंग
बोलने वाला हो । सूयं की रेखा हो तो बुद्धिमानी की बांते एवं विचार पूर्वक बातों
का कहने वाळा हो । शनि की रेखा हो-मिथ्यावादी हो उद्दिग्न करने वाली बातें
करे ( मंगल की रेखा हो-झगडा पैदा करने वाला हो । गुरु को रेखा हो-ताकिक
एवं यु क्ति पूर्ण बहस में कुशल । की-मनोहर भाषी, भाषण में प्रमाणों एवं
कहावतों की झड़ी लगा देने वाला हो 1
१३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(१) इसी प्रकार कुंडली में जन्म का चन्द्र नीच का हो या शत्रुगृही हो और
ऐसे चन्द्र की वुध अष्टक वर्ग में यदि द्वितीय स्थान में कोई रेखा हो तो वात करने
में लज्जा मानने वाला होता है । बोलने में व्यवस्था रहित होता है ।
(१०) लग्न से द्वितीय स्थान में बुध को रेखा पड़ती हो और शुभ राशि हो तो
जातक प्राय: आनन्द दायक वातों का बोलने वाला होता है ।
(११) बुध ६-८-१२ भाव मे हो उसमें ३ या कम रेखा हों, बुध पर किसी
शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो आलसी और जुआड़ी हो ।
(१२) वृध शुक्र के साथ ६-८ या १२ भाव में हो यदि बुध पर तीन या कम
रेखा हों तो विद्या रहित हो ।
(१३) बुध अ०वगं से चतुर्थ में शुभ रेखाओं से माया आदि की संख्याजानना ।
गुरु के अष्टक वर्ग का फल
गुरु के स्थान से पंचम स्थान द्वारा ज्ञाति, पुत्र, धर्म धनादि का विचार होता है
- एवं इस पंचम से अष्टम स्थान की रेखाओं से भी पूर्वोक्त रीति से जैसा सूर्य आदि में
बताया है विचार करना ।
(१) गुरु अष्टक० के जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि गत लग्न
में गर्भाधान होने से पुत्र की प्राप्ति होती है । जिस दिशा की सूचक वह राशि हो
उस दिशा में खजाना, गौशाला, अस्तबल, हथसार, मोटर गैरिज भंडार आदि बनाने
से उस स्थान में सब प्रकार की वृद्धि होती है । जसे गुरु अष्टकवगं में धन में ७ रेखा
तुला में ६, वृश्चिक में ६ रेखा है धन-पूर्व । तुला-पश्चिम। वृश्चिक-उत्तर। यहाँ
३ दिशायें शुभ हैं इनमें विशेष रेखा है। सब में शुभ धन-पूवं दिशा का है।
(र) गुरु अष्टक० में जिसमें सबसे कम रेखा हो उस राशि में जब गोचर का सूरय
जाता है उस मास में कार्थ करने से निष्फलता होती है ।
(३) लग्न से ६-८-१२ भाव में गुरु जिस राशि में हो उसकी ५ या अधिक रेखा
हों तो वह दीर्घायु और धनी हो शत्रु पर विजय पावे ।
(४) ४, ९, १२ राशि का गुरु केन्द्र में या नवम में हो या किसी राशि में हो
परन्तु नीच का या शत्रु गृहीत हो या अस्त न हो जिस राशि में गुरु हो उसकी ८ रेखा
हो तो अपने यत्न से पृथ्वी का स्वामी, धनवान् और राजा तुल्य होता है उसकी
बुद्धिमानी ओर शुभ गुणों की बहुत ख्याति होती है।
इस योग में गुरु के साथ चन्द्र भी हो ओर केवल ७ ही रेखा हों तो धनवान् हो
स्त्री और बहु सन्तान का सुख हो । ६ रेखा-धनवान् वाइन आदि का सुख भोगने
वाला संतान युक्त होता है। ५ रेखा-अयशील, शीलवान् । मतांतर ७-८ रेखा-्त्री'
एवं धन से चिरकाळ सुखी । ६ रेखा-धन-वाहन आदि सुख। ५ रेखा-श्रेष्ठ
स्वभाव वाला ।
(५) गुरु से चन्द्र ६ या ऽ स्थान में हो । गुरु अष्टक वर्ग में चन्द्र स्थिति राशि
पर रे या कम रेखा हों तो राजयोग रहने पर भी सदा ऋण ग्रस्त रहे ।
अष्टक वर्ग विचार : १३९.
(६) त्रिकोण में स्वक्षेत्री गुरु हो उस पर ३ या कम रेखा हों तो संतानों की
मृत्यु हो ।
(७) गुरु जिस राशि पर हो उसका स्वामी उच्च का हो गुरु अ० बग में उच्च ग्रह
पर ५ रेखा हों तो वह राजा या महाराजा होता है ।
(८) लग्न से ६ या ८ घर में गुरु लग्नेश युक्त हो गुरु स्थिति राशि की ३ या
कम रेखा हों तो आजन्म भाग्यहीन रहे ।
(९) ६-८या १२ घर में गुरु हो गुरु से ३ या पांचवें स्थान में गुरु अ० वर्ग
` में जितनी रेखायें हों उतनी संतान होगी ।
(१०) लग्न से पाँचवें घर का स्वामी गुरु से युक्त या दृष्ट हो ओर पंचमेश स्थिति
राशि में ४ या अधिक रेखा हों तो एक संतान, कुल की वृद्धि एवं ख्याति करने
वाला हो ।
(११) लग्न से पञ्चम घर को स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी यदि गुरु से युक्त या दुष्ट हो । पंचमेश स्थिति राशि पर ३ या कम रेखा हों तो १ संतान जातक के प्रति दुर्व्यवहार करने वाला हो ।
(१२) लग्न से और गुरु के स्थान से पञ्चम स्थान में ३ या कम रेखा हों तो
बहुत कम संतान हो ।
(१३) गुरु से पञ्चम स्थान में जितनी रेखा हों उतनी संतान होना बताया गया
है परन्तु नीच या शत्रु गृही ग्रह से तो फल ठीक नहीं होता ।
(१४) गुरु और लग्न से नवमेश उच्च या स्वगृही होकर केन्द्र में हो उस पर
४ से अधिक रेखा हो तो दंड देने का अधिकारी हो ।
(१५) गुरु अष्टक वर्ग में जब गोचर में उस राशि मे शनि जावे जिसमें सबसे |
कम रेखा हैं तब उस समय जातक की मृत्यु होती है ।
(१६) गुरु से पञ्चम स्थान का स्वामी जितने नवांश में हो उतनी संतान दों ।
(१७) गुरु से पञ्चम भाव की रेखा > गुरु योग पिड-+ २७-गेष नक्षत्र या उसके
त्रिकोण में जब शनि जावे, या रेखा+योगपिड <- १२ शेष राशि या उसके त्रिकोण में
जब शनि जावे तब संतान कष्ट होगा घमं ओर विद्या की हानि होगी ।
(१८) गुरु अ० वगं में गुरु से पाँचवें घर में जितनी शुभ रेखा हों उसमें से नीच
या शत्रु घर में जितनी रेखा हों उनको घटाना जो शेष वचे उतनो संतान होगी ।
शुक्र के अष्टक वग का विचार
शुक्र स्थिति राशि से सप्तम स्थान द्वारा स्त्री का विचार होता है ।
(१) इसी सप्तम स्थान एवं सप्तम से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी
रेखाओं द्वारा पूर्ववत् रत्री के कष्ट का विचार होता है ।
जैसे शुक्र मीन पर है उससे सप्तम स्थान कन्या राशि है । शुक्र अ० वर्ग कन्या
की ४ रेखा हैं योगपिण्ड ४४ है । ४२ ४४=१७६ -: २७=६ ३ङन्शेष १४ चित्रा में
या इसके त्रिकोण धनिष्ठा और मृग० में जब शनि आयेगा तव स्त्री कष्ट होगा या
१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४ >९ ४४-१७६ ~ १२=१४४=शेष ८ राशि वृश्चिक में या इसके त्रिकोण मीन और
कर्क में जब शनि जायगा तब स्त्री को कष्ट होगा ।
(२) शुक्र अष्ट० में जिस २ राशि में अधिक रेखा हो उस २ राशि में जब शुक्र
गोचर में जायगा तब धन, स्त्री और भूमि का सुख लाभ होगा ।
(३) शुक्र अ० वर्ग की जिस राशि में कम रेखायें हों उस राशि की दिशा में
जातक स्त्री का शयन गृह बनावे तो स्त्री जातक के वशीभूत रहे। अन्यमत जिस राशि
में अधिक रेखा पड़ती हों उस राशि की दिशा में गृह निर्माण करता है ।
(४) केन्द्र या त्रिकोण गत शुक्र स्थिति राशि की ८ रेखा हों तो सेनापति या
खाहनाधिपति हो ७ रेखा-धनाढ्य रत्नादि सम्पन्न या जन्म भर सुखी रहे । ५-६ रेखा दाम्पत्य जीवन सुखमय हो ।
यदि शुक्र नीच का हो या अस्त या ६-८ या १२ भाव में हो तो कोई राजयोग
होने पर भी राजयोग नष्ट हो जाता है ।
(५) शुक्र मेष या वृश्चिक का हो शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो ४ से अधिक रेखा हों "तो धनी बहुत वाहन युक्त होता है
(६) शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हो मंगल से दृष्ट न हो शुक्र स्थिति राशि की ४
से अधिक रेखा हों तो अल्प अवस्था में विवाह हो । मंगल से दुष्ट होने में विवाह में
विघ्न होता है । -
(७) शुक्र १० या ११ राशि में हो मंगल से दृष्ट हो ओर शुक्र स्थिति राशि की
३ या अधिक रेखा हों तो उसकी स्त्री कुलटा होती है ।
शनि अष्टक वर्ग फल
शनि के अष्टक वर्ग से आयु का विचार होता है जिस राशि में शनि हो उससे अष्टम स्थान मृत्यु स्थान कहलाता है ।
(१) शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि तक जितनी रेखायें हों उतने वर्ष में जातक
हो रोग या झगड़ा होता है।
शनि से लग्न तक जितनी रेखाएं हों उतने वषं में मृत्यु, धनक्षय या कष्ट या
“विदेश गमन होता है ।
लग्न से शनि तक और शनि से लग्न तक जितनी रेखा हों सबको जोड़ने से जो
संख्या आये उतने वर्ष में मृत्यु का भय हो ।
शनि अष्टक वर्ग में कुल ३९ रेखाएं होती हैं उसमें शनि स्थिति राशि एवं लग्न
ड स्थिति राशि की रेखाओं को जोड़ने से ठीक कष्ट प्रद वषं आयगा ।
इसी प्रकार लग्न से शनि तक अर्थात् शनि स्थिति राशि तक जितनी रेखाएं हों
उनको ७ से गुणाकर २७ का भाग दो जो शेष रहे उस संख्या के नक्षत्र में गोचर में
जब शनि आता है तब सुख एवं धन की हानि होती है ।
जसे शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि स्थिति राशि तक ९ रेखा हैं । शनि योग `
पिंड ४९ है ४९ > ९=४४१ =- २७-१६६७ शेष ९ श्लेषा नक्षत्र में जव गोचर का
खचि जायगा तब सुख और धन की हानि .होगी ।
अष्टक वर्भ विचार : १४१
(२) शनि अ० वर्ग में जिस राशि में कोई रेखा नहीं है उस राशि में गोचर का शनि आमे से मृत्यु या धन हानि होती है । (३) जन्म में शनि केन्द्र में हो । किसी केन्द्र स्थान में तुला राशि हो पर शनि तुला में न हो ऐसे शनि स्थिति राशि की ४ या कम रेखा हो तो अल्पायु हो । (४) लग्न में बली शनि हो उसमें ५-६ रेखा हों तो धन की हानि होती है जन्म से हो दुःख भोगता है ।
(५) शनि लग्न में हो रेखा न हो तो अल्पायु हो ।
(६) चंद्र शुभ वर्ग शोर शनि नीच या शत्रुगृही हो ऐसे शनि स्थिति राशि में
५-६ रेखा हो तो दीर्घायु हो । (७) शनि नीच या शत्रुगृही हो और शुभ दृष्ट हो, शनि पर ४ रेखा से अधिक हो तो दीर्घायु हो ।
(८) शनि लग्न या पंचम स्थान में हो, नीच शत्रुगृही या अस्त हो और शनि पर ४ या ६ रेखा हो तो बहुत दासियाँ होती हँ ! यह धनी और ऊंटों का मालिक होता है।
(९) शनि लग्न या पंचम में हो और शनि पर ७रेखायें हों तो धनी हो । ८ रेखा
हों तो ग्राम शहर आदि का अधिपति हो । ऐसे शनि पर ७-८ रेखा हों तो व्यापार में अप्रवृत्ति होने से लक्षाधीश हो ।
(१०) शनि मंगल युक्त हो, शनि पर ४-५ रेखा हो तो पुर ग्राम आदि का
स्वामी हो ओर तंत्र मंत्र जानने वाला हो ।
(११) शनि ३-६-११ घर में हो नवमेश या दशमेश हो तो राजा सदुश हो।
(१२) शनि चंद्र युक्त लग्न में हो शनि की चार रेखा हो तो ऋणग्रस्त हो ।
(१३) यदि शनि चंद्र युक्त ४, ७ या १० स्थान में हो ४ रेखा हो तो राजयोग होता है । RR
(१४) शनि कहीं हो उस पर ३ य। कम रेखा हो तो परदेश में मृत्यु हो । (१५) चतुर्थेश से युक्त या दुष्ट शनि द्वितीय में हो शनि पर २, ३ रेखा होतो
तीर्थाटन करता है।
(१६) शनि दशम में दशमेश युक्त हो ३ रेखा हो तो जीवन के विशेष अंश में
परदेशवासी रहता है ।
(१७) शनि अ० वं में जिस स्थान में एक भी रेखा न हो उस राशि में जब
` शनि गोचर में जावे उस समय सूर्य और चंद्र भी गोचर में वहाँ आवें तब बहुत
अनिष्ट कारी होता है । इस समय दशा भी खराव हो तो मृत्यु भी संभव है ।
. (१८) शति अ० वर्ग में जिस राशि में रेखा न हो उसमें सूर्य या शनि या दोनों
जब जाते हैं तो रोग पीड़ा आदि का कष्ट होता है ।
(१९) शनि से अष्टम राशि की रेखा%योगपिड-+ २७=शेष नक्षत्र, या उसके
त्रिकोण में जो रेखा%योगपिंड5-१२=शेष राशि, पर उसके त्रिकोण में जब शनि
जायया तब मृत्यु संभव हैं या सुख एवं धन को हानि हो । जैसे सिंह पर शनि है उससे
१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अप्टम मीन है जिसकी रेखा ३ है योगपिंड ४९ है। ४९५३=१४७-- २७=५२उ शेष
१२ उ. फा. हुआ इसमें या इसके त्रिकोण का उ० षा० या कृतिका में जब शनि जाये
तब मरण संभव है। या ३)१(४९-१४७--१२-१२ह६ 45शेष ३ मिथुन. या इसके
त्रिकोण की राशि तुला और कुंभ में जव शनि गोचर में जायगा तब मृत्यु संभव है ।
इस समय छिद्रा दशा हो अर्थात् जन्म कालीन नीच या शत्रुगृही वली ग्रह की अन्तदंशा हो तो मृत्यु अवश्य होगी । .
. (२०) जिस राशि में रेखा न हो उसमें गोचर का शनि जाये और उस समय
दुष्ट दशा भी हो तो मृत्यु हो । छु
-(२१) अन्यमत-शनि के अ० वर्ग में लग्न से जो अष्टम भाव हो उसकी शुभ
. रेखा,शनि योगपिर्ड :- २७=शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में, जब शनि या गुरु जावे
तब मृत्यु होगी ।
लग्न के अष्टकवर्ग का फल
लग्न अष्टकवर्ग कुण्डली से सब भावों के फल जानने की यह रीति हैः--
जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव गत लग्न अ० वर्ग रेखा को लग्न
अ० वर्ग योगपिंड रा गुणा कर २७ का भाग देना । शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में
जब शनि जावे तव यह फल होता है ।
(१) यदि उस भाव में कोई ग्रह न हो तो भाव फल साधारण क्लेश होता है।
(२) उसमें कोई शुभ ग्रह हो तो उस भाव के फल में अनिष्ट होने की सम्भावना
नहीं होगी । १
(३) उसमें कोई पाप ग्रह हो तो उस भाव के फल में क्लेश लाता है ।
(४) उसमें कोई पाप और शुभ ग्रह हो तो भाव का फल मिश्रित होगा ।
उदाहरण १)-लग्न अप्ट० वर्ग में-लग्न में ४ रेखा हैं लग्न योगपिंड परे है ।
८३५४=३३२--२७=१२६ङ=शेष ८ पुष्य नक्षत्र, इसके त्रिकोण के नक्षत्र अनु-
राधा और उ० भा० लग्न में पाप ग्रह राहु है। इसलिये इन नक्षत्रों में गोचर का
शनि जाने पर कष्ट की सूचना देगा ।
(२) धनभाव-लग्न से दूसरे भाव में ४ रेखा है । इसमें कोई ग्रह नहीं है । उपरोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा तो धन सम्बन्धी बातों में कुछ चिन्ता होगी ।
(३) प्रातृभाव--इसमें भी ४ रेखा हैं । इसमें शनि है । इससे जब, गोचर में
उपरोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा तो भाई आदि को कष्ट होगा ।
` (४) चतुर्थ में-३ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं है। ३ रेखा%योगपिंड :३=२४९ --
२७=९६७=शेष ६ आर्द्रा और इसका त्रिकोण नक्षत्र स्वाती, शतभिष पर जब शनि
आयगा तो सुख, माता, भू-सम्पत्ति आदि की कुछ चिन्ता होगी ।
(५) पंचम में-३ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं है तो उपरोक्त नक्षत्रों मे शनि जाने
पर पुत्र सम्बन्ध से नाम मात्र को कुछ चिंता. होगी ।
(६) षष्ठ में--७ रेखा हैं इसमें पाप ग्रह मंगळ स्वगृही है ७५८३५८१ -न २७
अस्टक वर्ग विचार : १४३
=२१ देर्डुन्शेष १४ चित्रा में या इसके त्रिकोण धनिष्ठा और मृग० में जब शनि
जायगा तव शत्रु द्वारा कष्ट होगा । परन्तु मंगल स्वगृही होने से शत्रु पीड़ा बढ़ने नहीं देगा अर्थात् कष्ट न होगा ।
(७) सप्तम में-३ रेखा हँ । इसमें पाप ग्रह केतु है तो स्त्री सम्बन्ध से पीड़ा देगा जवकि शनि उन नक्षत्रों में जायगा जिसका वर्णन चतुर्थ भाव के फल विचार में दिया है।
(८) अष्टम में पाँच रेखा हैं। योगपिंड ५३ १६ ५=४१५-- २७-१५३६-शेष१०
मघा या इसके त्रिकोण के नक्षत्र मूल और अश्विनी में जव शनि जायगा कोई अनिष्ट
नहीं होगा । क्योंकि इसमें शुभग्रह गुरु बेठा है ।
(९) नवम में-३ रेखा हैं चन्द्र और बुध इसमें हैं । इससे चतुर्थ भाव फल विचार
में जिन नक्षत्रों का वर्णन है उनमें शनि जायगा तो भाग्य सम्बन्धी कष्ट नहीं होगा ।
(१०) दशमभाव में ३ रंखा हैं सूये और शुक्र पाप और शुभग्रह मिश्रित होने से
मिश्रित फल होगा । जव चतुर्थ में बताये नक्षत्रों में शनि जायगा तब व्यापार जीविका
आदि सम्बन्ध से मिश्रित फल होगा ।
(११) लग्न में ५ रेखा हैं । कोई ग्रह नहीं है । अष्टम भाव के अनुसार नक्षत्रों में
जव शनि जायगा तो तव आय के सम्वन्ध में विशेष विघ्न वाधा नहीं होगी ।
(१२) व्यय में भी ५ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं हैं उपरोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा
तो खर्च के सम्वन्ध से विशेष कोई झंझट नहीं होगी । ४
संक्षिप्त में शनि के १२ भावों का फल |
गोचर में शनि नक्षत्र भाव स्थूल फल विचार
पुष्य, अनुराधा, उ० भाद्र० लग्न, द्वितीय, शारीरिक कष्ट, धन सम्बन्धी वातों की
तृतीय किंचित् चिंता, भाइयों के सम्बन्ध के कष्ट।
आर्द्रा, स्वातो, शतभिष चतुर्थ, पंचम सुख भू-संपत्ति मातृ सुख, संतान सम्बन्ध
: सप्तम,नवम, से किंचित् चिंता होगी, स्त्री को कष्ट, भाग्य
दशम में साधारण व्यापार जीविका सम्बन्धी
कुछ चिंता होगी ।
चित्रा, धनिष्टा, मुग षष्ठ शत्रु द्वारा विशेष कष्ट नहीं ।
सघा, मूल, अश्विनी अष्टम,लाभ आयु सम्बंध से कोई अनिष्ट नहीं होगा
व्यय लाभ में विशेष बाधा नहीं होगी । और
विशेष खर्च की झंझट नहीं होगी ।
उपरोक्त भाव की रेखा ><योगपिंड<- १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण में शनि
आवे तब उस समय भी उपरोक्त फल का विचार करना ।
अष्टक वर्ग से भावफल विचार दु
(१) जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव की राशि गत रेखा % योग
-:-१२ शेष राशि या उसके त्रिकोण की राशि में जब शनि जाता है तव उसका
अनिष्ट फल प्रगट है यदि उसमें कोई ग्रह नहीं है तो लेश. मात्र अनिष्ट होता
१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
है 1 यहाँ शुभ ग्र ह हो तो अनिष्ट हीं होता । पाप ग्रह हो तो पूर्ण अनिष्ट होता है पाण
और शुभ ग्रह वहाँ हो तो मिश्रित फल होगा । इस प्रकार लग्न अष्टक वर्ग से सव भाव के फल का विचार होता है । र (र) अष्टमेश जिस राशि में हो उस राशि के त्रिकोण शोधित रेखा को अष्टम स्थान की रेखाओं से गुणाकर १२ का भाग देने से जो शेष वचे उस राशि या उसके
त्रिकोण की राशि में जब गोचर का सूर्य जाता है, तव उस सौर मास में अनिष्ट
होता है जसे अष्टमेश शनि सिंह राशि का है सिंह में लग्न अ० वर्ग में त्रिकोण के
पश्चात् १ रेखा है । अष्टम स्थान में मकर राशि है उसकी ५ रेखा हैं। ५%१-५-: १२=शेष ५ सिंह है । इसके त्रिकोण में धन और मेष है इन सौर मास में ( गोचर का
सूर्य इन राशियों में जाने पर ) अनिष्टकारी होगा ।
(३) शनि के स्थान में आरम्भ करके अष्टमेश जहाँ हों उस स्थान तक की
रेखाओं को जोड़कर अष्टम स्थान की रेखा से गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष राशि आवे उसमें या उसके त्रिकोण में जव गोचर का सूयं जाता है उन सौर मासों में
अरिष्ट होता है । जैसे अष्टमेश शनि सिंह राशि में है यहाँ शनि और अष्टमेश एक ही है । केवल सिंह की रेखा ४ थी । अष्टम स्थान की रेखा ५ है। ५१(४-८२० -+ १२=शेष ८ वृश्चिक या इसके त्रिकोण की राशि मीन और कर्के । इन सौर मासों में अरिष्ट होगा ।
प्रत्येक ग्रह के अष्टक वर्ग से शुभाशुभ समय भी प्रकट होता है लग्न से उस ग्रह तक जिसका अष्टक वर्ग है और उस ग्रह से लग्न तक रेखाओं को जोड़ने से जो समय आयगा पाप ग्रह से पाप फल शुभ ग्रह से शुभ का समय प्रकट होगा जैसे :--
(१) सूर्य अष्ट० वर्ग में लग्न मिथुन से सूर्य स्थित राशि मीन तक ३९ रेखा हैं और सूर्य की मीन राशि से मिथुन लग्न तक १७ रेखा हैं । इन वर्षो में रोगादि फल होगा ।
(२) मंगल के अ० वग में छर्न मिथुन से वृश्चिक के मंगल तक २० रेखा हैं और
मंगल से लग्न तक २८ रेखा हैं इन वर्षों में कष्ट शस्त्र अग्निभय आदि होगा ।
(३) शनि से लग्न तक शनि अ० वर्ग में ९ रेखा हैं और शनि से लग्न तक ३७ है इन वर्षो में बड़ा कष्ट रोग पीड़ा आदि होगा । (४) चन्द्र अ० वर्ग में लग्न से चन्द्र तक ३९ रेखा हैं और चन्द्र से लग्न तक १५ रेखा हैं इन वर्षों में सुख होगा, भाग्यवृद्धि होगी । (५) बुध अ० वर्ग में लग्न से बुध तक ४२ रेखा हैं बुध से लग्न तक १७ रेखा हैं इन वर्षो में सुख होगा भाग्य वृद्धि धमं के कार्य होंगे । (६) गुरु अ० में लग्न से गुरु तक ४० रेखा हैं गुरु से लग्न तक २५ रेखा हैं इन वर्षों में स्वास्थ अच्छा रहेगा रोग दूर होगा सुख होगा । (७) शुक्र अ० वर्ग में लग्न से शुक्र तक ४२ रेखा हैं शुक्र से लग्न तक १९ रेखा हैं इन वर्षों में व्यापार आदि का सुख स्त्री सुख आदि प्राप्त होंगे ।
अष्टक दर्ग विचार : १४५
(८) लग्न अ० वर्ग में लग्न से मंगल तक २५ रेखा हैं मंगल से लग्न तक ३५
रेखा हैं इन वर्षों में शत्रु पीड़ा रोग आदि से कष्ट होगा ।
(९) लग्न अ० वर्ग से लग्न में गुरु तक ३३ रेखा और गुरु से लग्न तक २५
रेखा हैं इन वर्षों में फल शुभ होगा स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
इन सभयों में शुभ या पाप ग्रहों के योग से फल में भी प्रभाव पड़ेगा पाप ग्रह के
अष्टक वग में पाप ग्रह के योग से वहुत अशुभ होगा । शुभ ग्रह के अष्टक वर्ग में शुभ
ग्रहों के योग से शुभता बढ़ेगी । दोनों प्रकार के ग्रह हों तो मिश्रित फल होगा।
अरिष्ट जानना
(१) अष्टमेश जिस राशि में हो उसके त्रिकोण शोधन फल से अष्टम स्थान की
शुभ रेखा से गुणा कर १२ से भाग देना शेष राशि या उसके त्रिकोण के सौर मास
में अरिष्ट होगा ।
इसी प्रकार मातृ पितृ भाव से उससे अष्टम स्थान की गणना कर उसके अरिष्ट
का समय उपरोक्त प्रकार से निकालना ।
जैसे अष्टम में मकर राशि है अष्टमेश शनि सिंह राशि में है । लग्न अ० वर्ग में
मकर की शुभ रेखा ५ है सिंह में त्रिकोण शोधन के पश्चात् १ रेखा प्राप्त हुई है
५ १=५--१२=शेष ५ सिंह या इसके त्रिकोण की राशि धन,मेष के सूयं में अरिष्ट
होगा । ः
(२) शनि से लग्न के अ टमेश तक रेखा जोड़कर अष्टम स्थान की रेखा से गुणा
कर १२ का भाग देने से जो शेष राशि या उसके त्रिकोण की राशि आवे उसमें सूर्य
जाने से अरिष्ट होगा ।
(३) जिस जन्म लग्न में ९, १२ राशि का राहु हो उसमें या उसके त्रिकोण में
जव गोचर का गुरु आवे तव अरिष्ट संभव है । या जिस राशि में राहु युक्त हो उस
राशि के त्रिकोण में जव शनि गोचर में आवे तब अरिष्ट संभव है ।
(४) षष्ठेश जिस नक्षत्र में हो उस राशि नक्षत्र से त्रिकोण में जव शनि जावे तव
मरण संभव है ।
जैसे यहाँ षष्ठंश मंगल वृश्चिक में अनुराधा नक्षत्र में त्रिकोण में उ० भाद्र० और
पुष्य है इनमें शनि जाने पर मरण तथा अरिष्ट संभव है । यदि प्रबल दीर्घायु योग
हो तो अपने समान अन्य करिसी को अरिष्ट आदि हो ।
(५) चन्द्रमा से या लग्न से तीसरे उपकरण में गुरु हो तो उस अ० कोण का जो
स्वामी है उसके त्रिकोण में जव शनि आवे उस वर्ष विवाद, परदेश गमन, और मृत्यु
तुल्य शरीर पीड़ा होती है । |
(६) अष्टमेश जिस द्वादशांश में हो उसके त्रिकोण में जब राहु जावे उस समय
अष्टमेश गत राशि के त्रिकोणस्थ सूर्य में मृत्यु संभव है एवं- स्पष्ट सूर्यं की कला ५
राहु को कला बनाकर-:-१२ राशि की कला=छब्धि अंश फलादि जो आवे उसे स्पष्ट
सूयं में जोड़ने से जो आयगा उस तुल्य सूर्य स्पष्ट में मरण संभव । -
१ १०
१४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड र
जैसे सूर्य स्पष्ट ११-५-४०-४५। राहु स्पष्ट २-८-६-३२, सूर्य की कला ३०-१४०--४५ ५ राहु कला ४००६'--३२”“-८२३० ५८४६--१ ५० ८२३०५८४६,--१४ --- २१६०० (१२ राशि की कला ) -३०१०२--२७” रा० रा ० ' रात ७. 2
=२-२-३०-२७तमूर्य स्पष्ट पर ११--५--४०--४५=१-९-११--१२
इस स्पष्ट पर सूर्य जाने पर मृत्यु संभव है ।
(७) सूर्य स्पष्ट की कला % मंगल स्पष्ट की कछा-गुणन फल 5-१२ राशि की कला २१६००=लब्धि कला की राशि आदि बनाकर सूर्य स्पष्ट में जोड़ना । उस स्पष्ट के तुल्य सूर्य आने पर या उसके त्रिकोण राशि में सूर्यं आने पर क्लेश एवं क्षय होगां।
रा० ०
जैसे सूर्य स्पष्ट ११--.५--४०(--४५” की कला २८१४०४५” > भौम स्पष्ट
रा०
७०१२-२९-४४” की कला १३३४९'-४४/-२६८८७७६१'४-३८ उक्त गुणन फल
रा ०
+१२ राशि की कला २१६००८-१ २४४८--२ % ६--२७ - २८--२+
रा ०
सूर्य १९---५--४०--४४”“-६---३---८---४७ इनका सूर्य गोचर में होने पर क्लेश आदि होगा ।
(८) लग्न के द्वादशांश के त्रिकोण में जव सूर्य जावे तब मरण संभव होगा।
(९) था अष्टमेश के त्रिकोण में जब सूर्यं जावे ८ A
(१०) या अष्टमेश के त्रिकोण में जब चन्द्र जावे या अष्टमेश गत नवांश के
त्रिकोण में जब चन्द्र जावे उस दिन अल्प रेखा भी हो तो मृत्यु निश्चित जानो ।
(११) या ६-८-१२ भावेशों के स्पष्ट के योग करने से जो आवे उसमें जब शनि
जावे या उसके त्रिकोण में शनि जावे तव मृत्यु संभव है ।
(१२) निधन लग्न-जन्म लग्न स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट के नवांश से ६५ वें नवांश
को जिस राशि में लग्न या चन्द्र हो उस समय मरण संभव है । उस समय रेखा शून्य
हो और दुष्ट ग्रह की दशा हो तव उस लग्न में मृत्यु संभव है या जन्म लग्न से दूसरी
या सप्तम राशि के लग्न में उक्त फल हो । एक नवांश ३-२० का होता है ६४ वें
रा०
नवांश में ७--३--२० अधिक हो जाते हैं । इससे इतने जोड़ने पर ६५ वाँ नवांश आ जाता है।
जैसे २--२०--११--५३ हे-९--२३--३१ का नवांश ५ सिंह राशि आई
प७--३--२०
६--२३--३ ५
गोचर विचार : १४७
चन्द्र स्पष्ट १०--२--७--५५। ५-५-२७ का नवाश ११ कुंभ राशि आई
न७---३---२०
१७---५--२७
अध्याय ६
गोचर विचार
गोस्तारा, चरस्संचार सूर्यादि ग्रहों की दैनिक गति के भ्रमण से जो ग्रहों को
स्थिति प्रकट होती है उसे गोचर कहते हैं । -
जन्म कुण्डली में जो ग्रह दिये हैं वे वहाँ स्थिर हैं पंचांग के अनुसार वे ग्रह
चतंमान में कहाँकहाँ पर हैं इस विचार को गोचर कहते हैं ।
अर्थात् जन्म चन्द्र की स्थिति के विचार से वर्तमान में ग्रहों की स्थिति के सम्बन्ध
से भविष्य के फल विचार को गोचर विचार कहते हैं । जन्म राशि-जन्म समय चन्द्र
जिस राशि पर हो उसे ही जन्म राशि कहते हैं ।
गोचर फल का विचार :
गोचर का फल विचारने को यह देखना पड्ता है कि जन्म राशि से वर्तमान में
(पंचांग के अनुसार) कौन-कौन ग्रह कौन-कौन स्थान में हैं जेसे किसी जन्म कुण्डली में
चन्द्रमा कुम्भ राशि पर है तो उसकी राशि कुम्भ कहलाई । अव पञ्चांग देखा
संवत २० १८ के कातिक कुष्ण अमावस्या को वहाँ दिये कुण्डली अनुसार ग्रह है ।
72222] यहाँ कुम्भ ११ जहाँ दिया है वहाँ
से प्रत्येक ग्रहों के स्थान देखा। वहाँ से
६ स्थान में राहु है, नवम स्थान में चन्द्र
सूर्य, बुध, शुक्र है । दशम स्थान में मंगल ।
ग्यारहवे' स्थान से शनि । वारहवे स्थान
में गुरु और केतु हँ । इनकी गति के अनुसार
स्थान बदलते रहते हैं। आगे दिया है
| कि किस स्थान में कौन ग्रह होने से
क्या फल होता है उस चन्द्र से ग्रह का फल प्रकट हो जायगा कि किस ग्रह का प्रभाव
इस समय अच्छा है किस का वुरा है ४
में ग्रहों की स्थिति के अनुसार फळ कहा जाता है कुण्डली में ग्रहों की
स्थिति सदैव काल के लिये स्थिर कर दी जाती है परन्तु गोचर में उन ग्रहों की स्थिति
ET
१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
बदलती रहती है । इससे कुण्डली के फल से गोचर का फल भिन्न है।
ग्रहों के शुभ स्थान
म राशि से कौन ग्रह कब-कब अच्छा फल देते हैं इसका विचार नीचे दिया
है चन्द्र ( राशि ) से इन स्थानों की गिनती दी है।
१ सूर्य-३, ६, १० और ११ वे घर में अच्छा फल देता है।
२ चन्द्र-१, ३, ६, ७, १०, ११ वे घर में भी अच्छा फल देता है।
शुक्ल पक्ष का चन्द्र= २, ५, ९ वे घर में अच्छा फल देता है।
३ बुध-र, ४, ६, ८, १०, ११ वे घर में अच्छा फल देता है।
४ गुरु-२, ५ ७, ९, ११, वे घर में अच्छा फल देता है ।
५ शुक्र-१, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, 1२ वे घर में अच्छा फल देता है ।
इन स्थानों के अतिरिक्त इतर स्थान अशुभ हैं, जहाँ ग्रह अशुभ फल देगा ।
इन शुभ स्थानों में ग्रह हो तो शुभ है परन्तु इनके वेध स्थान भी हैं जिनमें यदि
ग्रह हो तो शुभत्व नाश हो जाता है। वेध स्थान नीचे दिये हैं ।
वेध स्थान
ग्रह शुभ स्थान वेध स्थान
१ सुयं-३, ६, १०, ११ वाँ स्थान ९, १२, ४, ५ वाँ स्थान
२ चन्द्र-१, ३, ६, ७, १०, ११ वाँ स्थान ५, ९, १२, ४, ८ वाँ स्थान
३ चन्द्र शुक्ल पक्ष मे-२, ५, ९, वाँ स्थान ६, ४, ८ वाँ स्थान
४ बुध-२, ४, ६, ८, १०, ११ वाँ स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२ वाँ स्थान
५ गुरु २, ५, ७, ९, ११ वाँ स्थान १२, ४, ३, १०, ८ वाँ स्थान
६ शुक्र-१, २, ३े, ४, ५, ८, ९, ८, ७, १, १०, ९, श्र ११, ३,
११, १२ वाँ स्थान ६ वाँ स्थान
७ मंगल शनि राहु ३, ६, ११ १२, ९, ५ वाँ स्थान
स्पष्टी करण-- (१) सूर्यं का शनि पुत्र है पिता पुत्र का विचार नहीं होता अर्थात्
सूर्य के वेध स्थान में यदि शनि हो तो अशुभ नहीं होता क्योंकि वेध स्थान में कोई ग्रह
हो तो शुभत्व मिट जाता | है इससे सूर्य|-शनि का वेध होना नहीं माना
जाता है।
(२) इसी प्रकार चन्द्र. वुध का परस्पर वेध नहीं होता ( वेध, होने पर भी वेध
नहीं मानते ) अर्थात् सूर्यं का शनि से और शनि का सूर्ये से या चन्द्र का वुध से भौर
वुध का चन्द्र से वेध होने पर भी वेध नहीं माना जाता अर्थात् शुभत्व दूर नहीं होता
क्योंकि साधारणतः यहाँ बताये वेध स्थानों में कोई भी ग्रह हो तो वहाँ उस ग्रह का वेध
होना माना जाता है जिससे शुभत्व दूषित हो जाता हे अर्थात् वह स्यान शुभ नहीं माना जायगा ।
उदाहरण--जैसे कोई भी जन्म राशि से यदि तीसरे स्थान में सूयं हो तो शुभ
फल होगा ऐसा माना जाता है परन्तु सूर्य के तीसरे स्थान के वेध स्थान में देखना
गोचर विचार : १४९
पड़ेगा कोई ग्रह तो नहीं है तीसरे का वेध स्थान ९ हे यदि जन्म राशि से ९ स्थान गिनने पर शनि है तो कोई हानि नहीं, शनि से वेध होना नहीं माना जायगा। मान लो जन्म राशि से शनि नहीं है और भो कोई ग्रह है तो वेध होना माना जायगा जिससे शुप्तत्व दूर हो जाता है ।
मान छो जन्म राशि से ११वें स्थान में मंगल है तो यह शुभ है । परन्तु उसके
११ वें स्थान का वेध स्थान ५ है । यदि जन्म राशि से पांचवे स्थान में कोई भी ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर हो जाता है अर्थात् अशुभ फल दायक होगा । यदि शनि जन्म रांशि से ६ स्थान में हो और इसके वेध स्थान जन्म राशिसे ९ वें स्थान में सूर्य हो तो वेध होना नहीं माना जायगा यदि वहाँ सूर्य को छोड़कर और कोई ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर हो जायगा अर्थात् अशुभ फल दायक होगा। वुध यदि जन्म राशि से अष्टम स्थान में हो तो शुभ होता है परन्तु उसक्रा वेध स्थान १ में चन्द्र हो तो वेध नहीं माना जायगा । यदि और कोई ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर होकर अशुभ होगा ।
इसी प्रकार जन्म राशि से गुरु पांचवा हो तो शुभ होता है परन्तु इसके वेध स्थान
४ में कोई भी ग्रह हो तो शुभत्व नहीं रहेगा ।
इस कारण गोचर में ग्रहों का स्थान फळ देखते समय यह भी देख लेना चाहिये कि उनके वेध स्थान में कोई ग्रह तो नहीं है ।
oo ग्रहों का शुभ स्थान और वेध स्थान सूचक चक्र
ग्रह सूर्य शनि मगल राहु कृष्ण चन्द्र शुक्ल चन्द्र
शुभ स्थान ३ ६ | ११ ३६ १९ १३ ६७ १० १५ २ ९ ५ वध स्थान ९ १२ ४ |५ १२ ९ ५। ५९१२ २४ पत ६८४
ग्रह बुध गुरु शुक्र
शुभ स्थान २ ४ ६ ८१० ११) २ ५७९ ११|१२ ३ ४ ५ ८ ९ ११ १२ वेब स्थान ५ ३९१८५ १ | १२४ ३१० ८]८ ७१ १० ९ ५११३६
विपरीत वेध > व्य
शुभ स्थान के वेध स्थान जो ग्रहों के ऊपर वताये हैं यह क्रम वेध हूँ । अर्थात् ग्रहों
के शुम स्थानों में उनके वेध स्थानों में ग्रह होने से शुभत्व दूर हो जाता है । विपरीत
वेध इसके विरुद्ध है। ग्रहों के शुभ स्थानों को छोड़कर जो इतर स्थान हूँ वे अशुभ
स्थान कहाते हैं । यदि अशुभ स्थान में कोई ग्रह हो परन्तु उसके वेध स्थान में वह अंक
खोजों जिसका वह वेध स्थान है उसमें यदि ग्रह हो तो वह अशुमत्व दूर हो जाता है ।
जैसे सूर्य का शुभ स्थान का वेध स्थान १२ है। सूरं यदि जन्म राशि से १२
वें स्थान में हो तो शुभत्व नहीं होगा अर्यात् अशुभ होगा। यदि सुर्य जन्म राशि से
अशुभ १२ वें स्थान में हो और यदि ६ स्थान में कोई ग्रह हो तो यह वाम वेध
२५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( विपरीत वेध ) अर्थात् उल्टा वेध हुआ । इस प्रकार वाम वेध स्थान में कोई ग्रह
होने से अशुभत्व दूर हो जाता है और वह शुभ हो जाता है जसे सूर्य १२ के अशुभ
स्थान में भी होकर वाम वेध से शुभत्व पा गया । क्रम वेध का उल्टा वांम वेध है ।
यह विपरीत वेध हिमालय और विन्ध्याचल के बीच के देशों में माना जांता है ।
समस्त देश भर को इसके विचार की आवश्यकता नहीं है ( परन्तु क्रम वेध सब स्थानों
में माननीय है।
नक्षत्र अनुसार गोचर फल विचार
जन्म तक्षत्र से कोई ग्रह गोचर में जिस नक्षत्र में हो गिनकर उसका फल विचार१ सूर्य २ चन्द्र ३ मंगल
न० सं० अंग प्रभाव न०सं० अंग प्रभाव न० सं० अंग फल
१ पहिला मुख नाश १-२ मुख वड़ा भय १-२ मुख मृत्यु और
शोक समाचार
२से५ सिर ऐश्वर्य ३-६ सिर कुशल ३-८ पैर शत्रुता कलह
(उन्नति)
६-९ छाती सफलता ७-८ पीठ शत्रु पर ९-११ गर्दन सफलता
जीत
१०-१३ दाहिना दान द्रव्य ९-१० नेत्र धन लाभ १२-१५ बाँया धन हानि
हाथ आगम हाथ ` :
१४-१९ पैर द्रव्य हानि ११-१५छाती मानसिक १६-१७ सिर लाभ
प्रसन्नता
२०-२३ बायाँ हाथ देह पीड़ा १६-१७ बाँया शत्रुता १८-२१ मुख भय की (बीमारी) हाथ वृद्धि २४-२४ नेत्र लाभ १८-२३ पैर घर पर २२-२५ दाहिना कुशलता
वास हाथ
२६-२७गुह्य देह नाश २४-२७ हाहिना धन लाभ २६-२७ नेत्र यात्रा
या भारी हाथ
रोग ४-बुघ ५-गुरु ६-शुक्र ७ शनि ८ राहु € केतु न० स० अङ्ग फल न० सं० अंग फल
१-३ सिर दुःख २-५ बाँया हाथ दुःख ४-६ मुख लाभ ६-८ दाहिना हाथ यात्रा ७-१२ हाथ लाभ ९-११ बाँया पैर नाश १३-१७ पेट अचानक १२-१५ दाहिना पर लाभ घटना अनर्थं
१८-१९ गुह्य धन लाभ १६-२० पेट नाना भोग
गोचर विचार : १५१
२०-२७ पेर नाश ` २१-२३ सिर आनन्द
२४-२५ नेत्र कुशल
२६-२७ पीठ मरणभय
विचार--जिस नक्षत्र पर जन्म का चन्द्र हो उससे गोचर के ग्रह के नक्षत्र तक गिनना जो संख्या आवे उसका फल यहाँ दिया है जैसे जन्म नक्षत्र के चन्र से सूर्य का नक्षत्र गोचर में पाँचवां है तो वह सिर में प्रभाव करेगा जिसका फल उन्नति है । इस प्रकार किसी समय गोचर ग्रह की स्थिति पर से विचार हो सकता है । यदि उस समय
अष्टक वर्ग की गणना से इसमें अधिक शुभ रेखा है तो शुभता का प्रभाव अधिक
बढ़ेगा । इस प्रकार से गोचर का दैनिक फल भी निकाल सकते हैं। गोचर फल पर विचार
जन्म लग्न, आधान लग्न फल एवं चंद्र राशि फल में बहुत कुछ समता दिखती है
इससे राशि कुंडली से ही गोचर फल का विचार बताया है । जन्म राशि ( जन्म चंद्र
की राशि ) को प्रथम स्थान मान कर शेष १२ स्थान को १२ भाव]मानकर फल विचा-
रना पड़ता है ।
चन्द्र प्रति २। दिन में बदलता रहता है । शीघ्रगामी है उसे छोड़कर शेष ग्रहों को
वर्तमान कोई अच्छे पंचाङ्ग से देखकर गोचर की कई कुंडलियाँ बना लेनी चाहिये ।
चंद्र छोड़ कर जब-जब कोई ग्रह बदलता है उस समय की एक-एक कुंडली प्रत्येक समय
की वना लेनी चाहिये । जेसे जब सूये बदला उसकी एक कुंडली बना लो आगे कोई
एक भी ग्रह वदले उसी समय की एक नवीन कुंडली वना लो । इस प्रकार वर्ष भर की
गोचर कुंडलियाँ बन जायगी उन कुंडलियों में समय भी लिख लो । फिर जन्म राशि से
प्रत्येक ग्रहों का फल आगे दिये हुए फल के अनुसार विचार लो ।
इसमें विशेष वात यह भी देखनी पड़ेगी कि जन्म काल के ग्रह से कौन से प्रकार
का दृष्टि योग आदि होता है। जन्म कुंडली के स्थान से अब विशेष ग्रह कोन से स्थान
में भ्रमण कर रहा है । जन्म कुंडली की ग्रह स्थिति से वर्तमान गोचर कुंडली का
लम कर देखना होगा कि जन्म का ग्रह अब गोचर में अच्छी या बुरी केसी स्थिति . में है।
जो ग्रह जन्म पत्नी में उत्तम स्थान में पड़ा हो वह गोचर में शुभ स्थान में आते ही
शुभ फल देगा । जो ग्रह जन्म में विगड़ा हो वह यदि गोचर में अच्छा भी होगा तो
भी शुभ फल नहीं देगा ।
जन्मराशि से गोचर फल विचारते समय इस वात का ध्यान रहे कि चन्द्र उस
राशि में कितने अंश कला विकला से जन्म में है। गोचर फल विचारते समय इस
प्रकार जन्म चन्द्र के अंश से इतर ग्रहों के अंश आदि के विचार से वह ग्रह किस भाव
में है और कौन-कौन ग्रहों की योग दृष्टि उस पर है पूरी परिस्थिति पर विचार कर
फल का निर्णय: करना पड़ेगा ।
जिस समय यह जानने की इच्छा हो कि किसी राशिवाले को अमुक समय अच्छा
| |
१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
है या बुरा है। इसके लिए उसकी जन्म कुंडली देखो उसमें जन्म लग्न के विचार से
सूर्य आदि ग्रह अच्छे हैं या बुरे हैं।
आगे इसका विचार दिया है कि कौन लग्न होने से कौन-कौन ग्रह शुभ या अशुभ हो जाते हैं । ये ग्रह गोचर में जिस स्थान में जावेंगे उस स्थान का सम्बंधीफल उत्पन्न करेंगे । गोचर ग्रह जन्म के ग्रहों से जिस समय अंशात्मक या आसन्न योग करते हैं तव ही उनका ठीक फळ प्रकट होता है !
मनुष्य के जन्म समय ग्रह जिस अंश पर हो जब ठीक उसी राशि ओर अंश पर
गोचर का ग्रह भ्रमण करते हुए पहुंचता है तभी अपना शुभाशुभ फल देने में समर्थ
होता है । ऐसा समझ बैठना कि ग्रहों का राश्यन्त होते हो उस राशि का शुभाशुभ
फल होगा यह समझना सूक्ष्म पद्धति से अशुद्ध है चाहे वह स्थूलमान से ठीक हो । कोई
ग्रह किसी राशि में जन्म होने के पिछले अंशों का फल कैसे दे सकता है जव कि उस
समय उसका जन्म ही नहीं हुआ था । राशि पूरी ३०° की होती है ।
मान लो किसी की वृष राशि है उसमें १५° पर शुक्र है। स्थूल मान से वृष में
शुक्र है । जब शुक्र कन्या राशि में होगा तो पांचवाँ कहा जाता है ! परन्तु सूक्ष्म रूप से
विचार करते हैं तो वृष के १८° से मिथुन के १७° तक १ स्थान हुआ । ककं के १७°
तक दूसरा, सिंह के १७° तक तीसरा, कन्या के १७° तक चौथा ही स्थान हुआ । यहाँ
शुक्र चौथे स्थान का ही फल देगा पांचवें का फल नहीं देगा । आगे तुला के १७° तक
वह पांचवें स्थान का फल देगा । इस प्रकार ग्रह के अंशों के विचार से सूक्ष्म रीति से
विचार कर फल कहना ।
` जन्म लग्नानुसार गोचर फल का बिचार
जन्म कुण्डली के अनुसार मेषादिलग्न में जन्म होने से सूर्यादिग्रह क्या शुभाशुभ
` फल देते हैं यह जान लेना गोचर फळ विचार के लिये आवश्यक है। कोई लग्न होने से
कोन ग्रह शुभ कौन अशुभ है कोन ग्रह मारक होता है आदि हा विचार नीचे दिया. है ।
(१) जन्म लग्न मेष हो तो-शनि, बुध, शुक्र अशभ फलदायक हैं । गुह सूर्य शुभ
फजप्रद हैं । शनि गुरु का संयोग जहां राजकारक है वहां गुरु व्ययेश होने से, शनि
राभेश होने से अन्य प्रकार से पाप फल दायक अवश्य हैं । शनि का जिस समय शुक्र से
सम्वन्ध होता है मारक फल करता है क्योंकि शुक्र यहाँ मारकेश है।
(२) वृष लग्न-शनि, सूर्यं शुभ फक दायक हैं, गुर शुक्र चन्द्र पाप फळ देंगे ।
एक शनि ही राजयोग कारक है पर गुर शुक चन्द्र वुय अनी अपनी दशाओं में अशुभ
फल करेंगे ।
(३) मिथुन छग्न-मंगल, गुरु और सूर्यं अशुभ फल करते हैं। शुक्र शुभ फल
करता है । शनि गुरु का संयोग मेष लग्न के समान ही अशुभ होता है। यदि चन्द्र «
पाप न हुआ तो मारक नहीं होता । बुध शुक्र का संयोग राज योग कारक है। शुक्र
भी व्ययेश होने से कुछ बुरा हो जाता है।
(४) ककं ळग्न-शुक्र वुध अशुभ फल करते हैं । मंगल व गुरु शुभ फ करते हैं